desiCNN - Items filtered by date: मार्च 2011
हाल ही में भारतीय सेना की इंटेलिजेंस कोर ने सीमापार से जो रेडियो संदेश पकड़े हैं उनके मुताबिक पाकिस्तान की खुफ़िया एजेंसी ISI ने कश्मीर में आतंकवादियों को रास्ता दिखाने वाले और सीमा पार करवाने वाले “भाड़े के टट्टुओं” यानी गाइडों का भत्ता चार गुना बढ़ा दिया है। पहले एक बार आतंकवादियों के गुट को सीमा पार करवाने पर गाइड को 25,000 रुपये मिलते थे, लेकिन अब ISI (ISI Pakistan) ने इसे बढ़ाकर सीधे एक लाख रुपये कर दिया है।

विगत कुछ माह से भारतीय सेना ने जिस प्रकार आतंकवादियों पर अपना शिकंजा कसा है और आतंकवादियों के घुसने के रास्तों पर पहरा और चौकसी बढ़ाई है, उसे देखते हुए घुसपैठ में काफ़ी कमी आई है। इसीलिये ISI को अपने कश्मीरी गाइडों का भत्ता बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ा है। अमूमन गर्मियों में जब बर्फ़ पिघलती है तब भारी संख्या में आतंकवादी भारत में घुसने में कामयाब हो जाते हैं, जबकि ठण्ड में बर्फ़बारी की वजह से कई पहाड़ी रास्ते बन्द हो जाते हैं। परन्तु इन गर्मियों में पाकिस्तान को आतंकवादी इधर ठेलने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि भारतीय सुरक्षा बलों (Indian Army in Kashmir) ने छोटे-छोटे रास्तों पर जमकर पहरेदारी की है, और जंगल में चरवाहों के भेष में भटकने वाले “गाइडों” को खदेड़ दिया है। मजबूरी में ISI ने एक फ़ेरे की फ़ीस बढ़ाकर एक लाख कर दी है, फ़िर भी उन्हें गाइड आसानी से नहीं मिल रहे हैं…


खुफ़िया सूचना के मुताबिक इस समय पाक के “अनधिकृत कब्जे वाले” (Pakistan Occupied Kashmir) कश्मीर में लगभग 45 ट्रेनिंग कैम्प चल रहे हैं जिसमें 2000 आतंकवादी भारत में घुसने का इंतज़ार कर रहे हैं, ISI को इन्हें खिलाना-पिलाना और पालना-पोसना महंगा पड़ता जा रहा है। भारतीय सुरक्षा बलों ने ऊँची-ऊँची पहाड़ियों पर स्थित रास्तों को खतरनाक आतंकवादियों के लिये मुश्किल बना दिया है। लेकिन ISI और पाकिस्तान, कुत्ते की उस टेढ़ी पूँछ के समान हैं जिसे 25 साल तक एक सीधी नली में डालकर भी रखा जाये तब भी बाहर निकालने पर टेढ़ी ही रहेगी…

 इसी “टेढ़ी पूँछ” को मोहाली में अपने पास बैठाकर, घी-मक्खन लगाकर सीधी करने की बेवकूफ़ाना कोशिश, कुछ “परम आशावादी” नॉस्टैल्जिक सेकुलर्स और अमन की आशा पाले बैठी कुछ नाजायज़ औलादें करेंगी…

अब बात कुत्तों की चली है, तो एक और खबर…

भारतीय सेना ने कश्मीर घाटी में आवारा कुत्तों (Stray Dogs in Kashmir) की हत्या और उनके गायब होने के सम्बन्ध में जाँच शुरु कर दी है। श्रीनगर में पिछले एक वर्ष में ऐसा देखने में आया है कि आवारा कुत्तों के समूह के समूह अचानक मृत पाये जाते हैं या गायब हो जाते हैं। सीमारेखा पर स्थित गाँवों में यह स्थिति बार-बार देखने में आई है। सेना की दसवीं डिवीजन के प्रवक्ता लेफ़्टिनेंट कर्नल एनके आयरी ने कहा है कि यह आवारा कुत्ते (जिन्हें आवारा कहना भी एक तरह की क्रूरता है) सेना के जवानों के लिये काफ़ी मददगार सिद्ध हो रहे हैं, रात के समय किसी भी संदिग्ध गतिविधि को देखकर ये कुत्ते भौंककर जवानों को आगाह कर देते हैं। सेना के कई अफ़सरों को ये कुत्ते बेहद प्रिय हैं।


हबीब रहमान नामक सेना से रिटायर्ड लेफ़्टिनेंट बताते हैं कि यह आवारा कुत्ते आसानी से सीख जाते हैं, इन्हें खाने-खिलाने का खर्च भी कम है तथा रात को इन्हें बिना किसी खतरे के इधर-उधर घूमने के लिये खुला भी छोड़ा जा सकता है। सबसे बड़ी बात यह कि इन्हें सेना के विशालकाय कुत्तों की तरह आसानी से पहचाना भी नहीं जा सकता कि ये जवानों के मददगार हैं। परन्तु सेना की मदद करने की वजह से पिछले कुछ समय से इन कुत्तों की सामूहिक हत्या शुरु हो गई है। मेजर जनरल अशोक मेहता (रिटायर्ड) ने काफ़ी पहले अपने एक लेख में कृपा नामक एक कुत्ते का जिक्र किया है जिसे पहाड़ों मे घूमते समय वे पकड़ लाये थे। नियंत्रण रेखा पर गोरखा राइफ़ल्स का वह प्रिय कुत्ता था और उसने कई आतंकवादियों और घुसपैठियों को ढेर करने में मदद की थी।

आंध्रप्रदेश के DGP स्वर्णजीत सेन ने भी नक्सलवादियों के इलाकों में स्थित पुलिस थानों को ऐसे ही आवारा कुत्तों को पालने और उन्हें अपना “मित्र” बनाने की सलाह दी थी और उसके नतीजे भी काफ़ी अच्छे मिले हैं। माओवादियों (Maoists in India) और नक्सलवादियों ने कुत्तों की इस “जागते रहो” मुहिम से चिढ़कर अन्दरूनी गाँवों में कुत्तों का सफ़ाया करना शुरु कर दिया, और गाँववालों को भी धमकियाँ दी हैं कि वे गाँव में एक भी कुत्ता न रखें।

आवारा कुत्तों की संख्या में कमी लाने हेतु Animal Welfare Board ने इनकी नसबन्दी करने का प्रस्ताव जम्मू-कश्मीर सरकार को भेजा है, लेकिन सरकार की तरफ़ से अभी तक कोई सहमति नहीं मिली है। इसकी बजाय सरकार में बैठे कुछ “संदिग्ध लोग” “कुत्तों को मार देने” जैसे प्रस्ताव की माँग कर रहे हैं (Stray Dogs killing in Kashmir) । विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने एक अध्ययन में पाया है कि कुत्तों को मारने की बजाय संख्या में कमी के लिये उनकी नसबन्दी ही अधिक कारगर उपाय है, परन्तु सीमापार से आने वाले आतंकवादियों के लिये यही आखिरी रास्ता बचता है कि वे दूरदराज के गाँवों से धीरे-धीरे कुत्तों को मारते चलें, ताकि सुरक्षा बलों पर निशाना साधने में आसानी हो…।

इधर भारतीय सुरक्षा बल मुस्तैदी से घुसपैठ भी रोक रहे हैं और उनकी मदद करने वाले इन कुत्तों से दोस्ती भी बढ़ा रहे हैं… जबकि उधर मोहाली में “अमन की आशा” (Aman ki Asha) करने वाले सेकुलर्स, वोटों की खातिर अपने देश की सुरक्षा को खतरे में डालकर 6500 स्पेशल वीज़ा जारी कर रहे हैं…

आम आदमी यह सोच-सोचकर उबला जा रहा है कि मुम्बई हमले (Mumbai Terror Attack 26/11) में शहीद हुए 150 से अधिक परिवारों के दिल पर क्या गुज़रेगी, जब मनमोहन सिंह हें-हें-हें-हें-हें-हें करते हुए गिलानी का स्वागत करेंगे…।

अब आप ही बताईये कश्मीर में सेना की मदद करने वाले आवारा कुत्ते ज्यादा बेहतर और आदरणीय हैं, या “क्रिकेट डिप्लोमेसी” नाम की फ़ूहड़ता परोसने वाले विदेश मंत्रालय के अधिकारी और घोटालों-अपराधों को भुलाकर क्रिकेट-क्रिकेट भजने वाले मीडिया के घटिया भाण्ड…?   आपसे अनुरोध है कि मीडिया के पागलों, भ्रष्ट नेताओं और मूर्ख अफ़सरों को चाहे कुछ भी सम्बोधन दें, लेकिन "कुत्ता" न कहें, प्रशिक्षित हों या आवारा… निश्चित रुप से कुत्ते इनसे बेहतर हैं।

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देश की सुप्रीम कोर्ट लगातार कांग्रेस सरकार को फ़टकार पर फ़टकार लगाये जा रही है, लेकिन सुधरना तो दूर, सरकार के कर्ताधर्ता चिकने घड़े की तरह बड़ी बेशर्मी से मुस्करा रहे हैं। ताज़ा मामला हसन अली का है, प्रवर्तन निदेशालय के दस्तावेजों में साफ़ दर्ज है कि हसन अली ने “अज्ञात स्रोतों”(?) से करोड़ों रुपये (डॉलर) स्विटजरलैण्ड की बैंकों में जमा किये हैं, लेकिन मजबूरी में (यानी सुप्रीम कोर्ट द्वारा पिछवाड़े में डण्डा करने के बाद ही) जब हसन अली (Hasan Ali Khan)  पर कार्रवाई करने की नौबत आई तो सरकारी एजेंसी ऐसा कोई सबूत ही पेश नहीं कर पाई, और अदालत ने हसन अली को सशर्त जमानत पर रिहा कर दिया। हसन अली सिर्फ़ एक-दो दिन के लिये हिरासत में रहा।


जिस व्यक्ति को जरा भी ज्ञान न हो, एकदम बेवकूफ़ हो या एकदम बोदे दिमाग वाला हो… वह भी आँख बन्द करके बता सकता है कि 50,000 करोड़ से अधिक की टैक्स चोरी (Tax Evation by Hasan Ali)  करने वाला “सिर्फ़ घोड़े का व्यापारी” या “स्क्रेप आयात करने” वाला नहीं हो सकता। सभी जानते हैं कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक पैसा ड्रग्स डीलिंग और हथियारों के सौदे की कमीशनखोरी में है। जब बोफ़ोर्स जैसा सिर्फ़ 64 करोड़ का सौदा क्वात्रोच्ची को मालामाल कर देता है तो आजकल अरबों के जो सौदे होते हैं उसमें अदनान खशोगी (Adnan Khashoggi Arms Dealer)  जैसे बड़े हथियार डीलरों (कमीशनबाजों) और भारत में उसके एजेण्ट हसन अली और दाऊद जैसे लोग अपने-आप में एक “अर्थव्यवस्था” हैं, और यह राजपाट बगैर उच्च स्तर के राजनैतिक संरक्षण के सम्भव ही नहीं है।

जानते सभी हैं, मानते सभी हैं, लेकिन “ऊपरी दबाव” इतना ज्यादा है कि हसन अली का बाल भी बाँका नहीं हो रहा। यदि जाँच एजेंसियों और आयकर विभाग के पास कोई सबूत नहीं था, तो फ़िर मुम्बई आयकर विभाग ने हसन अली को विदेशी बैंक में खाता रखने और उसे घोषित करने के आरोप में नोटिस क्यों भेजा? और नोटिस भेजा था तो उस पर आगे अमल क्यों नहीं किया गया, आयकर विभाग अब तक क्यों सोता रहा? राज्यसभा में 4 अगस्त 2009 को ही जब सरकार ने लिखित में मान लिया था कि हसन अली 50,0000 करोड़ का देनदार है, तो पिछले 2 साल में मनमोहन सिंह-प्रणब मुखर्जी-चिदम्बरम-मोंटेक सिंह वगैरह क्या अब तक तेल बेच रहे थे?

यह विशालतम (और कल्पनातीत) डॉलरों के आँकड़े और कारनामे तो हम आज की तारीख की बात कर रहे हैं, लेकिन हसन अली रातोंरात तो इस स्तर पर पहुँचा नहीं होगा। सीढ़ी-दर-सीढ़ी राजनेताओं, अफ़सरों और व्यवस्था को पुचकारते-लतियाते-जुतियाते ही यहाँ तक पहुँचा होगा। सवाल उठता है कि उसके पिछले अपराधों पर अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई? हसन अली खान को उसकी युवावस्था में बचाने वाले नेता और अफ़सर कौन-कौन हैं? आईये देखते हैं हसन अली के पुराने कारनामों को -


हसन अली का बाप आबकारी अधिकारी था, हैदराबाद (Hyderabad India)  के मुशीराबाद इलाके के इस परिवार में हसन अली का एक भाई और चार बहनें हैं। हसन अली ने शुरुआत में कबाड़ खरीदने-बेचने से शुरुआत की, फ़िर वह पुरातत्व की वस्तुओं और मूर्तियों के निर्यात के बिजनेस में उतरा (गजब का संयोग है कि सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा भी इसी धंधे में हैं, और सोनिया गाँधी के परिवार के भी इटली में शो-रुम हैं जो “एंटीक” वस्तुओं का आयात-निर्यात करते हैं)। खैर… हसन अली हैदराबाद से पुणे चला गया और वहाँ घोड़ों को खरीदने-बेचने-ट्रेनिंग देने और रेस में पैसा लगाने का धंधा शुरु कर लिया, उसकी दूसरी बीबी (वर्तमान) इस धंधे में उसकी पार्टनर बताई जाती है। जबकि पहली बीबी मेहबूबुन्निसा बेगम अपने दो बेटों के साथ आज भी हैदराबाद के “सुपर-पॉश” बंजारा हिल्स इलाके में रहती है।

(हसन अली के समर्थक(?) और कांग्रेस के चमचे कहेंगे कि इसमें कौन सी बड़ी बात है, कोई भी व्यक्ति कोई सा भी धंधा कर सकता है, जब तक वह कोई गैरकानूनी काम नहीं करता)

लेकिन मामला इतना सीधा नहीं है, मार्च 1990 में (यानी आज से 21 साल पहले) हैदराबाद के SBI की चारमीनार ब्रांच (Charminar Hyderabad)  के मैनेजर ने पुलिस में FIR दर्ज की थी कि हसन अली ने फ़र्जी ड्राफ़्टों की धोखाधड़ी के जरिये 26 लाख रुपये निकाल लिये हैं और चेक बाउंस होने के बावजूद धड़ाधड़ चेक काटता रहा और माल उठाता रहा है। इसी से मिलती-जुलती शिकायत लिखित में हैदराबाद के ANZ Grindlays Bank के मैनेजर ने भी कर रखी है (कोई नहीं जानता कि 21 साल में इस धोखेबाज पर क्या कार्रवाई हुई)

सितम्बर 1991 में केन्द्र सरकार ने “अनोखी”(?) योजना जाहिर की थी कि जितने भी टैक्स चोर हैं, काले धन के मालिक हैं… वे अपनी सम्पत्ति में से 30% टैक्स दे दें तो उनकी सारी सम्पत्ति “सफ़ेद धन” मान ली जायेगी। (Voluntary Disclosure Income Scheme) यानी ऐ टैक्स चोरों, हमारी तो औकात है नहीं कि हम तुम्हें पकड़ सकें, इसलिये आओ और “भीख” में अपने 30% टैक्स का टुकड़ा डाल जाओ और ऐश करो… तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा… (बड़े-बड़े हरामखोर मगरमच्छों को “प्यार से सहलाने” वाली इस अनोखी स्कीम के प्रणेता भी उस वक्त हमारे “ईमानदार बाबू” ही थे… तालियाँ…)। इस स्कीम(?) के दौरान हसन अली ने तीन NRI लोगों, सुरेश मेहता से 10 लाख, राजेश गुप्ता से 6 लाख, एक अन्य राजेश गुप्ता से 36 लाख, टी रामनाथ और पी कोटेश्वर राव से 18 लाख रुपये “सरेण्डर” करवाने का आश्वासन देकर फ़र्जी अन्तर्राष्ट्रीय मनीऑर्डरों को ड्राफ़्ट में बदलकर उन्हें और सरकार को कुल 70 लाख का चूना लगा दिया। हैदराबाद पुलिस ने हसन अली को 1991 और 1992 में दो बार गिरफ़्तार किया था, लेकिन “रहस्यमयी” तरीके से उस पर कोई खास कार्रवाई नहीं हुई।

(VDIS नामक बेशर्म और नपुंसक योजना में 30,000 करोड़ की सम्पत्ति उजागर हुई और सरकार को 7800 करोड़ का राजस्व मिला… लेकिन फ़िर भी कोई सत्ताधीश या वित्तमंत्री शर्म से डूब कर नहीं मरा…)

एक बार हसन अली अपनी माँ की बीमारी का बहाना बनाकर कनाडा भाग गया था, फ़िर हैदराबाद पुलिस इंटरपोल रेडकॉर्नर नोटिस (Interpol Red Corner Notice)  के जरिये उसे गिरफ़्तार करवाकर मुम्बई लाई और हैदराबाद ले गई। धोखाधड़ी के उस केस में हसन अली की चार कारें और एक मर्सीडीज़ (उस जमाने में भी मर्सीडीज़ थी उसके पास) जब्त कर लीं। जब केस कोर्ट में आगे बढ़ा तो जिन चारों NRI ने उसके खिलाफ़ रिपोर्ट दर्ज की थी, वे बयान देने भारत ही नहीं आये। फ़िलहाल इस केस की क्या स्थिति है, यह किसी को नहीं पता… लेकिन हैदराबाद पुलिस के अन्दरूनी सूत्रों का कहना है कि मां की बीमारी का सिर्फ़ बहाना था, असल में हसन अली, उन चारों व्यक्तियों को “धमकाने” के लिये ही कनाडा गया था।

हसन अली पर सबसे पुराना केस दर्ज हुआ है 1984 में, जब उसने अपने पड़ोसी डॉक्टर पी निरंजन राव पर एसिड फ़ेंक दिया था। डॉ राव के चेहरे पर 30 टांके आये थे, और पुलिस ने हसन अली को गिरफ़्तार भी किया था… आगे क्या हुआ, पुलिस के रिकॉर्ड से ही गायब है। (यानी कुल मिलाकर हसन अली खानदानी अपराधी लगता है…)

अब जबकि सुप्रीम कोर्ट हसन अली (यानी सरकार के) पीछे पड़ गया है तो ऐसे ही हल्का-पतला मामला बनाकर कोर्ट में पेश किया और सबूत न होने का बहाना बनाकर छुड़वा भी लिया। प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate of India)  और आयकर विभाग (Income Tax Department of India)  “सबूत नहीं है”, ऐसा कैसे कह सकते हैं… यही आश्चर्य और जाँच का विषय है, क्योंकि जनवरी 2007 में हसन अली के कोरेगाँव (पुणे) स्थित आवास पर छापा मारकर जो दस्तावेज जब्त किये थे, जिनसे साबित होता था कि हसन अली ने 8 बिलियन डालर यूबीएस बैंक (ज्यूरिख) में जमा किये हैं… वे कागज़ कहाँ गये? छापा इसलिये भी मारा गया था कि हसन अली ने 1999 से अब तक आयकर रिटर्न नहीं भरा है… क्या यह सबूत नहीं माना जाता? ऐसे कैसे पिलपिले सबूत लाये और कौन सी मरियल धाराएं लगाईं कि जज ने हसन अली को जमानत दे दी? जबकि साध्वी प्रज्ञा को तो बगैर किसी सबूत के हिरासत में प्रताड़ित कर-करके लगभग मौत के दरवाजे तक पहुँचा दिया है…

किसी आम आदमी को तो कोई भी सरकारी विभाग रगड़कर रख देता है…तो फ़िर हसन अली से उसके घर जाकर पूछताछ क्यों की गई? क्यों नहीं उसे घसीटकर थाने लाये, पिछवाड़ा गरम किया और उसके बाद पूछताछ की? साफ़ है कि आज की तारीख में हसन अली को कोई “अदृश्य शक्ति” बचा रही है? यदि अभी बचा भी रही है, तो इससे पहले के जो मामले आंध्रप्रदेश (हैदराबाद) में उस पर दर्ज हुए, उस वक्त किस शक्ति ने उसे बचाया? क्योंकि आंध्रप्रदेश में भी तो अधिकतर समय कांग्रेस की ही सरकार रही है, क्या YSR ने? या चंद्रबाबू ने? या फ़िर केन्द्र सरकार के “आर्थिक विशेषज्ञों” ने? या केन्द्र सरकार से भी ऊपर की किसी विशिष्ट अज्ञात शक्ति ने?

जब बाबा रामदेव चार-पाँच सवाल पूछते हैं तो दिग्गी राजा और कांग्रेस के “पालतू भड़ैती मीडियाई” तुरन्त बाबा रामदेव से हिसाब-किताब माँगने लगते हैं, उनके खिलाफ़ किस्से-कहानियाँ छापने लगते हैं, उल्टा-सीधा बकने लगते है, ये और बात है कि हसन अली से हिसाब माँगने और उसके “ऊँचे सम्बन्धों” की तहकीकात करने की औकात किसी भी मीडिया हाउस की नहीं है, क्योंकि दरवाजे पर खड़ा कुत्ता हड्डी की आस में सिर्फ़ पूँछ हिला सकता है, मालिक पर भौंक नहीं सकता…
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भड़ास :- (भारत की आम जनता भी बड़े “भोले किस्म की लोकतांत्रिक” है, जो सोचती है कि स्थितियाँ बदलेंगी, कोई अवतार आयेगा, भगवान फ़िर से जन्म लेंगे, या शिवाजी-सावरकर पुनर्जन्म लेकर हमें निजात दिलाएंगे। जबकि ताजा हकीकत ये है कि यदि “नागनाथ” जाएंगे, तो “साँपनाथ” आएंगे… ऐसे में क्या आपको नहीं लगता कि कम से कम 5 साल के लिये इस देश को किसी “देशभक्त हिटलर” के हाथों सौंप दिया जाये?… जो एक लाइन से सभी भ्रष्ट नेताओं-अफ़सरों के पिछवाड़े गरम करता चले…)
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दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले भारत में हम एक बार पहले भी सन 1975 में देख चुके हैं कि किस तरह एक निरंकुश महिला ने पूरे देश को आपातकाल के नाम पर बंधक बना लिया था, कारण सिर्फ़ एक ही था… कैसे भी हो सत्ता अपने हाथ में रखी जाये। भारत के ज्ञात इतिहास की अब तक की सबसे भ्रष्ट यूपीए-2 (Most Corrupt Government of India)  की वर्तमान सरकार भी कमजोर विपक्ष और “पालतू मीडिया” की वजह से धीरे-धीरे निरंकुशता की ओर बढ़ती नज़र आ रही है। विगत 5-7 वर्षों में, जब से भारत में इंटरनेट का प्रचार-प्रसार तेजी से बढ़ा है, आम आदमी मुख्य मीडिया की चालबाजियों और गाल-बजाऊ प्रवृत्ति को जान-समझकर अपनी आवाज़ ट्विटर, फ़ेसबुक और ब्लॉग (Hindi Blogging in India)  के जरिये मुखर कर रहा है, और यही बात सरकार को पसन्द नहीं आ रही। सरकार को इस बात की परेशानी है कि आखिर “आम आदमी” सरकारी नीतियों की खुल्लमखुल्ला आलोचना क्यों कर रहा है? क्यों विभिन्न प्रकार के न्यू मीडिया द्वारा सरकार के मंत्रियों की पोल खोली जा रही है? क्यों “कथित ईमानदार बाबू” को गरियाया जा रहा है, क्यों समूची सरकार की नाक मोरी में रगड़ी जा रही है…? आम आदमी को ऐसा करने के लिये जो साधन (इंटरनेट) मिला है, अब उस माध्यम पर नकेल कसने की तैयारी शुरु हो चुकी है। साफ़ है कि सरकार ब्लॉग और इंटरनेट की बढ़ती लोकप्रियता से घबरा गई है…

1) प्राप्त समाचार के अनुसार भारत के आईटी कानून 2008 (IT Act 2008)  में संशोधन करने की तैयारियाँ चल रही हैं। प्रस्तावित संशोधन में न सिर्फ़ ब्लॉगर्स, बल्कि नेट सेवाएं देने वाली कम्पनियाँ, वेबसाइटों एवं उपयोगकर्ताओं तक भी शिकंजा मजबूत बनाने की जुगाड़ का प्रावधान है। इस प्रस्तावित कानून में सरकार की पकड़ मजबूत बनाने हेतु, अमेज़न (Amazon) और ई-बे (E-bay)  जैसी नीलामी साइटों, पेपाल (PayPal)  जैसी पैसा ट्रांसफ़र करने वाली साइटों सहित, BSNL, एयरटेल जैसे सेवा-प्रदाता और सायबर कैफ़े, ब्लॉग लेखक, ट्वीट करने वाले और फ़ेसबुक पर बतियाने वाले सभी शामिल हैं। सरकार किसी को कभी भी धर कर जेल में ठूंस सकती है।


सरकार ने कानून की शब्दावली में ऐसे शब्द डाल दिये हैं जिनकी मनमानी व्याख्या की जा सकती है, जैसे कि ब्लॉगर या फ़ेसबुक/ट्विटर लेखक 'हानिकारक', 'धमकी', 'अपमानजनक', 'परेशान करना', 'निंदा करना', 'आपत्तिजनक'(?), 'अपमानजनक', ‘अश्लील', ‘दूसरे की गोपनीयता भंग करने वाला', 'घृणित'(?), 'नस्ली टिप्पणी’, 'काले धन को वैध/अवैध करने की सलाह या जुआ से संबंधित' सामग्री होने पर सरकार कार्रवाई कर सकती है। कोई बेवकूफ़ भी समझ सकता है कि “आपत्तिजनक”, “घृणित” और “निंदा करने वाला” जैसे शब्दों की आड़ लेकर सरकार किसका मुँह दबाना चाहती है।

वरिष्ठ सायबर लॉ विशेषज्ञ पवन दुग्गल (Cyber Law Expert Pawan Duggal)  ने भी इस प्रस्तावित कानून संशोधन को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है और कहा है कि ब्लॉगर्स की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहले से ही काफ़ी कानूनी अंकुश हैं ऐसे में एक और कड़ा कदम लोकतंत्र का गला घोंट देगा। चौतरफ़ा विरोध और आलोचना के बाद सरकार थोड़ी पीछे हटी है, एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि “…अभी हमने इस कानून को अन्तिम रूप नहीं दिया है और अभी हम विभिन्न क्षेत्रों और विशेषज्ञों से सलाह-मशविरा कर रहे हैं, आप निश्चिन्त रहें जनभावना का पूरा सम्मान किया जायेगा…”। परन्तु सरकार के कदमों और चुनाव आयुक्त से लेकर सीबीआई निदेशक और सीवीसी की नियुक्ति में हुई मनमानी और तानाशाही को देखते हुए साफ़ लगता है कि इंटरनेट पर सरकार की तिरछी नज़र है और नीयत गंदी है।

प्रस्तावित कानून में ब्लॉगर या सेवा प्रदाता ISP पर 5 करोड़ रुपये तक का जुर्माना अथवा तीन साल से लेकर आजन्म कारावास तक का खतरनाक प्रावधान है, जो कि निश्चित रुप से “आम आदमी” की मुखर होती आवाज़ को तोड़ने के लिये, डराने के लिये पर्याप्त है।

तात्पर्य यह है कि हमारी सरकार चीन से आर्थिक तरक्की और बेहतर इंफ़्रास्ट्रक्चर निर्माण तो सीख न सकी, लेकिन अभिव्यक्ति का गला दबाने का यह काम बखूबी कर गुज़रेगी। चिदम्बरम साहब, आप आम आदमी को सुरक्षा तो दे नहीं पा रहे हैं, कसाब, अफ़ज़ल और अब हसन अली को दामाद बनाकर पालने-पोसने में आपको गुरेज नहीं है… जबकि आम आदमी के पास ले-देकर एक अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता ही तो है, उसे भी आप छीन लेंगे तो वह भ्रष्टाचार, आतंकवाद, महंगाई इत्यादि के खिलाफ़ कहाँ लिखेगा, कहाँ बोलेगा? क्या उन अखबारों में जो सरकारी कागज के कोटे और विज्ञापन के लिये “कुछ भी” कर गुज़रते हैं? या उन चैनलों में, जिनके मालिकान मुनाफ़ाखोर उद्योगपतियों की गोद में बैठे हुए हैं या वेटिकन और अरब देशों से संचालित हैं?

स्वाभाविक है कि आपके पास सत्ता की ताकत है… और आप ब्लॉगर्स-ट्विटर्स-फ़ेसबुकर्स को धमका कर खामोश तो कर लेंगे, लेकिन याद रखियेगा कि “खामोशी का अर्थ शान्ति कभी नहीं होता…”

http://economictimes.indiatimes.com/tech/internet/bloggers-call-content-regulation-a-gag-on-freedom/articleshow/7659593.cms

2) दूसरी खबर एक पत्र के रूप में है जिसका हिन्दी अनुवाद पेश कर रहा हूं… पत्र लिखा है भारत के प्रसिद्ध नारायण हृदयालय के प्रमुख डॉ श्री देवी शेट्टी ने…(Dr. Devi Shetty) । इस पत्र में डॉ शेट्टी ने सभी भारतवासियों से अपील की है कि वे इस बजट में सरकार द्वारा प्रस्तावित “हेल्थ टैक्स” (स्वास्थ्य कर) का पुरज़ोर विरोध करें…

(उस पत्र की इमेज यहाँ पेश है) और मुख्य लिंक यह है… (Narayan Hrudayalaya)  


पाठकों की सुविधा के लिये मैं डॉ शेट्टी द्वारा पेश किये गये बिन्दुओं को रख रहा हूं…

a) सरकार ने इस बजट में “हेल्थ टैक्स” के नाम से 5% सर्विस टैक्स (Service Tax on Health and Hospitals)  लगाने का प्रस्ताव किया है।

(b) जनता को मूर्ख बनाने के लिये कहा गया है कि सिर्फ़ AC (वातानुकूलित) अस्पतालों और वहाँ इलाज करवाने वाले अमीर मरीजों पर ही यह टैक्स लगाया जायेगा, लेकिन डॉ शेट्टी के अनुसार किसी भी प्रकार का ऑपरेशन करने वाला अस्पताल अथवा ब्लड बैंक हमेशा AC ही होता है। अर्थात यदि अब से किसी भी व्यक्ति की हार्ट सर्जरी हुई और उसमें 1 लाख का खर्च हुआ तो उस मरीज से 5000 रुपये सरकार और अधिक छीन लेगी, जबकि यदि दुर्भाग्य से आपका कैंसर से सम्बन्धित ऑपरेशन हुआ तो सरकार आपकी जेब से अतिरिक्त लगभग 20,000 रुपये हड़प लेगी।

डॉ शेट्टी (जो कि चेरिटेबल अस्पताल चलाते हैं और न्यूनतम शुल्क में हार्ट सर्जरी करते हैं) ने आँकड़े पेश करते हुए बताया है कि भारत सरकार अपने कुल बजट का सिर्फ़ 1% ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करती है, दुनिया में सिर्फ़ पाकिस्तान ही ऐसा देश है जो इससे कम खर्च करता है… जबकि बांग्लादेश से लेकर अफ़्रीकी गरीब से गरीब देश भी अपनी जनता के स्वास्थ्य पर इससे अधिक खर्च करते हैं (यह भी 60 साल के कांग्रेस शासन की “उपलब्धि” है)। देश की 80% से अधिक स्वास्थ्य सेवाएं निजी अस्पतालों के जरिये चलती हैं, जिन से सरकार सेल्स टैक्स, कस्टम ड्यूटी (महंगे विदेशी उपकरणों पर), VAT, लक्ज़री टैक्स (कहीं-कहीं) एवं भारी-भरकम बिजली की दरें सब कुछ एक साथ वसूलती है… अब सरकार की नज़रे-इनायत निम्न और मध्यम वर्ग के मरीजों पर भी पड़ गई है।

डॉ शेट्टी आगे कहते हैं, “हमारे देश की सिर्फ़ 10% जनता ही इस स्थिति में है कि वह हार्ट, ब्रेन अथवा कैंसर के ऑपरेशन का खर्च उठा सके… जबकि दूसरी तरफ़ सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों द्वारा करवाये जा रहे जन-स्वास्थ्य बीमा योजनाओं से भी 8% सर्विस टैक्स वसूल रही है…”। प्रत्येक सरकार का फ़र्ज़ है कि वह अपने नागरिकों को उच्च दर्जे की स्वास्थ्य सुविधाएं भले ही मुफ़्त न सही, लेकिन कम से कम दामों और शुल्क पर उपलब्ध करवाये…। यहाँ तो उल्टा ही हो रहा है कि, सरकार उसका कर्तव्य तो पूरा कर ही नहीं रही, बल्कि जैसे-तैसे अपना पेट काटकर, मंगलसूत्र-चूड़ी बेचकर, ज़मीन-मकान गिरवी रखकर दूरदराज इलाके से आने वाले मरीजों से, पहले बीमा पॉलिसी में 8% (Service Tax on Medical Insurance)  और फ़िर अस्पताल के बिल में 5% सर्विस टैक्स से नोच खा रही है… यह बेहद अमानवीय कृत्य है और जनता को इसका विरोध करना ही चाहिये…। जनता के जले पर नमक तब और मसला जाता है, जब कोई निकम्मा नेता महीनों तक AIIMS (http://www.aiims.edu/) जैसे महंगे अस्पताल में सरकार ही तरफ़ से मुफ़्त इलाज करवाता रहता है, या हर हफ़्ते मुफ़्त डायलिसिस करवाकर खामखा देश पर बोझ बना घर बैठा रहता है…

डॉ शेट्टी ने अपील की है कि यह खबर अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाएं व धरना-प्रदर्शन-ज्ञापन-विरोध-काले झण्डे जैसा जो भी लोकतांत्रिक तरीका, आम आदमी अपना सके… उससे सरकार का विरोध करना चाहिये।

उक्त दोनों खबरें बेचैन करने वाली हैं, एक टैक्स प्रस्ताव से आपकी फ़टी हुई जेब का छेद और बड़ा की तैयारी है, जबकि अन्य प्रस्ताव से “विरोध करने वाली स्वतन्त्र आवाज़ों” को कुचलने का कार्यक्रम बनाया जा रहा है…। लेकिन दूसरी बार सत्ता में आये मदमस्त प्रधानमंत्री से दोबारा वही कहूंगा कि… “खामोशी का अर्थ शान्ति नहीं होता, ऐसा समझने की भूल कभी न करें कि जनता खामोश है यानी सब अमन-चैन है…”
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कल्पना कीजिये कि पावरग्रिड सिस्टम फ़ेल होने से अचानक पूरे भारत की बिजली गुल हो जाये, सभी प्रमुख बैंकों के सर्वर ठप होने से आर्थिक गतिविधियों में अफ़रातफ़री मच जाये, बाँधों में पानी की क्षमता पर नज़र रखने वाला सिस्टम फ़ेल हो जाये और सभी गेट अपने-आप खुल जायें, हवाई अड्डों पर ट्रेफ़िक नियंत्रण प्रणाली खराब हो जाये और सभी हवाई जहाज आकाश में एक-दूसरे से टकराने लगें… तो इन प्रलयंकारी घटनाओं से किसी देश को तबाह होने में कितना समय लगेगा?

उपरोक्त काल्पनिक घटनाएं मैं आपको डराने के लिये नहीं कह रहा हूं, और न ही भारत के सायबर विशेषज्ञों की क्षमता पर कोई सवाल खड़ा कर रहा हूँ, परन्तु आज जिस तेजी से समूची दुनिया कम्प्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर निर्भर होती जा रही है उसमें ऐसी किसी (कु)संभावना को खारिज़ भी नहीं किया जा सकता। चीन, अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों ने गुप्त रुप से भविष्य में होने वाले “सायबर महायुद्ध” (Cyber War and Third World) की गुपचुप तैयारियाँ काफ़ी पहले शुरु कर दी हैं।

पिछले 1-2 वर्षों में कुछ ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिनसे यह शक गहराता जा रहा है कि क्या भारत जैसे देशों की तरक्की में अड़ंगा लगाने के लिये “सीमित सायबर हमले” किये जा रहे हैं? ताज़ा मामला है ईरान के परमाणु संयंत्र का… उल्लेखनीय है कि जब से ईरान ने परमाणु कार्यक्रम हाथ में लिया है तभी से इज़राइल समेत समूचा पश्चिमी विश्व उसे रोकने और उसके इस कार्यक्रम में रुकावटें पैदा करने की लगातार कोशिशें कर रहा है। हालांकि ईरान कह चुका है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ़ ऊर्जा के लिये है (Iran’s Atomic Programme), हथियारों-मिसाइलों के लिये नहीं, पर किसी को भी अहमदीनेजाद पर भरोसा नहीं है। चूंकि ईरान किसी के रोके नहीं रुक रहा और उसे रूस और चीन का मूक समर्थन भी हासिल है तो अब उसके परमाणु कार्यक्रम को पीछे करने और खेल बिगाड़ने के लिये “सायबर युद्ध” का सहारा लिया जा रहा है।



हाल ही में जिस परमाणु संयंत्र से ईरान को सर्वाधिक बिजली उत्पादन मिलने की सम्भावना बनी थी, उस रिएक्टर (Iran’s Nuclear Power Reactor) में कुछ खराबी आ गई। ईरान के वैज्ञानिकों द्वारा गहन जाँच में सामने आया कि पिछली बार और इस बार आई दोनों खराबियों का कारण “बशर परमाणु रिएक्टर” के प्रमुख कम्प्यूटरों में “स्टक्सनेट” (Stuxnet Virus)  नामक वायरस है। यह वायरस इस रिएक्टर के नेटवर्क में फ़ैला है और इसने चुन-चुनकर उन्हीं सिस्टम को फ़ेल किया है जो परमाणु रिएक्टर को चालू करने में आवश्यक हैं। इस वायरस की वजह से ईरान का परमाणु कार्यक्रम फ़िर से बाधित हो गया है और इसे चालू करने में अब और देर होगी।

अंतर्राष्ट्रीय परमाणु एजेंसी (IAEA)  के सदस्य ईरान में सतत मौजूद रहते हैं और परमाणु रिएक्टरों की निगरानी करते हैं कि कहीं ईरान गुपचुप परमाणु हथियार तो नहीं बना रहा। ईरान ने इन परमाणु इंस्पेक्टरों को बताया है कि निश्चित रुप से कोई बाहरी शक्ति उसके शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम में खलल पैदा कर रही है। रुस ने, जो कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को कच्चा माल सप्लाय कर रहा है, ने इसकी जाँच की माँग की है और कहा है कि यदि यह बात सच निकली तो चेरनोबिल जैसी किसी बड़ी परमाणु दुर्घटना या सीमित परमाणु युद्ध की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता। ईरान के बशहर में स्थित इस परमाणु संयंत्र की लागत अब तक 2 अरब डालर तक पहुँच गई है, इसके आसपास एंटी-मिसाइल तकनीक सहित बेहद कड़ी सुरक्षा है, क्योंकि इसे सबसे अधिक खतरा इज़राइल से है। 1979 की इस्लामिक क्रान्ति (Islamic Revolution in Iran)  के बाद से ही ईरान परमाणु कार्यक्रम में लगा हुआ है, लेकिन किसी न किसी “कारण” से यह अटकता-टलता जा रहा है। लेकिन Stuxnet वायरस का यह नया पेंच बेहद गम्भीर है और भारत सहित तमाम विकासशील देशों के लिये खतरनाक संकेत भी है।

इस वायरस की शंका गत अक्टूबर में ही ईरानी अधिकारियों को लगी थी, परन्तु उस समय उन्होंने अपने कम्प्यूटरों को वायरस-मुक्त करके इस मुद्दे को अधिक तूल नहीं दिया, परन्तु दिसम्बर और फ़रवरी में जब बार-बार ऐसा हुआ तब उन्होंने विश्व में सभी को इस बारे में बताया।

नॉर्टन (Norton) एंटी-वायरस की कम्पनी सिमाण्टेक (Symantec)  ने अपने रिसर्च में पाया कि Stuxnet वायरस का 60% ट्रेफ़िक ईरान की तरफ़ से आ रहा है, 18% इंडोनेशिया की तरफ़ से जबकि 8% भारत की तरफ़ से। इस रिपोर्ट ने भारत के अन्तरिक्ष कार्यक्रम और मिसाइल तकनीक के महारथियों ISRO  (Indian Space Research Organization) और DRDO (Defense Research Development Organization)  में खलबली मचा दी है। अब इस बात की गम्भीरता से जाँच की जा रही है कि कहीं ISRO एवं DRDO के कम्प्यूटरों में Stuxnet वायरस तो नहीं है? जापान द्वारा यह स्वीकार करने के बाद, कि उसके तीन उपग्रह “अचानक किसी अज्ञात वजह” से खराब हो गये हैं, भारत में भी उच्च स्तर पर यह सोच हावी होने लगी है कि गत जुलाई में INSAT-4B के धराशायी होने के पीछे कहीं Stuxnet वायरस तो नहीं था? सन 2010 के अन्तिम छ्ह माह में चीन, भारत और जापान तीनों देशों को अपने-अपने अन्तरिक्ष कार्यक्रमों में भारी नुकसान सहना पड़ा है, क्या यह मात्र संयोग है? जिस उच्च तकनीक और सुरक्षा के साथ सैटेलाइटों का प्रक्षेपण किया जाता है, और जिन देशों को इसका अनुभव भी हो, उसमें ऐसी किसी दुर्घटना की सम्भावना न के बराबर होती है, फ़िर ऐसा कैसे हुआ कि चीन, जापान और भारत के प्रमुख उपग्रह प्रक्षेपण फ़ेल हो गये? भारत भी विश्व के “उपग्रह बाज़ार” का तेजी से उभरता हुआ खिलाड़ी है और इस तरक्की को रोकने के लिये अमेरिका और चीन किसी भी हद तक जा सकते हैं। वैसे देखा जाये तो इसमें कोई गलत बात भी नहीं है, हर देश चाहेगा कि उसका प्रतिद्वंद्वी अपनी समस्याओं में उलझा रहे और हम उसे कैसे रोकें। यह तो भारत पर निर्भर है कि वह अपने सिस्टम और उपकरणों की सुरक्षा किस प्रकार करता है। (ये और बात है कि हम अपने गाँधीवादी(?) इंजेक्शन की वजह से न तो बांग्लादेश की गर्दन मरोड़ते हैं, न पाकिस्तान को सबक सिखाते हैं, न ही श्रीलंका की स्थिति का फ़ायदा उठाते हैं…)

अप्रैल 2010 में भी ISRO का GSAT-4 नामक संचार उपग्रह नष्ट हो गया था, उससे पहले भी GSLV-D3 नामक रॉकेट प्रक्षेपण फ़ेल हुआ था (ISRO GSLV Launch failed), इस तरह देखा जाये तो 2 साल में तीन प्रमुख उपग्रह/रॉकेट किसी न किसी वजह से फ़ेल हुए हैं, और अब जापान और ईरान की इस आशंका के बाद यह शक गहराना स्वाभाविक है कि भारत के साथ भी कोई “बरबादी का गेम” खेला जा रहा है। छोटे-छोटे देश अपने-अपने उपग्रह को भारत में सस्ती दरों पर प्रक्षेपण करवाना चाहते हैं, बजाय चीन या अमेरिका के महंगी दरों के मुकाबले… और यह उन महाशक्तियों को कैसे रास आ सकता है? कुछ माह पहले ही चीन ने प्रमुख देशों के भारतीय दूतावासों और मंत्रालयों के कम्प्यूटरों में घुसपैठ की थी (Virus Attack by China on Indian Embassy) जिसे चीन समर्थित वामपंथी मीडिया द्वारा दबा दिया गया था। जबकि ईरान के IT मंत्री मोहम्मद लियाई ने साफ़ आरोप लगाया है कि “ईरान के खिलाफ़ सायबर युद्ध छेड़ा गया है… और इसके नतीजे गम्भीर होंगे”। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने इस कारनामे के लिये अमेरिका, ब्रिटेन और इज़राइल पर शक ज़ाहिर किया है। इस झमेले में भारत को जल्दी से जल्दी सबक लेना चाहिये, क्योंकि चीन तो खैर खुल्लमखुल्ला दुश्मन है ही, अमेरिका भी कभी नहीं चाहेगा कि हम अपनी हिम्मत के बल पर “अपने पैरों पर मजबूती” से खड़े हों इसलिये Stuxnet जैसे पता नहीं कितने वायरस उसने भारत के विभिन्न कम्प्यूटर सिस्टमों में छोड़ रखे होंगे… जिनके जरिये तमाम गुप्त जानकारियाँ तो उसे मिलेंगी ही और वक्त पड़ने पर किसी महत्वाकांक्षी उपग्रह या मिसाइल कार्यक्रम में अड़ंगा लगाने में भी आसानी होगी।

पाठकों को शायद याद होगा कि गत वर्ष चीन की सबसे बड़ी दूरसंचार उपकरण बनाने वाली कम्पनी “हुआवै” (Huawei) को भारत सरकार ने बीएसएनएल में प्रतिबन्धित कर दिया था (Huawei banned in BSNL), क्योंकि सुरक्षा एजेंसियों द्वारा जाँच करने पर पाया गया कि देश के विभिन्न शहरों के दूरसंचार दफ़्तरों में जो अरबों रुपये के चीनी सर्वर, सॉफ़्टवेयर और मोडम लगाये जा रहे हैं, उनमें “खास किस्म” के मालवेयर, ट्रोजन और वायरस हैं। ऐसा भी नहीं कि ऐसी आशंका सिर्फ़ भारत को ही हुई हो, इससे पहले अमेरिका और ब्रिटेन की सुरक्षा एजेंसियों और कम्प्यूटर विशेषज्ञों ने पाया कि चीन सरकार और सेना द्वारा समर्थित Huawei कम्पनी पर भरोसा किया जाना मुश्किल है, तथा अमेरिका और ब्रिटेन ने भी इस कम्पनी के बड़े-बड़े सौदे रद्द किये।

संक्षेप में तात्पर्य यह है कि अपने लालच के लिये, अपने फ़ायदे के लिये दूसरों को बरबाद करने और अन्य देशों की अन्दरूनी सूचनाओं को पाने के लिये यह जो “वायरस-वायरस का गंदा खेल” खेला जा रहा है उसके परिणामस्वरूप “अचानक कहीं परमाणु अस्त्र चल जाने” और फ़िर “आत्मघाती तीसरा विश्व युद्ध छिड़ने” जैसे बुरे नतीजे पूरी दुनिया को भी भुगतने पड़ सकते हैं। दूसरों के लिये गढ्ढा खोदने वाला खुद भी उसमें गिरता है यह कहावत सभी देशों और सभी भाषाओं में लागू होती है… सीखना या न सीखना बुद्धिमानों पर निर्भर है…। भारत को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिये कि अमेरिका या ब्रिटेन हमारे दोस्त हैं और न ही इस मुगालते में कि “हम कोई IT या सॉफ़्टवेयर सुपरपावर हैं… भारत की लचीली और लचर सुरक्षा व्यवस्था में ही हमें सुधार करना होगा, महत्वपूर्ण संस्थानों की आंतरिक सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना होगा।

ये बात और है कि जिस महान भारत देश में कोई भी व्यक्ति कहीं से भी घुस सकता है, बरसों तक नागरिक बनकर रह सकता है (बल्कि एक घुसपैठिया सांसद भी बन सकता है), एक ही नाम-पते से 2-4 पासपोर्ट बनवा सकता है, कोई विदेशी व्यक्ति हथियार गिराकर चलता बनता हो, किसी भी सुनसान समुद्री तट पर दुबई में बैठे-बैठे माफ़िया अपने हथियार गाहे-बगाहे उतरवाते रहते हों, बहुराष्ट्रीय और देसी कम्पनियाँ सारे नियम-कानून ताक पर रखकर घातक रसायन बना रही हों, रिश्वतखोरी की चर्बी से सने हुए अधिकारी व नेता बगैर सोचे-समझे, कमीशन के लालच में विदेशी तकनीक और उपकरणों को भारत में बनाने की बजाय, आयात करने में अधिक रुचि रखते हों… वहाँ पर “सायबर सुरक्षा” के बारे में अधिक उम्मीद करना थोड़ा अजीब लगता है…
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विभिन्न सन्दर्भ –

http://www.nytimes.com/2011/02/26/world/middleeast/26nuke.html?_r=1&ref=global-home&pagewanted=all

http://articles.economictimes.indiatimes.com/2010-05-24/news/28441165_1_chinese-vendors-lines-contract-kuldeep-goyal

http://www.sify.com/news/brit-security-experts-raise-concern-over-huawei-s-links-to-chinese-military-news-international-ldgqudjaadh.html

http://en.wikipedia.org/wiki/Huawei

http://www.computerweekly.com/Articles/2011/02/25/245613/Huawei-asks-US-to-investigate-it-for-threats-to-national.htm

http://www.atimes.com/atimes/China/LJ09Ad01.html

http://www.dnaindia.com/opinion/column_if-we-aren-t-ready-for-cyberwar-we-will-lose-the-next-war_1447690
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कुछ ही दिन पूर्व अल्पसंख्यक शिक्षण संस्था आयोग (NCMEI) के अध्यक्ष एमएसए सिद्दिकी ने एक विवादास्पद निर्णय के तहत दिल्ली के जामिया मिलिया विवि को “अल्पसंख्यक संस्थान” का दर्जा दे डाला। श्री सिद्दीकी साहब ने अपने इस निर्णय के पीछे जो तर्क दिया है वह भी अपनेआप में आपत्तिजनक है, कहते हैं “इस बात में कोई शंका नहीं है कि जामिया विवि (Jamia Milia) की स्थापना मुसलमानों द्वारा, मुसलमानों के फ़ायदे के लिये की गई थी और इस विवि ने कभी भी अपनी “अल्पसंख्यक पहचान” को खोने नहीं दिया है…” इसलिये इसे “अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान का दर्जा” दिया जाना उचित है। किसी भी केन्द्रीय विवि को इस प्रकार का “धार्मिक” आधार दिये जाने का यह सम्भवतः पहला मामला है। इस निर्णय से इस विवि में 50 प्रतिशत सीटें “सिर्फ़ मुसलमानों” के लिये आरक्षित हो जाएंगी। (Jamia Milia University Become Minority Institute) 



जामिया मिलिया विवि को सन 1988 में केन्द्रीय विवि का दर्जा दिया गया था, लेकिन अब इस निर्णय के बाद इसका केंद्रीय दर्जा (Central Universities of India) तो बरकरार रहेगा ही, साथ ही “विशेष अल्पसंख्यक दर्जा” भी रहेगा, बड़ी अजीब सी बात है, लेकिन ऐसा हो रहा है। अपने निर्णय में अल्पसंख्यक आयोग एक और खतरनाक बात फ़रमाता है, “चूंकि इस विश्वविद्यालय की स्थापना “भारत के संविधान” से पहले ही हो गई थी इसलिये इसे अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दिये जाने में कोई हर्ज नहीं है…” (यानी 1947 या 1950 से पहले वाली स्थिति मानी जायेगी, क्या इसके पीछे की “मानसिकता” अलग से समझाने की जरुरत है? या इसे यूं कहें कि, चूंकि यह सड़क आज़ादी और संविधान लागू होने के पहले मेरे दादाजी ने बनवाई थी, इसलिये इस सड़क पर अब सिर्फ़ हमारे परिवार के लोग ही चलेंगे…)।

असली मुश्किल SC/ST छात्रों के लिये है, क्योंकि आयोग के इस निर्णय के चलते अब यह विश्वविद्यालय केन्द्र सरकार के आरक्षण नियमों (Reservation Rules in India) को मानने के लिये बाध्य नहीं है। संक्षेप में कहा जाये तो पहले 50% सीटें सिर्फ़ मुसलमानों के लिये होंगी, बची हुई 50% सीटों में से “यदि विवि प्रशासन देना चाहे तो…” SC/ST छात्रों को आरक्षण देगा। तात्पर्य यह कि केन्द्र सरकार से मदद लेंगे, पैसा लेंगे, ज़मीन लेंगे… लेकिन आरक्षण नहीं देंगे। सिद्दिकी साहब आगे फ़रमाते हैं कि जामिया विवि की स्थापना मुस्लिमों में शिक्षा का प्रसार करने के लिए मुसलमानों द्वारा ही की गई है इसलिये इस पर किसी “बाहरी नियंत्रण”(?) को स्वीकार नहीं किया जा सकता…।

अब तमाम दलित संगठन चाहे लाख चिल्लाचोट कर लें, लेकिन केन्द्र सरकार ही हिम्मत नहीं है कि वह अपने “वोट बैंक” पर कोई “बाहरी नियंत्रण” (यानी भारत सरकार) स्थापित करे। जबकि कानूनी हकीकत यह है कि चूंकि केन्द्र सरकार संविधान के तहत काम करती है और संविधान “धर्मनिरपेक्ष” है इसलिये कोई केन्द्रीय विवि “धार्मिक आधार” पर अपने छात्रों के साथ भेदभाव नहीं कर सकता। अल्पसंख्यक शिक्षा आयोग के इस निर्णय के बाद विवि में प्रवेश हेतु “प्राथमिकता” मुसलमानों को मिलेगी, उसके बाद “यदि मर्जी हुई तो” बाकी सीटों पर SC/ST छात्रों को प्रवेश मिलेगा (शर्मनिरपेक्षता की जय हो… एवं “सभी छात्रों को बराबरी के आधार पर, जाति-धर्म के भेदभाव रहित” शिक्षा का अधिकार गया तेल लेने…। (Constitution of India) 

अल्पसंख्यक शिक्षा आयोग के इस निर्णय से कई मुश्किलें खड़ी होने का अनुमान है, पहला… संसद द्वारा कानून पारित करके बनाया गया केन्द्रीय विवि धर्मनिरपेक्ष संविधान में “अल्पसंख्यक” कैसे बनाया जा सकता है? दूसरा… इनकी देखादेखी अन्य “अल्पसंख्यक संस्थान”(?) भी इस “विशेष दर्जे” की माँग करेंगे, तब तो SC/ST छात्रों की सीटें और भी कम हो जाएंगी?


“असली दलितों-पिछड़ों” के लिये जिस संकेत की तरफ़ ऊपर के घटनाक्रम में इशारा किया गया है उसी की एक और झलक तमिलनाडु में भी देखने को मिली है। स्वयं को “दलितों का मसीहा और ब्राह्मणवाद के विरोधी कहे जाने” की हसरत पाले (तथा इस फ़ानी दुनिया को किसी भी समय अलविदा कहने की स्थिति में व्हील चेयर पर स्थापित) हुए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर माँग की है कि “राज्य में धर्मान्तरित ईसाईयों को भी दलितों के समान आरक्षण दिया जाये, धर्म परिवर्तन कर चुके ईसाईयों को संविधान की दलित सूची में रखा जाये… एवं प्रधानमंत्री इस मामले को स्वयं की देखरेख में निपटाएं…” (SC Status to Converted Christians)। करुणानिधि ने आगे कहा है कि जिस प्रकार संविधान में बदलाव करके सिखों एवं बौद्ध धर्म के दलितों को SC का दर्जा दिया गया, उसी प्रकार संविधान में बदलाव करके “दलित ईसाईयों”(?) (Converted Christians in India) को भी SC की सीटों पर आरक्षण दिया जाये”। करुणानिधि चाहते हैं कि संसद में कानून पास करके दलितों-पिछड़ों को मिलने वाली सारी सुविधाएं “दलित ईसाईयों” को भी दिलवाई जाएं… (कम से कम अब तो दलित-पिछड़े संगठन इन “तथाकथित धर्मनिरपेक्ष” नेताओं के मंसूबे समझ जाएं…)। (आंध्रप्रदेश में भी मुसलमानों को मिलने वाला 5% आरक्षण OBC के हिस्से में से ही दिया गया है)

पहले आप यह वीडियो देखिये, जिसे किसी ब्राह्मण ने नहीं बनाया है, बल्कि प्रसिद्ध फ़्रेंच लेखक फ़्रेंकोइस गोतिए ने बनाया है… और सारे पात्र “असली” हैं…

Direct Link :- http://www.youtube.com/watch?v=P7Xgc4ljHKM&feature=player_embedded



चालबाजी और षडयन्त्र स्पष्ट दिखाई दे रहा है, ऐन पश्चिम बंगाल, असम, केरल और तमिलनाडु चुनाव के पहले प्रणब मुखर्जी ने बजट में अलीगढ़ मुस्लिम विवि (Aligarh Muslim University) की दो नई शाखाओं के लिये 100 करोड़ रुपये आबंटित किये हैं (हालांकि “परम्परागत कांग्रेसी चालबाजी” इसमें भी खेल ली गई है कि मलप्पुरम-केरल और मुर्शिदाबाद-बंगाल के AMU को 50-50 करोड़ दिये हैं, क्योंकि वहाँ चुनाव हैं और “सजा के तौर पर” किशनगंज-बिहार को धेला भी नहीं दिया क्योंकि वहाँ के मुसलमानों ने नीतीश कुमार को वोट दिया था)। आगे चलकर अलीगढ़ मुस्लिम विवि सहित तमाम अल्पसंख्यक संस्थान अपने यहाँ “कानून के अनुसार आरक्षण नहीं देने” की माँग करेंगे। चेन्नई से कोयम्बटूर और वेल्लूर जाने वाली सड़कों के किनारे क्राइस्ट की बड़ी-बड़ी मूर्तियों और भव्य चर्चों की संख्या को देखते हुए तमिलनाडु में “धर्मान्तरण” किस पैमाने पर चल रहा है कोई मूर्ख भी समझ सकता है…। एक पक्का वोट बैंक बनने के बाद अब वहीं के एक “फ़र्जी हिन्दू” मुख्यमंत्री करुणानिधि, “दलित ईसाईयों” के लिये SC कोटे में से आरक्षण माँग रहे हैं… यानी “असली दलितों” पर खतरा दो-तरफ़ा मंडरा रहा है।

ब्राह्मणों को तो पहले ही “बदनाम” करके समाज में हाशिये पर डाला जा चुका है, “जेहादियों और एवेंजेलिस्टों” का पहला लक्ष्य था ब्राह्मणों को सबसे पहले नेस्तनाबूद करना, क्योंकि उनके अनुसार ब्राह्मण ही सबसे ज्यादा “राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व” के बारे में गुर्राते रहते हैं…। पहला चरण काफ़ी कुछ पूरा होने के बाद अब तेजी से धर्मान्तरण करना और ईसाई बन जाने के बावजूद “असली दलित हिन्दुओं के हक” के आरक्षण को हथियाना अगला चरण है…। सवाल यही है कि क्या दलित अब भी जागेंगे, या अभी भी ब्राह्मणों के अंध-विरोध की आग में ही जलते रहेंगे? ब्राह्मणों का तो जो नुकसान होना था, वह आरक्षण से हो चुका है… लेकिन अब “आरक्षण” को ही हथियार बनाकर “असली दलितों” का नुकसान “अ-हिन्दू धार्मिक नेता” न करने पाएं, यह देखना SC/ST संगठनों का काम है…
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नोट :- उम्मीद है कि टिप्पणियों में “जातिवाद-ब्राह्मण-दलित” इत्यादि पर अन्तहीन और बेमतलब की बहस न हो, “मुख्य मुद्दे” पर ध्यान केन्द्रित रहे…
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