Muthoot Finance, Anti-Hindu Circular, Ban on Bindi-Tilak

Written by मंगलवार, 13 सितम्बर 2011 16:16

सिन्दूर-बिंदी पर प्रतिबन्ध, अब कॉन्वेंट स्कूलों से निकलकर कारपोरेट तक पहुँचा…

जिनके बच्चे “सेंट” वाले कॉन्वेटों में पढ़ते हैं, वे जानते होंगे कि स्कूल के यूनिफ़ॉर्म के अलावा भी इन बच्चों पर कितनी तरह के प्रतिबन्ध होते हैं, जैसे कि “पवित्र”(?) कॉन्वेंट में पढ़ने वाला लड़का अपने माथे पर तिलक लगाकर नहीं आ सकता, लड़कियाँ बिन्दी-चूड़ी पहनना तो दूर, त्यौहारों पर मेहंदी भी लगाकर नहीं आ सकतीं। स्कूलों में बच्चों द्वारा अंग्रेजी में बात करना तो अनिवार्य है ही, बच्चों के माँ-बाप की अंग्रेजी भी जाँची जाती है… कुल मिलाकर तात्पर्य यह है कि “सहनशील” (यानी दब्बू और डरपोक) हिन्दुओं के बच्चों को “स्कूल के अनुशासन, नियमों एवं ड्रेसकोड” का हवाला देकर उनकी “जड़ों” से दूर करने और उन्हें “भूरे मानसिक गुलाम बनाने” के प्रयास ठेठ निचले स्तर से ही प्रारम्भ हो जाते हैं। भारतीय संस्कृति और खासकर हिन्दुओं पर लगाए जा रहे इन “तालिबानी” प्रतिबन्धों को अक्सर हिन्दुओं द्वारा “स्कूल के अनुशासन और नियम” के नाम पर सह लिया जाता है। अव्वल तो कोई विरोध नहीं करता, क्योंकि एक सीमा तक मूर्ख और सेकुलर दिखने की चाहत वाली किस्म के हिन्दू इसके पक्ष में तर्क गढ़ने में माहिर हैं (उल्लेखनीय है कि ये वही लतखोर हिन्दू हैं, जिन्हें सरस्वती वन्दना भी साम्प्रदायिक लगती है और “सेकुलरिज़्म” की खातिर ये उसका भी त्याग कर सकते हैं)। यदि कोई इसका विरोध करता है तो या तो उसके बच्चे को स्कूल में परेशान किया जाता है, अथवा उसे स्कूल से ही चलता कर दिया जाता है।

वर्षों से चली आ रही इस हिन्दुओं की इस “सहनशीलता”(??) का फ़ायदा उठाकर इस “हिन्दू को गरियाओ, भारतीय संस्कृति को लतियाओ टाइप, सेकुलर-वामपंथी-कांग्रेसी अभियान” का अगला चरण अब कारपोरेट कम्पनी तक जा पहुँचा है। एक कम्पनी है “मुथूट फ़ाइनेंस एण्ड गोल्ड लोन कम्पनी” जिसकी शाखाएं अब पूरे भारत के वर्ग-2 श्रेणी के शहरों तक जा पहुँची हैं। यह कम्पनी सोना गिरवी रखकर उस कीमत का 80% पैसा कर्ज़ देती है (प्रकारांतर से कहें तो गरीबों और मध्यम वर्ग का खून चूसने वाली “साहूकारी” कम्पनी है)। इस कम्पनी का मुख्यालय केरल में है, जो कि पिछले 10 वर्षों में इस्लामी आतंकवादियों का स्वर्ग एवं एवेंजेलिस्ट ईसाईयों का गढ़ राज्य बन चुका है। हाल ही में इस कम्पनी के मुख्यालय से यहाँ काम करने वाले कर्मचारियों हेतु “ड्रेसकोड के नियम” जारी किये गये हैं (देखें चित्र में)।


(बड़ा देखने के लिए चित्र पर क्लिक करें) 

कम्पनी सचिव शाइनी थॉमस के हस्ताक्षर से जारी इस सर्कुलर में पुरुष एवं स्त्री कर्मचारियों के ड्रेसकोड सम्बन्धी स्पष्ट दिशानिर्देश दिए गये हैं, जिसके अनुसार पुरुष कर्मचारी साफ़सुथरे कपड़े, पैण्ट-शर्ट पहनकर आएंगे, बाल ठीक से बने हों एवं क्लीन-शेव्ड रहेंगे… यहाँ तक तो सब ठीक है क्योंकि यह सामान्य दिशानिर्देश हैं जो लगभग हर कम्पनी में लागू होते हैं। परन्तु आगे कम्पनी कहती है कि पुरुष कर्मचारी घड़ी, चेन और सगाई(शादी) की अंगूठी के अलावा कुछ नहीं पहन सकते… पुरुष कर्मचारियों के शरीर पर किसी प्रकार का “धार्मिक अथवा सांस्कृतिक चिन्ह”, अर्थात चन्दन का तिलक (जो कि दक्षिणी राज्यों में आम बात है), कलाई पर बँधा हुआ मन्दिर का पवित्र कलावा अथवा रक्षाबन्धन के अगले दिन राखी, इत्यादि नहीं होना चाहिए। कम्पनी का कहना है कि यह “कारपोरेट एटीकेट”(?) और “कारपोरेट कल्चर”(?) के तहत जरूरी है, ताकि ग्राहकों पर अच्छा असर पड़े (अच्छा असर यानी सेकुलर असर)।

लगभग इसी प्रकार के “तालिबानी” निर्देश महिला कर्मचारियों हेतु भी हैं, जिसमें उनसे साड़ी-सलवार कमीज में आने को कहा गया है, महिला कर्मचारी भी सिर्फ़ घड़ी, रिंग और चेन पहन सकती हैं (मंगलसूत्र अथवा कान की बाली नहीं)… इस निर्देश में भी आगे स्पष्ट कहा गया है कि महिलाएं ऑफ़िस में “बिन्दी अथवा सिन्दूर” नहीं लगा सकतीं।

अब कुछ असुविधाजनक सवाल “100 ग्राम अतिरिक्त बुद्धि” वाले बुद्धिजीवियों तथा “सेकुलरिज़्म के तलवे चाटने वाले” हिन्दुओं से–

1) जब अमेरिका जैसे धुर ईसाई देश में भी हिन्दू कर्मचारी राखी पहनकर अथवा तिलक लगाकर दफ़्तर आ सकते हैं तो केरल में क्यों नहीं?

2) कम्पनी के इन दिशानिर्देशों में स्पष्ट रूप से “तिलक”, “बिन्दी” और “सिन्दूर” का ही उल्लेख क्यों किया गया है? “गले में क्रास”, “बकरा दाढ़ी” और “जालीदार सफ़ेद टोपी” का उल्लेख क्यों नहीं किया गया?

3) सर्कुलर में “वेडिंग रिंग” पहनने की अनुमति है, जो कि मूलतः ईसाई संस्कृति से भारत में अब आम हो चुका रिवाज है, जबकि माथे पर चन्दन का त्रिपुण्ड लगाने की अनुमति नहीं है, क्योंकि यह विशुद्ध भारतीय संस्कृति की पद्धति है।

ज़ाहिर है कि कम्पनी के मैनेजमेण्ट की “नीयत” (जो कि सेकुलर यानी मैली है) में खोट है, कम्पनी का सर्कुलर मुस्लिम महिलाओं को बुरका या हिजाब पहनने से नहीं रोकता, क्योंकि हाल ही में सिर्फ़ “मोहम्मद” शब्द का उल्लेख करने भर से एक ईसाई प्रोफ़ेसर अपना हाथ कटवा चुका है। परन्तु जहाँ तक हिन्दुओं की बात है, इनके मुँह पर थूका भी जा सकता है, क्योंकि ये “सहनशील”(?) और “सेकुलर”(?) होते हैं। ज़ाहिर है कि दोष हिन्दुओं (के Genes) में ही है। जब अपना सिक्का ही खोटा हो तो कांग्रेस और वामपंथियों को भी क्या दोष दें वे तो अपने-अपने आकाओं (रोम या चीन) की मानसिकता और निर्देशों पर चलते हैं।

“सो कॉल्ड” सेकुलर हिन्दुओं से एक सवाल यह भी है कि यदि कोई “हिन्दू स्कूल” अपने स्कूल में यह यूनिफ़ॉर्म लागू कर दे कि प्रत्येक बच्चा (चाहे वह किसी भी धर्म का हो) चोटी रखकर, धोती पहनकर व तिलक लगाकर ही स्कूल आएगा, तो क्या इन सेकुलरों को दस्त नहीं लग जाएंगे?

 इसी तरह बात-बात पर संघ और भाजपा का मुँह देखने और इन्हें कोसने वाले हिन्दुओं को भी अपने गिरेबान में झाँककर देखना चाहिए कि क्या कॉन्वेंट स्कूलों में उनका बेटा तिलक या बेटी बिन्दी लगाकर जाए और स्कूल प्रबन्धन मना करे तो उनमें स्कूल प्रबन्धन का विरोध करने की हिम्मत है? क्या अभी तक मुथूट फ़ायनेंस कम्पनी में काम कर रहे किसी हिन्दू कर्मचारी ने इस सर्कुलर का विरोध किया है? मुथूट फ़ायनेंस कम्पनी के इन दिशानिर्देशों के खिलाफ़ किसी हिन्दू संगठन ने कोई कदम उठाया? कोई विरोध किया? अभी तक तो नहीं…।

कुछ और नहीं तो, सलीम खान नाम के 10वीं के छात्र से ही कुछ सीख लेते, जिसने स्कूल यूनिफ़ॉर्म में अपनी दाढ़ी यह कहकर कटवाने से मना कर दिया था कि यह उसके धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है। सलीम खान अपनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक ले गया और वहाँ उसने जीत हासिल की (यहाँ देखें http://muslimmedianetwork.com/mmn/?p=4575) । सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि सलीम को अपनी धार्मिक रीतिरिवाजों के पालन का पूरा अधिकार है इसलिए वह स्कूल में दाढ़ी बढ़ाकर आ सकता है। स्कूल प्रबन्धन उसे यूनिफ़ॉर्म के नाम पर क्लीन शेव्ड होने को बाध्य नहीं कर सकता।

तात्पर्य यह है कि विरोध नहीं किया गया तो इस प्रकार की “सेकुलर” गतिविधियाँ और नापाक हरकतें तो आये-दिन भारत में बढ़ना ही हैं, इसे रोका जा सकता है। इसे रोकने के तीन रास्ते हैं –

1)    पहला तरीका तो तालिबानियों वाला है, जिस प्रकार केरल में मोहम्मद का नाम लेने भर से ईसाई प्रोफ़ेसर का हाथ काट दिया गया, उसी प्रकार हिन्दू धर्म एवं देवी-देवताओं का अपमान करने वाले को स्वतः ही कठोर दण्ड दिया जाए। परन्तु यह रास्ता हिन्दुओं को रास नहीं आ सकता, क्योंकि हिन्दू स्वभावतः “बर्बर” हो ही नहीं सकते…

2)    दूसरा तरीका सलीम खान वाला है, यानी हिन्दू धर्म-संस्कृति पर हमला करने वालों अथवा “खामख्वाह का सेकुलरिज़्म ठूंसने वालों” को अदालत में घसीटा जाए और संवैधानिक तरीके से जीत हासिल की जाए। परन्तु “सेकुलरिज़्म” के कीटाणु इतने गहरे धँसे हुए हैं कि यह रास्ता अपनाने में भी हिन्दुओं को झिझक(?) महसूस होती है…

3)    तीसरा रास्ता है “बहिष्कार”, मुथूट फ़ायनेंस कम्पनी या किसी कॉन्वेंट स्कूल द्वारा जबरन अपने नियम थोपने के विरुद्ध उनका बहिष्कार करना चाहिए। इनकी जगह पर कोई दूसरा विकल्प खोजा जाए जैसे मणप्पुरम गोल्ड लोन कम्पनी अथवा कॉन्वेंट की बजाय कोई अन्य स्कूल…। इसमें दिक्कत यह है कि हिन्दू इतने लालची, मूर्ख और कई टुकड़ों में बँटे हुए हैं कि वे प्रभावशाली तरीके से ऐसी बातों का, ऐसी कम्पनियों का, ऐसे स्कूलों का बहिष्कार तक नहीं कर सकते…

एक बात और…… कम्पनी कहती है कि बिन्दी-तिलक और सिन्दूर से उसके ग्राहकों पर “गलत प्रभाव”(?) पड़ सकता है, लेकिन इसी कम्पनी को चन्दन का त्रिपुण्ड लगाकर उनकी ब्रांच में सोना गिरवी रखने आये हिन्दू ग्राहकों से कोई तकलीफ़ नहीं है…। बाकी तो आप समझदार हैं ही…

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नोट :- मेरा फ़र्ज़ है कि मैं इस प्रकार की घटनाओं और तथ्यों को जनता के समक्ष रखूं, जिसे जागना हो जागे, नहीं जागना हो तो सोता रहे…। कश्मीर-नगालैण्ड में भी तो धीरे-धीरे हिन्दू अल्पसंख्यक हो गये हैं या होने वाले हैं, तो मैंने क्या उखाड़ लिया?, अब पश्चिम बंगाल-केरल और असम में भी हो जाएंगे तो आप क्या उखाड़ लेंगे?
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Super User

 

I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

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