केन्द्र सरकार द्वारा 10 रुपये का नया सिक्का जारी किया गया है, जो दो धातुओं से मिलकर बना है तथा जिस पर एक तरफ़ “ईसाई क्रूसेडर क्रॉस” का निशान बना हुआ है। हालांकि इस सिक्के पर सन् 2006 खुदा हुआ है, लेकिन हमें बताया गया है कि यह हाल ही में जारी किया गया है। इससे पहले भी सन् 2006 में ही 2 रुपये का जो सिक्का जारी किया गया था, उसमें भी यही “क्रॉस” का निशान बना हुआ था। “सेकुलरों के प्रातः स्मरणीय” नरेन्द्र मोदी ने उस समय गुजरात के चुनावों के दौरान इस सिक्के की खूब खिल्ली उड़ाई थी और बाकायदा लिखित में रिजर्व बैंक और केन्द्र सरकार का विरोध किया, तब वह सिक्का वापस लेने की घोषणा की गई। लेकिन सन् 2009 आते-आते फ़िर से नौकरशाही को फ़िर से वही बेशर्मी भरे “सेकुलर दस्त” लगे और दस रुपये का नया सिक्का जारी कर दिया गया, जिसमें वही क्रूसेडर क्रॉस खुदा हुआ है।



दूसरा फ़ोटो – एक रुपये के सिक्के में एक लकीर वाला क्रॉस तथा पुराने दो रुपये के सिक्के का जिसमें दोनाली क्रॉस दर्शाया गया है (जो मोदी द्वारा विरोध के बाद बन्द किया गया)



इसके बाद जो एक और दो रुपये के सिक्के जारी किये गये उसमें एक रुपये के सिक्के पर “अंगूठा दिखाते हुए” (Thumbs up) तथा दो रुपये के सिक्के पर “दो उंगलियों वाली विजयी मुद्रा” (Victory Sign) के चित्र खुदे हुए हैं। (इन सिक्कों पर ये “ठेंगा” किसे दिखाया जा रहा है, और “विक्ट्री साइन” किसे, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है)।


एक रुपये का नया सिक्का जिसमें “अंगूठा” दिखाया जा रहा है।

अब आते हैं मूल बात पर – सन् 2005 वाले एक रुपये के सिक्के में जो क्रॉस दिखाया गया था वह साफ़-साफ़ क्रिश्चियन क्रॉस था, लेकिन जब हल्ला मचा तो सिक्का वापस ले लिया गया, लेकिन फ़िर से 2006 में जारी दो रुपये के सिक्के पर वही क्रॉस “थोड़े से अन्तर” के साथ आ गया। इस बार क्रॉस को दोहरी लाइनों वाला कर दिया गया, फ़िर से विरोध हुआ तो सिक्का वापस लिया गया, अब पुनः दस रुपये के सिक्के पर वही क्रॉस दिया गया है…। देश में इस्लामीकरण को बढ़ावा देना हो या धर्म परिवर्तन को, यह एक आजमाया हुआ सेकुलर तरीका है, पहले चुपके से कोई हरकत कर दी जाती है, एकाध-दो बार विरोध होता है, लेकिन कुछ समय बाद वही हरकत दोहरा दी जाती है, और फ़िर धीरे से वह परम्परा बन जाती है। हिन्दू संगठन कोई विरोध करें तो उन्हें “साम्प्रदायिक” घोषित कर दिया जाता है, बिके हुए मीडिया के सहारे “वर्ग विशेष” के एजेण्डे को लगातार आगे बढ़ाया जाता है। सिक्कों पर क्रूसेडर क्रॉस रचने के पीछे किस चापलूस मंत्री या सरकारी अधिकारी का हाथ है यह भी एक जाँच का विषय है। क्या सोनिया गाँधी का कोई ऐसा “सुपर-चमचा” अधिकारी है जो किसी “पद्म पुरस्कार” या अपनी पत्नी द्वारा चलाये जा रहे NGO को मिलने वाली भारी आर्थिक मदद के बदले में “ईसाईकरण” को बढ़ावा देने में लगा है? क्योंकि इस प्रक्रिया को सन् 2004 के बाद ही तेजी मिली है, अर्थात जबसे “माइनो सरकार” स्थापित हुई। जो भी हो, यह अपने देश की संस्कृति और परम्परा पर अभिमान करने वालों के लिये एक अपमानजनक बात तो है ही।

लुई द पायस द्वारा जारी सोने का सिक्का

दो और दस रुपये के सिक्के पर जो क्रूसेडर क्रॉस खुदा हुआ है वह असल में फ़्रांस के शासक लुई द पायस (सन् 778 से सन् 840) द्वारा जारी किये गये सोने के सिक्के में भी है। लुई का शासनकाल फ़्रांस में सन् 814 से 840 तक रहा, और उसी ने इस क्रूसेडर क्रॉस वाले सिक्के को जारी किया था। (लुई द पायस के सिक्के का चित्र देखें) अब चित्र में विभिन्न प्रकार के “क्रॉस” देखिये जिसमें सबसे अन्तिम आठवें नम्बर वाला क्रूसेडर क्रॉस है जिसे दस रुपये के नये सिक्के पर जारी किया है, जिसे सन् 2006 में ही ढाला गया है, लेकिन जारी अभी किया।


विभिन्न तरह के क्रॉस

जैसा कि चित्र में दिखाया गया है इस क्रूसेडर क्रॉस में चारों तरफ़ आड़ी और खड़ी लाइनों के बीच में चार बिन्दु हैं। RBI अधिकारियों का एक हास्यापद तर्क है कि यह चिन्ह असल में देश की चारों दिशाओं का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें चारों बिन्दु एकता को प्रदर्शित करते हैं, तथा “अंगूठे” और “विक्ट्री साइन” का उपयोग नेत्रहीनों की सुविधा के लिये किया गया है… अर्थात सूर्य, कमल, गेहूँ की बालियाँ, अशोक चक्र, सिंह आदि देश की एकता और संस्कृति को नहीं दर्शाते? तथा इसके पहले जो भी सिक्के थे उन्हें नेत्रहीन नहीं पहचान पाते थे? किसे मूर्ख बना रहे हैं ये?

जबकि इस क्रूसेडर क्रॉस के चारों बिन्दुओं का मतलब कुछ और है – जैसा कि सभी जानते हैं, “क्रूसेड (Crusade)” का मतलब होता है “धर्मयुद्ध”। नवीं शताब्दी के उन दिनों में “बाइज़ेन्टाइन शासनकाल” में क्रॉस के चारों तरफ़ स्थित इन चारों बिन्दुओं को को “बेसेण्ट” (Besants) कहते थे, Besant का ही दूसरा नाम था “सोलिडस” (Solidus), और यही चार बिन्दुओं वाले सोने के सिक्के नवीं शताब्दी में लुई तृतीय ने जारी किये थे। रोमन साम्राज्य द्वारा यूरोप में भी 15वीं शताब्दी में इन चिन्हों वाले सिक्के चलन में लाये गये थे, यह क्रॉस कालान्तर में “जेरुसलेम क्रॉस” के नाम से जाना गया। यह चारों बिन्दु आगे चलकर चार छोटे से क्रॉस में तब्दील हुए, जो कि यरूशलम से प्रारम्भ होकर धरती के चार कोनों में स्थित चार “एवेंजेलिस्ट गोस्पेल” (सिद्धान्त) के रूप में भी माने गये, जो कि क्रमशः “Gospel of Matthew”, “Gospel of Mark”, “Gospel of Luke” तथा “Gospel of John” हैं, जबकि बड़ा वाला क्रॉस स्वयं यीशु का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे में रिज़र्व बैंक के अधिकारियों के “एकता” वाला तर्क बेहद थोथा और बोदा है, यह बात हमारे सदाबहार “सेकुलर” नहीं समझेंगे और हिन्दू समझना नहीं चाहते।

माइनो सरकार जबसे सत्ता में आई है, भारतीय संस्कृति के प्रतीक चिन्हों पर एक के बाद आघात करती जा रही है। सिक्कों से भारत माता, भारत के नक्शे और अन्य राष्ट्रीय महत्व के चिन्ह गायब करके “क्रॉस”, “अंगूठा” और “विक्ट्री साइन” के मूर्खतापूर्ण प्रयोग किये गये हैं, केन्द्रीय विद्यालय के प्रतीक चिन्ह “उगते सूर्य के साथ कमल पर रखी पुस्तक” को भी बदल दिया गया है, सरकारी कागज़ों, दस्तावेजों और वेबसाईटों से धीरे-धीरे “सत्यमेव जयते” हटाया जा रहा है, दूरदर्शन के “स्लोगन” “सत्यं शिवम् सुन्दरम्” में भी बदलाव किया गया है, बच्चों को “ग” से “गणेश” की बजाय “गधा” पढ़ाया जा रहा है, तात्पर्य यह कि भारतीय संस्कृति के प्रतीक चिन्हों को समाप्त करने के लिये धीरे-धीरे अन्दर से उसे कुतरा जा रहा है, और “हिन्दू” जैसा कि वे हमेशा से रहे हैं, अब भी गहरी नींद में गाफ़िल हैं। बहरहाल, यह तो खैर हिन्दुओं की शोकान्तिका है ही कि 60 में 50 साल तक एक “मुस्लिम-ईसाई परिवार” का शासन इस देश पर रहा।

किसी कौम को पहले मानसिक रूप से खत्म करने के लिये उसके सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीकों पर हमला बोला जाता है, उसे सांस्कृतिक रूप से खोखला कर दिया जाता है, पहले अपने “सिद्धान्त” ठेल दिये जाते हैं, दूसरों की संस्कृति की आलोचना करके, उसे नीचा दिखाकर एक अभियान चलाया जाता है, इससे धर्म परिवर्तन का काम आसान हो जाता है और वह कौम बिना लड़े ही आत्मसमर्पण कर देती है, क्योंकि उसकी पूरी एक पीढ़ी पहले ही मानसिक रूप से उनकी गुलाम हो चुकी होती है। वेलेंटाइन-डे, गुलाबी चड्डी, पब संस्कृति, अंग्रेजियत, कम कपड़ों और नंगई को बढ़ावा देना, आदि इसी “विशाल अभियान” का एक छोटा सा हिस्सा भर हैं।

किसी भी देश के सिक्के एक ऐतिहासिक धरोहर तो होते ही हैं, उस देश की संस्कृति और वैभव को भी प्रदर्शित करते हैं। पहले एक, दो और पाँच के सिक्कों पर कहीं गेहूँ की बालियों के, भारत के नक्शे के, अशोक चिन्ह के, किसी पर महर्षि अरविन्द, वल्लभभाई पटेल आदि महापुरुषों के चेहरे की प्रतिकृति, किसी सिक्के पर उगते सूर्य, कमल के फ़ूल अथवा खेतों का चिन्ह होता था, लेकिन ये “ईसाई क्रूसेडर क्रॉस”, “अंगूठा” और “विक्ट्री साइन” दिखाने वाले सिक्के ढाल कर सरकार क्या साबित करना चाहती है, यह अब स्पष्ट दिखाई देने लगा है। इस देश में “हिन्दू-विरोधियों” का एक मजबूत नेटवर्क तैयार हो चुका है, जिसमें मीडिया, NGO, पत्रकार, राजनेता, अफ़सरशाही सभी तबकों के लोग मौजूद हैं, तथा उनकी सहायता के लिये कुछ प्रत्यक्ष और कुछ अप्रत्यक्ष लोग “सेकुलर” अथवा “कांग्रेसी-वामपंथी” के नाम से मौजूद हैं।

इन सिक्कों के जरिये आने वाली पीढ़ियों के लिये यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि, सन् 2006 के काल में भारत पर “इटली की एक ईसाई महारानी” राज्य करती थी… तथा भारत की जनता में ही कुछ “जयचन्द” ऐसे भी थे जो इस महारानी की चरणवन्दना करते थे और कुछ “चारण-भाट” उसके गीत गाते थे, जिन्हें “सेकुलर” कहा जाता था।

, , , , , , , ,
Published in ब्लॉग
जब श्रीलंका ने तमिल चीतों पर निर्णायक हमला बोलने का निर्णय लिया तब कई लोगों को आश्चर्य हुआ था, कि आखिर श्रीलंका कैसे यह कर सकेगा। लेकिन इलाके पर बारीक नज़र रखने वाले विशेषज्ञ जानते थे कि चीन का हाथ अब पूरी तरह से श्रीलंका की पीठ पर है और प्रभाकरन सिर्फ़ कुछ ही दिनों का मेहमान है। चीन की मदद से न सिर्फ़ श्रीलंका ने जफ़ना और त्रिंकोमाली पर पकड़ मजबूत कर ली बल्कि “अन्तर्राष्ट्रीय आवाजों” और “पश्चिम की चिंताओं” की परवाह भी नहीं की।

श्रीलंका के दक्षिणी तट पर, विश्व के सबसे व्यस्ततम जलमार्ग से सिर्फ़ 10 समुद्री मील दूर एक विशालकाय निर्माण कार्य चल रहा है। “हम्बनतोटा” नामक इस मछलीमार गाँव की शान्ति भारी मशीनों ने भंग की हुई है… यहाँ चीन की आर्थिक और तकनीकी मदद से एक बहुत बड़ा बन्दरगाह बनाया जा रहा है, जिसे चीन अपने हितों के लिये उपयोग करेगा।



मार्च 2007 में जब श्रीलंका और चीन की सरकारों के बीच इस बन्दरगाह को बनाने का समझौता हुआ तभी से (यानी पिछले दो साल से) चीन ने श्रीलंका को इसके बदले में हथियार, अन्य साजो-सामान की सहायता और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मनोवैज्ञानिक मदद सब कुछ दिया। असल में लगभग 1 अरब डॉलर की भारी-भरकम लागत से बनने वाले इस सैनिक-असैनिक बन्दरगाह से चीन अपने सभी जहाजों और तेल टैंकरों की मरम्मत और ईंधन की देखभाल तो करेगा ही, इस सामरिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री इलाके से सऊदी अरब द्वारा आने वाले उसके तेल पर भी नज़र रखेगा। भले ही चीन कहे कि यह एक व्यावसायिक बन्दरगाह है और श्रीलंका का इस पर पूरा नियन्त्रण होगा, लेकिन जो लोग चीन को जानते हैं वे यह जानते हैं कि चीन इस बन्दरगाह का उपयोग निश्चित रूप से क्षेत्र में अपनी सामरिक उपस्थिति दर्ज करने के लिये करेगा, और दक्षिण प्रशान्त और हिन्द महासागर में उसकी एक मजबूत उपस्थिति हो जायेगी।

इस जलमार्ग की विशिष्टता और उपयोगिता कितनी है यह इस बात से भी स्पष्ट होता है कि 1957 तक ब्रिटेन ने भी त्रिंकोमाली में अपना नौसेनिक अड्डा बनाया हुआ था और आज भी दिएगो गार्सिया में वह अमेरिका के साथ साझेदारी में एक महत्वपूर्ण द्वीप पर काबिज है। चीन की नज़र श्रीलंका पर 1990 से ही थी, लेकिन अब तमिल चीतों के सफ़ाये में मदद के बहाने से चीन ने श्रीलंका में पूरी तरह से घुसपैठ कर ली है, जब पश्चिमी देशों और भारत ने श्रीलंका को मदद देने से इंकार कर दिया तब चीन ने सभी को ठेंगे पर रखते हुए “लंका लॉजिस्टिक्स एण्ड टेक्नोलॉजीस” (जिसके मालिक श्रीलंकाई राष्ट्रपति के भाई गोतभाया राजपक्षे हैं) से श्रीलंका को खुलकर भारी हथियार दिये। अप्रैल 2007 में 40 करोड़ डॉलर के हथियारों के बाद छः F-7 विमान भी लगभग मुफ़्त में उसने श्रीलंका को दिये ताकि वह लिट्टे के हवाई हमलों से निपट सके। क्या इतना सब चीन मानवता के नाते कर रहा है? कोई मूर्ख ही यह सोच सकता है। खासकर तब, जबकि चीन ने पिछले दस साल में पाकिस्तान में ग्वादर बन्दरगाह, बांग्लादेश में चटगाँव बन्दरगाह और बर्मा में सिटवे बन्दरगाह को आधुनिक बनाने में अच्छा-खासा पैसा खर्च किया है। (खबर यहाँ देखें)

क्या अब किसी के कानों में खतरे की घंटी बजी? जरूर बजी, हरेक समझदार व्यक्ति इस खतरे को भाँप रहा है, सिवाय भारत की कांग्रेसी सरकार के, जिसकी विदेश नीति की विफ़लता का आलम यह है कि तिब्बत के बाद अब नेपाल के रास्ते चीन पूर्वी सीमा पर आन खड़ा हुआ है तथा देश के चारों ओर महत्वपूर्ण ठिकानों पर अपने बन्दरगाह बना चुका है। सिर्फ़ अमेरिका की चमचागिरी करना ही “विदेश नीति” नहीं होती, यह बात कौन हमारे नेताओं को समझायेगा? आखिर कब भारत एक तनकर खड़ा होने वाला देश बनेगा। तथाकथित मानवाधिकारों की परवाह किये बिना कब भारत “अपने फ़ायदे” के बारे में सोचेगा? जो कुछ चीन ने श्रीलंका में किया क्या हम नहीं कर सकते थे? बांग्लादेश और पाकिस्तान को छोड़ भी दें (क्योंकि वे इस्लामिक देश हैं) तब भी कम से कम श्रीलंका और बर्मा में भारत अपने “पैर” जमा सकता था, लेकिन हमारी सरकारों को कभी करुणानिधि का डर सताता है, कभी “मानवाधिकारवादियों” का, तो कभी “लाल झण्डे वालों” का…, देश का फ़ायदा (दूरगामी फ़ायदा) कैसे हो यह सोचने की फ़ुर्सत किसी के पास नहीं है। उधर महिन्द्रा राजपक्षे की चारों तरफ़ से मौज है, सन् 2005 से लेकर अब तक चीन उसे 1 अरब डॉलर की अतिरिक्त मदद दे चुका है, जबकि इसी अवधि में अमेरिका ने सिर्फ़ 7 करोड़ डॉलर और ब्रिटेन ने सिर्फ़ 2 करोड़ पौंड की मदद दी है। आतंकवाद से लड़ने के नाम पर राजपक्षे विश्व की सहानुभूति तो बटोर ही रहे हैं, माल भी बटोर रहे हैं। चीन ने उसे संयुक्त राष्ट्र में उठने वाली किसी भी आपत्ति पर कान न देने को कहा है, और श्रीलंका जानता है कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन का वरदहस्त होने के क्या मायने हैं, इसलिये वह भारत को भी “भाव” देने को तैयार नहीं हैं, जबकि इधर भारतीय नेता खामखा मुगालते में बैठे हैं कि श्रीलंका हमारी कोई भी बात सुनेगा।

इस सारे झमेले में एक “मिशनरी/चर्च” का कोण भी है, जिसकी तरफ़ अभी बहुत कम लोगों का ही ध्यान गया है। श्रीलंका में बरसों से जारी सिंहली-तमिल संघर्ष के दौरान जिस लिट्टे का जन्म हुआ, अब वह लिट्टे पुराना लिट्टे नहीं रहा। उसके प्रमुख प्रभाकरण भी ईसाई बन चुके और कई प्रमुख ओहदेदार भी। लिट्टे अपने सदस्यों का अन्तिम संस्कार भी नहीं करने देता बल्कि उन्हें कब्र में दफ़नाया जाता है। लिट्टे की सबसे बड़ी आर्थिक और शस्त्रास्त्रों की आपूर्ति करने वाली संस्था रही “पश्चिम का एवेंजेलिकल चर्च”। चर्च (खासकर नॉर्वे, जर्मनी, स्पेन) और पश्चिम के अन्य देशों के पैसों के बल पर तमिलनाडु और उत्तरी श्रीलंका को मिलाकर एक “तमिल ईलम” बनाने की योजना थी, फ़िलहाल जिस पर चीन की मेहरबानी से पानी फ़िर गया है। गत 5 साल में चर्च का सर्वाधिक पैसा भारत में जिस राज्य में आया है वह “तमिलनाडु” है। करुणानिधि भले ही अपने-आप को नास्तिक बताते रहे हों, लेकिन गले में पीला दुपट्टा ओढ़कर भी वे सदा चर्च की मदद को तत्पर रहे हैं। शंकराचार्य की गिरफ़्तारी हो या चेन्नै हाईकोर्ट में वकीलों द्वारा किया गया उपद्रव हो, हरेक घटना के पीछे द्रमुक का हिन्दू और ब्राह्मणविरोधी रुख स्पष्ट दिखा है। जबकि चीन के लिये अपना फ़ायदा अधिक महत्वपूर्ण है, “चर्च” वगैरह की शक्ति को वह जूते की नोक पर रखता है, इसलिये उसे इस बात से कोई मतलब नहीं कि श्रीलंका में चल रहा संघर्ष असल में “बौद्ध” और “चर्च” का संघर्ष था। पश्चिमी देशों की श्रीलंका में मानवाधिकार आदि की “चिल्लपों” इसी कारण है कि चर्च का काफ़ी पैसा पानी में चला गया, जबकि श्रीलंका सरकार का रुख “कान पर बैठी मक्खी उड़ाने” जैसा इसलिये है, क्योंकि वह जानता है कि चीन उसके साथ है।

फ़िलहाल तो भारत सरकार एक मूक दर्शक की भूमिका में है (जैसा कि वह अधिकतर मामलों में होती है), चाहे करुणानिधि खुलेआम तमिलनाडु में “तमिल ईलम” की स्थापना की घोषणा कर रहे हों, वाइको सरेआम “खून की नदियाँ” बहाने की बात कर रहे हों। छोटी-मोटी पार्टियाँ जनता को उकसाकर भारतीय सेना के ट्रकों को लूट रही हैं, जला रही हैं… लेकिन शायद केन्द्र की कांग्रेस सरकार करुणानिधि या जयललिता से भविष्य में होने वाले राजनैतिक समीकरण पर ध्यान टिकाये हुए है, जयललिता को पटाने में लगी है, फ़िर चाहे “देशहित” जाये भाड़ में।

, , , , , , , ,
Published in ब्लॉग
जैसा कि पहले भी कई बार कहा जा चुका है कि वामपंथियों और कांग्रेसियों ने भारत के गौरवशाली हिन्दू इतिहास को शर्मनाक बताने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है… क्रूर, अत्याचारी और अनाचारी मुगल शासकों के गुणगान करने में इन लोगों को आत्मिक सुख की अनुभूति होती है। लेकिन यह मामला उससे भी बढ़कर है, एक मुगल आक्रांता, जो कि समूचे भारत को “दारुल-इस्लाम” बनाने का सपना देखता था, की कब्र को दरगाह के रूप में अंधविश्वास और भेड़चाल के साथ नवाज़ा जाता है, लेकिन इतिहास को सुधार कर देश में आत्मगौरव निर्माण करने की बजाय हमारे महान इतिहासकार इस पर मौन हैं।

मुझे यकीन है कि अधिकतर पाठकों ने सुल्तान सैयद सालार मसूद गाज़ी के बारे में नहीं सुना होगा, यहाँ तक कि बहराइच (उत्तरप्रदेश) में रहने वालों को भी इसके बारे में शायद ठीक-ठीक पता न होगा। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं बहराइच (उत्तरप्रदेश) में “दरगाह शरीफ़”(???) पर प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के पहले रविवार को लगने वाले सालाना उर्स के बारे में…। बहराइच शहर से 3 किमी दूर सैयद सालार मसूद गाज़ी की दरगाह स्थित है, ऐसी मान्यता है(?) कि मज़ार-ए-शरीफ़ में स्नान करने से बीमारियाँ दूर हो जाती हैं (http://behraich.nic.in/) और अंधविश्वास के मारे लाखों लोग यहाँ आते हैं। सैयद सालार मसूद गाज़ी कौन था, उसकी कब्र “दरगाह” में कैसे तब्दील हो गई आदि के बारे में आगे जानेंगे ही, पहले “बहराइच” के बारे में संक्षिप्त में जान लें – यह इलाका “गन्धर्व वन” के रूप में प्राचीन वेदों में वर्णित है, ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा जी ने ॠषियों की तपस्या के लिये यहाँ एक घने जंगल का निर्माण किया था, जिसके कारण इसका नाम पड़ा “ब्रह्माइच”, जो कालांतर में भ्रष्ट होते-होते बहराइच बन गया।



अब आते हैं सालार मसूद पर… पाठकगंण महमूद गज़नवी (गज़नी) के बारे में तो जानते ही होंगे, वही मुगल आक्रांता जिसने सोमनाथ पर 16 बार हमला किया और भारी मात्रा में सोना हीरे-जवाहरात आदि लूट कर ले गया था। महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर आखिरी बार सन् 1024 में हमला किया था तथा उसने व्यक्तिगत रूप से सामने खड़े होकर शिवलिंग के टुकड़े-टुकड़े किये और उन टुकड़ों को अफ़गानिस्तान के गज़नी शहर की जामा मस्जिद की सीढ़ियों में सन् 1026 में लगवाया। इसी लुटेरे महमूद गजनवी का ही रिश्तेदार था सैयद सालार मसूद… यह बड़ी भारी सेना लेकर सन् 1031 में भारत आया। सैयद सालार मसूद एक सनकी किस्म का धर्मान्ध मुगल आक्रान्ता था। महमूद गजनवी तो बार-बार भारत आता था सिर्फ़ लूटने के लिये और वापस चला जाता था, लेकिन इस बार सैयद सालार मसूद भारत में विशाल सेना लेकर आया था कि वह इस भूमि को “दारुल-इस्लाम” बनाकर रहेगा और इस्लाम का प्रचार पूरे भारत में करेगा (जाहिर है कि तलवार के बल पर)।

सैयद सालार मसूद अपनी सेना को लेकर “हिन्दुकुश” पर्वतमाला को पार करके पाकिस्तान (आज के) के पंजाब में पहुँचा, जहाँ उसे पहले हिन्दू राजा आनन्द पाल शाही का सामना करना पड़ा, जिसका उसने आसानी से सफ़ाया कर दिया। मसूद के बढ़ते कदमों को रोकने के लिये सियालकोट के राजा अर्जन सिंह ने भी आनन्द पाल की मदद की लेकिन इतनी विशाल सेना के आगे वे बेबस रहे। मसूद धीरे-धीरे आगे बढ़ते-बढ़ते राजपूताना और मालवा प्रांत में पहुँचा, जहाँ राजा महिपाल तोमर से उसका मुकाबला हुआ, और उसे भी मसूद ने अपनी सैनिक ताकत से हराया। एक तरह से यह भारत के विरुद्ध पहला जेहाद कहा जा सकता है, जहाँ कोई मुगल आक्रांता सिर्फ़ लूटने की नीयत से नहीं बल्कि बसने, राज्य करने और इस्लाम को फ़ैलाने का उद्देश्य लेकर आया था। पंजाब से लेकर उत्तरप्रदेश के गांगेय इलाके को रौंदते, लूटते, हत्यायें-बलात्कार करते सैयद सालार मसूद अयोध्या के नज़दीक स्थित बहराइच पहुँचा, जहाँ उसका इरादा एक सेना की छावनी और राजधानी बनाने का था। इस दौरान इस्लाम के प्रति उसकी सेवाओं(?) को देखते हुए उसे “गाज़ी बाबा” की उपाधि दी गई।

इस मोड़ पर आकर भारत के इतिहास में एक विलक्षण घटना घटित हुई, ज़ाहिर है कि इतिहास की पुस्तकों में जिसका कहीं जिक्र नहीं किया गया है। इस्लामी खतरे को देखते हुए पहली बार भारत के उत्तरी इलाके के हिन्दू राजाओं ने एक विशाल गठबन्धन बनाया, जिसमें 17 राजा सेना सहित शामिल हुए और उनकी संगठित संख्या सैयद सालार मसूद की विशाल सेना से भी ज्यादा हो गई। जैसी कि हिन्दुओ की परम्परा रही है, सभी राजाओं के इस गठबन्धन ने सालार मसूद के पास संदेश भिजवाया कि यह पवित्र धरती हमारी है और वह अपनी सेना के साथ चुपचाप भारत छोड़कर निकल जाये अथवा उसे एक भयानक युद्ध झेलना पड़ेगा। गाज़ी मसूद का जवाब भी वही आया जो कि अपेक्षित था, उसने कहा कि “इस धरती की सारी ज़मीन खुदा की है, और वह जहाँ चाहे वहाँ रह सकता है… यह उसका धार्मिक कर्तव्य है कि वह सभी को इस्लाम का अनुयायी बनाये और जो खुदा को नहीं मानते उन्हें काफ़िर माना जाये…”।

उसके बाद ऐतिहासिक बहराइच का युद्ध हुआ, जिसमें संगठित हिन्दुओं की सेना ने सैयद मसूद की सेना को धूल चटा दी। इस भयानक युद्ध के बारे में इस्लामी विद्वान शेख अब्दुर रहमान चिश्ती की पुस्तक मीर-उल-मसूरी में विस्तार से वर्णन किया गया है। उन्होंने लिखा है कि मसूद सन् 1033 में बहराइच पहुँचा, तब तक हिन्दू राजा संगठित होना शुरु हो चुके थे। यह भीषण रक्तपात वाला युद्ध मई-जून 1033 में लड़ा गया। युद्ध इतना भीषण था कि सैयद सालार मसूद के किसी भी सैनिक को जीवित नहीं जाने दिया गया, यहाँ तक कि युद्ध बंदियों को भी मार डाला गया… मसूद का समूचे भारत को इस्लामी रंग में रंगने का सपना अधूरा ही रह गया।

बहराइच का यह युद्ध 14 जून 1033 को समाप्त हुआ। बहराइच के नज़दीक इसी मुगल आक्रांता सैयद सालार मसूद (तथाकथित गाज़ी बाबा) की कब्र बनी। जब फ़िरोज़शाह तुगलक का शासन समूचे इलाके में पुनर्स्थापित हुआ तब वह बहराइच आया और मसूद के बारे में जानकारी पाकर प्रभावित हुआ और उसने उसकी कब्र को एक विशाल दरगाह और गुम्बज का रूप देकर सैयद सालार मसूद को “एक धर्मात्मा”(?) के रूप में प्रचारित करना शुरु किया, एक ऐसा इस्लामी धर्मात्मा जो भारत में इस्लाम का प्रचार करने आया था। मुगल काल में धीरे-धीरे यह किंवदंती का रूप लेता गया और कालान्तर में सभी लोगों ने इस “गाज़ी बाबा” को “पहुँचा हुआ पीर” मान लिया तथा उसकी दरगाह पर प्रतिवर्ष एक “उर्स” का आयोजन होने लगा, जो कि आज भी जारी है।

इस समूचे घटनाक्रम को यदि ध्यान से देखा जाये तो कुछ बातें मुख्य रूप से स्पष्ट होती हैं-

(1) महमूद गजनवी के इतने आक्रमणों के बावजूद हिन्दुओं के पहली बार संगठित होते ही एक क्रूर मुगल आक्रांता को बुरी तरह से हराया गया (अर्थात यदि हिन्दू संगठित हो जायें तो उन्हें कोई रोक नहीं सकता)

(2) एक मुगल आक्रांता जो भारत को इस्लामी देश बनाने का सपना देखता था, आज की तारीख में एक “पीर-शहीद” का दर्जा पाये हुए है और दुष्प्रचार के प्रभाव में आकर मूर्ख हिन्दू उसकी मज़ार पर जाकर मत्था टेक रहे हैं।

(3) एक इतना बड़ा तथ्य कि महमूद गजनवी के एक प्रमुख रिश्तेदार को भारत की भूमि पर समाप्त किया गया, इतिहास की पुस्तकों में सिरे से ही गायब है।

जो कुछ भी उपलब्ध है इंटरनेट पर ही है, इस सम्बन्ध में रोमिला थापर की पुस्तक “Dargah of Ghazi in Bahraich” में उल्लेख है

एन्ना सुवोरोवा की एक और पुस्तक “Muslim Saints of South Asia” में भी इसका उल्लेख मिलता है,


जो मूर्ख हिन्दू उस दरगाह पर जाकर अभी भी स्वास्थ्य और शारीरिक तकलीफ़ों सम्बन्धी तथा अन्य दुआएं मांगते हैं उनकी खिल्ली स्वयं “तुलसीदास” भी उड़ा चुके हैं। चूंकि मुगल शासनकाल होने के कारण तुलसीदास ने मुस्लिम आक्रांताओं के बारे में ज्यादा कुछ नहीं लिखा है, लेकिन फ़िर भी बहराइच में जारी इस “भेड़िया धसान” (भेड़चाल) के बारे में वे अपनी “दोहावली” में कहते हैं –

लही आँखि कब आँधरे, बाँझ पूत कब ल्याइ ।
कब कोढ़ी काया लही, जग बहराइच जाइ॥

अर्थात “पता नहीं कब किस अंधे को आँख मिली, पता नहीं कब किसी बाँझ को पुत्र हुआ, पता नहीं कब किसी कोढ़ी की काया निखरी, लेकिन फ़िर भी लोग बहराइच क्यों जाते हैं…” (यहाँ भी देखें)

“लाल” इतिहासकारों और धूर्त तथा स्वार्थी कांग्रेसियों ने हमेशा भारत की जनता को उनके गौरवपूर्ण इतिहास से महरूम रखने का प्रयोजन किया हुआ है। इनका साथ देने के लिये “सेकुलर” नाम की घृणित कौम भी इनके पीछे हमेशा रही है। भारत के इतिहास को छेड़छाड़ करके मनमाने और षडयन्त्रपूर्ण तरीके से अंग्रेजों और मुगलों को श्रेष्ठ बताया गया है और हिन्दू राजाओं का या तो उल्लेख ही नहीं है और यदि है भी तो दमित-कुचले और हारे हुए के रूप में। आखिर इस विकृति के सुधार का उपाय क्या है…? जवाब बड़ा मुश्किल है, लेकिन एक बात तो तय है कि इतने लम्बे समय तक हिन्दू कौम का “ब्रेनवॉश” किया गया है, तो दिमागों से यह गंदगी साफ़ करने में समय तो लगेगा ही। इसके लिये शिक्षण पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे। “मैकाले की अवैध संतानों” को बाहर का रास्ता दिखाना होगा, यह एक धीरे-धीरे चलने वाली प्रक्रिया है। हालांकि संतोष का विषय यह है कि इंटरनेट नामक हथियार युवाओं में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, युवाओं में “हिन्दू भावनाओं” का उभार हो रहा है, उनमें अपने सही इतिहास को जानने की भूख है। आज का युवा काफ़ी समझदार है, वह देख रहा है कि भारत के आसपास क्या हो रहा है, वह जानता है कि भारत में कितनी अन्दरूनी शक्ति है, लेकिन जब वह “सेकुलरवादियों”, कांग्रेसियों और वामपंथियों के ढोंग भरे प्रवचन और उलटबाँसियाँ सुनता है तो उसे उबकाई आने लगती है, इन युवाओं (17 से 23 वर्ष आयु समूह) को भारत के गौरवशाली पृष्ठभूमि का ज्ञान करवाना चाहिये। उन्हें यह बताने की जरूरत है कि भले ही वे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के नौकर बनें, लेकिन उन्हें किसी से “दबकर” रहने या अपने धर्म और हिन्दुत्व को लेकर किसी शर्मिन्दगी का अहसास करने की आवश्यकता नहीं है। जिस दिन हिन्दू संगठित होकर प्रतिकार करने लगेंगे, एक “हिन्दू वोट बैंक” की तरह चुनाव में वोटिंग करने लगेंगे, उस दिन ये “सेकुलर” नामक रीढ़विहीन प्राणी देखते-देखते गायब हो जायेगा।

हमें प्रत्येक दुष्प्रचार का जवाब खुलकर देना चाहिये, वरना हो सकता है कि किसी दिन एकाध “गधे की दरगाह” पर भी हिन्दू सिर झुकाते हुए मिलें…

, , , , , , , ,
Published in ब्लॉग
जलन, असुरक्षा और अविश्वास इन तत्वों से तो इस्लामी शासनकाल के पन्ने रंगे पड़े हैं, जहाँ भाई-भाई, और पिता-पुत्र में सत्ता के लिये खूनी रंजिशें की गईं, लेकिन क्या आपने सुना है कि कोई शासक अपनी 63 पत्नियों को सिर्फ़ इसलिये मार डाले कि कहीं उसके मरने के बाद वे दोबारा शादी न कर लें… है ना आश्चर्यजनक बात!!! लेकिन सच है…

यूँ तो कर्नाटक के बीजापुर में गोल गुम्बज और इब्राहीम रोज़ा जैसी कई ऐतिहासिक इमारतें और दर्शनीय स्थल हैं, लेकिन एक स्थान ऐसा भी है जहाँ पर्यटकों को ले जाकर इस्लामी आक्रांताओं के कई काले कारनामों में से एक के दर्शन करवाये जा सकते हैं। बीजापुर-अठानी रोड पर लगभग 5 किलोमीटर दूर एक उजाड़ स्थल पर पाँच एकड़ में फ़ैली यह ऐतिहासिक कत्लगाह है। “सात कबर” (साठ कब्र का अपभ्रंश) ऐसी ही एक जगह है। इस स्थान पर आदिलशाही सल्तनत के एक सेनापति अफ़ज़ल खान द्वारा अपनी 63 पत्नियों की हत्या के बाद बनाई गई कब्रें हैं। इस खण्डहर में काले पत्थर के चबूतरे पर 63 कब्रें बनाई गई हैं।




इतिहास कुछ इस प्रकार है कि एक तरफ़ औरंगज़ेब और दूसरी तरफ़ से शिवाजी द्वारा लगातार जारी हमलों से परेशान होकर आदिलशाही द्वितीय (जिसने बीजापुर पर कई वर्षों तक शासन किया) ने सेनापति अफ़ज़ल खान को आदेश दिया कि इनसे निपटा जाये और राज्य को बचाने के लिये पहले शिवाजी पर चढ़ाई की जाये। हालांकि अफ़ज़ल खान के पास एक बड़ी सेना थी, लेकिन फ़िर भी वह ज्योतिष और भविष्यवक्ताओं पर काफ़ी भरोसा करता था। शिवाजी से युद्ध पर जाने के पहले उसके ज्योतिषियों ने उसके जीवित वापस न लौटने की भविष्यवाणी की। उसी समय उसने तय कर लिया कि कहीं उसकी मौत के बाद उसकी पत्नियाँ दूसरी शादी न कर लें, इसलिये सभी 63 पत्नियों को मार डालने की योजना बनाई।

अफ़ज़ल खान अपनी सभी पत्नियों को एक साथ बीजापुर के बाहर एक सुनसान स्थल पर लेकर गया। जहाँ एक बड़ी बावड़ी स्थित थी, उसने एक-एक करके अपनी पत्नियों को उसमें धकेलना शुरु किया, इस भीषण दुष्कृत्य को देखकर उसकी दो पत्नियों ने भागने की कोशिश की लेकिन उसने सैनिकों को उन्हें मार गिराने का हुक्म दिया। सभी 63 पत्नियों की हत्या के बाद उसने वहीं पास में सबकी कब्र एक साथ बनवाई।



आज की तारीख में इतना समय गुज़र जाने के बाद भी जीर्ण-शीर्ण खण्डहर अवस्था में यह बावड़ी और कब्रें काफ़ी ठीक-ठाक हालत में हैं। यहाँ पहली दो लाइनों में 7-7 कब्रें, तीसरी लाइन में 5 कब्रें तथा आखिरी की चारों लाइनों में 11 कब्रें बनी हुई दिखाई देती हैं और वहीं एक बड़ी “आर्च” (मेहराब) भी बनाई गई है, ऐसा क्यों और किस गणित के आधार पर किया गया, ये तो अफ़ज़ल खान ही बता सकता है। वह बावड़ी भी इस कब्रगाह से कुछ दूर पर ही स्थित है। अफ़ज़ल खान ने खुद अपने लिये भी एक कब्र यहीं पहले से बनवाकर रखी थी। हालांकि उसके शव को यहाँ तक नहीं लाया जा सका और मौत के बाद प्रतापगढ़ के किले में ही उसे दफ़नाया गया था, लेकिन इससे यह भी साबित होता है कि वह अपनी मौत को लेकर बेहद आश्वस्त था, भला ऐसी मानसिकता में वह शिवाजी से युद्ध कैसे लड़ता? मराठा योद्धा शिवाजी के हाथों अफ़ज़ल खान का वध प्रतापगढ़ के किले में 1659 में हुआ।

वामपंथियों और कांग्रेसियों ने हमारे इतिहास में मुगल बादशाहों के अच्छे-अच्छे, नर्म-नर्म, मुलायम-मुलायम किस्से-कहानी ही भर रखे हैं, जिनके द्वारा उन्हें सतत महान, सदभावनापूर्ण और दयालु(?) बताया है, लेकिन इस प्रकार 63 पत्नियों की हत्या वाली बातें जानबूझकर छुपाकर रखी गई हैं। आज बीजापुर में इस स्थान तक पहुँचने के लिये ऊबड़-खाबड़ सड़कों से होकर जाना पड़ता है और वहाँ अधिकतर लोगों को इसके बारे में विस्तार से कुछ पता नहीं है (साठ कब्र का नाम भी अपभ्रंश होते-होते “सात-कबर” हो गया), जो भी हो लेकिन है तो यह एक ऐतिहासिक स्थल ही, सरकार को इस तरफ़ ध्यान देना चाहिये और इसे एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना चाहिये। लोगों को मुगलकाल के राजाओं द्वारा की गई क्रूरता को भी पता होना चाहिये। आजकल टूरिज़्म के क्षेत्र में “डार्क टूरिज़्म” (Dark Tourism) का नया फ़ैशन चल पड़ा है, जिसमें विभिन्न देशों के पर्यटक ऐसे भयानक पर्यटन(?) स्थल को देखने की इच्छा रखते हैं। इंडोनेशिया में बाली का वह समुद्र तट बहुत लोकप्रिय हो रहा है जहाँ आतंकवादियों ने बम विस्फ़ोट करके सैकड़ों मासूमों को मारा था, इसी प्रकार तमिलनाडु में सुदूर स्थित गाँव जिन्हें सुनामी ने लील लिया था वहाँ भी पर्यटक जा रहे हैं, तथा हाल ही में मुम्बई के हमले के बाद नरीमन हाउस को देखने भारी संख्या में दर्शक पहुँच रहे हैं, उस इमारत में रहने वाले लोगों ने गोलियों के निशान वैसे ही रखे हुए हैं और जहाँ-जहाँ आतंकवादी मारे गये थे वहाँ लाल घेरा बना रखा है, पर्यटकों को दिखाने के लिये। “मौत को तमाशा” बनाने के बारे में सुनने में भले ही अजीब लगता हो, लेकिन यह हो रहा है।

ऐसे में यदि खोजबीन करके भारत के खूनी इतिहास में से मुगल बादशाहों द्वारा किये गये अत्याचारों को भी बाकायदा पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाये तो क्या बुराई है? कम से कम अगली पीढ़ी को उनके कारनामों के बारे में तो पता चलेगा, वरना “मैकाले-मार्क्स” के प्रभाव में वे तो यही सोचते रहेंगे कि अकबर एक दयालु बादशाह था (भले ही उसने सैकड़ों हिन्दुओं का कत्ल किया हो), शाहजहाँ अपनी बेगम से बहुत प्यार करता था (मुमताज़ ने 14 बच्चे पैदा किये और उसकी मौत भी एक डिलेवरी के दौरान ही हुई, ऐसा भयानक प्यार? शाहजहाँ खुद एक बच्चा पैदा करता तब पता चलता), या औरंगज़ेब ने जज़िया खत्म किया और वह टोपियाँ सिलकर खुद का खर्च निकालता था (भले ही उसने हजारों मन्दिर तुड़वाये हों, बेटी ज़ेबुन्निसा शायर और पेंटर थी इसलिये उससे नफ़रत करता था, भाई दाराशिकोह हिन्दू धर्म की ओर झुकाव रखने लगा तो उसे मरवा दिया… इतना महान मुगल शासक?)…

तात्पर्य यह कि इस “दयालु मुगल शासक” वाले वामपंथी “मिथक” को तोड़ना बहुत ज़रूरी है। बच्चों को उनके व्यक्तित्व के उचित विकास के लिये सही इतिहास बताना ही चाहिये… वरना उन्हें 63 पत्नियों के हत्यारे के बारे में कैसे पता चलेगा…

(सूचना का मूल स्रोत यहाँ देखें)
==============

नोट : क्या आप जानते हैं, कि भारत में एक मुगल हमलावर (जो समूचे भारत को दारुल-इस्लाम बनाने का सपना देखता था) की दरगाह पर मेला लगता है, जहाँ हिन्दू-मुस्लिम “दुआएं”(???) माँगने जाते हैं… उसके बारे में भी शीघ्र ही लेख पेश किया जायेगा…

, , , , , , , ,
Published in ब्लॉग
सबसे पहले कुछ जरूरी सवाल –
1) मानो यदि किसी वकील को यह पता हो कि जिसका केस वह लड़ रहा है वह देशद्रोही है, फ़िर भी वह उसे बचाने के लिये जी-जान लगाता है और बचा भी लेता है तो इसे क्या कहेंगे “पेशे के प्रति नैतिकता और ईमानदारी” या “देशद्रोह”?

2) कोई पत्रकार किसी गुप्त जगह पर छिपे आतंकवादी का इंटरव्यू लेता है, उसकी राष्ट्रविरोधी टिप्पणियाँ प्रकाशित करता है और उसे “हीरो” बनाने की कोशिश करता है तो यह “पेशे के प्रति नैतिकता और ईमानदारी है या देशद्रोह”?

3) कोई वेश्या यह जानने के बावजूद कि ग्राहक “एड्स” का मरीज है उसे बगैर कण्डोम के “एण्टरटेन” करती है, तो यह “पेशे के प्रति नैतिकता और ईमानदारी” है या “मूर्खता”?

ऐसे कई उदाहरण दिये जा सकते हैं जहाँ “देश” “कर्तव्य” और पेशे की नैतिकता के बीच चुनाव के सवाल खड़े किये जा सकते हैं, अब आते हैं मूल बात पर…

जो अज़मल कसाब पहले तोते की तरह सारी बातें उगल-उगलकर बता रहा था, अचानक एक वकील की संगत में आते ही घाघ लोमड़ी की तरह बर्ताव करने लगा है। सबसे पहले तो वह अपनी कही पुरानी सारी बातों से ही मुकर गया, फ़िर उसके काबिल वकील ने उसे यह भी पढ़ाया कि “वह अदालत से माँग करे कि वह नाबालिग है, इसलिये उस पर इस कोर्ट में मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिये”, फ़िर अज़मल कसाब ने एक और पाकिस्तानी वकील की भी माँग की, अब उसके माननीय वकील ने माँग की है कि पूरे 11000 हजार पेजों की चार्जशीट का उर्दू अनुवाद उसे दिया जाये ताकि वह अपने मुवक्किल को ठीक से केस के बारे में समझा सके और कसाब समझ सके… तात्पर्य यह कि अभी तो शुरुआत है… भारत के कानून और न्याय व्यवस्था के छेदों का फ़ायदा उठाते हुए पहले तो उसका केस सालों तक चलेगा, और कहीं गलती से फ़ाँसी की सजा हो भी गई तो फ़िर राष्ट्रपति के पास “क्षमायाचना” की अर्जी दाखिल करने का विकल्प भी खुला है, जहाँ यदि स्वतन्त्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका रखने वाली “गाँधी” की कांग्रेस रही तो वह भी अफ़ज़ल गुरु की तरह मौज करता रहेगा।

हालांकि कसाब को पाकिस्तानी वकील की माँग करने की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि जो काम पाकिस्तान से आया हुआ वकील करेगा, वही काम हमारे यहाँ के वकील भी उसके लिये कर देंगे। कहावत है कि डॉक्टर और वकील से कुछ भी नहीं छिपाना चाहिये, ज़ाहिर है कि अपराधी (बल्कि देशद्रोही तत्व) भी अपनी हर बात वकील को बताते होंगे, ताकि घाघ वकील उसका “कानूनी तोड़” निकाल सके, ऐसे में सवाल उठता है कि जबकि वकील जान चुका है कि उसका “क्लाइंट” कितना गिरा हुआ इंसान है और देश के विरुद्ध षडयन्त्र करने और उसे तोड़ने में लगा हुआ है, तब उसे “पेशे के प्रति ईमानदारी” और “देशप्रेम” के बीच में किस बात का चुनाव करना चाहिये?

फ़िलहाल कसाब के लिये कड़ी सुरक्षा व्यवस्था, एयरकंडीशनर, वाटर कूलर, रोज़ाना मेडिकल चेक-अप, अच्छा खाना, आदि सुविधायें दी जा रही हैं जो कि लगभग अनन्त काल तक चलेंगी। चाट का ठेला लगाने वाले की, दो कौड़ी की औकात रखने वाली औलाद भला इस “शानदार भारतीय मेहमाननवाज़ी वाली व्यवस्था” को छोड़कर कहीं जाना चाहेगा? सवाल ही नहीं उठता, और फ़िर अब तो उसे “नेक सलाह” देने के लिये एक “वकील” भी मिल गया है, उधर अफ़ज़ल गुरु को भी तिहाड़ में रोज़ाना अखबार/पत्रिकायें, व्यायाम करने हेतु खुली हवा, चिकन/मटन आदि मिल ही रहा है, बस तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख बढ़वाये जाओ, देश को चूना लगाये जाओ, और कांग्रेस के इन “महान दोस्तों” को गोद में बैठाकर सहलाते रहो।

पहले कसाब अपने में खोया-खोया सा रहता था, परेशान और उदास दिखाई देता था, ठीक से भोजन नहीं करता था…। अब्बास काज़मी नामक वकील के मिलते ही कसाब में एक “ड्रामेटिक” बदलाव आ गया है, अब गत कुछ दिनों से वह वकीलों और पत्रकारों से बाकायदा आँखें मिलाकर बात करने लगा है, बड़ा बेफ़िक्र सा नज़र आने लगा है, वह अब मुस्कुराने भी लगा है, उसके साथ सह-अभियुक्त फ़हीम अंसारी ने जब अपनी पत्नी से मिलने की इजाजत माँगी (और उसे वह मिली भी) तो कसाब हँसा भी था… (ये सारी खबर मुकदमा कवर कर रहे पत्रकार ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया में यहाँ लिखी हैं)… कहने का मतलब ये कि वकील साहब की मेहरबानियों से मात्र 4-5 दिनों में ही वह समझ चुका है कि उसका कुछ बिगड़ने वाला नहीं है, वह काफ़ी लम्बे समय तक जियेगा और मौज से जियेगा… अब कसाब भी हमारे नेताओं की तरह सार्वजनिक रूप से कह सकता है कि “मुझे भारत की न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है और मुझे पूरा न्याय मिलेगा…”। यही सनातन वाक्य कई बार अबू सलेम, तेलगी, शहाबुद्दीन और समर्पण की आस रखने वाले दाऊद इब्राहीम भी बक चुके हैं।

“सरकारी लीगल पैनल” वकीलों की एक पैनल होती है जिसके द्वारा ऐसे मुजरिमों को मदद दी जाती है जो खुद अपना वकील नियुक्त नहीं कर सकते। इस पैनल में शामिल वकीलों को फ़िलहाल 900/- रुपये प्रति केस की दर से भुगतान किया जाता है (हालांकि इस फ़ीस के बहुत कम होने को लेकर जस्टिस टहिलियानी ने सरकार से इसे बढ़ाने को कहा है)। अब आते हैं कसाब के वकील अब्बास काज़मी पर… ये सज्जन(?) प्रायवेट वकील हैं, लेकिन कोर्ट द्वारा इन्हें कसाब का वकील नियुक्त किया गया है। वकील काज़मी किसी भी सरकारी “लीगल पैनल” में नहीं हैं। इसलिये सरकार को इनकी अच्छी-खासी फ़ीस भी चुकानी पड़ेगी, हालांकि ऐसा बहुत ही कम होता है, लेकिन इस केस में हो रहा है। काज़मी साहब की फ़ीस कितनी है इसका खुलासा अभी नहीं हो पाया है, लेकिन अब्बास काज़मी साहब कोई ऐरे-गैरे वकील नहीं हैं, 1993 के मुम्बई बम काण्ड के काफ़ी सारे अभियुक्तों के वकील यही महाशय थे, 1997 के गुलशन कुमार हत्याकाण्ड में भगोड़े नदीम के वकील भी हैं, और गत वर्ष “इंडियन मुजाहिदीन” के खिलाफ़ लगे हुए केसों में भी यही वकील हैं, (खबर यहाँ देखें)। पाकिस्तानी वकील की माँग का राग अलापने वाले कसाब को जब अब्बास काज़मी के बारे में बताया गया तो उसने आज्ञाकारी बालक की तरह तत्काल इसे मान लिया। (अब तक तो आप जान ही गये होंगे कि ये कितने “पहुँचे” हुए वकील हैं)

काज़मी साहब का एक और कारनामा भी पढ़ ही लीजिये… 1993 के मुम्बई बम धमाकों के एक अंडरवर्ल्ड आरोपी एजाज़ पठान को षडयन्त्र रचने और विस्फ़ोट में उसकी भूमिका हेतु दस साल कैद और सवा दो लाख रुपये जुर्माना की सजा मुकर्रर हुई। टाडा कोर्ट ने उसे जेल में ही रखने का आदेश दिया था। (इस खबर को यहाँ पढ़ें) एजाज़ पठान को दाऊद के भाई इब्राहीम कासकर के साथ 2003 में भारत लाया गया था। अब्बास काज़मी साहब ने कोर्ट द्वारा सरकार से एजाज़ पठान को “दिल की बीमारी के इलाज” के नाम पर दो लाख रुपये स्वीकृत करवाये (यानी सवा दो लाख के जुर्माने में से दो लाख रुपये तो वापस मिल ही गये)। कठोर सजायाफ़्ता कैदियों को महाराष्ट्र की दूरस्थ जेलों में भेजा जाता है, लेकिन एजाज़ पठान, काज़मी साहब की मेहरबानी से मुम्बई में आर्थर रोड जेल अस्पताल में ही जमा रहा, जहाँ उसकी दिल का दौरा पड़ने से मौत हुई।

तो भाईयों और बहनों, इस मुगालते में मत रहियेगा कि कसाब को तुरन्त कोई सजा मिलने वाली है, वह भारत सरकार का एक नया-नवेला “दामाद” है, एकाध मानवाधिकार संगठन भी उसकी पैरवी में आता ही होगा, या कोई बड़ी बिन्दी वाली महिला किसी “भारतीय इस्लामिक चैनल” पर उसे माफ़ी देने की पुरजोर अपील भी कर सकती है, साथ ही उसकी सेवा में “महान वकील” अब्बास काज़मी भी लगे हुए हैं… आप तो बस भारतीय न्याय व्यवस्था और वकीलों की जय बोलिये। कानून के विद्वान ही बता सकते हैं कि कसाब पर “मकोका” क्यों नहीं लगा और प्रज्ञा ठाकुर पर कैसे लगा? लोकतन्त्र की दुहाई देने वाले बतायेंगे कि यदि कसाब अमेरिका में होता तो उसके साथ क्या और कैसा होता तथा चीन को अपना बाप मानने वाले बतायेंगे कि यदि कसाब चीन में होता तो उसके साथ क्या और कैसा होता?
=====================

नोट – पढ़ते-पढ़ते यदि आपका खून खौलने लगा हो तो जाकर ठण्डे पानी से नहा आईये और दो रोटी ज्यादा खा लीजिये, इससे ज्यादा हम-आप कुछ कर भी नहीं सकते…

, , , , , , , ,
Published in ब्लॉग
“शर्मनिरपेक्षता” के खेल की धुरंधर खिलाड़ी, सेकुलर गैंगबाजों की पसन्दीदा अभिनेत्री, झूठे और फ़र्जी NGOs की “आइकॉन”, यानी सैकड़ों नकली पद्मश्रीधारियों में से एक, तीस्ता सीतलवाड के मुँह पर सुप्रीम कोर्ट ने एक तमाचा जड़ दिया है। पेट फ़ाड़कर बच्चा निकालने की जो कथा लगातार हमारा सेकुलर मीडिया सुनाता रहा, आखिर वह झूठ निकली। सात साल तक लगातार भाजपा और मोदी को गरियाने के बाद उनका फ़ेंका हुआ “बूमरेंग” उन्हीं के थोबड़े पर आ लगा है।

सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के तहत गठित “स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम” (SIT) ने सुप्रीम कोर्ट में तथ्य पेश करते हुए अपनी रिपोर्ट पेश की जिसके मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं –

1) कौसर बानो नामक गर्भवती महिला का कोई गैंगरेप नहीं हुआ, न ही उसका बच्चा पेट फ़ाड़कर निकाले जाने की कोई घटना हुई।

2) नरोडा पाटिया के कुँए में कई लाशों को दफ़न करने की घटना भी झूठी साबित हुई।

3) ज़रीना मंसूरी नामक महिला जिसे नरोडा पाटिया में जिंदा जलाने की बात कही गई थी, वह कुछ महीने पहले ही TB से मर चुकी थी।

4) ज़ाहिरा शेख ने भी अपने बयान में कहा कि तीस्ता ने उससे कोरे कागज़ पर अंगूठा लगवा लिया था।

5) तीस्ता के मुख्य गवाह रईस खान ने भी कहा कि तीस्ता ने उसे गवाही के लिये धमकाकर रखा था।

6) सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि सारे एफ़िडेविट एक ही कम्प्यूटर से निकाले गये हैं और उनमें सिर्फ़ नाम बदल दिया गया है।

7) विशेष जाँच दल ने पाया कि तीस्ता सीतलवाड ने गवाहों को धमकाया, गलत शपथ-पत्र दाखिल किये, कोर्ट में झूठ बोला।

कुल मिलाकर कहानी में जबरदस्त मोड़ आया है और धर्मनिरपेक्षता के झण्डाबरदार मुँह छिपाते घूम रहे हैं। NGO नामक पैसा उगाने वाली फ़र्जी संस्थाओं को भी अपने विदेशी आकाओं को जवाब नहीं देते बन रहा, गुजरात में उन्हें बेहतरीन मौका मिला था, लेकिन लाखों डॉलर डकार कर भी वे कुछ ना कर सके। हालांकि देखा जाये तो उन्होंने बहुत कुछ किया, नरेन्द्र मोदी की छवि खराब कर दी, गुजरात को बदनाम कर दिया, “भगवा” शब्द की खूंखार छवि बना दी… यानी काफ़ी काम किया।

अब समय आ गया है कि विदेशी मदद पाने वाले सभी NGOs की नकेल कसना होगी। इन NGOs के नाम पर जो फ़र्जीवाड़ा चल रहा है वह सबको पता है, लेकिन सबके अपने-अपने स्वार्थ के कारण इन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। हाल ही में रूस ने एक कानून पास किया है और उसके अनुसार विदेशी पैसा पाने वाले NGO और अन्य संस्थाओं पर रूसी सरकार का नियन्त्रण रहेगा। पुतिन ने साफ़ समझ लिया है कि विदेशी पैसे का उपयोग रूस को अस्थिर करने के लिये किया जा रहा है, जॉर्जिया में “गुलाबी क्रांति”, यूक्रेन में “ऑरेंज क्रांति” तथा किर्गिस्तान में “ट्यूलिप क्रांति” के नाम पर अलगाववाद को हवा दी गई है। रूस में इस समय साढ़े चार लाख NGO चल रहे हैं और अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार इन संगठनों को 85 करोड़ डॉलर का चन्दा “रूस में लोकतन्त्र का समर्थन”(?) करने के लिये दिये गये हैं। ऐसे में भारत जैसे ढीले-ढाले देश में ये “विदेशी पैसा” क्या कहर बरपाता होगा, सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि इस प्रकार के NGO पर भारत सरकार का नियन्त्रण हो भी जाये तो कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला, क्योंकि जब “माइनो सरकार” का पीछे से समर्थन है तो उनका क्या बिगड़ेगा?

हमेशा की तरह हमारा “सबसे तेज” सेकुलर मीडिया इस मामले को दबा गया, बतायें इस खबर को कितने लोगों ने मीडिया में देखा है? पहले भी कई बार साबित हो चुका है कि हमारा मीडिया “हिन्दू-विरोधी” है, यह उसका एक और उदाहरण है। बड़ी-बड़ी बिन्दियाँ लगाकर भाजपा-संघ के खिलाफ़ चीखने वाली महिलायें कहाँ गईं? अरुंधती रॉय, शबाना आजमी, महेश भट्ट, तरुण तेजपाल, बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई आदि के फ़टे हुए मुँह क्यों नहीं खुल रहे?

अब सवाल उठता है कि जिस “गुजरात के दंगों” की “दुकान” लगाकर तीस्ता ने कई पुरस्कार हड़पे उनका क्या किया जाये? पुरस्कारों की सूची इस प्रकार है –

1) पद्मश्री 2007 (मजे की बात कि पद्मश्री बरखा दत्त को भी कांग्रेसियों द्वारा ही मिली)

2) एमए थॉमस मानवाधिकार अवार्ड

3) न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री हेलेन क्लार्क के साथ मिला हुआ डिफ़ेंडर ऑफ़ डेमोक्रेसी अवार्ड

4) न्यूरेनबर्ग ह्यूमन राईट्स अवार्ड 2003

5) 2006 में ननी पालखीवाला अवार्ड।

अब जबकि तीस्ता सीतलवाड झूठी साबित हो चुकी हैं, यानी कि ये सारे पुरस्कार ही “झूठ की बुनियाद” पर मिले थे तो क्या ये सारे अवार्ड वापस नहीं लिये जाने चाहिये? हालांकि भारत की “व्यवस्था” को देखते हुए तीस्ता का कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं है, वह अपने इन नकली कामों में फ़िर से लगी रहेगी…

==============

चलते-चलते – क्या आपने मैसूर में हाल ही में (2 अप्रैल को) हुए हिन्दू-मुस्लिम दंगों के बारे में किसी टीवी चैनल पर कोई खबर सुनी है? मुझे विश्वास है नहीं सुनी होगी… क्योंकि मीडिया को वरुण के बहाने हिन्दुत्व को गरियाने और लालू जैसे जोकर की फ़ूहड़ हरकतों से ही फ़ुर्सत नहीं है, इसलिये यहाँ पढ़िये…
http://mangalorean.com/news.php?newstype=broadcast&broadcastid=118985


, , , , , , , ,
Published in ब्लॉग
लेख के भाग-1 (यहाँ देखें) से आगे जारी…

1980 में मलप्पुरम में कई सिनेमाघरों में बम विस्फ़ोट हुए, पुलिस ने कुछ नहीं किया, केरल के उत्तरी इलाकों में गत एक दशक में कई विस्फ़ोट हो चुके हैं लेकिन पुलिस कहीं भी हाथ नहीं डाल पा रही। बेपूर बन्दरगाह पर हुए विस्फ़ोट में भी आज तक एक भी आरोपी नहीं पकड़ाया है, ज़ाहिर है कि सत्ताधारी पार्टी ही जब समर्थन में हो तो पुलिस की क्या हिम्मत। लेकिन मलप्पुरम जिले का तालिबानीकरण अब बेहद खतरनाक स्थिति में पहुँच चुका है, हाल ही में 25 जुलाई 2008 के बंगलोर बम विस्फ़ोटों के सिलसिले में कर्नाटक पुलिस ने नौ आरोपियों के खिलाफ़ केस दायर किया है और सभी आरोपी मलप्पुरम जिले के हैं, क्या इसे सिर्फ़ एक संयोग माना जा सकता है? 6 दिसम्बर 1997 को त्रिचूर रेल धमाके हों या 14 फ़रवरी 1998 के कोयम्बटूर धमाके हों, पुलिस के हाथ हमेशा बँधे हुए ही पाये गये हैं।

पाठकों ने गुजरात, अहमदाबाद, कालूपुर-दरियापुर-नरोडा पाटिया, ग्राहम स्टेंस, कंधमाल आदि के नाम सतत सुने होंगे, लेकिन मराड, मलप्पुरम या मोपला का नाम नहीं सुना होगा… यही खासियत है वामपंथी और सेकुलर लेखकों और इतिहासकारों की। मीडिया पर जैसा इनका कब्जा रहा है और अभी भी है, उसमें आप प्रफ़ुल्ल बिडवई, कुलदीप नैयर, अरुंधती रॉय, महेश भट्ट जैसों से कभी भी “जेहाद” के विरोध में कोई लेख नहीं पायेंगे, कभी भी इन जैसे लोगों को कश्मीर के पंडितों के पक्ष में बोलते नहीं सुनेंगे, कभी भी सुरक्षाबलों का मनोबल बढ़ाने वाली बातें ये लोग नहीं करेंगे, क्योंकि ये “सेकुलर” हैं… इन जैसे लोग “अंसल प्लाज़ा” की घटना के बारे में बोलेंगे, ये लोग नरोडा पाटिया के बारे में हल्ला मचायेंगे, ये लोग आपको एक खूंखार अपराधी के मानवाधिकार गिनाते रहेंगे, अफ़ज़ल गुरु की फ़ाँसी रुकवाने का माहौल बनाने के लिये विदेशों के पाँच सितारा दौरे तक कर डालेंगे…। यदि इंटरनेट और ब्लॉग ना होता तो अखबारों और मीडिया में एक छोटी सी खबर ही प्रकाशित हो पाती कि “केरल के मराड में एक हिंसा की घटना में नौ लोगों की मृत्यु हो गई…” बस!!!

अब केरल में क्या हो रहा है… घबराये और डरे हुए हिन्दू लोग मुस्लिम बहुल इलाकों से पलायन कर रहे हैं, मलप्पुरम और मलाबार से कई परिवार सुरक्षित(?) ठिकानों को निकल गये हैं और “दारुल-इस्लाम” बनाने के लिये जगह खाली होती जा रही है। 580 किमी लम्बी समुद्री सीमा के किनारे बसे गाँवों में हिन्दुओं के “जातीय सफ़ाये” की बाकायदा शुरुआत की जा चुकी है। पोन्नानी से बेपूर तक के 65 किमी इलाके में एक भी हिन्दू मछुआरा नहीं मिलता, सब के सब या तो धर्म परिवर्तित कर चुके हैं या इलाका छोड़कर भाग चुके हैं। बहुचर्चित मराड हत्याकाण्ड भी इसी जातीय सफ़ाये का हिस्सा था, जिसमें भीड़ ने आठ मछुआरों को सरेआम मारकर मस्जिद में शरण ले ली थी (देखें)। 10 मार्च 2005 को संघ के कार्यकर्ता अश्विनी की भी दिनदहाड़े हत्या हुई, राजनैतिक दबाव के चलते आज तक पुलिस कोई सुराग नहीं ढूँढ पाई। मलप्पुरम सहित उत्तर केरल के कई इलाकों में दुकानें और व्यावसायिक संस्थान शुक्रवार को बन्द रखे जाते हैं और रमज़ान के महीने में दिन में होटल खोलना मना है। त्रिसूर के माथिलकोम इलाके के संतोष ने इस फ़रमान को नहीं माना और शुक्रवार को दुकान खोली तथा 9 अगस्त 1996 को कट्टरवादियों के हाथों मारा गया, जैसा कि होता आया है इस केस में भी कोई प्रगति नहीं हुई (दीपक धर्मादम, केरलम फ़ीकरारूड स्वान्थमनाडु, pp 59,60)।

पाठकों ने इस प्रकार की घटनाओं के बारे में कभी पढ़ा-सुना या टीवी पर देखा नहीं होगा, सभी घटनायें सच हैं और वीभत्स हैं लेकिन हमारा “राष्ट्रीय मीडिया”(?) जो कि मिशनरी पैसों पर पलता है, हिन्दू-विरोध से ही जिसकी रोटी चलती है, वामपंथियों और कांग्रेसियों का जिस पर एकतरफ़ा कब्जा है, वह कभी इस प्रकार की घटनाओं को महत्व नहीं देता (वह महत्व देता है वरुण गाँधी को, जहाँ उसे हिन्दुत्व को कोसने का मौका मिले)। ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जिनमें हिन्दुओं की हत्या, अपहरण और बलात्कार हुए हैं, लेकिन “सेकुलरिज़्म” के कर्ताधर्ताओं को भाजपा-संघ की बुराई करने से ही फ़ुर्सत नहीं मिलती। कोट्टायम और एर्नाकुलम जिलों के जागरूक नागरिकों ने जंगलों में चल रहे सिमी के कैम्पों की जानकारी पुलिस को दी, पुलिस आई, कुछ लोगों को पकड़ा और मामूली धारायें लगाकर ज़मानत पर छोड़ दिया। इन्हीं “भटके हुए नौजवानों”(???) में से कुछ देश के विभिन्न हिस्सों में आतंकवादी गतिविधियों में पकड़ाये हैं। हाल ही में मुम्बई की जेलों में अपराधियों को इस्लाम धर्म अपनाने के लिये दाऊद गैंग का हाथ होने की पुष्टि आर्थर रोड जेल के जेलर ने की थी, यह तकनीक केरल में भी अपनाई जा रही है और नये-पुराने अपराधियों को धर्म परिवर्तित करके मुस्लिम बनाया जा रहा है। जब “सिमी” पर प्रतिबन्ध लग गया तो उसने नाम बदलकर NDF रख लिया, इस प्रकार विभिन्न फ़र्जी नामों से कई NGO चल रहे हैं जिनकी गतिविधियाँ संदिग्ध हैं, लेकिन कोई देखने-सुनने वाला नहीं है (दैनिक मंगलम, कोट्टायम, 9 फ़रवरी 2009)।

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया “पेट्रो डॉलर” ने केरल में हिन्दू-मुस्लिम के बीच आर्थिक खाई को बहुत चौड़ा कर दिया है, खाड़ी से आये हुए हवाला धन के कारण यहाँ कई जिलों में 70% से अधिक ज़मीन की रजिस्ट्रियाँ मुसलमानों के नाम हुई हैं और हिन्दू गरीब होते जा रहे हैं। पैसा कमाकर लाना और ज़मीन खरीदना कोई जुर्म नहीं है, लेकिन “घेट्टो” मानसिकता से ग्रस्त होकर एक ही इलाके में खास बस्तियाँ बनाना निश्चित रूप से स्वस्थ मानसिकता नहीं कही जा सकती। यहाँ तक कि ज़मीन के इन सौदों में मध्यस्थ की भूमिका भी “एक खास तरह के लोग” ही निभा रहे हैं और इसके कारण हिन्दुओं और मुसलमानों में आर्थिक समीकरण बहुत गड़बड़ा गये हैं (मलयालम वारिका सम्पादकीय, Vol.VII, No.12, 25 जुलाई 2003)।

सदियों से हिन्दू गाय को माता के रूप में पूजते आये हैं, लेकिन भारत में केरल ही एक राज्य ऐसा है जिसने गौवंश के वध की आधिकारिक अनुशंसा की हुई है। सन् 2002 के केरल सरकार के आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक उस वर्ष पाँच लाख गायों का वध किया गया और 2,49,000 टन का गौमाँस निर्यात किया गया (न्यू इंडियन एक्सप्रेस, कोचीन 13 अगस्त 2003), जबकि असली आँकड़े निश्चित रूप से और भी भयावह होते हैं। भले ही मेडिकल साइंस इसके खतरों के प्रति आगाह कर रहा हो, भले ही हिन्दू धर्माचार्य और हिन्दू नेता इसका विरोध करते रहे हों, लेकिन केरल के किसी भी मुस्लिम नेता ने कभी भी इस गौवध का खुलकर विरोध नहीं किया।

केरल के सांस्कृतिक तालिबानीकरण की शुरुआत तो 1970 में ही हो चुकी थी, जबकि केरल के सरकारी स्कूल के “यूथ फ़ेस्टिवल” में “मोप्ला गीत” (मुस्लिम) और “मर्गमकल्ली” (ईसाई गीत) को एक प्रतियोगिता के तौर पर शामिल किया गया (केरल के 53 साल के इतिहास में 49 साल शिक्षा मंत्री का पद किसी अल्पसंख्यक के पास ही रहा है)। जबकि हिन्दुओं की एक कला “कोलकल्ली” का यूनिफ़ॉर्म बदलकर “हरी लुंगी, बेल्ट और बनियान” कर दिया गया… अन्ततः इस आयोजन से सारे हिन्दू छात्र धीरे-धीरे दूर होते गये। 1960 तक कुल मुस्लिम आबादी की 10% बुजुर्ग महिलायें “परदा” रखती थीं, जबकि आज 31% नौजवान लड़कियाँ परदा /बुरका रखती हैं, सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या मुस्लिम लड़कियों में कट्टरता बढ़ रही है, या कट्टरता उन पर थोपी जा रही है? वजह जो भी हो, लेकिन ऐसा हो रहा है।

6 नवम्बर 1999 को पोप जॉन पॉल ने दिल्ली के एक केथीड्रल में कहा था कि “जिस प्रकार पहली सदी में “क्रास” ने यूरोप की धरती पर कदम जमाये और दूसरी सदी में अमेरिका और अफ़्रीका में मजबूती कायम की, उसी प्रकार तीसरी सदी में हम एशिया में अपनी फ़सल बढ़ायेंगे…”, यह वक्तव्य कोई साधारण वक्तव्य नहीं है… थोड़ा गहराई से इसका अर्थ लगायें तो “नीयत” साफ़ नज़र आ जाती है। साफ़ है कि केरल पर दोतरफ़ा खतरा मंडरा रहा है एक तरफ़ “तालिबानीकरण” का और दूसरी तरफ़ से “मिशनरी” का, ऐसे में हिन्दुओं का दो पाटों के बीच पिसना उनकी नियति बन गई है। तीन साल पहले एक अमेरिकी नागरिक जोसेफ़ कूपर ने किलीमन्नूर में एक ईसाई समारोह में सार्वजनिक रूप से हिन्दू भगवानों का अपमान किया था (उस अमेरिकी ने कहा था कि “हिन्दुओं के भगवान कृष्ण विश्व के पहले एड्स मरीज थे…”), जनता में आक्रोश भी हुआ, लेकिन सरकार ने पता नहीं क्यों मामला रफ़ा-दफ़ा करवा दिया।

कश्मीर लगभग हमारे हाथ से जा चुका है, असम भी जाने की ओर अग्रसर है, अब अगला नम्बर केरल का होगा… हिन्दू जितने विभाजित होते जायेंगे, देशद्रोही ताकतें उतनी ही मजबूत होती जायेंगी… जनता के बीच जागरूकता फ़ैलाने की सख्त जरूरत है… हम उठें, आगे बढ़ें और सबको बतायें… मीडिया के भरोसे ना रहें वह तो उतना ही लिखेगा या दिखायेगा जितने में उसे फ़ायदा हो, क्योंकि ऊपर बताई गई कई घटनाओं में से कोई भी घटना “ब्रेकिंग न्यूज़” बन सकती थी, लेकिन नहीं बनी। “नेहरूवादी सेकुलरिज़्म” की बहुत बड़ी कीमत चुका रहा है यह देश…। नेहरू की “मानस संतानें” यानी “सेकुलर बुद्धिजीवी” नाम के प्राणी भी समझ से बाहर है, क्योंकि इन्हें भारत पर और खासकर हिन्दुओं पर कभी भी कोई खतरा नज़र नहीं आता…। जबकि कुछ बुद्धिजीवी “तटस्थ” रहते हैं, तथा जब स्थिति हाथ से बाहर निकल चुकी होती है तब ये अपनी “वर्चुअल” दुनिया से बाहर निकलते हैं… ऐसे में हिन्दुओं के सामने चुनौतियाँ बहुत मुश्किल हैं… लेकिन फ़िर भी चुप बैठने से काम नहीं चलने वाला… एकता ज़रूरी है… “हिन्दू वोट बैंक” नाम की अवधारणा अस्तित्व में लाना होगा… तभी इस देश के नेता-अफ़सरशाही-नौकरशाही सब तुम्हारी सुनेंगे…

=============
विशेष नोट - यह लेख त्रिवेन्द्रम निवासी डॉ सीआई इसाक (इतिहास के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर) द्वारा चेन्नै में 8 मार्च 2009 को रामाकृष्णन मेमोरियल व्याख्यानमाला में दिये गये उनके भाषण पर आधारित है।


, , , , , , , ,
Published in ब्लॉग
Talibanization Kerala Congress and Communist Secularism

जब वामपंथी कहते हैं कि “धर्म एक अफ़ीम की तरह है…” तो उनका मतलब सिर्फ़ हिन्दू धर्म से होता है, मुसलमानों और ईसाईयों के सम्बन्ध में उनका यह बयान कभी नहीं आता। पश्चिम बंगाल के 22 से 24 जिलों में मुस्लिम आबादी को 50% से ऊपर वे पहले ही पहुँचा चुके हैं, अब नम्बर आया है केरल का। यदि भाजपा हिन्दू हित की कोई बात करे तो वह “साम्प्रदायिक” होती है, लेकिन यदि वामपंथी कोयम्बटूर बम विस्फ़ोटों के आरोपी अब्दुल मदनी से चुनाव गठबन्धन करते हैं तो यह “सेकुलरिज़्म” होता है, कांग्रेस यदि केरल में मुस्लिम लीग को आगे बढ़ाये तो भी यह सेकुलरिज़्म ही है, शिवराज पाटिल आर्चबिशपों के सम्मेलन में जाकर आशीर्वाद लें तो भी वह सेकुलरिज़्म ही होता है… “शर्मनिरपेक्ष” शब्द इन्हीं कारनामों की उपज है। भाजपा-संघ-हिन्दुओं और भारतीय संस्कृति को सतत गरियाने वाले ज़रा केरल की तेजी से खतरनाक होती स्थिति पर एक नज़र डाल लें, और बतायें कि आखिर वे भाजपा-संघ को क्यों कोसते हैं?

केरल राज्य की स्थापना सन् 1956 में हुई, उस वक्त हिन्दुओं की जनसंख्या 61% थी। मात्र 50 साल में यह घटकर 55% हो गई है, जबकि दूसरी तरफ़ मुस्लिमों और ईसाईयों की संख्या में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। हिन्दुओं की नकारात्मक जनसंख्या वृद्धि दर के पीछे कई प्रकार के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक कारण हैं, लेकिन सच यही है कि केरल का तेजी से तालिबानीकरण/इस्लामीकरण हो रहा है। केरल की राजनैतिक परिस्थितियों का फ़ायदा जितनी चतुराई से इस्लामी शक्तियाँ उठा रही हैं, उतनी ही चालाकी से मिशनरी भी उठा रही है। जनसंख्या के कारण वोटों का सन्तुलन इस प्रकार बन चुका है कि अब कांग्रेस और वामपंथी दोनों को “मेंढक” की तरह “कभी इधर कभी उधर” फ़ुदक-फ़ुदक कर उन्हें मजबूत बना रहे हैं।

केरल के बढ़ते तालिबानीकरण के पीछे एक कारण है “पेट्रो डॉलर” की बरसात, जो कि वैध या अवैध हवाला के जरिये बड़ी मात्रा में प्रवाहित हो रहा है। मिशनरी और मुल्लाओं को मार्क्सवादियों और कांग्रेस का राजनैतिक सहारा तो है ही, हिन्दू जयचन्दों और “सेकुलर बुद्धिजीवियों” का मानसिक सहारा भी है। जैसे कि एक मलयाली युवक जिसका नाम जावेद “था” (धर्म परिवर्तन से पहले उसका नाम प्रणेश नायर था) जब गुजरात के अहमदाबाद में (15 नवम्बर 2004 को) पुलिस एनकाउंटर में मारा गया और यह साबित हो गया कि वह लश्कर के चार आतंकवादियों की टीम में शामिल था जो नरेन्द्र मोदी को मारने आये थे, तब भी केरल के “मानवाधिकारवादियों” (यानी अंग्रेजी बुद्धिजीवियों) ने जावेद(?) को हीरो और शहीद बताने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। लेकिन जब हाल ही में कश्मीर में सुरक्षा बलों के हाथों मारे गये चार युवकों के पास से केरल के मतदाता परिचय पत्र मिले तब इन “सेकुलरिस्टों” के मुँह में दही जम गया।

केरल के तालिबानीकरण का इतिहास तो सन् 1921 के मोप्ला दंगों से ही शुरु हो चुका है, लेकिन “लाल” इतिहासकारों और गठबंधन की शर्मनाक राजनीति करने वाली पार्टियों ने इस सच को दबाकर रखा और इसे “सिर्फ़ एक विद्रोह” कहकर प्रचारित किया। “मोप्ला” के दंगों और हिन्दुओं के नरसंहार पर विस्तार से खबर देखने के लिये यहाँ क्लिक करें। एनीबेसेण्ट जैसी विदुषी महिला ने अपनी रिपोर्ट (29 नवम्बर 1921) में कहा था - ..The misery is beyond description. Girl wives, pretty and sweet, with eyes half blind with weeping, distraught with terror; women who have seen their husbands hacked to pieces before their eye, in the way "Moplas consider religious", old women tottering, whose faces become written with anguish and who cry at a gentle touch and a kind look, waking out of a stupor of misery only to weep, men who have lost all, hopeless, crushed, desperate. ..... I have walked among thousands of them in refugee camps, and sometimes heavy eyes would lift as a cloth was laid gently on the bare shoulder, and a faint watery smile of surprise would make the face even more piteous than the stupor.

तथा तत्कालीन कालीकट जिला कांग्रेस कमेटी के सचिव माधवन नायर ने रिपोर्ट में लिखा है - Can you conceive of a more ghastly and inhuman crime than the murder of babies and pregnant women? ... A pregnant woman carrying 7 months was cut through the abdomen by a rebel and she was seen lying dead with on the way with the dead child projecting out ... Another baby of six months was snatched away from the breast of the mother and cut into two pieces. ... Are these rebels human beings or monsters?

जबकि आंबेडकर, जो कि उच्च वर्ग के प्रति कोई खास प्रेम नहीं रखते थे, उन्होंने भी इस तथाकथित “खिलाफ़त” आन्दोलन के नाम पर चल रही मुस्लिम बर्बरता के खिलाफ़ कड़ी आलोचना की थी। अम्बेडकर के अनुसार “इस्लाम और भारतीय राष्ट्रीयता को समरस बनाने के सारे प्रयास विफ़ल हो चुके हैं… भारतीय संस्कृति के लिये इस्लाम “शत्रुतापूर्ण और पराया” है…”, लेकिन फ़िर भी गाँधी ने इस “बर्बर हत्याकाण्ड और जातीय सफ़ाये” की निंदा तो दूर, एक शब्द भी इसके खिलाफ़ नहीं कहा… मुस्लिमों को शह देकर आगे बढ़ाने और हिन्दुओं को सतत मानसिक रूप से दबाने का उनका यह कृत्य आगे भी जारी रहा… जिसके नतीजे हम आज भी भुगत रहे हैं…। तात्पर्य यह 1921 से ही केरल का तालिबानीकरण शुरु हो चुका था…

हद तो तब हो गई जब फ़रवरी 2005 में CPM (Communal Politicians of Marx) ने वरियमकुन्नाथु कुन्जाअहमद हाजी को एक महान कम्युनिस्ट योद्धा और शहीद का दर्जा दे दिया। उल्लेखनीय है कि ये हाजी साहब 1921 के मलाबार खिलाफ़त आंदोलन में हजारों मासूम हिन्दू औरतों और बच्चों के कत्ल के जिम्मेदार माने जाते हैं, यहाँ तक कि “मुस्लिम लीग” भी इन जैसे “शहीदों”(?) को अपना मानने में हिचकिचाती है, लेकिन “लाल” झण्डे वाले इनसे भी आगे निकले।

अक्सर देखा गया है कि जब भी कोई हिन्दू व्यक्ति धर्म परिवर्तन करके मुसलमान बन जाता है तो उतना हो-हल्ला नहीं होता, भाजपा-संघ यदि हल्ला करें भी तो उन्हें “साम्प्रदायिक” कहकर दबाने की परम्परा रही है, लेकिन जब कोई मुस्लिम व्यक्ति हिन्दू धर्म स्वीकार कर ले तब देखिये कैसा हंगामा होता है और “वोट बैंक के सौदागर” और दूसरों (यानी हिन्दुओं) को उपदेश देने वाले बुद्धिजीवी कैसे घर में घुसकर छुप जाते हैं। इसके कई उदाहरण हमारे सामने हैं (ताजा मसला चांद-फ़िजा तथा इससे पहले कोलकाता का रिज़वान हत्या प्रकरण, जिसमें मुस्लिम से हिन्दू बनने पर हत्या तक हो गई)। लेकिन इस कथित “शांति का संदेश देने वाले” और “सभ्य” इस्लाम के अनुयायियों ने केरल में 1946 में ही उन्नियन साहब (मुस्लिम से हिन्दू बनने के बाद उसका नाम “रामासिंहम” हो गया था) और उनके परिवार की मलाबार इलाके के मलप्पुरम (बहुचर्चित मलप्पुरम हत्याकाण्ड) में सरेआम हत्या कर दी थी, क्योंकि “रामासिम्हन” (यानी उन्नियन साहब) ने पुनः हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया था। उस समय भी इन तथाकथित प्रगतिशील वामपंथियों ने पुलिस की जाँच को विभिन्न तरीके अपनाकर उलझाने की भरपूर कोशिश की थी ताकि असली मुजरिम बच सकें (EMS के चुनिंदा लेख (Vol.II, pp 356-57) और इनके तत्कालीन नेता थे महान वामपंथी ईएमएस नम्बूदिरिपाद। केरल की ये पार्टियाँ आज 60 साल बाद भी मुस्लिम तुष्टिकरण से बाज नहीं आ रही, बल्कि और बढ़ावा दे रही हैं।

हिन्दू विरोध धीरे-धीरे कम्युनिस्टों का मुख्य एजेण्डा बन गया था, 1968 में इसी नीति के कारण देश में एक “शुद्ध मुस्लिम जिले” मलप्पुरम का जन्म हुआ। आज की तारीख में यह इलाका मुस्लिम आतंकवाद का गढ़ बन चुका है, लेकिन देश में किसी को कोई फ़िक्र नहीं है। केरल सरकार ने मलप्पुरम जिले में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की शाखा खोलने के लिये 24 एकड़ की ज़मीन अधिगृहीत की है, जिसे 1000 एकड़ तक बढ़ाने की योजना है, ताकि राज्य में जमात-ए-इस्लामी का “प्रिय” बना जा सके (अब आप सिर धुनते रहिये कि जब पहले से ही जिले में कालीकट विश्वविद्यालय मौजूद है तब उत्तरप्रदेश से हजारों किमी दूर अलीगढ़ मुस्लिम विवि की शाखा खोलने की क्या तुक है, लेकिन भारत में मुस्लिम वोटों के लिये “सेकुलरिज़्म” के नाम पर कुछ भी किया जा सकता है), भले ही केरल की 580 किमी की समुद्री सीमा असुरक्षित हो, लेकिन इस प्रकार के मूर्खतापूर्ण कामों पर पैसा खर्च किया जा रहा है।

(भाग-2 में जारी रहेगा…)

, , , , , , , ,
Published in ब्लॉग
पश्चिमी देशों से भारत की विभिन्न धर्मादा संस्थाओं को दान में लाखों रुपये मिलना कोई नई बात नहीं है। भारत सरकार द्वारा इस प्रकार की सामाजिक, धार्मिक संस्थाओं, NGO आदि को विदेश से मिलने वाली मदद प्राप्त करने के लिये विशेष कानून भी बनाया हुआ है। आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरु होने से भी पहले भारत के कई संगठनों को विदेश से चन्दे में रकम प्राप्त होती रही है, जो कि धीरे-धीरे बढ़ती ही गई है।

हमें अक्सर उड़ीसा, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल आदि राज्यों में मिशनरी द्वारा धर्मान्तरण की खबरें सुनाई देती हैं, “संघी” लोग हो-हल्ला मचाते हैं, एकाध स्वामी जी हत्या होती है, सरकारें जाँच का नाटक करती हैं, फ़िर लोग हमेशा की तरह जल्दी ही सब भूल जाते हैं, लेकिन ऐसी घटनायें रह-रहकर होती हैं। इसी प्रकार देश में विभिन्न मदरसों, जमातों और अन्य मुस्लिम सामाजिक संस्थाओं को खाड़ी देशों और ईरान, लीबिया आदि देशों से पैसा सतत आता है। रह-रहकर सवाल उठता है कि आखिर ये अमीर पश्चिमी देश भारत जैसे देश में लाखों-करोड़ों डालर का चन्दा क्यों भेजते हैं? क्या इसलिये कि भारत एक गरीब देश है? लेकिन क्या उन देशों में गरीब नहीं पाये जाते? और चन्दे-दान-मदद के रूप में इतनी बड़ी राशि देने के बाद क्या ये देश उसे भूल जाते हैं? क्या अपने दिये हुए करोड़ों रुपये की उपयोगिता और उसके परिणाम (OUTPUT) के बारे में बिलकुल भी पूछताछ या चिन्ता नहीं करते? ऐसा तो हो नहीं सकता, क्योंकि जो भी दान दे रहा होगा, कम से कम वह उसके बारे में “अपेक्षा” तो रखेगा ही कि आखिर जिस “काम” के लिये वह चन्दा दे रहा है, वह “काम” ठीक से हो रहा है या नहीं।

हाल ही में एक पत्रकार संजीव नैयर ने सन् 2006-07 से अब तक भारत में आये हुए कुल आधिकारिक विदेशी धन, उसके स्रोत, धन पाने वाली संस्थाओं और क्षेत्रों का अध्ययन किया और उसके नतीजे बेहद चौंकाने वाले रहे। उन्होंने भारत सरकार की विदेशी मदद और चन्दे सम्बन्धी आधिकारिक वेबसाईट (यहाँ देखें) से आँकड़े लिये और उनका विश्लेषण किया। भारत में आये हुए विदेशी चन्दे में सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली और स्पेन से आता है। आईये संक्षेप में देखें इस विदेशी मदद का गोरखधंधा, शायद आपकी आँखें भी फ़टी की फ़टी रह जायें –

1) 1993-94 से 2006-07 के बीच भारत में कुल 64,670 करोड़ रुपये का विदेशी चन्दा आया (यह आँकड़ा रजिस्टर्ड संस्थाओं द्वारा आधिकारिक रूप से प्राप्त चन्दे का है)।

2) 1993 में विदेशी चन्दा आया था 1865 करोड़ रुपये जबकि 2007 में आया 12990 करोड़ रुपये, यानी कि 650% की बढ़ोतरी… (क्या इसका अर्थ ये लगाया जाये कि 1993 के बाद भारत में गरीबों की संख्या में भारी बढ़त हुई है?)

3) जितनी संस्थायें 1997 में विदेशी चन्दे का हिसाब देती थीं और जितनी संस्थाएं 2006 में हिसाब देती हैं उनका प्रतिशत 66% से घटकर 56% हो गया है। इसका साफ़ मतलब यह है कि 12990 करोड़ का जो आँकड़ा है वह वास्तविकता से बहुत कम है और कई संस्थाएं झूठ बोल रही हैं।

4) गत पाँच वर्ष से जब से माइनो आंटी सत्ता में आई हैं, विदेशी मदद का प्रतिशत 100% से भी अधिक बढ़ा है।

5) सर्वाधिक चन्दा लेने वाली संस्थायें “संयोग से” (???) ईसाई मिशनरी हैं, जिन्हें अमेरिका, जर्मनी और ब्रिटेन से 2002-2006 के दौरान क्रमशः 10,589 करोड़, 5233 करोड़ और 4612 करोड़ रुपये मिले हैं। पश्चिमी देशों से अधिक चन्दा प्राप्त करने में अपवाद है दलाई लामा का धर्मशाला स्थित दफ़्तर।

6) विदेशी चन्दा प्राप्त करने में अव्वल नम्बर हैं तमिलनाडु, दिल्ली, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र… (यानी कि “एक और संयोग” कि यहाँ भी 4-5 साल से UPA सत्ता में है)।

7) तमिलनाडु को सन् 2002 में 775 करोड़ का विदेशी चन्दा मिला था जबकि 2006 में 2244 करोड़ रुपये, “संयोग” से 200% की भारी-भरकम बढ़ोतरी।

8) विदेशी मददगारों(?) की लिस्ट में मुस्लिम देशों से कोई भी उल्लेखनीय नाम नहीं मिलता अर्थात या तो वे बेहद ईमानदार हैं या फ़िर “हवाला रूट” का उपयोग करते हैं।

2006-07 के टॉप 6 दानदाता संस्थायें और देश –

1) Misereor Postfach, Germany – 1244 करोड़ रुपये

2) World Vision (Gospel for Asia), USA – 469 करोड़ रुपये

3) Fundacion Vincente Ferrer, Spain – 399 करोड़ रुपये

4) ASA Switzerland – 302 करोड़ रुपये

5) Gospel For Asia – 227 करोड़ रुपये…

6) M/s Om Foundation, USA - 227 करोड़ रुपये

इनमें से सिर्फ़ ओम फ़ाउंडेशन यूएस, का नाम हिन्दू संगठन जैसा लगता है जिन्होंने दलाई लामा को चन्दा दिया है, बाकी सारी संस्थायें ईसाई मिशनरी हैं। ये तो हुई टॉप 6 दानदाताओं की आधिकारिक सूची, अब देखते हैं टॉप 6 विदेशी मदद(?) पाने वाली संस्थाओं की सूची –

2003-2006 के दौरान कुल विदेशी चन्दा लेने वाली टॉप 6 संस्थाओं की सूची –

1) Ranchi Jesuits, Jharkhand – 622 करोड़

2) Santhome Trust of Kalyan, Maharashtra – 333 करोड़

3) Sovereign Order of Malta, Delhi – 301 करोड़ रुपये

4) World Vision of India, Tamil Nadu – 256 करोड़ रुपये (इस संस्था पर “सुनामी” विपदा के दौरान भी गरीबों और बेघरों को पैसा देकर धर्मान्तरण के आरोप लग चुके हैं)

5) North Karnataka Jesuit Charitable Society – 230 करोड़ रुपये (अपुष्ट सूत्रों के मुताबिक विवादास्पद पुस्तक छापने पर चर्च-विहिप विवाद, में शामिल ईसाई संस्था इसकी Subsiadiary संस्था है)

6) Believers Church India, Kerala – 149 करोड़ रुपये।

यह तमाम डाटा भारत सरकार के FCRA रिपोर्ट पर आधारित है, हो सकता है कि इसमें कुछ मामूली गलतियाँ भी हों…। भारत में गत कुछ वर्षों से असली-नकली NGO की बाढ़ सी आई हुई है, इस सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि NGO का “मुखौटा” लगाये हुए ये संस्थायें किसी “गुप्त खतरनाक खेल” में लिप्त हों। जब सूचना का अधिकार लागू किया गया था उसी समय यह माँग उठी थी कि इस कानून के दायरे में सभी प्रकार के NGO को भी लाया जाये, ताकि सरकार की नज़र से बचकर जो भी “काले-सफ़ेद काम” NGO द्वारा किये जा रहे हैं उन्हें समाजसेवियों द्वारा उजागर किया जा सके, हालांकि हाल ही में सुनने में आया है कि सूचना अधिकार का यह कानून NGO पर भी लागू है, लेकिन अभी इस सम्बन्ध में कई बातों पर स्थिति अस्पष्ट है।

अब यह पाठकों पर निर्भर करता है कि वे इन आँकड़ों को वे किस सन्दर्भ में लेते हैं, इनका क्या मतलब निकालते हैं, लेकिन यह भी सच है कि गत 15 वर्षों में उत्तर-पूर्व में भी धर्मान्तरण को लेकर आये दिन विवाद होते रहे हैं, उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों में 1947 से 2007 के बीच ईसाई जनसंख्या में भारी बढ़ोतरी हो चुकी है तथा कहीं-कहीं मूल आदिवासी आबादी “अल्पसंख्यक” बन चुकी है। यह स्थिति असम के कई जिलों में भी आ चुकी है, जहाँ मुस्लिम धर्मान्तरण और बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण हिन्दू आबादी अल्पसंख्यक हो गई है…और सरेआम पाकिस्तानी झण्डे लहराये जा रहे हैं।

वैसे भी ये आँकड़े “शर्मनिरपेक्ष” नामक बेशर्मों के लिये नहीं हैं और न ही “कमीनिस्ट” नामक (यहाँ एक असंसदीय शब्द मन ही मन पढ़ा जाये) के लिये…

, , , , , , , ,
Published in ब्लॉग
Muslim Invaders, Indian History, King Hemu, Ibrahim Lodi

क्या आपने इब्राहीम लोदी का नाम सुना है? ज़रूर सुना होगा… क्या आपने हेमचन्द्र विक्रमादित्य (हेमू) का नाम सुना है? क्या कहा – याद नहीं आ रहा? इतनी आसानी से याद नहीं आयेगा… असल में हमें, बाबर, हुमायूं, अकबर, शाहजहाँ, औरंगज़ेब आदि के नाम आसानी से याद आ जाते हैं, लेकिन हेमचन्द्र, सदाशिवराव पेशवा, पृथ्वीराज चौहान आदि के नाम तत्काल दिमाग में या एकदम ज़ुबान पर नहीं आते… ऐसा क्यों होता है, इसका जवाब बेहद आसान है - हमारी मैकाले आधारित और वामपंथी शिक्षा प्रणाली ने हमारा “ब्रेन वॉश” किया हुआ है।



सबसे पहले ऊपर दिये गये दोनों राजाओं का संक्षिप्त परिचय दिया जाये… इब्राहीम लोदी कौन था? इब्राहीम लोदी एक मुस्लिम घुसपैठिया था जिसने मेवाड़ पर आक्रमण किया था और राणा सांगा के हाथों पराजित हुआ था। इब्राहीम लोदी के बाप यानी सिकन्दर लोदी ने कुरुक्षेत्र के पवित्र तालाब में हिन्दुओं के डुबकी लगाने पर रोक लगाई थी, और हिमाचल में ज्वालामुखी मन्दिर को ढहा दिया था, उसने बोधन पंडित की भी हत्या करवा दी थी, क्योंकि पंडित ने कहा था कि सभी धर्म समान हैं। इब्राहीम लोदी का दादा बहोल लोदी अफ़गानिस्तान से आया था और उसने दिल्ली पर कब्जा कर लिया था। ऐसे महान(?) वंश के इब्राहीम लोदी की कब्र के रखरखाव और मरम्मत के लिये केन्द्र और हरियाणा सरकार ने गत वर्ष 25 लाख रुपये स्वीकृत किये हैं, जबकि रेवाड़ी स्थित हेमू के स्मारक पर एक मस्जिद का अतिक्रमण हो रहा है।

अब जानते हैं राजा हेमू (1501-1556) के बारे में… “राजा हेमू” जिनका पूरा नाम हेमचन्द्र था, हरियाणा के रेवाड़ी से थे। इतिहासकार केके भारद्वाज के शब्दों में “हेमू मध्यकालीन भारत का ‘नेपोलियन’ कहा जा सकता है”, यहाँ तक कि विन्सेंट स्मिथ जिन्होंने समुद्रगुप्त को भी नेपोलियन कहा था, मानते थे कि हेमू को भी भारतीय नेपोलियन कहा जाना चाहिये। हुमायूं के पतन के बाद हेमचन्द्र ने बंगाल से युद्ध जीतना शुरु किया और बिहार, मध्यप्रदेश होते हुए आगरा तक पहुँच गया। हेमचन्द्र ने लगातार 22 युद्ध लड़े और सभी जीते। आगरा को जीतने के बाद हेमचन्द्र ने दिल्ली कूच किया और 6 अक्टूबर 1556 को दिल्ली भी जीत लिया था, तथा उन्हें दिल्ली के पुराने किले में “विक्रमादित्य” के खिताब से नवाज़ा गया। 5 नवम्बर 1556 को अकबर के सेनापति बैरम खान की विशाल सेना से पानीपत में उसका युद्ध हुआ। अकबर और बैरम खान युद्ध भूमि से आठ किमी दूर थे और एक समय जब हेमचन्द्र जीतने की कगार पर आ गया था, दुर्भाग्य से आँख में तीर लगने की वजह से वह हाथी से गिर गया और उसकी सेना में भगदड़ मच गई, जिससे उस युद्ध में वह पराजित हो गये। अचेतावस्था में शाह कुलीन खान उसे अकबर और बैरम खान के पास ले गया, अकबर जो कि पहले ही “गाज़ी” के खिताब हेतु लालायित था, उसने हेमू का सिर धड़ से अलग करवा दिया और कटा हुआ सिर काबुल भेज दिया, जबकि हेमू का धड़ दिल्ली के पुराने किले पर लटकवा दिया… हेमू की मौत के बाद अकबर ने हिन्दुओं का कत्लेआम मचाया और मानव खोपड़ियों की मीनारें बनीं, जिसका उल्लेख पीटर मुंडी ने भी अपने सफ़रनामे में किया है… (ये है “अकबर महान” की कुछ करतूतों में से एक)।

एक तरह से देखा जाये तो हेमचन्द्र को अन्तिम भारतीय राजा कह सकते हैं, जिसके बाद भारत में मुगल साम्राज्य और मजबूत हुआ। ऐसे भारतीय योद्धा राजा को उपेक्षित करके विदेश से आये मुस्लिम आक्रांता को महिमामण्डित करने का काम इतिहास की पुस्तकों में भी किया जाता है। भारत के हिन्दू राजाओं और योद्धाओं को न तो उचित स्थान मिला है न ही उचित सम्मान। मराठा पेशवा का साम्राज्य कर्नाटक से अटक (काबुल) तक जा पहुँचा था… पानीपत की तीसरी लड़ाई में सदाशिवराव पेशवा, अहमदशाह अब्दाली के हाथों पराजित हुए थे। भारत में कितनी इमारतें या सड़कें सदाशिवराव पेशवा के नाम पर हैं? कितने स्टेडियम, नहरें और सड़कों का नाम हेमचन्द्र की याद में रखा गया है? जबकि बाबर, हुमायूँ के नाम पर सड़कें तथा औरंगज़ेब के नाम पर शहर भी मिल जायेंगे तथा इब्राहीम लोदी की कब्र के रखरखाव के लिये 25 लाख की स्वीकृति? धर्मनिरपेक्षता नहीं विशुद्ध “शर्मनिरपेक्षता” है ये…।

धर्मनिरपेक्ष(?) सरकारों और वामपंथी इतिहासकारों का यह रवैया शर्मनाक तो है ही, देश के नौनिहालों का आत्म-सम्मान गिराने की एक साजिश भी है। जिन योद्धाओं ने विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ़ बहादुरी से युद्ध लड़े और देश के एक बड़े हिस्से में अपना राज्य स्थापित किया उनका सम्मानजनक उल्लेख न करना, उनके बारे में विस्तार से बच्चों को न पढ़ाना, उन पर गर्व न करना एक विकृत समाज के लक्षण हैं, और यह काम कांग्रेस और वामपंथियों ने बखूबी किया है।

इतिहास की दो महत्वपूर्ण घटनायें यदि न हुई होतीं तो शायद भारत का इतिहास कुछ और ही होता – 1) यदि राजा पृथ्वीराज चौहान सदाशयता दिखाते हुए मुहम्मद गोरी को जिन्दा न छोड़ते (जिन्दा छोड़ने के अगले ही साल 1192 में वह फ़िर वापस दोगुनी शक्ति से आया और चौहान को हराया), 2) यदि हेमचन्द्र पानीपत का युद्ध न हारता तो अकबर को यहाँ से भागना पड़ता (सन् 1556) (इतिहास से सबक न सीखने की हिन्दू परम्परा को निभाते हुए हम भी कई आतंकवादियों को छोड़ चुके हैं और अफ़ज़ल अभी भी को जिन्दा रखा है)। फ़िर भी बाहर से आये हुए आक्रांताओं के गुणगान करना और यहाँ के राजाओं को हास्यास्पद और विकृत रूप में पेश करना वामपंथी "बुद्धिजीवियों" का पसन्दीदा शगल है। किसी ने सही कहा है कि “इतिहास बनाये नहीं जाते बल्कि इतिहास ‘लिखे’ जाते हैं, और वह भी अपने मुताबिक…”, ताकि आने वाली पीढ़ियों तक सच्चाई कभी न पहुँच सके… इस काम में वामपंथी इतिहासकार माहिर हैं, जबकि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण में… इसीलिये अकबर और औरंगज़ेब का गुणगान करने वाले लोग भारत में अक्सर मिल ही जाते हैं… तथा शिवाजी की बात करना “साम्प्रदायिकता” की श्रेणी में आता है…

जाते-जाते एक बात बताईये, आपके द्वारा दिये गये टैक्स का पैसा इब्राहीम लोदी जैसों की कब्र के रखरखाव के काम आने पर आप कैसा महसूस करते हैं?

लेख के कुछ स्रोत – www.hindujagruti.org तथा विकीपीडिया से

, , , , , , , ,
Published in ब्लॉग