Suspicious NGOs Activity, Justice Aftab Alam, Teesta Setalvad, Rajshekhar Reddy and Chopper Scam

Written by मंगलवार, 26 फरवरी 2013 12:05


जस्टिस आफताब आलम, तीस्ता जावेद, “सेमुअल” राजशेखर रेड्डी  और NGOs के आपसी आर्थिक हित-सम्बन्ध,...


मित्रों...
जैसा कि पहले भी कई बार लिखा जा चुका है कि भारत में कई NGOs का एक विशाल नेटवर्क काम कर रहा है, जो भ्रष्टाचार और हिंदुत्व विरोधी कार्यों में लिप्त है. इन NGOs का आपस में एक “नापाक गठबंधन” (Nexus) है, जिसके जरिये ये देश के प्रभावशाली लोगों से संपर्क बनाते हैं तथा अपने देशद्रोही उद्देश्यों के लिए उन लोगों द्वारा प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष काम करवाने में सफल होते हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इन NGOs पर सरकार की कठोर निगरानी नहीं है (या शायद जानबूझकर नहीं रखी जाती). हाल ही में ऐसी दो घटनाक्रम सामने आए हैं जिनसे पता चलता है कि भारत के हितों और हिंदुत्व को चोट पहुँचाने के लिए ऐसे NGOs किस प्रकार मिल-जुलकर काम कर रहे हैं, कैसे इनमे अथाह धन का प्रवाह हो रहा है और ये लोग किस प्रकार “नेटवर्क” बनाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं....

पहला मामला है गुजरात की “कुख्यात” समाजसेविका(?) तीस्ता जावेद सीतलवाड (Teesta Javed Setalvad) से जुड़ा हुआ. फर्जी शपथ-पत्र और नकली गवाहों के मामले में सुप्रीम कोर्ट की लताड़ खा चुकी तथा घोषित रूप से हिन्दू-विरोधी इन मोहतरमा के NGO पर पहले भी कई आरोप लगते रहे हैं. ताज़ा मामला थोड़ा और गंभीर है, क्योंकि इसमें अप्रत्यक्ष रूप से न्यायपालिका की गरिमा और निष्पक्षता का सवाल भी भी जुड़ गया है. 

पहला मामला इस प्रकार है - एक समय पर तीस्ता “जावेद” सीतलवाड के खासुलखास रहे, लेकिन तीस्ता द्वारा पीठ में छुरा घोंपने के बाद उसकी तमाम पोल खोलने वाले रईस खान पठान ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर करते हुए मांग की है कि गुजरात दंगों से सम्बंधित सभी मामलों में हाईकोर्ट के Justice Aftab Alam को बेंच से हटाया जाए. जिस बेंच या अदालत में गुजरात के मामलों की सुनवाई हो रही हो, उससे जस्टिस आफताब आलम को दूर रखा जाए. रईस पठान ने जस्टिस आफताब आलम पर साफ़-साफ़ आरोप लगाते हुए कहा है कि चूँकि जस्टिस आलम की बेटी के “आर्थिक हित-सम्बन्ध” तीस्ता और अन्य कई NGOs से जुड़े हुए हैं, इसलिए जस्टिस आलम की निष्पक्षता पर संदेह उठना स्वाभाविक है. 

रईस पठान ने खुलासा करते हुए बताया है कि जस्टिस आफताब आलम की बेटी शाहरुख आलम एक NGO चलाती है, जिसका नाम है “पटना कलेक्टिव”, इस एनजीओ को नीदरलैंड्स की संस्था HIVOS बड़ी मात्रा में धनराशि अनुदान के रूप में देती है. “संयोग”(?) कुछ ऐसा है कि तीस्ता जावेद के एनजीओ “सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस” (CJP) को भी नीदरलैंड की यही संस्था भारी पैसा देती है. HIVOS तथा नीदरलैंड की एक और संस्था जिसका नाम है “कोस्मोपोलिस इंस्टीट्यूट”, दोनों ने मिलकर 2010 में रिसर्च पेपर प्रकाशित करने की एक श्रृंखला शुरू की थी जिसे नाम दिया गया “Promoting Pluralism Knowledge Programme” (PPKP). इस कार्यक्रम में स्वयं जस्टिस आफताब आलम ने लन्दन में अक्टूबर 2009 में एक पेपर प्रस्तुत किया था जिसका शीर्षक था, “The Idea of Secularism and Supreme Court of India” . 


रईस पठान ने इन कड़ियों को जोड़ते हुए आगे एक और एनजीओ के बारे में लिखित में दिया है, जिसका नाम है “Centre for Study of Culture and Society” (CSCS), बंगलौर. यह एनजीओ ऊपर बताई गई संस्था PPKP के कार्यक्रमों की संयोजक है और जस्टिस आलम द्वारा पेश किए गए पेपर प्रायोजक भी. अब और आगे बढते हैं.... याचिका के अनुसार यह NGO भी नीदरलैंड के HIVOS के साथ संयुक्त उपक्रम में एक वेबसाईट चलाता है, जिसका नाम है Pluralism.in. इस वेब पोर्टल की कोर कमेटी में जस्टिस आलम साहब की बेटी भी शामिल हैं. इस वेबसाईट की सामग्री में गुजरात दंगों के लिए एक विशेष खण्ड बनाया गया है, जिसमें “सेकुलरिज्म” और “गुजरात को नसीहतें” देते हुए लगभग 60 लेख लिखे गए हैं, इनमें से अधिकाँश लेख “सबरंग कम्यूनिकेशन एंड पब्लिशिंग, मुंबई” द्वारा लिखे हैं, जो कि तीस्ता जावेद की ही संस्था है. संयोग देखिये कि जस्टिस आलम की सुपुत्री जुलाई 2008 से मार्च 2010 के बीच बंगलौर के इसी CSCS नाम एनजीओ की “सवैतनिक रिसर्च फेलो” रहीं. इस अवधि के दौरान इन्होंने वेतन के नाम पर चार लाख पैंतालीस हजार रूपए प्राप्त किए, जबकि स्वयं के एनजीओ के लिए ग्यारह लाख अडतालीस हजार रूपए प्राप्त किए. CSCS संस्था ने लिखित में स्वीकार किया है कि यह पैसा उन्होंने नीदरलैंड्स की संस्था HIVOS से विदेशी अनुदान के तहत प्राप्त किया. यहाँ पेंच यह है कि चूँकि शाहरुख की संस्था “पटना कलेक्टिव” भारत सरकार के विदेशी अनुदान क़ानून (FCRA) के तहत रजिस्टर्ड नहीं है, इसलिए “हाथ घुमाकर कान पकड़ा गया” और CSCS ने एक हाथ से पैसा लिया और उसी पैसे को पेपर प्रस्तुतीकरण और अनुदान के रूप में आलम साहब की बेटी के NGO को आगे बढ़ा दिया. 

नीदरलैंड्स की इस संदिग्ध संस्था HIVOS ने तीस्ता जावेद सीतलवाड के एनजीओ सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) को तो सीधे ही अनुदान दिया है, 23 नवंबर 2009 को CJP के अकाउंट में दस हजार यूरो (लगभग 7 लाख रूपए) का भुगतान हुआ है (जिसका हिसाब-किताब यात्रा, पुस्तकें व सेमीनार आयोजित करने जैसे मदों में दर्शाया गया है). इसके अलावा तीस्ता जावेद के वकील मिहिर देसाई को भी नवंबर 2009 में ही एक बार 45,000 व दूसरी बार 75,000 रूपए का भुगतान हुआ है. 

रईस पठान ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि, “न्यायिक प्रक्रिया के सम्मान” और सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा को ध्यान में रखते हुए गुजरात दंगों की सुनवाई से सम्बन्धित सभी मामलों से जस्टिस आफताब आलम को हटाया जाए, ताकि न्याय की निष्पक्षता पर कोई संदेह न रहे. याचिका में कहा गया है कि गुजरात दंगों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने तथा ऐसे कई NGOs जो कि स्वयं कई मामलों में एक पक्ष हैं, उनके सुश्री शाहरुख आलम के साथ आर्थिक हित सम्बन्धों के मद्देनज़र स्वाभाविक रूप से जस्टिस आफताब आलम को स्वयं ही इन सभी सुनवाइयों से अलग हो जाना चाहिए, ताकि न्यायालय का गौरव बना रहे और तमाम शंकाओं का निवारण हो. 

विदेशी अनुदान प्राप्त और भारत सरकार द्वारा कड़ा नियंत्रण नहीं होने की वजह से पिछले कुछ वर्षों में ऐसे ढेरों NGOs पनप गए हैं, जिनका एकमात्र एजेंडा “सिर्फ और सिर्फ गुजरात” ही है. ज्ञातव्य है कि पिछले दिनों शबनम हाशमी के NGOs पर भी उंगलियाँ उठी थीं जिनका समुचित समाधान या जवाब अभी तक नहीं दिया गया है. सवाल यही उठता है कि आखिर ऐसे NGOs पर नकेल क्यों नहीं कसी जाती? इन NGOs के आपसी लेनदेन पर निगाह क्यों नहीं रखी जाती है? 

जस्टिस आफताब आलम कितने "साम्प्रदायिक" मानसिकता के हैं, इस बारे में उन्हीं के साथ काम करने वाले जज जस्टिस सोनी ने सुप्रीम कोर्ट में पत्र लिखकर विस्तार से आफताब आलम की शिकायत की थी... जिसका लिंक इस प्रकार है... 

http://www.scribd.com/doc/101311814/Keep-Communal-Mindset-Justice-Aftab-Alam-Away-From-Gujarat-Cases-Justice-Soni-to-Chief-Justice-of-India#download


दूसरा मामला और भी मजेदार है... यहाँ पर एक ईसाई NGO की कड़ी ताजातरीन हेलीकाप्टर घोटाले से जुड़ने जा रही है... 

संदिग्ध गतिविधियों वाले NGOs की फेहरिस्त में एक नया नाम जुड़ने जा रहा है, जिसका नाम है “आर्बोर चैरिटेबल फाउन्डेशन” का. यह ईसाई संस्था आंध्रप्रदेश के खम्मम जिले में कार्यरत है. भारत में इस फाउन्डेशन के कर्ता-धर्ता रहे कार्लोस गेरोसा, जो कि हाल ही में उजागर हुए औगास्ता-वेस्टलैंड हेलीकाप्टर घोटाले के आरोपियों में से एक है. जैसा कि सभी जानते हैं आंध्रप्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री “सैमुअल” राजशेखर रेड्डी ईसाई संस्थाओं के पक्के समर्थक थे, जबकि उनके दामाद अनिल कुमार तो घोषित रूप से एक “एवेंजेलिस्ट” (ईसाई धर्म-प्रचारक) हैं ही. आर्बोर चैरिटेबल फाउन्डेशन का रजिस्ट्रेशन दिसंबर 2007 में सैमुअल रेड्डी के कार्यकाल में ही हुआ. रजिस्ट्रेशन के वक्त बताया गया कि यह NGO जल प्रबंधन, बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा इत्यादि क्षेत्रों में कार्य करेगा (रजिस्ट्रेशन के वक्त अक्सर ऐसी ही लफ्फाजियाँ हांकी जाती हैं, जबकि “वास्तविक काम” कुछ और ही करना होता है). 

सैमुअल रेड्डी के कार्यकाल में यह एनजीओ खूब फला-फूला. मजे की बात देखिए, कि दिसंबर 2007 में इस एनजीओ के रजिस्ट्रेशन के तत्काल बाद ही सेमुअल राजशेखर रेड्डी ने इस संस्था को 2000 एकड़ की जमीन आवंटित कर दी. मार्च 2008 में जैसे ही कार्लोस गेरोसा, खम्मम जिले में इस एनजीओ के भारत प्रमुख बने, उसके सिर्फ दो माह के अंदर ही “सेमुअल” रेड्डी आन्ध्र सरकार ने इटली की अगस्ता वेस्टलैंड कम्पनी को 63 करोड़ रुपये में एक हेलीकाप्टर खरीदने का ऑर्डर दे दिया, जबकि आँध्रप्रदेश सरकार के पास पहले से ही Bell-430 कम्पनी का एक हेलीकाप्टर था जो कि जून 1999 में खरीदा गया था, परन्तु आर्बोर फाउन्डेशन की गतिविधियों में कार्लोस गेरोसा के शामिल होते ही यह हेलीकाप्टर खरीदा गया.


सितम्बर 2009 में सेमुअल रेड्डी की हेलीकाप्टर दुर्घटना में मौत के बाद कार्लोस गेरोसा तत्काल इटली वापस चला गया. सेमुअल रेड्डी का दामाद जिसका नाम “ब्रदर अनिल कुमार” है, उसने इस आर्बोर फाउन्डेशन के प्रचार-प्रसार और इसकी आड़ में धर्मांतरण का खेल आगे बढ़ाया. तेलोगू देसम पार्टी के सांसद द्वय नामा नागेश्वर राव और सीएम रमेश ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा है कि “हमारे पास इस बात के कई सबूत हैं जिनसे अनिल कुमार और राजशेखर रेड्डी के साथ आर्बोर फाउन्डेशन तथा हेलीकाप्टर घोटाले से उनके सम्बन्ध स्थापित होते हैं, समय आने पर हम वह CBI को देंगे”.

संक्षेप में तात्पर्य यह है कि देशद्रोही, भ्रष्टाचारी और हिन्दू-विरोधी NGOs का मकडजाल इस देश में गहरे तक फ़ैल चुका है, इन संस्थाओं को विदेशी मिशनरियों से बड़ी मात्रा में पैसा मिलता है, जिसका उपयोग कागजों पर तो अस्पताल, बच्चों की शिक्षा, जल प्रबंधन इत्यादि में होता है, लेकिन वास्तव में इस पैसे का बड़ा हिस्सा इन NGOs के “असली कामों” यानी धर्मांतरण करना, जेहादियों को अप्रत्यक्ष आर्थिक मदद करना, भारत-विरोधी विचार समूहों को बढ़ावा देना, सेमीनार-कान्क्लेव इत्यादि के नाम पर देश के प्रभावशाली लोगों को “उपकृत”(?) करना इत्यादि. यह “खेल” अब बहुत आगे बढ़ चुका है, यदि समय रहते ऐसे NGOs पर नकेल नहीं कसी गई, तो आने वाले दिनों में हालात और भी मुश्किल होने वाले हैं...

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Super User

 

I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

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