Indivar : Nadiya Chale Chale re Dhara Chanda Chale

Written by सोमवार, 28 मई 2007 11:02
इन्दीवर : नदिया चले, चले रे धारा


यह गीत उन लोगों के लिये है जो हमेशा हिन्दी फ़िल्मी गीतों की यह कर आलोचना करते हैं कि "ये तो चलताऊ गीत होते हैं, इनमें रस-कविता कहाँ", कविता की बात ही कुछ और है, हिन्दी फ़िल्मी गाने तो भांडों - ठलुओं के लिये हैं", लेकिन इन्दीवर एक ऐसे गीतकार हुए हैं जो कविता और शब्दों को हमेशा प्रधानता देते रहे हैं, उनके गीतों में अधिकतर हिन्दी के शब्दों का प्रयोग हुआ है और साहिर, शकील और हसरत के वजनदार उर्दू लफ़्जों की शायरी के बीच भी इन्दीवर हमेशा खम ठोंक कर खडे रहे । इन्दीवर का जन्म झाँसी(उप्र) में हुआ उनका असली नाम था - श्यामलाल राय । इनका शुरुआती गीत "बडे अरमानों से रखा है बलम तेरी कसम" बहुत हिट रहा और कल्याणजी-आनन्दजी के साथ इनकी जोडी खूब जमी ।


हिन्दी फ़िल्मी गीतों को इन्दीवर ने कविता के रूप में लिखकर उन्हें एक नया आयाम दिया है, कविता भी ऐसी कि शब्द बहुत क्लिष्ट ना हों और आम आदमी कि जुबान पर आसानी से चढ़ जायें । फ़िर इस गीत में कल्याणजी भाई ने नाव, नदी और नाविक का जो माहौल तैयार किया है वह अद्वितीय है..और मन्ना डे साहब की आवाज उसमें चार चाँद लगा देती है.. परन्तु मुख्य बात हैं शब्द जो कि एक कैन्सर पीडित (राजेश खन्ना) के लिये एक सकारात्मक सन्देश लाते हैं...

नदिया चले, चले रे धारा
चन्दा चले, चले रे तारा
तुझको चलना होगा...

जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है
आँधी से तूफ़ाँ से डरता नहीं है
नाव तो क्या, बह जाये किनारा
बडी ही तेज समय की है धारा
तुझको चलना होगा...

पार हुआ वो रहा जो सफ़र में
जो भी रुका, फ़िर गया वो भँवर में
तू ना चलेगा तो चल देंगी राहें
मंजिल को तरसेंगी तेरी निगाहें..
तुझको चलना होगा..

कितने आसान शब्दों में छोटी सी कविता में वे अपना सन्देश हम तक पहुँचा देते हैं और वह भी फ़िल्म की तमाम बन्दिशों के बावजूद । इन्दीवर साहब की हिन्दी कविताओं की कुछ बानगियाँ पेश हैं, ताकि पाठक समझ सकें कि उनमें कितनी "वेरायटी" थी, और यहाँ तक कि फ़िल्म "तोहफ़ा" में भी उन्होंने जंपिंग जैक (जीतेन्द्र) और थंडर थाईज़ (श्रीदेवी) के होते हुए भी हिन्दी कविता का साथ नहीं छोडा...

प्यार का तोहफ़ा तेरा, बना है जीवन मेरा,
दिल के सहारे मैने पा लिये, जीने को और क्या चाहिये


इसी तरह से फ़िल्मों के "मैचो मैन" सुनील शेट्टी पर फ़िल्माया गया "मोहरा" का गीत -

ना कजरे की धार ना मोतियों के हार
ना कोई किया सिंगार, फ़िर भी कितनी सुन्दर हो...


कुछ और विशुद्ध कवितायें -
"आओ मिल जायें हम सुगन्ध और सुमन की तरह" (फ़िल्म - प्रेमगीत)
"चन्दन सा बदन चंचल चितवन" (फ़िल्म - सरस्वतीचन्द्र)
"एक अंधेरा लाख सितारे, एक निराशा लाख सहारे" (फ़िल्म - आखिर क्यों)
"कोई जब तुम्हारा हृदय तोड दे, तडपता हुआ जब कोई छोड दे" (पूरब और पश्चिम)
"मधुबन खुशबू देता है, सागर सावन देता है" (साजन बिना सुहागन)

ऐसे सैकडों उदाहरण दिये जा सकते है इन्दीवर साहब सशक्त की लेखनी के लिये... ऐसे महान हिन्दी सेवक को हमारा सलाम...

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