ऐ भाई जरा देख के चलो (राजकपूर - २ जून)

Written by शनिवार, 02 जून 2007 18:06

दो जून को महान शोमैन राजकपूर की पुण्यतिथि है, और इस अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए मैं उनकी फ़िल्म "मेरा नाम जोकर" का एक असाधारण गीत प्रस्तुत करना चाहता हूँ, जो कई बार सुनाई दे जाता है, लेकिन अधिकतर लोग उसे सुनते वक्त "इग्नोर" कर देते हैं, दरअसल यह गीत भी अक्सर रेडियो पर पूरा नहीं बजाया जाता.. पहली बार में सुनते वक्त तो यह एक साधारण सा गीत लगता है, लेकिन गीतकार ने इसमें खोखली होती पूरी जीवन शैली को उघाडकर रख दिया है ।


यह गीत लिखा है कवि/गीतकार "नीरज" ने (जैसा कि यहाँ बताया गया है) अभी भी कई लोग यह समझते हैं कि यह गीत या तो शैलेन्द्र ने लिखा है या हसरत जयपुरी ने... गीत के बोल हैं - "ऐ भाई जरा देख के चलो..." । राजकपूर जी ने सरकस वाले जोकर के दिल के दर्द के माध्यम से जो भावनायें व्यक्त की हैं, जिससे लगता है कि "तीसरी कसम" की असफ़लता और उसके बाद "जोकर" के कटु अनुभव इस गीत में उभरकर आ गये हैं । शायद फ़िल्म "मेरा नाम जोकर" राजकपूर ने समय से पहले बना ली थी, आज के मार्केटिंग के दौर में यदि वे इस फ़िल्म को बनाते तो निश्चित ही दुनिया उसे "क्लासिक" का दर्जा देकर सिर-आँखों पर बिठाती... खैर...बात हो रही है गीत की... दुनिया के लोगों का व्यवहार और इन्सानी फ़ितरत का खूब चित्रण किया गया है इस गीत में...
गीत शुरु होता है सरकस के माहौल के संगीत और मन्ना दा की गहरी आवाज से -

ऐ भाई जरा देख के चलो
आगे ही नहीं पीछे भी, दायें ही नहीं बाँये भी
ऊपर ही नहीं, नीचे भी.. ऐ भाई..
तू जहाँ आया है, वो तेरा
घर नहीं, गाँव नहीं, कूचा नहीं, रस्ता नहीं, दुनिया है..

(यहाँ पहले नीरज गीत को एक आध्यात्मिक स्पर्श देते हैं और लगभग उपदेशात्मक रूप में हमें बताते हैं कि..)
और प्यारे दुनिया ये सरकस है और सरकस में..
बडे को भी छोटे को भी, दुबले को भी मोटे को भी, खरे को भी खोटे भी
ऊपर से नीचे को, नीचे से ऊपर को आना-जाना पडता है..
और रिंग मास्टर के कोडे़ पर...
कोडा़ जो भूख है, कोडा़ जो पैसा है, कोडा़ जो किस्मत है,
तरह-तरह नाच के दिखाना यहाँ पडता है,
बार-बार रोना और गाना यहाँ पडता है,
हीरो से जोकर बन जाना पडता है...
ऐ भाई...
(भूख, पैसा और किस्मत को यहाँ कोडा़ बताया गया है, और जाहिर है कि रिंग मास्टर भगवान है..)

अगले अन्तरे में गीतकार इन्सानी फ़ितरत की कठोर सच्चाई बयान कर देते हैं और इन्सान को जानवर से भी बदतर बताते हैं, जो कि काफ़ी हद तक सही भी है...
क्या है करिश्मा, कैसा खिलवाड है,
जानवर आदमी से ज्यादा वफ़ादार है,
खाता है कोडा भी, रहता है भूखा भी
फ़िर भी वो मालिक पर करता नहीं वार है
और इन्सान ये..
माल जिसका खाता है, प्यार जिससे पाता है
गीत जिसके गाता है
उसके ही सीने में भोंकता कटार है
कहिये श्रीमान आपका क्या खयाल है ? (यह पंक्ति राजकपूर बोलते हैं)
ऐ भाई..

अगले अन्तरे में फ़िर एक बार नीरज आदमी के अन्दर के इन्सान को जगाने की कोशिश करते हैं और उसे हिम्मत दिलाते हैं कि -
गिरने से डरता है क्यों, मरने से डरता है क्यों
ठोकर तू जब तक ना खायेगा
पास किसी गम को न जब तक बुलायेगा
जिन्दगी है चीज क्या, नहीं जान पायेगा
रोता हुआ आया है, रोता चला जायेगा..
ऐ भाई...

क्या सटीक लिखा है - जब तक ठोकर और गम जिन्दगी में नहीं मिलते, व्यक्ति जीवन को पूरी तरह समझ ही नहीं पाता..

गीत का अन्तिम हिस्सा अधिकतर सुनने को नहीं मिलता, क्योंकि तब तक गीत की लम्बाई इतनी अधिक हो जाती है कि रेडियो पर इसे बजाना शायद सम्भव नहीं होता होगा... लेकिन गीत का यही हिस्सा सबसे मार्मिक है.. जीवन-दर्शन को शब्दों में उतारना और उसे फ़िल्म में सरकस के साथ जोडना.... वाकई राजकपूर और नीरज के लिये "कमाल" शब्द बहुत छोटा प्रतीत होता है...
इसके बाद एक हल्का सा विराम देकर राजकपूर स्वतः की आवाज में कहते हैं -

सरकस, (हँसते हैं)
हाँ बाबू..ये सरकस है..
और ये सरकस है शो तीन घंटे का..

फ़िर मन्ना दा की आवाज शुरू होती है..
पहला घंटा बचपन है,
दूसरा जवानी है,
तीसरा बुढापा..
और इसके बाद
माँ नहीं, बाप नहीं, बेटा नहीं, बेटी नहीं, तू नहीं, मैं नहीं, ये नहीं, वो नहीं
कुछ भी नहीं रहता है
रहता है जो कुछ बस
(राजकपूर की आवाज में)
खाली-खाली कुर्सियाँ हैं, खाली-खाली तम्बू है
खाली-खाली डेरा है,
बिना चिडिया का बसेरा है,
ना तेरा है ना मेरा है.
..

आध्यात्म की इस ऊँचाई पर ले जाने के बाद अन्त में एक दर्दीला वॉयलिन का सुर आपको सुन्न अवस्था में छोड़ देता है, और आप अपने अन्दर जीवन के नये अर्थ तलाशने लगते हैं....

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