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रविवार, 26 अक्टूबर 2014 13:48

Hinduism Or Nationalistic is not a Right Winger...

हिन्दू धर्म का समर्थक, “दक्षिणपंथी” नहीं कहा जा सकता...

(आदरणीय विद्वान डॉक्टर राजीव मल्होत्रा जी के लेख से साभार, एवं अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवादित)
अनुवादकर्ता : सुरेश चिपलूनकर, उज्जैन (मप्र)

मित्रों...

अक्सर आपने “कथित” बुद्धिजीवियों (“कथित” इसलिए लिखा, क्योंकि वास्तव में ये बुद्धिजीवी नहीं, बल्कि बुद्धि बेचकर जीविका खाने वाले व्यक्ति हैं) को “राईट विंग” अथवा “दक्षिणपंथी” शब्द का इस्तेमाल करते सुना होगा. इस शब्द का उपयोग वे खुद को वामपंथी अथवा बुद्धिजीवी साबित करने के लिए करते हैं, अर्थात 2+2=4 सिद्ध करने के लिए “वामपंथी का उल्टा दक्षिणपंथी”. ये लोग अक्सर इस शब्द का उपयोग, “हिन्दूवादियों” एवं “राष्ट्रवादियों” को संबोधित करने के लिए करते हैं.

अब सवाल उठता है कि ये दोनों शब्द (अर्थात वामपंथ एवं दक्षिणपंथ) आए कहाँ से?? क्या ये शब्द भारतीय बुद्धिजीवियों की देन हैं? क्या इन शब्दों का इतिहास तमाम विश्वविद्यालयों में वर्षों से जमे बैठे “लाल कूड़े” ने कभी आपको बताया?? नहीं बताया!. असल में पश्चिम और पूर्व से आने वाले ऐसे ढेर सारे शब्दों को, जिनमें पश्चिमी वर्चस्व अथवा पूर्वी तानाशाही झलकती हो, उसे भारतीय सन्दर्भों से जबरदस्ती जोड़कर एक “स्थानीय पायजामा” पहनाने की बौद्धिक कोशिश सतत जारी रहती है. इन बुद्धिजीवियों के अकादमिक बहकावे में आकर कुछ हिंदूवादी नेता भी खुद को “राईट विंग या दक्षिणपंथी” कहने लग जाते हैं. जबकि असल में ऐसा है नहीं. आईये देखें कि क्यों ये दोनों ही शब्द वास्तव में भारत के लिए हैं ही नहीं...

फ्रांस की क्रान्ति के पश्चात, जब नई संसद का गठन हुआ तब किसानों और गरीबों को भी संसद का सदस्य होने का मौका मिला, वर्ना उसके पहले सिर्फ सामंती और जमींदार टाईप के लोग ही सांसद बनते थे. हालाँकि चुनाव में जीतकर आने के बावजूद, रईस जमींदार लोग संसद में गरीबों के साथ बैठना पसंद नहीं करते थे. ऐसा इसलिए कि उन दिनों फ्रांस में रोज़ाना नहाने की परंपरा नहीं थी. जिसके कारण गरीब और किसान सांसद बेहद बदबूदार होते थे. जबकि धनी और जमींदार किस्म के सांसद कई दिनों तक नहीं नहाने के बावजूद परफ्यूम लगा लेते थे और उनके शरीर से बदबू नहीं आती थी. परफ्यूम बेहद महँगा शौक था और सिर्फ रईस लोग ही इसे लगा पाते थे और परफ्यूम लगा होना सामंती की विशेष पहचान था. तब यह तय किया गया कि संसद में परफ्यूम लगाए हुए अमीर सांसद अध्यक्ष की कुर्सी के एक तरफ बैठें और जिन्होंने परफ्यूम नहीं लगाया हुआ है, ऐसे बदबूदार गरीब और किसान सांसद दूसरी तरफ बैठें.



चूँकि ये दोनों ही वर्ग एक-दूसरे को नाम से नहीं जानते थे और ना ही पसंद करते थे, इसलिए संसद में आने वाले लोगों तथा रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों ने “अध्यक्ष के दाँयी तरफ बैठे लोग” और अध्यक्ष के बाँई तरफ बैठे लोग” कहकर संबोधित करना और रिपोर्ट करना शुरू कर दिया. आगे चलकर स्वाभाविक रूप से “अनजाने में ही” यह मान लिया गया, कि बाँई तरफ बैठे बदबूदार सांसद गरीबों और किसानों की आवाज़ उठाते हैं अतः उन्हें “लेफ्ट विंग” (अध्यक्ष के बाँई तरफ) कहा जाने लगा. इसी विचार के व्युत्क्रम में दाँयी तरफ बैठे सांसदों को “राईट विंग” (अध्यक्ष के सीधे हाथ की तरफ बैठे हुए) कहा जाने लगा. यह मान लिया गया कि “खुशबूदार लोग” सिर्फ अमीरों और जमींदारों के हितों की बात करते हैं.

एक व्याख्यान के पश्चात JNU के एक छात्र ने गर्व भरी मुस्कान के साथ मुझसे पूछा कि, “मैं तो वामपंथी हूँ, लेकिन आपका लेखन देखकर समझ नहीं आता कि आप राईट विंग के हैं या लेफ्ट विंग के”? तब मैंने जवाब दिया कि, चूँकि भारतीय संस्कृति में रोज़ाना प्रातःकाल नहाने की परंपरा है, इसलिए मुझे परफ्यूम लगाकर खुद की बदबू छिपाने की कोई जरूरत नहीं है. इसलिए ना तो आप मुझे “खुशबूदार” की श्रेणी में रख सकते हैं और ना ही “बदबूदार” की श्रेणी में. भारत के लोग सर्वथा भिन्न हैं, उन्हें पश्चिम अथवा पूर्व की किसी भी शब्दावली में नहीं बाँधा जा सकता.

पश्चिमी बुद्धिजीवियों और लेखकों द्वारा “बना दी गई अथवा थोप दी गई सामान्य समझ” के अनुसार दक्षिणपंथी अर्थात धार्मिक व्यक्ति जो पूँजीवादी व्यवस्था और कुलीन सामाजिक कार्यक्रमों का समर्थक है. जबकि उन्हीं बुद्धिजीवियों द्वारा यह छवि बनाई गई है कि “वामपंथी” का अर्थ ऐसा व्यक्ति है जो अमीरों के खिलाफ, धर्म के खिलाफ है.

ऐसे में सवाल उठता है कि पश्चिम द्वारा बनाए गए इस “खाँचे और ढाँचे” के अनुसार मोहनदास करमचंद गाँधी को ये बुद्धिजीवी किस श्रेणी में रखेंगे? लेफ्ट या राईट? क्योंकि गाँधी तो गरीबों और दलितों के लिए भी काम करते थे साथ ही हिन्दू धर्म में भी उनकी गहरी आस्था थी. एक तरफ वे गरीबों से भी संवाद करते थे, वहीं दूसरी तरफ जमनादास बजाज जैसे उद्योगपतियों को भी अपने साथ रखते थे, उनसे चंदा लेते थे. इसी प्रकार सैकड़ों-हजारों की संख्या में “हिन्दू संगठन” हैं, जो गरीबों के लिए उल्लेखनीय काम करते हैं साथ ही धर्म का प्रचार भी करते हैं. दूसरी तरफ भारत में हमने कई तथाकथित सेकुलर एवं लेफ्ट विंग के ऐसे लोग भी देख रखे हैं, जो अरबपति हैं, कुलीन वर्ग से आते हैं. अतः “वाम” और “दक्षिण” दोनों ही पंथों को किसी एक निश्चित भारतीय खाँचे में फिट नहीं किया जा सकता, लेकिन अंधानुकरण तथा बौद्धिक कंगाली के इस दौर में, पश्चिम से आए हुए शब्दों को भारतीय बुद्धिजीवियों द्वारा न सिर्फ हाथोंहाथ लपक लिया जाता है, बल्कि इन शब्दों को बिना सोचे-समझे अधिकाधिक प्रचार भी दिया जाता है... स्वाभाविकतः हिंदुत्व समर्थकों अथवा राष्ट्रवादी नेताओं-लेखकों को “राईट विंग” (या दक्षिणपंथी) कहे जाने की परंपरा शुरू हुई.

हिन्दू ग्रंथों में इतिहास, धर्म, अर्थशास्त्र, वास्तु इत्यादि सभी हैं, जिन्हें सिर्फ संभ्रांतवादी नहीं कहा जा सकता. यह सभी शास्त्र इस पश्चिमी वर्गीकरण में कतई फिट नहीं बैठते. प्राचीन समय में जिस तरह से एक ब्राह्मण की जीवनशैली को वर्णित किया गया है, वह इस “अमेरिकी दक्षिणपंथी” श्रेणी से कतई मेल नहीं खाता. अतः हिंदुओं को स्वयं के लिए उपयोग किए जाने वाले “दक्षिणपंथी” शब्द को सीधे अस्वीकार करना चाहिए. एक हिन्दू होने के नाते मुझमें तथाकथित “अमेरिकी दक्षिणपंथ” के भी गुण मौजूद हैं और “अमेरिकी वामपंथ” के भी. मैं स्वयं को किसी सीमा में नहीं बाँधता, मैं दोनों ही तरफ की कई विसंगतियों से असहमत हूँ और रहूँगा. हाँ!!! अलबत्ता यदि कोई वामपंथी मित्र स्वयं को गर्व से वामपंथी कहता है तो उसे खुशी से वैसा करने दीजिए, क्योंकि वह वास्तव में वैसा ही है अर्थात पूँजी विरोधी, धर्म विरोधी और “बदबूदार”.

पुनश्च :- (आदरणीय विद्वान डॉक्टर राजीव मल्होत्रा जी के लेख से साभार एवं अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवादित)

अनुवादकर्ता : सुरेश चिपलूनकर, उज्जैन (मप्र) 
Published in ब्लॉग
बुधवार, 15 अक्टूबर 2014 11:31

Water Management of Gambhir Dam Ujjain is Must

सिर्फ जल संरक्षण नहीं, जल संचय, प्रबंधन  और बचत भी आवश्यक...

- Suresh Chiplunkar, Ujjain 

आधुनिक युग में जैसा कि हम देख रहे हैं, प्रकृति हमारे साथ भयानक खेल कर रही है, क्योंकि मानव ने अपनी गलतियों से इस प्रकृति में इतनी विकृतियाँ उत्पन्न कर दी हैं, कि अब वह मनुष्य से बदला लेने पर उतारू हो गई है. केदारनाथ की भूस्खलन त्रासदी हो, या कश्मीर की भीषण बाढ़ हो, अधिकांशतः गलती सिर्फ और सिर्फ मनुष्य के लालच और कुप्रबंधन की रही है. 

बारिश के पानी को सही समय पर रोकना, उचित पद्धति से रोकना ताकि वह भूजल के रूप में अधिकाधिक समय तक सुरक्षित रह सके तथा छोटे-छोटे स्टॉप डैम, तालाब इत्यादि संरचनाओं के द्वारा ग्रामीण इलाकों में किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की विभिन्न प्रक्रियाओं पर लगातार विचार किया जाता रहा है और आगे भी इस दिशा में कार्य किया ही जाता रहेगा, क्योंकि जल हमारी अर्थव्यवस्था, हमारे जीवन, हमारे सामाजिक ताने-बाने, हमारी सांस्कृतिक गतिविधियों का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है. ज़ाहिर है कि समय-समय पर इस विषय को लेकर कई जल विशेषज्ञ, इंजीनियर एवं समाजशास्त्रियों द्वारा उल्लेखनीय कार्य किया गया है. परन्तु मेरा मानना है कि हमें जल संरक्षण के साथ-साथ जल बचत पर भी उतनी ही गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है. चूँकि मैं मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले से हूँ, अतः इस सम्बन्ध में मैं आपके समक्ष इसी क्षेत्र को उदाहरण के रूप में पेश करता हूँ, ताकि इस उदाहरण को देश के अन्य जिलों की सभी जल संरचनाओं पर समान रूप से लागू किया जा सके.

जैसा कि सभी जानते हैं, उज्जैन एक प्राचीन नगरी है जहाँ ज्योतिर्लिंग भगवान महाकालेश्वर स्थित हैं, तथा प्रति बारह वर्ष के पश्चात यहाँ कुम्भ मेला आयोजित होता है, जिसे “सिंहस्थ” कहा जाता है. उज्जैन में आगामी कुम्भ मेला अप्रैल-मई २०१६ में लगने जा रहा है, अर्थात अब सिर्फ डेढ़ वर्ष बाकी है. उज्जैन नगर को जलप्रदाय करने अर्थात इसकी प्यास बुझाने का एकमात्र स्रोत है यहाँ से कुछ दूरी पर बना हुआ बाँध जो 1992 वाले कुम्भ के दौरान गंभीर नदी पर बनाया गया था. उल्लेखनीय है कि गंभीर नदी, चम्बल नदी की सहायक नदी है, जो कि नर्मदा नदी की तरह वर्ष भर “सदानीरा” नहीं रहती, अर्थात सिर्फ वर्षाकाल में ही इसमें पानी बहता है और इसी पानी को वर्ष भर संभालना होता है. कहने को तो यहाँ शिप्रा नदी भी है, परन्तु वह भी सदानीरा नहीं है और उसे भी स्थान-स्थान पर स्टॉप डैम बनाकर पानी रोका गया है जो सिंचाई वगैरह के कामों में लिया जाता है, पीने के योग्य नहीं है क्योंकि सारे उज्जैन का कचरा और मल-मूत्र इसमें आकर गिरता है. पेयजल के एकमात्र स्रोत अर्थात गंभीर बाँध की मूल क्षमता 2250 McFT है. 1992 में इसके निर्माण के समय यह कहा गया था कि, अब अगले तीस-चालीस साल तक उज्जैन शहर को पानी के लिए नहीं तरसना पड़ेगा. इंजीनियरों द्वारा ये भी कहा गया था कि इस बाँध को एक बार पूरा भर देने के बाद, यदि दो साल तक लगातार बारिश नहीं भी हो, तब भी कोई तकलीफ नहीं आएगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. वर्ष 2004 में जलसंकट और वर्ष 2007 में यह प्राचीन नगरी अपने जीवनकाल का सबसे भयानक सूखा झेल चुकी है. उस वर्ष जून से सितम्बर तक औसत से 40% कम वर्षा हुई थी. तो फिर ऐसा क्या हुआ, कि मामूली सा जलसंकट नहीं, बल्कि सात-सात दिनों में एक बार जलप्रदाय के कारण शहर से पलायन की नौबत तक आ गई? कारण वही है, कुप्रबंधन, राजनीति और दूरगामी योजनाओं का अभाव.


(चित्र :- उज्जैन नगर को पेयजल आपूर्ति करने वाला गंभीर बाँध 
जो शहर से लगभग १८ किमी दूर है) 

जल संरक्षण के साथ-साथ जिस जल संचय एवं जल बचत के बारे में मैंने कहा, अब उसे सभी बड़े शहरों एवं नगरों में लागू करना बेहद जरूरी हो गया है. उज्जैन में 2007 के भीषण जलसंकट के समय प्रशासन का पहला कुप्रबंधन यह था कि जब उन्हें यह पता था कि माह सितम्बर तक औसत से बहुत कम बारिश हुई है, तो उन्हें “लिखित नियमों” के अनुसार बाँध के गेट खुले रखने की क्या जरूरत थी? पूछने पर प्रशासनिक अधिकारियों ने कहा कि यह शासकीय नियम है कि वर्षाकाल में माह जुलाई से पन्द्रह सितम्बर तक बाँध के गेट खुले रखना जरूरी है, लेकिन यह एक सामान्य समझ है कि इस नियम को तभी लागू किया जाना चाहिए, जब लगातार बारिश हो रही हो. ऊपर से बारिश नहीं हुई और इधर बाँध से पानी बहता रहा. दूसरी गलती यह रही कि नवंबर से जनवरी के दौरान गेहूँ की फसल के लिए इसी बाँध से आसपास के किसानों ने पानी की जमकर चोरी की और प्रशासन तथा राजनीति मूकदर्शक बने देखते रहे, क्योंकि किसान एक बड़ा वोट बैंक है. हालाँकि दिखावे के लिए बाँधों के आसपास स्थित गाँवों में समृद्ध किसानों की चंद मोटरें और पम्प जब्त किए जाते हैं, लेकिन यह बात सभी जानते हैं कि जल संसाधन विभाग के कर्मचारी इसमें कितनी रिश्वतखोरी करते हैं और आराम से पानी चोरी होने देते हैं. यह तो हुई राजनीती और कुप्रबंधन की बात, अब आते हैं दूरगामी योजनाओं के अभाव के बारे में.

इस वर्ष भी उज्जैन और आसपास बारिश कम हुई है. गंभीर बाँध जिसकी क्षमता 2250 McFT है वह इस बार सिर्फ 1700 McFT ही भर पाया है (वह भी इंदौर के यशवंत सागर तालाब की मेहरबानी से). अब जबकि यह स्पष्ट हो चुका है, कि आगे और बारिश होने वाली नहीं है तथा समूचे उज्जैन शहर को इतना ही उपलब्ध पानी जुलाई 2015 के पहले सप्ताह तक चलाना है तो फिर अक्टूबर के माह में रोजाना जलप्रदाय की क्या जरूरत है? जी हाँ!!!, उज्जैन में पिछले वर्ष भी पूरे साल भर रोजाना एक घंटा नल दिए गए, फिर जब इस वर्ष बारिश में देरी हुई तो हाय-तौबा मचाई गई. इस साल भी बारिश कम हुई है, तब भी एक दिन छोड़कर जलप्रदाय के निर्णय में पहले देर की गई और अब त्यौहारों का बहाना बनाकर रोजाना जलप्रदाय किया जा रहा है. सार्वजनिक नल कनेक्शन की दुर्दशा के बारे में तो सभी जानते हैं. अतः रोजाना जो जलप्रदाय किया जा रहा है, वह खराब या टूटी हुई टोंटियों से नालियों में बेकार बहता जा रहा है, अथवा इस जलप्रदाय का फायदा सिर्फ उन मुफ्तखोरों को मिल रहा है, जो पानी बिल तक नहीं चुकाते. ऐसे में उज्जैन की जनता को आगामी मई-जून 2015 के भविष्य की कल्पना भी डरा देती है. मेरा प्रस्ताव यह है कि पूरे देश में जहाँ भी किसी शहर की जलप्रदाय व्यवस्था सिर्फ एक स्रोत पर निर्भर हो, वहाँ साल भर एक दिन छोड़कर नलों में पानी दिया जाए. वैसे भी ठण्ड के दिनों में अर्थात नवंबर से फरवरी तक पानी की खपत कम ही रहती है. इसलिए इस दौरान जल संचय या जल बचत का यह फार्मूला जनता को मई-जून-जुलाई में राहत देगा, बशर्ते इसमें राजनीति आड़े ना आए.

दूरगामी योजनाओं के अभाव की दूसरी मिसाल है बाँधों में जमा होने वाली गाद, जिसे अंगरेजी में हम “सिल्ट” कहते हैं, की सफाई नहीं होना. प्रकृति का नियम है कि नदी में बारिश के दिनों में बहकर आने वाला पानी अपने साथ रेत, मिट्टी के बारीक-बारीक कण लेकर आता है, जो धीरे-धीरे बाँध की तलहटी में बैठते, जमा होते जाते हैं और जल्दी ही एक मोटी परत का रूप धारण कर लेते हैं. मैंने उज्जैन के जिस गंभीर बाँध का यहाँ उदाहरण दिया है, उसकी क्षमता 2250 McFT बताई जाती है. उज्जैन नगर को पानी पिलाने में रोजाना का खर्च होता है लगभग 6-7 McFT. यदि मामूली हिसाब भी लगाया जाए, तो पता चलता है कि यदि शहर को रोजाना भी पानी दिया जाए तो वर्ष में लगभग 320-350 दिनों तक जलप्रदाय किया जा सकता है (माह सितम्बर में बाँध भरने के दिन से गिनती लगाई जाए तो). लेकिन पिछले दस वर्ष में ऐसा कभी नहीं हुआ कि जुलाई माह आते-आते बाँध के खाली होने की नौबत ना आ जाती हो. ऐसा क्यों होता है?? ज़ाहिर है कि, जिस बाँध की क्षमता 2250 MCFT बताई जा रही है, उसकी क्षमता उतनी है ही नहीं... यह क्षमता इसलिए कम हुई है, क्योंकि बाँध की तलहटी के एक बड़े हिस्से में खासी गाद जमा हो चुकी है, जिसकी सफाई वर्षों से आज तक नहीं हुई. यदि एक मोटा अनुमान भी लगाया जाए तो पता चलता है कि पिछले बीस वर्ष में गंभीर बाँध में गाद की एक खासी मोटी परत जमा हो गई है, जिसके कारण बाँध की वास्तविक क्षमता बेहद घट चुकी है, लेकिन अधिकारी और प्रशासन उसी पुराने स्केल पर मीटर की गहराई नाप रहा है जो बरसों पहले दीवार पर पेंट की गई है. कहने का तात्पर्य यह है कि जिस बाँध की क्षमता 2250 बताई जा रही है वह शायद 1500 या उससे भी कम रह गई हो, अन्यथा सितम्बर से लेकर जुलाई तक सिर्फ 270 दिनों में ही, हर साल बाँध का पानी खत्म क्यों हो जाता है? अतः मेरा दूसरा सुझाव यह है कि देश के सभी बाँधों में जमा गाद की गर्मियों में नियमित सफाई की जाए. गर्मियों के दिनों में जब बाँधों का पानी लगभग खत्म हो चुका होता है, उसी समय आठ दिनों के सामाजिक श्रमदान एवं प्रशासनिक सहयोग तथा आधुनिक उपकरणों के जरिये बाँधों को गहरा किया जाना चाहिए. यह पता लगाया जाना चाहिए कि बाँध की वास्तविक क्षमता क्या है?


(प्रस्तुत चित्र 2007 के जलसंकट के समय का है, साफ़ देखा जा सकता है कि बाँध की तलहटी में कितनी गाद जम चुकी है, जिसके कारण इसकी भराव क्षमता कम हुई है). 

तीसरी एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है, कि बढ़ते शहरीकरण के कारण बाँध के पानी के उपयोग की प्राथमिकताओं में कलह होने लगा है. यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बाँध का पानी सिंचाई के लिए है या पेयजल के लिए, अर्थात शहरी और ग्रामीण हितों का टकराव न होने पाए. अक्सर देखा गया है कि समृद्ध किसान नवंबर से फरवरी के दौरान अपनी फसलों के लिए बाँधों से पानी चोरी करते हैं. इसे रोका जाना चाहिए. इस पर रोक लगाने के लिए सिर्फ प्रशासनिक अमला काफी नहीं है, राजनैतिक इच्छाशक्ति भी जरूरी है, क्योंकि जैसा मैंने पहले कहा किसान एक बड़ा वोट बैंक है.

अंत में संक्षेप में सिर्फ तीन बिंदुओं में कहा जाए तो – १) शहरों में रोजाना जलप्रदाय की कतई आवश्यकता नहीं है, एक दिन छोड़कर जलप्रदाय किया जाना चाहिए... २) गर्मियों के दिनों में बाँधों की तलछट में जमा हुई गाद की नियमित सफाई होनी चाहिए, ताकि बाँध गहरा हो सके और उसकी क्षमता बढे... और ३) बाँध से पानी की चोरी रोकना जरूरी है, यह सुनिश्चित हो कि पानी का उपयोग पेयजल हेतु ही हो, ना कि सिंचाई के लिए.... यदि सभी शहरों में इन तीनों बिंदुओं पर थोड़ा भी ध्यान दिया जाएगा, तो मुझे विश्वास है कि “जल-संचय” एवं “जल-बचत” के माध्यम से भी हम काफी कुछ जल संरक्षण का लक्ष्य हासिल कर सकेंगे. मैं इस मीडिया चौपाल के माध्यम से अपने समस्त पत्रकार मित्रों एवं मीडिया समूहों से आव्हान करना चाहता हूँ कि सभी बड़े नगरों में इन तीन बिंदुओं पर अवश्य विचार किया जाए. इसमें मीडिया का दबाव कारगर होता है, और स्वाभाविक है कि जब हम कहते हैं कि “जल ही जीवन है”, तो अपने जीवन हेतु हमें सम्मिलित प्रयास करने ही होंगे... भूजल संरक्षण के साथ ही जो जल भण्डार हमें वर्षाकाल में उपलब्ध होते हैं उस पानी की बचत और समुचित प्रबंधकीय संचय करना भी जरूरी है.

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---____ :-  सुरेश चिपलूणकर, उज्जैन 
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