दो अफ़ज़ल? जी हाँ चौंकिये नहीं, पहला है अफ़ज़ल गुरु और दूसरा शिवाजी द्वारा वध किया गया अफ़ज़ल खान, भले ही इन दोनों अफ़ज़लों में वर्षों का अन्तर हो, लेकिन उनके "फ़ॉलोअर्स" की मानसिकता आज इतने वर्षों के बाद भी वैसी की वैसी है।

हाल ही में सम्पन्न गणेश उत्सव के दौरान मुम्बई में "अफ़ज़ल गुरु और कसाब को फ़ाँसी कब दी जायेगी?" का सवाल उठाते हुए, कुछ झाँकियों और नाटकों में इसका प्रदर्शन किया गया। वैसे तो यह सवाल समूचे देश को मथ रहा है, लेकिन मुम्बईवासियों का दर्द ज़ाहिर है कि सर्वाधिक है, इसलिये गणेशोत्सव में इस प्रकार की झाँकियाँ होना एक आम बात थी, इसमें भला किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? लेकिन नहीं साहब, "सेकुलरिज़्म" के झण्डाबरदार और "महारानी की गुलाम" महाराष्ट्र सरकार की वफ़ादार पुलिस ने ठाणे स्थित घनताली लालबाग गणेशोत्सव मण्डल को धारा IPC 149 के तहत एक नोटिस जारी करके पूछा है कि "मुस्लिम भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली अफ़ज़ल गुरु की झाँकियाँ क्यों निकाली गईं?"। ध्यान दीजिये कांग्रेस सरकार कह रही है कि अफ़ज़ल गुरु को फ़ाँसी लगाने की माँग करने का मतलब है मुसलमानों की भावनाओं को ठेस पहुँचान।

महाराष्ट्र में चुनाव सिर पर हैं, उदारवादी मुसलमान खुद आगे आकर बतायें कि क्या अफ़ज़ल गुरु को फ़ाँसी देने से उनकी भावनायें आहत होती हैं? यदि नहीं, तो मुस्लिमों को कांग्रेस के इस घिनौने खेल को उजागर करने हेतु आगे आना चाहिये। उपरोक्त गणेश मण्डल ने अपने जवाब में कहा है कि "हमारी झाँकी का उद्देश्य आम जनता को आतंकवाद के खिलाफ़ जागरूक और एकजुट करना है, इसमें साम्प्रदायिकता कहाँ से आ गई? भारत सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बावजूद अफ़ज़ल गुरु की फ़ाँसी में देरी से लोगों में बेचैनी है इसलिये गणेश मण्डल की यह झाँकी कहीं से भी आपत्तिजनक और देशविरोधी नहीं है…"।

यह तो हुई पहले अफ़ज़ल की बात, अब बात करते हैं दूसरे अफ़ज़ल की यानी अफ़ज़ल खान की। कांग्रेस द्वारा देश भर में "सेकुलरिज़्म" का जो खेल खेला जाता है और मुस्लिमों की भावनाओं(?) को देशहित से ऊपर रखा जाता है, उसका एक नमूना आपने ऊपर देखा इसी कांग्रेसी नीति और चालबाजियों का घातक विस्तार महाराष्ट्र के ही सांगली जिले के मिरज तहसील में देखने को मिला। सांगली जिले के मिरज़ में महाराणा प्रताप गणेशोत्सव मंडल द्वारा एक चौराहे पर विशाल झाँकी लगाई गई थी, जिसमें शिवाजी महाराज द्वारा "बघनखा" द्वार अफ़ज़ल खान का पेट फ़ाड़ते हुए वध का दृश्य चित्रित किया गया था।


3 सितम्बर को मुस्लिमों के एक उन्मादी समूह ने इस पोस्टर पर आपत्ति जताई (पता नहीं क्यों? शायद अफ़ज़ल खान को वे अपना आदर्श मानते होंगे, मुस्लिम सेनापति रखने वाले शिवाजी को नहीं)। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने भीड़ को समझाया, लेकिन वे नहीं माने, अन्ततः कांग्रेस सरकार के दबाव में शिवाजी वाला वह पोस्टर पुलिस प्रशासन द्वारा हटाने की घोषणा की गई। भीड़ ने खुशी में पाकिस्तान के झण्डे लहराये और पुलिस की जीप पर चढ़कर हरा झण्डा घुमाया,


पुलिस चुपचाप सब देखती रही, एक युवक ने नज़दीक के खम्भे पर पाकिस्तान का एक और झण्डा लगा दिया, मुस्लिमों की भीड़ नारेबाजी करती रही, लेकिन इतने भी उन्हें संतोष नहीं हुआ और उन्होंने सुनियोजित तरीके से दंगा फ़ैलाना शुरु कर दिया, और आसपास स्थित तीन गणेश मण्डलों में गणपति की मूर्तियों को पत्थर मार-मारकर तोड़ दिया।


आप सोच रहे होंगे कि प्रशासन क्या कर रहा था, आप प्रशासन को इतना निकम्मा न समझिये, पुलिस ने शिवसेना के दो पार्षदों, गणेशोत्सव मण्डल अध्यक्षों और अन्य हिन्दूवादी नेताओं को "भावनायें भड़काने" के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया। पुलिस ने बाद में कहा कि इन्होंने झाँकियों की "आचार संहिता" का उल्लंघन किया है (यानी शिवाजी महाराज द्वारा हकीकत में घटित एक घटना को चित्रित करना आचार संहिता का उल्लंघन है)। दंगों में पुलिस की एक जीप, चार सार्वजनिक वाहन और कुछ अन्य निजी वाहन जला दिये गये। इसके विरोध में हिन्दू संगठनों ने गणेश मूर्ति विसर्जित करने से इंकार कर दिया तब पुलिस ने उन्हें धमकाया और जबरदस्ती पुलिस गाड़ी में डालकर गणेश जी का विसर्जन करवा दिया। सांगली जिले में 2 दिन तक कर्फ़्यू लगा रहा और हिन्दू संगठनों ने अभी तक गणेश विसर्जन नहीं किया है उनकी मांग है कि अफ़ज़ल खान की वह झाँकी जब तक दोबारा उसी स्थान पर नहीं लगाई जाती, गणेश विसर्जन नहीं होगा। यह सारा मामला पूर्वनियोजित और सुनियोजित था इसका सबूत यह है कि जिस रास्ते से गणेश मूर्तियाँ निकलने वाली थीं, वहाँ एक दरवाजे के सामने दो दिन पहले ही लोहे के एंगल लगाकर रास्ता सँकरा करने की कोशिश की गई थी, ताकि मूर्तियाँ न निकल सकें


यह जानकर भी बिलकुल आश्चर्य मत कीजियेगा कि उस पूरे इलाके की मुस्लिम महिलायें एक दिन पहले ही इलाका छोड़कर बाहर चली गई थीं… बाकी तो आप समझदार हैं।

इन दोनों मामलों में हमारे सबसे तेज़, सबसे सेकुलर, मीडिया ने "ब्लैक आउट" कर दिया, किसी-किसी चैनल पर सिर्फ़ एक लाइन की खबर दिखाई, क्योंकि मीडिया को सलमान खान, महेन्द्रसिंह धोनी और राखी सावन्त जैसे लोग अधिक महत्वपूर्ण लगते हैं, या फ़िर गुजरात की कोई भी मोदी विरोधी खबर या भाजपा की उठापटक। "मीडिया हिन्दूविरोधी है" इस श्रृंखला में यह एक और सबूत है, (सुना आपने "बुरका दत्त")।

सारे झमेले से कई सवाल खड़े होते हैं कि - उदारवादी मुस्लिम इस प्रकार की हरकतों को रोकने के लिये आगे क्यों नहीं आते? यदि घटना हो ही जाये तब इसकी कड़ी आलोचना या कोई कार्रवाई क्यों नहीं करते? शाहबानो मामले में पीड़ित महिला के पक्ष में बोलने वाले आरिफ़ मोहम्मद खान को मुस्लिम समाज अपना नेता क्यों नहीं मानता, बुखारियों को क्यों मानता है? कांग्रेस की चालबाजियों को हमेशा नजर-अंदाज़ कर देते हैं, दंगों के मुख्य कारणों पर नहीं जाते और गुस्साये हुए हिन्दुओं का पक्ष रखने वाली भाजपा-शिवसेना के दोष ही याद रखते हैं? और सबसे बड़ी बात कि अफ़ज़ल खान या अफ़ज़ल गुरु का विरोध करने पर मुस्लिम भड़कते क्यों हैं? यह कैसी मानसिकता है? ऊपर से तुर्रा यह कि पुलिस हमें अनावश्यक तंग करती है, हिन्दू नफ़रत की निगाह से देखते हैं, अमेरिका जाँच करता है… आदि-आदि। उदारवादी मुस्लिम खुद अपने भीतर झाँककर देखें कि उग्रवादी मुस्लिमों की वजह से उनकी छवि कैसी बन रही है।

नीचे दिये हुए पहले वीडियो (7 मिनट) में आप देख सकते हैं कि किस तरह डीएसपी स्तर का अधिकारी मुस्लिमों की भीड़ को समझाने में लगा हुआ है, एक युवक सरकारी "ऑन ड्यूटी" जीप पर चढ़कर हरा झण्डा लहराता है, लेकिन पुलिस कुछ नहीं करती (जबकि उसी समय उसका पुठ्ठा सुजाया जाना चाहिये था)। वीडियो के अन्त में एक लड़का पाकिस्तान का झण्डा एक खम्भे पर खोंसता दिखाई देगा। पथराव करने वाली भीड़ में छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल हैं, क्या है यह सब?



First Video (7 min.)
http://www.youtube.com/watch?v=o-J0mD8naAg



इस वीडियो में भीड़ गणेशोत्सव मण्डलों के मण्डप में मूर्ति पर पथराव करती दिखाई देगी…

Second Video (3 min.)
http://www.youtube.com/watch?v=nsX6LYdNBNw



अब अन्त में एक आसान सा "ब्लड टेस्ट" कर लीजिये… यदि यह सब पढ़कर आपका खून उबालें नहीं लेता, तो निश्चित जानिये कि या तो आप "सेकुलर" हैं या "नपुंसक" (दोनो एक साथ भी हो सकते हैं)…


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पाकिस्तानी आतंकवादी अज़मल कसाब को मिलने वाली सुविधाओं और उसकी मांगों के बारे में तथा सरकार और अन्य "दानवाधिकार" संगठनों द्वारा उसके आगे बिछे जाने को लेकर पहले भी काफ़ी लिखा जा चुका है (ये और बात है कि चाहे कोई भी राष्ट्रवादी व्यक्ति कितनी ही आलोचना कर ले, कांग्रेस और हमारे हिन्दुत्वविरोधी मीडिया पर कोई असर नहीं पड़ता)। इसी प्रकार कश्मीर में मारे गये आतंकवादियों के परिवारों के आश्रितों को कांग्रेस-मुफ़्ती-फ़ारुक द्वारा आपसी सहमति से बाँटे गये पैसों पर भी काफ़ी चर्चा हो चुकी है। यह घटनायें कांग्रेस सरकारों द्वारा प्रायोजित और आयोजित होती थीं, सो इसकी जमकर आलोचना की गई, प्रत्येक देशप्रेमी को (सेकुलरों को छोड़कर) करना भी चाहिये। लेकिन अब एक नया ही मामला सामने आया है, जिसकी आलोचना भी हम-आप नहीं कर सकते।

जैसा कि सभी जानते हैं हमारे देश की न्यायपालिकाएं एक "लाजवन्ती" नारी से भी ज्यादा छुई-मुई हैं, जरा सा "छेड़" दो, तो तड़ से उनकी अवमानना हो जाती है। इसलिए पहले ही घोषणा कर दूं कि यह लेख मेरे प्रिय पाठकों के लिये सिर्फ़ "एक खबर" मानी जाये, "माननीय" न्यायालय के खिलाफ़ टिप्पणी नहीं…

11 अगस्त को "माननीय" सर्वोच्च न्यायालय की दो जजों तरुण चटर्जी और आफ़ताब आलम की खण्डपीठ ने गुजरात में नवम्बर 2005 में एनकाउंटर में मारे गये सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी कौसर बी के परिजनों को दस लाख रुपये का मुआवज़ा देने का निर्देश दिया है। ऐसे में "माननीय" न्यायालय से पूछने को जी चाहता है कि क्या ज्ञात और घोषित अपराधियों के परिजनों के लिये मुआवज़ा घोषित करने से गलत संदेश नहीं जायेगा? मुआवज़ा कितना मिलना चाहिये, यह निर्धारित करते समय क्या "माननीय" न्यायालय ने उस परिवार के "पाप में सहभागी होने" और उसकी आय को ध्यान में रखा है? इन अपराधियों द्वारा अब तक मारे गये निर्दोष व्यक्तियों के परिजनों को क्या ऐसा कोई मुआवज़ा "माननीय" न्यायालय ने दिया है? यदि इन अपराधियों द्वारा मारे गये लोगों के परिजन "माननीय" न्यायालय की दृष्टि के सामने नहीं आ पाये हैं तो क्या इसमें उनका दोष है, और क्या यही न्याय है? एक सामान्य और आम नागरिक इस निर्णय को किस प्रकार देखे? क्या यह निर्णय अपराधियों के परिवारों को कानूनी रूप से पालने-पोसने और उन अपराधियों द्वारा सरेआम एक न्यायप्रिय और कानून का पालन करने वाले आम नागरिक के साथ बलात्कार जैसा नहीं लगता?

उल्लेखनीय है कि सोहराबुद्दीन उज्जैन के पास उन्हेल का रहने वाला एक ट्रक चालक था, जिसे इन्दौर से कांडला बन्दरगाह माल लाने-ले जाने के दौरान अपराधियों का सम्पर्क मिला और वह बाद में दाऊद की गैंग के लिये काम करने लगा। मध्यप्रदेश, गुजरात और राजस्थान सरकारों के लिये वह एक समय सिरदर्द बन गया था और दाऊद के अपहरण रैकेट में उसकी एक महत्वपूर्ण भूमिका रही। सोहराबुद्दीन को गुजरात पुलिस द्वारा मार गिराये जाने के बाद जब उसका शव उसके पैतृक गाँव लाया गया तब उसकी शवयात्रा का स्वागत एक गुट द्वारा हवा में गोलियां दाग कर किया गया था। इस व्यक्ति के परिजनों को जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई का 10 लाख रुपया देने के पीछे "माननीय" न्यायालय का क्या उद्देश्य है, यह समझ से परे है।

आज जबकि समूचा भारत आतंकवाद से जूझ रहा है, आतंकवादियों और अन्तर्राष्ट्रीय अपराधियों में खुलेआम सांठगांठ साबित हो चुकी है, ऐसे में यह उदाहरण पेश करना क्या "माननीय" न्यायालय को शोभा देता है? खासकर ऐसे में जबकि हमारे जांबाज पुलिसवाले कम से कम संसाधनों और पुराने हथियारों से काम चला रहे हों और उनकी जान पर खतरा सतत मंडराता है? सवाल यह भी है कि "माननीय" न्यायालय ने अब तक कितने पुलिसवालों और छत्तीसगढ़ में रोजाना शहीद होने वाले पुलिसवालों को दस-दस लाख रुपये दिलवाये हैं?

दाऊद का एक और गुर्गा अब्दुल लतीफ़, जो कि साबरमती जेल से मोबाइल द्वारा सतत अपने साथियों के सम्पर्क में था, एक मध्यरात्रि में जेल से भागते समय पुलिस की गोली का शिकार हुआ, इस प्रकार के घोषित रूप से समाजविरोधी तत्वों को इस तरह "टपकाने" में कोई बुराई नहीं है, बल्कि इसे कानूनन जायज़ बना दिया जाना चाहिये, खासकर ऐसे मामलों में जहाँ न्यायालय द्वारा यह साबित किया जा चुका हो कि वह व्यक्ति कुख्यात अपराधी है और जेहादी संगठनों से उसकी मिलीभगत है, तभी हम आतंकवाद पर एक हद तक अंकुश लगा पाने में कामयाब होंगे।

"माननीय" न्यायालय को यह समझना चाहिये कि मुआवज़ा अवश्य दिया जाये, लेकिन सिर्फ़ उन्हीं को जो गलत पहचान के शिकार होकर पुलिस के हाथों मारे गये हैं (जैसे कनॉट प्लेस दिल्ली की घटना में वे दोनो व्यापारी)। एक अपराधी के परिजनों को मुआवज़ा देने से निश्चित रूप से गलत संदेश गया है। लेकिन यह बात हमारे सेकुलरों, लाल बन्दरों और झोला-ब्रिगेड वाले कथित मानवाधिकारवादियों को समझ नहीं आयेगी।

बाटला हाउस की जाँच में पुलिस वालों की भूमिका निर्दोष पाई गई है, लेकिन फ़िर भी सेकुलरों का "फ़र्जी मुठभेड़" राग जारी है, साध्वी प्रज्ञा के साथ अमानवीय बर्ताव जारी है लेकिन मानवाधिकार और महिला आयोग चुप्पी साधे बैठा है। अब बाटला हाउस कांड की जाँच सीबीआई से करवाने की मांग की जा रही है, यदि उसमें भी पुलिस को क्लीन चिट मिल गई तो ये सेकुलर लोग मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जायेंगे।

एक बार पहले भी "माननीय" सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों के सम्बन्ध में तीस्ता सीतलवाड द्वारा बगैर हस्ताक्षर किये कोरे हलफ़नामें स्वीकार किये हैं तथा, एक और "माननीय" हाईकोर्ट ने एक युवती इशरत जहाँ को, जिसे आतंकवादियों से गहरे सम्बन्ध होने की वजह से गुजरात पुलिस द्वारा मार गिराया गया था, उसकी न्यायिक जाँच के आदेश दिये थे, जबकि लश्कर-ए-तैयबा की वेबसाईट पर इशरतजहाँ को "शहीद" के रूप में खुलेआम चित्रित किया जा चुका था। ताज़ा समाचार के अनुसार कसाब को अण्डाकार जेल में रोज़े रखने/खोलने के लिये रोज़ाना समय बताया जायेगा ताकि उसकी धार्मिक भावनायें(?) आहत न हों, जबकि साध्वी प्रज्ञा को एक बार अंडा खिलाने की घृणित कोशिश की जा चुकी है, "सेकुलर देशद्रोहियों" के पास इस बात का भी कोई जवाब नहीं है कि यदि साध्वी प्रज्ञा जेल में गणेश मूर्ति स्थापित करने की मांग करें, तो क्या अनुमति दी जायेगी? "सेकुलरिज़्म" के कथित योद्धा इन बातों पर एक "राष्ट्रविरोधी चुप्पी" साध जाते हैं या फ़िर गोलमोल जवाब देते हैं, क्योंकि जैसा कि सभी जानते हैं, नरेन्द्र मोदी के खिलाफ़ बोलना-लिखना अथवा मुसलमानों के पक्ष में कुछ भी बोलना ही सेकुलरिज़्म कहलाता है। ये दो "पैरामीटर" सेकुलर घोषित किये जाने के लिये पर्याप्त हैं। ये घटिया लोग जीवन भर "संघ और हिन्दुत्व" को गाली देने में ही अपनी ऊर्जा खपाते रहे, और इन्हें पता भी नहीं कि भारत के पिछवाड़े में डण्डा करने वाली ताकतें मजबूत होती रहीं।

शुरुआत में जिन दोनों मामलों (कसाब और कश्मीर के आतंकवादी) का जिक्र किया गया था, उनमें तो "सरकारी तंत्र" और वोट बैंक की राजनीति ने अपना घृणित खेल दिखाया था, लेकिन अब "माननीय" न्यायालय भी ऐसे निर्णय करेगा तो आम नागरिक कहाँ जाये?

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विशेष नोट - इस लेख में "माननीय" शब्द का उपयोग 12-13 बार किया है, इसी से पता चलता है कि मैं कानून का कितना घोर, घनघोर, घटाटोप सम्मान करता हूं, और "अवमानना" करने का तो कोई सवाल ही नहीं है :)। टिप्पणी करने वाले बन्धु-भगिनियाँ भी टिप्पणी करते समय माननीय शब्द का उपयोग अवश्य करें वह भी डबल कोट के साथ… वरना आप तो जानते ही हैं कि पंगेबाज के साथ क्या हुआ था।

फ़िलहाल यू-ट्यूब की यह लिंक देखें और अपना कीमती (और असली) खून जलायें… सेकुलर UPA के सौजन्य से… :)

http://www.youtube.com/watch?v=NK6xwFRQ7BQ



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गत दिनों शाहरुख को अमेरिका के नेवार्क हवाई अड्डे पर सुरक्षा जाँच के लिये रोके जाने पर खासा बावेला खड़ा किया गया था। शाहरुख खान का हास्यास्पद बयान था कि उसे मुस्लिम होने की वजह से परेशान किया गया, और भारत में सेकुलरों और हमारे भाण्ड-गवैये टाइप इलेक्ट्रानिक मीडिया को एक मुद्दा मिल गया था दो दिन तक चबाने के लिये। हालांकि इस मुद्दे पर अमेरिका के सुरक्षा अधिकारियों की तरफ़ से भी स्पष्टीकरण आ चुका है, लेकिन इस मामले में शाहरुख को वहाँ रोके रखने के दो और सम्भावित कारण सामने आये हैं।

उल्लेखनीय है कि भारत से फ़िल्मी कलाकार अक्सर अमेरिका स्टेज शो करके डालर में मोटी रकम कमाने आते-जाते रहते हैं। डालर की चकाचौंध के कारण विदेशों में इस प्रकार के कई संगठन खड़े हो गये हैं जो भारतीय फ़िल्म कलाकारों को बुलाते रहते हैं, यदि भारतीय कलाकार वहाँ सिर्फ़ "भारत के नागरिक" बनकर जायें तो उन्हें उतना पैसा नहीं मिलेगा, चूंकि हिन्दी फ़िल्मों की लोकप्रियता पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान में भी काफ़ी है, इसलिये अमेरिका, कनाडा आदि देशों में ऐसे सभी आप्रवासियों को एकत्रित करके इस प्रकार के स्टेज शो को "साउथ एशिया" के किसी संगठन का नाम दे दिया जाता है। इस चालाकी में कोई बुराई नहीं है, बल्कि यह तो भारतीय कलाकारों और हिन्दी फ़िल्मों की ताकत का प्रदर्शन है। शाहरुख खान का 15 अगस्त का दौरा ऐसे ही एक कार्यक्रम हेतु था (वे वहाँ भारत के किसी स्वाधीनता दिवस कार्यक्रम में भाग लेने नहीं गये थे, बल्कि पैसा कमाने गये थे)। 15 अगस्त को शिकागो और ह्यूस्टन में अमेरिका स्थित भारतीयों और पाकिस्तानियों के एक ग्रुप ने "साउथ एशिया कार्निवाल" का आयोजन रखा था, उसमें शाहरुख बतौर "मेहमान"(?) बुलाये गये थे। इस कार्निवाल का टिकट 25 डालर प्रति व्यक्ति था, मेले में बॉलीवुड के कई कलाकारों के नृत्य-गीत का कार्यक्रम, एक फ़ैशन शो और एक वैवाहिक आईटमों की प्रदर्शनी शामिल था (तात्पर्य यह कि "स्वतन्त्रता दिवस" जैसा कोई कार्यक्रम नहीं था, जिसका दावा शाहरुख अपनी देशभक्ति दर्शाने के लिये कर रहे थे)। इस कार्निवाल के विज्ञापन में सैफ़ अली खान, करीना, कैटरीना, दीया मिर्ज़ा और बिपाशा बसु का भी नाम दिया जा रहा था, इस कार्निवाल को भारत की एयर इंडिया तथा सहारा एवं पाकिस्तान की दो बड़ी कम्पनियाँ प्रायोजित कर रही थीं, पूरे विज्ञापन में कहीं भी भारत या पाकिस्तान (14 अगस्त) के स्वतन्त्रता दिवस का कोई उल्लेख नहीं था।

तो समस्या कहाँ से शुरु हुई होगी? अमेरिका जाते समय तो ये कलाकार भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री के प्रतिनिधि और भारत के नागरिक के तौर पर जाते हैं लेकिन अमेरिका में प्रवेश करते समय कस्टम की पहचान सम्बन्धी पूछताछ के दौरान कभी-कभी ये अपने आपको "दक्षिण एशियाई" बता देते हैं। एक सम्भावना यह है कि शाहरुख ने पहले तो जाँच के नाम पर अपनी परम्परागत भारतीय "फ़ूं-फ़ाँ" दिखाई होगी, जिससे अमेरिकी पुलिसवाला और भी शक खा गया होगा अथवा भड़क गया होगा, ऊपर से तुर्रा यह था कि शाहरुख का सामान भी उनके साथ नहीं पहुँचा था (बाद में अगली फ़्लाइट से आने वाला था), ऐसे मामलों में अमेरिकी अधिकारी और अधिक सख्त तथा शंकालु हो जाते हैं। शाहरुख और उस पुलिस वाले के बीच हुई एक काल्पनिक बातचीत का आनन्द लें (क्या बात हुई होगी, इसकी एक सम्भावना) -

अमेरिकी कस्टम अधिकारी - तो मि शाहरुख आप अमेरिका क्यों आये हैं?

शाहरुख - मुझे यहाँ "साउथ एशिया कार्निवाल" में एक भाषण देने के लिये बुलाया गया है।

अधिकारी - अच्छा, वह कैसा और क्या कार्यक्रम है?

शाहरुख - (हे ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए ए… बकरे की तरह मिमियाने का शाहरुखी स्टाइल) दक्षिण एशिया के लोग आपस में मेलजोल बढ़ाने के लिये एकत्रित होते हैं और स्वतन्त्रता दिवस मनाते हैं…

अधिकारी - दक्षिण एशिया, क्या वह भी कोई देश है?

शाहरुख - नहीं, नहीं, दक्षिण एशिया मतलब भारत, पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान के लोग…

सुरक्षा अधिकारी पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान का नाम सुनकर ही सतर्क हो जाता है… "वेट ए मिनट मैन्…" अधिकारी अन्दर जाकर वरिष्ठ अधिकारी के कान में फ़ुसफ़ुसाता है… यह आदमी अफ़गानिस्तान-पाकिस्तान और भाषण वगैरा बड़बड़ा रहा है, मुझे शक है… इसे और गहन जाँच के लिये रोकना होगा।

सही बात तो शाहरुख और वह जाँच करने वाला अमेरिकी अधिकारी ही बता सकता है, लेकिन जैसा कि अमेरिका की सुरक्षा जाँच सम्बन्धी मानक बन गये हैं, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान का नाम सुनते ही अमेरिकी अधिकारियों के कान खड़े हो जाते हैं। ऐसे में क्या जरूरत है अपनी अच्छी खासी भारतीय पहचान छिपाकर खामखा "दक्षिण एशियाई" की पहचान बताने की? आप भले ही कितने ही शरीफ़ हों, लेकिन यदि आप वेश्याओं के मोहल्ले में रहते हैं तो सामान्यतः शक के घेरे में आ ही जाते हैं। खुद ही सोचिये, कहाँ भारत, भारत की इमेज, भारतीयों की अमेरिका में इमेज आदि, और कहाँ पाकिस्तान-अफ़गानिस्तान के साथ खुद को जोड़कर देखना? है कोई तालमेल? इन "असफ़ल और आतंकवादी देशों" के साथ खुद को खड़ा करने की क्या तुक है?

जबकि इसी काल्पनिक घटना का दूसरा रूप यह भी हो सकता था -

अधिकारी - मि शाहरुख आप अमेरिका किसलिये आये हैं?

शाहरुख - मैं यहाँ भारत के स्वतन्त्रता दिवस समारोह में एक भाषण देने आया हूं।

अधिकारी - भारत का स्वतन्त्रता दिवस?

शाहरुख - जी 15 अगस्त को भारत का 63 वां स्वतन्त्रता दिवस मनाया जा रहा है।

अधिकारी - वाह, बधाईयाँ, अमेरिका में आपका स्वागत है…

संदेश साफ़ है, हम पाकिस्तान और बांग्लादेश रूपी सूअरों के दो बाड़ों से घिरे हैं, उनकी "पहचान" के साथ भारत की गौरवशाली पहचान मिक्स करने की कोई जरूरत नहीं है, गर्व से कहो हम "भारतीय" हैं, दक्षिण एशियाई क्या होता है?
(समाचार यहाँ देखें…)

2) शाहरुख को रोकने की एक और वजह सामने आई है। बेवजह इस मामले को अन्तर्राष्ट्रीय तूल दिया गया और हमारे मूर्ख मीडिया ने इसे मुस्लिम पुट देकर बेवकूफ़ाना अन्दाज़ में इसे पेश किया, जबकि इस मामले में रंग, जाति, धर्म का कोई लेना-देना नहीं था। असल में जिस कार्निवाल की बात ऊपर बताई गई उसके आयोजकों का रिकॉर्ड अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक सन्देह के घेरे में है, भले ही वे आतंकवादी गुटों से सम्बद्ध न हों लेकिन अंडरवर्ल्ड से सम्बन्धित अवश्य हैं। इस नाच-गाने के शो का प्रमुख प्रमोटर था लन्दन निवासी फ़रहत हुसैन और शिकागो में रहने वाला उसका भाई अल्ताफ़ हुसैन, इन दोनों भाईयों की एक संस्था है लेक काउंटी साउथ एशियन एंटरटेनमेंट इन्क। इन दोनों भाईयों पर टैक्स चोरी और अंडरवर्ल्ड से सम्बन्धों के बारे में अमेरिकी अधिकारियों को शक है। जैसा कि शाहरुख खान ने बाद में प्रेस से कहा कि अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों के कुछ सवाल "अपमानजनक", "गैर-जिम्मेदाराना", "बेतुके" थे, असल में यह सवाल इन्हीं दोनों भाईयों के सम्बन्ध में थे। कुछ समय पहले भी ऐसी ही एक कम्पनी "एलीट एंटरटेनमेंट" के प्रमोटर विजय तनेजा नामक शख्स को अमेरिका में धोखाधड़ी और अमानत में खयानत का दोषी पाया गया और उसे बन्द करवा दिया था।

अब इस पर ध्यान दीजिये… एक वरिष्ठ सीनेटर केनेडी अमेरिका में जाना-पहचाना नाम है, उन्हें भी कई बार सुरक्षा जाँच से गुजरना पड़ा, क्योंकि उनके नाम का उपयोग करके एक आतंकवादी ने अमेरिका में घुसने की कोशिश की थी, बाद में बार-बार होने वाली परेशानी से तंग आकर केनेडी ने राष्ट्रपति से गुहार लगाई और उनका नाम "शंकास्पद नामों" की लिस्ट से हटाया गया। पूर्व उपराष्ट्रपति अल-गोर एक बार बगैर सामान चेक करवाये ग्रीन दरवाजे से जाने लगे तब उन्हें भी रोककर खासी तलाशी ली गई थी। जिस दिन शाहरुख की जाँच की गई थी, उसी दिन एक दूसरे शहर में अमेरिका के प्रसिद्ध रॉक स्टार बॉब डिलन को दो पुलिसवालों ने जाँच के लिये रोका, (और पुलिस वाले यदि पहचान भी गये हों तब भी), जब वे अपनी पहचान प्रस्तुत नहीं कर पाये तब उन्हें पकड़कर उनके मेज़बान के घर ले जाया गया और तसदीक करके ही छोड़ा। उससे कुछ ही दिन पहले ओलम्पिक के मशहूर तैराक विश्व चैम्पियन माइकल फ़ेल्प्स, बीयर पीकर कार चलाते पकड़े गये, हालांकि फ़ेल्प्स द्वारा पी गई बीयर कानूनी सीमा के भीतर ही थी, लेकिन फ़िर भी पुलिसवाले उन्हें थाने ले गये, उन्हें एक लिखित चेतावनी दी गई फ़िर छोड़ा गया। (देखें चित्र)



दिक्कत यह हुई कि शाहरुख खान को उम्मीद ही नहीं थी कि एक "सुपर स्टार" होने के नाते उनसे ऐसी कड़ी पूछताछ हो सकती है, सो उन्होंने निश्चित ही वहाँ कुछ "अकड़-फ़ूं" दिखाई होगी, जिससे मामला और उलझ गया। जबकि अमेरिका में सुरक्षा अधिकारी न तो कैनेडी को छोड़ते हैं न ही अल गोर को, कहने का मतलब ये कि शाहरुख का नाम यदि "सेड्रिक डिसूजा" भी होता तो तब भी वे उसे बिना जाँच और पूछताछ के न छोड़ते। अमेरिका, अमेरिका है, न कि भारत जैसी कोई "धर्मशाला"। हमारे यहाँ तो कोई भी, कभी भी, कहीं से भी आ-जा सकता है और यहाँ के सरकारी कर्मचारी, कार्पोरेट्स, अमीरज़ादे और नेता, भ्रष्टाचार और चापलूसी की जीवंत मूर्तियाँ हैं, किसी को भी "कानून का राज" का मतलब ही नहीं पता।

तात्पर्य यह कि न तो शाहरुख के साथ कथित ज्यादती(?) "खान" नाम होने की वजह से हुई, न ही उस दिन शाहरुख का भारत के स्वतन्त्रता दिवस से कोई लेना-देना था, और इमरान हाशमी की तरह "रोतलापन" दिखाकर उन्होंने अमेरिका में अपनी हँसी ही उड़वाई है, जबकि भारत में "अभी भी" शाहरुख को सही मानने वालों की कमी नहीं होगी, इसका मुझे पूरा विश्वास है।

स्रोत - टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क यूएस तथा India Syndicate

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(भाग…1 से http://desicnn.com/wp/2009/08/24/kaaba-hindu-temple-pn-oak/ आगे जारी…)

उन दिनों काबा में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला “ओकाज़” सिर्फ़ एक मेला या आनंदोत्सव नहीं था, बल्कि यह एक मंच था जहाँ विश्व के कोने-कोने से विद्वान आकर समूचे अरब में फ़ैली वैदिक संस्कृति द्वारा उत्पन्न सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, शैक्षणिक पहलुओं पर खुली चर्चा करते थे। “सायर-उल-ओकुल” का निष्कर्ष है कि इन चर्चाओं और निर्णयों को समूचे अरब जगत में सम्मान और सहमति प्राप्त होती थी। अतः एक प्रकार से मक्का, भारत के वाराणसी की तर्ज पर विद्वानों के बीच अतिमहत्वपूर्ण बहसों के केन्द्र के रूप में उभरा, जहाँ भक्तगण एकत्रित होकर परम-आध्यात्मिक सुख और आशीर्वाद लेते थे। वाराणसी और मक्का दोनों ही जगहों पर इन चर्चाओं और आध्यात्म का केन्द्र निश्चित रूप से शिव का मन्दिर रहा होगा। यहाँ तक कि आज भी मक्का के काबा में प्राचीन शिवलिंग के चिन्ह देखे जा सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि काबा में प्रत्येक मुस्लिम जिस काले पत्थर को छूते और चूमते हैं वह शिवलिंग ही है। हालांकि अरबी परम्परा ने अब काबा के शिव मन्दिर की स्थापना के चिन्हों को मिटा दिया है, लेकिन इसकी खोज विक्रमादित्य के उन शिलालेखों से लगाई जा सकती है जिनका उल्लेख “सायर-उल-ओकुल” में है। जैसा कि सभी जानते हैं राजा विक्रमादित्य शिव के परम भक्त थे, उज्जैन एक समय विक्रमादित्य के शासनकाल में राजधानी रही, जहाँ कि सबसे बड़े शिवलिंग महाकालेश्वर विराजमान हैं। ऐसे में जब विक्रमादित्य का शासनकाल और क्षेत्र अरब देशों तक फ़ैला था, तब क्या मक्का जैसी पवित्र जगह पर उन्होंने शिव का पुरातन मन्दिर स्थापित नहीं किया होगा?

अब हम पश्चिम एशिया और काबा में भारतीय और हिन्दू संस्कारों, संस्कृति से मिलती-जुलती परम्पराओं, प्रतीकों और शैलियों को हम एक के बाद एक देखते जाते हैं, और आप खुद ही अनुमान लगाईये कि आखिर काबा में स्थापित विशाल संरचना जिसे छिपाकर रखा गया है, प्राचीन काल में वह शिव मन्दिर क्यों नहीं हो सकता।

मक्का शहर से कुछ मील दूर एक साइनबोर्ड पर स्पष्ट उल्लेख है कि “इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का आना प्रतिबन्धित है…”। यह काबा के उन दिनों की याद ताज़ा करता है, जब नये-नये आये इस्लाम ने इस इलाके पर अपना कब्जा कर लिया था। इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का प्रवेश इसीलिये प्रतिबन्धित किया गया है, ताकि इस कब्जे के निशानों को छिपाया जा सके। जैसे-जैसे इस्लामी श्रद्धालु काबा की ओर बढ़ता है, उस भक्त को अपना सिर मुंडाने और दाढ़ी साफ़ कराने को कहा जाता है। इसके बाद वह सिर्फ़ “बिना सिले हुए दो सफ़ेद कपड़े” लपेट कर ही आगे बढ़ सकता है। जिसमें से एक कमर पर लपेटा जाता है व दूसरा कंधे पर रखा जाता है। यह दोनों ही संस्कार प्राचीन काल से हिन्दू मन्दिरों को स्वच्छ और पवित्र रखने हेतु वैदिक अभ्यास के तरीके हैं, यह मुस्लिम परम्परा में कब से आये, जबकि मुस्लिम परम्परा में दाढ़ी साफ़ करने को तो गैर-इस्लामिक बताया गया है? मक्का की मुख्य प्रतीक दरगाह जिसे काबा कहा जाता है, उसे एक बड़े से काले कपड़े से ढँका गया है। यह प्रथा भी “मूल प्रतीक” पर ध्यान न जाने देने के लिये एक छद्म-आवरण के रूप में उन्हीं दिनों से प्रारम्भ की गई होगी, वरना उसे इस तरह काले कपड़े में ढँकने की क्या आवश्यकता है?

“इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका” के अनुसार काबा में 360 मूर्तियाँ थीं। पारम्परिक अरबी आलेखों में उल्लेख है कि जब एक भीषण तूफ़ान से 360 मूर्तियाँ नष्ट हो गईं, तब भी शनि, चन्द्रमा और एक अन्य मूर्ति को प्रकृति द्वारा खण्डित नहीं किया जा सका। यह दर्शाता है कि काबा में स्थापित उस विशाल शिव मन्दिर के साथ अरब लोगों द्वारा नवग्रह की पूजा की जाती थी। भारत में आज भी नवग्रह पूजा की परम्परा जारी है और इसमें से दो मुख्य ग्रह हैं शनि और चन्द्रमा। भारतीय संस्कृति और परम्परा में भी चन्द्रमा को हमेशा शिव के माथे पर विराजित बताया गया है, और इस बात की पूरी सम्भावना है कि यह चन्द्रमा “काबा” के रास्ते इस्लाम ने, उनके झण्डे में अपनाया हो।

काबा से जुड़ी एक और हिन्दू संस्कृति परम्परा है “पवित्र गंगा” की अवधारणा। जैसा कि सभी जानते हैं भारतीय संस्कृति में शिव के साथ गंगा और चन्द्रमा के रिश्ते को कभी अलग नहीं किया जा सकता। जहाँ भी शिव होंगे, पवित्र गंगा की अवधारणा निश्चित ही मौजूद होती है। काबा के पास भी एक पवित्र झरना पाया जाता है, इसका पानी भी पवित्र माना जाता है, क्योंकि इस्लामिक काल से पहले भी इसे पवित्र (आबे ज़म-ज़म) ही माना जाता था। आज भी मुस्लिम श्रद्धालु हज के दौरान इस आबे ज़मज़म को अपने साथ बोतल में भरकर ले जाते हैं। ऐसा क्यों है कि कुम्भ में शामिल होने वाले हिन्दुओं द्वारा गंगाजल को पवित्र मानने और उसे बोतलों में भरकर घरों में ले जाने, तथा इसी प्रकार हज की इस परम्परा में इतनी समानता है? इसके पीछे क्या कारण है।

काबा में मुस्लिम श्रद्धालु उस पवित्र जगह की सात बार परिक्रमा करते हैं, दुनिया की किसी भी मस्जिद में “परिक्रमा” की कोई परम्परा नहीं है, ऐसा क्यों? हिन्दू संस्कृति में प्रत्येक मन्दिर में मूर्ति की परिक्रमा करने की परम्परा सदियों पुरानी है। क्या काबा में यह “परिक्रमा परम्परा” पुरातन शिव मन्दिर होने के काल से चली आ रही है? अन्तर सिर्फ़ इतना है कि मुस्लिम श्रद्धालु ये परिक्रमा उल्टी ओर (Anticlockwise) करते हैं, जबकि हिन्दू भक्त सीधी तरफ़ यानी Clockwise। लेकिन हो सकता है कि यह बारीक सा अन्तर इस्लाम के आगमन के बाद किया गया हो, जिस प्रकार उर्दू भी दांये से बांये लिखी जाती है, उसी तर्ज पर। “सात” परिक्रमाओं की परम्परा संस्कृत में “सप्तपदी” के नाम से जानी जाती है, जो कि हिन्दुओं में पवित्र विवाह के दौरान अग्नि के चारों तरफ़ लिये जाते हैं। “मखा” का मतलब होता है “अग्नि”, और पश्चिम एशिया स्थित “मक्का” में अग्नि के सात फ़ेरे लिया जाना किस संस्कृति की ओर इशारा करता है?

यह बात तो पहले से ही स्थापित है और लगभग सभी विद्वान इस पर एकमत हैं कि विश्व की सबसे प्राचीन भाषा पाली, प्राकृत और संस्कृत हैं। कुर-आन का एक पद्य “यजुर्वेद” के एक छन्द का हूबहू अनुवाद है, यह बिन्दु विख्यात इतिहास शोधक पण्डित सातवलेकर ने अपने एक लेख में दर्शाया है। एक और विद्वान ने निम्नलिखित व्याख्या और उसकी शिक्षा को कुरान में और केन उपनिषद के 1.7 श्लोक में एक जैसा पाया है।

कुरान में उल्लेख इस प्रकार है -
“दृष्टि उसे महसूस नहीं कर सकती, लेकिन वह मनुष्य की दृष्टि को महसूस कर सकता है, वह सभी रहस्यों को जानता है और उनसे परिचित है…”

केन उपनिषद में इस प्रकार है -

“वह” आँखों से नहीं देखा जा सकता, लेकिन उसके जरिये आँखें बहुत कुछ देखती हैं, वह भगवान है या कुछ और जिसकी इस प्रकट दुनिया में हम पूजा करते हैं…”

इसका सरल सा मतलब है कि : भगवान एक है और वह किसी भी सांसारिक या ऐन्द्रिय अनुभव से परे है।

इस्लाम के अस्तित्व में आने के 1300 वर्ष हो जाने के बावजूद कई हिन्दू संस्कार, परम्परायें और विधियाँ आज भी पश्चिम एशिया में विद्यमान हैं। आईये देखते हैं कि कौन-कौन सी हिन्दू परम्परायें इस्लाम में अभी भी मौजूद हैं – हिन्दुओं की मान्यता है कि 33 करोड़ देवताओं का एक देवकुल होता है, पश्चिम एशिया में भी इस्लाम के आने से पहले 33 भगवानों की पूजा की जाती थी। चन्द्रमा आधारित कैलेण्डर पश्चिम एशिया में हिन्दू शासनकाल के दौरान ही शुरु किया गया। मुस्लिम कैलेण्डर का माह “सफ़र” हिन्दुओं का “अधिक मास” ही है, मुस्लिम माह “रबी” असल में “रवि” (अर्थात सूर्य) का अपभ्रंश है (संस्कृत में “व” प्राकृत में कई जगह पर “ब” होता है)। मुस्लिम परम्परा “ग्यारहवीं शरीफ़”, और कुछ नहीं हिन्दू “एकादशी” ही है और दोनों का अर्थ भी समान ही है। इस्लाम की परम्परा “बकरीद”, वैदिक कालीन परम्परा “गो-मेध” और “अश्व-मेध” यज्ञ से ली गई है। संस्कृत में “ईद” का अर्थ है पूजा, इस्लाम में विशेष पूजा के दिन को “ईद” कहा गया है। संस्कृत और हिन्दू राशि चक्र में “मेष” का अर्थ मेमना, भेड़, बकरा होता है, प्राचीन काल में जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता था तब मांस के सेवन की दावत दी जाती थी। इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए इस्लाम ने इसे “बकरीद” के रूप में स्वीकार किया है (उल्लेखनीय है कि हिन्दी में भी “बकरी” का अर्थ बकरी ही होता है)। जिस प्रकार “ईद” का मतलब है पूजा, उसी प्रकार “गृह” का मतलब है घर, “ईदगृह = ईदगाह = पूजा का घर = पूजास्थल, इसी प्रकार “नमाज़” शब्द भी नम + यज्ञ से मिलकर बना है, “नम” अर्थात झुकना, “यज्ञ” अर्थात पूजा, इसलिये नम + यज्ञ = नमज्ञ = नमाज़ (पूजा के लिये झुकना)। इस्लाम में नमाज़ दिन में 5 बार पढ़ी जाती है जो कि वैदिक “पंचमहायज्ञ” का ही एक रूप है (दैनिक पाँच पूजा – पंचमहायज्ञ) जो कि वेदों में सभी व्यक्तियों के लिये दैनिक अनुष्ठान का एक हिस्सा है। वेदों में वर्णन है कि पूजा से पहले, “शरीरं शुद्धयर्थं पंचगंगा न्यासः” अर्थात पूजा से पहले शरीर के पाँचों अंगों को गंगाजल से धोया जाये, इसी प्रकार इस्लाम में नमाज़ से पहले शरीर के पाँचों भागों को स्वच्छ किया जाता है।

इस्लाम में “ईद-उल-फ़ितर” भी मनाया जाता है, जिसका मतलब है “पितरों की ईद” या पितरों की पूजा, अर्थात पूर्वजों का स्मरण करना और उनकी पूजा करना, यह सनातन काल से हिन्दू परम्परा का एक अंग रहा है। हिन्दू लोग “पितर-पक्ष” में अपने पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिये पूजा-हवन करते हैं उन्हें याद करते हैं यही परम्परा इस्लाम में ईद-उल-फ़ितर (पितरों की पूजा) के नाम से जानी जाती है। प्रत्येक मुख्य त्योहार और उत्सव के पहले चन्द्रमा की कलायें देखना, चन्द्रोदय और चन्द्रास्त देखना भी हिन्दू संस्कृति से ही लिया गया है, इस्लाम के आने से हजारों साल पहले से हिन्दू संकष्टी और विनायकी चतुर्थी पर चन्द्रमा के उदय के आधार पर ही उपवास तोड़ते हैं। यहाँ तक कि “अरब” शब्द भी संस्कृत की ही उत्पत्ति है, इसका मूल शब्द था “अरबस्तान” (प्राकृत में “ब” संस्कृत में “व” बनता है अतः “अरवस्तान”)। संस्कृत में “अरव” का अर्थ होता है “घोड़ा” अर्थात “घोड़ों का प्रदेश = अरवस्तान” (अरबी घोड़े आज भी विश्वप्रसिद्ध हैं) अपभ्रंश होते-होते अरवस्तान = अरबस्तान = अरब प्रदेश।

चन्द्रमा के बारे में विभिन्न नक्षत्रीय तारामंडलों और ब्रह्माण्ड की रचना के बारे में वैदिक विवरण कुरान में भी भाग 1, अध्याय 2, पैराग्राफ़ 113, 114, 115, 158 और 189 तथा अध्याय 9, पैराग्राफ़ 37 व अध्याय 10 पैराग्राफ़ 4 से 7 में वैसा ही दिया गया है। हिन्दुओं की भांति इस्लाम में भी वर्ष के चार महीने पवित्र माने जाते हैं। इस दौरान भक्तगण बुरे कर्मों से बचते हैं और अपने भगवान का ध्यान करते हैं, यह परम्परा भी हिन्दुओं के “चातुर्मास” से ली गई है। “शबे-बारात” शिवरात्रि का ही एक अपभ्रंश है, जैसा कि सिद्ध करने की कोशिश है कि काबा में एक विशाल शिव मन्दिर था, तत्कालीन लोग शिव की पूजा करते थे और शिवरात्रि मनाते थे, शिव विवाह के इस पर्व को इस्लाम में “शब-ए-बारात” का स्वरूप प्राप्त हुआ।

ब्रिटैनिका इनसाइक्लोपीडिया के अनुसार काबा की दीवारों पर कई शिलालेख और स्क्रिप्ट मौजूद हैं, लेकिन किसी को भी उनका अध्ययन करने की अनुमति नहीं दी जाती है, एक अमेरिकन इतिहासकार ने इस सम्बन्ध में पत्र व्यवहार किया था, लेकिन उसे भी मना कर दिया गया। लेकिन प्रत्यक्ष देखने वालों का मानना है कि उसमें से कुछ शिलालेख संस्कृत, पाली या प्राकृत भाषा में हो सकते हैं। जब तक उनका अध्ययन नहीं किया जायेगा, विस्तार से इस सम्बन्ध में कुछ और बता पाना मुश्किल है।

(लेखमाला के तीसरे और अन्तिम भाग में संस्कृतनिष्ठ नामों और चिन्हों आदि के बारे में…)
जारी रहेगा भाग…3 में…

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भाजपा में बहुप्रतीक्षित उठापटक आखिरकार शुरु हो ही गई। इस बात का इन्तज़ार काफ़ी समय से किया जा रहा था कि लगातार दो चुनाव हारने के बाद ही सही शायद भाजपा के सिर से "सेकुलर" नाली में लोट लगाने का भूत उतर गया हो, लेकिन शायद अभी नहीं। सबसे पहले पुस्तक के बहाने जसवन्त सिंह को बाहर किया गया, जबकि जसवन्त सिंह को बाहर करने की असली वजह है वह चिठ्ठी जिसमें उन्होंने हार के लिये जिम्मेदार व्यक्तियों को पुरस्कृत करने पर सवाल उठाया था। "बहाने से" इसलिये कह रहा हूं कि उनकी विवादित पुस्तक के रिलीज़ होने के 36 घण्टे के भीतर उन्हें अपमानजनक तरीके से निकाल दिया गया, मुझे नहीं पता कि 36 घंटे से कम समय में पार्टी ने या इसके चिन्तकों ने 700 पेज की यह पुस्तक कब पढ़ी, और कब उसमें से यह भी ढूंढ लिया कि यह पार्टी विरोधी है, लेकिन ताबड़तोड़ न कोई नोटिस, न कोई अनुशासन समिति, सीधे बाहर…।

अब हार के लिये "जिम्मेदार व्यक्ति" यानी कौन? ज़ाहिर है कि पार्टी पर काबिज एक गुट, जो कि भाजपा को सेकुलर बनाने और अपना उल्लू सीधा करके पार्टी को कांग्रेस की एक घटिया "बी" टीम बनाने पर तुला हुआ है। लेकिन "सीधी बात" कर दी अरुण शौरी ने, ऐसे व्यक्ति ने, जिसे पार्टी का बौद्धिक चेहरा समझा जाता है, ज़मीनी नहीं। ऐसे व्यक्ति ने आम कार्यकर्ताओं के मन की बात पढ़ते हुए बिना किसी लाग-लपेट के सच्ची बात कह दी अर्थात "संघ को भाजपा को टेक-ओवर कर लेना चाहिये…", और इस बात से पार्टी में कुछ लोगों को सिर्फ़ मिर्ची नहीं लगी, बल्कि भूचाल सा आ गया है। जबकि अरुण शौरी द्वारा लगाये गये सारे आरोप, एक आम कार्यकर्ता के दिल की बात है।

लेकिन सुधीन्द्र कुलकर्णी नामक "सेकुलर वायरस" ने पार्टी को इस कदर जकड़ रखा था कि उसका असर दिमाग पर भी हो गया था, और पार्टी कुछ सोचने की स्थिति में ही नहीं थी, सिवाय एक बात के कि किस तरह मुसलमानों को खुश किया जाये, किस तरह से मुस्लिम वोट प्राप्त करने के लिये तरह-तरह के जतन किये जायें। जो छोटी सी बात एक सड़क का कार्यकर्ता समझता है कि चाहे भाजपा लगातार 2 माह तक शीर्षासन भी कर ले, मुस्लिम उसे वोट नहीं देने वाले, यह बात शीर्ष नेतृत्व को समझ नहीं आई। पहले इस कुलकर्णी वायरस ने आडवाणी को चपेट में लिया, वे जिन्ना की मज़ार पर गये, वहाँ जाकर पता नहीं क्या-क्या कसीदे काढ़ आये, जबकि बेचारे जसवन्त सिंह ने तो जिन्ना को शराबी, अय्याश और स्वार्थी बताया है। फ़िर भी चैन नहीं मिला तो आडवाणी ने पुस्तक लिख मारी और कंधार प्रकरण से खुद को अलग कर लिया, जबकि बच्चा भी समझता है कि बगैर देश के गृहमंत्री की सलाह या जानकारी के कोई भी इस प्रकार दुर्दान्त आतंकवादियों को साथ लेकर नहीं जा सकता। थोड़ी कसर बाकी रह गई थी, तो खुद को "मजबूत प्रधानमंत्री" भी घोषित करवा लिया, पुस्तक के उर्दू संस्करण के विमोचन में भाजपा-संघ को पानी पी-पीकर कोसने वाले नामवर सिंह और एक अन्य मुस्लिम लेखक को मंच पर बुला लाये। कहने का मतलब यह कि हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद और पार्टी की पहचान बने सारे मुद्दे को छोड़कर भाजपा ने अपनी चाल ही बदल ली, ऐसे में आम कार्यकर्ता का दुखी और हताश होना स्वाभाविक ही था, हालांकि कार्यकर्ता बेमन से ही सही चुनाव प्रचार में जुटे, लेकिन जनता के मन में कांग्रेस के प्रति जो गुस्सा था उसे भाजपा नेतृत्व भुना नहीं पाया, क्योंकि "सेकुलर वायरस" के कारण उसकी आँखों पर हरी पट्टी बँध चुकी थी। पार्टी भूल गई कि जिस विचारधारा और मुद्दों की बदौलत वे 2 सीटों से 190 तक पहुँचे हैं, वही छोड़ देने पर उसे वापस 116 पर आना ही था। वोटिंग पैटर्न देखकर ऐसे कई उदाहरण दिये जा सकते हैं जहाँ मुसलमानों ने रणनीति के तहत "सिर्फ़ भाजपा को हराने के लिये" वोटिंग की है, उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि जीतने वाला कांग्रेसी है, या बसपाई, या सपाई, बस भाजपा को हराना था। यानी भाजपा की हालत "आधी छोड़ पूरी को धाये, आधी पाये न पूरी पाये" जैसी हो गई। जो परम्परागत हिन्दू वोट बैंक था, वह तो दरक गया, कर्मों की वजह से हाथ से खिसक गया और बदले में मिला कुछ नहीं। पार्टी पर काबिज एक गुट ने प्रश्न पूछने के लिये पैसा लेने वाल्रे सांसदों पर कड़ी कार्रवाई नहीं की, स्टिंग आपरेशन होने पर भी बेशर्मी से भ्रष्टों का बचाव करते रहे, टीवी पर चेहरा दिखाने के लालच में धुर-भाजपा विरोधी चैनलों पर चहक-चहककर बातें करते रहे, गरज यह कि पार्टी को बरबाद करने के लिये जो कुछ बन पड़ा सब किया। "हिन्दुत्व" और "राष्ट्रवाद" गये भाड़ में, तब नतीजा तो भुगतना ही था। आडवाणी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि, 2 सीटों से 190 तक ले जाने में उनके राम मन्दिर आंदोलन का बहुत बड़ा हाथ रहा और इसके लिये पार्टी कार्यकर्ता उन्हें श्रेय भी देते हैं, लेकिन वह पिछली सदी और पिछली पीढ़ी की बात थी, "हिन्दुत्व" के उस विराट आंदोलन के बाद आडवाणी को समय रहते अपना चार्ज वक्त रहते किसी युवा के हाथों में दे देना चाहिये था, लेकिन इस बात में जो देरी हुई उसका नतीजा आज पार्टी भुगत रही है।

अब जो चिन्तन-विन्तन के नाम पर जो भी हो रहा है, वह सिर्फ़ आपसी गुटबाजी और सिर-फ़ुटौव्वल है, बाकी कुछ नहीं। गोविन्दाचार्य ने बिलकुल सही कहा कि सैनिक तो लड़ने के लिये तैयार बैठे हैं, सेनापति ही आपस में लड़ रहे हैं, तो युद्ध कैसे जीतेंगे। कार्यकर्ता तो इन्तज़ार कर रहा है कि कब पार्टी गरजकर कहे कि "बस, अब बहुत हुआ!!! राम मन्दिर, धारा 370, समान नागरिक संहिता, बांग्लादेशी घुसपैठिये, उत्तर-पूर्व के राज्यों में सघन धर्मान्तरण, नकली सेकुलरिज़्म का फ़ैलता जाल, जैसे मुद्दों को लेकर जनमानस में माहौल बनाया जाये। पहले से ही महंगाई, भ्रष्टाचार और आतंकवाद से त्रस्त जनता को उद्वेलित करने में अधिक समय नहीं लगेगा, लेकिन यह बात बड़े नेताओं को एक आम कार्यकर्ता कैसे समझाये? उन्हें यह कैसे समझाये कि देश की युवा पीढ़ी भी देश के नपुंसक हालात, बेरोजगारी, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि से त्रस्त है, "राष्ट्रवाद" की एक मजबूत चिंगारी भी एक बड़े वोट बैंक को भाजपा के पीछे खड़ा कर सकती है, लेकिन नेताओं को लड़ने से फ़ुर्सत मिले तब ना। मजे की बात यह भी है कि अब आरोप लग रहे हैं कि भाजपा सशक्त विपक्ष की भूमिका नहीं निभा रहा, क्यों निभाये भाई? पिछले 5 साल में देश की वाट लगी पड़ी है, अगले 5 साल और लगेगी, समस्याओं के लिये कांग्रेस को दोष नहीं देंगे, लेकिन भाजपा पर जिम्मेदार विपक्ष बनने की जिम्मेदारी ढोल रहे हैं। जब जनता ने, मीडिया ने, चुनाव आयोग ने, उद्योगपतियों ने, वोटिंग मशीनों की हेराफ़ेरी ने, सबने मिलकर कांग्रेस को जिताया है, तो अब वही जनता भुगते। भाजपा को पहले अपना घर दुरुस्त करना अधिक जरूरी है।

खैर… भले ही फ़िलहाल इस सेकुलर वायरस ने पार्टी को ICU में पहुँचा रखा हो, भाजपा के तमाम विरोधियों की बाँछें खिली हुई हों, भाजपा की पतली हालत देखकर उनके मन में लड्डू फ़ूट रहे हैं। जबकि ऐसे लोग भी मन ही मन जानते हैं कि कांग्रेस के शासनकाल में जनता अधिक कष्ट भुगतेगी, फ़िर भी उनका मन भाजपा-विरोध पर ही टिका रहता है, ऐसे भाजपा-विरोधी चाहते हैं कि कांग्रेस का विकल्प तो बने, लेकिन "कांग्रेस-बी" के रूप में, हिन्दुत्ववादी भाजपा के रूप में नहीं। ऐसा कैसे होने दिया जा सकता है? जल्दी ही पार्टी के नेताओं को समझ में आयेगा कि "कांग्रेस-बी" बनना उसकी सेहत के लिये ठीक नहीं है, उसे अपने मूल स्वरूप "भाजपा" ही बनकर रहना होगा, और यदि वे कांग्रेस-बी बनना चाहेंगे भी, तो अब आम कार्यकर्ता, भाजपा समर्थक वोटर और अन्य समूह उसे ऐसा करने नहीं देंगे। बस बहुत हुई "सेकुलर नौटंकी", यदि यही रवैया जारी रहा तो कांग्रेस को हराने से पहले भाजपा को हराना पड़ेगा, इतनी बार हराना पड़ेगा कि वह "सेकुलरिज़्म" का नाम भी भूल जाये। अधिक से अधिक क्या होगा, कांग्रेस चुनाव जीतती रहेगी यही ना!!! क्या फ़र्क पड़ेगा, लेकिन अपनी "मूल विचारधारा" से खोखली हो चुकी भाजपा को रास्ते पर लाना अधिक महत्वपूर्ण है, बजाय कांग्रेस की जीत या हार के। पहले देखें कि इस मजमे से निपटने के बाद पार्टी क्या राह पकड़ती है, फ़िर कार्यकर्ता और भाजपा समर्थक भी अपना रुख तय करेंगे। लेकिन एक अदना सी सलाह यह है कि 2004 और 2009 के चुनाव में भाजपा को शाइनिंग इंडिया, विकास, नदी-जोड़ो योजना, स्वर्णिम चतुर्भुज योजना, वाजपेयी की प्रधानमंत्री सड़क योजना आदि के बावजूद जनता ने हरा दिया, तो फ़िर पार्टी को अपनी पुरानी हिन्दुत्ववादी लाइन पर लौटने में क्या हर्ज है? वैसे भी तो हारे ही, फ़िर इस लाइन को अपनाकर हारने में क्या बुराई है? यह मिथक भी सेकुलर मीडिया द्वारा ही फ़ैलाया गया है कि अब आज का युवा साम्प्रदायिक नारों से प्रभावित नहीं होता, सिर्फ़ एक बार यह लाइन सच्चाई से पकड़कर और उस पर ईमानदारी से चलकर देखो तो सही, कैसे बेरोजगारी और महंगाई से त्रस्त हिन्दू वोट बैंक तुम्हारे पीछे एकत्रित होता है, लेकिन जब "कुलकर्णी वायरस" दिमाग पर हावी हो जाता है तब कुछ सूझता नहीं है।

सो फ़िलहाल कार्यकर्ता चिन्ता ना करें, अभी जो हो रहा है होने दिया जाये, कम से कम यह भी पार्टी-लोकतन्त्र का एक हिस्सा ही है, अभी इतनी गिरावट भी नहीं आई कि महारानी या युवराज के एक इशारे पर किसी पार्टी के लोग ज़मीन पर लोट लगाने लगें। सेकुलर बुखार से पीड़ित इस मरीज को अभी थोड़े और झटके सहने पड़ेंगे, लेकिन एक बार यह वायरस उसके शरीर से पूरी तरह निकल जाये, तब "ताज़ा खून" संचारित होते देर नहीं लगेगी, और मरीज फ़िर से चलने-फ़िरने-दौड़ने लगेगा…। आज की तारीख में संघ-भाजपा-हिन्दुत्व विरोधियों का "पार्टी-टाइम" चल रहा है, उन्हें मनाने दो…

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हाल ही में एक सेमिनार में प्रख्यात लेखिका कुसुमलता केडिया ने विभिन्न पश्चिमी पुस्तकों और शोधों के हवाले से यह तर्कसिद्ध किया कि विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में बहुत गहरे अन्तर्सम्बन्ध रहे हैं। पुस्तक "फ़िंगरप्रिंट्स ऑफ़ द गॉड - लेखक ग्राहम हैन्नोक" तथा एक अन्य पुस्तक "1434" (लेखक - गेविन मेनजीस) का "रेफ़रेंस" देते हुए उन्होंने बताया कि पश्चिम के शोधकर्ताओं को "सभ्यताओं" सम्बन्धी खोज करते समय अंटार्कटिका क्षेत्र के नक्शे भी प्राप्त हुए हैं, जो कि बेहद कुशलता से तैयार किये गये थे, इसी प्रकार कई बेहद प्राचीन नक्शों में कहीं-कहीं चीन को "वृहत्तर भारत" का हिस्सा भी चित्रित किया गया है। अब इस सम्बन्ध में पश्चिमी लेखकों और शोधकर्ताओं में आम सहमति बनती जा रही है कि पृथ्वी पर मानव का अस्तित्व 12,000 वर्ष से भी पुराना है, और उस समय की कई सभ्यताएं पूर्ण विकसित थीं।

हालांकि "काबा एक शिव मन्दिर है", इस लेखमाला का ऊपर उल्लेखित तथ्यों से कोई सम्बन्ध नहीं है, लेकिन जैसा कि केडिया जी ने कहा है कि विश्व का इतिहास जो हमें पढ़ाया जाता है या बताया जाता है अथवा दर्शाया जाता है, वह असल में ईसा पूर्व 4000 वर्ष का ही कालखण्ड है और Pre-Christianity काल को ही विश्व का इतिहास मानता है। लेकिन जब आर्कियोलॉजिस्ट और प्रागैतिहासिक काल के शोधकर्ता इस 4000 वर्ष से और पीछे जाकर खोजबीन करते हैं तब उन्हें कई आश्चर्यजनक बातें पता चलती हैं।

यह प्रश्न कई बार और कई जगहों पर पूछा गया है कि क्या मुस्लिमों का तीर्थ स्थल “काबा” एक हिन्दू मन्दिर है या था? इस बारे में काफ़ी लोगों को शक है कि आखिर काबा के बाहर चांदी की गोलाईदार फ़्रेम में जड़ा हुआ काला पत्थर क्या है? काबा में काले परदे से ढँकी हुई उस विशाल संरचना के भीतर क्या है? क्यों काबा के कुछ इलाके गैर-मुस्लिमों के लिये प्रतिबन्धित हैं? आखिर मुस्लिम काबा में परिक्रमा क्यों करते हैं? इन सवालों के जवाब में सबसे प्रामाणिक और ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों के साथ भारतीय इतिहासकार पीएन ओक तथा हिन्दू धर्म के प्रखर विद्वान अमेरिकी इतिहासकार स्टीफ़न नैप की साईटों पर कुछ सामग्री मिलती है। इतिहासकारों में पीएन ओक के निष्कर्षों को लेकर गहरे मतभेद हैं, लेकिन जैसे-जैसे नये-नये तथ्य, नक्शे और प्राचीन ग्रन्थों के सन्दर्भ सामने आते जा रहे हैं, हिन्दू वैदिक संस्कृति का प्रभाव समूचे पश्चिम एशिया और अरब देशों में था यह सिद्ध होता जायेगा। कम्बोडिया और इंडोनेशिया में पहले से मौजूद मंदिर तथा बामियान में ध्वस्त की गई बुद्ध की मूर्ति इस बात की ओर स्पष्ट संकेत तो करती ही है। हिन्दू संस्कृति के धुर-विरोधी इतिहासकार भी इस बात को तो मानते ही हैं कि इस्लाम के प्रादुर्भाव के पश्चात कई-कई मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ा गया, लेकिन फ़िर भी संस्कृति की एक अन्तर्धारा सतत मौजूद रही जो कि विभिन्न परम्पराओं में दिखाई भी देती है।

पीएन ओक ने अपने एक विस्तृत लेख में इस बात पर बिन्दुवार चर्चा की है। पीएन ओक पहले सेना में कार्यरत थे और सेना की नौकरी छोड़कर उन्होंने प्राचीन भारत के इतिहास पर शोध किया और विभिन्न देशों में घूम-घूम कर कई प्रकार के लेख, शिलालेखों के नमूने, ताड़पत्र आदि का अध्ययन किया। पीएन ओक की मृत्यु से कुछ ही समय पहले की बात है, कुवैत में एक गहरी खुदाई के दौरान कांसे की स्वर्णजड़ित गणेश की मूर्ति प्राप्त हुई थी। कुवैत के उस मुस्लिम रहवासी ने उस मूर्ति को लेकर कौतूहल जताया था तथा इतिहासकारों से हिन्दू सभ्यता और अरब सभ्यता के बीच क्या अन्तर्सम्बन्ध हैं यह स्पष्ट करने का आग्रह किया था।

जब पीएन ओक ने इस सम्बन्ध में गहराई से छानबीन करने का निश्चय किया तो उन्हें कई चौंकाने वाली जानकारियाँ मिली। तुर्की के इस्ताम्बुल शहर की प्रसिद्ध लायब्रेरी मकतब-ए-सुल्तानिया में एक ऐतिहासिक ग्रन्थ है “सायर-उल-ओकुल”, उसके पेज 315 पर राजा विक्रमादित्य से सम्बन्धित एक शिलालेख का उल्लेख है, जिसमें कहा गया है कि “…वे लोग भाग्यशाली हैं जो उस समय जन्मे और राजा विक्रम के राज्य में जीवन व्यतीत किया, वह बहुत ही दयालु, उदार और कर्तव्यनिष्ठ शासक था जो हरे व्यक्ति के कल्याण के बारे में सोचता था। लेकिन हम अरब लोग भगवान से बेखबर अपने कामुक और इन्द्रिय आनन्द में खोये हुए थे, बड़े पैमाने पर अत्याचार करते थे, अज्ञानता का अंधकार हमारे चारों तरफ़ छाया हुआ था। जिस तरह एक भेड़ अपने जीवन के लिये भेड़िये से संघर्ष करती है, उसी प्रकार हम अरब लोग अज्ञानता से संघर्षरत थे, चारों ओर गहन अंधकार था। लेकिन विदेशी होने के बावजूद, शिक्षा की उजाले भरी सुबह के जो दर्शन हमें राजा विक्रमादित्य ने करवाये वे क्षण अविस्मरणीय थे। उसने अपने पवित्र धर्म को हमारे बीच फ़ैलाया, अपने देश के सूर्य से भी तेज विद्वानों को इस देश में भेजा ताकि शिक्षा का उजाला फ़ैल सके। इन विद्वानों और ज्ञाताओं ने हमें भगवान की उपस्थिति और सत्य के सही मार्ग के बारे में बताकर एक परोपकार किया है। ये तमाम विद्वान, राजा विक्रमादित्य के निर्देश पर अपने धर्म की शिक्षा देने यहाँ आये…”।

उस शिलालेख के अरेबिक शब्दों का रोमन लिपि में उल्लेख यहाँ किया जाना आवश्यक है…उस स्र्किप्ट के अनुसार, “…इट्राशाफ़ई सन्तु इबिक्रामतुल फ़ाहालामीन करीमुन यात्राफ़ीहा वायोसास्सारु बिहिल्लाहाया समाइनि एला मोताकाब्बेरेन सिहिल्लाहा युही किद मिन होवा यापाखारा फाज्जल असारी नाहोने ओसिरोम बायिआय्हालम। युन्दान ब्लाबिन कज़ान ब्लानाया सादुन्या कानातेफ़ नेतेफ़ि बेजेहालिन्। अतादारि बिलामासा-रतीन फ़ाकेफ़तासाबुहु कौन्निएज़ा माज़ेकाराल्हादा वालादोर। अश्मिमान बुरुकन्कद तोलुहो वातासारु हिहिला याकाजिबाय्माना बालाय कुल्क अमारेना फानेया जौनाबिलामारि बिक्रामातुम…” (पेज 315 साया-उल-ओकुल, जिसका मतलब होता है “यादगार शब्द”)। एक अरब लायब्रेरी में इस शिलालेख के उल्लेख से स्पष्ट है कि विक्रमादित्य का शासन या पहुँच अरब प्रायद्वीप तक निश्चित ही थी।

उपरिलिखित शिलालेख का गहन अध्ययन करने पर कुछ बातें स्वतः ही स्पष्ट होती हैं जैसे कि प्राचीन काल में विक्रमादित्य का साम्राज्य अरब देशों तक फ़ैला हुआ था और विक्रमादित्य ही वह पहला राजा था जिसने अरब में अपना परचम फ़हराया, क्योंकि उल्लिखित शिलालेख कहता है कि “राजा विक्रमादित्य ने हमें अज्ञान के अंधेरे से बाहर निकाला…” अर्थात उस समय जो भी उनका धर्म या विश्वास था, उसकी बजाय विक्रमादित्य के भेजे हुए विद्वानों ने वैदिक जीवन पद्धति का प्रचार तत्कालीन अरब देशों में किया। अरबों के लिये भारतीय कला और विज्ञान की सीख भारतीय संस्कृति द्वारा स्थापित स्कूलों, अकादमियों और विभिन्न सांस्कृतिक केन्द्रों के द्वारा मिली।

इस निष्कर्ष का सहायक निष्कर्ष इस प्रकार हैं कि दिल्ली स्थित कुतुब मीनार विक्रमादित्य के अरब देशों की विजय के जश्न को मनाने हेतु बनाया एक स्मारक भी हो सकता है। इसके पीछे दो मजबूत कारण हैं, पहला यह कि तथाकथित कुतुब-मीनार के पास स्थित लोहे के खम्भे पर शिलालेख दर्शाता है कि विजेता राजा विक्रमादित्य की शादी राजकुमारी बाल्हिका से हुई। यह “बाल्हिका” कोई और नहीं पश्चिम एशिया के बाल्ख क्षेत्र की राजकुमारी हो सकती है। ऐसा हो सकता है कि विक्रमादित्य द्वारा बाल्ख राजाओं पर विजय प्राप्त करने के बाद उन्होंने उनकी पुत्री का विवाह विक्रमादित्य से करवा दिया हो।

अथवा, दूसरा तथ्य यह कि कुतुब-मीनार के पास स्थित नगर “महरौली”, इस महरौली का नाम विक्रमादित्य के दरबार में प्रसिद्ध गणित ज्योतिषी मिहिरा के नाम पर रखा गया है। “महरौली” शब्द संस्कृत के शब्द “मिहिरा-अवली” से निकला हुआ है, जिसका अर्थ है “मिहिरा” एवं उसके सहायकों के लिये बनाये गये मकानों की श्रृंखला। इस प्रसिद्ध गणित ज्योतिषी को तारों और ग्रहों के अध्ययन के लिये इस टावर का निर्माण करवाया गया हो सकता है, जिसे कुतुब मीनार कहा जाता है।

अपनी खोज को दूर तक पहुँचाने के लिये अरब में मिले विक्रमादित्य के उल्लेख वाले शिलालेख के निहितार्थ को मिलाया जाये तो उस कहानी के बिखरे टुकड़े जोड़ने में मदद मिलती है कि आखिर यह शिलालेख मक्का के काबा में कैसे आया और टिका रहा? ऐसे कौन से अन्य सबूत हैं जिनसे यह पता चल सके कि एक कालखण्ड में अरब देश, भारतीय वैदिक संस्कृति के अनुयायी थे? और वह शान्ति और शिक्षा अरब में विक्रमादित्य के विद्बानों के साथ ही आई, जिसका उल्लेख शिलालेख में “अज्ञानता और उथलपुथल” के रूप में वर्णित है? इस्ताम्बुल स्थित प्रसिद्ध लायब्रेरी मखतब-ए-सुल्तानिया, जिसकी ख्याति पश्चिम एशिया के सबसे बड़े प्राचीन इतिहास और साहित्य का संग्रहालय के रूप में है। लायब्रेरी के अरेबिक खण्ड में प्राचीन अरबी कविताओं का भी विशाल संग्रह है। यह संकलन तुर्की के शासक सुल्तान सलीम के आदेशों के तहत शुरु किया गया था। उस ग्रन्थ के भाग “हरीर” पर लिखे हुए हैं जो कि एक प्रकार का रेशमी कपड़ा है। प्रत्येक पृष्ठ को एक सजावटी बॉर्डर से सजाया गया है। यही संकलन “साया-उल-ओकुल” के नाम से जाना जाता है जो कि तीन खण्डों में विभाजित किया गया है। इस संकलन के पहले भाग में पूर्व-इस्लामिक अरब काल के कवियों का जीवन वर्णन और उनकी काव्य रचनाओं को संकलित किया गया है। दूसरे भाग में उन कवियों के बारे में वर्णन है जो पैगम्बर मुहम्मद के काल में रहे और कवियों की यह श्रृंखला बनी-उम-मय्या राजवंश तक चलती है। तीसरे भाग में इसके बाद खलीफ़ा हारुन-अल-रशीद के काल तक के कवियों को संकलित किया गया है। इस संग्रह का सम्पादन और संकलन तैयार किया है अबू आमिर असामाई ने जो कि हारुन-अल-रशीद के दरबार में एक भाट था। “साया-उल-ओकुल” का सबसे पहला आधुनिक संस्करण बर्लिन में 1864 में प्रकाशित हुआ, इसके बाद एक और संस्करण 1932 में बेरूत से प्रकाशित किया गया।

यह संग्रह प्राचीन अरबी कविताओं का सबसे आधिकारिक, सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण संकलन माना जाता है। यह प्राचीन अरब जीवन के सामाजिक पहलू, प्रथाओं, परम्पराओं, तरीकों, मनोरंजन के तरीकों आदि पर पर्याप्त प्रकाश डालता है। इस प्राचीन पुस्तक में प्रतिवर्ष मक्का में आयोजित होने वाले समागम जिसे “ओकाज़” के नाम से जाना जाता है, और जो कि काबा के चारों ओर आयोजित किया जाता है, के बारे में विस्तार से जानकारियाँ दी गई हैं। काबा में वार्षिक “मेले” (जिसे आज हज कहा जाता है) की प्रक्रिया इस्लामिक काल से पहले ही मौजूद थी, यह बात इस पुस्तक को सूक्ष्मता से देखने पर साफ़ पता चल जाती है।

(इस लेखमाला के भाग-2 में हम देखेंगे हिन्दू संस्कृति से मिलती-जुलती इस्लामिक पद्धतियाँ… और भारतीय वैदिक संस्कृति और परम्पराओं का अरब पर प्रभाव) जारी रहेगा भाग…2 में…

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जबसे स्वाइन फ़्लू का “सुपर हौवा” मीडिया ने खड़ा किया है और उसके बाद लोगबाग हिसाब किताब लगाने लगे हैं कि आखिर इस “डराने वाले खेल” में कौन कितना कमा रहा है, कोई बता रहा है कि 10 रुपये का मास्क 200 रुपये में बिका, किसी ने बताया कि निजी अस्पताल विभिन्न टेस्ट के नाम पर लूट रहे हैं, डॉक्टरों के यहाँ भीड़ लगी पड़ी है और उन्हें नोट गिनने से ही फ़ुर्सत नहीं है… लेकिन शायद आपको पता नहीं होगा कि इस बीमारी के नाम पर डरा-धमकाकर भारत में जितनी और जैसी भी कमाई हो रही है वह “चिड़िया का चुग्गा” भर है।

एक नज़र इधर भी डालिये जनाब – स्वाइन फ़्लू पर कारगर दवा के रूप में रातोंरात मशहूर हो चुकी (हालांकि अभी इसमें भी संदेह है कि यह बच्चों पर कितनी कारगर है) दवाई “टैमीफ़्लू” की स्विट्ज़रलैंड स्थित बहुराष्ट्रीय कम्पनी “रॉश” (Roche) ने गत 6 माह में 938 मिलियन डालर (659 मिलियन यूरो – भारतीय रुपये में गणना मत कीजिये चक्कर आ जायेगा) का माल विभिन्न देशों को बेचा है। रॉश कम्पनी की वार्षिक सेल से 203% अधिक का टारगेट सिर्फ़ 6 माह में हासिल कर लिया गया है। इसके अलावा अभी भी अलग-अलग देशों और अन्तर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थानों की ओर से भारी मांग बनी हुई है। (यहाँ देखें http://www.nytimes.com/2009/07/24/business/24roche.html) कम्पनी के अध्यक्ष सेवेरिन श्वान कहते हैं कि टैमीफ़्लू की इस भारी मांग के बावजूद वह अपने ऑर्डर पूरा करने में सक्षम हैं लेकिन दवाओं के सभी ऑर्डर इस साल के अन्त तक ही दिये जा सकेंगे। कम्पनी की योजना है कि सन 2010 तक टैमीफ़्लू का उत्पादन 400 मिलियन पैकेट प्रतिवर्ष तक बढ़ाया जाये, जो कि आज की स्थिति से चार गुना अधिक होगा (यानी कम्पनी स्वाइन फ़्लू के प्रति बेहद “आशावान” है)।





इस बड़े “खेल” में एक पेंच यह भी है कि कैलीफ़ोर्निया स्थित “जिलीड साइंसेस” नामक कम्पनी ने इस दवा का आविष्कार किया है, और इसका पेटेंट और लाइसेंस भी उसी के पास है, अतः जितनी अधिक टैमीफ़्लू बिकेगी, उतनी ही अधिक रॉयल्टी जिलीड साइंसेस को मिलेगी, और यह कोई संयोग नहीं हो सकता कि जिलीड साइंसेस कम्पनी के सबसे प्रमुख शेयर होल्डर हैं अमेरिका पूर्व रक्षा सचिव डोनल्ड रम्सफ़ेल्ड। क्या हुआ चौंक गये क्या? यह रम्सफ़ेल्ड साहब वहीं शख्स हैं, जिन्होंने जॉर्ज बुश को ईराक के खिलाफ़ भड़काने में सबसे प्रमुख भूमिका निभाई थी, इन्ही साहब ने “इराक के पास महाविनाशक हथियार हैं” वाली थ्योरी को मीडिया के जरिये आगे बढ़ाया था। अब ये बात और है कि ईराक के पास से न कुछ मिलना था, न ही मिला लेकिन “तेल के खेल” में अमेरिका, जॉर्ज बुश की तेल कम्पनी और रम्सफ़ेल्ड ने अरबों डालर कमा लिये।
डोनल्ड रम्सफ़ेल्ड 1997 में जिलीड रिसर्च बायोटेक के चेयरमैन बने और 2001 में उन्होंने जॉर्ज बुश सरकार में पद ग्रहण किया, और आज की तारीख में भी उनके पास “जिलीड” के लगभग 25 मिलियन डालर के शेयर हैं। बुश प्रशासन के एक और पूर्व रक्षा सचिव जॉर्ज शुल्ट्ज़ भी जिलीड कम्पनी के बोर्ड मेम्बर हैं और उन्होंने सन 2005 से लेकर अब तक 7 मिलियन डालर के शेयर बेचे हैं। सन्देह की पुष्टि की बात यह है कि अमेरिका कि फ़ेडरल सरकार टैमीफ़्लू की सबसे बड़ी ग्राहक भी है, पेंटागन ने जुलाई में 58 मिलियन डालर की टैमीफ़्लू खरीदी के आदेश जारी किये हैं ताकि विश्व के विभिन्न इलाकों में रहने वाले सैनिकों को यह दवा भेजी जा सके, जबकि अमेरिकी कांग्रेस एक और बड़ी खरीदी के बिल पर विचार कर रही है। मजे की बात यह भी है कि जिलीड साइंस ही ओसेटमिविर नामक दवा बनाती है जो बर्ड फ़्लू के उपचार में काम आती है… और पिछले 5-7 वर्ष के दौरान अचानक विश्व में “सार्स”, “बर्ड फ़्लू”, एवियन फ़्लू, स्वाइन फ़्लू नामक नई-नई बीमारियाँ देखने में आने लगीं? इन्हें देखें…
http://www.timesonline.co.uk/tol/news/uk/health/Swine_flu/article6737507.ece और http://www.infowars.net/articles/november2005/081105birdflu.htm

स्वाइन फ़्लू का वायरस प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों की गलती की वजह से फ़ैला? ऐसा हो सकता है, “रशिया टुडे” में वेयन मैडसेन द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक स्वाइन फ़्लू का वायरस “मानव निर्मित” है और यह वैज्ञानिकों और प्रयोगकर्ताओं की गलती की वजह से मेक्सिको में फ़ैला और फ़िर आगे दुनिया में बढ़ा… देखें यह रिपोर्ट http://www.russiatoday.com/Top_News/2009-07-16/Swine_flu_virus_began_life_in_a_lab.html

(अतः इस सम्भावना को खारिज नहीं किया जा सकता कि इन प्रयोगशालाओं के जरिये यह वायरस जानबूझकर फ़ैलाया गया हो)

आईये अब देखते हैं कि स्वाइन फ़्लू नामक इस बड़े भारी “षडयन्त्र” को कैसे अंजाम दिया गया –

1) फ़रवरी 2009 – मेक्सिको के CDC ने कहा कि इस वर्ष फ़ैलने वाला फ़्लू टैमीफ़्लू द्वारा नहीं रोका जा सकता और यह फ़्लू टैमीफ़्लू की गोली के प्रति प्रतिरोधी क्षमता हासिल कर चुका है। इस खबर से रॉश कम्पनी की बिक्री में 68% की गिरावट देखी गई। (यहाँ देखें http://www.fiercepharma.com/story/roche-suffers-tamiflu-resistance/2009-02-06)

2) मार्च का प्रथम सप्ताह 2009 – दवा बनाने वाली एक भीमकाय कम्पनी सनोफ़ी एवेन्टिस ने बोर्ड मीटिंग में यह तय किया कि वह मेक्सिको में प्रतिवर्ष फ़ैलने वाले इन्फ़्लुएंज़ा के वैक्सीन निर्माण हेतु 100 मिलियन डालर का निवेश करेगी (तगड़ा माल कमाने की जुगाड़ सभी को दिखाई देने लगी)। (यहाँ देखें http://www.medicalnewstoday.com/articles/142835.php)

3) 18 मार्च 2009 – स्वाइन फ़्लू का पहला मरीज मेक्सिको सिटी में मिला। (यहाँ देखें http://www.who.int/csr/don/2009_04_24/en/index.html)

4) 25 अप्रैल 2009 – एक माह में मेक्सिको में इस बुखार से 60 लोगों की मौत हो गई, जबकि अमेरिका में इसी वायरस से ग्रसित 7 मरीज अपने-आप ठीक भी हो गये। यहाँ देखें (http://uk.reuters.com/article/idUKTRE53N4X020090424)

5) 25 अप्रैल 2009 – इसी दिन इसे “स्वाइन फ़्लू” नाम दिया गया, जबकि न तो यह सूअरों को संक्रमित करती है, न ही सूअरों के द्वारा फ़ैलती है। यह वायरस मनुष्य से मनुष्य में ही फ़ैलता है।

6) फ़रवरी से अप्रैल 2009 आते-आते मात्र 2 महीने में मीडिया के जरिये यह घोषित कर दिया गया कि “रॉश” कम्पनी की दवाई टैमीफ़्लू स्वाइन फ़्लू पर सर्वाधिक असरकारक है। यहाँ देखें http://www.marketwatch.com/story/roche-talks-who-tamiflu-potential

जबकि जिन जड़ी बूटियों के बारे में स्वामी रामदेव बता रहे थे.. उनका ज़िक्र और स्वाइन फ्लू से लड़ने के उपाय डॉक्टर विरेंदर सोढ़ी (1980 से अमेरिका के निवासी और आयुर्वेद के एमडी) मई 2009 में कर चुके थे, लेकिन उनके पास पालतू मीडिया की ताकत नहीं थी और इतने समय में तो बड़े खिलाड़ी अपना खेल दिखा चुके। यहाँ देखें http://74.125.153.132/search?q=cache:mBxlGe9h0qUJ:goodeatssd.blogspot.com/2009/05/about-swine-flu.html+Tinospora+cordifolia+Swine+Flu&cd=1&hl=en&ct=clnk

स्वाइन फ्लू का पहला केस 18 मार्च 2009 को सामने आया था.. तब से लेकर अब तक क़रीब 150 दिनों (पांच महीने) में दुनियाभर में अधिकतम 1500 मौत हुई हैं (WHO के मुताबिक़ 1154)... इस लिहाज़ से स्वाइन फ्लू दुनिया में रोज़ सात से दस लोगों को मौत का शिकार बना रहा है. जबकि दूसरी संक्रामक बीमारियां ज्यादा ख़तरनाक है.

1) TB ट्यूबरकोलिसिस – रोज़ 900 भारतीय मारे जाते हैं
यहाँ देखें http://www.medindia.net/news/TB-Claims-900-Lives-in-India-Daily-Dr-Ramadoss-36092-1.htm

2) डायरिया– रोज़ 1000 मारे जाते हैं- डायरिया के कारण दुनिया भर में 3.5 मिलियन बच्चे अपने जीवन के 5 वर्ष पूर्ण नहीं कर पाते, और मरने वाला हर पाँचवां बच्चा भारतीय होता है।
(http://www.earthtimes.org/articles/show/109532.html)
(कभी गुलाम नबी आज़ाद को डायरिया के सम्बन्ध में इतने बयान देते देखा है?)

3) मलेरिया से रोज़ाना देश में 41 मौत, जिसमें 13 बच्चे
WHO की ताज़ा रिपोर्ट http://apps.who.int/malaria/wmr2008/malaria2008.pdf
(कभी अम्बुमणि रामादौस को मलेरिया के लिये चिन्तित होते देखा है?)

4) हेपीटाइटिस से रोज़ 273 की मौत- http://74.125.153.132/search?q=cache:ue5L0E7gRvIJ:india.gov.in/citizen/health/hepatitis.php+hepatitis+india+every+year&cd=2&hl=en&ct=clnk

5) देश में रोज़ 214 महिलाएं प्रसव के दौरान मर जाती हैं - यहाँ देखें http://uk.reuters.com/article/idUKLNE51H04H20090218?sp=true
(कभी प्रधानमंत्री को इलाज के अभाव में देश के ग्रामीण इलाकों में रोज़ाना होने वाली महिलाओं की दशा को लेकर राष्ट्र को सम्बोधित करते देखा है?)

6) जापानी बुखार से रोज़ चार मौत- जापानी इन्सेफ़लाइटिस की रिपोर्ट यहाँ देखें
http://www.thaindian.com/newsportal/health/japanese-encephalitis-claimed-963-lives-in-india_10042110.html

7) कैंसर, हार्ट अटैक और अन्य बीमारियों के आंकड़े भी हैरत में डालने वाले हैं. और जबकि इसमें सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों का आँकड़ा शामिल नहीं किया गया है।

कहने का तात्पर्य यह है कि विश्व में फ़ैलने वाली किसी भी महामारी और युद्ध के बारे में कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता कि वह वाकई महामारी और लड़ाई है अथवा “पैसे के भूखे” अमेरिका में बैठे कुछ बड़े “शातिर खिलाड़ियों” का एक घिनौना षडयन्त्र है। स्वाइन का मतलब होता है “सूअर” और जो पैसा कमाने के लिये नीच कर्म करता है…

(भाईयों-बहनों, स्वाइन फ़्लू पर पहले भी कई पोस्ट लिखी जा चुकी हैं लेकिन बड़ी पोस्ट लिखने की मेरी आदत छूटती नहीं, इसलिये स्वाइन फ़्लू पर जरा देर से यह पोस्ट दी है, जरा “हट-के”)

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पहले इन रिश्तेदारियों पर एक नज़र डालिये, तब आप खुद ही समझ जायेंगे कि कैसे और क्यों “मीडिया का अधिकांश हिस्सा” हिन्दुओं और हिन्दुत्व का विरोधी है, किस प्रकार इन लोगों ने एक “नापाक गठजोड़” तैयार कर लिया है, किस तरह ये सब लोग मिलकर सत्ता संस्थान के शिखरों के करीब रहते हैं, किस तरह से इन प्रभावशाली(?) लोगों का सरकारी नीतियों में दखल होता है… आदि।

पेश हैं रिश्ते ही रिश्ते – (दिल्ली की दीवारों पर लिखा होता है वैसे वाले नहीं, ये हैं असली रिश्ते)

-सुज़ाना अरुंधती रॉय, प्रणव रॉय (नेहरु डायनेस्टी टीवी- NDTV) की भांजी हैं।
-प्रणव रॉय “काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशन्स” के इंटरनेशनल सलाहकार बोर्ड के सदस्य हैं।
-इसी बोर्ड के एक अन्य सदस्य हैं मुकेश अम्बानी।
-प्रणव रॉय की पत्नी हैं राधिका रॉय।
-राधिका रॉय, बृन्दा करात की बहन हैं।
-बृन्दा करात, प्रकाश करात (CPI) की पत्नी हैं।

-प्रकाश करात चेन्नै के “डिबेटिंग क्लब” के सदस्य थे।
-एन राम, पी चिदम्बरम और मैथिली शिवरामन भी इस ग्रुप के सदस्य थे।
-इस ग्रुप ने एक पत्रिका शुरु की थी “रैडिकल रीव्यू”।
-CPI(M) के एक वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी की पत्नी हैं सीमा चिश्ती।
-सीमा चिश्ती इंडियन एक्सप्रेस की “रेजिडेण्ट एडीटर” हैं।
-बरखा दत्त NDTV में काम करती हैं।
-बरखा दत्त की माँ हैं श्रीमती प्रभा दत्त।
-प्रभा दत्त हिन्दुस्तान टाइम्स की मुख्य रिपोर्टर थीं।
-राजदीप सरदेसाई पहले NDTV में थे, अब CNN-IBN के हैं (दोनों ही मुस्लिम चैनल हैं)।
-राजदीप सरदेसाई की पत्नी हैं सागरिका घोष।
-सागरिका घोष के पिता हैं दूरदर्शन के पूर्व महानिदेशक भास्कर घोष।
-सागरिका घोष की आंटी रूमा पॉल हैं।
-रूमा पॉल उच्चतम न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश हैं।
-सागरिका घोष की दूसरी आंटी अरुंधती घोष हैं।
-अरुंधती घोष संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थाई प्रतिनिधि हैं।
-CNN-IBN का “ग्लोबल बिजनेस नेटवर्क” (GBN) से व्यावसायिक समझौता है।
-GBN टर्नर इंटरनेशनल और नेटवर्क-18 की एक कम्पनी है।
-NDTV भारत का एकमात्र चैनल है को “अधिकृत रूप से” पाकिस्तान में दिखाया जाता है।
-दिलीप डिसूज़ा PIPFD (Pakistan-India Peoples’ Forum for Peace and Democracy) के सदस्य हैं।
-दिलीप डिसूज़ा के पिता हैं जोसेफ़ बेन डिसूज़ा।
-जोसेफ़ बेन डिसूज़ा महाराष्ट्र सरकार के पूर्व सचिव रह चुके हैं।

-तीस्ता सीतलवाड भी PIPFD की सदस्य हैं।
-तीस्ता सीतलवाड के पति हैं जावेद आनन्द।
-जावेद आनन्द एक कम्पनी सबरंग कम्युनिकेशन और एक संस्था “मुस्लिम फ़ॉर सेकुलर डेमोक्रेसी” चलाते हैं।
-इस संस्था के प्रवक्ता हैं जावेद अख्तर।
-जावेद अख्तर की पत्नी हैं शबाना आज़मी।

-करण थापर ITV के मालिक हैं।
-ITV बीबीसी के लिये कार्यक्रमों का भी निर्माण करती है।
-करण थापर के पिता थे जनरल प्राणनाथ थापर (1962 का चीन युद्ध इन्हीं के नेतृत्व में हारा गया था)।
-करण थापर बेनज़ीर भुट्टो और ज़रदारी के बहुत अच्छे मित्र हैं।
-करण थापर के मामा की शादी नयनतारा सहगल से हुई है।
-नयनतारा सहगल, विजयलक्ष्मी पंडित की बेटी हैं।
-विजयलक्ष्मी पंडित, जवाहरलाल नेहरू की बहन हैं।

-मेधा पाटकर नर्मदा बचाओ आन्दोलन की मुख्य प्रवक्ता और कार्यकर्ता हैं।
-नबाआं को मदद मिलती है पैट्रिक मेकुल्ली से जो कि “इंटरनेशनल रिवर्स नेटवर्क (IRN)” संगठन में हैं।
-अंगना चटर्जी IRN की बोर्ड सदस्या हैं।
-अंगना चटर्जी PROXSA (Progressive South Asian Exchange Network) की भी सदस्या हैं।
-PROXSA संस्था, FOIL (Friends of Indian Leftist) से पैसा पाती है।
-अंगना चटर्जी के पति हैं रिचर्ड शेपायरो।
-FOIL के सह-संस्थापक हैं अमेरिकी वामपंथी बिजू मैथ्यू।
-राहुल बोस (अभिनेता) खालिद अंसारी के रिश्ते में हैं।
-खालिद अंसारी “मिड-डे” पब्लिकेशन के अध्यक्ष हैं।
-खालिद अंसारी एमसी मीडिया लिमिटेड के भी अध्यक्ष हैं।
-खालिद अंसारी, अब्दुल हमीद अंसारी के पिता हैं।
-अब्दुल हमीद अंसारी कांग्रेसी हैं।
-एवेंजेलिस्ट ईसाई और हिन्दुओं के खास आलोचक जॉन दयाल मिड-डे के दिल्ली संस्करण के प्रभारी हैं।

-नरसिम्हन राम (यानी एन राम) दक्षिण के प्रसिद्ध अखबार “द हिन्दू” के मुख्य सम्पादक हैं।
-एन राम की पहली पत्नी का नाम है सूसन।
-सूसन एक आयरिश हैं जो भारत में ऑक्सफ़ोर्ड पब्लिकेशन की इंचार्ज हैं।
-विद्या राम, एन राम की पुत्री हैं, वे भी एक पत्रकार हैं।
-एन राम की हालिया पत्नी मरियम हैं।
-त्रिचूर में आयोजित कैथोलिक बिशपों की एक मीटिंग में एन राम, जेनिफ़र अरुल और केएम रॉय ने भाग लिया है।
-जेनिफ़र अरुल, NDTV की दक्षिण भारत की प्रभारी हैं।
-जबकि केएम रॉय “द हिन्दू” के संवाददाता हैं।
-केएम रॉय “मंगलम” पब्लिकेशन के सम्पादक मंडल सदस्य भी हैं।
-मंगलम ग्रुप पब्लिकेशन एमसी वर्गीज़ ने शुरु किया है।
-केएम रॉय को “ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन लाइफ़टाइम अवार्ड” से सम्मानित किया गया है।
-“ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन” के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं जॉन दयाल।
-जॉन दयाल “ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल”(AICC) के सचिव भी हैं।
-AICC के अध्यक्ष हैं डॉ जोसेफ़ डिसूज़ा।
-जोसेफ़ डिसूज़ा ने “दलित फ़्रीडम नेटवर्क” की स्थापना की है।
-दलित फ़्रीडम नेटवर्क की सहयोगी संस्था है “ऑपरेशन मोबिलाइज़ेशन इंडिया” (OM India)।
-OM India के दक्षिण भारत प्रभारी हैं कुमार स्वामी।
-कुमार स्वामी कर्नाटक राज्य के मानवाधिकार आयोग के सदस्य भी हैं।
-OM India के उत्तर भारत प्रभारी हैं मोजेस परमार।
-OM India का लक्ष्य दुनिया के उन हिस्सों में चर्च को मजबूत करना है, जहाँ वे अब तक नहीं पहुँचे हैं।
-OMCC दलित फ़्रीडम नेटवर्क (DFN) के साथ काम करती है।
-DFN के सलाहकार मण्डल में विलियम आर्मस्ट्रांग शामिल हैं।
-विलियम आर्मस्ट्रांग, कोलोरेडो (अमेरिका) के पूर्व सीनेटर हैं और वर्तमान में कोलोरेडो क्रिश्चियन यूनिवर्सिटी के प्रेसीडेण्ट हैं। यह यूनिवर्सिटी विश्व भर में ईसा के प्रचार हेतु मुख्य रणनीतिकारों में शुमार की जाती है।
-DFN के सलाहकार मंडल में उदित राज भी शामिल हैं।
-उदित राज के जोसेफ़ पिट्स के अच्छे मित्र भी हैं।
-जोसेफ़ पिट्स ने ही नरेन्द्र मोदी को वीज़ा न देने के लिये कोंडोलीज़ा राइस से कहा था।
-जोसेफ़ पिट्स “कश्मीर फ़ोरम” के संस्थापक भी हैं।
-उदित राज भारत सरकार के नेशनल इंटीग्रेशन काउंसिल (राष्ट्रीय एकता परिषद) के सदस्य भी हैं।
-उदित राज कश्मीर पर बनी एक अन्तर्राष्ट्रीय समिति के सदस्य भी हैं।
-सुहासिनी हैदर, सुब्रह्मण्यम स्वामी की पुत्री हैं।
-सुहासिनी हैदर, सलमान हैदर की पुत्रवधू हैं।
-सलमान हैदर, भारत के पूर्व विदेश सचिव रह चुके हैं, चीन में राजदूत भी रह चुके हैं।

-रामोजी ग्रुप के मुखिया हैं रामोजी राव।
-रामोजी राव “ईनाडु” (सर्वाधिक खपत वाला तेलुगू अखबार) के संस्थापक हैं।
-रामोजी राव ईटीवी के भी मालिक हैं।
-रामोजी राव चन्द्रबाबू नायडू के परम मित्रों में से हैं।

-डेक्कन क्रॉनिकल के चेयरमैन हैं टी वेंकटरमन रेड्डी।
-रेड्डी साहब कांग्रेस के पूर्व राज्यसभा सदस्य हैं।
-एमजे अकबर डेक्कन क्रॉनिकल और एशियन एज के सम्पादक हैं।
-एमजे अकबर कांग्रेस विधायक भी रह चुके हैं।
-एमजे अकबर की पत्नी हैं मल्लिका जोसेफ़।
-मल्लिका जोसेफ़, टाइम्स ऑफ़ इंडिया में कार्यरत हैं।

-वाय सेमुअल राजशेखर रेड्डी आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।
-सेमुअल रेड्डी के पिता राजा रेड्डी ने पुलिवेन्दुला में एक डिग्री कालेज व एक पोलीटेक्नीक कालेज की स्थापना की।
-सेमुअल रेड्डी ने कहा है कि आंध्रा लोयोला कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उक्त दोनों कॉलेज लोयोला समूह को दान में दे दिये।
-सेमुअल रेड्डी की बेटी हैं शर्मिला।
-शर्मिला की शादी हुई है “अनिल कुमार” से। अनिल कुमार भी एक धर्म-परिवर्तित ईसाई हैं जिन्होंने “अनिल वर्ल्ड एवेंजेलिज़्म” नामक संस्था शुरु की और वे एक सक्रिय एवेंजेलिस्ट (कट्टर ईसाई धर्म प्रचारक) हैं।
-सेमुअल रेड्डी के पुत्र जगन रेड्डी युवा कांग्रेस नेता हैं।
-जगन रेड्डी “जगति पब्लिकेशन प्रा. लि.” के चेयरमैन हैं।
-भूमना करुणाकरा रेड्डी, सेमुअल रेड्डी की करीबी हैं।
-करुणाकरा रेड्डी, तिरुमला तिरुपति देवस्थानम की चेयरमैन हैं।
-चन्द्रबाबू नायडू ने आरोप लगाया था कि “लैंको समूह” को जगति पब्लिकेशन्स में निवेश करने हेतु दबाव डाला गया था।
-लैंको कम्पनी समूह, एल श्रीधर का है।
-एल श्रीधर, एल राजगोपाल के भाई हैं।
-एल राजगोपाल, पी उपेन्द्र के दामाद हैं।
-पी उपेन्द्र केन्द्र में कांग्रेस के मंत्री रह चुके हैं।
-सन टीवी चैनल समूह के मालिक हैं कलानिधि मारन
-कलानिधि मारन एक तमिल दैनिक “दिनाकरन” के भी मालिक हैं।
-कलानिधि के भाई हैं दयानिधि मारन।
-दयानिधि मारन केन्द्र में संचार मंत्री थे।
-कलानिधि मारन के पिता थे मुरासोली मारन।
-मुरासोली मारन के चाचा हैं एम करुणानिधि (तमिलनाडु के मुख्यमंत्री)।
-करुणानिधि ने ‘कैलाग्नार टीवी” का उदघाटन किया।
-कैलाग्नार टीवी के मालिक हैं एम के अझागिरी।
-एम के अझागिरी, करुणानिधि के पुत्र हैं।
-करुणानिधि के एक और पुत्र हैं एम के स्टालिन।
-स्टालिन का नामकरण रूस के नेता के नाम पर किया गया।
-कनिमोझि, करुणानिधि की पुत्री हैं, और केन्द्र में राज्यमंत्री हैं।
-कनिमोझी, “द हिन्दू” अखबार में सह-सम्पादक भी हैं।
-कनिमोझी के दूसरे पति जी अरविन्दन सिंगापुर के एक जाने-माने व्यक्ति हैं।
-स्टार विजय एक तमिल चैनल है।
-विजय टीवी को स्टार टीवी ने खरीद लिया है।
-स्टार टीवी के मालिक हैं रूपर्ट मर्डोक।

-Act Now for Harmony and Democracy (अनहद) की संस्थापक और ट्रस्टी हैं शबनम हाशमी।
-शबनम हाशमी, गौहर रज़ा की पत्नी हैं।
-“अनहद” के एक और संस्थापक हैं के एम पणिक्कर।
-के एम पणिक्कर एक मार्क्सवादी इतिहासकार हैं, जो कई साल तक ICHR में काबिज रहे।
-पणिक्कर को पद्मभूषण भी मिला।
-हर्ष मन्दर भी “अनहद” के संस्थापक हैं।
-हर्ष मन्दर एक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं।
-हर्ष मन्दर, अजीत जोगी के खास मित्र हैं।
-अजीत जोगी, सोनिया गाँधी के खास हैं क्योंकि वे ईसाई हैं और इन्हीं की अगुआई में छत्तीसगढ़ में जोरशोर से धर्म-परिवर्तन करवाया गया और बाद में दिलीपसिंह जूदेव ने परिवर्तित आदिवासियों की हिन्दू धर्म में वापसी करवाई।
-कमला भसीन भी “अनहद” की संस्थापक सदस्य हैं।
-फ़िल्मकार सईद अख्तर मिर्ज़ा “अनहद” के ट्रस्टी हैं।

-मलयालम दैनिक “मातृभूमि” के मालिक हैं एमपी वीरेन्द्रकुमार
-वीरेन्द्रकुमार जद(से) के सांसद हैं (केरल से)
-केरल में देवेगौड़ा की पार्टी लेफ़्ट फ़्रण्ट की साझीदार है।
-शशि थरूर पूर्व राजनैयिक हैं।
-चन्द्रन थरूर, शशि थरूर के पिता हैं, जो कोलकाता की आनन्दबाज़ार पत्रिका में संवाददाता थे।
-चन्द्रन थरूर ने 1959 में द स्टेट्समैन” की अध्यक्षता की।
-शशि थरूर के दो जुड़वाँ लड़के ईशान और कनिष्क हैं, ईशान हांगकांग में “टाइम्स” पत्रिका के लिये काम करते हैं।
-कनिष्क लन्दन में “ओपन डेमोक्रेसी” नामक संस्था के लिये काम करते हैं।
-शशि थरूर की बहन शोभा थरूर की बेटी रागिनी (अमेरिकी पत्रिका) “इंडिया करंट्स” की सम्पादक हैं।
-परमेश्वर थरूर, शशि थरूर के चाचा हैं और वे “रीडर्स डाइजेस्ट” के भारत संस्करण के संस्थापक सदस्य हैं।

-शोभना भरतिया हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की अध्यक्षा हैं।
-शोभना भरतिया केके बिरला की पुत्री और जीड़ी बिरला की पोती हैं
-शोभना राज्यसभा की सदस्या भी हैं जिन्हें सोनिया ने नामांकित किया था।
-शोभना को 2005 में पद्मश्री भी मिल चुकी है।
-शोभना भरतिया सिंधिया परिवार की भी नज़दीकी मित्र हैं।
-करण थापर भी हिन्दुस्तान टाइम्स में कालम लिखते हैं।
-पत्रकार एन राम की भतीजी की शादी दयानिधि मारन से हुई है।

यह बात साबित हो चुकी है कि मीडिया का एक खास वर्ग हिन्दुत्व का विरोधी है, इस वर्ग के लिये भाजपा-संघ के बारे में नकारात्मक प्रचार करना, हिन्दू धर्म, हिन्दू देवताओं, हिन्दू रीति-रिवाजों, हिन्दू साधु-सन्तों सभी की आलोचना करना एक “धर्म” के समान है। इसका कारण हैं, कम्युनिस्ट-चर्चपरस्त-मुस्लिमपरस्त-तथाकथित सेकुलरिज़्म परस्त लोगों की आपसी रिश्तेदारी, सत्ता और मीडिया पर पकड़ और उनके द्वारा एक “गैंग” बना लिया जाना। यदि कोई समूह या व्यक्ति इस गैंग के सदस्य बन जायें, प्रिय पात्र बन जायें तब उनके और उनकी बिरादरी के खिलाफ़ कोई खबर आसानी से नहीं छपती। जबकि हिन्दुत्व पर ये सब लोग मिलजुलकर हमला बोलते हैं।

(नोट – यह जानकारियाँ नेट पर उपलब्ध विभिन्न वेबसाईट्स, फ़ोरम आदि पर आधारित हैं, इसमें मेरा कोई योगदान नहीं है। यदि इसमें कोई गलती दिखाई दे अथवा किसी नाम या रिश्ते में विसंगति अथवा गलती मिले तो टिप्पणी करें, तत्काल उसमें सुधार किया जायेगा…अपनी तरफ़ से कोई और रिश्ता उजागर करना चाहते हों तो वह भी इसमें जोड़ें…)

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हाल ही में एक अमेरिकी पत्रिका “न्यूज़वीक” ने राहुल गाँधी पर एक कवर स्टोरी तैयार की है, जिसमें पत्रिका के कवर पर उनका एक बड़ा सा फ़ोटो लगा है और लेख में राहुल गाँधी को “एक खामोश क्रान्ति का जनक” बताया गया है। हालांकि यह उपमा वामपंथियों को बिलकुल नहीं सुहायेगी, क्योंकि इतिहास में क्रान्तिकारी तो सिर्फ़ एक-दो ही हुए हैं, जैसे कार्ल मार्क्स या चे ग्वेवारा या माओ त्से तुंग और मजे की बात यह है कि इस लेख के लेखक सुदीप मजूमदार नक्सलवाद के समर्थक माने जाते हैं। बहरहाल, लेख में आगे कहा गया है कि राहुल गाँधी इस देश का “रीमेक” करने जा रहे हैं (मानो यह देश सदियों से एक मिट्टी का लोंदा हो और राहुल एक दक्ष कुम्हार) (लेख यहाँ देखें… http://www.newsweek.com/id/200051 - Sudip Mazumdar)।

पिछले सौ वर्षों में नेहरू-गाँधी परिवार के लगभग सभी सदस्यों ने विदेश में उच्च शिक्षा(?) हासिल की है, या फ़िर इंग्लैंड-अमेरिका में काफ़ी समय बिताया है। पश्चिमी मीडिया और नेहरु-गाँधी पीढ़ी और उनके विरासतियों के बीच प्रगाढ़ सम्बन्ध बहुत पहले से ही रहे हैं। कुछ वर्ष पहले तक राहुल गाँधी विश्व में कुछ खास नहीं पहचाने जाते थे (भारत में ही कौन से जाने-पहचाने जाते थे), पश्चिम और पश्चिमी मीडिया में कुछ समय पहले तक राहुल गांधी की चर्चा कभी-कभार ही हुआ करती थी, वह भी एक “राजपरिवार” के सदस्य के रूप में ही। लेकिन अब अचानक एक लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद पश्चिमी मीडिया ने उन्हें “भारत का भविष्य” घोषित कर दिया है, ठीक वैसे ही जैसे 60 साल पहले “पश्चिम के ही एक और दुलारे” जवाहरलाल, को घोषित किया था। सबसे पहले पश्चिमी मीडिया ने ही नेहरू को भारत का कर्णधार और प्रधानमंत्री घोषित किया था और सरदार पटेल तथा अन्य की राह में मुश्किलें खड़ी कर दी थीं। पश्चिमी मीडिया अपनी मुहिम में सफ़ल भी हुआ और नेहरू-महात्मा की महत्वाकांक्षा के चलते आखिर वे ही प्रधानमंत्री बने। अब यही मीडिया उनके परनाती को भारत का अगला प्रधानमंत्री बनाने पर तुल गया है, और गुणगान करने लग पड़ा है। लेकिन इसमें नया कुछ भी नहीं है, जैसा कि पहले कहा गया कि पश्चिमी सत्ता संस्थान और वहाँ के मीडिया को गाँधी परिवार से खास लगाव है, और यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि ये लोग पश्चिमी शिक्षा-दीक्षा के कारण वहाँ के रंग-ढंग, आचार-विचार में पूरी तरह से ढल चुके होते हैं और फ़िर इनसे कोई काम निकलवाना (यानी कोई विशेष नीतिगत मामला, अंतर्राष्ट्रीय मंचों और समझौतों, UNO आदि में पश्चिम के पक्ष में वोटिंग या “हाँ/ना” में मुंडी हिलाना, तथा अपना माल बेचने के लिये परमाणु करार, हथियार सौदे या क्रूड तेल बेचना आदि करना) आसान हो जाता है।

यह पश्चिमी मीडिया का बहुत पुराना आजमाया हुआ तरीका है, वे पहले एक व्यक्ति को जनता में “प्रोजेक्ट” करते हैं, वर्षों पहले उन्होंने नेहरु को भी भारत का भाग्य-विधाता बताया था, जबकि उन्होंने 1952 के जीप घोटाले में कृष्ण मेनन का पक्ष लेकर भारत में भ्रष्टाचार की नींव का पहला पत्थर रखा था। हालांकि पश्चिम में यह सब पहले से तय किया हुआ होता है कि वे किस देश में “अपने अनुकूल रहने वाला” कैसा नेतृत्व चाहते हैं, वे हमें बताते हैं कि नेहरु अच्छे हैं, इन्दिरा अच्छी हैं, राजीव बहुत सुदर्शन और भोले हैं, सोनिया त्यागमयी हैं और राहुल क्रान्तिकारी हैं। हम पश्चिम की हर बात अपने सिर-माथे लेने के आदी हो चुके हैं, चाहे वह फ़ैशन हो, फ़िल्में हों या कुसंस्कार हों, लगे हाथ नेता भी उनका बताया हुआ ले लेते हैं। पश्चिमी मीडिया के अनुसार राहुल गाँधी भारत की “खोज” कर रहे हैं, ठीक ऐसी ही एक खोज उनके परनाना ने भी की थी। राहुल गाँधी भारत को खोज कैसे रहे हैं, कलावती के झोपड़े में, उत्तरप्रदेश में एक दलित के यहाँ रात गुज़ारकर, और सड़क किनारे खाना खाकर। यदि इसी पैमाने को “भारत खोजना” या “क्रान्तिकारी कदम” कहते हैं तो इससे सौ गुना अधिक तो भाजपा-बसपा-वामपंथी सभी पार्टियों के कई नेता अपनी जवानी में कर चुके हैं, गाँव-गाँव सम्पर्क बनाकर, पदयात्रा करके, धूल-मिट्टी फ़ाँककर… उन्हें तो कभी क्रान्तिकारी नहीं कहा गया। जबकि राहुल गाँधी की शिक्षा-दीक्षा के बारे में संदेह अभी भी बना हुआ है, कि आखिर उन्होंने कौन सी डिग्री ली है? (यहाँ देखें http://baltimore.indymedia.org/newswire/display/14469/index.php)

वैसे अब नवीन चावला के रहते अब हम कभी भी नहीं जान पायेंगे कि आखिर कांग्रेस ने वोटिंग मशीनों में किस प्रकार हेराफ़ेरी की और चुनाव जीती, लेकिन एक बात तय है कि पश्चिम के सत्ता संस्थानों और पश्चिमी मीडिया में “गाँधी परिवार” की अच्छी पकड़ है, उनके बीच एक अच्छी “समझ” और गठबन्धन विकसित हो चुका है, और फ़िर 100 साल से “कैम्ब्रिज” इस परिवार का पसन्दीदा स्थान रहा है। क्या यह मात्र संयोग है या कुछ और? अनौपचारिक बातचीत में कई बड़े-बड़े राजनेता इस बात को दबे-छिपे स्वर में मानते हैं कि बगैर अमेरिका और ब्रिटेन की सहमति के भारत का प्रधानमंत्री बनना बहुत मुश्किल है, यदि कोई बन भी जाये तो टिकना मुश्किल है। अमेरिका को धता बताकर पोखरण परमाणु विस्फ़ोट करने के बाद से ही भाजपा उनकी आँख की किरकिरी बनी, जबकि विश्व बैंक पेंशन होल्डर मनमोहन सिंह उनके सबसे पसन्दीदा उम्मीदवार हैं। कई वरिष्ठ पत्रकार भी मानते हैं कि हमेशा आम चुनावों के दौरान अमेरिका और ब्रिटेन के दिल्ली स्थित दूतावासों में अनपेक्षित और संदेहास्पद गतिविधियाँ अचानक बढ़ जाती हैं।

वापस आते हैं नेहरु-गाँधी के शिक्षा बैकग्राउंड पर, नेहरू ने हार्वर्ड और कैम्ब्रिज में शिक्षा ग्रहण की यह बात सत्य है, उनकी बेटी इन्दिरा प्रियदर्शिनी ने भी लन्दन में काफ़ी समय बिताया (शिक्षा प्राप्त की, कितनी की, क्या प्रभाव छोड़ा आदि कहना जरा मुश्किल है, क्योंकि उस समय का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है), हाँ लेकिन वहाँ इन्दिरा कम्युनिस्टों के सम्पर्क में अवश्य आईं, जैसे कृष्ण मेनन, पीएन हक्सर और ज्योति बसु। राजीव गाँधी भी कैम्ब्रिज में पढ़े और बगैर डिग्री के वापस चले आये, और अब राहुल गाँधी, जो कि न्यूज़वीक के अनुसार पहले हारवर्ड गये, लेकिन डिग्री ली रोलिंस कॉलेज फ़्लोरिडा से और एमफ़िल की कैम्ब्रिज से। मतलब ये कि कैम्ब्रिज भारत के शासकों का एक पसन्दीदा स्थान है, और ये हमारा “सौभाग्य”(?) है कि हमेशा भारत की तकदीर बदलने, अथवा क्रान्तिकारी परिवर्तन होने का सारथी पूरे भारत में सिर्फ़ और सिर्फ़ नेहरु-गाँधी परिवार ही होता है, पहले-पहल ये बात हमें पश्चिमी मीडिया बताता है, फ़िर भारत का मीडिया भी “सदासर्वदा पिछलग्गू” की तरह इस विचार के समर्थन में मुण्डी हिलाता है फ़िर जनता को मूर्ख बनाने की प्रक्रिया शुरु हो जाती है। हालांकि जनता कभी-कभार अपना रुख बदलती है (1977, 1998-99) आदि, लेकिन फ़िर जल्दी ही वह “लाइन” पर आ जाती है।

अभी “न्यूज़वीक” ने यह शुरुआत की है, अब आप जल्द ही अन्य चिकने पन्नों वाली पत्रिकाओं के मुखपृष्ठ पर राहुल गाँधी की तस्वीर पायेंगे, पीछे-पीछे हारवर्ड और येल-ठेल-पेल यूनिवर्सिटियों के कथित मैनेजमेंट गुरु हमें बतायेंगे कि भारत का भविष्य यानी राहुल गाँधी तुम्हारे सामने खड़ा है, उठो और चुन लो। फ़िर नम्बर आयेगा संयुक्त राष्ट्र अथवा किसी अन्य बड़े अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर उनके “अवतरण” का, जहाँ एक लिखा-लिखाया भाषण देकर वे ससम्मान विश्व मंच पर आसीन हो जायेंगे, सबसे अन्त में (हो सकता है एक साल के भीतर ही) बराक ओबामा उन्हें मिलने बुलायें या ऐसा कोई “विशिष्ट संयोग” बन जाये कि हमें बराक ओबामा अथवा बिल गेट्स के साथ दाँत निपोरते और हाथ मिलाते हुए राहुल गाँधी के फ़ोटो देखने को मिल जायें।

अब ये मत पूछियेगा कि अब तक राहुल गांधी का भारत के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक उन्नयन में कितना योगदान है (हिन्दी भाषा में इसे “कौन सा तीर मार लिया”, कहते हैं)? ये भी न पूछियेगा कि यदि राहुल बाबा इतने ही ज्ञानवान और ऊर्जा से भरपूर हैं तो युवाओं से सम्बन्धित मामलों जैसे धारा 377 (समलैंगिकता), हरियाणा की पंचायत द्वारा हत्या किये जाने जैसे मामलों पर बहस करने या बयान देने कभी आगे क्यों नहीं आते? अक्सर उन्हें टीवी पर हाथ हिलाते और कॉलेज के युवकों-युवतियों के साथ मुस्कराते हुए ही क्यों देखा जाता है, बजाय इसके कि वे देश में फ़ैले भ्रष्टाचार के बारे में कुछ करने की बातें करें (आखिर यह रायता भी तो उन्हीं के परिवार ने फ़ैलाया है, इसे समेटने की बड़ी जिम्मेदारी भी उन्हीं की है)? अमरनाथ-कश्मीर-शोपियाँ, धर्मनिरपेक्षता-साम्प्रदायिकता-आरक्षण-युवाओं में फ़ैलती निराशा, देश की जर्जर प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था जैसे ज्वलंत मुद्दों पर कभी आपने उन्हें कभी टीवी पर किसी बहस में हिस्सा लेते देखा है? नहीं देखा होगा, क्योंकि खुद उनकी “मम्मी” ने आज तक मुश्किल से दो-चार इंटरव्यू दिये होंगे (वो भी उस पत्रकार पर बड़ा अहसान जताकर)। “बड़े लोग” (खासकर कैम्ब्रिज/ऑक्सफ़ोर्ड/हार्वर्ड आदि में पढ़े-लिखे) कभी भी “फ़ड़तूस” और “दो कौड़ी के पत्रकारों” को अव्वल तो घर में घुसने ही नहीं देते और जब भी कोई इंटरव्यू या बहस हेतु “बाइट्स” देते भी हैं तो इसकी पूरी व्यवस्था पहले ही की जा चुकी होती है कि चैनल/अखबार का मालिक “चादर से बाहर पैर” न निकाल सके, संवाददाता या पत्रकार की तो औकात ही क्या है, क्योंकि यदि पैसा और पावर हो तो मीडिया को “मैनेज करना” (हिन्दी भाषा में इसे “दरवाजे पर दरबान बनाना” कहते हैं) बेहद आसान होता है।

तो भाईयों और बहनों, राजकुमार के स्वागत में पलक-पाँवड़े बिछाये तैयार रहिये, जल्द ही आपका सुनहरा भविष्य आपके सामने एक जगमगाते हुए प्रधानमंत्री के रूप मे मौजूद होगा, भारत एक महाशक्ति बनेगा, गरीबी मिटेगी, असमानता हटेगी, खुशहाली आने ही वाली है…। और हाँ, यदि आपकी भी इच्छा हो भारत के सुनहरे भविष्य में कुछ हाथ बँटाने की, तो चलिये, उठिये और कैम्ब्रिज की राह पकड़िये…। कहाँ IIT और IIM के चक्कर में पड़े हैं, इन जगहों पर पढ़कर आप अधिक से अधिक किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी के “नौकर” बन सकते हैं, “भारत के सत्ताधारी” नहीं…

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सेकुलर समाचार - कोलकाता से 200 किमी दूर मुर्शिदाबाद के नावदा इलाके के ग्राम त्रिमोहिनी में पुलिस की फ़ायरिंग में 2 ग्रामीणों की मौत हो गई, जबकि दो अन्य की मौत धारदार हथियारों की चोट से हुई। गाँव में दो गुटों के बीच झगड़े में हुई गोलीबारी के बीच यह घटना हुई। इस घटना में भीड़ द्वारा 5 दुकानें जला दी गईं और कुछ दुकानों को लूट लिया गया। पुलिस के अनुसार इस घटना में एक डीएसपी रैंक का अधिकारी और सात अन्य पुलिस वाले पथराव में घायल हुए हैं। राज्य के गृह सचिव अर्धेन्दु सेन ने कहा कि “कुछ बाहरी तत्वों” ने एक स्थानीय स्कूल में घुसकर छात्रों को पीटा, और इस घटना के कारण पास के गाँव त्रिमोहिनी में झगड़ा शुरु हो गया। पुलिस ने दोनों गुटों के बीच संघर्ष को रोकने के लिये बलप्रयोग किया लेकिन असफ़ल रही, और पुलिस फ़ायरिंग में दो ग्रामीणों की मौत हो गई। गृह सचिव के अनुसार “स्थिति तनावपूर्ण लेकिन नियन्त्रण में है तथा जिला मजिस्ट्रेट ने कल गाँव में एक शान्ति बैठक का आयोजन रखा है…”। (12 जुलाई, इंडियन एक्सप्रेस, कोलकाता संस्करण)

ऐसे सैकड़ों समाचार आप रोज़-ब-रोज़ अखबारों में पढ़ते होंगे, यह है “सेकुलर” समाचार बनाने की कला… जिसका दूसरा नाम है सच को छिपाने की कला… एक और नाम दिया जा सकता है, मूर्ख बनाने की कला। क्या आप इस समाचार को पढ़कर जान सकते हैं कि “दो गुट” का मतलब क्या है? किन दो ग्रामीणों की मौत हो गई है? पुलिस पर पथराव क्यों हुआ और डीएसपी रैंक का अधिकारी कैसे घायल हुआ? “बाहरी तत्व” का मतलब क्या है? स्कूल में छात्रों की पिटाई किस कारण से हुई? “शान्ति बैठक” का मतलब क्या है?… यह सब आप नहीं जान सकते, क्योंकि “सेकुलर मीडिया” नहीं चाहता कि आप ऐसा कुछ जानें, वह चाहता है कि जो वह आपको दिखाये-पढ़ाये-सुनाये उसे ही आप या तो सच मानें या उसकी मजबूरी हो तो वह इस प्रकार की “बनाई” हुई खबरें आपको परोसे, जिसे पढकर आप भूल जायें…

लेकिन फ़िर असल में हुआ क्या था… पश्चिम बंगाल की “कमीनिस्ट” (सॉरी कम्युनिस्ट) सरकार ने खबर को दबाने की भरपूर कोशिश की, फ़िर भी सच सामने आ ही गया। जिन दो ग्रामीणों की धारदार हथियारों से हत्या हुई थी, उनके नाम हैं मानिक मंडल और गोपाल मंडल, जबकि सुमन्त मंडल नामक व्यक्ति अमताला अस्पताल में जीवन-मृत्यु के बीच झूल रहा है। त्रिमोहिनी गाँव के बाज़ार में जो दुकानें लूटी या जलाई गईं “संयोग से” वह सभी दुकानें हिन्दुओं की थीं। “एक और संयोग” यह कि दारपारा गाँव (झाउबोना तहसील) के जलाये गये 25 मकान भी हिन्दुओं के ही हैं।

झगड़े की मूल वजह है स्कूल में जबरन नमाज़ पढ़ने की कोशिश करना… झाऊबोना हाईस्कूल इलाके का एक बड़ा हाईस्कूल है जो कि मुर्शिदाबाद के बेलडांगा सब-डिवीजन में नावदा पुलिस स्टेशन के तहत आता है। इस स्कूल में लगभग 1000 छात्र हैं जिसमें से 50% छात्र मुस्लिम हैं, काफ़ी लम्बे समय से ये छात्र स्कूल में शुक्रवार की सामूहिक नमाज़ पढने की अनुमति माँग रहे थे, लेकिन स्कूल प्रशासन ने ऐसा करने की अनुमति नहीं दी। इसके बाद मुस्लिम छात्रों ने स्कूल में बरसों से चली आ रही सरस्वती पूजा को लेकर आपत्ति जता दी, इस पर स्कूल प्रशासन ने सरस्वती की पूजा रोक दी। लेकिन मुस्लिम छात्र इससे सन्तुष्ट नहीं थे और 10 जुलाई को मुस्लिम छात्रों के एक गुट ने स्कूल परिसर में जबरन नमाज़ पढ़ने की कोशिश की, हिन्दू छात्रों के विरोध के बाद दोपहर 12 बजे के आसपास झगड़ा शुरु हो गया। तत्काल मोबाइल फ़ोनों से मुस्लिम छात्रों ने “बाहरी तत्वों” को स्कूल में बुला लिया जो की “पूरी तैयारी” से आये थे, “बाहरी तत्व” कोई और नहीं पास के त्रिमोहिनी गाँव के मदरसे से छात्र थे। उन्होंने स्कूल में घुसकर हिन्दू छात्रों को पीटा और धारदार हथियारों से मारना शुरु कर दिया। इसी बीच त्रिमोहिनी और दारपारा गाँव के बाज़ार में कई मकान और दुकानों में लूटपाट शुरु हो गई। एक मकान में आग के दौरान एक व्यक्ति की अपनी बच्ची सहित जलकर मौत हो गई (शुक्र है कि वह ग्राहम स्टेंस नहीं था, वरना एक और राष्ट्रीय शोक कहलाता)। दोपहर ढाई बजे तक पुलिस और RAF घटनास्थल पर पहुँच चुके थे, लेकिन डीएसपी सरतलाल मीणा और कई पुलिसवाले मिलकर भी दंगाइयों को रोकने में नाकाम रहे। अचानक मस्जिद से यह घोषणा की गई कि जो पुलिसवाले गाँव में आये हैं वे “नकली” पुलिसवाले हैं और उन्हें बेलदांगा के भारत सेवाश्रम संघ के स्वामी कार्तिक महाराज ने भेजा है, इसके बाद पुलिस पर जमकर पथराव शुरु हो गया, जिसमें डीएसपी समेत कई पुलिसवाले घायल हो गये। संघर्ष रात साढ़े 11 बजे तक चलता रहा तब भी पुलिस काबू पाने में सफ़ल नहीं हो सकी थी। अपुष्ट सूत्रों के अनुसार 13 जुलाई तक करीब 11 हिन्दुओं की मौत हो चुकी थी और लगभग इतने ही लापता भी थे। यह थी पूरी खबर, बिना “सेकुलरिज़्म” का मुलम्मा चढ़ाये हुए।

यह तो हुई इस घटना के बारे में जानकारी, अब इसके पीछे की बातें भी जान लें… मुर्शिदाबाद एक सीमावर्ती मुस्लिम बहुल जिला है, और हाल ही में प्रणब मुखर्जी ने यहाँ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की शाखा खोलने हेतु भारी अनुदान और ज़मीन देने की घोषणा की है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास पर मैं जाना नहीं चाहता, साथ ही ऐसे संवेदनशील इलाके में इस विश्वविद्यालय की शाखा खोलने की ऐसी कौन सी आपातकालीन आवश्यकता आन पड़ी थी इसके कारणों पर भी नहीं जाना चाहता, लेकिन इस राजनीति के पीछे हाल के लोकसभा चुनाव के नतीजे महत्वपूर्ण हैं। मुर्शिदाबाद के चुनावों में कांग्रेस के अब्दुल मन्नान हुसैन जीते थे, उन्होने कम्युनिस्ट पार्टी के अनीसुर रहमान सरकार को लगभग 36,000 वोटों से हराया था, जबकि भाजपा के प्रत्याशी निर्मल कुमार साहा को 42,000 वोट मिले थे। अर्थात भाजपा को मिले वोटों के कारण कम्युनिस्ट प्रत्याशी हार गया। मुस्लिमों को खुश करने और अपने पाले में करने के लिये कांग्रेस और कम्युनिस्टों की अन्दरूनी राजनीति का घिनौना खेल भी इस घटना के पीछे है। प्रणब मुखर्जी रविवार को अपने निर्वाचन क्षेत्र जंगीपुर के दौरे पर आये थे, लेकिन उन्होंने इन गाँवों का दौरा करना “उचित नहीं समझा”, क्योंकि प्रभावित लोग “वोट बैंक” नहीं थे। क्षेत्र में रहने वाले हिन्दुओं को भय है कि बांग्लादेश से सटे इस जिले में स्थापित भारत सेवाश्रम संघ के अध्यक्ष स्वामी प्रदीप्तानन्दजी (कार्तिक महाराज) पर जानलेवा हमला हो सकता है (हालांकि ऐसी आशंका स्वामी लक्ष्मणानन्दजी सरस्वती की हत्या के पहले भी जताई जा चुकी थी, सरकार ने उस सम्बन्ध में क्या किया और उनके साथ क्या हुआ यह किसी से छिपा नहीं है)। हमेशा की तरह प्रत्येक दंगे के बाद “शांति बैठक” आयोजित की जाती है ताकि हिन्दुओं को शान्ति और सदभाव का लेक्चर पिलाया जा सके और उन्हें समझाया जा सके कि या तो वे “शांति” से रहे या फ़िर इलाका छोड़कर चले जायें, अथवा अधिक आसान रास्ता अपनायें और धर्म-परिवर्तन कर लें… जिस प्रकार धीरे-धीरे उत्तर-पूर्व के कुछ राज्य अब ईसाई बहुसंख्यक बनने जा रहे हैं, उसी प्रकार।

ये सब तो हुईं घटिया राजनीति की बातें, लेकिन यहाँ असल मुद्दा है कि किसी मामले में मीडिया का क्या “रोल” होना चाहिये और भारत का मीडिया इतना हिन्दू विरोधी क्यों है? क्या आपने यह खबर किसी राष्ट्रीय चैनल के प्राइम टाइम में सुनी-देखी है? शायद नहीं सुनी होगी… क्योंकि राष्ट्रीय मीडिया के पास और भी बहुत से “जरूरी” काम हैं। साथ ही एक बार विचार करके देखिये कि इसके विपरीत घटनाक्रम वाली कोई घटना यदि गुजरात में घटी होती तो क्या होता? निश्चित जानिये उसे “जातीय सफ़ाये” का नाम देकर NGOs और मानवाधिकार वाले अब तक अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दा बना चुके होते। कश्मीर में तो “बेचारे” कुछ “गुमराह युवक” हैं जिनसे सहानुभूति से पेश आने की आवश्यकता है, बाकी भारत में दो-चार संत-महात्मा गोलियों के शिकार हो भी जायें तो किसे परवाह है, कम से कम मीडिया को तो बिलकुल नहीं है, क्योंकि उसके लिये “धर्मनिरपेक्ष मूल्य”(?) बनाये रखना अधिक महत्वपूर्ण है, पता नहीं भारत के मीडिया वाले बांग्लादेश, पाकिस्तान और छद्म धर्मनिरपेक्षता के बारे में “सच का सामना” कब करेंगे?

(भारतीय मीडिया के हिन्दू विरोधी रुख के “डॉक्यूमेंटेशन” की यह कोशिश जारी रहेगी, आप हमारे साथ बने रहिये, अभी हाजिर होते हैं एक ब्रेक के बाद…)

सूचना स्रोत : http://www.indianexpress.com/news/ahead-of-pranab-visit-clashes-in-murshidabad-claim-4-curfew-clamped/488211/ तथा http://www.telegraphindia.com/1090711/jsp/bengal/story_11223561.jsp एवं http://hindusamhati.blogspot.com/2009/07/murshidabad-riot-update.html


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