फ़ॉक्स न्यूज़ अमेरिका की एक खबर के अनुसार न्यूयॉर्क से 150 मील दूर पश्चिमी कैट्स्किल्स के घने जंगलों में एक प्राइवेट कालोनी बनाई गई है, जिसका नाम रखा है “इस्लामबर्ग”। यह बस्ती मुख्य सड़क से थोड़ी दूर अन्दर जाकर बनाई गई है और बाहर नाम के साथ “बिना इजाज़त प्रवेश निषेध” का बोर्ड लगा हुआ है। इस बस्ती में कुछ छोटे-छोटे मकान हैं जिनमें लगभग 100 परिवार रहते हैं।

“इस्लामबर्ग” की स्थापना 1980 में शेख सैयद मुबारिक अली शाह गिलानी (पता नहीं ‘गिलानी’ नाम में ऐसा क्या है?) नामक एक पाकिस्तानी व्यवसायी ने बसाई है, जिसने उस समय 70 एकड़ का यह फ़ार्म खरीदा था, और इसमें प्लॉट खरीदने की अनुमति सिर्फ़ उन्हीं को थी जो मुस्लिम हैं। इस छोटी सी टाउनशिप में उनकी खुद की एक मस्जिद, बाज़ार और स्कूल भी है, आसपास के गाँवों के निवासी बताते हैं कि उक्त बस्ती में एक “फ़ायरिंग रेंज”(?) भी है। गिलानी ने इसी से मिलती-जुलती और भी बस्तियाँ बसाई हैं, जिसमें प्रमुख है दक्षिण वर्जिनिया में बसी “रेड हाउस कम्यूनिटी”, गिलानी महाशय ने “मुस्लिम्स ऑफ़ अमेरिका” नाम का एक संगठन भी बनाया हुआ है।

अमेरिकी अधिकारी कहते हैं कि गिलानी जमात-अल-फ़क्रा का संस्थापक भी है, जो कि विभिन्न इलाकों में बम विस्फ़ोट के लिये जिम्मेदार माना जाता है, इस समूह का 1993 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में हुए बम विस्फ़ोट में भी हाथ रहा है और इसके 10 सदस्य पोर्टलैण्ड में एक होटल में हुए विस्फ़ोट के मामले में दोषी पाये गये हैं, हालांकि गिलानी इस आरोप से इन्कार करते हैं। यह गिलानी साहब वही व्यक्ति हैं जिनका पाकिस्तान में इंटरव्यू लेने की कोशिश डेनियल पर्ल कर रहे थे। पाकिस्तान सरकार ने भी गिलानी को पूछताछ के लिये रोका था, लेकिन बाद में छोड़ दिया था। इस मुस्लिम बस्ती को छोड़ चुके एक व्यक्ति ने नाम गुप्त रखने पर बताया कि यहाँ रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आय का 10 से 30 प्रतिशत हिस्सा गिलानी को देना पड़ता है। फ़ॉक्स न्यूज़ ने यहाँ रहने वाले अन्य लोगों से बात करने की कोशिश की, लेकिन सभी ने मीडिया से बात करने से मना कर दिया…

ऐसा लगता है कि अमेरिका को आज पता चला है कि “अलग मुस्लिम बस्ती” नाम की भी कोई चीज़ होती है…बेचारा!!! भारत के पाठक अपने दिल पर हाथ रखकर कहें कि क्या भारत के प्रत्येक शहर में इस प्रकार की दो-चार बस्तियाँ नहीं हैं? और इन बस्तियों में वे खुद जाना तो दूर, प्रशासनिक अधिकारी, जल-विद्युत आपूर्ति अधिकारी और पुलिस अधिकारी भी सोच-समझकर ही घुसते हैं… 60 साल के कांग्रेस के “जय हो…” शासन की यह भी एक देन है…

खबर का स्रोत – यहाँ देखें

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(भाग-2 – यहाँ देखें) से आगे जारी… समापन किस्त)

इस लेखमाला का उद्देश्य यही है कि आप और हम भले ही पाकिस्तान द्वारा पढ़ाये जा रहे इस प्रकार के पाठ्यक्रम को पढ़कर या तो हँसें या गुस्से में अपना माथा पीटें, लेकिन सच तो यही है कि पाकिस्तान में 1971 के बाद पैदा हुई पूरी एक-दो पीढ़ियाँ यही पढ़-पढ़कर बड़ी हुई हैं और फ़िर भी हम उम्मीद कर रहे हैं कि पाकिस्तान कभी हमारा दोस्त बन सकता है? जो खतरा साफ़-साफ़ मंडरा रहा है उसे नज़र-अन्दाज़ करना समझदारी नहीं है। सरस्वती शिशु मन्दिरों को पानी पी-पीकर कोसने वाले अपने दिल पर हाथ रखकर कहें कि क्या इतना घृणा फ़ैलाने वाला कोर्स सरस्वती शिशु मन्दिरों में भी बच्चों को पढ़ाया जाता है? देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति पैदा करने वाला कोर्स पढ़ाने और किसी धर्म/देश के खिलाफ़ कोर्स पढ़ाने में मूलभूत अन्तर है, इसे “सेकुलर”(?) लोग नहीं समझ रहे। शिवाजी को “राष्ट्रनायक” बताना कोई जुर्म है क्या? या ऐसा कहीं लिखा है कि पृथ्वीराज चौहान की वीरता गाथायें पढ़ाना भी साम्प्रदायिक है? पाकिस्तान से तुलना की जाये तो हमारे यहाँ पढ़ाये जाने वाला पाठ्यक्रम अभी भी पूरी तरह से सन्तुलित है। हालांकि इसे विकृत करने की कोशिशे भी सतत जारी हैं, और सेकुलरों की असली चिढ़ यही है कि लाख चाहने के बावजूद भाजपा, हिन्दूवादी संगठनों और सरस्वती शिशु मन्दिरों के विशाल नेटवर्क के कारण वे पाठ्यक्रम् को “हरे” या “लाल” रंग से रंगने में सफ़ल नहीं हो पा रहे… हाँ, जब भी भाजपा पाठ्यक्रम में कोई बदलाव करती है तो “शिक्षा का भगवाकरण” के आरोप लगाकर हल्ला मचाना इन्हें बेहतर आता है।

गत 60 साल में से लगभग 50 साल तक ऐसे ही “लाल” इतिहासकारों का सभी मुख्य शैक्षणिक संस्थाओं पर एकतरफ़ा कब्जा रहा है चाहे वह ICHR हो या NCERT। उन्होंने इतिहास पुनर्लेखन के नाम पर तमाम मुस्लिम आक्रांताओं का गौरवगान किया है। लगभग हर जगह भारतीय संस्कृति, प्राचीन भारत की गौरवशाली परम्पराओं, संस्कारों से समृद्ध भारत का उल्लेख या तो जानबूझकर दरकिनार कर दिया गया है या फ़िर अपमानजनक तरीके से किया है (एक लेख यह है)। इनके अनुसार 8वी से लेकर 10वीं शताब्दी में जब से धीरे-धीरे मुस्लिम हमलावर भारत आना शुरु हुए सिर्फ़ तभी से भारत में कला, संस्कृति, वास्तु आदि का प्रादुर्भाव हुआ, वरना उसके पहले यहाँ रहने वाले बेहद जंगली और उद्दण्ड किस्म के लोग थे। इसी प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजों के शासनकाल को भी भारतवासियों को “अनुशासित” करने वाला दर्शाया जाता है, लेकिन “लाल” इतिहासकारों का “असली और खरा प्रेम” तो मुस्लिम शासक और उनका शासनकाल ही हैं। सिक्ख गुरुओं द्वारा किये गये संघर्ष को “लाल मुँह वाले” लोग सिर्फ़ एक राजनैतिक संघर्ष बताते हैं। ये महान इतिहासकार कभी भी नहीं बताते कि बाबर से लेकर ज़फ़र के शासनकाल में कितने हिन्दू मन्दिर तोड़े गये? क्यों आज भी कई मस्जिदों की दीवारों में हिन्दू मन्दिरों के अवशेष मिल जाते हैं?

NCERT की सातवीं की पुस्तक “हमारे अतीत – भाग 2” के कुछ नमूने –

1) तीसरा अध्याय, पाठ : दिल्ली के सुल्तान – लगभग 15 पेज तक अलाउद्दीन खिलजी और मुहम्मद तुगलक और उनके शासन का गुणगान।

2) चौथा पाठ – 15 पेज तक मुगल सेना तथा बाबर, अकबर, हुमायूँ, जहाँगीर, औरंगज़ेब की ताकत का बखान। फ़िर अकबर की प्रशासनिक व्यवस्था का वर्णन।

3) पाँचवा पाठ – “रूलर्स एण्ड बिल्डिंग्स”, कुतुब मीनार, दिल्ली की जामा मस्जिद, हुमायूं का मकबरा और ताजमहल आदि का बखान।

4) दसवाँ अध्याय – 18वीं सदी का राजनैतिक खाका – ढेर सारे पेजों में नादिरशाह, निजाम आदि का वर्णन, जबकि राजपूत, जाट, मराठा और सिख राजाओं को सिर्फ़ 6 पेज।

कुल मिलाकर मुस्लिम शासकों और उनके बारे में 60-70 पेज हैं, जबकि हिन्दुओं को पहली बार मुगल शासकों की गुलामी से मुक्त करवाकर “छत्रपति” कहलाने वाले शिवाजी महाराज पर हैं कुल 7 पेज। शर्म की बात तो यह है कि विद्वानों को “शिवाजी” का एक फ़ोटो भी नहीं मिला (पुस्तक में तस्वीर की जगह खाली छोड़ी गई है, क्या शिवाजी महाराज यूरोप में पैदा हुए थे?), जबकि बाबर का फ़ोटो मिल गया। इसी पुस्तक में राजपूत राजाओं पर दो पेज हैं जिसमें राजा जयसिंह का उल्लेख है (जिसने मुस्लिम धर्म स्वीकार कर लिया था), जबकि घास की रोटी खाकर अकबर से संघर्ष करने वाले महाराणा प्रताप पर सिर्फ़ एक पैराग्राफ़… हिन्दुओं से ऐसी भी क्या नफ़रत!!! इतिहास की पुस्तक में “मस्जिद कैसे बनाई जाती है?” “काबा की दिशा किस तरफ़ है…” आदि बताने की क्या आवश्यकता है? लेकिन जब बड़े-बड़े संस्थानों में बैठे हुए “बुद्धिजीवी”(?), “राम” को काल्पनिक बताने, रामसेतु को तोड़ने के लिये आमादा और भगतसिंह-राजगुरु-सुखदेव को हीरो की बजाय “आतंकवादी” दर्शाने पर उतारू हों तो ऐसा ही होता है।

अक्सर इतिहास की पुस्तकों में बाबर और हुमायूँ को “उदारवादी” मुस्लिम बताया जाता है जिन्होंने “जज़िया” नहीं लगाया और हिन्दुओं को मन्दिर बनाने से नहीं रोका… फ़िर जैसे ही हम अकबर के शासनकाल तक पहुँचते हैं अचानक हमें बताया जाता है कि अकबर इतना महान शासक था कि उसने “जज़िया” की व्यवस्था समाप्त कर दी। ऐसे में सवाल उठता है कि जो जजिया बाबर और हुमायूं ने लगाया ही नहीं था उसे अकबर ने हटा कैसे दिया? “लाल” इतिहासकारों का इतिहास बोध तो इतना उम्दा है कि उन्होंने औरंगज़ेब जैसे क्रूर शासक को भी “धर्मनिरपेक्ष” बताया है… काशी विश्वनाथ मन्दिर तोड़ने को सही साबित करने के लिये एक कहानी भी गढ़ी गई (यहाँ देखें…) फ़िर जब ढेरों मन्दिर तोड़ने की बातें साबित हो गईं, तो कहा गया कि औरंगज़ेब ने जो भी मन्दिर तोड़े वह या तो राजनैतिक उद्देश्यों के लिये थे या फ़िर दोबारा बनवाने के लिये (धर्मनिरपेक्षता मजबूत करने के लिये)… क्या कमाल है “शर्मनिरपेक्षता” का।

ये तो सिर्फ़ एक उदाहरण भर है, अधिकतर पुस्तकों का “टोन” कुछ ऐसा है कि “मुस्लिम शासक” ही असली शासक थे, हिन्दू राजा तो भगोड़े थे… बच्चों के दिमाग में एक “धीमा ज़हर” भरा जा रहा है। “लाल इतिहासकारों” का “अघोषित अभिप्राय” सिर्फ़ यह होता है कि “तुम हिन्दू लोग सिर्फ़ शासन किये जाने योग्य हो तुम कभी शासक नहीं थे, नहीं हो सकते…”। हिन्दुओं के आत्मसम्मान को किस तरह खोखला किया जाये इसका अनुपम उदाहरण हैं इस प्रकार की पुस्तकें… और यही पुस्तकें पढ़-पढ़कर हिन्दुओं का खून इतना ठण्डा हो चुका है कि “वन्देमातरम” का अपमान करने वाला भी कांग्रेस अध्यक्ष बन सकता है, “सरस्वती वन्दना” को साम्प्रदायिक बताने पर भी किसी को कुछ नहीं होता, भारत माता को “डायन” कहने के बावजूद एक व्यक्ति मंत्री बन जाता है, संसद जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थान पर हमले के बावजूद अपराधी को फ़ाँसी नहीं दी जा रही…सैकड़ों-सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं, और यह सब हो रहा है “सेकुलरिज़्म” के नाम पर… यह इसी “विकृत मानसिक शिक्षा” की ही देन है कि ऐसे नापाक कामों के समर्थन में उन्हें भारत के ही “हिन्दू बुद्धिजीवी” भी मिल जाते हैं, क्योंकि उनका दिमाग भी या तो “हरे”/“लाल” रंग में रंगा जा चुका है अथवा खाली कर दिया गया है… ऐसा होता है “शिक्षा” का असर…

शिवाजी महाराज का पालन-पोषण जीजामाता ने भगवान राम और कृष्ण की कहानियाँ और वीरता सुनाकर किया था और उन्होंने मुगलों की नाक के नीचे “पहले हिन्दवी स्वराज्य” की स्थापना की थी, लेकिन जिस तरह से आज के नौनिहालों का “ब्रेन वॉश” किया जा रहा है ऐसे में हो सकता है कि आने वाले कुछ सालों के बाद पाठ्यपुस्तकों में ओसामा बिन लादेन, सद्दाम हुसैन, दाऊद इब्राहीम, परवेज़ मुशर्रफ़ की वीरता(?) के किस्से भी प्रकाशित हो सकते हैं और उससे क्या और कैसी प्रेरणा मिलेगी यह सभी को साफ़ दिखाई दे रहा है सिवाय “सेकुलर बुद्धिजीवियों” के…
शिक्षा व्यवस्था को सम्पूर्ण रूप से बदले बिना, (अर्थात भारतीय संस्कृति और देश के बहुसंख्यक, फ़िर भी सहनशील हिन्दुओं के अनुरूप किये बिना) भारतवासियों में आत्मसम्मान, आत्मगौरव की भावना लाना मुश्किल ही नहीं असम्भव है, वरना “हिन्दुत्व” तो खत्म होने की ओर अग्रसर हो चुका है। मेरे जैसे पागल लोग भले ही चिल्लाते रहें लेकिन सच तो यही है कि 200 वर्ष पहले कंधार में मन्दिर होते थे, 100 वर्ष पहले तक लाहौर में भी मन्दिर की घंटियाँ बजती थीं, 50 वर्ष पहले तक श्रीनगर में भी भजन-कीर्तन सुनाई दे जाते थे, अब नेपाल में तो हिन्दुत्व खत्म हो चुका, सिर्फ़ वक्त की बात है कि “धर्मनिरपेक्ष भारत”(?) से हिन्दुत्व 50-100 साल में खत्म हो जायेगा… और इसके लिये सबसे अधिक जिम्मेदार होंगे “कांग्रेस” और “सेकुलर बुद्धिजीवी” जो जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं… लेकिन इन्हें अक्ल तब आयेगी जब कोई बांग्लादेशी इनके दरवाजे पर तलवार लेकर खड़ा होगा और उसे समर्थन देने वाला कोई कांग्रेसी उसके पीछे होगा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

अमूमन एक सवाल किया जाता है कि इस्लामिक देशों में लोकतन्त्र क्यों नहीं पनपता? इसका जवाब भी इसी लेख में निहित है कि “लोकतांत्रिक” होना भी एक जीवन पद्धति है जो हिन्दू धर्म में खुद-ब-खुद मौजूद है, न तो वामपंथी कभी लोकतांत्रिक हो सकते हैं, ना ही इस्लामिक देश। एक तरफ़ पाकिस्तान की शिक्षा व्यवस्था और दूसरी तरफ़ भारत की शिक्षा व्यवस्था, आप खुद ही फ़ैसला कर लीजिये कि हम कहाँ जा रहे हैं और हमारा “भविष्य” क्या होने वाला है…


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Pakistan Education System & Indian Secular Intellectuals (part-2)

… भाग-1 (यहाँ देखें) से आगे जारी…

कल्पना कीजिये कि 14-15 साल के बच्चे को कक्षा 9-10 में बताया जा रहा है कि “दक्षिण एशिया और समूचे विश्व में मुसलमानों की गिरती हालत इसलिये है क्योंकि मुसलमानों में “जेहाद” की भावना में कमी आ गई है…” (पाकिस्तान स्टडीज़, पेज 7, कक्षा 9)। “इस्लाम में जेहाद एक बहुत महत्वपूर्ण बात है, जो जेहाद करता है वह कभी नहीं मरता…” (पाकिस्तान स्टडीज़, पेज 10, कक्षा 9-10)। “हर मुसलमान को जेहाद के लिये अपनी जिन्दगी और सम्पत्ति दाँव पर लगाने को तैयार रहना चाहिये, जेहाद और सारी कुर्बानियों का मकसद सिर्फ़ “अल्लाह” को खुश करना है…” (पाकिस्तान स्टडीज़, पेज 4, कक्षा 12)। “अंग्रेजों ने हमारी लायब्रेरियों से कई दुर्लभ पुस्तकें इंग्लैण्ड भेज दीं ताकि इस्लाम का विश्व में प्रसार ना हो सके…” (सोशल स्टडीज़, पेज 99, कक्षा 6)। कराची निवासी प्रोफ़ेसर मियाँ मुहम्मद असलम और काज़ी सज्जाद कहते हैं कि “हमारी सरकार बच्चों को ‘जीवन’ की शिक्षा देने की बजाय मौत का खेल सिखा रही है, और इस तरह का विकृत इतिहास और समाजशास्त्र पढ़ने के बाद “फ़िदायीन” और मानव बम न बनें ऐसा हो ही नहीं सकता…, यह सरकार और इसकी शिक्षा पद्धति पाकिस्तान के समाज को एक हमलावर समाज बनाकर रख देंगे…” (यह आशंका कितनी सच निकली है यह अलग से बताने की जरूरत नहीं है) (यहाँ देखें)।

ऐसा नहीं कि इस शिक्षा पद्धति और पाठ्यक्रम पर कोई सवाल नहीं उठे, लेकिन सवाल उठाने वालों की संख्या और सत्ता में उनकी भागीदारी बेहद कमजोर है। इसमें व्यापक बदलाव करके इतिहास को हिन्दुत्व, बौद्ध परम्पराओं और सम्राट चन्द्रगुप्त से शुरु करने की बात उठते ही अधिकतर राजनैतिक पार्टियों ने एक सुर में कहा कि “हमारा इतिहास मक्का और मदीना से शुरु होता है…”। पाकिस्तान में शिक्षाविदों ने राजनैतिक पार्टियों और धार्मिक समूहों को समझाने की भरसक कोशिश की, कि इस प्रकार की पढ़ाई करवाने से एक पूरी पीढ़ी सच्चे तथ्यों, सही इतिहास और ज्ञान से वंचित रह जायेगी, लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं मानी। सिन्धु घाटी और गंधार (आज का कंधार) सभ्यता के बारे में भी एकाध-दो पाठ बड़ी मुश्किल से शामिल करवाये गये। “काफ़िरों को मारने के लिये मुहम्मद बिन कासिम और महमूद गजनवी को महिमामंडित किया गया है…, “बाबर” ने भारत की वास्तुकला को इसलिये बदल दिया क्योंकि उसे हिन्दुओं द्वारा निर्मित छोटे-छोटे और अंधेरे कमरे पसन्द नहीं थे…” किस तरह से हिन्दुओं और भारत को नीचा दिखाया जाये और उसके खिलाफ़ नफ़रत फ़ैलाई जाये इसका उदाहरण हैं पाकिस्तान की पाठ्य-पुस्तकें और ऐसे माहौल में, ऐसी पुस्तकों से पढ़े-लिखे बच्चे बड़े होकर “कसाब” नहीं बनेंगे तो क्या बनेंगे?

सिर्फ़ वहाँ के मदरसों को दोष क्यों दें, जब पाकिस्तान की सरकार खुद ही बच्चों के मन में भारत के विरुद्ध लगातार जहर घोल रहा है। पाकिस्तान के सैनिक शासक अय्यूब खान ने 1959 में पहला राष्ट्रीय शिक्षा आयोग बनाया जिसकी रिपोर्ट को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तौर पर स्वीकार किया गया, जबकि प्राथमिक शिक्षा की जिम्मेदारी राज्य सरकारों को सौंप दी गई। दूसरी पंचवर्षीय योजना (1960-65) के दौरान प्राथमिक और सेकण्डरी शिक्षा व्यवस्था और पाठ्यक्रम को बदलने की कोशिशें तेज हो गईं और सरकार की ओर से कहा गया कि “बच्चों के पाठ्यक्रम में इस्लामिक और धार्मिक शिक्षा पर अधिक जोर दिया जाना चाहिये…”। 1965 में भारत के साथ युद्ध के कारण शिक्षा संस्थानों की आर्थिक मदद में भारी कटौती कर दी गई, और यही समय था जब विभिन्न जमातों ने धीरे-धीरे शिक्षा प्रसार के क्षेत्र में दबदबा बढ़ाना शुरु कर दिया। 1969 में एक बार पुनः एक राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनाई गई जिसमें पारम्परिक मदरसों और सरकारी स्कूलों के बीच पैदा हुई खाई को कम करने हेतु कदम उठाने की बात थी, लेकिन 1971 के युद्ध और बांग्लादेश के अलग हो जाने की “चोट” भुट्टो सरकार भुला नहीं सकी और पाठ्यक्रम में इस्लामिक बदलाव की प्रक्रिया और तेज हो गई। एक और सैनिक विद्रोह और जनरल जिया-उल-हक के सत्ता संभालने के तुरन्त बाद एक राष्ट्रीय शिक्षा समागम का आयोजन किया गया, जिसमें शिक्षा व्यवस्था में “आमूलचूल” (?) परिवर्तन करने की बात कही गई। जनरल जिया की भाषण के अनुसार “आमूलचूल परिवर्तन” यानी कि “हमारा पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिये पाकिस्तान के बच्चे एक सच्चे मुसलमान बन सकें, बच्चों में इस्लामिक संस्कार भरना और उन्हें इस प्रकार की शिक्षा देना हमारा कर्तव्य है…”। जो प्रक्रिया पहले ही तेज हो चुकी थी उसे और जोरदार इस्लामिक ईंधन मिला और शिक्षा पद्धति के मुख्यतः चार बिन्दु तय किये गये… 1) पाकिस्तान सिर्फ़ मुसलमानों का है, 2) इस्लामिक शिक्षा और कुरान को कण्ठस्थ करना प्रत्येक छात्र को अनिवार्य किया जाये भले ही वह किसी भी धर्म का हो… 3) पाकिस्तान की छवि और विचारधारा इस प्रकार बनाना कि हिन्दुओं और भारत के विरोध को उसमें प्रमुखता दी जाये… 4) छात्रों को “जेहाद” और “शहादत” के बारे में विस्तार से बताना ताकि वे उस रास्ते पर चल सकें…।

धीरे-धीरे सभी शैक्षणिक संस्थायें उसी राह पर चल पड़ीं और पाकिस्तान में रहने वाले प्रत्येक धर्मावलम्बी के बच्चे को प्राथमिक स्तर पर कम से कम पाँच बातें आना अनिवार्य कर दिया गया, नेशनल अर्ली चाइल्डहुड कुर्रिकुलम (NECEC) के अनुसार, किसी से मिलने पर “अस्सलाम वालैकुम” कहना, “बिस्मिल्लाह” कब कहा जाता है यह जानना, पहला “कलमा” क्या होता है और उसका अर्थ क्या है तथा रमजान और ईद पर रोज़ाना पढ़ी जाने वाली पाँच प्रार्थनायें कौन सी हैं… यह तमाम बातें अनिवार्य की गईं। फ़िर बारी आती है मिडिल स्कूल और हाई स्कूल की… एक झलक उसकी भी…
“हिन्दू हमेशा इस्लाम के दुश्मन रहे हैं, हिन्दू अपने बच्चों को बुरी-बुरी बातें सिखाते हैं… (कक्षा 5 पेज 108 पंजाब बोर्ड लाहौर), हिन्दू लोग अपनी औरतों का सम्मान नहीं करते हैं, हिन्दुओं के मन्दिर अक्सर गन्दे और अंधेरे होते हैं वहीं उनकी पूजा की मूर्तियाँ रखी होती हैं, हिन्दुओं के मन्दिर में एक बार में सिर्फ़ एक ही आदमी घुस सकता है… जबकि हमारी मस्जिदें खुली हुई होती हैं और वहाँ सभी एक साथ नमाज़ पढ़ सकते हैं… (मुआशरेती उलूम, कक्षा चौथी, पेज 81, कक्षा 5, पेज 109) तथा “हिन्दुओं में कई प्रकार की सामाजिक बुराईयाँ होती हैं, हिन्दू सोचते हैं कि उनके अलावा और कोई देश इस दुनिया में नहीं है, भारत के लोगों को कोई खास ज्ञान नहीं होता है… (कक्षा 6, सोशल स्टडीज़, पेज 59, मार्च 2002)। (क्या सरस्वती शिशु मन्दिरों में मुसलमानों के बारे में ऐसा कुछ पढ़ाया जाता है?)

मीनार-ए-पाक की कहानी के अंश - 1) मुसलमानों द्वारा(?) जब आज़ादी हासिल कर ली तो उन्हें एक अपना देश चाहिये था, जहाँ वे इस्लाम के मुताबिक रह सकें और कुरान/शरीयत के कानून लागू कर सकें, लेकिन उन्हें मालूम था कि हिन्दू लोग ऐसा कभी नहीं करने देंगे क्योंकि वे हिन्दुस्तान में बहुमत में थे। जब अंग्रेज जा रहे थे तब वे साजिश कर रहे थे कि समूचे राज्य पर हिन्दुओं और भगवान का राज हो जाये और हिन्दू कानून(?) लागू कर दिये जायें, इस कानून के मुताबिक सभी मुसलमान अछूत बन जाते… 2) मुसलमानों को भय सताने लगा था कि अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होने के बाद वे हिन्दुओं के गुलाम बन जायेंगे… 3) मुसलमानों ने अपनी सच्ची आज़ादी की माँग की और पाकिस्तान ले लिया ताकि अल्लाह का राज कायम हो सके… (कक्षा 4, विषय उर्दू, पेज 36-39, पंजाब शिक्षा बोर्ड)।

“हिन्दू पण्डित हमेशा अल-बरूनी से जलते थे, क्योंकि वे कभी भी अल-बरूनी की विद्वत्ता का मुकाबला नहीं कर सकते थे…। दिल्ली के सुल्तान धार्मिक मामलों में बेहद मुलायम थे, उन्होंने कभी भी किसी को इस्लाम अपनाने पर जोर नहीं दिया… उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों में कभी भी भेद नहीं किया… (कक्षा 8, विषय अंग्रेजी, पाठ 3) (लगभग यही बातें भारत में भी “सेकुलर लोग” हमारे बच्चों को पढ़ाते हैं, जबकि औरंगज़ेब हो, बाबर हो या अकबर सभी की पोल बाकायदा विभिन्न कागज़ातों से खुल चुकी है कि ये लोग न सिर्फ़ धर्मान्ध थे बल्कि औरतखोर और दारुकुट्टे भी थे)। कक्षा आठवीं की सोशल स्टडीज़ की पुस्तक में “मुस्लिम विश्व”, “मुस्लिम विश्व के पहाड़”, “मुस्लिम विश्व की नदियाँ”, “मुस्लिम विश्व के समुद्र” आदि का उल्लेख किया गया है, अब इस “मुस्लिम पहाड़, मुस्लिम नदियाँ” आदि का मतलब तो तालिबान ही समझा सकता है…। इन पुस्तकों में मुहम्मद-बिन-कासिम को पहला पाकिस्तानी नागरिक(?) बताया गया है, कक्षा 6 की सोशल स्टडीज़ (सिन्ध टेक्स्टबुक बोर्ड, 1997) में दर्शाया गया है कि सिंधी शासक राजा धीर बेहर कूर और निर्दयी था और उसके ज़ुल्मों के कारण क्षेत्र के निवासियों ने मुहम्मद-बिन-कासिम से हाथ मिला लिया जिसने सभी के साथ बराबरी का व्यवहार किया…। बांग्लादेश के बनने की हकीकत को बड़ी सफ़ाई से छिपाकर भारत को इसके लिये जिम्मेदार ठहरा दिया गया है… कहा गया है कि “1965 के युद्ध में हार(?) जाने के बाद भारत ने पूर्वी पाकिस्तान के हिन्दुओं को पश्चिमी पाकिस्तान के खिलाफ़ भड़काया और पहले आंदोलन करवाकर फ़िर उनकी सैनिक मदद करके बांग्लादेश नामक देश बनवा दिया…”।

अगले समापन भाग में हम देखेंगे भारत की धर्मनिरपेक्ष शिक्षा(?), और नकली सेकुलरिज़्म के खतरे के बारे में (भाग-3 में जारी…)

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Pakistan Education System & Indian Secular Intellectuals

“1947 से पहले भारत, पाकिस्तान का ही एक हिस्सा था”… “1965 के युद्ध में पाकिस्तान ने भारत के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था, लेकिन निश्चित हार देखकर नई दिल्ली ने संयुक्त राष्ट्र से बचाव की गुहार लगाई और हमने युद्धविराम कर दिया…”, “1971 की लड़ाई में पाकिस्तानी सेना ने बड़ी हिम्मत दिखाते हुए भारत के पूर्वी और पश्चिमी वायु कमान को बुरी तरह नष्ट कर दिया था…” ना, ना, ना भाईयों ये पंक्तियाँ मैं भांग खाकर नहीं लिख रहा, असल में यही कुछ पाकिस्तान के मदरसों में बच्चों को पढ़ाया जा रहा है, और ये बात आरएसएस या भाजपा नहीं कह रही, बल्कि पाकिस्तान की खुफ़िया एजेंसियाँ इस बात की तसदीक कर चुकी हैं कि बगैर किसी सरकारी मदद से चलने वाले हजारों मदरसों में इस प्रकार की विकृत शिक्षा और बे-सिर-पैर के पाठ पढ़ाये जा रहे हैं।

जब मुम्बई में आतंकी हमले हुए तब लोगों ने टीवी पर देखा कि कम उम्र के बेहद कमसिन से नज़र आने वाले छोकरे हाथों में एके-47 और झोले में हथगोले भरे हुए ताबड़तोड़ सुरक्षा बलों और आम आदमियों पर हमले कर रहे हैं। संयोग से उसमें से एक अजमल कसाब पकड़ा भी गया। उस समय कई भारतीयों ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया था कि इतनी कम आयु में ये बच्चे आतंकवादी कैसे बन गये? किसने इनके दिमाग में भारत के प्रति इतना जहर भर दिया है कि अपने परिवार और अपनी उम्र को भूलकर ये आतंकवादी बन गये? इसका एकमात्र और विस्तृत जवाब है पाकिस्तान की मौजूदा शिक्षा प्रणाली, पाकिस्तान के स्कूलों में पढ़ाये जा रहे पाठ्यक्रम, प्रायमरी और मिडिल कक्षाओं में कोर्स में भारत के विरुद्ध उगला गया जहर…

आज जबकि तालिबान का शिकंजा अफ़गानिस्तान से होते हुए स्वात घाटी और कराची तक पहुँच चुका है, भारत के ये “सेकुलर” और “नॉस्टैल्जिक” अभी भी पाकिस्तान से दोस्ती के मुगालते पाले बैठे हैं। न सिर्फ़ खुद मुगालते पाले हुए हैं, NCERT की पुस्तकों की मदद से भारत के बच्चों को भी अपनी तरह के “नकली सेकुलर” बनाने की जुगत में लगे हुए हैं। हाल ही में अखबारों में वाघा सीमा से लौटते हुए कुछ महानुभावों का चित्र छपा था, ये महानुभाव पाकिस्तान की सदभावना यात्रा पर गये थे, जाहिर है कि ये सेकुलर ही होंगे, इनमें शामिल थे महेश भट्ट, कुलदीप नैयर और स्वामी अग्निवेश। अब ये कहना मुश्किल है कि ये सज्जन “नॉस्टैल्जिक” हैं, आवश्यकता से अधिक आशावादी हैं, या फ़िर एकदम मूर्ख हैं… इनमें से पहली सम्भावना सबसे अधिक मजबूत लगती है। इन जैसे कई-कई लोग भारत में भरे पड़े हैं जो 60 साल बाद भी यह सोचते हैं कि मुस्लिम बहुल पाकिस्तान कभी भारत का दोस्त बन जायेगा। एक बड़ा सा समूह है जो पाकिस्तान से दोस्ती के राग अलापता रहता है, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि पाकिस्तान में कोर्स में क्या-क्या पढ़ाया जा रहा है… और इससे भी ज्यादा दुःखद बात यह है कि इन जैसे लोग लगातार “सरस्वती शिशु मन्दिरों” की शिक्षा प्रणाली पर हमले बोलते रहते हैं, शिक्षा का भगवाकरण रोकने के नाम पर बच्चों के मन में एक विकृत सेकुलरिज़्म थोपते जा रहे हैं। भारत, भारतीय संस्कृति आदि से इन सेकुलर लोगों को कोफ़्त महसूस होती है। भारत के प्राचीन इतिहास को किस तरह या तो बदनाम किया जाये या फ़िर तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाये इसी कोशिश में ये लोग सतत लगे रहते हैं… सेकुलरिज़्म के मसीहा अर्जुनसिंह का मंत्रिकाल हो या JNU के किसी प्रोफ़ेसर का लिखा हुआ पाठ्यक्रम हो, अथवा किसी वामपंथी द्वारा ICHR में चमचागिरी से घुसपैठ करके लिखा गया खास सेकुलर इतिहास हो, इस सारी मानसिकता की एक झलक हमें NCERT की पुस्तकों में देखने मिल जाती है… इस लेख के आगे के हिस्सों में हम भारत में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों के बारे में भी जानेंगे, लेकिन पहले हमारे “छोटे भाई”(?) के घर क्या पढ़ाया जा रहा है, यह देख लेते हैं…

यह एक स्वाभाविक सी बात है कि बच्चा एक कच्ची मिट्टी के घड़े के समान होता है उसे जिस प्रकार ढाला जाये ढल जायेगा और एक विशेष आयु के बाद उसका दिमाग इतना “कण्डीशण्ड” हो चुका होता है कि उसे बदलना बेहद मुश्किल होता है। कच्चे दिमागों पर काबू पाने और उन्हें अपनी विचारधारा के मुताबिक मोड़ने में सबसे ज्यादा प्रभावशाली हथियार है “स्कूली पढ़ाई”, पाकिस्तान के प्रायमरी और मिडिल स्कूलों में सरकारी तौर पर क्या पढ़ाया जा रहा है और बच्चों का इतिहास बोध कितना सही है, इसके सर्वेक्षण हेतु पाकिस्तान के कुछ शिक्षाविदों की एक समिति बनाई गई थी, जिसने अपने अध्ययन में बेहद चौंकाने वाले खुलासे किये हैं और इस पाठ्यक्रम को तत्काल बदलने की सिफ़ारिश की है (हालांकि ऐसा कुछ होने की उम्मीद कम ही है)। Sustainable Development Policy Institute (SDPI) द्वारा इस समिति की एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई है, जिसका नाम है “The Subtle Subversion : The State of Curricula and Textbook in Pakistan” जिसके सम्पादक हैं एएच नैयर और अहमद सलीम (कुल पृष्ठ 154)। (यहाँ देखें)

SDPI द्वारा जो अध्ययन किया गया था वह पाकिस्तान के सरकारी स्कूलों में पढ़ाये जा रहे पाठ्यक्रम के बारे में है, उसी पाकिस्तान सरकार के बारे में जिसके “प्रेम और विश्वास” में गाँधी-नेहरु और समूची कांग्रेस 60 साल से डूबे हैं। जब सरकार के स्तर पर यह हालात हैं तो “जमात-उद-दावा” द्वारा संचालित और आर्थिक मदद से चलने वाले मदरसों में क्या पढ़ाया जाता होगा इसकी एक हल्की सी झलक लेख के पहले पैराग्राफ़ में आप पढ़ चुके हैं।

भारत की खुफ़िया एजेंसी आईबी द्वारा भी विभिन्न सीमावर्ती मदरसों से जब्त पुस्तकों और कश्मीरी आतंकवादियों से पूछताछ के दौरान पता चला है कि कच्चे दिमागों को “हरे रंग” में रंगने के लिये पाकिस्तान के मदरसों में अनवर-अल-अवलाकी द्वारा लिखित पुस्तक “जेहाद का समर्थन करने के 44 तरीके…” पढ़ाई जाती है। (यहाँ देखें) पाकिस्तान के मदरसों में पढ़ाई जाने वाली कक्षा 11 की पुस्तक में “संस्कृति” अध्याय की शुरुआत ही “भारत के साथ युद्ध” से की जाती है। लगभग हरेक पुस्तक में भारत को एक दुश्मन के रूप में चित्रित किया गया है तथा “जेहाद” और “शहादत” को जबरदस्त तरीके से महिमामण्डित किया गया है। इसी प्रकार खास तरह की अंग्रेजी भी पढ़ाई जा रही है, जिसमें B से बन्दूक, K से नाइफ़ (चाकू), R से रॉकेट, T से टैंक और S से सोर्ड (तलवार) के उदाहरण दिये गये हैं… दूसरी तरफ़ “सेकुलरों के देश” भारत में “ग” से गणेश की बजाय “ग” से गधा पढ़ाया जा रहा है।

तात्पर्य यह कि मदरसों में हिंसा को महिमामंडित किया जा रहा है। इतिहास और सामाजिक अध्ययन की पुस्तकें पाकिस्तान में बाजार में नहीं मिलती हैं इन्हें जमात-उद-दावा द्वारा सीधे मदरसों में पहुँचाया जाता है, जिसमें बताया गया है कि किस तरह मुस्लिम पीरों और फ़कीरों ने जाहिल और मूर्ख हिन्दुओं को उनके अन्धविश्वासों और अन्य गलत कामों से मुक्ति दिलवाई। एक अध्याय मुहम्मद अली जिन्ना पर भी है जिसमें उन्हें मुसलमानों का उद्धारक बताया गया है और कहा गया है कि भारत की “हिन्दू कांग्रेस पार्टी” मुसलमानों को गुलाम बनाना चाहती थी लेकिन जिन्ना ने जिद करके हमें गुलाम बनने से बचा लिया। इन मदरसों से निकले “प्रतिभाशाली”(?) छात्रों को लश्कर-ए-तोयबा में शामिल कर लिया जाता है, जहाँ पहले साल उनका नाम “व्हाईट फ़ॉल्कन” होता है, और 10-12 वर्ष की आयु से उनकी “जेहाद” की ट्रेनिंग शुरु हो जाती है। एक रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में लगभग 6000 गैर-सरकारी मदरसे हैं जिनमें अधिकतर में सिर्फ़ और सिर्फ़ नफ़रत का पाठ पढ़ाया जाता है। पाकिस्तान में मदरसों में लगभग 5 लाख छात्र पढ़ते हैं जिसमें से 16000 अफ़गानी बच्चे हैं और लगभग 18000 अन्य इस्लामी देशों के। लश्कर-ए-तैयबा अमूमन गरीब घरों के बच्चों को चुन लेता है और उनके परिवारों को हर महीने एक निश्चित रकम भेजी जाती है, सो परिवार वालों को भी कोई आपत्ति नहीं होती।

यह तो हुई गैर-सरकारी मदरसों में पढ़ाये जाने वाले लश्कर और जमात के पाठ्यक्रम के बारे में, लेकिन खुद पाकिस्तान सरकार भी आधिकारिक रूप से क्या पढ़ा रही है यह हम देखेंगे लेखमाला के अगले भाग में…
(भाग-2 में जारी…)

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Azaharuddin, Match Fixing, Dawood, Congress, Secularism

हाल ही में पाकिस्तान में श्रीलंकाई क्रिकेटरों पर हमला हुआ, जिस बात की आशंका काफ़ी समय से सभी को थी, अन्ततः वह बात सच साबित हुई कि पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान, आईएसआई, तालिबान, लश्कर आदि सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं, यानी कि चोर-चोर मौसेरे भाई। इसी प्रकार पाकिस्तान में क्रिकेट भी एक सट्टे का रूप है, यह बात काफ़ी वर्षों से सभी लोग जानते हैं कि पाकिस्तान की सत्ता में रहने वाले दाऊद के बेहद करीबी हैं। दाऊद के हजारों धंधों में से एक है क्रिकेट पर सट्टा लगाना, खिलाड़ियों को खरीदना और मैच फ़िक्स करवाना। इस धंधे में भारत और पाकिस्तान के कई खिलाड़ी शामिल रहे हैं और उनकी घनिष्ठता इतनी बढ़ी है कि दाऊद ने जावेद मियाँदाद को अपना समधी भी बना लिया, मोहम्मद अज़हरुद्दीन के पाकिस्तानी क्रिकेटरों से काफ़ी करीबी सम्बन्ध रहे हैं, और मुशर्रफ़ के हालिया भारत दौरे के समय अज़हरुद्दीन उनसे भी गलबहियाँ कर रहे थे।

उल्लेखनीय है कि हाल ही में कांग्रेस ने हैदराबाद सीट से पूर्व् क्रिकेटर अजहरुद्दीन को टिकट देने का फ़ैसला लगभग कर ही लिया है। एक तरफ़ तो राहुल बाबा पार्टी में शुद्धता आदि की बातें कर रहे हैं और साफ़ छवि वाले युवाओं को मौका देने की “लाबिंग” कर रहे हैं ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर मुस्लिम वोटों की लालच में कांग्रेस को अज़हरुद्दीन जैसे दागी क्रिकेटर (वे अभी भी पूरी तरह से पाक-साफ़ घोषित नहीं हुए हैं) की जरूरत क्यों आन पड़ी है? यह वही अज़हरुद्दीन हैं जो क्रिकेट से बाहर का दरवाजा दिखाये जाने और जेल जाने की नौबत आने के तुरन्त बाद प्रेस से मुखातिब होते हुए बोले थे कि “चूंकि वे अल्पसंख्यक हैं इसलिये उन्हें फ़ँसाया गया है…” हालांकि बाद में मीडिया के दबाव में उन्होंने वह कथन वापस ले लिया था, लेकिन उनकी “मानसिकता” तत्काल उजागर हो गई थी। एक बार एक इंटरव्यू में दाऊद इब्राहीम ने भी कहा है कि वे तो भारत में आत्मसमर्पण करना चाहते हैं लेकिन चूंकि भारत की न्याय व्यवस्था पर उन्हें यह भरोसा नहीं है कि उन्हें उचित न्याय(?) मिलेगा, इसलिये वे समर्पण नहीं करेंगे…। एक और छैला बाबू हैं सलमान खान, हिरण के शिकार के मामले में जब वे जोधपुर जेल जाने को हुए, उन्होंने भी तुरन्त मुसलमानों की सफ़ेद जाली वाली टोपी पहन ली थी… आखिर यह कैसी मानसिकता है और इन सभी के विचारों(?) में इतनी समानता कैसे है? जबकि यही वह देश है, जहाँ आज भी अफ़ज़ल गुरु मस्ती से चिकन चबा रहे हैं, आज भी अबू सलेम आराम से अपनी प्रेमिका से बतिया रहे हैं, आज भी धरती का बोझ अब्दुल करीम तेलगी महंगा इलाज ले रहा है, आज भी शहाबुद्दीन संसद में ठहाके लगा रहे हैं, आज भी सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर पर सेकुलर लोग “स्यापा” कर रहे हैं, और अब अज़हरुद्दीन भी हमारी छाती पर मूंग दलने आ पहुँचे हैं… ऐसे में इस महान देश से ज्यादा महफ़ूज़ ठिकाना कौन सा हो सकता है?

अज़हरुद्दीन के मामले पर सीबीआई अभी जाँच कर रही है, ऐसे में कहीं उनके कांग्रेस में शामिल होने की कोई गुप्त शर्त तो नहीं है? क्या इसका मतलब यह लगाया जाये कि कांग्रेस अबू सलेम को भी आज़मगढ़ से टिकट दे सकती है? सुप्रीम कोर्ट हाल ही में बेशर्म कांग्रेस को सीबीआई का दुरुपयोग करने हेतु सरेआम डाँट लगा चुकी है, लेकिन कोई असर नहीं। सीबीआई की विभिन्न रिपोर्टों में साफ़-साफ़ उल्लेख है कि अज़हरुद्दीन दाऊद के दो खास आदमियों अनीस इब्राहीम और अबू सलेम के सतत सम्पर्क में थे। शारजाह में होने वाले मैच खासतौर पर फ़िक्स किये जाते थे, क्योंकि वह इलाका भी दाऊद के लिये “घर” जैसा ही है। पाठकों को भारतीय क्रिकेट टीम के फ़िजियो डॉ अली ईरानी भी याद होंगे, वे गाहे-बगाहे मैचों के बीच में किसी न किसी बहाने मैदान के बीच पहुँच जाते थे और बतियाते रहते थे, आखिर ऐसा बार-बार क्यों होता था? सीबीआई की 162 पृष्ठों की एक रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख है कि किस तरह से अंडरवर्ल्ड का पैसा अज़हरुद्दीन के मार्फ़त घूम-फ़िरकर माफ़िया के हाथों में वापस पहुँचता था। कुख्यात बुकी मुकेश गुप्ता और हांसी क्रोन्ये के बयानों से भी साबित हुआ था कि क्रिकेट मैच सट्टे और फ़िक्सिंग में दाऊद गैंग गले-गले तक सक्रिय है। अभी-अभी उत्तरप्रदेश के एक और डॉन बबलू श्रीवास्तव ने कहा है कि वे और अज़हरुद्दीन लगभग एक जैसे ही हैं, लेकिन अज़हरुद्दीन सिर्फ़ इसलिये जेल से बाहर हैं क्योंकि उनके दाऊद से मधुर सम्बन्ध हैं। इस बयान का बहुत गहरा मतलब है, आज की तारीख में अज़हरुद्दीन हैदराबाद के जिस पॉश इलाके बंजारा हिल्स में रहते हैं, वहाँ कड़ी सुरक्षा व्यवस्था होती है और मुम्बई पुलिस की एक खुफ़िया रिपोर्ट आने के बाद वहाँ “शार्प शूटर्स” की तैनाती भी की गई है, भला एक “पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी” को इतनी भारी-भरकम सुरक्षा व्यवस्था की क्या आवश्यकता है? हालांकि बबलू ने कहा है कि अज़हरुद्दीन को जान का कोई खतरा हो ही नहीं सकता, क्योंकि उनके सभी “भाई” लोगों से मधुर सम्बन्ध हैं। जब अबू सलेम पुर्तगाल में आज़ादी से घूमता था उस वक्त सीबीआई ने अज़हरुद्दीन को किये गये उसके कई फ़ोन कॉल्स ट्रेस किये थे (दिव्या चावला की रिपोर्ट देखें)।

कोई न कोई अन्दरूनी बात है जो कि अभी खुलकर सामने नहीं आ रही है और अब अज़हरुद्दीन के कांग्रेस में शामिल हो जाने के बाद ऐसा कुछ सामने आने की सम्भावना भी कम होती जा रही है। “जय हो…” के कॉपीराइट खरीदने की बजाय कांग्रेस 25-50 साफ़ छवि वाले उम्मीदवार ही खड़े कर दे तो शायद देश का कुछ भला हो…

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Chand-Fiza Muslim Conversion Hindu Women Concern

गत कुछ समय से हमारे “जागरूक” और “सबसे तेज” चैनलों और अखबारों पर एक मुद्दा चटखारे ले-लेकर परोसा जा रहा है, वह है चन्द्रमोहन-अनुराधा उर्फ़ चाँद-फ़िज़ा का मुहब्बत(?) प्रकरण। टीवी वालों से तो खैर किसी स्वस्थ और गम्भीर बहस की उम्मीद रह नहीं गई है (क्योंकि उनके लिये यह एक “धंधा” है, और जब तय हुआ है कि “धंधा” करेंगे तो फ़िर कोई भी मुद्दा, खासकर जो हिन्दुओं के खिलाफ़ हो, उनका मजाक उड़ाता हो, उस पर सिर्फ़ हल्ला-गुल्ला किया जायेगा, कोई गम्भीर बात नहीं होगी), टीवी चैनल इन दो “अधेड़ों” की छिछोरी हरकत को लैला-मजनू या ससी-पुन्नू जैसी अमरप्रेम कथा बनाने पर तुले हैं तथा व्यक्तिगत एसएमएस, प्रेमपत्रों आदि का घृणित और भौण्डा प्रदर्शन लगातार जारी है (पब भरने वाली रेणुका चौधरी शायद किसी एसी कमरे में आराम कर रही होंगी)। इस हंगामे में अखबारों से कुछ उम्मीद बाकी थी, उन्होंने भी इस प्रकरण में शामिल कुछ मूलभूत सवालों पर कुछ कहना भी मुनासिब नहीं समझा।

जैसा कि सभी जानते हैं भारत में दो-चार अलग-अलग कानून चलते हैं, हिन्दुओं के लिये अलग, मुस्लिमों और अन्य कई धर्मों के लिये अपने-अपने पर्सनल कानून, जहाँ भारत सरकार उनके सामने मेमना बनने में देर नहीं लगाती। मुस्लिमों के पर्सनल कानून उन्हें मुबारक हों, लेकिन जब हिन्दुओं के “एक-पत्नी” कानून को, मुस्लिम शरीयत के जरिये “सिर्फ़ अपनी यौनेच्छा के लिये” तोड़ा जाये और उस पर देश में कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति सवाल न उठाये यह आश्चर्यजनक लगता है, हालांकि भारत में इस प्रकार के अजूबे सतत होते ही रहते हैं चाहे कश्मीर का मामला हो या शाहबानो का… “सेकुलरिस्टों” का दोगलापन यदा-कदा नंगा होता ही रहता है। परन्तु यहाँ पर चन्द्रमोहन-अनुराधा मामला सिर्फ़ “सेकुलरों” तक ही सीमित नहीं है, यहाँ एक महिला का पक्ष भी है जो चन्द्रमोहन की पहली शादीशुदा हिन्दू पत्नी है।

जब एक हिन्दू स्त्री विवाह करती है तो वह यह बात जानती है कि कानून के मुताबिक उसका पति उसकी सहमति के बिना न तो उससे आसानी से तलाक ले सकेगा न ही दूसरी शादी कर सकेगा, ऐसे में एक पति के एकतरफ़ा मुस्लिम बन जाने से उस हिन्दू औरत का कानूनी अधिकार कैसे खत्म हो गया? जब विवाह दो पक्षों के बीच हुआ एक समझौता है तो फ़िर कोई एक (पति या पत्नी) अकेले अपनी तरफ़ से एकतरफ़ा निर्णय कैसे ले सकता है? यदि किसी “छैला बाबू” पति को दो-चार औरतें पसन्द आ जायें तो क्या वह धर्म परिवर्तन करके चारों से शादी कर सकता है? फ़िर ऐसे हिन्दू विवाह कानून किस काम के? और “धर्मनिरपेक्ष”(?) सरकार क्या कर रही है? तथा उस पहली हिन्दू पत्नी का क्या? उसके पक्ष में किसी नारी संगठन या महिला मंत्री को बोलते नहीं सुना?

एक हिन्दू पति द्वारा तलाक लेने के लिये अदालत के चक्कर काटते-काटते जूते घिस जाते हैं, लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं और समय लगता है वह अलग। ऐसे में जब भारत सरकार ही उसकी “मदद”(?) के लिये हाथ बढ़ाकर खड़ी है तो बेहद आसान रास्ता है “धर्म परिवर्तन”, बस चट से मुसलमान बन जाओ और पट से चार-चार के साथ मजे करो, हिन्दू पत्नी जाये भाड़ में… शायद ऐसा ही कुछ “एंटोनिया माइनो” सरकार चाहती है। हो सकता है कि कल को यह भी सुनने में आये कि कोई मुल्ला सरेआम कहे कि “जो भी हिन्दू व्यक्ति अपनी पत्नी से मुफ़्त में छुटकारा पाना चाहता है, आये और मुसलमान बन जाये…”। “धर्म परिवर्तन माफ़िया” के हाथ में “लम्पट हिन्दू पुरुष” नामक एक और हथियार आ गया है, बस उसके कान में मंत्र फ़ूँकना है कि “तू मुस्लिम बन जा, साथ में एक औरत को भी हिन्दू से मुस्लिम बना दे… सरकार, प्रशासन सब तेरे साथ होंगे… हिन्दू संगठन, नारी संगठन आदि सब बकवास हैं…”।

सरकार (सेकुलरों) का इस सारे झमेले में मुस्लिमपरस्त रुख साफ़ नज़र आ रहा है, वरना फ़िज़ा जो यहाँ-वहाँ सारे मीडिया में चिल्लाती फ़िर रही है कि “चाँद मोहम्मद ने उसकी इस्लामी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाई है और अब चन्द्रमोहन वापस हिन्दू कैसे बन सकता है?…” यह सब किसकी शह पर? इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि हिन्दू पुरुष बगैर यह चिन्ता किये कि हिन्दू भावनाओं को चोट पहुँचेगी, मुस्लिम बनकर मौज कर सकता है और वही पुरुष अपनी पहली पत्नी-बच्चों की याद आने पर दोबारा हिन्दू नहीं बन सकता। अर्थात धार्मिक भावनायें सिर्फ़ मुस्लिमों की आहत होती हैं? आखिर कौन है इसके पीछे? जाहिर है कि फ़िजा को इस देश के महान सेकुलरों(?) और सरकारी इस्लामिक ताकतों पर पूरा भरोसा है। पुलिस के उच्चाधिकारी लगातार बयान दे रहे हैं कि “चन्दा मामा” लन्दन में हैं, उधर से चन्दा मामा भी टीवी चैनलों (यानी दलालों के मार्फ़त) पर बयान दे रहे हैं कि वे अभी भी “पूरी तरह से मुस्लिम” हैं, इसका मतलब यह होता है कि यदि वे फ़िर से हिन्दू बने तो सरकार और प्रशासनिक मशीनरी उन्हें नहीं छोड़ेगी, यह भी जाँच का विषय हो सकता है कि कहीं फ़िज़ा के मुस्लिम माफ़िया से कोई अन्तर्सम्बन्ध तो नहीं हैं? एक पेंच यह भी है कि यदि चाँद मोहम्मद लन्दन में हैं तो उनके पासपोर्ट पर नाम कौन सा है चन्द्रमोहन या चाँद मोहम्मद? और यह बदलाव इतनी जल्दी कैसे कर लिया गया?

साफ़ दिखाई दे रहा है कि “धर्म-परिवर्तन” की ताकतें इस सारे खेल में एक मजबूत भूमिका बनाये हुए हैं। “शर्मनिरपेक्ष” सरकार खुल्लमखुल्ला एक विशेष धर्म के प्रति अपना झुकाव जाहिर कर रही है। शायद लोगों को अभी भी कोलकाता के रिज़वान-उल-हक का मामला याद होगा, जिसमें रिज़वान की हत्या हो गई थी, लगातार सन्देह व्यक्त किया जाता है कि रिज़वान की हत्या भी धर्मान्ध मुस्लिमों ने ही की थी क्योंकि अपुष्ट सूत्रों के मुताबिक रिज़वान अपनी प्रेमिका की खातिर हिन्दू बनने को तैयार हो गया था, जबकि हत्या का आरोप लगा और केस चला उस प्रेमिका के परिजनों पर… देखा!!! कितना महान है हमारे भारत का सेकुलरिज़्म…

कई-कई सवाल अनछुए-अनकहे रह गये हैं, चैनलों और सेकुलरों(?) की बात जाने दीजिये, वे तो हैं ही शर्मनिरपेक्ष, लेकिन “गुलाबी चड्डी” पर हजारों पन्ने काले करने वाली प्रगतिशील महिलायें(?) उसका बीस प्रतिशत भी चन्द्रमोहन की परित्यक्ता हिन्दू औरत के पक्ष में लिखतीं तो कुछ संतोष होता, लेकिन अफ़सोस…

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Muslim Reservation in India, Congress & Minority Politics

विश्व के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे प्रधानमंत्री माननीय मनमोहन सिंह का यह बयान कि “देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है…” अब जोर-शोर से अपना रंग दिखाने लगा है, जाहिर है कि आम चुनाव सिर पर हैं, “कौए” बोलने लगे हैं और “सियार” गुफ़ाओं से बाहर आ चुके हैं। रविवार (दिनांक 1 फ़रवरी 2009) को दिल्ली में आयोजित मुस्लिम आरक्षण सम्बन्धी राष्ट्रीय अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए विभिन्न वक्ताओं ने सरकार से एक सुर में मुसलमानों को आरक्षण देने की माँग की। तमाम मुस्लिम संगठनों के नेताओं का कहना था कि उन्हें जनसंख्या के अनुपात में और पिछड़ेपन की वजह से सरकारी नौकरियो में आरक्षण मिलना चाहिये। इस सिलसिले में एक संयुक्त कमेटी बनाकर सरकार से कम से कम 10 प्रतिशत का आरक्षण माँगा गया है। हालांकि अधिकतर वक्ताओं ने रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफ़ारिशों को मानने का आग्रह करते हुए 15% आरक्षण की माँग की, साथ ही यह माँग भी रखी गई कि मुस्लिमों और ईसाई दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाये। सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री एएम अहमदी ने कहा कि “मुस्लिम गत 60 साल से समाज के हाशिये पर हैं (यानी कौन सा दल जिम्मेदार हुआ?), और मुसलमानों के साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगातार भेदभाव होता रहा है, उन्हें मुख्यधारा (फ़िर मुख्यधारा का राग) में लाने के लिये “सच्चर” कमेटी की रिपोर्ट को पूरी तरह से लागू किया जाये…”।

इस अवसर पर रामविलास पासवान (एक और “शर्मनिरपेक्ष” नेता) ने कहा कि “सच्चर कमेटी ने पाया है कि मुस्लिम आबादी की सामाजिक और आर्थिक स्थिति भारत की अनुसूचित जनजातियों के बराबर ही है… इसे देखते हुए उच्चतम न्यायालय द्वारा जो 50% प्रतिशत आरक्षण की सीमा तय की गई है, उसे बढ़ाना उचित होगा, क्योंकि मण्डल आयोग ने पिछड़ी जातियों को 52% आरक्षण देने की सिफ़ारिश की थी, जबकि उन्हें सिर्फ़(?) 27% आरक्षण दिया जा रहा है… और अधिकतम 50% आरक्षण की सीमा व्यवहारिक नहीं है…” (यानी पासवान अपने दलित हिस्से में से मुसलमानों को आरक्षण नहीं देंगे, अलग से चाहिये)। भाकपा के एबी बर्धन ने कहा कि “मुसलमानों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज समाज से कटा हुआ और निराश महसूस कर रहा है और देश के लिये यह एक खतरनाक संकेत है…” (यानी कि बर्धन साहब मुसलमानों का उत्साहवर्धन करते हुए पश्चिम बंगाल के सभी जिलों को मुस्लिम बहुल बनाकर ही दम लेंगे)।

हालांकि अधिकतर नेताओं के सुर थोड़े धीमे थे, लेकिन सबसे खतरनाक बयान था स्टूडेण्ट इस्लामिक ऑर्गेनाइज़ेशन के सचिव शाहनवाज़ का, उन्होंने कहा कि “मुसलमानों को आरक्षण सरकार से भीख में नहीं चाहिये, यह मुसलमानों का हक है…” (सुन रहे हैं मनमोहन सिंह जी, आपकी कोशिशें रंग लाई हैं)। शाहनवाज़ ने आगे कहा कि “हमारे लिये आरक्षण कोई खैरात नहीं है, मुस्लिम इस देश की आबादी का 23 प्रतिशत हैं, जिसमें से 10% मुस्लिमों को आरक्षण की आवश्यकता नहीं है, लेकिन बाकी के 12% मुसलमानों को नौकरियों में 12% आरक्षण चाहिये…। 10% आरक्षण तो कम है, 15% आरक्षण ज्यादा लगता है, इसलिये हम 12% आरक्षण की माँग करते हैं (यह देश पर उनका अहसान है)। मुस्लिम द्रविड़ मुनेत्र कषगम के इब्नैस मुहम्मद कहते हैं, “हमें देश को एक कारपोरेट कम्पनी की तरह देखना चाहिये, इस हिसाब से मुसलमानों का 15% शेयर इस कम्पनी में बनता ही है…” (अब कोई इस शेयर होल्डर को जाकर बताये कि “कम्पनी” को बरबाद करने में इसका शेयर कितना है)।

आंध्रप्रदेश के ईसाई मुख्यमंत्री रेड्डी द्वारा 5% आरक्षण देने के बावजूद “शर्मनिरपेक्षता” के इस खुले नाच के बाद हमेशा की तरह अनसुलझे सवाल उठते हैं कि, मुसलमानों को हमेशा पिछड़ा, अशिक्षित और भयग्रस्त रखने वाली कांग्रेस आखिर इनके वोटों के लिये इन्हें कितनी बार और कितने साल तक उपयोग करती रहेगी? मुसलमानों को तथाकथित “मुख्यधारा”(?) में लाने के बहुतेरे प्रयास पहले भी किये गये, लेकिन “कठमुल्लों” के अत्यधिक नियन्त्रण के कारण वे इस धारा से बाहर ही रहे, इसमें किसकी गलती है? मुसलमानों को मदरसे छोड़कर सीबीएसई या राज्य के स्कूलों में पढ़ने से किसने रोका था, क्यों नहीं वे कम से कम बच्चे पैदा करके खुद की गरीबी दूर कर लेते?

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सचमुच मुसलमान राष्ट्र की मुख्यधारा में आना भी चाहते हैं या नहीं? यदि वाकई में वे मुख्यधारा में आना चाहते हैं तो पहले उन्हें अपने दिमाग खुले करने पड़ेंगे, ये नहीं चलेगा कि वे मुख्यधारा में भी आना चाहें और शरीयत के कानून(?) भी चाहें, ऐसा नहीं हो सकता कि वे मदरसों को आधुनिक बनाने के लिये पैसा माँगते रहें और लड़के-लड़कियों की सहशिक्षा को इस्लाम-विरोधी बताते रहें (हाल ही में उप्र के एक उलेमा ने सहशिक्षा वाले स्कूलों के खिलाफ़ फ़तवा जारी किया है), कश्मीर में लड़कियाँ स्कूल की साधारण वेशभूषा में भी स्कूल नहीं जा सकती हैं, सरेआम उनके चेहरे पर तेजाब फ़ेंका जा रहा है और “शर्मनिरपेक्ष मीडिया” को मंगलोर की घटनायें अतिवादी लग रही हैं (शर्म की बात तो है, मगर भाजपा या हिन्दूवादी संगठनों की बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना और मुस्लिम कट्टरपंथियों की हरकतों को नज़र-अंदाज़ करना शर्मनिरपेक्ष लोगों का एक पुराना खेल है)।

अब एक महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि सभी तरह का जाति आधारित आरक्षण पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाये, नया फ़ार्मूला इस प्रकार हो कि - जिस “परिवार में सिर्फ़ एक बच्चा” हो उसे 5%, विकलांगों के लिये 10%, महिलाओं के लिये 20%, आर्थिक रूप से अति-गरीब सभी जातियों-धर्मों के लोगों के लिये 30% तथा सेना-अर्धसैनिक बलों-पुलिस वालों के परिजनों तथा शहीदों के उत्तरजीवियों के लिये 10% आरक्षण दिया जाये। इस फ़ार्मूले से एक तो जनसंख्या पर रोक लगाने में मदद मिलेगी तो दूसरी ओर सेना और पुलिस में भरती होने का एक और आकर्षण बढ़ेगा, गरीबों का सच में फ़ायदा होगा। बाकी के आर्थिक रूप से सक्षम लोगों, जातियों, धर्मों आदि को आरक्षण की क्या जरूरत है?

लेकिन जो पार्टी 60 साल से वोट-बैंक की राजनीति के आधार पर ही इस देश में टिकी हुई है, आज की तारीख में कथित “युवा शक्ति और युवा सोच”(?) का ढोल पीटने के बावजूद उसमें इस प्रकार का राजनैतिक “प्रस्ताव रखने तक की” हिम्मत नहीं है… अमल में लाना तो बहुत दूर की बात है।

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Muslims-Hindus Take a Lesson from Jews

इस लेख के पहले भाग का मकसद सिर्फ़ यहूदियों का गुणगान करना नहीं है, बल्कि यह सोचना है कि आखिर यहूदी इतने शक्तिशाली, बुद्धिमान और मेधावी क्यों हैं? ध्यान से सोचने पर उत्तर मिलता है – “शिक्षा”। इतनी विशाल जनसंख्या और दुनिया के सबसे मुख्य ऊर्जा स्रोत पेट्रोल पर लगभग एकतरफ़ा कब्जा होने के बावजूद मुसलमान इतने कमजोर और पिछड़े हुए क्यों हैं? ऑर्गेनाईज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉन्फ़्रेंस यानी OIC के 57 सदस्य देश हैं, उन सभी 57 देशों में कुल मिलाकर 600 विश्वविद्यालय हैं, यानी लगभग तीस लाख मुसलमानों पर एक विश्वविद्यालय। अमेरिका में लगभग 6000 विश्वविद्यालय हैं और भारत में लगभग 9000। सन् 2004 में एक सर्वे किया गया था, जिसमें से टॉप 500 विश्वविद्यालयों की सूची में मुस्लिम देशों की एक भी यूनिवर्सिटी अपना स्थान नहीं बना सकी। संयुक्त राष्ट्र से सम्बन्धित एक संस्था UNDP ने जो डाटा एकत्रित किया है उसके मुताबिक ईसाई बहुल देशों में साक्षरता दर 90% से अधिक है और 15 से अधिक ईसाई देश ऐसे हैं जहाँ साक्षरता दर 100% है। दूसरी तरफ़ सभी मुस्लिम देशों में कुल साक्षरता दर 40% के आसपास है, और 57 मुस्लिम देशों में एक भी देश या राज्य ऐसा नहीं है जहाँ की साक्षरता दर 100% हो (हमारे यहाँ सिर्फ़ केरल में 90% के आसपास है)। साक्षरता के पैमाने के अनुसार ईसाई देशों में लगभग 40% साक्षर विश्वविद्यालय तक पहुँच जाते हैं जबकि मुस्लिम देशों में यही दर सिर्फ़ 2% है। मुस्लिम देशों में प्रति दस लाख व्यक्तियों पर 230 वैज्ञानिक हैं, जबकि अमेरिका में यह संख्या 4000 और जापान में 5000 है। मुस्लिम देश अपनी कुल आय (GDP) का सिर्फ़ 0.2 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करते हैं, जबकि ईसाई और यहूदी 5% से भी ज्यादा।

एक और पैमाना है प्रति 1000 व्यक्ति अखबारों और पुस्तकों का। पाकिस्तान में प्रति हजार व्यक्तियों पर कुल 23 अखबार हैं, जबकि सिंगापुर जैसे छोटे से देश में यह संख्या 375 है। प्रति दस लाख व्यक्तियों पर पुस्तकों की संख्या अमेरिका में 2000 और मिस्त्र में 20 है। उच्च तकनीक उत्पादों के निर्यात को यदि पैमाना मानें पाकिस्तान से इनका निर्यात कुल निर्यात का सिर्फ़ 1.5 प्रतिशत है, सऊदी अरब से निर्यात 0.3% और सिंगापुर से 58% है।

निष्कर्ष निकालते समय मुसलमानों की बात बाद में करेंगे, पहले हमें अपनी गिरेबान में झाँकना चाहिये। 1945 में दो अणु बम झेलने और विश्व बिरादरी से लगभग अलग-थलग पड़े जापान और लगभग हमारे साथ ही आजाद हुए इज़राइल आज शिक्षा के क्षेत्र में भारत के मुकाबले बहुत-बहुत आगे हैं। आजादी के साठ सालों से अधिक के समय में भारत में प्राथमिक शिक्षा का स्तर और स्कूलों की संख्या जिस रफ़्तार से बढ़ना चाहिये थी वह नहीं बढ़ाई गई। आधुनिक शिक्षा के साथ संस्कृति के मेल से जो शिक्षा पैदा होना चाहिये वह जानबूझकर नहीं दी गई, आज भी स्कूलों में मुगलों और अंग्रेजों को महान दर्शाने वाले पाठ्यक्रम ही पढ़ाये जाते हैं, बचपन से ही ब्रेन-वॉश करके यह बताने की कोशिश होती है कि भारतीय संस्कृति नाम की कोई बात न कभी थी, न है। शुरु से ही बच्चों को “अपनी जड़ों” से काटा जाता है, ऐसे में पश्चिम की दुनिया को जिस प्रकार के “पढ़े-लिखे नौकर” चाहिये थे वैसे ही पैदा हो रहे हैं, और यहाँ से देश छोड़कर जा रहे हैं।

भारत के लोग आज भी वही पुराना राग अलापते रहते हैं कि “हमने शून्य का आविष्कार किया, हमने शतरंज का आविष्कार किया, हमने ये किया था, हमारे वेदों में ये है, हमारे ग्रंथों में वो है, हमने दुनिया को आध्यात्म सिखाया, हमने दुनिया को अहिंसा का संदेश दिया, हम विश्व-गुरु हैं… आदि-आदि। हकीकत यह है कि गीता के “कर्म” के सिद्धान्त को जपने वाले देश के अधिकांश लोग खुद ही सबसे अकर्मण्य हैं, भ्रष्ट हैं, अनुशासनहीन और अनैतिक हैं। लफ़्फ़ाजी को छोड़कर साफ़-साफ़ ये नहीं बताते कि सन् 1900 से लेकर 2000 के सौ सालों में भारत का विश्व के लिये और मानवता को क्या योगदान है? जिन आईआईएम और आईआईटी का ढिंढोरा पीटते हम नहीं थकते, वे विश्व स्तर पर कहाँ हैं, भारत से बाहर निकलने के बाद ही युवा प्रतिभाएं अपनी बुद्धिमत्ता और मेधा क्यों दिखा पाती हैं? लेकिन हम लोग सदा से ही “शतुरमुर्ग” रहे हैं, समस्याओं और प्रश्नों का डटकर सामना करने की बजाय हम हमेशा ऊँची-नीची आध्यात्मिक बातें करके पलायन का रास्ता अपना लेते हैं (ताजा उदाहरण मुम्बई हमले का है, जहाँ दो महीने बीत जाने बाद भी हम दूसरों का मुँह देख रहे हैं, मोमबत्तियाँ जला रहे हैं, गाने गा रहे हैं, हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं, भाषण दे रहे हैं, आतंकवाद के खिलाफ़ शपथ दिलवा रहे हैं, गरज यह कि “कर्म” छोड़कर सब कुछ कर रहे हैं)। हमारी मूल समस्या यह है कि “राष्ट्र” की अवधारणा ही जनता के दिमाग में साफ़ नहीं है, साठ सालों से शिक्षा प्रणाली भी एक “कन्फ़्यूजन” की धुंध में है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि आज तक हम “हिन्दू” नहीं बन पाये हैं, यानी जैसे यहूदी सिर्फ़ और सिर्फ़ यहूदी है चाहे वह विश्व के किसी भी कोने में हो, जबकि हम ब्राह्मण हैं, बनिये हैं, ठाकुर हैं, दलित हैं, उत्तर वाले हैं, दक्षिण वाले हैं, सब कुछ हैं लेकिन “हिन्दू” नहीं हैं। हालांकि मूलभूत शिक्षा और तकनीकी के मामले में हम इस्लामिक देशों से काफ़ी आगे हैं, लेकिन क्या हम उनसे तुलना करके खुश होना चाहिये? तुलना करना है तो अपने से ज्यादा, अपने से बड़े से करनी चाहिये…

संक्षेप में इन सब आँकड़ों से क्या निष्कर्ष निकलता है… कि मुस्लिम देश इसलिये पिछड़े हैं क्योंकि वे शिक्षा में पिछड़े हुए हैं, वे अपनी जनसंख्या को आधुनिक शिक्षा नहीं दिलवा पाते, वे “ज्ञान” आधारित उत्पाद पैदा करने में अक्षम हैं, वे ज्ञान को अपनी अगली पीढ़ियों में पहुँचाने और नौनिहालों को पढ़ाने की बजाय हमेशा यहूदियों, ईसाईयों और हिन्दुओं को अपनी दुर्दशा का जिम्मेदार ठहराते रहते हैं। सारा दिन अल्लाह और खुदा चीखने से कुछ नहीं होगा, शिविर लगाकर जेहादी पैदा करने की बजाय शिक्षा का स्तर बढ़ाना होगा, हवाई जहाज अपहरण और ओलम्पिक में खिलाड़ियों की हत्या करवाने की बजाय अधिक से अधिक बच्चों और युवाओं को शिक्षा देने का प्रयास होना चाहिये। सारी दुनिया में इस्लाम का ही राज होगा, अल्लाह सिर्फ़ एक है, बाकी के मूर्तिपूजक काफ़िर हैं जैसी सोच छोड़कर वैज्ञानिक सोच अपनानी होगी। सभी मुस्लिम देशों को खुद से सवाल करना चाहिये कि मानव जीवन और मानवता के लिये उन्होंने क्या किया है? उसके बाद उन्हें दूसरों से इज्जत हासिल करने की अपेक्षा करना चाहिये। इजराईल और फ़िलीस्तीन के बीच चल रहे युद्ध और समूचे विश्व में छाये हुए आतंकवाद के मद्देनज़र बेंजामिन नेतान्याहू की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि “यदि अरब और मुसलमान अपने हथियार रख दें तो हिंसा खत्म हो जायेगी और यदि यहूदियों ने अपने हथियार रख दिये तो इज़राइल खत्म हो जायेगा…”।

[सन्दर्भ और आँकड़े : डॉ फ़ारुख सलीम (फ़्री लांस पत्रकार, इस्लामाबाद)]

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विश्व की कुल आबादी में से यहूदियों की संख्या लगभग डेढ़ करोड़ है, जिसमें से लगभग 70 लाख अमेरिका में रहते हैं, 50 लाख यहूदी एशिया में, 20 लाख यूरोप में और बाकी कुछ अन्य देशों में रहते हैं… कहने का मतलब यह कि इज़राईल को छोड़कर सभी देशों में वे “अल्पसंख्यक” हैं। दूसरी तरफ़ दुनिया में मुस्लिमों की संख्या लगभग दो अरब है जिसमें से एक अरब एशिया में, 40 करोड़ अफ़्रीका में, 5 करोड़ यूरोप में और बाकी के सारे विश्व में फ़ैले हुए हैं, इसी प्रकार हिन्दुओं की जनसंख्या लगभग सवा अरब है जिसमें लगभग 80 करोड़ भारत में व बाकी के सारे विश्व में फ़ैले हुए हैं… इस प्रकार देखा जाये तो विश्व का हर पाँचवा व्यक्ति मुसलमान है, प्रति एक हिन्दू के पीछे दो मुसलमान और प्रति एक यहूदी के पीछे सौ मुसलमान का अनुपात बैठता है… बावजूद इसके यहूदी लोग हिन्दुओं या मुसलमानों के मुकाबले इतने श्रेष्ठ क्यों हैं? क्यों यहूदी लोग इतने शक्तिशाली हैं?

प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आईन्स्टीन एक यहूदी थे, प्रसिद्ध मनोविज्ञानी सिगमण्ड फ़्रायड, मार्क्सवादी विचारधारा के जनक कार्ल मार्क्स जैसे अनेकों यहूदी, इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं जिन्होंने मानवता और समाज के लिये एक अमिट योगदान दिया है। बेंजामिन रूबिन ने मानवता को इंजेक्शन की सुई दी, जोनास सैक ने पोलियो वैक्सीन दिया, गर्ट्र्यूड इलियन ने ल्यूकेमिया जैसे रोग से लड़ने की दवाई निर्मित की, बारुच ब्लूमबर्ग ने हेपेटाइटिस बी से लड़ने का टीका बनाया, पॉल एल्हरिच ने सिफ़लिस का इलाज खोजा, बर्नार्ड काट्ज़ ने न्यूरो मस्कुलर के लिये नोबल जीता, ग्रेगरी पिंकस ने सबसे पहली मौखिक गर्भनिरोधक गोली का आविष्कार किया, विल्लेम कॉफ़ ने किडनी डायलिसिस की मशीन बनाई… इस प्रकार के दसियों उदाहरण गिनाये जा सकते हैं जिसमें यहूदियों ने अपनी बुद्धिमत्ता और गुणों से मानवता की अतुलनीय सेवा की है।

पिछले 105 वर्षों में 129 यहूदियों को नोबल पुरस्कार मिल चुके हैं, जबकि इसी अवधि में सिर्फ़ 7 मुसलमानों को नोबल पुरस्कार मिले हैं, जिसमें से चार तो शान्ति के नोबल हैं, अनवर सादात और यासर अराफ़ात(शांति पुरस्कार??) को मिलाकर और एक साहित्य का, सिर्फ़ दो मेडिसिन के लिये हैं। इसी प्रकार भारत को अब तक सिर्फ़ 6 नोबल पुरस्कार मिले हैं, जिसमें से एक साहित्य (टैगोर) और एक शान्ति के लिये (मदर टेरेसा को, यदि उन्हें भारतीय माना जाये तो), ऐसे में विश्व में जिस प्रजाति की जनसंख्या सिर्फ़ दशमलव दो प्रतिशत हो ऐसे यहूदियों ने अर्थशास्त्र, दवा-रसायन खोज और भौतिकी के क्षेत्रों में नोबल पुरस्कारों की झड़ी लगा दी है, क्या यह वन्दनीय नहीं है?

मानव जाति की सेवा सिर्फ़ मेडिसिन से ही नहीं होती, और भी कई क्षेत्र हैं, जैसे पीटर शुल्ट्ज़ ने ऑप्टिकल फ़ायबर बनाया, बेनो स्ट्रॉस ने स्टेनलेस स्टील, एमाइल बर्लिनर ने टेलीफ़ोन माइक्रोफ़ोन, चार्ल्स गिन्सबर्ग ने वीडियो टेप रिकॉर्डर, स्टैनली मेज़ोर ने पहली माइक्रोप्रोसेसर चिप जैसे आविष्कार किये। व्यापार के क्षेत्र में राल्फ़ लॉरेन (पोलो), लेविस स्ट्रॉस (लेविस जीन्स), सर्गेई ब्रिन (गूगल), माइकल डेल (डेल कम्प्यूटर), लैरी एलिसन (ओरेकल), राजनीति और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में येल यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष रिचर्ड लेविन, अमरीकी सीनेटर हेनरी किसींजर, ब्रिटेन के लेखक बेंजामिन डिज़रायली जैसे कई नाम यहूदी हैं। मानवता के सबसे बड़े प्रेमी, अपनी चार अरब डॉलर से अधिक सम्पत्ति विज्ञान और विश्व भर के विश्वविद्यालयों को दान करने वाले जॉर्ज सोरोस भी यहूदी हैं। ओलम्पिक में सात स्वर्ण जीतने वाले तैराक मार्क स्पिट्ज़, सबसे कम उम्र में विंबलडन जीतने वाले बूम-बूम बोरिस बेकर भी यहूदी हैं। हॉलीवुड की स्थापना ही एक तरह से यहूदियों द्वारा की गई है ऐसा कहा जा सकता है, हैरिसन फ़ोर्ड, माइकल डगलस, डस्टिन हॉफ़मैन, कैरी ग्राण्ट, पॉल न्यूमैन, गोल्डी हॉन, स्टीवन स्पीलबर्ग, मेल ब्रुक्स जैसे हजारों प्रतिभाशाली यहूदी हैं।

इसका दूसरा पहलू यह है कि हिटलर द्वारा भगाये जाने के बाद यहूदी लगभग सारे विश्व में फ़ैल गये, वहाँ उन्होंने अपनी मेहनत से धन कमाया, साम्राज्य खड़ा किया, उच्च शिक्षा ग्रहण की और सबसे बड़ी बात यह कि उस धन-सम्पत्ति पर अपनी मजबूत पकड़ बनाये रखी, तथा उसे और बढ़ाया। शिक्षा का उपयोग उन्होंने विभिन्न खोज करने में लगाया। जबकि इसका काला पहलू यह है कि अमेरिका स्थित हथियार निर्माता कम्पनियों पर अधिकतर में यहूदियों का कब्जा है, जो चाहती है कि विश्व में युद्ध होते रहें ताकि वे कमाते रहें। जबकि मुस्लिमों को शिक्षा पर ध्यान देने की बजाय, आपस में लड़ने और विश्व भर में ईसाईयों से, हिन्दुओं से मूर्खतापूर्ण तरीके से लगातार सालों-साल लड़ने में पता नहीं क्या मजा आता है? यहूदियों का एक गुण (या कहें कि दुर्गुण) यह भी है कि वे अपनी “नस्ल” की शुद्धता को बरकरार रखने की पूरी कोशिश करते हैं, अर्थात यहूदी लड़के/लड़की की शादी यहूदी से ही हो अन्य धर्मावलम्बियों में न हो इस बात का विशेष खयाल रखा जाता है, उनका मानना है कि इससे “नस्ल शुद्ध” रहती है (इसी बात पर हिटलर उनसे बुरी तरह चिढ़ा हुआ भी था)।

(भाग-2 में जारी रहेगा…)

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मुम्बई हमले और बम विस्फ़ोटों को लगभग डेढ़ माह होने को आया, जैसी की पूरी सम्भावना थी कि भारत के नेताओं से कुछ नहीं होने वाला और इस देश के मिजाज़ को समझने वाले अधिकतर लोग आशंकित थे कि पाकिस्तान के खिलाफ़ गुस्से का यह वक्ती जोश बहुत जल्दी ठण्डा पड़ जायेगा, ठीक वैसा ही हुआ… 40 आतंकवादियों की लिस्ट से शुरु करके धीरे से 20 पर आ गये, फ़िर “सैम अंकल” के कहने पर सिर्फ़ एक लखवी पर आ गये और अब तो अमेरिका की शह पर पाकिस्तान खुलेआम कह रहा है कि किसी को भारत को सौंपने का सवाल ही नहीं है… तमाम विद्वान सलाहें दे रहे हैं कि भले ही युद्ध न लड़ा जाये, लेकिन कुछ तो ऐसे कदम उठाना चाहिये कि दुनिया को लगे कि हम पाकिस्तान के खिलाफ़ गम्भीर हैं, कुछ तो ऐसा करें कि जिससे विश्व जनमत को लगे कि हम आतंकवाद के जनक, आतंकवाद के गढ़ को खत्म करने के लिये कटिबद्ध हैं। इसकी बजाय सोनिया जी के सिपहसालार क्या कर रहे हैं देखिये… एक मंत्री कहते हैं कि पाकिस्तान को “मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन” (MFN) का दर्जा जारी रहेगा (यानी जब भी भारत की जनता बम विस्फ़ोट से मरना चाहेगी, बांग्लादेश से पहले पाकिस्तान “मोस्ट फ़ेवर्ड” देश होगा), पूर्व गृहमंत्री पाटिल साहब अभी भी “उसी पुराने चोले” में हैं, वे फ़रमाते हैं, “अफ़ज़ल गुरु को फ़ाँसी देने की इतनी जल्दी क्या है?” (अभी उसे भारत की छाती पर और मूँग दलने दो), हमारे नये-नवेले गृहमंत्री अमेरिका की यात्रा पर जा रहे हैं, वहाँ पर वे अमेरिका को पाकिस्तान के खिलाफ़ सबूत देंगे (इज़राइल ने कभी भी हमास के खिलाफ़ की सबूत नहीं दिया, न ही अमेरिका ने अफ़गानिस्तान-इराक के खिलाफ़ कोई सबूत दिया), “पपू” प्रधानमंत्री (ना, ना, ना…“पप्पू” नहीं, बल्कि परम पूज्य) कहते हैं कि “पाकिस्तान को हम बताना चाहते हैं कि आतंकवाद को समाप्त करने के लिये हम किसी भी हद तक जा सकते हैं…” (यानी कि अफ़ज़ल गुरु को माफ़ करने की हद तक भी जा सकते हैं), “भारत के सभी विकल्प खुले हैं…” (यानी कि पिछवाड़े में दुम दबाकर बैठ जाने का विकल्प)।

उधर पुंछ में मेंढर के जंगलों में जैश के आतंकवादियों ने पक्के कंक्रीट के बंकर बना लिये हैं और महीनों की सामग्री जमा कर ली है, हमारे सुरक्षाबल कह रहे हैं कि “स्थानीय” मदद के बिना यह सम्भव नहीं है (यही बात मुम्बई हमले के वक्त भी कही गई थी), लेकिन कांग्रेस पहले आतंकवादियों की पार्टी (पीडीपी) के साथ सत्ता की मलाई चख रही थी, अब “नाकारा” नेशनल कांफ़्रेंस के साथ मजे मार रही है, लेकिन पाकिस्तानियों की हमारे देश में आवाजाही लगातार जारी है। सोच-सोचकर हैरत होती है कि वे लोग कितने मूर्ख होंगे जो यह सोचते हैं कि पाकिस्तान कभी भारत का दोस्त भी बन सकता है। जिस देश का विभाजन/गठन ही धार्मिक आधार पर हुआ, जिसके मदरसों में कट्टर इस्लामिक शिक्षा दी जाती हो, जो देश भारत के हाथों चार-चार बार पिट चुका हो, जिसके दो टुकड़े हमने किये हों… क्या ऐसा देश कभी हमारा दोस्त हो सकता है? एक बार दोनों जर्मनी एकत्रित हो सकते हैं, दोनो कोरिया आपस में दोस्त बन सकते हैं, लेकिन हमारे हाथों से पिटा हुआ एक मुस्लिम देश कभी भी मूर्तिपूजकों के देश का दोस्त नहीं बन सकता, लेकिन इतनी सी बात भी उच्च स्तर पर बैठे लोगों को समझ में नहीं आती?… तरस आता है…

अब तो लगने लगा है कि वाजपेयी जी ने पोखरण परमाणु विस्फ़ोट करके बहुत बड़ी गलती कर दी थी… कैसे? बताता हूँ… ज़रा सोचिये यदि वाजपेयी पोखरण-2 का परीक्षण ना करते और घोषित रूप से परमाणु बम होने की गर्जना ना करते, तो पाकिस्तान जो कि पोखरण के बाद पगलाये हुए साँड की तरह किसी भी तरह से परमाणु शक्ति बनने को तिलमिला रहा था, वह भी खुलेआम परमाणु शक्ति न बनता… “खुलेआम” कहने का मतलब यह है कि यह समूचा विश्व जानता है कि पाकिस्तान का परमाणु बम “चोरी” का है, यह बात भी सभी जानते हैं कि न सिर्फ़ पाकिस्तान, बल्कि ईरान और उत्तर कोरिया जैसे कई देश परमाणु बम शक्ति सम्पन्न हैं, लेकिन “अघोषित” रूप से… ऐसे में यदि न हम परमाणु बम की घोषणा करते, न ही हमारा नकलची पड़ोसी देखादेखी में परमाणु बम बनाता, तब स्थिति यह थी कि “बँधी मुठ्ठी लाख की खुल गई तो फ़िर खाक की…” लेकिन दोनों पार्टियों ने सारे विश्व को बता दिया कि “हाँ हमारे पास परमाणु बम है…”। अब होता यह है कि जब भी भारत, “पाकिस्तान को धोने के मूड” में आता है, सारा विश्व और सारे विश्व के साथ-साथ भारत में भी काफ़ी लोग इस बात से आशंकित हो जाते हैं कि कहीं “परमाणु युद्ध” न छिड़ जाये… इसलिये शान्ति बनाये रखो… पाकिस्तान जैसा गिरा हुआ देश भी परमाणु बम की धमकी देकर अमेरिका और बाकी देशों को इस बात के लिये राजी कर लेता है कि वे “भारत को समझायें…” रही बात भारत की तो वह तो “समझने” को तैयार ही बैठा रहता है, और कुल मिलाकर सेनाओं को सीमाओं तक ले जाकर बासी कढ़ी का उबाल थोड़े समय में ठण्डा पड़ जाता है, और ऐसा दो बार हो चुका है… जबकि उधर देखिये इज़राइल भले ही जानता हो कि ईरान एक “अघोषित” परमाणु शक्ति है, लेकिन चूँकि हमास या फ़िलीस्तीन के पक्ष में वह इस हद तक नहीं जा सकता, सो जब मर्जी होती है इज़राइल हमास पर टूट पड़ता है…

चलो माना कि किसी को पता नहीं है कि आखिर पाकिस्तान में “परमाणु बटन” पर किसका कंट्रोल है, या यह भी नहीं पता कि पाकिस्तान से कितने परमाणु बम आतंकवादियों के हाथ में पहुँच सकते हैं, या आतंकवादियों की पहुँच में हैं… सो हम युद्ध करने का खतरा मोल नहीं ले सकते… लेकिन पाकिस्तान से सम्बन्ध तो खत्म कर सकते हैं, उसके पेट पर लात तो मार सकते हैं (जो लोग इस बात के समर्थक हैं कि “आर्थिक रूप से मजबूत पाकिस्तान”, भारत का दोस्त बन सकता है, वे भी भारी मुगालते में हैं), पाकिस्तान की आर्थिक नाकेबन्दी करें, उसके साथ सभी सम्बन्ध खत्म करें, उसके नकली राजदूत (जो कि आईएसआई का एजेंट होने की पूरी सम्भावना है) को देश से निकाल बाहर करें, पाकिस्तान के साथ आयात-निर्यात खत्म करें, उधर से आने वाले कलाकारों, खिलाड़ियों पर प्रतिबन्ध लगायें, पाकिस्तान आने-जाने वाली तमाम हवाई उड़ानों को भारत के ऊपर से उड़ने की अनुमति रद्द की जाये… सिर्फ़ एक छोटा सा उदाहरण देखें – यदि पाकिस्तान एयरलाइंस की सभी उड़ानों को भारत के उड़ान क्षेत्र से न उड़ने दिया जाये तो क्या होगा… पाकिस्तान से दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैण्ड आदि देशों को जाने वाले विमानों को कितना बड़ा चक्कर लगाकर जाना पड़ेगा, पाकिस्तान से बांग्लादेश या श्रीलंका जाने वाले विमानों को कहाँ-कहाँ से घूमकर जाना पड़ेगा… पाकिस्तान का कितना नुकसान होगा, कश्मीर घाटी में नदियों और पानी पर हमारा नियन्त्रण है, हम जब चाहें पाकिस्तान को सूखा या बाढ़ दे सकते हैं, देना चाहिये… इस सम्बन्ध में अन्तर्राष्ट्रीय नियम-कानूनों की दुहाई दी जायेगी, लेकिन यदि वाकई “महाशक्ति” बन के दिखाना है तो भारत को नुकसान दे सकने वाले नियम-कानून नहीं मानने चाहिये, अमेरिका या चीन कौन से सारे अन्तर्राष्ट्रीय कानून मानते हैं? संक्षेप में यह कि जब तक हम ही विश्व को यह संकेत नहीं देंगे कि पाकिस्तान एक “खुजली वाला कुत्ता” है और जो भी उससे सम्बन्ध रखेगा, वह हमसे मधुर सम्बन्ध की आशा न रखे… बस एक संकेत भर की देर है, पाकिस्तान पर ऐसा भारी दबाव बनेगा कि उसे सम्भालना मुश्किल हो जायेगा… लेकिन कांग्रेस हो या भाजपा दोनों से ऐसी उम्मीद करना बेकार है, वाजपेयी ने मुशर्रफ़ का लाल कालीन बिछाकर स्वागत किया था, आडवाणी जिन्ना की मज़ार पर हो आये, तो कांग्रेस इज़राईल की आलोचना कर रही है… और फ़िलीस्तीन जैसे “सड़ल्ले देश” को दिल्ली की बेशकीमती जमीन पर दूतावास खोलने दिया जा रहा है… दूसरी तरफ़ “मोमबत्ती ब्रिगेड” भी “हैप्पी न्यू ईयर” की खुमारी में खो चुकी है… हमारे विदेश मंत्रालय के अधिकारी इतने पढ़े-लिखे हैं फ़िर भी यह बात क्यों नहीं समझते कि अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति-कूटनीति में कोई भी “स्थायी दोस्त या दुश्मन” नहीं होता, न वहाँ भावनाओं का कोई महत्व है, न ही किये गये वादों का… बस अपने देश का फ़ायदा किसमें है सिर्फ़ यह देखा जाता है… ये छोटी सी बात समझाने के लिये क्या आसमान से देवता आयेंगे? “नकली सेकुलरिज़्म” और “थकेले” नेताओं ने इस देश को कहीं का नहीं छोड़ा…


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