1) 17 अक्टूबर 2009 को कासरगौड़ जिले की ईरुथुंकादवु नदी में डुब जाने से चार बच्चों की मौत हो गई, जिनके नाम थे अजीत(12), अजीश(15), रतन कुमार(15) और अभिलाष(17), जो कि नीरचल के माहजन स्कूल के छात्र थे।

2) 3 नवम्बर 2009 को त्रिवेन्द्रम के अम्बूरी स्थित नेय्यर नदी में एक छात्र की डूब जाने की वजह से मौत हुई, जिसका नाम था साजो थॉमस(10)।

3) 4 नवम्बर 2009 को मलप्पुरम के अरीकोड में चेलियार नदी में आठ बच्चों की डूबने से मौत हुई, नाम हैं सिराजुद्दीन, तौफ़ीक, शमीम, सुहैल, शहाबुद्दीन, मोहम्मद मुश्ताक, तोइबा और शाहिद

केरल में एक माह के अन्तराल में 13 बच्चों की मौत एक जैसी वजह से हुई, ज़ाहिर सी बात है कि राज्य सरकार द्वारा मुआवज़े की घोषणा की गई, लेकिन त्रिवेन्द्रम और मलप्पुरम के हादसे में मारे गये बच्चों के परिजनों को 5-5 लाख का मुआवज़ा दिया गया, जबकि कासरगौड़ जिले के बच्चों के परिजनों को 1-1 लाख का…

एक "साम्प्रदायिक" सवाल - ऐसा क्यों? (सही जवाब पर कोई इनाम घोषित नहीं है)

जब मरने वाले सभी बच्चे हैं, प्रत्येक परिवार ने अपने घर के चिराग को खोया है, सभी बच्चे एक जैसी दुर्घटनाओं में मारे गये हैं, तब मुआवज़े में यह भेदभाव कैसा?

मरे हुए लोगों, दंगों और शवों में भी बाकायदा चीन्ह-चीन्ह कर सेकुलरिज़्म की नौटंकी करने वालों पर हज़ार बार लानत है… नरेन्द्र मोदी का कथित भेदभाव तुरन्त दिखाई दे जाता है, लेकिन गाँधी द्वारा शुरु किये गये और 60 साल से जारी इस भेदभाव पर चुप्पी??? (दिल्ली में बैठी वामपंथी रुदालियाँ सुन रही हैं क्या?)

इससे पहले भी पिछले साल एक पोस्ट में ऐसी ही ओछी राजनीति पर एक माइक्रो पोस्ट लिखी थी
(http://desicnn.com/wp/2007/12/14/congrats-secularist-communists/)

जिसमें बताया गया था कि समझौता एक्सप्रेस बम विस्फ़ोट में मारे गये प्रत्येक पाकिस्तानी नागरिक को दस-दस लाख रुपये दिये गये (सम्मानित पड़ोसी हैं, इसलिये), मालेगाँव बम विस्फ़ोट में मारे गये प्रत्येक मुसलमान को पाँच-पाँच लाख रुपये दिये गये, और अमरावती के दंगों में लगभग 75 करोड़ के नुकसान के लिये 137 हिन्दुओं को दिये गये कुल 20 लाख। धर्मनिरपेक्षता ऐसी ही होती है भैया…
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(नोट - मेरे ब्लॉग का विरोध और नापसन्द करने वाले सभी "सज्जनों" से एक बार फ़िर गुज़ारिश है कि इस ब्लॉग का उद्देश्य कांग्रेस और कमीनिस्टों की ऐसी नीच मानसिकता को उजागर करना है, फ़िर भी यदि यह पोस्ट उन्हें "साम्प्रदायिक"(?) लगती हो, तो मैं कुछ नहीं कर सकता…)
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एक खबर अपने "महान सेकुलर" भारत देश से, तथा एक खबर धुर इस्लामिक देश सोमालिया से, जबकि कुछ अन्य खबरें यत्र-तत्र बिखरी पड़ी हुई… इन्हें एक ही पोस्ट में समेटकर लाया हूं, ताकि आप इस्लाम के सच्चे फ़ॉलोअर्स से परिचित हो लें (वे सेकुलर्स और वामपंथी भी परिचित हो लें जो जानते-बूझते-समझते हुए भी नाटक करते हैं)…
 (पाठकों हेतु एक सूचना - ब्रैकेट में लिखे हुए वाक्यों को मेरी "खट्टी डकार" समझा जाये)

1) सबसे पहली खबर अपने देश से (आखिर मेरा भारत महान है)…

उत्तराखण्ड के एक संवेदनशील सीमावर्ती इलाके जसपुर के एक मुस्लिम संगठन छीपी बिरादरी के अध्यक्ष मोहम्मद उस्मान ने बाकायदा बड़े-बड़े बोर्ड लगवाकर मुस्लिम महिलाओं के नाम "फ़रमान" जारी किया है कि वे बुरके के बगैर बाहर ना निकलें, पति के साथ ही बाज़ार जायें और मोबाइल का इस्तेमाल ना करें (शायद ज़ाकिर नाईक भी इस "गैर-इस्लामी चीज़" यानी मोबाइल का उपयोग नहीं करते होंगे)। उत्तराखण्ड और उत्तरप्रदेश की सिद्दीकी बिरादरी के प्रान्तीय अध्यक्ष मोहम्मद उस्मान साहब ने मुस्लिम महिलाओं को मज़ार भी में नहीं घुसने दिया और कहा कि यह कदम उन्होंने शरीयत और इस्लाम के कानूनों के तहत ही उठाया है (यानी कि वे भारत के कानूनों को नहीं मानते) (क्या देवबन्द वाले इन्हें समझा सकते हैं?) (चिदम्बरम जी, ये भारत की ही घटना है…




इसके पहले भी एक पोस्ट में महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में एक पोस्टर के बारे में बताया जा चुका है, यहाँ देखें… http://desicnn.com/wp/2009/10/12/blog-pos-16/




2) धुर इस्लामिक देश सोमालिया से एक खबर -

सोमालिया में 112 वर्ष के एक बूढ़े ने 17 साल की एक लड़की से निकाह किया है (अब यदि कोई उन्हें बूढ़ा कहे तो मुझे भी आपत्ति होगी)… प्राप्त खबर के अनुसार सोमालिया के अहमद मोहम्मद दोर जिसकी पहले से 5 बीवियाँ और 13 लड़के हैं (सबसे बड़े लड़के की आयु 80 वर्ष है) ने हाल ही में सफ़िया अब्दुल्ला नामक एक 17 वर्षीय लड़की से एक और निकाह किया है। इनके निकाह में हजारों लोगों ने शिरकत की (सभी फ़ॉलोअर्स)। मोहम्मद दोर ने शादी के बाद कहा कि अल्लाह ने मेरी एक बड़ी इच्छा पूरी की है (शायद अन्तिम होगी), वहीं लड़की के माता-पिता ने कहा कि "लड़की भी अपने नये पति के साथ बहुत खुश है" (ज़ाहिर है खुश तो होगी ही, "परदादा" की गोद देखी नहीं होगी कभी उसने)।


मोहम्मद दोर ने आगे कहा कि उन्होंने लड़की के बड़ा होने का काफ़ी इन्तज़ार किया फ़िर उसके परिवार वालों के सामने शादी का प्रस्ताव रखा (यानी जब वह बच्ची थी, तभी से निगाह थी चचा की)। मैंने किसी से कोई ज़ोर-जबरदस्ती नहीं की है, यह राजी-खुशी से हुई एक शादी है। (चित्र में - नवविवाहित युगल)

जब बीबीसी के संवाददाता मोहम्मद ओलाद हसन ने मोगादिशु में जनता से इस सम्बन्ध में रायशुमारी की तो चौंकाने वाले परिणाम सामने आये, कुछ लोगों ने कहा कि यह इस्लामिक कानूनों (?) के तहत एक सामान्य और मान्य प्रक्रिया है इसलिये उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, जबकि कुछ लोगों ने इस उम्र के अन्तर पर चिंता जताई (लेकिन कड़ी या नरम कैसी भी आलोचना नहीं की…… फ़िर वही फ़ॉलोअर्स वाली थ्योरी)। मोहम्मद दार का जन्म 1897 में हुआ बताया जाता है और उसका जन्म प्रमाण पत्र खुद उसके पिता द्वारा बकरे के चमड़े पर लिखा हुआ है। वैसे फ़िलहाल कुल मिलाकर मोहम्मद दार के 114 पोते-पोतियाँ-परपोते आदि हैं, और इसके पहले की पाँच में से तीन पत्नियों की मौत हो चुकी है (न होती तो आश्चर्य ही होता)… दोर को उम्मीद है कि जल्दी ही उसकी नई पत्नी एक बच्चे को जन्म देगी…

इस खबर को बीबीसी की साइट पर पढ़ा जा सकता है…  http://news.bbc.co.uk/2/hi/africa/8331136.stm

अब कुछ और फ़ॉलोअर्स से ही सम्बन्धित खबरें इधर-उधर की…

सूडान में एक महिला पत्रकार को 40 कोड़े मारने की सजा दी गई है, क्योंकि उसने पतलून पहन रखी थी और इस्लाम में महिलाओं के पतलून पहनने पर पाबन्दी है। संयुक्त राष्ट्र की सूचना अधिकारी लुबना अहमद हुसैन को यह सजा दी गई (शायद वे यह भूल गई होंगी कि सूडान कोई संयुक्त राष्ट्र का दफ़्तर नहीं है, यह फ़ॉलोअर्स की धरती है)। लुबना के साथ पकड़ी गई (?) अन्य महिलाओं को 10-10 कोड़े मारे गये, लेकिन लुबना ने अपने लिये वकील की मांग कर डाली इसलिये उन्हें 40 कोड़े मारे गये… है ना वितृष्णाजनक…
(इस खबर को यहाँ पढ़ें… http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/4834045.cms)

एक और खबर इधर भी पढ़ें…
""सऊदी महिला पत्रकार को 60 कोड़े मारने की सजा"" (शायद सऊदी अरब भी अशिक्षित और पिछड़ा देश होगा)
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5160424.cms

और भी चाहिये हों तो ये भी पढ़ें…
""फांसी से पहले रेप- एक कानून ऐसा भी""
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/4810015.cms


वेदों और पुराणों को आधार बनाकर आलतू-फ़ालतू लेख लिखने वाले नकलबाज ब्लागर इस खबर को भी पढ़ सकते हैं…

""मिस्यार शादी यानी सेक्स संबंध बनाने का लाइसेंस…" (बीच में किसी नियोग-फ़ियोग के बारे में कोई बकवास कहीं पढ़ी थी, शायद इस लिंक को पढ़कर अकल आ जाये)
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/4939231.cms

और लीजिये साहब, महिलाओं की "ब्रा" भी गैर-इस्लामी हो गई…
""सोमालियाई विद्रोहियों ने कहा, ब्रा गैर-इस्लामी…"
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5138430.cms

कहने का तात्पर्य सिर्फ़ इतना है कि मजमा लगाकर दूसरों को उपदेश देने, दूसरों के धर्मग्रन्थों में खोट निकालने, खुद को श्रेष्ठ बताने और एक किताब को अन्तिम सत्य मानने वाले फ़ॉलोअर्स यह समझ लें कि वेदों के ज़माने में कुछ भी हुआ रहा हो वह उस वक्त के अनुसार सही-गलत रहा होगा, लेकिन हिन्दुओं ने वक्त के साथ अपने को बहुत बदल लिया है, जबकि कुछ लोग अब भी बदलने को तैयार नहीं हैं…। स्पष्ट है कि "रुका हुआ पानी सड़ांध मारने लगता है, बहता हुआ पानी ही निर्मल कहलाता है…"

सुना है कि पूरे विश्व के इस्लामिक जगत में देवबन्द के फ़तवे और राय का काफ़ी महत्वपूर्ण स्थान होता है, वन्देमातरम पर फ़तवा जारी करने से पहले ऊपर बताई गई घटनाओं पर कुछ फ़तवे-जिरह-बहस कर लेते और सम्बन्धित पक्षों को नसीहत देते। अब दिक्कत ये है कि उत्तरप्रदेश में ही देशभक्त मुस्लिम बहनें सार्वजनिक रूप से वन्देमातरम गा रही हैं, गाती भी रहेंगी, एआर रहमान ने वन्देमातरम को विश्वप्रसिद्ध बनाया… ऐसे में प्रगतिशील मुस्लिमों को आगे आना होगा, इन कठमुल्लाओं के खिलाफ़ आवाज़ उठानी होगी, उन्हें यह समझना होगा कि ये लोग उन्हें भी अपनी "भेड़ों की रेवड़" का हिस्सा बना लेना चाहते हैं… जब तक प्रगतिशील मुस्लिम आगे बढ़कर इनका विरोध नहीं करेंगे तब तक साम्प्रदायिकता का मुद्दा हल होने वाला नहीं है।

इनके "असली मंसूबे" क्या हैं यह इस खबर में पढ़ सकते हैं, जिसमें इन्होंने ब्रिटेन में भी शरीयत कानून की मांग, महारानी एलिज़ाबेथ को बुर्का पहनाने और बकिंघम पैलेस का नाम बदलकर "बकिंघम मस्जिद" करने का मंसूबा बनाया है…
(खबर इधर पढ़ें… http://hindi.webdunia.com/news/news/international/0911/01/1091101104_1.htm)

ऐसा नहीं कि सब कुछ बुरा ही बुरा है, कुछ अच्छा भी हो रहा है… दो खबरें और हैं जैसे कि खामखा की फ़िजूलखर्ची रोकने की सलाह देता हुआ शिया पर्सनल लॉ बोर्ड……

""मैरिज हॉल की जगह मस्जिदों में करें निकाह""
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5154148.cms

ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने ऐलान किया है कि निकाह मस्जिदों में कराए जाने चाहिए। ऐसा बेतहाशा खर्च को रोकने के मकसद से कहा गया है। बोर्ड के प्रेजिडेंट मौलाना मिर्जा मोहम्मद अतहर ने कहा, शादी जैसे फंक्शन आम पारिवारिक फंक्शन होते हैं। लेकिन हमारा समुदाय मैरिज हॉल कल्चर के चलते बहुत अधिक खर्चा करने लगा है। मैं लोगों से अनुरोध करता हूं कि इससे बचें।

मिस्त्र में लड़कियों/महिलाओं की कक्षा में बुरके पर बैन…

ओनली वुमन क्लास में बुर्के पर अब बैन
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5107540.cms

काहिरा ।। मिस्त्र के मशहूर अल-अजहर यूनिवर्सिटी ने ऐसी क्लासों में छात्राओं और टीचरों के बुर्का पहनने पर बैन लगा दिया है, जिसमें सिर्फ लड़कियां ही हों। वुमन डॉरमिटरी और यूनिवर्सिटी से संबद्ध स्कूलों में भी यह बैन प्रभावी होगा। हालांकि वे घरों और सड़कों पर नकाब पहन सकेंगी। इस ऐतिहासिक फैसले में इंस्टिट्यूट ने कहा है कि यूनिवर्सिटी की सुप्रीम काउंसिल ने सिर्फ महिलाओं की कक्षाओं में छात्राओं और टीचर्स के नकाब पहनने पर बैन लगाने का फैसला किया है। इसका उद्देश्य आत्मविश्वास, आराम और टीचरों तथा स्टूडेंट्स के बीच परस्पर सुनने-समझने की क्षमता बढ़ाना है। परीक्षा के समय भी उनके नकाब पहनने पर प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया गया है।
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चाहता तो इन खबरों पर 10-20 माइक्रो पोस्ट बना सकता था, लेकिन मैंने सोचा कि सुनारों की तरह टुच-टुच क्या करना, लोहार की तरह एक हथौड़ा ही क्यों न चलाया जाये, इसलिये सारी खबरों को एक जगह संकलित कर दिया… संदेश सिर्फ़ एक ही है कि हिन्दुओं को उनके वेदों-पुराणों और धर्मग्रन्थों के बारे में किसी "बाहरी" व्यक्ति से नसीहत सुनने की कतई ज़रूरत नहीं है, "दूसरों के घरों में ताँक-झाँक करना छोड़ो, पहले अपने गंदे कपड़े तो धो लो…" हिन्दुओं में तो परमहंस, राजा राममोहन राय, ज्योतिबा फ़ुले और महात्मा गाँधी जैसे कई समाज सुधारक आये… और बदलाव हुआ भी है… लेकिन आपका क्या?


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भारत में अक्सर सेकुलर लोग तथाकथित "गंगा-जमनी संस्कृति" की बातें जी खोलकर करते रहते हैं। सेकुलरों का सबसे प्रिय शगल होता है भाजपा-संघ को कोसना, गरियाना और भाजपा अथवा हिन्दुत्ववादी संगठन जो भी कहें उसका उलटा बोलना। चाहे महंगाई ने गरीबों का जीना हराम कर रखा हो लेकिन उन्हें साम्प्रदायिकता से लड़ना है, चाहे नक्सलवादियों ने सरकार की बैण्ड बजा रखी हो तथा आधे भारत पर कब्जा कर रखा हो उन्हें साम्प्रदायिकता से लड़ना है, चाहे अफ़ज़ल और कसाब को कांग्रेस ने गोद में बैठा रखा हो फ़िर भी उन्हें साम्प्रदायिकता से ही लड़ना होता है… (यहाँ साम्प्रदायिकता से उनका मतलब सिर्फ़ "हिन्दू साम्प्रदायिकता" ही होता है, बाकी के सभी धर्म "गऊ" होते हैं)।



ये सेकुलर लोग आये दिन जब-तब तथ्यों, सबूतों, सेकुलर कांग्रेसियों की हरकतों तथा जेहादी और धर्म परिवर्तनवादियों की करतूतों की वजह से सतत लानत-मलामत झेलते रहते हों, फ़िर भी इनकी बेशर्मी जाती नहीं। ऐसे सैकड़ों उदाहरण गिनाये जा सकते हैं, जब किसी मामले को लेकर सेकुलरों के मुँह में दही जमा हुआ हो, चाहे अमरनाथ की ज़मीन का मामला हो या तसलीमा नसरीन की पिटाई अथवा हुसैन की पेंटिंग का, इन सेकुलरों की बोलती जब-तब बन्द होती रहती है। इस कड़ी में सबसे ताज़ा मामला है कश्मीर के रजनीश शर्मा का… उमर अब्दुल्ला जो कि भारत की संसद में गरजते हुए भाषण देकर सेकुलरों की वाहवाही लूटे थे, कोरे लफ़्फ़ाज़ निकले और उन्होंने अपने नकली "सेकुलरिज़्म" को लतियाने में जरा भी देर नहीं लगाई।



कश्मीर के निवासी रजनीश शर्मा (35) का एकमात्र गुनाह यह था कि उसने एक "मुस्लिम राज्य" में हिन्दू होकर एक मुस्लिम लड़की से बाकायदा शादी की थी। अमीना यूसुफ़ जो कि शादी के बाद आँचल शर्मा बन गई है, के परिवार को राज्य सत्ता के खुले संरक्षण में बेतहाशा परेशान किया गया। कानून के रखवालों ने इस जोड़े का एक महीने तक कुत्ते की तरह पीछा किया और अन्ततः 28 सितम्बर की रात को रजनीश को पकड़ कर श्रीनगर ले गये। एक हफ़्ते बाद श्रीनगर के राममुंशी बाग में 6 अक्टूबर को उसकी लाश मिली, जिसे पुलिस ने "हमेशा की तरह" आत्महत्या बताया, लेकिन पुलिस आज भी नहीं बता पा रही कि आत्महत्या करने से पहले रजनीश ने अपने घुटने खुद कैसे तोड़े, अपने नाखून खुद ही कैसे उखाड़े, अपनी ज़ुबान और गरदन पर सिगरेट से जलने के निशान कैसे बनाये या उसके शरीर पर बेल्ट से पिटाई के जो निशान पाये गये वह रजनीश ने कैसे बनाये।

आँचल शर्मा ने जम्मू में पूरे मीडिया और कैमरों के सामने अपने बयान में कहा है कि उसके पिता मोहम्मद यूसुफ़ (जो कि कश्मीर के सेल्स टैक्स विभाग में इंस्पेक्टर हैं) तथा उसके भाईयों ने पुलिस के साथ मिलकर उसके पति को मारा है। क्या आपने किसी नेशनल चैनल पर यह खबर प्रमुखता से देखी है? यदि देखी है तो कितनी बार और कितनी डीटेल्स में? मुझे पूरा विश्वास है कि राखी सावन्त की फ़ूहड़ता या राजू श्रीवास्तव के कपड़े उतारने की घटनाओं को छोड़ भी दिया जाये तो कम से कम कोलकाता के रिज़वान मामले या चाँद-फ़िज़ा की छिछोरी प्रेमकथा को जितना कवरेज मिला होगा उसका एक प्रतिशत भी रजनीश /आँचल शर्मा को नहीं दिया गया। कारण साफ़ है… "रजनीश हिन्दू है" और हिन्दुओं के कोई मानवाधिकार नहीं होते हैं, कम से कम कश्मीर में तो बिलकुल नहीं।

ये बात मानी जा सकती है कि पुलिस हिरासत में देश में रोज़ाना कई मौतें होती हैं, लेकिन जब शोपियाँ मामले में दो मुस्लिम लड़कियों के शव मिलने पर पूरी कश्मीर घाटी में उबाल आ जाता है तब रजनीश के पोस्टमॉर्टम में उसे बेइंतहा यातनाएं दिये जाने की पुष्टि के बाद "गंगा-जमनी संस्कृति" के पुरोधा कहाँ तेल लेने चले जाते हैं? इस देश में पिछले कुछ वर्षों से अचानक मुस्लिम लड़कों द्वारा हिन्दू लड़कियों को फ़ँसाने और शादी करने के मामले बढ़े हैं, लेकिन क्या किसी अन्य मामले में रजनीश की तरह, खुद सरकार और पुलिस को गहरी रुचि लेकर "मामला निपटाते" देखा है? देखा जाता है कि ऐसे मामलों में पुलिस दोनों बालिग प्रेमियों अथवा शादीशुदा जोड़ों की रक्षा में आगे आती है या कोई सामाजिक संगठन अथवा "सेकुलर"(?) संगठन जमकर हल्ला-गुल्ला मचाते हैं। क्या रजनीश मामले को लेकर देश में किसी तथाकथित "दानवाधिकार संगठन" ने कोई आवाज़ उठाई? या किसी से्कुलरिज़्म के झण्डाबरदार ने कभी कहा कि यदि रजनीश के परिवार वालों को न्याय नहीं मिला तो मैं धरने पर बैठ जाऊंगा/जाऊंगी? कहेगा भी नहीं, ये सारे धरने-प्रदर्शन-बयानबाजियाँ और मीडिया कवरेज "बाटला हाउस" प्रकरण के लिये आरक्षित हैं, रजनीश शर्मा तो एक मामूली हिन्दू है और वह भी कश्मीर जैसे "सेकुलर" राज्य में मुस्लिम लड़की से शादी करने की गलती कर बैठा। वैसे भी कश्मीर में भारत का शासन या कानून नहीं चलता, न तो वे हमारा संविधान मानते हैं, न ही हमारा झण्डा, उन्हें सिर्फ़ हमारे टैक्स के पैसों से बड़ी योजनाएं चाहिये, बाँध चाहिये, फ़ोकट की बिजली चाहिये, रेल लाइन चाहिये… सबसिडी चाहिये… यानी कि सिर्फ़ चाहिये ही चाहिये, देना कुछ भी नहीं है, यानी भारत के प्रति अखण्डता और राष्ट्रभक्ति की भावना तक नहीं… ऐसे हमारे छाती के बोझ को हम "सेकुलर" कहते हैं।

ऐसा नहीं कि ये "गंगा-जमनी" हरकतें सिर्फ़ हिन्दुओं के साथ ही होती हों, लद्दाख क्षेत्र के बौद्ध धर्मावलम्बी भी कश्मीर सरकार के पक्षपाती रवैये और स्थानीय मुसलमानों की आक्रामकता से परेशान हैं…। कुछ साल पहले लद्दाख की बुद्धिस्ट एसोसियेशन ने केन्द्र सरकार के समक्ष अपनी कुछ शिकायतें रखी थी, जैसे -

1) 1992 से 1999 के बीच कम से कम 24 बौद्ध लड़कियों ने धर्म परिवर्तन कर लिया और उन्हें कारगिल और श्रीनगर ले जाया गया।

2) पैसे के लालच और धमकियों से डरकर कारगिल के आसपास के 12 गाँवों के 72 युवकों ने धर्म परिवर्तित किया।

3) बौद्ध धर्मावलंबियों को कारगिल के आसपास के गाँवों में अपने शव दफ़नाने से भी स्थानीय मुसलमानों द्वारा मना किया जाता है।

4) पिछले 35 साल से एक बौद्ध सराय बनाने की मांग की जा रही है, लेकिन राज्य सरकार द्वारा कोई सुनवाई नहीं।

5) कारगिल क्षेत्र की 20% आबादी बौद्ध है, लेकिन यहाँ नियुक्त 24 पटवारियों में से सिर्फ़ 1 ही बौद्ध है, तथा 1998 में शिक्षा विभाग में चतुर्थ वर्ग के 40 कर्मचारियों की नियुक्ति की गई जिसमें सिर्फ़ एक ही व्यक्ति बौद्ध था और वह भी तब जब उसने इस्लाम कबूल कर लिया।

केन्द्र सरकार ने क्या कार्रवाई की होगी ये बताने की कम से कम मुझे तो जरूरत नहीं है… तो भैया, ऐसा है हमारा(?) सेकुलर श्रीनगर…। किसी 5 सितारा बुद्धिजीवी या मानवाधिकारवादी के मुँह से कभी इस बारे में सुना है? नहीं सुना होगा, उन्हें गुजरात और मोदी से फ़ुर्सत तो मिले।

रजनीश शर्मा का ये मामला कोलकाता के रिज़वान से भयानक रूप से मिलता-जुलता होने के बावजूद अलग है, यहाँ लड़की मुस्लिम थी, लड़का हिन्दू और कोलकाता में लड़की हिन्दू थी और लड़का मुस्लिम। दोनों ही मामले में लड़के की हत्या करने वाले लड़की के पिता और भाई ही थे। लेकिन दोनों मामलों में मीडिया और सेकुलरों की भूमिका से स्पष्ट हो जाता है कि ये दोनों ही कितने घटिया किस्म के हैं। रिज़वान के मामले में लगातार "बुरका दत्त" के चैनलों पर कवरेज दिया गया, रिज़वान कैसे मरा, कहाँ मरा, किसने मारा, पुलिस की क्या भूमिका रही, रेल पटरियों पर लाश कैसे पहुँची आदि का बाकायदा ग्राफ़िक्स बनाकर प्रदर्शन किया गया, तमाम "बुद्धूजीवी", बुकर और नोबल पुरस्कार वालों ने धरने दिये, अखबार रंगे गये और अन्ततः पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी को सस्पेण्ड किया गया, रिज़वान को मारने के जुर्म में लड़की के पिता अशोक तोडी पर केस दर्ज हुआ, अब मामला कोर्ट में है, कारण सिर्फ़ एक - इधर मरने वाला एक मुस्लिम है और उधर एक हिन्दू… इसे कहते हैं नीयत में खोट।

रजनीश की विधवा, आँचल शर्मा ने धमकी दी है कि यदि इस मामले की जाँच सीबीआई को नहीं सौंपी जाती तो वह आत्मदाह कर लेगी, लेकिन ऐसा लगता है कि यदि रजनीश की आत्मा को न्याय चाहिये तो उसे भारत के सेकुलरों की गोद में मुस्लिम बनकर पुनर्जन्म लेना होगा… फ़ारुक-उमर अब्दुल्ला के "सुपर-सेकुलर" और "गंगा-जमनी" वाले कश्मीर में नहीं…

साथ ही इन्हें भी जरूर पढ़ें -

चाँद-फ़िज़ां प्रकरण में उठे कुछ गम्भीर सवाल
http://desicnn.com/wp/2009/03/03/chand-fiza-muslim-conversion-hindu/

जम्मू-अमरनाथ मामले में सो-कॉल्ड सेकुलरों की पोल खोलने वाला एक और लेख -
http://desicnn.com/wp/2008/08/15/jammu-kashmir-agitation-economic/

सन्दर्भ साइटें -

http://naknews.co.in/newsdet.aspx?q=24481


http://www.expressbuzz.com/edition/story.aspx?Title=Why+is+Rajneesh+different+from+Rizwan+in+India?&artid=2TcgrifEK5k=&SectionID=XVSZ2Fy6Gzo=&MainSectionID=fyV9T2jIa4A=&SectionName=m3GntEw72ik=&SEO=Ashok%20Todi,%20Rizwan,%20Rajneesh%20Sharma,%20Ram%20Munshi%20Ba


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केरल में कोचीन स्थित केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल (KCBC) के तहत काम करने वाले संगठन कमीशन फ़ॉर सोशल हारमोनी एण्ड विजिलेंस द्वारा जारी ताज़ा न्यूज़लेटर में केरल में चल रहे "लव जेहाद" और इसके धार्मिक दुष्प्रभावों के बारे में ईसाई समाज को जानकारी दी गई है।

अपने अनुयायियों में बाँटे गये इस न्यूज़लेटर के अनुसार पालकों को निर्देशित किया गया है कि केरल और कर्नाटक में "लव जेहाद" जारी है, जिसमें भोलीभाली लड़कियों को मुस्लिम लड़कों द्वारा फ़ाँसकर उन्हें शादी का भ्रमजाल दिखाकर धर्म परिवर्तन करवाया जा रहा है। बिशप काउंसिल ने आग्रह किया है कि पालक अपनी लड़कियों पर नज़र रखें, यदि लड़कियाँ मोबाइल उपयोग करती हैं तो उनके माता-पिता को उनकी इनकमिंग और आऊटगोइंग कॉल्स पर नज़र रखना चाहिये, यदि घर पर कम्प्यूटर हो तो वह "सार्वजनिक कमरे" में होना चाहिये, न कि बच्चों के कमरे में। पालकों को अपनी लड़कियों को ऐसे लड़कों के जाल में फ़ँसने से बचाव के बारे में पूरी जानकारी देना चाहिये। यदि कोई लड़की गुमसुम, उदास अथवा सभी से कटी-कटी दिखाई देने लगे तब तुरन्त उसकी गतिविधियों पर बारीक नज़र रखना चाहिये।
(यदि ऐसे दिशानिर्देश किसी हिन्दूवादी संगठन ने जारी किये होते, तो पता नहीं अब तक नारी संगठनों और न्यूज़ चैनलों ने कितनी बार आकाश-पाताल एक कर दिये होते)।



उल्लेखनीय है कि कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने एक ताज़ा आदेश में "लव जेहाद" के बारे में पूरी तथ्यात्मक जानकारी जुटाने के निर्देश दिये हैं (शायद हाईकोर्ट भी साम्प्रदायिक हो??)। एक अपुष्ट सूचना के अनुसार सन् 2005 से अब तक 4000 ईसाई लड़कियों द्वारा धर्म परिवर्तन किया जा चुका है, उनमें से कुछ गायब भी हो गईं। इस न्यूज़लेटर में आगे कहा गया है कि चूंकि वे लड़कियाँ 18 वर्ष से उपर की हैं इसलिये वे कानूनन इस बारे में कुछ कर भी नहीं सकते, लेकिन ईसाई लड़कियों की मुस्लिम लड़कों से बढ़ती दोस्ती निश्चित ही चिन्ता का विषय है।

इस कमीशन के सचिव फ़ादर जॉनी कोचुपराम्बिल कहते हैं कि "फ़िलहाल" यह मामला धार्मिक लड़ाई का नहीं लगता बल्कि यह एक सामाजिक समस्या लगती है…। यह लड़कियाँ अपने कथित प्यार की खातिर सब कुछ छोड़कर चली जाती हैं, लेकिन जल्दी ही उनके साथ यौन दुराचार शुरु हो जाता है तथा उनकी जिन्दगी नर्क बन जाती है, जहाँ उन्हें कोई आज़ादी नहीं मिलती (यह भी एक साम्प्रदायिक बयान लगता है…??)। जिस परिवार पर यह गुज़रती है, वह सामाजिक प्रतिष्ठा की वजह से कई बार पुलिस में भी नहीं जाता, जिसका फ़ायदा लव जेहादियों को मिलता है। न्यूज़लेटर में सन् 2006 से 2009 के बीच, विभिन्न जिलावार 2868 ईसाई लड़कियों के नाम-पते हैं जो मुस्लिम लड़कों के प्रेमजाल में फ़ँसीं, जिसमें से अकेले कासरगौड़ जिले की 586 लड़कियाँ शामिल हैं। फ़ादर कहते हैं कि "हमें यह मसला गम्भीरता से लेना होगा…"।

इन लव जेहादियों को शुरुआत में बाइक, मोबाइल तथा फ़ैशनेबल कपड़ों के पैसे दिये जाते हैं और "काम" सम्पन्न होने के बाद प्रति धर्मान्तरित लड़की एक लाख रुपये दिये जाते हैं। कॉलेजों में एडमिशन लेते समय इन्हें ऐसी ईसाई-हिन्दू लड़कियों की लिस्ट थमाई जाती है, जिन्हें आसानी से फ़ुसलाया जा सकता हो। इस काम में मुख्यतः खाड़ी देशों से पैसा आता है और सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि गायब हो चुकी लड़कियाँ वहीं पहुँचाई जा चुकी हैं।

सेकुलरों के साथ सबसे बड़ी समस्या यही है कि जब हिन्दुत्ववादी संगठन कुछ भी कहते हैं तो वे इसे दुष्प्रचार, साम्प्रदायिक झूठ आदि की संज्ञा दे देते हैं, समस्या को समस्या मानते ही नहीं, रेत में सिर दबाये शतुरमुर्ग की तरह पिछवाड़ा करके खड़े हो जाते हैं। लव जेहाद के बारे में सबसे पहले हिन्दुत्ववादी संगठनों ने ही आवाज़ उठाई थी, लेकिन हमेशा की तरह उसे या तो हँसी में टाला गया या फ़िर उपेक्षा की गई। अब आज जबकि कर्नाटक और केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश खुद इसकी जाँच के आदेश दे रहे हैं तब इनकी बोलती बन्द है। ईसाई संगठनों को भी इस लव जेहाद के अंगारे महसूस होने लगे तभी माना गया कि यह एक समस्या है, वरना हिन्दू संगठन कितना भी कहें कोई मानने वाला नहीं, सेकुलरों का यही रवैया उन्हें देशद्रोही की श्रेणी में रखता है। क्या आज से 50 साल पहले कश्मीर की स्थिति के बारे में किसी ने सोचा था कि वहाँ से हिन्दुओं का नामोनिशान मिट जायेगा? आज जब हिन्दूवादी संगठन असम, पश्चिम बंगाल और केरल के बदलते जनसंख्या आँकड़ों और राजनैतिक परिस्थितियों का हवाला देते हैं तब सेकुलर और कांग्रेसी इसे गम्भीरता से नहीं लेते, लेकिन कुछ वर्षों बाद ही वे इसे समस्या मानेंगे, जब स्थिति हाथ से निकल चुकी होगी… लानत है ऐसी सेकुलर नीतियों पर। हाल ही में "नक्सलवादियों की चैम्पियन बुद्धिजीवी"(?) अरुंधती रॉय ने बयान दिया कि "जब राज्य सत्ता किसी व्यक्ति की सुन ही नही रही हो, और उस पर अन्याय और अत्याचार जारी रहे तो उसका बन्दूक उठाना जायज़ है…", फ़िर तो इस हिसाब से कश्मीर के विस्थापित हिन्दुओं को सबसे पहले हथियार उठा लेना चाहिये था, क्या तब बुकर पुरस्कार विजेता उनका साथ देंगी? जी नहीं, बिलकुल नहीं, क्योंकि यदि हिन्दू "प्रतिकार" करे तो वह घोर साम्प्रदायिकता की श्रेणी में आता है, ऐसी गिरी हुई मानसिकता है इन सेकुलर लुच्चों-टुच्चों की। हिन्दुओं के साथ कोई अन्याय हो तो वह कानून-व्यवस्था का मामला है, हिन्दू लड़कियों के साथ लव जेहाद हो तो वह साम्प्रदायिक दुष्प्रचार है, और यदि मामला मुस्लिमों और ईसाई लड़कियों से जुड़ा हो तब वह या तो सेकुलर होता है अथवा हिन्दूवादी संगठनों का अत्याचार…

पिछली पोस्ट में मैंने भारत में ईसाई मुस्लिम संघर्ष की शुरुआत केरल से होगी इस बारे में कुछ बताया था, जिस पर आदरणीय शास्त्री जी अपना जवाब जारी रखे हुए हैं। इस जवाब की पहली किस्त में शास्त्री जी ने केरल की विशिष्ट परम्परा और धार्मिक समूहों के बीच भावनात्मक सम्बन्धों का सुन्दर चित्रण प्रस्तुत किया है, मुझे उम्मीद है कि शास्त्री जी केरल के तेजी से बदलते राजनैतिक और सामाजिक वातावरण पर भी लिखेंगे। शास्त्री जी सज्जन व्यक्ति हैं इसलिये हो सकता है कि शायद उन्होंने मेरी पोस्ट में उल्लिखित केरल के राजनैतिक वातावरण को नज़र-अंदाज़ कर दिया हो, लेकिन मुझे आशा है कि शास्त्री जी, केरल में अब्दुल नासेर मदनी के बढ़ते प्रभाव, उम्मीदवार चयन में "चर्च के दखल" और कन्नूर तथा अन्य जगहों पर संघ कार्यकर्ताओं की नृशंस हत्याओं तथा इन सारी घटनाओं के दूरगामी प्रभाव के सम्बन्ध में भी कुछ अवश्य लिखेंगे, जो कि मेरा मूल आशय था। फ़िलहाल शास्त्री जी पहले अपना लेख पूरा कर लें, फ़िर मैं बाद में कुछ कहूंगा, तब तक के लिये केरल के हालात पर यह एक छोटी सी पोस्ट है। मैं शास्त्री जी जितना सज्जन नहीं हूं, इसलिये मुझे प्रत्येक राजनैतिक घटना को थोड़ा "टेढ़ा" देखने की आदत है, साथ ही किसी बुरी नीयत से किये गये "तथाकथित अच्छे काम" को भाँपने की भी… बहरहाल केरल के राजनैतिक हालातों पर एक अन्य विस्तृत पोस्ट शास्त्री जी के लेख समाप्त होने के बाद लिखूंगा…

फ़िलहाल केरल और ईसाई धर्मान्तरण से सम्बन्धित मेरे कुछ अन्य लेखों की लिंक्स नीचे दी जा रही है, पढ़ें और बतायें कि इसमें से आपको कितना काल्पनिक लगता है और कितना तथ्यहीन… :)

http://desicnn.com/wp/2009/04/13/talibanization-kerala-congress-and_13/


http://desicnn.com/wp/2009/04/09/talibanization-kerala-congress-and/


http://desicnn.com/wp/2008/11/17/kerala-and-malwa-becoming-nursery-of/


http://desicnn.com/wp/2008/10/10/alliance-between-church-and-naxalites_10/


http://desicnn.com/wp/2008/09/29/pope-conversion-in-india/



इस खबर की स्रोत साइटें…

http://expressbuzz.com/edition/story.aspx?Title=Watch+your+children+well:+KCBC+panel&artid=ApAxX8jXX54=&SectionID=1ZkF/jmWuSA=&MainSectionID=1ZkF/jmWuSA=&SEO=KCBC,+Fr+Johny+Kochuparambil,+jehadis,+Christian&SectionName=X7s7i%7CxOZ5Y=

http://in.christiantoday.com/articles/church-warns-of-love-jihad-in-kerala/4623.htm

http://mangalorean.com/news.php?newstype=broadcast&broadcastid=152084

चित्र साभार - द टेलीग्राफ़

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केरल, भारत का प्राकृतिक रूप से सम्पन्न एक खूबसूरत प्रदेश, जहाँ समुद्र का “बैकवाटर” इसे भारत का वेनिस कहे जाने को मजबूर कर देता है, कुछ ही वर्षों में एक भयानक संघर्ष की भूमि बन जाने को अभिशप्त लगने लगा है। लगभग आज़ादी के बाद से ही यहाँ दो प्रमुख गठबन्धन शासन में रहे हैं, कांग्रेस गठबन्धन और वामपंथी गठबन्धन। हमेशा से इन गठबन्धनों में चर्च और मुस्लिम लीग की भूमिका हमेशा अहम रही है, उम्मीदवारों के चयन से लेकर सरकार की नीतियों को प्रभावित करने तक में। आज की तारीख में केरल में अर्थव्यवस्था, शिक्षा, कृषि, ग्रामीण और शहरी भूमि, वित्तीय संस्थानों और सरकार के सत्ता केन्द्रों में ईसाईयों और मुसलमानों का वर्चस्व और बोलबाला है। यदि सरकार, निगमों, अर्ध-सरकारी संस्थानों, विश्वविद्यालयों और सरकारी नियन्त्रण में स्थापित उद्योगों में कर्मचारियों का अनुपात देखें तो साफ़ तौर पर चर्च और मुस्लिम-लीग का प्रभाव दिखाई देता है।

खाडी के देशों से आने वाले पैसे (चाहे वह वहाँ काम करने वाले मलयाली लोगों ने भेजे हों अथवा मुस्लिम लीग और मदनी को चन्दे के रूप में मिले हों) ने समूचे केरल में जिस प्रकार की अर्थव्यवस्था खड़ी कर दी है, उसमें हिन्दुओं की कोई भूमिका अब नहीं बची है। ज़ाहिर है कि यह स्थिति कोई रातोंरात निर्मित नहीं हो गई है, गत 60 साल से दोनों गठबन्धनों के राजनेताओं और विदेशी पैसे का उपयोग करके चर्च और मुस्लिम लीग ने अपनी ज़मीन मजबूत की है। लोकतन्त्र के दायरे में रहकर किस प्रकार अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को लागू करना है यह चर्च और मुस्लिम लीग से सीखना चाहिये, उम्मीदवार चयन से ही उनका दखल प्रारम्भ हो जाता है, विदेश से चर्च के लिये तथा खाड़ी देशों से मुस्लिम लीग के लिये भारी मात्रा में आया हुआ पैसा इसमें महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है, इनके चुने हुए उम्मीदवार जीतने के बाद इन्हीं की जी-हुजूरी करते हैं इसमें कहने की कोई बात ही नहीं है। समूचे केरल में हिन्दू (पूरे देश की तरह ही) बिखरे हुए और असंगठित हैं, उनके पास चुनाव में वोट देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, न ही नीति-निर्माण में उनकी कोई बात सुनी जाती है, न ही उनकी समस्याओं के निराकरण में। केरल में हिन्दुओं की कोई "राजनैतिक ताकत" नहीं है [देश में ही नहीं है], जल्दी ही पश्चिम बंगाल और असम भी इसी रास्ते पर कदम जमा लेंगे, जहाँ हिन्दुओं की कोई सुनवाई नहीं होगी (कश्मीर तो काफ़ी समय पहले ही हिन्दुओं को लतियाकर भगा चुका है)।

फ़िलहाल केरल में जनसंख्या सन्तुलन की दृष्टि से देखें तो लगभग 30% ईसाई, लगभग 30% मुस्लिम और 10% हिन्दू हैं, बाकी के 30% किसी धर्म के नहीं है यानी वामपंथी है (यानी बेपेन्दे के लोटे हैं) जो जब मौका मिलता है, जिधर फ़ायदा होता उधर लुढ़क जाते हैं चाहे चुनावों में मदनी जैसे धर्मनिरपेक्ष(?) का साथ देना हो अथवा चर्च से चन्दा ग्रहण करना हो। केरल में मलाबार देवासोम कानून हो (http://www.thehindu.com/2009/07/25/stories/2009072552860300.htm) अथवा सबरीमाला के मन्दिर के प्रबन्धन का नियन्त्रण अपने हाथ में लेना हो, सारे कानून और अधिसूचनायें ईसाई और मुस्लिम अधिकारी/विधायक मिलजुलकर पास कर लेते हैं। वामपंथी दोगलेपन की हद देखिये कि इन्हें हिन्दू मन्दिरों से होने वाली आय में से राज्य के विकास के लिये हिस्सा चाहिये, लेकिन चर्च अथवा मदरसों को मिलने वाले चन्दे के बारे में कभी कोई हिसाब नहीं मांगा जाता। यही दोगलापन बंगाल में नवरात्र के दौरान काली पूजा के पांडालों में अपने-आप को “नास्तिक” कहने और धर्म को “अफ़ीम” का दर्जा देने वाले वामपंथी नेताओं की उपस्थिति से प्रदर्शित होता है। धीरे-धीरे देश के कई मन्दिरों का प्रबन्धन और कमाई सरकारों ने अपने हाथ में ले ली है और इस पैसे का उपयोग मदरसों और चर्च को अनुदान देने में भी किया जा रहा है। आज की तारीख में केरल विधानसभा का एक भी विधायक खुलेआम हिम्मत से “हाँ, मैं हिन्दू हूँ…” कहने की स्थिति में नहीं है। ग्रामीण और शहरी इलाकों में कालोनियाँ और सोसायटी चलाने वाले ईसाई-मुस्लिम गठजोड़ को आसानी से कौड़ियों के दाम ज़मीन मिल जाती है। हिन्दुओं के पक्ष में आवाज़ उठाने वाले हिन्दू मुन्नानी, विश्व हिन्दू परिषद एवं संघ कार्यकर्ताओं पर मराड (http://en.wikipedia.org/wiki/Marad_massacre) तथा कन्नूर (http://www.rediff.com/news/2008/jan/13kannur.htm) जैसे रक्तरंजित हमले किये जाते हैं और पुलिस आँखें मूंद कर बैठी रहती है, क्योंकि हिन्दू न तो संगठित हैं न ही “वोट बैंक”। केरल से निकलने वाले 14 प्रमुख अखबारों में से सिर्फ़ एक अखबार मालिक हिन्दू है, जबकि केबल नेटवर्क के संगठन पर माकपा के गुण्डे कैडर का पूर्ण कब्जा है।

यह तो हुई आज की स्थिति, भविष्य की सम्भावना क्या बनती है इस पर भी एक निगाह डाल लें। यह बात सर्वविदित है कि धर्मान्तरण में चर्च और विदेशी पैसे की भूमिका बेहद अहम है, लेकिन भारत में मुसलमानों के मुकाबले ईसाइयों ने अधिक चतुराईपूर्ण तरीके से धर्म-परिवर्तन करके अपनी जनसंख्या बढ़ाने का काम किया है। जहाँ एक तरफ़ मुस्लिमों ने अपनी खुद की आबादी बढ़ाकर, पाकिस्तानी या बांग्लादेशियों की मदद से अथवा जोर-जबरदस्ती से धर्म परिवर्तन और जनसंख्या बढ़ाई वहीं दूसरी ओर ईसाई अधिक चालाक हैं, पहले उन्होंने स्वास्थ्य और शिक्षा संस्थानों के जरिये समाज में अपनी “इमेज” एक मददगार के रूप में मजबूत की (इस इमेज निर्माण में उन्हीं द्वारा दिये गये पैसों पर पलने वाले मीडिया का रोल प्रमुख रहा)। गाँव-गाँव तथा जंगलों के आदिवासी इलाकों में पहले अस्पताल और शिक्षा संस्थान खोलकर चर्च की इमेज बनाई गई। फ़िर अगले चरण में कभी बहला-फ़ुसलाकर तो कभी धन का लालच देकर गरीबों और आदिवासियों द्वारा चुपके से ईसाई धर्म स्वीकार करवा लिया। मुसलमानों की तरह ईसाईयों ने धर्म परिवर्तित व्यक्ति का नाम बदलने की जिद भी नहीं रखी (जैसे कि बहुत से लोगों को तब तक पता नहीं था कि YS राजशेखर रेड्डी एक ईसाई हैं, जब तक कि उनको दफ़नाने की प्रक्रिया शुरु नहीं हुई, इसी प्रकार उनका दामाद अनिल, कट्टर एवेंजेलिकल ईसाई है और दोनों ने मिलकर तिरुपति मन्दिर के आसपास चर्चों का जाल बिछा दिया हैं)। इस्लाम ग्रहण करते ही यूसुफ़ योहाना को मोहम्मद यूसुफ़ अथवा चन्द्रमोहन को चांद मोहम्मद बनना पड़ा हो, लेकिन ईसाईयों ने हिन्दू नाम यथावत ही रहने दिये (एक रणनीति के तहत फ़िलहाल ही), जैसे अनिल विलियम्स, मनीषा जोसफ़, विनय जॉर्ज आदि, बल्कि कहीं-कहीं तो पूरा का पूरा नाम ही हिन्दू है, लेकिन असल में वह ईसाई बन चुका होता है। चर्च ने शुरुआती तौर पर धर्म-परिवर्तित लोगों को घरों से हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र निकाल फ़ेंकने पर भी ज़ोर नहीं दिया है, बस “पवित्र जल” छिड़ककर, दुर्गा मैया के फ़ोटो के पास ही बाइबल और क्रास भी रख छोड़ा है।


“फ़िलहाल” का मतलब यह है कि धर्म परिवर्तन करवाने वाले ईसाई संगठनों को अच्छी तरह पता है कि भले ही वह व्यक्ति इस पीढ़ी में “विनय जॉर्ज” रहे, और दुर्गा और बाइबल दोनों को एक साथ रखे रहे, लेकिन उसके लगातार चर्च में आने, और चर्च साहित्य पढ़ने से उसकी अगली पीढ़ी निश्चित ही “विन्सेंट जॉर्ज” होगी, और एक बार किसी खास इलाके, क्षेत्र या राज्य का जनसंख्या सन्तुलन चर्च के पक्ष में हुआ कि उसके बाद ही तीसरा चरण आता है जोर-जबरदस्ती करने, अलग राज्य की मांग करने और भारत सरकार को आँखें दिखाने का (उदाहरण त्रिपुरा, नागालैंड और मिजोरम)। कहने का तात्पर्य यह कि ईसाई संगठन और चर्च, मुसलमानों के मुकाबले बहुत अधिक शातिर तरीके और ठण्डे दिमाग से काम ले रहे हैं। कश्मीर में इस्लाम के नाम पर, हिन्दुओं को लतियाकर और भगाकर, जो स्थिति जोर-जबरदस्ती से बनाई गई है, लगभग अब वैसा ही कुछ उत्तर-पूर्व के राज्यों में ईसाईयत के नाम पर होने जा रहा है, जहाँ कम से कम 20 उग्रवादी संगठनों को चर्च का खुला संरक्षण हासिल है। प्रथम अश्वेत आर्चबिशप डेसमंड टूटू का वह बहुचर्चित बयान याद करें, जिसमें उन्होंने कहा था कि “जब अफ़्रीका में चर्च आया तब हमारे पास ज़मीन थी और उनके पास बाइबल। चर्च ने स्थानीय आदिवासियों से कहा आँखें बन्द करके प्रभु का ध्यान करो, चंगाई होगी… और जब हमने आँखें खोलीं तब हमारे हाथ में सिर्फ़ बाइबल थी, सारी ज़मीन उनके पास…”।

(भारत में हिन्दुओं के बीच फ़ैल रहे "जागरण", यानी उड़ीसा, गुजरात और तमिलनाडु की घटनाओं, से पोप चिंतित क्यों हैं इसके लिये मेरा एक लेख यहाँ क्लिक करके पढ़ें http://desicnn.com/wp/2008/09/29/pope-conversion-in-india/)

केरल में अगले कुछ वर्षों में यही स्थिति बनने वाली है कि हिन्दू जो कि पहले ही कमजोर हो चुके हैं, लगभग बाहर धकियाये जा चुके होंगे तथा “सत्ता पर पकड़” और अपना “वर्चस्व” स्थापित करने के लिये मुस्लिमों और चर्च के बीच संघर्ष होगा। ऐसी स्थिति में वामपंथियों को “किसी एक” का साथ देने के लिये मजबूर होना ही पड़ेगा। क्योंकि दोनों ही धर्म भले ही अपने-आप को कितना ही “सेवाभावी” या “परोपकारी” बतायें, विश्व का ताजा इतिहास बताता है कि सबसे अधिक संघर्ष इन्हीं दो धर्मों के बीच हुआ है, कोई इसे “जेहाद” का नाम देता है, कोई इसे “क्रूसेड” का। जो भी धर्म जहाँ भी बहुसंख्यक हुआ है वहाँ उसने “अल्पसंख्यकों” पर अत्याचार ही किये हैं, हिन्दू धर्म को छोड़कर। भारत से यदि किसी राज्य को अलग करना हो, तो सबसे आसान तरीका है कि उस राज्य में साम-दाम-दंड-भेद की नीतियाँ अपना कर हिन्दुओं को अल्पसंख्यक बना दो, बस अपने-आप अलगाववादी मांग उठने लगेगी, और यह केवल संयोग नहीं हो सकता कि पश्चिम बंगाल और असम दोनों सीमावर्ती राज्य हैं, जहाँ मुस्लिम-ईसाई आबादी की तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। केरल भी इसी रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहा है, सिर्फ़ यह देखना बाकी है कि केरल के इस ईसाई-मुस्लिम संघर्ष की स्थिति में जीत किसकी होती है, क्योंकि वैसे भी हिन्दुओं ने आज तक देखते और सहते रहने के अलावा किया भी क्या है?

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राज ठाकरे को महाराष्ट्र की राजनीति का एक "नया धूमकेतु" कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन एक बात तो तय है कि बाल ठाकरे की जवानी के दिनों को यदि हूबहू कोई दर्शाता है तो वह भतीजा राज ही है, बेटा उद्धव नहीं। जिन लोगों ने बाल ठाकरे को एक समय मुम्बई पर एकछत्र राज्य करते देखा है, उनके आग उगलते भाषण सुने हैं, उनका खास "मैनरिज़्म", अंदाज़ और डायलॉग देखे हैं, वे लोग पहली ही नज़र में राज ठाकरे से प्रभावित हो सकते हैं। वैसी ही दुबली-पतली कद काठी, चश्मे का अन्दाज़ भी लगभग वैसा ही, बोलने और भीड़ को आकर्षित करने के लिये लगने वाले मैनरिज़्म भी हूबहू वही… बदला है तो सिर्फ़ पहनावा… बाल ठाकरे भगवे कपड़े अधिक पहनते थे, जबकि राज ठाकरे अधिकतर काली पैंट-सफ़ेद शर्ट या सफ़ेद कुर्ते पाजामे में होते हैं…


महाराष्ट्र के चुनावों में राज ठाकरे चुनावी मंचों से जैसा और जो गरज रहे हैं उसकी एक बानगी देखिये -

1) क्या आपने देश के गृहमंत्री पी चिदम्बरम को देखा है, वह अधिकतर भारतीय वेशभूषा अर्थात परम्परागत लुंगी और मुण्डू पहने दिखाई देते हैं, वे जब भी बोलते हैं या तो अंग्रेजी बोलते हैं या तमिल बोलते हैं… ऐसा क्यों?

2) रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपना सारा काम बंगाली में लिखा लेकिन उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला…

3) जब मुम्बई में कुछ टैक्सियाँ फ़ोड़ी जाती हैं तब देश में ऐसा हल्ला मचता है मानो देश जलने लगा हो, जबकि असम में इससे दस गुना होने पर भी कोई खबर नहीं बनती…

4) सत्यजीत रे की अधिकतर फ़िल्में बंगाली में हैं, फ़िर भी उन्हें ऑस्कर मिला…

फ़िर वे बरसते हैं… "तो फ़िर ऐ मराठियों, तुम्हें मराठी बोलने-लिखने में क्या परेशानी है? ऐसा क्यों होता है कि कोई भी बाहरी आदमी, जिसे मराठी नहीं आती तुम्हारा महापौर, विधायक, सांसद, मंत्री बन सकता है, क्या तुम लोगों को शर्म नहीं आती? रजनीकान्त भी तमिल नहीं है, इसलिये उसे वहाँ की राजनीति में कूदने के बारे में दस बार सोचना पड़ता है… फ़िर सारा ठीकरा मराठियों के माथे पर ही क्यों? मराठी अस्मिता के बारे में बात करके क्या मैं गुनाह करता हूं?" यह सुनकर युवाओं की भीड़ उत्तेजित हो जाती है…

महाराष्ट्र से बाहर रहने वालों तथा मेरे और आप जैसे लोगों को यह भाषणबाजी भले ही बकवास और भड़काऊ लगे, लेकिन राज ठाकरे वहाँ के बेरोजगार युवकों पर अपना असर छोड़ने में कामयाब हो जाते हैं। राज ठाकरे अपने भाषणों में महाराष्ट्र के लिये कोई योजना पेश नहीं करते, न ही विकास अथवा ग्रामीण उत्थान की बात बताते हैं… वे अपने भाषणों में सोनिया गाँधी की नकल उतारते हैं, विलासराव देशमुख और अशोक चव्हाण की खिल्ली उड़ाते हैं, मराठियों को केन्द्र और राज्य में उचित सम्मान न दिलाने के कारण महाराष्ट्र के पुराने नेताओं को लताड़ते हैं, भीड़ नारे लगाती है, तालियाँ पीटती है… सिर्फ़ एक बात ध्यान देने वाली है कि राज ठाकरे शिवसेना, उद्धव और कई अन्य वरिष्ठ नेताओं की आलोचना करते हैं, उनकी हँसी उड़ाते हैं, लेकिन बाल ठाकरे के विरुद्ध आज तक उन्होंने हमेशा सम्मान की भाषा में बात की है, भले ही बाल ठाकरे ने उन्हें "मराठियों का जिन्ना" कहा हो।

इस सबके मायने क्या हैं? राज की सभाओं में उमड़ने वाली भीड़ को देखकर सबसे अधिक परेशानी सेना-भाजपा गठबन्धन को हो रही है, क्योंकि राज ठाकरे को जो भी वोट मिलेंगे इन्हीं के वोटों से मिलेंगे, अर्थात राज ठाकरे, कांग्रेस का रास्ता आसान बना रहे हैं। सवाल उठता है कि राज की सभाओं में उन्हें सुनने के लिये उमड़ने वाली भीड़ क्या वोटों में तब्दील हो पायेगी? क्योंकि हाल के आंध्रप्रदेश के चुनाव में हमने देखा कि वहाँ के सुपरस्टार चिरंजीवी को सुनने-देखने के लिये लाखों की भीड़ जुटती थी, लेकिन उन्हें वोट नहीं मिले और चुनिंदा सीटें ही मिलीं। संयोग देखिये कि चिरंजीवी और राज ठाकरे दोनों को चुनाव चिन्ह "रेल का इंजन" ही मिला है। अगर लोकसभा चुनावों के आँकड़े देखें, तो साफ़ ज़ाहिर होता है कि राज ठाकरे, शिवसेना को नुकसान पहुँचाने में सफ़ल हो रहे हैं, इसीलिये बुढ़ापे में प्रचार से दूर रहने का इरादा जताने के बावजूद बालासाहेब अपने पुत्रमोह के कारण अब "सामना" में लिख भी रहे हैं, सीडी के जरिये भाषण भी दे रहे हैं।

जैसे-जैसे वक्त बीत रहा है, तथा राज ठाकरे आक्रामक होते जा रहे हैं, उससे अब कांग्रेस की भी परेशानी बढ़ती जा रही है, कांग्रेस को लगने लगा है कि हमारा ही खड़ा किया हुआ "बिजूका", कहीं हमारा ही नुकसान न कर दे। इस आशंका की एक वजह, राज ठाकरे द्वारा प्रचार के अन्तिम दिनों में सोनिया पर अधिकाधिक हमला बोलना है। राज ठाकरे के लिये भी यह चुनाव उसके "राजनैतिक कैरियर" का सबसे बड़ा दांव है, और वह यह बात जानते भी हैं, इसीलिये वे और भी उग्र हो रहे हैं। राज ठाकरे मजाकिया अंदाज में कहते हैं कि "…आंध्रप्रदेश में कांग्रेसी मुख्यमंत्री के चले जाने से लोग आत्महत्याएं कर रहे हैं, जबकि महाराष्ट्र में लोग कांग्रेसी मुख्यमंत्री बना हुआ है इसलिये आत्महत्याएं कर रहे हैं…"। अपनी हर सभा के अन्त में वे एक कागज़ दिखाते हैं जिसमें राज्य के नासिक, मुम्बई, जलगाँव, ठाणे आदि जिलों में महाराष्ट्र सरकार के अधिकृत आंकड़ों के अनुसार बिहार, उत्तरप्रदेश और बांग्लादेश से आये हुए बाहरी लोगों की संख्या दिखाई गई है, और वे जाते-जाते युवाओं को भड़का जाते हैं कि "ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन तुम्हारी भाषा, संस्कृति, अस्मिता खतरे में पड़ जायेगी…"।

13 अक्टूबर को महाराष्ट्र में मतदान होगा, सभी का भाग्य मशीनों में बन्द हो जायेगा, लेकिन यदि परिणामों की सम्भावनाओं पर एक नज़र डालें तो इस प्रकार के दृश्य उभरते हैं -

1) कांग्रेस-NCP को मिलाकर पूर्ण बहुमत मिल जाता है, और वे राज ठाकरे को दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल बाहर फ़ेंकते हैं। ("यूज़ एण्ड थ्रो" की कांग्रेसी संस्कृति, वर्तमान माहौल और वोटों के बंटवारे को देखते हुए फ़िलहाल यह सम्भावना सबसे मजबूत लगती है)।

2) राज ठाकरे की पार्टी अप्रत्याशित प्रदर्शन कर जाती है और उसे 25-30 सीटें मिल जाती हैं, तब वे किंगमेकर की भूमिका में भी आ सकते हैं, यह बाकी की चारों पार्टियों को मिलने वाली सीटों से निश्चित होगा।

3) सेना-भाजपा को मिलाकर पूर्ण बहुमत आ जाता है और राज ठाकरे, हार मानकर बाल ठाकरे के शरणागत हो जाते हैं।

4) सेना-भाजपा को बहुमत से थोड़ा कम मिलता है और राज ठाकरे का समर्थन लेना पड़े, तो क्या बाल ठाकरे, राज को मनाएंगे? यदि ऐसा होता है तब बाल ठाकरे के जीवनकाल की संध्या में यह उनके जीवन की पहली बड़ी हार होगी, वह भी अपने भतीजे के हाथों।

5) कुछ "जंगली" सम्भावनाएं (अंग्रेजी शब्द Wild Possibilities को यदि शब्दानुरूप देखें) ये भी हैं - भाजपा और NCP मिलकर सरकार बना लें, कांग्रेस और शिवसेना देखती रह जायें, अथवा शिवसेना-पवार का चुनाव बाद गठबंधन हो जाये और भाजपा टापती रह जाये… राजनीति में कुछ भी सम्भव है…

जो भी होगा वह तो नतीजों के बाद ही सामने आयेगा, लेकिन आज की स्थिति में तो राज ठाकरे सभी के लिये सिरदर्द बने हुए हैं, सेना-भाजपा के लिये प्रत्यक्ष रूप से, कांग्रेस-NCP के लिये अप्रत्यक्ष रूप से जबकि देश और हिन्दुत्व का भला सोचने वालों के लिये एक "घरतोड़क" के रूप में… क्योंकि आखिर नुकसान तो हिन्दुत्व और हिन्दू वोटों के एकत्रीकरण का हो रहा है…

इस स्थिति के लिये कुछ हद तक बाल ठाकरे का पुत्रमोह ही कारणीभूत लगता है, जो लोग राज ठाकरे और उद्धव को बचपन से जानते हैं, उन्हें पता है कि राज ठाकरे, उद्धव से राजनीति, वक्तृत्व कला, मैनरिज़्म, और युवाओं को अपील करने के मामले में हमेशा आगे रहे हैं, फ़िर भी उन्होंने शिवसेना की कमान उद्धव के हाथों में दी। ज़रा सोचिये कि यदि आज राज ठाकरे पर बाल ठाकरे का वरदहस्त होता और शिवसेना का नेतृत्व उनके हाथों में होता, तो राज के सामने महाराष्ट्र में राहुल गाँधी कहीं नहीं लगते, शिवसेना को एक युवा नेतृत्व मिल जाता, न मराठी-अमराठी का मुद्दा पैदा होता, न ही कोई बवाल होता। एक तरह से देखा जाये तो राज ठाकरे की "एनर्जी" का दुरुपयोग हो रहा है, भाषा और प्रान्त के नाम पर, जबकि उसे पता होना चाहिये कि वह हिन्दुत्व का नुकसान और कांग्रेस का फ़ायदा करवा रहा है। बुढ़ापे में हर व्यक्ति को अपने बेटों का कैरियर संवरते देखने की तीव्र इच्छा होती है और बाल ठाकरे वही चाहत अब दोनों पार्टियों को ले डूबेगी।

इस झमेले में एक "एंगल" बिके हुए मीडिया का भी है। मीडिया में आजकल ठाकरे परिवार के बड़े चर्चे हैं। हो भी क्यों ना, चुनाव कवरेज के समय मीडिया को ऐसा तैयार मिर्च-मसाला भला कब मिलेगा। यदि आप महाराष्ट्र की समस्याओं और प्रदेश की हालत का जायज़ा लेने के लिये मीडिया द्वारा किया जा रहे चुनाव कवरेज की रिपोर्ट देखना चाहते हैं तो आपको कुछ नहीं मिलने वाला, क्योंकि मीडिया के लिये महंगाई, किसानों की आत्महत्या, मुम्बई हमले के आरोपियों पर कार्रवाई, मुम्बई को शंघाई बनाने के सपने, गढ़चिरौली की नक्सल समस्या आदि कोई मुद्दा है ही नहीं, मीडिया के सामने एकमात्र और मुख्य मुद्दा है "ठाकरे परिवार" में चल रही जंग। चूंकि भाजपा और शिवसेना कोई भी साम्प्रदायिक मुद्दा नहीं उठा रहे और सिर्फ़ महाराष्ट्र के विकास की बात कर रहे हैं तो बेचारे "सेकुलरों" को उन्हें कोसने का कोई मौका भी नहीं मिल रहा।

एक विशेष रणनीति के तहत, कांग्रेस द्वारा हमेशा की तरह मैनेज किये हुए चापलूस मीडिया ने राज ठाकरे को जबरदस्त कवरेज देकर हीरो बनाया हुआ है, ठाकरे परिवार, उनके झगड़े-विवाद, राज-उद्धव-बाल ठाकरे के बारे में ऑफ़िस में बैठे-बैठे तैयार की गई रिपोर्टें सतत 24 घंटे आपको विभिन्न चैनलों पर दिखाई देंगी। कांग्रेस के दोनों हाथों में लड्डू हैं, और लगातार तीसरी बार सत्ता में आने के पूरे आसार नज़र आ रहे हैं (जो कि महाराष्ट्र का भीषण दुर्भाग्य ही होगा, ठीक वैसे ही जैसे केन्द्र में कांग्रेस का लगातार दूसरा कार्यकाल शुरु से ही जनता की रातों की नींद हराम किये हुए है)।

देखना है कि कांग्रेस द्वारा शतरंज पर खड़ा किया हुआ यह राज ठाकरे नामक मोहरा "हाथी" की तरह सीधा चलता है या "घोड़े" की तरह ढाई घर… या फ़िर "पैदल" की तरह बिना कुछ किये गायब हो जायेगा, बस कुछ दिन का इंतज़ार और…। तब तक हिन्दुत्ववादी वोटों के बिखराव का सदाबहार और सनातन "मातम" जारी रखिये…, और यदि कांग्रेसी हैं तो खुशियाँ मनाईये…

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संभाजी नगर से राष्ट्रवादी कांग्रेस के उम्मीदवार कदीर मौलाना ने अपने चुनावी पोस्टर में मतदाताओं से अपील की है कि वे हिन्दुओं का नामोनिशान मिटा दें, तथा औरंग की ज़मीं पर चांद-सितारा फ़िर से लहरायें…। सोचा था कि दीपावली तक इस प्रकार की कोई भी पोस्ट नहीं लिखूंगा कि जिससे माहौल खराब हो, लेकिन "कांग्रेसी औलादें" देश को चैन से नहीं बैठने देंगी। इस पोस्टर को  देखिये, इसे ऑल इंडिया मस्जिद कमेटी ने जारी किया है (जिससे वे अब इंकार कर रहे हैं)… लेकिन सवाल ये उठता है कि शिवसेना के एक उम्मीदवार के पोस्टर में कृष्ण की गीता का उल्लेख और चित्र आता है तो चुनाव आयोग कार्रवाई करने पोस्टर भी हटवाता है और नोटिस भी देता है… क्या इस मामले में नवीन चावला अब तक सो रहे हैं? या अपने किसी "आका" के चरणों को चूम रहे हैं…। यह पोस्टर "बुरका दत्त" को अभी तक नहीं दिखाई दिया होगा… न ही अपने-आपको एसपी सिंह समझते, हाथ मलते हुए समाचार पढ़ने वाले पुण्य प्रसून वाजपेयी जी को…




ज्यादा क्या लिखूं, आप खुद ही पोस्टर देखिये, उसकी भाषा देखिये, उनके संस्कार देखिये, चुनाव आयोग के बारे में सोचिये, कांग्रेस की नीचता का विचार कीजिये, और हिन्दुओं को राजनैतिक रूप से इकठ्ठा क्यों होना चाहिये… सेकुलरों के मुँह पर इस पोस्ट को मारकर बताईये…


(स्रोत - शिवसेना सांसद संजय राउत द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर)
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हाल ही में भारत ने अपने एक "राष्ट्र सन्त" को खोया है, जी हाँ, मैं बात कर रहा हूं वाय सेमुअल राजशेखर रेड्डी की… उनकी याद में, उनके गम में, उनकी जुदाई की वजह से आंध्रप्रदेश में 400 से भी अधिक गरीब किसानों ने टपाटप-टपाटप आत्महत्याएं की हैं (ऐसा तो MGR के समय भी नहीं हुआ न ही NTR के समय)… लेकिन सिर्फ़ इतने भर से यह महान राष्ट्रसन्त नहीं हो जाते, बल्कि अब आंध्रप्रदेश की राज्य सरकार ने कुरनूल जिले के नल्लामल्ला जंगलों में 1412 हेक्टेयर (जी हाँ, सही पढ़ा आपने… 1412 हेक्टेयर) के इलाके में "YSR स्मृति वनम" के नाम से उनका मेमोरियल बनाने की योजना को हरी झण्डी दे दी है। अब दिल्ली में स्थापित सारी समाधियाँ, सारे स्मारक, सारे मेमोरियल, सारे घाट, इस महाकाय स्मारक के आगे पानी भरते नज़र आयेंगे, और ऐसा तभी होता है जब कोई व्यक्ति "राष्ट्र सन्त" बने और गुज़र जाये… न सिर्फ़ गुज़र जाये, बल्कि ऐसा गुज़रे कि उसके लिये दो दिन तक सेना, वायुसेना, भारतीय सेटेलाईट, अमेरिकी उपग्रह, पुलिस, जंगल में रहने वाले आदिवासी ग्रामीण, खोजी कुत्ते… सब के सब भिड़े रहें, किसी भी खर्चे की परवाह किये बिना… क्योंकि राष्ट्र सन्त की खोज एक परम कर्तव्य था (छत्तीसगढ़ में भी एक बार एक हेलीकॉप्टर लापता हुआ था, उसे खोजने का प्रयास तक नहीं किया गया, क्योंकि उसमें दो-चार मामूली पुलिस अफ़सर बैठे थे, जबकि राष्ट्रसन्त सेमुअल तो वेटिकन के भी प्रिय हैं और इटली के भी)।

तो मित्रों, बात हो रही थी 1412 हेक्टेयर के विशाल वन क्षेत्र में फ़ैले इस प्रस्तावित मेमोरियल की। योजना के अनुसार आत्माकुर वन क्षेत्र में आने वाले नल्लामल्ला जंगल, जो कि लगभग 5 जिलों में फ़ैला है, में उस पहाड़ी पर वायएसआर स्तूप बनाया जायेगा, जहाँ उनका हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। जंगल और पहाड़ी की शुरुआत से अर्थात पवुरलागुट्टा गाँव से सैलानी लोग, सॉरी "दर्शनार्थी"… अरे फ़िर सॉरी "भक्तगण" उस पहाड़ी पर ट्रेकिंग करते हुए चढ़ेंगे, और पहाड़ी पर बने इस विशाल स्तूप तक पहुँचेंगे। कैबिनेट ने कहा है कि प्रकृति के सुरम्य वातावरण को बनाये रखा जायेगा, और वन क्षेत्र को कोई नुकसान नहीं पहुँचेगा (अर्थात उस जंगल में रहने वाले जीव-जन्तुओं और पक्षियों को चिंता करने की कोई बात नहीं है, "जगन बाबू" उनसे आत्महत्या करने को नहीं कहने वाले है)। इस पूरे प्रोजेक्ट पर सिर्फ़ साढ़े तीन करोड़ का खर्च होगा और इसे सितम्बर 2010 तक बना लिया जायेगा। इस सम्बन्ध में पर्यावरणवादियों और प्रकृतिप्रेमियों की आपत्तियों को खारिज करते हुए राज्य की मंत्री गीता "रेड्डी" ने कहा, कि सरकार की उस वनक्षेत्र में किसी बड़े बदलाव की योजना नहीं है और उससे पर्यावरण अथवा जंगल को कोई नुकसान नहीं पहुँचेगा। उन्होंने आगे कहा कि उस पहाड़ी पर किसी पेड़ को नहीं काटा जायेगा और कोई बड़ा निर्माण कार्य नहीं किया जायेगा (अब सरकार कह रही है तो मानना ही पड़ेगा), उन्होंने यह भी कहा कि कैबिनेट के अधिकतर मंत्रियों की राय यह भी है कि हैदराबाद में भी एक स्मारक बनाया जाये (यानी कि एक और बेशकीमती ज़मीन)। इस विशाल कार्य की देखरेख और उसे सुचारू रूप से चलाने के लिये 6 मंत्रियों की एक समिति बनाई गई है। कैबिनेट में पास किये गये एक और प्रस्ताव के अनुसार कडप्पा जिले का नाम बदलकर राजशेखर रेड्डी जिला रखा जायेगा… अब आप खुद ही बताईये, क्या मैं उन्हें "राष्ट्रसन्त" की उपाधि देकर कुछ गलत कर रहा हूं?





चित्र - अपने जन्मदिन पर पुलिवेन्दुला में एक चर्च में बिशप को केक खिलाते हुए…



इस खबर को आप यहाँ पढ़ सकते हैं
http://timesofindia.indiatimes.com/news/city/hyderabad/1412-hectare-Nallamala-forest-land-for-YSR-memorial/articleshow/5053354.cms

http://andhralekha.com/news/11-19619-Govt%20gets%20forest%20land%20ready%20for%20YS%20memorial

देश के इस सबसे विशालतम समाधि स्थल के लिये अधिगृहीत की जाने वाली ज़मीन और फ़िर हैदराबाद में भी एक विशाल स्मारक बनाये जाने की योजना से इस बात को बल मिलता है कि इस "राष्ट्रसन्त" और उनके लायक पुत्र के मन में ज़मीन के प्रति कितना मोह है, कितना लगाव है, कितनी चाहत है… आखिर धरतीपुत्र जो ठहरे… आईये देखते हैं कि YSR ने पिछले 5 साल के अपने मुख्यमंत्रित्व काल में गरीबों के लिये जो थोड़ा-बहुत काम किया, वह क्या-क्या हैं… ताकि इस राष्ट्रसन्त को आप सच्ची श्रद्धांजलि दे सकें…

- हैदराबाद में रहेजा कॉर्पोरेशन को इंफ़्रास्ट्रक्चर के लिये 300 एकड़ ज़मीन दी, इसमें 50% की भागीदारी जगन रेड्डी की है।
- गंगावरम बंदरगाह बनाने के लिये 1000 एकड़ ज़मीन (इसमें भी जगन की हिस्सेदारी है)।
- ब्राहमनी स्टील्स कम्पनी में धरतीपुत्र के पुत्र की हिस्सेदारी है।
- सिक्किम में चल रहे 6000 करोड़ के एक हाईड्रो-इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट में जगन की आधी हिस्सेदारी है।
- जगन बाबू कुछ साल पहले तक बंगलोर में ही रहते थे, उनके पप्पा ने उन्हें हाल ही में सांसद बनवाया है, अतः बंगलोर के बाहरी इलाके में तीन करोड़ रुपये प्रति एकड़ की दर से कृषि भूमि खरीदकर फ़ार्म हाउस बनवाया है।
- बंगलोर के ही बन्नरघट्टा रोड पर एक विशाल शॉपिंग मॉल काम्पलेक्स भी जगन बाबू का ही बताया जाता है।
- हैदराबाद की कुक्कापल्ली हाउसिंग बोर्ड सोसायटी में 25 एकड़ का प्लाट
- प्रकासम जिले की मशहूर ग्रेनाइट खदानों में 150 एकड़ की खनन भूमि (एक बेनामी कम्पनी गिम्पेक्स के नाम से)
- अखबार "साक्षी" जिसके मालिक और चेयरमैन जगन रेड्डी हैं, उस अखबार ने पिछले 5 साल में कोलकाता, गुजरात, चेन्नई और बंगलोर में 600 करोड़ का निवेश किया है।
- साक्षी ग्रुप में दो मुख्य निवेशक हैं आर्टिलियन्स बायोइन्नोवेशंस तथा स्टॉकनेट इंटरनेशनल, जिन्हें विश्व के स्टॉक मार्केट में लिस्टेड किया गया है, इनकी शेयर प्राइस एक रुपये से कम है और प्रमोटर का हिस्सा 0.3 प्रतिशत है, लेकिन यह दोनों निवेशक कम्पनियाँ साक्षी की स्क्रिप पर 350 रुपये का प्रीमियम देती हैं।
- साक्षी और जगति पब्लिकेशन में निवेश करने वाली कम्पनियों को ही बड़े-बड़े सरकारी ठेके मिलते हैं, जैसे SEZ, बन्दरगाह निर्माण और ग्रेनाईट खदानों में खनन की अनुमति।
- जगति पब्लिकेशन के ऑडिटर हैं PWC, जी हाँ वही प्राइस वाटर कूपरहाउस, जिसने सत्यम के बही खातों की उम्दा जाँच करके बताया था कि "सब ठीक है"।
- इसी PWC ने साक्षी अखबार की "जाँच" करके सर्टिफ़िकेट दिया कि इसकी दैनिक खपत 12 लाख प्रतियाँ रोज़ाना की है, और साक्षी अखबार को सरकार की ओर से बड़े-बड़े विज्ञापन मिलने लगे।
- अरुणाचल प्रदेश में लगने वाले 3000 मेगावाट के प्रोजेक्ट में काम करने वाली कम्पनियों, एपी जेन्को तथा मेसर्स एथेना पावर एनर्जी की भी जगति पब्लिकेशन्स में हिस्सेदारी है।
- पुल्लिवेन्दुला में 5 एकड़ में निर्मित वायएसआर के बंगले की कीमत कम से कम 4 करोड़ रुपये है।

अब जबकि "धरतीपुत्र" को ही धरती इतनी प्रिय है तब उनके पीछे-पीछे लगे "भूमिपुत्रनुमा" रिश्तेदारों को क्यों न होगी, और वे क्यों पीछे रहें…

वायएस विवेकानन्द रेड्डी (राष्ट्रसन्त के भाई) -

- कडप्पा से सांसद विवेकानन्द रेड्डी के पास मधापुर की हाईटेक सिटी में 2000 वर्गमीटर की ज़मीन है, जो फ़िलहाल एक सॉफ़्टवेयर कम्पनी को किराये पर दी गई है (कीमत बताने का क्या फ़ायदा, सभी अन्दाज़ लगा ही लेंगे)

वायवी सुब्बा रेड्डी (राष्ट्रसन्त के एक और भाई) -

- तुंगभद्रा नदी पर बनने वाले एक हाईड्रो प्रोजेक्ट में हिस्सेदार।
- अपनी पत्नी स्वर्णलता रेड्डी के नाम पर 1000 वर्गफ़ीट का प्लाट जुबली एनक्लेव इलाके में।

सुधाकर रेड्डी (चचेरे दामाद)

- उत्तरी आंध्रप्रदेश के समुद्री तटों पर रेती की खुदाई और ढुलाई के ठेके, स्विट्ज़रलैण्ड की कम्पनी बोथलिट्रेड इंक के साथ भागीदारी में।

बी युवराज रेड्डी (राष्ट्रसन्त के भतीजे)

युवराज चिटफ़ण्ड कम्पनी बनाकर 2.60 करोड़ का घोटाला किया।

रबिन्द्रनाथ रेड्डी (YSR के साले)

- डेन्दुलुरु गाँव में फ़र्टिलाइज़र कम्पनी बनाने के नाम पर कई एकड़ भूमि हड़प की।
- गेमन इंडिया लिमिटेड (दिल्ली मेट्रो के काम में गड़बड़ी के लिये ब्लैक लिस्टेड कम्पनी) के साथ मिलकर सर्वारासागर-वामिकोण्डा नहर प्रोजेक्ट को हासिल करने के लिये सम्बन्धों का उपयोग।

अन्य रिश्तेदार -
- मधुसूदन रेड्डी, वेणुगोपाल रेड्डी, प्रताप रेड्डी ने मिलकर कडप्पा नगर सुब्बा रेड्डी कॉलेज के पास की 15 करोड़ की ज़मीन गैरकानूनी रूप से दबाई हुई है (खसरा सर्वे क्रमांक 682/4, 684/4, 700/2).

- YSR के बड़े भाई की पत्नी भारती रेड्डी ने सितम्बर 2005 में कोल्लुरू में 35 लाख की ज़मीन (सर्वे क्रमांक 148) खरीदी, जो कि अचानक "रिंग रोड" के निर्माण की वजह से 13 करोड़ की हो गई।
- इसी रिंग रोड ने कई अन्य छोटे-मोटे रिश्तेदारों के भी वारे न्यारे करवा दिये, जैसे वायवी सुब्बा रेड्डी ने इसी रोड के पास सर्वे क्रमांक 117, 119, 121, 123, 124, 125, 126, 131, 132, 134, 136, 141 को 20 करोड़ में खरीदा, और "अचानक" वहाँ रिंग रोड बनाने की घोषणा हो गई, जिससे इस ज़मीन का भाव एक साल में ही 125 करोड़ पहुँच गया।
- YSR के नज़दीकी मित्र पार्थसारथी रेड्डी जो कि हेटेरो ड्रग्स नामक दवा कम्पनी के मालिक हैं, उन्हें SEZ बनाने के लिये कौड़ियों के दाम ज़मीन दी गई और कुछ ही दिन बाद उन्होंने जगति पब्लिकेशन में 13 करोड़ का निवेश कर दिया।

(इस लिस्ट में सत्यम और मेटास कम्पनी में हुआ महाघोटाला शामिल नहीं है)

यह तो हुई एक छोटी सी बानगी इस महान राष्ट्रसन्त के खुले कारनामों की (बाकी के जो भी घोटाले छिपे हुए हैं वह अलग हैं)। यदि आप पढ़ते-पढ़ते उकता गये हों तो आपको बता दूं कि ऐसा नहीं कि अपने मुख्यमंत्रित्व काल में इन्होंने सिर्फ़ अथाह पैसा ही कमाया हो, इन्होंने "धर्म" की भी सेवा की है, और जिस स्मारक या समाधि को बनाने में इतना पैसा खर्च किया जा रहा है, और हेलीकॉप्टर दुर्घटना होने पर इनकी खोज के लिये अमेरिका सहित सोनिया गाँधी भी चिंता में दुबली हुई जा रही थीं उसका कारण इनकी "धर्म" सेवा ही है, आईये यह ज्ञान भी प्राप्त कर ही लीजिये -

- 3 दिसम्बर 2007 को एक आदेश जारी करके "सेमुअल" ने प्रदेश के सभी 1,84,000 मन्दिरों, 181 मठों और विभिन्न धार्मिक ट्रस्टों को अधिगृहीत कर लिया ताकि उनकी करोड़ों की आय पर कब्जा किया जा सके। (डेक्कन क्रानिकल 3.12.2007)
- भद्राचलम : मन्दिर की 1289 एकड़ में से 884 एकड़ ज़मीन एक चर्च को दान कर दी।
- श्रीसेलम : प्रसिद्ध मल्लिकार्जुन मन्दिर की 1600 एकड़ भूमि को विभिन्न ईसाई-आदिवासी संगठनो में बाँट दिया।
- पुरानी मस्जिदों के लिये 2 करोड़, चर्चों की मरम्मत के लिये 7 करोड़ अनुदान दिया, भारत के इतिहास में पहली बार किसी ईसाई को बेथलेहम जाने के लिये सरकारी तौर पर अनुदान दिया। महाशिवरात्रि के अवसर पर बसों में अधिक भीड़ को देखते हुए हिन्दुओं की सुविधा(?) हेतु टिकट पर अतिरिक्त प्रभार लगाया। (डेक्कन क्रानिकल 23 अगस्त 2006, 18 दिसम्बर 2006, ईनाडु 16 फ़रवरी 2007)।
- प्रसिद्ध तिरुपति मन्दिर की 7 पहाड़ियों में से 5 पहाड़ियों पर चर्च निर्माण की अनुमति। अपने परिजन के नाम पर होने वाले हॉकी टूर्नामेंट के लिये तिरुपति मन्दिर की आय से पैसा खर्च किया (द हिन्दू 17 जुलाई 2006, डेक्कन क्रानिकल 8 मार्च 2007)।
- मन्तपम में गोल्फ़ कोर्स बनाने के लिये 10 मन्दिरों को तोड़ा गया, जबकि सेमुअल रेड्डी के बेटे जगन ने अनन्तपुर में एक मन्दिर तुड़वाया ( द हिन्दू 27 अगस्त 2004, डेक्कन क्रानिकल 8 मार्च 2007)।

(कम से कम अन्तिम संस्कार के मामले में YSR ईमानदार रहे और ईसाई पद्धति से ही उनका अन्तिम संस्कार किया गया, जबकि कुछ "परिवार" तो ऐसे ढोंगी हैं कि उन्हें पता है कि वे हिन्दू नहीं हैं फ़िर भी राजनीति और दिखावे की खातिर उन्हें हिन्दू धार्मिक पद्धति से अन्तिम संस्कार करवाना पड़ा… बेचारे)

(तात्पर्य यह कि जब उन्होंने "धरती" और धर्म की इतनी सेवा की है, तो उनके "लायक" पुत्र का हक बनता है कि वह इसे परम्परा को आगे बढ़ाये… इसीलिये तो आंध्रप्रदेश में इस राष्ट्रसंत के दुःख में लोगों ने टपाटप-टपाटप आत्महत्याएं कीं…)

मैं जानता हूं कि इस "राष्ट्रसन्त" के इन कारनामों और मेरी इस छोटी सी पोस्ट के मद्देनज़र आपकी आँखें श्रद्धा से छलछला उठी होंगी, अतः यहीं पर समाप्त करता हूं ताकि आप भी अपनी "विनम्र" श्रद्धांजलि उन्हें अर्पित कर सकें…

अन्य स्रोत -
1) Vijaya Karnataka, a kannada daily (20-6-06)
2) Eenadu Daily, A Telgu Daily
3) Deccan Chronicle, (15-06-2006)
4) Vikrama (28-05-2006)
5) Sudarshan TV (24-06-06)
6) Pungava news Magazine (1-06-06)
तथा http://www.outlookindia.com/article.aspx?229456

http://www.christianaggression.org/item_display.php?type=ARTICLES&id=1122662970

http://www.hindujagruti.org/news/index.php?print/id:1856,pdf:1


YSR, YS Rajshekhar Reddy Memorial, Land Grab and Forest Destruction in AP, Tirumala, Tirupati Devasthanam, Anti-Hindu Activities in Andhra Pradesh, Land Scams of Jagan Reddy and Reddy Family, Satyam and Maytas Scam, YSR in Satyam, वाईएसआर रेड्डी, राजशेखर रेड्डी मेमोरियल समाधि, विशाल भूमि अधिग्रहण और वनों का विनाश, तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम, हिन्दू विरोधी गतिविधियाँ और राजशेखर रेड्डी, रेड्डी परिवार की आर्थिक घोटाले, सत्यम घोटाला और जगन रेड्डी, Blogging, Hindi Blogging, Hindi Blog and Hindi Typing, Hindi Blog History, Help for Hindi Blogging, Hindi Typing on Computers, Hindi Blog and Unicode
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प्रायः सभी लोगों ने देखा होगा कि भारत में होने वाले प्रत्येक हिन्दू-मुस्लिम दंगे के लिये संघ-भाजपा को जिम्मेदार ठहराया जाता है, जब भी कभी, कहीं भी दंगा हो, आप यह वक्तव्य अवश्य देखेंगे कि "यह साम्प्रदायिक ताकतों की एक चाल है… भाजपा-शिवसेना द्वारा रचा गया एक षडयन्त्र है… देश के शान्तिप्रिय नागरिक इस फ़ूट डालने वाली राजनीति को समझ चुके हैं और चुनाव में इसका जवाब देंगे…" आदि-आदि तमाम बकवास किस्म के वक्तव्य कांग्रेसी और सेकुलर लोग लगातार दिये जाते हैं। महाराष्ट्र के सांगली जिले के मिरज़ कस्बे में हुए हिन्दू-मुस्लिम दंगों के बारे में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने भी ठीक यही रटा-रटाया बयान दिया है कि "महाराष्ट्र के चुनावों को देखते हुए राजनैतिक लाभ हेतु किये गये मिरज़ दंगे साम्प्रदायिक शक्तियों का एक षडयन्त्र है…"।

कुछ दिनों पूर्व मैंने एक पोस्ट लिखी थी, जिसमें इन दंगों के लिये जिम्मेदार हालात (अफ़ज़ल-शिवाजी और स्थानीय मुस्लिमों की मानसिकता के बारे में) तथा उन घटनाओं के बारे में विस्तार से चित्रों और वीडियो सहित लिखा था, जिस कारण दंगे फ़ैले। यहाँ देखा जा सकता है http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/09/miraj-riots-ganesh-mandal-mumbai.html

आईये सबसे पहले देखते हैं कि अशोक चव्हाण मुख्यमंत्री बने कैसे, और किन परिस्थितियों में? गत 26 नवम्बर को जब पाकिस्तान से आये कुछ आतंकवादियों ने मुम्बई में हमला किया था, और उसके नतीजे में "कर्तव्यनिष्ठ", "जिम्मेदार" और "सक्रिय" सूट-बूट वाले विलासराव देशमुख अपने बेटे रितेश और रामगोपाल वर्मा को साथ लेकर ताज होटल में तफ़रीह करने गये थे, उसके बाद शर्म के मारे उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा था और अचानक अशोक चव्हाण की लाटरी लग गई थी, तो क्या हम मुम्बई हमले को अशोक चव्हाण का षडयन्त्र मान लें जो कि उन्होंने अपने राजनैतिक फ़ायदे के लिये रचा था? यदि मिरज़ दंगों के बारे में ऊपर दिये गये तर्क के अनुसार चलें, तो इस आतंकवादी घटना का सबसे अधिक राजनैतिक फ़ायदा तो अशोक चव्हाण को ही हुआ, इसलिये इसमें उनका हाथ होने का शक करना चाहिये। जब विधानसभा की दो-चार सीटें हथियाने के लिये भाजपा-शिवसेना यह दंगों का षडयन्त्र कर सकती हैं तो मुख्यमंत्री पद पाने के लिये अशोक चव्हाण आतंकवादियों का क्यों नहीं? लेकिन ऐसा नहीं है, यह हम जानते हैं। इसलिये ऐसे मूर्खतापूर्ण वक्तव्य अब बन्द किये जाने चाहिये।

एक गम्भीर सवाल उठता है कि क्या हिन्दू-मुस्लिम दंगों की वजह से भाजपा को सच में फ़ायदा होता है? जब मुम्बई में हुए भीषण पाकिस्तानी हमले के बावजूद (जो कि एक बहुत बड़ी घटना थी) तत्काल बाद हुए चुनावों में मुम्बई की लोकसभा सीटों पर भाजपा को जनता ने हरा दिया था, तब एक मिरज़ जैसे छोटे से कस्बे में हुए दंगे से सेना-भाजपा को कितनी विधानसभा सीटों पर फ़ायदा हो सकता है?

यह तथ्य स्थापित हो चुका है कि इस प्रकार के हिन्दू-मुस्लिम दंगों की वजह से कभी भी हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण नहीं होता, लेकिन मुस्लिम वोट जरूर एकमुश्त थोक में एक पार्टी विशेष को मिल जाते हैं। मुसलमानों को डराने के लिये कांग्रेस और सेकुलर पार्टियाँ हमेशा भाजपा-संघ का हौवा खड़ा करती रही हैं, राजनैतिक पार्टियाँ जानती हैं कि हिन्दू वोट कभी एकत्र नहीं होता, बिखरा हुआ होता है, जबकि मुस्लिम वोट लगभग एकमुश्त ही गिरता है (भले ही वह कांग्रेस के पाले में हो या सपा या किसी अन्य के)। इसलिये जब भी हिन्दू-मुस्लिम दंगे होते हैं उसके पीछे कांग्रेसी षडयन्त्र ही होता है, भाजपा-संघ का नहीं। कांग्रेसी लोग कितने बड़े "राजनैतिक ड्रामेबाज" हैं उसका एक उदाहरण -- सन् 2000 में शिवसेनाप्रमुख बाल ठाकरे को गिरफ़्तार करने का एक नाटक किया गया था, खूब प्रचार हुआ, मीडिया के कैमरे चमके, बयानबाजियाँ हुईं। कांग्रेस को न तो कुछ करना था, न किया, लेकिन मुसलमानों के बीच छवि बना ली गई। मुम्बई के भेण्डीबाजार इलाके में शिवसेना की पीठ में "छुराघोंपू" यानी छगन भुजबल का, मुस्लिम संगठनों द्वारा तलवार देकर सम्मान किया गया, एक साल के भीतर समाजवादी पार्टी के विधायक राकांपा में आ गये और उसके बाद मुम्बई महानगरपालिका में एकमुश्त मुस्लिम वोटों के कारण, शरद पवार की पार्टी के पार्षदों की संख्या 19 हो गई… इसे कहते हैं असली षडयन्त्र। इतना बढ़िया षडयन्त्र सेना-भाजपा कभी भी नहीं कर सकतीं। इससे पहले भी कई बार पश्चिमी महाराष्ट्र के मिरज़, सांगली, इचलकरंजी, कोल्हापुर आदि इलाकों में दंगे हो चुके हैं, कभी भी सेना-भाजपा का उम्मीदवार नहीं जीता, ऐसा क्यों? बल्कि हर चुनाव से पहले कांग्रेस द्वारा बाबरी मस्जिद, गुजरात दंगे आदि का नाम ले-लेकर मुस्लिम वोटों को इकठ्ठा किया जाता है और फ़सल काटी जाती है।

गुजरात की जनता समझदार है जो कि हर बार कांग्रेस के इस षडयन्त्र (यानी प्रत्येक चुनाव से पहले गुजरात दंगों की बात, किसी आयोग की रिपोर्ट, किसी फ़र्जी मुठभेड़ को लेकर हल्ला-गुल्ला आदि) को विफ़ल कर रही है। मुसलमानों को एक बात हमेशा ध्यान में रखना चाहिये कि हिन्दू कभी भी "क्रियावादी" नहीं होता, नहीं हो सकता, हिन्दू हमेशा "प्रतिक्रियावादी" रहा है, यानी जब कोई उसे बहुत अधिक छेड़े-सताये तभी वह पलटकर वार करता है, वरना अपनी तरफ़ से पहले कभी नहीं। कांग्रेस हमेशा मुसलमानों को डराकर रखना चाहती है और हिन्दुओं के विरोध में पक्षपात करती जाती है, राजनीति करती रहती है, तुष्टिकरण जारी रहता है… तब कभी-कभार, बहुत देर बाद, हिन्दुओं का गुस्सा फ़ूटता है और "अयोध्या" तथा "गुजरात" जैसी परिणति होती है।


यदि अशोक चव्हाण षडयन्त्र की ही बात कर रहे हैं, तब यह भी तो हो सकता है कि पिछले लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र के इस इलाके से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का पत्ता साफ़ हो गया था, इसलिये फ़िर से मुस्लिम वोटों को अपनी तरफ़ करने के लिये यह षडयन्त्र रचा गया हो (वीडियो फ़ुटेज तो यही कहते हैं)।




मिरज़ के इन दंगों के बारे में कुछ और खुलासे, तथा पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर कुछ बिन्दु निम्नलिखित हैं…

1) पुलिस की सरकारी जीप पर चढ़कर हरा झण्डा लहराने वाले शाहिद मोहम्मद बेपारी को पुलिस, दंगों के 12 दिन बाद गिरफ़्तार कर पाई (Very Efficient Work)

2) शाहिद मोहम्मद बेपारी ने इन 12 दिनों में से अपनी फ़रारी के कुछ दिन नगरनिगम के एक इंजीनियर (यानी सरकारी कर्मचारी) बापूसाहेब चौधरी के घर पर काटे। आज तक इस सरकारी कर्मचारी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

3) इससे पहले इसी बापूसाहेब चौधरी ने ईदगाह मैदान पर नल के कनेक्शन को स्वीकृति दी थी, और नल लगवाया जबकि उस विवादित मैदान पर कोर्ट केस चल रहा है। इस नल कनेक्शन को लगवाने पर PHE विभाग को कोई पैसा नहीं दिया गया, और अब बात खुलने पर रातोंरात इस नल कनेक्शन को उखाड़ लिया गया है, ऐसे हैं कांग्रेसी सरकारी कर्मचारी।

4) इसके पहले इस साजिश के मुख्य मास्टरमाइंड (यानी पहले भड़काऊ भाषण देने वाले और बाद में, गणेश मूर्तियों पर पत्थर फ़ेंकने की शुरुआत की) इमरान हसन नदीफ़ को पुलिस ने आठ दिन बाद गिरफ़्तार किया (सोचिये, जिन व्यक्तियों के चित्र और वीडियो फ़ुटेज उपलब्ध हैं उसे पकड़ने में आठ दिन और बारह दिन लगते हैं, तो पाकिस्तान से आये आतंकवादियों को पकड़ने में कितने दिन लगेंगे)।

5) जब शाहिद बेपारी जीप पर चढ़कर हरा झण्डा लहरा रहा था, तब एक बार उसके हाथ से झण्डा गिर गया था, उस समय वहाँ एएसपी के सामने उपस्थित एक सब-इंस्पेक्टर ने वह झण्डा उठाकर फ़िर से ससम्मान शाहिद के हाथ में थमाया, इस "महान" सब-इंस्पेक्टर का तबादला 21 दिन बाद पुणे के एक ग्रामीण इलाके में किया गया। जबकि पिछले साल ठाणे में हुए दंगों के दौरान मुस्लिम युवकों को बलप्रयोग से खदेड़ने वाले इंस्पेक्टर साहेबराव पाटिल का तबादला अगले ही दिन हो गया था…। कांग्रेसियों की नीयत पर अब भी कोई शक बचा है?

देश में होने वाले प्रत्येक हिन्दू-मुस्लिम दंगों के पीछे रची गई कुटिल चालों को उजागर करना चाहिये, ताकि हर दंगे का ठीकरा भाजपा-संघ के सिर ही न फ़ोड़ा जाये, लेकिन अक्सर यही होता कि परदे के पीछे से चाल चलने वाली कांग्रेस तो साफ़ बच निकलती है और हिन्दुओं की "प्रतिक्रिया" व्यक्त करने वाली भाजपा-सेना-संघ सामने होते हैं और उन्हें साम्प्रदायिक करार दिया जाता है, जबकि असली साम्प्रदायिक है कांग्रेस, जो शाहबानो मामले पर सुप्रीम कोर्ट को लतियाकर मुसलमानों को, तथा तुरन्त ही जन्मभूमि का ताला खुलवाकर हिन्दुओं को खुश करने के चक्कर में देश की हवा खराब करती है। मेरी यह दृढ़ मान्यता है कि यदि देश से कांग्रेस (सिर्फ़ कांग्रेस नहीं, बल्कि कांग्रेसी मानसिकता) का सफ़ाया हो जाये तो हिन्दू-मुस्लिम दंगों की सम्भावना बहुत कम हो जायेगी, और देश सुखी रहेगा… आप क्या सोचते हैं?

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जैसा कि सभी जानते हैं, "नेस्ले" एक खाद्य पदार्थ बनाने वाली महाकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनी है। बच्चों के दूध पावडर से लेकर, कॉफ़ी, नूडल्स और चॉकलेट तक इस कम्पनी के खाद्य पदार्थों की रेंज इतनी बड़ी है कि, भारत के लाखों बच्चे और बड़े नेस्ले कम्पनी द्वारा बनाये गये किसी न किसी खाद्य पदार्थ को कभी न कभी अवश्य चख चुके होंगे। कई परिवारों में नेस्ले की कॉफ़ी, नूडल्स, बिस्किट तथा बेबी फ़ूड नियमित रूप से उपयोग किये जाते हैं।




हाल ही में नेस्ले कम्पनी ने घोषणा की है कि वह भारत में जारी किए जाने वाले अपने उत्पादों में "जेनेटिकली इंजीनियर्ड" (GE) उप-पदार्थ और मिश्रण (Ingredients) मिलाये जाने के पक्ष में है। उल्लेखनीय है कि गत कई वर्षों से समूची दुनिया में GE या GM (जेनेटिकली मेन्यूफ़ैक्चर्ड) पदार्थों के खिलाफ़ जोरदार मुहिम चलाई जा रही है। जिन लोगों को जानकारी नहीं है उन्हें बताया जाये कि GE फ़ूड क्या होता है। सीधे-सादे शब्दों में कहा जाये तो किसी भी पदार्थ के मूल गुणधर्मों और गुणसूत्रों (Genes) में वैज्ञानिक तकनीकों की मदद से छेड़छाड़ अथवा फ़ेरबदल करके बनाये गये "नये पदार्थ" को ज़ेनेटिकली इंजीनियर्ड कहा जाता है। थोड़े में इसे समझें तो उस पदार्थ के ऑर्गेनिज़्म को जेनेटिक इंजीनियरी द्वारा बदलाव करके उसके गुण बदल दिये जाते हैं, एक तरह से इसे डीएनए में छेड़छाड़ भी कहा जा सकता है (उदाहरण के तौर पर घोड़े और गधी के संगम से बना हुआ "खच्चर")। इस पद्धति से पदार्थ के मूल स्वभाव में परिवर्तन हो जाता है।


ग्रीनपीस तथा अन्य पर्यावरण और स्वास्थ्य सम्बन्धी संगठनों की माँग है कि चूंकि इन पदार्थों के बारे में अब तक कोई ठोस परीक्षण नहीं हुए हैं और इन "अप्राकृतिक" पदार्थों की वजह से मानव जीवन और धरती के पर्यावरण को खतरा है।  कई देशों ने उनके यहाँ "जीएम" खाद्य पदार्थों को प्रतिबंधित किया हुआ है। दिक्कत यह है कि "नेस्ले" जैसी कम्पनी जो कि यूरोप में तो सभी मानकों का पालन करती है और खाद्य पदार्थों की पैकिंग पर सभी कुछ स्पष्ट लिखती है, वह भारत में कानून की आड़ लेकर खुले तौर पर कुछ भी बताने को तैयार नहीं है, यह हठधर्मिता है। एक बार पहले भी कोक और पेप्सी को ज़मीन से अत्यधिक पानी का दोहन करने की वजह से केरल में कोर्ट की फ़टकार सुननी पड़ी है, लेकिन इन कम्पनियों का अभियान और अधिक जोर पकड़ता जा रहा है। विश्व की सबसे बड़ी बीज कम्पनी मोन्सेन्टो और कारगिल ने दुनिया के कई देशों में ज़मीनें खरीदकर उस पर "जीएम" बीजों का गुपचुप परीक्षण करना शुरु कर दिया है। भारत में भी बीटी बैंगन और बीटी कपास के बीजों को खुल्लमखुल्ला बेचा गया तथा मध्यप्रदेश में निमाड़ क्षेत्र के किसान आज भी इन बीटी कपास की वजह से परेशान हैं और कर्ज़ में डूब चुके हैं।


नेस्ले कम्पनी के विपणन प्रबन्धक (एशिया प्रशांत) मिस्टर वास्ज़िक को लिखे अपने पत्र में ग्रीनपीस इंडिया ने कहा है कि चूंकि नेस्ले कम्पनी के करोड़ों ग्राहक भारत में भी रहते हैं, जिसमें बड़ी संख्या मासूम बच्चों की भी है जो आये दिन चॉकलेट और नूडल्स खाते रहते हैं, इसलिये हमें यह जानने का हक है कि क्या नेस्ले कम्पनी भारत में बेचे जाने वाले उत्पादों में जेनेटिकली मोडीफ़ाइड पदार्थ मिलाती है? यदि मिलाती है तो कितने प्रतिशत? और यदि ऐसे पदार्थ नेस्ले उपयोग कर रही है तो क्या पैकेटों पर इस बारे में जानकारी दी जा रही है? एक उपभोक्ता होने के नाते प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार है कि उसे पता हो कि जो वस्तु वह खा रहा है, उसमें क्या-क्या मिला हुआ है। उल्लेखनीय है कि कई वैज्ञानिक शोधों से यह ज्ञात हुआ है कि जीएम खाद्य पदार्थों के कारण मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रतिकूल असर होता है। अब जबकि नेस्ले कम्पनी यूरोपियन यूनियन देशों में हर खाद्य वस्तु में "जीई-फ़्री" की नीति पर चलती है, तब भारत में वह क्यों छिपा रही है? यह भेदभाव क्यों किया जा रहा है, क्या भारत के बच्चे, वैज्ञानिक प्रयोगों में उपयोग किये जाने वाले चूहे अथवा "गिनीपिग" हैं? (गिनीपिग वह प्राणी है, जिस पर वैज्ञानिक प्रयोग किये जाते हैं) जब कई बड़ी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि उनके खाद्य पदार्थों में "जीएम" का मिश्रण नहीं किया जाता, तब नेस्ले को ऐसा घोषित करने में क्या आपत्ति है? जानवरों पर किये गये जीई फ़ूड के प्रयोगों ने सिद्ध किया है कि इसके कारण विभिन्न एलर्जी, किडनी के रोग तथा नपुंसकता में वृद्धि आदि बीमारियाँ होती हैं।


इस सम्बन्ध में ग्रीनपीस इंडिया ने एक "सेफ़ फ़ूड" (सुरक्षित खाद्य पदार्थ) की गाइड जारी की है, जिसमें 16 जाने माने ब्राण्ड्स का समावेश है। इस गाइड में "लाल सूची" और "हरी सूची" है, लाल सूची में शामिल कम्पनियाँ अपने उत्पादों में या तो जीई मिश्रण मिलाती हैं या फ़िर वे यह घोषणा करने में हिचकिचाहट दिखा रही हैं, जबकि हरी सूची में शामिल कम्पनियाँ ईमानदारी से घोषणा कर चुकी हैं कि उनके उत्पादों में किसी प्रकार का "जीएम" मिश्रण शामिल नहीं है। इस सेफ़ फ़ूड गाईड में केन्द्र सरकार द्वारा "जीएम" मिश्रण को आधिकारिक रूप से मिलाने के बारे में अनुमति के बारे में भी बताया गया है। बीटी-बैंगन की तरह ही "जीई" चावल, टमाटर, सरसों और आलू भी केन्द्र सरकार की अनुमति के इन्तज़ार में हैं।

लाल सूची में शामिल हैं, नेस्ले, कैडबरी, केल्लॉग्स, ब्रिटानिया, हिन्दुस्तान यूनिलीवर, एग्रोटेक फ़ूड्स लिमिटेड, फ़ील्डफ़्रेश (भारती ग्रुप), बेम्बिनो एग्रो इंडस्ट्रीज़, सफ़ल आदि, जबकि हरी सूची (सुरक्षित) में एमटीआर, डाबर, हल्दीराम, आईटीसी, पेप्सिको इंडिया, रुचि सोया आदि शामिल हैं। इस सम्बन्ध में अधिक जानकारी सैयद महबूब (syed.mehaboob@greenpeace.org, 09731301983) से ली जा सकती है।

नेस्ले कम्पनी का पिछला रिकॉर्ड भी बहुत साफ़-सुथरा नहीं रहा है, कई बार यह कम्पनी विवादों में फ़ँस चुकी है और 1977 में एक बार तो पूरे अमेरिका की जनता ने इसके सभी उत्पादों का बहिष्कार कर दिया था, बड़ी मुश्किल से इसने वापस अपनी छवि बनाई। नेस्ले का सबसे अधिक विवादास्पद प्रचार अभियान वह था, जिसमें इसने अपने डिब्बाबंद दूध पावडर को माँ के दूध से बेहतर और उसका विकल्प बताया था। इस विज्ञापन की आँधी के प्रभाव में आकर कई पश्चिमी देशों में नवप्रसूताओं ने अपने बच्चों को दूध पावडर देना शुरु कर दिया था, जबकि चिकित्सकीय और वैज्ञानिक दृष्टि से माँ का दूध ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है। एक बार स्विट्ज़रलैण्ड में भी इसकी कॉफ़ी के बीज विवादों में फ़ँस चुके हैं, तब माफ़ी माँगकर इसने अपना पीछा छुड़ाया था। हाल ही में नेस्ले कम्पनी ने यूरोपियन यूनियन में कॉफ़ी के जीएम बीजों पर पेटेंट हासिल किया है (http://www.organicconsumers.org/ge/coffee060417.cfm) जिसका ब्राजील के कॉफ़ी उत्पादकों ने कड़ा विरोध किया है, भारत में भी केरल के कॉफ़ी उत्पादकों पर भविष्य में इसका असर पड़ सकता है।

यदि आप भी जागरूक उपभोक्ता हैं तो नेस्ले कम्पनी के भारत स्थित दफ़्तर में फ़ोन लगाकर इसके उत्पादों में जीएम मिश्रण के बारे में पूछताछ कर सकते हैं, कॉल कीजिये 0124-2389300 को। अब तक 10,000 से अधिक लोग इस बारे में पूछताछ कर चुके हैं, शायद इस प्रकार ही सही, नेस्ले कम्पनी भारत वालों के प्रति अधिक जवाबदेह बने। नेस्ले के एक उपभोक्ता ने फ़ोन पर मैगी के टू मिनट नूडल्स के विज्ञापन को लेकर आपत्ति जताई, और खुला चैलेंज दिया कि कम्पनी दो मिनट में नूडल्स बनाकर दिखाये, ताकि भारत भर में हजारों रुपये के ईंधन की बचत हो सके। एक अन्य ग्राहक ने यह अपील की, कि मैगी के पैकेट पर यह बताया जाये कि दो मिनट में नूडल्स पकाने के लिये फ़्राइंग पैन की लम्बाई-चौड़ाई और गैस की लौ कितनी बड़ी होनी चाहिये, कम से कम इस बारे में ही लिख दें… लेकिन न तो कोई जवाब आना था, न आया…।

बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ धड़ल्ले से भारत की ज़मीन से पानी उलीच रही हैं, कोक और पेप्सी शकर के सबसे बड़े ग्राहक हैं (शकर की कीमतें बढ़ने के पीछे एक कारण यह भी है), चीन से आने वाले दूध पावडर में "मैलामाइन" (एक जहरीला कैंसरकारक पदार्थ) होना साबित हो चुका है, सॉफ़्ट ड्रिंक्स में पेस्टीसाइड भी साबित हो चुका है, एक बार "कुरकुरे" को गरम तवे पर रखकर देखिये, अन्त में प्लास्टिक की गंध और दाग मिलेगा, मतलब ये कि इनके लिये कोई कायदा-कानून नहीं है।

कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसी कोई भी कम्पनी तब तक नहीं सुधरती जब तक कि जनता इसके उत्पादों का बहिष्कार न करने लगे, जब धंधे पर चोट पड़ती है तब ये सारे कानून-कायदे मानने लगती हैं। समस्या यह है कि भारत का उपभोक्ता संगठित होना तो दूर, जागरूक भी नहीं है, और सरकारों को व्यापार के लिये अपनी सभी सीमाएं बगैर सोचे-समझे खोलने से ही फ़ुर्सत नहीं है। इन बड़ी-बड़ी कम्पनियों का तब तक कुछ नहीं बिगड़ेगा, जब तक देश में "बिकाऊ नेता" और "भ्रष्ट अफ़सरशाही" मौजूद है, सिर्फ़ प्रचार पर लाखों डालर खर्च करने वाली कम्पनी, देश के हर नेता को खरीदने की औकात रखती हैं। रही मीडिया की बात, तो उनमें भी अधिकतर बिकाऊ हैं, कुछ जानकर भी अंजान बने रहते हैं, जबकि कुछ के लिये क्रिकेट, फ़िल्मों, सलमान, धोनी, और छिछोरेपन के अलावा कोई खबर ही नहीं है…। जनता ही जागरूक बनकर ऐसे उत्पादों का बहिष्कार करे तो शायद कुछ बात बने…

ग्रीनपीस द्वारा जारी "सेफ़ फ़ूड" गाईड की छोटी कॉपी यहाँ से डाउनलोड करें…
http://www.greenpeace.org/india/assets/binaries/pocket-guide.pdf


ग्रीनपीस द्वारा जारी "सेफ़ फ़ूड" गाईड की पूरी कॉपी यहाँ से डाउनलोड करें…
http://www.greenpeace.org/india/assets/binaries/pocket-guide.pdf

(लेख और चित्र सामग्री स्रोत - ग्रीनपीस इंडिया)

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