गणतंत्र दिवस 2007 और मीडिया

Written by शनिवार, 27 जनवरी 2007 14:34

गणतन्त्र और हमारा मीडिया

कल ही गणतन्त्र दिवस (Republic Day of India) था और मै सोच रहा था कि लोगों, मित्रों को बधाई दूँ या उनसे शोक व्यक्त करूँ.... आज से पचास-साठ वर्ष पूर्व जिस आम आदमी को बाहर धकियाकर विशिष्टजनों के जिस गणतन्त्र का निर्माण किया गया, देखते-देखते कब वह "गनतन्त्र" बन गया आम आदमी जान भी नहीं सका... और जिन मूलभूत अधिकारों की गाथा हमें सुनाई गई थी वे तो शुरू से ही आम आदमी के लिये नही थे, ना कभी मिलने थे, ना आगे भी मिलेंगे... जो थोडी-बहुत आशा एक जमाने में उन्मुक्त और खुले प्रेस (Free Press) से थी अब वह भी धीरे-धीरे क्षीण होती नजर आ रही है..

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मैं अपने भाईयों से पूछना चाहता हूँ कि क्या वे आज के हमारे मीडिया कवरेज से संतुष्ट हैं, क्या उन्हें लगता है कि हमारा प्रिन्ट (Print Media in India) और इलेक्ट्रानिक मीडिया (Electronic Media) अपनी भूमिका का सही निर्वहन कर रहा है ? क्या हमारा मीडिया बाहुबलियों, धनवानों, सेलेब्रिटीयों (??), और छिछोरे दो-कौडी के नेताओं का पिछ्लग्गू बन कर नहीं रह गया है ? आये दिन हम मीडिया में इन लोगों के तमाशे देखते रहते हैं... चलो माना कि मीडिया का सेलेब्रिटी के पीछे भागना उनके धन्धे का एक हिस्सा है... लेकिन उन तथाकथित सेलेब्रिटीयों के काले-पीले कारनामों को बढा-चढाकर पेश करना मानो किसी ने फ़ुट्पाथ के गरीब मजदूरों पर गाडी चढाकर हम पर या इस देश पर कोई बहुत बडा अहसान कर दिया हो.... या फ़िर किसी भूतपूर्व नशेडी ने गांधीगिरी का अभिनय करके अपना कोई कर्ज उतार दिया हो... हमे बताया जाता है कि उस बिगडैल नवाब ने कौन सी शर्ट पहन रखी थी जब वह फ़लाने मन्दिर में गया था.... उसने कैसे न्यायपालिका को मूर्ख बनाया... कैसे उसके यह कहने से कि "वह परिवार का इकलौता कमाने वाला है, और उसकी एक लडकी है, जिसकी देखभाल के लिये उसे जेल से बाहर रहना आवश्यक है" मानो यदि वह जेल चला गया तो वह लड्की सडक पर आ जायेगी... जबकि जिस दिन संजू बाबा रिहा (शुक्र है अभी पूरी तरह से रिहा नहीं ) हुए उसी दिन हमारे कश्मीर (Kashmir) में एक जवान मेजर मनीष पिताम्बरे भी शहीद हुए, लेकिन शहीद होने से पहले उसने हिजबुल मुजाहिदीन के एक सुप्रीम कमाण्डर को मार गिराया.... और हमला करने से पहले मेजर पिताम्बरे ने कभी भी यह नहीं कहा कि... "मै अपने परिवार का इकलौता कमाने वाला सपूत हूँ और मेरी एक बेटी (डेढ वर्ष की) है जो अमेरिका में नहीं भारत में ही पढती है".... लेकिन मेजर पिताम्बरे का जिक्र तो दूर... उसकी अन्त्येष्टि को भी हमारा "सबसे तेज" मीडिया कवर नहीं कर पाया, जो मीडिया एक बालक के बोरिंग के गढ्ढे में गिर जाने पर... उसका लाइव टेलीकास्ट (Live Telecast) करके पैसा कूटने और अपनी "टीआरपी" (??) बढाने में लगा था... सेंसेक्स (Sensex) के जरा सा ऊपर-नीचे हो जाने पर हाय-तौबा मचाने वाला हमारा मीडिया विदर्भ और आन्ध्र के किसानों की मौत नहीं दिखाता, क्योंकि वहाँ जाने से पहले (यदि उसकी सही और सच्ची रिपोर्टिंग करनी हो) उस चाकलेटी पत्रकार को "होमवर्क" करना होगा... लेकिन यदि अमिताभ यदि उसे रात को दो बजे साथ में मन्दिर चलने को कहेगा तो वह तत्काल चल देगा... क्योंकि वहाँ तो उसे और उसके चैनल को "माल" मिलने वाला है... ये पत्रकारिता है ?

ये है हमारे मजबूत गणतन्त्र (?) का मीडिया ? जिस मीडिया को आटे-दाल के बढते भावों से अभिषेक-एश्वर्या की शादी की चिन्ता ज्यादा हो... वह मीडिया किस काम का ? कम से कम प्रिन्ट मीडिया कुछ हद तक इस मानसिक बीमारी से बचा हुआ है... (हालाँकि प्रिन्ट मीडिया भी धनकुबेरों के हाथ की कठ्पुतली ही है, जो उनका भोंपू बजाता रहता है) लेकिन फ़िर भी प्रतिस्पर्धा के कारण कोई अखबार कांग्रेसी है, कोई भाजपाई (ऊपरी तौर पर दिखाने के लिये), कोई सांप्रदायिक है, कोई धर्मनिरपेक्ष (??)... (हाँ.. जब जमीनों पर कब्जा करने की बात हो, कागज का कोटा बढवाना हो... सरकारी विग्यापनों की जुगाड लगानी हो, तब "हम सब एक है" वाली तर्ज पर आ जाते हैं).. फ़िर भी इनकी हालत इलेक्ट्रानिक मीडिया से कुछ बेहतर है (फ़िलहाल)... फ़िर वही सवाल जेहन में कौन्धता है... ये हम कहाँ जा रहे हैं... क्या वाकई हमारा प्रजातन्त्र (?) मजबूत हो रहा है (जबकि देश के लगभग १५ प्रतिशत हिस्से पर नक्सलियों का अघोषित कब्जा हो चुका है) (हो सकता है कुछ लोगों को यह आँकडा ज्यादा लगे... लेकिन सच्चाई यही है)...

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