top left img
desiCNN - Items filtered by date: अगस्त 2014
सोमवार, 04 अगस्त 2014 19:21

Laxman Rao : Writing of Common Man

फुटपाथ से राष्ट्रपति भवन तक...


पतंजलि हरिद्वार में स्वामी रामदेव जी द्वारा आयोजित सोशल मीडिया शिविर में भाग लेने के पश्चात २८ जुलाई को उज्जैन वापसी के समय मुझे निजामुद्दीन स्टेशन से ट्रेन पकड़नी थी. मैं हरिद्वार से शाम सात बजे ही दिल्ली पहुँच चुका था, जबकि ट्रेन का समय रात सवा नौ बजे का था. इस बीच पत्रकार भाई आशीष कुमार अंशु से फोन पर बातचीत करके चार-छह राष्ट्रवादी मित्रों का तात्कालिक मिलन समारोह आयोजित कर लिया गया था. आशीष भाई अपने दफ्तर नेहरू प्लेस से मुझे बाईक पर बैठाकर भाई रविशंकर के दफ्तर ले चले... हमारी राजनैतिक चर्चा के साथ हल्की-हल्की बारिश की फुहारें जारी थीं.

आईटीओ के पास हिन्दी भवन आते ही आशीष ने मुझसे पूछा कि आप साहित्यकार लक्ष्मण राव से मिलना चाहेंगे?? कम से कम समय में मैं अधिकाधिक लोगों से मिलजुलकर समय का सदुपयोग करना चाहता था.. मैंने तुरंत हामी भर दी. चूँकि आशीष भाई ने “साहित्यकार” लक्ष्मण राव कहा था, और मुझसे मिलवाने की इच्छा ज़ाहिर की थी सो मुझे भी उत्सुकता थी कि ये सज्जन कौन हैं? थोड़ी देर बाद आशीष ने एक चाय की गुमटी पर बाईक रोकी और कहा, आईये चाय पीते हैं. हरिद्वार से थका हुआ आया था, बारिश में भीग भी रहे थे, चाय की तलब भड़क रही थी, इसलिए वह आग्रह अमृत समान लगा. गुमटी के सामने बाईक पार्क करके हम दोनों वहाँ पहुँचे, जहाँ एक अधेड़ आयु वर्ग का आदमी फुटपाथ पर एक छोटी सी छतरी के नीचे गर्मागर्म चाय-पकौड़े बना रहा था. मैंने सोचा कि शायद आशीष भाई ने जिन साहित्यकार लक्ष्मण राव को मुझसे मिलवाने हेतु कहा है, और वे आसपास की किसी बहुमंजिला इमारत से उतरकर हमसे मिलने यहीं इसी गुमटी पर आएँगे. मैं चारों तरफ निगाहें दौड़ाता रहा कि अब लक्ष्मण राव आएँगे फिर आशीष उनका और मेरा परिचय करवाएँगे.

उधर गुमटी पर चाय तैयार हो चुकी थी और हल्की-फुल्की भीड़ के बीच हमारा नंबर आने ही वाला था. जब मैं और आशीष चाय लेने पहुँचे, तो अनायास मेरा ध्यान पास खड़ी एक साईकल पर गया. साईकिल के कैरियर पर बारिश से बचाने की जुगत में प्लास्टिक की पन्नी लगी हुई ढेरों पुस्तकें दिखाई दीं. चाय की गुमटी के पास किताबों से लदी हुई लावारिस साईकिल, बड़ा ही विरोधाभासी चित्र प्रस्तुत कर रही थी. मेरी नज़रों में प्रश्नचिन्ह देखकर आखिरकार आशीष से रहा नहीं गया. बोला, भाई जी अब आपकी बेचैनी और सस्पेंस दूर कर ही देता हूँ... जिन साहित्यकार लक्ष्मण राव जी से मैं आपको मिलवाने लाया हूँ, वे आपके सामने ही बैठे हैं. मैं भौंचक्का था... और खुलासा करते हुए आशीष ने कहा, चाय की गुमटी पर जो सज्जन चाय बना रहे हैं, वही हैं श्री लक्ष्मण राव... ज़ाहिर है कि मैं हैरान था, सोचा नहीं था ऐसा धक्का लगा था. दो मिनट बाद इस झटके से उबरकर मैंने लक्ष्मण राव जी से हाथ मिलाया, उनके साथ तस्वीर खिंचवाई और गौरवान्वित महसूस किया...


जी हाँ, आईटीओ के पास हिन्दी भवन के नीचे पिछले कई वर्षों से चाय-पान की गुमटी लगाने वाले सज्जन का नाम है लक्ष्मण राव. महाराष्ट्र के अमरावती से रोजी-रोटी की तलाश में भटकते-भटकते सूत मिल में मजदूरी, भोपाल में पाँच रूपए रोज पर बेलदारी, कभी ढाबे पर बर्तन माँजते हुए १९७५ में दिल्ली आ गए और इसी फुटपाथ पर जम गए. इतने संघर्षों के बावजूद पढ़ाई-लिखाई के प्रति उनका जूनून कम नहीं हुआ. मराठी में माध्यमिक तक शिक्षा हो ही चुकी थी. गाँव के पुस्तकालय में हिन्दी की अच्छी-अच्छी पुस्तकें पढ़ने को मिलती थीं. दिल्ली आने के बाद चाय-सिगरेट बेचकर आजीविका और परिवार पालने के बाद बचे हुए पैसों से दरियागंज जाकर शेक्सपीयर, गुरुदेव रविन्द्रनाथ, मुंशी प्रेमचंद, गुलशन नंदा आदि की पुस्तकें खरीद लाते और पढ़ते. साथ-साथ रात को अपने विचार लिखते भी जाते. लक्ष्मण राव का पहला उपन्यास “नईदुनिया की नई कहानी” १९७९ में प्रकाशित हुआ, उस समय वे चर्चा का विषय बन गए. लोगों को भरोसा नहीं होता था कि एक चायवाला और उपन्यासकार?? लेकिन जल्दी ही टाईम्स ऑफ इण्डिया के रविवारीय संस्करण में उनका संक्षिप्त परिचय छपा, इसके बाद तो धूम मच गई. १९८४ में इनकी मुलाक़ात श्रीमती इंदिरा गाँधी से हुई तथा २००९ में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने भी राष्ट्रपति भवन में बुलाकर लक्ष्मण राव जी की भूरि-भूरि प्रशंसा की. लक्ष्मण राव जी को कई सम्मान, पुरस्कार एवं प्रशंसा-पत्र प्राप्त हो चुके हैं. अभी तक दर्जनों लेख तथा २३ उपन्यास-पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं.



कोई भी व्यक्ति जब चाहे तब उनसे इसी चाय की गुमटी पर सुबह सात से रात्रि नौ बजे तक बड़े आराम से भेंट कर सकता है... लक्ष्मण राव जैसे व्यक्तियों को देखकर लगता है कि “समय की कमी” नामक कोई चीज़ नहीं होती, एवं लगन तथा रूचि बरकरार हो, तो व्यक्ति अपने शौक पूरे करने के लिए समय निकाल ही लेता है. न तो गरीबी उसे रोक सकती है, और ना ही संघर्ष और मुश्किलें उसकी राह में बाधा बन सकते हैं... 
Published in ब्लॉग
न्यूज़ लैटर के लिए साइन अप करें