सोनिया गाँधी वाले चिठ्ठे पर उठते सवाल-जवाब

Written by शुक्रवार, 10 अगस्त 2007 11:00

आप सोनिया गाँधी को कितना जानते हैं (भाग-१ और भाग-२) की पोस्टिंग के पश्चात मानो मेरे मेल बॉक्स में बाढ़ आ गई है। कुछ मित्रों ने सामने आकर टिप्पणियाँ की हैं, लेकिन अधिकतर मेल जो प्राप्त हुए हैं वे Anonymous या फ़र्जी ई-मेल पतों से भेजे गये हैं। समझ में नहीं आता कि आखिर सामने आकर, अपनी पहचान बताकर, गालियाँ देने में क्या हर्ज है?

हो सकता है कि किसी को कांग्रेस और सोनिया गाँधी से सहानुभूति हो, हो सकता है कि कुछ लोग मुझे भाजपाई समझ रहे हों, लेकिन मैं यह साफ़ कर देना चाहता हूँ कि काँग्रेस से तो कभी मेरी सहानुभूति रही ही नहीं, न कभी हो सकती है, क्योंकि देश की अधिकतर समस्याओं के लिये यही पार्टी या इसकी नीतियाँ ही जिम्मेदार रही हैं। भाजपा से सहानुभूति तो नहीं लेकिन एक उम्मीद अवश्य थी, जो कि कंधार के शर्मनाक घटनाक्रम के बाद समाप्त हो गई, और अब भाजपा और कुछ नहीं "काँग्रेस-२" रह गई है । लेकिन मुझे आश्चर्य इस बात का हुआ कि जबकि मैंने पहले ही यह घोषित कर दिया था कि यह मात्र अनुवाद है, फ़िर लोग इतना क्यों नाराज हो गये ?

क्या अंग्रेजी में लिखे हुए किसी लेख का अनुवाद करना कोई गलत काम है? यदि इंटरनेट पर इतना ही तथाकथित "कचरा"(?) भरा पडा़ है, तो फ़िर उसके अनुवाद मात्र से इतना भड़कना क्यों? यदि मैं किसी लेख में अपने विचार रखूँ और कोई तथ्य पेश किये बिना हाँकने लगूँ, तब तो वाद-विवाद की गुंजाइश बनती है, लेकिन यदि कोई एस.गुरुमूर्ति, डॉ.सुब्रह्मण्यम स्वामी, नेहरू के सचिव मथाई, आदि की लिखी बातों को मात्र बकवास कहकर खारिज कर दे या उन्हें सांप्रदायिक कह भी दे, तो मेरा क्या बिगड़ता है? ये और बात है कि "रंगीले रसिया नेहरू" की सडांध जब माऊंटबेटन की बेटी (गोरी चमडी़ वाली) ही उजागर करती है, तभी यहाँ के लोगों को कुछ विश्वास होता है, लेकिन यदि कोई भारतीय कुछ कहे तो या तो वह सांप्रदायिक है या फ़िर बकवास कर रहा होता है। रही बात तथ्यों की, तो मैं कोई खोजवेत्ता नहीं हूँ या मेरे पास इतने संसाधन नहीं हैं कि मैं सच-झूठ का पता कर सकूँ, इसलिये अंग्रेजी में लिखे-छपे को मैं अनुवाद करके हिन्दी पाठकों को परोस भर रहा हूँ, और इससे मेरी अनुवाद-क्षमता भी कचरा सिद्ध नहीं हो जाती। हम सभी अच्छी तरह जानते हैं कि भारतीय मानस एक स्त्री और वो भी विधवा, के खिलाफ़ किसी भी बात को सिरे से खारिज कर देगा, चाहे वह अटलबिहारी वाजपेयी को "झूठा" कहे, या कि रहस्यमयी तरीके से "कुर्सी के त्याग और बलिदान" की बातें करने लगे, और सारी शक्तियाँ अपने पास ही केन्द्रित रखे।

तो भाईयों, एक अनुवाद मात्र पर इतना चिढने की आवश्यकता नहीं है, कोई बात हो तो नीरज जी,या बैरागी जी जैसे तर्कों के साथ सामने आकर कहो, मुझे भी अच्छा लगेगा। और छुपकर गालियाँ ही देना हो तो उन्हें दो जिन्होंने यह सब लिखा है, उन लोगों के ई-मेल पते जरूर आपको ढूँढने पडेंगे (यदि मेरे पास होते तो तत्काल उपलब्ध करवाता)। मैं जब स्वयं का लिखा हुआ उपलब्ध करवाता हूँ तो छाती ठोंक कर कहता हूँ कि हाँ ये मेरा है, लेकिन इस मामले में मेरी भूमिका मात्र एक वेटर की है, जो खानसामा है वह पहले ही खाना बना चुका है । जब मैं कुछ पकाऊँगा, तो नमक-मिर्ची-तेल सभी की जिम्मेदारी मेरी होगी। जब तीसरा भाग पेश करूँ तो कृपया शुभचिंतक (!) इस बात का ध्यान रखें, फ़िर भी कोई शिकायत हो तो चिठ्ठे पर जाकर टिप्पणी करें (कम से कम मेरे चिठ्ठे पर टिप्पणियाँ तो बढेंगी), वरना मुझे लगेगा कि अपने चिठ्ठे पर ई-मेल पता देकर मैंने गलती तो नहीं कर दी?

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