हिन्दी फ़िल्मों की एक हीरोइन अमृता अरोरा (नाम कितने लोगों ने सुना है?) ने 4 मार्च को अपने “बॉयफ़्रेण्ड” शकील से “मैरिज” कर ली। जिसने उनका नाम नहीं सुना हो उन्हें बता दूँ कि ये मोहतरमा, सलमान खान के भाई अरबाज़ खान की पत्नी मलाईका अरोरा की बहन हैं (उफ़्फ़्फ़्फ़ इतना लम्बा परिचय), और अक्सर शाहरुख के बंगले में होने वाली पार्टियों में पाई जाती हैं। इस माइक्रो पोस्ट का लब्बेलुआब यह है कि इन्होंने 4 मार्च को ईसाई वेडिंग पद्धति से “मैरिज” की, फ़िर 6 मार्च को इस्लामी पद्धति से “निकाह” भी किया। असल में इनकी माताजी एक मलयाली ईसाई जोयस पोलीक्रैप हैं और ताजा-ताजा पति मुस्लिम हैं, सो माताजी और पति की “धार्मिक भावनाओं”(?) का खयाल रखते हुए उन्होंने अपना “कर्तव्य” निभाया। अब बेचारे पिताजी ठहरे एक पंजाबी हिन्दू, तो इन्हें हिन्दू पद्धति से शादी करने की बिलकुल नहीं सूझी, न उन्हें किसी ने सुझाया होगा, (हिन्दुओं की भावनाओं का खयाल रखने का तो प्रचलन रहा नहीं अब…) आखिर “सेकुलरिज़्म” का मामला है भाई… जय हो… जय हो… (और ये तो उनका व्यक्तिगत मामला है, वे चाहे जैसे शादी करें हम कौन होते हैं दखल देने वाले, हमारा काम आपको सूचित करना भर है…)

“व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के पक्षधर” और “सेकुलर” लोग लट्ठ (की-बोर्ड) लेकर आते ही होंगे, चलो निकलो भाईयों इधर से…। आजकल हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति आदि के बारे में कोई सवाल उठाना “ओल्ड फ़ैशन्ड” माना जाता है… और यदि किसी को अमृता जी द्वारा हिन्दू पद्धति से किये गये विवाह के बारे में कोई जानकारी हो लिंक दें ताकि उनके पिताजी के साथ-साथ हम जैसे दकियानूसी(?) लोगों का कलेजा भी ठण्डा हो सके…। एक बार फ़िर जय हो…

(नोट – “स्वास्थ्य” की बेहतरी के लिये कभी कभार ऐसी बेहद माइक्रो पोस्ट भी लिखना चाहिये… जिसमें एक भी “टैग” ना लगा हो)
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Rafique Zakaria, Indian Muslims, Congress and Secularism

पाठकों को लगेगा कि यह किसी संघ-भाजपा के नेता के विचार हैं, यदि यही बातें नरेन्द्र मोदी या आडवाणी किसी सार्वजनिक सभा में कहते तो “सेकुलर मीडिया” और उनके लगुए-भगुए खासा बवाल खड़ा कर देते, लेकिन नहीं… उक्त विचार प्रख्यात मुस्लिम राजनीतिज्ञ और विद्वान डॉ रफ़ीक ज़कारिया के हैं। डॉ ज़कारिया ने अपनी पुस्तक “कम्यूनल रेज इन सेक्यूलर इंडिया” (पापुलर प्रकाशन, सितम्बर 2002) मे मुसलमानों के व्यवहार और उनकी सोच पर “मुसलमानों को क्या करना चाहिये” नाम से एक पूरा एक अध्याय लिखा है। यह पुस्तक उन्होंने गोधरा दंगों के बाद लिखी थी… डॉ ज़कारिया का निधन 9 जुलाई 2005 को हुआ।

गत कुछ वर्षों में मुस्लिमों के लिये अलग से वित्तीय बजट, अल्पसंख्यकों के लिये अलग से मंत्रालय, सच्चर कमेटी द्वारा आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े मुसलमानों की पहचान करना और विभिन्न सुझाव देना, हज सब्सिडी की रकम बढ़ाना, नौकरियों में आरक्षण का हक जताना आदि कई ऐसे काम हैं जो कि UPA सरकार ने समय-समय पर मुस्लिमों के लिये (वोट बैंक मानकर) किये हैं, वैसे भी कांग्रेस तो 1947 से ही मुसलमानों के फ़ायदे के लिये विभाजन से लेकर उनकी हर माँग मानती आ रही है, फ़िर चाहे देश के अन्य धर्मावलम्बियों पर इसका कुछ भी असर हो। सिख, जैन और बौद्ध भी अल्पसंख्यक हैं यह बात लगता है कि कांग्रेस भूल चुकी है। ईसाईयों पर भी कांग्रेस का “विशेष ध्यान” तब से ही जाना शुरु हुआ, जब उनके खानदान में एंटोनिया माइनो बहू बनकर पधारीं, वरना अल्पसंख्यक का मतलब सिर्फ़ और सिर्फ़ मुसलमान होता है यह हमारी “महान सेकुलर प्रेस और मीडिया” ने भी मान लिया लगता है।

ऐसा प्रतीत होता है कि मुस्लिम नेतृत्व और कठमुल्लों ने विगत 60 सालों में सिवाय हक मांगने और सरकारों को वोट की ताकत के बल पर धमकाने के अलावा कुछ नहीं किया। पाकिस्तान मांगने से लेकर आरक्षण माँगने तक एक बार भी इन मुस्लिम नेताओं ने “देश के प्रति कर्त्तव्य” को याद नहीं रखा, और रीढ़विहीन कांग्रेस ने सदा इनके सामने लोट लगाई, मुसलमानों को अशिक्षित और गरीब बनाये रखा और देश को सतत गुमराह किया। जब किसी समाज या समुदाय को कोई अधिकार या सुविधायें दी जाती हैं तो देश और सरकार को यह अपेक्षा होती है कि इसके बदले में वह समाज देश की उन्नति और सुरक्षा के लिये काम करेगा और देश को और ऊँचे ले जायेगा। क्या कभी मुस्लिम नेतृत्व ने आत्मपरीक्षण किया है कि इस देश ने उन्हें क्या-क्या दिया है और उन्होंने देश को अब तक क्या दिया?

पुस्तक में डॉ ज़कारिया ने स्वीकार किया है कि भारतीय मुसलमानों में इस्लामिक कट्टरतावाद के फ़ैलते असर को लेकर बेचैनी है और वे इसके खिलाफ़ कुछ करना चाहते हैं, इसलिये उन्होंने यह निम्न सुझाव दिये हैं –

1) मुसलमानों के लिये संघर्ष का रास्ता उचित नहीं है। उनके लिये खुशहाली का एकमात्र उपाय यह है कि वे देश और समाज के मुख्य अंगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलें। मुसलमानों को खुले दिल से हिन्दुओं और इस राष्ट्र को अपनाना चाहिये। इसके लिये सबसे पहले उन्हें अपनी “कबीलाई मानसिकता” (Ghetto Mentality) से बाहर आना होगा, एक समरसता भरे समाज के निर्माण में उन्हें ही मुख्य भूमिका निभानी होगी।

2) मुसलमानों को समझना चाहिये कि ज़माना बदल रहा, बदल गया है। उन्हें अपने पूर्वाग्रहों को छोड़ना होगा और पुरानी मानसिकता को समय के अनुरूप बदलना चाहिये। मुसलमानों को सरकारों से मदद माँगना छोड़कर अपने पैरों पर खुद खड़े होने का प्रयास करना चाहिये, वरना वे एक अपंग समाज की तरह बन जायेंगे जिन्हें कभी-न-कभी बोझ समझा जाने लगेगा। मुसलमानों को जल्दी ही यह समझ लेना चाहिये कि जो भी नेता उनकी मदद करने को तत्पर दिखाई दे रहा है वह निश्चित ही अपने चुनावी फ़ायदे के लिये ऐसा कर रहा है, यहाँ तक कि मुसलमानों को दूसरे देशों के मुसलमानों से भी कोई अपेक्षा नहीं रखना चाहिये, हो सकता है कि वे कुछ आर्थिक मदद कर दें लेकिन मुश्किल समय मे वे उनके बचाव के लिये कभी आगे नहीं आयेंगे, और यह बात अन्य कई देशों में कई बार साबित हो चुकी है।

3) मुसलमानों को “अपनी खुद की बनाई हुई भ्रम की दुनिया” से बाहर निकलना चाहिये, उन्हें कठमुल्लों की भड़काऊ और भावनात्मक बातों पर यकीन नहीं करना चाहिये। मुस्लिमों के दुश्मन सिर्फ़ ये कठमुल्ले ही नहीं हैं बल्कि समाज के ही कुछ मौलाना, शिक्षाविद और पत्रकार भी इनका साथ देकर आग में घी डालने का काम करते हैं, इनसे बचना चाहिये। भारत के मुसलमानों को इस दलदल से बाहर निकलकर अपने काम और हुनर को माँजना चाहिये ताकि वे समाज की मुख्यधारा में आसानी से आ सकें और देश के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें।

4) भारतीय मुसलमानों को देश के उदार हिन्दुओं के साथ मिलकर एक उन्नत समाज की स्थापना के लिये काम करना चाहिये। हालांकि यह कोई मुश्किल काम नहीं है लेकिन इसके लिये उन्हें अपने व्यवहार और मानसिकता में बदलाव लाना चाहिये।

5) यही बात भारतीय मुस्लिमों में युवाओं पर भी लागू होती है, उनका ध्यान शिक्षा और सामाजिक गतिविधियों पर ही होना चाहिये क्योंकि “ज्ञान” का कोई विकल्प नहीं है, इसके लिये सबसे पहले इन युवाओं के माता-पिता को अपने पूर्वाग्रह छोड़ना होंगे और उन्हें अधिक से अधिक और उच्च शिक्षा दिलाने की कोशिश करना चाहिये।

6) भारत के मुसलमानों को जिहादी तत्वों और कट्टर धर्मांध लोगों को सख्ती से “ना” कहना सीखना ही चाहिये। उन्हें अन्य धर्मावलम्बियों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करना चाहिये कि उनका धर्म भी “जियो और जीने दो” के सिद्धान्त पर काम करता है। उनके इस प्रयास से ही इस्लाम को भारत में सच्चे अर्थों में लोकप्रिय बनाने में मदद मिलेगी।

7) कुरान में दिये गये आदेशों को मानते हुए भी भारतीय मुस्लिम “एकपत्नीवाद” का पालन कर सकता है। शरीयत में निकाह, तलाक, मेहर और गुज़ारे के कानूनों को समयानुकूल बदलने की काफ़ी गुंजाइश है। इसे करने की कोशिश की जाना चाहिये।

8) “वन्देमातरम” को गाने या न गाने सम्बन्धी विवाद बेमानी है। आज़ादी के आन्दोलन के समय कांग्रेस के सभी मुस्लिम नेता इस गीत को खुले दिल से गाते थे। जो मुसलमान इसे नहीं गाना चाहते कम से कम वे इसे गाये जाते समय खड़े हो जायें क्योंकि यह राष्ट्रगीत है और देश के सम्मान में गाया जा रहा है। पहले से ही घायल साम्प्रदायिक तानेबाने को एक छोटी सी बात पर बिगाड़ना उचित नहीं है।

9) परिवार नियोजन का सवाल हमेशा प्रत्येक विकासशील देश के लिये एक मुख्य प्रश्न होता है। हमें यह सच्चाई स्वीकारना चाहिये कि परिवार नियोजन को मुसलमानों ने उतने खुले दिल से स्वीकार नहीं किया जितना कि हिन्दुओं ने। मुसलमानो को अपनी गरीबी दूर करने के लिये यह गलती तुरन्त सुधारना चाहिये। इसके लिये समाज के पढ़े-लिखे व्यक्तियों को ही एक जागरण अभियान चलाना होगा ताकि अनपढ़ मुसलमान परिवार नियोजन अपनायें, यह एक बेहद जरूरी कदम है, वरना भारत कभी भी आगे नहीं बढ़ सकेगा, गरीबी और अशिक्षा बनी रहेगी।

10) मुसलमानों को अपने स्वभाव, हावभाव, रहन-सहन, व्यवहार से हिन्दुओं को यह विश्वास दिलाना होगा कि वे उनके दुश्मन नहीं हैं और उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचायेंगे। हिन्दुओं को अपने काम से यह विश्वास दिलाना होगा कि मुसलमान भी इसी देश की संतान हैं जैसे कि हिन्दू हैं, और वे भी इस देश की उन्नति के लिये चिन्तित हैं।

11) सबसे अन्त में मैं सबसे मुख्य बात कहना चाहूँगा, कि “मुसलमानों को यह साफ़ समझ लेना चाहिये कि उनका भाग्य सिर्फ़ वे खुद बदल सकते हैं उनका कोई भी नेता नहीं…”

क्या यह मात्र संयोग है कि ऊपर दिये गये कई विचार हिन्दुत्ववादी मानी जानी वाली पार्टियों और व्यक्तियों के विचारों से मिलते-जुलते हैं? हो सकता है कि कोई “अति-विद्वान”(?), डॉ रफ़ीक ज़कारिया की प्रतिबद्धता पर ही शक कर बैठे, इसलिये यहाँ बताना जरूरी है कि डॉ ज़कारिया एक अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान थे, उन्होंने लन्दन विश्वविद्यालय से पीएच. डी. की है और भारत के स्वतन्त्रता आंदोलन में भी हिस्सा लिया। डॉ ज़कारिया एक प्रतिष्ठित वकील, शिक्षाविद और पत्रकार थे, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि डॉ ज़कारिया पक्के कांग्रेसी थे, जो संसद के उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं तथा महाराष्ट्र सरकार में विभिन्न कैबिनेट पदों पर 15 वर्ष तक रहे।

डॉ ज़कारिया के यह विचार आज के माहौल में बेहद प्रासंगिक हैं, मुस्लिमों के लिये एक पथप्रदर्शक के तौर पर हैं, लेकिन वोट बैंक की राजनीति के चलते पहले ही देश को बरबाद कर चुकी कांग्रेस, जिसने पहले भी एक बार आरिफ़ मोहम्मद खान को बाहर का दरवाजा दिखा दिया था… ज़कारिया जी के इन विचारों और सुझावों को रद्दी की टोकरी में फ़ेंक चुकी है। कांग्रेस, सपा, वामपंथियों के प्रिय पात्र कौन हैं… अबू आज़मी, जावेद अख्तर, शबाना आज़मी, तीस्ता सीतलवाड, अरुन्धती रॉय और अंग्रेजी प्रेस के पेज-थ्री टाईप के कुछ “सेकुलर पत्रकार”(?)… इन जैसे ही कई भांड-गवैयों को नरेन्द्र मोदी के नाम से ही पेचिश हो जाती है… क्योंकि यदि रफ़ीक ज़कारिया के यह विचार अधिक प्रचारित-प्रसारित हो गये तो इनकी “दुकानें” बन्द हो जायेंगी… देश का पहला विभाजन भी कांग्रेस की वजह से हुआ था, भगवान न करे यदि दूसरा विभाजन हुआ तो इसकी जिम्मेदार भी यही घटिया, स्वार्थी और भ्रष्ट लोगों से भरी पार्टी होगी…

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Pink Chaddi Campaign, Women Liberation and Mangalore Pub Incidence

दिल्ली स्थित एक स्वयंभू पत्रकार महोदया हैं निशा सूसन, इन्होंने श्री राम सेना के प्रमोद मुतालिक के विरोध करने के लिये वेलेण्टाइन डे के अवसर पर सभी पब जाने वाली लड़कियों और महिलाओं से अनुरोध किया है कि वे 14 फ़रवरी को बंगलोर स्थित श्रीराम सेना के दफ़्तर में “गुलाबी चड्डियाँ” (गुलाबी रंग की महिला अण्डरवियर) भेजें। इन आभिजात्य वर्ग की महोदया (जो पत्रकार हैं तो जाहिर है कि पढ़ी-लिखी भी होंगी) का कहना है कि पब जाने वाली महिलाओं के समर्थन में यह एक अनूठा विरोध प्रदर्शन है। (इनका छिछोरा ब्लॉग यहाँ देखें)

इस तथाकथित “महिला समर्थक”(???) अभियान के अनुसार दिल्ली, मुम्बई, पुणे, हैदराबाद आदि शहरों में 11-12 फ़रवरी तक गुलाबी अंडरवियर एकत्रित की जायेंगी और उन्हें 14 फ़रवरी को श्रीराम सेना को भेजा जायेगा। नारी स्वतन्त्रता की पक्षधर निशा सूसन ने सभी महिलाओं (जाहिर है हाई सोसायटी की) से आव्हान किया है कि 14 फ़रवरी के दिन वे पब-बार आदि में भीड़ करें, श्रीराम सेना का नाम लेकर “चियर्स” करें और खूब “मस्ती”(???) करें। एक इंटरव्यू (जो कि उन्हीं जैसे किसी विद्वान ने उनसे लिया होगा) में इस महान महिला ने कहा कि चूँकि “गुलाबी” एक स्त्री रंग माना जाता है इसलिये उन्हें गुलाबी अन्तर्वस्त्र भेजने का आयडिया आया, साथ ही गुलाबी रंग कलर चार्ट स्पेक्ट्रम में “खाकी” के ठीक सामने आता है, सो “खाकी चड्डी” का विरोध करने के लिये यह “गुलाबी चड्डी” अभियान जारी किया गया है।

हालांकि अभी इस बात की पुष्टि होना बाकी है कि इस कथित नारी मुक्ति आन्दोलन के पीठ पीछे “तहलका” का हाथ है या नहीं, क्योंकि इन मोहतरमा का पता है –

निशा सूसन (9811893733)
द्वारा – तहलका
M-76, “M” Block Market
Greater Kailash, Delhi

यदि इस मुहिम को “तहलका” का समर्थन हासिल है तब तो यह विशुद्ध रूप से एक राजनैतिक अभियान है, क्योंकि तहलका की विश्वसनीयता और उसकी निष्पक्षता पहले से ही सन्देह के घेरे में है। “वेलेन्टाइन डे के दिन पब-बार को भर दो” का आव्हान तो निश्चित रूप से दारू कम्पनियों द्वारा प्रायोजित लगता है (क्योंकि पैसे के लिये इस प्रकार की पत्रकार कुछ भी कर सकते हैं) और यदि यह मुहिम निशाजी ने स्वयंस्फ़ूर्त ढंग से पैदा किया है तब तो इनकी मानसिक कंगाली पर तरस ही किया जा सकता है, लेकिन दिक्कत यह है ऐसे “मानसिक कंगाल” मीडिया के चहेते बने हुए हैं और इनका यथोचित “इलाज” करना बेहद आवश्यक होता जा रहा है। “गुलाबी चड्डी” को एकत्रित करने का काम भी अधिकतर महिलाओं ने ही संभाल रखा है, जो भी इच्छुक हों वे दिव्या (9845535406), रत्ना (09899422513) से भी सम्पर्क कर सकते हैं।

अब इस कथित अनूठे विरोध प्रदर्शन से कई सवाल खड़े होते हैं,

1) गुलाबी चड्डी और पब का आपस में क्या सम्बन्ध है?

2) क्या श्रीराम सेना को गुलाबी चड्डियां भेजने से पब-बार में जाने वाली महिलाओं को नैतिक बल मिलेगा?

3) क्या रत्ना जी को यह मालूम है कि गोवा में स्कारलेट नाम की एक लड़की के साथ बलात्कार करके उसकी हत्या की गई थी और उसमें गोवा के एक मंत्री का बेटा भी शामिल है, और वे वहाँ कितनी बार गई हैं?

4) क्या निशा जी को केरल की वामपंथी सरकार द्वारा भरसक दबाये जाने के बावजूद उजागर हो चुके “सिस्टर अभया बलात्कार-हत्याकांड” के बारे में कुछ पता है?

5) इंटरव्यू लेने वाले पत्रकार को दिल्ली की ही एक एमबीए लड़की के बलात्कार के केस की कितनी जानकारी है?

6) जिन उलेमाओं ने सह-शिक्षा को गैर-इस्लामी बताया है क्या उन्हें भी निशा जी गुलाबी चड्डी भेजेंगी? या यह विशेष कृपा सिर्फ़ भाजपा की कर्नाटक सरकार और श्रीराम सेना के लिये है?

7) कश्मीर में आतंकवादियों ने कई लड़कियों से बन्दूक की नोक पर शादी कर ली है, क्या दिव्या जी गुलाबी चड्डियों का एक बन्डल श्रीनगर भिजवा सकती हैं?

8) तसलीमा नसरीन भी तो औरत ही है जो कलकत्ता, जयपुर और न जाने कहाँ-कहाँ मारी-मारी फ़िर रही थी, तब यह “तहलका” कहाँ चला गया था?

9) यदि प्रमोद मुतालिक इन सभी चड्डियों के साथ चिठ्ठी लगाकर वापस भेजें कि “…कल शायद पब में आप नशे में अपनी गुलाबी चड्डी वहीं भूल गई थीं और इसे गलती से मेरे पास भेज दिया गया है, कृपया वापस ले लीजिये…” तो क्या इसे अश्लीलता समझा जायेगा?

10) सबसे अन्तिम और महत्वपूर्ण सवाल कि क्या भारत में नारी स्वतन्त्रता आन्दोलन का यह एक नया, बदला हुआ और परिष्कृत रूप है? (इस विषय पर महिला लेखिकाओं और ब्लॉगरों के विचार जानना भी दिलचस्प रहेगा)

नोट : चूंकि यह मुहिम एक महिला द्वारा शुरु की गई है, इसलिये यह लेख बनती कोशिश सभ्य भाषा में लिखा गया है, जिसे “भारतीय संस्कृति” का एक हिस्सा माना जा सकता है, और जिसका नाम भी इन “पेज-थ्री महिलाओं” ने शायद नहीं सुना होगा… और इस लेख को श्रीराम सेना द्वारा मंगलोर में किये गये कृत्य का समर्थन नहीं समझा जाये…

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Bharat Bhawan Culture Politics & BJP

1982 में चार्ल्स कोरिया द्वारा डिजाइन किया हुआ “भारत भवन” भोपाल ही नहीं बल्कि समूचे देश की एक धरोहर है। इस के मूलतः चार प्रखण्ड हैं, “रूपंकर” (फ़ाइन आर्ट्स का म्यूजियम), “रंगमण्डल” (नाटकों हेतु), “वागर्थ” (कविता और साहित्य सम्बन्धी लायब्रेरी) और “अनहद” (शास्त्रीय और लोक संगीत का पुस्तकालय)। कला और संस्कृति के विकास और साहित्य के प्रचार-प्रसार की गतिविधियों में लगे हुए इस संस्थान के बारे में पहले भी कई सकारात्मक और नकारात्मक खबरें आती रही हैं। ताजा खबर यह है कि “वागर्थ” के अन्तर्गत भारत भवन से एक आलोचनात्मक पत्रिका निकलती है “पूर्वग्रह”, इसे नये कलेवर के साथ पुनः प्रकाशित किया जा रहा है और इसका लोकार्पण 4 फ़रवरी को दिल्ली में डॉ नामवर सिंह करेंगे।




राज्य में चलने वाले किसी भी प्रकार के संस्थान में जब कोई गतिविधि होती है तो उसमें राज्य सरकार का हस्तक्षेप भले ही न हो लेकिन उसकी जानकारी में उस गतिविधि या उससे सम्बन्धित कार्यकलापों की जानकारी उच्च स्तर तक होती ही है और होना चाहिये भी। चूंकि भारत भवन सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र है और इसके कर्ताधर्ता अन्ततः सरकार के ही नुमाइन्दे होते हैं, चाहे वे प्रशासकीय अधिकारी हों या कोई अन्य। जब इस सम्बन्ध में मध्यप्रदेश के संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकान्त शर्मा से फ़ोन पर चर्चा हुई तो उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। यानी कि 4 फ़रवरी को भारत भवन द्वारा आयोजित दिल्ली में होने वाले एक विशेष समारोह और पुस्तक विमोचन की जानकारी मंत्री जी को 31 जनवरी तक नहीं दी गई या नहीं पहुँची, यह घोर आश्चर्य का विषय है।

उल्लेखनीय है कि डॉ नामवर सिंह खुले तौर पर भाजपा-संघ की विचारधारा के आलोचक और भारतीय संस्कृति को पानी पी-पीकर कोसने वालों में से हैं। अब सवाल उठता है कि जब मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है तो “वागर्थ” द्वारा आयोजित लोकार्पण समारोह में नामवर सिंह जैसे व्यक्ति को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाने और महिमामण्डित करने का क्या औचित्य है? क्या इससे नामवर सिंह भाजपा-संघ से खुश हो जायेंगे? या फ़िर भाजपा शासित सरकारें अपनी छवि(?) सुधारने के लिये ऐसी कोई भीषण सदाशयता दिखा रही हैं कि वे अपने घोर विरोधियों को भी सम्मान देने में नहीं हिचक रहीं? या, क्या भाजपा सरकार में नौकरशाही-अफ़सरशाही इतनी मनमानी करने लगी है कि प्रदेश के संस्कृति मंत्री को ही कार्यक्रम की जानकारी नहीं दी गई? क्या कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों के किसी कार्यक्रम में संघ की विचारधारा वाले किसी व्यक्ति को बुलाया जाता है? यदि नहीं, तो फ़िर नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, खुशवन्त सिंह, शबाना आजमी आदि जैसे घोषित रूप से संघ विरोधी लोगों के प्रति भाजपा के मन में प्रेम क्यों उमड़ना चाहिये?

भाजपा विरोधियों को सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन आम लोगों खासकर संघ और भाजपा के निचले स्तर के कार्यकर्ता से बात कीजिये तो अक्सर उनका यह दर्द उभरकर सामने आता है कि भाजपा की सरकार में संघ के जमीनी कार्यकर्ताओं के मामूली ट्रांसफ़र जैसे वाजिब काम ही नहीं हो पाते, जबकि कांग्रेसी व्यक्ति, कैसी भी सरकार हो, अपना गैरवाजिब काम भी करवा लेते हैं। इसे क्या कहा जाये? भाजपा का कांग्रेसीकरण, कार्यकर्ताओं के त्याग की उपेक्षा या प्रशासनिक नाकामी? भाजपा का यही रवैया भारतीय संस्कृति के बारे में भी है, जब वे सत्ता से बाहर होते हैं तब हिन्दू विरोधी पाठ्यक्रमों, पुस्तकों, पेंटिंग्स आदि पर खूब विरोध जताते हैं, लेकिन सत्ता में आते ही याददाश्त गुम हो जाती है।

मई 2007 में भारत भवन में चित्रकार कैलाश तिवारी की चित्र प्रदर्शनी लगी थी, जिसमें गोधरा के ट्रेन जलाये जाने की एक पेंटिंग थी। स्थानीय मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया और प्रदर्शनी बन्द कर दी गई। आगामी 13 फ़रवरी को भारत भवन का वार्षिकोत्सव होने जा रहा है, उसमें एक कवि सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है, पता चला है कि उसमें से 70% कवि कम्युनिस्ट विचारधारा वाले हैं, और अब नामवर सिंह से “पूर्वग्रह” का विमोचन करवाने जैसी हरकत… ऐसा क्यों किया जा रहा है और हो कैसे रहा है, यही सोच-सोचकर हैरानी होती है, कि इसका क्या अर्थ निकाला जाये?

मैं जानता हूँ कि इस लेख के विरोध में कई कथित “संस्कृति प्रेमी” उठ खड़े होंगे और कला-संस्कृति-साहित्य में किसी राजनैतिक हस्तक्षेप या तथाकथित राजनैतिक दखल-अंदाजी के विरोध की मुद्रा अपनाने की कोशिश करेंगे, लेकिन जेएनयू के कम्युनिस्ट हों, ICHR से पैसा लेकर विकृत भारतीय इतिहास लिखने वाले हों या जमाने भर के नकली फ़ाउण्डेशनों के द्वारा “संस्कृति” की सेवा(?) करने वाले हों, वे खुद जानते हैं कि वे भीतर से कितने खोखले हैं। दुःख तो इस बात का है कि सत्ता का फ़ायदा उठाकर कम्युनिस्ट और कांग्रेसी तो अपनी विचारधारा फ़ैलाने वालों को प्रश्रय देते हैं, खुलेआम अनुदान देते हैं, विभिन्न हिन्दू विरोधी और संघ विरोधी संस्थाओं को पैसा देते हैं, जबकि भाजपा दूसरी बार पूर्ण बहुमत मिलने के बावजूद भारत भवन जैसी संस्था के कार्यक्रम में “भारतीयता विरोधी व्यक्ति” को प्रमुखता दे रही है…। इस समय जबकि देश एक वैचारिक लड़ाई के दौर से गुजर रहा है, ऐसे वक्त में भाजपा को अपने बौद्धिक और वैचारिक समर्थकों को आगे बढ़ाना चाहिये या किसी और को? या फ़िर संघ कार्यकर्ताओं, भाजपा समर्थक बुद्धिजीवियों, लेखकों का काम सिर्फ़ सभाओं में दरियाँ उठाना और भूखे पेट गाँव-गाँव जाकर प्रचार करना भर है? इतनी छोटी सी बात मेरे जैसा अदना व्यक्ति समझाये, यह उचित नहीं है…


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मंगलवार, 30 दिसम्बर 2008 11:39

भारत को दस लाख “माधवन” चाहिये…

IIT Engineer Farmer India’s Food Crisis

“तकनीकी” भारत को बदल रही है यह हम सब जानते हैं, लेकिन यदि तकनीक का उपयोग भारत की मूल समस्याओं को दूर करने में हो जाये तो यह सोने में सुहागा होगा। हम अक्सर भारत के आईआईटी पास-आउट छात्रों के बारे में पढ़ते रहते हैं, उनकी ऊँची तनख्वाहों के बारे में, उनके तकनीकी कौशल के बारे में, विश्व में उनकी प्रतिभा के चर्चे के बारे में भी… गत कुछ वर्षों में आईआईटी छात्रों में एक विशिष्ट बदलाव देखने में आ रहा है, वह है मोटी तनख्वाह वाली नौकरियों को ठोकर मारकर “अपने मन का काम करना”, उनमें भारत को आमूलचूल बदलने की तड़प दिखाई देने लगी है और भले ही अभी इनकी संख्या कम हो, लेकिन आने वाले कुछ ही सालों में यह तेजी से बढ़ेगी…

पहले हम देख चुके हैं कि किस तरह बिट्स पिलानी का एक छात्र बहुराष्ट्रीय कम्पनी की नौकरी को ठोकर मारकर चेन्नई में गरीबों के लिये सस्ती इडली बेचने के धंधे में उतरा और उसने “कैटरिंग” का एक विशाल बिजनेस खड़ा कर लिया… लेकिन यह काम श्री माधवन सालों पहले ही कर चुके हैं… जी हाँ, बात हो रही है चेन्नई के नज़दीक चेंगलपट्टू में खेती-किसानी करने वाले आईआईटी-चेन्नई के पास आऊट श्री आर माधवन की… ONGC जैसे नवरत्न कम्पनी की नौकरी को छोड़कर खेती के व्यवसाय में उतरने वाले आर माधवन एक बेमिसाल शख्सियत हैं… उनकी सफ़लता की कहानी कुछ इस प्रकार है…

माधवन जी को बचपन से ही पेड़-पौधे लगाने, सब्जियाँ उगाने में बेहद रुचि थी, किशोरावस्था में ही उन्होंने कई बार अपनी माँ को खुद की उगाई हुई सब्जियाँ लाकर दी थीं और माँ की शाबाशी पाकर उनका उत्साह बढ़ जाता था। बचपन से उनका सपना “किसान” बनने का ही था, लेकिन जैसा कि भारत के लगभग प्रत्येक मध्यमवर्गीय परिवार में होता है कि “खेती करोगे?” कमाओगे क्या? और भविष्य क्या होगा? का सवाल हरेक युवा से पूछा जाना लाजिमी है, इनसे भी पूछा गया। परिवार के दबाव के कारण किसान बनने का कार्यक्रम माधवन को उस समय छोडना पड़ा। उन्होंने आईआईटी-जेईई परीक्षा दी, और आईआईटी चेन्नई से मेकेनिकल इंजीनियर की डिग्री प्राप्त की। जाहिर है कि एक उम्दा नौकरी, एक उम्दा कैरियर और एक चमकदार भविष्य उनके आगे खड़ा था। लेकिन कहते हैं ना कि “बचपन का प्यार एक ऐसी शै है जो आसानी से नहीं भूलती…”, और फ़िर आईआईटी करने के दौरान किसानी का यह शौक उनके लिये “आजीविका के साथ समाजसेवा” का रुप बन चुका था। ONGC में काम करते हुए भी उन्होंने अपने इस शौक को पूरा करने की “जुगत” लगा ही ली। समुद्र के भीतर तेल निकालने के “रिग” (Oil Rig) पर काम करने वालों को लगातार 14 दिन काम करने पर अगले 14 दिनों का सवैतनिक अवकाश दिया जाता है, माधवन ने यह काम लगातार नौ साल तक किया। 14 दिन तक मेकेनिकल इंजीनियर अगले 14 दिन में खेती-किसानी के नये-नये प्रयोग और सीखना। वे कहते हैं कि “मुझे मेकेनिकल इंजीनियरिंग से भी उतना ही लगाव है और खेती में इंजीनियरिंग और तकनीक का अधिकाधिक उपयोग करना चाहता था। मेरा मानना है कि किसी भी अन्य शिक्षा के मुकाबले “इंजीनियरिंग” की पढ़ाई खेती के काम में बहुत अधिक उपयोगी साबित होती है। मैंने भी खेत में काम करने, निंदाई-गुड़ाई-कटाई के लिये सरल से उपकरणों का घर पर ही निर्माण किया। अन्न-सब्जियाँ उगाने में मेहनत 20% और इंजीनियरिंग तकनीक 80% होना चाहिये।

जब मैंने पिता से कहा कि इतने सालों की नौकरी बाद अब मैं खेती करना चाहूँगा, उस वक्त भी उन्होंने मुझे मूर्ख ही समझा था। चार साल की नौकरी में मैंने इतना पैसा बचा लिया था कि चेन्नई के निकट चेंगलपट्टू गाँव में 6 एकड़ जमीन खरीद सकूँ, सन् 1989 में गाँव में पैण्ट-शर्ट पहनकर खेती करने वाला मैं पहला व्यक्ति था, और लोग मुझे आश्चर्य से देखते थे…”। माधवन जी को किसी ने भी खेती नहीं सिखाई, परिवार का सहयोग मिलना तो दूर, ग्राम सेवक से लेकर कृषि विश्वविद्यालय तक ने उनके साथ असहयोग किया। चार साल तक वे अपने खेत में खेती-किसानी-फ़सल को लेकर विभिन्न प्रयोग करते रहे। 6 एकड़ में उनकी सबसे पहली फ़सल मात्र 2 टन की थी और इससे वे बेहद निराश हुए, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

1996 में उनके जीवन का “टर्निंग पॉइंट” साबित हुई उनकी इज़राइल यात्रा। उन्होंने सुन रखा था कि “टपक-सिंचाई” (Drip Irrigation) और जल-प्रबन्धन के मामले में इज़राइल की तकनीक सर्वोत्तम है। इज़राइल जाकर उन्होंने देखा कि भारत में एक एकड़ में एक टन उगने वाली मक्का इज़राइली एक एकड़ में सात टन कैसे उगाते हैं। जितनी जमीन पर भारत में 6 टन टमाटर उगाया जाता है, उतनी जमीन पर इज़राईली लोग 200 टन टमाटर का उत्पादन कर लेते हैं। उन्होंने इज़राइल में 15 दिन रहकर सारी तकनीकें सीखीं। वे कहते हैं कि “इज़राइलियों से मैंने मुख्य बात यह सीखी कि वे एक पौधे को एक इंडस्ट्री मानते हैं, यानी कि एक किलो मिरची पैदा करने वाला पौधा उनके लिये एक किलो की इंडस्ट्री है। सच तो यही है कि हम भारतवासी पानी की कद्र नहीं जानते, भारत में किसानी के काम में जितना पानी का अपव्यय होता है वह बेहद शर्मनाक है…। 2005 के आँकड़ों के अनुसार भारत में फ़सलों में जितना काम 1 लीटर पानी में हो जाना चाहिये उसके लिये 750 लीटर पानी खर्च किया जाता है…”।

इज़राइल में उन्हे मिले एक और हमवतन, डॉ लक्ष्मणन जो एक तरह से उनके “किसानी-गुरु” माने जा सकते हैं। कैलिफ़ोर्निया में रहने वाले डॉ लक्ष्मणन पिछले 35 सालों से अमेरिका में खेती कर रहे है और लगभग 60,000 एकड़ के मालिक हैं। उन्होंने माधवन की जिद, तपस्या और संघर्ष को देखकर उन्हें लगातार “गाइडेंस” दिया। उनसे मिलकर माधवन को लगा कि पैसे के लिये काम करते हुए यदि मन की खुशी भी मिले तो काम का आनन्द दोगुना हो जाता है। उस जमाने में न तो इंटरनेट था न ही संचार के आधुनिक माध्यम थे, इस कारण माधवन को लक्ष्मणन से संवाद स्थापित करने में बड़ी मुश्किलें होती थीं और समय ज़ाया होता था। हालांकि आज की तारीख में तो माधवन सीधे “स्काईप” या “गूगल टॉक” से उन्हें अपनी फ़सलों की तस्वीरें दिखाकर दो मिनट में सलाह ले लेते हैं। नई-नई तकनीकों से खेती करने में मन की खुशी तो थी ही, धीरे-धीरे पैसा भी मिलने ही लगा। लगभग 8 साल के सतत संघर्ष, घाटे और निराशा के बाद सन् 1997 में उन्हें पहली बार खेती में “प्रॉफ़िट” हुआ। माधवन बताते हैं “इतने संघर्ष के बाद भी मैंने हार नहीं मानी, मेरा मानना था कि आखिर यह एक सीखने की प्रक्रिया है और इसमे मैं गिरूंगा और फ़िर उठूंगा, भले ही कोई मुझे सहारा दे या ना दे, मुझे स्वयं ही लड़ना है और जीतकर दिखाना है”। भारत में कृषि शिक्षा की बात करते समय उनका दर्द साफ़ झलकता है, “भारत के कृषि विश्वविद्यालयों का समूचा पाठ्यक्रम बदलने की आवश्यकता है, भारत के अधिकतर कृषि विश्वविद्यालय खेती करना नहीं सिखाते, बल्कि बैंकों से लोन कैसे लिया जा सकता है- यह सिखाते हैं। उनकी तकनीकें और शिक्षा इतनी पुरानी ढर्रे वाली और जमीनी हकीकतों से कटी हुई है कि कृषि विश्वविद्यालय से निकला हुआ एक स्नातक खेती करने की हिम्मत तक नहीं जुटा सकता। गाँवों के असली हालात और कृषि पाठ्यक्रमों के बीच भारी “गैप” है…”।

अगस्त में धान की खेती से उनका वार्षिक सीजन शुरु होता है, दिसम्बर तक वह फ़सल तैयार हो जाती है तब वे फ़रवरी तक सब्जियाँ उगाते हैं, जब फ़रवरी में वह फ़सल निकल आती है तो सूखा प्रतिरोधी तेल-बीज की फ़सलों जैसे तिल और मूंगफ़ली के लिये खेत खाली हो जाते हैं, मई में इसकी फ़सल लेने के बाद वे एक माह तक विभिन्न सेमिनारों, विदेश यात्राओं के जरिये खेती की नई तकनीकें और नई फ़सलों के बारे में जानकारी लेने में समय बिताते हैं। जून-जुलाई में वापस अपने खेत पर पहुँचकर अगले सीजन की तैयारी में लग जाते हैं। 1999 में उन्होने और 4 एकड़ जमीन खरीद ली। फ़िलहाल उनका लक्ष्य प्रति एकड़ एक लाख रुपये कमाने का है जिसका “आधा टारगेट” वे हासिल कर चुके हैं, यानी फ़िलहाल वे प्रति एकड़ 50,000 रुपये की कमाई कर पा रहे हैं। फ़सलें बेचने के लिये उनके पास खुद की एक जीप और ट्रॉलर है, वे सीधे अपनी फ़सल ग्राहक को बेचते है, बगैर किसी बिचौलिये के। अब तो आसपास के लोग उन्हें आवश्यकतानुसार पहले ही चावल का ऑर्डर दे देते हैं, और माधवन उन्हें खुशी-खुशी पूरा कर देते है, ग्राहक भी कम भाव मिलने से खुश रहता है। उनके खेत के प्रत्येक एकड़ की दस प्रतिशत जमीन विभिन्न प्रयोगों के लिये होती है, वे अलग-अलग फ़सलों पर तरह-तरह के प्रयोग करते रहते हैं, कुछ सफ़ल होते हैं और कुछ असफ़ल। भविष्य की योजनानुसार वे कम से कम 200 एकड़ जमीन खरीदकर उस पर “फ़ूड प्रोसेसिंग” का कारखाना शुरु करना चाहते हैं, और उनका दावा है कि विभिन्न फ़ूड प्रोसेसिंग इकाईयाँ खुद-ब-खुद आयेंगी और वे अपने गाँव को समृद्ध बनाने में सफ़ल होंगे। उनका कहना है कि सबसे पहला लक्ष्य होना चाहिये फ़सल की प्रति एकड़ लागत में कमी करना। उससे पैदावार भी अधिक होगी और सस्ती भी होगी, जिससे निर्यात भी बढ़ाया जा सकता है। उनके दिल में भारत के गरीबों के लिये एक तड़प है, वे कहते हैं “अमेरिका में चार घंटे काम करके एक श्रमिक तीन दिन की रोटी के लायक कमाई कर सकता है, जबकि भारत के गाँवों में पूरा दिन काम करके भी खेती श्रमिक दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पाता। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व की लगभग 65% जनसंख्या कुपोषण या अल्पपोषण से ग्रस्त है, जिसमें भारत के नागरिकों की संख्या सर्वाधिक है। भारत के दस वर्ष से कम 49% बच्चे कुपोषण से पीड़ित हैं, उनकी भूख मिटाना मेरा लक्ष्य है, क्योंकि यदि इस एक पूरी की पूरी भूखी पीढ़ी को हमने नज़र-अंदाज़ कर दिया तो यह एटम बम से भी खतरनाक हो सकती है।

माधवन के जीवन का एक और स्वर्णिम क्षण तब आया जब पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम उनके खेत पर उनसे मिलने और प्रयोगों को देखने गये, राष्ट्रपति से तय 15 मिनट की मुलाकात दो घण्टे में बदल गई, और तत्काल कलाम साहब के मुँह से निकला कि “भारत को कम से कम दस लाख माधवन की आवश्यकता है…”, स्वभाव से बेहद विनम्र श्री माधवन कहते हैं कि यदि मैं किसी उद्यमशील युवा को प्रेरणा दे सकूँ तो यह मेरे लिये खुशी की बात होगी…

इस खबर का स्रोत इस जगह है…
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चलते-चलते : सन् 2008 बीतने को है, हो सकता है कि इस वर्ष की यह अन्तिम ब्लॉग पोस्ट हो… संयोग से 30 दिसम्बर 2007 को भी मैंने फ़ुन्दीबाई सरपंच की एक ऐसी ही पोस्ट (यहाँ क्लिक कर पढ़ें) लिखी थी, इस प्रकार की सकारात्मक और प्रेरणादायी पोस्ट लिखने हेतु यही उत्तम अवसर है, 2008 में कई अच्छी-बुरी घटनायें घटीं, नेताओं ने हमेशा की तरह निराश ही किया, लेकिन माधवन और फ़ुन्दीबाई सरपंच (एक आईआईटी इंजीनियर और दूसरी अनपढ़) जैसे लोग उम्मीद की किरण जगाते हैं, निराशा से उबारते हैं, और हमें आश्वस्त करते हैं कि बुराई का अंधेरा कितना ही गहरा हो, अच्छाई का एक दीपक उसे हरा सकता है…। इस वर्ष मुझे पाठकों का भरपूर स्नेह मिला, मेरे सभी स्नेही पाठकों, ब्लॉगर मित्रों, इष्ट मित्रों को आगामी अंग्रेजी नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें… स्नेह बनाये रखें और माधवन जैसे लोगों से प्रेरणा लें… फ़िर मिलेंगे अगले वर्ष… सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें…

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पहला SMS

13 मई – जयपुर विस्फ़ोट
जून माह – खाली
26 जुलाई – अहमदाबाद विस्फ़ोट
अगस्त माह – खाली
13 सितम्बर – दिल्ली विस्फ़ोट
अक्टूबर माह – खाली
26 नवम्बर – मुम्बई फ़ायरिंग और विस्फ़ोट
दिसम्बर माह – खाली (???) (उम्मीद पर दुनिया कायम है)

13 जनवरी को क्या होने वाला है?
कृपया 13 जनवरी को बहुत सावधान रहें… चौकन्ने रहें और चारों तरफ़ ध्यान रखें…

दूसरा SMS

क्या 26 तारीख भारत के लिये बहुत बुरी है?
26 दिसम्बर – सुनामी
26 जनवरी – कच्छ का भूकम्प
26 फ़रवरी – गोधरा काण्ड
26 जून – गुजरात की भयानक बाढ़
26 जुलाई – मुम्बई ट्रेन ब्लास्ट
26 सितम्बर – अहमदाबाद धमाके
26 नवम्बर – मुम्बई फ़ायरिंग और विस्फ़ोट

कौन- कौन से महीने खाली बचे हैं, उनकी तारीखों पर अपना खयाल रखियेगा…

SMS की दुनिया वाकई निराली है, लेकिन इससे एक बात साबित होती है कि उच्च शिक्षा का “अंकज्योतिष” से कोई लेना-देना नहीं होता तथा लोगों के पास इस तरह का विश्लेषण करने का समय भी होता है… मैंने भी सोचा कि एक माइक्रो-पोस्ट ठेल ही दूँ…
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Media Coverage Mumbai Terror Attack

मुम्बई में जो दर्दनाक घटनायें हुईं उसका मूर्खतापूर्ण और लज्जाजनक “लाइव” कवरेज भारत के इलेक्ट्रानिक मीडिया ने दिखाया। जरा कुछ बानगियाँ देखिये इन गिद्धों के कवरेज की…

1) एक व्यक्ति के हाथ पर गोली लगी है, खून बह रहा है, माँस गिर रहा है, लेकिन उसकी मदद करने की बजाय एक गिद्ध पत्रकार उसके हाथ की फ़ोटो खींचने को उतावला हो रहा है और उसके पीछे भाग रहा है…

2) सुबह के सात बजे – ताज होटल के भीतर हमारे जाँबाज सिपाही आतंकवादियों से लोहा ले रहे हैं, दो दिन से भूखे-प्यासे और नींद को पीछे ढकेलते हुए… और ताज के बाहर कैमरे के पिछवाड़े में लेटे हुए गिद्ध आराम से कॉफ़ी-सैण्डविच का आनन्द उठा रहे हैं मानो क्रिकेट मैच का प्रसारण करने आये हों…

3) वीटी स्टेशन पर आम आदमियों को मारा जा चुका है, लेकिन गिद्ध टिके हुए हैं ओबेरॉय होटल के बाहर कि कब कोई विदेशी निकले और कब वे उसका मोबाईल नम्बर माँगें…

4) एक और पत्रकार(?) मनोरंजन भारती एक ही वाक्य की रट लगाये हुए हैं “ताज हमारे “देस” की “सान” (शान) है… और इस “सान” का सम्मान हमें बचाये रखना है…सेना का अफ़सर कह रहा है कि अब कोई आतंकवादी नहीं बचा, लेकिन ये “खोजी” बड़बड़ाये जा रहे हैं कि नहीं एक आतंकवादी अन्दर बचा है…

5) “आपको कैसा लग रहा है…” जैसा घटिया और नीच सवाल तो न जाने कितनी बार और किस-किस परिस्थिति में पूछा जा चुका है इसका कोई हिसाब ही नहीं है, आरुषि हत्याकाण्ड में भी कुछ पत्रकार ये सवाल पूछ चुके हैं…

6) अमेरिका में हुए वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद किसी चैनल ने लाशों, रोते-बिलखते महिलाओं-बच्चों की तस्वीरें नहीं दिखाईं, लेकिन यहाँ तो होड़ लगी थी कि कौन कितनी लाशें दिखाता है, कितना बिखरा हुआ खून दिखाता है… इन गिद्धों पर सिर्फ़ लानत भेजना तो बहुत कम है, इनका कुछ और इलाज किया जाना आवश्यक है।

7) जीटीवी द्वारा 28 तारीख की रात को बड़े-बड़े अक्षरों में “कैप्शन” दिखाया गया “हम समझते हैं अपनी जिम्मेदारी…”, “सुरक्षा की खातिर लाइव प्रसारण रोका जा रहा है…” और यह अकल उन्हें तब आई, जब सेना ने अक्षरशः उन्हें “लात” मारकर ताज होटल से भगा दिया था, वरना यह “सुरक्षा हित” पहले दो दिन तक उन्हें नहीं दिखा था… “टीआरपी के भूखे एक और गिद्ध” ने आतंकवादियों के इंटरव्यू भी प्रसारित कर दिये, ठीक वैसे ही जैसे सुबह तीन बजे अमिताभ के मन्दिर जाने की खबर को वह “ब्रेकिंग न्यूज” बताता है…

क्या-क्या और कितना गिनाया जाये, ये लोग गिरे हुए और संवेदनाहीन तो पहले से ही थे, देशद्रोही भी हैं यह भी देख लिया। कई बार लगता है प्रिंट मीडिया इनसे लाख दर्जे से बेहतर है, भले ही वह भी ब्लैकमेलर है, राजनैतिक आका के चरण चूमता है, विज्ञापन पाने के लिये तरह-तरह के हथकण्डे अपनाता है, लेकिन कम से कम “सबसे तेज” बनने और पैसा कमाने के चक्कर में इतना नीचे तो नहीं गिरता… किसी चैनल ने सीएसटी स्टेशन पर मारे गये लोगों की सहायता के लिये हेल्पलाईन नहीं शुरु की, किसी चैनल ने रक्तदान की अपील नहीं की, किसी भी चैनल ने “इस खबर” को छोड़कर तीन दिन तक समूचे भारत की कोई खबर नहीं दिखाई मानो भारत भर में सिर्फ़ यही एक काम चल रहा हो…

मजे की बात तो ये कि कवरेज कर कौन रहा था, एक पूरे वाक्य में छः बार “ऐं ऐं ऐं ऐं” बोलने वाले पंकज पचौरी यानी इस्लामिक चैनल NDTV के महान पत्रकार। विनोद दुआ नाम के पद्म पुरस्कार से सम्मानित(?) एक पत्रकार, जिन्हें उपस्थित भीड़ द्वारा वन्देमातरम और भारत माता की जय बोलना रास नहीं आया और वे स्टूडियो में बैठे मेजर जनरल से खामखा “धर्म का कोई मजहब नहीं होता…” जैसी बकवास लगातार करते रहे… अमिताभ स्टाइल में हाथ रगड़ते हुए और अपने आप को “एस पी सिंह” समझते हुए पुण्यप्रसून वाजपेयी… यानी कुल मिलाकर एक से बढ़कर एक महान लोग…

सो आइये हम सब मिलकर न्यूज चैनलों का बहिष्कार करें। लोग यह तय करें कि दिन भर में सिर्फ़ पाँच या दस मिनट से ज्यादा न्यूज चैनल नहीं देखेंगे, इन गिद्धों की टीआरपी गिराओ, इन्हें विज्ञापनों का सूखा झेलने दो, इन्हें सार्वजनिक रूप से देश की जनता से माफ़ी माँगने दो कि “हाँ हमसे बहुत बड़ी गलती हुई है और इस प्रकार की राष्ट्रीय आपदा के समय आगे से हम सावधानीपूर्वक रिपोर्टिंग करेंगे… और पढ़े-लिखे पत्रकारों को नौकरी पर रखेंगे…”।

नोट - एक बात के लिये आप मुझे माफ़ करें कि बार-बार मैंने “गिद्ध” शब्द का उपयोग किया, जबकि गिद्ध तो मरे हुए जानवरों की गंदगी साफ़ करता है, लेकिन टीआरपी के भूखे गिद्ध तो……

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Newspapers, Published News Between the Lines

लगभग सभी पढ़े-लिखे लोग अखबार तो पढ़ते ही हैं, उसमें काफ़ी खबरें छपी होती हैं, क्या आप सभी खबरों को सीधे-सीधे जैसी लिखी हैं वैसा ही पढ़ लेते हैं? ठहरिये, असल में जो छपा होता है वह वैसा होता नहीं है, हमें छपी हुई पंक्तियों के बीच में “न छपा हुआ” अर्थ पढ़ना आना चाहिये तभी आपको अखबार पढ़ने में बहुत मजा आयेगा, इस कला को “study between the lines” भी कहा जाता है, कैसे!!! एक छोटा सा उदाहरण देखिये… समाचार : अमेरिका ने कहा है कि आर्थिक मंदी के इस दौर में भारत उसका हमेशा की तरह मजबूत साथी बना रहेगा। अब आप समझेंगे कि यह भारत-अमेरिका के बढ़ते सम्बन्धों और मित्रता की मिसाल दी जा रही है, लेकिन “बिटवीन द लाइन्स” इसका मतलब यह होता है कि “जिस प्रकार पिछले 10-15 साल से हम भारत को बेवकूफ़ बना कर अपना माल उसे चेप रहे हैं, आगे भी भारत हमारी इसी प्रकार मदद करता रहेगा…”। देखा न आपने, लिखा क्या होता है और मतलब क्या निकलता है, इस “बिटवीन द लाईन्स” पढ़ने की कला को कोई “अर्थ का अनर्थ” कहता है, कोई इसे “बाल की खाल निकालना” कहता है, कोई इसे “तिल का ताड़ बनाना” कहता है, तो कोई इसे “शातिर दिमाग का फ़ितूर” कहता है, लेकिन हम जानते हैं कि जो लोग बिटवीन द लाइन्स पढ़ लेते हैं, वह बहुत “चतुर-सुजान” होते हैं (ऐसा माना जाता है)।

आजकल कई प्रदेशों में चुनाव का मौसम चल रहा है, हजारों प्रत्याशी अपनी-अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। रोज सुबह का अखबार खोलते ही कईयों का दिमाग खराब हो जाता है, सुबह-सुबह चाय का स्वाद बिगड़ जाता है। पन्ने के पन्ने भरे हुए हैं प्रत्याशियों के जीवन परिचय से। एक तस्वीर में एक “भेड़िया” मुस्करा रहा है, दूसरी तस्वीर में एक “कौआ” आपको सच्चाई का वचन दे रहा है, अखबार के एक तरफ़ “साँप और नाग” एकता प्रदर्शित कर रहे हैं तो दूसरी तरफ़ एक “लकड़बग्घा” विकास का वादा कर रहा है… लेकिन इस माहौल में भी आप “बिटवीन द लाइन्स” पढ़कर अपनी सुबह को आनन्दमयी और कॉमेडी से भरपूर बना सकते हैं। कुछ उदाहरण…



उदाहरण – 1) इन्होंने छात्र जीवन से ही राजनीति में कदम रख लिया था और छात्रसंघ के चुनावों में पार्टी का परचम लहराया था (बिटवीन द लाइन्स – ये नम्बर एक के गुण्डे हैं और कॉलेज में इन्होंने कम से कम चार प्रोफ़ेसरों को तमाचे रसीद किये हैं, तीन हड़तालें करवाईं, दो बसें जलाईं, छात्र संघ का चुनाव जीता है मतलब कम से कम सौ गुण्डे इनके हाथ के नीचे काम करते हैं)

उदाहरण – 2) फ़लाँ महानुभाव अपने पिता के नक्शे-कदम पर चलते हुए जनता की सेवा करने हेतु राजनीति में उतरे हैं (बिटवीन द लाइन्स – ये एक निकम्मे किस्म के युवा हैं जो अपने बाप की वजह से टिकट पा गये हैं, जैसा लम्पट इनका बाप था वैसे ही इनके भी नक्शे-कदम हैं)

उदाहरण – 3) ये महान नेता सहकारिता के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम है, गाँव-गाँव में फ़ैली विभिन्न सहकारिता संस्थाओं के माध्यम से इन्होंने गरीब किसानों की सेवा का प्रकल्प सफ़लतापूर्वक सिद्ध किया है (बिटवीन द लाइन्स – ये साहब सहकारी बैंकों के बहुत बड़े वाले “डिफ़ॉल्टर” हैं, एकाध-दो बैंक ये अपने अकेले के दम पर ही ले डूबे हैं, बाकी की सहकारी संस्थायें भी इनके गुर्गे लोन ले-लेकर अगले चुनाव तक डुबो देंगे)।

उदाहरण – 4) वयोवृद्ध नेताजी पिछले चालीस साल से जनता के सुख-दुख में साथ रहे हैं, राजनैतिक जीवन के कई उतार-चढ़ाव देखने के बावजूद आज भी इनका सेवा का जोश बरकरार है। (बिटवीन द लाइन्स – उतार-चढ़ाव यानी कि दो तीन बार जनता इन्हें बेइज्जती से सरेआम हरा चुकी है, फ़िर भी बुढ़ापे में इनसे सत्ता का मोह नहीं छूट रहा, सो कब्र में पैर लटके होने के बावजूद फ़िर से चुनाव में खड़े हो गये हैं)…

ये तो खैर चुनावी मौसम की खबरें हैं यूं साधारण दिनों में भी आप अखबार में बिटवीन द लाइन्स पढ़ सकते हैं, जैसे – “भारत ने पाकिस्तान के साथ आपसी सम्बन्ध बढ़ाने के लिये एक प्रतिनिधिमण्डल भेजने का फ़ैसला किया है” (बिटवीन द लाइन्स – हम जानते हैं कि यह कुत्ते की पूँछ है सीधी नहीं होगी लेकिन फ़िर भी प्रतिनिधिमण्डल भेज रहे हैं…)। समाचार - “ओलम्पिक में भारत पहले पदक के काफ़ी करीब…” (बिटवीन द लाइन्स – साठ साल में गिने-चुने पदक मिले हैं, फ़िर भी शर्म नहीं आ रही, क्रिकेट देखे जा रहे हैं…), आदि-आदि।

तो भाईयों आपकी मदद और गाइडेंस के लिये यहाँ मैंने कुछेक उदाहरण पेश कर दिये हैं कि “बिटवीन द लाइन्स” कैसे पढ़ा जाता है, बाकी का अभ्यास तो आप कर ही लेंगे। जब आप इस कला में काफ़ी निपुण हो जायेंगे तो आप ब्लॉग में मिल रही टिप्पणियों में से भी “बिटवीन द लाइन्स” पढ़ लेंगे, तब आप “मठाधीश ब्लॉगर” कहलायेंगे और अन्य ब्लॉगर आपके आतंक से खौफ़ खायेंगे और टिप्पणी-दर-टिप्पणी करके आपकी तारीफ़ों के पुल बाँध देंगे (सबसे ज्यादा पाठक इसी वाक्य में “बिटवीन द लाइन्स” पढ़ने की कोशिश करेंगे)। वैसे भी यह कला “अनुभव” से आती है, जैसे-जैसे आप अखबार को ध्यान से पढ़ेंगे और उसमें “बिटवीन द लाइन्स” पढ़ने की कोशिश करेंगे, आपको अखबार नाम की “चीज़” बहुत मजेदार लगने लगेगी। यदि आप चाहते हैं कि रोज-ब-रोज सुबह खुलकर हँसा जाये जिससे फ़ेफ़ड़ों की वर्जिश हो जाये तो इस “कला” की प्रैक्टिस कीजिये और अखबार पठन को एक आनन्ददायी अनुभव बनाईये, क्योंकि आजकल अखबार हों या टीवी चैनल, ये सिर्फ़ “दुकानदारी” बनकर रह गये हैं, इन्हें समाज पर पड़ने वाले प्रभाव से कोई लेना-देना नहीं होता… तो अखबार पढ़कर टेंशन लेने का नईं… खामखा दीमाक का पाव-भाजी क्यों बनाने का, मजा लेने का…

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Election Commission of India, General Elections and Instructions

चार प्रमुख राज्यों में चुनाव की घोषणा के साथ ही लगभग एक-डेढ़ माह के लिये चुनाव आयोग की “सत्ता” शुरु हुए कुछ दिन बीत चुके हैं। उल्लेखनीय है कि चुनाव के समय चुनाव आयोग ही उच्चतम प्रशासनिक संस्था होता है एवं चुनाव आयोग का आदेश अन्तिम व सर्वमान्य होता है। इस “कानून की शक्ति” और इस शक्ति केन्द्र का सबसे पहला और प्रभावशाली उपयोग किया था कालजयी नौकरशाह टी एन शेषन ने। कालजयी इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि उनके मुख्य चुनाव आयुक्त का पद सम्भालने से पहले “केन्द्रीय चुनाव आयोग” सत्ताधारी दलों के आँगन में बँधी हुई बकरी के अलावा और कुछ भी नहीं था, जो सिर्फ़ मिमिया सकती थी या फ़िर खामखा हवा में सींग चला सकती थी, जिसका कोई नतीजा नहीं निकलने वाला था। लेकिन जब टी एन शेषन ने यह शक्तिशाली कुर्सी संभाली तभी से स्थितियाँ बदलना शुरु हो गईं। एक नौकरशाह अपनी शक्ति का उपयोग करके कैसे धूर्त, बेईमान और जोड़तोड़ में माहिर नेताओं और राजनैतिक पार्टियों की नकेल कस सकता है शेषन इसका अनुपम उदाहरण बन गये हैं। जाते-जाते उन्होंने आने वाले चुनाव आयुक्तों के लिये एक नज़ीर पेश कर दी, एक परम्परा सी स्थापित कर दी। अब जो भी मुख्य चुनाव आयुक्त बनता है, राजनैतिक दल उससे सहमकर ही रहते हैं, ऐसा जलवा कायम किया जा चुका है।

इस बार के विधानसभा चुनावों के लिये चुनाव आयोग ने बहुत ही कठोर दिशानिर्देश जारी किये हैं। हालांकि दिशानिर्देश तो हमेशा जारी किये जाते हैं, लेकिन “शेषन युग” के बाद अब आयोग इन पर ईमानदारी से अमल भी करवाने लगा है। वैसे तो पहले ही शासकीय कर्मचारियों पर चुनाव आयोग का डण्डा तना हुआ है, लेकिन हाल ही में मध्यप्रदेश के पर्यटन मंत्री तुकोजीराव पवार और एक पूर्व सांसद उम्मीदवार फ़ूलचन्द वर्मा को एक रिटर्निंग ऑफ़िसर से बदतमीजी करने के आरोप में प्रकरण दर्ज कर जेल भेजा गया है तबसे सभी कर्मचारी और उम्मीदवार आतंकित हो गये हैं। मैंने पहले भी कहा था कि इतने उच्च स्तर के काम को देखते हुए क्यों न चुनाव आयोग को ही दिल्ली की सरकार चलाने का जिम्मा सौंप दिया जाये। भले ही यह बात मजाक में कही हो, लेकिन जिला कलेक्टरों, पुलिस अधिकारियों और अन्य शासकीय कर्मचारियों के काम करने के तौर तरीके देखकर महसूस होता है कि “इसे कहते हैं कानून का राज”। साधारण कर्मचारी हो या उच्च अधिकारी, रात के 12-12 बजे तक लगातार काम में जुटे हैं, कोई मतदाता सूची टटोल रहा है, कोई ईवीएम मशीनों का रिकॉर्ड दुरुस्त कर रहा है, कोई मतदान केन्द्रों के बारे में पूरी जानकारी तैयार कर रहा है। चुनाव आयोग ने सभी को एक समय-सीमा तय कर दी है, और उसी के भीतर उसे अपना काम करना है। सभी के सिर पर नोटिस, कारण बताओ पत्र, निलम्बन, बर्खास्तगी की तलवार लटक रही है… उम्मीदवार भी फ़ूंक-फ़ूंक कर कदम रख रहे हैं, सभी ने एक-दो वकीलों (आचार संहिता का अक्षरशः पालन करने) और चार्टर्ड अकाउंटेंट को (दैनिक हिसाब-किताब “ईमानदारी” से दर्शाने के लिये) नियुक्त कर रखा है, मकान मालिकों से विनम्रता से पूछ-पूछकर दीवारों पर लिख रहे हैं, ध्यान रखा जा रहा है कि प्रचार गाड़ी पर कितने स्पीकर लगेंगे, बिजली के खम्भों पर झंडे टांगने में सतर्कता बरत रहे हैं, इस दौरान किससे मिलना है किससे नहीं मिलना है इसका ध्यान रखा जा रहा है… रिरिया रहे हैं, मिमिया रहे हैं, गिड़गिड़ा रहे हैं… क्या खूब माहौल है, क्या देश में यह माहौल 24 घंटे, सातों दिन, बारहों महीने नहीं रह सकता? क्या यह जरूरी है कि “डण्डे” के डर से ही शासकीय कर्मचारी काम करें? बीते 60 सालों में कार्य-संस्कृति पैदा करने की आवश्यकता क्यों नहीं महसूस की गई? सत्ता में सर्वाधिक समय रहने के कारण “मुफ़्तखोरी” की इस आदत को बढ़ावा देने के लिये सबसे ज्यादा जिम्मेदारी कांग्रेस की होना चाहिये या नहीं? हर आठ-दस साल में नया वेतन आयोग चाहिये होता है, साल के 365 दिनों में से 100 से अधिक छुट्टियाँ, जमाने भर के भत्ते, भ्रष्टाचार के अलावा यूनियनबाजी, राजनीति और चापलूसी की संस्कृति का विकास किया गया है। हालांकि मक्कार कर्मचारी बचने के रास्ते ढूँढ ही लेते हैं, चुनाव ड्यूटी से बचने के लिये फ़र्जी स्वास्थ्य प्रमाण-पत्र, नकली शादी-ब्याह की पत्रिकायें तक पेश की जाती हैं, इतने बड़े “सिस्टम” में कुछ न कुछ गलत काम और गलत लोग आ ही जाते है, लेकिन फ़िर भी चुनाव आयोग के एक आदेश मात्र से बड़े-बड़ों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है, इसलिये शेषन कालजयी हैं, और अब जब यह “परम्परा” ही बन चुकी है तो कोई भी चुनाव आयुक्त बने वह इस प्रथा को आगे ही बढ़ायेगा, जनता और प्रेस का दबाव उसे सत्ताधारी दल की खुलेआम चमचागिरी करने से बचाकर रखेगा।



भारत के चुनाव आयोग ने एक और महान और उल्लेखनीय काम किया है पर्यावरण संरक्षण का। इस मुद्दे पर अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं को पर्यावरण से सम्बन्धित पुरस्कार किसी व्यक्ति विशेष को देने की बजाय भारत के चुनाव आयोग को देना चाहिये। सबसे पहले सन् 2004 के आम चुनावों में आयोग ने “पेपरलेस” चुनाव का प्रयोग किया जो कि सफ़ल भी रहा। लगभग प्रत्येक राज्य मे हरेक मतदान केन्द्र पर इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (EVM) से मतदान करवाकर चुनाव आयोग ने देश का सैकड़ों टन कागज बचाया, जाहिर है कि कागज बचाया मतलब लाखों पेड़ कटने से बचे। इन आगामी विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग ने एक नई और अनुकरणीय पहल की है, वह है “प्लास्टिक पर बैन”। कोई भी प्रत्याशी या पार्टी प्लास्टिक के बिल्ले, बैनर, झंडियाँ, पोस्टर, स्टीकर आदि नहीं बनवा सकेगा। आयोग ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए सभी कलेक्टरों को आदेश दिया है और सार्वजनिक सूचना दी है कि जो भी प्रकाशक या स्क्रीन प्रिंटिंग वाले प्लास्टिक की सामग्री छापेंगे उन्हें तुरन्त काली सूची में डाल दिया जायेगा और उन पर कार्रवाई की जायेगी (यानी सीधे जड़ पर प्रहार)। चुनाव आयोग का यह कदम पर्यावरणीय दृष्टिकोण से क्रांतिकारी कहा जा सकता है। सभी जानते हैं कि प्लास्टिक पर्यावरण को भयानक नुकसान पहुँचाता है और चुनाव निपटने के बाद यदि भारी मात्रा में चुनाव प्रचार सामग्री सड़कों पर बिखरी रहती, नालियों में चोक होती, जलाई जाने पर जहरीला धुआँ छोड़ती। प्रत्याशियों से यह उम्मीद करना कि चुनाव के बाद वे खुद अपनी प्रचार सामग्री हटायेंगे, बेकार ही है। ऐसे में चुनाव आयोग ने यह कदम उठाकर बेहतरीन काम किया है।

मूल समस्या है भारतीयों के चरित्र की, हम इतने अनुशासनहीन और अकर्मण्य हैं कि जब तक कोई मजबूत डण्डा हमारे सिर पर न तना हो हम काम नहीं करना चाहते, हम अनुशासन में नहीं रहना चाहते (चाहे लाल बत्ती पार करने का मामला हो, या गलत पार्किंग का), हम नैतिकता का पालन नहीं करना चाहते (बड़े बंगलों में अतिक्रमण हो या बिजली की चोरी हो)… “निजीकरण” हर समस्या का हल नहीं है, जब तक सरकारी मशीनरी वास्तविक तौर पर काम करने की मुद्रा में न आये, भारत को तेजी से आगे बढ़ना मुश्किल होगा, इसीलिये जब चुनाव आयोग की एक फ़टकार पर बड़े-बड़े अधिकारी अटेंशन की मुद्रा में आ जाते हैं तब बार-बार यही सवाल मन में उठता है कि आखिर दुनिया भर को “कर्म” की शिक्षा देने वाले “गीता” के इस देश में डण्डे की जरूरत ही क्यों पड़ना चाहिये?

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Election Campaign in India and Instructions of Election Commission
चार राज्यों में चुनाव का बिगुल बज चुका है और मौसम में चुनावी रंगत घुलने लगी है। जिस प्रकार होली के दिन नज़दीक आते ही एक विशेष प्रकार का मौसम अंगड़ाई लेने लगता है उसी प्रकार अब अगले कुछ दिनों तक हवा में चुनाव का रंग चढ़ा रहेगा। और बस इससे फ़ारिग होते ही अप्रैल के लोकसभा के चुनाव की तैयारियों का असर दिखने लगेगा, यानी कि अगले 6 महीने तक चुनाव का यह मौसम बना रहेगा।

चुनाव का यह मौसम मुझे बहुत भाता है, चारों ओर गहमागहमी है, भागदौड़ है, सरकारी कर्मचारी जो आम आदमी की बात पर कान तक नहीं देते और नम्बर एक के मक्कार और भ्रष्ट होते हैं वे भी चुनाव आयोग के डण्डे के कारण अटेंशन की मुद्रा में हैं, अभी तो वे अपनी बीबी की बात भी नहीं सुनेंगे, और शादी-ब्याह भी कैंसल कर देंगे। देखकर बड़ा अच्छा महसूस होता है कि चलो पाँच साल में ही सही कभी तो शासकीय कर्मचारी काम करता हुआ दिखता है, चुनाव आयोग के बहाने ही सही कभी-कभार लगता है कि “सरकार” नाम की कोई चीज है जो सरकारी कर्मचारियों पर रौब डालती है। जिस तरह से चुनाव आयोग के नाम से लोग यहाँ-वहाँ थर-थर काँप रहे हैं, लगता है कि देश का शासन चुनाव आयोग को ही सौंप देना चाहिये।

मुझे पता नहीं कि कितने लोगों ने मुर्गों, पाड़ों (भैंसा) और सूअरों की लड़ाई देखी है, मैंने तो बचपन में काफ़ी देखी है और बहुत मजा आता था। चुनाव की बेला आते ही बचपन की इन यादों में खो जाता हूँ। चारों तरफ़ उसी तरह का आलम है, थोड़े से “सोफ़िस्टिकेटेड” दो नेता जब चुनाव मैदान में उतरते हैं तो वह मुर्गे की लड़ाई जैसा लगता है (जैसे मुर्गे के पैर में बंधे हुए छोटे-छोटे चाकू से वार होता है ना, वैसा ही इनके चुनावी दंगल में होता है), उससे थोड़े गिरे हुए गुण्डे-बदमाश टाइप के लोगों के चुनाव “पाड़ों की लड़ाई” जैसे लगते हैं (हुंकार भरते हुए, एक-दूसरे को निपटाने के मूड में, सींग से सींग भिड़ाते हुए, खून बहाते हुए, एक दूसरे के समर्थकों पर भी चढ़ बैठने की अदा में), तीसरी कैटेगरी बहुत नीचे स्तर की है (और ऐसे ही लोगों की संख्या ज्यादा है) यानी सूअरों की लड़ाई (इसमें लड़ने वाले खुद भी कीचड़ में लोटते-नोचते-खसोटते हैं और देखने वालों पर भी कीचड़ उछालते हैं)। कहने का मतलब यह कि चुनाव नाम का यह दंगल देखने में बहुत मजा आता है।



सभी पार्टियों के उम्मीदवारों की सूची जारी हो चुकी है, सभी ने नामांकन भर दिया है, बागी भी अपना-अपना झंडा-डंडा थामे मैदान में कूद पड़े हैं। अब अगले कुछ दिन पार्टी उम्मीदवार और विद्रोही उम्मीदवार के बीच “सौदेबाजी” में गुजरेंगे। जो भी विपक्ष में “अपना ही भाई जैसा” आदमी खड़ा हुआ है उसे बिठाने की कोशिशें तेज की जायेंगी। एक भाई ने उस पर चल रहे 4 हत्याओं के मामले वापस लेने की शर्त रखी है, दूसरे ने चालीस लाख माँगे हैं “बैठने” के लिये, क्योंकि पिछले पाँच साल में वह पहले ही 5-10 लाख खर्च कर चुका है “खड़े” होने के लिये। एक जगह एक सज्जन बैठने की एवज में अपनी (सिर्फ़) 15 बसों का “राष्ट्रीय परमिट” चाहते हैं, दूसरी जगह एक और सज्जन सरकार बन जाने की स्थिति में “मलाईदार” निगम या मण्डल में अध्यक्ष पद चाहते हैं और यदि सरकार नहीं बनी तो केन्द्र के किसी आयोग या प्रतिनिधिमण्डल में जगह चाहते हैं। एक और “सज्जन” (सभी सज्जन ही होते हैं यारों…) बैठने के बदले में दो मेडिकल कॉलेज और चार बी-एड कॉलेज खोलने की अनुमति चाहते हैं…सोचिये एक विधायक बनने की क्या कीमत होगी, कितनी कीमत चुकानी पड़ेगी और कितनी कीमत वह अगले पाँच साल में बनायेगा, सोचते-सोचते दिमाग का दही बन जायेगा। जब-तब “भारत के महान लोकतन्त्र” की दुहाई देने वाले एलीट क्लास के लोग वोट देने जाना अपनी शान के खिलाफ़ समझते हैं और यही सबसे ज्यादा आलोचना भी करते हैं।

बहरहाल, अपने जैसे आम आदमी को चुनाव नाम के इस मेले-ठेले में बहुत मजा आता है, सूअरों-मुर्गों की लड़ाई फ़्री में देखने मिल जाती है, गरीबों को कम्बल-दारू मिल जाती है, काला पैसा और भ्रष्टाचार की कमाई जो नेताओं की तिजोरी में बन्द रहती है, वह टेम्पो चलाने वाले, माइक थामने वाले, मंच बनाने वाले, बैनर लिखने वाले, सौ-सौ रुपये लेकर पुतले जलाने वाले और नारे लगाने वाले जैसे हजारों लोगों की जेबों में, कुछ दिनों के लिये ही सही पहुँचती तो है, वापस इस लक्ष्मी को उन्हीं की तिजोरियों में दोगुना-तिगुना होकर पहुँचना है। पन्द्रह-बीस दिनों के लिये हजारों बेरोजगारों को काम मिल जाता है, कई हाथों को बिना कमाये रात को एक “क्वार्टर” दारू मिल जाती है, सब अपने-अपने कामों में व्यस्त हो जाते हैं, कितना-कितना फ़ायदा है चुनावों से… मुझे तो लगता है कि हर साल चुनाव होते रहें तो कम से कम सरकारी कर्मचारी काम करते हुए तो दिखाई देंगे, नेता जितना कमायेगा लगातार उतना ही खर्च भी करता रहेगा, हजारों-लाखों को रोजगार मिलता रहेगा और हमारा भी मनोरंजन होता रहेगा। अभी भारत में ब्रिटेन जैसी व्यक्तिगत और छिछोरी बातों को छापने वाले “टेब्लॉयड” अखबारों की संस्कृति नहीं आई है वरना जैसे नारायणदत्त तिवारी को बुढ़ापे में सरेआम नंगा कर दिया गया है, वैसे हजारों केसेस हमें देखने-पढ़ने-सुनने को मिल जाते, तो चुनाव का मजा और भी दोगुना हो जाता… खैर हमें क्या… कहते हैं “कोऊ नृप होई हमे का हानि…”, लेकिन यहाँ मामला उल्टा है कोई भी नृप (विधायक/सांसद) बने हमें (आम नागरिक) तो हानि ही हानि है, जैसे अमेरिका में “गधा” (डेमोक्रेट) जीते या “हाथी” (रिपब्लिकन) वह तो सारी दुनिया को लतियायेगा ही, उसी प्रकार यहाँ भी हमें चुनाव सिर्फ़ यह तय करना है कि हम किससे अपनी इज्जत लुटवाना चाहते हैं, “इस” पार्टी से या “उस” पार्टी से… बस बीच का यह आचार संहिता का एक महीने का समय बड़ा ही मजेदार-रंगबाज होता है तो इस “चुनाव मौसम” के मजे क्यों न लूटें… चुनाव के बाद तो सारे नेता मिलकर हमारी सबकी………… दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतन्त्र की यह एक विडम्बना है, लेकिन फ़िलहाल इससे बचने और निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा।

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