देशसेवा करते शहीद होना अच्छा है या जहरीली दारु पीकर मरना…?...... Major Unnikrishnan, CPM Kerala, Achyutanandan

Written by सोमवार, 27 सितम्बर 2010 13:34
यह प्रश्न सुनने में अजीब लगता है और सामान्यतः जवाब यही होगा कि देशसेवा के लिये शहीद होना निश्चित रुप से अच्छा है। लेकिन केरल के माननीय(?) मुख्यमंत्री वामपंथी श्री अच्युतानन्दन ऐसा नहीं सोचते, उनकी निगाह में जहरीली दारु पीकर मरने वाले की औकात, देश के एक जांबाज़ सैनिक से कहीं अधिक है… क्या कहा विश्वास नहीं होता? लेकिन ऐसा ही है साहब…। आपको तो याद ही होगा, पिछले साल जब ताज होटल के आतंकवादी हमले में शहीद हुए युवा कमाण्डो मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के घर पर जब अच्युतानन्दन जी उनके पिता के पास संवेदना व्यक्त करने (?) गए थे, उस समय मेजर के घर की चेकिंग खोजी कुत्तों द्वारा करवाई गई थी, जिस कारण बुरी तरह से भड़के हुए शोक-संतप्त पिता ने मुख्यमंत्री अच्युतानन्दन को दुत्कार कर अपने घर से भगा दिया था…। धिक्कारे जाने के बावजूद अच्युतानन्दन का बयान था कि "यदि वह घर संदीप का नहीं होता तो उधर कोई कुत्ता भी झाँकने न जाता…"। बाद में माकपा ने मामले की सफ़ाई से लीपापोती कर दी थी और मुख्यमंत्री ने शहादत का सम्मान(?) करते हुए, मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के परिजनों को केरल सरकार की तरफ़ से 3 लाख रुपए देने की घोषणा की थी (जो अब तक मिले या नहीं, पता नहीं चल सका है)।



अभी कुछ दिनों पहले केरल के मलप्पुरम जिले में जहरीली ताड़ी पीने से अब तक 26 लोगों की मौत हो चुकी है, और कुछ अंधे भी हुए हैं। वही राज्य, वही मुख्यमंत्री… लेकिन जहरीली शराब पीकर मरने वालों को "माननीय" ने 5 लाख रुपये प्रति व्यक्ति के मुआवज़े की घोषणा की है, जबकि अंधे होने वालों को 4 लाख रुपये एवं अन्य को एक लाख रुपये का मुआवज़ा देने की घोषणा की है। इसी के साथ सभी प्रभावितों का इलाज़ केरल सरकार के खर्च पर होगा।



अब आप ही सोचिये कि देशसेवा करते हुए शहीद होना ज्यादा फ़ायदे का सौदा है या जहरीली शराब पीकर मरना? यदि देशसेवा करते शहीद हुए, तो बूढ़े माता-पिता को सरकारी बाबुओं के धक्के खाने पड़ेंगे, मानो किसी मक्कार किस्म के मंत्री ने पेट्रोल पम्प देने की घोषणा कर भी दी तो वह इतनी आसानी से मिलने वाला नहीं है, जबकि पेंशन लेने के लिये भी दिल्ली के 10-15 चक्कर खाने पड़ेंगे सो अलग (हाल ही में खबर मिली है कि एक वीरता पदक प्राप्त सैनिक की विधवा को 70 रुपये… जी हाँ 70 रुपये मासिक, की पेंशन मिल रही है… सिर्फ़ 5 साल के लिये संसद में हल्ला मचाने के एवज़ में हजारों की पेंशन और सुविधाएं लेने वाले बतायें कि क्या 70 रुपये में वह विधवा एक किलो दाल भी खरीद सकेगी?)। इसकी बजाय परिवार के दो सदस्य जहरीली शराब पीकर मरें, तो दस लाख लो और मजे करो…

अब अच्युतानन्दन जी की इस "विलक्षण" सोच के पीछे की वजहों को समझने की कोशिश करते हैं। मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के माता-पिता को 3 लाख रुपये देने की घोषणा शायद इसलिये की होगी, कि उनका धकियाकर घर से बाहर किया जाना मीडिया की सुर्खियाँ बन चुका था, वरना शायद 3 लाख भी न देते, जबकि जहरीली शराब पीने वाले लोग पिछड़ी जातियों के "वोट बैंक" हैं इसलिये उन्हें 5 लाख दे दिये, वैसे भी उनकी जेब से क्या जाता है?

अब एक आश्चर्यजनक तथ्य भी जान लीजिये, जैसा कि सभी जानते हैं केरल देश का सर्वाधिक साक्षर प्रदेश है (साक्षरता दर लगभग 93% है), यही सबसे साक्षर प्रदेश आज की तारीख में सबसे बड़ा "बेवड़ा प्रदेश" बन चुका है। केरल में प्रति व्यक्ति शराब की खपत 8.3 लीटर हो चुकी है, अर्थात अमेरिका के बराबर और पोलैण्ड (8.1 लीटर) और इटली (8.0 लीटर) से भी अधिक (जबकि पंजाब का नम्बर दूसरा है - प्रति व्यक्ति खपत 7.9 लीटर)। पिछले साल केरल सरकार ने शराब पर टैक्स से 5040 करोड़ रुपये कमाए हैं, और यदि इस साल की पहली तिमाही के आँकड़ों को देखा जाये तो इस वर्ष लगभग 6500 करोड़ रुपये शराब से केरल सरकार को मिलने की सम्भावना है। यदि कोई व्यक्ति 100 रुपये की शराब खरीदता है तो लगभग 80 रुपये केरल सरकार की जेब में जाते हैं, 18 रुपये शराब निर्माता को और बाकी के 2 रुपये अन्य खर्चों के, यानी औसतन केरल का प्रत्येक व्यक्ति साल भर में 1340 रुपये की शराब पी जाता है… (कौन कहता है कि साक्षरता अच्छी बात होती है…?)।

लेकिन असली पेंच यहीं पर है… सोचिये कि जब आधिकारिक रुप से प्रतिवर्ष केरल सरकार को 5000 करोड़ रुपये मिल रहे हैं तो अनाधिकृत तरीके से नकली, जहरीली और अवैध शराब बेचने पर गिरोहबाजों को कितना मिलता होगा। मिथाइल अल्कोहल मिली हुई नकली और जहरीली शराब के रैकेट पर माकपा और कांग्रेस के कैडर का पूरा कब्जा है। अवैध शराब और ताड़ी की बिक्री से मिलने वाला करोड़ों रुपया जो शराब निर्माता की जेब में जाता है (राज्य सरकार को प्रति 100 रुपये की बिक्री पर मिलने वाले 80 रुपये), उसमें से एक मोटा टुकड़ा माकपा कैडर और नेताओं के पास पहुँचता है। कांग्रेस और वामपंथी दोनों पार्टियाँ मिलीभगत से अपना बँटवारा करती हैं, क्योंकि यही दोनों अदला-बदली करके केरल में सत्ता में आती रही हैं। कई बार, कई मौकों पर जहरीली शराब दुर्घटनाओं के बाद जाँच आयोग वगैरह की नौटंकी होती है, परन्तु फ़िर मामला ठण्डा पड़ जाता है। दारुकुट्टे और उनके परिजन मुआवज़ा लेकर चुप बैठ जाते हैं…

ऐसे में इस बार जहरीली शराब पीकर मरे हुए 26 लोगों के परिवार को 5 लाख रुपये देकर उनका मुँह बन्द करने की कोशिश की गई है, ताकि वे ज्यादा हल्ला न मचायें। (उल्लेखनीय है कि दुर्घटना के पहले दिन मुआवज़ा 1 लाख ही घोषित किया गया था, लेकिन जैसे ही हल्ला-गुल्ला अधिक बढ़ा, जाँच आयोग वगैरह की माँग होने लगी… तो अच्युतानन्दन ने इसे बढ़ाकर सीधे 5 लाख कर दिया…)

तात्पर्य यह कि शहीद संदीप उन्नीकृष्णन को 3 लाख रुपये का मुआवज़ा भले ही मजबूरी में दिया गया हो, लेकिन शराब से हुई इन 26 मौतों को 5 लाख रुपये का मुआवज़ा देना बहुत जरूरी था…वरना पोल खुलने का खतरा था। अब भले ही शहीद का मान और देश का सम्मान वगैरह जाये भाड़ में…
(सन्दर्भ : http://www.hindu.com/2010/09/09/stories/2010090958070400.htm)

हालांकि वर्तमान मामला "शहीद" और "बेवड़ों" के बीच मुआवज़े की तुलना का है, लेकिन कांग्रेसियों और वामपंथियों द्वारा मृतकों को मुआवज़े बाँटने में भी "सेकुलरिज़्म" का ध्यान रखा जाता है इसके दो उदाहरण हम पहले भी देख चुके हैं… यदि भूल गये हों तो याद ताज़ा कर लीजिये -

1) 17 अक्टूबर 2009 को कासरगौड़ जिले की ईरुथुंकादवु नदी में डुब जाने से चार बच्चों की मौत हो गई, जिनके नाम थे अजीत(12), अजीश(15), रतन कुमार(15) और अभिलाष(17), जो कि नीरचल के माहजन स्कूल के छात्र थे।

2) 3 नवम्बर 2009 को त्रिवेन्द्रम के अम्बूरी स्थित नेय्यर नदी में एक छात्र की डूब जाने की वजह से मौत हुई, जिसका नाम था साजो थॉमस(10)।

3) 4 नवम्बर 2009 को मलप्पुरम के अरीकोड में चेलियार नदी में आठ बच्चों की डूबने से मौत हुई, नाम हैं सिराजुद्दीन, तौफ़ीक, शमीम, सुहैल, शहाबुद्दीन, मोहम्मद मुश्ताक, तोइबा और शाहिद।

अर्थात केरल में एक माह के अन्तराल में 13 बच्चों की मौत एक जैसी वजह से हुई, ज़ाहिर सी बात है कि राज्य सरकार द्वारा मुआवज़े की घोषणा की गई, लेकिन त्रिवेन्द्रम और मलप्पुरम के हादसे में मारे गये बच्चों के परिजनों को 5-5 लाख का मुआवज़ा दिया गया, जबकि कासरगौड़ जिले के बच्चों के परिजनों को 1-1 लाख का… ऐसा क्यों हुआ, यह समझने के लिये अधिक दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है… (यहाँ पढ़ें…

इससे पहले भी पिछले साल एक पोस्ट में ऐसी ही ओछी और घटिया "सेकुलर" राजनीति पर एक माइक्रो पोस्ट लिखी थी (यहाँ देखें…) जिसमें बताया गया था कि समझौता एक्सप्रेस बम विस्फ़ोट में मारे गये प्रत्येक पाकिस्तानी नागरिक को दस-दस लाख रुपये दिये गये (सम्मानित-प्यारे-छोटे भाई टाइप के पड़ोसी हैं… इसलिये), जबकि इधर मालेगाँव बम विस्फ़ोट में मारे गये प्रत्येक मुसलमान को पाँच-पाँच लाख रुपये दिये गये, लेकिन अमरावती के दंगों में लगभग 75 करोड़ के नुकसान के लिये 137 हिन्दुओं को दिये गये कुल 20 लाख। धर्मनिरपेक्षता ऐसी ही होती है भैया…जो मौत-मौत में भी फ़र्क कर लेती है।

इसी प्रकार की धर्मनिरपेक्षता का घण्टा गले में लटकाये कई बुद्धिजीवी देश में घूमते रहते हैं… कभी नरेन्द्र मोदी को भाषण पिलाते हैं तो कभी हिन्दुत्ववादियों को नसीहतें झाड़ते हैं… लेकिन कभी खुद का वीभत्स चेहरा आईने में नहीं देखते…। काश, शहीद मेजर संदीप की एकाध गोली, कसाब के सीने को भी चीर जाती तो कम से कम हमारे टैक्स के करोड़ों रुपये बच गये होते… जो उसे पालने-पोसने में खर्च हो रहे हैं। टैक्स के इन्हीं पैसों को अपने "पूज्य पिता" का माल समझकर, नेता लोग इधर-उधर मुआवज़े बाँटते फ़िरते हैं… जबकि शहीद सैनिकों के बूढ़े माँ-बाप, विधवा और बच्चे धक्के खाते रहते हैं…


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I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

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