desiCNN - Items filtered by date: मई 2010
मुझे पता है कि शीर्षक पढ़कर आप चौंकेंगे, लेकिन यह सच है। गुजरात से बाहर रहने वाले मुस्लिम सोचते होंगे, कि पता नहीं गुजरात में नरेन्द्र मोदी नाम का आदमी उनकी कौम पर कितने ज़ुल्म ढाता होगा और तीस्ता “जावेद” सीतलवाड जैसी समाजसुधारिका(?) तथा राजदीप और “बुरका” दत्त जैसे स्वनामधन्य(?) पत्रकार दिन-रात जिस खलनायक(?) को गरियाते हुए नहीं थकते, पता नहीं संघ-भाजपा यह व्यक्ति गुजरात में मुस्लिमों पर कितने अत्याचार करता होगा।

लेकिन अब समूचे भारत के नकली सेकुलरों और फ़र्जी लाल झण्डे वालों को यह सुनकर बड़ा दुख होगा कि योजना आयोग ने गुजरात के मुख्यमंत्री के कार्यों से खुश होकर गुजरात के योजना व्यय को बढ़ाकर 30,000 करोड़ रुपये कर दिया है, जो कि पिछले वर्ष की तुलना में 6,500 करोड़ रुपये ज्यादा है… अर्थात गुजरात की 50वीं वर्षगाँठ पर उसे लगभग 25% का अतिरिक्त पैकेज दिया गया है। ऐसा नहीं कि यह सब इतनी आसानी से मिल गया, इसके लिये नरेन्द्र मोदी ने गुहार लगाई और प्रधानमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़ा, वरना योजना आयोग की सदस्या मैडम सईदा हमीद ने "गुजरात में मुस्लिमों से भेदभाव" का बहाना बनाकर इसमें अड़ंगे लगाने की भरपूर कोशिशें कर ली थीं, यह मैडम पूर्व में जब राष्ट्रीय महिला आयोग में थीं तब भी इन्होंने गुजरात की योजनाओं में काफ़ी टंगड़ी मारी थी।

http://www.narendramodi.in/news/news_detail/733

गत दिनों योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया और नरेन्द्र मोदी की बैठक के बाद पत्रकारों से मुखातिब होते हुए अहलूवालिया ने कहा कि “गुजरात योजना व्यय में हुई इस बढ़ोतरी का हकदार भी है और वह इस विशाल व्यय को झेलने की क्षमता भी रखता है…”। मोंटेक ने आगे बताया कि गुजरात का राजस्व गत वर्ष के 74% से बढ़कर 81% हो गया है तथा VAT कलेक्शन में 42% की जबरदस्त उछाल आई है। हाल ही में राज्य विधानसभा ने “स्वर्णिम गुजरात” योजना के तहत उत्तरी गुजरात में 500 मेगावाट बिजली उत्पादन करने वाला एक सौर ऊर्जा प्लाण्ट लगाने, 82 तहसीलों में अंडरग्राउण्ड सीवेज लाइन बिछाने की बड़ी योजना पर काम शुरु करने को हरी झण्डी दे दी है।

(जब देश में चारों तरफ़ एक से बढ़कर एक निकम्मे मुख्यमंत्री और लुटेरे IAS अफ़सरों की गैंग, भारत के विकास में अड़ंगे लगाती दिखाई देती है ऐसे में पिछले 10 साल से गुजरात की भलाई हेतु अनथक काम करता नरेन्द्र मोदी नामक यह राष्ट्रवाद का योद्धा सहज ही ध्यान आकर्षित कर लेता है…)


इसी के साथ केन्द्र सरकार ने सरदार सरोवर से सम्बन्धित 39240 करोड़ रुपये के संशोधित योजना व्यय को भी मंजूरी दे दी। अब कांग्रेस का अदभुत विकास और गरीबों का साथ देखिये - कच्छ और सौराष्ट्र के ढाई करोड़ लोगों के पेयजल के लिये इस योजना को 1986-87 में बनाया गया था, तब अनुमान था कि इसकी लागत 6406 करोड़ रुपये होगी, लेकिन राजनीति, श्रेय लेने की होड़ (योजना का नाम किसी गाँधी के नाम पर करने) तथा लालफ़ीताशाही ने 23 साल में भी इसे पूरा होने नहीं दिया और अब इसकी लागत बढ़कर 39240 करोड़ रुपये हो गई है। (अंग्रेजी में "PRO" का विपरीत शब्द होता है "CON", इसलिये कोई आश्चर्य नहीं कि "PROGRESS" का उलटा होता है "CONGRESS"...…)

http://www.livemint.com/2010/05/27231219/Gujarat-to-get-more-funds-afte.html?d=1

चलिये आईये अब देखते हैं कि आखिर गुजरात में मोदी ने मुसलमानों पर कौन-कौन से अत्याचार किये हैं, जिसका ईनाम उन्हें मिला है –

पेश किये जा रहे आँकड़े और तथ्य मनगढ़न्त नहीं हैं, बल्कि केन्द्र सरकार द्वारा गठित सच्चर कमीशन की रिपोर्ट में से लिये गये हैं। जी हाँ, “गुजरात में मुस्लिमों पर इतने ज़ुल्म ढाये गये हैं कि गुजरात के मुसलमान देश के बाकी सभी हिस्सों के मुसलमानों के मुकाबले शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के मामले में आगे निकल गये हैं…”।

1) गुजरात में मुस्लिमों का साक्षरता प्रतिशत 73%, जबकि बाकी देश में 59%।

2) ग्रामीण गुजरात में मुस्लिम लड़कियों की साक्षरता दर 57%, बाकी देश में 43%।

3) गुजरात में प्राथमिक शाला पास किये हुए मुस्लिम 74%, जबकि देश में 60%।

4) गुजरात में हायर सेकण्डरी पास किये मुस्लिमों का प्रतिशत 45%, देश में 40%।

शिक्षा सम्बन्धी सारे के सारे आँकड़े मुस्लिम हितों की कथित पैरवी करने वाले, मुस्लिम हितैषी(?) पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश और बिहार से कोसों आगे हैं।

1) गुजरात के जिन गाँवों में मुस्लिम आबादी 2000 से अधिक है वहाँ प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र की उपलब्धता है 89%, जबकि बाकी देश में 70%।

2) जिन गाँवों में मुस्लिम आबादी 1000 से 2000 के बीच है वहाँ स्वास्थ्य केन्द्र का प्रतिशत 66% है, जबकि देश का औसत है 43%।

3) जिन गाँवों में मुस्लिम आबादी 1000 से कम है वहाँ 53%, राष्ट्रीय औसत है सिर्फ़ 20%।

शायद राहुल गाँधी आपको बतायेंगे, कि उनके पुरखों ने बीते 60 साल में, भारत के ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने के लिये कितने महान कार्य किये हैं।

1) गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में मुस्लिमों की प्रति व्यक्ति आय 668 रुपये हैं, पश्चिम बंगाल में 501, आंध्रप्रदेश में 610, उत्तरप्रदेश में 509, मध्यप्रदेश में 475 और मीडिया के दुलारे जोकर यानी लालू द्वारा बर्बाद किये गये बिहार में 400 रुपये से भी कम।

2) गुजरात के शहरों में भी मुस्लिमों की बढ़ती आर्थिक सम्पन्नता इसी से प्रदर्शित होती है कि गुजराती मुस्लिमों के बैंक अकाउंट में औसत 32,932 रुपये की राशि है, जबकि यही औसत पश्चिम बंगाल में 13824/- तथा आसाम में 26,319/- है।

“लाल झण्डे वाले बन्दर” हों या “पंजा छाप लुटेरे’, इनकी राजनीति, रोजी-रोटी-कुर्सी इसी बात से चलती है कि किस तरह से भारत की जनता को अधिक से अधिक समय तक गरीब और अशिक्षित बनाये रखा जाये। क्योंकि उन्हें पता है कि जिस दिन जनता शिक्षित, समझदार और आत्मनिर्भर हो जायेगी, उसी दिन “लाल झण्डा” और “परिवार की चमचागिरी” दोनों को ज़मीन में दफ़ना दिया जायेगा। इसीलिये ये दोनों शक्तियाँ मीडिया को पैसा खिलाकर या उनके हित साधकर अपने पक्ष में बनाये रखती है, और नरेन्द्र मोदी जैसों के खिलाफ़ “एक बिन्दु आलोचना अभियान” सतत चलाये रखती हैं, हिन्दू आराध्य देवताओं, हिन्दू धर्मरक्षकों, संतों और शंकराचार्यों के विरुद्ध एक योजनाबद्ध घृणा अभियान चलाया जाता है, लेकिन जब गुजरात सम्बन्धी (उन्हीं की सरकार द्वारा गठित टीमों द्वारा पाये गये) आँकड़े और तथ्य उन्हें बताये जाते हैं तो वे बगलें झाँकने लगते हैं। ढीठता और बेशर्मी से बात तो ऐसे करते हैं मानो भारत के इतिहास में सिर्फ़ गुजरात में ही दंगे हुए, न पहले कभी कहीं हुए, न अब कभी होंगे

गुजरात के विकास के लिये नरेन्द्र मोदी को क्रेडिट देते समय मीडिया वालों का मुँह ऐसा हो जाता है, मानो उन्हें किसी ने उन्हें अरंडी के बीज का तेल पिला दिया हो। तीन-तीन चुनाव जीते हुए, दस साल से एक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे किसी व्यक्ति के खिलाफ़ इतिहास में आज तक कभी ऐसी उपेक्षा-अपमान-आलोचना नहीं आई होगी, न तो 15 साल में बिहार को चरने वाले लालू के… न ही दस साल राज करके मध्यप्रदेश को अंधेरे में धकेलने वाले दिग्गी राजा के…, परन्तु नरेन्द्र मोदी की गलती सिर्फ़ एक ही है (और आजकल यही सबसे बड़ी गलती भी मानी जाती है) कि वे हिन्दुत्ववादी-राष्ट्रवादी शक्तियों के साथ हैं। मजे की बात तो यह है कि गुजरात के इन नतीजों के बावजूद सच्चर कमेटी ने मुसलमानों को पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण की सिफ़ारिश कर दी है, जबकि सच्चर साहब को केन्द्र सरकार से सिफ़ारिश करना चाहिये थी कि नरेन्द्र मोदी के “थोड़े से गुण” देश के बाकी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और केन्द्रीय मंत्रियों के दिमागों में भरे जायें…

बहरहाल, मुझे डर है कि योजना आयोग द्वारा गुजरात की तारीफ़ तथा इस शानदार बोनस और प्रमोशन के कारण कहीं मनमोहन सिंह अपनी “नौकरी” न खो बैठें। जी हाँ नौकरी… क्योंकि वैसे भी वे आजीवन “यस-मैन” ही रहे हैं, कभी रिजर्व बैंक के, कभी वित्त मंत्रालय के, कभी IMF के, कभी विश्व बैंक के… और अब “भरत” की तरह खड़ाऊं लिये तैयार बैठे हैं कि कब “राहुल बाबा” आयें और उन्हें रिटायर करें…

सन्दर्भ : http://www.indianexpress.com/news/hard-facts-to-face/622193/1

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1) कुछ माह पहले ही अमेरिका में एक मेजर निदाल मलिक हसन ने अपने एयरबेस पर अंधाधुंध गोलियाँ बरसाकर 36 अमेरिकियों को हताहत किया था। निदाल मलिक हसन अमेरिकी सेना में एक मनोचिकित्सक था, और गिरफ़्तारी के बाद उसका कथन था कि वह अमेरिका द्वारा ईराक और अफ़गानिस्तान में की गई कार्रवाईयों की वजह से निराशा की अवस्था में था और उसे अमेरिका का यह हमला “इस्लाम” पर हमले के समान लगा।  पिछले कुछ समय से मेजर निदाल मलिक, इस्लामिक बुद्धिजीवी(?) अनवर-अल-अवलाकी के सम्पर्क में था, उससे निर्देश लेता था और उसकी इस्लामिक शिक्षाओं(?) से बेहद प्रभावित था…(खुद मनोचिकित्सक है, और शिक्षा ले रहा है अनवर अवलाकी से? है ना मजेदार बात…)


पूरा विवरण यहाँ देखें… http://f8ba48be.linkbucks.com

2) इसी तरह उच्च दर्जे की शिक्षा प्राप्त और पाकिस्तान के एयरफ़ोर्स अफ़सर बहरुल-हक के लड़के फ़ैज़ल शहजाद को अमेरिका से दुबई भागते वक्त हवाई जहाज में से गिरफ़्तार कर लिया गया (यहाँ देखें http://1d866b57.linkbucks.com)। फ़ैज़ल ने स्वीकार किया है कि उसी ने टाइम्स स्क्वेयर पर कार बम का विस्फ़ोट करने की योजना बनाई थी, क्योंकि अमेरिका उसे इस्लाम का दुश्मन लगता है। (http://4cfa0c9a.linkbucks.com)

इन दोनों मामलों में कुछ बातें समान है, और वह यह कि दोनों आतंकवादी अमेरिकी नागरिक बन चुके थे (अर्थात अमेरिका “उनका” देश था), दोनों अच्छे प्रतिष्ठित परिवारों से हैं, दोनों उच्च शिक्षित हैं, अमेरिका में स्थाई नौकरी कर रहे थे… लेकिन, लेकिन, लेकिन, लेकिन… दोनों ने प्रकारान्तर से यह स्वीकार किया कि उन्होंने यह हमले करके “इस्लाम” की सेवा की है। पिछले कुछ समय से अमेरिका में हुए आत्मघाती और हमले के षडयन्त्र की कुछ और घटनाएं देखिये –

1) गत दिसम्बर में फ़ोर्ट जैक्सन के मिलेट्री बेस में पाँच व्यक्तियों (यानी मुस्लिमों) को गिरफ़्तार किया गया, जब वे साउथ केरोलिना मिलेट्री बेस के लिये आये हुए खाने में जहर मिलाने की कोशिश कर रहे थे।

http://www.nypost.com/p/news/national/five_muslim_soldiers_arrested_over_zYTtFXIBnCecWcbGNobUEJ#ixzz0gEmjO5C8

2) 1 जून 2009 को अब्दुल हकीम मोहम्मद ने अरकंसास प्रान्त में दो अमेरिकी सैनिकों को गोली से उड़ा दिया।

3) अप्रैल 2009 में साउथ जर्सी में फ़ोर्ट डिक्स पर हमला करने का षडयन्त्र करते हुए चार मुस्लिम युवक धराये।

तात्पर्य यह कि अमेरिका में ऐसी घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, इसीलिये इनकी इस हरकत से यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि –

1) इस्लाम बड़ा या राष्ट्र बड़ा?

2) कोई व्यक्ति जिस देश का नागरिक है उसे अपने देश के प्रति वफ़ादार रहना चाहिये या अपने धर्म के प्रति?

3) यदि इतनी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी किसी व्यक्ति के दिल में अपने देश के प्रति (जहाँ से वह रोजी-रोटी कमा रहा है) प्रेम का भाव नहीं जागता, बल्कि उसके धर्म के प्रति ऐसा “अनुराग” जाग जाता है कि उसके लिये वह मरने-मारने पर उतारू हो जाता है, तो क्या फ़ायदा है ऐसी उच्च शिक्षा का?

4) “अपने” देश से गद्दारी करने के संस्कार, उन्हें कहाँ से मिले?

5) अच्छे खासे कमाते-खाते-पीते अचानक उसी देश के प्रति गद्दारी का भाव कहाँ से जागा, जहाँ की वे रोटी खा रहे हैं?

यह ब्रेन-वॉश किसने किया?

अब आते हैं, माधुरी गुप्ता मामले पर, जैसा कि सभी जानते हैं “गद्दार” माधुरी गुप्ता को जासूसी के आरोप में पुलिस ने गिरफ़्तार किया हुआ है और उससे पूछताछ जारी है। पूछताछ में पता चला है कि माधुरी के बैंक खातों में किसी भी प्रकार की “असामान्य एंट्रियाँ” नहीं पाई गई हैं, अतः यह गद्दारी, धन के लिये होने की सम्भावना कम लगती है। वहीं दूसरी ओर जाँच में यह सामने आया है कि माधुरी गुप्ता, इस्लामाबाद में एक पाकिस्तानी सेना के अफ़सर मुदस्सर राणा के प्रेम(?) में फ़ँसी हुई थी, और माधुरी ने लगभग 6 साल पहले ही इस्लाम कबूल कर लिया था। फ़रवरी 2010 में अफ़गानिस्तान में भारतीयों पर हुए हमले के सम्बन्ध में माधुरी ने तालिबान को मदद पहुँचाने वाली जानकारी दी थी।

माधुरी गुप्ता ने कुछ समय पहले भी खुलेआम एक इंटरव्यू में कहा था कि उसे पाकिस्तान और पाकिस्तानियों से “सहानुभूति” है। यह कैसी मानसिकता है? क्या धर्म बदलते ही राष्ट्र के प्रति निष्ठा भी बदल गई? इससे पहले भी अमेरिका के एडम गैडहॉन ने इस्लाम अपनाया था और बाकायदा टीवी पर एक टेप जारी करके अमेरिकी मुसलमानों से मेजर निदाल मलिक के उदाहरण से "कुछ सीखने"(?) की अपील की थी, अर्थात जिस देश में जन्म लिया, जो मातृभूमि है, जहाँ के नागरिक हैं… उसी पर हमला करने की साजिश रच रहे हैं और वह भी "इस्लाम" के नाम पर… ये सब क्या है? 

माधुरी गुप्ता के मामले में पाखण्ड और डबल-क्रास का उदाहरण भी देखिये, कि पाकिस्तान के मीडिया ने कहा कि “माधुरी गुप्ता एक शिया मुस्लिम है और उसने यह काम करके इस्लाम को नीचा दिखाया है”। यानी यहाँ भी शिया-सुन्नी वाला एंगल फ़िट करने की कोशिश की जा रही है…। सवाल उठता है कि सानिया मिर्ज़ा भी तो शिया मुस्लिम है, उसे अपनाने में तो भाभी-भाभी कहते हुए पाकिस्तानी मीडिया, बैंड-बाजे बजाकर आगे-आगे हो रहा है, तो माधुरी गुप्ता पर यह इल्ज़ाम क्यों लगाया जा रहा है कि “वह एक शिया है…”। इससे तो ऐसा लगता है, कि मौका पड़ने पर और सानिया मिर्जा का बुरा वक्त (जो कि शोएब जैसे रंगीले रतन और सटोरिये की वजह से जल्द ही आयेगा) आने पर, पाकिस्तान का मीडिया फ़िर से शोएब के पीछे ही खड़ा होगा और सानिया मिर्ज़ा को दुत्कार देगा, क्योंकि वह शिया है? मौलाना कल्बे जव्वाद ने पाकिस्तानी मीडिया की “शिया-सुन्नी” वाली थ्योरी की जमकर आलोचना की है, लेकिन उससे उन लोगों को कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला, क्योंकि विभाजन के वक्त भारत से गये हुए मुसलमानों को वे लोग आज भी "मुहाजिर" कहते हुए लताड़ते हैं। 

अन्त में इतना ही कहना चाहूंगा कि, भारत पर हमला करने वाला अजमल कसाब तो युवा है और लगभग अनपढ़ है अतः उसे बहकाना और भड़काना आसान है, लेकिन यदि मोहम्मद अत्ता जैसा पढ़ा-लिखा पायलट सिर्फ़ “धर्म” की खातिर पागलों की तरह हवाई जहाज ट्विन टावर से टकराता फ़िरे… या लन्दन स्कूल ऑफ़ ईकोनोमिक्स का छात्र उमर शेख, डेनियल पर्ल का गला रेतने लगे… तब निश्चित ही कहीं न कहीं कोई गम्भीर गड़बड़ी है। गड़बड़ी कहाँ है और इसका “मूल” कहाँ है, यह सभी जानते हैं, लेकिन स्वीकार करने से कतराते, मुँह छिपाते हैं, शतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर गड़ा लेते हैं… और ऐसे लोग ही या तो “सेकुलर” कहलाते हैं या “बुद्धिजीवी”। सॉरी, सॉरी… एक और विषधर जमात भी है, जिसे “पोलिटिकली करेक्ट” कहा जाता है…।

खैर… यदि कसाब जैसे अनपढ़ों की बात छोड़ भी दें (क्योंकि वह पाकिस्तान का नागरिक है और भारत के विरुद्ध काम कर रहा था) लेकिन यह सवाल बार-बार उठेगा कि, उच्च शिक्षा प्राप्त युवा, 5 अंकों में डालरों की तनख्वाह पाने वाले, जब किसी दूसरे देश के "स्थायी नागरिक" बन जाते हैं तब उनके लिये “धर्म बड़ा होना चाहिये या वह देश?”


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बहुप्रतीक्षित 3G स्पेक्ट्रम की नीलामी की निविदाएं कल (19 मई को) खोली गईं। UPA की महान दिलदार, उदार सरकार ने उम्मीद की थी कि उसे लगभग 35,000 करोड़ का राजस्व मिलेगा, जबकि 22 सर्कलों की लाइसेंस बिक्री के जरिये सरकार को अभी तक 70,000 करोड़ रुपये मिल चुके हैं, तथा BSNL और MTNL की “रेवेन्यू शेयरिंग” तथा “सर्कल डिस्ट्रीब्युशन” के कारण अभी यह आँकड़ा 85,000 करोड़ रुपये को पार कर जायेगा। कुछ ही दिनों में BWA (ब्रॉडबैण्ड वायरलेस एक्सेस) की भी नीलामी होने वाली है, जिससे सरकार को और 30,000 करोड़ की आय होने की उम्मीद है और निश्चित ही उसमें भी ज्यादा ही मिलेगा।

2G के महाघोटाले के बाद सतत राजा बाबू और नीरा राडिया के कारनामों को उजागर करने वाले “एकमात्र अखबार” द पायोनियर को इस बात का श्रेय जाता है कि उसने सरकार को मजबूर कर दिया कि 3G लाइसेंस बिक्री के सूत्र राजा बाबू के हाथ न आने पायें। पायनियर द्वारा लगातार बनाये गये दबाव के कारण सरकार को मजबूरन थ्री-जी की नीलामी के लिये –

1) मंत्रियों का एक समूह बनाना पड़ा

2) जिसकी अध्यक्षता प्रणब मुखर्जी ने की,

3) इसमें प्रधानमंत्री की तरफ़ से विशेषज्ञ के रूप में सैम पित्रोदा को भी शामिल किया गया

4) भारी चिल्लाचोट और कम्पनियों द्वारा छातीकूट अभियान के बावजूद नीलामी की प्रक्रिया जनवरी 2009 से शुरु की गई, जब वैश्विक मंदी कम होने के आसार दिखने लगे (वरना कम्पनियाँ मंदी का बहाना बनाकर कम पैसों में अधिक माल कूटने की फ़िराक में थीं…)

5) नीलामी रोज सुबह 9.30 से शाम 7.00 तक होती, और इसके बाद प्रत्येक कम्पनी को उस दिन शाम को अपने रेट्स केन्द्रीय सर्वर को सौंपना होते थे, जिस वजह से सरकार को अधिक से अधिक आय हुई।

6) इस सारी प्रक्रिया से बाबुओं-अफ़सरों-नौकरशाही-लॉबिंग फ़र्मों और फ़र्जी नेताओं को दूर रखा गया।

सोचिये, कि यदि अखबार ने राजा बाबू-नीरा राडिया के कारनामों को उजागर नहीं किया होता तो इसमें भी राजा बाबू कितना पैसा खाते? अर्थात यदि प्रमुख मीडिया अपनी भूमिका सही तरीके निभाये, फ़िर उसे अंग्रेजी-हिन्दी के ब्लॉगर एवं स्वतन्त्र पत्रकार आम जनता तक जल्दी-जल्दी पहुँचायें तो सरकारों पर दबाव बनाया जा सकता है। यदि सरकार द्वारा यही सारे उपाय 2G के नीलामी में ही अपना लिये जाते तो सरकार के खाते में और 60,000 करोड़ रुपये जमा हो जाते।

(दिक्कत यह है कि यदि ऐसी प्रक्रिया सभी बड़े-छोटे ठेकों में अपनाई जाने लगे, तो कांग्रेसियों को चुनाव लड़ने का पैसा निकालना मुश्किल हो जाये… दूसरी दिक्कत यह है कि सभी को मोटी मलाई चाहिये, जबकि इतने बड़े सौदों में “तपेले की तलछट” में ही इतनी मलाई होती है कि “बिना कुछ किये” अच्छा खासा पेट भर सकता है, लेकिन फ़िर भी पता नहीं क्यों इतना सारा पैसा स्विट्ज़रलैण्ड की बैंकों में सड़ाते रहते हैं ये नेता लोग…?)

बहरहाल, ऐसा भी नहीं है कि इतनी सारी प्रक्रियाएं अपनाने के बावजूद सारा मामला एकदम पाक-साफ़ ही हुआ हो, लेकिन फ़िर भी जिस तरह से राजा बाबू खुलेआम डाका डाले हुए थे उसके मुकाबले कम से कम प्रक्रिया पारदर्शी दिखाई तो दे रही है। 3G की नीलामी में राजा बाबू को पैसा खाने नहीं मिला और उनके मोटी चमड़ीदार पेट पर लात तो पड़ ही गई है, लेकिन फ़िर भी “जिस उचित जगह” पर उन्हें लात पड़नी चाहिये थी, वह अब तक नहीं पड़ी है… देखते हैं “ईमानदार बाबू” का धर्म-ईमान कब जागता है।
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भाग-1 में हमने देखा कि 2G स्पेक्ट्रम घोटाला क्या है, तथा भाग-2 में हमने देखा कि इस महाघोटाले को कैसे अंजाम दिया गया तथा पैसा किस प्रकार ठिकाने लगाया गया, इस वजह से अब उन पत्रों और दस्तावेजों के मजमून में से कुछ खास-खास बातें पेश करने पर किसी को भी इसे समझने में आसानी होगी, कि किस तरह से उद्योगपति-नेता-अफ़सर का बदकार त्रिकोण हमारे देश को लूट-खसोट रहा है… पेश है तीसरा और अन्तिम भाग…

चूंकि पत्रों-दस्तावेजों की स्कैन प्रति यहाँ अटैच कर ही रहा हूं, इसलिये उसमें उल्लेखित सिर्फ़ कुछ खास-खास बातें ही लिखूंगा… ऐसा करने पर भी लेख लम्बा हो गया है… अतः अधिक विस्तार से पढ़ने के लिये उस पर चटका लगाकर अक्षर बड़े करके पढ़ा जा सकता है –

राजा बाबू को मंत्री बनवाने के समय राजा-राडिया और कनिमोझी के किये गये फ़ोन टेप का चित्र यह है,
जिसमें नीरा, कनिमोझी से कहती हैं – “DMK के कोटे से कौन मंत्री बनेगा कौन नहीं बनेगा इससे प्रधानमंत्री को कोई मतलब नहीं है…प्रधानमंत्री ने कहा है कि उन्हें टीआर बालू अथवा ए राजा से कोई तकलीफ़ नहीं है, दयानिधि मारन ने गुलाम नबी आज़ाद से बात की है, लेकिन अन्तिम निर्णय तो करुणानिधि का ही होगा…, प्रधानमंत्री के सामने पाँच मंत्रालयों की माँग रख दी है और कह दिया है कि यदि नहीं मिले तो हम सरकार में शामिल नहीं होंगे…”
दूसरे फ़ोन में नीरा, राजा बाबू से कहती हैं, “अझागिरी या मारन में से कोई एक मंत्रिमण्डल में आ सकता है, लेकिन एक ही परिवार के तीन लोग होंगे तो करुणानिधि को इसकी सफ़ाई देना मुश्किल होगा… कपड़ा मंत्रालय या उर्वरक मंत्रालय? राजा बाबू कहते हैं कि “हाँ… एक ही परिवार के तीन लोग मंत्री, मुश्किल तो होगी… लेकिन राजनीति में यह तो चलता है…” (हँसते हैं…) खैर देखते हैं आगे क्या होता है…। अन्ततः टाटा और राडिया मिलकर मारन को मंत्रिमण्डल से बाहर रखने में सफ़ल होते हैं… और जमकर सौदेबाजी के बाद DMK के लिये 5 मंत्रालय दिये जाते हैं।


अगले पत्र में सीबीआई के आईपीएस अधिकारी श्री विनीत अग्रवाल ने श्री मिलाप जैन को पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने केस क्रमांक और दिनांक के उल्लेख सहित इस बात को रेखांकित किया है कि नीरा राडिया की कम्पनी नोएसिस कंसल्टेंसी इस पूरे षडयंत्र में पूरी तरह से शामिल है, और इन लोगों पर कड़ी नज़र रखने की जरूरत है, चाहे फ़ोन टेपिंग ही क्यों न करनी पड़े…और इससे जाँच के काम में मदद मिलेगी…


पत्र क्रमांक 2, श्री आशीष अबरोल (आयकर संयुक्त आयुक्त) द्वारा श्री विनीत अग्रवाल को लिखा गया, जिसमें अबरोल ने कहा है कि CBDT से मिली सूचना के आधार पर (गृह सचिव की अनुमति से) नीरा राडिया की फ़ोन लाइनें निगरानी पर ली गई हैं। नीरा राडिया की कम्पनियाँ नोएसिस, वैष्णवी कंसल्टेंसी, विटकॉम और न्यूकॉम, सरकार के विभिन्न विभागों जैसे, टेलीकॉम, पावर, एवियेशन, और इन्फ़्रास्ट्रक्चर में खामख्वाह दखल और सलाह देती हैं। पत्र में दो प्रमुख बातें हैं -
1) यह स्पष्ट है कि नीरा राडिया का टेलीकॉम लाइसेंस के मामले में कुछ भूमिका है।
2) नीरा राडिया और संचार मंत्री के बीच अक्सर सीधी बातचीत होती रहती है।

(अर्थात आयकर, सीबीआई, CBDT तीनों विभागों की निगरानी राडिया और राजा पर थी और इसमें सरकार की सहमति, अनुमति और जानकारी थी…) जबकि सरकार लगातार (आज भी) कहती रही है कि किसी की भी फ़ोन टैपिंग नहीं की गई है…





अगला दस्तावेज़, CBDT के श्री सुधीर चन्द्रा को सम्बोधित किया गया है, और इसमें सौदे में Unitech कम्पनी की संदिग्ध भूमिका, उसकी अनियमितताएं आदि के बारे में बाकायदा टेबल बनाकर बताया गया है, कि किस तरह यूनिटेक ने फ़र्जी लोन एंट्रियाँ दर्शाईं, और केपिटल गेन के 240 करोड़ रुपयों को भी हेराफ़ेरी करके दिखाया।


अगला चित्र इसी का दूसरा पेज है, जिसमें बताया गया है कि अमेरिका के लेहमैन ब्रदर्स के धराशाई हो जाने पर यूनिटेक घबरा गई तब नीरा राडिया ने ही टाटा रियलिटी से कहकर यूनिटेक के लिये 650 करोड़ का एडवांस जुगाड़ करवाया (इसे कहते हैं हाईटेक हाईफ़ाई दल्लेबाजी)। यूनिटेक ने टाटा को जो चेक दिये वह बाउंस हो गये जबकि राडिया ने प्रेस कान्फ़्रेंस में कहा था कि उस एडवांस का हिसाब-किताब हो चुका है। नीरा राडिया ने ही यूनीटेक को लाइसेंस दिलवाने में मुख्य भूमिका निभाई।


अगला पत्र आयकर विभाग की अन्तरिम जाँच रिपोर्ट (जून 2009) का है, जिसमें विभाग द्वारा सरकार को रिपोर्ट पेश की गई है कि नीरा राडिया की कम्पनियों की 9 लाइनों को 180 दिनों तक लगातार निगरानी और टेप किया गया, और इस बातचीत से पता चलता है कि टेलीकॉम, पावर और एवियेशन (उड्डयन) मंत्रालय में इन चारों फ़र्मों की गहरी पैठ है तथा इनके द्वारा कई काम करवाये गये हैं (अर्थात जून 2009 में ही सरकार को पता चल गया था कि राडिया-राजा के बीच जमकर घी-खिचड़ी है, तब भी राजा बाबू को दूरसंचार मंत्रालय सौंपने में “ईमानदार” बाबू को कोई अड़चन नहीं आई?)


अगले पत्र में विभाग की जुलाई 2009 की अन्तरिम जाँच रिपोर्ट है, जिसमें सरकार को बताया गया है कि फ़ोन पर सुनी गई बातों के मुताबिक, सरकार के गोपनीय दस्तावेज और सरकार की नीतियों सम्बन्धी जानकारी राडिया की कम्पनियों को कहीं से लीक हो रही है। टेपिंग के अनुसार अफ़्रीका के गिनी अथवा सेनेगल देशों से भी भारी मात्रा में पैसों के लेनदेन की बात सामने आई है। यह बात भी सामने आई है कि बड़ी मात्रा में निवेश करके भारत के किसी चैनल को खरीदने और अपने पक्ष में तथा विरोधी को परेशान करने के लिये अदालतों में NGOs द्वारा जनहित याचिका लगाने के लिये पैसा दिया जा रहा है। (तात्पर्य यह कि यह सब काले धंधे सरकार को जुलाई 2009 में ही पता चल चुके थे, तब भी “भलेमानुष” हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे? और आज भी कह रहे हैं कि “जाँच जारी है…)


अगला दस्तावेज़ कहता है कि “भारतीय टेलीकॉम के बेताज बादशाह” (अर्थात सुनील भारती मित्तल), नीरा राडिया की मदद से ए राजा से मधुर सम्बन्ध बनाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि दक्षिण अफ़्रीका की कम्पनी के अधिग्रहण करने में आसानी हो (हालांकि राजा के मंत्री बनने से पहले भारती मित्तल पूरी कोशिश कर चुके थे कि राजा मंत्री न बनने पायें)। इसी पत्र में बताया गया है कि राडिया की “विटकॉम” कम्पनी NDTV इमेजिन का भी काफ़ी कामधाम संभालती है (शायद इसीलिये बरखा दत्त, राडिया की लॉबिंग में लगी थीं), “वैष्णवी” कम्पनी टाटा समूह के “पर्यावरण सम्बन्धी” मामलों का “निपटारा” करती है, जबकि “न्यूकॉम” कम्पनी मुकेश अम्बानी की कुछ कम्पनियों की देखरेख करती है। (अब बताईये भला, टाटा-अम्बानी जैसों से मधुर सम्बन्ध रखने वाली राडिया का बाल भी बाँका हो सकता है क्या?) टेलीफ़ोन टेपिंग से पता चला कि जिन चार कम्पनियों को राडिया ने प्रमुख स्पेक्ट्रम और लाइसेंस दिलवाये उसमें से DataComm कम्पनी को वीडियोकॉन के धूत साहब ने मुकेश अम्बानी समूह के एक खास रसूखदार मनोज मोदी से साँठगाँठ कर खड़ा किया, मनोज मोदी भी लगातार नीरा राडिया के सम्पर्क में बने रहे हैं।


इसी दस्तावेज के अगले पेज पर भी टेलीफ़ोन टेपिंग से सम्बन्धित सीबीआई के कुछ नोट्स हैं – जैसे कि रतन टाटा और नीरा राडिया के बीच लम्बी बातचीत हुई जिसमें टाटा ने दयानिधि मारन को किसी भी कीमत पर मंत्री बनने से रोकने सम्बन्धी पेशकश की है। अप्रत्यक्ष रूप से रतन टाटा Aircell (एयरसेल) कम्पनी के मालिक हैं, और उन्होंने कह दिया था कि यदि मारन संचार मंत्री बने तो वे टेलीकॉम का धंधा ही छोड़ देंगे। नीरा राडिया और कनिमोझी (करुणानिधि की पुत्री) की तरफ़ से बरखा दत्त और वीर संघवी, राजा को मंत्री बनवाने के लिये कांग्रेस में बातचीत कर रहे थे। जबकि दूसरी तरफ़ एयरटेल (मित्तल) चाहते थे कि राजा को मंत्री नहीं बनने दिया जाये और उसे अपना मनपसन्द स्पेक्ट्रम मिल जाये, क्योंकि अनिल अम्बानी की रिलायंस कम्युनिकेशंस को वह अपना प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मानते हैं। बरखा दत्त और नीरा राडिया की इस काम में मदद के लिये तरुण दास, वीर संघवी तथा सुनील अरोरा (राजस्थान कैडर के एक IAS) तैनात थे। इसी प्रकार भारती एयरटेल चाहती थी कि मारन संचार मंत्री बन जायें ताकि CDMA लॉबी की बजाय GSM लॉबी में प्रभुत्व जमाया जा सके। सुनील मित्तल ने राडिया के समक्ष उनके लिये काम करने की पेशकश भी की, लेकिन राडिया ने कहा कि जब तक वे उधर हैं “टाटा” के हितों पर आँच आने जैसा कोई काम नहीं करेंगी। फ़ोन टेप से यह भी पता चला कि सुहैल सेठ के निवास पर सुनील मित्तल से मिलने एक तीसरा व्यक्ति आया था जो कि राडिया और मित्तल के बीच की कड़ी की तरह काम कर रहा था, यही व्यक्ति बाद में मुकेश अम्बानी से भी मिला और उन्होंने नीरा राडिया और सुनील मित्तल के बीच चल रही संदेहास्पद चालों पर अप्रसन्नता व्यक्त की।



अर्थात नीरा राडिया की घुसपैठ लगभग प्रत्येक बड़े उद्योग घराने, मीडिया के प्रमुख लोगों तथा स्वाभाविक रुप से राजनीतिकों तक भी थी… अगले पत्र में यह बताया गया है कि किस तरह से नीरा राडिया के दो सहयोगियों अमित बंसल और आरएस बंसल ने यूनीटेक के लिये पैसों की जुगाड़ की, यूनिटेक को रीयल एस्टेट के धंध मे हुए नुकसान की भरपाई किस तरह करवाई, किस तरह से सरकार को चूना लगाने हेतु काम किया, आदि-आदि। नीरा राडिया और जहाँगीर पोचा, “नईदुनिया” के छजलानी के भी निरन्तर सम्पर्क में थे, ताकि भारत में एक न्यूज़ चैनल शुरु किया जा सके (सम्भवतः न्यूज़ 9X) जिसे बाद में पीटर और इन्द्राणी मुखर्जी अधिग्रहण कर सकें। लगभग सभी मामलों में काम करने का तरीका एक ही था, मीडिया वालों और बड़े पत्रकारों को महंगे उपहार जैसे कार, विदेश यात्रा (और शायद पद्मश्री भी?) आदि का लालच देकर अपने पक्ष में करना


झारखण्ड में टाटा एक खदान की लीज़ बढ़वाना चाहते थे, मधु कौड़ा उनसे 180 करोड़ मांग रहे थे, लेकिन राडिया ने झारखण्ड के राज्यपाल की मदद से टाटा को खदान की लीज़ आगे बढ़वा दी, उसकी उन्हें फ़ीस (आँकड़ा मालूम नहीं) मिली। नीरा राडिया का वित्तीय कारोबार अफ़्रीकी देशों में भी फ़ैला हुआ है, इसीलिये उनकी फ़र्म “ग्लोबल मिनरल्स” के जरिये अफ़्रीकी देशों में पैसा निवेश करने के लिये करुणानिधि के CA मुथुरामन और IAS अधिकारी प्रदीप बैजल उनसे एक ई-मेल में अनुरोध करते हैं।


ADAG और रिलायंस के झगड़ों, हल्दिया पेट्रोकेमिकल्स में मुकेश अम्बानी की दिलचस्पी, राडिया और मनोज मोदी द्वारा रिलायंस कम्युनिकेशंस को घेरने के षडयन्त्र, मनोज मोदी के मार्फ़त दिल्ली के एक NGO को पैसा देकर न्यायालय में फ़र्जी जनहित याचिकाएं दायर करने… इत्यादि बातों के बारे में पढ़ने के लिये अगला चित्र देखें…


डॉ स्वामी ने आरोप लगाया है कि इस सौदे में सोनिया गाँधी के  केमैन आइलैण्ड स्थित बैंक ऑफ़ अमेरिका के खाते में करोड़ों डॉलर की एंट्रियाँ हुई हैं…। राजनैतिक (और बौद्धिक) क्षेत्रों में अक्सर डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी को गम्भीरता से नहीं लिया जाता, इसकी वजह या तो स्वामी का अधिक बुद्धिमान होना है या फ़िर राजनैतिक दलों में उनके तर्कों के प्रति घबराहट का भाव… कारण जो भी हो, लेकिन डॉ स्वामी ने अकेले दम पर सोनिया गाँधी के खिलाफ़ उनकी नागरिकता, उनके KGB से सम्बन्धों, उन पर बहुमूल्य कलाकृतियों की स्मगलिंग आदि के बारे में कोर्ट केस, आरोपों और याचिकाओं की झड़ी लगा दी है। यदि विपक्ष में जरा भी दम होता और वह एकजुट होता तो उसे डॉ स्वामी का साथ देना चाहिये था? जरा डॉ स्वामी द्वारा प्रेस विज्ञप्ति में जारी विभिन्न आरोपों की सूची देखिये… http://www.janataparty.org/pressdetail.asp?rowid=58

इस महाघोटाले के सम्बन्ध में और भी पढ़ना चाहते हैं तो निम्न लिंक्स पर जाकर देख सकते हैं…

1) http://www.hinduonnet.com/fline/fl2601/stories/20090116260112800.htm

2) http://jgopikrishnan.blogspot.com/2009/03/spectrum-scandal-and-telecom-ministers.html

3) http://www.businessworld.in/bw/2009_10_24_CBI_Raid_Turns_The_Heat_On_DoT.html

4) http://www.telecomasia.net/content/proving-charges-tricky-indias-spectrum-scandal

सारे मामले-झमेले का लब्बेलुबाब यह है कि सीबीआई के अधिकारी और पुलिस जानती है कि किस नेता या उद्योगपति की असल में क्या “औकात” है, किस-किस ने अपने हाथ कहाँ-कहाँ गन्दे किये हुए हैं, लेकिन सीबीआई हो, पुलिस हो या चाहे सेना ही क्यों न हो… सभी के हाथ बँधे हुए हैं, जनता को महंगाई के बोझ तले इतना दबा दिया गया है कि उसे अपनी रोजी-रोटी से ही फ़ुर्सत नहीं मिलती… विपक्षी दलों की पूँछ भी सीबीआई के डण्डे तले ही दबा दी गई है, 95% मीडिया या तो बिका हुआ है अथवा “विचारधारा” के आधार पर लॉबिंग कर रहा है। गिने-चुने हिन्दी ब्लॉगर, 50-100 अंग्रेजी ब्लॉगर और कुछ स्वतन्त्र पत्रकार जिन्हें बमुश्किल 1000-2000 लोग भी नहीं पढ़ते, अपना सिर फ़ोड़ रहे हैं, भला ऐसे में जनता तक बात पहुँचेगी कैसे? 

बहरहाल, प्रस्तुत लेख सीरिज में जो भी दस्तावेज़ पेश किये गए हैं उनमें से कुछ इंटरनेट से, कुछ पत्रकार मित्रों से तथा कुछ अन्य सहयोगियों से ई-मेल पर प्राप्त हुए हैं… इनकी विश्वसनीयता की जाँच कर सकना, मेरे जैसे सीमित संसाधनों वाले आम आदमी के बस की बात नहीं है, लेकिन यह बात भी उतनी ही सच है कि इसमें से (बल्कि इससे भी अधिक) गोपनीय दस्तावेज़ देश के लगभग सभी प्रमुख मीडिया संस्थानों और बड़े-बड़े पत्रकारों के पास पहले से ही मौजूद हैं। उनमें से सभी ने इस मामले को दिखाने-छापने से या तो परहेज किया अथवा अपने-अपने स्वार्थ पूर्ति के अनुसार काट-छाँट कर प्रकाशित किया, ऐसा करने के पीछे उनके “आपसी व्यावसायिक सम्बन्ध” हैं।

राजा बाबू आज भी तनकर चल रहे हैं, नीरा राडिया सारा माल-असबाब समेटकर लन्दन में आराम फ़रमा रही हैं… उद्योगपति-IAS अफ़सर के गठजोड़ मस्ती छान रहे हैं, आज तक भ्रष्टाचार के किसी मामले में किसी नेता को सलाखों के पीछे नहीं भेजा जा सका है… तो इसके पीछे कब्र में पैर लटकाये बैठे उनके करुणानिधि टाइप के सैकड़ों मसीहा, “ऊपर” से आदेश लेकर हर काम करते हमारे भलेमानुष प्रधानमंत्री, “त्यागमूर्ति” और भारत के युवाओं को सपने बेचते भोंदू युवराज, गठबन्धन की कीचड़नुमा राजनीतिक मजबूरी, हमारा सड़ा हुआ लोकतांत्रिक सिस्टम, और कुछ हद तक “लूट से बेखबर”, वोटिंग के दिन घर पर आराम फ़रमाने वाले हम-आप-सभी मिलजुलकर जिम्मेदार हैं…

इति श्री 2G स्पेक्ट्रम महाकथा स्रोत सम्पूर्णम्


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भाग-1 में हमने देखा था कि 2G स्पेक्ट्रम घोटाले की पृष्ठभूमि क्या है और असल में यह खेल है क्या… इस भाग में, यह घोटाला कैसे किया गया, इसे देखते हैं…

इस महाघोटाले को ठीक से और जल्दी समझने के लिये मैं इसे दिनांक के क्रम में जमा देता हूं –

- 16 मई 2007 को राजा बाबू को प्रधानमंत्री ने कैबिनेट में दूरसंचार मंत्रालय दिया।
(2009 में फ़िर से यह मंत्रालय हथियाने के लिये नीरा राडिया, राजा बाबू और करुणानिधि की पुत्री कनिमोझि के बीच जो बातचीत हुई उसकी फ़ोन टैप की गई थी, उस बातचीत का कुछ हिस्सा आगे पेश करूंगा…)

- 28 अगस्त 2007 को TRAI (दूरसंचार नियामक प्राधिकरण) ने बाजार भाव पर विभिन्न स्पेक्ट्रमों के लाइसेंस जारी करने हेतु दिशानिर्देश जारी किये, ताकि निविदा ठेका लेने वाली कम्पनियाँ बढ़चढ़कर भाव लगायें और सरकार को अच्छा खासा राजस्व मिल सके।

- 28 अगस्त 2007 को ही राजा बाबू ने TRAI की सिफ़ारिशों को खारिज कर दिया, और कह दिया कि लाइसेंस की प्रक्रिया जून 2001 की नीति (पहले आओ, पहले पाओ) के अनुसार तय की जायेंगी (ध्यान देने योग्य बात यह है कि 2001 में भारत में मोबाइलधारक सिर्फ़ 40 लाख थे, जबकि 2007 में थे पैंतीस करोड़। (यानी राजा बाबू केन्द्र सरकार को चूना लगाने के लिये, कम मोबाइल संख्या वाली शर्तों पर काम करवाना चाहते थे।)

- 20-25 सितम्बर 2007 को राजा ने यूनिटेक, लूप, डाटाकॉम तथा स्वान नामक कम्पनियों को लाइसेंस आवेदन देने को कह दिया (इन चारों कम्पनियों में नीरा राडिया तथा राजा बाबू की फ़र्जी कम्पनियाँ भी जुड़ी हैं), जबकि यूनिटेक तथा स्वान कम्पनियों को मोबाइल सेवा सम्बन्धी कोई भी अनुभव नहीं था, फ़िर भी इन्हें इतना बड़ा ठेका देने की योजना बना ली गई

- दिसम्बर 2007 में दूरसंचार मंत्रालय के दो वरिष्ठ अधिकारी (जो इस DOT की नीति को बदलने का विरोध कर रहे थे, उसमें से एक ने इस्तीफ़ा दे दिया व दूसरा रिटायर हो गया), इसी प्रकार राजा द्वारा “स्वान” कम्पनी का पक्ष लेने वाले दो अधिकारियों का ट्रांसफ़र कर दिया गया। इसके बाद राजा बाबू और नीरा राडिया का रास्ता साफ़ हो गया।

- 1-10 जनवरी 2008 : राजा बाबू पहले पर्यावरण मंत्रालय में थे, वहाँ से वे अपने विश्वासपात्र(?) सचिव सिद्धार्थ बेहुरा को दूरसंचार मंत्रालय में ले आये, फ़िर कानून मंत्रालय को ठेंगा दिखाते हुए DOT ने ऊपर बताई गई चारों कम्पनियों को दस दिन के भीतर नौ लाइसेंस बाँट दिये

22 अप्रैल 2008 को ही राजा बाबू के विश्वासपात्र सेक्रेटरी सिद्धार्थ बेहुरा ने लाइसेंस नियमों में संशोधन(?) करके Acquisition (अधिग्रहण) की जगह Merger (विलय) शब्द करवा दिया ताकि यूनिटेक अथवा अन्य सभी कम्पनियाँ “तीन साल तक कोई शेयर नहीं बेच सकेंगी” वाली शर्त अपने-आप, कानूनी रूप से हट गई।

- 13 सितम्बर 2008 को राजा बाबू ने BSNL मैनेजमेंट बोर्ड को लतियाते हुए उसे “स्वान” कम्पनी के साथ “इंट्रा-सर्कल रोमिंग एग्रीमेण्ट” करने को मजबूर कर दिया। (जब मंत्री जी कह रहे हों, तब BSNL बोर्ड की क्या औकात है?)

- सितम्बर अक्टूबर 2008 : “ऊपर” से हरी झण्डी मिलते ही, इन कम्पनियों ने कौड़ी के दामों में मिले हुए 2G स्पेक्ट्रम के लाइसेंस और अपने हिस्से के शेयर ताबड़तोड़ बेचना शुरु कर दिये- जैसे कि स्वान टेलीकॉम ने अपने 45% शेयर संयुक्त अरब अमीरात की कम्पनी Etisalat को 4200 करोड़ में बेच दिये (जबकि स्वान को ये मिले थे 1537 करोड़ में) अर्थात जनवरी से सितम्बर सिर्फ़ नौ माह में 2500 करोड़ का मुनाफ़ा, वह भी बगैर कोई काम-धाम किये हुए। अमीरात की कम्पनी Etisalat ने यह भारी-भरकम निवेश मॉरीशस के बैंकों के माध्यम से किया (गौर करें कि मॉरीशस एक “टैक्स-स्वर्ग” देश है और ललित मोदी ने भी अपने काले धंधे ऐसे ही देशों के अकाउंट में किये हैं और दुनिया में ऐसे कई देश हैं, जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था ही भारत जैसे भ्रष्ट देशों से आये हुए काले पैसे पर चलती है)…

बहरहाल आगे बढ़ें…

- यूनिटेक वायरलेस ने अपने 60% शेयर नॉर्वे की कम्पनी टेलनॉर को 6200 करोड़ में बेचे, जबकि यूनिटेक को यह मिले थे सिर्फ़ 1661 करोड़ में।

- टाटा टेलीसर्विसेज़ ने अपने 26% शेयर जापान की डोकोमो कम्पनी को 13230 करोड़ में बेच डाले।

अर्थात राजा बाबू और नीरा राडिया की मिलीभगत से लाइसेंस हथियाने वाली लगभग सभी कम्पनियों ने अपने शेयरों के हिस्से 70,022 करोड़ में बेच दिये जबकि इन्होंने सरकार के पास 10,772 करोड़ ही जमा करवाये थे। यानी कि राजा बाबू ने केन्द्र सरकार को लगभग 60,000 करोड़ का नुकसान करवा दिया (अब इसमें से राजा बाबू और नीरा को कितना हिस्सा मिला होगा, यह कोई बेवकूफ़ भी बता सकता है, तथा सरकार को जो 60,000 करोड़ का नुकसान हुआ, उससे कितने स्कूल-अस्पताल खोले जा सकते थे, यह भी बता सकता है)।

- 15 नवम्बर 2008 को केन्द्रीय सतर्कता आयोग ने राजा बाबू को नोटिस थमाया, सतर्कता आयोग ने इस महाघोटाले की पूरी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंप दी और लोकतन्त्र की परम्परानुसार(?) राजा पर मुकदमा चलाने की अनुमति माँगी।

- 21 अक्टूबर 2009 को (यानी लगभग एक साल बाद) सीबीआई ने इस घोटाले की पहली FIR लिखी।

- 29 नवम्बर 2008, 31 अक्टूबर 2009, 8 मार्च 2010 तथा 13 मार्च 2010 को डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी ने प्रधानमंत्री को कैबिनेट से राजा को हटाने के लिये पत्र लिखे, लेकिन “भलेमानुष”(?) के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।

- 19 मार्च 2010 को केन्द्र सरकार ने अपने पत्र में डॉ स्वामी को जवाब दिया कि “राजा पर मुकदमा चलाने अथवा कैबिनेट से हटाने के सम्बन्ध में जल्दबाजी में कोई फ़ैसला नहीं लिया जायेगा, क्योंकि अभी जाँच चल रही है तथा सबूत एकत्रित किये जा रहे हैं…”

- 12 अप्रैल 2010 को डॉ स्वामी ने दिल्ली हाइकोर्ट में याचिका प्रस्तुत की।

- 28 अप्रैल 2010 को राजा बाबू तथा नीरा राडिया के काले कारनामों से सनी फ़ोन टेप का पूरा चिठ्ठा (बड़े अफ़सरों और उद्योगपतियों के नाम वाला कुछ हिस्सा बचाकर) अखबार द पायनियर ने छाप दिया। अब विपक्ष माँग कर रहा है कि राजा को हटाओ, लेकिन कब्र में पैर लटकाये बैठे करुणानिधि, इस हालत में भी दिल्ली आये और सोनिया-मनमोहन को “धमका” कर गये हैं कि राजा को हटाया तो ठीक नहीं होगा…।


जैसा कि मैंने पहले बताया, राजा-करुणानिधि-कणिमोझी-नीरा राडिया जैसों को भारी-भरकम “कमीशन” और “सेवा-शुल्क” दिया गया, यह कमीशन स्विस बैंकों, मलेशिया, मॉरीशस, मकाऊ, आइसलैण्ड आदि टैक्स हेवन देशों की बैंकों के अलावा दूसरे तरीके से भी दिया जाता है… आईये देखें कि नेताओं-अफ़सरों की ब्लैक मनी को व्हाइट कैसे बनाया जाता है –

17 सितम्बर 2008 को चेन्नई में एक कम्पनी खड़ी की जाती है, जिसका नाम है “जेनेक्स एक्ज़िम”, जिसके डायरेक्टर होते हैं मोहम्मद हसन और अहमद शाकिर। इस नई-नवेली कम्पनी को “स्वान” की तरफ़ से दिसम्बर 2008 में अचानक 9.9% (380 करोड़) के शेयर दे दिये जाते हैं, यानी दो कौड़ी की कम्पनी अचानक करोड़ों की मालिक बन जाती है, ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि स्वान कम्पनी के एक डायरेक्टर अहमद सैयद सलाहुद्दीन भी जेनेक्स के बोर्ड मेम्बर हैं, और सभी के सभी तमिलनाडु के लोग हैं। सलाहुद्दीन साहब भी दुबई के एक NRI बिजनेसमैन हैं जो “स्टार समूह (स्टार हेल्थ इंश्योरेंस आदि)” की कम्पनियाँ चलाते हैं। यह समूह कंस्ट्रक्शन बिजनेस में भी है, और जब राजा बाबू पर्यावरण मंत्री थे तब इस कम्पनी को तमिलनाडु में जमकर ठेके मिले थे। करुणानिधि और सलाहुद्दीन के चार दशक पुराने रिश्ते हैं और इसी की बदौलत स्टार हेल्थ इंश्योरेंस कम्पनी को तमिलनाडु के सरकारी कर्मचारियों के समूह बीमे का काम भी मिला हुआ है, और स्वान कम्पनी को जेनेक्स नामक गुमनाम कम्पनी से अचानक इतनी मोहब्बत हो गई कि उसने 380 करोड़ के शेयर उसके नाम कर दिये। अब ये तो कोई अंधा भी बता सकता है कि जेनेक्स कम्पनी असल में किसकी है।

29 मई 2009 को जब राजा बाबू को दोबारा मंत्री पद की शपथ लिये 2 दिन भी नहीं हुए थे, दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस मुकुल मुदगल और वाल्मीकि मेहता ने एक जनहित याचिका की सुनवाई में कहा कि, 2G स्पेक्ट्रम लाइसेंस का आवंटन की “पहले आओ पहले पाओ” की नीति अजीब है, मानो ये कोई सिनेमा टिकिट बिक्री हो रही है? जनता के पैसे के दुरुपयोग और अमूल्य सार्वजनिक सम्पत्ति के दुरुपयोग का यह अनूठा मामला है, हम बेहद व्यथित हैं…”, लेकिन हाईकोर्ट की इस टिप्पणी के बावजूद “भलेमानुष” ने राजा को मंत्रिमण्डल से नहीं हटाया। इसी तरह 1 जुलाई 2009 को जस्टिस जीएस सिस्तानी ने DOT द्वारा लाइसेंस लेने की तिथि को खामख्वाह “जल्दी” बन्द कर दिये जाने की भी आलोचना की।

यह जनहित याचिका दायर की थी, स्वान की प्रतिद्वंद्वी कम्पनी STel ने, अब इस STel को चुप करने और इसकी बाँह मरोड़ने के लिये 5 मार्च 2010 को दूरसंचार विभाग ने गृह मंत्रालय का हवाला देते हुए कहा कि STel कम्पनी के कामकाज के तरीके से सुरक्षा चिताएं हैं इसलिये STel तीन राज्यों में अपनी मोबाइल सेवा बन्द कर दे, न तो कोई नोटिस, न ही कारण बताओ सूचना पत्र। इस कदम से हतप्रभ STel कम्पनी ने कोर्ट में कह दिया कि उसे दूरसंचार विभाग की “पहले आओ पहले पाओ” नीति पर कोई ऐतराज नहीं है, बाद में पता चला कि गृह मंत्रालय ने STel के विरुद्ध सुरक्षा सम्बन्धी ऐसे कोई गाइडलाइन जारी किये ही नहीं थे, लेकिन STel कम्पनी को भी तो धंधा करना है, पानी (मोबाइल सेवा) में रहकर मगरमच्छ (ए राजा) से बैर कौन मोल ले?

क्रमशः जारी आहे… (भाग-3 में हम सीबीआई के कुछ दस्तावेजों में उल्लेखित तथ्यों और जाँच एजेंसी के पत्राचार में आये हुए "कथित रुप से बड़े नामों" का जिक्र करेंगे…)
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विशेष नोट (खेद प्रकाशन) : भाग-1 पढ़ने के बाद, नाम प्रकाशित नहीं करने और पहचान गुप्त रखने की शर्त पर सीबीआई के एक अधिकारी का मेरे ईमेल पर स्पष्टीकरण आया है कि "विनीत अग्रवाल का ट्रांसफ़र किसी दबाव के तहत नहीं किया गया है, यह एक विभागीय प्रक्रिया है कि सीबीआई में सात वर्ष की पुनर्नियुक्ति के बाद सम्बन्धित अधिकारी अपने मूल कैडर में वापस लौट जाता है" अतः विनीत अग्रवाल के तबादले सम्बन्धी मेरे कथन हेतु मैं खेद व्यक्त करता हूं…। सीमित संसाधनों, सूचनाओं के लिये इंटरनेट पर अत्यधिक निर्भरता  और कम सम्पर्कों के कारण, मुझ जैसे छोटे-मोटे ब्लॉगर से कभीकभार इस प्रकार की तथ्यात्मक गलतियाँ हो जाती हैं, जिन्हें तत्काल ध्यान में लाये जाने पर खेद व्यक्त करने का प्रावधान है। हालांकि इस मामले में लगभग सभी बड़े पत्रकारों ने यही लिखा है कि "केस से हटाने और राजा को बचाने के लिये विनीत अग्रवाल का तबादला कर दिया गया है…", लेकिन बड़े पत्रकार अपनी गलती पर माफ़ी कहाँ माँगते हैं भाई… :)


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देश की सर्वोच्च अपराध जाँच संस्था सीबीआई यदि कड़ी मेहनत करके, लगातार 6-8 माह तक किसी के फ़ोन टेप करके पुख्ता सबूत एकत्रित करती है, और जब आगे की पूछताछ के लिये वह प्रधानमंत्री से आदेश माँगती है तो उसे आदेश तो मिलता नहीं, उलटे जाँच करने वाले आईपीएस अधिकारी को उस केस से हटा दिया जाता है… यह किसी फ़िल्म की कहानी नहीं है, हकीकत है… और इस समूचे महाघोटाले में जहाँ एक तरफ़ भलेमानुष(?) प्रधानमंत्री की बेचारगी साफ़ दिखाई देती है, वहीं द पायोनियर और दक्षिण के इक्का-दुक्का अखबारों को छोड़कर इस पूरे घटनाक्रम में राष्ट्रीय मीडिया(?) की अनदेखी और चुप्पी बहुत रहस्यमयी है। यहाँ तक कि पायोनियर और द हिन्दू अखबारों ने सीबीआई अधिकारियों की आपसी “आधिकारिक” चिठ्ठी-पत्री को सार्वजनिक क्यों नहीं किया यह भी आश्चर्य की बात है। (कुछ दस्तावेज, जो अखबारों ने प्रकाशित नहीं किये अर्थात सीबीआई, CBDT जाँच अधिकारियों द्वारा जाँच की प्रगति और रिपोर्ट, पत्राचार आदि… सूत्रों के हवाले से मुझे मिले हैं, जिन्हें इस पोस्ट में आगे पेश किया जायेगा।)

जी हाँ, तो बात हो रही है, दूरसंचार क्षेत्र में 2G स्पेक्ट्रम आबंटन घोटाले, मंत्री ए राजा की भूमिका, उनकी महिला मित्र नीरा राडिया की संदेहास्पद हलचलें तथा सीबीआई की मजबूरी की। गत कुछ माह से द पायोनियर ने इस पूरे घोटाले की परत-दर-परत खोलकर रखी है तथा करुणानिधि, प्रधानमंत्री तथा ए राजा को लगातार परेशान रखा है। पिछले कुछ महीनों से दूरसंचार मंत्री ए राजा सतत खबरों में बने हुए हैं, हालांकि जितना बने होना चाहिये उतने तो फ़िर भी नहीं बने हैं, क्योंकि जिस प्रकार लालूप्रसाद के चारा घोटाले अथवा बंगारू लक्ष्मण रिश्वत वाले मामले में मीडिया ने आसमान सिर पर उठा लिया था, वैसा कुछ राजा के मामले में अब तक तो दिखाई नहीं दिया है। जबकि राजा के घोटाले को देखकर तो लालूप्रसाद यादव बेहद शर्मिन्दा हो जायेंगे, और उस दिन को लानत भेजेंगे जब उन्होंने दूरसंचार की जगह रेल्वे मंत्रालय चुना होगा। साथ ही शशि थरूर भी उस दिन को कोस रहे होंगे जब उन्होंने खामख्वाह ट्विटर पर ललित मोदी से पंगा लिया और उनकी छुट्टी हो गई।

फ़िर भी शशि थरूर और ए राजा के मामलों में एक बात कॉमन है, वह है एक “औरत” की सक्रिय (बल्कि अति-सक्रिय) भागीदारी। थरूर वाले केस में सुनन्दा पुष्कर थी तो राजा बाबू के साथ “मैं तो छाया बन तेरे संग-संग डोलूं…” की तर्ज पर लन्दन निवासी नीरा राडिया हैं। ठीक लालूप्रसाद वाली शर्मीली मानसिक स्थिति में सुनन्दा पुष्कर भी आ सकती हैं, यदि उन्हें पता चले कि नीरा राडिया ने राजा बाबू के साथ मिलकर जितना माल कमाया है, उतना वह सात पुश्तों में भी नहीं कमा सकतीं और फ़िर भी न तो नीरा राडिया को अब तक कुछ हुआ, न ही राजा बाबू का बाल भी बाँका हुआ, जबकि सुनन्दा के स्वेट शेयर भी गये और थरूर भी मंत्रिमण्डल से बाहर हो गये।


जिन्हें इस महाघोटाले की जानकारी नही है, उन पाठकों के लिये पूरा मामला एक बार फ़िर संक्षेप में बताता हूं –

जैसा कि सभी जानते हैं, टेलीफ़ोन-मोबाइल ऑपरेटरों को क्षेत्र विशेष में अपने मोबाइल चलाने के लिये लाइसेंस लेना पड़ता है और उन्हें एक निश्चित फ़्रीक्वेंसी अलॉट की जाती है, ताकि वे उस पर मोबाइल सेवा प्रदान कर सकें। मोबाइल की पहली जनरेशन जल्दी ही पुरानी हो गई और 2G तकनीक का ज़माना आया, तब बड़े-बड़े मोबाइल ऑपरेटरों ने अपनी-अपनी पसन्द के इलाके में 2G का स्पेक्ट्रम (फ़्रीक्वेंसी रेंज) हासिल करने के लिये जोर लगाना शुरु किया, ताकि उन्हें अधिक मालदार इलाके मिलें (उदाहरण के तौर पर हर मोबाइल कम्पनी चाहेगी कि वह मुम्बई, गुजरात, दिल्ली, पंजाब जैसे राज्यों में अच्छी फ़्रीक्वेंसी और अधिक इलाका कवर कर ले, जबकि झारखण्ड, बिहार, उत्तर-पूर्व के राज्य, उड़ीसा आदि गरीब राज्यों में कोई कम्पनी नहीं जाना चाहेगी, क्योंकि वहाँ से उसे कम राजस्व मिलेगा)। सौदेबाजी और जोड़तोड़ की इस स्टेज पर धमाकेदार एण्ट्री होती है टेलीकॉम मंत्री राजा बाबू की महिला मित्र, “नीरा राडिया” की।

अब सवाल उठता है कि नीरा राडिया कौन हैं? नीरा राडिया चार-पाँच मैनेजमेण्ट कंसलटेंट (प्रबन्धन सलाहकार) कम्पनियों की मालिक हैं, जो “कंसल्टेंट” (यानी सलाह), “लॉबीइंग” (यानी पक्ष में आवाज़ उठाना), “पीआर” (जनसंपर्क) और “ब्रोकर” (खड़ी भाषा में “दलाली”) जैसे सभी काम करती हैं। इसी सत्ता और पैसे की दलाल नीरा राडिया की जुगलबन्दी, हमारे राजा बाबू से विगत चार साल से भी अधिक समय से चली आ रही है। जब विभिन्न कम्पनियों को स्पेक्ट्रम देने की नौबत आई, तब भारती और टाटा समेत सभी कम्पनियों ने जोर-आजमाइश शुरु की। ज़ाहिर सी बात है कि इस जोर-आजमाइश में जो भी मंत्री जी के सबसे अधिक नज़दीक होगा, जिसकी बात मंत्री जी “दिन-रात” सबसे अधिक सुनते हों, उसी के जरिये कोशिश की जायेगी, इसलिये नीरा राडिया एकदम उपयुक्त और फ़िट व्यक्ति थी। नीरा राडिया ने भी पहले से ही कुछ फ़र्जी कम्पनियाँ खड़ी कर रखी थीं, इसलिये उसने भी मित्तल, टाटा आदि को आसानी से हाथ धरने नहीं दिया और बाले-बाले ही स्पेक्ट्रम की अच्छी और मोटी मलाई अलग से छाँटकर “अपने लोगों” के लिये रख ली।
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विशेष नोट :- कई महत्वपूर्ण और गोपनीय दस्तावेजों का अनुवाद मैं आपको अगले भागों में मुहैया करवाता रहूंगा, क्योंकि जो कुछ अखबारों में प्रकाशित हुआ है वह आधा-अधूरा है और अखबारों की अपनी “आर्थिक मजबूरियों” और राजनीति की वजह से अप्रकाशित हैं, लेकिन खबरें हैं बड़ी सनसनीखेज़, मजेदार और सच्ची, क्योंकि यह CBI के हैं। इस घोटाले की जाँच कर रहे IPS अधिकारी विनीत अग्रवाल का भी तबादला कर दिया गया है। जिन चुनिंदा रिपोर्टों का अनुवाद अगले भागों में दिया जायेगा, वे सीबीआई, CBDT विभागों के अन्दरूनी विभागीय पत्राचार हैं, लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि हमारी सीबीआई और जाँच एजेंसियां चुस्त-दुरुस्त हैं, काम करने की इच्छुक और सक्षम भी हैं, यदि उन्हें राजनैतिक शिकंजे और दबाव से मुक्त कर दिया जाये तो वे भ्रष्ट नेताओं-अधिकारियों-उद्योगपतियों के “बदकार त्रिकोण” को छिन्न-भिन्न कर देंगी। ऐसा भी नहीं है कि मैं कोई धमाका या भण्डाफ़ोड़ कर रहा हूं क्योंकि जिन पत्रों का मैंने उल्लेख किया है, जब वे मेरे जैसे छोटे-मोटे ब्लॉगर के पास पहुँच सकते हैं तो निश्चित ही देश के प्रमुख अखबारों के पास भी होंगे ही, अन्तर सिर्फ़ इतना है कि उन्होंने फ़ोन टेपिंग की बातचीत और सफ़ेदपोशों के सौदे तथा नाम प्रकाशित नहीं किये…

(भाग-2 में हम तारीखवार सिलसिले से देखेंगे कि राजा बाबू और नीरा राडिया ने इस महाघोटाले को किस तरह अंजाम दिया…तथा कौन-कौन से बड़े चौंकाने वाले नाम इसमें शामिल हैं… )

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न कोई टीवी देखेगा, न कोई संगीत सुनेगा… और दाढ़ी-टोपी रखना अनिवार्य है। जी नहीं… ये सारे नियम लीबिया अथवा पाकिस्तान के किसी कबीले के नहीं हैं, बल्कि गुजरात के भरुच जिले के गाँव देतराल में चल रहे एक मुस्लिम राहत शिविर के हैं। जी हाँ, ये बिलकुल सच है और इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाता ने इस शिविर का दौरा भी किया है। हालांकि खबर कुछ पुरानी है, लेकिन सोचा कि आपको बताता चलूं…

गुजरात के दंगों के बाद विभिन्न क्षेत्रों में दंगा पीड़ितों के लिये राहत शिविर चलाये जा रहे हैं। ऐसा ही एक शिविर गुजरात के भरुच जिले में चल रहा है, जिसे लन्दन के एक मुस्लिम व्यवसायी की चैरिटी संस्था ने प्रायोजित किया हुआ है। इस पुनर्वास केन्द्र में सख्ती से शरीयत कानून का पालन करवाया जाता है, और इस सख्ती की वजह से शिविर में से कुछ मुस्लिम युवक भाग खड़े हुए हैं।

भरुच के देतराल में इस शिविर में 46 मकान बनाये गये हैं, जिसमें गुजरात के दंगा पीड़ितों के परिवारों को रखा गया है। इन मकानों के निवासियों को सख्ती से शरीयत के मुताबिक “शैतानी” ताकतों, खासकर टीवी और संगीत, से दूर रखा गया है, जो लोग इस नियम का पालन नहीं करते उन्हें यहाँ से बेदखल कर दिया जाता है। इस पुनर्वास केन्द्र को चला रहे NGO(?) ने इन निवासियों को गाँव की मस्जिद में जाने से भी मना कर रखा है, और इन लोगों के लिये अलग से खास “शरीयत कानून के अनुसार” बनाये गये नमाज स्थल पर ही सिजदा करवाया जाता है। इंडियन एक्सप्रेस के रविवारीय विशेष संवाददाता के हाथ एक नोटिस लगा है, जिसके अनुसार इस कैम्प के निवासियों से अपील (या धमकी?) की गई है… “इस्लामिक शरीयत कानून के मुताबिक यदि इस कैम्प में रह रहे किसी भी व्यक्ति के पास से टीवी अथवा कोई अन्य “शैतानी” वस्तु पाई जायेगी तो उस परिवार को ज़कात, फ़ितर, सदका तथा अन्य इमदाद से वंचित कर दिया जायेगा। पिछले सप्ताह जब उनकी कमेटी के मुख्य ट्रस्टी लन्दन से आये तो कुछ मकानों पर टीवी एंटीना देखकर बेहद नाराज़ हुए थे, और उन्होंने निर्देश दिया है कि 15 दिनों के भीतर सारे टीवी हटा लिये जायें…”। एक निवासी बशीर दाऊद बताते हैं कि, “चूंकि यह सारे मकान एक अन्य ट्रस्टी के भाई द्वारा दान में दी गई ज़मीन पर बने हैं और ज़कात के पैसों से यह ट्रस्ट चलता है, इसलिये सभी को “धार्मिक नियम”(?) पालन करने ही होंगे…”।

सूत्रों के अनुसार, ऐसी सख्ती की वजह से कुछ परिवार यह पुनर्वास केन्द्र छोड़कर पलायन कर चुके हैं, तथा कुछ और भी इसी तैयारी में हैं। इस शिविर में प्रत्येक परिवार को 50,000 रुपये की राहत दी गई है, जिसमें नया मकान बनाना सम्भव नहीं है। जब एक्सप्रेस संवाददाता ने लन्दन स्थित इस संस्था के ऑफ़िस में सम्पर्क करके यह जानना चाहा कि क्या वे लोग लन्दन में भी टीवी नहीं देखते? जवाब मिला – देखते हैं, लेकिन तभी जब बेहद जरूरी हो…। वडोदरा की तबलीगी जमात का कहना है कि वे इस मामले में कुछ नहीं कर सकते। एक अन्य पीड़ित मोहम्मद शाह दीवान ने कहा कि इस शिविर में आकर वे काफ़ी राहत महसूस करते थे, लेकिन इस तरह की बंदिशों से अब मन खट्टा होने लगा है, हमसे कहा जाता है कि यदि हमने उनके नियमों का पालन नहीं किया तो हम काफ़िर कहलायेंगे…। यही कहानी इदरीस शेख की है, दंगों में अपना सब कुछ गंवा चुके वेजलपुर गोधरा के निवासी, पेशे से टेलर शेख कहते हैं, “हमारे ही लोग हमसे जानवरों जैसा बर्ताव करते हैं, एक दिन इन लोगों ने मेरे कमरे पर ताला जड़ दिया और मुझसे कहा है कि मैं अपने ग्राहकों को इस शिविर में न घुसने दूं… इनकी बात मानना मेरी मजबूरी है…”।

शिविर छोड़कर पंचमहाल के हलोल में रहने गये इकबाल भाई कहते हैं, “शुरु-शुरु में सब ठीक था, लेकिन फ़िर उन्होंने मेरे पिता और मुझ पर सफ़ेद टोपी लगाने और दाढ़ी बढ़ाने हेतु दबाव बनाना शुरु कर दिया… हम लोग इस प्रकार की “लाइफ़स्टाइल” पसन्द नहीं करते, और रोजाना शिविर के कर्ताधर्ताओं से “ये करो, ये न करो” सुन-सुनकर हमने शिविर छोड़ना ही उचित समझा”।

खबर यहाँ पढ़ें… http://www.indianexpress.com/news/no-tv-no-music-beards-a-must-new-rules-in/541620/


तात्पर्य यह है कि, मैं खुद यह रिपोर्ट पढ़कर हैरान हो गया था…। कुछ माह पहले ही आणन्द जिले के एक गाँव में कई दिनों तक पाकिस्तान का झण्डा फ़हराने की खबर भी सचित्र टीवी पर देखी थी…।

भाईयों… मैंने तो सुना था कि नरेन्द्रभाई मोदी, गुजरात में मुसलमानों पर बहुत ज़ुल्म ढाते हैं, “सेकुलर गैंग” हमें यह बताते नहीं थकती कि मोदी के गुजरात में मुस्लिम असुरक्षित हैं, डरे हुए हैं…। यह दोनों घटनाएं पढ़कर ऐसा लगता तो नहीं… उलटे यह जरूर लगता है कि देशद्रोही NGOs की इस देश में आवाजाही और मनमर्जी बहुत ही हल्के तौर पर ली जा रही है। NGOs क्या करते हैं, किनके बीच में, कैसे काम करते हैं, रिलीफ़ फ़ण्ड और चैरिटी के नाम पर विदेशों से आ रहे अरबों रुपये का कहाँ सदुपयोग-दुरुपयोग हो रहा है, यह जाँचने की हमारे पास कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। जरा सोचिये, जब गुजरात में नरेन्द्र मोदी की नाक के नीचे हफ़्तों तक पाकिस्तानी झण्डे फ़हराये जा रहे हों, तथा लन्दन की कोई संस्था अपने राहत शिविर में दाढ़ी बढ़ाने-टोपी लगाने के फ़रमान सुना रही हो… तो भारत के बाकी हिस्सों में क्या होता होगा, कितना होता होगा और उसका असर कितना भयानक होता होगा…। उधर तीस्ता सीतलवाड आंटी और महेश भट्ट अंकल जाने कैसे-कैसे किस्से दुनिया को सुनाते रहते हैं, हम भले ही भरोसा न करें, सुप्रीम कोर्ट भले ही तीस्ता आंटी को “झूठी” कह दे, लेकिन फ़िर भी लाखों लोग तो उनके झाँसे में आ ही जाते हैं… खासकर “चन्दा” देने वाले विदेशी…। ऐसे ही झाँसेबाज मिशनरी में भी हैं जो कंधमाल की झूठी खबरें गढ़-गढ़कर विदेशों में दिखाते हैं, जिससे चन्दा लेने में आसानी रहे, जबकि ऐसा ही चन्दा हथियाने के लिये सेकुलरों का प्रिय विषय “फ़िलीस्तीन” है…।

तो भाईयों-बहनों, NGOs में से 90% NGO, “दुकानदारी” के अलावा और कुछ नहीं है… बस “अत्याचारों” की मार्केटिंग सही तरीके से करना आना चाहिये… सच्चाई क्या है, यह तो इसी बात से स्पष्ट है कि समूचे देश के मुकाबले, गुजरात में मुसलमानों की आर्थिक खुशहाली में बढ़ोतरी आई है…


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जैसा कि अब धीरे-धीरे सभी जान रहे हैं कि केरल में इस्लामीकरण और एवेंजेलिज़्म की आँच तेज होती जा रही है। दोगले वामपंथी और बीमार धर्मनिरपेक्षतावादी कांग्रेस मुसलमानों के वोट लेने के लिये कुछ भी करने को तैयार हैं, इसी कड़ी में केरल के राज्य उद्योग निगम (KSIDC) ने केरल में “इस्लामिक बैंक” खोलने की योजना बनाई थी।

जिन्हें पता नहीं है, उन्हें बता दूं कि “इस्लामिक बैंकिंग” शरीयत के कानूनों के अनुसार गठित किया गया एक बैंक होता है, जिसके नियमों के अनुसार यह बगैर ब्याज पर काम करने वाली वित्त संस्था होती है, यानी इनके अनुसार इस्लामिक बैंक शून्य ब्याज दर पर लोन देता है और बचत राशि पर भी कोई ब्याज नहीं देता। यहाँ देखें… (http://77e57899.linkbucks.com)

आगे हम देखेंगे कि क्यों यह आईडिया पूर्णतः अव्यावहारिक है, लेकिन संक्षेप में कहा जाये तो “इस्लामिक बैंकिंग” एक पाखण्डी अवधारणा है, तथा इसी अवधारणा को केरल राज्य में लागू करवाने के लिये वामपंथी मरे जा रहे हैं, ताकि नंदीग्राम घटना और ममता की धमक के बाद, पश्चिम बंगाल और केरल में छिटक रहे मुस्लिम वोट बैंक को खुश किया जा सके। परन्तु केरल सरकार की इस “महान धर्मनिरपेक्ष कोशिश” को डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी की याचिका ने धक्का देकर गिरा दिया है और केरल हाईकोर्ट ने फ़िलहाल इस्लामिक बैंकिंग सिस्टम को लागू करने की किसी भी “बेशर्म कोशिश” पर रोक लगा दी है।

http://www.thaindian.com/newsportal/business/court-stays-work-on-proposed-islamic-bank-in-kerala_100299303.html

डॉ स्वामी ने ऐसे-ऐसे तर्क दिये कि केरल सरकार की बोलती बन्द हो गई, और आतंकवादियों को “वैध” तरीके से फ़ण्डिंग उपलब्ध करवाने के लिये दुबई के हवाला ऑपरेटरों की योजना खटाई में पड़ गई। आईये पहले देखते हैं कि डॉ स्वामी ने इस्लामिक बैंकिंग के विरोध में क्या-क्या संवैधानिक तर्क पेश किये –

भारत में खोली जाने वाली इस्लामिक बैंकिंग पद्धति अथवा इस प्रकार की कोई भी अन्य नॉन-बैंकिंग फ़ाइनेंस कार्पोरेशन भारत के निम्न कानूनों और संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करती है –

1) पार्टनरशिप एक्ट (1932) का उल्लंघन, जिसके अनुसार अधिकतम 20 पार्टनर हो सकते हैं, क्योंकि KSIDC ने कहा है कि यह पार्टनरशिप (सहभागिता) उसके और निजी उद्यमियों के बीच होगी (जिनकी संख्या कितनी भी हो सकती है)।

2) भारतीय संविदा कानून (1872) की धारा 30 के अनुसार “शर्तों” का उल्लंघन (जबकि यह भी शरीयत के अनुसार नहीं है)।

3) बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट (1949) के सेक्शन 5(b), (c), 9 और 21 का उल्लंघन, जिसके अनुसार किसी भी लाभ-हानि के सौदे, खरीद-बिक्री अथवा सम्पत्ति के विक्रय पर ब्याज लेने पर प्रतिबन्ध लग जाये।

4) RBI कानून (1934) का उल्लंघन

5) नेगोशियेबल इंस्ट्रूमेण्ट एक्ट (1881) का उल्लंघन

6) को-ऑपरेटिव सोसायटी एक्ट (1961) का उल्लंघन


इसके अलावा, शरीयत के मुताबिक इस्लामिक बैंकिंग पद्धति में सिनेमा, होटल, अन्य मनोरंजन उद्योग, शराब, तम्बाकू आदि के व्यापार के लिये भी ॠण नहीं दे सकती, जो कि संविधान की धारा 14 (प्रत्येक नागरिक को बराबरी का अधिकार) का भी उल्लंघन करती है, क्योंकि यदि कोई व्यक्ति अपनी आजीविका के लिये सिनेमा या दारू बार चलाता है, तो उसे कोई भी बैंक ॠण देने से मना नहीं कर सकती। जब केरल सरकार का एक उपक्रम “राज्य उद्योग निगम”, इस प्रकार की शरीयत आधारित बैंकिंग सिस्टम में पार्टनर बनने का इच्छुक है तब यह संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का भी उल्लंघन है। डॉ स्वामी के उपरोक्त तर्कों से यह सिद्ध होता है कि इस्लामिक बैंकिंग टाइप का “सिस्टम” पूरी तरह से भारत के संविधान और कानूनों के विरुद्ध है, और इस्लामिक बैंक खोलने के लिये इनमें बदलाव करना पड़ेगा। दिक्कत यह है कि केरल सरकार और वहाँ की विधानसभा इस प्रकार कानूनों में बदलाव नहीं कर सकती, क्योंकि वित्त, वाणिज्य और संस्थागत फ़ाइनेंस के किसी भी कानून अथवा संवैधानिक प्रावधानों में बदलाव सिर्फ़ संसद ही कर सकती है, और “सेकुलरिज़्म” के पुरोधाओं द्वारा इसके प्रयास भी शुरु हो चुके हैं, इस्लामिक बैंकिंग के पक्ष में सेमिनार आयोजित हो रहे हैं, RBI और SEBI में लॉबिंग शुरु हो चुकी है, राज्यसभा में इस पर बाकायदा बहस भी हो चुकी है…

यहाँ देखें… http://4a038969.linkbucks.com

अब देखते हैं कि “इस्लामिक बैंकिंग पद्धति” अव्यावहारिक और पाखण्डी क्यों है? कहा जाता है कि इस्लामिक बैंक कोई ब्याज न तो लेते हैं न ही देते हैं। फ़िर सवाल उठता है कि आखिर ये बैंक जीवित कैसे रहते हैं? दरअसल ये बैंक “पिछले दरवाजे” से ब्याज लेते हैं, अर्थात कान तो पकड़ते हैं, लेकिन सिर के पीछे से हाथ घुमाकर। मान लीजिये यदि आपको मकान खरीदने के लिये 10 लाख का लोन लेना है तो साधारण बैंक आपसे गारण्टी मनी लेकर ब्याज जोड़कर आपको 10 लाख का ॠण दे देगी, जबकि इस्लामिक बैंक वह मकान खुद खरीदेगी और आपको 15 लाख में बेच देगी और फ़िर 10-15 वर्षों की “बगैर ब्याज” की किस्तें बनाकर आपको दे देगी। इस तरह से वह बैंक पहले ही सम्पत्ति पर अपना लाभ कमा चुकी होगी और आप सोचेंगे कि आपको बगैर ब्याज का लोन मिल रहा है।

इस्लामिक विद्वान इस प्रकार की बैंकिंग की पुरज़ोर वकालत करते हैं, लेकिन निम्न सवालों के कोई संतोषजनक जवाब इनके पास नहीं हैं –

1) यदि बचत खातों पर ब्याज नहीं मिलेगा, तो वरिष्ट नागरिक जो अपना बुढ़ापा जीवन भर की पूंजी के ब्याज पर ही काटते हैं, उनका क्या होगा?

2) जब ब्याज नहीं लेते हैं तो बैंक के तमाम खर्चे, स्टाफ़ की पगार आदि कैसे निकाली जाती है?

3) “हलाल” कम्पनियों में इन्वेस्टमेंट करने और “हराम” कम्पनियों में इन्वेस्टमेंट करने सम्बन्धी निर्णय बैंक का “शरीयत सलाहकार बोर्ड” करेगा, तो यह सेकुलरिज़्म की कसौटी पर खरा कैसे हो गया?

4) दुबई के पेट्रोडालर वाले धन्ना सेठ इस्लामिक बैंकिंग का प्रयोग सोमालिया, अफ़गानिस्तान और चेचन्या में क्यों नहीं करते? जहाँ एक तरफ़ सोमालिया में इस्लामिक लुटेरे जहाजों को लूटते फ़िर रहे हैं और अफ़गानिस्तान में तालिबान की मेहरबानी से लड़कियों के स्कूल बरबाद हो चुके हैं और बच्चों को रोटी नसीब नहीं हो रही, वहाँ इस्लामिक बैंक क्यों नहीं खोलते?

5) पाकिस्तान जैसा भिखमंगा देश, जो हमेशा खुद की कनपटी पर पिस्तौल रखकर अमेरिका से डालर की भीख मांगता रहता है, वहाँ इस्लामिक बैंकिंग लागू करके खुशहाली क्यों नहीं लाते?

http://www.emeraldinsight.com/Insight/viewContentItem.do?contentId=1571781&contentType=Article

6) क्या यह सच नहीं है कि हाल ही में दुबई में आये “आर्थिक भूकम्प” के पीछे मुख्य कारण इस्लामिक बैंकिंग संस्थाओं का फ़ेल हो जाना था?

7) पहले से ही देश में दो कानून चल रहे हैं, क्या अब बैंकिंग और फ़ाइनेंस भी अलग-अलग होंगे? सरकार के इस कदम को, देश में (खासकर केरल में) इस्लामिक अलगाववाद के “टेस्टिंग चरण” (बीज) के रूप में क्यों न देखा जाये? यानी आगे चलकर इस्लामिक इंश्योरेंस, इस्लामिक रेल्वे, इस्लामिक एयरलाइंस भी आ सकती है?

अन्त में एक सबसे प्रमुख सवाल यह है कि, जब प्रमुख इस्लामिक देशों को अल्लाह ने पेट्रोल की नेमत बख्शी है और ज़मीन से तेल निकालने की लागत प्रति बैरल 10 डालर ही आती है, तब “अल्लाह के बन्दे” उसे 80 डालर प्रति बैरल (बीच में तो यह भाव 200 डालर तक पहुँच गया था) के मनमाने भाव पर क्यों बेचते हैं? क्या यह “अनैतिक मुनाफ़ाखोरी” नहीं है? इतना भारी मुनाफ़ा कमाते समय इस्लाम, हदीस, कुरान आदि की सलाहियतें और शरीयत कानून वगैरह कहाँ चला जाता है? और 10 डालर का तेल 80 डालर में बेचने पर सबसे अधिक प्रभावित कौन हो रहा है, पेट्रोल आयात करने वाले गरीब और विकासशील देश ही ना…? तब यह “हलाल” की कमाई कैसे हुई, यह तो साफ़-साफ़ “हराम” की कमाई है। ऐसे में विश्व भर में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जमाने भर को इस्लामिक बैंकिंग की बिना ब्याज वाली थ्योरी की पट्टी पढ़ाने वाले अरब देश क्यों नहीं 10 डालर की लागत वाला पेट्रोल 15 डालर में सभी को बेच देते, जिससे समूचे विश्व में अमन-शान्ति-भाईचारा बढ़े और गरीबी मिटे, भारत जैसे देश को पेट्रोल आयात में राहत मिले ताकि स्कूलों और अस्पतालों के लिये अधिक पैसा आबंटित किया जा सके? यदि वे ऐसा करते हैं तभी उन्हें “इस्लामिक बैंकिंग” के बारे में कुछ कहने का “नैतिक हक” बनता है, वरना तो यह कोरी लफ़्फ़ाजी ही है।

वर्तमान में देश में तीन वित्त विशेषज्ञ प्रमुख पदों पर हैं, मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी और चिदम्बरम, फ़िर क्यों ये लोग इस प्रकार की अव्यावहारिक अवधारणा का विरोध नहीं कर रहे? क्या इन्हें दिखाई नहीं दे रहा कि इस्लामिक बैंकिंग का चुग्गा डालकर धर्मान्तरण के लिये गरीबों को फ़ँसाया जा सकता है? क्या यह नहीं दिखता कि अल-कायदा, तालिबान और अन्य आतंकवादी नेटवर्कों तथा स्लीपर सेल्स के लिये आधिकारिक रुप से पैसा भारत भेजा जा सकता है? बार-बार कई मुद्दों पर विभिन्न हाईकोर्टों और सुप्रीम कोर्ट में “लताड़” खाने के बावजूद क्यों कांग्रेसी और वामपंथी अपनी हरकतों से बाज नहीं आते?

सभी को, सब कुछ पता है लेकिन मुस्लिम वोट बैंक की पट्टी, आँखों पर ऐसी बँधी है कि उसके आगे “देशहित” चूल्हे में चला जाता है। भाजपा भी “पोलिटिकली करेक्ट” होने की दयनीय दशा को प्राप्त हो रही है, वरना क्या कारण है कि जो काम अरुण जेटली और रविशंकर प्रसाद को करना चाहिये था उसे डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी को करना पड़ रहा है? जब रुपये-पैसों से मालामाल लेकिन “मानसिक रूप से दो कौड़ी की औकात” रखने वाले विभिन्न NGOs घटिया से घटिया मुद्दों पर जनहित याचिकाओं और मुकदमों की बाढ़ ला देते हैं तो भाजपा के कानूनी सेल को जंग क्यों लगा हुआ है, क्यों नहीं भाजपा भी देशहित से सम्बन्धित मुद्दों को लगातार उठाकर सम्बन्धित पक्षों को न्यायालयों में घसीटती? MF हुसैन नामक “कनखजूरे” को न्यायालयों में मुकदमे लगा-लगाकर ही तो देश से भगाया था, फ़िर भाजपा राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों पर इतना शर्माती क्यों है? डॉ स्वामी से प्रेरणा लेकर ऐसे मामलों में मुकदमे क्यों नहीं ठोकती? अकेले डॉ स्वामी ने ही, कांची कामकोटि शंकराचार्य के अपमान और रामसेतु को तोड़ने के मुद्दे पर विभिन्न न्यायालयों में सरकार की नाक में दम कर रखा है, फ़िर भी भाजपा को अक्ल नहीं आ रही। भाजपा क्यों नहीं समझ रही कि, चाहे वह मुसलमानों के साथ “हमबिस्तर” हो ले, फ़िर भी उसे मुस्लिमों के वोट नहीं मिलने वाले…

बहरहाल, डॉ स्वामी की बदौलत, इस्लामिक बैंकिंग की इस बकवास पर कोर्ट की अस्थायी ही सही फ़िलहाल रोक तो लगी है… यदि केन्द्र सरकार संसद में कानून ही बदलवा दे तो कुछ कहा नहीं जा सकता, क्योंकि “भले आदमी”(?) और “विश्व के सबसे अधिक पढ़े-लिखे प्रधानमंत्री” पहले ही कह चुके हैं… “देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है…” क्योंकि हिन्दू तो…

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