कागज़ बचाओ, पर्यावरण बचाओ...

Written by गुरुवार, 15 फरवरी 2007 12:41

कागज : एक राष्ट्रीय सम्पत्ति

 

सन २००४ के आम चुनाव भारत के लिये बेहद महत्वपूर्ण साबित हुए हैं, राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं बल्कि पर्यावरणीय दृष्टिकोण से, क्योंकि विश्व के इन सबसे बडे चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (Electronic Voting Machines) का देशव्यापी उपयोग किया गया, जिसके कारण लाखों टन कागज की बचत हुई । जाहिर है लाखों टन कागज की बचत अर्थात लाखों पेड़ कटने से बच गये, पर्यावरण (Environment) की नजर से यह एक असाधारण उपलब्धि मानी जा सकती है।

हम सभी जानते हैं कि कागज बनाने का सीधा सम्बन्ध वनों की कटाई से होता है, और कागज का दुरुपयोग, मतलब हमारे और खराब होते हुए पर्यावरण को एक और धक्का । हमारे दैनिक जीवन में, रोजमर्रा के कामकाज में, ऑफ़िसों (Offices) में, कॉलेजों (Colleges), न्यायालयों (Courts), तात्पर्य यह कि लगभग सभी क्षेत्रों में कागज का सतत उपयोग होता रहता है, होता रहेगा, क्योंकि वह जरूरी भी है । लेकिन यहाँ बात हो रही है कागज के बेरहम दुरुपयोग की । क्या कभी किसी ने इस ओर ध्यान दिया है कि हम कागज का कितना दुरुपयोग करते हैं ? कई बार तो ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ लोगों को कागज मुफ़्त में मिल रहा है, या भारत में कागज की अधिकता हो गई है । कुछ उदाहरणों से इस विकराल समस्या को समझने और उसका निराकरण करने में सहायता मिलेगी ।

सबसे पहले बात न्यायालयों की, न्यायालयों में परम्परा के तौर पर "लीगल" कागज का उपयोग होता है । इस कागज का नाम "लीगल" पडा़ ही इसीलिये कि यह न्यायिक प्रक्रिया में उपयोग होने वाला कागज है । अनजान लोगों के लिये यह बताना जरूरी है कि "लीगल" कागज, एक सामान्य "ए४" कागज से थोड़ा सा लम्बा (दो सेमी अधिक) होता है । प्रायः देखा गया है कि लम्बी-लम्बी कानूनी प्रक्रिया के दौरान, हजारों, लाखों रुपये के कागज लग जाते हैं, जो कि गवाही, सबूत, शपथपत्र आदि तमाम न्यायिक गतिविधि को देखते हुए सामान्य और स्वाभाविक है, परन्तु क्या ऐसा नहीं किया जा सकता कि कोर्ट का सारा काम "लीगल" पेपर के बजाय, "ए४" कागज पर हो, जबकि ऐसा बगैर किसी परेशानी के किया जा सकता है । कल्पना ही की जा सकती है कि लाखों-करोड़ों कागज यदि दो-दो से.मी. कम हो जायेंगे तो कितने टन कागज की बचत होगी । कोई भी माननीय न्यायाधीश अपनी ओर से पहल करके अपने वकीलों से कह सकता है कि मेरे द्वारा सुनवाई किये जाने वाले कागज "लीगल" नहीं बल्कि "ए४" होंगे, तो अपने-आप धीरे-धीरे सभी लोग इसे अपना लेंगे, और कागज की लम्बाई कम हो जाने से कानून पर कोई फ़र्क नहीं पडे़गा, कानून तो अपना काम आगे भी करता रहेगा । तमाम स्टाम्प पेपर, ग्रीन पेपर, शपथ-पत्र, करारनामे आदि "लीगल" पेपर पर ही क्यों, और कोढ़ मे खाज यह कि अधिकतर कागज (रजिस्ट्री वगैरह छोड़कर) पीछे तरफ़ से कोरे होते हैं, अर्थात उस कीमती कागज की एक बाजू तो बेकार ही छोड़ दी जाती है । ऐसा क्यों ? क्या कागज के दोनों तरफ़ टाईप करने या फ़ोटोकॉपी करने से कानूनी दलील कमजोर हो जायेगी ? या किसी धारा का उल्लंघन हो जायेगा ? फ़िर यह राष्ट्रीय अपव्यय क्यों ? उच्चतम न्यायालय इस बात की व्यवस्था कर सकते हैं कि जो भी न्यायालयीन कागज एक तरफ़ से कोरा हो उस पर अगला पृष्ठ लगातार टाईप किया जाये, जरा सोचिये हमारी अदालतों मे लाखों केस लम्बित हैं उनमें कितना कागज बेकार गया होगा और इस विधि से भविष्य में हम कितना कागज बचा सकते हैं ।

ठीक इसी प्रकार का मामला अकादमिक क्षेत्रों में कागज के दुरुपयोग का है । भारत के तमाम विश्वविद्यालयों, संस्थानों, शोध प्रतिष्ठानों, महविद्यालयों आदि में पीएच.डी., एम.फ़िल., एम.एससी., लघु शोध प्रबन्ध आदि ऐसे हजारों अकादमिक कार्य चलते रहते हैं जिसमें छात्र को अपनी रिपोर्ट या थेसिस या संक्षेपिका जमा करानी होती है वह भी एक नहीं चार-पाँच बल्कि सात-सात प्रतियों में (वह शोध कितना उपयोगी होता है, यह बहस का एक अलग विषय है)... मेरा सुझाव है कि सभी रिपोर्टों और थेसिस (Reports and Thesis) को कागज के दोनों ओर टाईप किया जाये, जाहिर है कि उनकी फ़ोटोकॉपी भी वैसी ही की जायेगी । अमूमन एक पीएच.डी. थेसिस कम से कम दो सौ पृष्ठों की तो होती ही है, उसकी सात प्रतियाँ अर्थात चौदह सौ कागज, यदि यही थेसिस दोनों ओर टाईप की जाये तो हम सीधे-सीधे सात सौ कागज एक थेसिस पर बचा लेते हैं... कल्पना करें कि देश भर में चल रहे सभी थेसिस एवं रिपोर्टों को कागज के दोनो ओर टाईप करने से कितना कागज बचेगा (मतलब कितने पेड़ बचेंगे) । थेसिस को एक ही तरफ़ प्रिन्ट करने की शाही और अंग्रेजी प्रथा / परम्परा को तत्काल बन्द किया जाना चाहिये, क्योंकि अन्ततः मतलब तो उस थेसिस के निष्कर्षों से है, यदि शोध कार्य उत्कृष्ट है तो फ़िर इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वह कागज के एक ओर है या दोनों ओर । साथ ही यदि शोध कार्य घटिया है तो वह कितने भी चिकने और उम्दा कागज पर प्रिन्ट किया गया हो, घटिया ही रहेगा । सभी बडे़ विश्वविद्यालयों के कुलपति, कुलसचिव मिलबैठ कर तय कर लें कि सभी थेसिस एवं रिपोर्ट कागज के दोनों ओर टाईप की जायेंगी और स्वीकार की जायेंगी । उनका यह कार्य राष्ट्रीय कर्तव्य के रूप में याद किया जायेगा ।

देश में भयानक बेरोजगारी है, यह एक स्थापित तथ्य है, नौकरी के एक-एक पद के लिये सैकड़ों आवेदन दिये जाते हैं, जो कि समस्या को देखते हुए स्वाभाविक भी है, परन्तु कागज के अपव्यय का यह भी एक विडम्बनापूर्ण उदाहरण है, - एक समाचार पत्र में किसी पद का विज्ञापन प्रकाशित होता है, युवक अपनी सारी डिग्रियों की फ़ोटोकॉपी प्रत्येक आवेदन के साथ लगाते हैं (हाईस्कूल से लेकर पीएच.डी. और नेट/स्लेट तक की) ऐसा वह प्रत्येक आवेदन के साथ करता है, अर्थात कागज के अनावश्यक दुरुपयोग के साथ ही बेरोजगार पर फ़ोटोकॉपी के ढेर का आर्थिक बोझ भी । मेरा सुझाव है कि सरकारें (केन्द्र और राज्य) प्रत्येक जिले, तहसील, गाँव में सक्षम प्राधिकारी को अधिकृत करें, जो कि बेरोजगारों के सभी मूल प्रमाणपत्रों को एक बार देखकर, उनकी जाँच करके एक "कार्ड" जारी करें, जिसमें उस युवक की तमाम उपाधियों का उल्लेख हो, जिस प्रकार परिवहन विभाग सारे कागज जाँच कर "यलो कार्ड" जारी करता है, उसी तर्ज पर । युवक आवेदन पत्र के साथ सिर्फ़ वह कार्ड या उसकी छायाप्रति लगाये, जब उसका चयन इंटरव्यू के लिये हो जाये तभी वह नियोक्ता के समक्ष अपने मूल प्रमाणपत्रों के साथ हाजिर हो जाये । आवेदक वैसे भी अपनी सभी शैक्षणिक गतिविधियों का उल्लेख अपने बायो-डाटा में तो करता ही है, फ़िर सभी की फ़ोटोकॉपी लगाने की क्या आवश्यकता है ? क्योंकि एक पद के लिये चार-पाँच सौ आवेदन आना तो मामूली बात है, उनमें से चार-पाँच उम्मीदवार जो कि इंटरव्यू के लिये चुने जाने हैं, के अलावा बाकी के सारे कागज तो रद्दी की टोकरी में ही जाने हैं, यह कागज का भीषण अपव्यय तो है ही, बेरोजगारों के साथ अमानवीयता भी है ।

कम्प्यूटरीकरण के पश्चात अलबत्ता कागजों के उपयोग में कमी आई है, लेकिन उसे उल्लेखनीय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि बैंकों में भी कम्प्यूटरीकरण के बावजूद सभी रिकॉर्ड के प्रिन्ट आऊट कागजों पर भी लेने की परम्परा (सुरक्षा की दृष्टि से) जारी है, फ़िर क्या विशेष फ़ायदा हुआ ? रोज शाम को दिन भर के "ट्रांजेक्शन" का प्रिन्ट आऊट लो, उसे सम्भालकर रखो, उसका बैक-अप कैसेट भी बनाओ फ़िर और सुरक्षा के लिये उसकी एक कॉपी भी रखो... यह सब क्या है ? क्या तकनीक बढने से कागज के उपभोग में कमी आई है ? जर्मनी में बडे़ से बड़ा अफ़सर भी कागज की छोटी-छोटी पर्चियों पर अपना सन्देश लिखकर देते हैं । हमारे यहाँ चार पंक्ति की मामूली सी "नोटशीट" के लिये पूरा का पूरा "ए४" कागजक्यों लिया जाये ? लेकिन क्या सरकारी कर्मचारी (दामाद) और क्या प्राईवेट सभी जगह क्लर्क हों या अफ़सर "माले-मुफ़्त दिल-ए-बेरहम" की तर्ज पर कागज का दुरुपयोग करते फ़िरते हैं, क्या यह राष्ट्रीय अपराध की श्रेणी में नहीं आता ?

इसीलिये अब समय आ गया है कि हम कागज को भी "राष्ट्रीय सम्पत्ति" घोषित कर दें, और उसके सही इस्तेमाल हेतु एक जनजागरण अभियान चलाया जाये । लोगों को शिक्षित किया जाये कि किस तरह से कम से कम कागज में अपना काम निकाला जाये, इसके लिये सरकार के साथ सामाजिक संगठनों, प्रिन्ट मीडिया और महत्वपूर्ण व्यक्तियों को आगे आकर उदाहरण पेश करना होगा ।

"अलबत्ता प्रेमियों को इसमें छूट मिलना चाहिये, क्योंकि दिल का हाल बयाँ करने के लिये कई कागज खराब करने पडते हैं"....

Read 385 times Last modified on बुधवार, 25 जनवरी 2017 19:23