JNU की एकेडेमिक काउंसिल के 30 प्रोफ़ेसरों ने कुलपति बीबी भट्टाचार्य से लिखित में शिकायत की है कि विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर और असोसियेट प्रोफ़ेसरों के लिये 149 पदों के लिये आरक्षण नहीं होना चाहिये। यह सुनकर उन लोगों को झटका लग सकता है, जो वामपंथियों को प्रगतिशील मानते हों, जबकि हकीकत कुछ और ही है। अपने बयान में प्रोफ़ेसर बिपिनचन्द्र कहते हैं, “असिस्टेंट प्रोफ़ेसर से ऊपर के पद के लिये आरक्षण लागू करने से इस विश्वविद्यालय की शिक्षा का स्तर गिरेगा… और यह संस्थान थर्ड-क्लास संस्थान बन जायेगा…” (अर्थात प्रोफ़ेसर साहब कहना चाहते हैं कि आरक्षण की वजह से स्तर गिरता है, और जिन संस्थानों में आरक्षण लागू है वह तीसरे दर्जे के संस्थान बन चुके हैं)… एक और प्रोफ़ेसर साहब वायके अलघ फ़रमाते हैं, “जेएनयू का स्टैण्डर्ड बनाये रखने के लिये आरक्षण सम्बन्धी कुछ मानक तय करने ही होंगे, ताकि यह यूनिवर्सिटी विश्वस्तरीय बनी रह सके…” (हा हा हा हा, कृपया हँसिये नहीं, राजनीतिक अखाड़ा बनी हुई, भाई-भतीजावाद से ग्रस्त और भारतीय इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने वाली नकली थीसिसों की यूनिवर्सिटी पता नहीं कब से विश्वस्तरीय हो गई…)। अब दो मिनट के लिये कल्पना कीजिये, कि यदि यही बयान भाजपा-संघ के किसी नेता ने दिया होता तो मीडिया को कैसा “बवासीर” हो जाता। (खबर यहाँ पढ़ें… http://www.outlookindia.com/article.aspx?263782 )


जब भाजपा के नये अध्यक्ष गडकरी ने कार्यभार संभाला और नई टीम बनाई तो अखबारों, मीडिया और चैनलों पर इस बात को लेकर लम्बी-चौड़ी बहसें चलाई गईं कि भाजपा ब्राह्मणवादी पार्टी है और इसमें बड़े-बड़े पदों पर उच्च वर्ग के नेताओं का कब्जा है तथा अजा-जजा वर्ग को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। आईये जरा एक निगाह डाल लेते हैं वामपंथी नेतृत्व के खासमखास त्रिमूर्ति पर – प्रकाश करात (नायर क्षत्रिय), सीताराम येचुरी (ब्राह्मण), बुद्धदेब भट्टाचार्य (ब्राह्मण), अब बतायें कि क्या यह जातिवादी-ब्राह्मणवादी मानसिकता नहीं है? वामपंथियों के ढोंग और पाखण्ड का सबसे अच्छा उदाहरण केरल में देखा जा सकता है, जहाँ OBC (एझावा जाति) हमेशा से वामपंथियों का पक्का वोट बैंक और पार्टी की रीढ़ रही है, लेकिन जब-जब भी वहाँ पार्टी को बहुमत मिला है, तब-तब इन्हें पीछे धकेलकर किसी उच्च वर्ग के व्यक्ति को मुख्यमंत्री की कुर्सी दी गई है। केरल में कम्युनिस्ट आंदोलन की प्रमुख नेत्री केआर गौरी (जो सबसे अधिक समय विधानसभा सदस्या रहीं) मुख्यमंत्री पद के लिये कई बार उपयुक्त पाये जाने के बावजूद न सिर्फ़ पीछे कर दी गईं बल्कि उन्हें “पार्टी विरोधी गतिविधियों” के नाम पर पार्टी से भी निकाला गया। इसी प्रकार वर्तमान मुख्यमंत्री अच्युतानन्दन भी पिछड़ा वर्ग से (50 साल के कम्युनिस्ट शासन के पहले पिछड़ा वर्ग मुख्यमंत्री) हैं, लेकिन जिस दिन से उन्होंने पद संभाला है उस दिन से ही किसी बाहरी व्यक्ति नहीं, बल्कि पार्टी के सदस्यों ने ही उनकी लगातार आलोचना और नाक में दम किया गया है और उन्हें अपमानजनक तरीके से पोलित ब्यूरो से भी निकाला गया है, लेकिन फ़िर भी अकेली भाजपा ही ब्राह्मणवादी पार्टी है? मजे की बात तो यह है कि "धर्म को अफ़ीम" कहने वाले नास्तिक ढोंगियों (अर्थात वामपंथियों) की पोल इस मुद्दे पर भी कई बार खुल चुकी है, जब इनकी पार्टी के दिग्गज कोलकाता के पूजा पाण्डालों या अय्यप्पा स्वामी के मन्दिर में देखे गये हैं, फ़िर भी आलोचना भाजपा की ही करेंगे।

इसी प्रकार बंगाल के तथाकथित “भद्रलोक” कम्युनिस्टों को ही देख लीजिये, वहाँ कितने पिछड़ा वर्ग के मुख्यमंत्री हुए हैं? उच्च वर्ग हो या अजा-जजा वर्ग के बंगाली हों, बांग्लादेशी मुसलमानों द्वारा कम से कम 9 जिलों में लगातार उत्पीड़ित किये जा रहे हैं, लेकिन दूसरों को जातिवादी बताने वाले पाखण्डी वामपंथियों की कानों पर जूँ भी नहीं रेंगती। सन् 2008 में कम्युनिस्ट कैडर द्वारा पत्नी और बच्चों के सामने एक दलित युवक के गले में टायर डालकर उसे जला दिया गया था जिसकी कोई खबर किसी न्यूज़ चैनल या अखबार में प्रमुखता से नहीं दिखाई दी।

पिछले कुछ दिनों से मोहल्ला सहित 2-4 ब्लॉग्स पर वर्धा के हिन्दी विवि के प्रोफ़ेसर अनिल चमड़िया (जो कि बेहतरीन लिखते हैं, विचारधारा कुछ भी हो) को निकाले जाने को लेकर बुद्धिजीवियों(?) में घमासान मचा हुआ है… जिनमें से कुछ "नेतानुमा प्रोफ़ेसर" हैं, कुछ "पत्रकारनुमा नेता" हैं और कुछ “परजीवीनुमा बुद्धिजीवी” हैं… और हाँ कुछ वामपंथी है तो कुछ दलितों के कथित मसीहा भी… कुल मिलाकर ये कि उधर जमकर "भचर-भचर" हो रही है…(अच्छा हुआ कि मैं बुद्धिजीवी नहीं हूं), लेकिन जेएनयू (JNU) के प्रोफ़ेसर अपने संस्थान में आरक्षण नहीं चाहते… इस महत्वपूर्ण बात पर कोई बहस नहीं, कोई मीडिया चर्चा नहीं, किसी चैनल पर कोई इंटरव्यू नहीं… ऐसे होते हैं दोमुंहे और “कब्जाऊ-हथियाऊ” किस्म के वामपंथी…। सच बात तो यह है कि बरसों से जुगाड़, चमचागिरी और सेकुलरिज़्म के तलवे चाट-चाटकर जो प्रोफ़ेसर जेएनयू में कब्जा जमाये बैठे हैं उन्हीं को आरक्षण नहीं चाहिये। यदि यह बात किसी हिन्दू संगठन या भाजपा ने कही होती तो अब तक इन्ही सेकुलरों का पाला हुआ मीडिया "दलित विमर्श" को लेकर पता नहीं कितने सेमिनार करवा चुका होता… लेकिन मामला JNU का है जो कि झूठों का गढ़ है तो अब क्या करें…।
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एक अनुरोध - जब तक मीडिया का हिन्दुत्व विरोधी रवैया जारी रहेगा, जब तक मीडिया में हिन्दू हित की खबरों को पर्याप्त स्थान नहीं मिलता, ऐसी खबरों, कटिंग्स, ब्लॉग्स, लेखों आदि को अपने मित्रों को अधिकतम संख्या में फ़ेसबुक, ऑरकुट, ट्विटर आदि पर “सर्कुलेट” करके नकली सेकुलरिज़्म और वामपंथियों का “पोलखोल जनजागरण” अभियान सतत चलायें…

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क्या आप राहुल सक्सेना को जानते हैं? जानते तो होंगे लेकिन अब याद करने के लिये दिमाग पर थोड़ा ज़ोर लगाना पड़ेगा, चलिये मैं ही याद दिला देता हूं… भारत के पहले सबसे अधिक लोकप्रिय रियलिटी शो इंडियन आइडल (प्रथम), जिसमें अमित साना को हराकर, धारावी की झोपड़पट्टी में रहने वाले प्रतिभाशाली गायक अभिजीत सावन्त विजेता बने थे, उसी प्रतियोगिता में नौंवे क्रमांक पर रहने वाले एक प्रतियोगी हैं राहुल सक्सेना। आप कहेंगे इसमें कौन सी बड़ी बात है, ऐसे कई कलाकार, कई-कई शो में निचले क्रमांकों पर रहकर गुमनामी के अंधेरों में खो जाते हैं, लेकिन राहुल सक्सेना उनमें से नहीं हैं।
चार साल पहले भी जिस वक्त इंडियन आईडल से वह बाहर हुए थे, उस समय भी फ़राह खान ने भीगी आँखों से कहा था कि SMS के जरिये वोटिंग अथवा अन्य तकनीकी वजहों से भले ही राहुल बाहर जा रहे हैं, लेकिन मुझे उनकी प्रतिभा पर पूरा यकीन है और मैं इस लड़के को अपनी फ़िल्म में गाने का मौका दूंगी (यह वादा उन्होंने फ़िल्म ओम शांति ओम में सक्सेना को मौका देकर निभाया भी)। राहुल सक्सेना की समूची शिक्षा-दीक्षा दिल्ली में हुई इंडियन आइडल से पहले जून 2004 में ही वे मुम्बई शिफ़्ट हुए…। चलिये अब भूमिका और प्रस्तावना बहुत हुई, मुद्दे की बात पर आते हैं…

जी मराठी का एक लोकप्रिय कार्यक्रम है हिन्दी की तर्ज़ पर चलने वाला “सारेगमप…”, जिसे पल्लवी जोशी संचालित करती हैं। वर्तमान में जारी इस मराठी सारेगमप के फ़ाइनलिस्ट तीन कलाकारों में से दो कलाकार “गैर-मराठी” हैं… जी हाँ, चौंकिये मत… राहुल सक्सेना (शुद्ध हिन्दी भाषी) और अभिलाषा चेल्लम (एक और प्रतिभाशाली तमिलभाषी लड़की) “मराठी” के इस कार्यक्रम में सारे महाराष्ट्र और मराठियों का दिल जीत रहे हैं और भरपूर SMS प्राप्त कर रहे हैं।

है न मजेदार और थोड़ा आश्चर्यजनक भी… कि जब देश भाषाई और क्षेत्रीय विवादों से जूझ रहा हो, ऐसे वक्त में दो कलाकार जिनकी मातृभाषा तो मराठी तो है ही नहीं, बल्कि वे मराठी बोलना भी नहीं जानते… ऐसे गायक-गायिका, मराठी के एक संगीत कार्यक्रम में फ़ाइनल में पहुँचे हैं। खास बात इसलिये भी है, कि संगीत, नाटक, अभिनय आदि की समालोचना मराठी लोग बड़ी ही सूक्ष्म दृष्टि से करते हैं और सच्चे अर्थों में उच्च दर्जे का कलाकार ही यहाँ टिक पाता है। हालांकि मराठियों के लिये यह बात कतई आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि महाराष्ट्र ने हमेशा भाषा, जाति, सम्प्रदाय से ऊपर उठकर “सच्चे कलाकार” और उसकी कला का सम्मान किया है उन्हें प्यार दिया है। ऐसे कई गैर-मराठी कलाकार हैं जिन्होंने मराठी फ़िल्मों-नाटकों में अपना उत्कृष्ट योगदान दिया है, वहीं दूसरी ओर लता मंगेशकर हों या आशा भोंसले दोनों ने हिन्दी में सफ़लतापूर्वक अपना साम्राज्य स्थापित किया है।

बहरहाल, बात हो रही थी, इन दो युवा कलाकारों की… राहुल सक्सेना से आपका परिचय हो गया है, अब जान लीजिये दूसरी चुलबुली, नटखट, दाक्षिणत्य सौन्दर्य से भरपूर अभिलाषा चेल्लम के बारे में…

पुणे में निवासरत तमिलभाषी चेल्लम अय्यर की पुत्री अभिलाषा ने 4 वर्ष की आयु से ही कर्नाटक संगीत की शिक्षा ली, और पुणे में आयोजित होने वाली विभिन्न गायन प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। जब वह 8 वर्ष की थी उस समय सब टीवी पर आने वाले कार्यक्रम “आओ झूमें गायें” में फ़ाइनल तक पहुँची थी, लेकिन उम्र कम होने की वजह से वह दूसरे क्रमांक पर रही। इसलिये जब स्टार टीवी के “अमूल वॉइस ऑफ़ इंडिया” में उसे गाने का मौका मिला तब भी वह अन्तिम 12 प्रतिभागियों में स्थान बनाने में सफ़ल रही। इससे पहले भी कई प्रतियोगिताओं में अभिलाषा ने मन्ना डे, ज़ाकिर हुसैन, दुर्गा जसराज, मोहम्मद अज़ीज़ जैसे परीक्षकों के सामने बेधड़क गा चुकी है, और इस बार भी जी-मराठी के इस सारेगामापा में सुरेश वाडकर, जतिन-ललित और शंकर महादेवन समेत मराठी-हिन्दी के अनेक दिग्गजों ने इसकी आवाज़, संगीत की समझ और गाने के अन्दाज़ की दिल खोलकर तारीफ़ की है। अभिलाषा का सपना है कि उसे एक बार काजोल के लिये प्लेबैक करने का मौका मिले…

जब आप इन दोनों गायकों के उच्चारण सुनेंगे तो यह कतई महसूस नहीं होगा कि इन दोनों को मराठी नहीं आती, सिर्फ़ समझ सकते हैं। अभिलाषा तो पुणे की निवासी होने की वजह से टूटी-फ़ूटी मराठी बोल सकती हैं, लेकिन राहुल सक्सेना तो ठेठ दिल्ली के हैं और उन्हें मराठी बिलकुल नहीं आती। लेकिन “संगीत” को किसी भी भाषा, किसी राजनीति, किसी क्षेत्रवाद, किसी ठाकरेवाद में बाँधा नहीं जा सकता, और इस बात की पूरी सम्भावना है कि 31 जनवरी को होने वाले फ़ाइनल मुकाबले में अभिलाषा चेल्लम ही महाराष्ट्र की महागायिका बनकर उभरें। अभिलाषा की स्वर अदायगी, मराठी उच्चारण (गाने के दौरान), ताल की समझ बेहतरीन है और राहुल सक्सेना से उसकी काँटे की टक्कर होगी, तीसरी फ़ाइनलिस्ट मराठी है जिसका नाम है उर्मिला धनगर, लेकिन कोई भी उसे जीत का दावेदार नहीं मान रहा।


चित्र में तीनों फ़ाइनलिस्ट प्रख्यात गायिका अलका याग्निक के साथ 

अपने काम से देर शाम घर पहुँचता हूँ तब दिन भर ब्लॉगिंग के नशे के बाद संगीत का नशा ही लेता हूं… जो सारे नशे पर भारी है… और जी मराठी के बेहतरीन संगीत और हास्य कार्यक्रमों की वजह से बिग बॉस के घटियापन, राखी-राहुल के फ़ूहड़ स्वयंवरों, पुनर्जन्म की नौटंकियों आदि से बचा रहता हूँ… हाँ न्यूज़ चैनलों को अवश्य 5-5 मिनट देखना पड़ता है कि किस चैनल पर कौन सा एंकर भाजपा-संघ-हिन्दुत्व को गरिया रहा है, और कौन सा एंकर राहुल बाबा के चरण स्पर्श कर रहा है…

इस कार्यक्रम के बारे में आप लोगों को देर से बताने के लिये माफ़ी चाहता हूँ… लेकिन इन दोनों कलाकारों के एक-दो यू-ट्यूब वीडियो आपके लिये सादर प्रस्तुत करता हूं… उधर एक और मराठी माणुस मोहन भागवत जी ने भी अपना संयम तोड़ते हुए ठाकरेद्वय को कल “मराठी मुम्बई” के बारे में खरी-खरी सुना दी है भले इससे भाजपा-सेना गठबंधन खतरे में आ जाये, लेकिन राजनीति की बात अगली पोस्ट में करेंगे, फ़िलहाल आप इन दोनों युवा कलाकारों का गाना सुनिये… जिन्हें मराठी जजों, मराठी दर्शकों और मराठियों के अधिकाधिक SMS ने फ़ाइनल में पहुँचाया है…। मेरी भी अभिलाषा है कि “अभिलाषा” ही जीते…

मी राधिका, मी प्रेमिका : http://www.youtube.com/watch?v=q0eHkNTRXiA



नटरंग फ़िल्म की एक मुश्किल लावणी… http://www.youtube.com/watch?v=PsIS_CREvAo



खेळ मांडला… http://www.youtube.com/watch?v=Ww9A0a8XKvw



करुया उदो-उदो अम्बाबाईचा… http://www.youtube.com/watch?v=yXY2jy02hJM



चलते-चलते : पूरी पोस्ट लिख चुकने के बाद, कल रात की खबर यह है कि इन दोनों प्रतियोगियों को पीछे छोड़कर उर्मिला धनगर ने अधिक SMS प्राप्त करने की वजह से यह मुकाबला जीत लिया है। आज सुबह से इस बात की सम्भावना जताई जा रही है कि जी-मराठी, आईडिया (प्रायोजक) और कार्यक्रम संचालकों पर कोई "बाहरी दबाव" था जिसकी वजह से काँटे की टक्कर वाले इस मुकाबले में अभिलाषा चेल्लम की जीत नहीं हो सकी। हालांकि मंच से इन दोनों प्रतियोगियों ने किसी प्रकार की नाखुशी व्यक्त नहीं की, लेकिन एक जज "अवधूत गुप्ते" (जिन्होंने ठाकरे परिवार पर आधारित हाल ही में एक फ़िल्म "झेण्डा" का निर्माण किया है) ने इशारों-इशारों में ही बहुत कुछ कह दिया।

वहीं दूसरी तरफ़ महाराष्ट्र के कुछ संगीतप्रेमियों को इस बात पर ऐतराज़ हैं कि राहुल और अभिलाषा के कई मराठी उच्चारण दोषों को नज़र-अंदाज़ करके कई प्रतिभाशाली प्रतियोगियों को कार्यक्रम की "इमेज" बनाने के लिये जानबूझकर बाहर कर दिया गया है। अब ये तो पता नहीं कि अन्तिम समय पर क्या हुआ या ऐसे कार्यक्रमों की अन्दरूनी राजनीति क्या और कैसी रही, लेकिन मेरे कुछ वर्षों के "कानसेन" अनुभव के आधार पर यदि मुझे इन तीनों में से किसी को चुनने का मौका मिलता तो मैं निश्चित ही अभिलाषा चेल्लम को अपना वोट देता…। पहले मैं सिर्फ़ राहुल और अभिलाषा के वीडियो ही लगाने वाला था, लेकिन अब उर्मिला धनगर के दो सुपरहिट और खूब पसन्द किये गये गाने भी लगा रहा हूं, उर्मिला धनगर की आवाज़ में भी एक विशिष्ट ग्रामीण एवं लोकगायक का टच है जो उसे बाकियों से अलग करता है। पसन्द अपनी-अपनी, खयाल अपना-अपना, अब आप लोग खुद ही सुनें और अपना मत बतायें…।

बहरहाल, दो गैर-मराठी युवा कलाकारों ने काफ़ी समय से मुम्बई में चल रहे "ठाकरेवाद" की हवा निकालने की सफ़ल कोशिश की है। जय भारत, जय हिन्द तथा "जय हो महाराष्ट्र की संगीत परम्परा"

कळिदार कपुरी पान : http://www.youtube.com/watch?v=7IcZ03_G1kQ



पिकलं ज़ाम्भुळ तोड़ू नका - http://www.youtube.com/watch?v=twKyRx5oRmk




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महाराष्ट्र की ग्रामीण लोक-परम्परा में “लावणी” और “तमाशा” का एक विशिष्ट स्थान हमेशा से रहा है। यह लोकनृत्य और इसमें प्रयुक्त किये जाने वाले गीत-संगीत-हावभाव आदि का मराठी फ़िल्मों में हमेशा से प्रमुख स्थान रहा है। बीते कुछ वर्षों में हिन्दी फ़िल्मों के बढ़ते प्रभाव, फ़िल्मों के कथानक का “कमाई” के अनुसार बाज़ारीकरण, तथा मराठी फ़िल्मों में भी पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते असर की वजह से अव्वल तो ग्रामीण पृष्ठभूमि पर बनने वाली फ़िल्में ही कम हो गईं और उसमें भी लावणी और तमाशा के गीत तथा दृश्य मृतप्राय हो गये थे।

महाराष्ट्र के लोगों में नाटक-कला-संस्कृति-फ़िल्में-गायन-वादन-खेल आदि की परम्परा सदा से ही पुष्ट रही है। इसमें भी “नाटक” और “गायन” प्रत्येक मराठी के दिल में बसता है, और यदि संगीत-नाटक (जिसमें कहानी के साथ गीत भी शामिल होते हैं) हो तो क्या कहने। बदलते आधुनिक युग के साथ महाराष्ट्र के ग्रामीण भागों में भी लावणी-तमाशा की परम्परा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। अलबत्ता मुम्बई जैसे महानगर अथवा नासिक, पुणे, औरंगाबाद, सोलापुर, कोल्हापुर आदि शहरों में अच्छे नाटकों के शो आज भी हाउसफ़ुल जाते हैं।




1 जनवरी 2010 को महाराष्ट्र की इस विशिष्ट परम्परा को पुनर्जीवित करने का प्रयास करते हुए एक फ़िल्म प्रदर्शित हुई है, नाम है “नटरंग”, रिलीज़ होने से पहले ही इसका संगीत बेहद लोकप्रिय हो चुका था और रिलीज़ होने के बाद इस फ़िल्म ने पूरे महाराष्ट्र में धूम मचा रखी है। जी टॉकीज़ द्वारा निर्मित यह फ़िल्म प्रख्यात मराठी लेखक और महाराष्ट्र साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष आनन्द यादव के उपन्यास पर आधारित है और इसमें मुख्य भूमिका निभाई है “अतुल कुलकर्णी” ने। अतुल कुलकर्णी को हिन्दी के दर्शक, - हे-राम, पेज 3, चांदनी बार, रंग दे बसन्ती, ये है इंडिया, जेल आदि फ़िल्मों में महत्वपूर्ण भूमिकाओं में देख चुके हैं।

 दो साल पहले जब इस फ़िल्म के उपन्यास पर आधारित पटकथा जी टॉकीज़ वालों को सुनाई गई थी, उस समय इसकी कहानी के फ़िल्म बनने पर “कमाऊ” होने में निश्चित रूप से संशय था, क्योंकि लावणी-तमाशे की मुख्य पृष्ठभूमि पर आधारित ग्रामीण कहानी पर फ़िल्म बनाना एक बड़ा जोखिम था, लेकिन जी टॉकीज़ वालों ने निर्देशक की मदद की और यह बेहतरीन फ़िल्म परदे पर उतरी। रही-सही कसर अतुल कुलकर्णी जैसे “प्रोफ़ेशन” के प्रति समर्पित उम्दा कलाकार ने पूरी कर दी।



हिन्दी के दर्शक अतुल के बारे में अधिक नहीं जानते होंगे, लेकिन मराठी से आये हुए अधिकतर कलाकार चाहे वह रीमा लागू हों, डॉ श्रीराम लागू हों, नाना पाटेकर, अमोल पालेकर, मधुर भण्डारकर या महेश मांजरेकर कोई भी हों… सामान्यतः नाटक और मंच की परम्परा के जरिये ही आते हैं इसलिये फ़िल्म निर्देशक का काम वैसे ही आसान हो जाता है। हिन्दी में भी परेश रावल, सतीश शाह, पंकज कपूर, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी आदि मंजे हुए कलाकार नाटक मंच के जरिये ही आये हैं। बात हो रही थी अतुल कुलकर्णी की, इस फ़िल्म की पटकथा और कहानी से वे इतने प्रभावित थे कि उन्होंने सात महीने की एकमुश्त डेट्स निर्देशक को दे दीं, तथा इस बीच अपने रोल के साथ पूरा न्याय करने के लिये उन्होंने मणिरत्नम, विशाल भारद्वाज और रामगोपाल वर्मा जैसे दिग्गजों को नई कहानी या पटकथा सुनाने-सुनने से मना कर दिया।


इस फ़िल्म में अतुल कुलकर्णी का रोल इंटरवल के पहले एक पहलवान का है, जबकि इंटरवल के बाद तमाशा में नृत्य करने वाले एक हिजड़ानुमा स्त्री पात्र का है, जिसे “तमाशा” में मुख्य स्त्री पात्र का सहायक अथवा “नाच्या” कहा जाता है। फ़िल्म में पहलवान दिखने के लिये पहले दुबले-पतले अतुल कुलकर्णी ने अपना वज़न बढ़ाकर 85 किलो किया और जिम में जमकर पसीना बहाया। फ़िर दो माह के भीतर ही भूमिका की मांग के अनुसार इंटरवल के बाद “स्त्री रूपी हिजड़ा” बनने के लिये अपना वज़न 20 किलो घटाया। सिर्फ़ तीन माह के अन्तराल में अपने शरीर के साथ इस तरह का खतरनाक खिलवाड़ निश्चित रूप से उनके लिये जानलेवा साबित हो सकता था, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फ़िजिकल ट्रेनर शैलेष परुलेकर की मदद से यह कठिन काम भी उन्होंने पूरा कर दिखाया।

अतुल कुलकर्णी ने 30 वर्ष की आयु में 1995 में नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से कोर्स पूरा किया, उसी के बाद उन्होंने अभिनय को अपना प्रोफ़ेशन बनाना निश्चित कर लिया। अतुल कुलकर्णी ने अब तक 4 भाषाओं में आठ नाटक, 6 भाषाओं में छब्बीस फ़िल्में की हैं तथा उन्हें दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। उनका कहना है कि फ़िल्म की भाषा क्या है, अथवा निर्देशक कौन है इसकी बजाय कहानी और पटकथा के आधार पर ही वे फ़िल्म करना है या नहीं यह निश्चित करते हैं, मुझे अधिक फ़िल्में करने में कोई रुचि नहीं है, अच्छी फ़िल्में और रोल मिलते रहें बस… बाकी रोजी-रोटी के लिये नाटक तो है ही…”।

अब थोड़ा सा इस अदभुत फ़िल्म की कहानी के बारे में…


फ़िल्म का मुख्य पात्र गुणा कागलकर अर्थात अतुल एक ग्रामीण खेत मजदूर हैं। गुणाजी को सिर्फ़ दो ही शौक हैं, पहलवानी करना और तमाशा-लावणी देखना, उसके मन में एक दबी हुई इच्छा भी है कि वह अपनी खुद की नाटक-तमाशा कम्पनी शुरु करे, उसमें स्वयं एक राजा की भूमिका करे तथा विलुप्त होती जा रही लावणी कला को उसके शिखर पर स्थापित करे। ग्रामीण पृष्ठभूमि और सुविधाओं के अभाव में उसका संघर्ष जारी रहता है, वह धीरे-धीरे गाँव के कुछ अन्य नाटकप्रेमी लोगों को एकत्रित करके एक ग्रुप बनाता है जिसमें लावणी नृत्य पेश किया जाना है। उसे हीरोइन भी मिल जाती है, जो उसे भी नृत्य सिखाती है। इन सबके बीच समस्या तब आन खड़ी होती है, जब “नाच्या” (स्त्री रूपी मजाकिया हिजड़े) की भूमिका के लिये कोई कलाकार ही नहीं मिलता, लेकिन गुणाजी पर नाटक कम्पनी खड़ी करने और अपनी कला प्रदर्शित करने का जुनून कुछ ऐसा होता है कि वह मजबूरी में खुद ही “नाच्या” बनने को तैयार हो जाता है। उसके इस निर्णय से उसकी पत्नी बेहद खफ़ा होती है और उनमें विवाद शुरु हो जाते हैं, उस पर गाँव की भीतरी राजनीति में नाटक की हीरोइन तो “जेण्डर बायस” की शिकार होती है साथ ही साथ हिजड़े की भूमिका निभाने के लिये गुणाजी को भी गाँव में हँसी का पात्र बनना पड़ता है। कहाँ तो गुणाजी अपने तमाशे में एक “विशालकाय मजबूत राजा” का किरदार निभाना चाहता है, लेकिन बदकिस्मती से उसे साड़ी-बिन्दी लगाकर एक नचैया की भूमिका करना पड़ती है…नाटक के अपने शौक और अपनी लावणी कम्पनी शुरु करने की खातिर वह ऐसा भी करता है। बहरहाल तमाम संघर्षों, पक्षपात, खिल्ली, धनाभाव, अपने परिवार की टूट के बावजूद गुणाजी अन्ततः अपने उद्देश्य में सफ़ल होता है और उसकी नाटक कम्पनी सफ़लता से शुरु हो जाती है, लेकिन उसकी पत्नी उसे छोड़कर चली जाती है। (अतुल कुलकर्णी की हिजड़ानुमा औरत वाली भूमिका की तस्वीर जानबूझकर नहीं दे रहा हूं, क्योंकि वह देखने और अनुभव करने की बात है)

मराठी नाटकों की सौ वर्ष से भी पुरानी समृद्ध नाट्य परम्परा में लावणी-तमाशा में “नाच्या” की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि यह नाच्या कभी कहानी को आगे बढ़ाने के काम आता है, कभी सूत्रधार, कभी विदूषक तो कभी नर्तक बन जाता है। इस तरह नृत्य करने वाली मुख्य नृत्यांगना के साथ ही इसका रोल भी जरूरी होता है, लेकिन जैसा कि हमारे समाज में होता आया है, “थर्ड जेण्डर” अर्थात हिजड़ों के साथ अन्याय, उपेक्षा और हँसी उड़ाने का भाव सदा मौजूद होता है, वैसा नाच्या के साथ भी जेण्डर बायस किया जाता है, जबकि अधिकतर तमाशों में यह भूमिका पुरुष ही निभाते आये हैं। मराठी नाटकों में पुरुषों द्वारा स्त्री की भूमिका बाळ गन्धर्व के ज़माने से चली आ रही है, कई-कई नाटकों में पुरुषों ने स्त्री की भूमिका बगैर किसी फ़ूहड़पन के इतने उम्दा तरीके से निभाई है कि नाटक देखते वक्त कोई जान नहीं सकता कि वह कलाकार पुरुष है। ऐसे ही एक महान मराठी कलाकार थे गणपत पाटील, जिन्होंने बहुत सारी फ़िल्मों में “नाच्या” की भूमिका अदा की, और उनके अभिनय में इतना दम था तथा उनकी भूमिकाएं इतनी जोरदार थीं कि नाटक-फ़िल्मों के बाहर की दुनिया में भी उनके बच्चों को भी लोग उनका बच्चा मानने को तैयार नहीं होते थे, अर्थात जैसी छवि हिन्दी फ़िल्मों में प्राण अथवा रंजीत की है कि ये लोग बुरे व्यक्ति ही हैं, ठीक वैसी ही छवि गणपत पाटील की हिजड़े के रूप में तथा निळू फ़ुले की “खराब आदमी” के रूप में मराठी में प्रचलित है।

मराठी नाटकों की समृद्ध परम्परा की बात निकली है तो एक उल्लेख करना चाहूंगा कि मराठी फ़िल्मों के स्टार प्रशांत दामले 1983 से अब तक नाटकों के 8000 "व्यावसायिक" शो कर चुके हैं तथा एक ही दिन में 3 विभिन्न नाटकों के 5 शो हाउसफ़ुल करने के लिये लिम्का बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स में उनका नाम  दर्ज है…।

चलते-चलते :-

उज्जैन में प्रतिवर्ष सरकारी खर्च और प्रचार पर कालिदास समारोह आयोजित किया जाता है, जिसमें संस्कृत और हिन्दी के नाटक खेले जाते हैं, लेकिन सारे तामझाम के बावजूद कई बार 100 दर्शक भी नहीं जुट पाते, जो दर्शक इन हिन्दी नाटकों में पाये जाते हैं, उनमें से कुछ सरकारी अधिकारी होते हैं जिनकी वहां उपस्थिति “ड्यूटी” का एक भाग है, कुछ अखबारों के कथित समीक्षक, तथा कुछ आसपास घूमने वाले अथवा टेण्ट हाउस वाले दिखाई देते हैं। जबकि इसी उज्जैन में जब महाराष्ट्र समाज द्वारा मराठी नाटक मुम्बई अथवा इन्दौर से बुलवाया जाता है, तब बाकायदा “टिकिट लेकर” देखने वाले 500 लोग भी आराम से मिल जाते हैं।

फ़िल्म रिलीज़ के मौके पर मंच पर प्रस्तुत इस फ़िल्म का एक गीत यहाँ देखा जा सकता है…



http://www.youtube.com/watch?v=79xzHDM11eQ

तथा “नटरंग” फ़िल्म का ट्रेलर यहाँ देखा जा सकता है…



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वर्ष का अन्त और नववर्ष की शुरुआत हिम्मत और जीवट से करने के लिये मैंने इस लेख को चुनना तय किया। जैसी हिम्मत और जीवट मिग-21 के पायलट एमपी अनिल कुमार ने दिखाई और दिखा रहे हैं, वैसा जज़्बा और जोश सभी लोग दिखायें… ऐसी आशा करता हूं…





ज़रा कल्पना कीजिये कि आयु के 24वें वर्ष में एक युवक का एक्सीडेण्ट हो जाये और गर्दन के नीचे का पूरा शरीर पक्षाघात से पीड़ित हो जाये तब उसे हिम्मत हारते देर नहीं लगेगी? लेकिन भारत के जाँबाज सैनिक केरल के एमपी अनिल कुमार किसी और ही मिट्टी के बने हैं। जी हाँ, 24 वर्ष की आयु में एक सड़क हादसे में उन्हें गहरी दिमागी चोट लगी और गर्दन के नीचे का शरीर किसी काम का न रहा, लेकिन पिछले 19 वर्ष से वे न सिर्फ़ ज़िन्दगी को ठेंगा दिखाये हुए हैं, बल्कि कम्प्यूटर को अपना साथी बनाकर एक उम्दा लेखक के रूप में भी सफ़ल हुए हैं। विकलांगता पर लिखा हुआ उनका एक लेख महाराष्ट्र के स्कूलों में पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है, जिसमें उन्होंने सभी विकलांगो में जोश भरते हुए अपने बारे में भी लिखा है।



पुणे के खड़की में सैनिक रीहैबिलिटेशन केन्द्र के सबसे पहले कमरे में आप व्हील चेयर पर फ़्लाइंग ऑफ़िसर एमपी अनिल कुमार को देख सकते हैं। उनका कमरा, उनकी व्हीलचेयर, और उनका कम्प्यूटर… यही उनकी दुनिया है, लेकिन इस छोटी सी दुनिया में बैठकर दाँतों में एक लकड़ी की स्टिक पकड़कर वे सामने टंगे की-बोर्ड पर एक-एक करके अक्षर टाइप करते जाते हैं, और उम्दा लेख, बेहतरीन सपने और जीवटता की नई मिसाल रचते जाते हैं। 28 जून 1988 को रात में लौटते समय उनका एक्सीडेण्ट हुआ था, उस दिन के बाद से वे व्हील चेयर पर ही हैं।

1980 में उन्होंने पुणे की नेशनल डिफ़ेंस एकेडमी में दाखिला लिया था। त्रिवेन्द्रम से 35 किमी दूर एक गाँव से वे भारतीय वायु सेना में फ़ाइटर पायलट बनने का सपना लिये आये हुए युवक थे। NDA की तीन वर्ष की कठिन ट्रेनिंग के बाद उनका चयन वायुसेना में एक और बेहद कठिन ट्रेनिंग के लिये हुआ, लेकिन उसे उन्होंने आसानी से हँसते-हँसते पास कर लिया।


अनिल कुमार के सहपाठी याद करते हुए कहते हैं कि “अनिल एक आलराउंडर टाइप के व्यक्ति हैं, लम्बी दौड़ के साथ ही वे एक बेहतरीन जिमनास्ट भी हैं। उन्हें NDA की ट्रेनिंग के दौरान “सिल्वर टॉर्च” का पुरस्कार मिला था, जो कि प्रत्येक नये सैनिक का सपना होता है। हैदराबाद के वायुसेना अड्डे पर उनकी पोस्टिंग हुई, और देखते ही देखते उन्होंने हवाई जहाज उड़ाना, कलाबाजियाँ दिखाना और सटीक बमबारी करना सीख लिया। जवानी के दिनों में उनकी पोस्टिंग एक बार पठानकोट के वायुसेना बेस पर भी हुई, जहाँ उनके सीनियर भी उनसे सलाह लेने में नहीं हिचकते थे। यदि 19 साल पहले वह दुर्घटना न हुई होती तो पता नहीं अनिल कुमार आज कहाँ होते, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और एक सच्चे फ़ायटर की तरह जीवन से युद्ध किया और अब तक तो जीत ही रहे हैं।

उन्होंने अपनी विकलांगता को कैसे स्वीकार किया, कैसे उससे लड़ाई की, कैसे हिम्मत बनाये रखी आदि संस्मरणों को उन्होने एक लेख “एयरबोर्न टू चेयरबोर्न” में लिखा और उसकी लोकप्रियता ने उनके “लेखकीय कैरियर” की शुरुआत कर दी। अपने घर केरल से मीलों दूर पुणे के सैनिक अस्पताल में पहले-पहल उन्होंने दाँतों में पेन पकड़कर लिखना शुरु किया, लेकिन कम्प्यूटर के आने के बाद उन्होंने सामने की-बोर्ड लटकाकर लकड़ी की पतली डंडी से टाइप करना सीख लिया। महाराष्ट्र तथा केरल के अंग्रेजी माध्यम बोर्ड में उनका लिखा हुआ लेख पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया, और इस लेख ने उनके कई-कई युवा मित्र बनवा दिये।

आज की तारीख में खड़की का यह सैनिक पुनर्वास केन्द्र ही उनका स्थायी पता बन चुका है, रोज़ाना सुबह और शाम कुछ घण्टे वे लेखन में बिताते हैं। उनके लेख मुख्यतया सेना, रक्षा मामले और वायुसेना के लड़ाकू विमानों की नई तकनीक पर आधारित होते हैं और उनके अनुभव को देखते हुए ये लेख नये सैनिकों के लिये काफ़ी लाभकारी सिद्ध होते हैं। भले ही वे किसी की मदद के बिना हिलडुल नहीं सकते, लेकिन उनका दिमाग एकदम सजग और चौकन्ना है तथा उनका लेखन भी चाक-चौबन्द। उनका मानना है कि “संकट के बादलों में भी अवसरों की चमक छिपी होती है”, इसलिये कभी भी हिम्मत न हारो, संघर्ष करो, जूझते रहो, सफ़लता अवश्य मिलेगी… “संघर्ष जितना अधिक तीखा और कठिन होगा, उसका फ़ल उतना ही मीठा मिलेगा…”।

जल्द ही उनके लेखों को संकलित करती एक पुस्तक भी प्रकाशित होने वाली है…। नववर्ष की पूर्व संध्या पर तथा आने वाले वर्ष की शुरुआत के लिये इस जाँबाज सैनिक को सेल्यूट करने से अच्छा काम भला और क्या हो सकता है…। आप उनसे सम्पर्क साध सकते हैं… पता है -

M P Anil Kumar
Paraplegic Rehabilitation Centre
Park Road
Khadki
Pune 411020
E-mail: anilmp@gmail.com

मैं मानता हूं कि देश के सामने अनगिनत समस्याएं हैं, महंगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, धर्मान्तरण, साम्प्रदायिकता, जेहादी मानसिकता, गरीबी, अशिक्षा… लेकिन जैसा कि एमपी अनिल कुमार कहते हैं… संघर्ष जितना तीखा होगा, फ़ल उतना ही मीठा होगा… तो हमें भी इस फ़ाइटर पायलट की तरह संघर्ष करना है, हिम्मत नहीं हारना है और जुटे रहना है…
जय हिन्द, जय जवान… आप सभी को अंग्रेजी नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं…
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पिछले कुछ दिनों से आंध्र के पूर्व राज्यपाल एनडी तिवारी ने चहुंओर हंगामा मचा रखा है। इसके पक्ष-विपक्ष में कई लेख और मत पढ़ने को मिले, जिसमें अधिकतर में तिवारी के चरित्र पर ही फ़ोकस रहा, किसी ने इसे तुरन्त मान लिया, कुछ लोग सशंकित हैं, जबकि कुछ लोग मानने को ही तैयार नहीं हैं कि तिवारी ऐसा कर सकते हैं। ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के ब्लॉग पर विश्वनाथ जी ने बड़े मासूम और भोले-भाले से सवाल उठाये, जबकि विनोद जी ने चीरफ़ाड़ में कांग्रेस की फ़ाड़कर रख दी, वहीं एक तरफ़ डॉ रूपचन्द्र शास्त्री जी उन्हें दागी मानने को ही तैयार नहीं हैं। हालांकि कुछ बिन्दु ऐसे हैं जिनका कोई जवाब अभी तक नहीं मिला है, जैसे –

1) यदि नैतिकता के इतने ही पक्षधर थे तो, एनडी तिवारी ने इस्तीफ़ा इतनी देर से और केन्द्र के हस्तक्षेप के बाद क्यों दिया?

2) नैतिकता का दावा मजबूत करने के लिये इस्तीफ़ा “स्वास्थ्य कारणों” से क्यों दिया, नैतिकता के आधार पर देते?

3) जब रोहित शेखर नामक युवक ने पिता होने का आरोप लगाया था, तब नैतिकता की खातिर खुद ही DNA टेस्ट के लिये आगे कर दिया होता, दूध का दूध पानी का पानी हो जाता?

4) पहले भी ऐसे ही “खास मामलों” में राजनैतिक गलियारों में इनका ही नाम क्यों उछलता रहा है, किसी और नेता का क्यों नहीं?


बहरहाल सवाल तो कई हैं, लेकिन ऐसे माहौल में दो महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात छूट गई लगती है, इसलिये उन्हें यहाँ पेश कर रहा हूं…

पहला मुद्दा – क्या अब भी हमें राज्यपाल पद की आवश्यकता है?

पिछले कुछ वर्षों में (जबसे राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें मजबूत हुईं, तब से) यह देखने में आया है कि राज्यों में राज्यपाल केन्द्र के “जासूसी एजेण्ट” और “हितों के रखवाले” के रूप में भेजे जाते हैं। राज्यपाल अधिकतर उन्हीं “घाघ”, “छंटे हुए”, “शातिर” लोगों को ही बनाया जाता है, जिन्होंने “जवानी” के दिनों में कांग्रेस (यानी गाँधी परिवार) की खूब सेवा की हो, और ईनाम के तौर पर उनका बुढ़ापा सुधारने (यहाँ “मजे मारने” पढ़ा जाये) के लिये राज्यपाल बनाकर भेज दिया जाता है। राज्यपालों को कोई काम-धाम नहीं होता है, इधर-उधर फ़ीते काटना, उदघाटन करना, चांसलर होने के नाते प्रदेश के विश्वविद्यालयों में अपनी नाक घुसेड़ना, प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति यदि राज्य के दौरे पर आयें तो उनकी अगवानी करना, विधानसभा सत्र की शुरुआत में राज्य सरकार का ही लिखा हुआ बोरियत भरा भाषण पढ़ना… और सिर्फ़ एक महत्वपूर्ण काम यह कि कौए की तरह यह देखना कि कब राज्य में राजनैतिक संकट खड़ा हो रहा है (या ऐसा कोई संकट खड़ा करने की कोशिश करना), फ़िर पूरे लोकतन्त्र को झूला झुलाते हुए केन्द्र क्या चाहता है उसके अनुसार रिपोर्ट बनाकर देना…। ऐसे कई-कई उदाहरण हम रोमेश भण्डारियों, सिब्ते रजियों, बूटा सिंहों आदि के रूप में देख चुके हैं। तात्पर्य यह कि राज्यपाल नामक “सफ़ेद हाथी” जितना काम करता है उससे कहीं अधिक बोझा राज्य के खजाने (यानी हमारी जेब पर) डाल देता है। जानना चाहता हूं कि क्या राज्यपाल नामक “सफ़ेद हाथी” पालना जरूरी है? एक राजभवन का जितना खर्च होता है, उसमें कम से कम दो राज्य मंत्रालय समाहित किये जा सकते हैं, जो शायद अधिक काम के साबित हों…।

अब आते हैं दूसरे मुद्दे पर…

क्या भारतीय राजनीति में “टेब्लॉयड संस्कृति” का प्रादुर्भाव हो रहा है? यदि हो रहा है तो होना चाहिये अथवा नहीं?

भारत के राजनैतिक और सामाजिक माहौल में अभी ब्रिटेन की “टेब्लॉयड संस्कृति” वाली पत्रकारिता एक नई बात है। जैसा कि सभी जानते हैं, ब्रिटेन के दोपहर में निकलने वाले अद्धे साइज़ के अखबारों को टेब्लॉयड कहा जाता है, जिसमें, किस राजनेता का कहाँ चक्कर चल रहा है, किस राजनेता के किस स्त्री के साथ सम्बन्ध हैं, कौन सा राजनैतिक व्यक्ति कितनी महिलाओं के साथ कहाँ-कहाँ देखा गया, जैसी खबरें ही प्रमुखता से छापी जाती हैं। चूंकि पश्चिमी देशों की संस्कृति(?) में ऐसे सम्बन्धों को लगभग मान्यता प्राप्त है इसलिये लोग भी ऐसे टेब्लॉयडों को पढ़कर चटखारे लेते हैं और भूल जाते हैं।

डॉ शास्त्री, तिवारी जी के प्रति अपनी भक्तिभावना से प्रेरित होकर और विश्वनाथ जी एक सामान्य सभ्य नागरिक की तरह सवाल पूछ रहे हैं, लेकिन सच्चाई कहीं अधिक कटु होती है। जो पत्रकार अथवा जागरूक राजनैतिक कार्यकर्ता सतत इस माहौल के सम्पर्क में रहते हैं, वे जानते हैं कि इन नेताओं के लिये “सर्किट हाउसों”, रेस्ट हाउसों तथा फ़ार्म हाउसों में क्या-क्या और कैसी-कैसी व्यवस्थाएं की जाती रही हैं, की जाती हैं और की जाती रहेंगी… क्योंकि जब सत्ता, धन और शराब तीनों बातें बेखटके, अबाध और असीमित उपलब्ध हो, ऐसे में उस जगह “औरत” उपलब्ध न हो तो आश्चर्य ही होगा। भारतीय मीडिया अभी तक ऐसी खबरों के प्रकाशन अथवा उसे “गढ़ने”(?) में थोड़ा संकोची रहा है, लेकिन यह हिचक धीरे-धीरे टूट रही है… ज़ाहिर है कि इसके पीछे “बदलते समाज” की भी बड़ी भूमिका है, वरना कौन नहीं जानता कि –

1) भारत के एक पूर्व प्रधानमंत्री के कम से कम 3 महिलाओं से खुल्लमखुल्ला सम्बन्ध रहे थे।

2) दक्षिण का एक सन्यासी, जो कि हथियारों का व्यापारी भी था कथित रूप से एक पूर्व प्रधानमंत्री का बेटा कहा जाता है।

3) एक विशेष राज्य के विशेष परिवार के मुख्यमंत्री और उसका बेटे के “घरेलू” सम्बन्ध एक पूर्व प्रधानमंत्री के पूरे परिवार से थे।

4) एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री के लाड़ले बेटे की “चाण्डाल चौकड़ी” ने न जाने कितनी महिलाओं को बरबाद (एक प्रसिद्ध अभिनेत्री की माँ को) किया, जबकि कितनी ही महिलाओं को आबाद कर दिया (उनमें से एक वर्तमान केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में भी है)।

5) मध्यप्रदेश की एक आदिवासी महिला नेत्री का राजनैतिक करियर उठाने में भारत के एक पूर्व प्रधानमंत्री का हाथ है, जिनकी एकमात्र योग्यता सुन्दर होना है।

6) एक प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेता की माँ के भी एक पूर्व प्रधानमंत्री से सम्बन्ध काफ़ी चर्चित हैं।

नेताओं अथवा धर्मगुरुओं के प्रति भावुक होकर सोचने की बजाय हमें तर्कपूर्ण दृष्टि से सोचना चाहिये…। एक और छोटा सा उदाहरण - हाल ही में अपनी हरकतों की वजह से कुख्यात हुए एक “सिन्धी” धर्मगुरु तथा मुम्बई के एक प्रसिद्ध “सिन्धी” बिल्डर के बीच यदि धन के लेन-देन और बेनामी सौदों की ईमानदारी से जाँच कर ली जाये तो कई राज़ खुल जायेंगे… एक और प्रवचनकार द्वारा आयकर छिपाने के मामले खुल रहे हैं।

(तात्पर्य यह शास्त्री जी अथवा विश्वनाथ जी, कि भारतीय राजनीति में ऐसे कई-कई उदाहरण मौजूद हैं, हालांकि ऊपर दिये गये उदाहरणों में मैं नामों का उल्लेख नहीं कर सकता, लेकिन जो लोग राजनैतिक रूप से “जागरूक” हैं, वे जानते हैं कि ये किरदार कौन हैं, और ऐसी बातें अक्सर सच ही होती हैं और बातें भी हवा में से पैदा नहीं होती, कहीं न कहीं धुँआ अवश्य मौजूद होता है) चूंकि अब मामले खुल रहे हैं, समाज छिन्न-भिन्न हो रहा है, विश्वास टूट रहे हैं… तो लोग आश्चर्य कर रहे हैं, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि –

अ) क्या पश्चिमी प्रेस का प्रभाव भारतीय मीडिया पर भी पड़ा है?

ब) जब हम हर बात में पश्चिम की नकल करने पर उतारू हैं तो नेताओं के ऐसे यौनिक स्टिंग ऑपरेशन भी होने चाहिये (अब जनता ने भ्रष्टाचार को तो स्वीकार कर ही लिया है, इसे भी स्वीकार कर लिया जायेगा), धीरे-धीरे ऐसे नेताओं को नंगा करने में क्या बुराई है?

स) भारतीय संस्कृति में ऐसी खबरें हेडलाइन्स के रूप में छपेंगी तो समाज पर क्या “रिएक्शन” होगा?

ऐसे उप-सवालों का मूल सवाल यही है कि “ऐसे स्टिंग ऑपरेशन और नेताओं के चरित्र के सम्बन्ध में मीडिया को सबूत जुटाना चाहिये, खबरें प्रकाशित करना चाहिये, खोजी पत्रकारिता की जानी चाहिये अथवा नहीं?”

मूल बहस से हटते हुए एक महत्वपूर्ण तीसरा और अन्तिम सवाल यहाँ फ़िर उठाना चाहूंगा कि जब ऐसी कई जानकारियाँ मेरे जैसा एक सामान्य ब्लागर सिर्फ़ अपनी आँखे और कान खुले रखकर प्राप्त कर सकता है तो फ़िर पत्रकार क्यों नहीं कर सकते, उन्हें तो अपने मालिक का, कानून का कवच प्राप्त होता है, संसाधन और सम्पर्क हासिल होते हैं, और यदि यही संरक्षण ब्लागरों को भी मिलने लगे तो कैसा रहे?

बहरहाल अधिक लम्बा न खींचते हुए इन दोनों (बल्कि तीनों) मुद्दों पर पाठकों की बेबाक राय जानना चाहूंगा…
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चलते-चलते :- मैं सीरियसली सोच रहा हूं कि तिवारी जी ने इस्तीफ़े में “स्वास्थ्य कारणों” की वजह बताई, वह सही भी हो सकती है, क्योंकि वियाग्रा के ओवरडोज़ से स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो ही जाती हैं… है ना? और तिवारी जी की गलती इतनी बड़ी भी नहीं है, उन्होंने तो कांग्रेस की स्थापना के 125 वर्ष का जश्न थोड़ा जल्दी मनाना शुरु कर दिया था, बस…


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कोई भी कर्मचारी अपनी जान पर खेलकर अपने मालिक के लिये वफ़ादारी और समर्पण से काम क्यों करता है? इसका जवाब है कि उसे यह विश्वास होता है कि उसका मालिक उसके हर सुख-दुख में काम आयेगा तथा उसके परिवार का पूरा ख्याल रखेगा, और संकट की घड़ी में यदि कम्पनी या फ़ैक्ट्री का मालिक उस कर्मचारी से अपने परिवार के एक सदस्य की भाँति पेश आता है तब वह उसका भक्त बन जाता है। फ़िर वह मालिक, मीडिया वालों, राजनीतिबाजों, कार्पोरेट कल्चर वालों की निगाह में कुछ भी हो, उस संस्थान में काम करने वाले कर्मचारी के लिये एक हीरो ही होता है। भूमिका से ही आप समझ गये होंगे कि बात हो रही है रतन टाटा  की।

26/11 को ताज होटल पर हमला हुआ। तीन दिनों तक घमासान युद्ध हुआ, जिसमें बाहर हमारे NSG और पुलिस के जवानों ने बहादुरी दिखाई, जबकि भीतर होटल के कर्मचारियों ने असाधारण धैर्य और बहादुरी का प्रदर्शन किया। 30 नवम्बर को ताज होटल तात्कालिक रूप से अस्थाई बन्द किया गया। इसके बाद रतन टाटा ने क्या-क्या किया, पहले यह देख लें -

1) उस दिन ताज होटल में जितने भी कर्मचारी काम पर थे, चाहे उन्हें काम करते हुए एक दिन ही क्यों न हुआ हो, अस्थाई ठेका कर्मचारी हों या स्थायी कर्मचारी, सभी को रतन टाटा ने "ऑन-ड्यूटी" मानते हुए उसी स्केल के अनुसार वेतन दिया।

2) होटल में जितने भी कर्मचारी मारे गये या घायल हुए, सभी का पूरा इलाज टाटा ने करवाया।

3) होटल के आसपास पाव-भाजी, सब्जी, मछली आदि का ठेला लगाने वाले सभी ठेलाचालकों (जो कि सुरक्षा बलों और आतंकवादियों की गोलाबारी में घायल हुए, अथवा उनके ठेले नष्ट हो गये) को प्रति ठेला 60,000 रुपये का भुगतान रतन टाटा की तरफ़ से किया गया। एक ठेले वाले की छोटी बच्ची भी "क्रास-फ़ायर" में फ़ँसने के दौरान उसे चार गोलियाँ लगीं जिसमें से एक गोली सरकारी अस्पताल में निकाल दी गई, बाकी की नहीं निकलने पर टाटा ने अपने अस्पताल में विशेषज्ञों से ऑपरेशन करके निकलवाईं, जिसका कुल खर्च 4 लाख रुपये आया और यह पैसा उस ठेले वाले से लेने का तो सवाल ही नहीं उठता था।

4) जब तक होटल बन्द रहा, सभी कर्मचारियों का वेतन मनीऑर्डर से उनसे घर पहुँचाने की व्यवस्था की गई।

5) टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस की तरफ़ से एक मनोचिकित्सक ने सभी घायलों के परिवारों से सतत सम्पर्क बनाये रखा और उनका मनोबल बनाये रखा।

6) प्रत्येक घायल कर्मचारी की देखरेख के लिये हरेक को एक-एक उच्च अधिकारी का फ़ोन नम्बर और उपलब्धता दी गई थी, जो कि उसकी किसी भी मदद के लिये किसी भी समय तैयार रहता था।

7) 80 से अधिक मृत अथवा गम्भीर रूप से घायल कर्मचारियों के यहाँ खुद रतन टाटा ने अपनी व्यक्तिगत उपस्थिति दर्ज करवाई, जिसे देखकर परिवार वाले भी भौंचक थे।

8) घायल कर्मचारियों के सभी प्रमुख रिश्तेदारों को बाहर से लाने की व्यवस्था की गई और सभी को होटल प्रेसिडेण्ट में तब तक ठहराया गया, जब तक कि सम्बन्धित कर्मचारी खतरे से बाहर नहीं हो गया।

9) सिर्फ़ 20 दिनों के भीतर सारी कानूनी खानापूर्तियों को निपटाते हुए रतन टाटा ने सभी घायलों के लिये एक ट्रस्ट का निर्माण किया जो आने वाले समय में उनकी आर्थिक देखभाल करेगा।

10) सबसे प्रमुख बात यह कि जिनका टाटा या उनके संस्थान से कोई सम्बन्ध नहीं है, ऐसे रेल्वे कर्मचारियों, पुलिस स्टाफ़, तथा अन्य घायलों को भी रतन टाटा की ओर से 6 माह तक 10,000 रुपये की सहायता दी गई।

11) सभी 46 मृत कर्मचारियों के बच्चों को टाटा के संस्थानों में आजीवन मुफ़्त शिक्षा की जिम्मेदारी भी उठाई है।

12) मरने वाले कर्मचारी को उसके ओहदे के मुताबिक नौकरी-काल के अनुमान से 36 से 85 लाख रुपये तक का भुगतान तुरन्त किया गया। इसके अलावा जिन्हें यह पैसा एकमुश्त नहीं चाहिये था, उन परिवारों और आश्रितों को आजीवन पेंशन दी जायेगी। इसी प्रकार पूरे परिवार का मेडिकल बीमा और खर्च टाटा की तरफ़ से दिया जायेगा। यदि मृत परिवार ने टाटा की कम्पनी से कोई लोन वगैरह लिया था उसे तुरन्त प्रभाव से खत्म माना गया।

हाल ही में ताज होटल समूह के प्रेसिडेंट एचएन श्रीनिवास ने एक इंटरव्यू दिया है, जिसमें उन्होंने उस हमले, हमले के दौरान ताज के कर्मचारियों तथा हमले के बाद ताज होटल तथा रतन टाटा के बारे में विचार व्यक्त किये हैं। इसी इंटरव्यू के मुख्य अंश आपने अभी पढ़े कि रतन टाटा ने क्या-क्या किया, लेकिन संकट के क्षणों में होटल के उन कर्मचारियों ने "अपने होटल" (जी हाँ अपने होटल) के लिये क्या किया इसकी भी एक झलक देखिये -

1) आतंकवादियों ने अगले और पिछले दोनों गेट से प्रवेश किया, और मुख्य द्वार के आसपास RDX बिखेर दिया ताकि जगह आग लग जाये और पर्यटक-सैलानी और होटल की पार्टियों में शामिल लोग भगदड़ करें और उन्हें निशाना बनाया जा सके, इन RDX के टुकड़ों को ताज के कुछ सुरक्षाकर्मियों ने अपनी जान पर खेलकर हटाया अथवा दूर फ़ेंका।

2) उस दिन होटल में कुछ शादियाँ, और मीटिंग्स इत्यादि चल रही थीं, जिसमें से एक बड़े बोहरा परिवार की शादी ग्राउंड फ़्लोर पर चल रही थी। कई बड़ी कम्पनियों के CEO तथा बोर्ड सदस्य विभिन्न बैठकों में शामिल होने आये थे।

3) रात 8.30 बजे जैसे ही आतंकवादियों सम्बन्धी हलचल हुई, होटल के स्टाफ़ ने अपनी त्वरित बुद्धि और कार्यक्षमता से कई हॉल और कान्फ़्रेंस रूम्स के दरवाजे बन्द कर दिये ताकि लोग भागें नहीं तथा बाद में उन्हें चुपके से पिछले दरवाजे से बाहर निकाल दिया, जबकि खुद वहीं डटे रहे।

4) जिस हॉल में हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड की एक महत्वपूर्ण बैठक चल रही थी वहाँ की एक युवा होटल मैनेजमेंट ट्रेनी लड़की ने बिना घबराये दरवाजे मजबूती से बन्द कर दिये तथा इसके बावजूद वह कम से कम तीन बार पानी-जूस-व्हिस्की आदि लेने बाहर गई। वह आसानी से गोलियों की रेंज में आ सकती थी, लेकिन न वह खुद घबराई न ही उसने लोगों में घबराहट फ़ैलने दी। चुपके से एकाध-दो को आतंकवादी हमले के बारे में बताया और मात्र 3 मिनट में सबको किचन के रास्ते पिछले दरवाजे से बाहर निकाल दिया।

5) थॉमस जॉर्ज नामक एक फ़्लोर कैप्टन ने ऊपरी मंजिल से 54 लोगों को फ़ायर-एस्केप से बाहर निकाला, आखिरी व्यक्ति को बाहर निकालते समय गोली लगने से उसकी मौत हो गई।

6) विभिन्न वीडियो फ़ुटेज से ही जाहिर होता है कि कर्मचारियों ने होटल छोड़कर भागने की बजाय सुरक्षाकर्मियों को होटल का नक्शा समझाया, आतंकवादियों के छिपे होने की सम्भावित जगह बताई, बिना डरे सुरक्षाकर्मियों के साथ-साथ रहे।

ऐसे कई-कई असली बहादुरों ने अपनी जान पर खेलकर कई मेहमानों की जान बचाई। इसमें एक बात यह भी महत्वपूर्ण है कि ताज होटल का स्टाफ़ इसे अपनी ड्यूटी समझकर तथा "टाटा" की इज्जत रखने के लिये कर रहा था। 26 नवम्बर को यह घटना हुई और 21 दिसम्बर को सुबह अर्थात एक महीने से भी कम समय में होटल का पूरा स्टाफ़ (मृत और घायलों को छोड़कर) मेहमानों के समक्ष अपनी ड्यूटी पर तत्परता से मुस्तैद था।


जमशेदजी टाटा  ने होटल व्यवसाय में उस समय कदम रखा था जब किसी अंग्रेज ने उनका एक होटल में अपमान कर दिया था और उन्हें बाहर करवा दिया था। उन्होंने भारत में कई संस्थानों की नींव रखी, पनपाया और वटवृक्ष बनाया।  उन्हीं की समृद्ध विरासत को रतन टाटा आगे बढ़ा रहे हैं, जब 26/11 हमले के प्रभावितों को इतनी मदद दी जा रही थी तब एक मीटिंग में HR मैनेजरों ने इस बाबत झिझकते हुए सवाल भी किया था लेकिन रतन टाटा का जवाब था, "क्या हम अपने इन कर्मचारियों के लिये ज्यादा कर रहे हैं?, अरे जब हम ताज होटल को दोबारा बनाने-सजाने-संवारने में करोड़ों रुपये लगा रहे हैं तो हमें उन कर्मचारियों को भी बराबरी और सम्मान से उनका हिस्सा देना चाहिये, जिन्होंने या तो अपनी जान दे दी या "ताज" के मेहमानों और ग्राहकों को सर्वोपरि माना। हो सकता है कि कुछ लोग कहें कि इसमें टाटा ने कौन सा बड़ा काम कर दिया, ये तो उनका फ़र्ज़ था? लेकिन क्या किसी अन्य उद्योगपति ने अरबों-खरबों कमाने के बावजूद इतनी सारी दुर्घटनाओं के बाद भी कभी अपने स्टाफ़ और आम आदमी का इतना खयाल रखा है? इसमें मैनेजमेण्ट गुरुओं के लिये भी सबक छिपा है कि आखिर क्यों किसी संस्थान की "इज्जत" कैसे बढ़ती है, उसके कर्मचारी कम तनख्वाह के बावजूद टाटा को छोड़कर क्यों नहीं जाते? टाटा समूह में काम करना व्यक्तिगत फ़ख्र की बात क्यों समझी जाती है? ऐसे में जब रतन टाटा कहते हैं "We Never Compromise on Ethics" तब सहज ही विश्वास करने को जी चाहता है। एक घटिया विचार करते हुए यदि इस इंटरव्यू को टाटा का "प्रचार अभियान" मान भी लिया जाये, तो अगर इसमें बताई गई बातों का "आधा" भी टाटा ने किया हो तब भी वह वन्दनीय ही है।

अब दूसरा दृश्य देखिये -

26/11 के हमले को एक वर्ष बीत चुका है, मोमबत्ती ब्रिगेड भी एक "रुदाली पर्व" की भाँति अपने-अपने घरों से निकलकर मोमबत्ती जलाकर वापस घर जा चुकी, "मीडियाई गिद्धों" ने 26/11 वाले दिन भी सीधा प्रसारण करके जमकर माल कमाया था, एक साल बाद पुनः "देश के साथ हुए इस बलात्कार" के फ़ुटेज दिखा-दिखाकर दोबारा माल कूट लिया है। इस सारे तमाशे, गंदी राजनीति और "सदा की तरह अकर्मण्य और सुस्त भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था" के बीच एक साल गुज़र गया। महाराष्ट्र सरकार और केन्द्र अपने आधिकारिक जवाब में यह मान चुके हैं कि 475 प्रभावित लोगों में से सिर्फ़ अभी तक सिर्फ़ 118 प्रभावितों को मुआवज़ा मिला है, रेल्वे के कई कर्मचारियों को आज भी प्रशस्ति-पत्र, नकद इनाम, और अनुकम्पा नियुक्ति के लिये भटकना पड़ रहा है। महाराष्ट्र चुनाव में "लोकतन्त्र की जीत"(?) के बाद 15 दिनों तक पूरी बेशर्मी से मलाईदार विभागों को लेकर खींचतान चलती रही, शिवराज पाटिल किसी राज्य में राज्यपाल बनने का इंतज़ार कर रहे हैं, आरआर पाटिल नामक एक अन्य निकम्मा फ़िर से गृहमंत्री बन गया, रेल्वे मंत्रालय कब्जे में लेकर बैठी ममता बैनर्जी के एक सहयोगी का 5 सितारा होटल का बिल लाखों रुपये चुकाया गया है, कसाब नामक "बीमारी" पर अभी तक 32 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, आगे भी पता नहीं कितने साल तक होते रहेंगे (इतने रुपयों में तो सभी घायलों को मुआवज़ा मिल गया होता), केन्द्र के मंत्री चार दिन की "खर्च कटौती नौटंकी" दिखाकर फ़िर से विदेश यात्राओं में मगन हो गये हैं, उधर राहुल बाबा हमारे ही टैक्स के पैसों से पूरे देश भर में यात्राएं कर रहे हैं तथा "नया भारत" बनाने का सपना दिखा रहे हैं… तात्पर्य यह कि सब कुछ हो रहा है, यदि कुछ नहीं हो पाया तो वह ये कि एक साल बीतने के बावजूद मृतकों-घायलों को उचित मुआवज़ा नहीं मिला, ऐसी भ्रष्ट "व्यवस्था" पर लानत भेजने या थूकने के अलावा कोई और विकल्प हो तो बतायें।

जनता का वोट लेकर भी कांग्रेस आम आदमी के प्रति सहानुभूतिपूर्ण नहीं है, जबकि व्यवसायी होते हुए भी टाटा एक सच्चे उद्योगपति हैं "बिजनेसमैन" नहीं। तो क्या यह माना जाये कि रतन टाटा की व्यवस्था केन्द्र सरकार से अधिक चुस्त-दुरुस्त है? यदि हाँ, तो फ़िर इस प्रकार के घटिया लोकतन्त्र और हरामखोर लालफ़ीताशाही को हम क्यों ढो रहे हैं और कब तक ढोते रहेंगे?
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विषयान्तर - संयोग से पिछले वर्ष मेरे भतीजे का चयन कैम्पस इंटरव्यू में एक साथ दो कम्पनियों मारुति सुजुकी और टाटा मोटर्स में हुआ, मुझसे सलाह लेने पर मैंने उस समय निःस्संकोच उसे टाटा मोटर्स में जाने की सलाह दी थी, तब न तो 26/11 का हमला हुआ था, न ही यह इंटरव्यू मैंने पढ़ा था… आज सोचता हूँ तो लगता है कि मेरी सलाह उचित थी, टाटा अवश्य ही उसका खयाल रखेंगे…


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जब झारखण्ड में काले चश्मे वाले राज्यपाल सिब्ते रजी के जरिये काला खेल करवाकर "धर्मनिरपेक्षता" के नाम पर तथा "भाजपा को अछूत बनाकर" सत्ता से दूर रखने का खेल खेला गया था, उसमें "भ्रष्टाचार की माँ" कांग्रेस-राजद और बाकी के लगुए-भगुए किसी धर्मनिरपेक्ष सिद्धान्त के नाम पर एकत्रित नहीं हुए थे… निर्दलीय विधायक को मुख्यमंत्री बनाने पर राजी वे इसलिये नहीं हुए थे कि भाजपा के खिलाफ़ उन्हें लड़ाई लड़ना थी… बल्कि सारे के सारे ठग भारत माँ के सीने में छेद करके खदानों के जरिये होने वाली अरबों-खरबों की कमाई में हिस्सा बटोरने के लिये "गैंग" बनाये हुए थे। जैसे-जैसे मधु कोड़ा की लूट के किस्से उजागर हो रहे हैं, देश का मेहनतकश और निम्न-मध्यमवर्गीय व्यक्ति कुछ अचम्भे से, कुछ निराशा-हताशा से, कुछ गुस्से से और कुछ मजबूरी से इन लुटेरों को मन मसोसकर देख रहा है।

एक समय में मामूली से कंस्ट्रक्शन वर्कर और खदानकर्मी से मुख्यमंत्री बनने और भारतभूमि की अरबों की सम्पत्ति हड़प करने वाले की हरकतों के बारे में लालू और कांग्रेस को पता ही नहीं चला होगा, ऐसा कोई मूर्ख ही सोच सकता है। जबकि जो लोग कोड़ा और कांग्रेस को जानते हैं उन्हें पता था कि ऐसा कोई महाघोटाला कभी न कभी सामने आयेगा।

झारखण्ड से कोयले का अवैध खनन सालाना करीब 8000 करोड़ रुपयों का है, जिसमें लगभग 500 माफ़िया गुट अलग-अलग स्तरों पर जुड़े हुए हैं। कोयला खदानों के अधिकारी और स्थानीय गुण्डे इस रैकेट का एक मामूली पुर्जा मात्र हैं। मनचाहे इलाके में ट्रांसफ़र करवाने के लिये अधिकारियों द्वारा छुटभैये नेताओं से लेकर मुख्यमंत्री तक करोड़ों रुपये की रिश्वत अथवा "अरबों रुपये कमाकर देने की शपथ" का प्रावधान है। इस माफ़िया गैंग की कार्यप्रणाली एकदम सीधी और स्पष्ट है, ऐसी खदानों की पहचान की जाती है जो "बन्द" या समाप्त घोषित की जा चुकी हैं (अथवा मिलीभगत से "बन्द" घोषित करवा दी गई हैं), फ़िर उन्हीं खदानों में से फ़िर से लोहा और अयस्क निकालकर बेच दिया जाता है, और ऐसा दिनदहाड़े किया जाता है, क्योंकि ऊपर से नीचे तक सबका हिस्सा बाँटा जा चुका होता है। बताया जाता है कि सारे खेल में "सेल" (स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड) के उच्चाधिकारी, खान मंत्रालय और झारखण्ड सरकार मिले हुए होते हैं। खदानों से निकली हुई लाल मिट्टी और अयस्क को कच्चे लोहे में परिवर्तित करने वाले हजारों "क्रशर्स" झारखण्ड में यत्र-तत्र देखे जा सकते हैं जिनमें से 95% के मालिक नेता ही हैं, जो फ़र्जी नामों से छोटे-मोटे खदान ठेकेदार आदि बने हुए हैं। इस प्रकार की छोटी-छोटी फ़ैक्टरियाँ ही करोड़ों कमा लेती हैं, जिसे अंग्रेजी में "टिप ऑफ़ आईसबर्ग" कहा जाता है (हिन्दी में इसे "भ्रष्टाचार के महासागर की ऊपरी लहरें" कहा जा सकता है)

http://ibnlive.in.com/news/exclusive-how-exjharkhand-cm-madhu-koda-profited-from-mines/105088-3.html?utm_source=IBNdaily_MCDB_121109&utm_medium=mailer



वैसे तो यह लूट सालों से जारी है, जब कांग्रेस सत्ता में थी तब भी, और जब 15 साल लालू सत्ता में थे तब भी। झारखण्ड के बिहार से अलग होने का सबसे अधिक दुख लालू को यों ही नहीं हुआ था, असल में एक मोटी मुर्गी हाथ से निकल जाने का वह दुख था, ठीक उस प्रकार जैसे मध्यप्रदेश के नेताओं को छत्तीसगढ़ के निकल जाने का दुख हुआ, क्योंकि छत्तीसगढ़ "लूटने" के काम भी आता था और ईमानदार और सख्त अफ़सरों को सजा के बतौर बस्तर/अम्बिकापुर ट्रांसफ़र करने के काम भी आता था। कहने का मतलब ये कि मधु कोड़ा तो हमारी नज़रों में सिर्फ़ इसलिये आये कि उन्होंने कम से कम समय में अधिक से अधिक कमाने का मौका नहीं गंवाया।

आंध्रप्रदेश के "राष्ट्रसन्त" वायएस राजशेखर रेड्डी, अनधिकृत रूप से देश के सबसे अधिक पैसे वाले नेता माने जाते हैं (शरद पवार के समकक्ष)। उन्हीं के नक्शेकदम पर चल रहे हैं उनके बिजनेस पार्टनर कर्नाटक के खनन माफ़िया रेड्डी बन्धु। एक छोटा सा उदाहरण देता हूं… मध्यप्रदेश में एक सड़क ठेकेदार पर खनन विभाग ने 32 लाख रुपये की वसूली का जुर्माना निकाला, ठेकेदार ने सड़क निर्माण करते-करते सड़क के दोनों ओर नाली खुदाई करके उसमें से निकलने वाली मुरम चुपके से अंटी कर ली, जबकि कुछ का उपयोग वहीं सड़क बनाने में कर दिया… अब सोचा जा सकता है कि सिर्फ़ 8 किलोमीटर की सड़क के ठेके में सड़क के दोनों तरफ़ खुदाई करके ही ठेकेदार लाखों की मुरम निकालकर सरकार को चूना लगा सकता है, तो सुदूर जंगलों में धरती से 100-200 फ़ुट नीचे क्या-क्या और कितना खोदा जा रहा होगा और बाले-बाले ही बेचा जा रहा होगा (ठेकेदार पर 32 लाख का जुर्माना भी "ऑफ़िशियल" तौर पर हुआ, हकीकत में उस ठेकेदार ने पता नहीं कितना माल ज़मीन से खोदा होगा, ऊपर कितना पहुँचाया होगा और जुर्माना होने के बाद सरकारी अफ़सरों के घर कितना पहुँचाया होगा, इसका हिसाब आप कभी नहीं लगा सकते)।

असल में आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि खनन के काम में कितनी अनाप-शनाप कमाई है। मधु कोड़ा का भ्रष्टाचार का आँकड़ा, इन तीनों रेड्डियों (एक दिवंगत और दो बाकी) तथा उनके बेटे जगनमोहन के मुकाबले कुछ भी नहीं है। एक मोटे अनुमान के अनुसार चारों रेड्डियों ने इस देश के राजस्व को लगभग 75,000 करोड़ रुपये से अधिक का चूना लगाया है। पिछले दिनों कर्नाटक में जो खेल खेला गया उसके पीछे भी आंध्रप्रदेश के रेड्डी का ही हाथ है, जिसने येद्दियुरप्पा को भी रुलाकर रख दिया। उनका असली खेल यह था कि किसी तरह येदियुरप्पा न मानें और भाजपा में टूट हो जाये फ़िर कांग्रेस के अन्दरूनी-बाहरी समर्थन से सरकार बना ली जाये, ताकि आंध्र-कर्नाटक की सीमा पर स्थित बेल्लारी की खदानों पर सारे रेड्डियों का एकछत्र साम्राज्य स्थापित हो जाये। बेशर्म लालच की इन्तेहा देखिये कि रेड्डियों ने आंध्र-कर्नाटक की सीमा पर स्थित जंगलों में भी बेतहाशा अवैध खनन किया है और अब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें फ़टकार लगाई है। आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री रोसैया को इसका फ़ायदा हुआ है और अब वह सीबीआई और जाँच की धमकी की तलवार के बल पर जगनमोहन रेड्डी को दबोचे हुए हैं।



अब आते हैं नक्सलियों पर, नक्सली विचारधारा और उसके समर्थक हमेशा से यह आरोप लगाते आये हैं कि आदिवासी इलाकों से लौह अयस्क और खनिज पदार्थों की लूट चल रही है, सरकारों द्वारा इन अति-पिछड़े इलाकों का शोषण किया जाता है और खदानों से निकलने वाले बहुमूल्य खनिजों का पूरा मुआवज़ा इन इलाकों को नहीं मिलता आदि-आदि। लेकिन तथाकथित विचारधारा के नाम पर लड़ने वाले इसे रोकने के लिये कुछ नहीं करते, क्योंकि खुद नक्सली भी इन्हीं ठेकेदारों और कम्पनियों से पैसा वसूलते हैं। यहीं आकर इनकी पोल खुल जाती है, क्योंकि कभी यह सुनने में नहीं आता कि नक्सलियों ने किसी भ्रष्ट ठेकेदार अथवा खदान अफ़सर की हत्याएं की हों, अथवा कम्पनियों के दफ़्तरों में आग लगाई हो…। मतलब ये कि खदानों और खनिज पदार्थों की लूट को रोकने का उनका कोई इरादा नहीं है, वे तो चाहते हैं कि उसमें से एक हिस्सा उन्हें मिलता रहे, ताकि उनके हथियार खरीदी और ऐश जारी रहे और यह सब हो रहा है आदिवासियों के भले के नाम पर। नक्सली खुद चाहते हैं कि इन इलाकों से खनन तो होता रहे, लेकिन उनकी मर्जी से… है ना दोगलापन!!! यदि नक्सलियों को वाकई जंगलों, खनिजों और पर्यावरण से प्रेम होता तो उनकी हत्या वाली "हिट लिस्ट" में मधु कोड़ा और राजशेखर रेड्डी तथा बड़ी कम्पनियों के अधिकारी और ठेकेदार होते, न कि पुलिस वाले और गरीब निरपराध आदिवासी।
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विषयान्तर :- ऐसे भ्रष्ट संस्कारों और संस्कृति की जन्मदात्री है कांग्रेस…। इसके जवाब में यह तर्क देना कि भाजपा-बसपा-सपा-शिवसेना-कमीनिस्ट सभी तो भ्रष्ट हैं, नितान्त बोदा और बेकार है, क्योंकि ये भी उसी संस्कृति की पैदाइश हैं। असली सवाल उठता है कि ऐसी "खाओ और खाने दो" की संस्कृति का विकास किसने किया और इसे रोकने के प्रयास सबसे पहले किसे करना चाहिये थे और नहीं किया…। फ़िर भी लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं कांग्रेस से घृणा क्यों करता हूं? (इस विषय पर जल्दी ही एक पोस्ट आयेगी…)

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हम सभी ने अपने-अपने शहरों में सड़कों, गलियों और बस-स्टैण्ड, रेल्वे स्टेशनों आदि कई जगह अनाथ, लेकिन पागल और अर्धविक्षिप्त लोगों को हमेशा देखा है। कभी-कभार दया दिखाये हुए हम उनको कुछ खाने को दे देते हैं, लेकिन मनुष्य के शरीर को भूख तो जीवन भर ही लगती है, सुबह-शाम लगती है, चाहे वह अमीर हो या गरीब, बुद्धिमान हो या अर्धविक्षिप्त। हम कभी भी इस बात पर विचार नहीं करते कि आखिर शहर भर में फ़ैले ऐसे भिखारियों (जो कि हट्टे-कट्टे और भले-चंगे नहीं, बल्कि जिनका मानसिक सन्तुलन खोया हुआ है) को रोज खाना कैसे मिलता होगा? सुबह-शाम वे क्या खाते होंगे? जो "प्रोफ़ेशनल भिखारी" (जी हाँ, प्रोफ़ेशनल) हैं, वे तो घूम-घूम कर माँगकर शाम तक आराम से इतना पैसा एकत्रित कर लेते हैं कि खाने के अलावा दारू भी पी सकें, लेकिन ऐसे अर्ध अथवा पूर्ण विक्षिप्त बेसहारा लोगों के बारे में क्या, जो ठीक से बोल भी नहीं पाते, अथवा एक जगह से दूसरी जगह चलकर जाने में उन्हें बेहद तकलीफ़ होती है, उनका गुज़ारा कैसे होता होगा?




यही सारे प्रश्न मदुराई के एक युवक एन कृष्णन के दिमाग में उठते थे, लेकिन उसने वह कर दिखाया जो कई लोग या तो सोच ही नहीं पाते, अथवा सिर्फ़ सोचकर रह जाते हैं। मदुराई का यह कर्मठ महात्मा, पिछले सात साल से रोज़ाना दिन में तीन बार शहर में घूम-घूमकर ऐसे रोगियों, विक्षिप्तों और बेसहारा लोगों को खाना खिलाता है। मात्र 30 वर्ष की उम्र में "अक्षयपात्र" नामक ट्रस्ट के जरिये वे यह सेवाकार्य चलाते हैं।




अक्षयपात्र ट्रस्ट की रसोई में झांककर जब हम देखते हैं, तो पाते हैं कि चमचमाते हुए करीने से रखे बर्तन, शुद्ध दाल, चावल, सब्जियाँ और मसाले… ऐसा लगता है कि हम किसी 5 सितारा होटल के किचन में हैं, और हो भी क्यों ना, आखिर एन कृष्णन बंगलोर के एक 5 सितारा होटल के "शेफ़" रह चुके हैं (इतने बड़े होटल के शेफ़ की तनख्वाह जानकर क्या करेंगे)। कृष्णन बताते हैं कि आज सुबह उन्होंने दही चावल तथा घर के बने अचार का मेनू तय किया है, जबकि शाम को वे इडली-सांभर बनाने वाले हैं… हम लोग भी तो एक जैसा भोजन नहीं खा सकते, उकता जाते हैं, ऐसे में क्या उन लोगों को भी अलग-अलग और ताज़ा खाना मिलने का हक नहीं है?"। कृष्णन की मदद के लिये दो रसोईये हैं, तीनों मिलकर नाश्ता तथा दोपहर और रात का खाना बनाते हैं, और अपनी गाड़ी लेकर भोजन बाँटते हैं, न सिर्फ़ बाँटते हैं बल्कि कई मनोरोगियों और विकलांगों को अपने हाथ से खिलाते भी हैं।



कृष्णन कहते हैं कि "मैं साधारण भिखारियों, जो कि अपना खयाल रख सकते हैं उन्हें भोजन नहीं करवाता, लेकिन ऐसे बेसहारा जो कि विक्षिप्त अथवा मानसिक रोगी हैं यह हमसे पैसा भी नहीं मांगते, और न ही उन्हें खुद की भूख-प्यास के बारे में कुछ पता होता है, ऐसे लोगों के लिये मैं रोज़ाना भोजन ले जाता हूं"। चौराहों, पार्कों और शहर के विभिन्न ठिकानों पर उनकी मारुति वैन रुकती है तो जो उन्हें नहीं जानते ऐसे लोग उन्हें हैरत से देखते हैं। लेकिन "पेट की भूख और कृष्णन द्वारा दिये गये मानवीय संवेदना के स्पर्श" ने अब मानसिक रोगियों में भी इतनी जागृति ला दी है कि वे सफ़ेद मारुति देखकर समझ जाते हैं कि अब उन्हें खाना मिलने वाला है। कहीं-कहीं किसी व्यक्ति की हालत इतनी खराब होती है कि वह खुद ठीक से नहीं खा सकता, तब कृष्णन उसे अपने हाथों से खिलाते हैं। कृष्णन बताते हैं कि उन्होंने ऐसे कई बेसहारा मानसिक रोगी भी सड़कों पर देखे हैं, जिन्होंने 3-4 दिन से पानी ही नहीं पिया था, क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था पानी कहाँ मिलेगा, और पीने का पानी किससे और कैसे माँगा जाये।

इतना पुण्य का काम करने के बावजूद भोजन करने वाला व्यक्ति, कृष्णन को धन्यवाद तक नहीं देता, क्योंकि उसे पता ही नहीं होता कि कृष्णन उनके लिये क्या कर रहे हैं। सात वर्ष पूर्व की वह घटना आज भी उन्हें याद है जब कृष्णन अपने किसी काम से मदुराई नगर निगम आये थे और बाहर एक पागल व्यक्ति बैठा अपना ही मल खा रहा था, कृष्णन तुरन्त दौड़कर पास की दुकान से दो इडली लेकर आये और उसे दीं… जब उस पागल ने उसे खाया अचानक उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आई… कृष्णन कहते हैं कि "उसी दिन मैंने निश्चय कर लिया कि अब ऐसे लोगों के लिये भोजन की व्यवस्था मुझे ही करना है, उस भूखे पागल के चेहरे पर आई हुई मुस्कुराहट ही मेरा धन्यवाद है, मेरा मेहनताना है…"।



इस सारी प्रक्रिया में कृष्णन को 12,000 रुपये प्रतिदिन का खर्च आता है (भोजन, सब्जियाँ, रसोईयों की तनख्वाह, मारुति वैन का खर्च आदि)। वे कहते हैं कि अभी मेरे पास 22 दिनों के लिये दानदाता मौजूद हैं जो प्रतिमाह किसी एक तारीख के भोजन के लिये 12,000 रुपये रोज भेजते हैं, कुछ रुपया मेरे पास सेविंग है, जिसके ब्याज आदि से किसी तरह मेरा काम 7 साल से लगातार चल रहा है। इन्फ़ोसिस और TVS कम्पनी ने उन्हें 3 एकड़ की ज़मीन दी है, जिस पर वे ऐसे अनाथ लोगों के लिये एक विश्रामगृह बनवाना चाहते हैं। सात साल पहले का एक बिल दिखाते हुए कृष्णन कहते हैं कि "किराने का यह पहला बिल मेरे लिये भावनात्मक महत्व रखता है, आज भी मैं खुद ही सारा अकाउंट्स देखता हूं और दानदाताओं को बिना माँगे ही एक-एक पैसे का हिसाब भेजता हूं। आर्थिक मंदी की वजह से दानदाताओं ने हाथ खींचना शुरु कर दिया है, लेकिन मुझे बाकी के आठ दिनों के लिये भी दानदाता मिल ही जायेंगे, ऐसा विश्वास है"। इलेक्ट्रानिक मीडिया में जबसे उन्हें कवरेज मिला और कुछ पुरस्कार और सम्मान आदि मिले तब से उनकी लोकप्रियता बढ़ गई, और उन्हें अपने काम के लिये रुपये पैसे की व्यवस्था, दान आदि मिलने में आसानी होने लगी है।



ऐसा नहीं कि कृष्णन का एक यही काम है, मदुरै में पुलिस द्वारा जब्त की गई लावारिस लाशों का अन्तिम संस्कार भी वे करते हैं। नगर निगम, सरकारी अस्पताल और पुलिस उन्हें सूचित करते हैं और वे उन लावारिस मुर्दों को बाकायदा नहला-धुलाकर उनका अन्तिम संस्कार करते हैं।

कृष्णन अभी तक अविवाहित हैं, और उनकी यह शर्त है कि जिसे भी मुझसे शादी करना हो, उसे मेरा यह जीवन स्वीकार करना होगा, चाहे किसी भी तरह की समस्याएं आयें। कृष्णन मुस्कराते हुए कहते हैं कि "…भला ऐसी लड़की आसानी से कहाँ मिलेगी, जो देखे कि उसका पति दिन भर दूसरों के लिये खाना बनाता रहे और घूम-घूमकर बाँटता रहे…"। प्रारम्भ में उनके माता-पिता ने भी उनकी इस सेवा योजना का विरोध किया था, लेकिन कृष्णन दृढ़ रहे, और अब वे दोनों इस काम में उनका हाथ बँटाते हैं, इनकी माँ रोज का मेनू तैयार करती है, तथा पिताजी बाकी के छोटे-मोटे काम देखते हैं। पिछले 7 साल में गर्मी-ठण्ड-बारिश कुछ भी हो, आज तक एक दिन भी उन्होंने इस काम में रुकावट नहीं आने दी है। जून 2002 से लेकर अक्टूबर 2008 तक वे आठ लाख लोगों को भोजन करवा चुके थे।

रिश्तेदार, मित्र और जान-पहचान वाले आज भी हैरान हैं कि फ़ाइव स्टार के शेफ़ जैसी आलीशान नौकरी छोड़कर उन्होंने ऐसा क्यों किया, कृष्णन का जवाब होता है… "बस ऐसे ही, एक दिन अन्दर से आवाज़ आई इसलिये…"।

कृष्णन जैसे लोग ही असली महात्मा हैं, जिनके काम को भरपूर प्रचार दिया जाना चाहिये, ताकि "समाज की इन अगरबत्तियों" की सुगन्ध दूर-दूर तक फ़ैले, मानवता में लोगों का विश्वास जागे, तथा यह भावना मजबूत हो कि दुनिया चाहे कितनी भी बुरी बन चुकी हो, अभी भी ऐसा कुछ बाकी है कि जिससे हमें संबल मिलता है।

अधिक जानकारी के लिये log on to: http://www.akshayatrust.org/

समाज के ऐसे ही कुछ अन्य लोगों के बारे मे मेरे निम्न लेख भी पढ़ सकते हैं…

http://desicnn.com/wp/2009/10/09/dedicated-doctor-koelhe-at-gadhchiroli/



http://desicnn.com/wp/2008/07/19/social-service-medical-equipments/


http://desicnn.com/wp/2009/06/29/unnoticed-unsung-heroes-of-india/

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जी हाँ, कोई गलती नहीं, कोई मिसप्रिंट नहीं, आपने शीर्षक में एकदम सही पढ़ा है, महाराष्ट्र के आदिवासी इलाके मेलघाट में पिछले 24 साल से काम कर रहे, डॉ रवीन्द्र कोल्हे की फ़ीस सिर्फ़ 2 रुपये है (पहली बार) और दूसरी बार में 1 रुपया, और निम्न पंक्ति किसी घटिया नेता की झूठी बात नहीं, बल्कि महात्मा गाँधी और विनोबा भावे के "सच्चे अनुयायी" डॉ रवीन्द्र कोल्हे की हैं, जो सभी से रस्किन बांड का यह वाक्य कहते हैं, कि "यदि आप मानव की सच्ची सेवा करना चाहते हैं तो जाईये और सबसे गरीब और सबसे उपेक्षित लोगों के बीच जाकर काम कीजिये…"।



जब रवीन्द्र कोल्हे नामक नौजवान ने एमबीबीएस की पढ़ाई के बाद मेलघाट के अति-पिछड़े इलाके में नौकरी की तब उन्हें अहसास हुआ कि इन आदिवासियों की गहन पीड़ा और आवश्यकताएं अलग हैं, तब उन्होंने वापस जाकर एमडी की डिग्री हासिल की, और पुनः मेलघाट आकर कोरकू आदिवासियों के बीच काम करने लगे। इन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से एमबीबीएस किया, वे शुरु से ही विनोबा भावे के कार्यों और विचारों से बेहद प्रभावित थे। उन्होंने मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के कई जिलों का दौरा किया और पाया कि महाराष्ट्र का गढ़चिरौली इलाका नक्सलवाद, गरीबी और बीमारी से जूझ रहा है तब उन्होंने मेलघाट को ही अपना स्थाई ठिकाना बनाने का फ़ैसला किया। उनकी माँ ने नक्सलवाद के खतरे को देखते हुए उन्हें मनाने की बहुत कोशिश की लेकिन रवीन्द्र कोल्हे ठान चुके थे कि उन्हें आदिवासियों के बीच ही काम करना है। उनका पहनावा और हुलिया देखकर कोई भी नहीं कह सकता कि यह एक MD डॉक्टर हैं। 

अपने पुराने दिनों को याद करते हुए डॉ रवीन्द्र कोल्हे कहते हैं, "उन दिनों इस पूरे इलाके में सिर्फ़ 2 स्वास्थ्य केन्द्र थे, मुझे अपनी क्लिनिक तक पहुँचने के लिये धारणी से बैरागढ़ तक रोजाना 40 किमी पैदल चलना पड़ता था, मुझे इन जंगलों में रोजाना कम से कम एक शेर जरूर दिखाई दे जाता था, हालांकि पिछले 4 साल से मैने यहाँ कोई शेर नहीं देखा…"।

मेलघाट का मतलब होता है, वह जगह जहाँ दो घाटों का मिलन होता है। यह गाँव महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की सीमा पर बसा हुआ है, और पहाड़ियों की गहरी हरियाली को सिर्फ़ एक ही बात भेदती है वह है यहाँ के स्थानीय निवासी कोरकू आदिवासियों का रंगीन पहनावा। विकास के नाम पर इस पूरे इलाके में कुछ भी नहीं है, मीलों तक सड़कें नहीं हैं और गाँव के गाँव आज भी बिजली के बिना अपना गुज़ारा कर रहे हैं। टाइगर रिज़र्व इलाका होने की वजह से यहाँ किसी प्रकार का "इंफ़्रास्ट्रक्चर" बनाया ही नहीं गया है, ये और बात है कि पिछले कई साल से यहाँ एक भी टाइगर नहीं देखा गया है, अलबत्ता केन्द्र और राज्य से बाघ संरक्षण के नाम पर पैसा खूब आ रहा है। जंगलों के अन्दर आदिवासियों के गाँव तक पहुँचने के लिये सिर्फ़ जीप का ही सहारा है, जो ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर चल जाती है। यहाँ के आदिवासी सिर्फ़ पहाड़ी झरनों और छोटी नदियों के सहारे ही छोटी-मोटी खेती करके अपना पेट पालते हैं, क्योंकि न तो यहाँ सिंचाई व्यवस्था है, न ही पम्प, क्योंकि बिजली भी नहीं है। ऐसी जगह पर डॉ रवीन्द्र कोल्हे पिछले 24 साल से अपना काम एक निष्काम कर्मयोगी की तरह कर रहे हैं।

पहली बार जब भी कोई रोगी आता है तब वे उससे सिर्फ़ दो रुपये फ़ीस लेते हैं और अगली बार जब भी वह दोबारा चेक-अप के लिये आता है तब एक रुपया। अपने खुद के खर्चों से उन्होंने एक छोटा क्लिनिक खोल रखा है, और वे वहीं रहते भी हैं जहाँ कोई भी 24 घण्टे उनकी सलाह ले सकता है।




"जब मैं यहाँ आया था, उस समय शिशु मृत्यु दर, प्रति 1000 बच्चों में 200 की थी, लेकिन अब यह घटते-घटते 60 पर आ चुकी है, जबकि केरल में यह सिर्फ़ 8 है और भारत के अन्य ग्रामीण इलाकों में शिशु मृत्यु दर 10-12 है…" वे कहते हैं। इस इलाके में स्वास्थ्य केन्द्रों की बढ़ोतरी और स्वास्थ्य सेवाओं की तरफ़ ध्यान आकर्षित करने के लिये डॉ कोल्हे ने मुम्बई हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की, लेकिन सरकार ने उसका महीनों तक कोई जवाब नहीं दिया (शायद गरीबों का कोई जनहित नहीं होता होगा)। डॉ कोल्हे कहते हैं कि यदि सरकार हमसे बात ही नहीं करना चाहती तब हम क्या कर सकते हैं? हमें तो अपनी समस्याओं का हल खुद ही निकालना है। इलाके के स्वास्थ्य केन्द्रों पर डॉक्टरों की तैनाती ही नहीं होती, ऐसे में शिशु मृत्यु दर अधिक होना स्वाभाविक है। यहाँ पर वर्षा की कमी की वजह से साल के लगभग 8 महीने खेती सम्बन्धी कोई काम नहीं होता, पशुओं की मृत्यु दर भी डॉक्टर न होने की वजह से अधिक है इसलिये दूध की भी कमी रहती है। 1978 से पहले आदिवासी लोग खरगोश, छोटे हिरन आदि का शिकार करके अपना पेट भर लेते थे, लेकिन जब से इसे टाइगर रिज़र्व घोषित किया है, तब से शिकार पर भी प्रतिबन्ध लग गया है। मेलघाट एक बार राष्ट्रीय सुर्खियों में आया था जब यहाँ पर बच्चों की मौत "कुपोषण" से हुई थी, डॉ कोल्हे इसे नकारते हुए कहते हैं कि यह कुपोषण से नहीं बल्कि भूख से हुई मौतें थीं।

जिस "नरेगा" का मीडिया में सबसे अधिक ढोल पीटा जाता है, यहाँ शुरु होकर बन्द भी हो गई। स्थानीय आदिवासी बताते हैं कि धारणी और चिकलधारा तहसील में यह योजना चलाई गई, लेकिन मजदूरों की मेहनत के 3 करोड़ रुपये अभी भी नहीं मिले हैं। सरकार ने एक ही अच्छा काम किया है कि पूरे क्षेत्र में 300 से अधिक सरकारी स्कूल खोले हैं, जिसके कारण इन गरीबों को पढ़ने का मौका मिला है, इसी के साथ बहुत संघर्ष करने के बाद कोरकू भाषा में प्राथमिक स्कूलों में बच्चों की पुस्तकें भी वितरित करवाई हैं जिससे बच्चे जल्दी सीख जाते हैं। डॉ कोल्हे क्लिनिक में आदिवासी युवाओं को सरकार की विभिन्न योजनाओं के बारे में जानकारी भी देते जाते हैं। "मैंने उन्हें अपने हक के लिये लड़ना सिखाया है और कभी भी रिश्वत नहीं लेने-देने की कसम दी है…"। वे ग्रामीणों को सलाह देते हैं कि अब उन्हें सरकारी ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्रों पर जाना चाहिये ताकि सरकारी गतिविधियाँ और बढ़ें, इसी के साथ स्वास्थ्य केन्द्र पर काम करने वाले जूनियर डॉक्टरों और कम्पाउंडरों को उन्होंने कह रखा है कि वे जब चाहें निःसंकोच उनकी डॉक्टरी सलाह ले सकते हैं। धीरे-धीरे इन आदिवासियों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ी है और जब डॉ कोल्हे उनके आसपास ही हैं तब वे आश्वस्त भी रहते हैं। आज इतने साल बाद, जबकि इलाके में थोड़ी बहुत तरक्की हुई है, डॉ कोल्हे की फ़ीस 2 रुपये ही है।

हाल ही में AIMS के डॉक्टरों को तनख्वाह बढ़ाने के लिये मांगें करते, कई राज्यों में चारों तरफ़ डॉक्टरों को हड़ताल करते और निजी डॉक्टरों, नर्सिंग होम्स और 5 सितारा अस्पतालों को मरीजों का खून चूसते देखकर, डॉ कोल्हे का यह समर्पण एक असम्भव सपने सी बात लगती है। लेकिन आज के गंदगी भरे समाज, पैसे के भूखे भ्रष्टाचारी भेड़ियों, महानगर की चकाचौंध में कुत्ते के बिस्किट पर महीने के हजारों रुपये खर्चने वाले और हर साल कार तथा हर महीने मोबाइल बदलने वाले घृणित धनपिपासुओं की चारों ओर फ़ैली सड़ांध के बीच ऐसे लोग ही एक "सुमधुर अगरबत्ती" की तरह जलते हैं और मन में आशा और विश्वास का संचार करते हैं कि "मानवता अभी जिन्दा है…" और हमें संबल मिलता है कि बुराईयाँ कितनी भी हों हमें उनसे अविरत लड़ना है…

दीपावली के अवसर पर डॉ कोल्हे के त्याग और समर्पण के जरिये, सभी स्नेही पाठकों का अभिवादन और दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं… दिल में उम्मीदों के दीप जलायें…

डॉ रवीन्द्र कोल्हे से बैरागढ़ में (07226) 202002, धारणी में (07226) 202829 और उनके मोबाइल पर 0-94231-46181 पर सम्पर्क किया जा सकता है।
(सभी सन्दर्भ - रेडिफ़.कॉम)

"समाज की अगरबत्तियाँ" टाइप का इसी से मिलता-जुलता एक लेख यहाँ भी पढ़ें…
http://desicnn.com/wp/2008/12/30/iit-engineer-farmer-indias-food-crisis/

(विषयांतर - कई ब्लॉगरों द्वारा लगातार अनुरोध किया जा रहा है कि हिन्दी ब्लॉग जगत में छाई सड़ांध को दूर करें और धार्मिक विषयों पर तथा साम्प्रदायिक लेखन न किया जाये… दीप पर्व के पावन अवसर पर माहौल बदलने के लिये यह पोस्ट लिख रहा हूं… मैं भी चाहता हूं कि ऐसी कई पोस्ट लिखूं, लिखी जायें। फ़िर भी इस बात से मैं असहमत हूं और रहूंगा कि गुमराह करने वाली, उन्मादी धार्मिक प्रचार वाली बातों का जवाब ही न दिया जाये… इग्नोर भी एक हद तक ही किया जा सकता है, जब कोई आपके धर्म को, आपके धर्मग्रंथों को, आपके वेदों-पुराणों को दूसरों के मुकाबले श्रेष्ठ बताने लगे, उसके बारे में दुष्प्रचार करे, कुतर्क करे… तब निश्चित रूप से उसका जवाब दिया जाना चाहिये, तरीका अलग-अलग हो सकता है, लेकिन पीछे हटना या भागना शोभा नहीं देता…फ़िलहाल दीपावली के शुभ अवसर पर सभी को अग्रिम बधाईयाँ…और कटुतापूर्ण माहौल को शांत और सुगंधित करने के लिये इसी प्रकार की "अगरबत्ती" वाली पोस्टें लिखें…)

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जैसा कि सभी जानते हैं, "नेस्ले" एक खाद्य पदार्थ बनाने वाली महाकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनी है। बच्चों के दूध पावडर से लेकर, कॉफ़ी, नूडल्स और चॉकलेट तक इस कम्पनी के खाद्य पदार्थों की रेंज इतनी बड़ी है कि, भारत के लाखों बच्चे और बड़े नेस्ले कम्पनी द्वारा बनाये गये किसी न किसी खाद्य पदार्थ को कभी न कभी अवश्य चख चुके होंगे। कई परिवारों में नेस्ले की कॉफ़ी, नूडल्स, बिस्किट तथा बेबी फ़ूड नियमित रूप से उपयोग किये जाते हैं।




हाल ही में नेस्ले कम्पनी ने घोषणा की है कि वह भारत में जारी किए जाने वाले अपने उत्पादों में "जेनेटिकली इंजीनियर्ड" (GE) उप-पदार्थ और मिश्रण (Ingredients) मिलाये जाने के पक्ष में है। उल्लेखनीय है कि गत कई वर्षों से समूची दुनिया में GE या GM (जेनेटिकली मेन्यूफ़ैक्चर्ड) पदार्थों के खिलाफ़ जोरदार मुहिम चलाई जा रही है। जिन लोगों को जानकारी नहीं है उन्हें बताया जाये कि GE फ़ूड क्या होता है। सीधे-सादे शब्दों में कहा जाये तो किसी भी पदार्थ के मूल गुणधर्मों और गुणसूत्रों (Genes) में वैज्ञानिक तकनीकों की मदद से छेड़छाड़ अथवा फ़ेरबदल करके बनाये गये "नये पदार्थ" को ज़ेनेटिकली इंजीनियर्ड कहा जाता है। थोड़े में इसे समझें तो उस पदार्थ के ऑर्गेनिज़्म को जेनेटिक इंजीनियरी द्वारा बदलाव करके उसके गुण बदल दिये जाते हैं, एक तरह से इसे डीएनए में छेड़छाड़ भी कहा जा सकता है (उदाहरण के तौर पर घोड़े और गधी के संगम से बना हुआ "खच्चर")। इस पद्धति से पदार्थ के मूल स्वभाव में परिवर्तन हो जाता है।


ग्रीनपीस तथा अन्य पर्यावरण और स्वास्थ्य सम्बन्धी संगठनों की माँग है कि चूंकि इन पदार्थों के बारे में अब तक कोई ठोस परीक्षण नहीं हुए हैं और इन "अप्राकृतिक" पदार्थों की वजह से मानव जीवन और धरती के पर्यावरण को खतरा है।  कई देशों ने उनके यहाँ "जीएम" खाद्य पदार्थों को प्रतिबंधित किया हुआ है। दिक्कत यह है कि "नेस्ले" जैसी कम्पनी जो कि यूरोप में तो सभी मानकों का पालन करती है और खाद्य पदार्थों की पैकिंग पर सभी कुछ स्पष्ट लिखती है, वह भारत में कानून की आड़ लेकर खुले तौर पर कुछ भी बताने को तैयार नहीं है, यह हठधर्मिता है। एक बार पहले भी कोक और पेप्सी को ज़मीन से अत्यधिक पानी का दोहन करने की वजह से केरल में कोर्ट की फ़टकार सुननी पड़ी है, लेकिन इन कम्पनियों का अभियान और अधिक जोर पकड़ता जा रहा है। विश्व की सबसे बड़ी बीज कम्पनी मोन्सेन्टो और कारगिल ने दुनिया के कई देशों में ज़मीनें खरीदकर उस पर "जीएम" बीजों का गुपचुप परीक्षण करना शुरु कर दिया है। भारत में भी बीटी बैंगन और बीटी कपास के बीजों को खुल्लमखुल्ला बेचा गया तथा मध्यप्रदेश में निमाड़ क्षेत्र के किसान आज भी इन बीटी कपास की वजह से परेशान हैं और कर्ज़ में डूब चुके हैं।


नेस्ले कम्पनी के विपणन प्रबन्धक (एशिया प्रशांत) मिस्टर वास्ज़िक को लिखे अपने पत्र में ग्रीनपीस इंडिया ने कहा है कि चूंकि नेस्ले कम्पनी के करोड़ों ग्राहक भारत में भी रहते हैं, जिसमें बड़ी संख्या मासूम बच्चों की भी है जो आये दिन चॉकलेट और नूडल्स खाते रहते हैं, इसलिये हमें यह जानने का हक है कि क्या नेस्ले कम्पनी भारत में बेचे जाने वाले उत्पादों में जेनेटिकली मोडीफ़ाइड पदार्थ मिलाती है? यदि मिलाती है तो कितने प्रतिशत? और यदि ऐसे पदार्थ नेस्ले उपयोग कर रही है तो क्या पैकेटों पर इस बारे में जानकारी दी जा रही है? एक उपभोक्ता होने के नाते प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार है कि उसे पता हो कि जो वस्तु वह खा रहा है, उसमें क्या-क्या मिला हुआ है। उल्लेखनीय है कि कई वैज्ञानिक शोधों से यह ज्ञात हुआ है कि जीएम खाद्य पदार्थों के कारण मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रतिकूल असर होता है। अब जबकि नेस्ले कम्पनी यूरोपियन यूनियन देशों में हर खाद्य वस्तु में "जीई-फ़्री" की नीति पर चलती है, तब भारत में वह क्यों छिपा रही है? यह भेदभाव क्यों किया जा रहा है, क्या भारत के बच्चे, वैज्ञानिक प्रयोगों में उपयोग किये जाने वाले चूहे अथवा "गिनीपिग" हैं? (गिनीपिग वह प्राणी है, जिस पर वैज्ञानिक प्रयोग किये जाते हैं) जब कई बड़ी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि उनके खाद्य पदार्थों में "जीएम" का मिश्रण नहीं किया जाता, तब नेस्ले को ऐसा घोषित करने में क्या आपत्ति है? जानवरों पर किये गये जीई फ़ूड के प्रयोगों ने सिद्ध किया है कि इसके कारण विभिन्न एलर्जी, किडनी के रोग तथा नपुंसकता में वृद्धि आदि बीमारियाँ होती हैं।


इस सम्बन्ध में ग्रीनपीस इंडिया ने एक "सेफ़ फ़ूड" (सुरक्षित खाद्य पदार्थ) की गाइड जारी की है, जिसमें 16 जाने माने ब्राण्ड्स का समावेश है। इस गाइड में "लाल सूची" और "हरी सूची" है, लाल सूची में शामिल कम्पनियाँ अपने उत्पादों में या तो जीई मिश्रण मिलाती हैं या फ़िर वे यह घोषणा करने में हिचकिचाहट दिखा रही हैं, जबकि हरी सूची में शामिल कम्पनियाँ ईमानदारी से घोषणा कर चुकी हैं कि उनके उत्पादों में किसी प्रकार का "जीएम" मिश्रण शामिल नहीं है। इस सेफ़ फ़ूड गाईड में केन्द्र सरकार द्वारा "जीएम" मिश्रण को आधिकारिक रूप से मिलाने के बारे में अनुमति के बारे में भी बताया गया है। बीटी-बैंगन की तरह ही "जीई" चावल, टमाटर, सरसों और आलू भी केन्द्र सरकार की अनुमति के इन्तज़ार में हैं।

लाल सूची में शामिल हैं, नेस्ले, कैडबरी, केल्लॉग्स, ब्रिटानिया, हिन्दुस्तान यूनिलीवर, एग्रोटेक फ़ूड्स लिमिटेड, फ़ील्डफ़्रेश (भारती ग्रुप), बेम्बिनो एग्रो इंडस्ट्रीज़, सफ़ल आदि, जबकि हरी सूची (सुरक्षित) में एमटीआर, डाबर, हल्दीराम, आईटीसी, पेप्सिको इंडिया, रुचि सोया आदि शामिल हैं। इस सम्बन्ध में अधिक जानकारी सैयद महबूब (syed.mehaboob@greenpeace.org, 09731301983) से ली जा सकती है।

नेस्ले कम्पनी का पिछला रिकॉर्ड भी बहुत साफ़-सुथरा नहीं रहा है, कई बार यह कम्पनी विवादों में फ़ँस चुकी है और 1977 में एक बार तो पूरे अमेरिका की जनता ने इसके सभी उत्पादों का बहिष्कार कर दिया था, बड़ी मुश्किल से इसने वापस अपनी छवि बनाई। नेस्ले का सबसे अधिक विवादास्पद प्रचार अभियान वह था, जिसमें इसने अपने डिब्बाबंद दूध पावडर को माँ के दूध से बेहतर और उसका विकल्प बताया था। इस विज्ञापन की आँधी के प्रभाव में आकर कई पश्चिमी देशों में नवप्रसूताओं ने अपने बच्चों को दूध पावडर देना शुरु कर दिया था, जबकि चिकित्सकीय और वैज्ञानिक दृष्टि से माँ का दूध ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है। एक बार स्विट्ज़रलैण्ड में भी इसकी कॉफ़ी के बीज विवादों में फ़ँस चुके हैं, तब माफ़ी माँगकर इसने अपना पीछा छुड़ाया था। हाल ही में नेस्ले कम्पनी ने यूरोपियन यूनियन में कॉफ़ी के जीएम बीजों पर पेटेंट हासिल किया है (http://www.organicconsumers.org/ge/coffee060417.cfm) जिसका ब्राजील के कॉफ़ी उत्पादकों ने कड़ा विरोध किया है, भारत में भी केरल के कॉफ़ी उत्पादकों पर भविष्य में इसका असर पड़ सकता है।

यदि आप भी जागरूक उपभोक्ता हैं तो नेस्ले कम्पनी के भारत स्थित दफ़्तर में फ़ोन लगाकर इसके उत्पादों में जीएम मिश्रण के बारे में पूछताछ कर सकते हैं, कॉल कीजिये 0124-2389300 को। अब तक 10,000 से अधिक लोग इस बारे में पूछताछ कर चुके हैं, शायद इस प्रकार ही सही, नेस्ले कम्पनी भारत वालों के प्रति अधिक जवाबदेह बने। नेस्ले के एक उपभोक्ता ने फ़ोन पर मैगी के टू मिनट नूडल्स के विज्ञापन को लेकर आपत्ति जताई, और खुला चैलेंज दिया कि कम्पनी दो मिनट में नूडल्स बनाकर दिखाये, ताकि भारत भर में हजारों रुपये के ईंधन की बचत हो सके। एक अन्य ग्राहक ने यह अपील की, कि मैगी के पैकेट पर यह बताया जाये कि दो मिनट में नूडल्स पकाने के लिये फ़्राइंग पैन की लम्बाई-चौड़ाई और गैस की लौ कितनी बड़ी होनी चाहिये, कम से कम इस बारे में ही लिख दें… लेकिन न तो कोई जवाब आना था, न आया…।

बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ धड़ल्ले से भारत की ज़मीन से पानी उलीच रही हैं, कोक और पेप्सी शकर के सबसे बड़े ग्राहक हैं (शकर की कीमतें बढ़ने के पीछे एक कारण यह भी है), चीन से आने वाले दूध पावडर में "मैलामाइन" (एक जहरीला कैंसरकारक पदार्थ) होना साबित हो चुका है, सॉफ़्ट ड्रिंक्स में पेस्टीसाइड भी साबित हो चुका है, एक बार "कुरकुरे" को गरम तवे पर रखकर देखिये, अन्त में प्लास्टिक की गंध और दाग मिलेगा, मतलब ये कि इनके लिये कोई कायदा-कानून नहीं है।

कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसी कोई भी कम्पनी तब तक नहीं सुधरती जब तक कि जनता इसके उत्पादों का बहिष्कार न करने लगे, जब धंधे पर चोट पड़ती है तब ये सारे कानून-कायदे मानने लगती हैं। समस्या यह है कि भारत का उपभोक्ता संगठित होना तो दूर, जागरूक भी नहीं है, और सरकारों को व्यापार के लिये अपनी सभी सीमाएं बगैर सोचे-समझे खोलने से ही फ़ुर्सत नहीं है। इन बड़ी-बड़ी कम्पनियों का तब तक कुछ नहीं बिगड़ेगा, जब तक देश में "बिकाऊ नेता" और "भ्रष्ट अफ़सरशाही" मौजूद है, सिर्फ़ प्रचार पर लाखों डालर खर्च करने वाली कम्पनी, देश के हर नेता को खरीदने की औकात रखती हैं। रही मीडिया की बात, तो उनमें भी अधिकतर बिकाऊ हैं, कुछ जानकर भी अंजान बने रहते हैं, जबकि कुछ के लिये क्रिकेट, फ़िल्मों, सलमान, धोनी, और छिछोरेपन के अलावा कोई खबर ही नहीं है…। जनता ही जागरूक बनकर ऐसे उत्पादों का बहिष्कार करे तो शायद कुछ बात बने…

ग्रीनपीस द्वारा जारी "सेफ़ फ़ूड" गाईड की छोटी कॉपी यहाँ से डाउनलोड करें…
http://www.greenpeace.org/india/assets/binaries/pocket-guide.pdf


ग्रीनपीस द्वारा जारी "सेफ़ फ़ूड" गाईड की पूरी कॉपी यहाँ से डाउनलोड करें…
http://www.greenpeace.org/india/assets/binaries/pocket-guide.pdf

(लेख और चित्र सामग्री स्रोत - ग्रीनपीस इंडिया)

Nestle, Genetically Modified Food, Genetic Engineering, DNA Fingerprinting, Greenpeace Organization, Safe Food Guide Greenpeace, Nestle, Britania, Cadbury, Multinational Companies and Consumer Protection, Consumer Protection Act in India, ग्रीनपीस संगठन, नेस्ले कम्पनी चॉकलेट, नूडल्स, बिस्किट, ज़ेनेटिकली इंजीनियरिंग, जेनेटिक मॉडिफ़ाइड पदार्थ, नेस्ले, कैडबरी, ब्रिटानिया, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा उपभोक्ता कानूनों का उल्लंघन, उपभोक्ता संरक्षण, Blogging, Hindi Blogging, Hindi Blog and Hindi Typing, Hindi Blog History, Help for Hindi Blogging, Hindi Typing on Computers, Hindi Blog and Unicode
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