एक बार फ़िर से बाबरी विध्वंस का मामला “नकली-सेकुलर मीडिया” की हेडलाइन बना हुआ है। इस बार का हंगामा बरपा है 1992 में आडवाणी की निजी सुरक्षा अधिकारी रहीं अंजू गुप्ता के उस बयान की वजह से जिसमें उन्होंने कहा कि “उस दिन आडवाणी ने भड़काऊ भाषण दिया था और बाबरी ढाँचा गिरने के बाद आडवाणी बहुत खुश हुए थे…”।

अंजू गुप्ता के समक्ष अब इस बयान की गम्भीरता साबित करने का भारी दबाव आने वाला है, उसका कारण यह है कि यही अंजू गुप्ता पहले दो बार आडवाणी को “क्लीन चिट” दे चुकी हैं, पहली बार सीबीआई की पूछताछ और सीबीआई कोर्ट में, तथा दूसरी बार लिब्रहान आयोग के सामने उन्होंने आडवाणी को पूरी तरह बेकसूर और मामले से असम्बद्ध बताया था, लेकिन अंजू गुप्ता के इस नवीनतम “यू-टर्न” का औचित्य समझना थोड़ा मुश्किल जरूर है, परन्तु नामुमकिन नहीं। अपने पहले बयान में (जब मामला ताज़ा-ताज़ा था, अब तो मामला भी पुराना हो गया, कई बातें भूली जा चुकी हैं जबकि कई मुद्दों और बयानों को “सेकुलर सुविधानुसार” तोड़ा-मरोड़ा जा चुका है) अंजू गुप्ता ने कहा था कि “आडवाणी ने कारसेवकों से बार-बार गुम्बद से उतर जाने की अपील की थी…” अब बदले हुए बयान में वे कह रही हैं कि “आडवाणी ने कारसेवकों से गुम्बद से उतरने की अपील कर रहे थे ताकि, कहीं कारसेवक गुम्बद के गिरने से घायल न हो जायें…”।

बहरहाल, “डेली पायोनियर” http://dailypioneer.com/244999/Officer-blames-Advani-BJP-unfazed.html ने अंजू गुप्ता के इस ताज़ा बयान के साथ ही उनका बायो-डाटा खंगालने की भी कोशिश की है। अपनी एक हालिया पोस्ट में मैंने भी कहा था कि “पूरे नाम” लिखने की परम्परा शुरु की जाये, ताकि सम्बन्धित व्यक्ति का पूरा “व्यक्तित्व” उभरकर सामने आ सके। श्रीमती अंजू गुप्ता फ़िलहाल “रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग” (RAW) में पदस्थ हैं जबकि उनके पति “शफ़ी अहमद रिज़वी”, गृहमंत्री पी चिदम्बरम के “विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी” (OSD) हैं…। अब आपके दिमाग की बत्ती भी जल गई होगी… कि अंजू गुप्ता “रिज़वी” को कहाँ से “प्रेरणा” प्राप्त हो रही है।  क्या अब भी कुछ कहने को बाकी रह गया है? इतने समझदार तो आप लोग हैं ही, कि “खिचड़ी” सूंघकर ही पहचान सकें… (अंजू गु्प्ता रिज़वी + शफ़ी रिज़वी + पी चिदम्बरम = सेकुलर खिचड़ी… यह ठीक उसी प्रकार है जैसे कि ईसाई पादरी + वीडियो टेप + NGO + तहलका = सेकुलर खिचड़ी…)

वहीं दूसरी तरफ़, आडवाणी अभी भी Politically Correct बनने (दिखने) के चक्कर में बाबरी ढाँचे के गिरने की खुशी को सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं… कहने का मतलब यह है कि तीन तरह के “कैरेक्टर” हमें देखने को मिल रहे हैं –

1) पहले हैं आडवाणी, जो अभी भी खुलेआम बाबरी विध्वंस की जिम्मेदारी नहीं ले रहे, जिन्ना की मज़ार पर जाकर मत्था भी टेक आये, जबकि बाल ठाकरे, आचार्य धर्मेन्द्र और विहिप के कई नेता इस पर सार्वजनिक खुशी जता चुके हैं। इसे कहते हैं “राजनीति”, और आडवाणी का यह मुगालता कि शायद मुसलमान कभी भाजपा को वोट दे भी दें… जबकि यह कई बार साबित हो चुका है कि चाहे किसी गधे को भी वोट देना पड़े, तब भी मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देंगे।

2) दूसरी हैं, अंजू गुप्ता “रिज़वी” जो एक हिन्दू नारी होने की वजह से अपने “संस्कारों” के चलते (शायद) अपने “पति” के कहने पर अपने दो-दो बार दिये गये बयान से पलटी खा गईं…

3) तीसरी हैं, उमा भारती और साध्वी ॠतंभरा, जो बाबरी ढाँचा गिरने पर खुशी से चिल्लाईं और गले मिलीं। उमा भारती ने खुलेआम कहा कि जो हुआ अच्छा हुआ, और यूपीए सरकार में दम है तो उन्हें गिरफ़्तार करें। यह उमा भारती ही थीं जिन्होंने हुबली में तिरंगा फ़हराया और मुख्यमंत्री पद से हाथ धोया, और वह भी उमा भारती ही हैं जिन्हें भाजपा से बेइज्जत होकर निकलना पड़ा था…

तीनों “कैरेक्टरों” का विश्लेषण करने से तीन बातें उभरती हैं –

1) भाजपा भी “Politically Correct” होने के चक्कर में अपना “हिन्दू वोट” गँवा रही है, क्योंकि गडकरी का ताज़ा बयान “आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता…” इसी “पोलिटिकल करेक्टनेस” की ओर इशारा कर रहा है…

2) “लव जेहाद” एक वास्तविकता है, अतः जहाँ तक सम्भव हो (और जैसे ही पता चले) व्यक्ति का पूरा नाम लिखें। (जैसे तीस्ता जावेद सीतलवाड…, मुझे भी “अंजू गुप्ता रिज़वी” का पूरा नाम आज ही पता चला, इसलिये डेली पायोनियर को धन्यवाद)।

3) हिन्दू साध्वियाँ (उमा, ॠतम्भरा और प्रज्ञा) जैसी भी हों, कम से कम राजनेताओं की तरह ढोंगी और पाखण्डी तो नहीं हैं। (बगैर आरक्षण के आगे बढ़ी हुई महिला शक्ति को सलाम… )

लगता है समय आ गया है, कि कांग्रेस की “बी” टीम तथा “बेशर्म Political Correctness” की ओर बढ़ रही, “भाजपा” का कोई अन्य सशक्त विकल्प खोजना शुरु करना पड़ेगा…क्योंकि दो-दो लोकसभा चुनावों में हार का मुँह देखने के बावजूद, न तो भाजपा ने बरेली दंगा मुद्दे पर कोई आंदोलन-घेराव-प्रदर्शन किया, न ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुसलमानों को 4% आरक्षण दिये जाने का पुरजोर ढंग से विरोध किया है… जब तक भाजपा इस दुविधा में फ़ँसी रहेगी, ऐसे ही पिटती रहेगी…, और फ़िर अंजू गुप्ता रिज़वी हों या कम्युनिस्ट बैकग्राउण्ड वाले सुधीन्द्र कुलकर्णी हों… हिन्दुत्व को “धक्का-अडंगा मारने वाले” भी तो सैकड़ों भरे पड़े हैं…


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हाल ही में देश की “अब तक की सबसे मजबूत और होनहार राष्ट्रपति” श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने राज्यसभा के लिये पाँच सदस्यों का नामांकन किया है। जिसमें से दो प्रमुख व्यक्ति हैं मणिशंकर अय्यर और गीतकार जावेद अख्तर…। यह राष्ट्रपति का विवेकाधिकार(??) और विशेषाधिकार है कि वह अपने कोटे से किन पाँच ख्यातिप्राप्त व्यक्तियों को राज्यसभा के लिये नामांकित करे। बाकी के तीन नाम तो ध्यान आकर्षित नहीं करते क्योंकि वे जायज़ हैं उनकी उपलब्धियाँ भी चमकदार हैं, लेकिन इन दोनों महानुभावों के नाम चौंकाने वाले और निंदनीय हैं। हालांकि अब पद्म पुरस्कारों अथवा राज्यसभा सीट की न तो कोई इज्जत रह गई है, न ही कोई प्रतिष्ठा, यहाँ पर “अंधा बाँटे रेवड़ी” वाली मिसाल भी लागू नहीं की जा सकती, क्योंकि रेवड़ी बाँटने वाले अंधे-बहरे नहीं हैं, बल्कि बेहद शातिर हैं।



पहले बात करेंगे अय्यर साहब की…, जैसा कि सभी जानते हैं अय्यर साहब खुलेआम वीर सावरकर को गरिया चुके हैं… वैसे तो ये साहब बड़े विद्वान कहलाते हैं, लेकिन अंडमान निकोबार की सेल्यूलर जेल में भी इन्हें सावरकर की उपस्थिति सहन नहीं होती। ये सज्जन भी पिछले लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु में अपनी सीट पर बुरी तरह लतियाये गये और चुनाव हारे। चलो हार गये तो कोई बात नहीं, अर्जुन सिंह भी तो तीन-तीन चुनाव हारने के बावजूद सत्ता के गलियारे में अतिक्रमण किये बैठे ही रहे, अय्यर साहब भी उसी तरह राज्यसभा में घुस जाते। लेकिन मणिशंकर अय्यर साहब के इस ताज़ा मामले में पेंच यह है कि इन्हें राष्ट्रपति ने “मनोनीत” किया है। असल में राष्ट्रपति अपने विशेषाधिकार के तहत पाँच ऐसे लोगों को मनोनीत कर सकता है जिन्होंने समाज, कला, खेल, संगीत आदि क्षेत्रों में विशेष उल्लेखनीय योगदान दिया हो, जावेद अख्तर साहब को तो गीतकार होने के नाते जगह मिल गई, बाकी के तीन लोग भी अपने-अपने क्षेत्र के जाने-माने लोग हैं, लेकिन जिस रास्ते से लता मंगेशकर, दिलीप कुमार, जावेद अख्तर, या अन्य कोई कलाकार राज्यसभा में प्रवेश करते हैं, उस मनोनीत हस्तियों वाले कोटे में घुसपैठ करने के लिये अय्यर साहब की “क्वालिफ़िकेशन” क्या है? जी हाँ सही समझे आप, वह क्वालिफ़िकेशन है, हिन्दुत्व को जमकर गरियाना, सावरकर को भला-बुरा कहना और इतालवी मम्मी की चमचागिरी करना…। यहाँ देखें

लेख की सबसे पहली लाइन में मैंने श्रीमति प्रतिभा पाटिल की शान में कसीदे काढ़े हैं, उन्हीं “विशिष्ट गुणों” का पालन करते हुए जो लिस्ट उन्हें सोनिया मैडम ने थमाई थी, वही पाँच नाम उन्होंने नामांकित कर दिये, एक बार भी पलटकर नहीं पूछा कि “जब मणिशंकर अय्यर को उनके मतदाता नकार चुके हैं और तमिलनाडु में द्रमुक ने कांग्रेस को अपने हिस्से की एक राज्यसभा सीट देने का वादा भी किया है, तब कलाकारों, खिलाड़ियों, समाजसेवकों, संगीतज्ञों के लिये आरक्षित इन 5 सीटों में घुसपैठ करने की क्या जरूरत आन पड़ी थी?” लेकिन मैडम से कौन सवाल-जवाब कर सकता है (अपने आप को देश के बड़े-बड़े पत्रकारों में शुमार करवाने वाले स्टार पत्रकारों, सबसे तेज़ चैनल चलाने वालों आदि में से किसी की भी औकात नहीं है कि मैडम का एक “सही ढंग का” इंटरव्यू ले सकें), तो इस तरह अय्यर साहब को सरकार ने बड़ी बेशर्मी से “पुनर्वास पैकेज” दे दिया।




अब हम आते हैं “संयोगों की लम्बी सीरीज” पर… जावेद अख्तर साहब एक बेहतरीन गीतकार हैं और सलीम-जावेद की जोड़ी ने कई हिट फ़िल्में भी दी हैं, लेकिन जिस दिन से जावेद साहब ने गुजरात सरकार के खिलाफ़ सोहराबुद्दीन और इशरत जहाँ समेत बाकी के सभी एनकाउंटरों की जाँच की माँग को लेकर 2007 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, उसी वर्ष उन्हें साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिये पद्मभूषण मिला, और अब इन्हें राज्यसभा की सीट से भी नवाज़ा गया है। “सेकुलर्स” कहेंगे कि यह तो संयोग है, लेकिन जावेद अख्तर जैसा मामला कोई अकेला मामला नहीं है। जिस वर्ष जावेद अख्तर को पद्मभूषण दिया गया उसी साल तीस्ता जावेद सीतलवाड को भी “न्याय हेतु संघर्ष” के लिये पद्मश्री बाँटा गया। तीस्ता के NGO “सिटीज़न्स फ़ॉर पीस” का गठन 2002 के गुजरात दंगों के बाद किया गया था (और इस संस्था ने सिर्फ़ 5 साल में ही इतना बड़ा काम कर दिखाया कि तीस्ता को पद्मश्री दी जाये)… यह और बात है कि विशेष अदालत ने यह पाया कि तीस्ता जावेद ने जो शपथ-पत्र (Affidavit) लगाये थे वह फ़र्जी थे, और एक जैसी भाषा में, एक ही जगह बैठकर, एक ही व्यक्ति द्वारा भरे गये थे, लेकिन पद्मश्री फ़िर भी मिली, क्योंकि तीस्ता ने “अपना काम” बखूबी निभाया था। क्या यह भी संयोग है?



ऐसी ही एक और हस्ती हैं प्रसिद्ध नृत्यांगना मल्लिका साराभाई, जो कि अपने नृत्यकला के साथ-साथ नरेन्द्र मोदी विरोध के लिये भी जानी जाती हैं, इन मोहतरमा को भी पद्मभूषण “बाँटा” गया, सन् 2009 में इससे उत्साहित होकर और मुगालता पालकर इन्होंने लोकसभा में आडवाणी के खिलाफ़ चुनाव लड़ा, बुरी तरह हारीं, नरेन्द्र मोदी दोबारा चुनाव जीते, लेकिन इनकी ऐंठ अब तक नहीं गई। मल्लिका मैडम को पहले नृत्यकला के लिये पद्मश्री मिल चुका था, लेकिन अब मोदी-भाजपा विरोध के लिये पद्मभूषण भी मिल गया। क्या यह भी संयोग है?

एक और सज्जन हैं न्यायमूर्ति वीएन खरे, यह साहब भारत के उच्चतम न्यायालय के भूतपूर्व न्यायाधीश हैं, और गोधरा काण्ड के बाद हुए दंगों को लेकर माननीय जज साहब ने कहा था कि “गुजरात सरकार राजधर्म निभाने में पूरी तरह नाकाम रही है”, अपने रिटायरमेण्ट के बाद एक इंटरव्यू में खरे साहब ने कहा कि “गुजरात में स्टेट मशीनरी पूरी तरह विफ़ल है”, इसी के बाद तीस्ता जावेद सीतलवाड ने कई याचिकाएं दायर करवाईं। खरे साहब के कार्यकाल में ही बेस्ट बेकरी काण्ड के 21 अभियुक्तों के खिलाफ़ दोबारा केस खोला गया… अन्ततः जस्टिस वीएन खरे साहब को सामाजिक क्षेत्र में विशेष योगदान(?) के लिये 2006 में भारत का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान “पद्मविभूषण” मिल गया…(इसके बाद सिर्फ़ भारत रत्न बचा है)। शायद ये भी संयोग ही होगा…

(कुछ ऐसा ही भीषण संयोग हाल ही में केरल में देखने में आया था, इस लिंक पर देखें)
http://blog.sureshchiplunkar.com/2010/02/blog-post_21.html

कृपया अभी से नोट कर लें, अगले साल के पद्म पुरस्कारों की लिस्ट में “स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT)” के प्रमुख श्री राघवन साहब का नाम शामिल होगा। ऐसे “विशिष्ट संयोग” यूपीए सरकार के कार्यकाल में जब-तब होते ही रहे हैं… जैसे राजदीप सरदेसाई, बुर्का दत्त… सॉरी बरखा दत्त, तहलका के तरुण तेजपाल… लिस्ट लम्बी है… लेकिन जिस-जिस ने नरेन्द्र मोदी-भाजपा-संघ-हिन्दुत्व को गरियाया, परेशान किया, झूठ बोल-बोलकर, गला फ़ाड़-फ़ाड़कर अपने-अपने चैनलों, अखबारों, संस्थाओं, फ़र्जी NGOs आदि के द्वारा यह “पावन-पुनीत” कार्य किया, उसे मैडम ने कुछ न कुछ “ईनाम-इकराम” अवश्य दिया। जब से यूपीए सत्ता में आया है, तभी से यह परम्परा स्थापित करने की कोशिश की जा रही है कि नरेन्द्र मोदी और हिन्दुत्व पर कीचड़ उछालने में जो लोग सबसे अगुआ रहेंगे, उन्हें सरकार की ओर से या तो किसी पद्म पुरस्कार से नवाज़ा जायेगा, या फ़िर राज्यसभा सीट देकर पुरस्कृत किया जायेगा, यदि कोई फ़र्जी NGOs चलाते हों तो भारी अनुदान, चैनल चलाते हों तो विज्ञापन, अखबार चलाते हों तो फ़ोकट की ज़मीन और कागज़ का कोटा इत्यादि दिया जायेगा… और यह भी संयोगवश ही होगा।

हाल ही में एक और नया शिगूफ़ा आया है… “प्रशान्त” नामक NGO चलाने वाले फ़ादर फ़्रेडेरिक प्रकाश (एक और ईसाई) ने दावा किया है कि गुजरात दंगों में नरेन्द्र मोदी के शामिल होने के पक्के सबूत के रूप में वह जल्दी ही कुछ चुनिंदा “वीडियो क्लिपिंग” जारी करेंगे, इन वीडियो टेप की शूटिंग “तहलका” ने की है…।

अब कोई मूर्ख या नकली सेकुलर ही होगा, जो कि एक ईसाई फ़ादर, NGO, वीडियो टेपों के इतिहास (नित्यानन्द स्वामी, संजय जोशी जैसे) तथा तहलका, के नापाक गठजोड़ को समझ ना सके… (खबर इधर है)
http://news.rediff.com/report/2010/mar/22/ngo-claims-its-godhra-footage-proves-modis-role.htm

जिस तरह से इलेक्ट्रानिक मीडिया ने 21 मार्च को SIT के सामने मोदी के पेश होने की झूठी कहानी गढ़ी और नरेन्द्र मोदी द्वारा पत्र लिखकर दिये गये स्पष्टीकरण तक को प्रमुखता नहीं दी, इससे इनका चेहरा पिछली कई बार की तरह इस बार भी बेनकाब हो गया है। पिछले 8-10 दिनों से लगातार लगभग सभी चैनलों-अखबारों के कुछ “भाण्डनुमा”, जबकि कुछ “बोदे और भोंदू किस्म” के पत्रकारों द्वारा नरेन्द्र मोदी के खिलाफ़ लगातार विषवमन किया गया है, लेकिन बरेली के दंगों के बारे में आपको किसी चैनल या अखबार में कवरेज नहीं मिलेगा। नेहरु डायनेस्टी टीवी जब तक दिन में एक बार गुजरात और मोदी को जी भरकर कोस न ले, वहाँ काम करने वालों का खाना नहीं पचता, लेकिन जीटीवी, आज तक, NDTV या कोई अन्य चैनल हो, किसी ने बरेली जाना तो दूर, उसका कवरेज देना-दिखाना भी उचित नहीं समझा, मौलाना तौकीर रज़ा खान का नाम लेना तो बहुत दूर की बात है।

तो भाईयों-बहनों, आईपीएल की तरह एक बड़ा “ऑफ़र” खुला हुआ है – नरेन्द्र मोदी-भाजपा-संघ (या हिन्दुत्व) को गरियाओ तथा पद्म-पुरस्कार या राज्यसभा सीट पाओ…। जो लोग इस ऑफ़र में “इंटरेस्टेड” नहीं हैं, वे यह सोचें कि भारत के “बीमार”, चाटुकार और भ्रष्ट मीडिया का क्या और कैसा इलाज किया जाये? तथा कांग्रेस नामक “कैंसर” की दवा क्या हो?

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जम्मू कश्मीर सरकार जल्दी ही एक शासकीय नीति के तहत भारतीय सुरक्षा बलों, नागरिकों और दंगों के समय “पत्थर” फ़ेंकने वाले “गुमराह लड़कों”(??) के पुनर्वास के लिये नीति बना रही है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बताया कि जल्दी ही इस सम्बन्ध में विधानसभा में प्रस्ताव पेश किया जायेगा, ताकि इन “भटके हुए नौजवानों” (??) को नौकरी या रोज़गार दिया जा सके (यह खबर अब पुरानी हो चुकी है कि कश्मीर के जेहादी संगठन इन युवकों को रोज़ाना 100-200 रुपये की दिहाड़ी देते हैं, और इनका काम सिर्फ़ पत्थरबाजी करना होता है)।


(चित्र - कश्मीर में सुरक्षा बलों पर पथराव करते "मासूम" नौजवान)

इन लड़कों में से कुछेक गिरफ़्तार हैं और अधिकतर फ़रार हैं, लेकिन अमरनाथ ज़मीन मसला हो या नीलोफ़र बलात्कार मामला, अचानक ही झुण्ड के झुण्ड गलियों में से निकलकर पत्थर फ़ेंकने में ये “गुमराह लड़के” सबसे आगे रहते हैं। सोनिया “गाँधीवादी” सरकार ने दया दिखाते हुए कहा है कि, इन लड़कों को नौकरी, लोन, राहत पैकेज या ज़मीन देगी जिससे ये नवयुवक स्वरोज़गार में संलग्न हो सकें (यानी पत्थरों की फ़ैक्ट्री लगा सकेंगे)। पिछले माह इस पत्थर-फ़ेंकू गैंग द्वारा जो “गुमराह” टाइप का काम किया था, उसमें कार में बैठी एक महिला घायल हुई थी तथा उसकी गोद में 11 माह का बच्चा इनके पत्थर से मारा गया। “बाय द वे”, बरेली (बरेली इसलिये कहा क्योंकि यह सबसे ताजा मामला है) समेत देश के प्रत्येक दंगे के समय इस “पत्थर-फ़ेंकू” गिरोह के कुछ “गुमराह युवक”(?) अपनी “डिस्ट्रीब्यूटरशिप” और “फ़्रेंचाइजी” चलाते हैं… कौन कहता है भारत में करियर ऑप्शन कम हैं? दुष्यन्त भी स्वर्ग में करवटें बदल रहे होंगे यह सोचकर कि मैंने ऐसा क्यों लिखा कि “एकाध पत्थर तबियत से तो उछालो यारों…”, अब उमर अब्दुल्ला और कांग्रेस ने इसे एक “करियर ऑप्शन” बना दिया है, पत्थर फ़ेंको, पैकेज लो…।

और भाईयों-बहनों, “भटके हुए मासूम नवयुवक” तो कुछ भी कर सकते हैं, जामिया में पढ़ो, बाटला हाउस में रुको, गोलियाँ चलाओ, राहत पैकेज लो… (दिक्कत सिर्फ़ यही हुई कि शहीद मोहनचन्द्र शर्मा समझ नहीं पाये कि गुमराहों को कौन सा पैकेज देना है, सो उन्होंने बाटला हाउस में “अलग किस्म” का पैकेज दे दिया)।

बहरहाल, “भटके हुए नौजवान” ऐसी हरकत करते हैं कभी-कभी…। हाल ही में चिदम्बरम साहब और कश्मीर की सरकार ने आतंकवाद से निपटने का एक और नायाब तरीका निकाला, जिसके अनुसार पाकिस्तान की तरफ़ भाग चुके आतंकवादियों को वापस बुलाकर उन्हें घाटी में बसाने का इरादा है (यानी महात्मा गाँधी वाला हृदय परिवर्तन का फ़ण्डा)…। खैर, अब राष्ट्रीय हित में (कांग्रेस जो भी करती है राष्ट्रीय हित में ही होता है) हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम लगातार कांग्रेस को चुनते रहें और अपना टैक्स समय पर अदा करते रहें ताकि उन पैसों से कांग्रेस, नेशनल कान्फ़्रेंस और मुफ़्ती मोहम्मद बाप-बेटी जैसे लोग मिलकर कश्मीर में सबसिडी खाते रहें और हमारी छाती पर बोझा और बढ़ाते चले जायें…।  (जल्दी ही सरकार "1411 बाघ बचे हैं" की तर्ज पर विज्ञापन निकालने वाली है, "कश्मीर में कुछेक हिन्दू बचे हैं, उन्हें भगाने के लिये POK से आतंकवादी आमंत्रित हैं)

अब सारी दुनिया को पता है कि भारत जैसे महान देश में “गुमराह”, “भटके हुए” और तथाकथित “मासूम” नवयुवकों (यानी कसाब जैसे) के “पिछवाड़े” लाल-नीले करने की बजाय, उन्हें “राहत पैकेज” दिये जाते हैं, तब भी हम कुछ सीखने को तैयार नहीं हैं…। तात्पर्य यह कि हिन्दुओं को कुछ नहीं आता, न तो ये वोटिंग के समय ठीक से एकजुट हो सकते हैं, न ही ठीक से “एकजुट गुमराह” हो सकते हैं… लानत है लानत!!!

वैसे, 31 मार्च नज़दीक आ रहा है, इनकम टैक्स जरूर भर दीजियेगा… कश्मीर के राहत पैकेज में कमी नहीं आनी चाहिये… हम तो एक रोटी कम खा लेंगे, लेकिन एके-47 उठाये घूमने वाले, बम लगाने वाले और अब पत्थर फ़ेंकने वाले “मासूम” नौजवानों का पेट भरा रहे… बस!!! भई, आखिर गाँधीवाद और सहिष्णुता भी कोई चीज़ है कि नहीं… और इन सबका बाप, “सेकुलरिज़्म” तो छुट्टे सांड की तरह घूम ही रहा है पूरे देश में…

खबर का स्रोत इधर है –
http://in.news.yahoo.com/43/20100319/812/tnl-jammu-and-kashmir-government-to-reha.html


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दक्षिण भारत में फ़िलहाल एक हंगामा मचा हुआ है, नित्यानन्द स्वामी को चेन्नई पुलिस ने एक सीडी और शिकायत के आधार पर गिरफ़्तार किया है। ऐसा आरोप हैं कि नित्यानन्द स्वामी के कई महिलाओं से सम्बन्ध रहे हैं और एक तमिल अभिनेत्री के साथ उनकी अश्लील सीडी उन्हीं के आश्रम में उनके शिष्य रह चुके एक व्यक्ति ने बनाई है। यह तो हुआ मूलरूप से बना हुआ केस, लेकिन जैसा कि हमेशा होता आया है, भारतीय मीडिया ने इस कहानी में प्रारम्भ से ही “हिन्दुत्व विरोधी रंग” भरना शुरु कर दिया था।

प्रणव “जेम्स” रॉय के चैनल NDTV ने सबसे पहले नित्यानन्द स्वामी के साथ नरेन्द्र मोदी की तस्वीरें दिखाईं और चिल्ला-चिल्लाकर नरेन्द्र मोदी को इस मामले में लपेटने की कोशिश की (गुजरात के दो-दो चुनावों में बुरी तरह से जूते खाने के बाद NDTV और चमचों के पास अब यही एक रास्ता रह गया है मोदी को पछाड़ने के लिये)। लेकिन जैसे ही अगले दिन से “ट्विटर” पर स्वामी नित्यानन्द की तस्वीरें गाँधी परिवार के चहेते एसएम कृष्णा और एपीजे अब्दुल कलाम के साथ भी दिखाई दीं, तुरन्त NDTV का मोदी विरोधी सुर धीमा पड़ गया (हालांकि ढेर सारे “हिन्दू विरोधी पत्रकार” अभी भी लगे हुए हैं इसे चबाने में)। नित्यानन्द के स्टिंग ऑपरेशन मामले को सही ठहराने के लिये NDTV ने नारायणदत्त तिवारी वाले मामले का सहारा लिया और दोनों को एक ही पलड़े पर रखने की कोशिश की। जबकि तिवारी एक संवैधानिक पद पर थे, उन्होंने राजभवन और अपने पद का दुरुपयोग किया और तो और होली के दिन भी वह लड़कियों से घिरे नृत्य कर रहे थे। नित्यानन्द जो भी कर रहे थे अपने आश्रम के बेडरूम में कर रहे थे, बगैर किसी प्रलोभन या दबाव के, इसलिये इन दोनों मामलों की तुलना तो हो ही नहीं सकती। नित्यानन्द अगर दोषी है तो सजा मिलनी ही चाहिये…  (हालांकि जैसे-जैसे धागे सुलझ रहे हैं मामला संदिग्ध होता जा रहा है, क्योंकि पता चला है कि पुलिस को सीडी देकर आरोप लगाने वाला व्यक्ति “कुरुप्पन लेनिन” एक धर्म-परिवर्तित ईसाई है और यह व्यक्ति पहले एक फ़िल्म स्टूडियो में काम कर चुका है तथा "वीडियो मॉर्फ़िंग" में एक्सपर्ट है)।

अब आते हैं मुख्य मामले पर, 6M (मार्क्स, मुल्ला, मिशनरी, मैकाले, माइनो और मार्केट) के हाथों बिके हुए भारतीय मीडिया ने स्वामी नित्यानन्द को सीडी सामने आते ही तड़ से अपराधी घोषित कर दिया है, ठीक उसी तरह जिस तरह कभी संजय जोशी को किया था (हालांकि बाद में सीडी फ़र्जी पाई गई), या जिस तरह से  कांची के वयोवृद्ध शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती को तमिलनाडु की DMK सरकार ने गिरफ़्तार करके सरेआम बेइज्जत किया था। जब भी कोई हिन्दू “आईकॉन” किसी भी सच्चे-झूठे मामले में फ़ँसे तो मीडिया उन्हें “अपराधी” घोषित करने में देर नहीं करता… और इस समय किसी मानवाधिकारवादी के आगे-पीछे कहीं से भी “कानून अपना काम करेगा…” वाला सुर नहीं निकलता। जैसे ही मीडिया में आया कि मालेगाँव धमाके में पाई गई मोटरसाईकिल साध्वी प्रज्ञा की थी (जो काफ़ी पहले उन्होंने बेच दी थी), कि तड़ से “हिन्दू आतंकवाद” नामक शब्द गढ़कर हिन्दुओं पर हमले शुरु…। फ़िर चाहे जेल में कसाब और अफ़ज़ल ऐश कर रहे हों, लेकिन साध्वी प्रज्ञा को अण्डे खिलाने की कोशिश या गन्दी-गन्दी गालियाँ देना हो… महिला आयोग, नारीवादी संगठन सब कहीं दुबक कर बैठ जाते हैं, क्योंकि मीडिया ने तो पहले ही उन्हें अपराधी घोषित कर दिया है। भारत के कितने अखबारों और चैनलों ने वेटिकन और अन्य पश्चिमी देशों में चर्च की आड़ में चल रहे देह शोषण के मामलों को उजागर किया है? चलिये वेटिकन को छोड़िये, केरल में ही सैकड़ों मामले सामने आ चुके हैं कितने लोगों को पता है… और वेटिकन तो अब इस तरफ़ काफ़ी आगे बढ़ चुका है, उधर सिर्फ़ महिलाओं के ही साथ यौन शोषण नहीं होता बल्कि पुरुषों के साथ भी “गे-सेक्स” के मामले सामने आ रहे हैं… द गार्जियन की खबर पढ़िये…

http://www.guardian.co.uk/world/2010/mar/04/vatican-gay-sex-scandal

बेंगलूरु के मठ वाले नित्यानन्द दोषी हैं या नहीं यह बाद में पता चलेगा, लेकिन उनके बहाने नरेन्द्र मोदी पर हमला करने का सुख(?) प्राप्त कर लिया गया, और यदि नित्यानन्द वाकई दोषी है तो उसे फ़ाँसी की सजा मिलनी चाहिये, यह माँग करने वालों की भीड़ भी जुट गई है, परन्तु इस बात पर कोई ध्यान नहीं देना चाहता कि जिस प्रकार कांची के शंकराचार्य और उड़ीसा के स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती धर्म परिवर्तन और ईसाई एवेंजेलिस्टों के खिलाफ़ मुहिम चलाये हुए थे, ठीक वैसे ही नित्यानन्द भी धर्म परिवर्तन की राह में रोड़ा बने हुए हैं, ऊपर से वह पिछड़ी जाति से भी आते हैं, ऐसे में भला करुणानिधि कैसे उन्हें सहन कर सकते थे। अरे भाई जब करुणानिधि हिन्दुओं के प्रतिष्ठित गुरु शंकराचार्य से नहीं डरे तो नित्यानन्द किस खेत की मूली हैं? जब मीडिया मेहरबान तो गधा पहलवान। अब रही बात सीडी की, तो कम्प्यूटर तकनीक के इस आधुनिक युग में कुछ भी सम्भव है… क्योंकि ऐसी भी खबर है कि जिस समय नित्यानन्द की यह सीडी बनाई गई उन्हें खाने में कोई ड्रग दिया गया था, परन्तु हिन्दुओं पर हमले करते समय चैनल/अखबार किसी बात का तटस्थ या तथ्यपूर्ण विचार नहीं करते, सिर्फ़ अपने “6M आकाओं” के आदेश का पालन करते हैं।

लेकिन किसी ऐसे पादरी की खबर “जेम्स” रॉय का चैनल नहीं दिखायेगा, जिसने एक अल्पवयस्क लड़की के साथ ज्यादती की और उसकी हत्या करवा दी (जबकि नित्यानन्द ने रंजीता के साथ उसकी मर्जी से सम्बन्ध बनाया होगा, उसकी हत्या नहीं की)। खबरों के अनुसार कोझीकोड के नीलाम्बर स्थित एक क्रिश्चियन होस्टल की स्कूली छात्रा अनु का शव पाया गया था जिस सम्बन्ध में पथनापुरम माउंट टबोर के फ़ादर(?) केजे जोसफ़ की गिरफ़्तारी हुई है। होस्टल की सहेली के बयानों के मुताबिक अनु के साथ बलात्कार और यौन शोषण की पुष्टि हो चुकी है, उसकी मौत चूहामार दवा खाने से हुई, लेकिन पुलिस को शक है कि यह विष उसे जबरदस्ती खिलाया गया है।

http://www.keralanext.com/news/2010/03/05/article104.asp

अनु की बहन ने दो पादरियों पर उसके यौन शोषण का आरोप लगाया है, इस पर पुलिस ने कहा है कि मामले में और भी गिरफ़्तारियाँ हो सकती हैं।

अरे रे रे रे रे, क्या कहा, आपको केरल के सिस्टर अभया हत्याकाण्ड की याद आ गई? स्वाभाविक बात है। उस केस में भी तो ऐसा ही कुछ हुआ था… 1992 में सिस्टर अभया की हत्या हुई थी, उसका भी यौन शोषण हुआ था, चर्च की ताकत द्वारा मामले को दबाने और उलझाने की वजह से 18 साल बाद भी अभया के परिजनों को न्याय नहीं मिल पाया है, ज्यादा जानना चाहते हैं तो इसे पढ़िये… (क्योंकि ऐसी खबरें “जेम्स” रॉय का NDTV आपको नहीं देगा…)

http://en.wikipedia.org/wiki/Sister_Abhaya_murder_case

और इसे पढ़िये…

http://www.rediff.com/news/2008/nov/19sister-abhaya-case-kerala-two-priests-held.htm

दिल्ली की जामा मस्जिद का अतिक्रमण हटाने के हाईकोर्ट के निर्णय की धज्जियाँ देखी हैं कभी किसी चैनल पर?

http://www.encyclopedia.com/doc/1P3-1134197141.html


प्रारम्भिक सदमे के बाद नित्यानन्द स्वामी के भक्तों ने भी मोर्चा संभाल लिया है और सन टीवी के कर्ताधर्ताओं से पूछा है कि क्या सन टीवी ने यह वीडियो टेप प्रदर्शन से पहले जाँच लिया था कि यह सही है या नहीं? क्या सन टीवी ने इस टेप को लेकर पुलिस में कोई औपचारिक शिकायत दर्ज की? क्या चैनल ने कभी इस बात की पुष्टि करने की कोशिश की है कि आश्रम की जिस ज़मीन को लेकर वह हंगामा खड़ा कर रहा है, वह ज़मीन स्वामी के बंगलुरू स्थित एक भक्त ने दान में दी है? क्या चैनल ने स्वामी अथवा आश्रम के नाम पर ज़मीन के आधिकारिक रिकॉर्ड देखे हैं? वह वीडियो जिस कमरे में शूट किया गया है, वैसा कोई कमरा आश्रम में है ही नहीं, फ़िर इसकी शूटिंग कहाँ हुई? क्या वीडियो में दिखाया गया व्यक्ति स्वामी नित्यानन्द ही है? चैनलों ने सबसे पहले दिन अभिनेत्री रंजीता का चेहरा छिपा क्यों दिया था? यदि यह सब प्रायोजित नहीं था तो चैनल पर इस खबर के प्रसारित होने के 5 मिनट के अन्दर ही आक्रोशित लोगों(?) की भीड़ ने आश्रम पर हमला कैसे कर दिया? भीड़ ने हमले के दौरान आश्रम में रह रहे हिन्दू भक्तों और महिलाओं से बदतमीजी क्यों की? उल्लेखनीय है कि चैनल सन टीवी और नक्कीरन अखबार में हेडलाइन यही थी कि फ़र्जी स्वामी नित्यानन्द सेक्स स्कैण्डल में फ़ँसे, यानी इन्होंने बगैर किसी जाँच या मुकदमे के स्वामी को तुरन्त दोषी ठहरा दिया और हल्ला मचा दिया… असल में यह चाल काउण्टर बैलेंसिंग कही जाती है। पिछले एक वर्ष में अमेरिका में चर्च ने ननों के शारीरिक और मानसिक शोषण और बच्चों के साथ पादरियों के यौन मामलों में लगभग 6 करोड़ डालर का मुआवज़ा चुकाया है तथा पोप सतत देश-दर-देश उनके द्वारा नियुक्त पादरियों के कुकर्मों की माफ़ी माँगते घूम रहे हैं। इसलिये भारत में हिन्दू धर्मगुरुओं को खासकर निशाना बनाया जा रहा है ताकि बैलेंस बना रहे, लेकिन भारत का मीडिया चर्च के कुकर्मों को सामने लाने में हमेशा पीछे ही रहा है।

इस बात को काफ़ी पहले ही साबित किया जा चुका है कि जहाँ एक ओर भारत में इस्लाम का प्रसार जेहाद, जोर-जबरदस्ती और आतंक के जरिये किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर चर्च का प्रसार, चालबाजियों, दुष्प्रचार, पैसों के लालच पर धर्म-परिवर्तन और मीडिया के उपयोग द्वारा किया जा रहा है, ऐसे खतरनाक हालातों में सभी हिन्दू धर्मगुरुओं और खासकर बाबा रामदेव को अत्यधिक सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि वे तो लुटेरी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का भी भारी नुकसान कर चुके हैं और उनके निशाने पर हैं… सो आने वाले दिनों में हमें हिन्दू धर्म के अन्य प्रतीकों और धर्माचार्यों के किस्से-कहानियाँ-स्कैण्डल सुनने को मिलें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये…

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक भारत में मिशनरी संस्थाओं का सबसे अधिक ज़मीन पर कब्जा है कभी मीडिया ने हल्ला मचाया? माओवादियों और नक्सलवादियों के कैम्पों में महिला कैडर के साथ यौन शोषण और कण्डोम मिलने की खबरें कितने चैनल दिखाते हैं? लेकिन चूंकि हिन्दू धर्मगुरु के आश्रम में हादसा हुआ है तो मीडिया ऐसे सवालों को सुविधानुसार भुला देता है, और कोशिश की जाती है कि येन-केन-प्रकारेण नरेन्द्र मोदी या संघ या भाजपा का नाम इसमें जोड़ दिया जाये, या और कुछ नहीं मिले तो हिन्दू संस्कृति-परम्पराओं को ही गरिया दिया जाये। मीडिया और सेकुलरों के लगातार जारी इस दुष्प्रचार और दोगलेपन को समय-समय पर प्रकाशित और प्रचारित किया ही जाना चाहिये, जनता को बताना होगा कि ये लोग किस तरह से पक्षपाती हैं, पक्के हिन्दू-विरोधी हैं। इस काम के लिये बड़ी मात्रा में विदेशों से हवाला और NGOs के जरिये पैसा आता है (एक हम हैं जो अपने ब्लॉग पर "डोनेट" का बटन लगाये बैठे हैं फ़िर भी कोई पैसा ही नहीं देता)।

लेख का सार यह है कि नित्यानन्द जो भी है, जैसा भी है अगर दोषी पाया गया तो (कानून के मुताबिक) सजा मिलनी ही चाहिये (उसी कानून? के मुताबिक जिसने सिस्टर अभया के हत्यारों को 18 साल बचाये रखा, उसी कानून? के मुताबिक, जिसने अफ़ज़ल की फ़ाँसी अब तक रोक रखी है), लेकिन इस बहाने हिन्दुओं और सनातन धर्म को बदनाम करने की साजिश का मुँहतोड़ जवाब दिया जायेगा। मीडिया की एकतरफ़ा चालबाजियों का एक उदाहरण हाल में देखा जा चुका है जब चैनलों के बीच कृपालु महाराज को दोषी और भगोड़ा ठहराने की होड़ सी लगी थी, कृपालु महाराज चाहे जैसे भी हों अपने किये की सजा भुगतेंगे ही। लेकिन किसी चैनल ने यह पूछने की ज़हमत नहीं उठाई कि कांग्रेस द्वारा 55 साल तक राज करने के बाद, उत्तरप्रदेश से अधिकतम प्रधानमंत्री होने के बावजूद, दलितों की मसीहा मायावती और विप्र सिंह के अवतरित होने के बावजूद, वहाँ के दलित इतने गरीब क्यों हैं कि सिर्फ़ एक थाली, लड्डू और कुछ रुपयों के लिये हजारों की संख्या में जमा हो जाते हैं?

“दीवार” फ़िल्म का एक डायलॉग याद आता है, इंस्पेक्टर रवि कहता है “दूसरों के पाप गिनाने से तुम्हारे अपने पाप कम नहीं हो सकते, दूसरों के जुर्म बताने से ये सच्चाई नहीं बदल जाती कि तुम भी एक मुजरिम हो…”। जी हाँ, बिलकुल सही बात है…… लेकिन जब एक ही पक्ष (हिन्दू) के जुर्म बार-बार बताये जायेंगे, एक ही पक्ष (हिन्दू धर्म) को बार-बार प्रताड़ित किया जायेगा, हिन्दू प्रतीकों-त्योहारों-संस्कारों-संतों को बार-बार अपमानित किया जायेगा, सिर्फ़ इसलिये कि तुम्हारे पास “चैनल” और “अखबार” की ताकत है, तब हम जैसे आम आदमी ब्लॉग ही तो लिखेंगे ना… (भले ही आलोक मेहता और मृणाल पाण्डे जैसे तथाकथित बड़े पत्रकार ब्लॉग को कचरा लेखन मानते हों)… क्योंकि अभी हमारे दिमागों में ऐसे संस्कार नहीं आ पाये हैं कि “धर्म खतरे में है…” कहते ही हम पत्थर और तलवारें लेकर सड़कों पर निकल पड़ें…। हाँ, एक बात तो तय है कि मीडिया लगातार ऐसी ही हिन्दू विरोधी खबरें दिखाता रहे तो कभी न कभी ऐसे “संस्कार” भी आ आयेंगे, और फ़िर उस दिन क्या होगा, कहना मुश्किल है…

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भारत अथवा विश्व के किसी भी देश में जब भी कोई सामाजिक स्थिति सम्बन्धी अध्ययन किये जाते हैं, तब इस बात पर मुख्य जोर दिया जाता है कि विभिन्न धर्मों और जातियों में देश के विकास और अर्थव्यवस्था से होने वाले फ़ायदे बराबर पहुँच रहे हैं या नहीं। सामान्यतः यह माना जाता है कि खुली अर्थव्यवस्था और पूंजीवाद एक शिक्षित समाज में सबको बराबरी से धन कमाने का मौका देते हैं।

पूंजीवाद का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है अमेरिका। हाल ही में अमेरिका के सामान प्रशासन विभाग द्वारा अमेरिका में रहने वाले विभिन्न धर्मों और जातियों की आर्थिक स्थिति का एक लेखाजोखा पेश किया गया है। अमेरिका में बसने वाले सभी धर्मों के लोगों की वार्षिक आय का विस्तृत सर्वे है यह रिपोर्ट। इस रिपोर्ट की सबसे आश्चर्यजनक किन्तु सत्य बात (जो हमें पहले से ही पता थी) यह निकलकर सामने आई है कि अमेरिका में रहने वाले “हिन्दुओं” और यहूदियों की आमदनी, वहाँ के वार्षिक औसत आय से काफ़ी आगे हैं। अलग-अलग समूहों में हिन्दुओं ने वहाँ अपनी मेहनत, काबिलियत और दिमाग का लोहा मनवाया है, और यह बात इस सर्वे से जाहिर होती है।



इस सर्वे में हिन्दू, मुस्लिम, यहूदी, रोमन कैथोलिक, अश्वेत, बौद्ध आदि समूहों को शामिल किया गया। आधार अध्ययन के रूप में अमेरिका की वार्षिक औसत आय को पैमाना रखा गया और देखा गया कि कौन से समूह इस आधार रेखा से कितनी नीचे और कितने ऊपर हैं। एक लाख डालर वार्षिक से लेकर 30000 डालर वार्षिक तक के समूहों में वार्षिक आय को 5 समूहों में बाँटा गया। सर्वे में यह बात उभरकर सामने आई कि एक लाख डालर वार्षिक से अधिक आय रखने में यहूदी 46% तथा हिन्दू 43% हैं। जबकि 75 हजार डालर से लेकर एक लाख डालर के आय वर्ग में भी हिन्दू सबसे अधिक 22% पाये गये। यदि नीचे से शुरु किया जाये तो 30 हजार डालर से कम वाले आय वर्ग में अश्वेत ईसाई 47% और मुस्लिम 35% लेकर नीचे की दो पायदानों पर थे, जबकि हिन्दुओं में यह प्रतिशत सिर्फ़ नौ प्रतिशत है। जबकि अमेरिका का राष्ट्रीय औसत एक लाख डालर से ऊपर सिर्फ़ 18% और 30 हजार से कम आय वर्ग में 31% है। प्रस्तुत ग्राफ़ देखने पर यह स्पष्ट नज़र आता है कि यहूदी और हिन्दू सबसे अधिक धनवान या कहें कि गरीबों में भी कम गरीब हैं, जबकि अश्वेत ईसाई और मुस्लिम समुदाय पिछड़ा हुआ है।



भारत में अक्सर यह मूर्खतापूर्ण आरोप लगाया जाता है कि मुसलमानों के साथ भेदभाव किया जाता है (जबकि हकीकत इसके ठीक उलट है), लेकिन अमेरिका में जहाँ कार्य संस्कृति अव्वल, प्रतिभाशाली को उचित स्थान और पूंजीवाद तथा पैसा कमाना ही सबसे महत्वपूर्ण माना जाता हो, ऐसे देश में बाहर से आकर बसे हुए हिन्दू और यहूदी अधिक धनवान और प्रभावशाली क्यों हैं? और अश्वेत तथा मुसलमान वहाँ भी पिछड़े हुए क्यों हैं? 9/11 के बाद पिछले कुछ वर्षों को छोड़ भी दिया जाये तो अमेरिका के सामाजिक हालात कम से कम भारत जैसे तो नहीं हैं। अमेरिका में भारत जैसी कांग्रेस पार्टी नहीं है जिसने मुसलमानों को सिर्फ़ एक वोट बैंक समझा है, अमेरिका में भाजपा भी नहीं है जिसका नाम लेकर मुसलमानों को इधर डराया जाता है, अमेरिका की शिक्षा व्यवस्था भी भारत की तरह की नहीं है, फ़िर क्या कारण है कि अमेरिका के अश्वेत और मुस्लिम आर्थिक रूप से इतनी तरक्की नहीं कर पाये?

इस सर्वे के परिणामों से यह सवाल उठने भी स्वाभाविक हैं कि हिन्दुओं के प्रति विश्व के अनेक देशों के समाज में नफ़रत की भावना के कारणों में से क्या यह (आर्थिक खुशहाली) भी एक कारण है? और यदि ऐसा ही है तो अमेरिका में बाकी धर्मों के लोगों को तरक्की करने से किसने रोका है? क्या अब अमेरिका में भी सच्चर और रंगनाथ आयोग जैसी कोई व्यवस्था करनी पड़ेगी? फ़िर अमेरिका के “सबको समान अवसर वाला देश” के नारे का क्या होगा? यदि अमेरिका में सबको समान अवसर मिलते हैं तो सिर्फ़ यहूदी और हिन्दू बाकियों से काफ़ी आगे क्यों हैं, बाकी धर्मों को छोड़ दें तो स्थानीय कैथोलिक गोरे ईसाई भी इन दोनों से पीछे क्यों हैं?

बहरहाल, हिन्दुओं के लिये भले ही यह एक खुशखबरी हो लेकिन अमेरिका सहित भारत के भी समाजशास्त्रियों के लिये यह एक शोध का विषय है कि हिन्दू जिस देश में भी जाते हैं वहाँ अपनी बुद्धि, कौशल, काम के प्रति समर्पण के कारण जल्दी ही एक महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर लेते हैं और उस देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं, लेकिन हिन्दू यही काम अपने देश भारत में नहीं कर पाते… ऐसा क्यों? इसके कुछ मोटे-मोटे कारण काफ़ी लोग जानते तो हैं लेकिन खुलकर कुछ कहते नहीं… क्योंकि सच कड़वा होता है… और हमारे कथित बुद्धिजीवी, समाजशास्त्री और राजनेता मीठा बोलने के आदी हो चले हैं… भले ही इससे देश का सतत नुकसान हो रहा हो।

ऊपर दिये गये सवालों पर अपनी राय भी रखें… शायद भारत के नीति-निर्माताओं को कुछ अक्ल आये (उम्मीद तो कम है) … 
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भारत से भगोड़े और तथाकथित सेकुलर कलाकार एमएफ़ हुसैन द्वारा हिन्दू देवी-देवताओं के बने चित्रों पर बात करने से सभी पक्षों का दिल दुखता है (हिन्दूवादियों का भी और खासकर सेकुलरों का)। अतः हुसैन की देश की समस्याओं पर बनी पेण्टिंग पर बात की जाये, यहाँ सन्दर्भ है मुम्बई बम ब्लास्ट के बाद हुसैन द्वारा बनाई गई पेण्टिंग का, जो कि लन्दन आर्ट गैलरी में प्रदर्शित की गई है। हुसैन ने 26/11 के हमले पर बनाई कलाकृति को “रेप ऑफ़ इंडिया” (भारत का बलात्कार) नाम दिया है। हुसैन पहले भी “भारत माता की नग्न तस्वीर बना चुके हैं, और अब प्रकारान्तर से “भारत माता का बलात्कार” नाम भी दे चुके। (चित्र देखिये)


यदि असली-नकली सेकुलरिज़्म को एक तरफ़ रख भी दिया जाये तो क्या हुसैन की ऐसी पेंटिंग्स देशद्रोह की श्रेणी में नहीं आतीं? “रेप ऑफ़ इंडिया” पेंटिंग में हुसैन ने जानबूझकर एक औरत को ही दिखाया है (भारतवासी परम्परानुसार अपनी धरती को माँ की तरह पूजते हैं इसलिये इसलिये इस पावन धरा का नाम “भारत माता” मान लिया गया है… और जब हुसैन “रेप ऑफ़ इंडिया” लिखते हैं तो उनके दिमाग में एक औरत ही आती है)। क्या विदेशों में प्रदर्शित उस पेंटिंग में भारत को एक “बलात्कृता स्त्री” के रूप में पेश करना देशद्रोह नहीं है? भारत का अपमान नहीं है? याद नहीं आता कि जब अमेरिका पर 9/11 का हमला हुआ तो अमेरिका के किसी मुस्लिम पेण्टर ने “रेप ऑफ़ अमेरिका” के नाम से चित्र बनाया? अथवा रोज़ाना थोक के भाव में पाकिस्तान में हो रहे बम विस्फ़ोटों के बाद पाकिस्तान में रहने वाले किसी हिन्दू ने “गैंगरेप ऑफ़ पाकिस्तान” नामक फ़िल्म बनाई? फ़िर हुसैन मानसिक रूप से इतने गिरे हुए क्यों हैं? यदि भविष्य में (और हुसैन तब तक जीवित रहे) इज़राइल, कभी कतर पर हमला कर दे तो क्या हुसैन “रेप ऑफ़ कतर” नामक पेंटिंग बनायेंगे?

बहरहाल, “रेप ऑफ़ इंडिया” पेंटिंग में दो-तीन बातें ध्यान खींचने वाली हैं। इस पेंटिंग को कैनवास के दो टुकड़ों में बनाया गया है। क्या हुसैन यह दर्शाना चाहते हैं कि ऐसे हमलों से भारत टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा? (या यह उनकी दिली इच्छा है?) तस्वीर के दोनों तरफ़ से टपकता हुआ खून “हरे” रंग का है, और दोनो बैलों का रंग भी हरा है… ऐसा क्यों? आखिर इशारों-इशारों में क्या साबित करना चाहते हैं हुसैन? ऐसे भीषण हमले और मृतकों के परिवारों के मिले दर्द के बाद, हिम्मत और हौसला बढ़ाने वाली तस्वीर पेण्ट करना चाहिये या “रेप” कहकर खिल्ली उड़ाने वाली? वे कैसे बुद्धिजीवी हैं जो इस प्रकार की पेंटिंग में भी “कलाकार” की स्वतन्त्रता ढूंढते हैं? जब डेनमार्क का कार्टूनिस्ट अथवा कोई अन्य ईसाई कलाकार मोहम्मद के कार्टून अथवा काल्पनिक ग्राफ़िक्स बनाता है तो क्या वह आर्ट नहीं है? कार्टून, लोगो और ग्राफ़िक्स “कला” नहीं हैं लेकिन हुसैन की पेंटिंग “कला" है, यह दोहरा मानदण्ड क्यों?


हुसैन ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि वह हिटलर से घृणा करते हैं, और इसीलिये अपनी पेण्टिंग में उसे नंगा चित्रित किया है (देखें चित्र)। इस पेंटिंग में आइंस्टीन, महात्मा गाँधी और माओ-त्से-तुंग को पूरे कपड़े पहने दिखाया है (ठीक वैसे ही जैसे हुसैन ने फ़ातिमा और मदर टेरेसा को पूरे कपड़ों में दिखाया है), लेकिन हिटलर को नंगा चित्रित किया है (हिटलर कम से कम देशद्रोही तो नहीं था)। इसका अर्थ यह होता है कि जिससे हुसैन घृणा करते हैं उसे “नीचा दिखाने के लिये”(?) नग्न चित्र बनाते हैं। ज़ाहिर सी बात है कि सरस्वती, दुर्गा, सीता और भारत माता को नंगा चित्रित करने के पीछे यही मानसिकता है। साफ़ है कि हुसैन हिन्दू देवियों, भारत देश और यहाँ की हिन्दू संस्कृति से नफ़रत करते हैं और उसे नंगा चित्रित करने पर उन्हें “मानसिक सुख” मिलता है। शायद इसीलिये भारत में रहकर मुकदमों का सामना करने की बजाय एक इस्लामी देश की नागरिकता स्वीकार करने में भी उन्हें शर्म नहीं आई। यह साफ़-साफ़ देशद्रोह है… यदि हुसैन इतने ही गैरतमन्द हैं तो क्यों नहीं पासपोर्ट के साथ-साथ सारे सम्मान भी लौटा देते?

सवाल उठते हैं कि आखिर हुसैन कैसे व्यक्ति हैं? एमएफ़ हुसैन क्या चाहते हैं? ऐसा आभास होता है कि हुसैन यौन विकृति और “इरोटिक पीड़ा” से ग्रस्त मनोवैज्ञानिक केस है। ऐसा क्यों है कि हुसैन की अधिकतर पेंटिंग्स में जानवरों और इन्सानों का “अंतरंग सम्बन्ध” दर्शाया जाता है? क्या अब कतर में उन्हें किसी मनोवैज्ञानिक से सलाह लेना चाहिये? तरस तो आता है हमारे तथाकथित सेकुलर और कलाप्रेमी मूर्खों पर जो लाखों रुपये में इनकी पेंटिंग खरीदकर अपने ड्राइंगरूमों में सजाकर रखते हैं ताकि लोग इन्हें प्रगतिशील समझें… लानत भेजिये ऐसी प्रगतिशीलता पर…और शुक्र मनाईये कि उनकी कब्र (उनके अनुसार) "रेप" हो चुकी, और हमारे अनुसार इस पावन धरती पर नहीं बनेगी… बशर्ते कि सेकुलरों, मानवाधिकारवादियों, वामपंथियों और प्रगतिशीलों को "अब भी" हुसैन को भारत वापस लाने का दौरा न पड़ जाये…

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हाल ही में एमएफ़ हुसैन द्वारा हिन्दू देवी-देवताओं के नग्न चित्र वाले मामले में “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता”(?) के पक्षधर और “कलाकार की कला” के बारे में बहुत (कु)चर्चा हुई (कुचर्चा इसलिये क्योंकि उन चर्चाकारों की निगाह में डेनमार्क के कार्टूनिस्ट द्वारा बनाया गया रेखाचित्र “कला” की श्रेणी मे नहीं आता होगा)… बहरहाल, हाल ही में नेट-भ्रमण के दौरान एक वेबसाईट पर पैगम्बर मोहम्मद साहब का यह अश्लील चित्र दिखाई दिया। मेरी जानकारी के अनुसार यह चित्र 26 फ़रवरी के आसपास इस वेबसाईट पर अपलोड किया जा चुका है। (इससे पहले भी यह चित्र सितम्बर 2009 में एक वेबसाईट पर दिखाया जा चुका है, लेकिन आधा काटकर, जबकि साइंस ब्लॉग के नाम से चलाई जा रही साईट पर यह पूरा दिखाया गया है)। दिखाये गये विज्ञापन में बाकायदा “मोहम्मद” नाम दिया गया है तथा उनकी 23 पत्नियों और 6 वर्षीय पत्नी आयशा के बारे में लिखा गया है। समझ में नहीं आता कि ऐसा विकृत विज्ञापन बनाने के पीछे क्या मकसद है?

पहली वेबसाईट है (जिसमें चित्र आधा दिखाई दे रहा है)


और दूसरी वेबसाईट है जिसमें पूरा विज्ञापित चित्र दिख रहा है, साथ ही एक और चित्र भी दिख रहा है, जिसमें एक व्यक्ति की पगड़ी में अरबी में कुछ आयतें लिखी हैं, यह कैसी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता है?


चूंकि मेरा तकनीकी ज्ञान कम है इसलिये यह बताना मेरे लिये मुश्किल है कि यह चित्र वाकई में है या जानबूझकर शरारतपूर्ण ढंग से मुस्लिम भाईयों को उकसाने के इरादे से “डिज़ाइन” किया गया है, लेकिन इस आपत्तिजनक चित्र पर “मेड इन डेनमार्क” लिखा हुआ है तथा सेक्स खिलौना या जो कुछ भी यह है, बेहद घटिया और बेहूदा है, जिसका पुरज़ोर विरोध किया जाना चाहिये। मैं सभी पाठकों (खासकर तकनीकी और कानूनी जानकार) और मुस्लिम भाईयों से अनुरोध करता हूं कि “साइंस ब्लॉग” के नाम से चलाई जा रही इस वेबसाईट को (कम से कम भारत में) प्रतिबन्धित करवाने हेतु कदम उठायें, या फ़िर इस साईट (अथवा ब्लॉग) मालिक से ताबड़तोड़ इस आपतिजनक चित्र को हटवाने के लिये दबाव बनायें। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पक्षधर कथित “सेकुलर” लोगों से यह पूछा जाना चाहिये कि क्या यह दोनों चित्र “कलाकारी” का नमूना हैं? और क्या वे इसका समर्थन करते हैं? यदि “हाँ” तो क्यों, और “नहीं” तो क्यों नहीं? इसका जवाब उन्हें हुसैन के मामले में की गई बकवासों पर बेनकाब कर देगा।

आश्चर्य तो इस बात का भी है कि अभी तक पिछले 8-10 दिनों में भी इस चित्र (या खिलौने) या वेबसाईट या लेखक पर कोई कार्रवाई होना तो दूर, मुस्लिम जगत से कोई विरोध की आवाज़ तक नहीं उठी? मैं इन्तज़ार कर रहा था कि कोई मुस्लिम भाई विरोध करें, लेकिन अब मेरा दिल नहीं माना, इसलिये इसे अपने ब्लॉग पर जगह दे दी ताकि विरोध का एक छोटा सा प्रयास मेरी तरफ़ से भी हो… और कुछ लोग साथ आयें। धार्मिक प्रतीकों (किसी भी धर्म के हों) का मखौल उड़ाना कभी भी किसी “हिन्दू” का मकसद हो नहीं सकता, सभी लोग इसका विरोध करें।

इसी प्रकार एक और साईट है http://www.jesusandmo.net/ जिस पर जीसस और मोहम्मद नाम के दो काल्पनिक पात्रों की खिल्ली उड़ाते हुए कार्टून पेश किये जाते हैं, (और यह साईट भी किसी गैर-हिन्दू की है)। तात्पर्य यह कि पूरे विश्व में मुस्लिमों और ईसाईयों के बीच खतरनाक तरीके से युद्ध चल रहा है, लेकिन भारत में इनके “गुर्गे” हैं मीडिया मुगल और इसीलिये भारतीय मीडिया का पहला निशाना हैं “हिन्दू”। भारतीय इलेक्ट्रानिक और प्रिण्ट मीडिया का लक्ष्य है हिन्दू खत्म हो जायें, निराश हो जायें, धर्म-परिवर्तित हो जायें, हिन्दू परम्परायें और त्योहार विकृत हो जायें, हिन्दुओं का सनातन धर्म से विश्वास उठ जाये, युवा पीढ़ी नष्ट-भ्रष्ट हो जाये, भारत खण्ड-खण्ड हो जाये… तभी मीडिया को चैन आयेगा।

चलते-चलते एक बात और -

यह बात सोचने वाली है कि जब भी किसी धार्मिक आराध्य अथवा देवताओं का अपमान होता है, उसके पीछे कभी भी कोई हिन्दू कलाकार नहीं होता, क्योंकि हिन्दू धर्म की शिक्षाओं के अनुसार सभी धर्मों का आदर किया जाना चाहिये और जिस व्यक्ति की जो भी इच्छा हो, वह अपनी बुद्धि और श्रद्धा के अनुसार उस आराध्य देव को पूज सकता है। सिर्फ़ “मेरे देवता या मेरे ग्रन्थ ही सही, सच्चे और अन्तिम हैं बाकी के सब गलत हैं” यह घटिया सोच अगर बदल जाये, और यदि यह बात सभी धर्मों के लोग अपना लें तो विश्व अधिकतर समस्याएं दूर हो जायें…। बहरहाल, अभी सब मिलकर मोहम्मद साहब के इस चित्र (या विज्ञापन) का पुरज़ोर विरोध करें…
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कुछ माह पहले एप्पल कप्म्यूटर्स की नवनिर्मित इमारत को काले कपड़े से ढँक कर उसका निर्माण कार्य किया जा रहा था, चूंकि इमारत का आकार चौकोर था, इसलिये कुछ धर्मान्धों को उसमें “काबा” की शक्ल दिखाई दे गई और उन्होंने हंगामा खड़ा कर दिया था। यहाँ देखें… http://www.thepatri0t.net/2006/11/08/apples-mecca-non-sense/

आये दिन जब-तब समूचे विश्व भर में ऐसे मामले सामने आते रहते हैं जब फ़लाँ चित्र से, फ़लाँ कृत्य से, फ़लाँ डिजाइन से “मुसलमानों की भावनाएं आहत हुई हैं…” का राग सुनाई दे जाता है (क्या इनकी भावनायें इतनी कमजोर हैं कि किसी काल्पनिक बात से भी आहत हो जाती हैं?)। माना जा सकता है कि एकाध मामले में जानबूझकर शरारती तत्व इन्हें छेड़ने के लिये ऐसा करता हो, लेकिन सभी मामलों को धर्म, धार्मिक चिन्हों और भावनाओं तथा अस्मिता के साथ जोड़ देना भी ठीक नहीं है। एप्पल की बिल्डिंग (जिसे “काबा” का प्रतिरूप कहकर हंगामा किया था) तो हाल ही का उदाहरण है, लेकिन इसके पहले भी ऐसे कई मामले आ चुके हैं, जहाँ कल्पना के घोड़े दौड़ाकर किसी आकृति को इस्लाम के साथ जोड़ दिया गया हो… आईये देखें…



सन् 1997-98 की बात है, जब जूता बनाने वाली अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनी “नाईकी” को बाज़ार से अपने 8 लाख जोड़ी जूते वापस लेने को मजबूर किया गया, क्योंकि जूते पर जो अंग्रेजी शब्द Air (हवा) लिखा हुआ था, उसकी डिजाइन अरबी लिपि के शब्द “अल्लाह” से मिलती-जुलती लगती थी, जबकि कई मुस्लिम विद्वानों ने भी देखा और माना कि यह आकृति “अल्लाह” तो कतई नहीं है बल्कि साफ़-साफ़ “AIR” है, लेकिन उन्मादियों को समझाये कौन? पाकिस्तान से डॉ अहमद जमाल चौधरी ने अपनी टिप्पणी में भी कहा कि “इस आकृति का अर्थ अल्लाह के रूप में निकालना नितांत मूर्खता है, हो सकता है कि पहली नज़र में यह अरबी लिपि का अल्लाह दिखता हो, लेकिन यह साफ़ Air लिखा है, जब अरबी लिपि को दाँये से बाँये पढ़ा जाता है तब यह अल्लाह कैसे हो सकता है? लेकिन जैसा कि होता आया है विद्वानों और उदारवादियों की आवाज़ अनसुनी कर दी गई, और नाईकी को जूते वापस लेने पड़े।

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इसी प्रकार सितम्बर 2005 में एक और पढ़े-लिखे मुस्लिम राशिद अख्तर ने इंग्लैण्ड में “बर्गर किंग” नामक ब्राण्ड की आइसक्रीम के डिजाइन पर आपत्ति उठाई और कहा कि यह आकृति “अल्लाह” शब्द से मिलती है, मैं इस आइसक्रीम कोन के विज्ञापन बनाने वाले डिजाइनर को चैन से नहीं बैठने दूंगा…। जबकि उस कोन के विज्ञापन को आड़ा करके देखने पर ही अरबी लिपि के “अल्लाह” जैसा आभास होता है, लेकिन फ़िर भी हंगामा होना ही था, सो हुआ… और “धार्मिक भावनाओं का सम्मान”(?) करते हुए नाईकी कम्पनी की तरह बर्गर किंग ने लाखों की संख्या में अपने आइसक्रीम कोन और विज्ञापन बाज़ार से वापस लिये।

इसी प्रकार एक सज्जन(?) को कॉफ़ी के मशहूर ब्राण्ड “कोज़ी” (http://www.getcosi.com/) के एक कप पर कॉफ़ी से उठती भाप के लोगो को उलटा करके देखने पर भी “अल्लाह” दिखाई दे गया। आप भी देखिये…



विश्व इस्लामिक कॉन्फ़्रेंस 2006 की बैठक के दौरान एक पत्रकार ने “संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त” के लोगो में भी “अल्लाह” की आकृति देख ली (बताईये भला, ये भी कोई बात हुई, कहाँ तो मानवाधिकार का नाम और कहाँ ऐसा आपत्तिजनक लोगो?), कहने का मतलब ये है कि “अल्लाह” शब्द सर्वव्यापी है वह कहीं भी दिखाई दे सकता है, बस देखने वाली “नज़र-ए-खास” चाहिये।



सामान्यतः “कोकाकोला” कम्पनी को अमेरिकी पूंजीवाद का प्रवर्तक माना जाता है और वामपंथियों से इसकी दुश्मनी काफ़ी पुरानी है, लेकिन कोकाकोला कम्पनी के विश्वप्रसिद्ध लोगो में भी “धार्मिक भावनाएं भड़कने का सामान” ढूंढ लिया गया, कहा गया कि कोकाकोला के ब्राण्ड लोगो को आईने में उलटा करके देखने पर जो अरबी शब्द बनता है वह है “ना तो मोहम्मद है, न ही मक्का है” (कल्पना की बेहतरीन उड़ान)… आईये देखें कि कैसे…



पहले चित्र में कोकाकोला का मूल लोगो है, दूसरे चित्र में उसे आईने में उल्टा करके देखा गया और फ़िर उससे मिलते-जुलते अरबी लिपि के शब्द दिखाकर मुसलमानों से अपील की गई है कि वे पूरे विश्व में कोकाकोला के उत्पादों का बहिष्कार करें (गनीमत है कि कोकाकोला से उसका लोगो बदलने को नहीं कहा…)। यह एक शोध का विषय हो सकता है कि विश्व के कितने मुसलमानों ने कोकाकोला पीना छोड़ दिया, लेकिन आकृतियों में कुछ खास बात ढूंढने वाली निगाह के क्या कहने…। 


कहने का तात्पर्य यह है, कि ऐ ग्राफ़िक डिजाइनरों, संभल जाओ, पता नहीं किस आकृति में, किस चीज़ पर छपे, किस लोगो में… “अल्लाह” की छवि दिखाई दे जाये। कोई भी डिज़ाइन बनाने के बाद उसे आड़ा-तिरछा-उलटा-पुलटा करके, आईने के सामने रखकर, पानी में डालकर, आग में तपाकर, सभी दूर से चेक कर लेना कि कहीं गलती से भी “अल्लाह” (या कोई और इस्लामिक धार्मिक चिन्ह) न दिखाई दे जाये… वरना तगड़ी व्यावसायिक चोट हो जायेगी।

(समाजशास्त्रियों के लिये एक और शोध का विषय दे रहा हूं - भारत में रहने वाले कितने मुसलमानों को अरबी लिपि का ज्ञान है…… चलिये शुद्ध अरबी लिपि छोड़िये, शुद्ध उर्दू लिपि का ज्ञान कितने प्रतिशत मुसलमानों को है… इस पर शोध किया जाये)।

अब थोड़ा हटकर एक पैराग्राफ़ –

हाल ही में मकबूल फ़िदा हुसैन के भारत न लौटने और कतर की नागरिकता ग्रहण किये जाने पर भी काफ़ी बड़ा “वामपंथी-सेकुलर छातीकूट अभियान” चलाया गया, जबकि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पक्षधर, कला और कलाकार की भावनाओं का सम्मान करने, व्यक्तिगत आज़ादी के पहरुआ आदि होने का ढोंग करने वालों ने डेनमार्क के कार्टूनिस्ट के पक्ष में खड़े होने से इनकार कर दिया, तसलीमा नसरीन को भारत में पीटा गया तब भी मुँह नहीं खोला, सलमान रुशदी की पुस्तक तथा फ़िल्म “द विंसी कोड” पर प्रतिबन्ध लगा दिये जाने पर भी रजाई ओढ़कर सोये रहे… सारे पाखण्डी।

खैर अब ज़रा इन चित्रों को देखिये, इन चित्रों में से किसी आकृति को आड़ा-तिरछा-उलटा-पुलटा-आईना करके देखने की जरूरत नहीं है… सब कुछ साफ़ है…



यदि किसी को पता हो तो बतायें, कि इन्हें बनाने वाले कलाकार(?), पेण्टर को कितनी बार पीटा गया? ऐसे भद्दे और धार्मिक भड़काऊ उत्पाद बनाने वाली कितनी कम्पनियों में आग लगाई गई? विदेशों में कितने लोगों ने इसका बहिष्कार किया, ईसाई अथवा मुस्लिम समाज के कितने "धर्मनिरपेक्ष" प्रतिनिधियों ने इनके खिलाफ़ आवाज़ उठाई?

लेकिन फ़िर भी, नाथूराम गोडसे की पुस्तक और नाटक पर प्रतिबन्ध अवश्य होना चाहिये, तथा हिन्दू देवताओं की नंगी तस्वीरें बनाई जा सकती हैं उन तस्वीरों को बनाने वाले कलाकार को "भारत रत्न" दिलवाने के लिये लॉबिंग की जा सकती है… हिन्दू भगवानों को चप्पल, अंडरवियर आदि पर भी चित्रित किया जा सकता है, भगवान शिव को कुत्ते के रूप में दर्शाया जा सकता है… क्योंकि हिन्दू तो  *#@#*!!*  हैं (क्या खुद अपने मुँह से कहूं… आप तो जानते ही हैं कि हिन्दू "क्या" और "कैसे" हैं… और यह नतीजा है पिछले 60 साल से लगातार लगाये जा रहे सेकुलरिज़्म और गाँधीवाद के इंजेक्शनों का…………)।


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एक इस्लामिक विद्वान(?) माने जाते हैं ज़ाकिर नाईक, पूरे भारत भर में घूम-घूम कर विभिन्न मंचों से इस्लाम का प्रचार करते हैं। इनके लाखों फ़ॉलोअर हैं जो इनकी हर बात को मानते हैं, ऐसा कहा जाता है कि ज़ाकिर नाईक जो भी कहते हैं या जो उदाहरण देते हैं वह “कुर-आन” की रोशनी में ही देते हैं। अर्थात इस्लाम के बारे में या इस्लामी धारणाओं-परम्पराओं के बारे में ज़ाकिर नाईक से कोई भी सवाल किया जाये तो वह “कुर-आन” के सन्दर्भ में ही जवाब देंगे। कुछ मूर्ख लोग इन्हें “उदार इस्लामिक” व्यक्ति भी मानते हैं, इन्हें पूरे भारत में खुलेआम कुछ भी कहने का अधिकार प्राप्त है क्योंकि यह सेकुलर देश है, लेकिन नीचे दिये गये दो वीडियो देखिये जिसमें यह आदमी “धर्म परिवर्तन” और “अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकार” के सवाल पर इस्लाम की व्याख्या किस तरह कर रहा है…

पहले वीडियो में उदारवादी(?) ज़ाकिर नाईक साहब फ़रमाते हैं कि यदि कोई व्यक्ति मुस्लिम से गैर-मुस्लिम बन जाता है तो उसकी सज़ा मौत है, यहाँ तक कि इस्लाम में आने के बाद वापस जाने की सजा भी मौत है…नाईक साहब फ़रमाते हैं कि चूंकि यह एक प्रकार की “गद्दारी” है इसलिये जैसे किसी देश के किसी व्यक्ति को अपने राज़ दूसरे देश को देने की सजा मौत होती है वही सजा इस्लाम से गैर-इस्लाम अपनाने पर होती है… है न कुतर्क की इन्तेहा… (अब ज़ाहिर है कि ज़ाकिर नाईक वेदों और कुर-आन के तथाकथित ज्ञाता हैं इसका मतलब कुर-आन में भी ऐसा ही लिखा होगा)। इसका एक मतलब यह भी है कि इस्लाम में “आना” वन-वे ट्रैफ़िक है, कोई इस्लाम में आ तो सकता है, लेकिन जा नहीं सकता (इसी से मिलता-जुलता कथन फ़िल्मों में मुम्बई का अण्डरवर्ल्ड माफ़िया भी दोहराता है), तो इससे क्या समझा जाये? सोचिये कि इस कथन और व्याख्या से कोई गैर-इस्लामी व्यक्ति क्या समझे? और जब कुर-आन की ऐसी व्याख्या मदरसे में पढ़ा(?) कोई मंदबुद्धि व्यक्ति सुनेगा तो वह कैसे “रिएक्ट” करेगा?




अब इसे कश्मीर के रजनीश मामले और कोलकाता के रिज़वान मामले से जोड़कर देखिये… दिमाग हिल जायेगा, क्योंकि ऐसा संदेह भी व्यक्त किया जा रहा है कि लक्स कोज़ी वाले अशोक तोड़ी ने रिज़वान को इस्लाम छोड़ने के लिये लगभग राजी कर लिया था, फ़िर संदेहास्पद तरीके से उसकी लाश पटरियों पर पाई गई और अब मामला न्यायालय में है, इसी तरह कश्मीर में रजनीश की थाने में हत्या कर दी गई, उसके द्वारा शादी करके लाई गई मुस्लिम लड़की अमीना को उसके घरवाले जम्मू से अपहरण करके श्रीनगर ले जा चुके… और उमर अब्दुल्ला जाँच का आश्वासन दे रहे हैं। यानी कि शरीयत के मुताबिक नाबालिग हिन्दू लड़की भी भगाई जा सकती है, लेकिन पढ़ी-लिखी वयस्क मुस्लिम लड़की किसी हिन्दू से शादी नहीं कर सकती। तात्पर्य यह है कि जब इस्लाम के तथाकथित विद्वान ज़ाकिर नाईक जब कुतर्कों के सहारे कुर-आन की मनमानी व्याख्या करते फ़िरते हैं तब “सेकुलर” सरकारें सोती क्यों रहती हैं? वामपंथी बगलें क्यों झाँकते रहते हैं? अब एक दूसरा वीडियो भी देखिये…





इस वीडियो में ज़ाकिर नाईक साहब फ़रमाते हैं कि मुस्लिम देशों में किसी अन्य धर्मांवलम्बी को किसी प्रकार के मानवाधिकार प्राप्त नहीं होने चाहिये, यहाँ तक कि किसी अन्य धर्म के पूजा स्थल भी नहीं बनाये जा सकते, सऊदी अरब और “etc.” का उदाहरण देते हुए वे कुतर्क देते रहते हैं, अपने सपनों में रमे हुए ज़ाकिर नाईक लगातार दोहराते हैं कि इस्लाम ही एकमात्र धर्म है, बाकी सब बेकार हैं, और मजे की बात यह कि फ़िर भी “कुर-आन” की टेक नहीं छोड़ते। ज़ाकिर नाईक के अनुसार मुस्लिम लोग तो किसी भी देश में मस्जिदें बना सकते हैं लेकिन इस्लामिक देश में चर्च या मन्दिर नहीं चलेगा। यदि कुर-आन में यही सब लिखा है तो समझ नहीं आता कि फ़िर काहे “शान्ति का धर्म” वाला राग अलापते रहते हैं? और जो भी मुठ्ठी भर शान्तिप्रिय समझदार मुसलमान हैं वह ऐसे “विद्वान”(?) का विरोध क्यों नहीं करते? वीडियो को पूरा सुनिये और सोचिये कि ज़ाकिर नाईक और तालिबान में कोई फ़र्क नज़र आता है आपको?

पाकिस्तान और अन्य इस्लामिक देशों से लगातार खबरें आती हैं कि वहाँ अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते हैं, मलेशिया में हिन्दुओं पर ज़ुल्म होते हैं, पाकिस्तान में हिन्दू जनसंख्या घटते-घटते 2 प्रतिशत रह गई है, हिन्दू परिवारों की लड़कियों को जबरन उठा लिया जाता है और इन परिवारों से जज़िया वसूल किया जाता है और हाल ही में पाकिस्तान में तालिबान द्वारा दो सिखों के सर कलम कर दिये गये, क्योंकि उन्होंने इस्लाम कबूल करने से मना कर दिया था, ऐसा लगता है कि यह सब ज़ाकिर नाईक की शिक्षा और व्याख्यानों का असर है। ऐसे में भारतीय मुसलमानों द्वारा ऐसी घटनाओं की कड़ी निंदा तो दूर, इसके विरोध में दबी सी आवाज़ भी नहीं उठाई जाती, ऐसा क्यों होता है? लेकिन ज़ाकिर नाईक जैसे “समाज-सुधारक” और “व्याख्याता” मौजूद हों तब तो हो चुका उद्धार किसी समाज का…। बढ़ते प्रभाव (या दुष्प्रभाव) की वजह से आम लोगों को लगने लगा है कि सचमुच कहीं इस्लाम वैसा ही तो नहीं, जैसा अमेरिका, ब्रिटेन अथवा इज़राइल सारी दुनिया को समझाने की कोशिश कर रहे हैं… और पाकिस्तान, लीबिया, सोमालिया, जैसे देश उसे अमलीजामा पहनाकर दिखा भी रहे हैं…


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मार्केटिंग मैनेजमेण्ट के कुछ खास सिद्धान्त होते हैं, जिनके द्वारा जब किसी प्रोडक्ट की लॉंचिंग की जाती है तब उन्हें आजमाया जाता है। ऐसा ही एक प्रोडक्ट भारत की आम जनता के माथे पर थोपने की लगभग सफ़ल कोशिश हुई है। मार्केटिंग के बड़े-बड़े गुरुओं और दिग्विजय सिंह जैसे घाघ और चतुर नेताओं की देखरेख में इस प्रोडक्ट यानी राहुल गाँधी की मार्केटिंग की गई है, और की जा रही है। जब मार्केट में प्रोडक्ट उतारा जा रहा हो, (तथा उसकी गुणवत्ता पर खुद बनाने वाले को ही शक हो) तब मार्केटिंग और भी आक्रामक तरीके से की जाती है, बड़ी लागत में पैसा, श्रम और मानव संसाधन लगाया जाता है, ताकि घटिया से घटिया प्रोडक्ट भी, कम से कम लॉंचिंग के साथ कुछ समय के लिये मार्केट में जम जाये। (मार्केटिंग की इस रणनीति का एक उदाहरण हम “माय नेम इज़ खान” फ़िल्म के पहले भी देख चुके हैं, जिसके द्वारा एक घटिया फ़िल्म को शुरुआती तीन दिनों की ओपनिंग अच्छी मिली)। सरल भाषा में इसे कहें तो “बाज़ार में माहौल बनाना”, उस प्रोडक्ट के प्रति इतनी उत्सुकता पैदा कर देना कि ग्राहक के मन में उस प्रोडक्ट के प्रति लालच का भाव पैदा हो जाये। ग्राहक के चारों ओर ऐसा वातावरण तैयार करना कि उसे लगने लगे कि यदि मैंने यह प्रोडक्ट नहीं खरीदा तो मेरा जीवन बेकार है। हिन्दुस्तान लीवर हो या पेप्सी-कोक सभी बड़ी कम्पनियाँ इसी मार्केटिंग के फ़ण्डे को अपने प्रोडक्ट लॉंच करते समय अपनाती हैं। ग्राहक सदा से मूर्ख बनता रहा है और बनता रहेगा, ऐसा ही कुछ राहुल गाँधी के मामले में भी होने वाला है।

राहुल बाबा को देश का भविष्य बताया जा रहा है, राहुल बाबा युवाओं की आशाओं का एकमात्र केन्द्र हैं, राहुल बाबा देश की तकदीर बदल देंगे, राहुल बाबा यूं हैं, राहुल बाबा त्यूं हैं… हमारे मानसिक कंगाल इलेक्ट्रानिक मीडिया का कहना है कि राहुल बाबा जब भी प्रधानमंत्री बनेंगे (या अपने माता जी की तरह न भी बनें तब भी) देश में रामराज्य आ जायेगा, अब रामराज्य का तो पता नहीं, रोम-राज्य अवश्य आ चुका है (उदाहरण – उड़ीसा के कन्धमाल में यूरोपीय यूनियन के चर्च प्रतिनिधियों का दौरा)।

जब से मनमोहन सिंह दूसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं और राहुल बाबा ने अपनी माँ के श्रीचरणों का अनुसरण करते हुए मंत्री पद का त्याग किया है तभी से कांग्रेस के मीडिया मैनेजरों और “धृतराष्ट्र और दुर्योधन के मिलेजुले रूप” टाइप के मीडिया ने मिलकर राहुल बाबा की ऐसी छवि निर्माण करने का “नकली अभियान” चलाया है जिसमें जनता स्वतः बहती चली जा रही है। दुर्भाग्य यह है कि जैसे-जैसे राहुल की कथित लोकप्रियता बढ़ रही है, महंगाई भी उससे दोगुनी रफ़्तार से ऊपर की ओर जा रही है, गरीबी भी बढ़ रही है, बेरोज़गारी, कुपोषण, स्विस बैंकों में पैसा, काला धन, किसानों की आत्महत्या… सब कुछ बढ़ रहा है, ऐसे महान हैं हमारे राहुल बाबा उर्फ़ “युवराज” जो आज नहीं तो कल हमारी छाती पर बोझ बनकर ही रहेंगे, चाहे कुछ भी कर लो।

मजे की बात ये है कि राहुल बाबा सिर्फ़ युवाओं से मिलते हैं, और वह भी किसी विश्वविद्यालय के कैम्पस में, जहाँ लड़कियाँ उन्हें देख-देखकर, छू-छूकर हाय, उह, आउच, वाओ आदि चीखती हैं, और राहुल बाबा (बकौल सुब्रह्मण्यम स्वामी – राहुल खुद किसी विश्वविद्यालय से पढ़ाई अधूरी छोड़कर भागे हैं और जिनकी शिक्षा-दीक्षा का रिकॉर्ड अभी संदेह के घेरे में है) किसी बड़े से सभागार में तमाम पढे-लिखे और उच्च समझ वाले प्रोफ़ेसरों(?) की क्लास लेते हैं। खुद को विवेकानन्द का अवतार समझते हुए वे युवाओं को देशहित की बात बताते हैं, और देशहित से उनका मतलब होता है NSUI से जुड़ना। जनसेवा या समाजसेवा (या जो कुछ भी वे कर रहे हैं) का मतलब उनके लिये कॉलेजों में जाकर हमारे टैक्स के पैसों पर पिकनिक मनाना भर है। किसी भी महत्वपूर्ण मुद्दे पर आज तक राहुल बाबा ने कोई स्पष्ट राय नहीं रखी है, उनके सामान्य ज्ञान की पोल तो सरेआम दो-चार बार खुल चुकी है, शायद इसीलिये वे चलते-चलते हवाई बातें करते हैं। वस्तुओं की कीमतों में आग लगी हो, तेलंगाना सुलग रहा हो, पर्यावरण के मुद्दे पर पचौरी चूना लगाये जा रहे हों, मंदी में लाखों नौकरियाँ जा रही हों, चीन हमारी इंच-इंच ज़मीन हड़पता जा रहा हो, उनके चहेते उमर अब्दुल्ला के शासन में थाने में रजनीश की हत्या कर दी गई हो… ऐसे हजारों मुद्दे हैं जिन पर कोई ठोस बयान, कोई कदम उठाना, अपनी मम्मी या मनमोहन अंकल से कहकर किसी नीति में बदलाव करना तो दूर रहा… “राजकुमार” फ़ोटो सेशन के लिये मिट्टी की तगारी उठाये मुस्करा रहे हैं, कैम्पसों में जाकर कांग्रेस का प्रचार कर रहे हैं, विदर्भ में किसान भले मर रहे हों, ये साहब दलित की झोंपड़ी में नौटंकी जारी रखे हुए हैं… और मीडिया उन्हें ऐसे “फ़ॉलो” कर रहा है मानो साक्षात महात्मा गाँधी स्वर्ग (या नर्क) से उतरकर भारत का बेड़ा पार लगाने आन खड़े हुए हैं। यदि राहुल को विश्वविद्यालय से इतना ही प्रेम है तो वे तेलंगाना के उस्मानिया विश्वविद्यालय क्यो नहीं जाते? जहाँ रोज-ब-रोज़ छात्र पुलिस द्वारा पीटे जा रहे हैं या फ़िर वे JNU कैम्पस से चलाये जा रहे वामपंथी कुचक्रों का जवाब देने उधर क्यों नहीं जाते? लेकिन राहुल बाबा जायेंगे आजमगढ़ के विश्वविद्यालय में, जहाँ उनके ज्ञान की पोल भी नहीं खुलेगी और वोटों की खेती भी लहलहायेगी। अपने पहले 5 साल के सांसद कार्यकाल में लोकसभा में सिर्फ़ एक बार मुँह खोलने वाले राजकुमार, देश की समस्याओं को कैसे और कितना समझेंगे?

कहा जाता है कि राहुल बाबा युवाओं से संवाद स्थापित कर रहे हैं? अच्छा? संवाद स्थापित करके अब तक उन्होंने युवाओं की कितनी समस्याओं को सुलझाया है? या प्रधानमंत्री बनने के बाद ही कौन सा गज़ब ढाने वाले हैं? जब उनके पिताजी कहते थे कि दिल्ली से चला हुआ एक रुपया गरीबों तक आते-आते पन्द्रह पैसा रह जाता है, तो गरीब सोचता था कि ये “सुदर्शन व्यक्ति” हमारे लिये कुछ करेंगे, लेकिन दूसरे सुदर्शन युवराज तो अब एक कदम आगे बढ़कर कहते हैं कि गरीबों तक आते-आते सिर्फ़ पाँच पैसा रह जाता है। यही बात तो जनता जानना चाहती है, कि राहुल बाबा ये बतायें कि 15 पैसे से 5 पैसे बचने तक उन्होंने क्या किया है, कितने भ्रष्टाचारियों को बेनकाब किया है? भ्रष्ट जज दिनाकरण के महाभियोग प्रस्ताव पर एक भी कांग्रेसी सांसद हस्ताक्षर नहीं करता, लेकिन राहुल बाबा ने कभी इस बारे में एक शब्द भी कहा? “नरेगा” का ढोल पीटते नहीं थकते, लेकिन क्या राजकुमार को यह पता भी है कि अरबों का घालमेल और भ्रष्टाचार इसमें चल रहा है? हाल के पंचायत चुनाव में अकेले मध्यप्रदेश में ही सरपंच का चुनाव लड़ने के लिये ग्रामीण दबंगों ने 1 करोड़ रुपये तक खर्च किये हैं (और ये हाल तब हैं जब मप्र में भाजपा की सरकार है, सोचिये कांग्रेसी राज्यों में “नरेगा” कितना कमाता होगा…), क्योंकि उन्हें पता है कि अगले पाँच साल में “नरेगा” उन्हें मालामाल कर देगा… कभी युवराज के मुँह से इस बारे में भी सुना नहीं गया। अक्सर कांग्रेसी हलकों में एक सवाल पूछा जाता है कि मुम्बई हमले के समय ठाकरे परिवार क्या कर रहा था, आप खुद ही देख लीजिये कि राहुल बाबा भी उस समय एक फ़ार्म हाउस पर पार्टी में व्यस्त थे… और वहाँ से देर सुबह लौटे थे… जबकि दिल्ली के सत्ता गलियारे में रात दस बजे ही हड़कम्प मच चुका था, लेकिन पार्टी जरूरी थी… उसे कैसे छोड़ा जा सकता था।



अरे राहुल भैया, आप शक्कर के दाम तक तो कम नहीं करवा सकते हो, फ़िर काहे देश भर में घूम-घूम कर गरीबों के ज़ख्मों पर नमक मल रहे हो? लेकिन यहाँ फ़िर वही मार्केटिंग का फ़ण्डा काम आता है कि प्रोडक्ट की कमियाँ ढँक कर रखो, उस प्रोडक्ट के “साइड इफ़ेक्ट” के बारे में जनता को मत बताओ, और यह काम करने के लिये टाइम्स ऑफ़ इंडिया, NDTV, द हिन्दू से लेकर तमाम बड़े-बड़े अखबारी-मीडिया-टीवी घराने (जिन्हें आजकल जनता “भाण्ड-गवैया” समझती है) लगे हुए हैं… लेकिन यह लोग एक बात भूल रहे हैं कि किसी प्रोडक्ट से अत्यधिक आशायें जगा देना भी बेहद खतरनाक होता है, क्योंकि जब वह प्रोडक्ट जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता तब हालात और बिगड़ जाते हैं। यदि प्रोडक्ट कोई निर्जीव पदार्थ हो तो ज्यादा से ज्यादा उस कम्पनी को नुकसान होगा, लेकिन राहुल गाँधी नामक नकली प्रोडक्ट जब फ़ेल होगा, तब सामाजिक स्तर पर क्या-क्या और कैसा नुकसान होगा…

जाते-जाते : ईमानदारी से बताईयेगा कि उड़ीसा में चर्च के प्रतिनिधियों के दौरे वाली शर्मनाक खबर के बारे में आपने पुण्यप्रसून वाजपेयी, रवीश कुमार, किशोर अजवाणी, विनोद दुआ, पंकज पचौरी, प्रणय “जेम्स” रॉय, राजदीप सरदेसाई, दिबांग आदि जैसे तथाकथित स्टार पत्रकारों से कोई “बड़ी खबर”, या कोई “सबसे तेज़” खबर, या कोई परिचर्चा, कोई “सामना”, कोई “मुकाबला”, कोई “सीधी बात”, कोई “हम लोग” जैसा कितनी बार सुना-देखा है? मेरा दावा है कि इस मुद्दे को दरी के नीचे खिसकाने में मीडिया ने अहम भूमिका निभाई है, और यह ऐसा कोई पहला मामला भी नहीं है, मीडिया हमेशा से ऐसा करता रहा है, और जब कहा जाता है कि मीडिया “पैसे के भूखे लोगों का शिकारी झुण्ड” है तो कुछ लोगों को मिर्ची लग जाती है। यही मीडिया परिवार विशेष का चमचा है, सम्प्रदाय विशेष का दुश्मन है, पार्टी विशेष के प्रति प्रेम भावना से आसक्त है…

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युवाओं से अनुरोध है कि इस लेख को अपने “राहुल भक्त” मित्रों को ट्वीट करें, ऑरकुट करें, फ़ॉरवर्ड करें… ताकि वे भी तो जान सकें कि जिस प्रोडक्ट को मार्केटिंग के जरिये उनके माथे पर ठेला जा रहा है, वह प्रोडक्ट कैसा है…


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