यह एक सामान्य सा लेकिन जरूरी सरकारी प्रोटोकॉल है कि उस प्रत्येक शासकीय कार्यक्रम में जिसमें प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री तथा राज्यपाल अध्यक्षता कर रहे हों उस कार्यक्रम में “जन-गण-मन” गाया भले न जाये लेकिन उसकी धुन बजाना आवश्यक है। हाल ही में केरल के त्रिवेन्द्रम में 3 जनवरी को 97 वीं भारतीय साइंस कांग्रेस का उदघाटन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने किया था। इस साइंस कांग्रेस के उदघाटन समारोह में देश-विदेश के बड़े-बड़े भारतीय वैज्ञानिकों ने शिरकत की थी। केरल दौरे पर प्रधानमंत्री ने केरल प्रदेश कांग्रेस के दो अन्य कार्यक्रमों में भी उपस्थिति दर्ज करवाई थी।

लेकिन अत्यन्त खेद के साथ सूचित किया जाता है कि तीनों ही कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत नहीं बजाया गया, बाद वाले दोनों कार्यक्रम भले ही पार्टी स्तर के हों (लेकिन यह पार्टी भी तो अपनी 125 वीं सालगिरह मना रही है, और जन-गण-मन तथा वन्देमातरम की ही रोटी खा रही है अब तक), लेकिन पहला कार्यक्रम एक शासकीय, अन्तर्राष्ट्रीय और बेहद महत्वपूर्ण कार्यक्रम था।

मीडिया के सूत्रों के अनुसार कार्यक्रम आयोजकों को प्रधानमंत्री ऑफ़िस से यह निर्देश मिले थे कि इस कार्यक्रम में जन-गण-मन नहीं बजाया जाये, क्योंकि कई कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत को जो पर्याप्त सम्मान मिलना चाहिये वह नहीं मिल पाता। चकरा गये ना??? यानी कि भारतीय साइंस कांग्रेस के कार्यक्रम को प्रधानमंत्री ऑफ़िस ने एक सिनेमाघर में उपस्थित टपोरी दर्शकों के स्तर के बराबर समझ लिया, जहां राष्ट्रगीत को सम्मान नहीं मिलने वाला? अर्थात जिस अन्तर्राष्ट्रीय कार्यक्रम में देश के बड़े-बड़े राष्ट्रीय नेता, वरिष्ठ नागरिक, सम्माननीय वैज्ञानिक तथा केरल के उच्च प्रशासनिक अधिकारी मौजूद हों, वहाँ राष्ट्रगीत को उचित सम्मान नहीं मिलता??? कैसी अजीब सोच है…

इससे कई सवाल अवश्य उठ खड़े होते हैं, जैसे –

1) इस घटना के लिये किसे जिम्मेदार माना जाये, प्रधानमंत्री कार्यालय को या कार्यक्रम आयोजकों को?

2) क्या इस मामले में राष्ट्रगीत के अपमान का केस दायर किया जा सकता है? यदि हाँ तो किस पर?

3) समाचार पत्र, ब्लॉग में प्रकाशित इस समाचार पर क्या कोई न्यायालय स्वयं संज्ञान लेकर सम्बन्धितों को नोटिस दे सकता है?

4) वन्देमातरम के बाद अब जन-गण-मन को किसके इशारे पर निशाना बनाया जा रहा है?

यदि इसमें कोई साजिश नहीं है तब क्यों इस गलत और आपत्तिजनक निर्णय के लिये अब तक किसी अधिकारी, जूनियर मंत्री, आयोजकों आदि में से किसी को सजा नहीं मिली? राहुल महाजन जैसे छिछोरे और दारुकुट्टे का स्वयंवर दिखाते सबसे तेज चैनल देश के अपमान की इस खबर को क्यों दबा गये?

वन्देमातरम तो “साम्प्रदायिक”(?) बना ही दिया गया है, क्या गोरे साहबों की वन्दना करने वाला यह गीत भी जल्दी ही “साम्प्रदायिक” बनने जा रहा है? सरस्वती वन्दना साम्प्रदायिक है, वन्देमातरम साम्प्रदायिक है, दूरदर्शन का लोगो “सत्यं शिवं सुन्दरम्” भी साम्प्रदायिक है, पाठ्यपुस्तकों में “ग” से गणेश भी साम्प्रदायिक है (उसकी जगह गधा कर दिया गया है), रेल्वे में ई अहमद ने नई ट्रेनों की पूजा पर रोक लगा दी है, इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय कि “गीता” को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित किया जाये, भी साम्प्रदायिक है। क्या एक दिन ऐसा भी आयेगा कि जब “जय हिन्द” और तिरंगा भी साम्प्रदायिक हो जायेगा?

http://www.organiser.org/dynamic/modules.php?name=Content&pa=showpage&pid=327&page=4
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जैसा कि अब लोग धीरे-धीरे जान चुके हैं कि आंध्र के दिवंगत मुख्यमंत्री “सेमुअल” राजशेखर रेड्डी एक “नकली रेड्डी” और असली पक्के एवेंजेलिस्ट ईसाई थे, फ़िलहाल उनका बेटा जगनमोहन तो फ़िलहाल केन्द्र में सोनिया की नाक में दम किये हुए है, उनके दामाद “बेंजामिन” अनिल कुमार भी एक एवेंजेलिस्ट ईसाई (कट्टर धर्म प्रचारक) हैं। दुःख की बात यह है कि शादी से पहले अनिल कुमार एक ब्राह्मण थे।

इस पोस्ट में प्रस्तुत वीडियो में अनिल कुमार बड़ी बेशर्मी से उनके ब्राह्मण से ईसाई बनने के बारे में बता रहे हैं, इस वीडियो की शूटिंग दक्षिण के किसी मन्दिर में की गई है और इसमें दिखाया गया है कि वे बचपन में मन्दिर में सोते थे और वहाँ की सेवा किया करते थे। अनिल कुमार बताते हैं कि उन्होंने बचपन में अपने माता-पिता से भगवान, पुनर्जन्म और संस्कृति के बारे में पूछा था, लेकिन उन्हें कोई संतोषजनक(?) जवाब नहीं मिला, जबकि जब वे जवान होकर चर्च में जाने और बाइबल पढ़ने लगे तभी उनके “ज्ञानचक्षु” अचानक खुल गये। हालांकि इस वीडियो की शूटिंग में मन्दिर दिखाने की कतई आवश्यकता नहीं थी, लेकिन फ़िर YSR परिवार की हिन्दू धर्म के प्रति घृणा कैसे प्रदर्शित होती? हिन्दुओं को नीचा दिखाना, उनके धर्म-परम्पराओं-संस्कृति की आलोचना करना और मजाक उड़ाना, यही तो “सेकुलरिज़्म” की पहली शर्त है।

YSR की बेटी शर्मिला, रिश्ते में अपने “मामा” अनिल कुमार नामक ब्राह्मण युवक पर तभी से फ़िदा थी जब वह उसे अमेरिका में मिली थी, भारत आकर उनकी दोस्ती प्यार में बदल गई और YSR के प्रकोप से बचने के लिये दोनों ने भागकर शादी कर ली और वारंगल जिले में जाकर छिप गये। YSR इतने बड़े “सेकुलर” थे कि उन्हें ब्राह्मण जमाई चलने वाला नहीं था, इसलिये हैरान-परेशान शर्मिला ने भोले-भाले अनिल कुमार पर ऐसा जादू चलाया कि वे ईसाई बन बैठे।

 जब कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करता है तो उस नये धर्म के प्रति प्रतिबद्धता ज़ाहिर करने के लिये अत्यधिक धार्मिक बनने का प्रयास करता है, यही कुछ अनिल कुमार के साथ हुआ। “बेंजामिन” अनिल कुमार बनने के बाद जल्दी ही वे पक्के धर्म प्रचारक बन गये। वे जमकर “चंगाई सभाएं”(?) आयोजित करते हैं और सरकारी मदद पर आंध्र-तेलंगाना के गरीबों को फ़ुसलाकर ईसाई बनाने के काम में लगे हुए हैं। वीडियो के अन्त में आप देखेंगे किस तरह अनिल कुमार सिर पर हाथ रखकर जादूगरनुमा मंत्र आदि फ़ेरते हैं, किस तरह सभाओं में “बाहरी हवा से बाधित”(?) गरीबों पर “पवित्र जल” छिड़ककर उन्हें ठीक(?) किया जाता है आदि-आदि, लेकिन यही “कर्मकाण्ड” हिन्दू धर्मगुरु करें तो वह पिछड़ेपन और दकियानूस की श्रेणी में आ जाता है अर्थात यदि हिन्दू करे तो वह अंधविश्वास और जड़ता, लेकिन अनिल कुमार और YSR करे तो चंगाई और गरीबों का भला, “वारी जाऊं बलिहारी जाऊं ऐसे सेकुलरिज़्म पर…”।




वीडियो की सीधी लिंक यह है, http://www.youtube.com/watch?v=oF_Gz2WHorw

विश्व प्रसिद्ध तिरुपति-तिरुमाला मन्दिर जो कि विश्व का सबसे अधिक धनी मन्दिर है, वहाँ भक्तों-दर्शनार्थियों की लम्बी-लम्बी कतारें लगती हैं। अमूमन उन कतारों के बीच एक-दो महिलाएं "टाइम-पास" के नाम पर ईसाई साहित्य मुफ़्त बाँटते हुए दिखाई देती हैं, उत्सुकतावश उनके बारे में जानकारी लेने पर पता चलता है कि वे इसी तिरुपति मन्दिर की कर्मचारी हैं। अर्थात जो महिला तिरुमाला देवस्थानम की कर्मचारी है, जिसकी दाल-रोटी इस संस्थान के रुपये से चलती है, वह औरत उसी मन्दिर में भक्तों के बीच ईसाई धर्म के पेम्फ़लेट बाँट रही है… इससे बढ़िया बात मिशनरियों के लिये क्या हो सकती है। यही तो सेमुअल राजशेखर रेड्डी (जो कि "सेवन्थ डे एडवेन्टिस्ट क्रिस्चियन थे) की कलाकारी है। सेमुअल रेड्डी जैसे कई "सेकुलर" हैं जो हिन्दू मन्दिरों की सम्पत्ति पर अप्रत्यक्ष कब्जा जमाये बैठे हैं, आप सोचते हैं कि आपने मन्दिर में दान दिया है, जबकि असल में वह दान आंध्रप्रदेश सरकार के खाते में जाता है, और उस पैसे से मस्जिदों को अनुदान और ईसाईयों को यरुशलम जाने के लिये सब्सिडी दी जाती है…। एक बात बताईये, आप में से कितने लोग जानते हैं कि तिरुपति-तिरुमाला देवस्थानम में काम करने वाले 60 प्रतिशत कर्मचारी ईसाई हैं? मेरा दावा है कि अधिकांश लोग नहीं जानते होंगे… यही तो "सेकुलरिज़्म" है…



आंध्र-तेलंगाना में दशकों के निज़ाम के शासनकाल में भी जितने हिन्दू धर्म परिवर्तित करके मुस्लिम नहीं बने थे, उससे अधिक तो 10 साल में इस एक YSR परिवार ने हिन्दू से ईसाई बना दिये हैं, अब आपको समझ में आया होगा कि उनके शव को ढूंढने के लिये हेलीकॉप्टर, विमान, रॉकेट, उपग्रह, सोनिया-अमेरिका यूं ही नहीं बेचैन हो रहे थे। यही तो दिल्ली की “मैडम” का जलवा है, जिनके गीत गाने में हमारा "भाण्ड-गवैया मीडिया" दिन-रात लगा रहता है, कोरस में साथ देने के लिये सेकुलर पत्रकार और सेकुलर ब्लॉगर तो हैं ही…

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नोट – मैंने एक बार www.Scribd.com पर धर्म परिवर्तन विषय पर अमेरिका में प्रदान की गई एक Ph.D. देखी थी, लेकिन उसका लिंक मुझे कहीं मिल नहीं रहा। उस Ph.D. थेसिस के Content (विषय सूची) में “धर्म परिवर्तन कैसे करवाया जाता है…”, “धर्म परिवर्तन हेतु आसान लक्ष्य कैसे ढूंढे जायें…”, “भारत तथा अन्य विकासशील देशों में धर्म परिवर्तन का क्या स्कोप है…” आदि बिन्दु दिये हुए हैं। इस थीसिस को मैं “सेव” करना भूल गया, यदि किसी सज्जन को वह Ph.D. दिखे या मिले तो उसकी लिंक भी अपनी टिप्पणी में चेप दें, ताकि सभी को पता चले कि उधर धर्म परिवर्तन पर डॉक्टरेट भी मिलती है जबकि “मूर्ख हिन्दू” अभी भी सोये हुए हैं… क्योंकि उनके घर में “सेकुलर” गद्दार भरे पड़े हैं। कभी भी कोई कहे कि मैं "सेकुलर" हूं, तब तड़ से जान जाईये कि वह असल में कहना चाहता है कि "मैं हिन्दू विरोधी हूं…"।



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जिस समय आंध्रप्रदेश का गठन हो रहा था उस समय नेहरु ने कहा था कि “एक मासूम लड़की की शादी एक शरारती लड़के के साथ हो रही है, जब तक सम्भव हो वे साथ रहें या फ़िर अलग हो जायें…”। 50 साल तक इस मासूम लड़की ने शरारती युवक के साथ किसी तरह बनाये रखी कि शायद वह सुधर जायेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, और आज जब “मासूम लड़की” अलग होना चाहती है तो वह शरारती लड़का (आंध्र-रायलसीमा) (जो अब गबरू पहलवान बन चुका है) अपने बाप (केन्द्र) को भी आँखे दिखा रहा है, और बाप हमेशा की तरह “हर धमकाने वाले” के सामने जैसा घिघियाता रहा है, वैसा ही अब भी घिघिया रहा है।

तेलंगाना के पक्ष में कुछ बिन्दु हाल ही में तेलंगाना नेता डॉ श्रीनिवास राजू के एक इंटरव्यू में सामने आये हैं – जैसे :

1) जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड के बारे में हम लोगों ने कई-कई पन्ने पढ़े हैं, लेकिन यह बात बहुत कम लोगों को पता होगी कि हैदराबाद के निजाम ने तेलंगाना के लोगों के साथ जलियाँवाला जैसे लगभग 6 हत्याकाण्ड अंजाम दिये हैं, जब तेलंगाना के लोगों ने उस समय निजाम से अलग होने की मांग करने की “जुर्रत” की थी, यही निजाम भारत की आज़ादी के समय भी बहुत गुर्रा रहा था, लेकिन सरदार पटेल ने उसे पिछवाड़े में दुम दबाने पर मजबूर कर दिया था।

2) तेलंगाना क्षेत्र की विधानसभा भवन, उच्च न्यायालय भवन आदि निजाम के ज़माने से बन चुके हैं। सन् 1909 में आधुनिक इंजीनियरिंग के पितामह एम विश्वेश्वरैया ने हैदराबाद में भूमिगत ड्रेनेज सिस्टम बनवाया था जिसमें से अधिकतर हिस्सा आज सौ साल बाद भी काम में लिया जा रहा है।

3) कृष्णा नदी के जलग्रहण क्षेत्र का 69 प्रतिशत हिस्सा तेलंगाना में आता है, लेकिन एक भी बड़ा बाँध इस इलाके में नहीं है।

4) डॉ बीआर अम्बेडकर भी हैदराबाद को भारत की दूसरी अथवा आपातकालीन राजधानी बनाने के पक्ष में थे।

5) आंध्र राज्य के निर्माण के समय कांग्रेस ने सबसे पहला वादा तोड़ा नामकरण को लेकर, तय यह हुआ था कि नये प्रदेश का नाम “आंध्र-तेलंगाना” रखा जायेगा, लेकिन पता नहीं क्या हुआ सिर्फ़ “आंध्रप्रदेश” रह गया।

6) दूसरी बड़ी वादाखिलाफ़ी निजामाबाद जिले में बनने वाले श्रीराम सागर बाँध को लेकर हुई, 40 साल बाद भी इस बाँध का प्रस्ताव ठण्डे बस्ते में है।

7) यदि तेलंगाना का गठन होता है तो इसका क्षेत्रफ़ल विश्व के 100 देशों से बड़ा और भारत के 18 राज्यों से बड़ा होगा।

8) तेलंगाना क्षेत्र के लोगों के साथ हमेशा आंध्र के लोगों ने खिल्ली उड़ाने वाले अंदाज़ में ही बात की है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि तेलुगू फ़िल्मों में एक भी बड़ा हीरो तेलंगाना क्षेत्र से नहीं है, जबकि तेलुगु फ़िल्मों में हमेशा विलेन अथवा जोकरनुमा पात्र को तेलंगाना का दर्शाया जाता है।

मीडिया का रोल –

तेलंगाना आंदोलन शुरु होने के बाद से अक्सर खबरें आती हैं कि तेलंगाना के लोगों की वजह से करोड़ो का नुकसान हो रहा है, बन्द और प्रदर्शनों की वजह से भारी नुकसान हो रहा है आदि-आदि। डॉ श्रीनिवास के अनुसार आंध्रप्रदेश रोडवेज को जो 7 करोड़ का नुकसान हुआ है वह पथराव और बन्द की वजह से बसें नहीं चलने की वजह से हुआ है। जितना उग्र प्रदर्शन आंध्र और रायलसीमा में हो रहा है उसके मुकाबले तेलंगाना के लोग बड़े ही लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रख रहे हैं। उदाहरण के लिये आंध्र और रायलसीमा में 70 करोड़ की बसें और सम्पत्ति जलाई गई हैं। BSNL ने भी अपनी एक पुलिस रिपोर्ट में कहा है कि कुछ युवकों द्वारा उसके ऑप्टिकल फ़ाइबर जला दिये जाने की वजह से उसे रायलसीमा में 2 करोड़ का नुकसान हुआ है। रायलसीमा में ही जेसी दिवाकर रेड्डी के समर्थकों द्वारा एक रेल्वे स्टेशन को बम से उड़ाने के कारण 10 करोड़ का नुकसान हुआ है, लेकिन यह सभी खबरें तेलुगु मीडिया द्वारा दबा दी गईं क्योंकि मीडिया के अधिकतर हिस्से पर आंध्र के शक्तिशाली रेड्डियों का कब्जा है। आंध्र के पैसे वाले रेड्डियों ने तेलंगाना और हैदराबाद में सस्ती ज़मीनें गरीबों के आगे पैसा फ़ेंककर उस वक्त कौड़ियों के दाम खरीद ली थीं, जो अब अरबों की सम्पत्ति बन चुकी हैं… आंध्र-रायलसीमा के लोगों का मुख्य विरोध इसी बात को लेकर है कि तेलंगाना बन जाने के बाद बाँध बन जायेंगे और उधर पानी सीमित मात्रा में पहुँचेगा तथा हैदराबाद पर तेलंगाना का अधिकार हो जायेगा तो उनकी सोना उगलने वाली सम्पत्तियों का क्या होगा… इसीलिये दिल्ली से लेकर हैदराबाद तक पैसा झोंककर मीडिया सहित सबको मैनेज किया जा रहा है अथवा धमकाया जा रहा है।

इस सारे झमेले के बीच संघ प्रमुख भागवत जी ने एक मार्के की बात कही है, उन्होंने छोटे राज्यों के गठन का विरोध करते हुए कहा है कि अधिक राज्य बनाने से गैर-योजनागत व्यय में कमी आ जाती है, राज्य बनने से वहाँ के मंत्रियों-अधिकारियों-मंत्रालयों आदि के वेतन पर जो खर्च होता है उस कारण आम जनता के लिये चलने वाली योजनाओं के पैसे में कमी आती है। मंत्री और आईएएस अधिकारी अपनी राजसी जीवनशैली छोड़ने वाले नहीं हैं, ऐसे में छोटे राज्यों में प्रशासनिक खर्च ही अधिक हो जाता है और वह राज्य सदा केन्द्र का मुँह तकता रहता है।

सोनिया ने तो अपनी जयजयकार करवाने के चक्कर में तेलंगाना के निर्माण का वादा कर दिया (यहाँ देखें), लेकिन अब रेड्डियों के दबाव में आगे-पीछे हो रही हैं। निज़ाम के वंशज अभी से सपने देखने लगे हैं कि प्रस्तावित तेलंगाना में 20% आबादी मुस्लिम होगी तब वे अपना मुख्यमंत्री बनवा सकेंगे और अधिक फ़ायदा उठा सकेंगे। उधर नक्सली मौके की ताक में हैं, कि कब तेलंगाना में आग भड़काकर अपना फ़ायदा देखा जाये… यानी मुर्दा अभी घर से उठाया ही नहीं है उससे पहले ही तेरहवीं के भोज खीर मिलेगी या लड्डू, इसकी चर्चा शुरु हो गई है, जबकि भोंदू युवराज दलितों की थाली में ही लगे हुए हैं… यदि महारानी और युवराज सच्चे नेता होते तो मामले पर आगे आते और जनता/मीडिया से बात करते, लेकिन ये लोग “फ़ैब्रिकेटेड नेता” हैं। कुछ दिनों पहले चीन के एक सैन्य अखबार ने लिखा था कि थोड़े से प्रयासों से हम आसानी से भारत के कई टुकड़े कर सकते हैं, लेकिन अब वे चैन से सो सकते हैं… ये काम हम ही कर लेंगे… पहले भी करते आये हैं। यदि तेलंगाना बन भी गया तो अब तक यहाँ के उपेक्षित और अपमानित स्थानीय व्यक्तियों / आदिवासियों को कोई लाभ मिल सकेगा इसमें संदेह ही है, क्योंकि “गिद्ध” अभी से मंडराने लगे हैं। तेलंगाना राज्य तभी बनेगा, जब कांग्रेस को इसमें अपना फ़ायदा दिखाई देगा, फ़िलहाल ऐसे आसार नहीं हैं, इसलिये चाहे जितनी सार्वजनिक सम्पत्ति का नुकसान हो, चाहे जितनी रेलें रोकी जायें, चाहे जितनी बसें जलाई जायें, अपनी गलतियों को ढँकने के लिये, मामले को लम्बा लटकाने की भूमिका अन्दर ही अन्दर तैयार हो चुकी है…।

खैर, कांग्रेस की सैकड़ों वादाखिलाफ़ियों और ऐतिहासिक गलतियों की सजा पूरे देश में कितनी पीढ़ियाँ, कितने समय तक झेलती रहेंगी, पता नहीं… यह देश अभिशप्त है कांग्रेस को झेलते रहने के लिये…


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यदि कोई व्यक्ति किसी नाबालिग लड़की को भगाकर ले जाये और शादी कर ले तो उसे भारतीय कानून और संविधान के तहत सजा हो सकती है, ये सामान्य सी बात लगभग सभी जानते हैं, लेकिन अगर कोई मुसलमान, किसी नाबालिग हिन्दू लड़की को भगाकर “निकाह” कर ले तो यह जायज़ है… कोलकाता हाईकोर्ट ऐसा मानता है, जबकि मैं समझता था कि नाबालिग लड़की भगाना गैर-ज़मानती अपराध है।

टाइम्स अखबार में प्रकाशित एक खबर के अनुसार पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में एक 26 वर्षीय युवक सईरुल शेख को कोलकाता हाईकोर्ट ने अग्रिम ज़मानत दे दी है। सईरुल शेख के खिलाफ़ अनीता रॉय नामक 15 वर्षीय लड़की को बहला-फ़ुसलाकर भगा ले जाने और निकाह कर लेने का आरोप लगाया गया है। कोलकाता हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के जस्टिस पिनाकीचन्द्र घोष और जस्टिस एसपी तालुकदार ने सईरुल शेख की ज़मानत याचिका पर उसके वकीलों जयमाला बागची और राजीबलोचन चक्रवर्ती ने दलील दी है कि चूंकि यह शादी(?) मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत की गई है अतः यह जायज़ है, और कोर्ट ने भी इस शादी को जायज़ मानते हुए शेख को अग्रिम ज़मानत प्रदान कर दी है। उधर अनीता रॉय की माँ ज्योत्सना ने बहरामपुर पुलिस थाने में उनकी नाबालिग बेटी के गुमशुदा होने की रिपोर्ट 14 अक्टूबर 2009 से दाखिल कर रखी है। खबर के लिये इधर चटका लगायें…

http://timesofindia.indiatimes.com/city/kolkata-/Youth-gets-bail-in-elopement-caseKolkata/articleshow/5345745.cms

कुछ प्रश्न उठते हैं… यदि किसी “सेकुलर ब्लॉगर” (यह भी एक श्रेणी है ब्लॉगरों की) के पास कोई जवाब हो तो दें…

1) क्या इससे यह साबित माना जाये कि कोई मुस्लिम लड़का यदि हिन्दू नाबालिग को भगाकर शादी (या निकाह जो भी हो) कर ले तब भारतीय कानून उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता? क्योंकि उनका अपना पर्सनल लॉ है।

2) क्या मुस्लिम निकाहनामे में नाबालिग से शादी करना गुनाह नहीं है?

3) एक देश में दो कानून कब तक चलेंगे?

4) सुना है कि देश में “महिला आयोग” नाम की एक चिड़िया है वो क्या कर रही है?

बहरहाल, जो भी हो तीस्ता सीतलवाड का मनपसन्द काम मिल गया है, उन्हें तत्काल कोलकाता जाकर उस लड़की को 14 अक्टूबर 2009 से ही बालिग साबित कर देना चाहिये, आखिर तीस्ता झूठे हलफ़नामे पेश करने में उस्ताद हैं। रही-सही कसर हाशमी, आज़मी, अरुंधती वगैरह मिलकर पूरी कर ही देंगे, यदि उस मुस्लिम युवक पर अन्याय(?) हुआ तो… है ना?

दूसरी खबर भी पढ़ ही लीजिये… फ़िर इकठ्ठा ही टिप्पणी कीजियेगा दोनों मुद्दों पर…

जैसा कि सभी जानते हैं केरल में पिछले 60 साल से या तो कांग्रेस का राज रहा है या कमीनिस्टों का। वहीं से एक केन्द्रीय मंत्री हैं ई अहमद नाम के, फ़िलहाल तो रेल राज्यमंत्री हैं और मुस्लिम लीग के कोटे से सुपर सेकुलर यूपीए सरकार में शामिल हैं (ये तो कहने की ज़रूरत ही नहीं है भाई, क्योंकि जब नाम ही मुस्लिम लीग हो, तो वह सेकुलर ही होगी, साम्प्रदायिकता तो उन नामों में होती है जिसमें “हिन्दू” शब्द हो)। खैर, बात हो रही थी ई अहमद साहब की… तमिलनाडु में एक राष्ट्रीय सेमिनार के उदघाटन के अवसर पर इन महाशय ने मंच पर सबके सामने दीप प्रज्जवलित करने से इनकार कर दिया, क्योंकि उनके अनुसार यह “गैर-इस्लामिक” है।

इंडो-जापान चेम्बर ऑफ़ कॉमर्स एण्ड इंडस्ट्री के विशेष सेमिनार “स्टेटस ऑफ़ इन्फ़्रास्ट्रक्चर” का उदघाटन करने विशेष विमान से पहुँचे ई अहमद ने मंच पर उपस्थित सभी सम्माननीय अतिथियों को भौंचक्का और असहज कर दिया जब उन्होंने गैर-इस्लामिक कृत्य कहकर दीप प्रज्ज्वलित करने से इन्कार कर दिया। पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि “दीप प्रज्जवलित करना शरीयत के मुताबिक इस्लामिक सिद्धांतों के खिलाफ़ है”, IJCCI के अध्यक्ष एन कृष्णास्वामी ने मामले को “कृपया इसे मुद्दा बनाने की कोशिश न करें” कहकर रफ़ा-दफ़ा करने की घटिया कोशिश भी की।

कुछ समय पहले केरल में भी त्रिवेन्द्रम के एक सांस्कृतिक समारोह के दौरान सरकार में शामिल एक मंत्री पीके कुन्हालिकुट्टी (मुस्लिम लीग) ने मंच पर दीप प्रज्जवलित करने से मना कर दिया था, उस समय महान गायक केजे येसुदास ने विरोधस्वरूप मंच और कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया था, लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ, क्योंकि यह उद्योग जगत की मीटिंग थी, येसुदास जैसी मर्दानगी किसी ने दिखाना उचित नहीं समझा (धंधे का सवाल था भई…)। तमिलनाडु के कांग्रेस नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया (उन्हें भी तो “महारानी” से डर लगता है ना) कि एक केन्द्रीय मंत्री का यह शर्मनाक कृत्य एक प्रकार की कट्टरता और बर्बरता ही है… लेकिन जब चहुँओर “सेकुलरिज़्म” का बोलबाला हो तो ऐसे बयान बेकार साबित होते हैं। खबर का स्रोत यहाँ है… http://www.deccanchronicle.com/chennai/ahmed-refuses-light-lamp-028

तो मेरे सेकुलर भाईयों… सेकुलरिज़्म की जय, कांग्रेस की जय, कमीनिस्टों (सॉरी कम्युनिस्टों) की जय, महारानी की जय, भोंदू युवराज (क्योंकि उन्हें पता ही नहीं है कि ऐसे मामलों पर क्या बोलना चाहिये) की भी जय…। इन लोगों की जय बोलना आवश्यक है भाई… क्योंकि आने वाले कई सालों तक ये हम पर राज करने वाले हैं… छाती पर मूंग दलने वाले हैं…।

मैं इस प्रकार की खबरें अपने ब्लॉग पर हिन्दुत्ववादियों के लिये नहीं देता हूं… हम तो पहले से ही बहुत कुछ जानते हैं…कि "सेकुलरिज़्म" के नाम देश में क्या-क्या गन्दा खेल चल रहा है। ये खबरें तो सोये हुए मूर्ख हिन्दुओं के लिये तथा गद्दार सेकुलरों के लिये हैं कि “देख लो कहीं तुम्हारे आज के पाप कल की पीढ़ी के लिये विनाशकारी सिद्ध न हो जायें…”।

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केरल के अलप्पुझा से खबर आई है कि पकड़े गये आतंकवादी नज़ीर से नज़दीकी सम्बन्ध रखने, बंगलोर बम ब्लास्ट तथा तमिलनाडु में बस जलाये जाने के मामले की मुख्य आरोपी सूफ़िया मदनी (जो कि वामपंथियों के परम सहयोगी अर्थात कोयम्बटूर बम धमाकों के मुख्य आरोपी अब्दुल नासेर मदनी की पत्नी भी है) को सिर्फ़ एक दिन बाद ही जेल से अलप्पुझा के मेडिकल कॉलेज में शिफ़्ट कर दिया गया है। इस खास मेहमान के लिये केरल के स्वास्थ्य मंत्रालय के विशेष निर्देशों पर वह एसी कमरा खुलवाया गया है जिसमें मंत्रियों और विधायकों का इलाज किया जाता है (क्योंकि हो सकता है कल वह मंत्री भी बन जाये)। सामान्यतः अपराधियों को अस्पतालों में एक विशेष सेल में रखा जाता है, लेकिन चूंकि सूफ़िया ने “जेहाद” के प्रति अपनी प्रतिबद्धता ज़ाहिर कर दी है, इसलिये उसे विशेष 5 स्टार ट्रीटमेण्ट देना केरल सरकार की जिम्मेदारी बनती है।

केरल के गृहमंत्री के बेटे जो कि रात में NDF के सदस्य होते हैं और दिन में SFI के सामाजिक कार्यकर्ता होते हैं, सूफ़िया की देखभाल करने हेतु उनकी विशेष नियुक्ति की गई है, ज़ाहिर है कि मेडिकल कॉलेज के सुपरिन्टेण्डेण्ट की क्या औकात है कि इनके निर्देश मानने से इनकार कर दे। सूफ़िया को अस्पताल में तीन-तीन मोबाइल रखने की सुविधा प्रदान की गई है, और जब वह फ़ोन पर बात कर रही होती है तब डीन को भी कमरे के बाहर आधा घण्टा इन्तज़ार करना पड़ रहा है। हाल ही में “मदनी साहब” अपनी पत्नी से मिलने अस्पताल आये थे तो उनकी सुरक्षा के लिये 45 मिनट तक अस्पताल में आम आदमी का प्रवेश रोका गया और एक्सीडेण्ट में घायल एक युवक को अपना प्राथमिक इलाज करवाने के लिये बाहर एक घण्टा इन्तज़ार करना पड़ा…।

सोचा कि जल्दी से जल्दी यह खबर सेकुलरों और वामपंथियों को दे दूं, वे खुश हो जायेंगे कि उनका काम बराबर चल रहा है। सेकुलर इसलिये खुश होंगे कि सूफ़िया भी एक महिला है और साध्वी प्रज्ञा भी और दोनों को यथायोग्य ट्रीटमेंट मिल रहा है, जबकि वामपंथी इसलिये खुश हो जायेंगे कि जिस मुख्यमंत्री (शायद चूतियानन्दन या ऐसा ही कुछ नाम था) ने NSG कमाण्डो उन्नीकृष्णन के परिवार का अपमान किया था, वह मदनी की बीवी का बराबर खयाल रख रहा है…

बाकी हमारा-आपका क्या है, हम तो टैक्स देने और महंगाई झेलने के लिये ही पैदा हुए हैं, ताकि केरल का अस्पताल हो या मुम्बई की विशेष कसाब सेल… उनके AC में कोई खराबी न आने पाये…

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(इस खबर का सोर्स जानकर क्या करेंगे भाई, जिसे भरोसा हो वह मान ले, जिसे भरोसा न हो तो भाड़ खुली है शौक से जाये, मैं रोकने वाला नहीं)
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अभी यह ज्यादा पुरानी बात नहीं हुई है जब भारत में तीन नये राज्यों छत्तीसगढ़, झारखण्ड और उत्तरांचल का निर्माण बगैर किसी शोरशराबे और हंगामे के हो गया और तीनों राज्यों में तथा उनसे अलग होने वाले राज्यों में वहाँ के मूल निवासियों(?) और प्रवासियों(?) के बीच रिश्ते कड़वाहट भरे नहीं हुए। इन राज्यों में शान्ति से आम चुनाव आदि निपट गये और पिछले कई सालों से ये राज्य अपना कामकाज अपने तरीके चला रहे हैं। फ़िर तेलंगाना और आंध्र में ऐसा क्या हो गया कि पिछले 15 दिनों से दोनों तरफ़ आग लगी हुई है? दरअसल, यह सब हुआ है सोनिया गाँधी के अनाड़ीपन, खुद को महारानी समझने के भाव और कांग्रेसियों की चाटुकारिता की वजह से।


उल्लेखनीय है कि तेलंगाना का आंदोलन सन् 1952 से चल रहा है और एक बार पहले भी यह गम्भीर रूप ले चुका है जब अनशन के दौरान आंदोलनकारियों की मौत होने पर आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया था। महबूबनगर, वारंगल, आदिलाबाद, खम्मम, नलगोंडा, करीमनगर, निज़ामाबाद, मेडक, रंगारेड्डी तथा हैदराबाद को मिलाकर बनने वाले इस राज्य का हक भी उतना ही बनता है, जितना छत्तीसगढ़ का। 70 के दशक में जब यह आंदोलन अपने चरम पर था और चेन्ना रेड्डी उसका नेतृत्व कर रहे थे, तब इंदिरा गाँधी ने चेन्ना को मुख्यमंत्री पद देकर इस आंदोलन को लगभग खत्म सा कर दिया था, हालांकि आग अन्दर ही अन्दर सुलग रही थी। रही-सही कसर आंध्र के शक्तिशाली रेड्डियों ने तेलंगाना को पिछड़ा बनाये रखकर और सारी नौकरियाँ और संसाधनों पर कब्जे को लेकर पूरी कर दी।


तेलंगाना इलाके की ज़मीनी स्थिति यह है कि आंध्र की दो मुख्य नदियाँ कृष्णा और गोदावरी इसी इलाके से बहते हुए आगे जाती हैं, लेकिन सभी प्रमुख बाँध और नहरें बनी हुई हैं आंध्र वाले हिस्से में, जिस वजह से उधर की ज़मीन बेहद उपजाऊ और कीमती बन चुकी है। रावों और रेड्डियों ने आंध्र तथा रायलसीमा का जमकर दोहन किया है और अरबों-खरबों की सम्पत्ति बनाई है, जबकि तेलंगाना को छोटे-मोटे लॉलीपाप देकर बहलाया जाता रहा है। अधिकतर बड़े उद्योग और खनन माफ़िया आंध्र/रायलसीमा में हैं, नौकरियों-रोज़गार पर आंध्रवासियों का कब्जा बना हुआ है। ऊपर से तुर्रा यह कि आंध्र वाले लोग तेलंगाना के निवासियों के बोलने के लहज़े (उर्दू मिक्स तेलुगु) की हँसी भी उड़ाते हैं और इधर के निवासियों को (ज़ाहिर है कि जो कि गरीब हैं) को नीची निगाह से भी देखते हैं, यहाँ तक कि उस्मानिया विश्वविद्यालय जो कि तेलंगाना समर्थकों का गढ़ माना जाता है, वहाँ होने वाले किसी भी छात्र आंदोलन के दौरान उन्हें पीटने के लिये पुलिस भी विशाखापत्तनम से बुलवाई जाती है। अब ऐसे में अलगाव की भावना प्रबल न हो तो आश्चर्य ही है। यह तो हुई पृष्ठभूमि… अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर…

जैसा कि सभी जानते हैं केसीआर के नाम से मशहूर के चन्द्रशेखर राव पिछले कई दशकों से तेलंगाना आंदोलन के मुख्य सूत्रधारों में से एक रहे हैं। अभी उन्होंने इस मुद्दे पर आमरण अनशन किया तथा उनकी हालत बेहद खराब हो गई, तब सोनिया गाँधी को तुरन्त कूटनीतिक और राजनैतिक कदम उठाने चाहिये थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उल्टे उनके जन्मदिन पर तेलंगाना के सांसदों को खुश करने के लिये उनकी महंगी शॉलों के रिटर्न गिफ़्ट के रूप में तेलंगाना राज्य बनाने का वादा कर दिया (मानो वे एक महारानी हों और राज्य उनकी मर्जी से बाँटे जाते हों)। बस फ़िर क्या था, सोनिया की मुहर लगते ही चमचेनुमा कांग्रेसियों ने तेलंगाना का जयघोष कर दिया। गृहमंत्री ने संसद में ऐलान कर दिया कि अलग तेलंगाना राज्य बनाने के लिये आंध्र की राज्य सरकार एक विधेयक पास करके केन्द्र को भेजेगी। इस मूर्खतापूर्ण कवायद ने आग को और भड़का दिया। सबसे पहला सवाल तो यही उठता है कि चिदम्बरम कौन होते हैं नये राज्य के गठन की हामी भरने वाले? क्या तेलंगाना और आंध्र, कांग्रेस के घर की खेती है या सोनिया गाँधी की बपौती हैं? इतना बड़ा निर्णय किस हैसियत और प्रक्तिया के तहत लिया गया? न तो केन्द्रीय कैबिनेट में कोई प्रस्ताव रखा गया, न तो यूपीए के अन्य दलों को इस सम्बन्ध में विश्वास में लिया गया, न ही किसी किस्म की संवैधानिक पहल की गई, राज्य पुनर्गठन आयोग बनाने के बारे में कोई बात नहीं हुई, आंध्र विधानसभा ने प्रस्ताव पास किया नहीं… फ़िर किस हैसियत से सोनिया और चिदम्बरम ने तेलंगाना राज्य बनाने का निर्णय बाले-बाले ही ले लिया? इनके साथ दिक्कत यह हो गई कि सोनिया ने अपने जन्मदिन पर तेलंगाना सांसदों को खुश करने के चक्कर में अपनी जेब से रेवड़ी बाँटने के अंदाज़ में राज्य की घोषणा कर दी, उधर चिदम्बरम ने भी चन्द्रशेखर राव को अधिक राजनैतिक भाव न मिल सके तथा कांग्रेस की टांग दोनों तरफ़ फ़ँसी रहे इस भावना से बिना किसी भूमिका के आंध्र के बंटवारे की घोषणा कर दी।

अब इसका नतीजा ये हो रहा है कि ऊपर से नीचे तक न सिर्फ़ कांग्रेस बल्कि आंध्र के लोगों की भावनाएं उफ़ान मार रही हैं, और आपस में झगड़े और दो-फ़ाड़ शुरु हो चुका है। चिरंजीवी पहले तेलंगाना के पक्ष में थे, विधानसभा चुनाव तक उनके समर्थक भी उनके साथ ही रहे, जैसे कांग्रेस ने यह तमाशा खेला, चिरंजीवी की फ़िल्मों का बॉयकॉट प्रारम्भ हो गया, आंध्र की तरफ़ अपना अधिक फ़ायदा देखकर मजबूरन उन्हें भी पलटी खाना पड़ी और जब पलटी खाई तो अब तेलंगाना में उनकी फ़िल्मों के पोस्टर फ़ाड़े-जलाये जाने लगे हैं, लोकसभा में सोनिया गाँधी के सामने ही आंध्र और तेलंगाना के सांसद एक-दूसरे को देख लेने की धमकियाँ दे रहे हैं, जो "कथित" अनुशासन था वह तार-तार हो चुका, तात्पर्य यह कि ऊपर से नीचे तक हर कोई अलग पाले में बँट गया है। पहले चन्द्रशेखर राव ने भावनाएं भड़काईं और फ़िर सोनिया और उनके सिपहसालारों ने अपनी मूर्खता की वजह से स्थिति और बिगाड़ दी। ऐसे मौके पर याद आता है जब, वाजपेयी जी के समय छत्तीसगढ़ सहित अन्य दोनों राज्यों का बंटवारा शान्ति के साथ हुआ था और मुझे तो लगता है कि बंटवारे के बावजूद जितना सौहार्द्र मप्र-छत्तीसगढ़ के लोगों के बीच है उतना किसी भी राज्य में नहीं होगा। हालांकि छत्तीसगढ़ के अलग होने से सबसे अधिक नुकसान मप्र का हुआ है लेकिन मप्र के लोगों के मन में छत्तीसगढ़ के लोगों और नेताओं के प्रति दुर्भावना अथवा बैर की भावना नहीं है, और इसी को सफ़ल राजनीति-कूटनीति कहते हैं जिसे सोनिया और कांग्रेस क्या जानें… कांग्रेस को तो भारत-पाकिस्तान, हिन्दू-मुस्लिम और तेलंगाना-आंध्र जैसे बंटवारे करवाने में विशेषज्ञता हासिल है।

बहरहाल इस “खेल”(?) में आंध्र के शक्तिशाली रेड्डियों ने पहली बार सोनिया गाँधी को उनकी असली औकात दिखा दी है। पहले भी जब तक वायएसआर सत्ता में रहे, सोनिया अथवा कांग्रेस उनके खिलाफ़ एक शब्द भी नहीं बोल पाते थे, वे भी भरपूर धर्मान्तरण करवा कर “मैडम” को खुश रखते थे, उनकी मृत्यु के बाद रेड्डियों ने पूरा जोर लगाया कि जगनमोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनवाया जाये, लेकिन सोनिया ने ऐसा नहीं किया और उसी समय रेड्डियों ने सोनिया को मजा चखाने का मन बना लिया था। रेड्डियों की शक्ति का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लोकसभा में सर्वाधिक सम्पत्ति वाले सांसदों में पहले और दूसरे नम्बर पर आंध्र के ही सांसद हैं, तथा देश में सबसे अधिक प्रायवेट हेलीकॉप्टर रखने वाला इलाका बेल्लारी, जो कहने को तो कर्नाटक में है, लेकिन वहाँ भी रेड्डियों का ही साम्राज्य है।

पिछले 15 दिनों से आंध्र में हंगामा मचा हुआ है, वैमनस्य फ़ैलता जा रहा है, बनने वाले राज्य और न बनने देने के लिये संकल्पित राज्यों के लोग एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं, राजनीति हो रही है, फ़िल्म, संस्कृति, खेल धीरे-धीरे यह बंटवारा नीचे तक जा रहा है, आम जनता महंगाई के बोझ तले पिस रही है और आशंकित भाव से इन बाहुबलियों को देख रही है कि पता नहीं ये लोग राज्य का क्या करने वाले हैं…। उधर महारानी और उनका “भोंदू युवराज” अपने किले में आराम फ़रमा रहे हैं… क्योंकि देश में जब भी कुछ बुरा होता है तब उन दोनों का दोष कभी नहीं माना जाता… सिर्फ़ अच्छी बातों पर उनकी तारीफ़ की जाती है, ज़ाहिर है कि उनके पास चमचों-भाण्डों और मीडियाई गुलामों की एक पूरी फ़ौज मौजूद है…


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नेपाल के बरियापुर में प्रत्येक पाँच वर्ष में एक त्योहार पर हजारों हिन्दू एकत्रित होते हैं, जहाँ एक पूजा के दौरान अनुमानतः लगभग 2 लाख पशु-पक्षियों की बलि दी जाती है। इस उत्सव के दौरान नेपाल के केन्द्रीय मंत्री भी उपस्थित रहते हैं तथा हिन्दू देवी गाधिमाई की पूजा के दौरान, मुर्गे, बकरे, भैंसे आदि की बलि दी जाती है, और देश की खुशहाली के लिये प्रार्थना की जाती है। इस अवसर पर गत 24 नवम्बर को हजारों मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, “एनीमल राईट्स” और पशुप्रेमियों के संगठनों ने विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। कई संगठनों ने इस परम्परा का कड़ा विरोध किया और इसके खिलाफ़ कई लेख आदि छापे गये। इस मुहिम में न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी हिन्दुओं की इस “बर्बरता”(?) को दर्शाते हुए खबर छापी।

http://www.nytimes.com/2009/11/25/world/asia/25briefs-Nepal.html?_r=2


अमेरिका में एक त्योहार होता है “थैंक्स गिविंग डे”, इस अवसर पर लगभग प्रत्येक अमेरिकी परिवार में टर्की (एक प्रकार का पक्षी) पकाया जाता है और उसकी पार्टी होती है। अब यदि मान लें कि 20 करोड़ अमेरिकी परिवारों में यह थैंक्स गिविंग डे मनाया जाता है और एक परिवार में यदि औसतन चार सदस्य हों तो कम से कम 5 करोड़ टर्कियों को इस दिन मारकर खाया जाता है… यदि किसी को पता हो कि न्यूयॉर्क टाइम्स ने कभी टर्कियों के इस बड़े पैमाने पर संहार के खिलाफ़ कुछ छापा हो तो अवश्य बताएं या लिंक दें। (चित्र -- जॉर्ज बुश टर्की की गरदन दबोचने की फ़िराक में…)





 ऐसा ही एक त्योहार है बकरीद, जिसमें “कुर्बानी”(किसकी?) के नाम पर निरीह बकरों को काटा जाता है। मान लें कि समूचे विश्व में 2 अरब मुसलमान रहते हैं, जिनमें से लगभग सभी बकरीद अवश्य मनाते होंगे। यदि औसतन एक परिवार में 10 सदस्य हों, और एक परिवार मात्र आधा बकरा खाता हो तब भी तकरीबन 100 करोड़ बकरों की बलि मात्र एक दिन में दी जाती है (साल भर के अलग)।

(मैं तो समझता था कि कुर्बानी का मतलब होता है स्वयं कुछ कुर्बान करना। यानी हरेक मुस्लिम कम से कम अपनी एक उंगली का आधा-आधा हिस्सा ही कुर्बान करें तो कैसा रहे? बेचारे बकरों ने क्या बिगाड़ा है।)

अब सवाल उठता है कि यदि 2 लाख प्राणियों को मारना “बर्बरता” और असभ्यता है तो 5 करोड़ टर्की और 10 करोड़ बकरों को मारना क्या है? सिर्फ़ “परम्परा” और “कुर्बानी” की पवित्रता??? इससे ऐसा लगता है, कि परम्पराएं सिर्फ़ मुसलमानों और ईसाईयों के लिये ही होती हैं, हिन्दुओं के लिये नहीं।

हाल ही में कहीं एक बेहूदा सा तर्क पढ़ा था कि बकरीद के दौरान कटने वाले बकरों को गर्दन की एक विशेष नस काटकर मारा जाता है, और उसके कारण उस पशु की पहले दिमागी मौत हो जाती है फ़िर शारीरिक मौत होती है, तथा इस प्रक्रिया में उसे बहुत कम कष्ट होता है। शायद इसीलिये कश्मीर और फ़िलीस्तीन के मुस्लिम आतंकवादियों (सॉरी…स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों) का पसन्दीदा मानवाधिकारवादी तरीका, बंधक व्यक्ति का "गला रेतना" ही है, जिससे उसे कम तकलीफ़ हो। अब एक नया सवाल उठता है कि यदि वाकई इस इस्लामिक पद्धति (हलाल) से जानवरों को बहुत कम कष्ट होता है तो क्यों न कसाब और अफ़ज़ल का गला भी इसी पद्धति से काटा जाये ताकि उन्हें कम से कम तकलीफ़ हो (मानवाधिकारवादी ध्यान दें…)। जबकि शोध से ज्ञात हुआ है कि "झटका" पद्धति कम तकलीफ़देह होती है, बजाय इस्लामिक "हलाल" और यहूदी "काशरुट" पद्धति के। (यहाँ देखें)

एक सर्वे होना चाहिये जिसमें यह पता लगाया जाये कि "धार्मिक कर्मकाण्ड" के नाम पर भारत और बाकी विश्व में कितने मन्दिरों में अभी भी "बलि" की परम्परा वास्तविक रूप में मौजूद है (जहाँ वार्षिक या दैनिक पशु कटाई होती है) तथा भारत में कितने हिन्दू परिवारों में धर्म के नाम पर पशु कटने की परम्परा अभी भी जारी है (आहार के लिये काटे जाने वाले पशु-पक्षियों को अलग रखा जाये), फ़िर हिसाब लगाया जाये कि इस वजह से हिन्दू धर्म के नाम पर कितने पशु-पक्षी कटते हैं। ताकि न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अखबार तथा "एनिमल राइट्स" के नाम पर चन्दाखोरी करने वालों के मुँह पर वे आँकड़े मारे जा सकें तथा अमेरिका तथा ईसाई जगत में कटने वाले टर्की तथा बकरीद के दौरान पूरे विश्व में कटने वाले बकरों की संख्या से उसकी तुलना की जा सके।

मैं व्यक्तिगत रूप से इस पशु बलि वाली बकवास धार्मिक परम्परा के खिलाफ़ हूं, लेकिन इस प्रकार का दोगलापन बर्दाश्त नहीं होता कि सिर्फ़ हिन्दुओं की परम्पराओं के खिलाफ़ माहौल बनाकर उन्हें असभ्य और बर्बर बताया जाये। सारे विरोध प्रदर्शन हिन्दुओं की परम्पराओं के खिलाफ़ ही क्यों भाई, क्या इसलिये कि हिन्दू हमेशा से एक "आसान टारगेट" रहे हैं? एक बात तय है कि हम अंग्रेजी प्रेस को कितने भी आँकड़े दे लें, मार्क्स-मुल्ला-मैकाले-मिशनरी के हाथों बिका हुआ मीडिया हिन्दुओं के खिलाफ़ दुष्प्रचार से बाज नहीं आयेगा। जरा एक बार बकरीद के दिन मीडिया, मानवाधिकारवादी और एनिमल राईट्स के कार्यकर्ता कमेलों और कत्लगाहों में जाकर विरोध प्रदर्शन करके तो देखें… ऐसे जूते पड़ेंगे कि निकलते नहीं बनेगा उधर से… या फ़िर पश्चिम में "थैंक्स गिविंग डे" के दिन टर्कियों को मारने के खिलाफ़ कोई मुकदमा दायर करके देखें… खुद अमेरिका का राष्ट्रपति इनके पीछे हाथ-पाँव धोकर पड़ जायेगा… जबकि हिन्दुओं के साथ ऐसा कोई खतरा नहीं होता… कभी-कभार शिवसेना या राज ठाकरे, एकाध चैनल वाले का बाजा बजा देते हैं, बाकी तो जितनी मर्जी हो हिन्दुओं के खिलाफ़ लिखिये, खिलाफ़ बोलिये, खिलाफ़ छापिये, कुछ नहीं होने वाला

लेख का सार -

1) सभी प्रकार की बलि अथवा पशु क्रूरता, अधर्म है, चाहे वह जिस भी धर्म में हो।

2) सिर्फ़ हिन्दुओं को "सिंगल-आउट" करके बदनाम करने की किसी भी कोशिश का विरोध होना चाहिये, विरोध करने वालों से कहा जाये कि पहले ज़रा दूसरे "धर्मों के कर्मों" को देख लो फ़िर हिन्दू धर्म की आलोचना करना…
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विषयान्तर :- आज ही चिदम्बरम साहब ने भी "हिन्दू आतंकवाद" नामक शब्द फ़िर से फ़रमाया है, उनसे यह जानने का इच्छुक हूं कि भारत और बाकी विश्व में इन "हिन्दू आतंकवादियों"(?) ने अब तक कितने बम विस्फ़ोट किये हैं, कितने विमान अपहरण किये हैं, कितने बन्धक बनाये हैं, कितनी हत्याएं की हैं… ताकि बाकियों से तुलना का कोई आधार तो बने…। शायद चिदम्बरम साहब के पास आँकड़े होंगे और वे हमें बतायेंगे कि "हिन्दू आतंकवादी" कितने खतरनाक हैं… मैं इन्तज़ार करूंगा…

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(भाग-1 से आगे जारी…)

10 जून 2006 को केरल के मुख्यमंत्री अच्युतानन्दन खुद करुणानिधि से मिलने चेन्नै पहुँचे और अब्दुल नासिर मदनी की सुरक्षित रिहाई की गुहार लगाई। हालांकि "दया के सागर" ने तत्काल उसे रिहा करने से मना कर दिया (शायद अन्नादुरै का जन्मदिन दूर होगा), लेकिन महानता की पराकाष्ठा को पार करते हुए करुणानिधि ने जेल में ही मदनी के लिये आयुर्वेदिक मसाज और चिकित्सा की व्यवस्था करवा दी (क्या कहा? आपको कसाब का AC और अफ़ज़ल का चिकन बिरयानी याद आ गया? मेरी गलती नहीं है)। अप्रैल 2007 में कोयम्बटूर बम विस्फ़ोटों की सुनवाई पूरी हुई जिसमें 1300 गवाहों ने बयान दिये। 1 अगस्त 2007 को मुकदमे का निर्णय आया और जैसा कि अपेक्षित था अब्दुल नासेर मदनी को सबूतों के अभाव में छोड़ दिया गया, जिसका केरल में एक हीरो की तरह स्वागत हुआ, बाशा, अंसारी तथा अन्य को सजा हुई, जिन्हें अब "दया के सागर" ने अन्नदुरै के जन्मदिन की खुशी में रिहा कर दिया। अब्दुल नासेर मदनी ने कहा कि वह कभी भी आतंकवादी नहीं था और अब वह राजनीति में आकर दलितों और मुस्लिमों (ज़ाहिर है) की सेवा करना चाहता है। मदनी ने भारी दरियादिली(?) दिखाते हुए कहा कि हालांकि तमिलनाडु सरकार ने उसे 9 साल जेल में रखा लेकिन वह इसके खिलाफ़ कोई मुकदमा दायर नहीं करेगा (आयुर्वेदिक मसाज के खिलाफ़ भी केस दायर होता है क्या?)।

केरल के बेशर्म वामपंथी नेताओं ने विधानसभा चुनावों में मदनी को एक हीरो बनाकर पेश किया। तमिलनाडु के सभी राजनैतिक दलों ने कोयम्बटूर बम विस्फ़ोटों के इस निर्णय पर चुप्पी साधे रखी, सरकार द्वारा तो उच्चतम न्यायालय में इसके खिलाफ़ अपील करने का सवाल ही नहीं था, जयललिता और भाजपा ने भी रहस्यमयी अकर्मण्यता दिखाई। बम विस्फ़ोट से पीड़ित परिवारों ने 18 जुलाई 2008 को इस फ़ैसले के खिलाफ़ एक याचिका दायर की है, लेकिन ऐसी सैकड़ों याचिकाएं भारतीय कोर्ट में कई सालों से चल रही हैं।
http://islamicterrorism.wordpress.com/2008/07/28/muslim-terrorists-target-sri-meenakshi-and-other-major-temples-in-tamil-nadu-security-tightened/

and

http://ibnlive.in.com/news/tamil-nadu-cops-foil-aug-15-terror-bid-arrest-one/69709-3.html?xml

सरकारों के इस मैत्रीपूर्ण रवैये की वजह से अलगाववादियों और देशद्रोहियों के हौसले इतने बुलन्द हैं कि इस वर्ष तमिलनाडु में कम से कम 14 जगह पर गणेश चतुर्थी के विसर्जन समारोह में कोई न कोई फ़साद या मारपीट हुई, जिसमें से एकाध-दो के बारे में करुणानिधि के लाड़ले अखबार और चैनलों "दिनाकरण" और "सन-टीवी" पर (मजबूरी में) दिखाये गये।



सबसे खतरनाक बात यह कि सरकार के समर्थन से MNP (मनिथा नीधि पसाराई) नामक अलगाववादी संगठन अपने काडर को मिलिट्री ट्रेनिंग दे रहा है। तमिल दैनिक "दिनामणि" ने अप्रैल 2008 में इस सम्बन्ध में खबर दी थी कि जिसमें इस संगठन ने 15 अगस्त के मौके पर "फ़्रीडम परेड" का आयोजन किया, जिसमें इसके 1000 से अधिक सदस्यों ने बाकायदा शस्त्रों के साथ प्रदर्शन किया, लेकिन इसे भारत की आज़ादी के साथ जोड़कर एक छद्म आवरण में छिपा दिया गया। संगठन ने पिछले 4 साल में 25,000 नये सदस्यों की भरती की है। (देखें चित्र) MNP की गत वर्ष की वार्षिक रैली में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ़्रण्ट के झण्डे से मिलता जुलता झण्डा लहराया गया और पोस्टर चिपकाये गये। इस कवायद में पापुलर फ़्रण्ट नामक संगठन भी शामिल है जो कि बात करता है भारत की एकता और अखण्डता की, लेकिन इनकी वार्षिक बैठक में निम्न प्रस्ताव पारित किये गये हैं -

1) बाबरी मस्जिद का पुनर्निर्माण किया जायेगा।

2) एयरपोर्ट का नाम शहीद(?) टीपू सुल्तान के नाम पर रखा जाये।

3) सच्चर कमेटी की सिफ़रिशे तुरन्त लागू करवाने हेतु संघर्ष किया जायेगा।

4) बाबा बोधनगिरि पर्वत के भगवाकरण का विरोध किया जायेगा।

5) अफ़ज़ल गुरु को फ़ाँसी क्यों नहीं होना चाहिये, इस विषय पर व्यापक प्रचार किया जायेगा।

6) सभी प्रकार के पुलिस एनकाउंटरों की जाँच की माँग की जायेगी

7) नरेन्द्र मोदी के खिलाफ़ धरना-प्रदर्शन आयोजित किये जायेंगे… आदि-आदि

http://www.popularfrontindia.org/documents/Popular%20Front%20of%20India%20Annual%20Report%202007.html

इस प्रकार की "फ़्रीडम परेड" की इजाज़त तमिलनाडु और केरल सरकारों ने कुम्भकोणम, मदुराई, इदुक्की आदि जगहों पर दी। यहाँ तक कि येद्दियुरप्पा ने भी "थोड़ा सा सेकुलर हो जायें" की तर्ज़ पर इस संगठन को मंगलोर में रैली की इजाजत दी, लेकिन मैसूर में तनाव को देखते हुए इसे अनुमति नहीं दी।
http://www.deccanherald.com/content/20200/pfi-flays-government-stages-protest.html

एक तरफ़ तो ये संगठन देशभक्ति की बातें करते जाते हैं, और दूसरी तरफ़ वन्देमातरम का विरोध, बाबरी मस्जिद की बरसी मनाना, अफ़ज़ल गुरु के समर्थन में कैम्पेन चलाना जैसे काम भी करते जाते हैं। TMMK (तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कषगम) और TNTJ (तमिलनाडु तौहीद जमात) के पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध उजागर हो चुके हैं, और पाकिस्तान के अखबारों में इन्हें कवरेज मिलता रहता है।
http://www.app.com.pk/en_/index.php?option=com_content&task=view&id=61510&Itemid=2




ऐसा भी नहीं कि ये सिर्फ़ मानवता वगैरह का ही खेल खेलते हैं, मधु कौड़ा भी शरमा जायें ऐसे "2G स्पेक्ट्रम घोटाले" के तार इस पूरे "दयासागर" परिवार से ही लिपटे हुए हैं। (देखें चित्र) एक कम्पनी ETA समूह जिसे 2008 के अन्त में सिर्फ़ एक लाख के शेयर कैपिटल के साथ शुरु किया गया था, उसने एक साल के भीतर ही स्वान टेलीकॉम के 380 करोड़ के शेयर ले डाले, स्वान टेलीकॉम और 2G स्पेक्ट्रम घोटाले के बारे में काफ़ी कुछ पहले ही लिखा जा चुका है। ETA समूह के निदेशकों तथा करुणानिधि के बहुत "दोस्ताना सम्बन्ध" हैं, तथा ETA समूह को ही तमिलनाडु में नये सचिवालय के निर्माण सहित, बड़े-बड़े सड़क, बाँध के प्रोजेक्ट मिले हैं (बिलकुल राष्ट्रसन्त राजशेखर रेड्डी के परिवार की तरह)। अब भला मनमोहन सिंह जी की क्या बिसात कि वे दूरसंचार मंत्री राजा को निकाल बाहर करें, सो "रिक्वेस्ट" कर रहे हैं कि भाई साहब यदि मर्जी हो तो किसी दूसरे को दूरसंचार मंत्रालय दे दो, नहीं तो कोई बात नहीं… संसद में चार दिन हल्ला होगा, विपक्ष चिल्लायेगा, होना-जाना कुछ नहीं है (वैसे भी प्रधानमंत्री द्वारा अपनी पसन्द का मंत्रिमण्डल बनाने के दिन अब लद गये, अब मंत्रिमण्डल करुणानिधि, लालू, ममता, रेड्डी आदि लोग तय करते हैं)।

कुल मिलाकर कहा जाये, तो करुणानिधि की "दया" का पूरा का पूरा सागर तमिल उग्रवादियों के पक्ष में तो उमड़ा ही करता था, लेकिन वोट बैंक का बैलेंस अपने पक्ष में बनाये रखने के लिये इस्लामिक अलगाववादियों के पक्ष में भी जब-तब उमड़ता ही रहता है, खासकर अन्नादुरै की जयंती के दिन। जब सरकार खुद ही इन्हें प्रश्रय दे रही हो तो पुलिस से यह उम्मीद करना बेकार है कि वह खास शहरों के कुछ "खास मोहल्लों" में घुसने की हिम्मत भी कर सके। तमिलनाडु में कानून-व्यवस्था की हालत दिनोंदिन खराब होती जा रही है, और पिता-बेटा-भतीजा-भांजा आदि मिलकर राज्य पर बोझ बढ़ाते जा रहे हैं।

चुनाव के समय "साम्प्रदायिकता" का डर दिखाकर और सस्ता चावल, सस्ता टीवी जैसे मूर्ख बनाने के नारों से चुनाव जीत लिया जाता है, फ़िर 5 साल के लिये नमस्ते… और यह दुर्गति कमोबेश भारत के हर राज्य में है… इसलिये महारानी की जय बोलिये तथा भारत बदलने निकले दलित के घर सोने वाले "युवराज" को चुपचाप सत्ता सौंप दीजिये… क्योंकि "मीडियाई भाण्ड" तो उनका ऐसा गुणगान कर रहे हैं जैसे "राहुल बाबा" पता नहीं क्या-क्या उखाड़ लेंगे और क्या-क्या बदल डालेंगे। तात्पर्य यह कि करुणानिधि, राजशेखर रेड्डी, मधु कोड़ा जैसे लोग येन-केन-प्रकारेण आपकी छाती पर मूंग दलते रहेंगे… नेहरु से शुरु करके "कांग्रेसी संस्कृति" ने 60 साल में देश को यही सौगात दी है, आप देखते रहने और अफ़सोस करने के सिवा कुछ भी नहीं कर सकते… देश में "सेकुलर" और वामपंथी लॉबी बहुत मजबूत है जबकि "हिन्दू" बिखरा हुआ, सोया हुआ और कुछ हद तक मूर्ख और नपुंसक भी…।

उम्मीद तो कम है, फ़िर भी अपनी तरफ़ से जगाने का छोटा सा प्रयास तो कर ही सकता हूँ…


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भाईयों-बहनों, मोमबत्तियों का स्टॉक बढ़ा लीजिये, किसी मोमबत्ती कम्पनी की शेयर हों तो रखे रहिये भाव बढ़ने वाले हैं, डिम्पल कपाड़िया के फ़ैन हों या न हों, उनकी दुकान से डिजाइनर मोमबत्तियाँ खरीद लीजिये… आपको तो पता ही होगा 26/11 की बरसी नज़दीक आ गई है…। कई प्रकार के “वार्षिक स्यापा महोत्सवों” में से एक यानी कि 26/11 की पहली बरसी आ रही है… चूंकि मामला नया-नया है इसलिये “इनफ़ इज़ इनफ़” कहकर डकार लेने वाली 5 सितारा पीढ़ी भी जोश में है और 26/11 सेलिब्रेट करने के लिये कटिबद्ध भी… क्योंकि उन्हें भी पता है कि पहला ही साल होने के कारण इस बार “सेलिब्रेशन” कुछ ज्यादा ही जोरदार रहेगा। इसी 5 सितारा पीढ़ी का खयाल रखते हुए दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने मनु शर्मा को अपनी सिफ़ारिश से पेरोल दिलवाया था, ताकि देश की इस “अघाई हुई” पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में मनु 26/11 को सेलिब्रेट करें… अब इसमें शीला दीक्षित की क्या गलती, कि मनु शर्मा 26/11 आने से पहले ही बारों-पबों-रेस्टोरेण्टों में जाकर दारु में गर्क हो गया।

विभिन्न चैनलों पर मातमी धुनें बजने लगी हैं, पुराने ग्राफ़िक्स निकाल-निकालकर हमें याद करवाया जा रहा है कि, देखो ऐ निकम्मों हमने उस वक्त कितना काम किया था, लगातार 3 दिनों तक लाइव प्रसारण किया था तुम्हारे लिये, और तुम हो कि एक मोमबत्ती भी नहीं खरीद सकते? कुछ चैनलों पर उनकी स्थाई "रुदालियाँ" दिखाई देंगी, जो लोकतन्त्र पर हमले की दुहाई वगैरह देंगी। कोई 3 दिन का "ताज पैकेज" लाया है, तो कोई 5 दिन का "आतंकवाद रोको" पैकेज लाया है, ताकि आपका दिल लगा रहे और मनोरंजन होता रहे।

मेक-अप, ब्यूटी पार्लर वगैरह चाक-चौबन्द हैं, ताकि टीवी पर दुख सेलिब्रेट करते उच्च वर्ग का चेहरा-मोहरा अच्छा दिखाई दे। देश में एक प्रधानमंत्री भी हैं, जो इस मौके को नये अन्दाज़ में सेलिब्रेट करेंगे… जी हाँ, वे इस “फ़ड़तूस” से अवसर पर देश में रहकर क्या करते, सो बराक ओबामा के साथ जाम से जाम टकराकर सेलिब्रेट करेंगे, और ऐसा भी नहीं कि वे कुछ काम नहीं कर रहे, जाने से पहले कई बार चेता चुके हैं कि नया हमला होने वाला है, अब इससे ज्यादा और क्या करें वे बेचारे? जैसे कि शरद पवार भी हमें चेता चुके हैं कि मार्च तक कीमतें कम होने वाली नहीं हैं, जो उखाड़ना हो उखाड़ लो, मतलब ये कि सभी मंत्री बराबर काम कर रहे हैं। सरकारें भी ठीक काम कर रही हैं, क्योंकि करकरे का बुलेटप्रूफ़ जैकेट गायब हो चुका है, जबकि मुम्बई भेजे गये पुलिस के विशेष जवानों को नारकीय परिस्थितियों में रहना पड़ रहा है।

मनमोहन सिंह लोकसभा में तो चुने नहीं गये हैं, जो कि संसद का शीतकालीन सत्र चलते रहने के बावजूद 26/11 के दिन यहाँ मौजूद रहें… उन्हें तो इटली की महारानी ने चुना है, भला महारानी को 26/11 से क्या लेना-देना और मनमोहन को लोकसभा से क्या मतलब? गन्ने के किसानों द्वारा हार की चोट दिये जाने के बाद मनमोहन को गम गलत करना भी जरूरी था, सो वे सेलिब्रेट करने अमेरिका जा पहुँचे हैं। इस सारे तमाशे को देखकर एक देशी शब्द याद आता है "चूतियापा", जी नहीं गाली नहीं है ये, बल्कि बिहारी शब्द "बुड़बक" का पर्यायवाची है… इसी चूतियापे को देखने के लिये कसाब और अफ़ज़ल गुरु को टीवी-अखबार दिया गया है ताकि उन्हें पता चले कि हम कितने "बुड़बक" हैं। अन्त में, मुझे उस व्यक्ति पर सबसे अधिक दया आती है, जो कहता है कि "भले ही कांग्रेस पैसा खाती हो, काम तो करती है…" यह संस्कार और मान्यता जिस देश की जनता में गहरे तक पड़ चुके हों, वह कभी आत्मसम्मान से नहीं जी सकता।

अब आप इस बारे में ज्यादा न सोचिये, मोमबत्तियाँ खरीदने निकल पड़िये… और मन में एक संकल्प लीजिये (ना ना ना ना आतंकवाद से लड़ने, भ्रष्टाचार खत्म करने आदि का संकल्प न लीजिये, उसके लिये तो सरकार कटिबद्ध, प्रतिबद्ध और भी न जाने क्या-क्या है), आप तो बस लगातार कांग्रेस को वोट देने का संकल्प लीजिये, राहुल बाबा की होने वाली "ताजपोशी" का इन्तज़ार कीजिये, भाजपा का अध्यक्ष कौन बनेगा इस चिन्ता में दुबले होईये, कमजोर विपक्ष की खुशियाँ मनाईये और मौज कीजिये। वैसे भी अपनी जिम्मेदारी सिर्फ़ वोट देने तक ही सीमित है, है ना?
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हम लोगों ने कई बार पुराने जमाने के किस्से-कहानियों में राजा-महाराजाओं तथा बादशाहों के बारे में पढ़ा-सुना है कि वे अपने जन्मदिन पर अथवा उनके माता-पिता या पितरों की पुण्यतिथियों पर राज्य की जनता को भोज देते थे और बन्दी बनाये गये कैदियों को रिहा कर दिया करते थे। ऐसे मौके पर प्रजा उनकी दयालुता और महानता के किस्से बढ़-चढ़कर बयान करती थी और धन्य-धन्य हो जाती थी।

आप सोच रहे होंगे कि इस बात का आज के प्रगतिवादी जमाने और लोकतन्त्र के राज में इसका क्या सम्बन्ध है, लेकिन है। आज भी करुणानिधि जैसे दया के सागर और मानवता के मसीहा कुछ ऐसा ही करते हैं। इनकी "मानवता" और दयालुता के किस्से वैसे तो अपार हैं लेकिन फ़िर भी वीरप्पन और प्रभाकरण को लेकर इनकी मानवता यदा-कदा टपक-टपक जाया करती थी। इन्होंने एक बार बयान दिया था कि "तमिल और तमिलों के हितों की रक्षा के लिये जो भी व्यक्ति काम करेगा मैं उसका खुले दिल से समर्थन करता हूं और इसीलिये श्रीलंका के टाइगर्स को उग्रवादी नहीं कह सकता…"। अपने मुख्यमंत्रित्व काल में तमिलों के हितों की रक्षा में ये इतने आगे बढ़ गये थे कि वीरप्पन और प्रभाकरण को अपराधी मानने में भी इन्हें हिचक होती थी। बहरहाल, इसी करुणा और मानवता को आगे बढ़ाते हुए करुणानिधि ने अपनी दया का कटोरा इस्लामिक उग्रवादियों पर भी ढोल दिया है ताकि वे उपेक्षित महसूस न करें।

करुणानिधि की दया का यह महासागर अक्सर उनके कथित गुरु अन्नादुरै की पुण्यतिथि के दिन हिलोरें मारने लगता है, स्वर्गीय अन्नादुरै के जन्मदिन (15 सितम्बर) पर करुणानिधि की मानवता के सागर में ज्वार उठता है, और वे इस महान भारत के लोकतन्त्र, अदालतों, कानूनों को एक उम्दा लात जमाते हुए पुराने जमाने के बादशाहों की स्टाइल में तमिलनाडु की जेलों में बन्द कैदियों को छोड़ते चले जाते हैं (इस लोकतन्त्र ने ही उन्हें ऐसी बादशाहों वाली शक्ति दी है, ठीक वैसे ही जैसे कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा मौत की सजा के बावजूद राष्ट्रपति नामक "रबर स्टाम्प" जिसे चाहे जीवित रख सकता है, जिसे चाहे मार सकता है, कानून-वानून की बात करना बेकार है…)।

करुणानिधि साहब ने सत्ता में लौटने के बाद अर्थात मई 2006 से प्रतिवर्ष अन्नादुरै के जन्मदिन पर खूंखार से खूंखार कैदियों को भी छोड़ना शुरु किया (2006 में 540 आजीवन कैद की सजा प्राप्त अपराधी तथा 2007 में 200 कैदी छोड़े गये, जबकि पिछले साल तो इनकी मानवता ऐसी हिलोरें मार रही थी कि इन्होंने 1400 कैदियों को ही छोड़ दिया। जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इसके खिलाफ़ न्यायालय में याचिका दायर की, लेकिन आप हमारे देश की अदालतों के हाल तो जानते ही हैं, कुछ नहीं हुआ। राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति दिनोंदिन खराब होती जा रही है, उधर "दया के सागर" करुणानिधि लगातार "हार्डकोर" अपराधियों को छोड़े चले जा रहे हैं, यह कितना कानून सम्मत है इसकी बारीक जानकारी तो नहीं है, लेकिन देखने में तो यह खुलेआम लोकतन्त्र और न्यायालय को लतियाने जैसा ही लगता है, लेकिन उनसे कोई सवाल-जवाब नहीं किया जा सकता (आखिर "तमिल अस्मिता" का सवाल है भई, और ये सज्जन केन्द्र में सरकार के एक प्रमुख घटक भी हैं)।

यह तो भगवान का शुक्र मनाईये कि वीरप्पन और प्रभाकरण नामक समस्याएं किस्मत से (या श्रीलंका सरकार के पुरुषार्थ से) समाप्त हो गईं और दोनों इतिहास में समा गये, लेकिन करुणानिधि की मानवता कम होने का नाम नहीं ले रही। हाल ही में उन्होंने अन्नादुरै की 101वें जन्मदिन पर 1998 के कोयम्बटूर के सीरियल बम विस्फ़ोटों के 10 आतंकवादियों को भी रिहा कर दिया (बादशाह जो ठहरे!!!)। हालांकि पिछले साल तक करुणानिधि ने इन इस्लामिक आतंकवादियों को छोड़ने में ना-नुकुर की थी, लेकिन शायद दो तमिल योद्धाओं(?) के मारे जाने के बाद और उनके निवास के सामने कुछ मुस्लिम महिलाओं द्वारा छाती पीट-पीटकर रोने-धोने से उनका कलेजा मानवता से भर आया होगा, और यह पुण्य कार्य इस वर्ष उन्होंने कर ही दिया, और सामाजिक न्याय, सेकुलरिज़्म, बराबरी का अधिकार, मानवाधिकार जैसे बड़े-बड़े शब्दों के पीछे छिपकर करुणानिधि ने अशफ़ाक शेख, शाहुल हमीद, मोहम्मद रफ़ीक, अब्बास अब्दुल जाफ़र, अब्दुल फ़ारुख, अब्दुल रहमान, अब्दुल रऊफ़, फ़करुद्दीन अली, अब्दुल वहाब और मोहम्मद इब्राहीम को 15 सितम्बर को रिहा कर दिया, जबकि सभी की कठोर सजा के कम से कम 2 साल बचे हुए थे।

तमिलनाडु में "सिमी" की गतिविधियाँ और द्रमुक का शतुरमुर्गी रवैया -

जैसा कि सभी जानते हैं, सिमी पर लगभग पूरे देश में प्रतिबन्ध लागू है। सिमी कई नाम धरकर अपने काम में लगा रहता है, तमिलनाडु में भी कई वर्ष पहले ही जिहाद मूवमेंट के नाम से एक संगठन खड़ा किया गया था, जिसके प्रमुख सूत्रधार थे पलानी बाबा और एसए बाशा। ये लोग सबसे पहले तब लाइमलाइट में आये थे, जब इन्होंने नवम्बर 1993 में चेन्नई स्थित संघ कार्यालय पर हमला करके 11 स्वयंसेवकों की हत्या कर दी थी। किसी भी द्रमुक या अन्नाद्रमुक सरकार ने इन अपराधियों को गिरफ़्तार करने में कोई रुचि नहीं दिखाई और इन्होंने हिन्दू मुन्नानी नेता राजागोपाल की अक्टूबर 1994 में हत्या की, और पिछले 15 साल में तमिलनाडु और केरल में अल-उम्मा, सिमी और अन्य जेहादी संगठनों की गतिविधियाँ चरम पर पहुँच गईं, लेकिन करुणानिधि तो सेकुलर हैं और सेकुलर ही बने रहे और आगे भी रहेंगे।

आईये अब देखते हैं कि इस "दया के सागर" का मुस्लिमों के प्रति पिछला रिकॉर्ड कैसा है-

1996 के विधानसभा चुनाव में DMK उम्मीदवार सीटी दण्डपाणि और एम रामानाधन ने एक मुस्लिम बहुल इलाके में यह घोषणा की कि चुनाव जीतने पर वे इस इलाके से पुलिस की सभी चेक-पोस्ट हटवा देंगे… चुनाव नतीजों में उनके आगे होने की खबर मात्र से इलाके के मुस्लिमों ने सभी चेकपोस्टों पर हमला करके उन्हें तोड़फ़ोड़ दिया, इस हमले में दो कांस्टेबल भी घायल हुए थे… यहाँ देखें
(http://www.mrt-rrt.gov.au/docs/research/IND/rr/IND30613.pdf)

करुणानिधि की पार्टी का "गुपचुप गठबन्धन" तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कषगम से भी हुआ, 18 मई 1996 को मदुराई के मीनाक्षी अम्मन मन्दिर में जो ब्लास्ट हुआ उसके मुख्य आरोपी रहे TTMK के नेता नायना मोहम्मद, सैत साहब, रज़ा हुसैन और फ़खरुद्दिन।
http://www.assembly.tn.gov.in/archive/Resumes/11assly/11_01.pdf

8 फ़रवरी 1997 को तंजावुर में एक शक्तिशाली बम धमाका हुआ, जिसमें मोहम्मदिया चावल मिल में पुलिस ने बड़ी मात्रा में जिलेटिन छड़ें, अमोनियम नाइट्रेट, सल्फ़्यूरिक एसिड, डिटोनेटर और पिस्तौल बरामद किया था, उस केस में कोई प्रगति नहीं हुई http://www.thehindu.com/fline/fl1505/15050170.htm

कोयम्बटूर बम धमाकों की बात करें तो 14 फ़रवरी 1998 को दोपहर 3.50 से 4.50 के बीच 13 बम धमाके हुए जिसमें 45 व्यक्ति मारे गये और घायलों में 14 लोग बाद में अस्पताल में मारे गये जबकि 200 घायल हुए। इसके अलावा NSG ने कई जगह से बम बरामद किये जो कि फ़ट न सके। 70 किलो विस्फ़ोटकों से लदी एक कार भी रेल्वे स्टेशन के बाहर से बरामद की गई। (क्या यह सब रातोंरात हो गया? राज्य सरकार क्या कर रही थी? आदि सवाल पूछना बेकार है) पुलिस ने बाद में कोयम्बटूर के अन्दरूनी इलाके से अल-उम्मा सरगना एसए बाशा और अन्य 12 लोगों को पकड़ा।

जब मीडिया इन धमाकों के सिलसिले में एक मुस्लिम बहुल इलाके कोट्टामेदु गये तब महिलाओं ने उन्हें घेर लिया और कहा कि हमने अपने बेटों को जिहाद(?) के लिये समर्पित कर दिया है, मारे गये आतंकवादियों के शवों की वीडियो रिकॉर्डिंग की गई और उस फ़ुटेज को चन्दा उगाहने के लिये खाड़ी देशों में भेजा गया।

इस बीच मार्च 2002 में इन बम धमाकों के मुख्य आरोपी केरल के अब्दुल नासेर मदनी को जयललिता सरकार ने गिरफ़्तार कर लिया था और मामला कोर्ट में चल रहा था। मदनी को ज़मानत पर रिहा करवाने के कई प्रयास किये गये, इस वजह से तत्कालीन गृह सचिव मुनीर होडा को जयललिता के कोप का भाजन बनना पड़ा और उन्हें सस्पेण्ड कर दिया गया। 2 जुलाई 2005 को केरल के मुख्यमंत्री मदनी की बीवी से उसके घर पर मिलने पहुँचे (VIP है भई) और "मानवीय आधार पर" (जी हाँ, ये "मानवीय आधार" केरल के मुख्यमंत्रियों पर भी जमकर हावी है) मदनी को रिहा करवाने का आश्वासन दिया। 14 मार्च 2006 को भारत के संसदीय इतिहास की एक अद्वितीय घटना में केरल विधानसभा ने सर्वसम्मति से कोयम्बटूर बम विस्फ़ोटों के मुख्य आरोपी अब्दुल मदनी को मानवीयता के नाते रिहा कर देने का प्रस्ताव पारित कर दिया।

2006 में "दया के महासागर" करुणानिधि फ़िर से सत्ता में आ गये, मुनीर होडा को ही उन्होंने अपना सचिव नियुक्त कर लिया। तुरन्त TTMK के अध्यक्ष जवाहिरुल्लाह ने इनके पालतू चैनल "सन टीवी" पर एक इंटरव्यू देकर कहा कि मदनी को उनकी अस्वस्थता के कारण जल्दी से जल्दी छोड़ा जाना चाहिये। केरल के मुख्यमंत्री अच्युतानन्दन (जी हाँ, वही जिन्होंने NSG कमाण्डो के पिता का अपमान किया था), कोयम्बटूर जेल में मिलने गये और उसे "नैतिक समर्थन" दिया (मानो मदनी स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी हो) तथा कहा कि जल्दी ही उनकी रिहाई के प्रयास करवाये जायेंगे।

(भाग-2 में जारी रहेगा…)

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