Secular and Sanatan Haveli

Written by शनिवार, 03 जनवरी 2015 12:26
जर्जर होती सनातन "हवेली"


गाँव में एक बहुत बड़ी हवेली थी , या यूं कहें हवेली बसी उसके बाद ही पूरा गाँव बसा , हवेली के दूरदृष्टा पूर्वजों ने पूरे गाँव में महान परम्पराएँ बसाई , भाषाएँ विकसित की , इंसानों जैसा जीना सिखाया , वैज्ञानिक सोच दी , पर जैसे हर गाँव में होता है , दो चार घर काले धंधे कर बढे हो गए , मंजिलें चढ़ गयीं , मोटर साइकल आई , ट्रेक्टर आया , फ़ोन आ गया , पर पैसे से कभी अकल आते देखि है ? वो वहीँ की वहीँ रही, सोच वही दकियानूसी कबीलाई , हवेली अब इन "नवधनाढ्यों" को आँखों में चुभने लगी , "जब तक ये हवेली रहेगी तब तक गाँव हमारा इतिहास याद रखेगा " , ऐसी भावना घर करने लगी , गाँव में वर्चस्व स्थापित करने का एक ही रास्ता है , हवेली को ख़त्म करो , बर्बाद करो !!




अब साजिशें शुरू हुईं , बच्चों के खेलने के नाम पर पहले हवेली की बाउंड्री वाल तोड़ी गयी , हवेली में थोड़ी बहस हुई तो बड़ों ने कहा "हम इतने दकियानूस हो गए हैं की बच्चों को खेलने की जगह भी ना दे सकें ? जब बाउंड्री वॉल टूट गयी तो आहिस्ता से मनचलों ने हवेली का पिछला चबूतरा जुआ खेलने का अड्डा बना लिया , बहस हुई तो निष्कर्ष ये निकला की  " हमारे बच्चों के संस्कार क्या इतने कमज़ोर हैं की जुए खेलते देख बिगड़ जाएँ , बाहर जो करता है करने दो , अपना ध्यान खुद  रखो " , हवेली का एक कमरा जो बरसों पहले परदादा ने एक असहाय की मदद के लिए किराये से दिया था उसपर उसके एहसान फरामोश बच्चों ने कब्ज़ा कर लिया, घर में खूब कलह हुई तो बाबूजी ने शांति और अहिंसा का सन्देश देकर चुप करा दिया , कहा "एक कमरे के जाने से हवेली बर्बाद नहीं हो जाएगी" !! हवेली के बुजुर्गों में एक अजीब सा नशा था हवेली के रुद्बे को लेकर , उसके इतिहास को लेकर , अपने पुरखों की जंग लगी बन्दूक रोज़ देखते पर अपने बच्चों को कभी उसे छूने ना देते , हम बहुत महान थे पर क्यों थे और आगे कैसे बने रह सकते हैं ये कभी नहीं बताते , शायद उन्हें ही ना पता हो , इधर चौराहे पर हवेली की हंसी उड़ती , चुटकुले सुनाये जाते , इन्ही बुजुर्गों की खिल्ली उड़ाई जाती !! यही क्रम चलता रहा और हवेली चारों और से बर्बाद होती रही !!


आज हालत ये है की हवेली की चारों दीवारों पर आजकल पूरा गाँव पेशाब करता है , दीवार गाँव की पेशाब से सिलसिलकर "ऐतिहासिक" हो गयी है , अमोनिया की "सहिष्णुता" से भरी खुशबु पूरी हवेली को सुगन्धित कर रही हैं पर घर के बड़े बूढ़े मानने को तैयार नहीं है , बार बार किसी मानसिक विक्षिप्त की तरह "सनातन हवेली" "सनातन हवेली" जैसा शब्द रटते रहते हैं , कहते हैं कुछ नहीं बिगड़ेगा , अजीबोगरीब बहाने ढूंढ लियें हैं अपनी कायरता को छुपाने के , कह रहे हैं अमोनिया की खुशबु सूंघने से बाल काले रहेंगे , ये तो हमारे भले के लिए ही है !! कल वहीँ असलम मियां अपनी कलात्मकता का प्रदर्शन करते हुए जलेबिनुमा पेशाब कर रहे थे तो हवेली के बच्चे ने पत्थर फेंक दिया , असलम मियां ने बाबूजी से शिकायत की और उस बच्चे के कट्टरपंथी हो जाने का खतरा बताया , तब से बाबूजी ने बड़े भैया को दीवार के पास ही तैनात कर दिया है ताकि कोई पेशाब करे तो उसे कोई रोके टोके ना , बेइज्जती ना हो ,  उसके लोकतान्त्रिक अधिकारों का हनन ना हो !! 

किसी को पान की पीक करते , किसी को पेशाब करते , किसी को मैदान में तम्बू गाड़ते , किसी को पीछे की शीशम की खिड़की उखाड़ते बच्चे रोज़ देखते हैं , हवेली रोज़ बिक रही है , खुद रही हैं , नेस्तनाबूत हो रही है , आँखों से खून आता है , मुट्टीयाँ भींच कर चुप रहना पड़ता है , सहिष्णु बाबूजी हैं , कायर भाई हैं , सेक्युलर भाभियाँ हैं , हवेली महान है , हवेली सनातन है !! 

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(झकझोरने वाला यह शानदार लेख फेसबुक पर लिखा है श्री गौरव शर्मा जी ने... मैंने यहाँ साभार ग्रहण किया है... उनके प्रोफाईल पर जाकर कुछ ऐसे ही अन्य "आँखें खोलने वाले" लेखों का आनंद भी उठाएँ... लिंक यह है... https://www.facebook.com/gaurav.bindasbol?fref=ufi )
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Super User

 

I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

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