Poor Brahmins Social Justice and Reservation
केन्द्र सरकार के उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मुहर लगा दी है। अब कांग्रेस सहित सभी राजनैतिक दल अपनी-अपनी रोटियाँ नये सिरे से सेंक सकेंगे। निर्णय आये को अभी दो-चार दिन भी नहीं हुए हैं, लेकिन तमाम चैनलों और अखबारों में नेताओं और पिछड़े वर्ग के रहनुमाओं द्वारा “क्रीमी लेयर” को आरक्षण से बाहर रखने पर चिल्लाचोट मचना शुरु हो गई है। निजी शिक्षण संस्थाओं में भी आरक्षण लागू करवाने का इशारा “ओबीसी के मसीहा” अर्जुनसिंह पहले ही दे चुके हैं, पासवान और मायावती पहले ही प्रायवेट कम्पनियों में 33% प्रतिशत आरक्षण की माँग कर चुके हैं। यानी कि सभी को अधिक से अधिक हिस्सेदारी चाहिये। इस सारे “तमाशे” में एक वर्ग सबसे दूर उपेक्षित सा खड़ा है, वह है निम्न और मध्यम वर्ग के ब्राह्मणों का, जिसके बारे में न तो कोई बात कर रहा है, न ही कोई उससे पूछ रहा है कि उसकी क्या गलती है। स्वयंभू पत्रकार और जे-एन-यू के कथित विद्वान लगातार आँकड़े परोस रहे हैं कि सरकारी नौकरियों में कितने प्रतिशत ब्राह्मण हैं, कितने प्रतिशत दलित है, कितने मुसलमान हैं आदि-आदि। न तो गुणवत्ता की बात हो रही है, न ही अन्याय की। यह “बदला” लिया ही इसलिये जा रहा है कि हमारे पूर्वजों ने कभी अत्याचार किये थे। जाहिर है कि परदादा के कर्मों का फ़ल परपोते को भुगतना पड़ रहा है, “सामाजिक न्याय” के नाम पर।

आँकड़े ही परोसने हैं तो मैं भी बता सकता हूँ कि सिर्फ़ दिल्ली मे कम से कम 50 सुलभ शौचालय हैं, जिनका “मेंटेनेंस” और सफ़ाई का काम ब्राह्मण कर रहे हैं। एक-एक शौचालय में 6-6 ब्राह्मणों को रोजगार मिला हुआ है, ये लोग उत्तरप्रदेश के उन गाँवों से आये हैं जहाँ की दलित आबादी 65-70% है। दिल्ली के पटेल नगर चौराहे पर खड़े रिक्शे वालों में से अधिकतर ब्राह्मण हैं। तमिलनाडु में आरक्षण लगभग 70% तक पहुँच जाने के कारण ज्यादातर ब्राह्मण तमिलनाडु से पलायन कर चुके हैं। उप्र और बिहार की कुल 600 सीटों में से सिर्फ़ चुनिंदा (5 से 10) विधायक ही ब्राह्मण हैं, बाकी पर यादवों और दलितों का कब्जा है। कश्मीर से चार लाख पंडितों को खदेड़ा जा चुका है, कई की हत्या की गई और आज हजारों अपने ही देश में शरणार्थी बने हुए हैं, लेकिन उन्हें कोई नहीं पूछ रहा। अधिकतर राज्यों में ब्राह्मणों की 40-45% आबादी गरीबी की रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रही है। तमिलनाडु और कर्नाटक में मंदिरों में पुजारी की तनख्वाह आज भी सिर्फ़ 300 रुपये है, जबकि मन्दिर के स्टाफ़ का वेतन 2500 रुपये है। भारत सरकार लगभग एक हजार करोड़ रुपये मस्जिदों में इमामों को वजीफ़े देती है और लगभग 200 करोड़ की सब्सिडी हज के लिये अलग से, लेकिन उसके पास गरीब ब्राह्मणों के लिये कुछ नहीं है। कर्नाटक सरकार द्वारा विधानसभा में रखे गये आँकड़ों के मुताबिक राज्य के ईसाईयों की औसत मासिक आमदनी है 1562/-, मुसलमानों की 794/-, वोक्कालिगा समुदाय की 914/-, अनुसूचित जाति की 680/- रुपये जबकि ब्राह्मणों की सिर्फ़ 537/- रुपये मासिक। असल समस्या यह है कि दलित, ओबीसी और मुसलमान के वोट मिलाकर कोई भी राजनैतिक पार्टी आराम से सत्ता में आ सकती है, फ़िर क्यों कोई ब्राह्मणों की फ़िक्र करने लगा, और जब भी “प्रतिभा” के साथ अन्याय की बात की जाती है, तो देश जाये भाड़ में, हमारी अपनी जाति का भला कैसे हो यह देखा जायेगा।



आने वाले दिनों में “नेता” क्या करेंगे इसका एक अनुमान :
इस बात में मुझे कोई शंका नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अब माल कूटने के लिये और अपने चमचों और रिश्तेदारों को भरने के लिये “क्रीमी लेयर” को नये सिरे से परिभाषित किया जायेगा। सभी ओबीसी सांसदों और विधायकों को “गरीब” मान लिया जायेगा, सभी ओबीसी प्रशासनिक अफ़सरों, बैंक अधिकारियों, अन्य शासकीय कर्मचारियों, बैंक अधिकारी, डॉक्टर आदि सभी को “गरीब” या “अतिगरीब” मान लिया जायेगा, और जो सचमुच गरीब ओबीसी छात्र हैं वे मुँह तकते रह जायेंगे। फ़िर अगला कदम होगा निजी / प्रायवेट कॉलेजों और शिक्षण संस्थाओं की बाँहें मरोड़कर उनसे आरक्षण लागू करवाने की (जाहिर है कि वहाँ भी मोटी फ़ीस के कारण पैसे वाले ओबीसी ही घुस पायेंगे)।

एकाध-दो वर्षों या अगले चुनाव आने तक सरकारों का अगला कदम होगा निजी कम्पनियों में भी आरक्षण देने का। उद्योगपति को अपना फ़ायदा देखना है, वह सरकार से करों में छूट हासिल करेगा, “सेज” के नाम पर जमीन हथियायेगा और खुशी-खुशी 30% “अनप्रोडक्टिव” लोगों को नौकरी पर रख लेगा, इस सारी प्रक्रिया में “पेट पर लात” पड़ेगी फ़िर से गरीब ब्राह्मण के ही। सरकारों ने यह मान लिया है कि कोई ब्राह्मण है तो वह अमीर ही होगा। न तो उसे परीक्षा फ़ीस में कोई रियायत मिलेगी, न “एज लिमिट” में कोई छूट होगी, न ही किसी प्रकार के मुफ़्त कोर्स उपलब्ध करवाये जायेंगे, न ही कोई छात्रवृत्ति प्रदान की जायेगी। सुप्रीम कोर्ट के नतीजों को लात मारने की कांग्रेस की पुरानी आदत है (रामास्वामी केस हो या शाहबानो केस), इसलिये इस फ़ैसले पर खुश न हों, “वे” लोग इसे भी अपने पक्ष में करने के लिये कानून बदल देंगे, परिभाषायें बदल देंगे, ओबीसी लिस्ट कम करना तो दूर, बढ़ा भी देंगे…

बहरहाल, अब जून-जुलाई का महीना नजदीक आ रहा है, विभिन्न परीक्षाओं के नतीजे और एडमिशन चालू होंगे। वह वक्त हजारों युवाओं के सपने टूटने का मौसम होगा, ये युवक 90-95 प्रतिशत अंक लाकर भी सिर्फ़ इसलिये अपना मनपसन्द विषय नहीं चुन पायेंगे, क्योंकि उन्हें “सामाजिक न्याय” नाम का धर्म पूरा करना है। वे खुली आँखों से अपने साथ अन्याय होते देख सकेंगे, वे सरेआम देख सकेंगे कि 90% अंक लाने के बावजूद वह प्रतिभाशाली कॉलेज के गेट के बाहर खड़ा है और उसका “दोस्त” 50-60% अंक लाकर भी उससे आगे जा रहा है। जो पैसे वाला होगा वह अपने बेटे के लिये कुछ ज्यादा पैसा देकर इंजीनियरिंग/ डॉक्टरी की सीट खरीद लेगा, कुछ सीटें “NRI” हथिया ले जायेंगे, वह कुछ नहीं कर पायेगा सिवाय घुट-घुटकर जीने के, अपने से कमतर अंक और प्रतिभा वाले को नौकरी पाते देखने के, और “पढ़े फ़ारसी बेचे तेल” कहावत को सच होता पाने के लिये। जाहिर है कि सीटें कम हैं, प्रतिभा का विस्फ़ोट ज्यादा है और जो लोग साठ सालों में प्राथमिक शिक्षा का स्तर तक नहीं सुधार पाये, जनसंख्या नियन्त्रित नहीं कर पाये, भ्रष्टाचार नहीं रोक पाये, वे लोग आपको “सामाजिक न्याय”, “अफ़र्मेटिव एक्शन” आदि के उपदेश देंगे और झेड श्रेणी की सुरक्षा के नाम पर लाखों रुपये खर्च करते रहेंगे…
(भाग–2 में जारी… आरक्षण नामक दुश्मन से निपटने हेतु कुछ सुझाव…)

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Third Front Communist Inflation Rate
माकपा के हालिया सम्मेलन में प्रकाश करात साहब ने दो चार बातें फ़रमाईं, कि “हम भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिये कुछ भी करेंगे”, कि “तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिशे जारी हैं”, कि “हम बढती महंगाई से चिन्तित हैं”, कि “यूपीए सरकार गरीबों के लिये ठीक से काम नहीं कर रही”, कि ब्ला-ब्ला-ब्ला-ब्ला… उधर भाकपा ने पुनः बर्धन साहब को महासचिव चुन लिया है, और उठते ही उन्होने कहा कि “हम महंगाई के खिलाफ़ देशव्यापी प्रदर्शन करने जा रहे हैं…”

गत 5 वर्षों में सर्वाधिक बार अपनी विश्वसनीयता खोने वाले ये ढोंगी वामपंथी पता नहीं किसे बेवकूफ़ बनाने के लिये इस प्रकार की बकवास करते रहते हैं। क्या महंगाई अचानक एक महीने में बढ़ गई है? क्या दालों और तेल आदि के भाव पिछले एक साल से लगातार नहीं बढ़ रहे? क्या कांग्रेस अचानक ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की खैरख्वाह बन गई है? जिस “कॉमन मिनिमम प्रोग्राम” का ढोल वे लगातार पीटते रहते हैं, उसका उल्लंघन कांग्रेस ने न जाने कितनी बार कर लिया है, क्या लाल झंडे वालों को पता नहीं है? यदि ये सब उन्हें पता नहीं है तो या तो वे बेहद मासूम हैं, या तो वे बेहद शातिर हैं, या फ़िर वे परले दर्जे के मूर्ख हैं। भाजपा के सत्ता में आने का डर दिखाकर कांग्रेस ने वामपंथियों का जमकर शोषण किया है, और खुद वामपंथियों ने “शेर आया, शेर आया…” नाम का भाजपा का हौआ दिमाग में बिठाकर कांग्रेसी मंत्रियों को इस देश को जमकर लूटने का मौका दिया है।

अब जब आम चुनाव सिर पर आन बैठे हैं, केरल और बंगाल में इनके कर्मों का जवाब देने के लिये जनता तत्पर बैठी है, नंदीग्राम और सिंगूर के भूत इनका पीछा नहीं छोड़ रहे, तब इन्हें “तीसरा मोर्चा” नाम की बासी कढ़ी की याद आ गई है। तीसरा मोर्चा का मतलब है, “थकेले”, “हटेले”, “जातिवादी” और क्षेत्रीयतावादी नेताओं का जमावड़ा, एक भानुमति का कुनबा जिसमें कम से कम चार-पाँच प्रधानमंत्री हैं, या बनने की चाहत रखते हैं। एक बात बताइये, तीसरा मोर्चा बनाकर ये नेता क्या हासिल कर लेंगे? वामपंथियों को तो अब दोबारा 60-62 सीटें कभी नहीं मिलने वाली, फ़िर इनका नेता कौन होगा? मुलायमसिंह यादव? वे तो खुद उत्तरप्रदेश में लहूलुहान पड़े हैं। बाकी रहे अब्दुल्ला, नायडू, चौटाला, आदि की तो कोई औकात नहीं है उनके राज्य के बाहर। यानी किसी तरह यदि सभी की जोड़-जाड़ कर 100 सीटें आ जायें, तो फ़िर अन्त-पन्त वे कांग्रेस की गोद में ही जाकर बैठेंगे, भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के नाम पर। क्या मिला? नतीजा वही ढाक के तीन पात। और करात साहब को पाँच साल बाद जाकर यह ज्ञान हासिल हुआ है कि गरीबों के नाम पर चलने वाली योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार हो रहा है, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को छूट देने के कारण महंगाई बढ़ रही है… वाह क्या बात है? लगता है यूपीए की समन्वय समिति की बैठक में सोनिया गाँधी इन्हें मौसम का हाल सुनाती थीं, और बर्धन-येचुरी साहब मनमोहन को चुटकुले सुनाने जाते थे। तीसरे मोर्चे की “बासी कढ़ी में उबाल लाने” का नया फ़ण्डा इनकी खुद की जमीन धसकने से बचाने का एक शिगूफ़ा मात्र है। इनके पाखंड की रही-सही कलई तब खुल गई जब इनके “विदेशी मालिक” यानी चीन ने तिब्बत में नरसंहार शुरु कर दिया। दिन-रात गाजापट्टी-गाजापट्टी, इसराइल-अमेरिका का भजन करने वाले इन नौटंकीबाजों को तिब्बत के नाम पर यकायक साँप सूंघ गया।

इन पाखंडियों से पूछा जाना चाहिये कि –
1) स्टॉक न होने के बावजूद चावल का निर्यात जारी था, चावल निर्यात कम्पनियों ने अरबों के वारे-न्यारे किये, तब क्या ये लोग सो रहे थे?

2) तेलों और दालों में NCDEX और MCX जैसे एक्सचेंजों में खुलेआम सट्टेबाजी चल रही थी जिसके कारण जनता सोयाबीन के तेल में तली गई, तब क्या इनकी आँखों पर पट्टी बँधी थी?

3) आईटीसी, कारगिल, AWB जैसे महाकाय कम्पनियों द्वारा बिस्कुट, पिज्जा के लिये करोड़ों टन का गेंहूं स्टॉक कर लिया गया, और ये लोग नन्दीग्राम-सिंगूर में गरीबों को गोलियों से भून रहे थे, क्यों?

जब सरकार की नीतियों पर तुम्हारा जोर नहीं चलता, सरकार के मंत्री तुम्हें सरेआम ठेंगा दिखाते घूमते हैं, तो फ़िर काहे की समन्वय समिति, काहे का बाहर से मुद्दा आधारित समर्थन? लानत है…। आज अचानक इन्हें महंगाई-महंगाई चारों तरफ़ दिखने लगी है। ये निर्लज्ज लोग महंगाई के खिलाफ़ प्रदर्शन करेंगे? असल में यह आने वाले चुनाव में संभावित जूते खाने का डर है, और अपनी सर्वव्यापी असफ़लता को छुपाने का नया हथकंडा…


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Indian Postal Stamps on Celebrities
केन्द्र सरकार के एक बयान के अनुसार सरकार जीवित व्यक्तियों पर भी डाक टिकट निकालने का विचार कर रही है। संचार मंत्री के अनुसार देश की विशिष्ट हस्तियों पर डाक टिकट छापने के लिये एक समिति इस बात का विचार कर रही है। सरकार ने जो दो-चार नाम गिनाये हैं उसके अनुसार शाहरुख खान, सचिन तेंडुलकर, सानिया मिर्जा आदि के चित्रों वाले डाक टिकट जारी किये जाने की योजना है।

हमारे देश में कुछ न कुछ नया अजूबा करने-दिखाने की हमेशा होड़ लगी रहती है। यह कथित नायाब विचार भी इसी “खुजली” का एक नमूना है। सबसे पहली बात तो यह है कि पहले से ही कई मरे हुए व्यक्तियों, प्रकृति, पशु-पक्षी, स्मारक आदि पर डाक टिकट जारी हो चुके हैं, फ़िर ये नया शिगूफ़ा कि “जीवित व्यक्तियों पर भी डाक टिकट” जारी किये जायेंगे, की कोई तुक नहीं है। जिस देश में इतनी मतभिन्नता हो, जहाँ “महान” माने जाने के इतने अलग-अलग पैमाने हों, जहाँ हरेक मरे हुए नेताओं तक की इज्जत नहीं होती हो, कई मरे हुए नेताओं को लोग आज भी खुलेआम गालियाँ देते हों, ऐसे में जीवित व्यक्तियों पर डाक टिकट जारी करना नितांत मूर्खता है, और जरूरत भी क्या है? क्या पहले से मरे हुए व्यक्ति कम पड़ रहे हैं, क्या विभिन्न जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, फ़ूल-पत्तियाँ आदि कम हैं जो नये-नये विवाद पैदा करने का रास्ता बना रहे हो? सरकार खुद ही सोचे, क्या शाहरुख सर्वमान्य हैं? क्या समूचा भारत उन्हें पसन्द करता है? और सबसे बड़ी बात तो यह कि डाक टिकट जारी करने का पैमाना क्या होगा? किस आधार पर यह तय किया जायेगा कि फ़लाँ व्यक्तित्व पर डाक टिकट जारी करना चाहिये? क्या डाक टिकट पर शाहरुख को सिगरेट पीते दिखाया जायेगा? या सचिन कोका-कोला की बोतल के साथ डाक टिकट पर दिखेंगे? सौ बात की एक बात तो यही है कि ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी है? क्या मरे हुए और पुराने “सिम्बॉल” कम पड़ रहे हैं, जो जीवितों के पीछे पड़े हो? या कहीं सरकार भी हमारे “न्यूड” (न्यूज) चैनलों की तरह सोचने लगी है कि धोनी, राखी सावन्त आदि पर डाक टिकट जारी करके वह डाक विभाग को घाटे से उबार लेगी? या उसे कोरियर के मुकाबले अधिक लोकप्रिय बना देगी? कोई तो लॉजिक बताना पड़ेगा…

जब एक बार सरकार कोई नीतिगत निर्णय कर लेगी तो सबसे पहले हमारे नेता उसमें कूद पड़ेंगे। इस बात की क्या गारंटी है कि कांग्रेसी चमचे सोनिया गाँधी पर डाक टिकट जारी नहीं करेंगे, फ़िर राहुल गाँधी, फ़िर प्रियंका गाँधी, फ़िर “वर्ल्ड चिल्ड्रन्स डे” के अवसर पर प्रियंका के दोनो बच्चे एक डाक टिकट पर… यानी एक अन्तहीन सिलसिला चल निकलेगा। एक बात और नजर-अन्दाज की जा रही है कि डाक टिकट पर छपे महापुरुषों के वर्तमान में क्या हाल होते हैं। सबसे अधिक खपत महात्मा गाँधी के डाक टिकटों की होती है। गाँधी की तस्वीर वाले उस डाक टिकट को न जाने कहाँ-कहाँ, और न जाने कैसे-कैसे रखा जाता है, थूक लगाई जाती है, रगड़ा जाता है, पोस्ट मास्टर अपनी बीवी का सारा गुस्सा उस पर जोर से ठप्पा लगाकर निकालता है। नोटों पर छपे गाँधी न जाने कैसे-कैसे लोगों के हाथों से गुजरते हैं, महिलाओं द्वारा जाने कहाँ-कहाँ रखे जाते हैं, क्या ये सब अपमानजनक नहीं है? क्या यह जरूरी है कि महापुरुषों का सम्मान नोटों और डाक टिकट पर ही हो? रही प्रेरणा की बात, तो भाई मल्लिका शेरावत पर डाक टिकट छापने से किसको प्रेरणा मिलने वाली है?

जिस देश में नल से पानी लेने की बात पर हत्या हो जाती हो, घूरकर देखने की बात पर अपहरण हो जाते हों, वहाँ जीवित व्यक्तियों पर डाक टिकट जारी करने से विवाद पैदा नहीं होंगे क्या? सोनिया पर डाक टिकट जारी होगा तो नरेन्द्र मोदी पर भी होगा और ज्योति बसु पर भी होगा। सचिन तेंडुलकर पर जारी होगा तो बंगाली कैसे पीछे रहेंगे… सौरव दादा पर भी एक डाक टिकट लो। सानिया मिर्जा पर डाक टिकट निकाला तो बुर्के में फ़ोटो क्यों नहीं छापा? शाहरुख के डाक टिकट की धूम्रपान विरोधियों द्वारा होली जलाई जायेगी। और फ़िर उद्योगपति पीछे रहेंगे क्या? मुकेश अम्बानी की जेब में 150 सांसद हैं तो उनका डाक टिकट जरूर-जरूर जारी होगा, तो विजय माल्या भी अपनी कैलेण्डर गर्ल्स के साथ एक डाक टिकट पर दिखाई देंगे… मतलब एक न खत्म होने वाली श्रृंखला चालू हो जायेगी। हाँ एक बात जरूर है कि सरकार की डाक टिकटों की बिक्री जरूर बढ़ जायेगी, कैसे? भई जब भी कांग्रेसी किसी राज्य से पोस्टकार्ड अभियान चलायेंगे तो सोनिया के टिकटों की माँग एकदम बढ़ जायेगी। बुद्धदेव भट्टाचार्य के मुखड़े वाले डाक टिकट सिंगूर और नंदीग्राम में खूब बिकेंगे। सबसे ज्यादा मजा लेगी आम जनता, जो अपनी-अपनी पसन्द के मुताबिक डाक टिकट के सामने वाले हिस्से में थूक लगायेगी।

यदि मजाक को एक तरफ़ रख दिया जाये, तो कुल मिलाकर सरकार का यह निर्णय बेहद बेतुका, समय खराब करने वाला और नये बखेड़े खड़ा करने वाला है। इसकी बजाय सरकार को ऐसे वीरों पर डाक टिकट जारी करना चाहिये जो निर्विवाद हों (और ऐसा शायद ही कोई मिले)।

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Foreign Investment Indian Media Groups
भारत में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के मालिक कौन हैं? हाल ही में एक-दो ई-मेल के जरिये इस बात की जानकारी मिली लेकिन नेट पर सर्च करके देखने पर कुछ खास हाथ नहीं लग पाया (हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है, यह तो मीडिया वाले ही बता सकते हैं) कि भारत के कई मीडिया समूहों के असली मालिक कौन-कौन हैं?

हाल की कुछ घटनाओं के मीडिया कवरेज को देखने पर साफ़ पता चलता है कि कतिपय मीडिया ग्रुप एक पार्टी विशेष (भाजपा) के खिलाफ़ लगातार मोर्चा खोले हुए हैं, गुजरात चुनाव और चुनावों के पूर्व की रिपोर्टिंग इसका बेहतरीन नमूना रहे। इससे शंका उत्पन्न होती है कि कहीं हमारा मीडिया और विख्यात मीडियाकर्मी किन्हीं “खास” हाथों में तो नहीं खेल रहे? भारत में मुख्यतः कई मीडिया और समाचार समूह काम कर रहे हैं, जिनमें प्रमुख हैं – टाइम्स ऑफ़ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दू, आनन्दबाजार पत्रिका, ईनाडु, मलयाला मनोरमा, मातृभूमि, सहारा, भास्कर और दैनिक जागरण समूह। अन्य कई छोटे समाचार पत्र समूह भी हैं। आईये देखें कि अपुष्ट और गुपचुप खबरें क्या कहती हैं…

समाचार चैनलों में एक लोकप्रिय चैनल है NDTV, जिसका आर्थिक फ़ंडिंग स्पेन के “गोस्पेल ऑफ़ चैरिटी” से किया जाता है। यह चैनल भाजपा का खासमखास विरोधी है। इस चैनल में अचानक “पाकिस्तान प्रेम” जाग गया है, क्योंकि मुशर्रफ़ ने इस एकमात्र चैनल को पाकिस्तान में प्रसारण की इजाजत दी। इस चैनल के सीईओ प्रणय रॉय, कम्युनिस्ट पार्टी के कर्ता-धर्ता प्रकाश करात और वृन्दा करात के रिश्तेदार हैं। सुना गया है कि इंडिया टुडे को भी NDTV ने खरीद लिया है, और वह भी अब भाजपा को गरियाने लग पड़ा है। एक और चैनल है CNN-IBN, इसे “सदर्न बैप्टिस्ट चर्च” के द्वारा सौ प्रतिशत की आर्थिक मदद दी जाती है। इस चर्च का मुख्यालय अमेरिका में है और दुनिया में इसके प्रचार हेतु कुल बजट 800 मिलियन डॉलर है। भारत में इसके कर्ताधर्ता राजदीप सरदेसाई और उनकी पत्नी सागरिका घोष हैं। गुजरात चुनावों के दौरान नरेन्द्र मोदी और हिन्दुओं को लगातार गाली देने और उनकी छवि बिगाड़ने का काम बड़ी ही “स्वामिभक्ति” से इन चैनलों ने किया। गुजरात के दंगों के दौरान जब राजदीप और बरखा दत्त स्टार टीवी के लिये काम कर रहे थे, तब उन्होंने सिर्फ़ मुसलमानों के जलते घर दिखाये और मुसलमानों पर हुए अत्याचार की कहानियाँ ही सुनाईं, किसी भी हिन्दू परिवार का इंटरव्यू नहीं लिया गया, मानो उन दंगों में हिन्दुओं को कुछ हुआ ही न हो।

टाइम्स समूह “बेनेट कोलमेन” द्वारा संचालित होता है। “वर्ल्ड क्रिश्चियन काउंसिल” इसका 80% खर्चा उठाती है, एक अंग्रेज और एक इतालवी रोबर्टियो मिन्डो इसके 20% शेयरों के मालिक हैं। यह इतालवी व्यक्ति सोनिया गाँधी का नजदीकी भी बताया जाता है। स्टार टीवी तो खैर है ही ऑस्ट्रेलिया के उद्योगपति का और जिसका एक बड़ा आका है सेंट पीटर्स पोंटिफ़िशियल चर्च मेलबोर्न। 125 वर्ष पुराना दक्षिण के एक प्रमुख समाचार समूह “द हिन्दू” को अब जोशुआ सोसायटी, बर्न्स स्विट्जरलैण्ड ने खरीद लिया है। इसके कर्ताधर्ता एन.राम की पत्नी स्विस नागरिक भी हैं। दक्षिण का एक तेलुगु अखबार “आंध्र ज्योति” को हैदराबाद की मुस्लिम पार्टी “एम-आई-एम” और एक कांग्रेसी सांसद ने मिलकर खरीद लिया है। “द स्टेट्समैन” समूह को कम्युनिस्ट पार्टी संचालित करती है, और “कैराल टीवी” को भी। “मातृभूमि” समूह में मुस्लिम लीग के नेताओं का पैसा लगा हुआ है। “एशियन एज” और “डेक्कन क्रॉनिकल” में सऊदी अरब का भारी पैसा लगा हुआ है। जैसा कि मैने पहले भी कहा कि हालांकि ये खबरें सच हैं या नहीं इसका पता करना बेहद मुश्किल है, क्योंकि जिस देश में सरकार को यह तक पता नहीं लगता कि किसी एनजीओ को कुल कितनी मदद विदेश से मिली, वहाँ किसी समाचार पत्र के असली मालिक या फ़ाइनेन्सर का पता लगाना तो बहुत दूर की बात है। अधिग्रहण, विलय, हिस्सेदारी आदि के जमाने में अन्दर ही अन्दर बड़े समाचार समूहों के लाखों-करोड़ों के लेन-देन हुए हैं। ये खबरें काफ़ी समय से इंटरनेट पर मौजूद हैं, हवा में कानोंकान तैरती रही हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कि आपके मुहल्ले का दादा कौन है ये आप जानते हैं लेकिन लोकल थानेदार जानते हुए भी नहीं जानता। अब ये पता लगाना शौकिया लोगों का काम है कि इन खबरों में कितनी सच्चाई है, क्योंकि कोई खोजी पत्रकार तो ये करने से रहा। लेकिन यदि इसमें जरा भी सच्चाई है तो फ़िर ब्लॉग जगत का भविष्य उज्जवल लगता है।

ऐसे में कुल मिलाकर तीन समूह बचते हैं, पहला “ईनाडु” जिसके मालिक हैं रामोजी राव, “भास्कर” समूह जिसके मालिक हैं रमेशचन्द्र अग्रवाल और तीसरा है “जागरण” समूह। ये तीन बड़े समूह ही फ़िलहाल भारतीय हाथों में हैं, लेकिन बदलते वक्त और सरकार की मीडिया क्षेत्र को पूरी तरह से विदेशियों के लिये खोलने की मंशा को देखते हुए, कब तक रहेंगे कहना मुश्किल है। लेकिन एक बात तो तय है कि जो भी मीडिया का मालिक होता है, वह अपनी राजनैतिक विचारधारा थोपने की पूरी कोशिश करता है, इस हिसाब से भाजपा के लिये आने वाला समय मुश्किलों भरा हो सकता है, क्योंकि उसे समर्थन करने वाले “पाञ्चजन्य” (जो कि खुद संघ का मुखपत्र है) जैसे इक्का-दुक्का अखबार ही बचे हैं, बाकी सब तो विरोध में ही हैं।

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American Sub Prime Crisis Indian Economy

जी, मैं कोई मजाक नहीं कर रहा। हालांकि मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ, लेकिन “अमेरिकी रिसेशन” (बाजारों की मंदी) नाम का भूत जब सारी दुनिया को डराता हुआ घूम रहा है, उसके पीछे यही चार्वाक नीति काम कर रही है। अमेरिकी बैंकों और वित्तीय संस्थाओं ने ज्यादा कमाई और ब्याज के लालच में ऐसे-ऐसे लोगों को भी ॠण बाँट दिये जिनकी औकात उतनी थी नहीं, यही है अमेरिकी सब-प्राइम संकट, सरल भाषा में। मंदी छाई हुई है अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर, लेकिन घिग्घी बंधी हुई है हमारी और हमारे शेयर बाजारों की। ऐसा क्यों होता है?

“बचत करना पाप है, खर्च करना गुण है…” एक महान अर्थशास्त्री का यह बयान अमेरिका पर कितना सटीक बैठता है, आइये देखते हैं। आमतौर पर मान्यता है कि जापानी व्यक्ति बेहद कंजूस होता है और बचत में अधिक विश्वास करता है। जापानी अधिक खर्च नहीं करते, जापान की वार्षिक बचत लगभग सौ अरब है, फ़िर भी जापानी अर्थव्यवस्था कमजोर मानी जाती है। दूसरी ओर अमेरिकी खर्चते ज्यादा हैं, बचाते कम हैं, यहाँ तक कि अमेरिका निर्यात से अधिक आयात करता है, उसका व्यापार घाटा चार सौ अरब को पार कर चुका है। फ़िर भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत मानी जाती है और सारी दुनिया उसकी सेहत के लिये फ़िक्रमन्द रहती है।

अब सवाल उठता है कि अमेरिकी लोग खर्च करने के लिये इतना पैसा लाते कहाँ से हैं? असल में वे उधार लेते हैं, जापान से, चीन से, भारत से और भी वहाँ से जहाँ के लोग बचत करते हैं। बाकी सारे देश बचत करते हैं, ताकि अमेरिका उसे खर्च कर सके, क्योंकि लगभग सारे देश अपनी बचत डॉलर या सोने में करते हैं। अकेले भारत ने ही अपनी विदेशी मुद्रा को लगभग 50 अरब डालर की अमेरिकी प्रतिभूतियों में सुरक्षित रखा हुआ है, चीन का आँकड़ा 160 अरब डॉलर का है। अमेरिका ने पूरे विश्व से पाँच खरब डॉलर लिये हुए हैं, इसलिये जैसे-जैसे बाकी का विश्व बचत करता जाता है, अमेरिकी उतनी ही उन्मुक्तता से खर्च करते जाते हैं। चीन ने जितना अमेरिका में निवेश किया हुआ है उसका आधा भी अमेरिका ने चीन में नहीं किया, यही बात भारत के साथ भी है, हमने अमेरिका में लगभग 50 अरब डॉलर निवेश किया है, जबकि अमेरिका ने भारत में 20 अरब डॉलर।

फ़िर सारी दुनिया अमेरिका के पीछे क्यों भाग रही है? इसका रहस्य है अमेरिकियों की खर्च करने की प्रवृत्ति। वे लोग अपने क्रेडिट कार्डों से भी बेतहाशा खर्च करते हैं, जो कि उनकी भविष्य की आमदनी है, इसीलिये अमेरिका निर्यात कम करता है, आयात अधिक करता है, नतीजा – सारा विश्व अपने विकास के लिये अमेरिका के खर्चों पर निर्भर होता है। यह ठीक इस प्रकार है कि जैसे कोई दुकानदार किसी ग्राहक को उधार देता रहता है ताकि वह उसका ग्राहक बना रहे, क्योंकि यदि ग्राहक खरीदना बन्द कर देगा तो दुकानदार का धंधा कैसे चलेगा? इस प्रकार यह चक्र चलता रहता है और उधारी बढ़ती जाती है, इसमें ग्राहक तो उपभोग करके मजे लूटता रहता है, लेकिन दुकानदार उसके लिये मेहनत करता जाता है।

अमेरिकियों के लिये सबसे बड़ा दुकानदार है जापान। जब तक जापानी खर्च करना प्रारम्भ नहीं करते वे विकास नहीं कर सकते। जापान सरकार ने बचतों पर भी टैक्स लगाना शुरु कर दिया है, लेकिन फ़िर भी वहाँ सिर्फ़ पोस्ट ऑफ़िसों की बचत लगभग एक खरब डॉलर है, यानी भारत की अर्थव्यवस्था का तीन गुना।

सभी प्रमुख अर्थशास्त्री यह मानते हैं कि जब तक किसी देश के लोग खर्च करना प्रारम्भ नहीं करते, देश तरक्की नहीं कर सकता, और सिर्फ़ खर्च नहीं करना है, बल्कि उधार ले-लेकर खर्च करना है। अमेरिका में बसे भारतीय अर्थशास्त्री डॉ जगदीश भगवती ने एक बार मनमोहन सिंह से कहा था कि भारतीय लोग खामख्वाह बचत करते हैं, भारत के लोगों को विदेशी कारों, मोबाइल, परफ़्यूम, कॉस्मेटिक्स पर खर्च करने की प्रवृत्ति बढ़ानी होगी, इससे भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ेगी। सरकार ने इस दिशा में काम करते हुए पिछले एक दशक में जमा पूँजी पर ब्याज दरों को क्रमशः कम किया है, और वह दिन दूर नहीं जब आपकी जमापूँजी सुरक्षित रखने के लिये बैंके उलटे आपसे पैसा लेने लगेंगी। सरकार चाहती है कि हर भारतीय खर्चा करता रहे, अपना पैसा शेयर मार्केट में लगाकर सटोरिया बन जाये। ईपीएफ़ के पैसों को भी बाजार में झोंकने की पूरी तैयारी है।

अब आप सोच रहे होंगे कि दुकानदार-ग्राहक वाली थ्योरी कैसे काम करेगी, क्योंकि जब कर्जा लिया है तो कुछ तो लौटाना ही होगा, यह तो हो नहीं सकता कि दुकानदार देता ही रहे। होता यह है कि जब अमेरिका को किसी देश का कर्ज उतारना होता है तो वह उसे हथियार बेचता है, बम बेचता है, F-16 हवाई जहाज बेचता है, दो बेवकूफ़ देशों को आपस में लड़वाकर पहले तो दोनों को हथियार बेचता है, फ़िर एक पर कब्जा करके उसका तेल अंटी करता है, ताकि अमेरिकियों की कारें लगातार चलती रहें… अंकल सैम की खुशहाली का यही राज है “जमकर खर्च करो…”। बचत करने के लिये और आपस में लड़कर उनका हथियारों का धंधा जारी रखने के लिये दुनिया में कई मूर्ख मौजूद हैं…


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Bank Loan Waiver VDIS Chidambaram

हमारे महान वित्तमंत्री, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री और इकोनोमिक्स के विशेषज्ञ माने जाने वाले बाकी के दोनों वीर मोंटेकसिंह अहलूवालिया और मनमोहन सिंह ने किसानों के लिये 60 हजार करोड़ रुपये के कर्जों को माफ़ करने की घोषणा की है। राजकुमार राहुल गाँधी तो एक कदम आगे बढ़कर कहते हैं कि ये कर्जमाफ़ी नाकाफ़ी है, और ज्यादा कर्ज माफ़ किये जाना थे (उसकी जेब से क्या जाता है?)। ये घोषणा चुनावी वर्ष में ही क्यों की है, यह सवाल करना बेकार है, लेकिन एकमुश्त कुछ भी बाँट देने की नेताओं की इस आदत ने ईमानदार लोगों के दिलोदिमाग पर गहरा असर किया है।

जनार्दन पुजारी का नाम बहुत लोगों को याद होगा। जिन्हें नहीं मालूम उनके लिये बता दूँ कि अस्सी के दशक में इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में ये महाशय वित्त राज्यमंत्री थे। इन्हीं महाशय को यह कालजयी काम (लोन बाँटने और उसे खा जाने) का सूत्रधार माना जा सकता है। हमारे यहाँ बड़े-बड़े हिस्ट्रीशीटर को जेलमंत्री और अंगूठाटेक को शिक्षामंत्री बनाये जाने का रिवाज है। पुजारी महाशय ने बैंकों पर दबाव डलवाकर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में “लोन मेले” लगवाये थे। इन लोन मेलों की खासियत यह थी कि इनमें से 90% के लोन बैंकों को वापस नहीं मिले। लगभग ऐसी ही योजना है, पीएमआरवाय (PMRY), इसमें भी सरकार ने जमकर लोन बाँटे, उस लोन पर सबसिडी दी, और लोग-बाग करीब-करीब वह पूरा पैसा खा गये। कई बार तो मजाक-मजाक में लोग कहते भी हैं कि यदि पैसों की जरूरत हो तो PMRY से लोन ले लो। (कांग्रेस से घृणा करने के कई कारणों में से एक कारण यह भी है कि आजादी के बाद से इसने कभी सुशासन लाने की कोशिश नहीं की, हमेशा भ्रष्टाचारियों और बेईमानों को संरक्षण दिया)

इन्हीं की राह पर आगे चले चिदम्बरम साहब। नहीं, नहीं, मैं अभी 2007-08 की बात नहीं कर रहा। थोड़ा पीछे जायें सन 1997 में। चिदम्बरम जी एक बड़ी अनोखी(?) योजना लेकर आये थे, जिसे उन्होंने VDIS स्कीम का नाम दिया था, Voluntary Disclosure Income Scheme। इस नायाब योजना के तहत उन्होंने कालाबाजारियों, काला पैसा जमा करने वालों, आयकर चुराने वालों (मतलब बड़े-बड़े डाकुओं) को यह छूट प्रदान की थी कि वे अपनी काली कमाई जाहिर कर दें और उसका तीस प्रतिशत टैक्स के रूप में जमा कर दें तो बाकी की सम्पत्ति को सरकार “सफ़ेद” कमाई मान लेगी। लोगों ने इसका भरपूर फ़ायदा उठाते हुए लगभग 35000 करोड़ रुपये की काली सम्पत्ति जाहिर की और सरकार को 10000 करोड़ से अधिक की आय हो गई, है न मजेदार स्कीम !!! आंध्रप्रदेश के कांग्रेस नेता-पुत्र ने उस वक्त अपनी सम्पत्ति 700 करोड़ जाहिर की थी, यानी 250 करोड़ का टैक्स देकर बाकी की सारी धन-दौलत (जो उसने या उसके बाप ने भ्रष्टाचार, अनैतिकता और साँठगाँठ से ही कमाई थी) पूरी तरह सफ़ेद हो गई, उसका वह जो चाहे उपयोग करे।

कहने का मतलब यह कि हमारी नपुंसक सरकारों ने हमेशा जब-तब यह माना हुआ है कि “भई हमसे तो कुछ नहीं होगा, न तो हम काला पैसा जमा करने वालों के खिलाफ़ कुछ कर पायेंगे, न कभी भी हम बड़े-बड़े सफ़ेदपोश डाकुओं के खिलाफ़ कमर सीधी करके खड़े हो पायेंगे, हमारा काम है सत्ता पाना, भ्रष्टाचार करना और फ़िर चुनाव लड़कर ॠण / आयकर / लोन माफ़ करना…”। कानून का शासन क्या होता है, कांग्रेस कभी जान नहीं पाई न ही कभी उसके इसके लिये गंभीर प्रयास किये। हमेशा नेहरू-नेहरू, गाँधी-गाँधी का ढोल पीटने वाले ये गंदे लोग 1952 के सबसे पहले जीप घोटाले से ही भ्रष्टाचार में सराबोर हैं। इन्हीं की राह पकड़ी भाजपा ने (इसीलिये मैं इसे कांग्रेस की “बी” टीम कहता हूँ)।

मध्यप्रदेश सरकार में सबसे पहले अर्जुनसिंह ने झुग्गी-झोंपड़ियों को पट्टे प्रदान किये थे, यानी जो व्यक्ति जिस जमीन पर फ़िलहाल रहता है, वह उसकी हो गई, यानी सरकार ने मान लिया था, कि हममें तो अतिक्रमण हटाने की हिम्मत नहीं है, इसलिये जो गंद यहाँ-वहाँ बिखरी पड़ी है और भू-माफ़िया (जो हमें चन्दे देता है) चाहे तो सारी जमीन हड़प कर ले। इस महान(?) नीति का फ़ायदा यह हुआ कि रातोंरात लोगों ने हजारों की संख्या में झुग्गियाँ तान दीं, जिसे भू-माफ़िया का संरक्षण हासिल रहा, और बाद में उन्हें वहाँ से भगाकर कालोनियाँ काट दी गईं… अगला नम्बर था भाजपा के सुन्दरलाल पटवा का, सत्ता पाने के लिये उन्होंने सहकारी बैंकों से लिये गये किसानों के दस हजार तक के ॠण माफ़ कर दिये, आज दस साल बाद भी सहकारी बैंक उस झटके से नहीं उबर पाये हैं और यह नवीनतम जोर का झटका भी सबसे ज्यादा सहकारी बैंकों को ही झेलना पड़ेगा। गाँवों में किसान बैंक अधिकारियों से अभी से कहने लगे हैं कि “कैसी वसूली, काहे का पैसा, दिल्ली सरकार ने सब माफ़ कर दिया, वापस भाग जाओ…”। सिर धुन रहा है बेचारा वह किसान जिसने लोकलाज के चलते अपना कर्जा चुका दिया।

सभी जानते हैं कि इस प्रकार की कर्जमाफ़ी या आयकर / कालेधन में छूट का फ़ायदा सिर्फ़ और सिर्फ़ चोरों को ही मिलता है, ईमानदारी से कर्ज चुकाने वाला या आयकर चुकाने वाला इसमें ठगा हुआ महसूस करता है, वह भी सोचने पर मजबूर हो जाता है कि अब मैं भी क्यों कर्ज चुकाऊँ? क्यों न मैं भी बिजली चोरी करूँ, आखिर अन्त में सरकार को यह सब माफ़ करना ही है। सबसे ज्यादा गुस्सा उस नौकरीपेशा व्यक्ति को आता है, उसका टैक्स तो तनख्वाह में से ही काट लिया जाता है।

इसलिये देश-विदेशों में बसे भाईयों और बहनों… भारत में तमाम सरकारों का संदेश स्पष्ट है, कि “हम नालायक, निकम्मे और नपुंसक हैं, कर चोरी करने वालों के खिलाफ़ हम कुछ नहीं कर पायेंगे तो माफ़ कर देंगे, बिजली चोरी हमसे नहीं रुकेगी तो बिल माफ़ कर देंगे, अतिक्रमण हमसे नहीं रुकेगा तो “सीलिंग एक्ट” के बारे में सर्वोच्च न्यायालय में हम बेशर्म बन जायेंगे, एक लाख से ज्यादा किसानों की आत्महत्या के बाद चुनाव जीतने के लिये कर्जमाफ़ी देंगे, आतंकवाद या नक्सलवाद को रोकना हमारे बस का नहीं है इसलिये हम तो x, y, z सुरक्षा ले लेंगे, तुम मरते फ़िरो सड़कों पर… गरज यह कि हमसे कानून-व्यवस्था के अनुसार कोई काम नहीं होगा… जो भी टैक्स आप चुकाते हैं या जो निवेश आप करते हैं अन्त-पन्त वह किसी न किसी हरामखोर की जेब में ही जायेगा… और यदि आप कर्ज लेकर उसे चुकाते भी हैं तो आप परले दर्जे के महामूर्ख हैं…


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Rich People Uncivilized Unsocial Selfish

पहला दृश्य देखिये – पंजाब के खन्ना गाँव के अनपढ़ ग्रामीणों ने कैसा व्यवहार किया। लुधियाना से 50 किमी दूर रात के 3 बजे, खून जमा देने वाली ठंड के बीच एक रेल दुर्घटना हुई। गाँव के सारे लोग एक घंटे के भीतर इकठ्ठा हो चुके थे, गुरुद्वारे के लाउडस्पीकर से सबको जगा-जगाकर दुर्घटनास्थल भेजा जा रहा था, जिसके पास ट्रैक्टर थे उन्होंने अपने ट्रैक्टर रेल्वे लाइन के आसपास हेडलाइट जलाकर चालू हालत में छोड़ दिये ताकि वहाँ रोशनी हो सके। रेल के डिब्बों से लाशों से निकालने का काम शुरु कर दिया गया। गाँव की औरतों ने लालटेन जलाकर और खेत से फ़ूस में आग लगाकर ठंड से काँप रहे घायलों को थोड़ी गर्मी देने की कोशिश की।

जल्दी ही सैकड़ों की संख्या में आरएसएस के कार्यकर्ता वहाँ पहुँच गये, किसी भी सरकारी मदद के बिना उन्होंने गुरुद्वारे में ही एक “टेम्परेरी” अस्पताल खोल दिया और रक्तदान शुरु कर दिया। गाँव वालों ने एक समिति बनाई जिसने अगले एक सप्ताह तक घायलों और मृतकों के रिश्तेदारों और बाहर से आने वाले लगभग 30000 लोगों के लिये भोजन की व्यवस्था की। जिन्दा या मुर्दा किसी की जेब से एक रुपया भी चोरी नहीं हुआ, समिति के अध्यक्ष ने मृतकों की ज्वेलरी और लाखों रुपये कलेक्टर को सौंपे, जब मृतकों के रिश्तेदार भी उन छिन्न-भिन्न लाशों के पास जाने से घबरा रहे थे, तब आरएसएस के युवकों ने उनका सम्मान के साथ अन्तिम संस्कार किया।

अब दूसरा दृश्य देखिये - वह 26 जनवरी 2001 की शाम थी, गुजरात में आये महाविनाशकारी भूकम्प की खबरें तब तक पूरे देश में फ़ैल चुकी थीं। लाशों के मिलने का सिलसिला जारी था और धीरे-धीरे भूकम्प की भयावहता सभी के दिमाग पर हावी होने लगी थी। लेकिन दिल्ली, जो कि देश की राजधानी है, उसके एक केन्द्रीय इलाके में चारों तरफ़ रोशनी थी, धूमधड़ाका था, मौज मस्ती चल रही थी। जब समूचा देश शोक और पीड़ा में डूबा हुआ था, वहाँ एक विशाल पार्टी चल रही थी। उस पार्टी में भारत के जाने-माने रईस, समाज के बड़े-बड़े ठेकेदार तो थे ही, वर्तमान और भूतपूर्व फ़िल्म स्टार, दागी क्रिकेटर, उद्योगपति, गुलशन कुमार की हत्या के आरोपी, नौकरशाह, बैंक अफ़सर, पत्रकार और यहाँ तक कि बुद्धिजीवी माने जाने वाले बड़े शिक्षाविद भी थे। एक बड़े कम्युनिस्ट नेता भी उस पार्टी की शोभा बढ़ा रहे थे। पार्टी का मुख्य आकर्षण था एक भव्य स्टेज जहाँ एक मुख्यमंत्री बेकाबू होकर खुद गाने-बजाने लग पड़े थे, और उनके जवान बेटे को उन्हें यह कह कर शांत करना पड़ा कि गुजरात में आज ही एक राष्ट्रीय आपदा आई है और इस तरह आपका प्रदर्शन शोभा नहीं देता।

आप सोच रहे होंगे कि आखिर यह पार्टी थी किस उपलक्ष्य में? यह पार्टी एक 45 साल के बच्चे के जन्मदिन के उपलक्ष्य में थी। यह पैंतालीस साला बच्चा और कोई नहीं बल्कि एक ख्यात व्यवसायी, उद्योगपति, फ़िल्मी (खासकर हीरोईनों) और क्रिकेट हस्तियों से विशेष मेलजोल रखने वाला, और एक ऐसी पार्टी का मुख्य कर्ता-धर्ता था, जो अपने नाम के आगे “समाजवादी” लगाती है… (क्या अब नाम भी बताना पड़ेगा)। उस पार्टी में शामिल होने के लिये मुम्बई से कुछ लोग चार्टर विमान करके आये थे। यह पार्टी सिर्फ़ 26 जनवरी की रात को ही खत्म नहीं हुई, बल्कि यह 27 जनवरी को भी जारी रही, जबकि यह सभी को पता चल चुका था कि भुज-अंजार में लगभग 15000 लोग मारे गये हैं और तीन लाख से अधिक बेघर हुए हैं। 27 जनवरी की पार्टी उन लोगों के लिये थी, जो 26 जनवरी को उसमें शामिल होने से चूक गये थे। 27 जनवरी तक हालांकि तमाम राजनीतिक लोग इस पार्टी से शर्मा-शर्मी में दूर हो गये थे सिर्फ़ इसलिये कि कहीं वे मीडिया की नजर में न आ जायें, लेकिन दिल्ली और मुम्बई के कुछ प्रसिद्ध अमीर, समाज के प्रमुख स्तम्भ माने जाने वाले लोग इतने बेशर्म और ढीठ थे कि उन्होंने पार्टी स्थगित करना भी उचित नहीं समझा।

और ऐसा करने वाले अकेले दिल्ली के अमीर ही नहीं थे, मुम्बई में भी 26 जनवरी की रात को ही एक फ़ैशन शो आयोजित हुआ (जिसमें जाहिर है कि “एलीट” वर्ग ही आता है)। भविष्य की मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स चुनने के लिये यह शो आयोजित किया गया था। हमेशा की तरह विशिष्ट लोगों ने “माँस” की वह प्रदर्शनी सूट-बूट पहनकर देखी, मीडिया ने भी सुबह गुजरात में लाशों और टूटे घरों की तथा शाम को अधनंगी लड़कियों की तस्वीरें खींची और अपना कर्तव्य निभाया।

लेकिन हमारे-आपके और देश के दुर्भाग्य से दिल्ली के एक छोटे से सांध्य दैनिक के अलावा किसी राष्ट्रीय अखबार ने पंजाब के गाँववालों की इस समाजसेवा के लिये (आरएसएस की तो छोड़िये ही) तारीफ़ में कुछ नहीं छापा। कल्पना कीजिये कि यदि कोई एकाध-दो गुण्डे दो-चार यात्रियों के पैसे या चेन वगैरह लूट लेते तो “आज तक” जैसे नकली चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज क्या होती? “दुर्घटनाग्रस्त यात्रियों से लूटपाट…”, बड़े अखबारों में सम्पादकीय लिखे जाते कि कैसे यह पुलिस की असफ़लता है और कैसे गाँव वालों ने लूटपाट की।

समाज के एक तथाकथित “एलीट” वर्ग ने गाँव वालों को हमेशा “गँवई”, “अनसिविलाइज्ड” कहा और प्रचारित किया है। जबकि हकीकत यह है कि जैसे-जैसे अमीरी बढ़ती जाती है, “मैं”, “मेरा परिवार”, “मेरा पैसा”, “मेरी सुविधायें” वाली मानसिकता बढ़ती जाती है। जब समाज को कुछ योगदान देने की बात आती है तो अमीर सोचता है कि मेरा काम सिर्फ़ “पैसा” देना भर है, और पैसा भी कौन सा? जो उसने शोषण, अनैतिकता, भ्रष्टाचार, साँठगाँठ करके कमाया हुआ है। त्याग, बलिदान, समाजसेवा की बारी आयेगी तो ग्रामीण खुद-ब-खुद आगे आता है…

याद कीजिये कंधार का हवाई अपहरण कांड, कैसे अमीर लोग टीवी कैमरों के सामने अपना “छातीकूट” अभियान लगातार जारी रखे रहे, इक्का-दुक्का को छोड़कर एक भी अमीर यह कहने के लिये आगे नहीं आया, कि “सरकार एक भी आतंकवादी को न छोड़े चाहे मेरे परिजन मारे ही क्यों न जायें…” लेकिन यही अमीर वर्ग सबसे पहले करों में छूट की माँग करता है, सरकार को चूना लगाने के नये-नये तरीके ढूँढता है, बिजली चोरी करता है और बाकी सारे धतकरम भी करता है, यहाँ तक कि हवाई दुर्घटना में मरने पर दस लाख का हर्जाना और बस दुर्घटना में मरने पर एक लाख भी नहीं (यानी मौत में भी भेदभाव), ढिठाई तो इतनी कि सरेआम फ़ुटपाथ पर लोगों को कुचलने के बावजूद मुम्बई में सलमान और दिल्ली में संजीव नन्दा साफ़ बच निकलते हैं, लेकिन आलोचना की जाती है ग्रामीण वर्ग की… क्या खूब दोगलापन है।

कोई यह नहीं चाहता कि अमीरों को नुकसान पहुँचाया जाये, लेकिन कम से कम उन्हें दूसरों की तकलीफ़ों और दुःखों की समझ होनी चाहिये। कोई यह नहीं कह रहा कि वे आगे आकर अन्जान लोगों की लाशों को दफ़नायें/जलायें (वे कर भी नहीं सकते) लेकिन कम से कम जो लोग ये काम कर रहे हैं उनकी तारीफ़ तो कर सकते हैं। कोई उनसे यह नहीं कह रहा कि गुजरात या लुधियाना जाकर मृतकों/घायलों की मदद करो, लेकिन कम से कम बेशर्मी भरी पार्टियाँ तो आयोजित न करें।

माना कि जीवन चलने का नाम है और दुर्घटनाओं से देश रुक नहीं जाता, लेकिन सार्वजनिक रूप से इस प्रकार का भौंडा प्रदर्शन निहायत ही घटिया और शर्मनाक होता है। गाँवों में आज भी कोई बड़ी दुर्घटना होने पर शादी-ब्याह तक रोक दिये जाते हैं, लेकिन अमीरो को कम से कम यह खयाल तो करना ही चाहिये कि पड़ोस में लाश पड़ी हो तो दीवाली नहीं मनाया करते। ऐसे में रह-रह कर सवाल उठता है कि क्या अमीरी के साथ बेशर्मी, ढिठाई, असामाजिकता और स्वार्थीपन भी बढ़ता जाता है?

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Indian Heroines Wedding Married Men

आज ही खबर आई है कि रानी मुखर्जी और आदित्य चोपड़ा का विवाह होने वाला है। हालांकि इस खबर पर कोई आश्चर्य करने वाली कोई बात नहीं है, क्योंकि इसमें कोई अजूबा नहीं है, और यह उनका व्यक्तिगत मामला है। पहले भी भारतीय हीरोईनें “समय आने पर” अपना घर बसाती रही हैं। लेकिन इस बनने वाली जोड़ी में एक बात है, जो कि चर्चा और जिक्र के काबिल है, वह है आदित्य चोपड़ा का शादीशुदा होना। वे अपनी पत्नी से तलाक लेने जा रहे हैं और रानी मुखर्जी से शादी करेंगे।

शादीशुदा, तलाकशुदा, दुहाजू या बल्कि तिहाजू पुरुष से शादी करने का हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री में रिवाज रहा है। ज्यादा पीछे न जायें तो हेमामालिनी ने धर्मेन्द्र से उनकी पत्नी जीवित रहते और तलाक न देने के बावजूद रोमांस किया और शादी भी की। हेमामालिनी का मामला ज्यादा अलग इसलिये भी है कि उस वक्त धर्मेन्द्र दो बच्चों के पिता भी थे। रेखा और अमिताभ के किस्से तो सभी को मालूम ही हैं, अमिताभ भी उस वक्त शादीशुदा थे और दो बच्चों के बाप थे, लेकिन फ़िर भी रेखा उन पर मर मिटी थीं और लगभग हाथ-पाँव धोकर उनके पीछे पड़ी थीं। यदि “कुली” फ़िल्म की दुर्घटना न हुई होती, जया भादुड़ी ने अमिताभ की सेवा करके उन्हें मौत के मुँह से खीच न लिया होता तो शायद अमिताभ भी रेखा के पति बन सकते थे। सारिका ने भी कमल हासन से उनके शादीशुदा रहते विवाह किया, उसके बाद सुना है कि उनमें भी तलाक हो गया है और कमल हासन को तीसरी औरत मिल गई है (शायद हीरोइन ही है)। हालांकि दक्षिण में दूसरी शादी का रिवाज सा है, और इसे “विशेष” निगाह से देखा भी नहीं जाता, लेकिन उत्तर भारत में इसे गत दशक तक “खुसुर-पुसुर” निगाहों से देखा जाता था। बीते दस वर्षों में, जबसे समाज में “खुलापन” बढ़ा है, यह संख्या तेजी से बढ़ी है, और चूँकि ये हीरोईने लड़कियों की “आइकॉन” होती हैं, इसलिये फ़िल्मों से बाहर के समाज में भी यह रिवाज पसरता जा रहा है।

हाल के वर्षों में यह ट्रेण्ड कुछ ज्यादा ही चल पड़ा है, पिछली पीढ़ी की हीरोइनों से शुरु करें तो सबसे पहले श्रीदेवी ने शादीशुदा और बच्चेदार बोनी कपूर से शादी की, फ़िर करिश्मा कपूर, रवीना टंडन, ॠचा शर्मा, मान्यता (आमिर खान की दूसरी बीवी हीरोइन नहीं हैं, लेकिन आमिर खुद दुहाजू ही हैं, फ़िरोज खान ने भी बुढ़ौती में एक जवान लड़की से शादी की थी) आदि भी उनकी ही राह चलीं। ताजा मामला आदित्य और रानी मुखर्जी का है, लेकिन उससे पहले करीना और सैफ़ का जिक्र करना भी आवश्यक है, खबरें हैं कि उनमें जोरों का रोमांस चल रहा है, लेकिन फ़िल्म इंडस्ट्री के “अफ़वाह रिवाज” पर तब तक भरोसा नहीं किया जा सकता जब तक कि वाकई में शादी न हो जाये, फ़िर भी यदि करीना-सैफ़ की शादी हुई तो यह शाहिद कपूर के साथ अन्याय तो होगा ही, सैफ़ जैसे अधेड़ और “तिहाजू” से करीना कैसे फ़ँस गई, यह भी शोध का विषय होगा।

बहरहाल, लेख का उद्देश्य इन हीरोइनों की आलोचना करना नहीं है, क्योंकि शादी उनका व्यक्तिगत मामला है, लेकिन प्रश्न उठते हैं कि आखिर इन शादीशुदा मर्दों में ऐसा क्या आकर्षण होता है कि हीरोईनें अपने हम-उम्र लड़कों का साथ छोड़कर इनके साथ शादी रचा लेती हैं?

1) क्या यह दैहिक आकर्षण है? (यदि ऐसा है तो मर्दों की दाद देनी होगी)
2) इसमें रुपये-पैसे का रोल और एक सुरक्षित भविष्य की कामना दबी होती है? (लेकिन वे खुद भी काफ़ी पैसे वाली होती हैं)
3) क्या वाकई ये हीरोइनें अपने-आपको इतनी असुरक्षित समझती हैं कि वे दूसरी औरत का घर उजाड़ने में कोई कोताही नहीं बरततीं? (उन्हें यह डर भी नहीं होता कि कल कोई और लड़की उसे बेदखल कर देगी?)
4) क्या वे “अनुभव” को प्राथमिकता देती हैं? (लेकिन यदि पुरुष को जीवन का अनुभव होता तो पहला तलाक ही क्यों होता?)
5) क्या आधुनिक समझे जाने वाली उस सोसायटी में भी मर्दों का राज ही चलता है? (चोखेर बालियाँ ध्यान दें…)
6) क्या यह कोई मनोवैज्ञानिक समस्या है?

आखिर क्या बात है… ?

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Mumbai Dibbawalas, Tirupur, Namakkal, IIM

कुछ समय पहले एक प्रतिष्ठित आईआईएम के निदेशक बड़े गर्व से टीवी पर बता रहे थे कि उनके यहाँ से 60 छात्रों का चयन बड़ी-बड़ी कम्पनियों में हो गया है (जाहिर है कि मल्टीनेशनल में ही)…एक छात्र को तो वार्षिक साठ लाख का पैकेज मिला है और दूसरे को अस्सी लाख वार्षिक का…। लेकिन यहाँ सवाल उठता है कि इतना वेतन लेने वाले ये मैनेजर आखिर करेंगे क्या? मल्टीनेशनल कम्पनियों के लिये शोषण के नये-नये रास्ते खोजने का ही… जो कम्पनी इन्हें पाँच लाख रुपये महीना वेतन दे रही है, जाहिर है कि वह इनके “दिमाग”(?) के उपयोग से पचास लाख रुपये महीना कमाने की जुगाड़ में होगी, अर्थात ये साठ मेधावी छात्र आज्ञाकारी नौकर मात्र हैं, जो मालिक के लिये कुत्ते की तरह दिन-रात जुटे रहेंगे।

इन साठ छात्रों का चयन भारत के बेहतरीन मैनेजमेंट इन्स्टीट्यूट में तब हुआ जब वे लाखों के बीच से चुने गये, इनके प्रशिक्षण और रहन-सहन पर इस गरीब देश का करोड़ों रुपया लगा। लेकिन क्या सिर्फ़ इन्हें बहुराष्ट्रीय (या अम्बानी, टाटा, बिरला) कम्पनियों के काम से सन्तुष्ट हो जाना चाहिये? क्या ये मेधावी लोग कभी मालिक नहीं बनेंगे? क्या इनके दिमाग का उपयोग भारत के फ़ायदे के लिये नहीं होगा? इनमें से कितने होंगे जो कुछ सैकड़ों लोगों को ही रोजी-रोटी देने में कामयाब होंगे? यदि भारत के बेहतरीन दिमाग दूसरों की नौकरी करेंगे, तो नौकरी के अवसर कौन उत्पन्न करेगा? दुर्भाग्य की बात यह है कि मैनेजमेंट संस्थानों से निकलने वाले अधिकतर युवा “रिस्क” लेने से घबराते हैं, वे उद्यमशील (Entrepreneur) बनने की कोशिश नहीं करते।

अब तस्वीर का दूसरा पक्ष देखिये। रिलायंस, अम्बानी, टाटा, बिरला, मित्तल का नाम तो सभी जानते हैं, लेकिन कितने लोग तिरुपुर या नमक्कल के बारे में जानते हैं? तिरुपुर, तमिलनाडु के सुदूर में स्थित एक कस्बा है, जहाँ लगभग 4000 छोटे-बड़े सिलाई केन्द्र और अंडरवियर/बनियान बनाने के कुटीर उद्योग हैं। उनमें से लगभग 1000 इकाईयाँ इनका निर्यात भी करती हैं। पिछले साल अकेले तिरुपुर का निर्यात 6000 करोड़ रुपये का था, जो कि सन 1985 में सिर्फ़ 85 करोड़ था। इन छोटी-छोटी इकाईयों और कारखानों की एक एसोसियेशन भी है तिरुपुर एक्सपोर्टर एसोसियेशन। लेकिन सबसे खास बात तो यह है कि दस में से नौ कामगार खुद अपनी इकाई के मालिक हैं, वे लोग पहले कभी किसी सिलाई केन्द्र में काम करते थे, धीरे-धीरे खुद के पैरों पर खड़ा होना सीखा, बैंक से लोन लिये और अपनी खुद की इकाई शुरु की। तिरुपुर कस्बा अपने आप में एक पाठशाला है कि कैसे लोगों को उद्यमशील बनाया जाता है, कैसे उनमें प्रेरणा जगाई जाती है, कैसे उन्हें काम सिखाया जाता है। इनमें से अधिकतर लोग कभी किसी यूनिवर्सिटी या मैनेजमेंट संस्थान में नहीं गये, इनके पास कोई औपचारिक डिग्री नहीं है, लेकिन ये खुद अपना काम तो कर ही रहे हैं दो-चार लोगों को काम दे भी रहे हैं जो आगे चलकर खुद मालिक बन जायेंगे।

जाहिर सी बात है कि अधिकतर कामगार/मालिक अंग्रेजी नहीं जानते, लेकिन फ़िर भी वैश्विक चुनौतियों का वे बखूबी सामना कर रहे हैं, रेट्स के मामले में भी और ग्राहक की पसन्द के मामले में भी। पश्चिमी देशों के मौसम और डिजाइन के अनुकूल अंडर-गारमेण्ट्स ये लोग बेहद प्रतिस्पर्धी कीमतों पर निर्यात करते हैं। इन्हीं में से एक पल्लानिस्वामी साफ़ कहते हैं कि “जब वे बारहवीं कक्षा में फ़ेल हो गये तब वे इस बिजनेस की ओर मुड़े…”। आज की तारीख में वे एक बड़े कारखाने के मालिक हैं, उनका 20 करोड़ का निर्यात होता है और 1200 लोगों को उन्होंने रोजगार दिया हुआ है। वे मानते हैं कि यदि वे पढ़ाई करते रहते तो आज यहाँ तक नहीं पहुँच सकते थे। और ऐसे लोगों की तिरुपुर में भरमार है, जिनसे लक्स, लिरिल, रूपा आदि जैसे ब्राण्ड कपड़े खरीदते हैं, अपनी सील और पैकिंग लगाते हैं और भारी मुनाफ़े के साथ हमे-आपको बेचते हैं, लेकिन सवाल उठता है कि आईआईएम और उनके छात्रों ने देश में ऐसे कितने तिरुपुर बनाये हैं?

मुम्बई के डिब्बेवालों की तारीफ़ में प्रिंस चार्ल्स पहले ही बहुत कुछ कह चुके हैं, उनकी कार्यप्रणाली, उनकी कार्यक्षमता, उनकी समयबद्धता वाकई अद्भुत है। मजे की बात तो यह है कि उनमें से कई तो नितांत अनपढ़ हैं, लेकिन मुम्बई के सुदूर उपनगरों से ठेठ नरीमन पाइंट के कारपोरेट दफ़्तरों तक और वापस डिब्बों को उनके घर तक पहुँचाने में उनका कोई जवाब नहीं है। अब कई मैनेजमेंट संस्थान इन पर शोध कर रहे हैं, लालू भी इनके मुरीद बन चुके हैं, लेकिन इनका जीवन आज भी वैसा ही है। इनकी संस्था ने हजारों को रोजगार दिलवाया हुआ है, खाना बनाने वालों, छोटे किराना दुकानदारों, गरीब बच्चों, जिन्हें कोई बड़ा उद्योगपति अपने दफ़्तर में घुसने भी नहीं देता। आईआईएम के ही एक छात्र ने चेन्नई में अपना खुद का केटरिंग व्यवसाय शुरु किया, शुरु में सिर्फ़ वह इडली बनाकर सप्लाई करते थे, आज उनके पास कर्मचारियों की फ़ौज है और वे टिफ़िन व्यवसाय में जम चुके हैं, लेकिन उनकी प्रेरणा स्रोत थीं उनकी माँ, जिन्होंने बेहद गरीबी के बावजूद अपने मेधावी बेटे को आईआईएम में पढ़ने भेजा, लेकिन सवाल यही है कि ऐसा कदम कितने लोग उठाते हैं?

एक और उदाहरण है नमक्कल का। जाहिर है कि इसका नाम भी कईयों ने नहीं सुना होगा। नमक्कल के 3000 परिवारों के पास 18000 ट्र्क हैं। भारत के 70% टैंकर व्यवसाय का हिस्सा नमक्कल का होता है। चकरा गये ना !! तिरुपुर की ही तरह यहाँ भी अधिक पढ़े-लिखे लोग नहीं हैं, ना ही यहाँ विश्वविद्यालय हैं, न ही मैनेजमेंट संस्थान। लगभग सभी टैंकर मालिक कभी न कभी क्लीनर थे, किसी को अंग्रेजी नहीं आती, लेकिन ट्रक के मामले में वे उस्ताद हैं, पहले क्लीनर, फ़िर हेल्पर, फ़िर ड्रायवर और फ़िर एक टैंकर के मालिक, यही सभी की पायदाने हैं, और अब नमक्कल ट्रकों की बॉडी-बिल्डिंग (ढांचा तैयार करने) का एक बड़ा केन्द्र बनता जा रहा है। एक समय यह इलाका सूखे से लगातार जूझता रहता था, लेकिन यहाँ के मेहनती लोगों ने पलायन करने की बजाय यह रास्ता अपनाया।

पहले उन्होंने हाइवे पर आती-जाती गाड़ियों पर कपड़ा मारने, तेल-हवा भरने का काम किया, फ़िर सीखते-सीखते वे खुद मालिक बन गये। आज हरेक ट्रक पर कम से कम तीन लोगों को रोजगार मिलता है। एक-दो को देखकर दस-बीस लोगों को प्रेरणा मिलती है और वह भी काम पर लग जाता है, ठीक तिरुपुर की तरह। यह एक प्रकार का सामुदायिक विकास है, सहकारिता के साथ, इसमें प्रतिस्पर्धा और आपसी जलन की भावना तो है, लेकिन वह उतनी तीव्र नहीं क्योंकि हरेक के पास छोटा ही सही रोजगार तो है। और यह सब खड़ा किया है समाज के अन्दरूनी हालातों के साथ लोगों की लड़ने की जिद ने, न कि किसी आईआईएम ने। यही नहीं, ऐसे उदाहरण हमें समूचे भारत में देखने को मिल जाते हैं, चाहे वह कोयम्बटूर का वस्त्रोद्योग हो, सिवाकासी का पटाखा उद्योग, लुधियाना का कपड़ा, पटियाला का साइकिल उद्योग हो (यहाँ पर मैंने “अमूल” का उदाहरण नहीं दिया, वह भी सिर्फ़ और सिर्फ़ कुरियन साहब की मेहनत और सफ़ल ग्रामीण सहकारिता का नतीजा है)।

मोटी तनख्वाहें लेकर संतुष्ट हो जाने और फ़िर जीवन भर किसी अंग्रेज की गुलामी करने वालों से तो ये लोग काफ़ी बेहतर लगते हैं, कम से कम उनमें स्वाभिमान तो है। लेकिन जब मीडिया भी अनिल-मुकेश-मित्तल आदि के गुणगान करता रहता है, वे लोग भी पेट्रोल से लेकर जूते और सब्जी तक बेचने को उतर आते हैं, “सेज” के नाम पर जमीने हथियाते हैं, तो युवाओं के सामने क्या आदर्श पेश होता है? आखिर इतनी पूंजी का ये लोग क्या करेंगे? एक ही जगह इतनी ज्यादा पूंजी का एकत्रीकरण क्यों? क्या नीता अम्बानी को जन्मदिन पर 300 करोड़ का हवाई जहाज गिफ़्ट में देना कोई उपलब्धि है? लेकिन हो यह रहा है कि कॉलेज, संस्थान से निकले युवक की आँखों पर इन्हीं लोगों के नामों का पट्टा चढ़ा होता है, वह कुछ नया सोच ही नहीं पाता, नया करने की हिम्मत जुटा ही नहीं पाता, उसकी उद्यमशीलता पहले ही खत्म हो चुकी होती है। इसमें अपनी तरफ़ से टेका लगाते हैं, मैनेजमेंट संस्थान और उनके पढ़े-लिखे आधुनिक नौकर। जबकि इन लोगों को तिरुपुर, नमक्कल जाकर सीखना चाहिये कि स्वाभिमानी जीवन, लाखों की तनख्वाह से बढ़कर होता है…। जो प्रतिभाशाली, दिमागदार युवा दूसरे के लिये काम कर सकते हैं, क्या वे दो-चार का समूह बनाकर खुद की इंडस्ट्री नहीं खोल सकते? जरूर कर सकते हैं, जरूरत है सिर्फ़ मानसिकता बदलने की…

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English Medium Convent, Parents Children

मेरे शहर में कई स्कूल हैं (जैसे हर शहर में होते हैं), कई स्कूलों में से एक-दो कथित प्रतिष्ठित स्कूल(?) भी हैं (जैसे कि हर शहर में होते हैं), और उन एक-दो स्कूलों के नाम में “सेंट” या “पब्लिक” है (यह भी हर शहर में होता है)। जिस स्कूल के नाम में “सेंट” जुड़ा होता है, वह तत्काल प्रतिष्ठित होने की ओर अग्रसर हो जाता है। इसका सबसे पहला कारण तो यह है कि “सेंट” नामधारी स्कूलों में आने वाले माता-पिता भी “सेंट” लगाये होते हैं, दूसरा कारण है “सन्त” को “सेंट” बोलने पर साम्प्रदायिकता की उबकाई की बजाय धर्मनिरपेक्षता की डकार आती है, और भरे पेट वालों को भला-भला लगता है। रही बात “पब्लिक” नामधारी स्कूलों की…तो ऐसे स्कूल वही होते हैं, जहाँ आम पब्लिक घुसना तो दूर उस तरफ़ देखने में भी संकोच करती है।

ऐसे ही एक “सेंट”धारी स्कूल में कल एडमिशन फ़ॉर्म मिलने की तारीख थी, और जैसा कि “हर शहर में होता है” यहाँ भी रात 12 बजे से पालक अपने नौनिहाल का भविष्य सुधारने(?) के लिये लाइन में लग गये थे। खिड़की खुलने का समय था सुबह नौ बजे, कई “विशिष्ट” (वैसे तो लगभग सभी विशिष्ट ही थे) लोगों ने अपने-अपने नौकरों को लाईन में लगा रखा था। खिड़की खुलने पर एक भदेस दिखने वाले लेकिन अंग्रेजी बोलने वाले बाबू के दर्शन लोगों को हुए, जो लगभग झिड़कने के अन्दाज में उन “खास” लोगों से बात कर रहा था, “जन्म प्रमाणपत्र की फ़ोटोकॉपी लेकर आओ, फ़िर देखेंगे”, “यह बच्चे का ब्लैक-व्हाईट फ़ोटो नहीं चलेगा, कलर वाला लगाकर लाओ”, “फ़ॉर्म काले स्केच पेन से ही भरना”… आदि-आदि निर्देश (बल्कि आदेश कहना उचित होगा) वह लगे हाथों देता जा रहा था।

मुझ जैसे आम आदमी को जो यत्र-तत्र और रोज-ब-रोज धक्के खाता रहता है, यह देखकर बड़ा सुकून सा महसूस हुआ कि “चलो कोई तो है, जो इन रईसों को भी धक्के खिला सकता है, झिड़क सकता है, हड़का सकता है, लाईन में लगने पर मजबूर कर सकता है…”। स्कूल के बाहर खड़ी चमचमाती कारों को देखकर यह अहसास हो रहा था कि “सेंट” वाले स्कूल कितने “ताकतवर” हैं, जहाँ एडमिशन के लिये स्कूली शिक्षा मंत्री की सिफ़ारिश भी पूरी तरह काम नहीं कर रही थी। एक फ़ॉर्म की कीमत थी मात्र 200 रुपये, स्कूल वालों को कुल बच्चे लेने थे 100, लेकिन फ़ॉर्म बिके लगभग 1000, यानी दो लाख रुपये की “सूखी कमाई”, फ़िर इसके बाद दौर शुरु होगा “इंटरव्यू” का, जिसके लिये अभी से माता-पिता की नींदें उड़ चुकी हैं, यदि इंटरव्यू में पास हो गया (मतलब बगैर रसीद के भारी डोनेशन को लेकर सौदा पट जाये) तो फ़िर आजीवन स्कूल वालों की गालियाँ भी खाना है, क्योंकि यह मूर्खतापूर्ण मान्यता विकसित की गई है कि इन स्कूलों से "शासक" निकलते हैं, बाकी स्कूलों से "कामगार", जबकि यही वह स्कूल है, जहाँ हिन्दी में बातें करने पर दण्ड लगता है, बिन्दी लगा कर आने पर लड़कियों को सजा दी जाती है, और मेहंदी लगाकर आने पर कहर ही बरपा हो जाता है। लेकिन बच्चे के उज्जवल भविष्य(?) के लिये यह सब तो सहना ही होगा…

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