बाल ठाकरे, मीडिया और जनता को मूर्ख बनाकर, कॉंग्रेस की तरफ़ से अगले लोकसभा चुनावों में अपना टिकट पक्का करने और अपनी फ़िल्म की सफ़ल अन्तर्राष्ट्रीय मार्केटिंग करने वाले शाहरुख खान अब दुबई से लौटकर अपने बंगले मन्नत में आराम फ़रमा रहे हैं। मीडिया को तो खैर इस “काम” के लिये पैसा मिला था और कांग्रेस को मुम्बई में लोकसभा की एक सीट के लिये अज़हरुद्दीन टाइप का सदाबहार “इस्लामिक आईकन” मिल गया, सबसे ज्यादा घाटे में रहे बाल ठाकरे और आम जनता। बाल ठाकरे के बारे में बाद में बात करेंगे, लेकिन जनता तो इस घटिया फ़िल्म को “मीडिया हाइप” की वजह से देखने गई और बेहद निराश हुई, वहीं दूसरी तरफ़ महंगाई और आतंकवाद जैसे मुद्दे 4-5 दिनों के लिये सभी प्रमुख चैनलों से गायब हो गये। इस सारे तमाशे में कुछ प्रमुख बातें उभरकर आईं, खासकर शाहरुख खान द्वारा खुद को इस्लामिक आईकॉन के रूप में प्रचारित करना।

राजनीति की बात बाद में, पहले बात करते हैं फ़िल्म की, क्योंकि फ़िल्म ट्रेड संवाददाताओं और आँकड़े जुटाने वाली वेबसाईटों को स्रोत मानें तो इस फ़िल्म का अब तक का कलेक्शन कमजोर ही रहा है। जब सारे “भारतीय समीक्षकों” ने इस 5 स्टार की रेटिंग दे रखी हो ऐसे में मुम्बई में रिलीज़ 105 थियेटरों में पहले शो की उपस्थिति सिर्फ़ 75% रही, जबकि मीडिया हाइप और उत्सुकता को देखते हुए इसे कम ही कहा जायेगा। करण जौहर की किसी भी फ़िल्म के प्रारम्भिक तीन दिन साधारणतः हाउसफ़ुल जाते हैं, लेकिन इस फ़िल्म में ऐसा तो हुआ नहीं, बल्कि सोमवार आते-आते फ़िल्म की कलई पूरी तरह खुल गई और जहाँ रविवार को दर्शक उपस्थिति 70-80% थी वह सोमवार को घटकर कहीं-कहीं 30% और कहीं-कहीं 15% तक रह गई। ज़ाहिर है कि शुरुआती तीन दिन तो बाल ठाकरे से खुन्नस के चलते, उत्सुकता के चलते, शाहरुख-काजोल की जोड़ी के चलते दर्शक इसे देखने गये, लेकिन बाहर निकलकर “निगेटिव माउथ पब्लिसिटी” के कारण इसकी पोल खुल गई, कि कुल मिलाकर यह एक बकवास फ़िल्म है। और हकीकत भी यही है कि फ़िल्म में शाहरुख खुद तो ओवर-एक्टिंग का शिकार हैं ही, उनकी महानता को दर्शाने वाले सीन भी बेहद झिलाऊ और अविश्वसनीय बन पड़े हैं… ऊपर से बात-बात में कुरान का “ओवरडोज़”…। अमेरिकी कम्पनी फ़ॉक्स स्टार ने इसे 100 करोड़ में खरीदा है, इस दृष्टि से इसे कम से कम 250 करोड़ का राजस्व जुटाना होगा, जो कि फ़िलहाल दूर की कौड़ी नज़र आती है (हालांकि भोंपू पत्रकार झूठे आँकड़े पेश करके इसे 3 इडियट्स से भी अधिक सफ़ल बतायेंगे)…हकीकत इधर देखें…


मीडियाई भोंपुओं द्वारा फ़ैलाया गया गर्द-गुबार बैठ गया है तो शान्ति से बैठकर सोचें कि आखिर हुआ क्या? सारे मामले की शुरुआत हुई शाहरुख के दो बयानों से कि - 1) IPL में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को लिया जाना चाहिये था और 2) पाकिस्तान हमारा एक “महान पड़ोसी” है। इस प्रकार के निहायत शर्मनाक और इतिहासबोध से परे बयान एक जेहादी व्यक्ति ही दे सकता है। पहले बयान की बात करें तो आज की तारीख में भी यह एक “खुला रहस्य” बना हुआ है कि आखिर शाहरुख खान ने अपनी टीम में पाकिस्तान के किसी खिलाड़ी को क्यों नहीं खरीदा? यह सवाल मीडियाई भाण्डों ने उनसे आज तक नहीं पूछा… और जब नहीं खरीदा तब बोली खत्म होने के बाद अचानक उनका पाकिस्तान प्रेम क्यों उमड़ पड़ा? रही-सही कसर बाल ठाकरे ने अपनी मूर्खतापूर्ण कार्रवाईयों के जरिये पूरी कर दी, और शाहरुख को खामखा एक बकवास फ़िल्म को प्रचारित करने का मौका मिल गया।

“महान पड़ोसी” वाला बयान तो निहायत ही बेवकूफ़ाना और उनके “इतिहास ज्ञान” का मखौल उड़ाने वाला है। क्या पाकिस्तान के निर्माण से लेकर आज तक भारत के प्रति उसके व्यवहार, लियाकत अली खान, ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो, बेनज़ीर भुट्टो, ज़िया-उल-हक, मुशर्रफ़ और कियानी जैसों तथा तीन-तीन युद्धों के बारे में, शाहरुख खान नहीं जानते? यदि नहीं जानते तब तो वे मूर्ख ही हैं और जानते हैं फ़िर भी “महान पड़ोसी” कहते हैं तब तो वे “जेहादी” हैं और उनका कोई गुप्त एजेण्डा है। शाहरुख खान, या महेश भट्ट जैसे लोग जानते हैं कि “बाज़ार” में अपनी “घटिया चीज़” बेचने के लिये क्या-क्या करना पड़ता है, साथ ही ऐसे “उदारवादी” बयानों से पुरस्कार वगैरह कबाड़ने में भी मदद मिलती है, इसीलिये पाकिस्तान के साथ खेलने के सवाल पर सभी कथित गाँधीवादी, पाकिस्तान के प्रति नॉस्टैल्जिक बूढे और भेड़ की खाल में छुपे बैठे कुछ उदारवादी एक सुर में गाने लगते हैं कि “खेलों में राजनीति नहीं होना चाहिये… खेल इन सबसे ऊपर हैं…”। ऐसे वक्त में यह भूल जाते हैं कि चीन ने भी ओलम्पिक को अपनी “छवि बनाने” के लिये ही उपयोग किया, और “पैसा मिलने” पर “कुछ भी” करने के लिये तैयार आमिर और सैफ़ खान ने, तिब्बतियों, और यहाँ तक कि मुस्लिम उइगुरों के भी दमन के बावजूद, ओलम्पिक मशाल लेकर दौड़ने में कोई कोताही नहीं बरती, जबकि फ़ुटबॉल खिलाड़ी बाइचुंग भूटिया अधिक हिम्मत वाले और मजबूत रीढ़ की हड्डी वाले निकले, जिन्होंने चीन में बौद्धों के दमन के विरोध में ओलम्पिक मशाल नहीं थामी। कोई मूर्ख ही यह सोच सकता है कि अन्तर्राष्ट्रीय खेलों में राजनीति नहीं होती। IPL-3 ने जो कड़ा संदेश पाकिस्तान पहुँचाया था उसे शाहरुख खान ने तुरन्त धोने की कवायद कर डाली, लेकिन किसके इशारे पर? यह प्रश्न संदेह के घेरे में अनुत्तरित है।

बाल ठाकरे, जो पहले ही उत्तर भारतीयों पर निशाना साधने की वजह से जनता की सहानुभूति खो चुके थे, शाहरुख खान और इस्लामिक जगत की इस “इमेज-बनाऊ” “बाजारू चाल” को भाँप नहीं सके और उनके जाल में फ़ँस गये। उप्र-बिहार के निवासियों को नाराज़ करके “हिन्दुत्व आंदोलन” को पहले ही कमजोर कर चुके और उसी वजह से खुद भी कमजोर हो चुके बाल ठाकरे बेवकूफ़ बन गये। युवाओं ने बाल ठाकरे से खुन्नस के चलते मल्टीप्लेक्सों में जाकर इस थर्ड-क्लास फ़िल्म पर अपने पैसे लुटाये (और बाद में पछताये भी)। भाजपा ने युवाओं के इस रुख को भाँप लिया था और वह इससे दूर ही रही, लेकिन तब तक शाहरुख ने खुद को करोड़ों रुपये में खेलने के लिये ज़मीन तैयार कर ली। जबकि बाल ठाकरे यदि रिलीज़ से एक-दो दिन पहले इस फ़िल्म की पायरेटेड सीडी हजारों की संख्या में अपने कार्यकर्ताओं के जरिये आम जनता और युवाओं में बंटवाते तो वह विरोध अधिक प्रभावशाली होता तथा पहले तीन दिन जितने लोग मूर्ख बनने थियेटरों में गये, उनके पैसे भी बचते। ठाकरे के इस कदम का विरोध करना भी मुश्किल हो जाता क्योंकि पाकिस्तान में भारतीय फ़िल्मों और गानों की पाइरेसी से करोड़ों रुपये का फ़टका खाने के बावजूद इधर के मूर्ख कलाकार अभी भी पाकिस्तान का गुणगान किये ही जा रहे हैं।

कुछ पत्रकार बन्धुओं का शाहरुख प्रेम अचानक जागृत हो उठा है, शाहरुख के पिता ऐसे थे, दादाजी वैसे थे, स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी भी थे, आजादी की लड़ाई में भाग भी लिया था… आदि-आदि-आदि किस्से हवा में तैरने लगे हैं, लेकिन वे लोग यह भूल जाते हैं कि शाहरुख शाहरुख हैं, अपने पिता और दादा नहीं…। शाहरुख ने तो “लव जेहाद” अपनाते हुए एक हिन्दू लड़की को भगाकर शादी की है, फ़िर उनकी तुलना स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी से कैसे की जा सकती है?

उधर हमारा “बिका हुआ सेकुलर मीडिया” जो पहले ही हिन्दुत्व और हिन्दू हित की खबरों को पीछे धकेल रखता है, हरिद्वार कुम्भ के शाही स्नान की प्रमुख खबरें छोड़कर, देश पर आई इस “सेकुलर आपदा” यानी खान की फ़िल्म रिलीज़ को कवरेज देता रहा (ऐसी ही भौण्डी कोशिश देश के स्वतन्त्रता दिवस के दिन भी हुई थी जब इस व्यक्ति को अमेरिका के हवाई अड्डे पर तलाशी के लिये रोका गया था, उस दिन भी मीडिया ने 15 अगस्त के प्रमुख कार्यक्रम छोड़कर इस छिछोरे पर हुए “कथित अन्याय” को कवरेज में पूरे तीन दिन खा लिये थे)। शाहरुख खान ने पाकिस्तान से मधुर सम्बन्ध की नौटंकी का पहला भाग अपनी फ़िल्म “मैं हूँ ना…” से पहले भी खेला था, अभी जो खेला गया, वह तीसरा भाग था, जबकि दूसरा भाग अमेरिकी हवाई अड्डे की तलाशी वाला था। इससे शक गहराना स्वाभाविक है कि शाहरुख का कोई गुप्त एजेण्डा तो नहीं है? इसी प्रकार फ़िल्म की रिलीज़ के पहले शाहरुख खान ने लन्दन एयरपोर्ट पर बॉडी स्कैनर द्वारा उसकी नग्न तस्वीरें खींचे जाने सम्बन्धी सरासर झूठ बोला, फ़िर उसके हवाले से खबर आई कि उसकी नग्न तस्वीरों पर लन्दन में लड़कियों ने ऑटोग्राफ़ भी लिये… ब्रिटिश कस्टम अधिकारियों के खण्डन के बावजूद (क्योंकि ऐसा नग्न स्कैन सम्भव नहीं है), चमचे पत्रकारों ने कुछ समय हंगामे में गुज़ार दिया… और अचानक तुरन्त ही इस्लामिक जगत की ओर से “फ़तवा” आ गया कि “कोई भी मुसलमान एयरपोर्ट पर अपना बॉडी स्कैनर न करवायें, क्योंकि यह गैर-इस्लामिक है…” ताबड़तोड़ दारुल उलूम ने भी इसका अनुमोदन कर दिया… क्या यह सिर्फ़ संयोग है कि शाहरुख के बयान के तुरन्त बाद फ़तवा आ गया? क्या यह भी संयोग है कि नायक का नाम रिज़वान है (कोलकाता में एक हिन्दू लड़की से शादी रचाने और मौत के बाद “सेकुलरों” द्वारा रोने-पीटने के मामले में भी “हीरो” रिज़वान ही था)। क्या यह भी सिर्फ़ संयोग है कि नायिका एक हिन्दू विधवा है? इतने सारे संयोग एक साथ? मामला कुछ गड़बड़ है भैया…
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इसी विवाद से सम्बन्धित एक और हिट लेख पढ़िये - क्या इन्हीं पाकिस्तानियों के लिये मरे जा रहे हैं शाहरुख खान…



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लीजिये साहब, आतंकवादियों को भी यही दिन मिला था पुणे में बम विस्फ़ोट करने के लिये? अभी तो इस्लाम के नये प्रवर्तक महागुरु (घंटाल) शाहरुख खान अपनी मार्केटिंग करके जरा सुस्ताने ही बैठे थे कि ये क्या हो गया…। आतंकवादियों को जरा भी अकल नहीं है, यदि 13 तारीख से इतना ही मोह था, तो 13 मार्च को कर लेते, होली भी उसी महीने पड़ रही है, एक होली खून की भी पड़ लेती तो क्या फ़र्क पड़ता? लेकिन नहीं, एक तरफ़ तो “हुसैन” ओबामा ने कान पकड़कर बातचीत की टेबल पर बैठा दिया है और इधर ये लोग बम फ़ोड़े जा रहे हैं, माना कि जनता कुछ नहीं बोलती, बस वोट देती ही जाती है, लेकिन इन हिन्दूवादियों का क्या करें? बड़ी मुश्किल से तो सारे चैनलों को सेट किया था कि भैया, चाहे प्रलय ही क्यों न आ जाये शाहरुख खान से अधिक महत्वपूर्ण कोई खबर नहीं बनना चाहिये 3-4 दिन तक, वैसा उन्होंने किया भी। सदी की इस सबसे बड़ी घटना अर्थात “फ़िल्म के रिलीज होने” के बाद “पेड-रिव्यू” (शुद्ध हिन्दी में इसे हड्डी-बोटी चबाकर या माल अंटी करके, लिखना कहते हैं) भी दनादन चेपे जाने लगे हैं। पत्रकारों और चैनल चलाने वालों को पहले ही बता दिया गया था कि "ऐसी फ़िल्म न पहले कभी बनी है, न आगे कभी बनेगी… शाहरुख खान ने इसमें बेन किंग्सले और ओमपुरी की भी छुट्टी कर दी है एक्टिंग में… और करण जौहर के सामने, रिचर्ड एटनबरो और श्याम बेनेगल की कोई औकात नहीं रह गई है"। अब ये क्या बात हुई कि दुबई से लौट रहे "खान भाई" को मुम्बई में लाल कालीन स्वागत मिले और उधर पुणे में भी सड़कें लाल कर दी जायें…

करण जौहर को “ऑस्कर”, शाहरुख खान को “निशान-ए-पाकिस्तान” और मनमोहन सिंह को “शान्ति का नोबल पुरस्कार” दिलवाने की पूरी मार्केटिंग, रणनीति, जोड़-तोड़, जुगाड़, व्यवस्था आदि तैयार कर ली गई थी (वैसे तो मनमोहन को नोबल मिल भी जाये तब भी वे उसे शाहरुख को दे देंगे, क्योंकि महानता की बाढ़ में बहते हुए वे पहले ही कह चुके हैं कि “देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है” और शाहरुख की ताज़ा फ़िल्म भी इसी पुरस्कार को ध्यान में रखकर बनाई गई है)… लेकिन इस लश्कर-ए-तोइबा का क्या किया जाये, हमारा ही खाते हैं और हमारे ही यहाँ बम विस्फ़ोट कर देते हैं। इनके भाईयों, कसाब और अफ़ज़ल को इतना संभालकर रखा है, फ़िर भी जरा सा अहसान नहीं मानते… कुछ दिन बाद फ़ोड़ देते। बड़ी मुश्किल से तो राहुल बाबा और शाहरुख खान का माहौल बनाया था। शाहरुख ने शाहिद अफ़रीदी को वेलेन्टाइन का “दोस्ताना” न्यौता दिया था (छी छी छी, गन्दी बात मन में न लायें), जवाब में पाकिस्तान ने भी पुणे में ओशो आश्रम के नज़दीक वेलेन्टाइन मनवा दिया।

खैर चलो जो हुआ सो हुआ… अब अगले कुछ दिनों तक बरसों पुराने आजमाए हुए इन मंत्रों का उच्चार करना है, ताकि बला फ़िलहाल टले –

1) सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी गई है (2-4 दिन के लिये)

2) आतंकवादियों को पकड़ने के लिये विशेष अभियान छेड़ा जायेगा (ताकि उन्हें चिकन-बिरयानी खिलाई जा सके)

3) हम इस आतंक का मुँहतोड़ जवाब देंगे (फ़िल्म रिलीज़ करने के राष्ट्रीय कर्तव्य से फ़ुर्सत मिलेगी, उसके बाद)

4) राष्ट्र मजबूत है और ((पुणे, जयपुर, वाराणसी, अहमदाबाद, कोयम्बटूर)) के निवासी इस कायराना हमले से नहीं घबरायेंगे (कोष्ठक में अगले बम विस्फ़ोट के समय उस शहर का नाम डाल लीजियेगा)

5) पाकिस्तान के साथ हमें अच्छे सम्बन्ध बनाना है (क्योंकि नोबल शांति पुरस्कार की जरूरत है)

6) आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता (ये भी नोबल जुगाड़ वाला वाक्य है)

तो कहने का मतलब ये, कि इस प्रकार के विभिन्न “सुरक्षा मंत्रों” का लगातार 108 बार जाप करने से बाधाएं निकट नहीं आतीं, इस मंत्र की शक्ति से पुरस्कार मिलने, आम जनता को %&#॰*^;% बनाने में प्रभावकारी मदद मिलती है…। आप भी जाप करें और खुश रहें…। राहुल बाबा कुछ दिनों बाद आजमगढ़ जायेंगे, क्योंकि इस देश में जातिवादी, मुस्लिमपरस्त, चर्चप्रायोजित सभी प्रकार की राजनीति की जा सकती है… सिर्फ़ “हिन्दू”, शब्द भड़काऊ और वर्जित है…। खैर आप भी कहाँ चक्कर में पड़े हैं, इन तीनों महान व्यक्तियों को तीनों पुरस्कार मिलें और देश की “शर्मनिरपेक्षता” बरकरार रहे, इसलिये मंत्र जाप जारी रखें…
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(मैं जानता हूं कि मुझे व्यंग्य लिखना नहीं आता, फ़िर भी कुछ “खालिस देशज शब्दों” को प्रयुक्त करने से बचने की कोशिश करते हुए जैसा ऊबड़-खाबड़ लिख सकता था, लिख दिया… जब इतनी सारी कांग्रेसी सरकारें झेल सकते हैं तो इस लेख को भी आप झेल ही जाईये)

विशेष नोट - "म", "भ", "ग" आदि अक्षरों से शुरु होने वाले देसी शब्द टिप्पणियों से हटाये जायेंगे
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शाहरुख खान को पाकिस्तानी खिलाड़ियों को न लिये जाने पर भारी निराशा हुई है (भले ही खुद ने न खरीदा हो)। अच्छे सम्बन्ध बनाने के नाम पर भारत की “नॉस्टैल्जिक फ़ौज” और धंधेबाज अखबार “अमन की आशा” के नाम थूक-चाट अभियान भी चलाये हुए हैं… लेकिन पाकिस्तान के खिलाड़ी इस बारे में क्या सोचते हैं, अथवा भारत की टीम के साथ खेल के दौरान वे लोग जिस तरह से गाली-गलौज करते हैं, उसे देखते हुए कोई बेशर्म या मूर्ख ही होगा जो उनसे मधुर सम्बन्ध की अपेक्षा रखे…। आईये देखते हैं कुछ यू-ट्यूब वीडियो… (जिन पाठकों के पास तेज गति इंटरनेट नहीं है उनकी सुविधा के लिये डायरेक्ट लिंक भी दिया है, आराम से बफ़र कर लीजिये और बाद में देखिये…)

पहले वीडियो में सोहेल तनवीर से इंटरव्यू लिया जा रहा है, जिसमें वह कहता है “हिन्दुस्तानियों की नीयत ही खराब है”, जबकि एंकर और कोई जोकरनुमा विशेषज्ञ कहता है “हिन्दुओं की आदत रही है मुंह में राम और बगल में छुरी रखने की…”। सोहेल के कथन को तौला जाये तो उससे एक बात उभरकर सामने आती है कि उसकी परवरिश जिस माहौल में हुई है उसमें वह हर भारतीय को “हिन्दू” ही मानता है, और जब राजस्थान रॉयल्स से खेलकर लाखों रुपये कमाये थे तब उसे हिन्दुओं की नीयत खराब नहीं दिख रही थी, जब भिखारियों के पिछवाड़े पर लात पड़ गई तो राम और छुरी याद आने लगे। एक और नोट करने लायक बात है कि पाकिस्तान का कम से कम एक चैनल तो है जो खुलेआम भारत के विरोध और बहिष्कार की बात कर रहा है, हमारे यहाँ का मिशनरी के हाथों बिका और मुल्लाओं की तरफ़दारी करने वाला “सेकुलर मीडिया” इस मामले पर मुँह में दही जमाकर बैठा है, उलटा शाहरुख का पक्ष लेकर बाल ठाकरे से भिड़ गया है (यदि किसी व्यक्ति के पास किसी भारतीय चैनल का कोई वीडियो हो जिसमें वह खुलेआम कह रहा हो कि “इन पाकिस्तानियों की औकात ही ऐसी है और ये लोग इसी लायक हैं और हमें तब तक इनके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रखने चाहिये जब तक ये लोग खुद अपने यहाँ आतंकवादियों का खात्मा न कर दें…” ऐसी कोई लिंक हो तो टिप्पणी में अवश्य दें। यह है मानसिकता का अन्तर… पहले वीडियो देखिये, फ़िर आगे बात करते हैं…

Direct link : http://www.youtube.com/watch?v=_2IL-6YaCk0



आजकल शाहरुख खान अपनी छत पर नमाज़ पढ़ते हैं, बार-बार "सलाम" और "इंशाअल्लाह" शब्दों का प्रयोग करने लगे हैं, यह सब वे अपनी फ़िल्म के प्रमोशन के लिये कर रहे हैं अथवा उनका कोई छिपा हुआ एजेण्डा है यह तो वही जानें। लेकिन शक होता है कि शाहरुख खान उस शोएब मलिक को अपनी टीम में लेने के लिये क्यों बेचैन हैं जिसने टी-20 विश्व कप फ़ाइनल में हारने के बाद मंच से कहा था कि “मैं समूचे इस्लामी जगत से माफ़ी माँगता हूं कि हम हिन्दुस्तान से नहीं जीत पाये…” (यानी T-20 की हार को वह नालायक आदमी इस्लामी जगत की हार से जोड़ रहा था, और शाहरुख उसका बचाव कर रहा था), या क्यों इस सोहेल तनवीर को लेने के लिये शाहरुख मरे जा रहे हैं जो भारत को “हिन्दू” कहकर पुकार रहा है, या क्यों धोखेबाज अफ़रीदी को भारत में खिलाने के लिये बेताब हो रहे हैं, जिसे खाना नहीं मिला इसलिये गेंद ही चबा रहा है… वीडियो देखिये…

डायरेक्ट लिंक : http://www.youtube.com/watch?v=NAuElcY3gfg




पाकिस्तानी, ऑस्ट्रेलियन और इंग्लिश खिलाड़ी हमेशा से ही खेल में धोखेबाजी, चालबाजी और गालीगलौज करते रहे हैं… इसी शाहिद अफ़रीदी को भारत में खिलाने की योजना है “सेकुलरों” की…। अब एक और महोदय हो देखिये… जन्म से नशे की गोलियों के आदी व्यक्ति जैसी आँखों वाले शोएब अख्तर (इस नशेलची की आँखें संजय दत्त से मिलती-जुलती हैं)…। इस शोएब अख्तर को शाहरुख ने पहले IPL ने अपनी टीम में लिया था… यह शोएब अख्तर नाम की बीमारी, भारत के हमारे प्रिय खिलाड़ी इरफ़ान पठान को कैसी भद्दी-भद्दी गालियाँ दे रहा है (वैसे भी पाक में रहने वाले मुस्लिम भारत के मुस्लिमों को नीची निगाह से देखते हैं, विभाजन के समय इधर से गये उनके भाई-बन्दों को ही “मुहाजिर” बताकर भारी ज़ुल्म करते हैं), खुद देख लीजिये…

http://www.youtube.com/watch?v=p7v0lP7VpXQ



हम और आप सिर्फ़ महसूस कर सकते हैं, कि सचिन तेंडुलकर को उसके कैरियर की शुरुआत में इन पाकिस्तानियों ने कितनी गालियाँ दी होंगी… हालांकि बाद में भौंक-भौंककर शान्त हो गये होंगे, क्योंकि उन्हें पता चल गया होगा कि गालियाँ देने के बाद तेंडुलकर अपने बल्ले से उनका पिछवाड़ा लाल कर डालता है… ऐसा ही एक पुराना वीडियो है जिसमें घमण्डी आमिर सोहेल को वेंकटेश प्रसाद ने करारा जवाब दिया, लेकिन अपनी गेंदबाजी से… इसे देखिये…

http://www.youtube.com/watch?v=OpsSe_zvaoU



हालांकि इनसे निपटने का गौतम गम्भीर वाला तरीका भी एकदम सही है… इसे देखिये… इसमें गौतम गम्भीर ने शाहरुख खान के चहेते को कैसी “भिट्टी” मारी…

http://www.youtube.com/watch?v=ZU7cUU-71dk



कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे खिलाड़ी भी जनता के बीच से ही आते हैं, नेताओं और धंधेबाजों के बीच से नहीं… वे धोखेबाज पाकिस्तानियों और घमण्डी ऑस्ट्रेलियाईयों से निपटना अच्छी तरह जानते हैं… लेकिन हमारा मीडिया और सरकार उन्हें सहयोग करने को राजी नहीं होती…। सरकार के पास सदा-सर्वदा “शान्ति-फ़ार्मूला” तैयार होता है, जबकि मीडिया भी वही राग गाता है जिसकी धुन कांग्रेस उसे बनाकर देती है, वरना पाकिस्तान की औकात है ही कितनी, उसके कराची के पूरे स्टॉक एक्सचेंज को अकेले मुकेश अम्बानी सात बार पूरा खरीद लें तब भी उनके पास पैसा बचा रहेगा… हम हर बात में पाक से कोसों आगे हैं, फ़िर उसके सामने यह गिड़गिड़ाना और बेशर्मी भरा तथाकथित गाँधीवाद किसलिये?

अब इस वीडियो को देखिये, कश्मीर की आज़ादी के लिये एकता प्रदर्शित करने यह रैली बुलाई गई है, जिसे हाफ़िज़ मोहम्मद सईद समेत सभी ने कश्मीर के लिये लड़ने का संकल्प लिया, हिन्दुओं और हिन्दुस्तान को गरियाया गया (पाकिस्तान से आने वाले किसी भी इंटरव्यू को सुनिये, वे लोग कभी “भारत” नहीं बोलते, हमेशा “हिन्दुस्तान” बोलते हैं… कहने को ये छोटी-छोटी बातें हैं लेकिन इनके अर्थ गहरे होते हैं)।

ऐ हिन्दू तुझे लश्कर के जूते पड़े…
http://www.youtube.com/watch?v=lQXcsmlqmFM




Reference… : http://neerajdiwan.wordpress.com/2010/02/06/kashmir-day-celebrated-in-pok


श्रीनगर के लाल चौक पर इस वर्ष 19 साल बाद पहली बार तिरंगा नहीं फ़हराया गया,  यानी कांग्रेस और अब्दुल्ला परिवार मान चुका है कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं रहेगा…, राहुल के मुम्बई दौरे की तरह ही, चिदम्बरम का पाकिस्तान जाना भी एक “मीडिया इवेंट” बनकर रहेगा, क्योंकि हमारा मीडिया सिर्फ़ अल-कायदा, लादेन और जवाहिरी के वीडियो टेप दिखाकर देश की जनता को डराना जानता है, राष्ट्रवादी सोच, देशभक्ति का जज़्बा और तनकर खड़े होने की फ़ितरत तो कब की खत्म हो चुकी…। मुम्बई हमले के बाद “मोमबत्ती ब्रिगेड” घर चली गई है या फ़िर दारू पीकर फ़ुटपाथ पर सोये गरीबों पर गाड़ियाँ चढ़ाने में मशगूल है, इधर 26/11 के मृतकों-शहीदों का “वर्षश्राद्ध” निपट गया, पाकिस्तान का तो कुछ उखाड़ नहीं पाये, अब श्राद्ध का भोजन खाने के बाद दोबारा जूते खाने की तैयारी है…

(यदि यह लेख पसन्द आया हो तो इसे पढ़कर भूल न जायें, बल्कि अपने मित्रों को फ़ॉरवर्ड करें, ऑरकुट, फ़ेसबुक, ट्विटर आदि जहाँ-जहाँ भी लिंक दिया जा सकता है, दीजिये…, सिर्फ़ आपके जानने से क्या होगा… बाकियों को भी शाहरुख खान और कांग्रेस का असली चेहरा जानने का मौका दीजिये…)

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[डिस्क्लेमर – मुझे मलयालम नहीं आती, इसलिये प्रस्तुत पोस्ट एक मलयाली मित्र द्वारा दी गई सूचनाओं पर आधारित है… जिसे मलयालम आती हो, कृपया इसकी पुष्टि करें…]

बचपन से मैंने तो यही पढ़ा था कि देश के तिरंगे में भगवा रंग त्याग और बलिदान का, सफ़ेद रंग शान्ति का तथा हरा रंग हरियाली और पर्यावरण का होता है। लेकिन हाल ही में केरल में “गोस्पेल चर्च” (जो कि धर्मांतरण के लिये कुख्यात है और जिसे “वर्तमान देशमाता” और “युवराज” का पूर्ण वरदहस्त प्राप्त है) के एक कार्यक्रम में एक जोकरनुमा व्यक्ति ने “जानबूझकर” देश के तिरंगे का पूरा देशद्रोही विवरण प्रस्तुत किया और न तो केरल सरकार, न ही किसी हिन्दू संगठन, न ही किसी मानवाधिकार/NGO संगठन ने इस पर आपत्ति उठाई… और तो और कार्यक्रम समाप्ति के बाद भी किसी ने इस जोकर के खिलाफ़ तिरंगे के अपमान को लेकर पुलिस केस रजिस्टर नहीं करवाया।

मेरे मलयाली मित्र द्वारा किये गये वर्णन के अनुसार – प्रस्तुत वीडियो में तिरुवल्ला के शैरोन फ़ेलोशिप चर्च में केए अब्राहम नामक व्यक्ति कॉमेडी शो(?) प्रस्तुत कर रहा है। इसमें यह बताता है कि भारत के राष्ट्रीय ध्वज में “भगवा” रंग आक्रामकता का प्रतीक है, जबकि हरा रंग मुस्लिमों की बढ़ती आर्थिक खुशहाली (खाड़ी के पैसे द्वारा आई हुई) का प्रतीक है, लेकिन सबसे पवित्र है “सफ़ेद रंग” जो कि ईसाईयत का प्रतीक है, क्योंकि सफ़ेद रंग शांति का प्रतीक है (ईसाईयत = शान्ति)। और आगे अपना ज्ञान बखान करते हुए वह बताता है कि शक्तिशाली अशोक चक्र का मतलब है “अ-शोक” (अर्थात कोई दुख नहीं) और इस “अ-शोक” को सफ़ेद रंग के अन्दर इसलिये रखा गया है क्योंकि ईसाईयत में आने के बाद मनुष्य को कोई शोक नहीं होता। इसलिये जो भी दुखी और असहाय हैं, सफ़ेद रंग में रंग जायें, यानी ईसाईयत स्वीकार करें। तिरंगे की ऐसी व्याख्या कभी देखी-सुनी है आपने? लेकिन “सेकुलरिज़्म” को दूध पिलाने की सजा तो भुगतनी ही पड़ेगी, क्योंकि अब इसका “फ़न” धीरे-धीरे फ़ुंफ़कारे मारने लगा है।


Direct Link : http://www.youtube.com/watch?v=ohpo2xDabqg



अब यह वीडियो देखिये (सुनिये), एक स्कूल में हमारे राष्ट्रीय गान “जन-गण-मन” की धुन पर पोप जॉन पॉल (द्वितीय) का गुणगान और जीसस की प्रार्थना की जा रही है। इन दोनों का गुणगान करना गलत बात नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय गीत की धुन और तर्ज पर इसे गाकर क्या साबित करने की और कैसा संदेश देने की कोशिश की जा रही है, यह मुझे देशभक्तों को समझाने की आवश्यकता नहीं है, हाँ छद्म-सेकुलरों को समझाना जरूरी है, क्योंकि मेरी नज़र में “छद्म-सेकुलर” *%$%*&#*$*॰  हैं…

Direct Link : http://www.youtube.com/watch?v=zDpIn03gEi8



इस दूसरे वीडियो में भी छोटी-छोटी बच्चियाँ “जन-गण-मन” की धुन पर पोप की प्रार्थना कर रही हैं। इन बेचारी बच्चियों को क्या मालूम कि इनके दिमाग का कैसा ब्रेन-वॉश किया जा रहा है…और जाने-अनजाने वे अपनी मातृभूमि से गद्दारी का पाठ पढ़ रही हैं… और यदि वाकई ऐसे हथकण्डों से प्रभु यीशु धरती पर शान्ति ला सकते, तो फ़िलीस्तीन और यरुशलम में सबसे पहले शान्ति आ जाती, जहाँ उनका जन्म हुआ, लेकिन उधर तो उन्हें “क्रूसेड” और “जेहाद” से ही फ़ुरसत नहीं है।

Direct Link : Janaganama praising Pope http://www.youtube.com/watch?v=5bO21MQ1LtI




इस चालबाजी का मिलाजुला रूप झारखण्ड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के दूरस्थ आदिवासी इलाकों में देखा जा सकता है, जहाँ झोंपड़ियों में स्थित चर्च को “भगवा” रंग से रंगा गया है, मदर मेरी और यीशु की मूर्तियों और छवियों को भी हिन्दू देवी-देवताओं से मिलता-जुलता रूप दिया गया है, ताकि भोले-भाले आदिवासियों को आसानी से मूर्ख बनाया जा सके, और मौका मिलते ही “धर्मान्तरण” करवा लिया जाता है। तिरंगे झण्डे, राष्ट्रीय गान का मजाक उड़ाना, वन्देमातरम का विरोध करना, नाबालिग लड़की को भगा ले जाने को धार्मिक बताना और देश के नक्शे से छेड़छाड़ आदि कामों को सिर्फ़ “बकवास” अथवा “गलती” कहकर खारिज़ नहीं किया जा सकता, यह एक दीर्घकालीन रणनीति के तहत हो रहा है।

इस प्रकार दीमक की तरह “एवेंजेलिस्ट” ज़मीन खोखली करते जा रहे हैं, और इधर  “सेकुलरिज़्म” नाम का साँप मोटा होते-होते अजगर बन गया है और मूर्ख हिन्दू सोये हुए हैं और ऐसे ही नींद में गाफ़िल रहते ही मारे भी जायेंगे। इस स्थिति के लिये मिशनरी और कट्टर मुल्लाओं का दोष तो है लेकिन “छद्म-सेकुलरवादियों” और “बेसुध हिन्दुओं” के मुकाबले में कम है…। जब तक “हिन्दू” एक इकाई बनकर राजनैतिक रूप से संगठित नहीं होते, तब तक यह देश टुकड़े-टुकड़े होने को अभिशप्त ही रहेगा… रही-सही कसर राज ठाकरे-बाल ठाकरे टाइप के लोग पूरी कर रहे हैं जो “हिन्दुत्व” को कमजोर कर रहे हैं, और उनकी इस हरकत से “बाहरी” लोग खुश हो रहे हैं कि उनका काम अपने-आप आसान हो रहा है। वर्तमान दौर सेकुलरिज़्म का नंगा रूप देखने और सहनशील हिन्दुओं की परीक्षा का कठिन दौर है…

जैसा कि केरल में बढ़ते मिशनरीकरण और इस्लामीकरण के बारे में पहले भी कुछ पोस्ट में लिख चुका हूं, केरल में हिन्दुओं, हिन्दुत्व और भारतीय संस्कृति को गरियाने का दौर धीरे-धीरे मुखर होता जा रहा है, और इस बार तो सीधे देश के झण्डे तिरंगे की ही मनमानी व्याख्या सुनाई जा रही है। इस्लामी जेहादी तो सीधे-सीधे बम फ़ोड़ते हैं या “घेट्टो” (Ghetto) बनाकर हमले करते हैं जैसा कश्मीर से पंडितों को भगाने के मामले में किया, लेकिन मिशनरी और एवेंजेलिस्ट चालाक हैं, चुपके से काम करते हैं और मौका मिलते ही पीठ में छुरा घोंपते हैं (यह हम मिजोरम और उत्तर-पूर्व के अन्य राज्यों तथा कश्मीर में देख रहे हैं, देख चुके हैं)। अब आप कहेंगे कि ऐसी खबरें हमारे “सबसे तेज़” न्यूज़ चैनलों पर क्यों नहीं आतीं? जवाब एक ही है – कि इन चैनलों में “बिना रीढ़ के लोग” काम करते हैं जो अपने पाँच-M (मार्क्स-मुल्ला-मिशनरी-मैकाले-माइनो) पोषित आकाओं के इशारे पर रेंगते हैं… और “सेकुलर” पार्टियों द्वारा इन्हें “पाला” जाता है… ऐसी खबरें आपको सिर्फ़ ब्लॉग्स पर ही मिलेंगी… 

विषय से सम्बन्धित कुछ अन्य मिलती-जुलती पोस्ट अवश्य पढ़िये -
1) http://blog.sureshchiplunkar.com/2010/01/ysr-family-evangelism-church-in-andhra.html

2) http://blog.sureshchiplunkar.com/2010/01/shariat-islamic-personal-law-e-ahmed.html

3) http://blog.sureshchiplunkar.com/2009/10/kcbc-newsletter-kerala-love-jihad.html

4) http://blog.sureshchiplunkar.com/2009/08/why-indian-media-is-anti-hindutva.html

5) http://blog.sureshchiplunkar.com/2009/04/talibanization-kerala-congress-and_13.html


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दीर्घकाल तक इस्लाम की आंधी से हिन्दुस्थान ने टक्कर ली है। इस प्रक्रिया में जहां एक ओर हिंदू समाज को मर्मांतक पीड़ा मिली और उसका सामाजिक एवं आर्थिक जीवन बुरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया वहीं इस्लाम को भी हिंदुत्व के उदात्त विचारों ने अपने रंग में गहरे रंग देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। भक्ति आंदोलन को अगर इस रूप में देखें तो उस कालखण्ड में एक बार ऐसा लगने लगा था कि इस्लाम का असहिष्णु जीवन प्रवाह भक्ति की महान सुरसरिता में समाहित हो जाएगा।

संतों के निर्मल और साधनापूर्ण जीवन ने देश में हमेशा सभी को प्रभावित किया। उनके चिंतन, आदर्श व्यवहार, सेवाभाव, त्यागमय जीवन और भगवद्भक्ति ने एक ओर जहां हिंदुओं में कोई भेदभाव नहीं माना वहीं इस्लाम को मानने वाले भी इसके आकर्षण में खिंचे चले आए। इन संतों के सत्संग, भजन, कीर्तन, प्रवचन आदि कार्यक्रमों में ऐसी रसधारा बहती थी कि जो इसके निकट आया वही उस में सराबोर हो गया। भक्ति को कभी कोई भेदभाव स्वीकार नहीं था। इसी के प्रभाव में आकर बहुत से मुसलमान भी हिंदू संतों के शिष्य बन गए और संतों के समान ही जीवन जीने लगे। मध्यकाल में हम देखें तो पाएंगे कि ऐसे हजारों मुस्लिम संत थे जिन्होंने हिंदुत्व के अमर तत्व को अपने इस्लाम मतावलंबियों के बीच बांटना शुरू कर दिया था। यहां हम कबीर, संत रज्जब, संत रोहल साहेब और संत शालबेग के अतिरिक्त ऐसे संतों की चर्चा करेंगे जिन्होंने भारतीय इस्लाम को एक नवीन चेहरा दिया। इस्लाम के परंपरागत असहिष्णु चेहरे से कहीं अलग भक्ति के मधुर रस से आप्लावित और सभी को आनंद देने वाला यह चेहरा था।

सोलहवीं सदी में रसखान दिल्ली के समृद्ध पठान परिवार से ताल्लुक रखते थे। लेकिन उनका सारा जीवन ही कृष्ण भक्ति का पर्याय बन गया। लोकपरंपरा में कथा आती है कि एक बार वे गोवर्धनजी में श्रीनाथ जी के दर्शन को गए तो द्वारपार ने उन्हें मुस्लिम जानकर मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया। भक्त रसखान तीन दिनों तक बिना कुछ खाए-पिए मंदिर के पास पड़े रहे और कृष्ण भक्ति के पद गाते रहे। बाद में लोगों को पता चला कि ये तो कृष्ण को अनन्य भक्त हैं। गोस्वामी विट्ठलनाथ जो को रसखान की कृष्णभक्ति के बारे में पता चला तो उन्होंने उन्हें बाकायदा गोविन्द कुण्ड में स्नान कराकर दीक्षा दी। रसखान ने भी अपना अगला जन्म भी प्रभु के श्रीचरणों में ही पाने की प्रार्थना गाई।

मानुस हों तो वही रसखान, बसौं बृज गोकुल गांव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहां बस मेरौ, चरौं नित नन्द की धेनु मंझारन।
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धरयो कर छत्र पुरंदर धारन।
जो खग हौं तो बसेरौ करों, नित कालिंदी कूल कदंब की डारन।।

मथुरा में यमुनातट पर रमणरेती में निर्मित इस महान कृष्ण भक्त की समाधि आज भी करोड़ों कृष्ण भक्तों के ह्दयों को लुभाती और आनन्दमय प्रवाह से भर देती है।

ऐसे ही थे बाबा फरीद। पंजाब के कोठिवाल नामक ग्राम के रहने वाले। भक्त फरीद भक्ति में तल्लीन अपनी प्रार्थना में कहते हैं- हे काग अर्थात कौवे, तू मेरा सारा शरीर चुन-चुन कर खा लेना किंतु मेरी दो आंखें मत खाना क्योंकि मुझे ईश्वर के दर्शन करने हैं- कागा सब तन खाइयो, मेरा चुन-चुन मांस। दो नैना मत खाइयो, मोहि पिया मिलन की आस।।

राजस्थान के अलवर में सोलहवीं सदी में पैदा हुए संत लालदास भी मुसलमान थे। उनका जन्म मेव मुस्लिम जाति में हुआ था। लकड़हारे के रूप में उनका प्रारंभिक जीवन व्यतीत हुआ। और इसी जीवन के कारण वे साधुओं की संगत में आ गए, मुसलमान से भक्त लालदास होगए। ऊंच-नीच और हिंदू-मुस्लिम के भेद को तो उन्होंने अपने जीवन में जाना तक नहीं। कब उन्होंने मांस खाना छोड़ा और नमाज भुला दी, ये भी उन्हें पता न चला। गांव-गांव हरि का सुमिरन करने का उपदेश करने लगे। हिरदै हरि की चाकरी पर, घर कबहुं न जाए। ऐसे पद गाते हुए उन्होंने लालपंथ की नींव रखी और भरतपुर क्षेत्र के नगला ग्राम में उनकी समाधि आज भी लालदासी पंथियों की प्रमुख दर्शन स्थली है।

भक्ति आंदोलन और मुस्लिम राजवंश

हिंदू भक्ति आंदोलन ने सामान्य मुस्लिमों से लेकर मुस्लिम सम्राटों तक के परिजनों को हिलाकर रख दिया। रहीम, अमीर खुसरो और दारा शिकोह इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। और केवल पुरूष ही नहीं मुस्लिम शहजादियां भी भक्ति के रंग में रंग गईं। इसी कड़ी में औरंगजेब की बेटी जैबुन्निसां बेगम तथा भतीजी ताज बेगम का नाम बहुत आदर से लिया जाता है।

इनमें ताज़बीबी के कृष्णभक्ति के पदों ने तो पूरी मुस्लिम सियासत में ही हलचल मचा दी। ताज़ दोनों हाथ ऊंचे कर भावविभोर होकर जिस तरह से कृष्णभक्ति के पद गाती थी, उसकी तुलना मीरा के साथ सहज ही की जा सकती है। ताज़बीबी का एक प्रसिद्ध पद है-

छैल जो छबीला, सब रंग में रंगीला
बड़ा चित्त का अड़ीला, कहूं देवतों से न्यारा है।
माल गले सोहै, नाक-मोती सेत जो है कान,
कुण्डल मन मोहै, लाल मुकुट सिर धारा है।
दुष्टजन मारे, सब संत जो उबारे ताज,
चित्त में निहारे प्रन, प्रीति करन वारा है।
नन्दजू का प्यारा, जिन कंस को पछारा,
वह वृन्दावन वारा, कृष्ण साहेब हमारा है।।
सुनो दिल जानी, मेरे दिल की कहानी तुम,
दस्त ही बिकानी, बदनामी भी सहूंगी मैं।
देवपूजा ठानी मैं, नमाज हूं भुलानी,
तजे कलमा-कुरान साड़े गुननि गहूंगी मैं।।
नन्द के कुमार, कुरबान तेरी सुरत पै,
हूं तो मुगलानी, हिंदुआनी बन रहूंगी मैं।।

तो कृष्णभक्ति में विह्वल ताज़ मुगल सल्तनत से जुड़ी होने के बावजू़द हिंदुवानी रौ में बहने की प्रतिज्ञा करती है। ताज़ ने बाद में गोस्वामी विट्ठलनाथ से विधिवत् वैष्णव मत की दीक्षा ली।

ऐसे ही थे भक्त कारे बेग जिनका पुत्र मरणासन्न हो गया तो उसे मंदिर की देहरी पर लिटाकर वह आंसू बहाते हुए कृष्ण से कहने लगे-

एहौं रन धीर बलभद्र जी के वीर अब।
हरौं मेरी पीर क्या, हमारी बेर-बार की।।
हिंदुन के नाथ हो तो हमारा कुछ दावा नहीं,
जगत के नाथ हो तो मेरी सुध लिजिए।

काशी में जन्मे थे कबीर से कमाल। कमाल साहेब का अड़ोस-पड़ोस और सगे-संबंधी मुसलमान थे लेकिन कबीर साहेब के कारण उन्हें घर में बचपन से अलग माहौल मिला था। बचपन में ही भक्ति की धार उनमें प्रबल हो गई और राम के प्रति वे अति आसक्त हो गए। गाने लगे-

राम नाम भज निस दिन बंदे और मरम पाखण्डा,
बाहिर के पट दे मेरे प्यारे, पिंड देख बह्माण्डा ।
अजर-अमर अविनाशी साहिब, नर देही क्यों आया।
इतनी समझ-बूझ नहीं मूरख, आय-जाय सो माया।

मराठवाड़ा क्षेत्र में जन्में कृष्णभक्त शाही अली कादर साहेब ने तो गजब भक्तिपूर्ण रचनाएं की हैं। उन्हीं की सुप्रसिद्ध पदावली है- चल मन जमुना के तीर, बाजत मुरली री मुरली री।।

दाराशिकोह का नाम भला किसने नहीं सुना। मुगलिया सल्तनत के उत्तराधिकार संघर्ष में उन्हें अपने प्राणों का बलिदान करना पड़ा। वे शाहजहां के ज्येष्ठ पु्त्र थे लेकिन उनमें हिंदुत्व के उदात्त विचारों ने इतना ज्यादा प्रभाव डाला कि वे वेदों और उपनिषदों का अध्ययन करने लगे। उपनिषदों का ज्ञान फारसी में अनुदित हुआ तो इसके पीछे दारा शिकोह की तपस्या थी जो उन्होंने प्रयाग और काशी में गंगा तट पर रहते हुए की थी। उनके हिंदुत्व प्रेम के कारण ही औरंगजेब ने उनका वध करवा डाला।

अकबर के नवरत्नों में एक अब्दुर्ररहीम खानखाना को भी जहांगीर ने इसी कारण परेशान किया। अपने जीवन की संझाबेला में वे चित्रकूट आ गए और भगवान राम की भक्ति करने लगे। चित्रकूट में रमि रहे रहिमन अवधनरेश, जा पर विपदा परत है, सो आवत एहि देश।

राम और कृष्ण दोनों के प्रति ही रहीम के मन में गहरा अनुराग था। वे मुसलमान थे लेकिन उन्होंने सच्चे अर्थों में भारत की सहिष्णु परंपरा का अवगाहन किया। मुगलिया सल्तनत में एक समय उनका प्रभाव वर्तमान प्रधानमंत्री और केबिनेट सचिव जैसा हुआ करता था। लेकिन उनका निर्मल मन सदा ही राजनीति के छल-प्रपंचों से दूर भगवद्दभक्ति में रमता था। यही कारण है कि जो पद, दोहे और रचनाएं वह कर गए वह हमारी महान और समृद्ध विरासत का सुंदर परिचय है।

भारतीय जीवनदर्शन और मूल्यों को रहीम ने व्यक्तिगत जीवन में न सिर्फ जिया वरन् उसे शब्द देकर हमेशा के लिए अमर कर दिया। एक बार किसी ने रहीम से पूछा कि यह हाथी अपने सिर पर धूल क्यों डालता है तो रहीम ने उसे उत्तर दिया- यह उस रजकण को ढूंढता फिरता है जिसका स्पर्श पाकर अहिल्या तर गई थी।

धूर धरत निज सीस पर, कहु रहीम केहि काज।
जेहि रज मुनिपत्नी तरी, सो ढूंढत गजराज।

गुरू नानक के शिष्य मरदाना, संत रविदास के शिष्य सदना, महाराष्ट्र के संत लतीफ शाह, अमेठी के पास जायसी ग्राम के मलिक मोहम्मद जायसी, नर्मदा तट पर रमण करने वाले संत बाबा मलेक, गुजरात के ही भक्त बाबा दीन दरवेश, दरिया साहेब, अनाम जैसे संत यारी साहेब, ग्वालियर के संत बुल्ला शाह, मेहसाणा के रामभक्त मीर मुराद, नज़ीर अक़बराबादी, बंगाल के संत मुर्तजा साहेब, और तो और सम्राट शाहजहां तक के जीवन में भक्ति आंदोलन ने ऐसी लहर पैदा की इनके पग भक्ति के महान पथ पर चल पड़े।

यह भक्ति की भावना सभी को आत्मसात करने वाली थी। आज़ भी जब हम डागर बंधुओं से ध्रुवपद सुनते हैं तो हमें उस भक्ति परंपरा का अनायास स्मरण हो उठता है जिसने इस्लाम के तूफान को गंगा की लहरों के सामने नतमस्तक होने पर मजबूर कर दिया था।

यही कारण था कि इस्लाम के हिंदुत्व के साथ बढ़ते तादात्मीकरण ने कट्टरपंधी मुल्लाओँ की नींद हराम कर दी। मौलाना हाली ऐसे ही एक कट्टरपंथी मुसलमान थे जिन्होंने हिंदू-मुस्लिम समन्वय के इस महान कार्य पर चिंता जताई। उन्होंने कहा-

वो दीने हिजाजी का बेबाक बेड़ा,
निशां जिसका अक्साए आलम में पहुंचा,
मज़ाहम हुआ कोई खतरा न जिसका,
न अम्मां में ठटका, न कुलज़म में झिझका,
किए पै सिपर जिसने सातों समंदर,
वो डुबा दहाने में गंगा के आकर।।


यानी मौलाना हाली दुःख प्रकट करते हुए कहते हैं कि इस्लाम का जहाज़ी बेड़ा जो सातों समुद्र बेरोक-टोक पार करता गया और अजेय रहा, वह जब हिंदुस्थान पहुंचा और उसका सामना यहां की संस्कृति से हुआ तो वह गंगा की धारा में सदा के लिए डूब गया।

मुस्लिम समाज़ पर हिंदू तथा मुस्लिम संतों की भगवद्भक्ति का इतना प्रभाव बढ़ता गया कि इस्लामी मौलवी लोगों को लगने लगा कि इस प्रकार तो हिंदुत्व इस्लाम को निगल जाएगा। इस कारण प्रतिक्रिया में आकर भारतीय मुसलमान संतों पर मौलवियों ने कुफ्र अर्थात नास्तिकता के फतवे ज़ारी कर दिये। मौलानाओं ने साधारण मुसलमानों को सावधान किया-

हमें वाइजों ने यह तालीम दी है।
कि जो काम दीनी है या दुनियावी है,
मुखालिफ़ की रीस उसमें करनी बुरी है,
निशां गैरते दीने हक का यही है,
न ठीक उसकी हरगिज़ कोई बात समझो,
वह दिन को कहे दिन तो तुम रात समझो।।

तो इस प्रकार अठारहवीं सदी आते आते हिंदु-मुस्लिम समन्वय की महान भक्ति परंपरा पर कट्टरपंथियों का ग्रहण लगना तेज़ हो गया। धूर्त और चालाक अंग्रेजों ने हिंदुओं और मुस्लिमों में पनप रहे प्रेम को भी अपने लिए गंभीर खतरा माना। येन-केन-प्रकारेण वे मुसलमानों को उन हिंदुओं से सांस्कृतिक तौर पर भी अलग करने में सफल हो गए जिन हिंदुओं के साथ मुसलमानों का नाभि-नाल का सम्बंध था। आज यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि यदि अंग्रेज़ भारत में न आए होते तो निर्मल भक्ति, प्रेम तथा संतों के पवित्र एवं त्यागमयी आचरण के दैवीय आकर्षण से करोड़ों मुसलमान अपने पुरखों की संस्कृति, धर्म और परंपरा से उसी भांति जुड़ जाते और आनन्द मानते जैसे एक बच्चा अपनी मां की गोदी में सुख का अनुभव करता है।

चूंकि अधिकाधिक लोगों तक यह बात पहुँच सके, इसलिये यह पोस्ट प्रवक्ता.कॉम से साभार ली गई है, जिसका मूल लिंक यह है http://www.pravakta.com/?p=6375 
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लेखक: डॉ. कृष्णगोपाल

कृष्णगोपालजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जीवन समर्पित प्रचारकों की टोली से जुड़े यशस्वी और मेधावी प्रचारक हैं। वनस्पति विज्ञान में शोध करने के उपरांत उन्होंने अपना जीवन राष्ट्रकार्य के लिए अर्पित किया। संप्रति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की योजनानुसार वह पूर्वोत्तर भारत के क्षेत्र प्रचारक का दायित्व निर्वाह कर रहे हैं। व्यक्तिरूप से वे गहन जिज्ञासु और अध्यावसायी हैं। स्वदेशी, डंकेल प्रस्तावों पर उन्होंने करीब 15 वर्ष पूर्व विचारपूर्वक अनेक पुस्तकों का लेखन किया। कालांतर में डॉ. भीमराव अम्बेडकर के जीवन पर अत्यंत सारगर्भित पुस्तक की रचना की। वर्तमान लेखमाला उनके द्वारा लिखित पुस्तक भारत की संत परंपरा पर आधारित है, यद्यपि इसमें कुछ नए आयाम भी उन्होंने जोड़े हैं।
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प्रतिवर्ष की भाँति इस वर्ष भी पद्म पुरस्कारों की घोषणा की रस्म निभाई गई। जिस प्रकार पुराने जमाने में राजा-बादशाह खुश होकर अपनी रियासत के कलाकारों, राजा की तारीफ़ में कसीदे काढ़ने वाले भाण्डों और चारण-भाट को पुरस्कार, सोने के सिक्के, हार आदि बाँटा करते थे, वही परम्परा लोकतन्त्र के साठ साल (यानी परिपक्व ? लोकतन्त्र हो जाने) के बावजूद जारी है।

जैसा कि सभी जानते हैं “भारत रत्न” भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, फ़िर आता है पद्म विभूषण, पद्मभूषण और पद्मश्री आदि। अब तक कुल 41 लोगों को भारत रत्न का सम्मान दिया जा चुका है (यह संख्या 42 भी हो सकती थी, यदि “तकनीकी आधार”(??) पर खारिज किया गया सुभाषचन्द्र बोस का सम्मान भी गिन लिया जाता)। भारत रत्न प्रदान करने के लिये बाकायदा एक विशेषज्ञ समिति होती है जो यह तय करती है कि किसे यह सम्मान दिया जाना चाहिये और यह अनुशंसा राष्ट्रपति को भेजी जाती है, जिस पर वे अपनी सहमति देते हैं। इतनी भारी-भरकम समिति और उसमें तमाम पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी और इतिहासविद उपस्थित होने के बावजूद यदि भारत रत्न प्राप्त लोगों की लिस्ट देखी जाये तो कई अति-प्रतिष्ठित नाम उसमें नहीं मिलेंगे, जबकि कुछ “बेहद साधारण” किस्म के नाम भी इसमें देखे जा सकते हैं। चूंकि गाँधी को तो “राष्ट्रपिता” का दर्जा मिला हुआ है, इसलिये इस नाम को छोड़ भी दें, तो अंधे को भी साफ़ दिखाई दे सकता है कि भारत रत्न सम्मान प्राप्त करने के लिये सिर्फ़ निस्वार्थ भाव से देश की सेवा करना जरूरी नहीं है, इसके लिये सबसे पहली शर्त है नेहरु-गाँधी परिवार की चमचागिरी, दूसरी शर्त है “सेकुलरिज़्म का लबादा” और तीसरी तो यह कि या तो वह कलाकार इतने ऊँचे स्तर का हो कि कोई भी समिति उसका विरोध कर ही न सके, जैसे कि लता मंगेशकर, रविशंकर या पण्डित भीमसेन जोशी।

खिलाड़ियों, कलाकारों को छोड़ दिया जाये, तो जब राजनीति और समाजसेवा से जुड़े लोगों को ये नागरिक सम्मान दिये जाते हैं तब इनमें पहली और दूसरी शर्त सबसे महत्वपूर्ण होती है। यहाँ तक कि खिलाड़ियों और कलाकारों के सम्बन्ध में भी एक अदृश्य शर्त तो यह होती ही है कि उसने कभी भी “हिन्दुत्व” के सम्बन्ध में कोई खुल्लमखुल्ला बयान न दिया हो, कभी संघ-भाजपा के कार्यक्रम में न गया हो (क्योंकि ये अछूत हैं)…और सबसे बड़ी बात, कि गाँधी परिवार का कभी खुला विरोध न किया हो। मैं जानता हूं कि इन सम्मानों में क्षेत्रवाद, जातिवाद, सेकुलरवाद आदि की बातें करने से कुछ “कथित बुद्धिजीवियों” की भौंहें तन सकती हैं, लेकिन कुछ बिन्दु आपके सामने रख रहा हूं जिससे पूरी तरह से खुलासा हो जायेगा कि ये सम्मान निहायत ही पक्षपाती, राजनीति से प्रेरित और एक खास परिवार या विचारधारा के लोगों के लिये आरक्षित हैं –

1) देश की आज़ादी के आंदोलन को सबसे महत्वपूर्ण आहुति देने वाले, अंग्रेजों के साथ-साथ कांग्रेस का खुला विरोध करने वाले वीर दामोदर सावरकर को अभी तक यह पुरस्कार नहीं दिया गया है, बल्कि मणिशंकर अय्यर जैसे लोग तो अंडमान में भी इनकी समाधि की उपस्थिति बर्दाश्त नहीं कर पाते – कारण सिर्फ़ एक, उनके “हिन्दुत्ववादी विचार”, लेकिन इससे उनके अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़ी गई लड़ाई का महत्व कम नहीं हो जाता।

2) आज़ादी के बाद सभी रियासतों को अपने बल, बुद्धि और चातुर्य के बल पर भारत संघ में मिलाने वाले सरदार वल्लभाई पटेल को भारत रत्न दिया गया 1991 में। इंदिरा गाँधी, मदर टेरेसा और एमजीआर के बहुत बाद। कारण सिर्फ़ एक – उनकी विचारधारा कभी भी गाँधी परिवार से मेल नहीं खाई, नेहरु की उन्होंने कई बार (चीन के साथ एकतरफ़ा मधुर सम्बन्धों तथा हज सबसिडी की) खुलकर आलोचना भी की।

3) संविधान के निर्माता के रूप में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अम्बेडकर को यह पुरस्कार मिला 1990 में, वह भी इसलिये कि तब तक देश में “दलित आंदोलन” एक मजबूत वोट बैंक का रूप ले चुका था, वरना तब भी नहीं मिलता, क्योंकि ये महानुभाव भी देश की वर्तमान परिस्थिति के लिये नेहरुवादी नीतियों को जिम्मेदार मानते थे, तथा देश में ब्राह्मणवाद फ़ैलाने के लिये कांग्रेस की आलोचना करते थे।

4) मौलाना आज़ाद ने खुद ही भारत रत्न लेने से इसलिये मना कर दिया क्योंकि उनके अनुसार सरकार में मौजूद प्रभावशाली लोगों तथा समिति के सदस्य होने के नाते यह उनका नैतिक अधिकार नहीं था, जबकि नेहरु ने 1955 में ही भारत रत्न “हथिया” लिया। उनकी बेटी ने भी इसी परम्परा को जारी रखा और 1971 में (पाकिस्तान के 90000 सैनिकों को मुफ़्त में छोड़ने और बकवास टाइप शिमला समझौता करने के बावजूद) खुद ही भारत रत्न ले लिया, और पायलटी करते-करते “उड़कर” प्रधानमंत्री बने, इनके बेटे को भी मौत के बाद सहानुभूति के चलते 1991 में फ़ोकट में ही (“जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है” जैसे बयान और शाहबानो मामले में वोटबैंक जुगाड़ू, ढीलाढाला और देशघाती रवैया अपनाने तथा अपनी मूर्खतापूर्ण विदेशनीति के चलते श्रीलंका में शान्ति सेना के नाम पर हजारों भारतीय सैनिक मरवाने के बावजूद) भारत रत्न दे दिया गया।

5) जयप्रकाश नारायण, जिन्होंने कांग्रेस की चूलें पूरे देश से हिलाने में बड़ी भूमिका निभाई, उन्हें 1999 में यह सम्मान मिला, जबकि सिर्फ़ तमिलनाडु के लिये आजीवन काम करने वाले एमजी रामचन्द्रन को 1988 में ही मिल गया था, क्योंकि उस समय कांग्रेस को तमिल वोटों को लुभाना था।

ये थे चन्द उदाहरण, कि सन् 1980-85 तक तो भारत रत्न उसे ही मिल सकता था, जो या तो कांग्रेस का सदस्य हो, या गाँधी परिवार का चमचा हो या फ़िर अपवाद स्वरूप कोई बहुत बड़ा कलाकार अथवा नोबल विजेता। लेकिन जिस किसी व्यक्ति ने कांग्रेस का विरोध किया अथवा कोई जन-आंदोलन चलाया उसे अपने जीवनकाल में भारत रत्न तो नहीं मिलने दिया गया, मरणोपरांत ही मिला। कश्मीर में अपनी जान लड़ाने वाले (बल्कि जान गंवाने वाले) डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी, जिन्होंने शेख अब्दुल्ला को कश्मीर हथियाने से रोका, विभिन्न विवादास्पद कानूनों का विरोध किया उन्हें भारत रत्न देना तो दूर, संदेहास्पद स्थितियों में हुई उनकी मौत की नेहरु ने विधिवत जाँच तक नहीं करवाई। जबकि जिस तरह से “भड़ैती मीडिया” सोनिया मैडम के “त्याग और बलिदान” के किस्से गढ़ रहा है, जल्दी ही उन्हें भी भारत रत्न देने की नौबत आ जायेगी, पीछे-पीछे देश के “कथित युवा भविष्य” राहुल गाँधी हैं ही, एक उनके लिये भी…।

यह तो हुई भारत रत्न की बात, जो कि देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है और जिसे विदेशों में भी अच्छी निगाह से देखा जाता है, कम से कम इसमें तो राजनीति नहीं होना चाहिये, लेकिन ऐसा हुआ नहीं और कांग्रेसी घिनौनी चालें सतत चलती रहीं। पद्म विभूषण हों, पद्मभूषण अथवा पद्मश्री, सारे पुरस्कार मनमर्जी से “बादशाहों” की तर्ज पर बाँटे गये हैं। प्रणब मुखर्जी को सिर्फ़ “सोनिया भक्ति” की वजह से 2008 में पद्मविभूषण, पत्रकार रामचन्द्र गुहा को सिर्फ़ और सिर्फ़ भाजपा-संघ विरोध की वजह से और इसी तर्ज पर राजदीप सरदेसाई, बरखा दत्त या महेश भट्ट-शबाना आज़मी को “सेकुलर” वजहों से खैरात बाँटी गई हैं, और ऐसे नाम सैकड़ों की संख्या में हैं।

अपने पाँच वर्षीय कार्यकाल के दौरान वाजपेयी चाहते तो श्यामाप्रसाद मुखर्जी, सावरकर, दीनदयाल उपाध्याय, कुशाभाऊ ठाकरे आदि को पुरस्कृत कर सकते थे, लेकिन वे सदाशयता के नाते चाहते थे कि इस सर्वोच्च सम्मान में राजनीति नहीं होना चाहिये और कोई भाजपा सरकार पर उंगली न उठाये, लेकिन उनके इस रवैये की फ़िर भी कोई तारीफ़ मीडिया ने नहीं की। आज की तारीख में अटलबिहारी वाजपेयी का स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा, कभी भी कुछ भी हो सकता है ऐसे में वे “सही अर्थों में भारत के प्रथम गैर-कांग्रेसी” प्रधानमंत्री और राजनीति में बेदाग 50 वर्ष पूर्ण करने के नाते भारत रत्न के एकमात्र जीवित हकदार हैं, लेकिन उन्हें यह मिलेगा नहीं (कम से कम जीवित रहते)। पिछले तीनों भारत रत्न कलाकारों को ही मिले हैं (क्योंकि अब यही लोग थोड़े गैर-विवादास्पद बचे हैं)… और मान लिया जाये कि यदि किसी राजनैतिक व्यक्ति को यह सम्मान मिलने की बारी आई भी, तब भी ज्योति बसु का नम्बर पहले लग जायेगा (भले ही वे कभी बंगाल से बाहर चुनाव नहीं लड़े हों या सिर्फ़ एक राज्य के मुख्यमंत्री भर रहे हों), लेकिन वाजपेयी को भारत रत्न तो कतई नहीं। खैर… संघ-भाजपा से सम्बन्ध रखने वालों को “अछूत” बनाये रखने की यह परम्परा कई वर्षों से चली आ रही है, अब इसमें आश्चर्य नहीं होता

आश्चर्य तो इस बात का है कि इस वर्ष के पुरस्कारों में “संगीत के बेताज बादशाह” इलैया राजा को एआर रहमान के समकक्ष रखा गया है, जबकि देखा जाये तो रहमान उनके सामने “शब्दशः” बच्चे हैं और इलैया राजा के महान योगदान के सामने कुछ भी नहीं (शायद रहमान को “झोंपड़पट्टी वाला करोड़पति कुत्ता” फ़िल्म में पश्चिम द्वारा मिली तारीफ़ की वजह से दिया होगा), जबकि हिरण मारने वाले सैफ़ अली को वरिष्ठ अभिनेता धर्मेन्द्र और सनी देओल पर भी तरजीह दे दी गई (क्योंकि धर्मेन्द्र भाजपा सांसद रहे)।

आश्चर्य तो इस साल घोषित सम्मानों की लिस्ट में अमेरिकी NRI होटल व्यवसायी चटवाल का नाम  देखकर भी हुआ है। जिस व्यक्ति पर स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के करोड़ों रुपये के गबन और हेराफ़ेरी का मामला चल चुका हो, जो व्यक्ति एक बार गिरफ़्तार भी हो चुका हो, पता नहीं उसे किस आधार पर पद्म पुरस्कार के लायक समझा गया है (शायद अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में अच्छा चन्दा दिया होगा, या मनमोहन-चिदम्बरम की उम्दा खातिरदारी की होगी इसने)। खैर, कांग्रेस द्वारा “भ्रष्टों को संरक्षण” देने की परम्परा तो शुरु से रही है, चाहे जस्टिस रामास्वामी का महाभियोग मामला हो या जस्टिस दिनाकरन के महाभियोग प्रस्ताव में कांग्रेसी सांसदों का दस्तखत न करना रहा हो।

धीरे-धीरे हमें ऐसे पुरस्कारों की भी आदत डाल लेना चाहिये, क्योंकि जब राठौर और आरके शर्मा जैसे “महादागी” पुलिस अफ़सर भी राष्ट्रपति पदक “जुगाड़” सकते हैं, तो पप्पू यादव, शहाबुद्दीन, अरुण गवली, दाऊद इब्राहीम आदि को भी किसी दिन “पद्मश्री” मिल सकता है… लेकिन वीर सावरकर, तिलक, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, अटलबिहारी वाजपेयी को कभी नहीं… क्योंकि इन लोगों का “जुर्म” अधिक बड़ा है… इन्होंने कांग्रेस-नेहरु-गाँधी परिवार का विरोध और हिन्दुत्व का समर्थन किया है… जो इस देश में “बहुत बड़ा और अक्षम्य अपराध” है… जय हो।

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भारतभूमि नामक महान धरा के तथाकथित “फ़िल्मी बादशाह” यानी शाहरुख, पाकिस्तानी खिलाड़ियों के साथ हुए “बर्ताव”(?) से बहुत दुखी हैं, उन्होंने कहा है कि जो भी हुआ गलत हुआ (यानी जब टीम के लिये खिलाड़ियों की बोली लगाई जा रही थी, तब वे सो रहे थे)। प्रियंका गाँधी के बच्चों के लाड़ले और कांग्रेस के टिकिट पर लोकसभा चुनाव लड़ने को बेताब शाहरुख कहते हैं कि खेलों में राजनीति नहीं होना चाहिये और IPL की नीलामी में जो हुआ वह उन्होंने जानबूझकर नहीं किया। पाकिस्तान को इस मामले में संयम बरतना चाहिये… http://ibnlive.in.com/news/ipl-could-have-been-respectful-to-pak-srk/109146-5.html?utm_source=IBNdaily_MCDB_250110&utm_medium=mailer अब भला शाहरुख खान जब “माहौल” बनाने में लगे हैं तो फ़िर शाहिद अफ़रीदी को कौन रोक सकेगा IPL-3 में?

उधर तत्काल ऑस्ट्रेलिया से ताबड़तोड़ गालीगलौज में माहिर शाहिद अफ़रीदी का “थूक कर चाटने वाला बयान” भी आ गया कि “जो भी हुआ उसे वे भुला चुके हैं और IPL की बोली के अगले दौर के लिये वे उपलब्ध रहेंगे”, http://cricket.rediff.com/report/2010/jan/26/shahid-afridi-decides-to-forgive-and-forget-open-to-ipl-in-future.htm यानी कहाँ तो लड़ने की बातें कर रहे थे, और अपना आत्मसम्मान भुलाकर फ़िर से IPL के पैसों पर लार टपकाने लगे। अब बेचारे जहीर अब्बास के बयान का क्या होगा, पाकिस्तानी कबड्डी टीम के बयानों का क्या होगा, पाकिस्तानी हॉकी संघ के टीम न भेजने के फ़ैसले का क्या होगा… और एक “सज्जन” ने पाकिस्तानी कोर्ट में जो याचिका (http://cricket.rediff.com/report/2010/jan/25/pak-court-issues-notice-to-indian-govt-over-ipl-snub.htm) लगाई है उस पर अब कोर्ट को शाहिद अफ़रीदी और शाहरुख खान को नोटिस जारी करके पूछना चाहिये कि “भाई लोगों, जब अपनी बात से पलटना ही था, पैसों के लिये स्वाभिमान गिरवी रखना ही था, दोनों देशों की नकली दोस्ती के राग-तराने गाना ही था… तब पहले क्यों दहाड़ रहे थे?”… लेकिन पाकिस्तानी हैं ही ऐसे… आज़ादी के समय से ही भारत के पैसों पर पलने वाले…

इधर हमारे चिदम्बरम साहब भी बड़े उदास मूड में कह रहे हैं कि “पाकिस्तान को इस मुद्दे को इतना तूल नहीं देना चाहिये, उन्हें बुरा लगना स्वाभाविक है लेकिन इस मामले में सरकार की अपनी सीमाएं हैं” (यानी कि मेरे बस में होता तो ललित मोदी के कान पकड़कर उसे पाकिस्तानी खिलाड़ियों को शामिल करने को कहता)…

बहरहाल, मुझे तो ऐसा लगता है कि शाहरुख की आने वाली फ़िल्म जिसका नाम ज़ाहिर है कि “माइ नेम इज़ खान” है (क्योंकि “माइ नेम इज़ कश्मीरी पंडित” बनाने की परम्परा इस देश में नहीं है) के पाकिस्तान में होने वाले “बिजनेस” पर फ़र्क पड़ने की आशंका को लेकर शाहरुख बेचैन हैं, उधर भारत के कुछ “सेकुलर चैनल” वाले भी IPL-3 के पाकिस्तान में प्रसारण न होने को लेकर चिन्तित होंगे… क्योंकि उनकी विज्ञापन की कमाई मारी जायेगी… सो बात का लब्बेलुआब यह है कि पिछले दरवाजे से किसी बहाने पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिये दरवाजे खोलने की तैयारी चल रही है…

जैसा कि मैं पहले भी कई बार कह चुका हूं कि भारतीयों के लिये (और पाकिस्तानियों के लिये भी) “धंधा” अधिक महत्वपूर्ण होता है राष्ट्र के स्वाभिमान की अपेक्षा…। चीन हमारी जमीन हथियाता जा रहा है, नकली और घटिया माल से हमारे बाज़ार बिगाड़ रहा है और हम उससे “धंधे” की बात कर रहे हैं… पाकिस्तान तो 60 साल में भारी नुकसान पहुँचा चुका, उसे भी हमने “धंधे” की खातिर “मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन” का दर्जा दे रखा है, बांग्लादेश हमारे वीर जवानों की लाशों को भी बेइज्जती से भेजता है और हम उसे 400 करोड़ का अनुदान देते हैं “धंधे” के नाम पर… क्योंकि मैकाले आधारित शिक्षा पद्धति ने हमें “आत्मसम्मान” क्या होता है, यह कभी सिखाया ही नहीं…
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IPL नामक बाजीगरीनुमा भौण्डा तमाशा मुझे पहले एपीसोड से ही पसन्द नहीं था, इसके दूसरे एपीसोड के बाद, जबकि इसे अपने देश से बाहर आयोजित किया गया तब भी इसके प्रति कभी खास रुचि जागृत नहीं हुई। कितनी ही चीयरलीडर्स आई-गईं, लेकिन कभी भी शान्ति से बैठकर IPL के 4 ओवर देखने की भी इच्छा नहीं हुई।

इसीलिये जब IPL के तीसरे संस्करण की बोलियाँ लगाने सम्बन्धी खबर पढ़ी तब कोई उत्सुकता नहीं जागी, कोई भी धनपति किसी भी खिलाड़ी को खरीदे-बेचे मुझे क्या फ़र्क पड़ने वाला था, नीता अम्बानी, प्रीति जिण्टा से हारे या जीते मुझे अपनी नींद खराब क्यों करना चाहिये? वैसा ही सब कुछ आराम से चल रहा था, लेकिन खिलाड़ियों की नीलामी के अगले दिन जब यह सुखद खबर आई कि टी-20 विश्वकप के “मैन ऑफ़ द सीरिज” शाहिद अफ़रीदी समेत सभी पाकिस्तानी खिलाड़ियों को कोई खरीदार नहीं मिला, तब मुझे बड़ा ही सुकून मिला। मन में तत्काल विचार आया कि 26/11 के हमले के बाद हमारे बतोलेबाज और बयानवीर नेताओं ने जो काम नहीं किया था, उसे इन धनपतियों ने मजबूरी में ही सही, कर दिखाया है।

यह काम बहुत पहले हो जाना चाहिये था, लेकिन “देर आयद दुरुस्त आयद”, पाकिस्तान को उसकी “सही जगह” दिखाने की कम से कम एक रस्म निभा दी गई है, और यह काम “धंधेबाजी” में माहिर हमारे क्रिकेटरों, उन्हें पालने वाले धनकुबेरों ने भले ही मजबूरी में किया हो, इसका स्वागत किया ही जाना चाहिये। यह कदम, हमारे “सेकुलर मीडिया” द्वारा खामख्वाह पाकिस्तान से दोस्ती के नाम पर चलाये जा रहे नौटंकीनुमा हाईप और बाल ठाकरे द्वारा धमकी नहीं दिये जाने के बावजूद हो गया, इसलिये ये और भी महत्वपूर्ण है। अब पाकिस्तानी खिलाड़ियों, अभिनेताओं, बिजनेसमैनों के खैरख्वाह अपने कपड़े फ़ाड़-फ़ाड़कर भले ही रोते फ़िरें, लेकिन भारत की करोड़ों जनता के मनोभावों को इस काम से जो मुखरता मिली है, उसने कई दिलों पर मरहम लगाया है, वरना यही अफ़रीदी, जो गौतम गम्भीर को धकियाकर उसे मां-बहन की गाली सुनाकर भी बरी हो जाता था, और हम मन मसोसकर देखते रह जाते थे, अब उसका मुँह सड़े हुए कद्दू की तरह दिखाई दे रहा है। सड़क चलते किसी भी क्रिकेटप्रेमी से इस बारे में पूछिये, वह यही कहेगा कि अच्छा हुआ *&;$*^*$*# को इधर नहीं खेलने दे रहे।

पाकिस्तान में लोग उबाल खा रहे हैं, लेकिन कोई इस बात पर आत्ममंथन करने को तैयार नहीं है कि मुम्बई हमले के बाद उनकी सरकार ने क्या किया अथवा इन रोने-धोने वालों ने पाकिस्तानी सरकार पर इसके लिये क्या दबाव बनाया? इधर भारत में भी विधवा प्रलाप शुरु हो चुका है, जिसमें कुछ “सेकुलर” शामिल हैं जबकि कुछ (ज़मीनी हकीकत से कटे हुए) “बड़ा भाई-छोटा भाई” वाली गाँधीवादी विचारधारा के लोग हैं। जबकि IPL में पाकिस्तानी खिलाड़ियों के न खेलने से क्रिकेट का कोई नुकसान नहीं होने वाला है, किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता है उनके न होने से।

अब पाकिस्तानी खिलाड़ियों के “Humiliation” और अपमान की बड़ी-बड़ी बातें की जा रही हैं, लेकिन यही लोग उस समय दुबककर बैठ जाते हैं जब शारजाह में संजय मांजरेकर को अंधेरे में खेलने पर मजबूर किया जाता है, तब इन्हें मांजरेकर की आँखों के आँसू नहीं दिखाई देते? अकीब जावेद जैसा थर्ड क्लास गेंदबाज जब शारजाह में 5-5 भारतीय खिलाड़ियों को LBW आउट ले लेता है तब किसी का मुँह नहीं खुलता, जब अन्तिम गेन्द पर छक्का मारकर जितवाने वाले जावेद मियांदाद को दाऊद इब्राहीम सोने की तलवार भेंट करते हैं तब सारे सेकुलर देशभक्त घर में घुस जाते हैं? ऐसा क्यों भाई, क्या खेलभावना के नाम पर जूते खाते रहने का ठेका सिर्फ़ भारतीय खिलाड़ियों ने ही ले रखा है? जो लोग “खेलों में राजनीति का दखल नहीं होना चाहिये…” टाइप की आदर्शवादी बातें करते हैं, वे इमरान खान और जिया-उल-हक के पुराने बयान भूल जाते हैं।

भले ही IPL-3 में फ़्रेंचाइज़ी ने यह निर्णय मजबूरी में लिया हो, धंधे में रिस्क न लेने की प्रवृत्ति से लिया हो, अथवा एक विशेष विज्ञापन “प्रोपेगैण्डा” के तहत किया गया हो, लेकिन जो काम भारत के रीढ़विहीन नेताओं को बहुत पहले कर देना चाहिये था, वह जाने-अनजाने इसके जरिये हो गया है। टाइम्स और जंग अखबार द्वारा शुरु की गई “अमन की आशा” नौटंकी"  की भी इस एक कदम से ही हवा निकल गई है।

होंगे पाकिस्तानी खिलाड़ी टी-20 के विश्व चैम्पियन, हमें क्या? जब IPL एक “तमाशा” है, तब इसमें पाकिस्तान के 2-4 खिलाड़ी नहीं खेलें तो कोई तूफ़ान नहीं टूटने वाला भारतीय क्रिकेट पर, लेकिन कम से कम एक “संदेश” तो गया पाकिस्तान में। जो लोग इस थ्योरी पर विश्वास करते हैं कि “स्थिर, शान्त और विकसित पाकिस्तान भारत के लिये अच्छा दोस्त साबित होगा”, वे लोग तरस खाने लायक हैं। 1948 से अब तक 60 साल में जितने घाव इस गन्दे देश ने भारत के सीने पर दिये हैं इसके लिये उनके पेट पर जहाँ-जहाँ और जितनी लातें जमाई जा सकती हों, निरन्तर जमाना चाहिये। जिस मुल्क के बाशिंदे कोरिया से आई चायपत्ती की चाय पीते हों, चार सौ रुपए किलो अदरक खरीदते हों, पांच हजार में जिन्हें साइकिल की सवारी नसीब होती हो, सोलह रुपए की अखबार व पिच्चासी रुपए में पत्रिका खरीदते हों, सोचना “उन्हें” चाहिए कि भारत से दोस्ती का कितना फायदा हो सकता है, बार-बार हम ही क्यों सोचें?
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नोट – ऑस्ट्रेलिया के साथ ऐसा कोई “सबक सिखाने वाला” कदम कब उठाया जाता है यह देखना अभी बाकी है… या हो सकता है कि “यूरेनियम” के लालच में फ़िलहाल भारतीयों को पिटने ही दिया जाये उधर… क्योंकि हमारे लिये “धंधा” अधिक महत्वपूर्ण है, राष्ट्रीय स्वाभिमान से…

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अंग्रेजों के नववर्ष के दिन अर्थात 1 जनवरी 2010 से भारत के टाइम्स समूह तथा पाकिस्तान के अखबार “जंग” ने एक तथाकथित शांति मुहिम की शुरुआत के तहत “अमन की आशा” के नाम से एक अभियान छेड़ा है। इसके उद्देश्यों की फ़ेहरिस्त में, भारत और पाकिस्तान के बीच मैत्रीपूर्ण एकता स्थापित करना, दोनों देशों की जनता के बीच मधुर सम्बन्ध बनाना तथा आतंकवाद का मिलजुलकर मुकाबला करने जैसी “महान रोमांटिक” किस्म की लफ़्फ़ाजियाँ शामिल हैं। इन अखबारों के इस “पुरस्कार-जुगाड़ू” काम में इनकी मदद करने के लिये कुछ सेलेब्रिटी (बल्कि इन्हें “नॉस्टैल्जिक” कहना ज्यादा उचित है) नाम भी सदा की तरह शामिल हैं, जैसे कुलदीप नैयर, अमिताभ बच्चन, महेश भट्ट, सलमान हैदर तथा गुलज़ार आदि… और हाँ… यासीन मलिक जैसे सेकुलरों के “कृपापात्र” आतंकवादी भी

पाकिस्तान में जो हैसियत, इज़्ज़त और छवि कराची से निकलने वाले “डॉन” अखबार की है उसके मुकाबले टाइम्स समूह ने “जंग” जैसे अखबार से हाथ मिलाने का फ़ैसला क्यों किया, सबसे पहला सवाल तो यही उठाया जा रहा है। संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि जंग अखबार के मालिकान की विवादास्पद भूमिका और उनके धनलोलुप होने की वजह से ही इस गठबंधन ने आकार लिया है और “धंधेबाजी” का शक यहीं से गहराना शुरु हो जाता है, क्योंकि इस अभियान की शुरुआत ही इस बात से हुई है कि भारत-पाकिस्तान के बीच व्यापार की क्या संभावनाएं हैं, इसे कैसे बढ़ाया जा सकता है, इसमें और किन क्षेत्रों को शामिल किया जा सकता है… आदि-आदि।

ऊपर नामित महान नॉस्टेल्जिक लोगों और टाइम्स ने कभी इस मामूली बात पर गौर किया है कि 1947 में एक साथ आज़ाद होने के बावजूद आज पाकिस्तान कहाँ रह गया और भारत कहाँ पहुँच गया है, तो उसका कारण क्या है? कारण साफ़ है कि पाकिस्तान का गठन इस्लाम के नाम पर हुआ है और वहाँ कभी लोकतन्त्र नहीं पनप सका, लेकिन सावन के अंधों को अब भी हरा ही हरा सूझ रहा है और ये लोग इस उम्मीद में अपना सिर पत्थर से फ़ोड़ रहे हैं कि शायद पत्थर टूट जाये। क्या कभी इन्होंने सोचा है कि विश्व भर के तमाम आतंकवादी अपनी सबसे सुरक्षित पनाहगाह पाकिस्तान को क्यों मानते हैं? क्योंकि उन आतंकवादियों जैसी मानसिकता वाले लाखों लोग वहाँ उन्हें “पारिवारिक” वातावरण मुहैया करवाते हैं, क्योंकि पाकिस्तान की शिक्षा व्यवस्था में ही दो-दो पीढ़ियों में “भारत से घृणा करो” का भाव फ़ैलाया गया है, क्या ऐसे लोगों से स्वस्थ दोस्ती सम्भव हो सकती है? कभी नहीं। लेकिन ये आसान सी बात स्वप्नदर्शियों को समझाये कौन?

ऐसे में शक होना स्वाभाविक है कि टाइम्स और जंग द्वारा “भारत-पाक भाई-भाई” (http://timesofindia.indiatimes.com/amankiasha.cms) का रोमांटिक नारा लगाने के पीछे आखिर कौन सी चाल है? शान्ति के पक्ष में जैसे कसीदे टाइम्स ने भारत की तरफ़ से काढ़े हैं, वैसे ही कसीदे जंग ने उधर पाकिस्तान में क्यों नहीं काढ़े? क्या यहाँ भी बांग्लादेशी भिखारियों को 4500 करोड़ का अनुदान देने जैसा एकतरफ़ा “संतत्व” का भाव है… या कश्मीर के मामले पर अन्दर ही अन्दर कोई खिचड़ी पक रही है, जिसकी परिणति शर्म-अल-शेख जैसे किसी शर्मनाक हाथ मिलाने के रूप में होगी? या फ़िर दोनों अखबार मिलकर, कहीं से किसी अन्तर्राष्ट्रीय “फ़ण्ड” या पुरस्कार की व्यवस्था में तो नहीं लगे हैं? पान, चावल, शकर और आलू निर्यात व्यापारियों की लॉबी तो इसमें प्रमुख भूमिका नहीं निभा रही? फ़िल्म वालों के जुड़ने की वजह से यह बॉलीवुड इंडस्ट्री द्वारा अपना व्यवसाय पाकिस्तान में मजबूत करने की भी जुगाड़ नज़र आती है…। यह सारी शंकाएं-कुशंकाएं इसीलिये हैं कि भारतीय हो या पाकिस्तानी, जब फ़ायदा, धंधा, लाभ, पैसे का गणित जैसी बात सामने आती है तब राष्ट्र-गौरव, स्वाभिमान जैसी बातें (जो कभीकभार 15 अगस्त वगैरह को झाड़-पोंछकर बाहर निकाली जाती हैं), तुरन्त “पैरपोंछ” के नीचे सरका दी जाती हैं, और हें-हें-हें-हें करते हुए दाँत निपोरकर पाकिस्तान तो क्या, ये लोग लादेन से भी हाथ मिलाने में संकोच नहीं करेंगे, इसलिये इन दोनों अखबारों की गतिविधियों पर बारीक नज़र रखने की जरूरत तो है ही, “तथाकथित शान्ति” के इस “बड़े खेल” में परदे के पीछे से इन दोनों के कान में फ़ुसफ़ुसाने वाली “ताकत” कौन सी है, यह अभी पहचानना बाकी है। अधिक अफ़सोसनाक इसलिये भी है कि यह तमाशा तब हो रहा है जब कश्मीरी पंडितों को “घाटी से निकल जाओ और अपनी औरतों को यहीं छोड़ जाओ” का फ़रमान सुनाने के बीस वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन चूंकि कश्मीरी पंडित कोई “फ़िलीस्तीनी मुसलमान” तो हैं नहीं इसलिये इस महान “सेकुलर” देश में ही पराये हैं।

शक का आधार मजबूत है, क्योंकि यह एक नितांत हवाई कवायद है, इसमें फ़िलहाल भारत सरकार और इसके आधिकारिक संगठन खुले रूप में कहीं भी तस्वीर में नहीं हैं। पाकिस्तान, उसके इतिहास और वहाँ की सरकारों द्वारा किये वादों से मुकरने का एक कटु अनुभव हमारे साथ है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया वाले पाकिस्तान से यह पुरानी बात क्यों नहीं पूछते कि विभाजन के समय जो करोड़ों का ॠण (अब ब्याज मिलाकर अरबों का हो गया है) वह पाकिस्तान कब लौटाने वाला है? या फ़िर एकदम ताजी बात, कि 26/11 के हमले के बाद पाकिस्तान ने कोई ठोस कदम उठाकर किसी आतंकवादी को गिरफ़्तार क्यों नहीं किया? लेकिन मेहमानों से असुविधाजनक सवाल पूछने की परम्परा हमारे यहाँ कभी रही नहीं, उन्हें बिरयानी-मटन खिलाने की जरूर रही है। अब भारत के “गीली मिट्टी” के मंत्री, हवाई जहाज के अपहरण करने पर मौत की सजा के प्रावधान की दिखावटी और भोंदू किस्म की बातें कर रहे हैं, जबकि जिसे सुप्रीम कोर्ट मौत की सजा दे चुका है उसे तो फ़ाँसी देने की हिम्मत हो नहीं रही… (अब तो कसाब को बचाने के लिये भी कुछ “कुख्यात बुद्धिजीवी” आगे आने लगे हैं), उधर ये दोनों धंधेबाज अखबार उपदेश झाड़ने, एकता के गीत गाने और नॉस्टेल्जिक लोगों के सहारे बासी कढ़ी में उबाल लाने की कोशिशों में लगे हैं। वे बतायें कि पिछले एक साल में पाकिस्तान की मानसिकता में ऐसा क्या बदलाव आ गया है जो हम हाथ बढ़ाने के लिये मरे जायें।

अमन की आशा कम से कम भारत में तो काफ़ी लोगों को सदा से रही है, पाकिस्तान के लोगों से अच्छे सम्बन्ध बनें इसकी भी चाहत है, लेकिन यदि पिछले 60 साल में गंगा और चिनाब में बहे पानी को भूल भी जायें तब भी पिछले एकाध-दो साल में ही इतना कुछ हो चुका है कि भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती की बात करना लगभग “थूक कर चाटने” जैसा मामला बन चुका है।

हमारी पिलपिलाई हुई विदेश नीति तो ऐसी है कि मुम्बई हमले के बाद, 40 आतंकवादियों की लिस्ट से शुरु करके धीरे से 20 पर आ गये, फ़िर “सैम अंकल” के कहने पर सिर्फ़ एक लखवी पर आ गये और अब तो अमेरिका की शह पर पाकिस्तान खुलेआम कह रहा है कि किसी को भारत को सौंपने का सवाल ही नहीं है… सोच-सोचकर हैरत होती है कि वे लोग कितने मूर्ख होंगे जो यह सोचते हैं कि पाकिस्तान कभी भारत का दोस्त भी बन सकता है। जिस देश का विभाजन/गठन ही धार्मिक आधार पर हुआ, जिसके मदरसों में कट्टर इस्लामिक शिक्षा दी जाती हो, जो देश भारत के हाथों चार-चार बार पिट चुका हो, जिसके दो टुकड़े हमने किये हों… क्या ऐसा देश कभी हमारा दोस्त हो सकता है? दोनों जर्मनी एकत्रित हो सकते हैं, दोनो कोरिया आपस में दोस्त बन सकते हैं, लेकिन हमसे बार-बार पिटा हुआ एक ऐसा देश जिसकी बुनियाद इस्लाम के नाम पर रखी गई है… वह कभी भी “मूर्तिपूजकों के देश” का सच्चा दोस्त नहीं बन सकता, कभी न कभी पीठ में छुरा घोंपेगा जरूर…। लेकिन इतनी सी बात भी उच्च स्तर पर बैठे लोगों को समझ में नहीं आती?… तरस आता है…

चलते-चलते इस लिंक पर एक निगाह अवश्य डालियेगा http://www.indianexpress.com/news/man-moves-hc-to-get-back-wife/563838/ जो साफ़ तौर पर रजनीश-अमीना यूसुफ़ जैसा ही मामला नज़र आ रहा है… टाइम्स वाले बतायें कि ऐसी मानसिकता वाले लोगों से आप "अमन की आशा" की उम्मीद रखे हुए हैं? रिज़वान मामले पर रो-रोकर अपने कपड़े फ़ाड़ने वाले देश के नामचीन "सेकुलर पत्रकार"(?) रजनीश मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं, यदि वाकई मर्द हैं तो अमन की आशा के अलावा कभी "आशीष की आयशा" जैसा नारा भी लगाकर तो दिखायें…, कश्मीर की असली "मानसिकता" को समझें और पाकिस्तान नामक "खजेले कुत्ते" से दोस्ती का ढोंग-ढकोसला छोड़ें…"धंधा" ही करना है तो उसके लिये सारी दुनिया पड़ी है… कभी स्वाभिमान भी तो दिखाओ।

विषय से सम्बन्धित कुछ लेख अवश्य देखें ताकि आपको पाकिस्तान (और वहाँ की मानसिकता) की सही जानकारी मिल सके…

1) http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/06/jamat-e-islami-pakistan-talibani-plans_09.html

2) http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/03/pakistan-education-system-indian_17.html

3) http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2008/08/secular-intellectuals-terrorism-nation.html


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हुबली (कर्नाटक) में कई वर्षों से चल रहे ईदगाह मैदान के बारे में अन्ततः सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि ईदगाह का यह मैदान हुबली-धारवाड़ नगरपालिका निगम के स्वामित्व का माना जायेगा, तथा किसी भी अन्य संगठन को इस सम्पत्ति पर दावा प्रस्तुत करने का अधिकार नहीं है।

कुछ लोग भूल गये होंगे इसलिये आईये पूरे मामले पर फ़िर से एक निगाह डालते हैं –

हुबली के ईदगाह के मैदान का भूमि विवाद सन् 1921 से चल रहा है, जब हुबली नगरपालिका ने स्थानीय अंजुमन-ए-इस्लाम को इस मैदान का 1.5 एकड़ हिस्सा नमाज के लिये कुछ शर्तों पर दिया था। शुरु से ही शर्तों का उल्लंघन होता रहा, प्रशासन, सरकारें आँखें मूंदे बैठे रहे। जब हिन्दूवादी संगठनों ने इस पर आपत्ति उठाना शुरु किया तब हलचल मची, इस बीच 1990 में अंजुमन ने इस भूमि पर पक्का निर्माण कार्य लिया, जिसने आग में घी डालने का काम कर दिया, और जब सरकार ने इस निर्माण कार्य को अतिक्रमण कहकर तोड़ने की कोशिश की तब मामला न्यायालय में चला गया, फ़िर जैसा कि होता आया है हमारे देश के न्यायालय न्याय कम देते हैं “स्टे ऑर्डर” अधिक देते हैं, मामला टलता गया, गरमाता गया, साम्प्रदायिक रूप लेता गया। उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती ने इस मैदान पर जब तिरंगा फ़हराने की कोशिश की थी, तब “स्वार्थी तत्वों” दंगे भड़काये गये थे और पुलिस गोलीबारी मे 9 लोग मारे गये थे, उमा भारती के खिलाफ़ स्थानीय न्यायालय ने गैर-ज़मानती वारंट जारी किया था और उन्हें संवैधानिक बाध्यताओं के चलते अपना मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने 8 जून 1992 के अपने निर्णय में स्पष्ट कहा है कि –

1) ईदगाह मैदान अंजुमन-ए-इस्लाम की निजी सम्पत्ति नहीं है यह हुबली-धारवाड़ नगरपालिक निगम की सम्पत्ति है।

2) मैदान का कुछ हिस्सा, अंजुमन को वर्ष में “सिर्फ़ दो दिन” अर्थात बकरीद और रमज़ान के दिन नमाज़ अदा करने के लिये दिया गया है।

3) अंजुमन द्वारा जो स्थाई निर्माण किया गया है उसे 45 दिनों के अन्दर हटा लिया जाये।

4) अंजुमन इस ज़मीन का उपयोग किसी भी व्यावसायिक अथवा शैक्षणिक गतिविधियों के लिये नहीं कर सकता।

इस निर्णय के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई थी, जिस पर न्यायालय ने “स्टे” दिया था। संघ परिवार(?) ने भी सुप्रीम कोर्ट में दस्तावेज़ जमा करके 19 अप्रैल 1993 को उच्चतम न्यायालय में इस मैदान को सार्वजनिक सम्पत्ति घोषित करने की मांग की थी।

शुरुआत में स्थानीय नागरिकों ने इस सार्वजनिक मैदान के नमाज़ हेतु उपयोग तथा पक्के निर्माण पर आपत्ति ली थी, फ़िर एक संगठन ने 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन यहाँ तिरंगा फ़हराने की अनुमति मांगी, जिसका अंजुमन ने विरोध किया और तभी से मामला उलझ गया। असल में अंजुमन का इरादा यहाँ एक व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स बनाकर नीचे दुकानें और ऊपर धार्मिक गतिविधि के लिये पक्का निर्माण करके समूचे मैदान पर धीरे-धीरे कब्जा जमाने का था (बांग्लादेशी भी ऐसा ही करते हैं), लेकिन भाजपा और अन्य हिन्दू संगठनों के बीच में कूदने के कारण उनका खेल बिगड़ गया। फ़िर भी जो स्थाई निर्माण इतने साल तक रहा और उसकी वजह से अंजुमन को जो भी आर्थिक फ़ायदा हुआ होगा, कायदे से वह भी सुप्रीम कोर्ट को उनसे वसूल करना चाहिये।

अब देखना यह है कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद उस जगह से अंजुमन का अतिक्रमण हटाने में कामयाब हो पाते हैं या नहीं (क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों को लतियाने की परम्परा रही है इस देश में)। वैसे तो यह पूरी तरह से एक भूमि विवाद था जिसे अतिक्रमणकर्ताओं ने “साम्प्रदायिक” रूप दे दिया, लेकिन फ़िर भी उमा भारती के लिये व्यक्तिगत रूप से यह एक नैतिक विजय कही जा सकती है।

इसलिये ऐ, “सेकुलर रुदालियों,” उठो, चलो काम पर लगो… कर्नाटक में भाजपा की सरकार है… अपने पालतू भाण्ड चैनलों को ले जाओ, कुछ मानवाधिकार संगठनों को पकड़ो, एकाध महेश भट्टनुमा सेलेब्रिटी(?) को पढ़ने के लिये स्क्रिप्ट वगैरह दो… कहीं ऐसा न हो कि येदियुरप्पा “अल्पसंख्यकों” पर “भारी अत्याचार” कर दें…

http://news.rediff.com/interview/2010/jan/14/hubli-idgah-maidan-is-for-public-use.htm
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