“सच का सामना”(?) नामक फ़ूहड़ टीवी कार्यक्रम से सम्बन्धित मेरी पिछली पोस्ट “नारी का सम्मान और TRP के भूखे…” पर आई हुई विभिन्न टिप्पणियों से एक नई बहस का जन्म होने जा रहा है… वह ऐसे कि उनमें से कई टिप्पणियों का भावार्थ यह था कि “यदि स्मिता (या कोई अन्य प्रतियोगी) को पहले से ही पता था कि उससे ऐसे सवाल पूछे जायेंगे तो तब वह वहाँ गई ही क्यों…?”, “यदि प्रतियोगी को पैसों का लालच है और वह पैसों के लिये सब कुछ खोलने के लिये तैयार है तब क्या किया जा सकता है, यह तो उसकी गलती है”… “चैनलों का तो काम यही है कि किस तरह से अश्लीलता और विवाद पैदा किया जाये, लोग उसमें क्यों फ़ँसते हैं?”… “स्मिता ने अपनी इज़्ज़त खुद ही लुटवाई है, इसे बलात्कार नहीं कहा जा सकता, बलात्कार और स-सहमति शयन में अन्तर है…”।

कुछ टिप्पणियों का भावार्थ यह भी था कि “फ़िर क्यों ऐसे चैनल देखते हो?”, “यह कार्यक्रम वयस्कों के लिये है, क्यों इसे परिवार के साथ देखा जाये?”, “टीवी बन्द करना तो अपने हाथ है, फ़िर इतनी हायतौबा क्यों?”… ज़ाहिर है कि मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्नाः की तर्ज़ पर हरेक व्यक्ति के अपने विचार है, और यही स्वस्थ लोकतन्त्र की निशानी भी है।

अब ज़रा निम्नलिखित घटनाओं पर संक्षेप में विचार करें –

1) सोना दोगुना करने का लालच देकर कई ठग “अच्छी खासी पढ़ी-लिखी” शहरी महिलाओं को भी अपना शिकार बना लेते हैं, वह महिला लालच के शिकार में उस ठग की बातों में आ जाती है और अपना सोना लुटवा बैठती है। इस “लुट जाने के लिये” वह महिला अधिक जिम्मेदार है या वह ठग? सजा उस “ठग” को मिलनी चाहिये अथवा नहीं, सोना गँवाकर महिला तो सजा पा चुकी।

2)शेयर बाज़ार में पैसा निवेश करते समय निवेशक को यह पता होता है कि वह एक “सट्टा” खेलने जा रहा है और इसमें धोखाधड़ी और “मेनिपुलेशन” भी सम्भव है, ऐसे में यदि कोई हर्षद मेहता या केतन पारेख उसे लूट ले जाये तो क्या मेहता और पारेख को छोड़ देना चाहिये?

3) मान लें यदि कोई पागल व्यक्ति आपके घर के सामने कूड़ा-करकट फ़ैला रहा है, सम्भव है कि वह कूड़ा-करकट आपके घर को भी गन्दा कर दे, तब आप क्या करेंगे? A) पागल को रोकने की कोशिश करेंगे, B) अपने घर के दरवाजे बन्द कर लेंगे कि, मुझे क्या करना है? (यह बिन्दु शंकर फ़ुलारा जी के ब्लॉग से साभार)

4) इसी से मिलता जुलता तर्क कई बार बलात्कार/छेड़छाड़ के मामले में भी दे दिया जाता है, कि अकेले इतनी रात को वह उधर गई ही क्यों थी, या फ़िर ऐसे कपड़े ही क्यों पहने कि छेड़छाड़ हो?

इन तर्कों में कोई दम नहीं है, क्योंकि यह पीड़ित को दोषी मानते हैं, अन्यायकर्ता को नहीं। मेरे ब्लॉग पर आई हुई टिप्पणियों को इन सवालों से जोड़कर देखें, कि यदि स्मिता लालच में फ़ँसकर अपनी इज़्ज़त लुटवा रही है तो आलोचना किसकी होना चाहिये स्टार प्लस की या स्मिता की? सामाजिक जिम्मेदारी किसकी अधिक बनती है स्मिता की या स्टार प्लस की? “चैनलों का काम ही है अश्लीलता फ़ैलाना और बुराई दिखाना…” यह कहना बेतुका इसलिये है कि ऐसा करने का अधिकार उन्हें किसने दिया है? और यदि वे अश्लीलता फ़ैलाते हैं और हम अपनी आँखें या टीवी बन्द कर लें तो बड़ा दोष किसका है? आँखें (टीवी) बन्द करने वाले का या उस चैनल का? इस दृष्टि से तो हमें केतन पारिख को रिहा कर देना चाहिये, क्योंकि स्मिता की तरह ही निवेशक भी लालच में फ़ँसे हैं सो गलती भी उन्हीं की है, वे लोग क्यों शेयर बाजार में घुसे, केतन पारेख का तो काम ही है चूना लगाना? शराब बनाने वालों को छोड़ देना चाहिये क्योंकि यह तो “चॉइस” का मामला है, सिगरेट कम्पनियों को कानून के दायरे से बाहर कर देना चाहिये क्योंकि पीने वाला खुद ही अपनी जिम्मेदारी से वह सब कर रहा है? यह भी तो एक प्रकार का “स-सहमति सहशयन” ही है, बलात्कार नहीं।

इसी प्रकार यदि कहीं पर कोई अपसंस्कृति (कूड़ा-करकट) फ़ैला रहा है तब अपने दरवाजे बन्द कर लेना सही है अथवा उसकी आलोचना करके, उसकी शिकायत करके (फ़िर भी न सुधरे तो ठुकाई करके) उसे ठीक करना सही है। दरवाजे बन्द करना, आँखें बन्द करना अथवा टीवी बन्द करना कोई इलाज नहीं है, यह तो बीमारी को अनदेखा करना हुआ। ऐसे चैनल क्यों देखते हो का जवाब तो यही है कि वरना पता कैसे चलेगा कि कौन-कौन, कहाँ-कहाँ, कैसी-कैसी गन्दगी फ़ैला रहा है? न्यूज़ चैनल देखकर ही तो पता चलता है कि कितने न्यूज़ चैनल भाजपा-संघ-हिन्दुत्व विरोधी हैं?, कौन सा चैनल एक परिवार विशेष का चमचा है, कौन सा चैनल “तथाकथित प्रगतिशीलता” का झण्डाबरदार बना हुआ है। अतः इस “अपसंस्कृति” (यदि कोई इसे अपसंस्कृति नहीं मानता तो यह उसकी विचारधारा है) की आलोचना करना, इसका विरोध करना, इसे रोकने की कोशिश करना, एक जागरूक नागरिक का फ़र्ज़ बनता है (भले ही इस कोशिश में उसे दकियानूसी या पिछड़ा हुआ घोषित कर दिया जाये)।

यदि यह शो वयस्कों के लिये है तब इस प्रकार की वैधानिक चेतावनी क्यों नहीं जारी की गई और इसका समय 10.30 की बजाय रात 12.30 क्यों नहीं रखा गया? कांबली-सचिन के फ़ुटेज दिखा-दिखाकर इसका प्रचार क्यों किया जा रहा है? क्योंकि पहले भी कंडोम के प्रचार में राहुल द्रविड और वीरेन्द्र सहवाग को लिया जा चुका है और कई घरों में बच्चे पूछते नज़र आये हैं कि पापा क्रिकेट खेलते समय मैं भी राहुल द्रविड जैसा कण्डोम पहनूंगा… क्या यह कार्यक्रम बनाने वाला चाहता है कि कुछ और ऐसे ही सवाल बच्चे घरों में पूछें?

बहरहाल, यह बहस तो अन्तहीन हो सकती है, क्योंकि भारत में “आधुनिकता”(?) के मापदण्ड बदल गये हैं (बल्कि चालबाजी द्वारा मीडिया ने बदल दिये गये हैं), एक नज़र इन खबरों पर डाल लीजिये जिसमें इस घटिया शो के कारण विभिन्न देशों में कैसी-कैसी विडम्बनायें उभरकर सामने आई हैं, कुछ देशों में इस शो को प्रतिबन्धित कर दिया गया है, जबकि अमेरिका जैसे “खुले विचारों”(?) वाले देश में भी इसके कारण तलाक हो चुके हैं और परिवार बिखर चुके हैं…।

प्रकरण – 1 : मोमेंट ऑफ़ ट्रुथ का ग्रीक संस्करण प्रतिबन्धित किया गया…

मीडिया मुगल रूपर्ट मर्डोक जिन्होंने अपनी पोती की उम्र की लड़की वेंडी से शादी की है और मीडिया के जरिये “बाजारू क्रान्ति” लाने के लिये विख्यात हैं उनकी पुत्री एलिज़ाबेथ मर्डोक द्वारा निर्मित यह शो कई देशों में बेचा गया है और इसकी हू-ब-हू नकल कई देशों में जारी है, का ग्रीक संस्करण ग्रीस सरकार ने प्रतिबन्धित कर दिया है। ग्रीस के सरकारी चैनल “एण्टेना” द्वारा इस शो में विभिन्न भद्दी स्वीकृतियों और परिवार पर पड़ने वाले बुरे असर के चल्ते यह शो बन्द कर दिया गया। इसके फ़रवरी वाले एक शो में एक माँ से उसकी बेटी-दामाद के सामने पूछा गया था कि “क्या वह अपनी बेटी की शादी एक अमीर दामाद से करना चाहती थी”, उसने हाँ कहा और उसके गरीब दामाद-बेटी के घर में दरार पड़ गई। मार्च में हुए एक शो में पति के सामने महिला से पूछा गया था कि क्या वह पैसों के लिये किसी गैर-मर्द के साथ सो सकती है?
खबर का स्रोत यहाँ है http://www.guardian.co.uk/world/2009/jun/24/greek-quiz-show-confessions-banned

इसका वीडियो लिंक यहाँ है http://www.youtube.com/watch?v=yMvuQugBKCE

प्रकरण 2 – पति की हत्या के लिये भाड़े का हत्यारा लेना स्वीकार करने पर कोलम्बिया में भी इस शो पर प्रतिबन्ध (मूल रिपोर्ट जोशुआ गुडमैन APP)

कोलम्बिया में गेम शो “नथिंग बट ट्रूथ” को बैन कर दिया गया, जब एक प्रतिभागी ने 25,000 डालर के इनाम के लिये यह स्वीकार कर लिया कि उसने अपने पति की हत्या के लिये एक भाड़े के हत्यारे को पैसा दिया था। कोलम्बिया में प्रसारित इस शो में सभी प्रतिभागियों ने ड्रग स्मगलिंग, समलैंगिक सम्बन्धों और शादीशुदा होने के बावजूद रोज़ाना वेश्यागमन को स्वीकार किया। लेकिन 2 अक्टूबर 2007 को रोज़ा मारिया द्वारा यह स्वीकार किये जाने के बाद कि उसने अपने पति की हत्या की सुपारी दी थी लेकिन ऐन वक्त पर उसका पति हमेशा के लिये कहीं भाग गया और यह काम पूरा न हो सका, के बाद यह शो बन्द कर दिया गया।
खबर का स्रोत यहाँ देखें http://www.textually.org/tv/archives/2007/10/017595.htm

प्रकरण 3 – लॉरेन क्लेरी : मोमेंट ऑफ़ ट्रुथ ने उसका तलाक करवा दिया…

इस शो में लॉरेन क्लेरी नामक महिला ने यह स्वीकार कर लिया कि वह अपने पति को धोखा दे रही है और अपने पूर्व मित्र से शादी करना चाहती है। लॉरेन ने स्वीकार किया किया कि वह यह सब पैसे के लिये कर रही है। उसके पति फ़्रैंक क्लेरी ने कहा कि उसे शक था कि उसकी पत्नी उसके प्रति वफ़ादार नहीं है और शायद मामला धीरे-धीरे सुलझ जायेगा, लेकिन इस तरह सार्वजनिक रूप से पत्नी के यह स्वीकार करने के बाद उसे बेहद शर्मिन्दगी हुई है। लॉरेन क्लेरी इस कार्यक्रम से कुछ पैसा ले गई, लेकिन शायद यह उसे तलाक दिलवाने से नहीं रोक सकेगा।

इसका वीडियो लिंक देखने के लिये यहाँ चटका लगायें…
Video link : http://www.transworldnews.com/NewsStory.aspx?id=38398&cat=14

प्रकरण 4 – अमेरिका में इस शो के सातवें एपीसोड में एक कारपेंटर ने स्वीकार किया कि वह अपनी पत्नी की बहन और उसकी सहेलियों के साथ सोता रहा है और कई बार उसने एक माह में विभिन्न 25 महिलाओं के साथ सेक्स किया है। एपीसोड क्रमांक 9 में पॉल स्कोन ने एक लाख डालर में यह सच(?) कहा कि वह प्रत्येक सेक्स की जाने वाली महिला की अंडरवियर संभालकर रखता है, और कई महिलाओं से उसने सेक्स करने के पैसे भी लिये हैं।

खबर का स्रोत देखने के लिये यहाँ चटका लगायें http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_The_Moment_of_Truth_episodes#Episode_7

अब कहिये… इतना सब हो चुकने के बावजूद फ़िर भी यदि हम भारत में इस शो को जारी रखने पर उतारू हैं तब तो वाकई हमारा भयानक नैतिक पतन हो चुका है। एक बात और है कि “नाली में गन्दगी दिखाई दे रही है तो उसे साफ़ करने की कोशिश करना चाहिये, यदि नहीं कर सकते तो उसे ढँकना चाहिये, लेकिन यह जाँचने के लिये, कि नाली की गन्दगी वाकई गन्दगी है या नहीं, उसे हाथ में लेकर घर में प्रवेश करना कोई जरूरी नहीं…”।

(नोट – इस लेख के लिये भी मैं अपनी कॉपीराइट वाली शर्त हटा रहा हूँ, इस लेख को कहीं भी कॉपी-पेस्ट किया जा सकता है।)

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किसी महिला की इज़्ज़त, सम्मान और उसके परिवार के प्रति समर्पण की क्या कीमत तय की जा सकती है? उत्तरप्रदेश में तो रीता बहुगुणा ने मायावती की इज़्ज़त का भाव एक करोड़ लगाया है, लेकिन यहाँ बात दूसरी है। स्टार प्लस ने अपने कार्यक्रम “सच का सामना” में महिला की बेइज़्ज़ती की कीमत सीढ़ी-दर-सीढ़ी तय कर रखी है, कार्यक्रम में प्रतियोगी (चाहे वह मर्द हो या औरत) जिस स्तर तक अपमानित होना चाहता उसे उस प्रकार की कीमत दी जायेगी, यानी 1 लाख, 5 लाख, 10 लाख आदि।

जिन पाठकों ने अभी तक यह कार्यक्रम नहीं देखा है उन्हें ज़रूर देखना चाहिये, ताकि उन्हें भी पता चले कि “बालिका वधू” द्वारा बुरी तरह पिटाई किये जाने के बाद, TRP नामक गन्दगी के लिये इलेक्ट्रानिक मीडियारूपी भेड़िया कितना नीचे गिर सकता है।

कार्यक्रम के निर्माताओं द्वारा दावा किया जा रहा है कि यह कार्यक्रम “पॉलिग्राफ़िक टेस्ट” (झूठ पकड़ने वाली मशीन) के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें प्रतियोगी को पहले इस मशीन पर बैठाकर उससे उसकी निजी जिन्दगी से जुड़े 50 सवाल किये जाते हैं, जिसकी रिकॉर्डिंग मशीन में रखी जाती है कि किस सवाल पर उसने सच बोला या झूठ बोला (हालांकि इस मशीन की वैधानिकता कुछ भी नहीं है, शायद न्यायालय ने भी इसे सबूत के तौर पर मानने से इंकार किया हुआ है, क्योंकि व्यक्ति के मन में क्या चल रहा है इस बारे में यह मशीन शरीर में होने वाले परिवर्तनों और उतार-चढ़ावों के आधार पर “सम्भावना” – सिर्फ़ सम्भावना, व्यक्त करती है, इसमें दर्ज जवाबों को पूरी तौर पर सच नहीं माना जा सकता, क्योंकि यदि ऐसा होता तो भारत में सभी अपराधी सजा पा जाते)। प्रतियोगियों को उनके द्वारा दिये गये “मशीन टेस्ट” के उत्तरों के बारे में नहीं बताया जाता, और यही चालबाजी है।

हालांकि कहने के लिये तो इस कार्यक्रम को खेल का नाम दिया गया है, लेकिन हकीकत में यह “दूसरों की इज़्ज़त उतारकर उसे सरेआम नीचा दिखाकर खुश होने” के मानव के आदिम स्वभाव पर आधारित है। इसमें एंकर 21 सवाल पूछेगा और पूरी तरह से नंगा होने वाले आदमी (या औरत) को एक करोड़ रुपये दिये जायेंगे। जिस तरह आज भी दूरस्थ इलाके में स्थित गाँवों में दलितों की स्त्रियों को नंगा किया जाता है और लोग आसपास खड़े होकर तालियाँ पीटते हैं, यह कार्यक्रम “सच का सामना” उसी का “सोफ़िस्टिकेटेड” स्वरूप है। आपकी सास ज्यादा अच्छी है या माँ? क्या आपको अपने भाई से कम प्यार मिला? यह तो हुए आसान सवाल, लेकिन पाँचवां सवाल आते-आते स्टार प्लस अपनी औकात पर आ जाता है…… क्या आप अपने पति की हत्या करना चाहती थीं?, क्या आपने कभी अपने पति से बेवफ़ाई की है? (यहाँ बेवफ़ाई का मतलब पर्स में से रुपये से चुराने से नहीं है), यदि आपके पति को पता ना चले तो क्या आप किसी गैर-मर्द के साथ सो सकती हैं? ऐसे सवाल पूछे जाने लगते हैं, यानी निजी सम्बन्धों और बेडरूम को सार्वजनिक किया जाने लगता है “सच बोलने” के महान नैतिक कर्म(?) के नाम पर।

जिन्होंने पहला एपीसोड देखा है उन्होंने महसूस किया होगा कि किस प्रकार एक मध्यमवर्गीय महिला जो टीचर है और टिफ़िन सेंटर का भी काम करती है, जिसका पति मुश्किल से शराब की लत से बाहर निकला है और उस महिला ने एक बेहद संघर्षमय जीवन जिया है… ऐसी महिला को यह बताया जाना कि पॉलिग्राफ़िक मशीन में उसने यह जवाब दिया था कि, “हाँ वह किसी गैर-मर्द के साथ सो सकती है…” कितना कष्टदायक हो सकता है। प्रतियोगी स्मिता मथाई के चेहरे पर अविश्वास मिश्रित आश्चर्य और आँसू थे, तथा स्टार प्लस अपना TRP मीटर देख रहा था।

सवाल उठाया जा सकता है कि सब कुछ मालूम होते हुए भी प्रतियोगी क्यों ऐसे कार्यक्रम में शामिल होने के लिये राजी होते हैं? इसका जवाब यह है कि जो 50 सवाल उनसे पहले पूछे जाते हैं, उनमें से सिर्फ़ 10 सवाल ही ऐसे होते हैं जो उनके निजी जीवन और अंतरंग सम्बन्धों से जुड़े होते हैं, बाकी के सवाल… क्या आपको रसगुल्ला अच्छा लगता है?, क्या आप बगीचे में घूमते समय फ़ूल तोड़ लाती हैं? इस प्रकार के सवाल होते हैं, प्रतियोगी को पता नहीं होता कि इन 50 सवालों में से कौन से 21 सवाल कार्यक्रम में पूछे जायेंगे, फ़िर साथ में 10-20 लाख के “लालच की गाजर” भी तो लटकी होती है। एक सामान्य व्यक्ति का इस चालबाजी में फ़ँसना स्वाभाविक है। चालबाजी (बल्कि घटियापन कहना उचित है) भी ऐसी कि वह प्रतियोगी पॉलिग्राफ़िक मशीन के टेस्ट को चुनौती तो दे नहीं सकता, अब यदि स्टार प्लस ने कह दिया कि आपने उस समय यह जवाब दिया था, वही सही मानना पड़ेगा। भले ही फ़िर प्रतियोगी बाद में लाख चिल्लाते रहें कि मैंने कभी नहीं कहा था कि “मैं गैर-मर्द के साथ सोने को तैयार हूँ”, कौन सुनने वाला है? प्रतियोगी का तो परिवार बर्बाद हो गया, उसे आने वाले जीवन में ताने, लानत-मलामत सुनना ही है, इस सबसे चैनल को क्या… उस “गंदगी से खेलने वाले चैनल को तो मजा आ गया”, उसका तो मकसद यही था किस तरह से नाली की ढँकी हुई गन्दगी में थूथनी मारकर उसे सड़क पर सबसे सामने फ़ैला दिया जाये। दुख की बात यह है कि बात-बेबात पर नारी सम्मान का झण्डा बुलन्द करने वाले महिला संगठन नारी के इस असम्मान पर अभी तक चुप हैं।

हालांकि राखी सावन्त या मल्लिका शेरावत का सम्मान भी नारी का सम्मान ही है, लेकिन चूँकि वे लोग “पेज थ्री” नामक कथित सामाजिक स्टेटस(?) से आते हैं इसलिये वे खुद ही चाहती हैं कि लोग उनके निजी सम्बन्धों और गैर-मर्द से रोमांस के बारे में जानें, बातें करें, चिकने पृष्ठों पर उनकी अधनंगी तस्वीरें छपें। फ़िर वे ठहरीं कथित “हाई सोसायटी” की महिलायें, जिनके लिये समलैंगिकता, सरेआम चूमाचाटी या सड़क पर सेक्स करना भी “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता” हो सकती है। दूसरे एपिसोड में आलोचना से बचने और महिला-पुरुष के बीच “बैलेंस” बनाने के लिये एक मुस्लिम अभिनेता को शो में बुलाया गया और उससे भी वही फ़ूहड़ सवाल पूछे गये कि “आपकी तीन बीवियों में से आप किसे अधिक चाहते हैं?”, “अपनी बेटी को दूसरी पत्नी को सौंपने पर आपको अफ़सोस है?”, “क्या आपकी दूसरी बीबी पैसों की लालची है?”, “क्या आपकी कोई नाजायज़ औलाद है?” आदि-आदि…। वे भी बड़ी बहादुरी(?) और खुशी से इन सवालों के जवाब देते रहे, लेकिन जैसा कि पहले कहा ये लोग “पेज थ्री सेलेब्रिटी”(?) हैं इन लोगों की इज्जत क्या और बेइज़्ज़ती क्या? लेकिन यहाँ मामला है एक आम स्त्री का जो शायद लालच, मजबूरी अथवा स्टार की धोखेबाजी के चलते सार्वजनिक रूप से शर्मिन्दा होने को बाध्य हो गई है।

अब आते हैं इस कार्यक्रम के असली मकसद पर, जैसा सर्वविदित है कि कलर्स चैनल पर आने वाले कार्यक्रम “बालिका वधू” द्वारा TRP के खेल में स्टार प्लस को बुरी तरह खदेड़ दिया गया है। स्टार प्लस पहले भी विदेशी कार्यक्रमों की नकल करके अपनी TRP बढ़ाता रहा है, अथवा एकता कपूर मार्का “घरतोड़क और बहुपतिधारी बीमारी वाले सीरियलों” को बढ़ावा देकर गन्दगी फ़ैलाता रहा है, लेकिन जब उसे एक खालिस देशी “कॉन्सेप्ट” पर आधारित बालिका वधू ने हरा दिया तो बेकरारी और पागलपन में स्टार प्लस को TRP बढ़ाने का सबसे अच्छा तरीका लगा “नंगई का प्रदर्शन”। पहले तो स्टार प्लस ने ओछे हथकण्डे अपनाकर कभी सामाजिक संगठनों, कभी बाल-विवाह विरोधी NGOs को आगे करके और कभी शरद यादव के जरिये संसद में सवाल उठवाकर बालिका वधू को बन्द करवाने / बदनाम करने की कोशिश की, लेकिन फ़िर भी बात नहीं बनी तो “लोकप्रियता”(?) पाने का यह नायाब तरीका ढूँढ निकाला गया। सच का सामना नामक यह कार्यक्रम पूरी तरह से धोखेबाजी पर आधारित है, जिसमें स्टार प्लस जब चाहे बेईमानी कर सकता है (पहले ही एपिसोड में की) (इस बात में कोई दम नहीं है कि इतना बड़ा चैनल और पैसे वाले लोग थोड़े से पैसों के लिये बेईमानी नहीं कर सकते)।

माना कि TRP के भूखे भेड़िये किसी भी हद तक गिर सकते हैं (मुम्बई हमलों के वक्त ये लोग राष्ट्रद्रोही की भूमिका में थे), लेकिन आखिर सेंसर बोर्ड क्या कर रहा है? सूचना-प्रसारण मंत्रालय क्यों सोया हुआ है? महिला आयोग क्या कर रहा है? सुषमा स्वराज, ममता बैनर्जी, गिरिजा व्यास, मीरा कुमार जैसी दबंग महिलायें क्यों हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं? क्या मायावती की इज़्ज़त ही इज़्ज़त है, स्मिता मथाई की इज़्ज़त कुछ नहीं है?

क्या स्टार प्लस किसी IAS अफ़सर को बुलाकर लाई-डिटेक्टर टेस्ट कर सकता है कि उस अफ़सर ने कितने करोड़ रुपये भ्रष्टाचार से बनाये हैं? या क्या स्टार प्लस किसी नेता को बुलाकर पूछ सकता है कि क्या आपने कभी चुनाव में धांधली की है? हरगिज़ नहीं, ऐसा कभी नहीं हो सकता, क्योंकि कार्यक्रम का मकसद सिर्फ़ नंगापन प्रदर्शित करके सनसनी फ़ैलाना है ताकि स्टार प्लस की “परम्परा” के अनुसार परिवारों और समाज में और दरारें पैदा हों… अमेरिका में इस शो के मूल संस्करण ने कई परिवारों को बरबाद कर दिया है (वह भी तब जबकि अमेरिका में परिवार नामक संस्था पहले ही कमजोर है), इसके निहितार्थ भारतीय संस्कृति और समाज पर कितने गहरे हो सकते हैं, इसका अन्दाज़ा शायद अभी किसी को नहीं है।

सुना है कि सिर्फ़ एक पोस्टकार्ड के आधार को भी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश किसी मामले में जनहित याचिका के तौर पर स्वीकार कर सकते हैं? क्या इस लेख को भी समाज में अनैतिकता फ़ैलाने और एक घरेलू महिला को सार्वजनिक तौर पर अपमानित करने की शिकायत हेतु जनहित याचिका के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है???

(नोट – इस लेख के लिये मैं अपनी कॉपीराइट वाली शर्त हटा रहा हूँ, इस लेख को कहीं भी कॉपी-पेस्ट किया जा सकता है। इस बात का भी विश्वास है कि महिला ब्लॉगर्स इस घटिया “खेल” को समझेंगी और इसके खिलाफ़ उचित मंचों से अवश्य आवाज़ उठायेंगी)

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(भाग-1 - भाजपा को “हिन्दुत्व” और “राष्ट्रवाद” से दूर हटने और “सेकुलर” वायरस को गले लगाने की सजा मिलनी ही चाहिये… से आगे)

मीडिया, सेकुलर पत्रकार, कुछ अन्य विदेशी ताकतें और “कथित प्रगतिशील” लोग भाजपा से उसकी पहचान छीनने में कामयाब हो रहे हैं और उसे “कांग्रेस-बी” बना रहे हैं। भ्रष्टाचार और हिन्दुत्व की वैचारिक शून्यता के कारण भाजपा धीरे-धीरे कांग्रेस की नकल बनती जा रही है, फ़िर आम मतदाता (यदि वह मन ही मन परिवर्तन चाहता भी हो) के पास ओरिजनल कांग्रेस को चुनने के अलावा विकल्प भी क्या है? मीडिया-सेकुलर-प्रगतिशील और कुलकर्णी जैसे बुद्धिजीवियों ने बड़ी सफ़ाई से भाजपा को रास्ते से भटका दिया है (कई बार शंका होती है कि कल्याण-उमा-ॠतम्भरा जैसे प्रखर हिन्दुत्ववादी नेताओं को धकियाने के पीछे कोई षडयन्त्र तो नहीं? और यदि नरेन्द्र मोदी ने अपनी छवि “लार्जर दैन लाइफ़” नहीं बना ली होती तो अब तक उन्हें भी “साइडलाइन” कर दिया होता)।

एक अन्य मुद्दा है भाजपा नेताओं का मीडिया-प्रेम। यह जानते-बूझते हुए भी कि भारत के मीडिया का लगभग 90% हिस्सा भाजपा-संघ (प्रकारान्तर से हिन्दुत्व) विरोधी है, फ़िर भी भाजपा मीडिया को गले लगाने की असफ़ल कोशिश करती रहती है। जिस प्रकार भाजपा को “भरभराकर थोक में मुस्लिम वोट मिलने” के बारे में मुगालता हो गया है, ठीक वैसा ही एक और मुगालता यह भी हो गया है कि “मीडिया या मीडियाकर्मी या मीडिया-मुगल कभी भाजपा की तारीफ़ करेंगे…”। जिस मीडिया ने कभी आडवाणी की इस बात के लिये तारीफ़ नहीं की कि उन्होंने हवाला कांड में नाम आते ही पद छोड़ दिया और बेदाग बरी होने के बाद ही चुनाव लड़े, जिस मीडिया ने कभी भी नरेन्द्र मोदी के विकास की तारीफ़ नहीं की, जिस मीडिया ने कभी भी भाजपा में लगातार अध्यक्ष बदलने की स्वस्थ लोकतान्त्रिक परम्परा की तारीफ़ नहीं की, जिस मीडिया ने मोदी-वाजपेयी-आडवाणी-जोशी जैसे दिग्गज नेताओं द्वारा अपने परिवार के सदस्यों को राजनीति में आगे नहीं बढ़ाने की तारीफ़ नहीं की, जिस मीडिया ने भाजपा की कश्मीर नीति का कभी समर्थन नहीं किया… (लिस्ट बहुत लम्बी है…) क्या वह मीडिया कभी भाजपा की सकारात्मक छवि पेश करेगा? कभी नहीं…। भागलपुर-मलियाना-मेरठ-मुम्बई-मालेगाँव जैसे कांग्रेस के राज में और कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के काल में हुए सैकड़ों दंगों के बावजूद सबसे बदनाम कौन है, नरेन्द्र मोदी…। नेहरू के ज़माने से जीप घोटाले द्वारा भ्रष्टाचार को “सदाचार” बनाने वाली पार्टी की मीडिया कोई छीछालेदार नहीं करता। पहले “पप्पा” और फ़िर राजकुमार सरेआम बेशर्मी से कहते फ़िरते हैं कि “दिल्ली से चला हुआ एक रुपया नीचे आते-आते 5 पैसे रह जाता है…” उनसे मीडिया कभी सवाल-जवाब नहीं करता कि 50 साल शासन करने के बाद यह किसकी जिम्मेदारी है कि वह पैसा पूरा नीचे तक पहुँचे…?, क्यों नहीं 50 साल में आपने ऐसा कुछ काम किया कि भ्रष्टाचार कम हो? उलटे मीडिया स्टिंग ऑपरेशन करता है किसका? बंगारू लक्ष्मण और दिलीप सिंह जूदेव का?

ज़ाहिर है कि लगभग समूचे मीडिया पर एक वर्ग विशेष का पक्का कंट्रोल है, यह वर्ग विशेष जैसा कि पहले कहा गया “मुल्ला-मार्क्स-मिशनरी-मैकाले” का प्रतिनिधित्व करता है, इस मीडिया में “हिन्दुत्व” का कोई स्थान नहीं है, फ़िर क्यों मीडिया को तेल लगाते फ़िरते हो? हाल ही में NDTV पर वरुण गाँधी की सुरक्षा सम्बन्धी एक बहस आ रही थी, एंकर बार-बार कह रही थी कि “भाजपा की ओर से अपना पक्ष रखने कोई नहीं आया…”, अरे भाई, आ भी जाता तो क्या उखाड़ लेता, क्योंकि “नेहरु डायनेस्टी टीवी” (NDTV) उसे कुछ कहने का मौका भी देता क्या? और यदि भाजपा की ओर से कोई कुछ कहे भी तो उसका दूसरा मतलब निकालकर हौवा खड़ा नहीं करता इसकी क्या गारंटी? इसलिये बात साफ़ है कि इन पत्रकारों को फ़ाइव स्टार होटलों में कितनी ही उम्दा स्कॉच पिलाओ, ये बाहर आकर “सेकुलर उल्टियाँ” ही करेंगे, इसलिये इनसे “दुरदुराये हुए खजेले कुत्ते” की तरह व्यवहार भी किया जाये तो कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं है, क्योंकि ये कभी भी तुम्हारी जय-जयकार करने वाले नहीं हैं। आज का मीडिया “हड्डी” का दीवाना है, उसे हड्डी डालना चाहिये, लेकिन पूरी कीमत वसूलने के बाद… (हालांकि इसकी उम्मीद भी कम ही है, क्योंकि इनके जो “टॉप बॉस” हैं वे खाँटी भाजपा-विरोधी हैं, मार्क्स-मुल्ला-मिशनरी-मैकाले की विचारधारा को आगे बढ़ाने के अलावा जो खबरें बच जाती हैं, वे एक और M यानी “मनी” से संचालित होती हैं, यानी कि जिन खबरों में पैसा कूटा जा सकता हो, किसी को ब्लैकमेल किया जा सकता हो, वही प्रकाशित हों, देश जाये भाड़ में, नैतिकता जाये चूल्हे में, पत्रकारिता के आदर्श और मानदण्डों पर राख डालो, ये लोग “हिन्दुत्व” और “राष्ट्रवाद” का साथ देने वाले नहीं हैं)।

क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का काम इतने वर्षों से मीडिया के बिना नहीं चल रहा है? आराम से चल रहा है। जब RSS के वर्ग, सभायें आदि हो रही होती हैं तब मीडिया वालों को उधर से दूर ही रखा जाता है, तो क्या बिगड़ गया RSS का? क्या संघ बरबाद हो गया? या संघ कमजोर हो गया? सीधा हिसाब है कि जो लोग तुम्हारा सही पक्ष सुनेंगे नहीं, तुम्हारे पक्ष में कभी लिखेंगे नहीं, तुम्हारे दृष्टिकोण को छूटते ही “साम्प्रदायिक” घोषित करने में लगे हों, उनसे मधुर सम्बन्ध बनाने की बेताबी क्यों? काहे उन्हें बुला-बुलाकर इंटरव्यू देते हो, काहे उन्हें 5 सितारा होटलों में भोज करवाते हो? भूत-प्रेत-चुड़ैल दिखाने, जैक्सन-समलैंगिकता-आरुषि जैसे बकवास मुद्दों पर समय खपाने और फ़ालतू की लफ़्फ़ाजी हाँकने की वजह से आज की तारीख में मीडिया की छवि आम जनता में बहुत गिर चुकी है…। क्यों यह मुगालता पाले बैठे हो कि इस प्रकार का मीडिया कभी भाजपा का उद्धार कर सकेगा? मीडिया के बल पर ही जीतना होता तो “इंडिया शाइनिंग” कैम्पेन के करोड़ों रुपये डकारकर भी ये मीडिया भाजपा को क्यों नहीं जितवा पाया? चलो माना कि हरेक राजनैतिक पार्टी को मीडिया से दोस्ती करना आवश्यक है, लेकिन यह भी तो देखो कि जो व्यक्ति खुलेआम तुम्हारा विरोधी है, जिस पत्रकार का इतिहास ही हिन्दुत्व विरोधी रहा है, जो मीडिया-हाउस सदा से कांग्रेस और मुसलमानों का चमचा रहा है, उसे इतना भाव क्यों देना, उसे उसकी औकात दिखाओ ना?

चुनाव जीता जाता है कार्यकर्ता के बल पर, आन्दोलनों के बल पर… तुअर दाल के भाव 80 रुपये को पार कर चुके हैं, क्या कोई आन्दोलन किया भाजपा ने? एकाध जोरदार किस्म का प्रदर्शन करते तो मीडिया वालों को मजबूर होकर कवरेज देना ही पड़ता (दारू भी नहीं पिलानी पड़ती), लेकिन AC लगे कमरों में बैठने से जनता से नहीं जुड़ा जायेगा। 5 साल विपक्ष में रहे, अगले 5 साल भी रहोगे… अब “सुविधाभोग” छोड़ो, हिन्दुत्व से नाता जोड़ो। सड़क-बिजली-पानी अति-आवश्यक मुद्दे हैं ये तो सभी सरकारें करेंगी, करना पड़ेगा… लेकिन “हिन्दुत्व” तो तुम्हारी पहचान है, उसे किनारे करने से काम नहीं चलेगा। नरेन्द्र मोदी वाला फ़ार्मूला एकदम फ़िट है, “विकास + हिन्दुत्व = पक्की सत्ता”, वही आजमाना पड़ेगा, खामखा इन सेकुलरों के चक्कर में पड़े तो न घर के रहोगे न घाट के। “आधी छोड़ पूरी को धाये, आधी पाये न पूरी पाये” वाली कहावत तो सुनी होगी, मुसलमानों को जोड़ने के चक्कर में “सेकुलर उलटबाँसियाँ” करोगे, तो नये मतदाता तो मिलेंगे नहीं, अपने प्रतिबद्ध मतदाता भी खो बैठोगे।

सार-संक्षेप : दो मुगालते भाजपा जितनी जल्दी दूर कर ले उतना अच्छा कि –

1) मुसलमान कभी भाजपा को सत्ता में लाने लायक वोटिंग करेंगे, और
2) मीडिया कभी भाजपा की तारीफ़ करेगा या कांग्रेस के मुकाबले उसे तरजीह देगा

मैं तो एक अदना सा व्यक्ति हूँ, बड़े-बड़े दिग्गजों को क्या सलाह दूँ, लेकिन एक बात तो तय है कि “हिन्दुत्व” और “राष्ट्रवाद” की बात करने वाली एक ठोस पार्टी और ठोस व्यक्ति की “मार्केट डिमाण्ड” बहुत ज्यादा है जबकि “सप्लाई” बहुत कम। इस सीधी-सादी इबारत को यदि कोई पढ़ नहीं सकता हो तो क्या किया जा सकता है। भाजपा के काफ़ी सारे समर्थक एक “विचारधारा” के समर्थक हैं, किसी खास “परिवार” के चमचे नहीं। जो भी हिन्दुत्व की विचारधारा को खोखला करने या उससे हटने की कोशिश करेगा (चाहे वह नरेन्द्र मोदी ही क्यों न हों) पहले उसे हराना या हरवाना उन समर्पित कार्यकर्ताओं का एक दायित्व बन जायेगा। हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद से दूर हटने की सजा भाजपा को अगले दो-चार-छः बार के चुनावों में देना होगी, शायद तब “सेकुलरिज़्म का भूत” उसके दिमाग से उतरे। हालांकि कांग्रेसी और वामपंथी यह सुनकर/पढ़कर बहुत खुश होंगे, लेकिन यदि और 10-20 साल तक कांग्रेस सत्ता में रह भी जाये तो क्या हर्ज है, पहले भी 50 साल शासन करके कौन से झण्डे गाड़ लिये हैं। लेकिन जब तक भाजपा “सेकुलर” वायरस मुक्त होकर, पूरी तरह से हिन्दुत्व की ओर वापस नहीं आती, तब तक उसे सबक सिखाना ही होगा (ज़ाहिर है कि वोट न देकर, और फ़िर भी नहीं सुधरे तो किसी ऐरे-गैरे को भी वोट देकर)।

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एक सज्जन हैं जो एक समय पर पक्के और ठोस कम्युनिस्ट थे, हिन्दुत्व और साम्प्रदायिकता को कोसने का जो फ़ैशन आज भी चलता है, उसी के ध्वजवाहक थे उन दिनों… आईआईटी मुम्बई के ग्रेजुएट बुद्धिजीवी। माकपा की छात्र इकाई, स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया के सक्रिय कार्यकर्ता। जब ये साहब माकपा में थे तब उन्होंने मास्को का दौरा भी किया था और मुम्बई की लोकल ट्रेनों में “साम्प्रदायिकता” (ज़ाहिर है कि हिन्दू साम्प्रदायिकता) के खिलाफ़ सैकड़ों पोस्टर चिपकाये थे, ये पोस्टर जावेद आनन्द और तीस्ता सीतलवाड के साथ मिलकर इन्होंने संघ-विरोध और सेकुलर-समर्थन में लगाये थे। सस्पेंस बनाने की कोई तुक नहीं है, क्योंकि काफ़ी लोग इन सज्जन को जानते हैं, ये हैं “सुधीन्द्र कुलकर्णी”, जो 1998 में वाजपेयी के दफ़्तर (प्रधानमंत्री कार्यालय) में डायरेक्टर के पद पर रहे, 2004 में भाजपा के राष्ट्रीय सचिव, और 2005 से आडवाणी के सलाहकार हैं, इनका मानना है कि भाजपा को संघ से अपना नाता तोड़ लेना चाहिये। माना जाता है कि इन्हीं की सलाह पर आडवाणी ने अपनी “इमेज” सुधारने(?) के लिए पाकिस्तान दौरे में जिन्ना की मज़ार पर सिर झुकाया और विश्वस्त सूत्रों की मानें तो नरेन्द्र मोदी को अमेरिका का वीजा न मिले इसके लिये भी ये पर्दे के पीछे से प्रयासरत रहे। अब तो आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिये, कि आखिर भाजपा की वर्तमान दुर्गति कैसे-कैसे लोगों की सलाहकारी के कारण हो रही है। चुनाव हारने के बाद सारा ठीकरा वरुण गाँधी और नरेन्द्र मोदी के सिर फ़ोड़ने की कोशिश हो रही है, इसके पीछे भाजपा का वैचारिक पतन ही है।

हाल के लोकसभा चुनावों में भाजपा की हार के बाद तमाम मंथन-वंथन हुए, पार्टी की मीटिंग-दर-मीटिंग हुईं, लेकिन नतीजा सिफ़र ही रहा और पार्टी को मजबूत करने के नाम पर भाजपाई नेता, नौ दिन में अढ़ाई कोस भी नहीं चल पाये। जमाने भर की मगजमारी और माथाफ़ोड़ी के बाद भी इतने बड़े-बड़े और विद्वान नेतागण यह समझने में नाकाम रहे कि भाजपा की इस हार की एक वजह “हिन्दुत्व” और “राष्ट्रवाद” से दूर हटना और “सेकुलर” वायरस से ग्रस्त होना भी है। कालिदास की कथा सभी ने पढ़ी होगी जो जिस डाल पर बैठे थे उसी को काट रहे थे, भाजपा का किस्सा भी कुछ ऐसा ही है। 1984 में जब पार्टी को सिर्फ़ 2 सीटें मिली थीं, उसके बाद 1989, 1991, 1996, 1999 के चुनावों में पार्टी को 189 सीटों तक किसने पहुँचाया? प्रखर हिन्दुत्व और राष्ट्रवादी विचारों वाली पार्टी के वफ़ादार स्वयंसेवकों और प्रतिबद्ध भाजपाई वोटरों ने। इसमें आडवाणी की रथयात्रा के महत्व को खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन जो प्रतिबद्ध वोटर हर बुरे से बुरे वक्त में भाजपा को वोट देता था उसे खारिज करने और उपेक्षित करने का काम 1999 से शुरु हुआ, खासकर जबसे पार्टी में “सत्ता” के कीटाणु घुसे।

सत्ता के इन कीटाणुओं ने प्रेस के एक वर्ग के साथ मिलकर पार्टी के भीतर और बाहर ऐसा माहौल बनाया कि भाजपा जब तक “सेकुलर”(?) नहीं बनेगी तब तक दिल्ली की सत्ता उसे नहीं मिलेगी। इस झाँसे में आकर कई ऊटपटांग गठबंधन किये गये, कई जायज-नाजायज समझौते किये गये, किसी तरह धक्के खाते-खाते 5 साल सत्ता चलाई। गठबंधन किया इसमें कोई हर्ज नहीं, लेकिन गठबंधन के सहयोगियों के ब्लैकमेल के आगे लगातार झुकते रहे यह सबसे बड़ी गलती रही। जब नायडू, बीजू, जयललिता, ममता, माया और फ़ारुक जैसे घोर अवसरवादी लोग अपनी शर्तें भाजपा पर थोपते रहे और मनवाते रहे, तब क्या भाजपा में इतना भी दम नहीं था कि वह अपनी एक-दो मुख्य हिन्दुत्ववादी और राष्ट्रवादी शर्तें मनवा पाती? असल में भाजपा के नेता सत्ता के मद में इतने चूर हो चुके थे कि वे भूल गये कि वे किस प्रतिबद्ध वोटर के बल पर 189 सीटों तक पहुँचे हैं, और उन्होंने राम-मन्दिर, धारा 370, समान नागरिक संहिता आदि मुद्दों को दरी के नीचे दबा दिया। सेकुलरों की बातों में आकर आडवाणी को भी लगा कि शायद मुस्लिमों के वोट के बिना सत्ता नहीं मिलने वाली, सो वे भी जिन्ना की मज़ार पर जाकर सजदा कर आये (जबकि कोई मूर्ख ही यह सोच सकता है कि मुस्लिम कभी थोक में भाजपा को वोट देंगे)।

भाजपा की सबसे बड़ी गलती (बल्कि अक्षम्य अपराध) रही कंधार प्रकरण… जिस प्रकरण से पार्टी अपनी ऐतिहासिक छवि बना सकती थी और खुद को वाकई में “पार्टी विथ डिफ़रेंस” दर्शा सकती थी, ऐसा मौका न सिर्फ़ गँवा दिया गया, बल्कि “खजेले कुत्ते की तरह पीछे पड़े हुए” मीडिया के दबाव में पार्टी ने अपनी जोरदार भद पिटवाई। वह प्रकरण पार्टी के गर्त में जाने की ओर एक बड़ा “टर्निंग पॉइंट” साबित हुआ। उस प्रकरण के बाद पार्टी के कई प्रतिबद्ध वोटरों ने भी भाजपा को वोट नहीं दिया, और पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं में निराशा फ़ैलना शुरु हो चुकी थी। आज भी कांग्रेसी जब-तब हमेशा कंधार प्रकरण का उदाहरण देते फ़िरते हैं (यानी सूप बोले तो बोले, छलनी भी बोले जिसमें सौ छेद)।

ज़रा याद करके बतायें कि कितने लोगों ने पिछले 5-7 साल में, धारा 370 को हटाने, राम सेतु को गिराने के मुद्दे, बांग्लादेशियों को खदेड़ने, असम में पाकिस्तानी झंडा लहराये जाने, कश्मीर में जारी कत्लेआम आदि राष्ट्रवादी मुद्दों पर भाजपा को बेहद आक्रामक मूड में देखा है? नहीं देखा होगा, क्योंकि “सत्ता के सुविधाभोग” में आंदोलनों की जो गर्मी थी, वह निकल चुकी। मीडिया और सेकुलर पत्रकारों ने भाजपा के नेताओं पर कुछ ऐसा जादू किया है कि पार्टी कुछ भी बोलने से पहले यह सोचती है कि “लोग क्या कहेंगे…?”, “मुस्लिम क्या सोचेंगे…?”, “पार्टी की छवि को नुकसान तो नहीं होगा…?”, यानी जिस पार्टी को “फ़्रण्टफ़ुट” पर आकर चौका मारना चाहिये था, वह “बैकफ़ुट” पर जाकर डिफ़ेंसिव खेलने लग पड़ी है। असल में पार्टी इस मुगालते में पूरी तरह से आ चुकी है कि मुसलमान उसे वोट देंगे, जबकि हकीकत यह है कि इक्का-दुक्का इलाकाई “पॉकेट्स” को छोड़ दिया जाये तो अखिल भारतीय स्तर पर भाजपा को मुसलमानों के 1-2 प्रतिशत वोट मिल जायें तो बहुत बड़ी बात होगी। लेकिन इन 1-2 प्रतिशत वोटों की खातिर अपने प्रतिबद्ध वोटरों को नाराज करने वाली, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाली पार्टी यानी भाजपा।

जब वरुण गाँधी पैदा भी नहीं हुए थे उस समय से भाजपा-संघ-जनसंघ, मुसलमानों के लिये एक “हिन्दू पार्टी” हैं। चाहे भाजपा सर के बल खड़ी हो जाये, डांस करके दिखाये, उठक-बैठक लगा ले, मुस्लिमों की ओर से उसे तालियाँ मिलेंगी, कुछ सेकुलर अखबारों में प्रशंसात्मक लेख मिल सकते हैं लेकिन वोट नहीं मिलेंगे। वन्देमातरम की बजाय किसी कव्वाली को भी यदि राष्ट्रगान घोषित कर दिया जाये तब भी मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देंगे। फ़िर क्यों खामखा, सफ़ेद जाली वाली टोपी लगाकर इधर-उधर सम्मेलन आयोजित करते फ़िरते हो, क्यों खामखा हरे साफ़े और हरी चद्दरें विभिन्न मंचों पर ओढ़ते फ़िरते हो, इस कवायद की बजाय यदि अपने प्रतिबद्ध वोटरों की ओर ध्यान दिया होता तो शायद आज कांग्रेस के बराबर न सही उसके आसपास तो सीटें आतीं। माना कि किसी भी राजनैतिक पार्टी को सत्ता में आने के लिये दूसरे समुदायों को भी अपने साथ जोड़ना पड़ता है, लेकिन क्या यह जरूरी है कि “सेकुलर कैबरे” करते समय अपने प्रतिबद्ध वोटरों और कार्यकर्ताओं को नज़र-अंदाज़ किया जाये? कांग्रेस की बात अलग है, क्योंकि उसकी तो कोई “विचारधारा” ही नहीं है, लेकिन भाजपा तो एक विचारधारा आधारित पार्टी है फ़िर कैसे वह अपने ही समर्पित कार्यकर्ताओं को भुलाकर अपनी मूल पहचान खो बैठी।

इन ताज़ा लोकसभा चुनावों में जो पार्टी अपने प्रतिबद्ध वोटरों से हटी, वही पिटी। बसपा ने “सोशल इंजीनियरिंग” का फ़ार्मूला अपनाकर ब्राह्मणों को पास लाने की कोशिश की तो उसका मूल आधार ही सरक गया, वामपंथियों ने अपनी सोच को खुला करके टाटा को लाने की कोशिश की, किसानों-गरीबों की जमीन छीनी, अपने प्रतिबद्ध वोटरों को नाराज कर दिया, उसके पटिये उलाल हो गये, यही भाजपा भी कर रही है। वरुण गाँधी के बयान के बाद भाजपा के नेता ऊपर बताये गये 1-2 प्रतिशत वोटों को खुश करने के चक्कर में कैमरे के सामने आने से बचते रहे, वरुण के समर्थन में बयान भी आया तो कब जब वरुण पीलीभीत में एक “शख्सियत” बन गये तब!!! ऐसा ढुलमुल रवैया देखकर कार्यकर्ता तो ठीक, आम वोटर भी भ्रमित हो गया। भाजपा को उसी समय सोचना चाहिये था कि मुल्ला-मार्क्स-मिशनरी-मैकाले के हाथों बिका हुआ मीडिया दिन-रात वरुण गाँधी के फ़ुटेज दिखा-दिखाकर एक जाल फ़ैला रहा है, और उस जाल में भाजपा आराम से फ़ँस गई, 1-2 प्रतिशत वोटरों को खुश करने के चक्कर में “श्योर-शॉट” मिलने वाले वोटों से हाथ धो लिया। भाजपा के प्रतिबद्ध वोटर जब नाराज होते हैं तब वे वोट नहीं करते, क्योंकि कांग्रेस को तो गिरी से गिरी हालत में भी दे नहीं सकते, और कार्यकर्ताओं का यह “वोट न देना” तथा ज़ाहिर तौर पर अन्य मतदाताओं को वोट देने के लिये प्रेरित न करना भाजपा को भारी पड़ जाता है, कुछ-कुछ ऐसा ही इस चुनाव में भी हुआ है। जो पार्टी अपने खास वोटरों को अपना बँधुआ मजदूर समझती हो और उसे ही नाराज करके आगे बढ़ना चाहती हो, उसका यह हश्र हुआ तो कुछ गलत नहीं हुआ। भाजपा ने वर्षों की मेहनत से एक खून-पसीना बहाने वाला कार्यकर्ता और एक प्रतिबद्ध वोटरों का समूह खड़ा किया था। विश्वास जमने में बरसों का समय लगता है, टूटने में एक मिनट भी नहीं लगता। हिन्दू वोटरों को विश्वास था कि भाजपा उनके मुद्दे उठायेगी, चारों तरफ़ जब हिन्दुओं को गरियाया-लतियाया जा रहा हो तब भाजपा हिन्दुओं के पक्ष में खम-ताल ठोंककर खड़ी होगी, लेकिन ये क्या? “सत्ता प्रेम” इतना बढ़ गया कि प्रमुख मुद्दों को ही गठबंधन के नाम पर भूल गये… और गठबंधन भी किनसे, जो मेंढक हैं, थाली के बैंगन हैं, जब चाहे जिधर लुढ़क जाते हैं, उनसे? ऐसे नकली गठबंधन से तो अकेले चलना भला… धीरे-धीरे ही सही 2 से 189 तक तो पहुँचे थे, कुछ राज्यों में सत्ता भी मिली है, क्या इतना पर्याप्त नहीं है? दिल्ली की सत्ता के मोह में “सेकुलर कीचड़” में लोट लगाने की क्या आवश्यकता है? वह कीचड़ भरा “फ़ील्ड” जिस टाइप के लोगों का है, तुम उनसे उस “फ़ील्ड” में नहीं जीत सकते, फ़िर क्यों कोशिश करते हो?

(भाग-2 में जारी रहेगा… -- अगले भाग में भाजपा और मीडिया के रिश्तों पर कुछ खरी-खरी…)

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वोटिंग मशीनों के “चावलाकरण” का विस्तारित भाग शुरु करने से पहले एक सवाल – इलेक्ट्रानिक वोटिंग में इस बात का क्या सबूत है कि आपने जिस पार्टी को वोट दिया है, वह वोट उसी पार्टी के खाते में गया है? कागज़ी मतपत्र का समय सबको याद होगा, उसमें प्रत्येक बूथ पर मतपत्रों के निश्चित नम्बर होते थे, जिससे वोटिंग के 6 महीने बाद भी इस बात का पता लगाया जा सकता था कि किस बूथ पर, किस मतदाता ने, किस पार्टी को वोट दिया है, लेकिन इलेक्ट्रानिक मशीनों में जो रिकॉर्ड उपलब्ध होता है वह “कुल” (Cumulative) होता है कि कुल कितने मत पड़े, और कितने-कितने मत किस पार्टी को मिले, लेकिन व्यक्तिगत रूप से किसने किसे वोट दिया यह जान पाना असम्भव है।

EVM में गड़बड़ी और वोटिंग में तकनीकी धोखाधड़ी की सर्वाधिक आशंका-कुशंका तमिलनाडु के चुनाव नतीजों को लेकर, तमिल और अंग्रेजी ब्लॉगों पर सर्वाधिक चल रही है (तमिल ब्लॉग्स की संख्या हिन्दी के ब्लॉग्स से कई गुना अधिक है)। जैसा कि प्रत्येक राजनैतिक जागरूक व्यक्ति जानता है कि हर चुनाव (चाहे विधानसभा हो या लोकसभा) में तमिलनाडु की जनता हमेशा “एकतरफ़ा” फ़ैसला करती है अर्थात या तो द्रमुक या अन्नाद्रमुक को पूरी तरह से जिताती है, आधा-अधूरा फ़ैसला अमूमन तमिलनाडु में नहीं आता है। इस लोकसभा चुनाव में भी करुणानिधि के खिलाफ़ “सत्ता-विरोधी” लहर चल रही थी, करुणानिधि के परिवारवाद से सभी त्रस्त हो चुके थे (अब तो दिल्ली भी त्रस्त है और शुक्र है करुणानिधि ने सिर्फ़ तीन ही शादियाँ की)। ऐसे में तमिलनाडु में जयललिता को सिर्फ़ नौ सीटें मिलना तमिल जनता पचा नहीं पा रही। हाँ, यदि जयललिता को सिर्फ़ एक या दो सीटें मिलतीं तो इतना आश्चर्य फ़िर भी नहीं होता, लेकिन सीटों का ऐसा बँटवारा और वह भी द्रमुक के पक्ष में, दक्षिण में हर किसी को हैरान कर रहा है।

मेरी पिछली एक पोस्ट http://desicnn.com/wp/2009/05/26/electronic-voting-machines-fraud/ में EVM में गड़बड़ी और धोखाधड़ी सम्बन्धी जो आशंकायें जताई थीं, उसके पीछे एक मूल आशंका यही थी कि आखिर कैसे पता चले कि आपने जिसे वोट दिया है, वह वोट उसी प्रत्याशी के खाते में गया? मशीन से तो सिर्फ़ बीप की आवाज़ आती है, स्क्रीन पर “कमल” या “पंजे” का निशान तो आता नहीं कि हम मान लें कि हाँ, चलो उसी को वोट गया, जिसे हम देना चाहते थे। न ही वोटिंग मशीनों से कोई प्रिण्ट आऊट निकलता है जो यह साबित करे कि आपने फ़लाँ प्रत्याशी को ही वोट दिया। उस पोस्ट में आई टिप्पणियों में कई पाठकों ने ऐसी किसी सम्भावना से दबे स्वरों में इनकार किया, कुछ ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता, कुछ ने खिल्ली भी उड़ाई, कुछ ने माना कि ऐसा हो सकता है जबकि कुछ पाठकों ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। फ़िर सवाल उठा कि यदि जैसा प्रोफ़ेसर साईनाथ कह रहे हैं कि मशीनों में गड़बड़ी की जा सकती है तो आखिर कैसे की जा सकती है, उसका कोई तकनीकी आधार तो होना चाहिये। आईये कुछ नई सम्भावनाओं पर एक नज़र डालें –

1) मशीनों में ट्रोज़न वायरस डालना –

धोखाधड़ी की इस “पद्धति” को सफ़ल मानने वालों की संख्या कम है, अधिकतर का मानना है कि इस प्रक्रिया में अधिकाधिक व्यक्ति शामिल होंगे जिसके कारण इस प्रकार की धोखाधड़ी की पोल खुलने की सम्भावना सर्वाधिक होगी। हालांकि तमिलनाडु के शिवगंगा सीट (चिदम्बरम वाली सीट) का उदाहरण देखें तो अधिक लोगों वाली थ्योरी भी हिट है, जहाँ पहले एक प्रत्याशी को विजयी घोषित कर दिया गया और बाद में अचानक चिदम्बरम को बहुत मामूली अन्तर से विजेता घोषित कर दिया गया। ट्रोज़न वायरस डालने (मशीनें हैक करने) की प्रक्रिया मशीनों के कंट्रोल यूनिटों के निर्माण के समय ही सम्भव है। चुनाव आयोग ने दावा किया है कि कई मशीनें दो-तीन बार भी उपयोग की जा चुकी हैं जबकि कुछ नई हैं, तथा मशीन पर प्रत्याशी का क्रम पहले से पता नहीं होता, इसलिये मशीन निर्माण के समय “ट्रोज़न वायरस” वाली थ्योरी सही नहीं हो सकती। जबकि आयोग के दावे को एकदम “फ़ुलप्रूफ़” नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ट्रोज़न वायरस को सिर्फ़ मशीन का वह बटन पता होना चाहिये जो “फ़ायदा” पहुँचने वाली पार्टी को दिया जाना है। ज़ाहिर है कि यह बटन अलग-अलग चुनाव क्षेत्रों में अलग-अलग जगह पर होगा, लेकिन “हैकर्स” को विभिन्न “बटन कॉम्बिनेशन” से सिर्फ़ यह सुनिश्चित करना होगा कि सॉफ़्टवेयर जान सके कि वह बटन कौन सा है। उदाहरण के तौर पर – माना कि किसी बूथ पर तीसरा बटन कांग्रेस प्रत्याशी का है तब सॉफ़्टवेयर शुरुआती दौर में पड़ने वाले मतों के “कॉम्बिनेशन” से जल्द ही पता लगा लेगा कि वह बटन कौन सा है, और तय किये गये प्रतिशत के मुताबिक वह वोटों को कांग्रेस के खाते में ट्रांसफ़र करता चलेगा।

चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि प्रत्येक मशीन की “चिप” का एक विशिष्ट कोड निर्धारित है और वह हर मशीन के लिये अलग होता है, और यदि वह “चिप” बदलने की कोशिश की जाये तो वह मशीन बन्द हो जायेगी। हालांकि इस बात में भी कोई दम इसलिये नहीं है क्योंकि यदि गड़बड़ी करने की ठान ली जाये, तो उसी नम्बर की, उसी कोड की और उस प्रकार की हूबहू चिप आसानी से तैयार की जा सकती है।

2) दूसरी सम्भावना – बेहद माइक्रो वायरलेस ट्रांसमीटर /रिसीवर को मशीन में ऊपर से फ़िट करवाना

सभी तकनीकी लोग जानते हैं कि “नैनो” तकनीक का कितना विकास हो चुका है। आज के युग में जब प्रत्येक वस्तु छोटी-छोटी होती जा रही है तब एक माइक्रोचिप वाला ट्रांसमीटर/रिसीवर बनाना और उसे मशीनों में फ़िट करना कोई मुश्किल काम नहीं है। EVM की यूनिट में रिमोट कंट्रोल द्वारा संचालित वायरलेस ट्रांसमीटर/रिसीवर चिपकाया जा सकता है। मशीनों में छेड़छाड़ करके मनचाहे परिणाम प्राप्त करने के लिये यह सबसे सुरक्षित और आसान तरीका हो सकता है। जो विद्वान पाठक इस “आईडिया” को सिरे से खारिज करना चाहते हैं, वे पहले बीबीसी पर जारी एक तकनीकी रिपोर्ट पढ़ लें। http://news.bbc.co.uk/2/hi/technology/5186650.stm

HP कम्पनी द्वारा तैयार यह बेहद माइक्रोचिप किसी भी कागज़, किताब, टेबल के कोने या किसी अन्य मशीन पर आसानी से चिपकाई जा सकती है और यह किसी को दिखेगी भी नहीं (इसका मूल साइज़ इस चित्र में देखा जा सकता है)। इस चिप में ही “इन-बिल्ट” मोडेम, एंटीना, माइक्रोप्रोसेसर, और मेमोरी शामिल है। इसके द्वारा 100 पेज का डाटा 10MB की स्पीड से भेजा और पाया जा सकता है। यह रेडियो फ़्रिक्वेंसी, उपग्रह और ब्लूटूथ की मिलीजुली तकनीक से काम करती है, जिससे इसके उपयोग करने वाले को इसके आसपास भी मौजूद रहने की आवश्यकता नहीं है। ऑपरेटर कहीं दूर बैठकर भी इसे मोबाइल या किसी अन्य साधन से इस चिप को क्रियान्वित कर सकता है।

इसलिये इस माइक्रो वायरलेस ट्रांसमीटर / रिसीवर के जरिये EVM की कंट्रोल यूनिट को विश्व के किसी भी भाग में बैठकर संचालित और नियन्त्रित किया जा सकता है।
(चित्र देखने से आपको पता चलेगा कि यह कितनी छोटी माइक्रोचिप होती है)




आगे बढ़ने से पहले कृपया माइक्रोचिप की जानकारी के बारे में यह साइट भी देख लें -
http://www.sciencedaily.com/releases/2009/03/090310084844.htm
जिसमें एक पतली सी फ़िल्म में एंटेना, ट्रांसमीटर, रिसीवर सभी कुछ शामिल है।

इसी प्रकार की एक और जानकारी इधर भी है -
http://embedded-system.net/bluetooth-chip-with-gps-fm-radio-csr-bluecore7.html

HP कम्पनी की साईट पर भी (http://www.hp.com/hpinfo/newsroom/press/2006/060717a.html) विस्तार से इस माइक्रो चिप और उसकी डिजाइन के बारे में बताया गया है - और इस माइक्रोचिप के उपयोग भी गिनाये गये हैं, जैसे अस्पताल में किसी मरीज की कलाई में इसे लगाकर उसका सारा रिकॉर्ड विश्व में कहीं भी लिया जा सकता है, विभिन्न फ़ोटो और डॉक्यूमेंट भी इसके द्वारा पल भर में पाये जा सकते हैं। जब ओसामा बिन लादेन द्वारा किये गये सेटेलाइट फ़ोन की तरंगों को पहचानकर अमेरिका, ठीक उसके छिपने की जगह मिसाइल दाग सकता है, तो आज के उन्नत तकनीकी के ज़माने में इलेक्ट्रानिक उपकरणों के द्वारा कुछ भी किया जा सकता है।

2002 में जारी एक और रिपोर्ट यहाँ पढ़िये http://www.sciencedaily.com/releases/2002/05/020530073010.htm कि किस तरह वायरलेस तकनीक इन माइक्रोचिप में बेहद उपयोगी और प्रभावशाली है।

इस प्रकार की माइक्रोचिप में विभिन्न देशों की सेनाओं ने भी रुचि दर्शाई है और इनमें छोटे माइक्रोफ़ोन और कैमरे भी लगाने की माँग रखी है ताकि इन चिप्स को दुश्मन के इलाके में गिराकर ट्रांसमीटर और रिसीवर के जरिये वहाँ की तस्वीरें और बातें प्राप्त की जा सकें। अमेरिकी सेना से सम्बन्धित एक साइट पर भी इसके बारे में कई नई और आश्चर्यजनक बातें पता चलती हैं (यहाँ देखें http://mae.pennnet.com/articles/article_display.cfm?article_id=294946)

EVM मशीनों में इस तकनीक से कैसे गड़बड़ी की जा सकती है?

मशीनों में गड़बड़ी या छेड़छाड़ के सम्भावित परिदृश्य को समझने के लिये हम मान लेते हैं कि यह ट्रांसमीटर और रिसीवर युक्त माइक्रोचिप वोटिंग मशीनों के निर्माण के समय अथवा बाद में फ़िट कर दी गई है।

क्या इस प्रकार की कोई “चिप” पकड़ में आ सकती है?

इस प्रकार की वायरलेस माइक्रोचिप के दिखाई देने या पकड़ में आने की सम्भावना तब तक नहीं है, जब तक यह सिग्नल प्रसारित न करे (अर्थात डाटा का ट्रांसफ़र न करे)। माइक्रोचिप से डाटा तभी आयेगा या जायेगा जब उसे एक विशिष्ट फ़्रीक्वेंसी पर कोई सिग्नल न दिया जाये, तब तक यह ट्रांसमीटर सुप्त-अवस्था में ही रहेगा।

क्या इन माइक्रोचिप की संरचना को आसानी से पहचाना जा सकता है?
नहीं, क्योंकि अव्वल तो यह इतनी माइक्रो है कि आम आदमी को इसे देखना सम्भव नहीं है और विशेषज्ञ भी इसकी पूरी जाँच किये बिना दावे से नहीं कह सकते कि इसमें क्या-क्या फ़िट किया गया है।

अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर –

EVM मशीनें उनके निर्धारित चुनाव क्षेत्रों में भेजी जा चुकी हैं और एक “उच्च स्तरीय हैकरों की टीम” सिर्फ़ यह सुनिश्चित करती है कि माइक्रोचिप लगी हुई मशीनें उन क्षेत्रों में पहुँचें जहाँ वे परिणामों में गड़बड़ी करना चाहते हैं। इसके बाद चुनाव हुए, मशीनों में वोट डल गये और मशीनों को कड़ी सुरक्षा के बीच कलेक्टोरेट में स्ट्रांग रूम में रख दिया गया। अब यहाँ से “तकनीकी हैकरों” का असली काम शुरु होता है। हैकरों की यह टीम उच्च स्तरीय तकनीकी उपकरणों की मदद से सैटेलाइट के ज़रिये उन मशीनों से डाटा प्राप्त करती है, डाटा को कम्प्यूटर पर लिया जाता है, और उसमें चालाकी से ऐसा हेरफ़ेर किया जाता है कि एकदम से किसी को शक न हो, अर्थात ऐसा भी नहीं कि जिस प्रत्याशी को जिताना है सारे वोट उसे ही दिलवा दिये जायें। डाटा में हेरफ़ेर के पश्चात उस डाटा को वापस इन्हीं माइक्रोचिप ट्रांसमीटर के ज़रिये मशीनों में अपलोड कर दिया जाये। वोटिंग होने और परिणाम आने के बीच काफ़ी समय होता है इतने समय में तो सारी मशीनों का डाटा बाकायदा Excel शीट पर लेकर उसमें मनचाहे फ़ेरबदल गुणाभाग करके उसे वापस अपलोड किया जा सकता है।

इस प्रकार की गड़बड़ी या धोखाधड़ी के फ़िलहाल को सबूत नहीं मिले हैं, इसलिये दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि ऐसा ही हुआ होगा, लेकिन आधुनिक तकनीकी युग में कम्प्यूटर के जानकार और विश्वस्तरीय उपकरणों से लैस हैकर कुछ भी करने में सक्षम हैं, इस बात को सभी मानते हैं। यह भी सवाल उठाये गये थे कि यदि कांग्रेस पार्टी ने ऐसी गड़बड़ी की होती तो क्यों नहीं 300 सीटों पर धोखाधड़ी की ताकि पूर्ण बहुमत आ जाता? इसका उत्तर यही है कि धांधली करने की भी एक सीमा होती है, जब महंगाई अपने चरम पर हो, आतंकवाद का मुद्दा सामने हो तब कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिल जाये तो सभी को शक हो जायेगा, इसीलिये पहले ही कहा कि “चतुराईपूर्ण” गड़बड़ी की गई होगी कि शक न हो सके। कांग्रेस को गड़बड़ी करने की आवश्यकता सिर्फ़ 150 सीटों पर ही थी, क्योंकि बाकी बची 390 सीटों में से क्या कांग्रेस 50 सीटें भी न जीतती? कुल मिलाकर हो गईं 200, इतना काफ़ी है सरकार बनाने के लिये।

अब क्या किया जा सकता है?

वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी और धांधली की इस प्रकार की अफ़वाहों के बाद सवाल उठने लगे हैं कि आखिर राजनैतिक पार्टियाँ इस बात पर चुप्पी क्यों साधे हुए हैं? इसका जवाब यह हो सकता है, कि राजनैतिक पार्टियाँ इस मुद्दे पर बोलने से इसलिये बच रही हैं क्योंकि अभी तो यह विश्वसनीय बात नहीं है, कौन इस मुद्दे पर बोले और अपनी भद पिटवाये, क्योंकि यह इतना तकनीकी मुद्दा है कि आम जनता या मीडिया का एक बड़ा हिस्सा पार्टियों के एक बयान पर उसे पहले तो सिरे से खारिज कर देगा, और भाजपा जैसी पार्टी यदि इस बात को उठाये तो उसका सतत विरोधी मीडिया “खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे” की कहावत से नवाज़ेगा। ऐसे में कोई भी इस मुद्दे पर बोलना नहीं चाहता। जानकारी के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में भी यह मामला (वोटिंग मशीनों की जाँच और गड़बड़ी की सम्भावना का पता लगाने सम्बन्धी) चल रहा है, इसलिये फ़िलहाल सभी “रुको और देखो” की नीति पर चल रहे हैं।

राजनैतिक पार्टियाँ फ़िलहाल इतना कर सकती हैं कि जिन-जिन क्षेत्रों में उनकी अप्रत्याशित हार हुई है, वहाँ के गुपचुप तरीके से लेकिन चुनाव आयोग से अधिकृत डाटा लेकर, पिछले वोटिंग पैटर्न को देखकर, प्रत्येक बूथ और वार्ड के अनुसार वोटिंग मशीनों में दर्ज वोटों का पैटर्न देखें कि क्या कहीं कोई बड़ी गड़बड़ी की आशंका दिखाई देती है? फ़िर अगले चुनाव में पुनः वोटिंग के पुराने तरीके अर्थात “पेपर मतपत्र” पर वोटिंग की मांग की जाये। पेपर मतपत्रों में भी गड़बड़ी और लूटपाट की आशंका तो होती ही है, लेकिन बड़े पैमाने पर गुमनाम तरीके से तकनीकी धांधली तो नहीं की जा सकती। क्योंकि यदि ऐसा नहीं किया गया तो हो सकता है कि इधर पार्टियाँ करोड़ों रुपये खर्च करती रहें और उधर दिल्ली अथवा न्यूयॉर्क के किसी सात सितारा होटल में बैठी हैकरों की कोई टीम “मैच फ़िक्सिंग” करके अपनी पसन्द की सरकार बनवा दे।

परमाणु करार को लागू करवाने और उसके द्वारा अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारने के सपने देखने वाले अमेरिका, फ़्रांस और ब्रिटेन का भारत के इन चुनावों में “बहुत कुछ दाँव पर” लगा था। कल्पना कीजिये कि यदि इस सरकार में भी वामपंथी पुनः निर्णायक स्थिति में आ जाते अथवा भाजपा परमाणु करार की पुनर्समीक्षा करवाती तो इन देशों द्वारा अरबों डालर की परमाणु भट्टियों के सौदों का क्या होता। है तो यह दूर की कौड़ी, लेकिन जब बड़े पैमाने पर हित जुड़े हुए हों तब कुछ भी हो सकता है। जो लोग इसे मात्र एक कपोल कल्पना या “नॉनसेंस” मान रहे हों, वे भी यह अवश्य स्वीकार करेंगे कि आज के तकनीकी युग में कुछ भी सम्भव है… जब ओसामा के एक फ़ोन से उसके छिपने के ठिकाने का पता लगाया जा सकता है तो इन मामूली सी वोटिंग मशीनों को सेटेलाइट के जरिये क्यों नहीं कंट्रोल किया जा सकता?

और वह पहला मूल सवाल तो अपनी जगह पर कायम है ही, कि “आपके पास क्या सबूत है कि आपने जिस बटन पर वोट दिया वह वोट उसी प्रत्याशी के खाते में गया”? कागज़ी मतपत्र पर तो आपको पूरा भरोसा होता है कि आपने सही जगह ठप्पा लगाया है।

[नोट – मैं कोई तकनीकी विशेषज्ञ नहीं हूँ, यह पोस्ट विभिन्न साइटों (खासकर तमिल व अंग्रेजी ब्लॉग्स) पर खोजबीन करके लिखी गई है, सभी पहलुओं को सामने लाना भी ज़रूरी था, इसलिये पोस्ट लम्बी हो गई है, लेकिन उम्मीद है कि बोर नहीं हुए होंगे]

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(भाग-1 से जारी…)
जैसा कि पहले कहा गया है, इस इंटरव्यू में ज़ाहिर किये गये विचारों को पढ़कर कभी आप हँसेंगे, कभी आप माथा पीटेंगे, कभी गुस्सा होंगे, लेकिन कुल मिलाकर है बड़ा ही मजेदार इंटरव्यू। प्रस्तुत हैं जमात-ए-इस्लामी (पाकिस्तान) के मौलाना साहब के इंटरव्यू के हिन्दी अनुवाद का दूसरा भाग… जिसमें उन्होंने भारत के मुसलमानों के बारे में भी आश्चर्यजनक बयान दिये हैं…

प्रश्न (पत्रकार ज़लील आमिर) – क्या आपको नहीं लगता कि यदि कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा बन गया तो भारत में व्यापक पैमाने पर हिन्दू-मुस्लिम दंगे होंगे और उसमें काफ़ी संख्या में हमारे मुस्लिम भाई भी मारे जायेंगे?

उत्तर (मौलाना नबीउल्लाह) – हाँ, हो सकता है, लेकिन हमारी विचारधारा सिर्फ़ कुर-आन और हदीस की व्याख्याओं पर आधारित है। पैगम्बर मुहम्मद ने कहा है कि जो भी मुस्लिम, किसी अन्य गैर-मुस्लिम से मधुर सम्बन्ध रखता है वह सच्चा मुसलमान नहीं हो सकता। इसमें हिन्दू, ईसाई और यहूदी सभी शामिल हैं। पैगम्बर मोहम्मद ने यह भी कहा है कि यदि कोई मुस्लिम शासक खराब है तब भी मुस्लिमों को वह देश छोड़कर गैर-मुस्लिम देश में नहीं जाना चाहिये। इस बारे में हदीस और कुर-आन में स्पष्ट निर्देश हैं। इसलिये जो मुसलमान विभाजन के दौरान भारत से पाकिस्तान की तरफ़ नहीं आये, वे भी हमारी नज़र में “हिन्दू” ही हैं। वे भले ही सोचते रहें कि वे मुस्लिम हैं लेकिन अल्लाह के सामने ऐसा नहीं होगा। उदाहरण के तौर पर जैसे कि “अहमदिया” हैं, वे अपने आपको मुस्लिम मानते हैं लेकिन असल में वे हैं नहीं, इसलिये जब तक भारत के मुस्लमान किसी मुस्लिम देश में नहीं चले जाते तब तक वे सच्चे मुस्लिम नहीं हो सकते। अपने भारत दौरे के समय मैंने पाया कि भारत के हिन्दू किसान फ़सल लेने पर अपनी सारी उपज पूजा करके पहले भगवान को समर्पित कर देते हैं, इसलिये इस प्रकार की उपज मुसलमानों के लिये “हराम” है। क्योंकि भारत के सभी “तथाकथित” मुसलमान ऐसी फ़सल और अनाज खाते हैं जो कि अल्लाह से पहले किसी और भगवान को पहले ही समर्पित की जा चुकी है, कुर-आन में इसकी सख्त बन्दिश है और इसीलिये वे लोग सच्चे मुस्लमान नहीं हैं। पैगम्बर मोहम्मद का आदेश है कि मुसलमान उसी देश में रहें जहाँ वे बहुसंख्यक हैं, जो मुसलमान इस्लामिक देश छोड़कर दूसरे देश में बसता है वह काफ़िर माना जाये, सिर्फ़ उसी को मुसलमान माना जायेगा जो अल्लाह द्वारा शासित देश में आने को उत्सुक हो, गैर-इस्लामी देश में सदा के लिये बस चुका व्यक्ति मुसलमान नहीं है। ऐसे में यदि भारत के किसी दंगे में कोई मुसलमान मारा भी जाता है तो हमें उसकी परवाह क्यों होनी चाहिये? लेकिन फ़िलहाल रणनीतिक तौर पर हम भारत के मुसलमानों से मधुर सम्बन्ध बनाये हुए हैं। पाकिस्तान की बेहतरी के लिये काम करने वाले ही असली मुसलमान हैं। कश्मीर के मुसलमानों को मैं असली मुसलमान मान सकता हूँ, क्योंकि वे “हिन्दू शासन”(?) से मुक्ति हेतु संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन भारत के बाकी मुसलमानों ने भारत-पाक विभाजन स्वीकार कर लिया है और इसलिये वे मुस्लिम नहीं रहे।

जमात-ए-इस्लामी पार्टी “गुलाम प्रथा” को फ़िर शुरु करेगी…

सभी अरब देशों में “गुलाम” प्रथा चलती है, पैगम्बर मोहम्मद ने भी कहा है कि गुलामों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उन्हें समय-समय पर आज़ाद करते रहो। जमात जब पाकिस्तान में सत्ता में आयेगी तो “गुलाम प्रथा” फ़िर शुरु की जायेगी, सभी पकड़े गये हिन्दू कैदियों को गुलाम बनाया जायेगा। लगभग सभी अरब देशों में यह प्रथा धड़ल्ले से जारी है, हालांकि अरब देशों में भारी संख्या में हिन्दू काम कर रहे हैं, लेकिन हमारा इरादा अरबों की पवित्र भूमि को पुनः पवित्र बनाना है और यह काम हिन्दुओं को वहाँ से निकालकर या गुलाम बनाकर ही किया जा सकता है। फ़िलहाल वहाँ के हिन्दुओं ने अरबों को मानसिक रूप से भ्रष्ट कर दिया है।

हिन्दुओं के मन्दिर, मुस्लिम भूमि को अपवित्र करते हैं…

अरब देशों और कतर आदि में मैंने देखा कि वहाँ हिन्दुओं के कई मन्दिर हैं, अरब के बादशाह ने मन्दिर बनाने की अनुमति देकर ही गलती की है, ऊपर से सुल्तान के परिवार के सदस्य मन्दिर का उद्घाटन करने भी गये। काज़ी अहमद इस बात से भी काफ़ी नाराज़ हैं कि कतर की रॉयल परिवार के कुछ सदस्य भगवान “अय्यप्पा” में भी आस्था रखते हैं। इससे जमात प्रमुख बेहद खफ़ा हैं और उन्होंने इन शैतानी शक्तियों से लड़ने का संकल्प लिया है।

धर्म-परिवर्तन की सजा मौत है…
मौलाना साहब फ़रमाते हैं कि मुसलमानों के लिये धर्म परिवर्तन या अन्य धर्मों की ओर झुकाव की सजा सिर्फ़ मौत है। पाकिस्तान में अभी शरीयत का कानून लागू नहीं है, इसलिये यहाँ संविधान के तहत धर्म परिवर्तन किया जा सकता है, लेकिन जब जमात सत्ता में आयेगी तब इसके लिये मौत की सजा मुकर्रर की जायेगी।

विश्व का सारा ज्ञान कुरान और हदीस में समाया हुआ है…
मौलाना साहब आगे फ़रमाते हैं कि विश्व का समूचा ज्ञान कुर-आन और हदीस में समाया हुआ है, कुर-आन से अधिक जानने पर एटम बम और टीवी जैसी विनाशकारी समस्याएं पैदा होती हैं। संगीत, टीवी, फ़ोटोग्राफ़ी आदि शैतानी और हराम वस्तुएं हैं। पहले के ज़माने में संगीत सिर्फ़ गायन तक सीमित था, लेकिन नई तकनीक ने इसे घर-घर में पहुँचा दिया है, हमें इस शैतानी चीज़ से नई पीढ़ी का बचाव करना है।

साइंस और टेक्नोलॉजी मानव सभ्यता के लिये बुरी बातें हैं…
मौलाना के महान विचार यहीं नहीं थमते, वे कहते हैं… “मैं भी एक सिविल इंजीनियर हूँ, और मेरा मानना है कि साइंस और टेक्नोलॉजी सभ्यता के विकास के लिये बहुत बुरी बातें हैं। जितना ज्यादा आप इसका ज्ञान प्राप्त करते जाते हैं, आप सर्वकालिक महान पुस्तक कुर-आन पर सवाल उठाने लगते हैं। हदीस में स्पष्ट कहा गया है कि “धरती गोल नहीं चपटी है… लेकिन वैज्ञानिक हमें बताते हैं कि धरती गोल है, लेकिन कुप्रचार के जरिये लोगों के मन में कुर-आन के प्रति संशय पैदा कर दिये गये हैं। हम कुर-आन के वैज्ञानिक पहलुओं को जनता के सामने लायेंगे और सिद्ध करेंगे कि कुर-आन ही पूरी तरह वैज्ञानिक है और पूर्ण सत्य है।

प्रश्न – आप साइंस और टेक्नोलॉजी को बुरा कह रहे हैं, फ़ोटोग्राफ़ी को हराम बता रहे हैं, लेकिन पश्चिमी देशों से हथियार आयात करते हैं और पासपोर्ट के लिये फ़ोटो भी तो खिंचवाते हैं?

उत्तर – आपका कहना सही है, लेकिन यह सिर्फ़ रणनीति के तौर पर है। अल्लाह ने हमे पेट्रोल की ताकत दी है, जिससे पश्चिमी देशों की कारें चलती हैं, इसके बदले में हम उनसे हथियार लेते हैं और यही हथियार आगे चलकर उन्हें खत्म करने में काम आयेंगे।

प्रश्न – आजकल पाकिस्तान में भी आरक्षण को लेकर झगड़े बढ़ रहे हैं, इस सम्बन्ध जमात की क्या नीति होगी।

उत्तर – यह समस्या असल में भाषा की समस्या है, फ़िलहाल उर्दू बोलने वाले मुसलमान और सिन्धी बोलने वाले मुसलमानों (मोहाजिरों) के बीच झगड़े अधिक हैं। हम सत्ता में आये तो सभी क्षेत्रीय भाषाओं (पश्तो, सिंधी, बलूची, उर्दू, पंजाबी आदि) को बन्द करके सिर्फ़ अरबी को राजकाज की भाषा बनायेंगे। यही एकमात्र पवित्र भाषा है। इसके द्वारा सभी जनता कुर-आन और हदीस की व्याख्या को ठीक से समझ सकेगी, और धर्म आधारित आरक्षण के झगड़े बन्द होंगे।

प्रश्न- पाकिस्तान के कुछ सेकुलर पत्रकार जमात का कड़ा विरोध करते हैं, डॉन और कराची से निकलने वाले कई अखबार आपके विरोधी हैं। इस बारे में आपके क्या विचार हैं?
उत्तर – जब पाकिस्तान में शरीयत लागू होगी तब इनमें से एक भी पत्रकार नहीं दिखाई देगा, वे कोर्ट भी नहीं जा पायेंगे। ये सेकुलर पत्रकार हमारे वक्तव्यों को तोड़-मरोड़कर जनता के सामने पेश करते हैं और हमारी छवि खराब करते हैं। ये लोग पाकिस्तान का इतिहास अंग्रेजों के जमाने से लिखते हैं और शुरु करते हैं, जबकि पाकिस्तान का इतिहास विभाजन और आज़ादी के बाद ही शुरु होता है। सेकुलर पत्रकार “काफ़िर” हैं, वे मुस्लिम हैं ही नहीं। वे हमारे पास आयें और कुर-आन और हदीस की व्याख्या के बारे में पूछें, हम उनकी हरेक शंका का समाधान कुर-आन की रौशनी में करने को तैयार हैं। वे यह सिद्ध करें कि जो हमने कहा है कुर-आन के अनुसार वह गलत है, तो हम मान लेंगे, लेकिन वे ऐसा नहीं कर सकते। ये लोग कुर-आन और हदीस पर कोई बहस नहीं करना चाहते। हम साबित कर देंगे कि कुर-आन के हिसाब से ये लोग गैर-मुस्लिम हैं, ये लोग “कादियानियों” की तरह हैं जो कहते हैं कि “जेहाद” कोई अनिवार्य बात नहीं है… यह बकवास है।
प्रश्न – आपका अमूल्य समय देने के लिये धन्यवाद…
उत्तर – अल्लाह का रहमोकरम आपके साथ रहे…

इस इंटरव्यू के मूल अंग्रेजी भाग को यहाँ देखा जा सकता है…
http://www.islam-watch.org/JihadiUmmah/What-Islam-Wants-Nabiullah-Khan.htm


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मराठी भाषा में नाटकों, कला और संस्कृति का एक विस्तृत और समृद्ध इतिहास रहा है। मराठी रंगमंच ने देश के कला जगत को गायन, वादन, नाटक, संगीत आदि क्षेत्रों में कई महान कलाकार दिये हैं। इन्हीं में से एक हैं प्रख्यात नाटककार विजय धोण्डोपन्त तेंडुलकर। कई प्रसिद्ध और विवादास्पद नाटकों के लेखक श्री तेंडुलकर की हाल ही में 19 मई को पहली पुण्यतिथि थी। तेंडुलकर के कई नाटक अपने विषयवस्तु को लेकर सामाजिक रूप से विवादित रहे, लेकिन कभी भी उन्होंने अपने लेखन से समझौता नहीं किया।


संयोग देखिये कि पाकिस्तान के अखबारों को पढ़ते समय अचानक यह खबर मिली कि विजय तेंडुलकर के प्रसिद्ध नाटक “शांतता…कोर्ट चालू आहे…” (खामोश… अदालत जारी है) का उर्दू भाषा में सफ़ल मंचन कराची में किया जा रहा है। इस खबर को “डॉन” अखबार की इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है…

http://www.dawn.com/wps/wcm/connect/dawn-content-library/dawn/news/entertainment/05-silence-the-court-is-in-session

डॉन अखबार मे तेंडुलकर के इस नाटक और उस नाटक की उर्दू प्रस्तुति की खूब तारीफ़ की गई है। यह खबर भारत के कलाप्रेमियों और आम जनता के लिये एक सुखद आश्चर्यजनक धक्का ही है। “धक्का” इसलिये, कि विश्वास नहीं होता कि पाकिस्तान की छवि और वहाँ के वर्तमान हालातों को देखते हुए वहाँ अभी भी “नाटक परम्परा” न सिर्फ़ जीवित है, बल्कि सफ़लतापूर्वक उसका मंचन भी किया जा रहा है। अगला धक्का यह कि, खबर के अनुसार नाटक का टिकट 500/- रुपये रखा गया है (मराठी में तो हम आसानी से कल्पना कर सकते हैं, लेकिन हिन्दी नाट्य जगत 500 रुपये के टिकट लेकर आने वाले दर्शक खींच सकेगा, ऐसा मुश्किल लगता है)। 500 रुपये के टिकट के बाद, एक तीसरा धक्का यह कि भारत के किसी कलाकार का लिखा हुआ और वह भी “कुमारी माता” और गर्भपात जैसे विवादास्पद मुद्दों पर बेलाग बात करने वाला नाटक पाकिस्तान में खेला जा रहा है, है न आश्चर्य की बात… लेकिन यही विजय तेंडुलकर की सफ़लता है। उनके लिखे हुए नाटक और फ़िल्मों को किसी भी भाषा में अनुवादित किया जाये उनका “असर” उतना ही तीव्र होता है, जितना मराठी में हुआ है।

तेंडुलकर के इस नाटक “शांतता कोर्ट चालू आहे…” का हिन्दी सहित अन्य भाषाओं में भी मंचन हो चुका है। संक्षिप्त में इस नाटक की कहानी कुछ इस प्रकार है कि – एक थियेटर ग्रुप जो कि गाँव-गाँव जाकर अपने नाटक दिखाता है, उसे अचानक एक गाँव में किसी कारणवश अधिक रुकना पड़ जाता है। थियेटर ग्रुप के सदस्य टाइमपास के लिये एक नकली अदालत का दृश्य रचते हैं और आपस में मुकदमा चलाते हैं। नाटक के भीतर एक नाटक की शुरुआत तो हल्के-फ़ुल्के माहौल में होती है, लेकिन जल्दी ही ग्रुप के सदस्य अपने असली “रंग” में आ जाते हैं। पुरुष मानसिकता और हिंसा के घालमेल के दर्शन होने लगते हैं। थियेटर ग्रुप की एक महिला सदस्य “सुश्री बेनारे” को लेकर पुरुष सदस्य उस पर विभिन्न आरोप लगाते हैं, क्योंकि वे जानते थे कि मिस बेनारे यौन उत्पीड़ित रही है और वह एक बार गर्भपात भी करवा चुकी है। टाइम पास के लिये शुरु की गई नकली अदालत में सभी पात्र, कब अपनी आपसी रंजिश और पूर्वाग्रहों को उजागर करने लगते हैं पता ही नहीं चलता, अन्त में मिस बेनारे टूट जाती है, वह स्वीकार करती है कि हाँ वह भी एक “कुमारी माता” है, लेकिन सभी पुरुष पात्रों की हिंसात्मक और नारी विरोधी मानसिकता को उजागर करके उनकी “असली औकात” दिखाने के बाद…”।

विजय तेंडुलकर ने मात्र 6 वर्ष की उम्र में पहली कहानी लिखी और 11 वर्ष की आयु में पहला नाटक लिखा, उसमें अभिनय किया और उसका निर्देशन भी किया। तेंडुलकर का झुकाव वामपंथी विचारधारा की ओर रहा है, लेकिन फ़िर भी भारत की सांस्कृतिक परम्परा और भारत की मिट्टी के प्रति उनका गहरा लगाव था। गुजरात दंगों के बाद उनका वह वक्तव्य बेहद विवादित हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था कि “यदि मेरे पास पिस्तौल होती तो मैं नरेन्द्र मोदी को गोली से उड़ा देता…” हालांकि बाद में उन्होंने सफ़ाई देते हुए कहा था कि गुस्सा किसी भी बात का हल नहीं निकाल सकता और वह वक्तव्य गुस्से में दिया गया था। विजय तेंडुलकर को महाराष्ट्र तथा भारत सरकार की ओर से कई पुरस्कार और सम्मान मिले, जिसमें प्रमुख हैं 1999 में “महाराष्ट्र गौरव”, 1970 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1984 में पद्मभूषण। उनकी लिखी कई फ़िल्मों की पटकथाओं पर कलात्मक फ़िल्में बनीं, जैसे मंथन, निशांत, आक्रोश, अर्धसत्य आदि।

पाकिस्तान में चल रहे नाटक के बारे में एक बात का दुःख जरूर है कि उस नाटक से पैसा बनाने वालों ने तेंडुलकर परिवार को कभी रॉयल्टी का एक रुपया भी ईमानदारी से नहीं दिया है। तेंडुलकर के अवसान के बाद उनकी बौद्धिक सम्पत्ति की देखभाल कर रहीं उनकी पुत्री तनुजा मोहिते ने बताया कि “जब तक बाबा (यानी पिताजी) जीवित थे तब तक तो कई जगहों से ईमानदारी, या शर्म के मारे ही सही रॉयल्टी आ जाती थी, लेकिन उनके निधन के पश्चात इसमें ढील आती जा रही है। श्री तेंडुलकर ने तय किया था कि उनके प्रत्येक प्रमुख नाटक के एक शो पर 1000 रुपये, एकांकी नाटक के प्रति शो 500 रुपये, बाल नाट्य के 300 रुपये तथा लेखों के अनुवाद हेतु प्रति लेख 1500 रुपये रॉयल्टी वे लेंगे। नाटक “शांतता…” के पाकिस्तान में कई सफ़ल शो 500 रुपये प्रति व्यक्ति के टिकट की दर से आयोजित हो चुके हैं, इस नाटक का अनुवाद भी मुम्बई में रहने वाले एक लेखक इंतिज़ार हुसैन ने किया है, लेकिन रॉयल्टी के नाम पर तेंडुलकर परिवार को अब तक कुछ नहीं मिला है। इस सम्बन्ध में सुश्री मोहिते ने बताया कि बौद्धिक सम्पदा की चोरी रोकने के लिये उन्होंने कई कम्युनिटी वेबसाईटों और गूगल अलर्ट पर भी सावधान किया है कि यदि इस प्रकार के नाटक या तेंडुलकर के कोई लेख आदि प्रकाशित होते हैं तो उन्हें 9820362103 पर सम्पर्क करके बताने का कष्ट करें, ताकि रॉयल्टी के बारे में निश्चित स्थिति पता चल सके। उन्होंने आगे बताया कि महाराष्ट्र के छोटे शहरों में कई छोटी संस्थायें हैं जो “बाबा” के नाटकों का मंचन करती हैं और अधिकतर बार ईमानदारी से रॉयल्टी का पैसा देती हैं, या पूर्व-अनुमति लेकर मुफ़्त में नाटक करती हैं… लेकिन बड़ी संस्थायें या जाने-माने नाट्य ग्रुप रॉयल्टी देने में आनाकानी करते हैं।

अपनी पुत्री प्रिया तेंडुलकर (“रजनी” फ़ेम) के निधन (सितम्बर 2002) के पश्चात विजय तेंडुलकर भीतर से टूट गये थे और 19 मई 2008 को पुणे में उनका देहान्त हुआ। इस महान नाटककार को विनम्र श्रद्धांजलि…
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नोट – मेरे कुछ नये पाठकों (जिन्होंने मेरे पुराने लेख नहीं पढ़े) ने ई-मेल पर कहा कि क्या मैं सिर्फ़ कांग्रेस विरोध, राजनीति और “शर्मनिरपेक्षता” आदि पर ही लेख लिखता हूँ? क्योंकि गत 6 महीने में मैंने अधिकतर लेख “राजनीति, समाज और हिन्दुत्व को हो रहे नुकसान पर ही लिखे। इसलिये एक वाम विचारधारा के, धर्म आधारित राजनीति के प्रखर विरोधी, समाज को हिलाकर रख देने वाले कालजयी नाटकों के रचयिता तेंडुलकर, पर यह लेख उनकी शिकायत को दूर करने के लिये है…

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भाजपा को पानी पी-पीकर कोसने वालों में वामपंथी सबसे आगे रहते हैं, ये अलग बात है कि भाजपा को गरियाते-गरियाते कब वे खुद ही पूरे भारत में अप्रासंगिक हो गये उन्हें पता ही नहीं चला। लेकिन इस लेख में प्रस्तुत आँकड़े सिद्ध करते हैं कि यदि पश्चिम बंगाल में भाजपा एक “ताकत” के रूप में न उभरती तो वामपंथियों को मुँह छिपाना मुश्किल पड़ जाता। सिर्फ़ और सिर्फ़ भाजपा के कारण पश्चिम बंगाल में कांग्रेस-तृणमूल गठबन्धन को कम से कम 7 सीटों का नुकसान हुआ, जो कि वामपंथी खाते में गई, वरना लाल बन्दरों का तो पूरा “सूपड़ा” ही साफ़ हो जाता। ज़रा एक नज़र डालिये इन पर–

1) बर्दवान सीट पर सीपीएम के उम्मीदवार की जीत का अन्तर है 59,419, जबकि भाजपा उम्मीदवार को मिले 71,632 वोट, सोचिये यदि वहाँ भाजपा का उम्मीदवार ही न होता तो?

2) जलपाईगुड़ी सीट पर भाजपा के उम्मीदवार सुखबिलदास बर्मा ने 94,000 वोट लेकर कांग्रेस को नहीं जीतने दिया, यहाँ से सीपीएम का उम्मीदवार 90,000 वोट से जीता।

3) अलीपुरद्वार में आरएसपी के मनोहर टिर्की जीते 1,12,822 वोट से जबकि भाजपा को आश्चर्यजनक रूप से 1,99,843 वोट मिले और कांग्रेस हार गई।

4) बेलूरघाट सीट पर आरएसपी का उम्मीदवार बड़ी मुश्किल से 5,105 वोट से जीत पाया, जबकि भाजपा उम्मीदवार को मिले 60,000 वोट।

5) फ़ॉरवर्ड ब्लॉक का उम्मीदवार कूच बिहार सीट से 33,632 वोट से जीता, यहाँ भाजपा की झोली में 64,917 वोट आये।

6) मिदनापुर में भाकपा के प्रबोध पाण्डा, भाजपा को मिले 52,000 वोटों की बदौलत हारने से बच गये।

माकपा के स्थानीय नेता भी मानते हैं कि भाजपा के कारण हम भारी शर्मिन्दगी भरी हार से बच गये वरना कांग्रेस-ममता को लगभग 31 सीटें मिलतीं। लगभग यही आरोप ममता बैनर्जी ने भी लगाया और कहा कि भाजपा के उम्मीदवार, वामपंथी खेमे को मदद पहुँचाने के लिये खड़े हैं (हा हा हा हा)।

इस सारे घटनाक्रम से स्पष्ट होता है कि जो बात भाजपा के मामूली कार्यकर्ता को भी मालूम है उससे पार्टी का शीर्ष नेतृत्व कैसे अनजान है, कि भाजपा को अब अकेले चुनाव लड़ना चाहिये। NDA वगैरह बकवास है, यह भाजपा की बढ़त तो रोक ही रहा है, साथ ही साथ उसे वैचारिक रूप से भ्रष्ट भी कर रहा है। “सेकुलरों” की बातों और सेकुलर मीडिया के प्रभाव में आकर भाजपा ने अपनी छवि बदलने का जो प्रयास किया है, अब सिद्ध हो चुका है कि वह प्रयास पूरी तरह से असफ़ल रहा है। सेकुलर बनने के चक्कर में भाजपा “धोबी का कुत्ता” बन गई है। आँकड़ों से स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा अकेले चुनाव लड़कर राज्य स्तर पर “तीसरी ताकत” के रूप में उभरी है, ऐसा ही समूचे देश में आसानी से किया जा सकता है। जब किसी “मेंढक” से गठबन्धन ही नहीं होगा, तो उसके फ़ुदकने का कोई असर भी नहीं होगा, तब भाजपा अपनी वैचारिक बात जनता तक ठोस रूप में पहुँचाने में कामयाब होगी। इस रणनीति का फ़ायदा दूरगामी होगा, यह करने से लगभग प्रत्येक गैर-भाजपा शासित राज्य में भाजपा दूसरी या तीसरी शक्ति के रूप में “अकेले” उभरेगी। ऐसे में स्थानीय पार्टियाँ बगैर शर्त के और स्वाभाविक रूप से भाजपा के पाले में आयेंगी क्योंकि देर-सवेर कांग्रेस या तो उन्हें “खाने” वाली है या अपने दरवाजे पर अपमानित करके खड़ा करेगी, तब ऐसी स्थानीय पार्टियों से “लोकसभा में हम और विधानसभा में तुम” की तर्ज पर समझौता किया जा सकता है, जैसा कि पश्चिम बंगाल में दार्जीलिंग सीट पर किया गया और जसवन्त सिंह तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद विजेता बने, कृष्णनगर में भी भाजपा प्रत्याशी को 1,75,283 वोट मिले। भाजपा के प्रदेश महासचिव राहुल सिन्हा कहते हैं कि “यह सफ़लता बंगाल में हमारे संगठनात्मक ढाँचे की ताकत के कारण मिली है…”। क्षेत्रीय पार्टियाँ हों या वामपंथी, ये लोग जब तक भाजपा को अपना प्रतिद्वन्द्वी नम्बर एक मानते रहेंगे, तब तक कांग्रेस मजे करती रहेगी, क्योंकि उसने बड़ी चतुराई से अपनी छवि “मध्यमार्गी” की बना रखी है और “धर्मनिरपेक्षता” नाम का ऐसा सिक्का चला दिया है कि बाकी सभी पार्टियों को मजबूरन कांग्रेस का साथ देना ही पड़ता है।

पश्चिम बंगाल में भाजपा सभी 42 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ी, एक सीट (दार्जीलिंग) जीती, लेकिन कम से कम दस सीटों पर उसने कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया। एक चुनाव हारने पर भाजपा को दिन-रात सलाह देने में लगे ऐरे-गैरे-नत्थू-खैरे भी “लाल-गढ़” में भाजपा प्रत्याशियों को मिले वोटों को देखकर हैरान होंगे, लेकिन इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है, जिस तरह उत्तरप्रदेश में कांग्रेस अकेले लड़ी और जीती, भाजपा भी अकेले ही लड़े। इस बार नहीं तो अगले चुनाव में, अगले नहीं तो उसके अगले चुनाव में, जीत निश्चित मिलेगी। आज लाखों-करोड़ों लोग कांग्रेस-वामपंथियों की नीतियों से त्रस्त हो चुके हैं, उनकी भावनाओं को आवाज़ देने वाली कोई पार्टी उन्हें दिखाई नहीं दे रही, इसलिये उन्होंने कांग्रेस को ही चुन लिया, जब उनके पास एक सशक्त विकल्प मौजूद रहेगा तब वे निश्चित ही उसे चुनेंगे। लेकिन लौहपुरुष का विशेषण और कंधार जैसा शर्मनाक समर्पण तथा राम मन्दिर आंदोलन और जिन्ना की मज़ार पर जाने जैसा वैचारिक अन्तर्द्वन्द्व अब नहीं चलेगा। पश्चिम बंगाल जैसे राजनैतिक रूप से संवेदनशील, लगभग 23 सीटों पर 40% से अधिक मुस्लिम वोटरों तथा वामपंथियों द्वारा इतने वर्षों से शासित राज्य में भाजपाई उम्मीदवारों को कई जगह एक लाख से अधिक वोट मिल रहे हैं, इसका क्या अर्थ है यह मेरे जैसे छोटे से व्यक्ति को समझाने की जरूरत नहीं है।

रही बात वामपंथियों की तो उन्हें भाजपा का शुक्र मनाना चाहिये कि उनकी कम से कम 6-7 सीटें भाजपा के कारण ही बचीं, वरना इज्जत पूरी लुट ही गई थी, लेकिन वे ऐसा करेंगे नहीं। रस्सी तो जल गई है, मगर……

(खबर का मूल स्रोत यहाँ है)


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नईदुनिया अखबार (27 मई) में प्रकाशित समाचार के अनुसार मुम्बई हमले के शहीद हेमन्त करकरे की पत्नी ने बताया है कि उन्हें रुपये 15,000/- का करकरे के “अन्तिम संस्कार का बिल”(???) दिया गया है। इसी प्रकार परिजनों को 25 लाख रुपये देने की घोषणा हुई थी जिसमें से अब तक सिर्फ़ 10 लाख रुपये ही मिले हैं। उधर कसाब को सुरक्षा प्रदान करने और अदालती कार्रवाई के लिये करोड़ों रुपये अब तक खर्च हो चुके हैं। अब चूंकि कसाब तो “देश का जमाई” है इसलिये उसे तो कोई “बिल” थमा नहीं सकता।

एक और महान क्रांतिकारी “विनायक सेन” भी रिहा हो गये हैं, उनके लिये कई बड़े-बड़े लोगों ने प्रार्थनायें कीं, मोमबत्तियाँ जलाई, गीत गाये, हस्ताक्षर अभियान चलाये… कहने का मतलब ये कि विनायक सेन बहुत-बहुत महान व्यक्ति हैं। साध्वी प्रज्ञा के लिये महिला आयोग सहित किसी ने भी ऐसा कुछ नहीं किया, क्योंकि वे कीड़ा-मकोड़ा हैं। विनायक सेन की रिहाई की खुशियाँ मनाई जा रही हैं, इसे “जीत” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है… उधर नक्सली हमलों में रोज-ब-रोज हमारे आर्थिक रूप से गरीब जवान मारे जा रहे हैं, किसी-किसी के तो शव भी नहीं मिलते और जब अफ़सर ग्रेड वाले करकरे की पत्नी के यह हाल हैं तो बेचारे छोटे-मोटे जवानों के परिवारों के क्या हाल होते होंगे…

अरे… ये आप भी किन खयालों में खो गये भाई… मैं तो इस प्रकार के अनर्गल प्रलाप जब-तब करता ही रहता हूँ… आप तो कांग्रेस की जय बोलिये, राहुल बाबा के नेतृत्व के गुण गाईये, प्रियंका की मुस्कान पर फ़िदा होईये, भाजपा को साम्प्रदायिक कहकर कोसिये, अफ़ज़ल की फ़ाँसी के बारे में चिदम्बरम के मासूम बयान सुनिये… आर्थिक तरक्की के सपने देखिये, सेंसेक्स के बूम की कल्पना करते रहिये, संघियों के “राष्ट्रवाद” को बकवास कहिये…।

कहाँ इन शहीदों और जवानों के परिवारों के चक्करों में पड़ते हैं… मेरा क्या है, मेरे जैसे “पागल” तो चिल्लाते ही रहते हैं…
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किसी भी देश की सार्वभौमिकता, एकता और अखण्डता के साथ-साथ उस देश का “राष्ट्रीय स्वाभिमान” या राष्ट्र-गौरव भी एक प्रमुख घटक होता है। भारत की अब तक यह नीति रही है कि “हमारे अन्दरूनी मामलों में कोई भी देश, संस्था या अन्तर्राष्ट्रीय संगठन हस्तक्षेप नहीं कर सकता…”, लेकिन सोनिया सरकार ने इस नीति को उलट दिया है। अमेरिका की एक संस्था है “USCIRF” अर्थात US Commission on International Religious Freedom, इस संस्था को जून 2009 में पहली बार भारत का दौरा करने की अनुमति “सोनिया गाँधी सरकार” द्वारा प्रदान कर दी गई है। यह संस्था (कमीशन) अमेरिकी कांग्रेस द्वारा बनाई गई है जिसे अमेरिकी सरकार द्वारा पैसा दिया जाता है। इस संस्था का गठन 1998 में अमेरिका के एक कानून International Religious Freedom Act 1998 के तहत किया गया है, और 1998 से लगातार यह संस्था भारत पर दौरा करने का दबाव बनाये हुए थी, लेकिन भारत की सरकार ने उसे अनुमति और इसके सदस्यों को वीज़ा नहीं दिया। भारत के अन्दरूनी मामलों में दखल-अंदाजी को बर्दाश्त न करने की इस नीति को NDA (1999-2004) और UPA (2004-2009) की सरकारों ने बनाये रखा, जो कि नरसिम्हाराव, देवेगौड़ा और गुजराल सरकार की भी नीति रही।

आईये देखें कि यह अमेरिकी संस्था आखिर करती क्या है? इस अमेरिकी संस्था का गठन अमेरिकी कानूनों के अन्तर्गत हुआ है, लेकिन जिस तरह “दुनिया का खून चूसकर खुद भी और दुनिया को भी आर्थिक मन्दी में फ़ँसाने वाला अमेरिका” अभी भी सोचता है कि वह “विश्व का चौधरी” है, ठीक वैसे ही यह संस्था USCIRF समूचे विश्व में “धार्मिक स्वतन्त्रता” और मानवाधिकारों का हनन कहाँ-कहाँ हो रहा है यह देखती है। भारत में “धार्मिक स्वतन्त्रता” और “मानवाधिकारों” का हनन किस सम्प्रदाय पर ज्यादा हो रहा है? जी हाँ, बिलकुल सही पहचाना आपने, सिर्फ़ और सिर्फ़ “ईसाईयों” पर। वैसे तो कहने के लिये “मुस्लिमों” पर भी भारत में “भारी अत्याचार”(??) हो रहे हैं, लेकिन उनकी फ़िक्र करने के लिये इधर पहले से ही बहुत सारे “सेकुलर” मौजूद हैं, और अमेरिका को वैसे भी मुस्लिमों से विशेष प्रेम नहीं है, सो वह इस संस्था के सदस्यों को पूरे विश्व में सिर्फ़ “ईसाईयों” पर होने वाले अत्याचारों की रिपोर्ट लेने भेजता है।

इस संस्था के भारत दौरे पर पहले विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी नाखुशी जता चुके हैं और दबे स्वरों में इसका विरोध भी कर चुके हैं, लेकिन चूंकि मामला “ईसाईयों” से जुड़ा है और जब “महारानी” की अनुमति है तो विदेश नीति और देश का स्वाभिमान जाये भाड़ में, किसे परवाह है?

इस वर्ष जून में इस संस्था का भारत दौरा प्रस्तावित हो चुका है। इसके सदस्य भारत में कहाँ का दौरा करेंगे? इस आसान सवाल पर कोई ईनाम नहीं मिलेगा, क्योंकि वे गुजरात में डांग, गोधरा तथा उड़ीसा में कंधमाल का दौरा करने वाले हैं। नवीन पटनायक तो शायद इसके सवाल-जवाबों से बच जायेंगे, क्योंकि भाजपा का साथ छोड़ते ही वे “शर्मनिरपेक्ष” बन गये हैं, लेकिन USCIRF के सदस्य डांग्स और गोधरा का दौरा करेंगे तथा नरेन्द्र मोदी और भाजपा से सवाल-जवाब करेंगे। ये अमेरिकी संस्था हमें बतायेगी कि “धार्मिक स्वतन्त्रता” और मानवाधिकार क्या होता है, तथा इसके “निष्पक्ष महानुभाव सदस्य”(?) भारत सरकार के अधिकृत आँकड़ों को दरकिनार करते हुए अपनी खुद की तैयार की हुई रिपोर्ट अमेरिकी कांग्रेस को पेश करेंगे।

इस समिति के सदस्यों के “असीमित ज्ञान” के बारे में यही कहा जा सकता है कि गत वर्ष पेश की गई अपनी आंतरिक रिपोर्ट में इन्होंने नरेन्द्र मोदी को “गुजरात राज्य का गवर्नर” (मुख्यमंत्री नहीं) बताया है, और नरेन्द्र मोदी की स्पेलिंग कई जगह “Nahendra” लिखी गई है, और यह स्थिति तब है जबकि इस संस्था के पास 17 सदस्यों का “दक्षिण एशिया विशेषज्ञों” का एक शोध दल है जो इलाके में धार्मिक स्वतन्त्रता हनन पर नज़र रखता है।

किसी मूर्ख को भी साफ़ दिखाई दे रहा है कि यह साफ़ तौर पर भारत में खुल्लमखुल्ला “अतिक्रमण” है, एक प्रकार का अनुचित हस्तक्षेप है। भारत के अन्दरूनी मसलों पर जाँच करने या दौरा करके अपनी रिपोर्ट अमेरिकी कांग्रेस को पेश करने का इस समिति को क्या हक है? क्या यह एक सार्वभौम राष्ट्र का अपमान नहीं है? यदि एक मिनट के लिये कांग्रेस-भाजपा या सेकुलर-साम्प्रदायिक के मतभेदों को अलग रख दिया जाये तो यह कृत्य प्रत्येक देशभक्त भारतीय को निश्चित ही यह अपमानजनक लगेगा, लेकिन बुद्धिजीवियों की एक कौम है “सेकुलर”… शायद उन्हें यह अपमानजनक या आपत्तिजनक न लगे, क्योंकि इस कौम को उस वक्त भी “बहुत खुशी” महसूस हुई थी, जब अमेरिका ने नरेन्द्र मोदी को वीज़ा देने से इन्कार कर दिया था। उस वक्त इस सेकुलर कौम के लिये नरेन्द्र मोदी, भारत नामक सबसे बड़े लोकतन्त्र के लगातार तीसरी बार निर्वाचित मुख्यमंत्री नहीं थे, बल्कि एक “हिन्दू” थे। सेकुलरों का मानना है कि नरेन्द्र मोदी को वीज़ा न देना “भारत का अपमान” नहीं था, बल्कि एक “हिन्दू” का अपमान था, इससे ये लोग बहुत खुश हुए थे, ये नज़रिया है इन लोगों का देश और खासकर “हिन्दुओं” के प्रति। नरेन्द्र मोदी को वीज़ा न देने सम्बन्धी भारत गणराज्य के अपमान का ऊँची आवाज़ में विरोध करना तो दूर, सेकुलरिस्टों ने दबी आवाज़ में भी अमेरिका के प्रति नाराज़गी तक नहीं दिखाई, जबकि यही लोग देवी-देवताओं की नंगी तस्वीरें बनाने वाले एमएफ़ हुसैन के भारत लौटने के लिये ऐसे बुक्का फ़ाड़ रहे हैं, जैसे इनका कोई “सगा-वाला” इनसे बिछुड़ गया हो, जबकि तसलीमा नसरीन के साथ सरेआम प्रेस कांफ़्रेंस में मारपीट करने वाले हैदराबाद के एक “सेकुलर नेता” की कोई आलोचना नहीं होती… इनके दोगलेपन की कोई हद नहीं है।

बहरहाल, बात हो रही थी अमेरिकी समिति USCIRF की, इस समिति की निगाहे-करम कुछ खास देशों पर हमेशा रही है, जैसे क्यूबा, रूस, चीन, वियतनाम, म्यांमार, उत्तर कोरिया आदि (और ये देश अमेरिका को कितने “प्रिय” हैं यह अलग से बताने की आवश्यकता नहीं है)। ये और बात है कि इस समिति को क्यूबा सरकार ने देश में घुसने की अनुमति नहीं दी, चीन सरकार ने भी लगातार तीन साल तक लटकाने के बाद कड़ी शर्तों के बाद ही इन्हें सन् 2005 में देश में घुसने दिया था और इसकी रिपोर्ट आते ही चीन ने उसे “विद्वेषपूर्ण कार्यवाही” बता दिया था। वियतनाम ने 2002 में इसकी रिपोर्ट सिरे से ही खारिज कर दी थी। भारत के बारे में इस संस्था की रिपोर्ट इनकी वेबसाईट पर देखी जा सकती है। USCIRF धर्म परिवर्तन विरोधी कानून बनाने वालों के खिलाफ़ खास “लॉबी” बनाती है, यह समिति विभिन्न देशों को अलग-अलग “कैटेगरी” में रखती है, जैसे – Countries of Particular Concern (CPC), Country Watch List (CWL) तथा Additional Countries Monitored (ACM)। भारत का दर्जा फ़िलहाल ACM में रखा गया है, जहाँ “धार्मिक स्वतन्त्रता” (यानी धर्मान्तरण की छूट) को खतरा उत्पन्न होने की आशंका है, श्रीलंका भी इसी श्रेणी में रखा गया है, जहाँ हाल ही में चीन की मदद से श्रीलंका ने “चर्च” की तमिल ईलम बनाने की योजना को ध्वस्त कर दिया है।

सवाल यह भी उठता है कि क्या यह अमेरिकी कमीशन केरल भी जायेगा, जहाँ ननों के साथ बलात्कार और हत्याएं हुई हैं? क्या यह कमीशन कश्मीर भी जायेगा जहाँ से हिन्दुओं को बेदखल कर दिया गया है? क्या यह कमीशन पाकिस्तान भी जायेगा जहाँ सिखों से जज़िया न मिलने की सूरत में उन पर अत्याचार हो रहे हैं? जब यह समिति कंधमाल जायेगी, तो स्वामी लक्षमणानन्द सरस्वती की हत्या क्यों हुई, इस पर भी कोई विचार करेगी? क्या यह समिति गुजरात के दंगों में 200 से अधिक हिन्दू “भी” क्यों मारे गये, इसकी जाँच करेगी? ज़ाहिर है कि यह ऐसा कुछ नहीं करेगी। असल में दोगले सेकुलर, इस समिति से अपनी “पसन्दीदा” रिपोर्ट चाहते हैं, इसका एक उदाहरण यह भी है कि गत मार्च में ऐसी ही एक और मानवाधिकार कार्यकर्ता पाकिस्तान की अस्मां जहाँगीर को भारत सरकार ने गुजरात का दौरा करने की अनुमति दी थी (अस्मां जहाँगीर यूएन मानवाधिकार आयोग की विशेष सदस्या भी हैं)। उम्मीदों के विपरीत नरेन्द्र मोदी ने असमां जहाँगीर का स्वागत किया था और उन्हें सभी सुविधायें मुहैया करवाई थीं, तब सभी “मानवाधिकारवादी” और “सेकुलरिस्ट” लोगों ने असमां जहाँगीर की इस बात के लिये आलोचना की कि उन्हें नरेन्द्र मोदी से नहीं मिलना चाहिये था। यानी कि जो भी रिपोर्ट उनकी पसन्द की होगी वही स्वीकार्य होगी, अन्यथा नहीं। इसलिये इस अमेरिकी समिति की “धर्मान्तरण” और “भारत में धार्मिक स्वतन्त्रता” सम्बन्धी रिपोर्ट क्या होगी, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। यह देखना रोचक होगा कि “हिन्दू हृदय सम्राट” नरेन्द्र मोदी भी आडवाणी की तरह “सेकुलरता” का ढोंग करके USCIRF के गोरे साहबों का स्वागत करते हैं या सच्चे हिन्दू देशभक्त की तरह उन्हें लतियाकर बेरंग लौटाते हैं, यह भी देखना मजेदार होगा कि ताजा-ताजा सेकुलर बने पटनायक उन्हें उड़ीसा के आदिवासी इलाकों में चल रही “हरकतों” की असलियत बतायेंगे या नहीं।

देश पर हो रहे इस “अनैतिक अतिक्रमण” को केन्द्र सरकार का पूर्ण समर्थन हासिल है। क्या इस प्रकार की गतिविधि देश की अखण्डता के साथ खिलवाड़ नहीं है? काल्पनिक ही सही लेकिन भविष्य में अगले कदम के तौर पर हो सकता है कि अमेरिका कहे कि आपसे कश्मीर नहीं संभलता इसलिये हम अपनी सेना वहाँ रखना चाहते हैं। क्या यह हमें मंजूर होगा? लेकिन यहाँ मामला सिर्फ़ और सिर्फ़ येन-केन-प्रकारेण भाजपा-मोदी-संघ को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करके ओछी राजनीति करने का है, जबकि उसकी बहुत बड़ी कीमत यह देश चुकायेगा। इन्हें यह छोटी सी बात समझ नहीं आती कि देश की घरेलू राजनीति में भले ही कांग्रेस-भाजपा और सेकुलर-साम्प्रदायिक में घोर मतभेद हों, लेकिन उस मतभेद का पूरी दुनिया के सामने इस तरह से भौण्डा प्रदर्शन करने की कोई जरूरत नहीं है, सवाल है कि “सेकुलर” राजनीति बड़ी है या देश का स्वाभिमान? अल्पसंख्यकों को खुश करने और हिन्दुओं की नाक मोरी में रगड़ने के लिये सेकुलरिस्ट किस हद तक जा सकते हैं यह अगले 5 साल में हमें देखने मिलेगा, क्योंकि आखिर इस देश की जनता ने “स्थिर सरकार”, “रोजी-रोटी देने वाली सरकार”, “गरीबों का साथ देने वाली सरकार” को चुन लिया है…

(खबरों के स्रोत के लिये यहाँ तथा यहाँ चटका लगाया जा सकता है…)



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