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desiCNN - Items filtered by date: नवम्बर 2010
पहले कृपया यह वीडियो क्लिप देखिये, फ़िल्म का नाम है “चाइना गेट”, राजकुमार संतोषी की फ़िल्म है जिसमें विलेन अर्थात डाकू जगीरा के साथ एक गाँव वाले की लड़ाई का दृश्य है… जिसमें उस ग्रामीण को धोखे से मारने के बाद जागीरा कहता है… “मुझसे लड़ने की हिम्मत तो जुटा लोगे, लेकिन कमीनापन कहाँ से लाओगे…”… फ़िर वह आगे कहता है… “मुझे कुत्ता भाया तो मैं कुत्ता काट के खाया, लोमड़ी का दूध पीकर बड़ा हुआ है ये जगीरा…”… असल में डाकू जागीरा द्वारा यह संदेश भाजपा नेताओं और विपक्ष को दिया गया है, विश्वास न आता हो तो आगे पढ़िये -



डायरेक्ट लिंक - http://www.youtube.com/watch?v=KRyH0eexMpE

भाजपा से पूरी तरह निराश हो चुके लोगों से अक्सर आपने सुना-पढ़ा होगा कि भाजपा अब पूरी तरह कांग्रेस बन चुकी है और दोनों पार्टियों में कोई अन्तर नहीं रह गया है, मैं इस राय से "आंशिक" सहमत हूं, पूरी तरह नहीं हूं… जैसा कि ऊपर "भाई" डाकू जगीरा कह गये हैं, अभी भाजपा को कांग्रेस की बराबरी करने या उससे लड़ने के लिये, जिस "विशिष्ट कमीनेपन" की आवश्यकता होगी, वह उनमें नदारद है। 60 साल में कांग्रेस शासित राज्यों में कम से कम 200 दंगों में हजारों मुसलमान मारे गये और अकेले दिल्ली में 3000 से अधिक सिखों को मारने वाली कांग्रेस बड़ी सफ़ाई से "धर्मनिरपेक्ष" बनी हुई है, जबकि गुजरात में "न-मो नमः" के शासनकाल में सिर्फ़ एक बड़ा दंगा हुआ, लेकिन मोदी "साम्प्रदायिक" हैं, अरे भाजपाईयों, तुम क्या जानो ये कैसी ट्रिक है। अब देखो ना, गुजरात में तुमने "परजानिया" फ़िल्म को बैन कर दिया तो तुम लोग साम्प्रदायिक हो गये, लेकिन कांग्रेस ने "दा विंसी कोड", "मी नाथूराम गोडसे बोलतोय" और "जो बोले सो निहाल" को बैन कर दिया, फ़िर भी वे धर्मनिरपेक्ष बने हुए हैं…, "सोहराबुद्दीन" के एनकाउंटर पर कपड़े फ़ाड़-फ़ाड़कर आसमान सिर पर उठा लिया लेकिन महाराष्ट्र में "ख्वाज़ा यूनुस" के एनकाउंटर को "पुलिस की गलती" बताकर पल्ला झाड़ लिया…। महाराष्ट्र में तो "मकोका" कानून लागू करवा दिया, लेकिन गुजरात में "गुजकोका" कानून को मंजूरी नहीं होने दी… है ना स्टाइलिश कमीनापन!!!

इनके "पुरखों" ने कश्मीर को देश की छाती पर नासूर बनाकर रख दिया, देश में लोकतन्त्र को कुचलने के लिये "आपातकाल" लगा दिया, लेकिन फ़िर भी तुम लोग "फ़ासिस्ट" कहलाते हो, कांग्रेस नहीं… बोलो, बराबरी कर सकते हो कांग्रेस की? नहीं कर सकते… अब देखो ना, कारगिल की लड़ाई को "भाजपा सरकार की असफ़लता" बताते हैं और एक "चेन स्मोकर" द्वारा पंचशील-पंचशील का भजन गाते-गाते जब चीन ने धुलाई कर डाली, तो कहते हैं "यह तो धोखेबाजी थी, सरकार की असफ़लता नहीं"…। चलो छोड़ो, अन्तर्राष्ट्रीय नहीं, देश की ही बात कर लो, संसद पर हमला हुआ तो भाजपा की असफ़लता, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बावजूद अफ़ज़ल को फ़ाँसी नहीं दी तो इसे "मानवता" बता दिया…। एक बात बताओ भाजपाईयों, तुम्हारे बंगारू और जूदेव कहाँ हैं किसी को पता नहीं, लेकिन उधर देखो… 26/11 हमले का निकम्मा विलासराव देशमुख केन्द्र में मंत्री पद की मलाई खा रहा है, CWG में देश की इज्जत लुटवाने वाला कलमाडी चीन में एशियाई खेलों में ऐश कर रहा है, जल्दी ही अशोक चव्हाण की गोटी भी कहीं फ़िट हो ही जायेगी… तुम लोग क्या खाकर कांग्रेस से लड़ोगे? ज्यादा पुरानी बात नहीं करें तो हाल ही में अरुंधती ने भारत माता का अपमान कर दिया, कोई कांग्रेसी सड़क पर नहीं निकला… पर जब सुदर्शन ने सोनिया माता के खिलाफ़ बोल दिया तो सब सड़क पर आ गये, बोलो "भारत माता" बड़ी कि "सोनिया माता"?  

हजारों मौतों के जिम्मेदार वॉरेन एण्डरसन को देश से भगा दिया, कोई जवाब नहीं… देश के पहले सबसे चर्चित बोफ़ोर्स घोटाले के आरोपी क्वात्रोची को छुड़वा दिया, फ़िर भी माथे पर कोई शिकन नहीं…। अब देखो ना, जब करोड़ों-अरबों-खरबों के घोटाले सामने आये, जमकर लानत-मलामत हुई तब कहीं जाकर कलमाडी-चव्हाण-राजा के इस्तीफ़े लिये, और तुरन्त बाद बैलेंस बनाने के लिये येदियुरप्पा के इस्तीफ़े की मांग रख दी… अरे छोड़ो, भाजपा वालों, तुम क्या बराबरी करोगे कमीनेपन की…। क्या तुम लोगों ने कभी केन्द्र सरकार में सत्ता होते हुए "अपने" राज्यपाल द्वारा कांग्रेस की राज्य सरकारों के "कान में उंगली" की है? नहीं की ना? जरा कांग्रेस से सीखो, देखो रोमेश भण्डारी, बूटा सिंह, सिब्ते रजी, हंसराज भारद्वाज जैसे राज्यपाल कैसे विपक्षी राज्य सरकारों की "कान में उंगली" करते हैं, अरे भाजपाईयों, तुम क्या जानो कांग्रेसी किस मिट्टी के बने हैं।

एक चुनाव आयुक्त को रिटायर होते ही "ईनाम" में मंत्री बनवा दिया, फ़िर दूसरे चमचे को चुनाव आयुक्त बनवा लिया, वोटिंग मशीनों में हेराफ़ेरी की, जागरुक नागरिक ने आवाज़ उठाई तो उसे ही अन्दर कर दिया… भ्रष्टाचार की इतनी आदत पड़ गई है कि एक भ्रष्ट अफ़सर को ही केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त बना दिया… कई-कई "माननीय" जजों को "ईनाम" के तौर पर रिटायर होते ही किसी आयोग का अध्यक्ष वगैरह बनवा दिया…।  भाजपा वालों तुम्हारी औकात नहीं है इतना कमीनापन करने की, कांग्रेस की तुम क्या बराबरी करोगे।

डाकू जगीरा सही कहता है, "लड़ने की हिम्मत तो जुटा लोगे, लेकिन कमीनापन कहाँ से लाओगे…?" गाय का दूध पीने वालों, तुम लोमड़ी का दूध पीने वालों से मुकाबला कैसे करोगे? अभी तो तुम्हें कांग्रेस से बहुत कुछ सीखना है…


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जैसा कि सभी जानते हैं वामपंथी भले ही सिद्धान्तों की कितनी भी दुहाई दे लें, कितनी ही शाब्दिक लफ़्फ़ाजियाँ हाँक लें परन्तु उनका "असली रंग" गाहे-बगाहे सामने आता ही रहता है, और वह असली रंग है वोटों की खातिर मुस्लिमों के सामने आये दिन नतमस्तक होने का…। वैसे तो देश के सौभाग्य से अब यह कौम सिर्फ़ दो ही राज्यों (केरल और पश्चिम बंगाल) में ही जीवित है, तथा अपने कैडर की गुण्डागर्दी और कांग्रेस द्वारा मुस्लिम वोटों के शिकार के बाद जो जूठन बच जाती है उस पर ये अपना गुज़र-बसर करते हैं। पश्चिम बंगाल और केरल के आगामी चुनावों को देखते हुए इन दोनों "सेकुलर चैम्पियनों" के बीच मुस्लिम वोटों को लेकर घमासान और भी तीखा होगा। पश्चिम बंगाल में देगंगा के दंगों में (यहाँ देखें…) हम यह देख चुके हैं… हाल ही में केरल से दो खबरें आई हैं जिसमें वामपंथियों का "सेकुलर नकाब" पूरी तरह फ़टा हुआ दिखता है…


1) मुस्लिम बच्चों को मुफ़्त कोचिंग क्लास सुविधा, स्कॉलरशिप एवं मुफ़्त होस्टल की सुविधा, मौलवियों को पेंशन तथा पाकिस्तान को पाँच करोड़ का दान देने जैसे "सत्कर्म" करने के बाद केरल की वामपंथी सरकार ने हाल ही में एक सर्कुलर जारी करके सभी राशन दुकानों को आदेश दिया है कि राज्य के सभी गरीब मदरसा शिक्षकों को दो रुपये किलो चावल दिया जाये। जैसा कि सभी जानते हैं केरल के कई इलाके लगभग 70% मुस्लिम जनसंख्या वाले हो चुके हैं और कई सीटों पर स्वाभाविक रुप से "जेहादी" निर्णायक भूमिका में हैं, हाल ही में ईसाई प्रोफ़ेसर का हाथ काटने वाली गैंग में शामिल एक अपराधी, जेल से पंचायत चुनाव जीत चुका है तथा कई नगर निगमों अथवा जिला पंचायतों में मुस्लिम लीग व PFI (पापुलर फ़्रण्ट ऑफ़ इंडिया) के उम्मीदवार निर्णायक स्थिति में आ गये हैं… तो अब हमें मान लेना चाहिये कि वामपंथियों ने प्रोफ़ेसर का हाथ काटने के "उपलक्ष्य" (यहाँ देखें...) में इनाम के बतौर मदरसा शिक्षकों को दो रुपये किलो चावल का तोहफ़ा दिया होगा।

उल्लेखनीय है कि केरल में "देवस्वम बोर्ड" के गठन में नास्तिक(?) वामपंथियों की घुसपैठ की वजह से मन्दिरों के पुजारियों की आर्थिक स्थिति बहुत खराब चल रही है, जहाँ एक तरफ़ पुजारियों को यजमानों से दक्षिणा लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है, वहीं दूसरी तरफ़ पुजारियों की तनख्वाह मन्दिर के सफ़ाईकर्मियों के बराबर कर दी गई है।

2) दूसरी खबर वामपंथियों की "सेकुलर बेशर्मी" के बारे में है - पिछले कई साल से केरल के वामपंथी राज्य में "इस्लामिक बैंक" स्थापित करने के लिये जी-जान से जुटे हुए हैं, वह तो भला हो डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी का जिनकी याचिकाओं के कारण केरल हाईकोर्ट ने इस्लामिक बैंक पर रोक लगा दी है (यहाँ देखें…), वहीं दूसरी तरफ़ हाल ही में रिज़र्व बैंक ने एक आदेश जारी करके यह कहा कि केरल में किसी भी प्रकार के इस्लामिक बैंक को अनुमति प्रदान करने का सवाल ही नहीं पैदा होता, क्योंकि इस्लामिक बैंक की अवधारणा ही असंवैधानिक है।

इतनी लताड़ खाने के बावजूद, केरल राज्य औद्योगिक विकास निगम द्वारा प्रवर्तित अल-बराका इंटरनेशनल फ़ाइनेंशियल सर्विसेज़ ने बेशर्मी से दावा किया उसे "इस्लामिक बैंक" बनाने की मंजूरी मिल गई है। "अल-बराका" द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि प्रस्तावित बैंक पूर्णतः "शरीयत कानून" पर आधारित होगा। खाड़ी देशों में कार्यरत "कुछ खास गुट" ऐसी इस्लामिक बैंक बनवाने के लिये पूरा जोर लगा रहे हैं ताकि जो पैसा उन्हें हवाला अथवा अन्य गैरकानूनी रास्तों से भेजना पड़ता है, उसे एक "वैधानिकता" हासिल हो जाये। इसी में अपना सुर मिलाते हुए केरल सरकार ने कहा कि "इस्लामिक बैंक" पूरी तरह से सेकुलर है…। वामपंथ के लिये यह एक स्वाभाविक सी बात है कि जहाँ "इस्लामिक" शब्द आयेगा वह तो सेकुलर होगा ही और जहाँ "हिन्दू" शब्द आयेगा वह साम्प्रदायिक… जैसे कि मुस्लिम लीग सेकुलर है, विश्व हिन्दू परिषद साम्प्रदायिक… मजलिस-इत्तेहाद-ए-मुसलमीन सेकुलर है लेकिन शिवसेना साम्प्रदायिक… इत्यादि।

(चित्र में - वरिष्ठ वामपंथी नेता विजयन, कोयंबटूर बम विस्फ़ोट के आरोपी अब्दुल नासेर मदनी के साथ मंच शेयर करते हुए)

पहले भी एक बार वामपंथियों के पूज्य बुज़ुर्ग नम्बूदिरीपाद ने अब्दुल नासेर मदनी की तुलना महात्मा गाँधी से कर डाली थी, जो बाद में कड़े विरोध के कारण पलटी मार गये। तात्पर्य यह कि वामपंथियों के नारे "धर्म एक अफ़ीम है" का मतलब सिर्फ़ "हिन्दू धर्म" से होता है (यहाँ देखें…), मुस्लिम वोटों को खुश करने के लिये ये लोग "किसी भी हद तक" जा सकते हैं। शुक्र है कि ये सिर्फ़ दो ही राज्यों में बचे हैं, असली दिक्कत तो कांग्रेस है जिससे इन्होंने यह शर्मनिरपेक्ष सबक सीखा है।

चलते-चलते एक अन्य खबर महाराष्ट्र से - जवाहरलाल नेहरु अन्तर्राष्ट्रीय बन्दरगाह (ज़ाहिर है कि अन्तर्राष्ट्रीय है तो इसका नाम नेहरु या गाँधी पर ही होगा…) पर कुवैत के एक जहाज को सुरक्षा एजेंसियों ने जाँच के लिये रोका है। तफ़्तीश से यह साबित हुआ है कि जहाज के कर्मचारी बन्दरगाह पर इस्लाम के प्रचार सम्बन्धी पुस्तकें बाँट रहे थे। 12 पेज वाली इस पुस्तक का मुखपृष्ट "निमंत्रण पत्र" जैसा है जहाँ लिखा है "उन्हें एक बेहतर धर्म "इस्लाम" की तरफ़ बुलाओ, जो हिन्दू धर्म अपनाये हुए हैं…"। CGM एवरेस्ट नामक जहाज के कैप्टन हैं सैयद हैदर, जो कि कराची का निवासी है। 12 पेज की यह बुकलेट कुवैत के इस्लामिक दावा एण्ड गाइडेंस सेण्टर द्वारा प्रकाशित की गई है, तथा जहाज के सभी 33 कर्मचारियों के पास मुफ़्त में बाँटने के लिये बहुतायत में उपलब्ध पाई गई।

हालांकि पहले सुरक्षा एजेंसियों की निगाह से यह छूट गया था, लेकिन बन्दरगाह के ही एक भारतीय कर्मचारी द्वारा पुलिस को यह पुस्तिका दिखाने से उनका माथा ठनका और जहाज को वापस बुलाकर उसे विस्तृत जाँच के लिये रोका गया। जहाज महाराष्ट्र के कोंकण इलाके की तरफ़ बढ़ रहा था, यह वही इलाका है जहाँ दाऊद इब्राहीम का पैतृक गाँव भी है एवं मुम्बई में ट्रेन विस्फ़ोट के लिये इन्हीं सुनसान समुद्र तटों पर RDX उतारा गया था। जहाज के कैप्टन की सफ़ाई है कि वे भारतीय तट पर नहीं उतरे थे, बल्कि जो लोग जहाज में बाहर से (यानी भारत की ज़मीन से) आये थे उन्हें बाँट रहे थे। अधिकारियों ने जाँच में पाया कि अन्तर्राष्ट्रीय जल सीमा में "धार्मिक प्रचार" का यह पहला मामला पकड़ में आया है, तथा यह बुकलेट मजदूरों और कुलियों को निशाना बनाकर बाँटी जा रही थी तथा पूरी तरह हिन्दी में लिखी हुई हैं…

तात्पर्य यह कि हिन्दुओं पर "वैचारिक हमले" चौतरफ़ा हो रहे हैं, और हमलावरों का साथ देने के लिये कांग्रेस-वामपंथ जैसे जयचन्द भी इफ़रात में मौजूद हैं…

मीडिया द्वारा अपनी "सेकुलर इमेज" बनाये रखने के तरह ऐसी खबरों को जानबूझकर दबा दिया जाता है ताकि "कुम्भकर्णी हिन्दू" कभी असलियत न जान सकें, रही बात कई राज्यों में सत्ता की मलाई चख रहे भाजपाईयों की, तो उनमें से किसी में भी डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसी लगन और हिम्मत तो है ही नहीं… (उल्लेखनीय है कि डॉ स्वामी ने अकेले दम पर याचिकाएं और आपत्तियाँ लगा-लगा कर इस्लामिक बैंक की स्थापना में अड़ंगे लगाये, रामसेतु टूटने से बचाया, इटली की रानी के नाक में दम तो कब से किये ही हैं, अब राजा बाबू के बहाने “ईमानदार बाबू” पर भी निशाना साधा हुआ है…), शायद “थकेले” केन्द्रीय भाजपा नेताओं को डॉ स्वामी से कोई प्रेरणा मिले…

Source : http://www.financialexpress.com/news/ship-docked-in-mumbai-invites-hindus-to-convert-to-islam/710021/


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(भाग-1 से जारी…)

सुदर्शन प्रकरण ने फ़िर से इस बात को रेखांकित किया है कि या तो संघ का अपना खुद का टीवी चैनल और विभिन्न राज्यों में 8-10 अखबार होने चाहिये, या फ़िर वर्तमान उपलब्ध मीडियाई भेड़ियों को वक्त-वक्त पर "समयानुसार कभी हड्डी के टुकड़े और कभी लातों का प्रसाद" देते रहना चाहिये। संघ से जुड़े लोगों ने गत दिनों सुदर्शन मसले के मीडिया कवरेज को देखा ही होगा, एक भी चैनल या अखबार ने सोनिया के खिलाफ़ एक शब्द भी नहीं कहा, किसी अखबार ने सोनिया से सम्बन्धित किसी भी पुराने मामले को नहीं खोदा… जिस तरह मुकेश अम्बानी के खिलाफ़ कुछ भी नकारात्मक प्रकाशित/प्रसारित नहीं किया जाता, उसी प्रकार सोनिया-राहुल के खिलाफ़ भी नहीं, ऐसा लगता है कि आसमान से उतरे देवदूत टाइप के लोग हैं ये... लेकिन ऐसा है नहीं, दरअसल इन्होंने मीडिया और सांसदों (अब विपक्ष भी) को ऐसा साध रखा है कि बाकी सभी के बारे में कुछ भी कहा (बल्कि बका भी) जा सकता है लेकिन "पवित्र परिवार" के विरुद्ध नहीं। जब जयललिता और दयानिधि मारन जैसों के अपने मालिकाना टीवी चैनल हो सकते हैं, तो संघ या भाजपा के हिन्दुत्व का झण्डा बुलन्द करने वाला कोई चैनल क्यों नहीं बनाया जा सकता? भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने कभी सोचा है इस बारे में?



मीडिया के अन्तर्सम्बन्धों और उसके हिन्दुत्व विरोधी मानसिकता के सम्बन्ध में एक पोस्ट लिखी थी "मीडिया हिन्दुत्व विरोधी क्यों है… इन रिश्तों से जानिये",  इसी बात को आगे बढाते हुए एक अपुष्ट सूचना है (जिसकी पुष्टि मैं अपने पत्रकार मित्रों से चाहूंगा) - केरल की लोकप्रिय पत्रिका मलयाला मनोरमा के निदेशक थॉमस जैकब के पुत्र हैं अनूप जैकब, जिनकी पत्नी हैं मारिया सोहेल अब्बास। मारिया सोहेल अब्बास एक पाकिस्तानी नागरिक सोहेल अब्बास की पुत्री हैं, अब पूछिये कि सोहेल अब्बास कौन हैं? जी हाँ पाकिस्तानी खुफ़िया एजेंसी ISI के डिप्टी कमिश्नर, इनके परम मित्र हैं मिस्टर सलाहुद्दीन जो कि हाफ़िज़ सईद के आर्थिक मैनेजर हैं, तथा मारिया सोहेल अब्बास हाफ़िज़ सईद के दफ़्तर में काम कर चुकी हैं…। यदि यह सूचनाएं वाकई सच हैं तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि स्थिति कितनी गम्भीर है और हमारा मीडिया किस "द्रोहकाल" से गुज़र रहा है।

भाजपा नेताओं को यह भी सोचना चाहिये कि पिछले 10 साल में सोनिया ने इक्का-दुक्का "चहेते" पत्रकारों को मुश्किल से 2-3 इंटरव्यू दिये होंगे (स्वाभाविक है कि इसका कारण उनके बहुत "सीमित ज्ञान की कलई खुलने का खतरा" है), (राहुल बाबा का ज्ञान कितना है यह नीचे दिये गये वीडियो में देख सकते हैं…) राहुल बाबा भी प्रेस कांफ़्रेंस में उतना ही बोलते हैं जितना पढ़ाया जाता है (यानी इन दोनों की निगाह में मीडिया की औकात दो कौड़ी की भी नहीं है) फ़िर भी मीडिया इनके पक्ष में कसीदे क्यों काढ़ता रहता है… सोचा है कभी? लेकिन भाजपाईयों को आपस में लड़ने से फ़ुरसत मिले तब ना… और "हिन्दू" तो खैर कुम्भकर्ण हैं ही… उन्हें तो यह पता ही नहीं है कि इस्लामिक जेहादी और चर्च कैसे इनके पिछवाड़े में डण्डा कर रहे हैं, कहाँ तो एक समय पेशवा के सेनापतियों ने अफ़गानिस्तान के अटक तक अपना ध्वज लहराया था और अब हालत ये हो गई है कि कश्मीर, असम, उत्तर-पूर्व में नागालैण्ड, मिजोरम में आये दिन हिन्दू पिटते रहते हैं… केरल और पश्चिम बंगाल भी उसी राह पर हैं… लेकिन जब हिन्दुओं को घटनाएं और तथ्य देकर जगाने का प्रयास करो तो ये जागने से न सिर्फ़ इंकार कर देते हैं, बल्कि "सेकुलरिज़्म" का खोखला नारा लगाकर अपने हिन्दू भाईयों को ही गरियाते रहते हैं। पाखण्ड की इन्तेहा तो यह है कि एक घटिया से न्यूज़ चैनल पर किसी भीड़ द्वारा तोड़फ़ोड़ करना अथवा शिवसेना द्वारा शाहरुख खान का विरोध करना हो तो, सारे सियार एक स्वर में हुँआ-हुँआ करके "फ़ासिस्ट-फ़ासिस्ट-फ़ासिस्ट" का गला फ़ाड़ने लगते हैं, अब वे बतायें कि संघ कार्यालयों पर कांग्रेसियों के हमले फ़ासिस्टवाद नहीं तो और क्या है?



रही-सही कसर गैर-भाजपाई विपक्ष पूरी कर देता है। गैर-भाजपाई विपक्ष यानी प्रमुखतः वामपंथी और क्षेत्रीय दल… इन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि कांग्रेस क्या कर रही है, क्यों एक ही परिवार के आसपास सत्ता घूमती रहती है, महाराष्ट्र का भ्रष्ट मुख्यमंत्री संवैधानिक रुप से अपना इस्तीफ़ा लेकर प्रधानमंत्री के पास न जाते हुए सोनिया के पास क्यों जाता है? करोड़ों (अब तो बहुत छोटा शब्द हो गया है) अरबों के घोटाले हो रहे हैं… लेकिन इस निकम्मे और सीमित जनाधार वाले गैर-भाजपाई विपक्ष का मुख्य काम है किस तरह भाजपा को रोका जाये, किस तरह हिन्दुत्व को गाली दी जाये, किस तरह नरेन्द्र मोदी के प्रति अपने "फ़्रस्ट्रेशन" को सार्वजनिक किया जाये। इस गैर-भाजपाई विपक्ष को एक भोंदू युवराज, प्रधानमंत्री के रुप में स्वीकार है लेकिन भाजपा का कोई व्यक्ति नहीं। इसी से इनकी प्राथमिकताएं पता चल जाती हैं। कलमाडी, चव्हाण और अब राजा, अरबों के घोटाले हुए… लेकिन कभी भी, किसी में भी सोनिया-राहुल का नाम नहीं आया, क्या इतने "भयानक" ईमानदार हैं दोनों? जब सभी प्रमुख फ़ाइलें और निर्णय सोनिया-राहुल की निगाह और स्वीकृति के बिना आगे बढ़ नहीं सकतीं तो कोई मूर्ख ही ऐसा सोच सकता है कि इन घोटालों में से "एक बड़ा हिस्सा" इनके खाते में न गया हो… लेकिन "मदर इंडिया" और "पप्पू" तरफ़ किसी ने उंगली उठाई तो वह देशद्रोही कहलायेगा।

कुछ और बातें हैं जो आये दिन सुनने-पढ़ने में आती हैं, परन्तु उनके बारे में सबूत या पुष्टि करना मुश्किल है, इनमें से कुछ अफ़वाहें भी हैं… लेकिन यह तो भाजपा का काम ही है कि ऐसी खबरों पर अपना खुफ़िया तन्त्र सक्रिय और विकसित करे ताकि कांग्रेस को घेरा जा सके, लेकिन भाजपा वाले ऐसा करते नहीं हैं, पता नहीं क्या बात है?

उदाहरण के तौर पर - जब कांग्रेसियों ने हजारों भारतीयों के हत्यारे वॉरेन एण्डरसन को छोड़ा, उसी के 6 माह बाद राजीव गाँधी की अमेरिका यात्रा के दौरान, आदिल शहरयार नामक व्यक्ति को अमेरिका में छोड़ा गया जो कि वहाँ हथियार तस्करी और फ़्राड के आरोपों में जेल में बन्द था। आदिल शहरयार कौन? जी हाँ… मोहम्मद यूनुस के सपूत। अब यह न पूछियेगा कि मोहम्मद यूनुस कौन हैं… मोहम्मद यूनुस वही एकमात्र शख्स हैं जो संजय गाँधी की अंत्येष्टि में फ़ूट-फ़ूटकर रो रहे थे, क्यों, मुझे तो पता नहीं? भाजपा के नेताओं को तो पता होगा, आज तक उन्होंने कुछ किया इस बारे में? क्या एण्डरसन की रिहाई के बदले में आदिल को छोड़ना एक गुप्त अदला-बदली सौदा था? और राजीव गाँधी को आदिल से क्या विशेष प्रेम था? क्योंकि जिस तरह से एण्डरसन के सामने मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वागत में बिछे जा रहे थे, उससे तो यह खेल दिल्ली की सत्ता द्वारा ही खेला गया प्रतीत होता है।

इसी प्रकार संजय गाँधी एवं माधवराव सिंधिया दोनों की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु भी रहस्य की परतों में दबी हुई है, आये दिन इस सम्बन्ध में अफ़वाहें उड़ती रहती हैं कि सिंधिया के साथ उस फ़्लाइट में, मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित भी जाने वाले थे, लेकिन अन्तिम क्षणों में अचानक दोनों किसी काम के कारण साथ नहीं गये। माधवराव सिंधिया की सोनिया से दोस्ती लन्दन से ही थी, जो कि राजीव की शादी के बाद भी कायम रही… लेकिन राजेश पायलट के साथ-साथ कुमारमंगलम, राजशेखर रेड्डी और जीएमसी बालयोगी… सभी युवा, ऊर्जावान और कांग्रेस में "उच्च पद के दावेदार" नेताओं की दुर्घटना में मौत हुई… कैसा गजब का संयोग है, भले ही यह अफ़वाहें ही हों, लेकिन कभी भाजपाईयों ने इस दिशा में कुछ खोजबीन करने की कोशिश की? या कभी इस ओर उंगली उठाई भाजपाईयों ने?

एक बात और है जो कि अफ़वाह नहीं है, बल्कि दस्तावेजों में है, कि जिस वक्त सोनिया गाँधी (1974 में) इटली की नागरिक थीं, वह भारत की सरकारी कम्पनी ओरियंटल इंश्योरेंस की बीमा एजेण्ट भी थीं और प्रधानमंत्री कार्यालय में काम कर रहे अधिकारियों के बीमे दबाव देकर करवाती थीं, साथ ही वह इन्दिरा गाँधी के सरकारी आवास को अपने कार्यालय के पते के तौर पर दर्शाती थी, यह साफ़-साफ़ "फ़ेरा कानून" के उल्लंघन का मामला है (यानी एक तो विदेशी नागरिक, फ़िर भी भारतीय सरकारी कम्पनी में कार्यरत और ऊपर से प्रधानमंत्री निवास को अपना कार्यालय बताना… है किसी में इतना दम?) भाजपा वालों ने कभी इस मुद्दे को क्यों अखबारों में नहीं उठाया?

तात्पर्य यह है कि कांग्रेसी तो अपना "काम"(?) बखूबी कर रहे हैं, टीवी पर सिखों का हत्यारा जगदीश टाइटलर संघ को गरिया रहा था… हज़ारों मौतों से सने एंडरसन को देश से बाहर भगाने वाले लोग सुदर्शन के पुतले जला रहे थे… अरुंधती के देशद्रोही बयानों पर लेक्चर झाड़ने वाले लोग सुदर्शन को देशद्रोही बता रहे थे (मानो सोनिया ही देश हो)… IPL, गेहूं, कॉमनवेल्थ, आदर्श, 2G स्पेक्ट्रम जैसे महाघोटाले करने वाले भ्रष्ट और नीच लोग, RSS को देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहे थे… तात्पर्य कि अपने "पैगम्बर" (उर्फ़ सोनिया माता) के कथित अपमान के मामले में कांग्रेसी अपना "असली चमचा रंग" दिखा रहे थे, परन्तु सबसे बड़ा सवाल यही है कि भाजपा के बड़े नेता क्या कर रहे थे? इतने राज्यों में सरकारें, लाखों कार्यकर्ताओं के होते हुए भी तत्काल "माफ़ी की मुद्रा" में क्यों आ गये? कहाँ गई वो रामजन्मभूमि आंदोलन वाली धार? क्या सत्ता की मलाई ने भाजपा नेताओं को भोथरा कर दिया है? लगता तो ऐसा ही है…

गोविन्दाचार्य जैसे वरिष्ठ सहित कई लोगों ने सुदर्शन जी को गलत ठहराया है, मेरे पिछले लेख में भी काफ़ी असहमतियाँ दर्शाई गईं, नैतिकता और सिद्धान्तों की दुहाईयाँ भी सुनी-पढ़ीं… परन्तु अभी भी मेरा व्यक्तिगत मत यही है कि सुदर्शन जी सही थे। खैर… मेरी औकात न होते हुए भी, अन्त में भाजपा नेताओं को सिर्फ़ एक क्षुद्र सी सलाह देना चाहूंगा कि, कांग्रेस के साथ किसी भी किस्म की रियायत नहीं बरतनी चाहिये, किसी किस्म के मधुर सम्बन्ध नहीं एवं सतत "शठे-शाठ्यम समाचरेत" की नीति का पालन हो…।

जैसा कि ऊपर मीडिया के अन्तर्सम्बन्धों के बारे में लिखा है… सच यही है कि भारत देश संक्रमण काल से गुज़र रहा है, "वोट आधारित सेकुलरिज़्म" की वजह से कई राज्यों में परिस्थितियाँ गम्भीर हो चुकी हैं, कई संदिग्ध कारणों की वजह से मीडिया हिन्दुत्व विरोधी हो चुका है… जबकि देश की 40% से अधिक जनसंख्या युवा हैं जिनमें "सच" जानने की भूख है… अब इन्हें कैसे "हैण्डल" करना है यह सोचना वरिष्ठों का काम है… हम तो सोये हुए हिन्दुओं को अपने लेखों के "अंकुश" से कोंच-कोंचकर जगाने का कार्य जब तक सम्भव होगा करते रहेंगे… बाकी आगे जैसी सबकी मर्जी…। (समाप्त)


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संघ के बुज़ुर्ग श्री सुदर्शन जी ने सोनिया के सम्बन्ध में जो वक्तव्य दिया है, उसके मद्देनज़र कांग्रेसियों द्वारा धरने-प्रदर्शन-आंदोलन-पुतले जलाओ प्रतियोगिता एवं धमकियों का दौर जारी है। कांग्रेसी वही कर रहे हैं जो पैगम्बर का कार्टून बनाने पर मुस्लिमों ने किया, क्योंकि गाँधी परिवार, कांग्रेसियों के लिये पैगम्बर है और उनके बिना कांग्रेस का कोई अस्तित्व ही नहीं है… तात्पर्य यह कि कांग्रेसी तो अपने "आजन्म चमचागिरी" के धर्म का पालन करते हुए अपना काम बखूबी कर रहे हैं…। परन्तु संघ-भाजपा का रवैया अप्रत्याशित है…

भाजपा से तो उम्मीदें उसी दिन से टूटना शुरु हो गई थीं जिस दिन नपुंसकता दिखाते हुए कंधार में इन्होंने दुर्दान्त आतंकवादियों को छोड़ा था, परन्तु अब जिस तरह से सोनिया बयान मामले पर संघ के नेताओं ने एक पूर्व सरसंघचालक और वरिष्ठ नेता से अपना पल्ला झाड़ा है वह घोर आश्चर्य और दुख की बात है। संघ के इस "बैकफ़ुट" से एक आम हिन्दूवादी कार्यकर्ता तथा एक स्वयंसेवक का मन तो आहत हुआ ही है, मेरे जैसे मामूली ब्लॉगर (जो संघ का सदस्य भी नहीं है, और न ही पत्रकार है) का मन भी बेहद खिन्न और आहत है।

सुदर्शन जी ने जो कहा उसमें मामूली (अर्थात केजीबी की एजेण्ट कहने की बजाय CIA कहना) गलती हो सकती है, परन्तु सुदर्शन जी के इस बयान के पीछे की मंशा और भावना को समझना और उनका पूर्ण समर्थन करना, न सिर्फ़ संघ बल्कि भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की भी जिम्मेदारी और कर्तव्य बनता था, परन्तु ऐसा नहीं हुआ। जिस तरह कांग्रेसियों ने अपने "पैगम्बर" के पक्ष में सड़कों पर प्रदर्शन किया, वैसा ही भाजपा-संघ को उतने ही पुरज़ोर तरीके से करना चाहिये था, क्योंकि आखिर सोनिया के बारे में कही गई यह बातें कोई नई बात नहीं है। विभिन्न जगहों पर, विभिन्न लेखकों ने सोनिया के बारे में कई तथ्य दिये हैं जिनसे शक गहराना स्वाभाविक है, परन्तु भाजपा के नेता कांग्रेसियों के पहले हमले में ही इतने डरपोक और समझौतावादी बन जायेंगे ऐसी उम्मीद नहीं थी।

विगत 10-20 वर्ष से जिस तरह डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी लगातार एकाकी रुप से इस "विख्यात"(?) परिवार के खिलाफ़ काम कर रहे हैं, सबूत जुटा रहे हैं वह सराहनीय है… यदि संघ-भाजपा वालों को डॉ स्वामी से कोई निजी खुन्नस है तो इसका मतलब यह नहीं कि उनके द्वारा कही और लिखी गई बातों पर कोई ध्यान ही न दें… सुदर्शन जी को जिस तरह तूफ़ान और मंझधार में अकेला छोड़कर सभी भाजपाई भाग खड़े हुए वह निंदनीय है,  भाजपाईयों को डॉ स्वामी से कुछ तो सीखना ही चाहिये। बहरहाल, सोनिया-राहुल सहित समूचे गाँधी परिवार के बारे में डॉ स्वामी ने जो तथ्य दिये हैं, उन्हें मैं यहाँ संकलित करने की कोशिश कर रहा हूं… शायद संघ-भाजपा के नेता इस पर पुनर्विचार करें और अपने रुख में परिवर्तन करें…


सोनिया गाँधी ने भारत की नागरिकता बाद में ग्रहण की जबकि मतदाता सूची में उनका नाम पहले ही (1980 में ही) आ गया था…ऐसा कैसे हुआ? कभी भाजपा के सांसदों ने इस मुद्दे पर संसद में बात उठाई? (दस्तावेज़ की प्रति डॉ स्वामी की वेबसाईट से…) इसी से सम्बन्धित डॉ स्वामी का वीडियो भी देखिये…



(डायरेक्ट लिंक - http://www.youtube.com/watch?v=SidLY-nSqvA)

सोनिया ने अपने जन्म स्थान के बारे में झूठ बोला, कि उनका जन्म ओरबेस्सानो में हुआ, जबकि बर्थ सर्टिफ़िकेट के अनुसार, जन्म लुसियाना में हुआ, लुसियाना की बात छिपाने का मकसद मुसोलिनी से सोनिया के पिता का सम्बन्ध उजागर होने से बचाना था या कुछ और? (सन्दर्भ - डॉ स्वामी का वीडियो http://www.youtube.com/watch?v=u3VdiX7KUH8)





शपथ-पत्र में झूठ बोलना तो एक अपराध है फ़िर सोनिया ने लोकसभा सचिवालय को दिये अपने शपथ पत्र में यह क्यों छिपाया कि वह बहुत कम पढ़ी-लिखी हैं और उन्होंने कैम्ब्रिज से सिर्फ़ एक अंग्रेजी भाषा सीखने का डिप्लोमा किया है न कि कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से, दोनों संस्थाओं में ज़मीन-आसमान का अन्तर है… (दस्तावेज़ की प्रति डॉ स्वामी की वेबसाइट से…)

(डॉ स्वामी के भाषण का अंश भी देखिये… http://www.youtube.com/watch?v=-BfdiWpICo4)



इटली के कानूनों के मुताबिक इटली की नागरिक महिला से होने वाले बच्चे भी स्वयमेव इटली के नागरिक बन जाते हैं चाहे वह महिला कहीं भी रह रही हो। जिस समय राहुल (Raul) और प्रियंका (Bianca) का जन्म हुआ उस समय सोनिया भारत की नागरिक नहीं थी। उसके बाद कई वर्ष तक राहुल और प्रियंका ने इटली के पासपोर्ट पर भारत से बाहर यात्रा की (सन्दर्भ डॉ स्वामी का वीडियो…)। भाजपा वाले कान में मिट्टी का तेल डालकर क्यों सोते रहे? आज भी यह स्पष्ट नहीं है कि राहुल ने इटली की नागरिकता कब छोड़ी? या अभी भी दोहरी नागरिकता रखे हुए हैं? तेज़तर्रार कहलातीं सुषमा स्वराज ने इस मुद्दे पर कितनी बार धरना दिया है?

इस विषय पर डॉ स्वामी के भाषण के अंश देखें… http://www.youtube.com/watch?v=z5As3uAc0vU



ऐसा भी नहीं कि अकेले डॉ स्वामी ही बोल रहे हैं, जर्मनी की पत्रिकाओं तथा रुस के अखबारों में भी इस "पवित्र परिवार" के बारे में कई संदिग्ध बातें प्रकाशित होती रही हैं… (नीचे देखिये "द हिन्दू" दिनांक 4 जुलाई 1992 में प्रकाशित रूसी पत्रकार व्लादिमीर रेद्युहिन की अनुवादित रिपोर्ट जिसमें राजीव को KGB से मदद मिलने की बात कही गई है…)


ऐसे न जाने कितने संवेदनशील मुद्दे हैं जिन पर भाजपा-संघ को उग्र प्रदर्शन करना चाहिये था, कोर्ट केस करना चाहिये था, संसद ठप करना था… लेकिन कभी नहीं किया…। "सदाशयता" और "लोकतन्त्र की भावना" के बड़े-बड़े शब्दों के पीछे छिपे बैठे रहे। क्या भाजपा का यह फ़र्ज़ नहीं कि वे कांग्रेस के पैगम्बर पर निगाह रखें, उनके खिलाफ़ सबूत जुटायें, देश से विदेशों से अपने सम्पर्क सूत्रों के बल पर कांग्रेस को परेशान करने वाले मुद्दे खोजकर लायें? या विपक्ष में सिर्फ़ इसलिये बैठे हैं कि कभी न कभी तो जनता कांग्रेस से नाराज़ होगी तो घर बैठे पका-पकाया फ़ल मिल ही जायेगा?   भाजपा वालों को समझना चाहिये कि कांग्रेस या वामपंथियों के साथ "मधुर सम्बन्ध" बनाने की कोशिश करेंगे तो पीठ में छुरा ही खायेंगे…। शिवराज सिंह चौहान ने राहुल गाँधी की मप्र यात्रा में उसे "राजकीय अतिथि" का दर्जा दिया… बदले में राहुल ने भोपाल में ही संघ की तुलना सिमी से कर डाली। उधर नीतीश बाबू ने भाजपा के साथ मिलकर जमकर सत्ता की मलाई खाई, जब चुनाव की बारी आई तो "नरेन्द्र मोदी को बिहार में नहीं घुसने देंगे" कहकर भाजपा को हड़का दिया… भाजपा वाले भी घिघियाते हुए पिछवाड़े में दुम दबाकर नीतीश की बात मान गये, भाजपा की नीतियाँ क्या नीतीश तय करेंगे कि कौन प्रचार करेगा, कौन नहीं करेगा? पहले भी ऐसा कई बार हो चुका है कि भाजपा की राज्य सरकारों के आश्रय में वामपंथी साहित्यकारों का सम्मान कर दिया जाता है, जबकि वही कथित "गैंगबाज" साहित्यकार हॉल से बाहर आकर संघ और हिन्दुत्व को गाली दे जाते हैं। सुदर्शन जी के बयान के मद्देनज़र पहली बार कांग्रेस से सीधी लड़ाई का माहौल बना था, लेकिन अपना पल्ला झाड़कर संघ और भाजपा के लोग मैदान से भाग लिये… ऐसे कैसे पिलपिले विपक्ष हैं आप? क्या ऐसे होगी विचारधारा की लड़ाई? उधर एमजी वैद्य साहब सोनिया गाँधी को मानहानि का मुकदमा दायर करने की सलाह देकर, पता नहीं अपनी कौन सी पुरानी कुण्ठा निकाल रहे हैं। बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ और अनुभवी लोग संघ-भाजपा में बैठे हैं, क्या मेरे जैसे अदने से व्यक्ति को यह समझाना पड़ेगा कि राजनीति में प्रेम और मधुर सम्बन्ध नहीं बनाया जाता, कांग्रेस तो मीडिया और भ्रष्टों को अपने साथ रखकर बखूबी अपना खेल निर्बाध गति से चला रही है, फ़िर हिन्दुत्ववादी शक्तियों(?) को पाला क्यों मार जाता है? हिन्दुत्व को मजबूत करने के लिये हजारों लोग निस्वार्थ भाव से मैदानों में, स्कूलों में, सार्वजनिक जीवन में, पुस्तकों एवं इंटरनेट पर, संघ से एक भी पैसा लिये बगैर काम कर रहे हैं, कभी उनके मनोबल के बारे में सोचा है?

सुदर्शन जी के इस बयान से भाजपा का ऐसा कौन सा राजनैतिक नुकसान होने वाला था कि ये लोग चुप्पी साध गये? नरेन्द्र मोदी सिर्फ़ अपने साफ़-सुथरे काम के कारण ही प्रसिद्ध नहीं हैं, बल्कि इसलिये भी लोकप्रिय हैं कि वह "कांग्रेस के पैगम्बर" पर सीधा शाब्दिक और मर्मभेदी हमला बोलते हैं, जबकि दिल्ली में विपक्ष के दिग्गज(?) चाय-डिनर पार्टियों में व्यस्त हैं। सामान्य हिन्दूवादी कार्यकर्ता के मन में अब यह रहस्य गहराता जा रहा है कि आखिर भाजपा के नेता कांग्रेस और सोनिया के प्रति इतने "सॉफ़्ट" क्यों होते जा रहे हैं?


(भाग-2 में जारी रहेगा… अगले भाग में इस मुद्दे पर मीडिया की भूमिका एवं सामान्य कार्यकर्ता के मन की पीड़ा…)

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केरल सरकार ने केन्द्र सरकार से पिछले दिनों राजधानी त्रिवेन्द्रम के कुछ खास इलाकों में टेलर-नील्सन नामक संस्था द्वारा किये गये रहस्यमयी और अजीबोगरीब सर्वे की जाँच करवाने का आग्रह किया है। अब जैसा कि सभी जानते हैं वामपंथी और कांग्रेसियों द्वारा बारी-बारी से शासित केरल राज्य में ईसाई और मुस्लिम बहुल इलाके बहुतायत में हैं, इन दोनों समुदायों की जनसंख्या भी अच्छी-खासी तादाद में है। उक्त सर्वे केरल सरकार की नाक के नीचे ब्रिटेन की संस्था टेलर-नील्सन ने किया एवं इस संस्था को आर्थिक मदद वॉशिंगटन की प्रिंसटन सर्वे रिसर्च असोसिएट्स द्वारा दिया जाता है।

इस सर्वे में मुस्लिम इलाकों में कई आपत्तिजनक सवाल पूछे गये। सर्वे प्रश्नावली में कुल 93 प्रश्न थे… कुछ की बानगी देखिये…

- बराक हुसैन ओबामा और उनके प्रशासन के बारे में क्या सोचते हैं?

- मनमोहन सिंह, पश्चिम एशिया, इसराइल और बांग्लादेशी मुसलमानों के बारे में आपके क्या विचार हैं?

- भारत की सरकार और सेना के बीच सम्बन्धों तथा सेना की भूमिका पर आपके विचार?

- भारत के अलावा किस देश में रहना पसन्द करेंगे?

- ओसामा बिन लादेन के बारे में क्या सोचते हैं?

- शरीयत को भारत के संविधान का हिस्सा बनाने पर अपनी राय दीजिये।

इस प्रकार के कई आपत्तिजनक और देशद्रोही किस्म के सवाल इस सर्वे में पूछे जा रहे थे, कुछ लोगों ने इस पर अपना विरोध जताया और कम्पनी के स्टाफ़ (जिसमें चार लड़कियाँ भी शामिल थीं) को रोक दिया। इस मामले में पुलिस में शिकायत दर्ज की गई है, और इसके तुरन्त बाद कोच्चि स्थित टेलर-नेल्सन कम्पनी का दफ़्तर बन्द पाया गया। प्रारम्भिक जाँच से पता चला है कि इस एजेंसी ने इसी प्रकार का सर्वे गुजरात को छोड़कर, देश के करीबन 20 राज्यों के 55 मुस्लिम बहुल इलाकों में करवाया है। केरल के गृहमंत्री का बयान है कि हमने केन्द्र सरकार को सूचित कर दिया है और किसी केन्द्रीय संस्था से इस संदिग्ध मामले की गहराई से पड़ताल करने को कहा है।

सवाल उठता है कि आखिर विदेशी संस्थाओं द्वारा ऐसे सर्वे करने का क्या औचित्य है और निहायत बदनीयती भरे सवाल पूछने के पीछे उनका क्या मकसद रहा होगा? यह सर्वे मुस्लिम बहुल इलाकों में ही क्यों किये गये… क्या केरल सहित अन्य सभी राज्य सरकारों का खुफ़िया तन्त्र सो रहा था? कहीं यह "सेकुलरिज़्म" के नाम पर "मुस्लिमों को खुश करो…" अभियान का हिस्सा तो नहीं था? सर्वे करने वाली एजेंसी टेलर-नेल्सन कम्पनी से पूछा जाना चाहिये कि उसे यह सर्वे करने का ठेका किसने दिया और इस प्रकार की प्रश्नावली किसने तैयार की?

"कांग्रेसी और वामपंथी छाप" सेकुलरिज़्म वैसे ही इस देश में उफ़ान पर है। जब भी, जिसे भी, जहाँ भी, जैसे भी मर्जी होती है हिन्दू नेताओं, हिन्दू धर्माचार्यों, हिन्दुत्व की बात करने वालों, संघ और विहिप जैसे संगठनों पर वैचारिक और शाब्दिक हमले कर डालता है, आजकल यह फ़ैशन सा बन गया है। "हिन्दुत्व को गरियाओ", अभियान में जो सेकुलर शामिल होते हैं, उन्हें इस बात का पूरा-पूरा "समुचित भुगतान" भी किया जाता है। वामपंथी लोग अपने "नेटवर्क" में "सेटिंग" के जरिये किसी ऐरे-गैरे को कभी कहीं प्रोफ़ेसर बनवा देते हैं, तो कभी किसी इतिहास शोधक संस्था में मोटा पद दिलवा देते हैं तो कभी किसी तीसरे दर्जे के घटिया से शोध के नाम पर कुछ तगड़ी "ग्राण्ट" वगैरह दिलवा देते हैं… लगभग यही तरीका कांग्रेसी भी अपनाते हैं और ईनाम के तौर पर ठरकी किस्म के बुढ़ापों को विभिन्न राज्यों में राज्यपाल बनाकर भिजवा देते हैं जो अच्छी-भली चल रही गैर-कांग्रेसी राज्य सरकारों के कान में उंगली करते रहते हैं।

सेकुलरिज़्म का ऐसा ही "नंगा नाच" हमें हाल ही में ओबामा की यात्रा के दौरान भी देखने को मिल चुका है। जब ओबामा को UPA वाले गाँधी से पहले हुमायूं के मकबरे के दर्शन करने ले गये (विदेशी मेहमानों को कहाँ ले जाना है या क्या दिखाना है यह भारत सरकार की सलाह से तय होता है), कांग्रेसियों से सवाल किया जाना चाहिये कि क्या हुमायूं का मकबरा, राजघाट से भी अधिक महत्वपूर्ण है? यह बात अभी भी समझ से परे है कि लाल किला या ताजमहल को छोड़कर, बाबर की औलाद तथा एक हारे हुए योद्धा और ढीले-ढाले शासक हुमायूं के मकबरे पर ओबामा गये ही क्यों? और कांग्रेसी उन्हें हुमायूं के मकबरे पर पहले क्यों ले गये। यही सेकुलर बाजीगरी ओबामा के सम्मान में दिये गए डिनर के दौरान भी की गई। भारत में कश्मीर के विलय पर बचकाना सवाल उठाने वाले एक नाकाम और अनुभवहीन मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को डिनर के आमंत्रितों में शामिल किया गया, किसी और मुख्यमंत्री को नहीं।

चलो माना कि भारत के सबसे विकसित राज्य गुजरात और सबसे सफ़ल मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर कांग्रेस को हिचकियाँ आने लगती हैं सो उन्हें नहीं बुलाया, लेकिन कम से कम किसी और कांग्रेसी मुख्यमंत्री को ही डिनर पर बुला लेते? इसमें भी एक पेंच था, कांग्रेसी मुख्यमंत्री गिनेचुने ही तो बचे हैं, तो बुलाते किसे? अशोक चव्हाण को? हुड्डा को? या रोसैया को, जिसे खुद आंध्र में ही लोग मुख्यमंत्री नहीं मानते और जानते। इसलिये ओबामा और मुस्लिमों को खुश करने के लिये उमर अब्दुल्ला को बुलाया गया। ओबामा के साथ डिनर करने वाले कुछ अति-गणमान्य व्यक्तियों में आमिर खान, शबाना आज़मी और जावेद अख्तर साहब भी शामिल थे… शायद इन तीनों का भारतीय फ़िल्म उद्योग और संस्कृति में योगदान, अमिताभ बच्चन से ज्यादा होगा इसीलिये इन्हें बुलाया और अमिताभ को नहीं बुलाया… सेकुलर सोच ऐसी ही होती है। जबकि असली कारण यह है कि अमिताभ बच्चन गुजरात के ब्राण्ड एम्बेसेडर बन चुके हैं तो अब वे "अछूत" हो गये हैं और चूंकि शबाना और जावेद अख्तर सतत रात-दिन कांग्रेसी मार्का सेकुलरिज़्म के पैरोकार बने घूमते रहते हैं इसलिये वे ही ओबामा के साथ डिनर करेंगे… इतनी सी बात "हिन्दू-हिन्दू" करने वाले नहीं समझते तो उसमें सोनिया का भी क्या दोष है?

बहरहाल, ओबामा भारत के नेताओं को संयुक्त राष्ट्र की स्थाई सदस्यता की लॉलीपॉप थमाकर जा चुके हैं, अब सभी लोग मिलकर इसे चूसते रहेंगे… इस लॉलीपॉप के जरिये ओबामा भारत सरकार और कम्पनियों को कुल 500 अरब से अधिक का चूना लगा गये… तीन दिन रुकने का खर्चा अलग से।

बहरहाल, इंडियन स्टाइल "सेकुलरिज़्म" अब अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुँच चुका है, एक तरफ़ अमेरिका के पैसे से ब्रिटिश एजेंसी केरल के मुस्लिम इलाकों में गुपचुप सर्वे करती है, वहीं दूसरी तरफ़ "UPA के मुस्लिम वोट सौदागर", एक विदेशी मेहमान के सामने भी देश के सबसे बेहतरीन मुख्यमंत्री और सबसे लोकप्रिय अभिनेता को पेश करने की बजाय अपने "घृणित सेकुलरिज़्म" का भौण्डा प्रदर्शन करने से नहीं चूकते…
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चलते-चलते :- जो भोले लोग इस मुगालते में हैं कि अशोक चव्हाण की कुर्सी आदर्श सोसायटी घोटाले की वजह से गई वे नीचे दी गई तस्वीर देख लें… चव्हाण की कुर्सी जाने की असली वजह यह तस्वीर है…



(सबक - नरेन्द्र मोदी वह मिर्ची है, वह आग है… जो कांग्रेस, वामपंथी, सेकुलरों और देश के गद्दारों के पिछवाड़े में बराबरी से शेयर होती है…) ये तो भाजपा वाले "मूर्ख और डरपोक" हैं जो नीतीश कुमार की बन्दर घुड़की से डर कर मोदी को बिहार के चुनाव प्रचार से दूर रखे रहे… हकीकत यही है कि भाजपा में किसी नेता की औकात, लोकप्रियता और काम नरेन्द्र मोदी के बराबर नहीं है… परन्तु ड्राइंगरुम में बैठकर सोनिया-राहुल के साथ चाय की चुस्कियाँ लेने वाले कांग्रेस से "मधुर सम्बन्ध"(?) बनाकर रखने वाले भाजपा के "हवाई नेताओं" को समझाये कौन? बाय द वे…… ओबामा के साथ डिनर हेतु जेटली और आडवाणी को आमंत्रित किया गया था, सुषमा स्वराज की स्थिति के बारे में जानकारी नहीं है…


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(भाग-1 में हमने सर्वोच्च न्यायालय के कुछ जजों के संदिग्ध आचरण के बारे में देखा था (यहाँ क्लिक करके पढ़ें), पेश है उसी की दूसरी और अन्तिम कड़ी…)

5) जस्टिस एएस आनन्द (10.10.1998 - 01.11.2001)


जस्टिस पुंछी महाशय की तरह ही जस्टिस आनन्द का कार्यकाल भी विवादों और विभिन्न संदिग्ध निर्णयों से भरा रहा। इन साहब के खिलाफ़ भी राष्ट्रपति से महाभियोग चलाने की अनुमाति ली गई थी और विभिन्न आरोप तय किये गये थे।

(अ) जब ये सज्जन जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे उस समय कृष्ण कुमार आमला नामक उद्योगपति के केस की सुनवाई करते रहे और उसके पक्ष में निर्णय भी दिया, जबकि गांदरबल में नहर के किनारे ज़मीन के दो बड़े-बड़े प्लॉट आमला ने जस्टिस आनन्द के नाम कर दिये थे।

(ब) जस्टिस आनन्द ने जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीश रहते काफ़ी बड़ी कृषि भूमि पर कब्जा जमाये रखा, जबकि यह ज़मीन जम्मू-कश्मीर कृषि सुधार कानून 1976 के अनुसार राज्य सरकार के कब्जे में होनी चाहिए थी।

जस्टिस आनन्द के खिलाफ़ कई पक्के सबूत होने के बावजूद महाभियोग अपील पर हस्ताक्षर करने लायक सांसदों की पर्याप्त संख्या नहीं मिल पाई, क्योंकि लगभग सभी पार्टियों के नेता इस बात से भयभीत थे कि जस्टिस आनन्द की अदालत में चल रहे उनके और उनकी पार्टियों से सम्बन्धित मुकदमों का क्या होगा, जब आनन्द को पता चलेगा कि उनके खिलाफ़ किस-किस सांसद ने हस्ताक्षर किये हैं। सो आनन्द साहब का कुछ नहीं बिगड़ा…

6) जस्टिस वायके सभरवाल (01.11.2005 - 14.01.2007)


दिल्ली में "सीलिंग एक्ट" के सम्बन्ध में धड़ाधड़ आदेश और निर्देश जारी करने वाले सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सभरवाल के खिलाफ़ भी न्यायिक जिम्मेदारी समिति ने कई गम्भीर आरोप लगाये हैं जिनकी जाँच होना आवश्यक है। दिल्ली के रिहायशी इलाकों में चल रहे व्यावसायिक संस्थानों को बन्द करके सील लगाने सम्बन्धी इनके आदेश बहुचर्चित हुए। इस आदेश की वजह से छोटे दुकानदारों और एक-दो कमरों में अपने दफ़्तर चलाने वाले छोटे संस्थानों पर रातोंरात ताले डलवा दिये गये और उन्हें सील कर दिया गया। इस वजह से इन लोगों को अपना धंधा सुचारु रुप से जारी रखने के लिये बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल्स और व्यावसायिक कॉम्पलेक्स में अपनी दुकानें और ऑफ़िस खरीदने या किराये पर लेने पड़े, जिसके कारण दिल्ली के बड़े-बड़े डेवलपर्स और बिल्डर्स के भाव ताबड़तोड़ बढ़ गए तथा मुख्य बाज़ारों में व्यावसायिक प्रापर्टी की कीमतें आसमान छूने लगीं। इसके पीछे की कहानी का खुलासा बाद में तब हुआ जब पता चला कि सभरवाल साहब के दोनों बेटे (चेतन और नितिन सभरवाल) शॉपिंग मॉल्स और कमर्शियल कॉम्पलेक्स के बड़े निर्माताओं के न सिर्फ़ सम्पर्क में थे, बल्कि कुछ बिल्डर फ़र्मों में उनकी पार्टनरशिप भी थी… (यहाँ देखें…)। जिन व्यापारियों का टर्नओवर 2 करोड़ से कम था उन्हें सभरवाल साहब ने अपने आदेशों से मजबूर कर दिया कि वे महारानीबाग और सिकन्दर रोड पर 15-20 करोड़ की प्रापर्टी खरीदें। इस तरह उन्होंने कुछ ही महीनों में उनके बेटों ने करोड़ों रुपये की सम्पत्ति खड़ी कर ली। बेशर्मी की इन्तेहा यह भी थी कि उनके बेटों की फ़र्मों के ऑफ़िस का पता भी सभरवाल साहब का सरकारी आवास ही दर्शाया जाता रहा। इसी प्रकार अमर सिंह टेप काण्ड की सुनवाई के समय ही अचानक उनके पुत्रों को उतरप्रदेश सरकार द्वारा नोएडा में बेशकीमती ज़मीन अलॉट की गई। "विशेषाधिकार प्राप्त" वीवीआईपी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश महोदय के खिलाफ़ अभी तक प्रशासनिक मशीनरी में एक पत्ता भी नहीं खड़का है…

यह तो हुई सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की बात, जिसे प्रशान्त भूषण जैसे धुन के पक्के व्यक्ति ने उजागर करने और उसके खिलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत की, लेकिन इससे पहले भी कई मामले ऐसे सामने आ चुके हैं जिसमें "माननीय"(?) न्यायाधीश महोदय के पद पर बैठे महानुभावों ने अपना हाथ "काला-पीला" किया है…

1) बच्चों को नकल नहीं करने की नसीहत देने वाले और नकल के केस बनने पर जुर्माना और रेस्टीकेशन करने वाले जज महोदय खुद परीक्षा में नकल करते पकड़ाये गये… http://www.dailypioneer.com/278780/5-AP-judges-suspended-for-cheating-exams.html

2) जस्टिस सेन द्वारा अपने बंगले के रखरखाव और फ़र्नीचर पर 33 लाख रुपये का बेतुका खर्चा किया गया… http://www.dailypioneer.com/270092/Justice-Sen-misappropriated-funds-RS-probe-panel-told.html
(ताज़ा खबर यह है कि जस्टिस सेन के खिलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव को उपराष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी है)

3) कई न्यायाधीश ऐसे "भाग्यशाली" रहे हैं कि सरकारी नौकरी से रिटायर होने के "अगले दिन ही" उन्हें बेहद महत्वपूर्ण पद मिल गया (ज़ाहिर है कि उनकी "प्रतिभा" के बल पर) - जैसे कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस एचके सेमा ने अपने कार्यकाल के अन्तिम दिनों में अम्बेडकर पार्क के निर्माण कार्य पर लगी रोक हटाने में मायावती की "मदद" की तो वे तड़ से उप्र राज्य के मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष बना दिये गये। फ़िर इन माननीय को ज्यादा तकलीफ़ न हो इसलिये मानवाधिकार आयोग का कार्यालय भी उठाकर नोएडा में खोल दिया गया, क्योंकि "माननीय" दिल्ली में रहते हैं।



4) जस्टिस यूसी बनर्जी जिन्हें NDA सरकार ने अप्रत्यक्ष कर बोर्ड के अध्यक्ष पद पर बैठाने से मना कर दिया था, उन्हें UPA सरकार के "मैनेजमेंट के धनी और सबसे प्रतिभाशाली"(?) मंत्री लालू यादव ने गोधरा काण्ड की जाँच आयोग का अध्यक्ष बना दिया। इस "अहसान" का बदला बनर्जी साहब ने लालूप्रसाद यादव की मनमर्जी की रिपोर्ट बनाकर दिया, यानी कि गोधरा में आग डिब्बे के अन्दर से लगाई गई थी, न कि बाहर से।


5) जस्टिस अरिजीत पसायत जिन्होंने अहसान जाफ़री केस दोबारा खोलने और मोदी को फ़ाँसने वाले SIT की तारीफ़ करने का काम किया था उन्हें "अपीलेट अथॉरिटी" के पद से नवाज़ा गया।

6) सोहराबुद्दीन केस में गुजरात सरकार की खिंचाई करने वाले जस्टिस तरुण चटर्जी साहब को रिटायरमेण्ट के अगले दिन अरुणाचल/असम के सीमा प्रदेशों के विवाद में मध्यस्थ हेतु नियुक्त किया गया। हालांकि तरुण चटर्जी साहब PF घोटाले में उनकी संदिग्ध भूमिका के लिये अभी भी जाँच के घेरे में हैं।

7) जस्टिस एआर लक्षमणन जिन्होंने मुलायम सिंह को सीबीआई के घेरे में लिया, सेवानिवृत्ति के बाद तड़ से लॉ कमीशन के चेयरमैन बना दिये गये।


8) चेन्नई के जस्टिस दिनाकरन तो मानो "भूमिपुत्र" ही हैं, उन्हें ज़मीन से विशेष प्रेम है… चेन्नई कलेक्टर ने उनकी ज़मीनों की एक पूरी लिस्ट जारी की है… यहाँ देखें…http://www.hindu.com/2009/11/13/stories/2009111355421300.htm

लेकिन न तो आज तक किसी भी मुख्य न्यायाधीश और उनके परिजनों की सम्पत्ति की जाँच कभी भी केन्द्रीय सतर्कता आयोग या सीबीआई द्वारा नहीं की गई… ज़ाहिर है कि इन महानुभावों के पास आलोचकों के लिये "न्यायालय की अवमानना" नामक घातक हथियार तथा सरकार और राष्ट्रपति का विशेष कानून रुपी रक्षा-कवच मौजूद है।

किसी राजनैतिक भ्रष्ट को आप और हम मिलकर कभीकभार वोट के जरिये 5 साल में ही बाहर का रास्ता दिखा देते हैं, लेकिन IAS-IPS-IFS जैसे उच्चाधिकारी और न्यायिक सेवा के इन "माननीय महानुभावों" का आप क्या कीजियेगा… वरिष्ठ वकील प्रशान्त भूषण जी द्वारा दायर हलफ़नामे में सरकार से इन भ्रष्ट जजों के खिलाफ़ जाँच शुरु करने की माँग की गई है।

जजों की सम्पत्ति घोषित करना इस लड़ाई में छोटी सी, लेकिन पहली जीत है… न्यायाधीशों को सूचना के अधिकार कानून में शामिल करने को लेकर हीलेहवाले और टालमटोल किये जा रहे हैं, लेकिन यह भी होकर रहेगा… फ़िर सबसे अन्त में नम्बर आयेगा "माननीयों" के खिलाफ़ मुकदमे दायर करने का…। जिस तरह से सेना में भ्रष्टाचार को "राष्ट्रीय सुरक्षा" के नाम पर अधिक दिनों तक छिपाया नहीं जा सकता उसी तरह न्यायिक क्षेत्र को भी "अवमानना" और "विशेषाधिकार" के नाम पर अधिक दिनों तक परदे के पीछे नहीं रखा जा सकेगा…। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा हाल ही में जारी भ्रष्ट देशों की सूची में भारत और नीचे खिसक गया है… पर हमें शर्म नहीं आती।

यह लेख आम जनता की जानकारी हेतु जनहित में प्रस्तुत किया गया -

(डिस्क्लेमर - प्रस्तुत जानकारियाँ विभिन्न वेबसाईटों एवं प्रशान्त भूषण/शान्ति भूषण जी के एफ़िडेविट पर आधारित हैं, यदि इनसे किसी भी "माननीय" न्यायालय की अवमानना होती हो, तो "आधिकारिक आपत्ति" दर्ज करवायें… सामग्री हटा ली जायेगी…)

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हाल ही में कैम्ब्रिज विवि में एक व्याख्यान के दौरान प्रकाश करात ने माना कि "भारत के वामपंथी" देश में होने वाले आर्थिक बदलावों को समझने में असफ़ल रहे तथा भारतीय वामपंथ आज भी 1940 के ज़माने की मानसिकता में जी रहा है। कुछ माह पहले यही स्वीकारोक्ति वचन, वामपंथियों के पितातुल्य फ़िदेल कास्त्रो भी अपने मुँह से उचर चुके हैं (यहाँ देखें…)

आज़ादी के पिछले 60 साल से भारत की जनता ने वामपंथियों को लाल झण्डे उठाये, मुठ्ठियाँ भींचे, नारे लगाते देखा है, यह सारी प्रक्रिया अक्सर (लगभग हमेशा) उद्योगपतियों के खिलाफ़, निजीकरण के विरोध में, सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों को बचाने के नाम पर बरसों से दोहराई जाती रही है।



विभिन्न सरकारी संस्थानों, उपक्रमों, सार्वजनिक कम्पनियों, नवरत्न कम्पनियों से लेकर रेल्वे तक वामपंथी नेता, विदेशी पुस्तकों से एवं विदेशी विचारकों से उधार ले-लेकर भाषण, सिद्धान्त जनता के माथे पर झाड़ते रहे। बात-बात पर हड़ताल, तालाबन्दी, कलमबन्दी, घेराव, प्रदर्शन, तोड़फ़ोड़, नारेबाजी, उकसाना, प्रबन्धन को हड़काना, मजदूर नेताओं(?) द्वारा हाजिरी मस्टर पर हस्ताक्षर करके दिन भर गायब हो जाना, प्रबन्धन को मनचाहा झुकाने के बावजूद ब्लैकमेल करना, अपने-अपने आदमियों को विभिन्न संस्थानों में दबाव से फ़िट करवाना… जैसे कई मार्क्सवादी(?) पुनीत काम पिछले कुछ दशकों से हम देखते आये हैं। उदारीकरण के दौर के बाद, इन लोगों के इसी रवैये की वजह से देश के सार्वजनिक उपक्रम निजी उपक्रमों से टक्कर लेने में कमजोर पड़ने लगे, फ़िर भी ये सुधरे नहीं। देखते-देखते पिछले 20 साल में निजी क्षेत्र तरक्की के नये सोपान चढ़ता गया और कामगारों के हमदर्द कहे जाने वाले वामपंथियों ने सरकारी उपक्रमों की टाँग खींचना जारी रखा।

इनके अधिकतर आंदोलन तनख्वाह बढ़ाने, कर्मचारियों की सुविधाएं बढ़ाने, छुट्टियाँ और भत्ते बढ़वाने तक ही सीमित रहते हैं, बहुत कम आंदोलन ऐसे हुए हैं जिसमें इन्होंने उच्च प्रबन्धन के भ्रष्टाचार को लेकर तालाबन्दी की हो, ऐसा भी कम ही हुआ कि किसी कर्मचारी नेता या संस्थान के कर्मचारियों की काम के प्रति जवाबदेही और उसके कर्तव्यों के निर्वहन में मक्कारी के खिलाफ़ इन्होंने कोई आन्दोलन किया हो… नतीजा ये हुआ कि कई सार्वजनिक उपक्रम पूरी तरह बैठ गये, कुछ बीमार हो गये और कुछ बिकने की कगार पर हैं। इसका सारा दोष वामपंथी हमेशा दूसरी सरकारों पर डालते आये हैं, कि इन्होंने ऐसा नहीं किया इसलिये यह कम्पनी बन्द हो गई या उन्होंने वैसा मैनेजमेण्ट किया इसलिये वह संस्था बरबाद हो गई… तात्पर्य यह कि कामचोरी, मक्कारी, हड़ताल, कर्मचारी यूनियन नेताओं की दादागिरी और कदाचरण तथा कर्मचारियों और मजदूरों को "सिर्फ़ अधिकार-सुविधाएं लेना" के साथ "कर्तव्य नहीं करना" की शिक्षा देना जैसे कामों में इनका कोई दोष नहीं है, सारा दोष दूसरों का ही है (यह इनकी पुरानी आदत रही है)। अपनी असफ़लता को स्वीकार करने में इन्हें हिचक तो होती है, अतः खुलकर कुछ कह नहीं पाते।


इतिहास गवाह है कि हर नये विचार का वामपंथियों ने विरोध किया है, इन्होंने कम्प्यूटर का विरोध किया, उस समय इसके फ़ायदे इन्हें समझ नहीं आये… और अन्त में वामपंथ मुख्यालय में कम्प्यूटर लगाने ही पड़े। ये लोग केरल और बंगाल में हड़तालें करवाते रहे, सरकारी उपक्रमों का भट्टा बैठाते रहे, कार्यसंस्कृति का सत्यानाश करते रहे और इनके पड़ोसी राज्य तेजी से आगे बढते चले गये… अब जाकर इनकी आँख खुली है। इन्होंने ट्रैक्टर का विरोध किया, इन्होंने थ्रेशर का विरोध किया, इन्होंने 10+2 शिक्षा पद्धति का विरोध किया, इन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में निजी भागीदारी का विरोध किया… तात्पर्य यह कि वास्तविकता को स्वीकार करने की बजाय रेत में मुँह दबाये बैठे रहे… फ़िलहाल इनका यही रवैया इस्लामिक उग्रवाद को लेकर है, अभी भी ये समझ नहीं पा रहे हैं कि केरल और बंगाल में मुस्लिम वोटों की खातिर जिस "भस्मासुर" को ये पाल रहे हैं, वह अन्ततः इन्हें ही भस्म करने वाला है…

लेकिन हाल ही में केरल की एक और घटना ने इनके "पाखण्डों के धारावाहिक" का एक और एपीसोड प्रदर्शित किया है। केरल में वामपंथियों का एक "भोंपू" है (भोंपू यानी मुखपत्र अखबार) जिसका नाम है "देशाभिमानी" (नाम ही विचित्र है, क्योंकि इसका नाम तो मार्क्साभिमानी होना चाहिये था)। इस अखबार के विभिन्न दफ़्तरों और संवाददाताओं को BSNL के नेटवर्क (टेलीफ़ोन, मोडम, राऊटर, लीज़ लाइन्स इत्यादि) से जोड़ा गया था। हाल ही में CPM की केन्द्रीय समिति ने इस अखबार से BSNL का ठेका समाप्त करके रिलायंस टेलीकॉम कम्पनी की सेवाएं लेने का फ़ैसला कर लिया है। अब देशाभिमानी अखबार और वेबसाइट से माकपा ने BSNL को बाहर करके रिलायंस का हाई-स्पीड डाटा नेटवर्क ले लिया है। BSNL को माकपा अखबार से बाहर करने का कारण "खराब और गुणवत्ताहीन सेवाएं" बताया गया है। BSNL की धीमी गति, लाइनों में बार-बार खराबी और डाटा नष्ट होने की वजह से परेशान होकर माकपा की केन्द्रीय समिति के सदस्य ईपी जयराजन और समिति के अन्य सदस्यों ने BSNL को बाहर का रास्ता दिखाने का फ़ैसला किया। "…आखिर कब तक हम BSNL को झेलते, उनकी सेवाएं बहुत खराब हैं और ऊपर से उनके बिल भी भारी-भरकम होते हैं…" ऐसा कहना है समिति के सदस्यों का।

BSNL के स्थानीय प्रबन्धन ने इस बात से साफ़ इंकार किया है कि खराब सेवाओं के कारण उन्हें बन्द किया गया है, जबकि BSNL में ही कार्यरत यूनियन (माकपा से जुड़ी) के सदस्य भी इस निर्णय से बेहद शर्मिन्दा और खफ़ा हैं। BSNL एम्पलाइज़ यूनियन के सचिव के. मोहनन कहते हैं, "…हमारा प्रयास हमेशा BSNL की सेवाओं में सुधार का ही होता है, हम अपने सभी मिलने-जुलने वालों को BSNL की सेवाएं लेने हेतु प्रेरित करते हैं, लेकिन देशाभिमानी के इस निर्णय से हमारी स्थिति अजीब हो गई है…"।

उल्लेखनीय है कि CPM और CITU ने BSNL को "निजीकरण से बचाने" के नाम पर जमकर (राजनैतिक और आर्थिक) रोटियाँ सेंकी हैं और UPA पर BSNL को कमजोर करने का आरोप लगाते रहे हैं, परन्तु जब बात खुद पर और "धंधे" पर आई तो BSNL को लात मारने में देर नहीं लगाई। यदि CPM वाले वाकई BSNL को सुधारने के प्रति गम्भीर होते तो अपनी यूनियन के जरिये सेवाओं में सुधार के लिये प्रबन्धन पर दबाव बनाते या फ़िर अपनी यूनियन सदस्यों को अच्छा काम करने को प्रेरित करते, सेवाओं में सुधार के लिये CPM की यूनियनें एक घण्टा अधिक काम करतीं, जो कर्मचारी दोषी या मक्कार है उसे सजा दिलाने के लिये CPM की यूनियन आवाज़ उठाती… ऐसा तो कुछ नहीं किया गया, उलटा BSNL का एक हजारों रुपये मासिक का बड़ा ग्राहक (यानी पार्टी का अखबार) खुद ही तोड़ दिया। ये कैसा मार्क्सवाद है भाई…?

जबकि हकीकत यह है कि यदि BSNL को उचित माहौल, सही प्रबन्धन, नेतागिरी और यूनियनबाजों से से मुक्ति मिल जाये तो रिलायंस, आईडिया, एयरटेल किसी भी औकात नहीं है कि उसके सामने टिक सकें। ऐसे आरोप आम हैं कि निजी कम्पनियों को बढ़ावा देने के लिये BSNL के अफ़सरों ने शुरुआत में जानबूझकर "सिम" को दबाये रखा, उसका ब्लैक होने दिया, जल्दी-जल्दी टावर खड़े नहीं किये… तब मार्क्सवादियों ने इसके खिलाफ़ कोई आंदोलन नहीं किये? निजी कम्पनियाँ ग्रामीण क्षेत्रों में लैण्डलाइन सेवाएं देना नहीं चाहतीं, जबकि BSNL बाज़ार में मौजूद है इसलिये उन पर "कम रेट्स" रखने का दबाव भी है…। क्यों नहीं CPM वाले दूरसंचार मंत्री राजा को उसके भ्रष्टाचार के लिये रगड़ते?

असल में मार्क्सवादी हों, वामपंथी हों, CPM-CPI आदि जैसे जो भी हों, इनके सिद्धान्त सिर्फ़ बघारने के लिये होते हैं, कार्यकर्ताओं को लुभाने और जनता को बरगलाने के लिये होते हैं। माकपा की असली ताकत "गरीबी और बेरोज़गारी" है, इसलिये ये चाहते हैं कि गरीबी बनी रहे…, बेरोज़गार इनके झण्डे उठाते रहें। "विकास" से इनकी दुश्मनी है, क्योंकि जैसे ही उद्योग-धंधे लगेंगे… बाज़ार पनपेगा, क्रय शक्ति बढ़ेगी… गरीब आगे बढ़कर निम्न-मध्यम और मध्यमवर्ग बनेगा… तो सबसे पहले इन्हें ही लात मारेगा। फ़र्जी विदेशी सिद्धान्त झाड़ते-झाड़ते ये लोग यथार्थ से दूर हो गये हैं। सामाजिक सुरक्षा, गरीबी उन्मूलन की सिर्फ़ बातें ही बातें इनसे करवा लो… जबकि "सरकारी एजेंसी द्वारा" करवाये गये सर्वे में यह बात सिद्ध हुई है कि गरीबों के लिये चलाये जाने वाले "बीस सूत्री कार्यक्रम" का सबसे सफ़ल क्रियान्वयन भाजपा शासित गुजरात (क्रमांक 1) और कर्नाटक (क्रमांक 2) राज्यों में हुआ है, जबकि केरल का नम्बर पाँचवा और बंगाल का 14वां है…। अब बताईये, क्या फ़ायदा हुआ एक ही राज्य में 30 साल शासन करने का और गरीबी-गरीबी भजने का? लेकिन फ़िर भी न तो ये सुधरेंगे, न ही झूठे सिद्धान्त बघारना छोड़ेंगे, न ही जनता की आमदनी बढ़ाने और विकास करने के लिये कुछ करेंगे…।
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विशेष टीप -
1) इतने सालों तक सड़कों पर "संघर्ष"(?) करने के बावजूद वामपंथी लोग बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कुछ नहीं उखाड़ पाये, लेकिन जब अकेले रामदेव बाबा ने अपने योग के प्रचार के जरिये इन शीतल पेय, जंक फ़ूड, दवा आदि कम्पनियों को अरबों रुपये का नुकसान करवा दिया तब भी इनके पेट में दर्द हो रहा है और ये रामदेव बाबा की आलोचना में लग गये हैं… कारण एक ही है कि रामदेव बाबा भारतीय संस्कृति की बात करते हैं तथा "भगवा" वस्त्र पहनते हैं…। इसी पाखण्ड की वजह से वामपंथ तेजी से अपना जनाधार खोता जा रहा है…

2) अन्त में एक आसान सा सवाल - खबर है कि बिल क्लिंटन और जॉर्ज बुश की भारत यात्रा के दौरान जमकर विरोध करने वाले वामपंथी, ओबामा का बहिष्कार भी नहीं करेंगे और संसद में ओबामा के भाषण को सुनेंगे भी… बताईये ऐसा क्यों? जी हाँ, सही समझे आप… ओबामा के नाम में "हुसैन" शब्द जो आता है। स्वाभाविक है कि भारतीय संस्कृति को भले ही ये लोग जब-तब ईंट मारते रहें, लेकिन "हुसैन" से इनका "प्यार और दुलार" जगज़ाहिर है, फ़िर जल्दी ही केरल और बंगाल में विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं… ऐसे में "हुसैन" शब्द जहाँ भी दिखेगा, सारे वामपंथी जीभ लपलपाते हुए उधर दौड़े चले जायेंगे…

लेख का सन्दर्भ :- http://expressbuzz.com/cities/thiruvananthapuram/deshabhimani-dumps-bsnl-prefers-reliance/216340.html


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अमूमन ऐसा माना जाता है कि IIT में आने वाले छात्र भारत के सबसे बेहतरीन दिमाग वाले बच्चे होते हैं, क्योंकि वे बहुत ही कड़ी प्रतिस्पर्धा करके वहाँ तक पहुँचते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि यहाँ से निकले हुए प्रतिभाशाली दिमाग अपने नये-नये आईडियाज़ से देश और समाज को लाभान्वित करने के प्रकल्पों में लगायेंगे। जिन लोगों ने IIT रुड़की के छात्रों को टीवी पर “लिपस्टिक लगाओ प्रतियोगिता” में भाग लेते देखा होगा, उनकी कुछ धारणाएं अवश्य खण्डित हुई होंगी।

जिन लोगों ने IIT के “प्रतिभाशाली” छात्रों के “पुण्य प्रताप” नहीं देखे या इस बारे में नहीं जानते होंगे, उन्हें बताना जरुरी है कि रुड़की स्थित IIT  के छात्रों ने कॉलेज में एक प्रतियोगिता आयोजित की थी, जिसे लिपस्टिक लगाओ प्रतियोगिता कहा गया। इसमें लड़कों ने मुँह में लिपस्टिक दबा रखी थी और उसे सामने वाली लड़की के होंठों पर उसे ठीक से लगाना था (मुझे यह नहीं पता कि यह “प्रतिभाशाली” आइडिया किस छात्र का था, किस शिक्षक का था या किसी आयोजन समिति का था), ऐसा “नावीन्यपूर्ण” आइडिया किसी IITian के दिमाग में आया होगा इस बात पर भी मुझे शक है… बहरहाल आइडिया किसी का भी हो, IIT रुड़की में जो नज़ारा था वह पूर्ण रुप से “छिछोरेपन” की श्रेणी में आता है और इसमें किसी भी सभ्य इंसान को कोई शक नहीं है।

इस घटना की तीव्र निंदा की गई और उत्तराखण्ड सरकार ने इसकी पूरी जाँच करने के आदेश दे दिये हैं।

पहले आप "छिछोरग्रस्त वीडियो" देखिये, फ़िर आगे बात करते हैं…



जब यह वीडियो टीवी चैनलों पर दिखाया गया तो स्वाभाविक रुप से “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता”(?) के पक्षधर अपने-अपने तर्क लेकर खड़े हो गये। जब भी कभी इस प्रकार की कोई “अ-भारतीय” और “अशोभनीय” घटना होती है तो अमूमन उसका विरोध ABVP या विहिप द्वारा किया जाता है (NSUI के आदर्श, चूंकि रॉल विंसी घान्दी हैं इसलिये वह ऐसी घटनाओं का विरोध नहीं करती)। फ़िर मीडिया जिसे कि कोई बहाना चाहिये ही होता है कि वे किस तरह “भारतीय संस्कृति” की बात करने वालों को “पिछड़ा”, “बर्बर” और “हिंसक” साबित करें तड़ से इस पर पैनल चर्चा आयोजित कर डालता है। इस पैनल चर्चा में अक्सर “सेकुलरों” के साथ (खुद को तीसमारखां समझने वाले) “प्रगतिशीलों”(?) और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता वाले “वाचाल” मौजूद होते हैं।

ऐसे प्रगतिशील रटे-रटाये तर्क करते रहते हैं, जैसे कि “…यह प्राचीन देश “कामसूत्र” का देश है और हम ऐसे कृत्यों को सामान्य समझते हैं…” (इनसे पूछना चाहिये कि भईया जब यह कामसूत्र और खजुराहो का देश है तो क्या हम फ़ुटपाथ पर सेक्स करते फ़िरें?), या फ़िर तर्क ये होता है कि पुराने जमाने में भी भारतीय संस्कृति में इस तरह का खुलापन और “कामुकता” को राजा-महाराजों ने सामाजिक मान्यता दी थी (तो भईया, क्या हम भी राजाओं की तरह हरम और रनिवास बना लें और उसमें कई-कई औरतें रख लें? हमें मान्यता प्रदान करोगे?)…। इसी मूर्खतापूर्ण तर्क को आगे बढ़ायें तो फ़िर एक समय तो मनुष्य बन्दर था और नंगा घूमता था, तो क्या दिल्ली और रुड़की में मनुष्य को नंगा घूमने की आज़ादी प्रदान कर दें? कैसा अजीब तर्क हैं… भाई मेरे… यदि भारत में खजुराहो है… तो क्या हम भी अपने घरों में “इरोटिक” पेंटिंग्स लगा लें?

रही बात “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता” की… तो इसका “वीभत्स देशद्रोही रुप” एक औरत हाल ही में हमें रायपुर, दिल्ली और कश्मीर में दिखा चुकी है, क्या "वैसी" अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता चाहते हैं ये प्रगतिशील लोग? भारत में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का फ़ायदा एक "घटिया चित्रकार" पहले भी उठा चुका है, जिसे बड़ी मुश्किल से खदेड़ा गया था इस देश से।

और सबसे बड़ी बात यह कि, क्या IIT के ये छात्र, लड़कियों को लिपस्टिक लगाने को “स्वतन्त्रता” या “स्वस्थ प्रतियोगिता” मानते हैं? यदि मानते हैं तब तो इनकी बुनियादी शिक्षा पर ही सवाल उठाये जाने चाहिये। क्या IIT में पढ़ने वाले इन छात्रों को पता नहीं है कि आज भारत के गाँव-गाँव में बच्चे यहाँ तक पहुँचने के लिये कड़ी मेहनत कर रहे हैं और IIT उनके लिये एक सपना है, एक आदर्श है… वहाँ ऐसी छिछोरी हरकते करते उन्हें शर्म नहीं आई? कभी सोचा नहीं कि इस कृत्य के दृश्यों का प्रभाव “बाहर” कैसा पड़ेगा? नहीं सोचा तो फ़िर काहे के “प्रतिभाशाली दिमाग” हुए तुम लोग? भारत के इन चुनिंदा प्रतिभाशाली बच्चों को "अल्हड़"(?) और इसे "नादानी में किया गया कृत्य" कहा जा सकता है? जिस छिछोरे ने यह आइडिया दिया, क्यों नहीं उसी समय उसके मुँह पर तमाचा जड़ दिया गया? आज तुमने लिपस्टिक लगाओ प्रतियोगिता रखी है और “प्रगतिशील” उसका गाल बजा-बजाकर समर्थन कर रहे हैं…। इन सड़े हुए दिमागों का बस चले तो हो सकता है कि कल कॉलेज में तुम “ब्रा पहनाओ प्रतियोगिता” भी रख लो, जिसमें लड़के अपनी लड़की सहपाठियों को एक हाथ से “ब्रा पहनाकर देखें”…। फ़िर ABVP और विहिप को गालियाँ दे-देकर मन भर जाये और भारतीय संस्कृति और शालीनता को बीयर की कैन में डुबो दो… तब हो सकता है कि 3-4 साल बाद आने वाली IIT बैच के लड़के “पैंटी पहनाओ प्रतियोगिता” भी रख लें। यदि सड़क पर खुलेआम चुम्बन लेना और देवताओं के नंगे चित्र बनाना अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता है, तो उसके थोबड़े पर हमें भी चार चप्पल लगाने की स्वतन्त्रता दो भईया… यह भेदभाव क्यों?

ऐ, IIT वालों… माना कि तुममें से अधिकतर को भारत में नहीं रहना है, विदेश ही जाना है… तो क्या पश्चिम का सिर्फ़ नंगापन ही उधार में लोगे? तरस आता है ऐसी घटिया सोच पर…। कुछ दिन पहले दिल्ली के राजपथ पर BSF का एक जवान अपने चार बच्चों के साथ पूर्ण नग्न अवस्था में विरोध प्रदर्शन कर रहा था… उसका वह नंगापन भी “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता” था, लेकिन नौकरी गंवाने और बच्चों को भूख से बेहाल देखकर उसने व्यवस्था के खिलाफ़ नंगा होना स्वीकार किया, जबकि IIT के इन छात्रों ने “नंगापन” सिर्फ़ और सिर्फ़ मस्तीखोरी के लिये किया… और यह अक्षम्य है… अपने घर के भीतर तुम्हें जो करना है करो, लेकिन सार्वजनिक जगह (और वह भी कॉलेज) पर ऐसी “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता” कतई बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिये…।

अब अन्त में कुछ सलाह ABVP और विहिप के लिये –

1) वर्तमान समय में यह बात हमेशा याद रखो कि मीडिया पर एक “वर्ग विशेष” का पूरा कब्जा है, जो हमेशा इस ताक में रहता है कि कैसे आपको बदनाम किया जाये, इसलिये प्रत्येक विरोध का तरीका शालीन, तर्कपूर्ण और सभ्य रखने की पूरी कोशिश करो…

2) छिछोरों को “जमकर रगेदने” का सबसे बढ़िया तरीका है “अदालत” का रास्ता, आपके पास वीडियो उपलब्ध है, उसमें दिखाई दे रहे लड़कों के खिलाफ़ “अश्लीलता फ़ैलाने” का आरोप लगाकर उन्हें कोर्ट में घसीटो। ऐसे दसियों कानून हैं और यदि जेठमलानी और जेटली जैसे वकीलों को छोड़ भी दिया जाये तो कोई भी सामान्य सा वकील इन उच्छृंखल और असभ्य लड़कों को कोर्ट के कम से कम 10-20 चक्कर तो आसानी से खिलवा सकता है। ये IIT के लड़के हैं, कोई ऊपर से उतरे हुए देवदूत नहीं हैं, जब MF हुसैन जैसे घाघ को सिर्फ़ मुकदमों के बल पर देशनिकाला दे दिया तो इन कल के लौण्डों की क्या औकात है। कोर्ट के 2-4 चक्कर खाते ही अक्ल ठिकाने आ जायेगी और फ़िर ऐसी छिछोरी हरकतें भूल जायेंगे और पढ़ाई में ध्यान लगाएंगे। इस प्रक्रिया में एकाध लड़के (जिसने यह फ़ूहड़ आइडिया दिया होगा) को IIT से बाहर भी निकाल दिया जाये तो देश पर कोई आफ़त नहीं टूट पड़ेगी… कम से कम आगे के लिये एक सबक तो मिलेगा।

तात्पर्य यह कि जिस तरह अक्षय कुमार को सरेआम अपनी पत्नी ट्विंकल द्वारा पैंट की चेन खोलने को लेकर पहले सार्वजनिक रुप से और फ़िर कोर्ट में रगेदा गया था, वैसा ही इन लड़कों को भी रगेदना चाहिये… अक्षय-ट्विंकल तो फ़िर भी पति-पत्नी थे, रुड़की के ये छात्र तो पति-पत्नी नहीं हैं। राखी सावन्त या मल्लिका शेरावत टीवी पर ऐसी हरकतें करें तो उसे एक-दो बार "इग्नोर" किया जा सकता है लेकिन कॉलेज (वह भी कोई साधारण दो कौड़ी वाला नहीं, बल्कि IIT) के सांस्कृतिक कार्यक्रम में ऐसी बदनुमा हरकत!!!

3) यही तरीका उन लड़कियों के लिये भी अपनाया जा सकता है जो कि हो सकता है अपने बॉयफ़्रेण्ड की फ़जीहत देखकर उसके बचाव में आगे आयें, लेकिन विरोध का तरीका वही अदालत वाला ही…। वरना कई “पिंक चड्डियाँ” भी आप पर हमला करने को तैयार बैठी हैं।

भारतीय संस्कृति को गरियाने और लतियाने का यह उपक्रम काफ़ी समय से चला आ रहा है और इसमें अक्सर “रईसों की औलादें” शामिल होती हैं, चाहे मुम्बई की रेव पार्टियाँ हों, रात के 3 बजे दारु पीकर फ़ुटपाथ पर गरीबों को कुचलना हो, कॉलेज के सांस्कृतिक कार्यक्रम में कपड़े उतारना हो, या फ़िर एमटीवी मार्का “चुम्बन प्रतियोगिता”, “वक्ष दिखाओ प्रतियोगिता”, “नितम्ब हिलाओ प्रतियोगिता”…इत्यादि हो। परन्तु IIT के छात्रों द्वारा ऐसा छिछोरा मामला सार्वजनिक रुप से पहली बार सामने आया है जो कि गम्भीर बात है। फ़िर भी जैसा कि ऊपर कहा गया है, श्रीराम सेना जैसा मारपीट वाला तरीका अपनाने की बजाय, इन “हल्के” लोगों को न्यायालय में रगड़ो, देश के विभिन्न हिस्सों में पार्टी और संगठन के वकीलों की मदद से ढेर सारे केस दायर कर दो… फ़िर भले ही इन के बाप कितने ही पैसे वाले हों… जेसिका लाल को गोली मारने वाले बिगड़ैल रईसजादे मनु शर्मा की तरह जब एड़ियाँ रगड़ते अदालतों, थानों, लॉक-अप के चक्कर काटेंगे, तब सारी “पश्चिमी हवा” पिछवाड़े के रास्ते से निकल जायेगी…। ध्यान में रखने वाली सबसे प्रमुख बात यह है कि “कथित उदारतावादियों”, “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के कथित पक्षधरों”, “अश्लील से अश्लील बात को भी हमेशा भारतीय इतिहास और संस्कृति से जोड़ने वालों” इत्यादि की कतई परवाह न करो… ये भौंकते ही रहेंगे और मीडिया भी इन्हीं को अधिक कवरेज भी देगा।

फ़िर ऐसा भी नहीं है कि ABVP या विहिप को “इन जैसों” के खिलाफ़ आक्रामक रुख अपनाना ही नहीं चाहिये, जब पानी सिर के ऊपर से गुज़रने लगे तो इन पर और आसपास मौजूद कैमरों पर कम्बल ओढ़ाकर एकाध बार “जमकर सार्वजनिक अभिनन्दन” करने में कोई बुराई नहीं है। फ़िर भी कोई इस मुगालते में न रहे कि ये लोग मुन्ना भाई की तरह सिर्फ़ गुलाब भेंट करने से मान जायेंगे… गुलाब के नीचे स्थित चार-छः कांटों वाली संटी भी खास जगह पर पड़नी चाहिये…।


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