सैयद अली शाह गिलानी की दो हरकतें – केन्द्र की पिलपिली सरकार को सरेआम चुनौती…… Syed Gilani, Terrorism in Kashmir, Afzal Guru

Written by सोमवार, 26 अप्रैल 2010 12:36
कश्मीर के एक अलगाववादी नेता हैं सैयद अली शाह गिलानी। ये साहब खुलेआम भारत की सरकार को आये दिन गरियाते रहते हैं, भारत का तिरंगा जलाते रहते हैं, कश्मीर में महीने में एक-दो बार आम हड़तालें करवाते हैं, और भी “बहुत कुछ” करते और करवाते रहते हैं।

सैयद अली शाह गिलानी का एक ताज़ा बयान आया है, जिसमें उन्होंने कश्मीर के मुसलमानों से 2011 की 15 मई से शुरु होने वाली भारत की जनगणना में जोर-शोर से भाग लेने की अपील की है। आप सोचेंगे कि… “भई ये तो अच्छी बात है, जनगणना में सहयोग करना तो एक राष्ट्रीय कर्तव्य है…”, लेकिन गिलानी साहब आपकी तरह इतना सीधा भी नहीं सोचते। गिलानी का कहना है कि कश्मीर के कठुआ, गुल, बानी, अखनूर आदि सेक्टरों के मुसलमानों की सही जनगणना से इस इलाके के जनसंख्या संतुलन के सही आँकड़े आयेंगे और तब हम भारत सरकार से “इस पर आगे बात करेंगे…”। गिलानी ने यह भी कहा कि उनकी पार्टी स्थानीय लोगों को जनगणना के दौरान पूछे जाने वाले प्रश्नों का “उचित जवाब देने के लिये शिक्षित भी करेगी…”

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अथवा http://azad-kashmir.com/akhnoor/actively-take-part-in-census-gilani-tells-jk-muslims-rediff/

यह दोनों ही बयान महत्वपूर्ण हैं…, गिलानी की घोषित रूप से भारत-विरोधी पार्टी हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस स्थानीय मुसलमानों को “शिक्षित करेगी” का मतलब है कि “जनगणना के समय प्रश्नों के उत्तर ऐसे दिये जायें कि उसके द्वारा जनगणना के आँकड़ों में हेराफ़ेरी की जा सके और अपने पक्ष में अनुकूल बदलाव दर्शाया जा सके…”, “कैसे यह बताया जा सके कि फ़लाँ-फ़लाँ इलाके की आबादी अब पूरी तरह मुस्लिम-बहुल बन चुकी है, ताकि आज़ाद कश्मीर में उसे मिलाने की माँग करने में सहूलियत हो…” आदि। कश्मीर को पहले ही “धार्मिक आधार” पर लगभग पूरी तरह से “हिन्दू-मुक्त” किया जा चुका है (Religion of Peace के ढेर सारे उदाहरणों में से एक), और अब उसे भारत से अलग करने के लिये “बराक हुसैन ओबामा” भी दबाव बना रहा है (आखिर उसे भी नोबेल शान्ति पुरस्कार के “नमक का हक” अदा करना है भाई…)।

भारत की जनता के टैक्स के टुकड़ों पर पलने वाले, लेकिन फ़िर भी कश्मीर की आज़ादी की रट लगाये रखने वाले इन “पिस्सुओं” का भारत सरकार कुछ नहीं बिगाड़ पाती… उलटे इन्हें दिल्ली में सरकारी मेहमान बनाये रखने में अपनी शान समझती है… क्या कहा, विश्वास नहीं होता? तो इस गिलानी की दूसरी हरकत देखिये…

बीते पखवाड़े अली शाह गिलानी ने “कांग्रेस की कृपा से अब तक जीवित”, तिहाड़ जेल में बन्द संसद पर हमले के देशद्रोही अफ़ज़ल गुरु से “व्यक्तिगत मुलाकात” की। वजह पूछे जाने पर गिलानी ने बताया कि अफ़ज़ल गुरु से वह इसलिये मिले, क्योंकि उन्हें लगता है कि गुरु निर्दोष है… (यानी भारत की सुप्रीम कोर्ट बेवकूफ़ है)। सारे कश्मीरी मुसलमान निर्दोष और मासूम ही होते हैं, यह गिलानी का पक्का विश्वास है, क्योंकि दिल्ली के लाजपतनगर में हुए बम विस्फ़ोटों के लिये दोषी पाये गये कश्मीरी युवकों को “नैतिक समर्थन”(?) देने के लिये उन्होंने तड़ से घाटी में एक और आम हड़ताल भी करवा ली।

गिलानी पिछले कुछ हफ़्ते दिल्ली में “विशिष्ट मेहमान” की तरह दिल्ली में ठहरे (यहाँ रुकने-खाने-पीने का खर्च किसने उठाया, मुझे पता नहीं)। यहाँ गिलानी ने एक तमिल कॉन्फ़्रेंस(?) को संबोधित किया (गिलानी का तमिल कॉन्फ़्रेंस से क्या लेना-देना है, कोई मुझे समझायेगा?), तथा अफ़ज़ल गुरु के बाद तिहाड़ जेल में बन्द अन्य कश्मीरी “गुमराह” युवकों से भेंट की। यह सब हुआ भारत सरकार की नाक के नीचे, क्योंकि इस “पिलपिली” सरकार को कोई भी ऐरा-गैरा जब चाहे धमका सकता है, और सरेआम इज्जत उतार सकता है, और ऐसा ही गिलानी ने किया भी… एक मुलाकात में (दिल्ली में ही, यानी सोनिया-मनमोहन-चिदम्बरम के बंगलों की दस किमी रेंज के भीतर ही) गिलानी ने कहा कि “अफ़ज़ल गुरु को जबरन जेल में ठूंसकर रखा गया है, गुरु ने कश्मीरी युवाओं (यानी सेकुलरों के प्रिय, “भटके हुए”) से अपील की है कि कश्मीर की आज़ादी के लिये मरते दम तक संघर्ष जारी रखें…” (कृपया ध्यान दें – दूसरों को “मरते दम तक” कह रहा है, लेकिन खुद ही विभिन्न राष्ट्रपतियों के सामने बीबी-बच्चे को आगे करके, जान की भीख लगातार माँगे भी जा रहा है…… कैसा “स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी” है भई ये?)। जाते-जाते सैयद गिलानी, यूपीए के बचे-खुचे कपड़े उतारने से भी नहीं चूके और आगे कहा कि “यदि केन्द्र सरकार अफ़ज़ल गुरु को फ़ाँसी देती है तो वह कश्मीर का एक और हीरो बन जायेगा, जिस तरह मकबूल बट बन गया था… कश्मीर का बच्चा-बच्चा अफ़ज़ल गुरु की फ़ाँसी को बर्दाश्त नहीं करेगा और इसके खिलाफ़ उठ खड़ा होगा…भारत को इसकी बड़ी कीमत चुकानी होगी”। (तात्पर्य यह कि जो उखाड़ सकते हो उखाड़ लो…)

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अथवा http://www.dnaindia.com/world/report_geelani-visits-afzal-guru-in-tihar-jail_1372641

सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र सरकार की सरेआम हुई इस “बेइज्जती” पर, किसी भी मंत्री, किसी भी चमचे, किसी भी “सेकुलर” लगुए-भगुए, किसी भी मीडियाई भाण्ड, का कोई “कड़ा” तो क्या, हल्का-पतला बयान भी नहीं आया…।

बयान आता भी कैसे…? अभी तो केन्द्र सरकार, IPL के मैदान में अपनी “गन्दी चड्डियाँ धोने” में व्यस्त है, और “सेकुलरिज़्म” का नारा गुजरात के लिये आरक्षित है। इसी प्रकार “पिंक चड्डी” सिर्फ़ और सिर्फ़ हिन्दुत्ववादियों के लिये ही रिज़र्व है…, बच्चों को अपनी यौन-पिपासा के लिये बर्बाद करने वाले चर्च के “मानसिक बीमार पादरियों” के लिये नहीं और गिलानियों जैसे के लिये तो बिलकुल भी नहीं। ऐसे में यदि असम के पाँच जिलों से लगातार पाकिस्तान के झण्डे फ़हराये जाने की खबरें आ भी रही हों, पश्चिम बंगाल के 17 जिलों में मुस्लिम आबादी 50-55 प्रतिशत से ऊपर हो चुकी हो, केरल में अब्दुल मदनी को सत्ता का खुला संरक्षण प्राप्त हो, तो भी किसे फ़िक्र है? कश्मीर में भी समस्या सिर्फ़ इसलिये है क्योंकि वहाँ मुस्लिम बहुमत है, जबकि लद्दाख और जम्मू क्षेत्रों में स्थिति शान्तिपूर्ण है…। यह बात पहले भी सैकड़ों बार दोहराई जा चुकी है कि जब तक किसी इलाके में "हिन्दू" बहुमत में हैं, वहाँ अलगाववादी विचार पनप नहीं सकता… क्योंकि हिन्दू संस्कृति "सबको साथ लेकर चलने वाली" और "व्यक्ति को धार्मिक या नास्तिक होने की स्वतन्त्रता देने वाली" लोकतांत्रिक संस्कृति है।

नेहरु से सोनिया तक गलतियों पर गलतियाँ करने के बाद, कश्मीर को मानसिक रूप से भारत के साथ मिलाने के लिये अब तो “भागीरथी प्रयास” ही करने होंगे… और इसे भविष्यवाणी न समझें बल्कि चेतावनी समझें, कि आने वाले कुछ वर्षों के भीतर ही असम, पश्चिम बंगाल और केरल में इस कांग्रेसी सेकुलरिज़्म के विष का असर साफ़ दिखाई देने लगेगा…। और जो लोग यह समझते हैं कि यह चेतावनी अतिशयोक्तिपूर्ण है, उन्हें असम के राज्यपाल की सन् 2005 में केन्द्र को भेजी गई रिपोर्ट को देखना चाहिये, उसके बाद 4 साल और बीत चुके हैं तथा अब तो बांग्लादेश से आये हुए मुसलमानों ने ISI के साथ मिलकर स्थानीय आदिवासियों को अल्पसंख्यक बना दिया है, क्योंकि कांग्रेस को सिर्फ़ "वोट-बैंक" और "स्विस-बैंक" से प्यार है, देश से कतई नहीं।


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