Terrorist attack & Indian Police Encounter
बंगलोर, अहमदाबाद, जयपुर के बाद अब दिल्ली का नम्बर भी आ गया, साफ़ है कि कोई भी शहर अब सुरक्षित नहीं रहा, बम धमाके और मौत किसी भी समय किसी भी परिवार को उजाड़ सकते हैं। इस देश में एक गृहमंत्री भी है, जिनका नाम है शिवराज पाटिल (नाम बहुत कम लोगों ने सुना होगा, ठीक वैसे ही जैसे कि उपराष्ट्रपति का नाम भी कम ही लोगों को मालूम होगा)। तो हमारे गृहमंत्री साहब मीटिंग करते हैं, सेमिनार करते हैं, निर्देश देते हैं, लेकिन होता-जाता कुछ नहीं है। वही बरसों पुरानी रट लगाये रहते हैं, "आतंकवादियों का कड़ा मुकाबला किया जायेगा…", "इस तरह की कायराना हरकतों को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा…", आदि-आदि। रेड अलर्ट और हाई अलर्ट तो एक सरकारी उत्सव की तरह हो गये हैं जो हर महीने-पन्द्रह दिन में आते-जाते रहते हैं, एक कर्मकाण्ड की तरह रेड अलर्ट मनाया जाता है, एक बेगारी की तरह हाई अलर्ट टाला जाता है। फ़िर से सब उसी ढर्रे पर लौट आते हैं, जैसे कुछ हुआ ही न हो… फ़िर अखबार और मीडिया देश की जनता की तारीफ़ों(?) के कसीदे काढ़ते हैं कि "देखो कैसे जनजीवन सामान्य हो गया…" "देश की जनता ने अलाँ-फ़लाँ त्यौहार जोरशोर से मनाकर आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब दिया…" इन मूर्खों को कौन समझाये कि क्या जनता अगले दिन अपने काम पर न जाये? या बम विस्फ़ोट हो गया है तो अगले दिन सभी लोग भूखे सो जायें? कोई कामधाम नहीं है क्या, जनजीवन सामान्य न करें तो क्या करें? सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ अपना काम नहीं कर रही, कम से कम आम जनता तो अपना काम करे, उसमें आतंकवाद को जवाब देने की बात कहाँ से आ गई? खैर… जो हो रहा है वह ऐसे ही चलता रहेगा, अब उम्मीद की किरण बची है पुलिस वालों से…

पुलिस वालों, अब तुम्हारे जागने का वक्त आ गया है यदि देशद्रोही नेताओं के भरोसे बैठे रहे और उनके घटिया आदेशों का पालन करते रहे तो एक दिन तुम्हारा परिवार भी ऐसे ही किसी बम विस्फ़ोट में मारा जायेगा तब हाथ मलने के सिवा कोई चारा न होगा। इस लेख के माध्यम से पुलिस वालों से एक अनुरोध है, विनती है, करबद्ध प्रार्थना है कि अब अपना पुलिसिया जलवा दिखाओ, अपने मुखबिरों की नकेल कसो, उनका नेटवर्क मजबूत करो, सूचनायें एकत्रित करो और "व्यक्तिगत स्तर पर देश की खातिर" मुठभेड़ों का जोरदार दौरदौरा चलाओ। चार-छः महीनों में पकड़े जा सकने वाले आतंकवादियों और देशद्रोहियों की लाशें बिछाओ। भले ही उसे आधिकारिक मुठभेड़ न दिखाओ, लेकिन देश के भले के लिये हर पुलिस वाला कम से कम दो-चार समाजविरोधी काँटों को तो साफ़ कर ही सकता है। "सेफ़ मुठभेड़" कैसे की जाती है, यह अनुभवी पुलिस वालों को बताने की ज़रूरत नहीं है, बस इस बात का ध्यान रखना होगा कि कहीं कोई बेगुनाह न मारा जाये, पहले पक्की सूचनायें इकठ्ठा करो, उनको जाँच-परख लो, फ़िर उस आतंकवादी को उड़ा दो। ऐसा दमनचक्र चलाओ कि देशद्रोहियों को पनाह देने वालों का सर चकरा जाये कि आखिर यह हो क्या रहा है? जिसके पास AK-47 बरामद हो वह कोई सन्त तो नहीं हो सकता, जिस घर से RDX और डिटोनेटर बरामद हो रहे हों वह कोई महात्मा का आश्रम तो हो नहीं सकता, उसे वहीं मार गिराओ, उस घर को नेस्तनाबूद कर दो, उस घर में रहने वाले पूरे परिवार को पुलिस की थर्ड डिग्री का मजा चखाओ। सेकुलर लोग कहेंगे कि उस परिवार का क्या दोष है वह तो निर्दोष है, लेकिन बम विस्फ़ोट में मारे जाने वाले भी तो निर्दोष ही होते हैं।



प्रिय पुलिस वालों, हम एक युद्धकाल में जी रहे हैं यहाँ शान्तिकाल के नियम लागू नहीं होते। हो सकता है कि गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाये, लेकिन अभी गेहूँ का पिसना अधिक महत्वपूर्ण है, अपनी तरफ़ से सावधानी बरतो, लेकिन यदि कोई बेगुनाह मारा भी जाता है तो उसमें छाती कूटने की आवश्यकता नहीं है, रोजाना कई बेगुनाह सड़कों पर कारों-ट्रकों द्वारा कुचले जाते हैं और अमीरज़ादे पैसा देकर छूट जाते हैं, और फ़िर यह तो देश की सुरक्षा का मामला है, गर्व का मामला है। हे पुलिस वालों, तुम नाकों-चौराहों पर पैसा खाते हो, मर्डर-झगड़ा होने पर दोनों पार्टियों से पैसा खाते हो, तुम FIR लिखने तक का पैसा खाते हो, ये काम तो तुम छोड़ने से रहे तो कम से कम एक नेक काम करो, महीने-दो महीने में एकाध बड़े गुण्डे का एनकाउंटर करो, यदि वह गुण्डा देशविरोधी काम में लिप्त पाया जाये तो जल्दी से जल्दी करो। एक बात होती है "राजदण्ड", दिखने में यह हवलदार के हाथ में एक मामूली डण्डे जैसा दिखता है, लेकिन उस डण्डे का जलाल ही अपराधियों में खौफ़ पैदा करता है। आतंकवादियों के दिलोदिमाग में इस राजदण्ड का ऐसा खौफ़ पैदा करो कि वे कुछ भी करने से पहले दस बार सोचें। हमारे देश की न्याय व्यवस्था पर भी भरोसा रखो, जो न्याय व्यवस्था अबू सलेम, दाऊद इब्राहीम, तेलगी, शहाबुद्दीन जैसों की "मददगार" है, वह कई एनकाउंटर करने के बावजूद तुम्हारी भी "मदद" करेगी, यदि देशद्रोही वकील हैं तो देशप्रेमी वकील भी हैं इस देश में… इसलिये बेखौफ़ होकर इस युद्धकाल में अपना कर्तव्य निभाओ, लोग यह नहीं याद रखते कि पंजाब में कितने बेगुनाह मारे गये, लोग याद रखते हैं केपीएस गिल को…।

और एक अन्तिम बात… "सेकुलर" और "मानवाधिकारवादी" नाम के दो आस्तीन के साँपों (ये साँप अफ़ज़ल को गले लगाये रहेंगे, बांग्लादेशी घुसपैठियों की राशनकार्ड और पैसों से मदद करते रहेंगे, आतंकवादियों को बिरयानी खिलाकर छोड़ते रहेंगे) से दूर रहने की कोशिश करना… जनता तुम्हें लाख-लाख दुआयें देगी जो तुम्हारे बच्चों के ही काम आयेगी। तो उठो और काम में जुट जाओ, शुरुआत जेल में बन्द आतंकवादियों से ही करो… सबसे पहले उन्हें एक दिन छोड़कर खाने में जुलाब की चार गोली खिलाओ…, चुपके से एड्स के इंजेक्शन लगाओ… "असली गोली" बाद में, फ़िर आगे क्या और कैसे करना है यह भी मुझे बताना पड़ेगा क्या???

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Terrorism in India Causes and Remedies
भारत में बम विस्फ़ोटों का सिलसिला लगातार जारी है… नेताओं का अनर्गल प्रलाप और खानापूर्ति (यह पोस्ट पढ़ें) भी हमेशा की तरह जारी है, साथ ही जारी है हम भारतीयों (खासकर छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों का प्रलाप और “गाँधीगिरी” नाम की मूर्खता भी – इसे पढ़ें)। पता नहीं हम लोग यह कब मानेंगे कि आतंकवाद अब इस देश में एक कैंसर का रूप ले चुका है। आतंकवाद या आतंकवादियों का निदान अब साधारण तरीकों से सम्भव नहीं रह गया है। अब “असाधारण कदम” उठाने का वक्त आ गया है (वैसे तो वह काफ़ी पहले ही आ चुका है)। जब शरीर का कोई अंग सड़ जाता है तब उसे काटकर फ़ेंक दिया जाता है, एक “बड़ा ऑपरेशन” (Major Surgery) किया जाता है, ठीक यही किये बिना हम आतंकवाद से नहीं लड़ सकते। लचर कानूनों, समय काटती घिसी-पिटी अदालतों, आजीवन सत्य-अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले “थकेले” धर्मनिरपेक्षतावादियों, भ्रष्ट पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के रहते आतंकवाद समाप्त होने वाला नहीं है। अब इस देश को आवश्यकता है कम से कम पाँच सौ “दया नायक” की, ऐसे पुलिस अफ़सरों की जो देशभक्त और ईमानदार हैं, लेकिन “व्यवस्था” के हाथों मजबूर हैं और कुछ कर नहीं पा रहे। ऐसे पुलिस अफ़सरों को चुपचाप अपना एक तंत्र विकसित करना चाहिये, “समान विचारधारा वाले” अधिकारियों, पुलिस वालों, मुखबिरों आदि को मिलाकर एक टीम बनाना चाहिये। यह टीम आतंकवादियों, उनके खैरख्वाहों, पनाहगाहों पर जाकर हमला बोले, और उन्हें गिरफ़्तार न करते हुए वहीं हाथोंहाथ खत्म करे। यदि हम गिलानी, अफ़जल, मसूद, उमर जैसे लोगों को नहीं पकड़ते तो न हमें उन्हें अपना “दामाद” बनाकर रखना पड़ता, न ही कंधार जैसे प्रकरण होते। क्या कोई बता सकता है कि हमने अब्दुल करीम तेलगी, अबू सलेम आदि को अब तक जीवित क्यों रखा हुआ है? क्यों नहीं उन जैसों को जल्द से जल्द खत्म कर देते हैं? क्या उन जैसे अपराधी सुधरने वाले हैं? या उन जैसे लोग माफ़ी माँगकर देशभक्त बन जाने वाले हैं? या क्या उनके अपराध छोटे से हैं?



आतंकवाद अब देश के कोने-कोने में पहुँच चुका है (courtesy Bangladesh और Pakistan), लेकिन हम उसे कुचलने की बजाय उसका पोषण करते जा रहे हैं, वोट-बैंक के नाम पर। हमें यह स्वीकार करने में झिझक होती है कि रिश्वत के पैसों के कारण भारत अन्दर से खोखला हो चुका है। इस देश में लोग पेंशनधारियों से, श्मशान में मुर्दों की लकड़ियों में, अस्पतालों में बच्चों की दवाइयों में, विकलांगों की ट्राइसिकल में, गरीबों के लिये आने वाले लाल गेहूँ में… यहाँ तक कि देश के लिये अपनी जान कुर्बान कर देने वाले सैनिकों के सामान में भी भ्रष्टाचार करके अपनी जेबें भरने में लगे हुए हैं। देशभक्ति, अनुशासन, त्याग आदि की बातें तो किताबी बनती जा रही हैं, ऐसे में आप आतंकवाद से लड़ने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? इन सड़े हुए अधिकारियों के बल पर? या इस गली हुई व्यवस्था के बल पर, जो एक मामूली जेबकतरे को दस साल तक जेल में बन्द कर सकती है, लेकिन बिजली चोरी करने वाले उद्योगपति को सलाम करती है।

नहीं… अब यह सब खत्म करना होगा। जैसा कि पहले कहा गया कि हमें कम से कम 500 “दया नायक” चाहिये होंगे, जो मुखबिरों के जरिये आतंकवादियों को ढूँढें और बिना शोरशराबे के उन्हें मौत के घाट उतार दे (खासकर हमारे “नकली मीडिया” को पता चले बिना)। और यह काम कुछ हजार ईमानदार पुलिस अधिकारी अपने व्यक्तिगत स्तर पर भी कर सकते हैं। कहा जाता है कि ऐसा कोई अपराध नहीं होता जो पुलिस नहीं जानती, और कुछ हद तक यह सही भी है। पुलिस को पूर्व (रिटायर्ड) अपराधियों की मदद लेना चाहिये, यदि किसी जेबकतरे या उठाईगीरे को छूट भी देनी पड़े तो दे देना चाहिये बशर्ते वह “काम की जानकारी” पुलिस को दे। फ़िर काम की जानकारी मिलते ही टूट पड़ें, और एकदम असली लगने वाले “एनकाउंटर” कैसे किये जाते हैं यह अलग से बताने की आवश्यकता नहीं है। अपराधियों, आतंकवादियों का पीछा करके उन्हें नेस्तनाबूद करना होगा, सिर्फ़ आतंकवादी नहीं बल्कि उसके समूचे परिवार का भी सफ़ाया करना होगा। उनका सामाजिक बहिष्कार करना होगा, उनके दुकान-मकान-सम्पत्ति आदि को कुर्क करना होगा, उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर कर देना चाहिये, तभी हम उन पर मानसिक विजय प्राप्त कर सकेंगे। अभी तो हालत यह है कि पुलिस की टीम या तो भ्रष्ट मानसिकता से ग्रस्त है या फ़िर परास्त मानसिकता से।



“संजू बाबा” नाम के एक महान व्यक्ति ने “गाँधीगिरी” नाम की जो मूर्खता शुरु की थी, उसे जरूर लोगों ने अपना लिया है, क्योंकि यह आसान काम जो ठहरा। एक शहर में ट्रैफ़िक इंस्पेक्टर तक “गाँधीगिरी” दिखा रहे हैं, चौराहे पर खड़े होकर खासकर लड़कियों-महिलाओं को फ़ूल भेंट कर रहे हैं कि “लायसेंस बनवा लीजिये…”, बच्चों को फ़ूल भेंट कर रहे हैं कि “बेटा 18 साल से कम के बच्चे बाइक नहीं चलाते…”… क्या मूर्खता है यह आखिर? क्या इससे कुछ सुधार आने वाला है? इस निकम्मी गाँधीगिरी की बजाय अर्जुन की “गांडीवगिरी” दिखाने से बात बनेगी। सिर्फ़ एक बार, नियम तोड़ने वाले की गाड़ी जब्त कर लो, चौराहे पर ही उसके दोनों पहियों की हवा निकालकर उसे घर से अपने बाप को लाने को कहो, देखो कैसे अगली बार से वह सड़क पर सीधा चलता है या नहीं? लेकिन नहीं, बस लगे हैं चूतियों की तरह “गाँधीगिरी के फ़ूल” देने में। इसी मानसिकता ने देश का कबाड़ा किया हुआ है। आक्रामकता, जीतने का जज्बा और लड़ने का जीवट हममें है ही नहीं, हाँ ऊँची-ऊँची बातें करना अवश्य आता है, “भारत विश्व का गुरु है…”, “भारत ने विश्व को अहिंसा का पाठ पढ़ाया…”, “हिन्दू धर्म सहनशील है, सहिष्णु है (मतलब डरपोक है)…” आदि-आदि, लेकिन इस महान देश ने कभी भी स्कूल-कॉलेजों में हर छात्र के लिये कम से कम तीन साल की सैनिक शिक्षा जरूरी नहीं समझी (यौन शिक्षा ज्यादा जरूरी है)।

जब व्यवस्था पूरी तरह से सड़ चुकी हो, उस समय केपीएस गिल, रिबेरो जैसे कुछ जुनूनी व्यक्ति ही देश का बेड़ा पार लगा सकते हैं, आतंकवाद से लड़ाई “मरो या मारो” की होनी चाहिये, “मरो” पर तो वे लोग हमसे अमल करवा ही रहे हैं, हम कब “मारो” पर अमल करेंगे? देश के गुमनाम “दया नायकों” उठ खड़े हो…

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Indo-US Nuclear Deal Politics
सारे देश में एक “अ-मुद्दे” पर बहस चल रही है, जबकि मुद्दा होना चाहिये था “भारत की ऊर्जा जरूरतें कैसे पूरी हों?”, लेकिन यही भारतीय राजनीति और समाज का चरित्र है। इस वक्त हम विश्लेषण करते हैं भारत की अन्दरूनी राजनीति और उठापटक का… कहते हैं कि भारत में बच्चा भी पैदा होता है तो राजनीति होती है और जब बूढ़ा मरता है तब भी… तो भला ऐसे में परमाणु करार जैसे संवेदनशील मामले पर राजनीति न हो, यह नहीं हो सकता…।

पिछले एक माह से जारी इस सारे राजनैतिक खेल में सबसे प्रमुख खिलाड़ी के तौर पर उभरी है कांग्रेस। कांग्रेस ने एक पत्थर से कई पक्षी मार गिराये हैं (या मारने का प्लान बनाया है)। पिछले चार साल तक वामपंथियों का बोझा ढोने के बाद एकाएक मनमोहन सिंह का “मर्द” जागा और उन्होंने वामपंथियों को “परे-हट” कह दिया। चार साल पहले वामपंथियों की कांग्रेस को सख्त जरूरत थी, ताकि एक “धर्मनिरपेक्ष”(??) सरकार बनाई जा सके, मिल-बाँटकर मलाई खाई जा सके। चार साल तक तो बैठकों, चाय-नाश्ते के दौर चलते रहे, फ़िर आया 2008, जब मार्च के महीने से महंगाई अचानक बढ़ना शुरु हुई और देखते-देखते इसने 11% का आंकड़ा छू लिया। कांग्रेसियों के हाथ-पाँव फ़ुलाने के लिये यह काफ़ी था, क्योंकि दस-ग्यारह माह बाद उन्हें चुनावी महासमर में उतरना है। महंगाई की कोई काट नहीं सूझ रही, न ही ऐसी कोई उम्मीद है कि अगले साल तक महंगाई कुछ कम होगी, ऐसे में कांग्रेस को सहारा मिला समाजवादी पार्टी (सपा) का। दोनों पार्टियाँ उत्तरप्रदेश में मायावती की सताई हुई हैं, एक से भले दो की तर्ज पर “मैनेजर” अमरसिंह का हाथ कांग्रेस ने थाम लिया। कांग्रेस जानती है कि नंदीग्राम, सिंगूर आदि के मुद्दे पर बंगाल में और भ्रष्टाचार व सांप्रदायिकता के मुद्दे पर केरल में वामपंथी दबे हुए हैं और उन्हें खुद अगले चुनाव में ज्यादा सीटें मिलने की कोई उम्मीद नहीं है, जबकि प्रधानमंत्री बनने (बहुमत) का रास्ता उत्तरप्रदेश और बिहार से होकर गुजरता है। मायावती नामक “हैवीवेट” से निपटने के लिये दो “लाइटवेट” साथ लड़ेंगे, और बिहार में लालू तो एक तरह से सोनिया के दांये हाथ ही बन गये हैं, ऐसे में इस समय वामपंथियों को आराम से लतियाया जा सकता था, और वही किया गया।

अब देखिये एक परमाणु मुद्दे ने कांग्रेस को क्या-क्या दिलाया –
1) एक “टेम्परेरी” दोस्त दिलाया जो उत्तरप्रदेश (जहाँ कांग्रेस लगभग जीरो है) में उन्हें कुछ तो फ़ायदा दिलायेगा, बसपा और सपा को आपस में भिड़ाकर कांग्रेस मजे लेगी, सपा के कुछ मुसलमान वोट भी कांग्रेस की झोली में आ गिरने की सम्भावना है।
2) “तीसरा मोर्चा” नाम की जो हांडी-खिचड़ी पकने की कोशिश हो रही थी, एक झटके में फ़ूट गई और दाना-दाना इधर-उधर बिखर गया, और यदि सरकार गिरती भी है तो हल्ला मचाया जा सकता है कि “देखो-देखो…राष्ट्रहित में हमने अपनी सरकार बलिदान कर दी, लेकिन वामपंथियों के आगे नहीं झुके… आदि” (वैसे भी कांग्रेस और उसके भटियारे चमचे, “त्याग-बलिदान” आदि को बेहतरीन तरीके से सजाकर माल खाते हैं), और इसकी शुरुआत भी अखबारों में परमाणु करार के पक्ष में विज्ञापन देकर शुरु की जा चुकी है।
3) यदि सरकार गिरी तो ठीकरा विपक्ष के माथे, खासकर वामपंथियों के… और यदि सरकार नहीं गिरी तो एक साल का समय और मिल जायेगा, पहले वामपंथियों की भभकियाँ सुनते थे, अब सपाईयों की सौदेबाजी सहेंगे, कौन सा कांग्रेस की जेब से जा रहा है।

इस राजनैतिक खेल में सबसे घाटे में यदि कोई रहा तो वह हैं “लाल मुँह के कॉमरेड” (कांग्रेसी चाँटे और शर्म से लाल हुए)। यदि वे महंगाई के मुद्दे पर सरकार गिराते तो कुछ सहानुभूति मिल जाती, लेकिन समर्थन वापस लेने का बहाना बनाया भी तो क्या घटिया सा!! असल में चार साल तक सत्ता की मौज चखने के दौरान आँखों पर चढ़ चुकी चर्बी के कारण महंगाई उन्हें नहीं दिखी, लेकिन बुढ़ाते हुए पंधे साहब को परमाणु करार के कारण मुस्लिम वोट जरूर दिख गये, इसे कहते हैं परले दर्जे की सिद्धांतहीनता, अवसरवाद और राजनैतिक पाखंड। भाजपा फ़िलहाल “मन-मन भावे, ऊपर से मूँड़ हिलावे” वाली मुद्रा अपनाये हुए है, क्योंकि यदि वह सत्ता में होती तो कांग्रेस से भी तेजी से इस समझौते को निपटाती (समझौते की शुरुआत उन्होंने ही की थी)। भाजपा को लग रहा है कि “सत्ता का आम” बस मुँह में टपकने ही वाला है उसे सिर्फ़ वक्त का इंतजार करना है… हालांकि यह मुगालता उसे भारी पड़ सकता है, क्योंकि यदि सरकार नहीं गिरी, चुनाव अगले साल ही हुए, मानसून बेहतर रहा और कृषि उत्पादन बम्पर होने से कहीं महंगाई दर कम हो गई, तो चार राज्यों में जहाँ भाजपा सत्ता में है वहाँ “सत्ता-विरोधी” (Anti-incumbency) वोट पड़ने से कहीं मामला उलट न जाये और एक बार फ़िर से “धर्मनिरपेक्षता” की बाँग लगाते हुए कांग्रेस सत्ता में आ जाये। कांग्रेस के लिये तो यह मामला एक जुआ ही है, वैसे भी जनता तो नाराज है ही, यदि इन चालबाजियों से “सत्ता के अंकों” (यानी 272 मुंडियाँ) के नजदीक भी पहुँच गये तो फ़िर वामपंथियों को मजबूरन, यानी कि “सांप्रदायिक ताकतों” को सत्ता में आने से रोकने के नाम पर (इस वाक्य को पढ़कर कृपया हँसें नहीं) कांग्रेस का साथ देना ही पड़ेगा…

तो भाइयों कुल मिलाकर यह है सारा कांग्रेस का खेल… जबकि “कम्युनिस्ट” बन गये हैं इस खेल में “तीसरे जोकर”, जिसका वक्त आने पर “उपयोग” कर लिया जायेगा और फ़िर वक्त बदलने पर फ़ेंक दिया जायेगा… आखिर “धर्मनिरपेक्षता”(?) सबसे बड़ी चीज़ है…

अब सबसे अन्त में जरा “कम्युनिस्ट” (COMMUNIST) शब्द का पूरा अर्थ जान लीजिये –
C = Cheap
O = Opportunists
M = Marionette (controller - China)
M = Mean
U = Useless
N = Nuts
I = Indolents
S = Slayers
T = Traitors

क्या अब भी आपको कम्युनिस्टों की “महानता” पर शक है?

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Kashmir Issue India Pakistan Secularism
अक्टूबर 2002 में जिस वक्त पीडीपी-कांग्रेस की मिलीजुली सरकार कश्मीर में बनने वाली थी और “सौदेबाजी” जोरों पर थी, उस वक्त वहाँ के एक नेता ने कहा था कि “मुफ़्ती साहब को कांग्रेस के बाद सत्ता का आधा हिस्सा लेना चाहिये”, उसके पीछे उनका तर्क था कि “तब हम लोग (यानी पीडीपी) जब चाहे तब सरकार गिरा सकते हैं, अपने चाहे गये समय पर और अपने गढ़े हुए मुद्दों के हिसाब से”… आज वह आशंका सच साबित हो गई है, हालांकि पीडीपी ने पहले जमकर सत्ता का उपभोग कर लिया और अब अन्त में कोई बहाना बनाकर उन्हें सत्ता से हटना ही था क्योंकि चुनाव को सिर्फ़ दो माह बचे हैं। लेकिन क्या कभी इस बात पर विचार किया गया है कि इस प्रकार की राजनैतिक बाजीगरी से भारत का कितना नुकसान होता है? क्यों भारत इन देशद्रोहियों की इच्छापूर्ति के लिये करोड़ों रुपया खर्च करे? “कश्मीर”, हमारी-आपकी-सबकी छाती पर, नेहरू परिवार द्वारा डाला एक बोझ है जो हम सब पिछले साठ वर्षों से ढो रहे हैं।

कश्मीर में एक “शांतिपूर्ण”(?) चुनाव करवाने का मतलब होता है अरबों रुपये का खर्च और सैकड़ों भारतीय जवानों की मौत। लेकिन मुफ़्ती जैसे देशद्रोही नेता कितनी आसानी से मध्यावधि चुनाव की बातें करते हैं। चुनाव के ठीक बाद मुफ़्ती ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि “अब नौजवानों को बन्दूक का रास्ता छोड़ देना चाहिये, क्योंकि “उनके प्रतिनिधि” अब विधानसभा में पहुँच गये हैं, और चाहे हम सत्ता में रहें या बाहर से समर्थन दें, उनकी माँगों के समर्थन में काम करते रहेंगे”…क्या इसके बाद भी उनके देशद्रोही होने में कोई शक रह जाता है? लेकिन हमेशा से सत्ता की भूखी रही कांग्रेस और उनके जनाधारविहीन गुलाम नबी आजाद जैसे लोग तो तुरन्त से पहले कश्मीर की सत्ता चाहते थे और इन देशद्रोहियों से समझौता करने को लार टपका रहे थे । पीडीपी और कुछ नहीं हुर्रियत का ही बदला हुआ रूप है, और उनके ही मुद्दे आगे बढ़ाने में लगी हुई है, यह बात सभी जानते हैं, कांग्रेसियों के सिवाय।

आइये अब देखते हैं कि कैसे कश्मीरी लोग भारत को लूटने में लगे हुए हैं, भारत उनके लिये एक “सोने के अंडे देने वाली मुर्गी” साबित हो रहा है, और यह सब हो रहा है एक आम ईमानदार भारतीय के द्वारा दिये गये टैक्स के पैसों से…

सत्ता में आते ही सबसे पहले महबूबा मुफ़्ती ने SOG (स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप) को भंग कर दिया। जिस एसओजी ने बहुत ही कम समय में एक से एक खूंखार आतंकवादियों को मार गिराया था, उसे भंग करके महबूबा ने अपने “प्रिय” लोगों, यानी तालिबान, अल-कायदा और पाकिस्तानियों को एक “वेलकम” संदेश दिया था। महबूबा का संदेश साफ़ था “आप भारत में आइये, आपका स्वागत है, यहाँ आपका कुछ नहीं बिगड़ने दिया जायेगा, कोई नुकसान नहीं पहुँचाया जायेगा…” इस प्रकार का खुला निमंत्रण दोबारा शायद न मिले। जाहिर है कि इससे हमें क्या मिलने वाला है, अपहरण, फ़िरौतियाँ, आतंकवाद समूचे देश में।

कश्मीर में अपहरण और राजनेताओं का गहरा सम्बन्ध है, और यह सम्बन्ध एक मजबूत शक की बुनियाद तैयार करते हैं। सबसे पहले 8 दिसम्बर 1989 को रूबिया सईद का अपहरण किया था, जो कि मुफ़्ती मुहम्मद की लड़की है। आतंकवादियों(?) की मुख्य माँग थी जेल में बन्द उनके कुछ खास साथियों को छोड़ना। जिस वक्त बातचीत चल ही रही थी और आतंकवादी सिर्फ़ धनराशि लेकर रुबिया को छोड़ने ही वाले थे, अचानक जेल में बन्द उनके साथियों को रिहा करने के आदेश दिल्ली से आ गये (सन्दर्भ मनोज जोशी – द लॉस्ट रिबेलियन: कश्मीर इन नाइन्टीज़)। उस वक्त केन्द्रीय गृहमंत्री थे मुफ़्ती मुहम्मद सईद और प्रधानमंत्री थे महान धर्मनिरपेक्ष वीपी सिंह।

इस एक फ़ैसले ने एक परम्परा कायम कर दी और यह सिलसिला अपने वीभत्सतम रूप में कंधार प्रकरण के तौर पर सामने आया, जब हमारी “महान धर्मनिरपेक्ष” प्रेस, और न के बराबर देशप्रेम रखने वाले “धनिकों” के एक वर्ग के “छातीकूट अभियान” के दबाव के कारण भाजपा को भी मसूद अजहर और उमर शेख को छोड़ना पड़ा। रूस में एक थियेटर में चेचेन उग्रवादियों द्वारा बन्धक बनाये गये 700 बच्चों को छुड़ाने के लिये रूसी कमांडो ने जैसा धावा बोला, या फ़िर इसराइल के एक अपहृत विमान को दूसरे देश से उसके कमांडो छुड़ाकर लाये थे, ऐसी कार्रवाई आज तक किसी भी भारतीय सरकार ने नहीं की है। असल में केन्द्र में (इन्दिरा गाँधी के अवसान के बाद) हमेशा से एक पिलपिली, लुंजपुंज और “धर्मनिरपेक्ष” सरकार ही रही है। किसी भी केन्द्र सरकार में आतंकवादियों से सख्ती से पेश आने और उनके घुटने तोड़ने की इच्छाशक्ति ही नहीं रही (किसी हद तक हम इसे एक आम भारतीय फ़ितरत कह सकते हैं, दुश्मन को नेस्तनाबूद करके मिट्टी में मिला देना, भारतीयों के खून में, व्यवहार में ही नहीं है, अब यह हमारे “जीन्स” में ही है या फ़िर हमें “अहिंसा” और “माफ़ी” का पाठ पढ़ा-पढ़ाकर ऐसा बना दिया गया है, यह एक शोध का विषय है)। अच्छा… उस वक्त केन्द्र में सरकार में “प्रगतिशील” और “धर्मनिरपेक्ष” लोगों की फ़ौज थी, खुद वीपी सिंह प्रधानमंत्री, और सलाहकार थे आरिफ़ मुहम्मद खान, इन्द्र कुमार गुजराल, अरुण नेहरू, और इन “बहादुरों” ने आतंकवादी बाँध के जो गेट खोले, तो अगले दस वर्षों में हमे क्या मिला? 30000 हजार लोगों की हत्या, हजारों भारतीय सैनिकों की मौत, घाटी से हिन्दुओं का पूर्ण सफ़ाया, धार्मिक कट्टरतावाद, हिन्दू तीर्थयात्रियों का कत्ले-आम, क्या खूब दूरदृष्टि पाई थी “धर्मनिरपेक्ष” सरकारों ने !!!!

अभी आगे तो पढ़िये साहब… 22 सितम्बर 1991 को गुलाम नबी आजाद के साले तशद्दुक का आतंकवादियों ने अपहरण किया। नतीजा? जेल में बन्द कुछ और आतंकवादी छोड़े गये। गुलाम नबी आजाद उस वक्त केन्द्र में संसदीय कार्य मंत्री थे, और अब कश्मीर के मुख्यमंत्री हैं। तात्पर्य यह कि गुलाम नबी आजाद और मुफ़्ती मुहम्मद में “अपहरण” और जेल में बन्द कैदियों को छोड़ना ये दो बातें समान हैं। एक और साहब हैं “सैफ़ुद्दीन सोज़”… कांग्रेस के सांसद, जो पहले नेशनल कॉन्फ़्रेंस में थे और जिनके प्रसिद्ध एक वोट के कारण ही एक बार अटल सरकार गिरी थी (लन्दन से फ़ोन पर उन्हें सलाह देने वाले थे शख्स थे वीपी सिंह)। सोज़ की बेटी नाहिदा सोज़ का अगस्त 1991 में अपहरण किया गया और एक बार फ़िर जेल में बन्द कुछ आतंकवादियों को रिहा किया गया।

क्या आपको यह सब रहस्यमयी नहीं लगता? हमेशा ही इन कथित बड़े नेताओं के रिश्तेदारों को ही अपहरण किया जाता है? आज तक किसी भी कश्मीरी नेता ने देशहित में कभी यह नहीं कहा कि आतंकवादियों के आगे झुकने की आवश्यकता नहीं है। तथ्य साफ़ इशारा करते हैं कि इन नेताओं और आतंकवादियों के बीच निश्चित ही सांठगांठ है। यही नेता “रास्ते से भटके नौजवानों” की आवाज विधानसभा में उठाने का दावा करते हैं और बन्दूक छोड़ने की “घड़ियाली आँसू वाली” अपीलें करते नजर आते हैं।

(भाग-2 में हम देखेंगे कि कैसे कश्मीर हम भारतीयों पर बोझ बना हुआ है…) (भाग-2 में जारी रहेगा…)

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Human Body Organ Smuggling
गत कुछ वर्षों मे हमारे भारत में कुछ वीभत्स प्रकार के अपराध सामने आये हैं, जिसमें सबसे प्रमुख है निठारी काण्ड जिसमें अपराधियों ने बच्चों के साथ यौन दुर्व्यवहार करने के बाद उनके अंग (विशेषकर किडनी) निकाल लिये। दूसरा केस डॉ अमित का है जिसे “किडनी किंग(?)” कहा जा रहा है और जिसका नेटवर्क नेपाल तक फ़ैला हुआ है, और जिसके ग्राहकों में कई विशिष्ट व्यक्ति भी शामिल हैं।

सभी को याद होगा कि इंग्लैंड निवासी स्कारलेट की गोवा में हत्या हुई थी, और जब भारतीय पुलिस और शासकीय मशीनरी के हाथों उसकी मिट्टी के चीथड़े-चीथड़े करके उधर भेजा गया था तब पाया गया था कि उसके शरीर के कई महत्वपूर्ण अंग गायब थे और स्कारलेट की माँ ने आरोप लगाया था कि उन्हें भारत में निकाल लिया गया है। अकेले उत्तरप्रदेश से गत पाँच वर्षों में 12,000 से अधिक गुमशुदगी के मामले आये हैं, जिसमें से अधिकतर बच्चे हैं। इस प्रकार की खबरें लगातार आती रहती हैं कि अपराधी तत्व कब्रिस्तानों और श्मशानों में (जहाँ बच्चों को दफ़नाया जाता है) से मानव कंकाल, खोपड़ी और मजबूत हड्डियाँ आदि खोदकर ले जाते हैं जो ऊँची कीमतों में बिकती हैं।



एक और पक्ष देखिये, दिनों-दिन नये-नये मेडिकल कॉलेज खुलते जा रहे हैं, उनके पास विद्यार्थियों को “प्रैक्टिकल” करवाने के लिये पर्याप्त मात्रा में मृत शरीर नहीं हैं, मेडिकल कॉलेज लोगों से “देहदान” के लिये लगातार अपीलें करते रहते हैं, लेकिन इस मामले में जागरूकता अभी नहीं के बराबर है (क्योंकि अभी तो नेत्रदान के लिये ही जागरूकता का अभाव है)। अब भारत में घटी या घट रही इन सब घटनाओं को आपस में जोड़कर एक विशाल चित्र देखिये/सोचिये। क्या आपको नहीं लगता कि भारत में मानव अंगों की चोरी, तस्करी, विक्रय का एक विशाल रैकेट काम कर रहा है? छिटपुट मामले कभी-कभार पकड़ में आते हैं, लेकिन निठारी या डॉ अमित जैसे बड़े केस इक्का-दुक्का ही हैं। जाहिर है कि यह “धंधा” बेहद मुनाफ़े वाला है और मुर्दे शिकायत भी नहीं करते, ऐसे में अपराधियों, दलालों, गंदे दिमाग वाले डॉक्टरों और किडनी, आँखें, लीवर आदि अंगों के विदेशी ग्राहकों का एक खतरनाक गैंग चुपचाप अपना काम जारी रखे हुए है।

कई मामलों में जाँचकर्ताओं ने पाया है कि इस प्रकार के मानव अंगों के मुख्य खरीदार अरब देशों के अमीर शेख, कनाडा, जर्मनी और अमेरिका के बेहद धनी लोग होते हैं। भारत की गरीबी और सस्ते मेडिकल इन्फ़्रास्ट्रक्चर का भरपूर दोहन करके ये लोग किडनी, आँखें, दाँत आदि प्रत्यारोपित करवाते हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष एक लाख किडनी प्रत्यारोपण की आवश्यकता है, जबकि आधिकारिक और कानूनी रूप से सिर्फ़ 5000 किडनियाँ बदली जा रही हैं, जाहिर है कि “माँग और पूर्ति” में भारी अन्तर है और इसका फ़ायदा “स्मगलर” उठाते हैं। (सन्दर्भ)

मजे की बात तो यह है कि आमतौर पर लोग सोचते हैं कि किडनी बदलना और कार का टायर बदलना लगभग एक जैसा ही है। लेकिन ऐसा है नहीं, क्योंकि किडनी लेने वाले और देने वाले का “परफ़ेक्ट मैच” होना बहुत ही मुश्किल होता है तथा ऑपरेशन के बाद दोनों व्यक्तियों की उचित देखभाल और लम्बा इलाज जरूरी होता है। स्मग्लिंग के इन मामलों में “लेनेवाले अमीर” की देखभाल तो बेहतर हो ही जाती है, मारा जाता है बेचारा गरीब देने वाला। जो भी पैसा उसे किडनी बेचकर मिलता है वह उसके अगले पाँच साल की दवाई में ही खर्च हो जाता है (यदि तब तक वह जीवित रहा तो)। “एम्स” के डॉक्टर संदीप गुलेरिया कहते हैं कि भारत में डायलिसिस की सुविधायें अभी भी बहुत कम जगहों पर हैं और बेहद महंगी हैं, इसलिये लोग किडनी बदलवाने का “आसान रास्ता”(?) अपनाते हैं।

इस “गंदे धंधे” की जड़ में जहाँ एक ओर गरीबी और अशिक्षा है, वहीं दूसरी ओर इन मामलों में भारत के लचर कानून भी हैं। कानूनी तौर पर किडनी दान करना भी एक बेहद जटिल प्रक्रिया है, जिसका फ़ायदा “दलाल” किस्म के डॉक्टर उठाते हैं। अब जाकर सरकार इस दिशा में कोई स्पष्ट कानून बनाने के बारे में विचार कर रही है, ताकि अंगदान को आसान बनाया जा सके। चीन में भी मानव अंग खरीदना-बेचना जुर्म माना जाता है, और इसके लिये कड़ी सजा के प्रावधान भी हैं, लेकिन 1984 में चीन सरकार ने संशोधन करके एक कानून पास किया है जिसके अनुसार आजीवन कारावास प्राप्त किसी कैदी, जिसके कोई भी रिश्तेदार मरणोपरांत उसका मृत देह लेने नहीं आयें, के अंग सरकार की अनुमति से निकाले जा सकते हैं और प्रत्यारोपित किये जा सकते हैं। हालांकि धांधली वहाँ भी कम नहीं है, क्योंकि चीन सरकार के अनुसार 2002 में 1060 कैदियों को मौत की सजा सुनाई गई थी, जबकि एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार इनकी संख्या 15000 से ऊपर है। इन कैदियों के महत्वपूर्ण अंग सिंगापुर और हांगकांग के अमीर चीनियों को लगाये गये।


ऐसा कहा जाता है कि रूस, भारत, कुछ दक्षिण एशियाई देश और कुछ बेहद गरीब अफ़्रीकी देशों में यह धंधा जोरों पर है। इन देशों में मानव अंगों, किडनी, आँखों के कॉर्निया, लीवर, चमड़ी आदि निकालकर बिचौलियों के जरिये बेचे जाते हैं। हाइवे पर अकेले चलने वाले ड्रायवर, नशे में हुए एक्सीडेंट जिनमें लाश लावारिस घोषित हो जाती है, अकेले रहने वाले बूढ़े जिनकी असामयिक मौत हो जाती है, गरीब, मजबूर और कर्ज से दबे हुए लोग आदि इस माफ़िया के आसान शिकार होते हैं (मुम्बई, गुड़गाँव, चेन्नई चारों तरफ़ इस प्रकार के अपराध पकड़ में आ रहे हैं, हाल ही में उज्जैन में एक किडनी रैकेट पकड़ाया है जो डॉकटरों की मिलीभगत से गरीबों और मजदूरों को किडनी बेचने के लिये फ़ुसलाता था)। “ऑर्डर” पूरा करने के चक्कर में कई बार ये अपराधी अपहरण करने से भी नहीं हिचकते। विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्ययन के लिये शरीर के विभिन्न अंगों माँग बनी रहती है, इसी प्रकार आयरलैण्ड और जर्मनी आदि यूरोपीय देशों में टाँगों की लम्बी और मजबूत हड्डियाँ की फ़ार्मेसी कम्पनियाँ मंगवाती हैं जिन्हें दाँतों की “फ़िलिंग” के काम में लिया जाता है।

ऊपर दिये गये तथ्य निश्चित रूप से एक भयानक दुष्चक्र की ओर इशारा करते हैं… ऐसे में हमें अत्यन्त सावधान रहने की आवश्यकता है, किसी भी अन्जान जगह पर किसी अजनबी पर एकदम विश्वास न करें न ही उसके साथ अधिक समय अकेले रहें, बच्चों को रातों में अकेले सुनसान जगहों पर जाने से हतोत्साहित करें, यदि पार्टी में ज्यादा नशा हो गया हो तो किसी दोस्त को साथ लेकर ही देर रात को घर लौटें…

और इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया हुआ न मानें, क्योंकि धरती पर सबसे खतरनाक प्राणी है “इंसान”, जिससे सभी को सावधान रहना चाहिये…

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Crude Oil Price Crisis, Indian Politicians
अभी हाल ही में उज्जैन में देश की दो सर्वोच्च हस्तियाँ आईं (वैसे सर्वोच्च तो एक ही थी)। पहले आईं सोनिया गाँधी और उसके कुछ ही दिन बाद आईं राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल। जब से सुरेश पचौरी मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने हैं वे लगातार इस कोशिश में थे कि सोनिया का एक दौरा मप्र में हो जाये, और आखिरकार वह हो गया। हम उज्जैनवासियों के लिये किसी वीवीवीआईपी का आगमन वैसे तो कोई खास बात नहीं, क्योंकि महाकालेश्वर के दर्शनों के लिये यहाँ नेता-अभिनेता-खिलाड़ी-उद्योगपति आते ही रहते हैं। वैसे तो हर विशिष्ट व्यक्ति चुपचाप आता है, महाकाल के दर्शन करता है और बगैर किसी “ऐरे-गैरे” से मिले, निकल लेता है, लेकिन इस बार सोनिया एक रैली को सम्बोधित करने आ रही थीं और वह उज्जैन में कम से कम तीन घंटे रुकने वाली थीं। बस फ़िर क्या था, कांग्रेसी तो कांग्रेसी, प्रशासनिक अधिकारियों को भी लगा कि “घर की शादी है”।

सोनिया गाँधी के आने-जाने का मार्ग तय किया गया, उनकी सुरक्षा के लिये अन्य जिलों से पुलिस बल, रैपिड एक्शन फ़ोर्स, एसपीजी, कमांडो आदि सभी आये, चूंकि वे महाकाल भी जाने वाली थीं, इसलिये ठेठ हवाई अड्डे और सर्किट हाउस से लेकर मन्दिर तक की रिहर्सल कम से कम दस-बीस बार की गई, आईजी-डीआईजी-एसपी के दौरे पर दौरे चले, कलेक्टर-कमिश्नर लगातार उज्जैन भर में घूमते-फ़िरते रहे… कहने का मतलब यह कि सैकड़ों सरकारी गाड़ियाँ, जीपें, ट्रक, डम्पर, नगर निगम के वाहन आदि लगातार आठ-दस दिन तक व्यवस्था में लगे रहे। हजारों लीटर पेट्रोल-डीजल सरकारी और आधिकारिक तौर पर फ़ूंका गया, खामख्वाह तमाम छोटे-बड़े अधिकारी इधर-उधर होते रहे, नगर निगम में किसी काम के लिये जाओ तो पता चलता था कि “साहब सोनियाजी की व्यवस्था में लगे हैं… दौरे पर हैं”, उठाई गाड़ी निकल गये दौरे पर, कोई देखने वाला नहीं, कोई सुनने वाला नहीं। मनमोहन सिंह गला फ़ाड़-फ़ाड़ कर चिल्ला रहे हैं कि पेट्रोल में मितव्ययिता बरतो, देश संकट के दौर से गुजर रहा है, और इधर कारों का बड़ा भारी लवाजमा (शायद अंग्रेजी में इसे कारकेट कहते हैं) चला जा रहा है, बेवजह। सबसे पहले दो पायलट वाहन टां-टूं-टां-टूं… की तेज आवाज करते हुए (कि ऐ आम आदमी, ऐ कीड़े-मकोड़े रास्ते से हट), फ़िर उसके पीछे दस-बीस कारें, उसके बाद एक-दो एम्बुलेंस, एक फ़ायर ब्रिगेड, एक रैपिड एक्शन फ़ोर्स का ट्रक, और उसके बाद न जाने कितने ही छुटभैये नेता अपनी-अपनी गाड़ियों पर… आखिर यह सब क्या है? और किसके लिये है? जनता को क्या हासिल होगा इससे? कुछ नहीं, लेकिन नहीं साहब फ़िर भी लगे पड़े हैं, दौड़ाये जा रहे हैं गाड़ियाँ मानो इनके लिये मुफ़्त में ईराक से सीधे पाइप लाइन बिछी है घर तक, और मजे की बात तो यह कि इतनी सारी कवायद के बाद सोनिया ने रैली को सम्बोधित किया सिर्फ़ 13 मिनट, जिसमें उनका आना, जमाने भर का स्वागत-हार-फ़ूल-माला-गुलदस्ते-चरण वन्दन आदि भी शामिल था, और महान वचनों का सार क्या था? – कि राज्य सरकार निकम्मी और भ्रष्ट है, महंगाई रोकने में हमारा साथ नहीं दे रही, और आने वाले चुनावों के लिये कांग्रेसियों को तैयार रहना चाहिये। ये तीन बातें तो दिन में चार-चार बार इनके प्रवक्ता विभिन्न टीवी पर बकते रहते हैं, फ़िर नया क्या हुआ?

खैर यह तो हुआ सरकारी खर्चा, जिसकी पाई-पाई हम करदाताओं की जेब से गई है, अब बात करते हैं निजी पेट्रोल-डीजल फ़ूंक तमाशे की… चूंकि यह मध्यप्रदेश में चुनावी वर्ष है, इसलिये हरेक नेता विधानसभा टिकट के लिये अपना शक्ति प्रदर्शन सोनिया के सामने करना चाहता था। आसपास की तहसीलों, गाँवों से सैकड़ों वाहन भर-भर कर लोग लाये गये, जीपें, ट्रक, बस, ट्रैक्टर ट्रालियाँ जिसे जो मिला उसी में किसानों को भरकर लाया गया। मजे की बात तो यह थी कि जब कई गाड़ियाँ उज्जैन की सीमा के बाहर ही थीं, उस वक्त तक तो सोनिया अपना भाषण समाप्त करके जा चुकी थीं। ऐसे में विचारणीय है कि यह पेट्रोल-डीजल संकट असल में किसके लिये है, जाहिर है कि हम-आप जैसे लोगों के लिये जो अपनी जेब से पैसा देकर ईंधन भरवाते हैं। यदि सोनिया गाँधी का यह एक दौरा ही रद्द हो जाता तो देश का लाखों लीटर डीजल बचाया जा सकता था, लेकिन परवाह है किसे…

इसी प्रकार ठीक आठ दिन बाद राष्ट्रपति का दौरा हुआ, प्रशासन की फ़िर से वही कवायद, फ़िर वही रिहर्सल (तीन-तीन बार) सरकारी गाड़ियाँ बगैर सोचे-समझे दौड़ रही हैं, अधिकारी सारे काम-धाम छोड़कर व्यवस्था में लगे हैं, कार्यक्रम बनाये-बिगाड़े जा रहे हैं, कई जगह रंगाई-पुताई की गई, फ़र्जी डामरीकरण किया गया (जो पहली बारिश में ही धुल जायेगा), सर्किट हाउस के पर्दे बदलवाये गये, महंगी क्रॉकरी खरीदी गई (मुझे आज तक समझ में नहीं आया, कि हर प्रमुख हस्ती के दौरे के समय सर्किट हाउस में, और जब भी कोई मंत्री या बड़ा अधिकारी नये बंगले में शिफ़्ट होता है सबसे पहले पर्दे, क्रॉकरी और सोफ़े क्यों बदलवाता है… कोई बताये कि क्या इसमें कोई “छुआछूत कानून” का मामला बनता है?)। तात्पर्य यह कि लाखों रुपये एक-एक दौरे पर सरकारी और निजी तौर पर खर्च होते हैं, इस “बहती गंगा” में अधिकारी और कर्मचारी अपने हाथ-पाँव-मुँह सब धो लेते हैं।

यह देश लुंजपुंज लोकतन्त्र और सड़ी-गली न्याय व्यवस्था की बहुत भारी कीमत चुका रहा है। एक नये प्रकार के राजा-रजवाड़े पैदा हो गये हैं, जो आम आदमी से बहुत-बहुत दूर हैं (शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से)। पिछले वर्ष 11 लाख चौपहिया और 38 लाख दुपहिया वाहनों की बिक्री हुई, चारों तरफ़ हल्ला मचाया जा रहा है कि भारत में बहुत गरीबी है, लेकिन नेताओं के ऐसे भव्य दौरों, पेट्रोल-डीजल की खुलेआम बरबादी और गाड़ियों के नित नये जारी होते मॉडलों को देखकर लगता नहीं कि आज भी कई परिवार 40-50 रुपये रोजाना पर गुजर-बसर कर रहे हैं। लेकिन व्यवस्था ही कुछ ऐसी बनी हुई है कि कफ़न-दफ़न में भी पैसा खाने की जुगाड़ देखने वाले अधिकारी, बच्चों के “कैरेक्टर सर्टिफ़िकेट” जारी कर रहे हैं, और जिनकी जगह जेल में होना चाहिये वे मंत्रीपद का उपभोग कर रहे हैं।

इस विद्रूप और विषम परिस्थिति में भी “पॉजिटिव” देखना हो तो वह यह है कि इस बहाने कम से कम कुछ सड़कों का, कुछ समय के लिये ही सही कायाकल्प हो जाता है, जहाँ-जहाँ ये वीवीआईपी लोग जाने वाले हों वहाँ की नालियाँ साफ़ हो जाती हैं, उस इलाके की स्ट्रीट लाईटें ठीक हो जाती हैं, उन एक-दो दिनों के लिये बिजली कटौती नहीं होती आदि-आदि, वरना…


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Drunken Driving Youths Road Accidents
लगभग रोज ही किसी न किसी चैनल पर एक खबर अवश्य होती है कि दिल्ली, मुम्बई, चंडीगढ़, गुड़गाँव, पुणे, हैदराबाद आदि महानगरों में किसी कार ने फ़ुटपाथ पर सोये लोगों को कुचल दिया, किसी बाइक सवार ने किसी बूढ़े की जान ले ली आदि-आदि। हम धीरे-धीरे इन खबरों के भी “आदी”(?) होते जा रहे हैं, और इन घटनाओं में सलमान जैसे “सेलेब्रिटी(?)” तक शामिल हैं। ऐसी घटनाओं के तेजी से बढ़ने के पीछे मुख्य कारण है “युवाओं में बढ़ती शराबनोशी”। शराब अब समाज के लगभग 70% तबके में त्याज्य, या बुरी वस्तु नहीं मानी जाती, शादी-पार्टियों में तो अब यह आम हो चली है, ये बात और है कि शराब पीने और पीने के बाद की हरकतों की तमीज सिखाने का कोई इंस्टीट्यूट अभी तक नहीं खुला है। अक्सर देखने में आया है कि शराब पीकर कार या बाइक से कुचलने की घटनायें आमतौर पर शनिवार-रविवार को ज्यादा होती हैं। हालांकि अमीरजादों के लिये क्या वीक-एण्ड और क्या काम का दिन, लेकिन जब से बीपीओ का बूम आया है, सॉफ़्टवेयर, हवाई सेवाओं, व अन्य सभी इंडस्ट्री ने अनाप-शनाप पैसा युवाओं के हाथों में पहुँचाना शुरु किया है, धीरे-धीरे इन क्षेत्रों के युवा अमूमन शनिवार-रविवार को “मस्ती”, “एंजॉय”, “रिलैक्स” के नाम पर शराब या अन्य नशे की गिरफ़्त में होते हैं। इसकी शुरुआत होती है बीयर से और अन्त होता है हवालात में या सिर फ़टने के कारण हुई मौत में। रोड एक्सीडेंट के 40-45% मामलों में इसकी जिम्मेदार शराब ही होती है और उसमें भी 90% की उम्र 17 से 30 वर्ष होती है, इसका क्या मतलब निकाला जाये? शराब ही शायद एकमात्र ऐसी चीज है जो खुशी में भी पी जाती है और गम में भी, और कई बार टाइम-पास के लिये भी (विजय माल्या देखते-देखते विशाल एयरलाइन के मालिक यूँ ही नहीं बन गये हैं)।

बहरहाल, अक्सर देखने में आया है कि ऐसी घटनाओं में टक्कर मारकर घायल करने वाला, बल्कि जान लेने तक के मामले में ड्रायवर बच निकलता है। पहले या तो वह भाग जाता है, या पकड़ा जाये तो रिश्वत देकर छूटने की कोशिश करता है, या उसका कोई वैध-अवैध बाप थाने में आकर उसे छुड़ा ले जाता है। मान लो किसी तरह संघर्ष करके केस कोर्ट में चला जाये तो उसे सजा होगी मात्र दो साल की। जी हाँ, कानून के अनुसार एक तो यह जमानती अपराध है, और सजा अधिकतम दो साल की हो सकती है, चाहे उसने कितने ही लोगों को कुचलकर मार दिया हो।

सबसे पहला सुधार तो कानून आयोग की सिफ़ारिशों के अनुसार यही होना चाहिये कि अपराध गैर-जमानती हो (जैसे कि दहेज या दलित उत्पीड़न के मामले में है) और अपराध साबित होने के बाद सजा को बढ़ाकर दो साल की बजाय दस साल किया जाना चाहिये। दो-चार रईसजादे दस साल के लिये अन्दर हो जायें और उनके “पिछवाड़े” पर जेल में डंडे बरसाये जायें तो बाकी के 50% तो वह आलम देखकर गाड़ी चलाना ही छोड़ देंगे, बाकी के दारू पीना छोड़ देंगे और बचे-खुचे लोग “दारू और गाड़ी का कॉम्बिनेशन” नहीं करेंगे। ये तो हुआ पहला और जरूरी कदम। यदि टक्कर के बाद कोई व्यक्ति घायल हुआ है तो लायसेंस निरस्ती और/या भारी जुर्माना तो होना ही चाहिये लेकिन यदि व्यक्ति की जान गई है तब तो कम से कम दस साल की सजा होना ही चाहिये।

हालांकि भारत जैसे देश में कानून का पालन करवाना ही कठिन काम होता है, देश में सरेआम सड़कों पर 100 रुपये में कानून बिकता है, ड्रायविंग लायसेंस हमारे यहाँ घर बैठे बन जाते हैं (राशन कार्ड और पासपोर्ट भी), ऐसे में सबसे पहला काम शिक्षित करने का होना चाहिये, खासकर पालकों को जो अपने आठ-दस साल के नौनिहाल को स्कूटी या लूना चलाते देखकर गदगद हुए जाते हैं। ये नजारे आमतौर पर कालोनियों में देखे जा सकते हैं, सबसे पहले उन बच्चों के वाहन जब्त करके पालकों को “हिन्दी में समझाइश” देना होगा।

कानून में बदलाव के अलावा मेरा सुझाव है कि –
1) नशे में वाहन चलाते पाये जाने पर, गलत लेन या “नो एंट्री” में वाहन पकड़े जाने पर – जान से मारने की कोशिश का केस बनाये जायें
2) दूसरा महत्वपूर्ण सुझाव यह कि “जुर्माने” में से ट्रैफ़िक जवान को Incentive का प्रावधान होना चाहिये। मान लें कि “गलत पार्किंग”, “जेब्रा क्रॉसिंग पार करना”, “रेड लाइट होते हुए भी गाड़ी भगा ले जाना”, “लायसेंस-रोड टैक्स के कागजात न होना”, “गाड़ी चलाते हुए मोबाइल पर बात करने” जैसे छोटे अपराधों के लिये हमें “गाड़ी की कीमत” के हिसाब से 5% जुर्माना ठोंकना चाहिये और उस जुर्माना राशि में से 10-15% की रकम ट्रैफ़िक जवान को मिलना चाहिये। जैसे यदि किसी चार लाख की कार पर जुर्माना हुआ 20,000/- तो उसमें से 2000/- ट्रैफ़िक जवान का Incentive होगा, किसी 60,000 कीमत की बाइक पर जुर्माना 3000/- और उसमें से 300-500 रुपये ट्रैफ़िक जवान को मिलेंगे, तो ऐसे में भला वह क्यों 50-100 रुपये की रिश्वत लेकर किसी को छोड़ेगा? वह तो चाहेगा कि दिन भर में आठ-दस केस पकड़े और आराम से 5-7 हजार रुपये लेकर घर जाये। ऊपर से सरकार की प्रशंसा अलग से… देखते-देखते ट्रैफ़िक नियमों के प्रति जागरूकता फ़ैलेगी ऐसा मेरा विश्वास है।

भारत के अधिकांश लोग समझाइश से या शिक्षित होने भर से अनुशासन नहीं मानते, इन्हें “डंडा” ही ठीक कर सकता है (कुछ मामलों में “आपातकाल” इसका गवाह है)…

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IIT Coaching Classes Kota
जून के महीने में अखबार पढ़ना एक बेहद त्रासदायक और संतापदायक काम होता है, आप सोचेंगे ऐसा क्यों? असल में मई के आखिरी सप्ताह या जून के पहले सप्ताह देश में “रिजल्ट” का मौसम होता है। दसवीं, बारहवीं, पीईटी, पीएमटी, आईआईटी-जेईई, और भी न जाने क्या-क्या लगातार रिजल्ट आते ही रहते हैं। जाहिर है कि रिजल्ट आयेंगे तो “सबसे ज्यादा मुनाफ़े वाले धंधेबाज” यानी कि कोचिंग क्लास वाले मानो पूरा का पूरा अखबार ही खरीद लेते हैं। रिजल्ट के अगले ही दिन फ़ुल पेज के विज्ञापन झलकने लगते हैं, “हमने ऐसा तीर मारा, हमारे यहाँ के अलाँ-फ़लाँ स्टूडेंट ने ये तोप मारी आदि-आदि”। विज्ञापन भी एक-दूसरे कोचिंग क्लास वालों को आपस में नीचा दिखाने की भाषा में किये जाते हैं… “मार लिया मैदान…”, “क्रैक करके रख दिया”, “है कोई दूसरा हमारे जैसा”, “हम ही हैं सिरमौर…” जैसे हेडिंग वाले भड़काऊ विज्ञापन दिये जाते हैं। अखबार वालों का क्या जा रहा है, उन्हें तो खासी मोटी रकम वाली कमाई हो रही है (मुश्किल हम जैसे मूर्खों की होती है जो तीन-चार रुपये का अखबार खरीदते हैं, जिसमें पढ़ने के लिये दो या तीन पेज ही होते हैं, बाकी के पेज कोचिंग क्लासेस, केन्द्र या राज्य सरकार की कोई फ़ालतू सी योजना, किसी कमीने नेता के जन्मदिन की बधाईयाँ, बाइक-मोबाइल-कार-फ़्रिज-टीवी बेचने के लिये फ़ूहड़ता… आदि होता है) और कोचिंग वालों का भी क्या लग रहा है “तेरा तुझको अर्पण…” की तर्ज पर पालकों से झटकी हुई मोटी रकम में से थोड़ा सा खर्च कर दिया, ताकि अगले साल के “कटने वाले बकरे” पहले से ही बुक किये जा सकें । एक ही छात्र की तस्वीर दो-तीन-चार कोचिंग क्लास वालों के विज्ञापन में दिखाई दे जाती है। यह संभव ही नहीं कि कोई छात्र एक साथ इतनी सारी कोचिंग क्लास में जा सकता है, लेकिन खामख्वाह “झाँकी” जमाने में क्या जा रहा है, कौन उनसे इस बाबत पूछताछ करने वाला है। रिजल्ट आते ही एक तरह का मकड़जाल बुन लिया जाता है, तरह-तरह के दावे और लुभावने विज्ञापन देकर “हम ही श्रेष्ठ हैं, बाकी सब तो बेकार हैं” का भाव पैदा किया जाता है।

यह खबर सबने सुनी होगी कि बिहार में शौकिया तौर पर गरीब छात्रों के लिये आईआईटी की क्लासेस चलाने वाले “सुपर-30” में सभी 30 गरीब छात्रों का चयन आईआईटी के लिये हो गया है (पिछले वर्ष यह 30 में से 28 था), अर्थात लगभग 100% छात्र सफ़ल। धन्य हैं श्री अभयानन्द जी जिन्होंने यह प्रकल्प हाथ में लिया है। अब नजर डालते हैं कोटा की महान(?) कोचिंग संस्थाओं पर… अव्वल तो ये लोग कभी भी विज्ञापन देकर जाहिर नहीं करते कि उनके यहाँ कुल कितने छात्रों ने प्रवेश लिया। लेकिन हाल ही में एक विज्ञापन देखकर पता चला कि एक “बड़ी” कोचिंग क्लास ने लिखा “1547 छात्रों में से 184 का चयन”, एक और उभरती हुई कोचिंग संस्था ने बताया कि कुल “48 छात्रों में से 4 का चयन आईआईटी-एआईईईई में”। अब खुद ही हिसाब लगाइये कि कितना प्रतिशत हुआ? मुश्किल से 12-14% सफ़लता!!! इस सड़ी सी बात पर इतना क्या इतराना? क्यों इतना डंका पीटना? अरे तुमसे दस गुना अच्छे तो “सुपर-30” वाले हैं, जिनके पास न तो चिकने पन्नों वाले ब्रोशर हैं, न ही एसी रूम हैं, न उनकी फ़ैकल्टी फ़ाइव स्टार में रुकती है, न ही वे मोटी फ़ीस वसूलते हैं, फ़िर भी उनका रिजल्ट लगभग 100% है, तो कोटा में “शिक्षा इंडस्ट्री” चलाने वाले किस बात पर गर्व करते हैं? अच्छा, एक बात और है… ये कथित महान कोचिंग क्लासेस वाले अपने यहाँ छात्रों को प्रवेश कैसे देते हैं… सबसे पहले वे 85-90 प्रतिशत अंक से कम लाने वाले को साफ़ मना कर देते हैं। फ़िर उच्च अंक लाने वाले बेहतरीन तीक्ष्ण बुद्धि वाले लड़के छाँटे जाते हैं, उनमें भी एक “एन्ट्रेन्स परीक्षा” आयोजित की जाती है, उसमें जो सफ़ल होते हैं उन्हें ही कोटा में प्रवेश मिलता है… इसका मतलब यह कि दूध में से क्रीम निकालने के बाद उस क्रीम को भी फ़ेंटकर सबसे बढ़िया घी निकाल लिया, फ़िर दावा करते हैं कि 1547 छात्रों में से 184 का चयन???? अरे भाई तुम तो पहले से ही कुशाग्र बुद्धि वाले लड़के छाँट चुके हो, फ़िर भी इतना कम सफ़लता प्रतिशत?? उम्दा किस्म का “हीरा” पहले से ही तुम्हारे पास है, सिर्फ़ उसे तराशना है, फ़िर भी??? यदि इतने ही शूरवीर(?) हो, तो किसी गरीब लड़के को जिसके 80 प्रतिशत नम्बर आये हों, मुफ़्त में पढ़ाकर दिखाओ और उसका सिलेक्शन आईआईटी में करवाओ। जब तुम्हें मालूम है कि आईआईटी में सिर्फ़ 6000-6500 सीटें हैं, तो एक साल के लिये ऐसा करके दिखाओ कि सब बड़े-बड़े कोचिंग वाले आपस में मिलकर सिर्फ़ और सिर्फ़ 8000 छात्रों को प्रवेश दो, और उसमें से ज्यादा नहीं तो 5000 सिलेक्शन करवा के दिखा दो, तो माना जाये कि वाकई में तुम्हारी शिक्षा(?) में कुछ दम है।

एक पेंच और है, जब इस “महान” देश में IAS, IPS की परीक्षा तक में धांधली हो जाती है, “मुन्नाभाई” किसी अन्य की जगह जाकर परीक्षा दे आते हैं, पैसा देकर पेपर आउट हो जाते हैं, होटलों में बैठकर परीक्षापत्र हल किये जाते हैं, तो क्या गारंटी है कि IIT, IIM, AIEEE की परीक्षा भी बेदाग होती होगी??? बड़े कोचिंग संस्थान जिनकी आमदनी करोड़ों में है, क्या “ऊपर” तक सेटिंग नहीं कर सकते? भारत जैसे “बिकाऊ लोगों के देश" में बिलकुल कर सकते हैं।

अब आते हैं खर्चों पर… एक छात्र की फ़ीस तीस हजार से पचास हजार (जैसी दुकान हो उस हिसाब से), 11वी-12वीं पास करवाने की गारंटी की जुगाड़ की फ़ीस अलग से, उस छात्र का रहना-खाना आदि का खर्च 5 से 10 हजार प्रतिमाह, इसके अलावा पुस्तकें, स्टेशनरी, परीक्षायें दिलवाने के खर्च, बीच-बीच में घर आने-जाने का खर्चा… कहने का मतलब यह कि एक लड़के पर दो साल में कम से कम तीन-चार लाख रुपये खर्च होता है, इसके बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि बेचारे का सिलेक्शन IIT नहीं, तो AIEEE नहीं, तो किसी अच्छे कॉलेज में ही हो जाये, और यदि हो भी जाये तो फ़िर से खर्चों की नई ABCD शुरु होगी वह अलग है, और सिलेक्शन नहीं हुआ तो तीन-चार लाख गये पानी में? बताइये इतना बड़ा जुआ खेलने की ताकत भारत के कितने प्रतिशत परिवारों में है? क्या यह भी एक प्रकार का आर्थिक आरक्षण नहीं है? क्योंकि मैंने ऐसे कई गरीब-निम्न मध्यमवर्गीय परिवार देखे हैं, जिनमें बच्चों ने 12वीं में 80-85 प्रतिशत तक अंक लाये हैं, लेकिन वे लोग पहले से ही इस “खेल” से बाहर हैं, क्योंकि वे बेचारे तो बड़े कोचिंग संस्थानों के दरवाजे में भी घुसने से डरते हैं। लेकिन हमारी “नौकरी पाने पर आधारित” शिक्षा व्यवस्था का यह एक दर्दनाक पहलू है कि हरेक पालक को इंजीनियर, डॉक्टर ही चाहिये, चाहे उसके लिये कुछ भी करना पड़े, आँखों में एक सपना लिये माँ-बाप दिन-रात खटते रहते हैं, लेकिन अन्य किसी विकल्प पर विचार तक नहीं करते। छोटे-छोटे कस्बों में ही तीन-तीन टेक्निकल कॉलेज खुल गये हैं, जिसमें 12वीं में सप्लीमेंट्री पाये हुए लड़के को भी एडमिशन दे दिया जाता है, फ़िर वह जैसे-तैसे धक्के खाते-खाते चार या पाँच साल में 60-70 प्रतिशत वाली डिग्री हाथ में लेकर बाहर निकलता है। उज्जैन से हर साल 350-400 सॉफ़्टवेयर/केमिकल/सिविल इंजीनियर पैदा होते हैं, जिनमें से 30-40 को ही ठीकठाक “प्लेसमेंट” मिल पाती है, बाकी के इंजीनियर सड़क नापते रहते हैं, कुछ “फ़्रस्ट्रेट” हो जाते हैं, कुछ ठेकेदार बन जाते हैं, कुछ कोई और धंधा कर लेते हैं, लेकिन ताकत न होते हुए भी हजारों परिवार यह महंगा जुआ हर साल खेल रहे हैं। आखिर क्या फ़ायदा है ऐसी शिक्षा का? फ़ायदा तो भरपूर हुआ लेकिन कोचिंग क्लास वालों का और उसके बाद प्रायवेट इंजीनियरिंग कॉलेज वालों का… लेकिन फ़िलहाल इस “शिक्षा बाजार के खेल” का कोई तात्कालिक हल नहीं है, इसके लिये शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे, चाहिये होगी दूरदृष्टि, पक्का इरादा और ईमानदार नीति निर्माता, जिनका काफ़ी समय से अकाल पड़ा हुआ है…

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SBI Recruitment Procedure & Fees
काफ़ी वर्षों के बाद भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने 20000 क्लर्कों की भर्ती के लिये विज्ञापन जारी किया है, जिसे भरने की आखिरी तारीख 31 मई है। इस बात में दो राय नहीं हो सकती कि एसबीआई इस समय मानव संसाधन की कमी की समस्या से जूझ रही है। चूंकि काफ़ी वर्षों तक कोई भर्ती नहीं की गई, काफ़ी सारे वरिष्ठ लोगों ने काम का बोझ बढ़ जाने और वीआरएस की आकर्षक शर्तों के कारण VRS (Voluntary Retirement Scheme) ले लिया, तथा बाकी के बचे-खुचे अधिकारी भी धीरे-धीरे रिटायरमेंट की कगार पर पहुँच चुके हैं। काम का बोझ तो निश्चित ही बढ़ा है, सरकार की सबसे मुख्य बैंक होने के कारण पेंशन, रोजगार, भत्ते, चालान, डीडी जैसे कई कामों ने क्लर्कों पर काम का बोझ बढ़ाया है जिनमें से अधिकतर उस आयु वर्ग में पहुँच चुके हैं, जहाँ एक तो काम करने की रफ़्तार कम होने लगती है और दूसरे नई तकनीक सीखने में हिचक और अनिच्छा भी आड़े आती है। ऐसे माहौल में युवाओं की भरती करने के लिये SBI ने एकमुश्त 20,000 क्लर्कों की भर्ती के लिये अभियान शुरु किया है। यहाँ तक तो सब कुछ ठीकठाक लगता है, लेकिन असली “पेंच” यहीं से शुरु होता है। यह बात तो अब सभी जान गये हैं कि बैंकें अब जनसुविधा या जनहित के काम कम से कम करने की कोशिशें कर रहे हैं, यदि करना भी पड़े तो उसमें तमाम किंतु-परन्तु-लेकिन की आपत्ति लगाकर करते हैं, वहीं वित्त मंत्रालय के निर्देशों के मुताबिक हरेक बैंक अपने-अपने विभिन्न शुल्क (Charges) लगाकर अपना अतिरिक्त “खर्चा” निकालने की जुगत में लगे रहते हैं। (इस बारे में पहले भी काफ़ी प्रकाशित हो चुका है कि किस तरह से बैंकें ATM Charges, Inter-Transaction Charges, DD Charges, Cheque Book per leaf charges, Late fees, Minimum Balance Fees जैसे अलग-अलग शुल्क लेकर काफ़ी माल बना लेती हैं)। ये तथाकथित शुल्क इतने कम होते हैं कि सामान्य व्यक्ति इसे या तो समझ ही नहीं पाता या फ़िर जानबूझकर कोई विरोध नहीं करता “कि इतना शुल्क कोई खास बात नहीं…”। यह ठीक लालू यादव जैसी नीति है, जिसमें उपभोक्ता को धीरे-धीरे और छोटे-छोटे शुल्क लगाकर लूटा जाता है। यह छोटे-छोटे और मामूली से लगने वाले शुल्क, ग्राहकों की संख्या बढ़ने पर एक खासी बड़ी रकम बन जाती है जो कि रेल्वे या बैंक के फ़ायदे में गिनी जाती है। हालांकि आम जनता इसमें कुछ खास नहीं कर सकती, क्योंकि उदारीकरण के बाद बैंकों को पूरी छूट दी गई है (निजी क्षेत्र के बैंकों को कुछ ज्यादा ही) कि वे ग्राहक को ATM, Core Banking, Internet Banking आदि के द्वारा बैंक शाखा से दूर ही रखने की कोशिश करें और इसे शानदार सुविधा बताकर इसका मनमाना (लेकिन मामूली सा लगने वाला) शुल्क वसूल लें। (हो सकता है कि कुछ दिनों बाद किसी बैंक शाखा में घुसते ही आपसे दस रुपये माँग लिये जायें, गद्देदार सोफ़े पर बैठने और एसी की हवा खाने के शुल्क के रूप में)



बात हो रही थी SBI की क्लर्क भर्ती अभियान की… रोजगार समाचार में छपे विज्ञापन के अनुसार बैंक (और अन्य बैंकों जैसे बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र, कार्पोरेशन बैंक, आंध्रा बैंक, इलाहाबाद बैंक आदि ने भी) ने क्लर्क की भर्ती के लिये न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता 60% अंकों से 12वीं पास या 40% अंकों से किसी भी विषय में ग्रेजुएट रखी है। इसके लिये किसी भी CBS (Core Banking) शाखा में 250/- का चालान जमा करके इसे नेट से ऑनलाइन ही भरना है, उसमें भी पेंच यह कि प्रार्थी का ई-मेल आईडी होना आवश्यक है, वरना ऑनलाइन फ़ॉर्म भरा ही नहीं जायेगा (यह शर्त भी अजीबोगरीब है, ग्रामीण क्षेत्र के कई युवा उम्मीदवारों को ई-मेल आईडी क्या होता है यही नहीं मालूम)। यहाँ से मुख्य आपत्ति शुरु होती है… जब बैंक सारी प्रक्रिया ऑनलाइन करवा रहा है तो उसे शुल्क कम रखना चाहिये था, क्योंकि उनके स्टाफ़ के समय और ऊर्जा की काफ़ी बचत हो गई। एक मोटे अनुमान के अनुसार समूचे भारत से इन 20,000 पदों के लिये कम से कम 25 से 30 लाख लोग फ़ॉर्म भरेंगे (सिर्फ़ उज्जैन जैसे छोटे शहर से 3000 से 4000 फ़ॉर्म भरे जा चुके हैं)। एक समाचार के अनुसार दिनांक 23 मई तक एसबीआई के इस “भर्ती खाते” में अच्छी-खासी रकम एकत्रित हो चुकी थी, यानी कि 31 मई की अन्तिम तिथि तक करोड़ों रुपये एसबीआई की जेब में पहुँच चुके होंगे। हालांकि इस सारी प्रक्रिया में गैरकानूनी या अजूबा कुछ भी नहीं है, पहले भी भर्ती में यही शर्तें होती थीं। मेरा कहने का मुख्य पहलू यह है कि बढ़ती जनसंख्या, बढ़ती साक्षरता, बढ़ती अपेक्षाओं को देखते हुए एसबीआई को शुल्क कम से कम रखना चाहिये था। दूसरी मुख्य बात यह कि 12वीं की परीक्षा में शामिल होने वाले को भी फ़ॉर्म भरने की अनुमति है शर्त वही 60% वाली है, इसी प्रकार ग्रेजुएट परीक्षा में शामिल होने वाले को भी परीक्षा देने की छूट है, बशर्ते उसके कम से कम 40% हों। इसका सीधा सा अर्थ यही होता है कि कम से कम पाँच से दस प्रतिशत उम्मीदवार तो परीक्षा देने से पहले ही बाहर हो जायेंगे (जिनका रिजल्ट 31 मई के बाद आयेगा और जिन्हें 12वीं में 60% या ग्रेजुएट में 40%अंक नहीं मिलेंगे)।

अगला पेंच यह है कि कुल पाँच विषय हैं जिनमें 40% अंक लाना आवश्यक है तभी साक्षात्कार की प्रावीण्य सूची में स्थान मिलने की सम्भावना है, लेकिन विज्ञापन में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि पाँचों विषयों में कुल मिलाकर 40% लाना है या पाँचों विषयों में अलग-अलग 40% अंक लाना है। यह बैंक के “स्वत्व-अधिकार” क्षेत्र में है कि वह आगे क्या नीति अपनाता है। चलो मान भी लिया कि कम से कम 40% अंक पर ही अभ्यर्थी पास होगा, लेकिन जब M.Sc. वाले भी फ़ॉर्म भर रहे हैं, बेरोजगारी से त्रस्त B.E. और M.B.A. वाले भी बैंक में “क्लर्क” बनने के लिये लालायित हैं तब ऐसे में भला 12वीं पास या “appeared” वाले लाखों लड़कों का क्या होगा? इस कठिन परीक्षा में ये लोग कैसे मुकाबला करेंगे? यह तो खरगोश-कछुए या गधे-घोड़े को एक साथ दौड़ाने जैसा कार्य है। बैंक ने पहले ही साफ़ कर दिया है कि प्रकाशित पदों के तीन गुना उम्मीदवार ही साक्षात्कार के लिये प्रावीण्य सूची बनाकर बुलाये जायेंगे, अर्थात सिर्फ़ 60,000 युवाओं को इंटरव्यू के लिये बुलाया जायेगा। मान लो कि बीस लाख व्यक्ति भी फ़ॉर्म भर रहे हैं तो 19 लाख 40 हजार का बाहर होना तो तय है, ऐसे में एक दृष्टि से देखा जाये तो 12वीं पास वाले लाखों बच्चे तो ऐसे ही स्पर्धा से बाहर हो जायेंगे, तो उनके पैसे तो बर्बाद ही हुए, फ़िर ऐसी शर्तें रखने की क्या तुक है? या तो बैंक पहले ही साफ़ कर दे कि “क्लर्क” के पद के लिये पोस्ट ग्रेजुएट उम्मीदवार पर विचार नहीं किया जायेगा। सवाल यह है कि क्या इस प्रकार का “खुला भर्ती अभियान” कहीं बैंकों द्वारा पैसा बटोरने का साधन तो नहीं है? बेरोजगारों के साथ इस प्रकार के “छुप-छुप कर छलने” वाले विज्ञापन के बारे में कोई आपत्ति नहीं उठती आश्चर्य है!!!

विशेष टिप्पणी – खुद मैंने अपने सायबर कैफ़े से गत दस दिनों में लगभग 150 फ़ॉर्म भरे हैं, हालांकि मैंने कई 12वीं पास बच्चों को यह फ़ॉर्म न भरने की सलाह दी (जिन्हें मैं जानता हूँ कि वह गधा, बैंक की परीक्षा तो क्या 12वीं में भी पास नहीं होगा, लेकिन यदि कोई 250/- जानबूझकर कुँए में फ़ेंकना चाहता हो तो मैं क्या कर सकता हूँ) और यह 250/- तो शुरुआती बैंक चालान भर हैं, कई उत्साहीलाल तो बैंक की परीक्षा की तैयारी करने के लिये कोचिंग क्लास जाने का प्लान बना रहे हैं। कोचिंग वालों ने भी तीन महीने की 4000/- की फ़ीस को “एक महीने के बैंक परीक्षा क्रैश कोर्स” के नाम पर 2000/- झटकने की तैयारी कर ली है, वहाँ भी लम्बी लाइन लगी है। इसके बाद चूंकि उज्जैन में परीक्षा केन्द्र नहीं है इसलिये इन्दौर जाकर परीक्षा देने का खर्चा भी बाकी है…

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Fairness Creams Market India Imami
सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया निर्णय में कहा है कि “महिलाओं के विरोध में उनके रंग के आधार पर की टिप्पणी को भी शाब्दिक हिंसा माना जायेगा…” इसका अर्थ है कि यदि आप किसी महिला को “कालीकलूटी-बैंगनलूटी” या “कल्लोरानी” कहते हैं तो आप हिंसक हैं और महिला पर अत्याचार कर रहे हैं। एकदम स्वागतयोग्य और सही निर्णय दिया है सुप्रीम कोर्ट ने। हमारे देश में “गोरे रंग” के प्रति एक विशेष आसक्ति का भाव है, कहीं-कहीं यह आसक्ति - भक्ति और चमचागिरी तक पहुँच जाती है (समझदार के लिये इशारा काफ़ी है)। दो कौड़ी की औकात वाला और चेहरे से ओमपुरी या सदाशिव अमरापुरकर से भी गया-बीता लड़का, “गोरी-सुन्दर” दुल्हन चाहिये का फ़ूहड़ विज्ञापन छपवाने से बाज नहीं आता। हमारा मीडिया, और खासकर टीवी एक से बढ़कर एक अत्याचारी (सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय को मानें तो) विज्ञापन लगातार दिखाता रहता है। एक विज्ञापन में काली लड़की निराश है, अचानक उसे एक क्रीम मिलती है, वह गोरी हो जाती है और सीधे एयर-होस्टेस या टीवी अनाउंसर बन जाती है। दूसरे विज्ञापन में एक लड़की “सिर्फ़ पाँच दिन” में गोरी बन जाती है, और उसके माता-पिता भी मूर्खों जैसे हँसते हुए दिखाये जाते हैं। हद तो तब हो जाती है, जब एक काला लड़का (शायद अपनी बहन की) क्रीम चुराकर लगाता है और अचानक शाहरुख खान “ए ए ए ए ए ए ए ए ए मर्द होकर लड़कों वाली क्रीम लगाते हो?” कहते हुए प्रकट होता है, बस फ़िर वह लड़का गोरा बनकर लड़कियों के बीच से इठलाता हुआ निकलता है। क्या ऐसे विज्ञापन भी “अत्याचार” की श्रेणी में नहीं आना चाहिये?



भारत में गोरे रंग के प्रति इतना आकर्षण क्यों है? गोरे रंग को ही सफ़लता का पर्याय क्यों मान लिया गया है? वह क्या मानसिकता या मनोवैज्ञानिक कारण हैं जो अक्सर काले-साँवले लोगों के प्रति निम्न और गलत-सलत धारणा बनाते रहते हैं? यदि हम ऐतिहासिक या शारीरिक दृष्टि से देखें तो यह वैज्ञानिक तथ्य है कि कमनीय स्त्रियाँ अधिक प्रजनन शक्ति रखती हैं, पुष्ट वक्षस्थल और नाजुक कमर के प्रति पुरुष का आकर्षण सदैव रहा है, ठीक इसी प्रकार मजबूत शरीर के, रोगमुक्त और साँवले चेहरे वाले पुरुष सामान्यतः स्त्रियों को पसन्द आते हैं। इनके मिलन से उत्तम संतान पैदा हो ऐसी दोनों की इच्छा रहती है, लेकिन ये साला “गोरा रंग” इन सबके बीच में कहाँ से आ गया? ये गोरे चेहरे वाली या वाला के बारे में आकर्षण कब और कैसे पैदा हो गया? भारत के अधिकतर लोग काले या साँवले हैं, देवताओं का वर्णन भी शास्त्रों में अधिकतर “साँवला”, सुन्दर-सलोना, इस प्रकार किया गया है, राम भी साँवले थे, कृष्ण काले और शिव तो एकदम फ़क्कड़-औघड़ बाबा, ये और बात है कि इनकी पत्नियों को अत्यन्त रूपवती बताया गया है, लेकिन विशेष रूप से “गोरी-गोरी” तो कतई नहीं (गौरी यानी पार्वती के अलावा), फ़िर इन भगवानों के करोड़ों भक्त क्यों मूर्खों की तरह फ़ेयरनेस क्रीम चेहरे पर पोते जा रहे हैं?

एक बात शोध करने लायक है कि “क्या अंग्रेजों के शासन के पूर्व भी भारतीयों में गोरे होने या दिखने की भरपूर चाह थी?” या फ़िर दो सौ वर्षों की मानसिक गुलामी ने हमारे दिमागों में “गोरे रंग” की श्रेष्ठता का भ्रम पैदा किया है? अंग्रेज जाने के साठ साल बाद भी त्वचा का रंग क्यों हमारे दिमाग में खलल पैदा करता है? वर्णभेद, नस्लभेद, जातिभेद के साथ “रंगभेद” भी एक कड़वी सच्चाई बन गया है। फ़िर “गोरे” को श्रेष्ठ और “काले” को पिछड़ा, असफ़ल दर्शाने वाले विज्ञापनों पर कोई कार्रवाई हो सकती है क्या? (इस बारे में वकील बन्धु सलाह दें)।

कहते समय अक्सर “जा मुँह काला कर” कहा जाता है, क्यों भई? ऐसा क्यों नहीं कहा जाता कि “जा मुँह गोरा कर”? सफ़ेद रंग हमेशा स्वतन्त्रता, सच्चाई, पवित्रता आदि का प्रतिनिधि होता है, जबकि काला रंग राक्षसी प्रवृत्ति, दुष्टता, गंदापन आदि दर्शाने के लिये उपयोग किया जाता है, ऐसा क्यों? मुम्बई में टैक्सी-होटल वालों द्वारा किसी नीग्रो पर्यटक के मुकाबले अमेरिकी पर्यटक को ज्यादा “भाव” दिया जाता है, ऐसा क्यों? अभी भी किसी भारतीय नर्तकी को वीसा पाने के लिये नाच के दिखाना पड़ता है, काले खिलाड़ियों पर छींटाकशी की जाती है, गोरे खिलाड़ियों पर नहीं, दोष अक्सर “काले” का ही होता है गोरे का नहीं… अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं… यहाँ तक कि ऑस्कर के लिये भी “ब्लैक” की बजाय “पहेली” भेजी गई (इस वाक्य को मजाक मानें)… जाहिर है कि हमारे मन में गोरे रंग के प्रति एक विशेष आसक्ति है, भारतीयों के दिलोदिमाग में गोरे रंग की “श्रेष्ठता” और काले रंग के प्रति तिरस्कार गहरे तक पैठ बना चुका है, और इसे लगातार हवा देती हैं “गोरा बनाने वाली क्रीमें”।

असल में ये सारा खेल “बाजार” से जुड़ा हुआ भी है, कम्पनियों ने भारतीयों की “गोरा बनने” की चाहत को काफ़ी पहले से भाँप लिया है। पहले वे सिर्फ़ औरतों के लिये क्रीमें बनाते थे, अब जब खपत स्थिर हो गई तो “ए ए ए ए ए ए मर्दों के लिये भी” गोरेपन की “अलग-हट के” क्रीम आ गई। अकेले “फ़ेयर एंड लवली” क्रीम का भारतीय बाजार 600 करोड़ रुपये का है, इसके अलावा यह क्रीम मलेशिया, श्रीलंका आदि देशों को निर्यात भी की जाती है। इसके अलावा कम से कम 40 ब्राण्ड ऐसे हैं जो लाखों रुपये का गोरा बनाने का सामान बेच रहे हैं। अब सवाल उठता है कि क्या वाकई ये क्रीमें इतनी प्रभावशाली हैं? लगता तो नहीं, क्योंकि आँकड़ों के अनुसार इस क्रीम की सर्वाधिक (36%) खपत दक्षिण भारत में होती है, जबकि उत्तर और पश्चिम क्षेत्र 23% बिक्री के साथ दूसरे स्थान पर हैं और पूर्व में सबसे कम यानी 18% खपत होती है। “टेक्निकल” दृष्टि से देखा जाये तो दक्षिण भारतीय लोगों को सर्वाधिक गोरा होना चाहिये ना? लेकिन ऐसा है नहीं, और यदि ये क्रीमें वाकई इतनी प्रभावशाली हैं तो अफ़्रीका में इनकी खपत ज्यादा क्यों नहीं है? और जहाँ है, क्या वहाँ के कितने अफ़्रीकी गोरे हुए? असल में इस प्रकार की क्रीमों की सबसे ज्यादा खपत दक्षिण एशियाई देशों भारत, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, बर्मा आदि मे है। (यहाँ देखें)

अब संक्षेप में देखते हैं कि असल में ये क्रीमें करती क्या हैं और इनमें क्या-क्या मिला हुआ है। FDA द्वारा की गई एक टेस्ट में अधिकतर क्रीमों में “पारे” (Mercury) का स्तर बहुत ज्यादा पाया गया, जबकि अधिकतर देशों में सन-स्क्रीन और फ़ेयरनेस क्रीमों में मरकरी का प्रयोग प्रतिबन्धित है। इसी तरह इनमें “हाइड्रोक्विनोन” की मात्रा भी काफ़ी पाई गई, जो कि त्वचा को ब्लीच कर देता है, जिससे तात्कालिक रूप से व्यक्ति को “लगता है” कि वह गोरा हो गया, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम काफ़ी खतरनाक होते हैं। यहाँ तक कि चर्मरोग विशेषज्ञ भी इन क्रीमों को सुरक्षित नहीं मानते और त्वचा कैंसर, धूप से एलर्जी, मूल रंग खो जाने जैसी कई बीमारियों से ग्रसित मरीज उनके पास आते रहते हैं। अधिकतर डॉक्टरों का मानना है कि इनमें कई घातक रसायन मिले होते हैं, लेकिन इन कम्पनियों का विज्ञापन इतना जोरदार होता है कि लोग झाँसे में आ ही जाते हैं। जबकि हमारे बड़े-बुजुर्ग कह गये हैं कि दूध-बेसन या शहद-नींबू आदि के प्रयोग से ज्यादा सुन्दरता पाई जा सकती है, लेकिन “इंस्टेण्ट” के जमाने में ये बात युवाओं को कौन समझाये?

अंत में एक कविता पेश है जो कि 2005 में विश्व की सर्वश्रेष्ठ कविता पुरस्कार के लिये नामांकित हुई थी, यह कविता एक अफ़्रीकी बालक ने लिखी है, बड़ी मार्मिक और गोरों की “पोल” खोलने वाली कविता है ये…

When I born, I black .
When I grow up, I black .
When go in sun, I black .
When I scared, I black .
When I sick, I black .
& when I die, I still black.
And u white fella,
when you born you pink .
when you grow up u white .
when u go in sun you red.
when u cold u blue.
when u scared u yellow .
when u sick u green .
& when u die u gray .
And u calling me coloured ? ?

इसके बाद कुछ कहने को रह ही नहीं जाता…

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