Less wood Hindu Cremation Environment
(भाग-2 से जारी…) अब चिता को जमाने का सही तरीका… यदि कण्डे उपलब्ध हों तो सबसे नीचे कण्डों की सेज बनाना चाहिये, फ़िर उसके ऊपर एक मोटी लकड़ी सिर की तरफ़ और दो मोटी लकड़ियाँ दोनों बाजू में रखना चाहिये, ताकि शरीर जब जलकर नीचे बैठे तो साइड से खिसक न जाये। अब बीच में बची हुई जगह पर पतली लकड़ियाँ जमाकर मुर्दे को उस पर लिटायें। अब सबसे पहले छाती पर एक मोटी लकड़ी, दूसरी सिर पर तथा तीसरी घुटनों पर रखें, जलने के दौरान अक्सर यही तीन स्थान अपने स्थान से खिसकने की सम्भावना होती है। बाकी की पतली लकड़ियाँ बीच-बीच में फ़ँसा दें, लेकिन इस तरह कि हवा का आवागमन बना रहे। बीच के खाली स्पेस में थोड़ा-थोड़ा फ़ूस भरते रहें जो हल्का सा बाहर की ओर निकला रहे, क्योंकि सबसे पहले उसी में आग लगानी है। प्रदक्षिणा के बाद जैसे ही व्यक्ति अग्नि दे, चारों तरफ़ के फ़ूस में आग लगाना शुरु करें, और बाकी लोगों को वहाँ से “हवा आने दो…” कहकर हटा दें, एक बार कण्डे आग पकड़ लें तो काम आसान हो जाता है, वैसे तो मुर्दे पर कर्मकांड के दौरान घी छिड़का / लेपा ही जायेगा, तो बाकी बची राल को धीरे-धीरे चिता में झोंकना शुरु करें ताकि आग तेजी से भड़के। चिता जमाते समय इस बात का खास खयाल रहे कि मुर्दे के हाथ और पैर पास-पास हों तथा उसके साइड में कम-से-कम एक-दो लकड़ियाँ अच्छी तरह से जमी हुई हों, कई बार देखा गया है कि आधी चिता जलने के बाद मुर्दे का एक हाथ या एक पैर बाहर आ जाता है। खैर, यहाँ आकर काम लगभग समाप्त हो जाता है, बस दूर बैठकर चिता के 75% जलने का इंतजार कीजिये, हो सकता है कि खोपड़ी फ़ूटने की आवाज भी सुनाई दे जाये, न भी दे तो क्या, अब मृतात्मा को अन्तिम नमस्कार कीजिये, शोक संतप्त को धीरज बँधाइये और घर जाइये, नहाइये-धोइये और अपने काम से लग जाइये, एक न एक दिन तो आपको भी यहीं आना है…

अब बात करते हैं पर्यावरण की… जैसा कि मैंने पहले कहा कि लकड़ियों से शवदहन की परम्परा को अब हमें वक्त रहते बदलना होगा, और विद्युत शवदाह की ओर चलना होगा। इसके लिये मन में पैठी ग्रंथियों को निकाल बाहर करने की आवश्यकता है। विद्युत शवदाह एक बेहतरीन, कम खर्च वाला, कम समय वाला, और पर्यावरण हितैषी उपाय है। लेकिन जब तक जागरूकता नहीं फ़ैलती, कम से कम तब तक हमें इस पारम्परिक चिता दहन में ही कुछ बदलाव करके लकड़ियों का उपयोग कम से कम करना चाहिये। यह काम दो क्विंटल और 20 कण्डे में हो सकता है, जरूरत है सिर्फ़ तकनीक को अपनाने की। मुझे इन्दौर, भोपाल, देवास, गोधरा, उज्जैन आदि जगहों पर जाकर शवयात्रा में शामिल होने का मौका मिला है, इन सबमें मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है गोधरा की श्मशान व्यवस्था ने। यहाँ चिता जलाने के लिये लोहे के पिंजरानुमा ब्लॉक बनाये गये हैं, एक स्टैण्ड पर रखे हुए जो ऊपर से खुले हैं, लेकिन नीचे और साइड से जालीनुमा खुला होता है, इसका फ़ायदा यह होता है कि इसमें कम लकड़ी लगती है, मुर्दे के हाथ पैर बाहर आने के कोई चांस नहीं, अस्थि संचय में भी आसानी, राख-राख नीचे गिर जाती है, बड़ी-बड़ी अस्थियाँ चुन ली जाती हैं। एक और जगह है (मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा), जहाँ अर्थी भी लोहे की रेडीमेड बनी हुई मिलती है, पहले जाकर ले आओ, सिर्फ़ मुर्दे को उस पर बाँधना होता है, और जलाने से पहले उसे श्मशान के कर्मचारी के हवाले कर दो बस… इसमें भी बाँस और खपच्चियों की बचत होती है। असल उद्देश्य है लकड़ी बचाना, यानी पेड़ बचाना चाहे वह कैसे भी हो। रही बात परम्पराओं की, तो वक्त के साथ बदलाव तो जरूरी है, महाराष्ट्र में भी लोगों ने घरों के गणेश विसर्जन अपने घर में एक बाल्टी में करना प्रारम्भ कर दिया है, जब चार-आठ दिन में मूर्ति पूरी तरह घुल जाये, उस पानी को पौधों में डाल दिया जाता है। पर्यावरण खतरों को देखते हुए परम्पराओं से मूर्खों की तरह चिपके रहने में कोई तुक नहीं है।

“मोक्षदा” नाम के एक NGO ने चिता दहन के लिये एक नया मॉडल तैयार किया है, जिसमें चार विभिन्न प्रकार के पर्यावरण हितैषी Eco-friendly (कम लकड़ी लगने वाले) चितादहन यन्त्र हैं, जिनकी कीमत 2 लाख से लेकर 20 लाख तक है (नगर निगमों में पैसे की कोई कमी नहीं है, यदि ईमानदारी से खर्च किया जाये तो)। शहर की जनसंख्या और श्मशान में आने वाले “ट्रैफ़िक” के हिसाब से अलग-अलग क्षमता का यन्त्र लगवाया जा सकता है। इस कीमत में उक्त NGO द्वारा एक स्थानीय व्यक्ति को ट्रेनिंग, और एक वर्ष का लकड़ी सहित पूरा खर्चा तथा मशीन की सर्विसिंग भी शामिल है। संस्था के आँकड़ों के अनुसार यदि यह संयंत्र 20 वर्ष तक सतत काम करता है (जिसमें औसतन 6 शव रोजाना का ऐवरेज रखा गया है) तो लगभग साढ़े चार- पाँच करोड़ रुपये की बचत होगी। यह तो हुई सीधी बचत, इसमें पेड़ों द्वारा मिलने वाली ऑक्सीजन, फ़ल-फ़ूल, जड़ी-बूटियाँ, मिट्टी की पकड़ बनाना, वर्षाजल को जमीन मे संरक्षित करना जैसे अनमोल फ़ायदे भी जोड़ लीजिये, और क्या चाहिये?

लम्बी-लम्बी पोस्ट लिखने की “बुरी आदत”(?) के चलते यह पोस्ट भी विस्तारित हो गई, लेकिन जैसा कि मैंने पहले ही कहा “विषय भी एकदम ‘हट-के’ था और मजेदार भी…”। बस यही अपेक्षा करता हूँ कि इसमें कई लोगों को कुछ नई जानकारियाँ मिली होंगी, कुछ लोगों को प्रेरणा मिली होगी (कुछ को घृणा भी आई होगी), लेकिन मेरा उद्देश्य एकदम साफ़ रहता है, “जनजागरण”। विद्युत शवदाह का जितना अधिक प्रचार हो उतना अच्छा, चिता में लकड़ियाँ कम से कम लगें ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी के लिये कुछ तो पेड़ बचें। दो काम मैं पूरी श्रद्धा के साथ करता हूँ, वर्ष भर में दो-तीन रक्तदान और कम से कम 5-6 शवयात्रा। और शवयात्राओं में जाने का मुख्य मकसद होता है वहाँ फ़ुर्सत में खड़े लोगों में से एकाध दो को विद्युत शवदाह, नेत्रदान और देहदान के बारे में “झिलवाना”… अब जैसे आप लोग मेरे इतने बड़े-बड़े लेख “झेल” गये, वैसे ही कुछ लोग तो वहाँ मिल ही जाते हैं, यदि एक साल में मेरे कहने भर से किसी एक व्यक्ति ने भी विद्युत शवदाह का उपयोग कर लिया, तो मेरी मेहनत सफ़ल!!! आपका क्या कहना है? टिप्पणी न करना हो न कीजिये, लेकिन इतना पढ़ने के बाद अब उठिये और शवयात्रा में शामिल हो जाइये। सिर्फ़ मजे लेने के लिये नहीं परन्तु शामिल लोगों को विद्युत शवदाह, नेत्रदान और देहदान के बारे में बताने के लिये। और कुछ नहीं तो ऐसे ही शाम को टहलते-टहलते श्मशान की तरफ़ हो आइये, देखिये वहाँ कितनी शांति है… क्या कहा!! डर लगता है, भाई मेरे जिंदा व्यक्ति से खतरनाक इस धरती पर और कुछ नहीं है… श्मशान काफ़ी अच्छी जगह है बाकी दुनिया के मुकाबले…

, , , , , , , , , , , ,
Published in ब्लॉग
Less wood Hindu Cremation Environment
(भाग-1 से जारी) अगला क्रम आता है मुर्दे को अंतिम यात्रा हेतु सजाने का। लगभग हर शहर में एक-दो दुकानें ऐसी होती हैं कि जहाँ इस गतिविधि का सामान तैयार “पैकेज” के रुप में मिलता है। आपको सिर्फ़ जाकर बताना होता है कि मृतक हिन्दू था, मुसलमान था या कुछ और था, ब्राह्मण था, ठाकुर था, या कोई और। सम्बन्धित दुकानदार एकदम अचूक तरीके से आपको एक पूरा पैकेज देता है, जिसमें सफ़ेद कपड़ा, दो बाँस, खपच्चियाँ, मटकी, रस्सी, आटा, जौ, काले तिल, गुलाल आदि सभी सामान एकमुश्त होता है। शवयात्रा का समय तय होते ही तत्काल किसी को भेज कर सामान मंगवा लिया जाये और सामान सावधानीपूर्वक अलग-अलग कर लिया जाये ताकि ऐन वक्त पर किसी तरह की परेशानी न हो। कई समाजों में पूरी तैयारी के पश्चात रिश्तेदारों द्वारा मुर्दे को शॉल ओढ़ाने का चलन होता है, ऐसे में पहले ही सम्बन्धित व्यक्तियों से पूछ लें कि क्या उन्होंने शॉल खरीद ली है। कई बार यह देखा गया है कि जब मुर्दे को बाँधने की तैयारी करते हैं तो कोई एक चीज कम पड़ जाती है या दुकानदार द्वारा पैकेज में गलती से नहीं रखी जाती तब खामख्वाह की भागदौड़ मचती है और अप्रिय दृश्य उत्पन्न होता है।
आइये अब बाँधना शुरु करते हैं… कई बयानवीर, घोषणावीर ऐसे वक्त पर एकदम पीछे नजर आते हैं, आप आगे बढ़िये, इसमें डरने की कोई बात नहीं है, यदि आप मरने वाले को जानते भी नहीं तो क्या हुआ, मरने वाला उठ खड़ा नहीं होगा कि “अबे तू कौन है मुझे उठाने वाला…”। मैंने कई लोगों को डरते हुए देखा है, मानो उनके परिवार में कभी कोई मरेगा ही नहीं, बल्कि ऐसे-ऐसे वीर भी देखे हैं जो लठ्ठ लेकर पड़ोसी का सिर खोल देंगे, लेकिन शवयात्रा में इसलिये नहीं जायेंगे कि “डर लगता है…” खैर उन्हें छोड़िये, दो-दो ईंटें कुछ दूरी पर जमाकर उस पर लम्बे वाले बाँस रखें, बाँस की खपच्चियाँ अमूमन सही नाप की होती हैं उन्हें एक निश्चित दूरी बनाकर रखते हुए दोनो सिरों पर बाँधना शुरु करें, दोनों तरफ़ एक-सवा फ़ुट का अन्तर छोड़ा जाना चाहिये ताकि चारों कंधा देने वाले को आसानी हो। पूरी तरह बँधने के बाद उस पर घास के पूले में से घास फ़ैलाकर बिछा दें और सफ़ेद कपड़ा दोनों सिरों पर छेद करके इकहरा फ़ँसा दें (बाकी का कपड़ा वैसा ही रहेगा, क्योंकि वह मुर्दे को अर्थी पर लिटाने के बाद उस पर दूसरी तरफ़ से आयेगा)। अब धीरे से बॉडी को उठाकर अर्थी पर रखें और बाकी का कपड़ा गले तक लाकर उसे बाँधना शुरु करें। बाँधते समय यह ध्यान रखें कि मुर्दे के दोनों पैरों के अंगूठे आपस में कसकर बाँधे जायें, कई बार देखा गया है कि पैर खुल जाते हैं और एक पैर बाहर लटक जाता है, दोनों हाथ यदि पेट पर रखकर बाँधे जायें तो ज्यादा सही रहता है।

अब बारी आती है ले जाने की, आजकल लगभग हर बड़े शहर, कस्बे में “शव वाहन” उपलब्ध होता है, नगर निगम में ड्रायवर को पहले से फ़ोन करके समय बता दें (अपने तय किये समय से आधा घंटा बाद ही बतायें) ताकि उसका भी कीमती समय खराब न हो, क्योंकि उसे तो दिन भर में आठ-दस शव ले जाने हैं। जब शव-वाहन की व्यवस्था न हो और कंधों पर ही ले जाना हो तो पहले से आठ-दस गबरू जवान छाँट लें और उन्हें “समझा” दें ताकि बीच रास्ते में कोई परेशानी न हो। जैसे ही शव वाहन चौराहे के कोने पर आकर रुके, अर्थी उठाने की जल्दी करें, जल्दी-जल्दी अंतिम दर्शन करवाने की पहल करें, यदि इस वक्त संभालने वाले न हों, तो कई बार बड़ी अप्रिय स्थिति उत्पन्न हो जाती है। कृपा करके अपने-अपने मोबाइल “साइलेंस” मोड पर रखें, और इसी वक्त कोई जरूरी फ़ोन आ जाये तो दूर जाकर धीमे-धीमे बातें करें। इस वक्त मोबाइल की रिंगटोन बड़ी खीझ उत्पन्न करती है, और बाकी लोग आपको लगभग मार डालने के अन्दाज में घूरेंगे। एक बार एक सज्जन(?) मुर्दे को हार पहनाने के लिये झुके और “कजरारे-कजरारे तेरे कारे-कारे नैना…” की जोरदार चाइना-स्टाइल रिंगटोन बजी, सोचिये कि शोकाकुल रिश्तेदारों पर क्या प्रभाव पड़ा होगा?

अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर… श्मशान घाट पहुँचने के पहले ही दो-चार पठ्ठों को भेजकर लकड़ी, कंडे, राल (इसका नाम अलग-अलग जगहों पर अलग हो सकता है, हमारे यहाँ इसे “राल” कहते हैं, यह मटमैला सा बड़े दानेदार होता है, जिसे चिता में फ़ेंकने पर आग भड़कती है), फ़ूस, घी, आटा तुलवाकर रख लें। आमतौर पर एक सामान्य व्यक्ति को जलाने के लिये ढाई-तीन क्विंटल लकड़ी (मोटी और पतली मिलाकर) तथा लगभग 40 कण्डे लगते हैं। आजकल गौवंश के बढ़ते नाश के कारण कण्डे आसानी से उपलब्ध नहीं होते हैं, यदि उपलब्ध हों तो बेहतर, शुरुआती आग लगाने के लिये थोड़ा सा फ़ूस (सूखी लम्बी घास) तथा आग भड़काने के लिये घी और राल, बस यही सामान है जो आखिरी वक्त हम और आप सभी कभी न कभी, श्मशान की किसी छत पर बैठकर देख पायेंगे, जी हाँ भूत बनकर। यही वह जगह होती है जहाँ आपको दुनिया भर के “रायचन्द” मिल जाते हैं, जिनके बाप ने भी कभी चिता न देखी हो, वे भी सलाहें देने लगते हैं। वैसे तो श्मशान पर उपलब्ध कर्मचारी सही लकड़ी देगा ही, लेकिन फ़िर भी ध्यान रखें कि कम से कम 6 लकड़ियाँ तो ऐसी हों जिसे हम “डूंड” कहते हैं अर्थात बेहद मोटी, बाकी की लकड़ियाँ पतली होना चाहिये। आपको लकड़ियाँ फ़िल्मों जैसी नहीं मिलेंगी अब जरा मूड हल्का करने के लिये इसे पढ़ें “फ़िल्मी मौत : क्या सीन है”

आखिरी किस्त मिलेगी… भाग-3 में

, , , , , , , , , , , ,
Published in ब्लॉग
Less wood Hindu Cremation Environment
बहुत दिनों से विचार कर रहा था कि इस विषय पर लिखा जाये। खोजबीन करने पर पाया कि इस विषय पर कुछ खास उल्लेखनीय नहीं लिखा गया है, जबकि “मौत” ही इस जीवन का सबसे बड़ा सत्य है जिससे बड़े से बड़ा पैसे वाला, प्रसिद्धि वाला भी नहीं बच सकता। भारत में हिन्दुओं की परम्परा के अनुसार मृत्यु के बाद शव को जलाने की प्रथा है। इस लेख में मैंने सिर्फ़ हिन्दुओं की इस पद्धति पर ही लिखने की कोशिश की है, अन्य धर्मों या समुदायों के अन्तिम संस्कार के बारे में लिखना उचित नहीं है, क्योंकि उनकी पद्धतियाँ, संस्कार आदि अलग-अलग होते हैं जिसके बारे में मेरी जानकारी कम है।

यहाँ तक कि हिन्दुओं में भी चूंकि कई पंथ हैं, समुदाय हैं, जातियाँ हैं, उपजातियाँ हैं, जिनमें दाह संस्कार के अलग-अलग तरीके अपनाये जाते हैं। इस लेख का उद्देश्य किसी की भावनाओं को चोट पहुँचाने का नहीं है, बल्कि दाह संस्कार ठीक ढंग से हो, “मिट्टी” को सही तरीके से ठिकाने लगाया जाये, कोई फ़ूहड़ता न हो, और न ही शोकाकुल व्यक्तियों को मानसिक चोट पहुँचे, यह है।


व्यक्तिगत रूप से मुख्यतः दो कारणों से मैं शव के दाह संस्कार के खिलाफ़ हूँ। पहला, देश में एक वर्ष में लगभग 5 करोड़ पेड़ सिर्फ़ शवदाह के लिये काटे जाते हैं, हिन्दुओं की आबादी एक अरब पहुँचने वाली है और दूसरी तरफ़ जंगल साफ़ होते जा रहे हैं (सोचकर कंपकंपी होती है कि बाकी के कामों के लिये कितने करोड़ पेड़ काटे जाते होंगे)। और दूसरा, हमारी तथाकथित “पवित्र” नदियाँ जो पहले से ही उद्योगपतियों द्वारा प्रदूषित कर दी गई हैं, शवों की राख और अस्थि विसर्जन से बेहद मैली हो चुकी हैं। लेकिन मन में संस्कारों की इतनी गहरी पैठ होती है कि मृत्यु के बाद विद्युत शवदाह के लिये उठने वाली इक्का-दुक्का आवाज सख्ती से दबा दी जाती है और अन्ततः लकड़ियों से ही शव को जलाना होता है। बड़े शहरों में तो धीरे-धीरे (मजबूरी में ही सही) लोग विद्युत शवदाहगृहों का उपयोग करने लगे हैं (एक तो श्मशान पास नहीं होते और दूसरा लकड़ियों के भाव भी अनाप-शनाप बढ़ गये हैं), लेकिन कस्बों और गाँवों में आज भी विद्युत शवदाहगृहों को आम जनता “अच्छी निगाह”(?) से नहीं देखती। अक्सर इन शवदाह गृहों का उपयोग लावारिस लाशों, भिखारियों, बगैर पहचान के सड़क दुर्घटनाओं में मरे हुए लोगों के लिये नगर निगम और पुलिस करती है। जबकि आज जरूरत इस बात की है कि आम जनता को विद्युत शवदाह के बारे में शिक्षित और जागरूक किया जाये। न सिर्फ़ विद्युत शवदाह बल्कि अंगदान के बारे में भी, क्योंकि मरने के बाद तो शरीर मिट्टी हो गया, अब कम से कम उसके दो-चार अंग तो काम में लिये जायें। हाल ही में मालवा के कुछ समाजसेवियों ने सम्पूर्ण “शरीर दान” करने के संकल्प को फ़ैलाने का काम किया है। मेडिकल कॉलेज बढ़ रहे हैं, उनमें छात्रों की संख्या बढ़ रही है, उन्हें “प्रैक्टिकल” के लिये “शरीर” नहीं मिल रहे, कॉलेज प्रबन्धन दुर्घटनाओं में मरे हुए कटे-फ़टे शवों से काम चला रहा है, ऐसे में यदि पूरी तरह से साबुत स्वस्थ शरीर का मुर्दा उन्हें मिल जाये तो विद्यार्थियों को सीखने में आसानी होगी, लेकिन “मरने के बाद मुक्ति” वाला फ़ण्डा(?) शरीर दान करने से रोकता है। राह मुश्किल जरूर है, लेकिन धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ रही है, लोग पहले आँखे ही आसानी से दान नहीं करते थे, परन्तु जैसे अब नेत्रदान तेजी से फ़ैल रहा है, उसी तरह “देहदान” भी बढ़ेगा। विषय इतना विस्तृत और रोचक है कि न चाहते हुए भी विषयांतर हो ही जाता है, मैं बता रहा था शवदाह के बारे में और पहुँच गया “देहदान” पर…

तो पेश है मेरी दसियों शवयात्राओं में शिरकत के अनुभव का निचोड़, मेरी कोशिश होगी कि इसमें अंत तक हरेक बात पर लिखा जाये। भारत इतना विशाल और भिन्नताओं से भरा है अतः पाठकों से भी आग्रह है कि अपने क्षेत्र विशेष की शवदाह परम्परा, तरीके, खासियत आदि का उल्लेख अपनी टिप्पणियों में अवश्य करें, ताकि लोगों को विभिन्न संस्कृतियों के बारे में पता चल सके। हम शुरु करते हैं “एकदम शुरु” से…। शुरु से मेरा मतलब है कि मौत कहाँ हुई है उससे, यदि मौत घर पर ही हुई है तो सबसे पहले उस कमरे को जितना हो सके खाली कर लेना चाहिये, मुर्दे को नीचे कमरे के बीचोंबीच जमीन पर सीधा लेटाकर, सिर्फ़ मुँह खुला रखते हुए बाकी पूरा चादर से ढँक देना चाहिये, ताकि अंतिम दर्शनों के लिये आने वाला आसानी से उसकी परिक्रमा भी कर सके और दण्डवत प्रणाम भी कर सके। जाहिर है कि ये बात शोक संतप्त परिजनों को बाद में सूझेगी, इसलिये यार-दोस्तों-मित्रों को पहल करके सबसे पहले ये काम करना चाहिये। कई बार देखने में आया है कि मुर्दा किसी पलंग पर पड़ा रहता है, जो कि कमरे एक कोने में होता है, आसपास रोने-धोने वालों की भीड़ होती है, ऐसे में जो बाहर से आता है वह बेचारा सहमा सा दरवाजे के बाहर से ही नमस्कार करके चलता बनता है, यदि वाकई कोई मृतक का खास मित्र है तो वह व्यथित होता है कि वह छू न पाया, या ठीक से देख न पाया। नाते-रिश्तेदारों, सगे-सम्बन्धियों में से किसी मुख्य व्यक्ति से पहले ही पूछ लें कि “क्या आसपास के किसी रिश्तेदार का इंतजार करना है?”, यदि ऐसा हो तो आने वालों को तत्काल सूचना दे दें कि शवयात्रा फ़लाँ के आने के बाद इतने बजे निकलेगी। यदि ज्यादा समय लगने वाला हो तो बर्फ़ की सिल्ली की व्यवस्था भी कर लें और शरीर को बर्फ़ की सिल्ली पर शिफ़्ट कर दें। यदि मौत किसी अस्पताल में हुई है, या दुर्घटना की वजह से हुई है तो एम्बुलेंस के घर आने से पहले ये सारी व्यवस्थायें हो जायें तो अच्छा। साथ ही यदि बॉडी पोस्टमॉर्टम की हो और चेहरा विच्छेदित हो तो कोशिश करें कि बॉडी कम से कम समय ही घर पर रखी जाये, और किसी तरह समझा-बुझा कर ऐसे शव का विद्युत शवदाह करवाने का प्रयास करें। जारी रहेगा…अगले भाग में

भाग-2 में आप पायेंगे अर्थी को सजाने और चिता को सही ढंग से लगाने का तरीका…

, , , , , , , , , , , ,
Published in ब्लॉग
Morning After Pills, FDA, health threats
ऐसा लगता है कि अब यह मान लिया गया है कि “नैतिक शिक्षा” की बात करना दकियानूसी है और सार्वजनिक स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में नैतिकता की बात करना बेवकूफ़ी। सरकारों की सोच है कि समाज को खुला छोड़ देना चाहिये और उस पर कोई बन्धन लागू नहीं करना चाहिये, ठीक वैसे ही जैसा कि सरकारों ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये किया हुआ है। फ़िल्मों और टीवी के बढ़ते खुलेपन ने बच्चों को तेजी से जवान बनाना शुरु कर दिया है, डॉक्टर भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि लड़कियों में मासिक धर्म की औसत आयु काफ़ी कम हो चुकी है। भारत के समाज में धीरे-धीरे कपड़े उतारने की होड़ बढ़ती जा रही है, और दुख की बात यह है कि सरकारें भी इसमें खुलकर साथ दे रही हैं। कभी वह “जोर से बोलो कंडोम” का नारा लगवाती हैं, तो कभी एनजीओ (NGO) के माध्यम से ट्रक ड्रायवरों और झुग्गियों में कंडोम बँटवाती हैं। हाल ही में एक और धमाकेदार(?) गोली कुछ जानी-मानी कम्पनियों ने बाजार में उतारी है, जिसे कहते हैं “मॉर्निंग आफ़्टर पिल्स” (Morning After Pills)। इस गोली की खासियत(?) और कर्म यह है कि यदि यौन सम्बन्धों के दौरान कोई गलती से कोई असुरक्षा हो जाये और गर्भधारण का खतरा बन जाये तो स्त्री को अगले 72 घंटों के दौरान कभी भी यह गोली ले लेनी चाहिये, इससे गर्भधारण का खतरा नहीं रहता। यह गोली स्त्री के शारीरिक हार्मोन्स में परिवर्तन करके सम्भावित गर्भधारण की प्रक्रिया को रोक देती है। शर्त यही है कि इसे यौन सम्बन्ध के तुरन्त बाद जितनी जल्दी हो सके ले लेना चाहिये, ताकि यह अधिक से अधिक प्रभावशाली साबित हो। यहाँ तक तो सब ठीक-ठीक ही नजर आता है, लेकिन असली पेंच आगे शुरु होता है।



जैसा कि सभी जानते हैं कि भारतवासी कानून तोड़ने में सबसे आगे रहते हैं, किस तरह से अनुशासन को तोड़ा जाये, सरकारी कानूनों को धता बताया जाये, कैसे गड़बड़ी करके अपना फ़ायदा देखा जाये इसमें भारत के लोग एकदम उर्वर दिमाग वाले हैं। सरकारी एजेंसियाँ, और सरकारी कर्मचारी अपना काम कितनी ईमानदारी से करते हैं, ये भी सबको मालूम है। एक सर्वेक्षण में यह सामने आया है कि इन “मॉर्निंग आफ़्टर पिल्स” का सर्वाधिक उपयोग कुंआरी लड़कियाँ कर रही हैं। इन गोलियों की सबसे ज्यादा खपत कॉलेज कैम्पस, कोचिंग क्लासेस, ब्यूटी पार्लर के आसपास की मेडिकल दुकानों से हो रही है, ठीक उसी तरह जैसे कि “कंडोम” की बिक्री में उछाल “नवरात्रि” के समय सबसे ज्यादा देखा गया है। उल्लेखनीय है कि इन गोलियों के विज्ञापन में “फ़िलहाल” एक विवाहित स्त्री-पुरुष ही दिखाये जाते हैं, तथा इन गोलियों के पैकेट पर भी फ़िलहाल एक विवाहित स्त्री ही दिखाई गई है। “फ़िलहाल” कहने का तात्पर्य सिर्फ़ यही है कि अभी शुरुआत में कम्पनियों द्वारा ऐसा किया जा रहा है, फ़िर धीरे से पैकेट की स्त्री के माथे से बिन्दी गायब हो जायेगी, फ़िर कुछ वर्षों में उस पैकेट पर अविवाहित नवयुवती दिखाई देगी, इस छुपे हुए संदेश के साथ कि “सेक्स में कोई बुराई नहीं है, जमकर मुक्त आनन्द उठाओ… बस गर्भधारण करना गुनाह है, इससे बचो, हमारी गोली लो और आजाद रहो…”। रही-सही कसर टीवी, अखबार, चिकनी पत्रिकायें पूरी कर ही रही हैं, जो सेक्स पर खुलकर बात कर रही हैं, हमें बताया जा रहा है कि भारतीय नारियों की “सेक्स भूख” बढ़ रही है, हमें लगातार सिखाया जा रहा है कि बाजार में एक से एक कंडोम (सुगंधित भी) मौजूद हैं, सम्बन्ध बनाओ लेकिन सुरक्षित बनाओ…आदि-आदि। कोई भी यह सिखाने को तैयार नहीं कि “संयम” रखना सीखो, “नैतिकता” का पालन करो, एक विशेष उम्र तक यौन सम्बन्धों के बारे में सोचो भी नहीं, बल्कि “रियलिटी शो” में मासूम बच्चों को लिपस्टिक पोतकर, “लव-लव” सिखाया जा रहा है।

यह तो हुआ लेख का नैतिक पहलू, और इसमें बहस की काफ़ी गुंजाइश है, आजकल नारियों-लड़कियों को कोई संदेश देना भी खतरे से खाली नहीं है, क्योंकि “स्त्री मुक्ति” के नाम पर चढ़ दौड़ने वालियाँ कई हैं। तो फ़िलहाल मैं इसे व्यक्तिगत नैतिकता के तौर पर छोड़ देता हूँ कि जिसे ये गोली लेना हो वह ले, न लेना हो तो न ले।

लेकिन दूसरा पहलू जो कि स्वास्थ्य से जुड़ा है वह मानवीय पहलू है। अमेरिका के फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) जो कि सभी प्रकार के खाद्य पदार्थ और दवाओं को अमेरिका में बेचने से पहले अनुमति देता है, ने अपने अध्ययन निष्कर्षों से चेताया है कि इस प्रकार की “मॉर्निंग आफ़्टर पिल्स” के उपयोग से पहले बहुत सावधानी जरूरी है। उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि इस प्रकार की गोलियों में एक जहरीला पदार्थ “डाइ-ईथाइल-स्टिल्बेस्टेरॉल” (DES) पाया जाता है, और कई लड़कियों में (चूँकि अमेरिका में गर्भवती किशोरियाँ नाम की कौम आमतौर पर पाई जाती है) इस DES की मात्रा घातक स्तर तक पाई गई है। असल में होता यह है कि चूँकि ये गोलियाँ “ऑन द काउंटर” (OTC) उत्पाद हैं, इसलिये बगैर सोचे-समझे युवतियाँ इसका उपयोग करने लगती हैं जबकि FDA पहले ही DES को जानवरों के लिये प्रतिबन्धित कर चुका है। जैसा कि मैंने पहले कहा कि इनका असर तभी सर्वाधिक होता है जब यौन सम्बन्ध के 24 घंटे के अन्दर इसे ले लिया जाये, लेकिन अक्सर इसे 72 घंटे बाद तक लिया जा रहा है, इसका नुकसान यह है कि तब तक युवती के गर्भवती होने की प्रक्रिया शुरु हो चुकी होती है। इस स्थिति में घबराहट में वे दो-चार गोलियाँ ले लेती हैं और उसके जहरीले (Carcinogenic) अंश से भ्रूण की हत्या तो हो जाती है, लेकिन स्त्री के शरीर पर इसका बेहद बुरा असर होता है। FDA के अनुसार इन गोलियों के सेवन से कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, सिरदर्द, चक्कर आना, घबराहट, मासिक धर्म में परिवर्तन आदि कई बीमारियाँ भी साथ में हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि मान लो तमाम “सद्प्रयासों” के बावजूद गर्भ ठहर जाये (क्योंकि डॉक्टर स्पष्ट कहते हैं कि इस बात की कोई गारंटी नहीं ली जा सकती कि इस गोली को लेने के बाद गर्भधारण नहीं होगा) तो इन गोलियों के असर के कारण होने वाले बच्चे का मानसिक विकास अवरुद्ध हो सकता है या वह विकलांग पैदा हो सकता है। यह गोली “कभीकभार” लेने के लिये है, लेकिन होता यह है कि “मुक्त समाज” में लड़कियाँ इसे महीने में आठ-दस बार तक ले लेती हैं, और फ़िर इसके भयंकर दुष्परिणाम होते हैं, यह बुरी सम्भावना भारत के युवाओं पर भी लागू होगी।



ऐसे में विचारणीय है कि भारत जैसे देश में जहाँ न तो ईमानदारी से कोई ड्रग कानून लागू होता है, न ही यहाँ किसी दवाई में क्या-क्या मिला हुआ है इसकी सार्वजनिक घोषणा की जाती है, सरेआम क्रोसिन, विक्स, बेनाड्रिल जैसी आम दवाइयाँ तो ठीक एंटीबायोटिक्स तक बगैर डॉक्टरी पर्चे के बेच दिये जाते हैं… पशुओं के साथ इंसानों के लिये भी खतरनाक “ऑक्सीटोसिन” को ज्यादा दूध के लालच में खुलेआम भैंसों को लगाया जा रहा है… कई ड्रग जो कि सारे विश्व में प्रतिबन्धित हो चुके हैं यहाँ आराम से बिक रहे हैं… ये “मॉर्निंग आफ़्टर पिल्स” क्या गजब ढायेंगी? विशेषज्ञ डॉक्टर की देखरेख में ही इन गोलियों को लिया जाना चाहिये, लेकिन असल में क्या होगा ये हम सभी जानते हैं…। पुरुष सत्तात्मक समाज में इन गोलियों के विभिन्न आपराधिक दुरुपयोग होने की भी पूरी सम्भावना है। लेकिन जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि इसके खिलाफ़ आवाज उठाना या नैतिकता की बात करना भी “संघी” विचारधारा का माना जाता है, ऐसे में खुल्लमखुल्ला यौन दुराचरण के साथ-साथ स्त्रियों के गंभीर स्वास्थ्य क्षरण का खतरा सिर पर मंडरा रहा है। पश्चिम की नकल करने के चक्कर में भारत तेजी से अंधे कुंए की ओर दौड़ लगा रहा है। जय हो यौन शिक्षा की…

, , , , , , , , , , , ,
Published in ब्लॉग
GPS Microchips Terrorism Criminals RFID
(भाग-1 से जारी)
पिछले भाग में हमने GPS तकनीक वाली चिप के बारे में जानकारी हासिल की थी, जो कि नवीनतम है, अब थोड़ा जानते हैं एक पुरानी तकनीक RFID के बारे में, जो कि अब काफ़ी आम हो चली है (जी हाँ भारत में भी…)

RFID तकनीक वाली माइक्रोचिप -

RFID तकनीक से काम करने वाली माइक्रोचिप के डाटा को पढ़ने के लिये एक विशेष “रीडर” की आवश्यकता होती है, जिसमें से उस व्यक्ति को गुजारा जाता है (उदाहरण के तौर पर मेटल डिटेक्टर जैसी)। साथ ही इस चिप की “रेंज” मात्र कुछ किलोमीटर तक ही होती है, अर्थात इसमें से निकलने वाली “फ़्रीक्वेंसी” को कुछ दूरी तक ही पकड़ा जा सकता है। इसमें माइक्रोचिप फ़िट किये गये व्यक्ति या जानवर को “स्कैन” किया जाता है, और उसका सारा डाटा कम्प्यूटर पर हाजिर होता है। अक्सर इस तकनीक का उपयोग पालतू जानवरों के लिये किया जाता है। आमतौर पर इस माइक्रोचिप का उपयोग उच्च सुरक्षा वाले इलाकों, महत्वपूर्ण दस्तावेजों की आलमारी, या पुलिस विभाग के गोपनीय विभाग में किया जाता है। इस प्रकार के विभागों में सिर्फ़ वही व्यक्ति घुस सकता है जिसकी बाँह के नीचे यह माइक्रोचिप फ़िट किया हुआ है, कोई अवांछित व्यक्ति जब उस “रेंज” में प्रवेश करता है तो अलार्म बजने लगता है। यह तकनीक परमाणु संस्थानों और सेना के महत्वपूर्ण कार्यालयों की सुरक्षा के लिये बहुत जरूरी है।



अमेरिका में तीस वर्ष पूर्व सबसे पहले भैंस पर इसका सफ़ल प्रयोग किया गया। उस भैंस को चरागाह और जंगल में खुला छोड़ दिया गया और उन पर फ़्रीक्वेंसी के जरिये “निगाह” रखी गई, वे कहाँ जाती है, क्या-क्या खाती हैं, आदि। इस प्रयोग की सफ़लता के बाद तो मछलियों, बैलों, कुत्तों आदि को लाखों माइक्रोचिप्स लगाई जा चुकी हैं। इससे जानवर के गुम जाने पर उसे ढूँढने में आसानी हो जाती है। अब इन RFID चिप का उपयोग नाके पर ऑटोमेटिक पेमेंट के लिये कारों में (अमेरिका में चेक नाकों पर इस तकनीक से पेमेंट सीधे क्रेडिट कार्ड के जरिये कट जाता है), लाइब्रेरी की महत्वपूर्ण और कीमती पुस्तकों में (ताकि चोरी होने की स्थिति में उसका पता लगाया जा सके), यहाँ तक कि वालमार्ट जैसे बड़े मॉल में कीमती सामानों में भी लगाया जाता है (चोर तो हर जगह मौजूद होते हैं ना!!)। इस तकनीक में सुरक्षा एजेंसियों को सिर्फ़ जगह-जगह कैमरे फ़िट करने होते हैं और उन्हें इनकी रेडियो फ़्रिक्वेंसी से “तालमेल” करवा दिया जाता है, बस उन कैमरों के सामने से निकलने वाली हर माइक्रोचिप की गतिविधि, उसकी दिशा आदि का तत्काल पता चल जाता है।

11 सितम्बर के हमले के बाद अमेरिका में आज तक कोई आतंकवादी हमला नहीं हो पाया, जबकि भारत में तो हर महीने एक हमला होता है और मासूम नागरिक मारे जाते हैं। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि हरेक नागरिक को यह “चिप” लगवा लेना चाहिये तथा इसे “निजी मामलों में दखल” न समझा जाये बल्कि देश की सुरक्षा के लिहाज से इसे देखा जाना चाहिये। हालांकि “निजता (Privacy) में सरकारी निगरानी” जैसी बात को लेकर, जनता का रुख अभी नकारात्मक है, लेकिन प्रशासन लोगों को राजी करने में लगा हुआ है। इसे लगाने की तकनीक भी बेहद आसान है, एक मामूली इंजेक्शन के जरिये इसे कोहनी और कंधे के बीच में पिछले हिस्से में त्वचा के अन्दर फ़िट कर दिया जाता है। एक मिर्गी के मरीज ने इसे फ़िट करवा लिया है, जब भी उसे दौरा पड़ने की नौबत आती है, या वह बेहोशी की हालत में अस्पताल में लाया जाता है, इस “चिप” के कारण डॉक्टरों को उसके पिछले रिकॉर्ड के बारे सब कुछ पहले से मालूम रहता है और उसका इलाज तत्काल हो जाता है।

वैसे एक माइक्रोचिप की औसत उम्र 10 से 15 साल होती है, और एक बार फ़िट कर दिये जाने के बाद इसे निकालना आसान नहीं है। हरेक चिप का 16 अंकों का विशेष कोड नम्बर होता है, जिससे इसकी स्कैनिंग आसानी से हो जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन माइक्रोचिप को शरीर से निकाला जा सकता है, लेकिन उसके लिये पहले पूरे शरीर का एक्सरे करना पड़ेगा, क्योंकि वह चिप अधिकतर शरीर में स्किन के नीचे खिसकते-खिसकते कहीं की कहीं पहुँच जाती है। इसमें एक सम्भावना यह भी है कि कहीं वह अपराधी किसी मुठभेड़ में या आपसी गैंगवार में बुरी तरह घायल हो जाये, तो कहीं बहते खून के साथ यह माइक्रोचिप भी न निकल जाये।



अमेरिका की सबसे बड़ी माइक्रोचिप बनाने वाली कम्पनी “वेरीचिप कॉर्प” अब तक 7000 से ज्यादा माइक्रोचिप बना चुकी है जिसे विभिन्न पालतू जानवरों को लगाया जा चुका है, साथ ही 2000 माइक्रोचिप विभिन्न व्यक्तियों को भी लगाई जा चुकी है, जिनमें से अधिकतर गम्भीर डायबिटीज, अल्जाइमर्स पीड़ित या हृदय रोगियों को लगाई गई हैं। चूंकि यह तकनीक अभी नई है, इसलिये फ़िलहाल इसकी कीमत 200 से 300 डॉलर के आसपास होती है, लेकिन जैसे-जैसे यह आम होती जायेगी स्वाभाविक रूप से यह चिप सस्ती पड़ेगी। लेकिन जैसा कि मैंने पिछले लेख में कहा कि यदि “तरल” रूप में नैनो जीपीएस तकनीक वाली माइक्रोचिप आ जाये तो सुरक्षा एजेंसियों को जबरदस्त फ़ायदा हो जायेगा…

, , , , , , , , , , , , , ,
Published in ब्लॉग
GPS Microchips Terrorism Criminals RFID
अपराध को रोकने या आतंकवादियों के नेटवर्क को तोड़ने में विज्ञान ने बहुत बड़ा सहयोग किया है। विज्ञान की मदद से फ़िंगरप्रिंट, डीएनए (DNA) आदि तकनीकें तो चल ही रही हैं, साथ ही में एक प्रयोग “नार्को-टेस्ट” (Narcotics Test) का भी है, जिसमें अधिकतर अपराधी सच्चाई उगल देते हैं। हालांकि अभी नार्को टेस्ट की वीडियो रिकॉर्डिंग को न्यायालय में मान्यता हासिल नहीं है, क्योंकि अपराधी का उच्चारण अस्पष्ट और लड़खड़ाता हुआ होता है, लेकिन इस उगली हुई जानकारी का उपयोग पुलिस आगे अन्य जगहों पर छापे मारने या उसके साथियों के नाम-पते जानकर उन्हें गिरफ़्तार करने में करती है। इस लिहाज से “नार्को-टेस्ट” एक क्रांतिकारी कदम सिद्ध हुआ है।

बीती सदी में विज्ञान ने निश्चित ही बहुत-बहुत तरक्की की है। वैज्ञानिकों के कई प्रयोगों के कारण आम जनता के साथ ही सरकारों को भी काफ़ी फ़ायदा हुआ है, चाहे वह हरित क्रांति हो या मोबाइल क्रांति। वैज्ञानिक हमेशा जीवन को उद्देश्यपूर्ण और सुलभ बनाने के लिये ही नित्य नये प्रयोग करते रहते हैं, इन्हीं लाखों आविष्कारों में से एक है माइक्रोचिप का आविष्कार। जैसा कि नाम से ही जाहिर है “माइक्रोचिप” मतलब एक कम्प्यूटराइज्ड डाटा चिप जो आकार में अधिकतम चावल के एक दाने के बराबर होती है। अधिकतम इसलिये बताया ताकि पाठकों को इसके आकार के बारे में सही ज्ञान हो जाये, अन्यथा यह इतनी छोटी भी होती है कि इसे इंजेक्शन के सहारे किसी के शरीर में डाला जा सकता है, और व्यक्ति को इसका पता भी नहीं चलेगा। ये माइक्रोचिप दो तरह की तकनीकों में आती है, पहली है RFID (Radio Frequency Identification Device) और दूसरी होती है GPS (Global Positioning System)।



पहले हम देखेंगे GPS तकनीक वाली माइक्रोचिप के बारे में, क्योंकि यह तकनीक नई है, जबकि RFID वाली तकनीक पुरानी है। GPS (Global Positioning System) जैसा कि नाम से ही जाहिर है, एक ऐसी तकनीक है, जिसमें सम्बन्धित उपकरण हमेशा सैटेलाइट के माध्यम से जुड़ा रहता है, पूरी पृथ्वी पर जहाँ कहीं भी वह उपकरण जायेगा, उसकी “लोकेशन” का पता लगाया जा सकता है। यह तकनीक गत कुछ वर्षों में ही इतनी उन्नत हो चुकी है कि उपकरण के पाँच सौ मीटर के दायरे तक यह अचूक काम करती है (इसी तकनीक की सहायता से अमेरिका जीपीएस फ़ोन के सिग्नलों को पकड़कर, अब तक ओसामा पर कई मिसाइल आक्रमण कर चुका है)। इस तकनीक में जिस उपकरण या व्यक्ति को निगरानी में रखना है, उसकी त्वचा में एक माइक्रोचिप फ़िट कर दी जाती है, जिसका सम्बन्ध एक सामान्य जेण्ट्स पर्स के आकार के ट्रांसमीटर से होता है, यह ट्रांसमीटर लगातार सिग्नल भेजता रहता है, जिसे सैटेलाइट के माध्यम से पकड़ा जाता है। पश्चिमी देशों में आजकल कई बड़े उद्योगपतियों ने अपहरण से बचने के लिये इस तकनीक को अपनाया है, लेकिन इसका ॠणात्मक (Negative) पहलू यह है कि सिग्नल भेजने वाला वह ट्रांसमीटर सतत व्यक्ति के साथ होना चाहिये, और उसका साइज इतना बड़ा तो होता ही है कि उसे आसानी से छिपाया नहीं जा सकता (हालांकि उसमें भी ऐसे नये-नये प्रयोग हो चुके हैं कि कोई भी सिर्फ़ देखकर नहीं कह सकता कि यह “ट्रांसमीटर” है, जैसे ग्लोव्स, साबुन, पर्स, सिगरेट लाइटर आदि के आकारों में)। ऐसे में यदि अपहरणकर्ताओं को पहले से मालूम हो कि फ़लाँ व्यक्ति ने यह उपकरण लगवाया हुआ है, तो अपहरण करते ही सबसे पहले वे उस ट्रांसमीटर को पहचानने के बाद निकालकर फ़ेंक देंगे और अपने शिकार को कहीं दूर ले जायेंगे, लेकिन यदि वह ट्रांसमीटर किसी तरह से अपहृत व्यक्ति से दूर नहीं हो पाया तब तो अपराधियों की खैर नहीं, पुलिस तत्काल GPS से उस व्यक्ति की लोकेशन पता कर लेगी और अपहरणकर्ताओं पर चढ़ बैठेगी। आजकल मोबाइल या कारों में GPS तकनीक का जमकर उपयोग हो रहा है। मोबाइल गुम जाये तो ऑफ़ करने के बाद भी पता चल जायेगा कि वह कहाँ है, इसी प्रकार कार ड्रायवर के लिये रास्ता ढूँढने, टक्कर से बचाने आदि के लिये GPS का बड़ा रोल प्रारम्भ हो चुका है।



यहाँ तक तो हुई हकीकत की बात, अब मैं अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाता हूँ। सभी जानते हैं कि आजकल “नैनो-टेक्नोलॉजी” (Nano-Technology) का जोर है, “नैनो” यानी कि “बहुत ही छोटी” और वैज्ञानिकों में हरेक वस्तु छोटी से छोटी बनाने का जुनून सवार है, और यह जगह की दृष्टि से उपयोगी भी है। ऐसे में मेरे मन में एक सवाल आता है कि क्या यह GPS माइक्रोचिप भी “नैनो” आकार में लगभग “तरल द्रव्य” के रूप में नहीं बनाई जा सकती? यह इतनी “नैनो” होना चाहिये कि माइक्रोचिप और उसका ट्रांसमीटर दोनों को मानव शरीर में फ़िट कर दिया जाये और सामने वाले को इसका पता तक न चले। भविष्य की तकनीक को देखते हुए यह बिलकुल सम्भव है। अब सोचिये सुरक्षा एजेंसियों को इस “नैनो तकनीक” का कितना फ़ायदा होगा। जैसे ही कोई अपराधी या आतंकवादी पकड़ा जाये, उसे “नार्को-टेस्ट” के नाम पर बंगलोर ले जाया जाये, पहले तो “नार्को-टेस्ट” में जितना उगलवाया जा सकता है, निकलवा लिया जाये, फ़िर जाते-जाते, उस आतंकवादी के शरीर में यह GPS आधारित ट्रांसमीटर इंजेक्शन के जरिये रोपित कर दिया जाये। हमारी महान न्याय व्यवस्था, भ्रष्ट राजनेताओं और “देशद्रोही” वकीलों की मेहरबानी से आज नहीं तो कल वे खतरनाक आतंकवादी छूट ही जायेंगे, उस वक्त उन पर खास निगरानी रखने में ये माइक्रोचिप बेहद उपयोगी सिद्ध होंगी। जैसे ही कोई आतंकवादी छूटेगा, वह अपने अन्य साथियों से मिलने जरूर जायेगा, तब पुलिस GPS के जरिये उनका ठिकाना आसानी से ढूंढ लेगी, और उन पुलिसवालों में से कोई “असली देशभक्त” निकल आया तो वहीं उनके ठिकाने पर हाथोंहाथ “फ़ैसला” हो जायेगा। यदि वह अपने पुराने ठिकाने पर नहीं भी जाता, या अपने साथियों से नहीं भी मिलता, या किसी तरह से उसे पता चल जाये कि वह GPS की निगरानी में है, तब भी पुलिस को कम से कम यह तो पता रहेगा कि आज की तारीख में वह आतंकवादी भारत में है या पाकिस्तान, नेपाल, मलेशिया में है। सुरक्षा के लिहाज से इतना भी कुछ कम नहीं है।

सवाल है कि क्या ऐसी तकनीक फ़िलहाल उपलब्ध है? यदि नहीं तो क्या वैज्ञानिक इस पर काम कर रहे हैं? और जैसा मैं सोच रहा हूँ, यदि वैसी कोई तकनीक मिल जाये तो सुरक्षा एजेंसियों का काम कितना आसान हो जाये… लेकिन शायद फ़िलहाल ऐसी कोई GPS माइक्रोचिप नहीं आती जिससे कि रोपित व्यक्ति की एकदम सही-सही स्थिति पता चल जाये। हो सकता है कि मेरा यह संदेश देश-विदेश के वैज्ञानिकों और वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों तक पहुँच जाये और वे इस पर प्रयोगों को जोर-शोर से आगे बढ़ायें… वैसे आपको ये आइडिया कैसा लगा?

अगले भाग में RFID तकनीक माइक्रोचिप के बारे में थोड़ा सा…

, , , , , , , , , , , , , ,
Published in ब्लॉग
(भाग-1 से जारी…)
All about AK-47, Kalashnikov
एके-47 चलाने में आसान, निर्माण में सस्ती और रखरखाव में बेहद सुविधाजनक होती है। वजन में बेहद हल्की (भरी हुई होने पर मात्र साढ़े चार किलो), लम्बाई सिर्फ़ 36 इंच (तीन फ़ुट), एक बार में 600 राउंड गोलियाँ दागने में सक्षम, और क्या चाहिये!! दुनिया के किसी भी मौसम में, कैसे भी प्रदेश में इसको चलाने में कोई तकलीफ़ नहीं होती। शुरु में कलाश्निकोव ने इसे उन रूसी सैनिकों के लिये बनाया था, जिन्हें आर्कटिक (Arctic) के बर्फ़ीले प्रदेशों में मोटे-मोटे दस्ताने पहने हुए ही गन चलानी पड़ती थी, और तेज बर्फ़बारी के बावजूद इसे “मेंटेनेन्स” करना पड़ता था। यदि अच्छे इस्पात से बनाई जाये तो लगभग बीस से पच्चीस साल तक इसमें कोई खराबी नहीं आती। सही ढंग से “एडजस्ट” किये जाने के बाद यह लगभग 250 मीटर तक का अचूक निशाना साध सकती है, अर्थात बिना किसी तकनीकी जानकारी या एडजस्टमेंट के भी आँख मूँदकर पास के अचूक निशाने लगाये जा सकते हैं। इसका गोलियों का चेम्बर, बोर और गैस सिलेंडर क्रोमियम का बना होता है, इसलिये जंग लगने का खतरा नहीं, मेंटेनेन्स का झंझट ही नहीं और लाइफ़ भी जोरदार। इसे मात्र एक बटन के जरिये ऑटोमेटिक या सेमी-ऑटोमेटिक में बदला जा सकता है। सेमी-ऑटोमेटिक का मतलब होता है कि चलाने वाले को गोलियां चलाने के लिये बार-बार ट्रिगर दबाना होता है, जबकि इसे ऑटोमेटिक कर देने पर सिर्फ़ एक बार ट्रिगर दबाने से अपने-आप गोलियां तब तक चलती जाती हैं, जब तक कि मैगजीन खाली न हो जाये। ऐसा इसकी गैस चेम्बर (Gas Chamber) और शानदार स्प्रिंग तकनीक के कारण सम्भव होता है। इस गन में सिर्फ़ आठ पुर्जे ऐसे हैं जो “मूविंग” हैं, इसलिये कोई बिना पढ़ा-लिखा सिपाही भी एक बार सिखाने के बाद ही इसे मात्र एक मिनट में पूरी खोल कर फ़िर फ़िट कर सकता है। यही है रूसी रिसर्च और तकनीक का कमाल और अब जिसकी सभी नकल कर रहे हैं।



“द गार्जियन” को दिये एक इंटरव्यू में मिखाइल कलाश्निकोव कहते हैं कि “मुझे अपने बनाये हुए सभी हथियारों से बेहद प्रेम है, और मुझे गर्व है कि मैंने मातृभूमि की सेवा की। इसमें मुझे किसी तरह का अपराध बोध नहीं है कि मेरी बनाई हुई गन से करोड़ों लोग मारे जा चुके हैं। एके-47 मेरे लिये सबसे प्यारे बच्चे की तरह है, मैंने उसका निर्माण किया है, उसे पाला-पोसा और बड़ा किया। एक देशभक्त और तकनीकी व्यक्ति होने के नाते यह मेरा फ़र्ज था। मैंने इस रायफ़ल से लाखों गोलियां दागी हैं और उसी के कारण आज मैं लगभग बहरा हो गया हूँ, लेकिन मुझे कोई शिकायत नहीं है। मैंने इसे इतना आसान बनाया कि फ़ैक्ट्री में औरतें और बच्चे भी इसका निर्माण आसानी से कर लेते हैं”। वे कहते हैं कि “मुझे किसी तरह शर्मिन्दा होने की क्या आवश्यकता है? मैंने इसका निर्माण अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिये किया था, अब यह पूरे विश्व में फ़ैल चुकी है तो इसमें मेरा क्या दोष है? यह तो बोतल से निकले एक जिन्न की तरह है, जिस पर अब मेरा कोई नियन्त्रण नहीं है। एक तथ्य आप लोग भूल जाते हैं कि लोग एके-47 या उसके डिजाइनर की वजह से नहीं मरते, वे मरते हैं राजनीति की वजह से…”।

कलाश्निकोव अपने बचपन की यादों में खोते हुए बताते हैं कि “उन दिनों हमारे यहाँ अनाज तो हुआ करता था, लेकिन चक्कियाँ नहीं थीं, मैने आटा बनाने के लिये विशेष डिजाइन की चक्कियों का निर्माण किया। रेल्वे की नौकरी के दौरान मैं एक इंजन बनाना चाहता था, जो कभी खराब ही न हो, लेकिन तकदीर ने मुझसे एके-47 का निर्माण करवाया, और उसमें भी मैंने अपना सर्वोत्कृष्ट दिया। है न मजेदार!!! रह-रहकर मन में एक सवाल उठता है कि भारत में इस तरह के आविष्कारकों को सरकार की तरफ़ से कितने सम्मान मिले हैं? हमारे यहाँ भी गाँव-गाँव में कलाश्निकोव जैसी प्रतिभायें बिखरी पड़ी हैं, जो पानी में चलने वाली सायकल, मिट्टी और राख से बनी मजबूत ईंटें, हीरो-होंडा के इंजन से सिंचाई के लिये लम्बी चलने वाली मोटर, पानी साफ़ करने वाला तीन परतों वाला मटका, जैसे सफ़ल स्थानीय और देशी प्रयोग करते हैं, उन्हें क्यों नहीं बढ़ावा दिया जाता? लालफ़ीताशाही और मानसिक गुलामी में हम इतने डूब चुके हैं कि हमें हमारे आसपास के हीरे तक नजर नहीं आते… सचमुच विडम्बना है।

, , , , , , , , , ,
Published in ब्लॉग
AK-47, Mikhael Kalashnikov, Russia
परमाणु बम के बाद सबसे घातक हथियार कौन सा है? इसका सीधा सा जवाब होना चाहिये, एके-47। गत सत्तर वर्षों में इस रायफ़ल से लाखों लोगों की जान गई है। हरेक व्यक्ति की हथियार के रूप में सबसे पहली पसन्द होती है एके-47। आखिर ऐसा क्या खास है इसमें? क्यों यह इतनी लोकप्रिय है, और इसके जनक मिखाइल कलाश्निकोव (Kalashnikov) के बारे में आप कितना जानते हैं? आइये देखें -

कलाश्निकोव की ऑटोमेटिक मशीनगन की सफ़लता का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लगभग 100 से भी अधिक देशों की सेनायें इस रायफ़ल (Rifle) का उपयोग कर रही हैं। कई देशों के “प्रतीक चिन्हों” में एके-47 का चित्र शामिल किया गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार 1990 तक लगभग 7 करोड़ एके-47 रायफ़लें पूरे विश्व में उपलब्ध थीं, जिनकी संख्या आज की तारीख में बीस करोड़ से ऊपर है। सबसे अधिक आश्चर्यजनक बात यह है कि आज तक कलाश्निकोव ने इसका पेटेंट नहीं करवाया, इसके कारण इस गन में हरेक देश ने अपनी जरूरतों के मुताबिक विभिन्न बदलाव किये, पाकिस्तान के सीमान्त प्रांत (Frontier) में तो इसका निर्माण एक “कुटीर उद्योग” की तरह किया जाता है। हर सेना और हर आतंकवादी संगठन इसे पाने के लिये लालायित रह्ता है।



मिखाइल कलाश्निकोव का जन्म 10 नवम्बर 1919 को रूस (USSR) में अटलाई प्रांत के कुर्या गाँव में एक बड़े परिवार में हुआ था। सेकण्डरी स्कूल से नौंवी पास करने के बाद कलाश्निकोव ने पास के मताई डिपो में बतौर अप्रेन्टिस नौकरी की शुरुआत की, और धीरे-धीरे तुर्किस्तान-सर्बियन रेल्वे में “टेक्निकल क्लर्क” के पद पर पहुँच गये। 1938 में विश्व युद्ध की आशंका के चलते उन्हें “लाल-सेना” से बुलावा आ गया, और कीयेव के टैंक मेकेनिकल स्कूल में उन्होंने काम किया। इसी दौरान उनका तकनीकी कौशल उभरने लगा था, टैंक की इस यूनिट में नौकरी के दौरान ही टैंको द्वारा दागे गये गोलों की संख्या गिनने के लिये “काऊंटर” बना लिया और उसे टैंकों में फ़िट किया। सेना के उच्चाधिकारियों की निगाह तभी इस प्रतिभाशाली युवक पर पड़ गई थी। अक्टूबर 1941 में एक भीषण युद्ध के दौरान कलाश्निकोव बुरी तरह घायल हुए और उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। उस वक्त मशीनगन पर काम कर रहे उनके अधिकारी मिखाइल टिमोफ़ीविच ने उन्हें इस पर आगे काम करने को कहा। अस्पताल के बिस्तर पर बिताये छः महीनों में कलाश्निकोव ने अपने दिमाग में एक सब-मशीनगन का रफ़ डिजाइन तैयार कर लिया था। वह वापस अपने डिपो में लौटे और उन्होंने उसे अपने नेताओं और कामरेडों की मदद से मूर्तरूप दिया। जून 1942 में कलाश्निकोव की सब-मशीनगन वर्कशॉप में तैयार हो चुकी थी, इस डिजाइन को रक्षा अकादमी में भेजा गया। वहाँ सेना के अधिकारियों और प्रसिद्ध सेना वैज्ञानिक एए ब्लागोन्रारोव ने उनके प्रोजेक्ट में रुचि दिखाई। हालांकि इतनी आसानी से तकनीकी लोगों और वैज्ञानिकों ने कलाश्निकोव पर भरोसा नहीं किया और सन 1942 के अंत तक वे सेंट्रल रिसर्च ऑर्डिनेंस डिरेक्टोरेट में ही काम पर लगे रहे। 1944 में कलाश्निकोव ने एक “सेल्फ़ लोडिंग कार्बाइन” का डिजाइन तैयार किया, 1946 में इसके विभिन्न टेस्ट किये गये और अन्ततः 1949 में इसे सेना में शामिल कर लिया गया। इस आविष्कार के लिये कलाश्निकोव को प्रथम श्रेणी का स्टालिन पुरस्कार दिया गया। रूसी सरकार ने कलाश्निकोव का बहुत सम्मान किया है, उन्हें दो बार 1958 और 1976 में “हीरो ऑफ़ सोशलिस्ट लेबर”, 1949 में “स्टालिन पुरस्कार”, 1964 में “लेनिन पुरस्कार” आदि। 1969 में उन्हें सेना में “कर्नल” का रैंक दिया गया और 1971 में “डॉक्टर ऑफ़ इंजीनियरिंग” की मानद उपाधि भी दी गई। 1980 से उन्हें कुर्या गाँव का “प्रथम नागरिक” मान लिया गया और 1987 में इझ्वेस्क प्रान्त के मानद नागरिक का सम्मान उन्हें दिया गया। खुद रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने अपने हाथों से “मातृभूमि की विशेष सेवा के लिये” उन्हें रूसी ऑर्डर से सम्मानित किया और 75 वीं सालगिरह के मौके पर उन्हें मानद “मेजर जनरल” (Major General) की उपाधि भी दी गई।

अगले भाग में हम एके-47 की खूबियों और इसके बारे में खुद कलाश्निकोव के विचार जानेंगे (जारी भाग-2 में…)

, , , , , , , , , ,
Published in ब्लॉग
US India Kashmir Yugoslavia Serbia Kosovo
पुराने लोग कह गये हैं कि “शैतान हो या भगवान, पहचानना हो तो उसके कर्मों से पहचानो…”। हालांकि फ़िलहाल यह एक “दूर की कौड़ी” है, लेकिन अमेरिका नामक शैतान का क्या भरोसा, आगे दिये गये उदाहरण से पाठक सोचने पर मजबूर हो जायेंगे कि यह “दूर की कौड़ी” किसी दिन “गले की फ़ाँस” भी बन सकती है। अमेरिका की यह पुरानी आदत है कि वह वर्तमान दोस्त में भी भावी दुश्मन की सम्भावना रखते हुए, कोई न कोई मुद्दा अनसुलझा रख कर उसपर विश्व राजनीति थोपता रहता है। जैसा कि रूस-अफ़गानिस्तान, ईरान-ईराक, चीन-ताइवान, भारत-पाकिस्तान आदि। अब जरा भविष्य की एक सम्भावना पर सोचें…

यदि अचानक अमेरिका “कश्मीर” को एक अलग राष्ट्र के तौर पर मान्यता दे देता है, तो हम कुछ नहीं कर सकेंगे। उसका एकमात्र और मजबूत कारण (अमेरिका की नजरों में) यह होगा कि कश्मीर में 99% जनता मुस्लिम है। यूगोस्लाविया नाम के देश की बहुत लोगों को याद होगी। कई पुराने लोग अब भी “पंचशील-पंचशील” जपते रहते हैं, जिसमें से एक शक्तिशाली देश था यूगोस्लाविया। जिसके शासक थे मार्शल टीटो। यूगोस्लाविया का एक प्रांत है “कोसोवो”, जहाँ की 90% आबादी मुस्लिमों की है, उसे अमेरिका और नाटो देशों ने एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी है। हालांकि भारत सरकार इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार नहीं कर रही है (हमेशा की तरह)।



1999 में अमेरिका और नाटो ने यूगोस्लाविया पर बमबारी करके सर्बिया के एक हिस्से कोसोवो पर कब्जा जमा लिया था, तब से “नाटो” ही इस इलाके का मालिक है। सर्ब नेता मिलोसेविच ने इसका विरोध किया और कोसोवो में कत्लेआम मचाना शुरु किया तब अमेरिका ने उसे युद्धबंदी बना लिया और कोसोवो से ईसाई सर्बों को खदेड़ना शुरु कर दिया। आज के हालात में कोसोवो में गिने-चुने सर्बियाई बचे हैं (इसे भारत के कश्मीर से तुलना करके देखें…जहाँ से हिन्दुओं को भगा दिया गया है, और लगभग 99% आबादी मुस्लिम है, और भाई लोगों को गाजा-पट्टी की चिंता ज्यादा सताती है)।

(इस अगले उदाहरण को भी भारत के सन्दर्भ में तौल कर देखिये…) 1980 से पहले तक यूगोस्लाविया एक समय एक बहुभाषी और बहुलतावादी संस्कृति का मजबूत अर्थव्यवस्था वाला देश था। यूरोप में वह एक औद्योगिक शक्ति रहा और आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर भी था। 1980 में यूगोस्लाविया की जीडीपी वृद्धि दर 6.1 प्रतिशत थी, साक्षरता दर 91% और जीवन संभावना दर 72 वर्ष थी। लेकिन दस साल के पश्चिमी आर्थिक मॉडल का अनुसरण, फ़िर पाँच साल तक युद्ध, बहिष्कार और बाहरी हस्तक्षेप ने यूगोस्लाविया को तोड़ कर रख दिया। IMF की विचित्र नीतियों से वहाँ का औद्योगिक वातावरण दूषित हो गया और कई उद्योग बीमार हो गये। समूचे 90 के दशक में विश्व बैंक और आईएमएफ़ यूगोस्लाविया को कड़वी आर्थिक गोलियाँ देते रहे और अन्ततः उसकी अर्थव्यवस्था पहले धराशाई हुई और फ़िर लगभग कोमा में चली गई…

एक तरफ़ तो अमेरिका और नाटो मुस्लिम आतंकवादियो के खिलाफ़ युद्ध चलाये हुए हैं, और दूसरी तरफ़ विश्व के कई हिस्सों में उनकी मदद भी कर रहे हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि जिमी कार्टर और रोनाल्ड रेगन ने अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान को लगातार हथियार दिये, 1992 में बिल क्लिंटन जम्मू-कश्मीर को एक विवादित इलाका कह चुके हैं, 1997 में क्लिंटन ने ही तालिबान को पैदा किया और पाला-पोसा, 1999 में अमेरिका और नाटो ने यूगोस्लाविया पर हमला करके “बोस्निया” नामक इस्लामिक राज्य बना दिया और अब गैरकानूनी तरीके से उसे एक मुस्लिम राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी।

हमारे लिये सबक बिलकुल साफ़ है, फ़िलहाल तो हम अमेरिका के हित और फ़ायदे में हैं, इसलिये वह हमें “परमाणु-परमाणु” नामक गुब्बारा-लालीपाप पकड़ा रहा है, लेकिन जिस दिन भी हमारी अर्थव्यवस्था चरमरायेगी, या भारत अमेरिका के लिये उपयोगी और सुविधाजनक नहीं रहेगा, या कभी अमेरिका को आँखे दिखाने की नौबत आयेगी, उस दिन अमेरिका कश्मीर को एक “स्वतंत्र मुस्लिम राष्ट्र” घोषित करने के षडयन्त्र में लग जायेगा… जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि भले ही यह अभी “दूर की कौड़ी” लगे, लेकिन बुरा वक्त कभी कह कर नहीं आता। हमारी तैयारी पहले से होनी चाहिये, और वह यही हो सकती है कि कश्मीर के मुद्दे को जल्द से जल्द कैसे भी हो सुलझाना होगा, धारा 370 हटाकर घाटी में हिन्दुओं को बसाना होगा जिससे जनसंख्या संतुलन बना रहे। अमेरिका का न कभी भरोसा था, न किसी को कभी होगा, वे लोग सिर्फ़ अपने फ़ायदे का सोचते हैं। “विश्व गुरु” बनने या “सत्य-अहिंसा” की उसे कोई चाह नहीं है…न ही हमारे खासुलखास पड़ोसियों को… आप भले ही भजते रहिये कि “भारत एक महाशक्ति बनने वाला है, बन रहा है आदि-आदि”, लेकिन हकीकत यही है कि हम “क्षेत्रीय महाशक्ति” तक नहीं हैं, पाकिस्तान-बांग्लादेश तो खुलेआम हमारे दुश्मन हैं, श्रीलंका भी कोई बात मानता नहीं, नेपाल जब-तब आँखें दिखाता रहता है, बर्मा के फ़ौजी शासकों के सामने हमारी घिग्घी बँधी हुई रहती है, ले-देकर एक पिद्दी सा मालदीव बचा है (यदि उसे पड़ोसी मानें तो)। कमजोर सरकारों, लुंजपुंज नेताओं और नपुंसकतावादी नीतियों से देश के टुकड़े-टुकड़े होने से कोई रोक नहीं सकता, आधा कश्मीर तो पहले से ही हमारा नहीं है, बाकी भी चला जायेगा, ठीक ऐसा ही खतरा उत्तर-पूर्व की सीमाओं पर भी मंडरा रहा है, और यदि हम समय पर नहीं जागे तो……


, , , , , , , , , , , , , ,

सन्दर्भ: डॉ दीपक बसु (प्रोफ़ेसर-अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था) नागासाकी विश्वविद्यालय, जापान
Published in ब्लॉग
Spiritualism Baba Guru Copyright Patent

लाइनस टोर्वाल्ड्स और रिचर्ड स्टॉलमैन, ये दो नाम हैं। जो लोग कम्प्यूटर क्षेत्र से नहीं हैं, उन्हें इन दोनों व्यक्तियों के बारे में पता नहीं होगा। पहले व्यक्ति हैं लाइनस जिन्होंने कम्प्यूटर पर “लाइनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम” का आविष्कार किया और उसे मुक्त और मुफ़्त किया। दूसरे सज्जन हैं स्टॉलमैन, जो कि “फ़्री सॉफ़्टवेयर फ़ाउंडेशन” के संस्थापक हैं, एक ऐसा आंदोलन जिसने सॉफ़्टवेयर दुनिया में तहलका मचा दिया, और कई लोगों को, जिनमें लाइनस भी थे, प्रेरित किया कि वे लोग निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा के लिये मुफ़्त सॉफ़्टवेयर उपलब्ध करवायें। अधिकतर पाठक सोच रहे होंगे कि ये क्या बात हुई? क्या ये कोई क्रांतिकारी कदम है? जी हाँ है… खासकर यदि हम आधुनिक तथाकथित गुरुओं, ज्ञान गुरुओं और आध्यात्मिक गुरुओं के कामों को देखें तो।

(लाइनस टोरवाल्ड्स)

(रिचर्ड स्टॉलमैन)


आजकल के गुरु/ बाबा / महन्त / योगी / ज्ञान गुरु आदि समाज को देते तो कम हैं उसके बदले में शोषण अधिक कर लेते हैं। आजकल के ये गुरु कॉपीराइट, पेटेंट आदि के जरिये पैसा बनाने में लगे हैं, यहाँ तक कि कुछ ने तो कतिपय योग क्रियाओं का भी पेटेण्ट करवा लिया है। पहले हम देखते हैं कि इनके “भक्त”(?) इनके बारे में क्या कहते हैं –
- हमारे गुरु आध्यात्म की ऊँचाइयों तक पहुँच चुके हैं
- हमारे गुरु को सांसारिक भौतिक वस्तुओं का कोई मोह नहीं है
- फ़लाँ गुरु तो इस धरती के जीवन-मरण से परे जा चुके हैं
- हमारे गुरु तो मन की भीतरी शक्ति को पहचान चुके हैं और उन्होंने आत्मिक शांति हासिल कर ली है… यानी कि तरह-तरह की ऊँची-ऊँची बातें और ज्ञान बाँटना…



अब सवाल उठता है कि यदि ये तमाम गुरु इस सांसारिक जीवन से ऊपर उठ चुके हैं, इन्हें पहले से ही आत्मिक शांति हासिल है तो काहे ये तमाम लोग कॉपीराइट, पेटेण्ट और रॉयल्टी के चक्करों में पड़े हुए हैं? उनके भक्त इसका जवाब ये देते हैं कि “हमारे गुरु दान, रॉयल्टी आदि में पैसा लेकर समाजसेवा में लगा देते हैं…”। इस प्रकार तो “बिल गेट्स” को विश्व के सबसे बड़े आध्यात्मिक गुरु का दर्जा दिया जाना चाहिये। बल्कि गेट्स तो “गुरुओं के गुरु” हैं, “गुरु घंटाल” हैं, बिल गेट्स नाम के गुरु ने भी तो कॉपीराइट और पेटेण्ट के जरिये अरबों-खरबों की सम्पत्ति जमा की है और अब एक फ़ाउण्डेशन बना कर वे भी समाजसेवा कर रहे हैं। श्री श्री 108 श्री बिल गेट्स बाबा ने तो करोड़ों डॉलर का चन्दा विभिन्न सेवा योजनाओं में अलग-अलग सरकारों, अफ़्रीका में भुखमरी से बचाने, एड्स नियंत्रण के लिये दे दिया है।

यदि लोग सोचते हैं कि अवैध तरीके से, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, अत्याचार करके कमाई हुई दौलत का कुछ हिस्सा वे अपने कथित “धर्मगुरु” को देकर पाप से बच जाते हैं, तो जैसे उनकी सोच गिरी हुई है, ठीक वैसी ही उनके गुरुओं की सोच भी गिरी हुई है, जो सिर्फ़ इस बात में विश्वास रखते हैं कि “पैसा कहीं से भी आये उन्हें कोई मतलब नहीं है, पैसे का कोई रंग नहीं होता, कोई रूप नहीं होता…” इसलिये बेशर्मी और ढिठाई से तानाशाहों, भ्रष्ट अफ़सरों, नेताओं और शोषण करने वाले उद्योगपतियों से रुपया-पैसा लेने में कोई बुराई नहीं है। ऐसा वे खुद प्रचारित भी करते / करवाते हैं कि, पाप से कमाये हुए धन का कुछ हिस्सा दान कर देने से “पुण्य”(?) मिलता है। और इसके बाद वे दावा करते हैं कि वे निस्वार्थ भाव से समाजसेवा में लगे हैं, सभी सांसारिक बन्धनों से वे मुक्त हैं आदि-आदि… जबकि उनके “कर्म” कुछ और कहते हैं। बिल गेट्स ने कभी नहीं कहा कि वे एक आध्यात्मिक गुरु हैं, या कोई महान आत्मा हैं, बिल गेट्स कम से कम एक मामले में ईमानदार तो हैं, कि वे साफ़ कहते हैं “यह एक बिजनेस है…”। लेकिन आडम्बर से भरे ज्ञान गुरु यह भी स्वीकार नहीं करते कि असल में वे भी एक “धंधेबाज” ही हैं… आधुनिक गुरुओं और बाबाओं ने आध्यात्म को भी दूषित करके रख दिया है, “आध्यात्म” और “ज्ञान” कोई इंस्टेण्ट कॉफ़ी या पिज्जा नहीं है कि वह तुरन्त जल्दी से मिल जाये, लेकिन अपने “धंधे” के लिये एक विशेष प्रकार का “नकली-आध्यात्म” इन्होंने फ़ैला रखा है।

दूसरी तरफ़ लाइनस और स्टॉलमैन जैसे लोग हैं, जो कि असल में गुरु हैं, “धंधेबाज” गुरुओं से कहीं बेहतर और भले। ये दोनों व्यक्ति ज्यादा “आध्यात्मिक” हैं और सच में सांसारिक स्वार्थों से ऊपर उठे हुए हैं। यदि ये लोग चाहते तो टेक्नोलॉजी के इस प्रयोग और इनका कॉपीराइट, पेटेण्ट, रॉयल्टी से अरबों डॉलर कमा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। मेहनत और बुद्धि से बनाई हुई तकनीक उन्होंने विद्यार्थियों और जरूरतमन्द लोगों के बीच मुफ़्त बाँट दी। कुछ ऐसा ही हिन्दी कम्प्यूटिंग और ब्लॉगिंग के क्षेत्र में है। कई लोग शौकिया तौर पर इससे जुड़े हैं, मुफ़्त में अपना ज्ञान बाँट रहे हैं, जिन्हें हिन्दी टायपिंग नहीं आती उनकी निस्वार्थ भाव से मदद कर रहे हैं, क्यों? क्या वे भी पेटेण्ट करवाकर कुछ सालों बाद लाखों रुपया नहीं कमा सकते थे? लेकिन कई-कई लोग हैं जो सैकड़ों-हजारों की तकनीकी मदद कर रहे हैं। क्या इसमें हमें प्राचीन भारतीय ॠषियों की झलक नहीं मिलती, जिन्होंने अपना ज्ञान और जो कुछ भी उन्होंने अध्ययन करके पाया, उसे बिना किसी स्वार्थ या कमाई के लालच में न सिर्फ़ पांडुलिपियों और ताड़पत्रों पर लिपिबद्ध किया बल्कि अपने शिष्यों और भक्तों को मुफ़्त में वितरित भी किया। बगैर एक पल भी यह सोचे कि इसके बदले में उन्हें क्या मिलेगा?



लेकिन ये आजकल के कथित गुरु-बाबा-प्रवचनकार-योगी आदि… किताबें लिखते हैं तो उसे कॉपीराइट करवा लेते हैं और भारी दामों में भक्तों को बेचते हैं। कुछ अन्य गुरु अपने गीतों, भजनों और भाषणों की कैसेट, सीडी, डीवीडी आदि बनवाते हैं और पहले ये देख लेते हैं कि उससे कितनी रॉयल्टी मिलने वाली है। कुछ और “पहुँचे हुए” गुरुओं ने तो योग क्रियाओं का भी पेटेण्ट करवा लिया है। जबकि देखा जाये तो जो आजकल के बाबा कर रहे हैं, या बता रहे हैं या ज्ञान दे रहे हैं वह सब तो पहले से ही वेदों, उपनिषदों और ग्रंथों में है, फ़िर ये लोग नया क्या दे रहे हैं जिसकी कॉपीराइट करना पड़े, क्या यह भी एक प्रकार की चोरी नहीं है? सबसे पहली आपत्ति तो यही होना चाहिये कि उन्होंने कुछ “नया निर्माण” तो किया नहीं है, फ़िर वे कैसे इससे पेटेण्ट / रॉयल्टी का पैसा कमा सकते हैं?

लेकिन फ़िर भी उनके “भक्त” (अंध) हैं, वे जोर-शोर से अपना “धंधा” चलाते हैं, दुनिया को ज्ञान(?) बाँटते फ़िरते हैं, दुनियादारी के मिथ्या होने के बारे में डोज देते रहते हैं (खुद एसी कारों में घूमते हैं)। स्वयं पैसे के पीछे भागते हैं, झोला-झंडा-चड्डी-लोटा-घंटी-अंगूठी सब तो बेचते हैं, सदा पाँच-सात सितारा होटलों और आश्रमों में ठहरते हैं, तर माल उड़ाते हैं।

कोई बता सकता है कि क्यों पढ़े-लिखे और उच्च तबके के लोग भी इनके झाँसे में आ जाते हैं? बिल गेट्स भले कोई महात्मा न सही, लेकिन इनसे बुरा तो नहीं है…

, , , , , , , , , , , , ,
Published in ब्लॉग