top left img
desiCNN - Items filtered by date: अक्टूबर 2009
केरल में कोचीन स्थित केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल (KCBC) के तहत काम करने वाले संगठन कमीशन फ़ॉर सोशल हारमोनी एण्ड विजिलेंस द्वारा जारी ताज़ा न्यूज़लेटर में केरल में चल रहे "लव जेहाद" और इसके धार्मिक दुष्प्रभावों के बारे में ईसाई समाज को जानकारी दी गई है।

अपने अनुयायियों में बाँटे गये इस न्यूज़लेटर के अनुसार पालकों को निर्देशित किया गया है कि केरल और कर्नाटक में "लव जेहाद" जारी है, जिसमें भोलीभाली लड़कियों को मुस्लिम लड़कों द्वारा फ़ाँसकर उन्हें शादी का भ्रमजाल दिखाकर धर्म परिवर्तन करवाया जा रहा है। बिशप काउंसिल ने आग्रह किया है कि पालक अपनी लड़कियों पर नज़र रखें, यदि लड़कियाँ मोबाइल उपयोग करती हैं तो उनके माता-पिता को उनकी इनकमिंग और आऊटगोइंग कॉल्स पर नज़र रखना चाहिये, यदि घर पर कम्प्यूटर हो तो वह "सार्वजनिक कमरे" में होना चाहिये, न कि बच्चों के कमरे में। पालकों को अपनी लड़कियों को ऐसे लड़कों के जाल में फ़ँसने से बचाव के बारे में पूरी जानकारी देना चाहिये। यदि कोई लड़की गुमसुम, उदास अथवा सभी से कटी-कटी दिखाई देने लगे तब तुरन्त उसकी गतिविधियों पर बारीक नज़र रखना चाहिये।
(यदि ऐसे दिशानिर्देश किसी हिन्दूवादी संगठन ने जारी किये होते, तो पता नहीं अब तक नारी संगठनों और न्यूज़ चैनलों ने कितनी बार आकाश-पाताल एक कर दिये होते)।



उल्लेखनीय है कि कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने एक ताज़ा आदेश में "लव जेहाद" के बारे में पूरी तथ्यात्मक जानकारी जुटाने के निर्देश दिये हैं (शायद हाईकोर्ट भी साम्प्रदायिक हो??)। एक अपुष्ट सूचना के अनुसार सन् 2005 से अब तक 4000 ईसाई लड़कियों द्वारा धर्म परिवर्तन किया जा चुका है, उनमें से कुछ गायब भी हो गईं। इस न्यूज़लेटर में आगे कहा गया है कि चूंकि वे लड़कियाँ 18 वर्ष से उपर की हैं इसलिये वे कानूनन इस बारे में कुछ कर भी नहीं सकते, लेकिन ईसाई लड़कियों की मुस्लिम लड़कों से बढ़ती दोस्ती निश्चित ही चिन्ता का विषय है।

इस कमीशन के सचिव फ़ादर जॉनी कोचुपराम्बिल कहते हैं कि "फ़िलहाल" यह मामला धार्मिक लड़ाई का नहीं लगता बल्कि यह एक सामाजिक समस्या लगती है…। यह लड़कियाँ अपने कथित प्यार की खातिर सब कुछ छोड़कर चली जाती हैं, लेकिन जल्दी ही उनके साथ यौन दुराचार शुरु हो जाता है तथा उनकी जिन्दगी नर्क बन जाती है, जहाँ उन्हें कोई आज़ादी नहीं मिलती (यह भी एक साम्प्रदायिक बयान लगता है…??)। जिस परिवार पर यह गुज़रती है, वह सामाजिक प्रतिष्ठा की वजह से कई बार पुलिस में भी नहीं जाता, जिसका फ़ायदा लव जेहादियों को मिलता है। न्यूज़लेटर में सन् 2006 से 2009 के बीच, विभिन्न जिलावार 2868 ईसाई लड़कियों के नाम-पते हैं जो मुस्लिम लड़कों के प्रेमजाल में फ़ँसीं, जिसमें से अकेले कासरगौड़ जिले की 586 लड़कियाँ शामिल हैं। फ़ादर कहते हैं कि "हमें यह मसला गम्भीरता से लेना होगा…"।

इन लव जेहादियों को शुरुआत में बाइक, मोबाइल तथा फ़ैशनेबल कपड़ों के पैसे दिये जाते हैं और "काम" सम्पन्न होने के बाद प्रति धर्मान्तरित लड़की एक लाख रुपये दिये जाते हैं। कॉलेजों में एडमिशन लेते समय इन्हें ऐसी ईसाई-हिन्दू लड़कियों की लिस्ट थमाई जाती है, जिन्हें आसानी से फ़ुसलाया जा सकता हो। इस काम में मुख्यतः खाड़ी देशों से पैसा आता है और सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि गायब हो चुकी लड़कियाँ वहीं पहुँचाई जा चुकी हैं।

सेकुलरों के साथ सबसे बड़ी समस्या यही है कि जब हिन्दुत्ववादी संगठन कुछ भी कहते हैं तो वे इसे दुष्प्रचार, साम्प्रदायिक झूठ आदि की संज्ञा दे देते हैं, समस्या को समस्या मानते ही नहीं, रेत में सिर दबाये शतुरमुर्ग की तरह पिछवाड़ा करके खड़े हो जाते हैं। लव जेहाद के बारे में सबसे पहले हिन्दुत्ववादी संगठनों ने ही आवाज़ उठाई थी, लेकिन हमेशा की तरह उसे या तो हँसी में टाला गया या फ़िर उपेक्षा की गई। अब आज जबकि कर्नाटक और केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश खुद इसकी जाँच के आदेश दे रहे हैं तब इनकी बोलती बन्द है। ईसाई संगठनों को भी इस लव जेहाद के अंगारे महसूस होने लगे तभी माना गया कि यह एक समस्या है, वरना हिन्दू संगठन कितना भी कहें कोई मानने वाला नहीं, सेकुलरों का यही रवैया उन्हें देशद्रोही की श्रेणी में रखता है। क्या आज से 50 साल पहले कश्मीर की स्थिति के बारे में किसी ने सोचा था कि वहाँ से हिन्दुओं का नामोनिशान मिट जायेगा? आज जब हिन्दूवादी संगठन असम, पश्चिम बंगाल और केरल के बदलते जनसंख्या आँकड़ों और राजनैतिक परिस्थितियों का हवाला देते हैं तब सेकुलर और कांग्रेसी इसे गम्भीरता से नहीं लेते, लेकिन कुछ वर्षों बाद ही वे इसे समस्या मानेंगे, जब स्थिति हाथ से निकल चुकी होगी… लानत है ऐसी सेकुलर नीतियों पर। हाल ही में "नक्सलवादियों की चैम्पियन बुद्धिजीवी"(?) अरुंधती रॉय ने बयान दिया कि "जब राज्य सत्ता किसी व्यक्ति की सुन ही नही रही हो, और उस पर अन्याय और अत्याचार जारी रहे तो उसका बन्दूक उठाना जायज़ है…", फ़िर तो इस हिसाब से कश्मीर के विस्थापित हिन्दुओं को सबसे पहले हथियार उठा लेना चाहिये था, क्या तब बुकर पुरस्कार विजेता उनका साथ देंगी? जी नहीं, बिलकुल नहीं, क्योंकि यदि हिन्दू "प्रतिकार" करे तो वह घोर साम्प्रदायिकता की श्रेणी में आता है, ऐसी गिरी हुई मानसिकता है इन सेकुलर लुच्चों-टुच्चों की। हिन्दुओं के साथ कोई अन्याय हो तो वह कानून-व्यवस्था का मामला है, हिन्दू लड़कियों के साथ लव जेहाद हो तो वह साम्प्रदायिक दुष्प्रचार है, और यदि मामला मुस्लिमों और ईसाई लड़कियों से जुड़ा हो तब वह या तो सेकुलर होता है अथवा हिन्दूवादी संगठनों का अत्याचार…

पिछली पोस्ट में मैंने भारत में ईसाई मुस्लिम संघर्ष की शुरुआत केरल से होगी इस बारे में कुछ बताया था, जिस पर आदरणीय शास्त्री जी अपना जवाब जारी रखे हुए हैं। इस जवाब की पहली किस्त में शास्त्री जी ने केरल की विशिष्ट परम्परा और धार्मिक समूहों के बीच भावनात्मक सम्बन्धों का सुन्दर चित्रण प्रस्तुत किया है, मुझे उम्मीद है कि शास्त्री जी केरल के तेजी से बदलते राजनैतिक और सामाजिक वातावरण पर भी लिखेंगे। शास्त्री जी सज्जन व्यक्ति हैं इसलिये हो सकता है कि शायद उन्होंने मेरी पोस्ट में उल्लिखित केरल के राजनैतिक वातावरण को नज़र-अंदाज़ कर दिया हो, लेकिन मुझे आशा है कि शास्त्री जी, केरल में अब्दुल नासेर मदनी के बढ़ते प्रभाव, उम्मीदवार चयन में "चर्च के दखल" और कन्नूर तथा अन्य जगहों पर संघ कार्यकर्ताओं की नृशंस हत्याओं तथा इन सारी घटनाओं के दूरगामी प्रभाव के सम्बन्ध में भी कुछ अवश्य लिखेंगे, जो कि मेरा मूल आशय था। फ़िलहाल शास्त्री जी पहले अपना लेख पूरा कर लें, फ़िर मैं बाद में कुछ कहूंगा, तब तक के लिये केरल के हालात पर यह एक छोटी सी पोस्ट है। मैं शास्त्री जी जितना सज्जन नहीं हूं, इसलिये मुझे प्रत्येक राजनैतिक घटना को थोड़ा "टेढ़ा" देखने की आदत है, साथ ही किसी बुरी नीयत से किये गये "तथाकथित अच्छे काम" को भाँपने की भी… बहरहाल केरल के राजनैतिक हालातों पर एक अन्य विस्तृत पोस्ट शास्त्री जी के लेख समाप्त होने के बाद लिखूंगा…

फ़िलहाल केरल और ईसाई धर्मान्तरण से सम्बन्धित मेरे कुछ अन्य लेखों की लिंक्स नीचे दी जा रही है, पढ़ें और बतायें कि इसमें से आपको कितना काल्पनिक लगता है और कितना तथ्यहीन… :)

http://desicnn.com/wp/2009/04/13/talibanization-kerala-congress-and_13/


http://desicnn.com/wp/2009/04/09/talibanization-kerala-congress-and/


http://desicnn.com/wp/2008/11/17/kerala-and-malwa-becoming-nursery-of/


http://desicnn.com/wp/2008/10/10/alliance-between-church-and-naxalites_10/


http://desicnn.com/wp/2008/09/29/pope-conversion-in-india/



इस खबर की स्रोत साइटें…

http://expressbuzz.com/edition/story.aspx?Title=Watch+your+children+well:+KCBC+panel&artid=ApAxX8jXX54=&SectionID=1ZkF/jmWuSA=&MainSectionID=1ZkF/jmWuSA=&SEO=KCBC,+Fr+Johny+Kochuparambil,+jehadis,+Christian&SectionName=X7s7i%7CxOZ5Y=

http://in.christiantoday.com/articles/church-warns-of-love-jihad-in-kerala/4623.htm

http://mangalorean.com/news.php?newstype=broadcast&broadcastid=152084

चित्र साभार - द टेलीग्राफ़

Love Jihad, Love Jehad, Kerala, Christianity, Conversion, Islamic Terrorism, Secularism, Vote Bank Politics in India, KCBC Newsletter, Abdul Naser Madani, लव जेहाद, केरल की राजनैतिक स्थितियाँ, ईसाई धर्मान्तरण और केरल, मुस्लिम-ईसाई संघर्ष, सेकुलरिज़्म, केसीबीसी न्यूज़लेटर, Blogging, Hindi Blogging, Hindi Blog and Hindi Typing, Hindi Blog History, Help for Hindi Blogging, Hindi Typing on Computers, Hindi Blog and Unicode
Published in ब्लॉग
हम सभी ने अपने-अपने शहरों में सड़कों, गलियों और बस-स्टैण्ड, रेल्वे स्टेशनों आदि कई जगह अनाथ, लेकिन पागल और अर्धविक्षिप्त लोगों को हमेशा देखा है। कभी-कभार दया दिखाये हुए हम उनको कुछ खाने को दे देते हैं, लेकिन मनुष्य के शरीर को भूख तो जीवन भर ही लगती है, सुबह-शाम लगती है, चाहे वह अमीर हो या गरीब, बुद्धिमान हो या अर्धविक्षिप्त। हम कभी भी इस बात पर विचार नहीं करते कि आखिर शहर भर में फ़ैले ऐसे भिखारियों (जो कि हट्टे-कट्टे और भले-चंगे नहीं, बल्कि जिनका मानसिक सन्तुलन खोया हुआ है) को रोज खाना कैसे मिलता होगा? सुबह-शाम वे क्या खाते होंगे? जो "प्रोफ़ेशनल भिखारी" (जी हाँ, प्रोफ़ेशनल) हैं, वे तो घूम-घूम कर माँगकर शाम तक आराम से इतना पैसा एकत्रित कर लेते हैं कि खाने के अलावा दारू भी पी सकें, लेकिन ऐसे अर्ध अथवा पूर्ण विक्षिप्त बेसहारा लोगों के बारे में क्या, जो ठीक से बोल भी नहीं पाते, अथवा एक जगह से दूसरी जगह चलकर जाने में उन्हें बेहद तकलीफ़ होती है, उनका गुज़ारा कैसे होता होगा?




यही सारे प्रश्न मदुराई के एक युवक एन कृष्णन के दिमाग में उठते थे, लेकिन उसने वह कर दिखाया जो कई लोग या तो सोच ही नहीं पाते, अथवा सिर्फ़ सोचकर रह जाते हैं। मदुराई का यह कर्मठ महात्मा, पिछले सात साल से रोज़ाना दिन में तीन बार शहर में घूम-घूमकर ऐसे रोगियों, विक्षिप्तों और बेसहारा लोगों को खाना खिलाता है। मात्र 30 वर्ष की उम्र में "अक्षयपात्र" नामक ट्रस्ट के जरिये वे यह सेवाकार्य चलाते हैं।




अक्षयपात्र ट्रस्ट की रसोई में झांककर जब हम देखते हैं, तो पाते हैं कि चमचमाते हुए करीने से रखे बर्तन, शुद्ध दाल, चावल, सब्जियाँ और मसाले… ऐसा लगता है कि हम किसी 5 सितारा होटल के किचन में हैं, और हो भी क्यों ना, आखिर एन कृष्णन बंगलोर के एक 5 सितारा होटल के "शेफ़" रह चुके हैं (इतने बड़े होटल के शेफ़ की तनख्वाह जानकर क्या करेंगे)। कृष्णन बताते हैं कि आज सुबह उन्होंने दही चावल तथा घर के बने अचार का मेनू तय किया है, जबकि शाम को वे इडली-सांभर बनाने वाले हैं… हम लोग भी तो एक जैसा भोजन नहीं खा सकते, उकता जाते हैं, ऐसे में क्या उन लोगों को भी अलग-अलग और ताज़ा खाना मिलने का हक नहीं है?"। कृष्णन की मदद के लिये दो रसोईये हैं, तीनों मिलकर नाश्ता तथा दोपहर और रात का खाना बनाते हैं, और अपनी गाड़ी लेकर भोजन बाँटते हैं, न सिर्फ़ बाँटते हैं बल्कि कई मनोरोगियों और विकलांगों को अपने हाथ से खिलाते भी हैं।



कृष्णन कहते हैं कि "मैं साधारण भिखारियों, जो कि अपना खयाल रख सकते हैं उन्हें भोजन नहीं करवाता, लेकिन ऐसे बेसहारा जो कि विक्षिप्त अथवा मानसिक रोगी हैं यह हमसे पैसा भी नहीं मांगते, और न ही उन्हें खुद की भूख-प्यास के बारे में कुछ पता होता है, ऐसे लोगों के लिये मैं रोज़ाना भोजन ले जाता हूं"। चौराहों, पार्कों और शहर के विभिन्न ठिकानों पर उनकी मारुति वैन रुकती है तो जो उन्हें नहीं जानते ऐसे लोग उन्हें हैरत से देखते हैं। लेकिन "पेट की भूख और कृष्णन द्वारा दिये गये मानवीय संवेदना के स्पर्श" ने अब मानसिक रोगियों में भी इतनी जागृति ला दी है कि वे सफ़ेद मारुति देखकर समझ जाते हैं कि अब उन्हें खाना मिलने वाला है। कहीं-कहीं किसी व्यक्ति की हालत इतनी खराब होती है कि वह खुद ठीक से नहीं खा सकता, तब कृष्णन उसे अपने हाथों से खिलाते हैं। कृष्णन बताते हैं कि उन्होंने ऐसे कई बेसहारा मानसिक रोगी भी सड़कों पर देखे हैं, जिन्होंने 3-4 दिन से पानी ही नहीं पिया था, क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था पानी कहाँ मिलेगा, और पीने का पानी किससे और कैसे माँगा जाये।

इतना पुण्य का काम करने के बावजूद भोजन करने वाला व्यक्ति, कृष्णन को धन्यवाद तक नहीं देता, क्योंकि उसे पता ही नहीं होता कि कृष्णन उनके लिये क्या कर रहे हैं। सात वर्ष पूर्व की वह घटना आज भी उन्हें याद है जब कृष्णन अपने किसी काम से मदुराई नगर निगम आये थे और बाहर एक पागल व्यक्ति बैठा अपना ही मल खा रहा था, कृष्णन तुरन्त दौड़कर पास की दुकान से दो इडली लेकर आये और उसे दीं… जब उस पागल ने उसे खाया अचानक उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आई… कृष्णन कहते हैं कि "उसी दिन मैंने निश्चय कर लिया कि अब ऐसे लोगों के लिये भोजन की व्यवस्था मुझे ही करना है, उस भूखे पागल के चेहरे पर आई हुई मुस्कुराहट ही मेरा धन्यवाद है, मेरा मेहनताना है…"।



इस सारी प्रक्रिया में कृष्णन को 12,000 रुपये प्रतिदिन का खर्च आता है (भोजन, सब्जियाँ, रसोईयों की तनख्वाह, मारुति वैन का खर्च आदि)। वे कहते हैं कि अभी मेरे पास 22 दिनों के लिये दानदाता मौजूद हैं जो प्रतिमाह किसी एक तारीख के भोजन के लिये 12,000 रुपये रोज भेजते हैं, कुछ रुपया मेरे पास सेविंग है, जिसके ब्याज आदि से किसी तरह मेरा काम 7 साल से लगातार चल रहा है। इन्फ़ोसिस और TVS कम्पनी ने उन्हें 3 एकड़ की ज़मीन दी है, जिस पर वे ऐसे अनाथ लोगों के लिये एक विश्रामगृह बनवाना चाहते हैं। सात साल पहले का एक बिल दिखाते हुए कृष्णन कहते हैं कि "किराने का यह पहला बिल मेरे लिये भावनात्मक महत्व रखता है, आज भी मैं खुद ही सारा अकाउंट्स देखता हूं और दानदाताओं को बिना माँगे ही एक-एक पैसे का हिसाब भेजता हूं। आर्थिक मंदी की वजह से दानदाताओं ने हाथ खींचना शुरु कर दिया है, लेकिन मुझे बाकी के आठ दिनों के लिये भी दानदाता मिल ही जायेंगे, ऐसा विश्वास है"। इलेक्ट्रानिक मीडिया में जबसे उन्हें कवरेज मिला और कुछ पुरस्कार और सम्मान आदि मिले तब से उनकी लोकप्रियता बढ़ गई, और उन्हें अपने काम के लिये रुपये पैसे की व्यवस्था, दान आदि मिलने में आसानी होने लगी है।



ऐसा नहीं कि कृष्णन का एक यही काम है, मदुरै में पुलिस द्वारा जब्त की गई लावारिस लाशों का अन्तिम संस्कार भी वे करते हैं। नगर निगम, सरकारी अस्पताल और पुलिस उन्हें सूचित करते हैं और वे उन लावारिस मुर्दों को बाकायदा नहला-धुलाकर उनका अन्तिम संस्कार करते हैं।

कृष्णन अभी तक अविवाहित हैं, और उनकी यह शर्त है कि जिसे भी मुझसे शादी करना हो, उसे मेरा यह जीवन स्वीकार करना होगा, चाहे किसी भी तरह की समस्याएं आयें। कृष्णन मुस्कराते हुए कहते हैं कि "…भला ऐसी लड़की आसानी से कहाँ मिलेगी, जो देखे कि उसका पति दिन भर दूसरों के लिये खाना बनाता रहे और घूम-घूमकर बाँटता रहे…"। प्रारम्भ में उनके माता-पिता ने भी उनकी इस सेवा योजना का विरोध किया था, लेकिन कृष्णन दृढ़ रहे, और अब वे दोनों इस काम में उनका हाथ बँटाते हैं, इनकी माँ रोज का मेनू तैयार करती है, तथा पिताजी बाकी के छोटे-मोटे काम देखते हैं। पिछले 7 साल में गर्मी-ठण्ड-बारिश कुछ भी हो, आज तक एक दिन भी उन्होंने इस काम में रुकावट नहीं आने दी है। जून 2002 से लेकर अक्टूबर 2008 तक वे आठ लाख लोगों को भोजन करवा चुके थे।

रिश्तेदार, मित्र और जान-पहचान वाले आज भी हैरान हैं कि फ़ाइव स्टार के शेफ़ जैसी आलीशान नौकरी छोड़कर उन्होंने ऐसा क्यों किया, कृष्णन का जवाब होता है… "बस ऐसे ही, एक दिन अन्दर से आवाज़ आई इसलिये…"।

कृष्णन जैसे लोग ही असली महात्मा हैं, जिनके काम को भरपूर प्रचार दिया जाना चाहिये, ताकि "समाज की इन अगरबत्तियों" की सुगन्ध दूर-दूर तक फ़ैले, मानवता में लोगों का विश्वास जागे, तथा यह भावना मजबूत हो कि दुनिया चाहे कितनी भी बुरी बन चुकी हो, अभी भी ऐसा कुछ बाकी है कि जिससे हमें संबल मिलता है।

अधिक जानकारी के लिये log on to: http://www.akshayatrust.org/

समाज के ऐसे ही कुछ अन्य लोगों के बारे मे मेरे निम्न लेख भी पढ़ सकते हैं…

http://desicnn.com/wp/2009/10/09/dedicated-doctor-koelhe-at-gadhchiroli/



http://desicnn.com/wp/2008/07/19/social-service-medical-equipments/


http://desicnn.com/wp/2009/06/29/unnoticed-unsung-heroes-of-india/

Akshay Patra, Madurai, Madurai Tourism, Madurai Social Service, अक्षयपात्र ट्रस्ट, मदुरै, मदुरै समाजसेवा, मदुरई पर्यटन, Blogging, Hindi Blogging, Hindi Blog and Hindi Typing, Hindi Blog History, Help for Hindi Blogging, Hindi Typing on Computers, Hindi Blog and Unicode
Published in ब्लॉग
केरल, भारत का प्राकृतिक रूप से सम्पन्न एक खूबसूरत प्रदेश, जहाँ समुद्र का “बैकवाटर” इसे भारत का वेनिस कहे जाने को मजबूर कर देता है, कुछ ही वर्षों में एक भयानक संघर्ष की भूमि बन जाने को अभिशप्त लगने लगा है। लगभग आज़ादी के बाद से ही यहाँ दो प्रमुख गठबन्धन शासन में रहे हैं, कांग्रेस गठबन्धन और वामपंथी गठबन्धन। हमेशा से इन गठबन्धनों में चर्च और मुस्लिम लीग की भूमिका हमेशा अहम रही है, उम्मीदवारों के चयन से लेकर सरकार की नीतियों को प्रभावित करने तक में। आज की तारीख में केरल में अर्थव्यवस्था, शिक्षा, कृषि, ग्रामीण और शहरी भूमि, वित्तीय संस्थानों और सरकार के सत्ता केन्द्रों में ईसाईयों और मुसलमानों का वर्चस्व और बोलबाला है। यदि सरकार, निगमों, अर्ध-सरकारी संस्थानों, विश्वविद्यालयों और सरकारी नियन्त्रण में स्थापित उद्योगों में कर्मचारियों का अनुपात देखें तो साफ़ तौर पर चर्च और मुस्लिम-लीग का प्रभाव दिखाई देता है।

खाडी के देशों से आने वाले पैसे (चाहे वह वहाँ काम करने वाले मलयाली लोगों ने भेजे हों अथवा मुस्लिम लीग और मदनी को चन्दे के रूप में मिले हों) ने समूचे केरल में जिस प्रकार की अर्थव्यवस्था खड़ी कर दी है, उसमें हिन्दुओं की कोई भूमिका अब नहीं बची है। ज़ाहिर है कि यह स्थिति कोई रातोंरात निर्मित नहीं हो गई है, गत 60 साल से दोनों गठबन्धनों के राजनेताओं और विदेशी पैसे का उपयोग करके चर्च और मुस्लिम लीग ने अपनी ज़मीन मजबूत की है। लोकतन्त्र के दायरे में रहकर किस प्रकार अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को लागू करना है यह चर्च और मुस्लिम लीग से सीखना चाहिये, उम्मीदवार चयन से ही उनका दखल प्रारम्भ हो जाता है, विदेश से चर्च के लिये तथा खाड़ी देशों से मुस्लिम लीग के लिये भारी मात्रा में आया हुआ पैसा इसमें महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है, इनके चुने हुए उम्मीदवार जीतने के बाद इन्हीं की जी-हुजूरी करते हैं इसमें कहने की कोई बात ही नहीं है। समूचे केरल में हिन्दू (पूरे देश की तरह ही) बिखरे हुए और असंगठित हैं, उनके पास चुनाव में वोट देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, न ही नीति-निर्माण में उनकी कोई बात सुनी जाती है, न ही उनकी समस्याओं के निराकरण में। केरल में हिन्दुओं की कोई "राजनैतिक ताकत" नहीं है [देश में ही नहीं है], जल्दी ही पश्चिम बंगाल और असम भी इसी रास्ते पर कदम जमा लेंगे, जहाँ हिन्दुओं की कोई सुनवाई नहीं होगी (कश्मीर तो काफ़ी समय पहले ही हिन्दुओं को लतियाकर भगा चुका है)।

फ़िलहाल केरल में जनसंख्या सन्तुलन की दृष्टि से देखें तो लगभग 30% ईसाई, लगभग 30% मुस्लिम और 10% हिन्दू हैं, बाकी के 30% किसी धर्म के नहीं है यानी वामपंथी है (यानी बेपेन्दे के लोटे हैं) जो जब मौका मिलता है, जिधर फ़ायदा होता उधर लुढ़क जाते हैं चाहे चुनावों में मदनी जैसे धर्मनिरपेक्ष(?) का साथ देना हो अथवा चर्च से चन्दा ग्रहण करना हो। केरल में मलाबार देवासोम कानून हो (http://www.thehindu.com/2009/07/25/stories/2009072552860300.htm) अथवा सबरीमाला के मन्दिर के प्रबन्धन का नियन्त्रण अपने हाथ में लेना हो, सारे कानून और अधिसूचनायें ईसाई और मुस्लिम अधिकारी/विधायक मिलजुलकर पास कर लेते हैं। वामपंथी दोगलेपन की हद देखिये कि इन्हें हिन्दू मन्दिरों से होने वाली आय में से राज्य के विकास के लिये हिस्सा चाहिये, लेकिन चर्च अथवा मदरसों को मिलने वाले चन्दे के बारे में कभी कोई हिसाब नहीं मांगा जाता। यही दोगलापन बंगाल में नवरात्र के दौरान काली पूजा के पांडालों में अपने-आप को “नास्तिक” कहने और धर्म को “अफ़ीम” का दर्जा देने वाले वामपंथी नेताओं की उपस्थिति से प्रदर्शित होता है। धीरे-धीरे देश के कई मन्दिरों का प्रबन्धन और कमाई सरकारों ने अपने हाथ में ले ली है और इस पैसे का उपयोग मदरसों और चर्च को अनुदान देने में भी किया जा रहा है। आज की तारीख में केरल विधानसभा का एक भी विधायक खुलेआम हिम्मत से “हाँ, मैं हिन्दू हूँ…” कहने की स्थिति में नहीं है। ग्रामीण और शहरी इलाकों में कालोनियाँ और सोसायटी चलाने वाले ईसाई-मुस्लिम गठजोड़ को आसानी से कौड़ियों के दाम ज़मीन मिल जाती है। हिन्दुओं के पक्ष में आवाज़ उठाने वाले हिन्दू मुन्नानी, विश्व हिन्दू परिषद एवं संघ कार्यकर्ताओं पर मराड (http://en.wikipedia.org/wiki/Marad_massacre) तथा कन्नूर (http://www.rediff.com/news/2008/jan/13kannur.htm) जैसे रक्तरंजित हमले किये जाते हैं और पुलिस आँखें मूंद कर बैठी रहती है, क्योंकि हिन्दू न तो संगठित हैं न ही “वोट बैंक”। केरल से निकलने वाले 14 प्रमुख अखबारों में से सिर्फ़ एक अखबार मालिक हिन्दू है, जबकि केबल नेटवर्क के संगठन पर माकपा के गुण्डे कैडर का पूर्ण कब्जा है।

यह तो हुई आज की स्थिति, भविष्य की सम्भावना क्या बनती है इस पर भी एक निगाह डाल लें। यह बात सर्वविदित है कि धर्मान्तरण में चर्च और विदेशी पैसे की भूमिका बेहद अहम है, लेकिन भारत में मुसलमानों के मुकाबले ईसाइयों ने अधिक चतुराईपूर्ण तरीके से धर्म-परिवर्तन करके अपनी जनसंख्या बढ़ाने का काम किया है। जहाँ एक तरफ़ मुस्लिमों ने अपनी खुद की आबादी बढ़ाकर, पाकिस्तानी या बांग्लादेशियों की मदद से अथवा जोर-जबरदस्ती से धर्म परिवर्तन और जनसंख्या बढ़ाई वहीं दूसरी ओर ईसाई अधिक चालाक हैं, पहले उन्होंने स्वास्थ्य और शिक्षा संस्थानों के जरिये समाज में अपनी “इमेज” एक मददगार के रूप में मजबूत की (इस इमेज निर्माण में उन्हीं द्वारा दिये गये पैसों पर पलने वाले मीडिया का रोल प्रमुख रहा)। गाँव-गाँव तथा जंगलों के आदिवासी इलाकों में पहले अस्पताल और शिक्षा संस्थान खोलकर चर्च की इमेज बनाई गई। फ़िर अगले चरण में कभी बहला-फ़ुसलाकर तो कभी धन का लालच देकर गरीबों और आदिवासियों द्वारा चुपके से ईसाई धर्म स्वीकार करवा लिया। मुसलमानों की तरह ईसाईयों ने धर्म परिवर्तित व्यक्ति का नाम बदलने की जिद भी नहीं रखी (जैसे कि बहुत से लोगों को तब तक पता नहीं था कि YS राजशेखर रेड्डी एक ईसाई हैं, जब तक कि उनको दफ़नाने की प्रक्रिया शुरु नहीं हुई, इसी प्रकार उनका दामाद अनिल, कट्टर एवेंजेलिकल ईसाई है और दोनों ने मिलकर तिरुपति मन्दिर के आसपास चर्चों का जाल बिछा दिया हैं)। इस्लाम ग्रहण करते ही यूसुफ़ योहाना को मोहम्मद यूसुफ़ अथवा चन्द्रमोहन को चांद मोहम्मद बनना पड़ा हो, लेकिन ईसाईयों ने हिन्दू नाम यथावत ही रहने दिये (एक रणनीति के तहत फ़िलहाल ही), जैसे अनिल विलियम्स, मनीषा जोसफ़, विनय जॉर्ज आदि, बल्कि कहीं-कहीं तो पूरा का पूरा नाम ही हिन्दू है, लेकिन असल में वह ईसाई बन चुका होता है। चर्च ने शुरुआती तौर पर धर्म-परिवर्तित लोगों को घरों से हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र निकाल फ़ेंकने पर भी ज़ोर नहीं दिया है, बस “पवित्र जल” छिड़ककर, दुर्गा मैया के फ़ोटो के पास ही बाइबल और क्रास भी रख छोड़ा है।


“फ़िलहाल” का मतलब यह है कि धर्म परिवर्तन करवाने वाले ईसाई संगठनों को अच्छी तरह पता है कि भले ही वह व्यक्ति इस पीढ़ी में “विनय जॉर्ज” रहे, और दुर्गा और बाइबल दोनों को एक साथ रखे रहे, लेकिन उसके लगातार चर्च में आने, और चर्च साहित्य पढ़ने से उसकी अगली पीढ़ी निश्चित ही “विन्सेंट जॉर्ज” होगी, और एक बार किसी खास इलाके, क्षेत्र या राज्य का जनसंख्या सन्तुलन चर्च के पक्ष में हुआ कि उसके बाद ही तीसरा चरण आता है जोर-जबरदस्ती करने, अलग राज्य की मांग करने और भारत सरकार को आँखें दिखाने का (उदाहरण त्रिपुरा, नागालैंड और मिजोरम)। कहने का तात्पर्य यह कि ईसाई संगठन और चर्च, मुसलमानों के मुकाबले बहुत अधिक शातिर तरीके और ठण्डे दिमाग से काम ले रहे हैं। कश्मीर में इस्लाम के नाम पर, हिन्दुओं को लतियाकर और भगाकर, जो स्थिति जोर-जबरदस्ती से बनाई गई है, लगभग अब वैसा ही कुछ उत्तर-पूर्व के राज्यों में ईसाईयत के नाम पर होने जा रहा है, जहाँ कम से कम 20 उग्रवादी संगठनों को चर्च का खुला संरक्षण हासिल है। प्रथम अश्वेत आर्चबिशप डेसमंड टूटू का वह बहुचर्चित बयान याद करें, जिसमें उन्होंने कहा था कि “जब अफ़्रीका में चर्च आया तब हमारे पास ज़मीन थी और उनके पास बाइबल। चर्च ने स्थानीय आदिवासियों से कहा आँखें बन्द करके प्रभु का ध्यान करो, चंगाई होगी… और जब हमने आँखें खोलीं तब हमारे हाथ में सिर्फ़ बाइबल थी, सारी ज़मीन उनके पास…”।

(भारत में हिन्दुओं के बीच फ़ैल रहे "जागरण", यानी उड़ीसा, गुजरात और तमिलनाडु की घटनाओं, से पोप चिंतित क्यों हैं इसके लिये मेरा एक लेख यहाँ क्लिक करके पढ़ें http://desicnn.com/wp/2008/09/29/pope-conversion-in-india/)

केरल में अगले कुछ वर्षों में यही स्थिति बनने वाली है कि हिन्दू जो कि पहले ही कमजोर हो चुके हैं, लगभग बाहर धकियाये जा चुके होंगे तथा “सत्ता पर पकड़” और अपना “वर्चस्व” स्थापित करने के लिये मुस्लिमों और चर्च के बीच संघर्ष होगा। ऐसी स्थिति में वामपंथियों को “किसी एक” का साथ देने के लिये मजबूर होना ही पड़ेगा। क्योंकि दोनों ही धर्म भले ही अपने-आप को कितना ही “सेवाभावी” या “परोपकारी” बतायें, विश्व का ताजा इतिहास बताता है कि सबसे अधिक संघर्ष इन्हीं दो धर्मों के बीच हुआ है, कोई इसे “जेहाद” का नाम देता है, कोई इसे “क्रूसेड” का। जो भी धर्म जहाँ भी बहुसंख्यक हुआ है वहाँ उसने “अल्पसंख्यकों” पर अत्याचार ही किये हैं, हिन्दू धर्म को छोड़कर। भारत से यदि किसी राज्य को अलग करना हो, तो सबसे आसान तरीका है कि उस राज्य में साम-दाम-दंड-भेद की नीतियाँ अपना कर हिन्दुओं को अल्पसंख्यक बना दो, बस अपने-आप अलगाववादी मांग उठने लगेगी, और यह केवल संयोग नहीं हो सकता कि पश्चिम बंगाल और असम दोनों सीमावर्ती राज्य हैं, जहाँ मुस्लिम-ईसाई आबादी की तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। केरल भी इसी रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहा है, सिर्फ़ यह देखना बाकी है कि केरल के इस ईसाई-मुस्लिम संघर्ष की स्थिति में जीत किसकी होती है, क्योंकि वैसे भी हिन्दुओं ने आज तक देखते और सहते रहने के अलावा किया भी क्या है?

=================

Christian Muslim Infighting in Kerala, Conversion in Kerala, Arab Money to Muslims in Kerala, Devasom Trust Law, Sabrimala Temple, Hindus in Kerala, Kashmir and Assam, Jehad and Crusade in India, Tourism in Kerala, ईसाई मुस्लिम संघर्ष केरल से, केरल में धर्मान्तरण, केरल के मुस्लिम और अरब देशों का पैसा, देवासोम ट्रस्ट कानून, सबरीमाला मन्दिर, केरल, कश्मीर और असम में हिन्दुओं की स्थिति, जेहाद और क्रूसेड, मराड नरसंहार, केरल पर्यटन, Blogging, Hindi Blogging, Hindi Blog and Hindi Typing, Hindi Blog History, Help for Hindi Blogging, Hindi Typing on Computers, Hindi Blog and Unicode
Published in ब्लॉग
राज ठाकरे को महाराष्ट्र की राजनीति का एक "नया धूमकेतु" कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन एक बात तो तय है कि बाल ठाकरे की जवानी के दिनों को यदि हूबहू कोई दर्शाता है तो वह भतीजा राज ही है, बेटा उद्धव नहीं। जिन लोगों ने बाल ठाकरे को एक समय मुम्बई पर एकछत्र राज्य करते देखा है, उनके आग उगलते भाषण सुने हैं, उनका खास "मैनरिज़्म", अंदाज़ और डायलॉग देखे हैं, वे लोग पहली ही नज़र में राज ठाकरे से प्रभावित हो सकते हैं। वैसी ही दुबली-पतली कद काठी, चश्मे का अन्दाज़ भी लगभग वैसा ही, बोलने और भीड़ को आकर्षित करने के लिये लगने वाले मैनरिज़्म भी हूबहू वही… बदला है तो सिर्फ़ पहनावा… बाल ठाकरे भगवे कपड़े अधिक पहनते थे, जबकि राज ठाकरे अधिकतर काली पैंट-सफ़ेद शर्ट या सफ़ेद कुर्ते पाजामे में होते हैं…


महाराष्ट्र के चुनावों में राज ठाकरे चुनावी मंचों से जैसा और जो गरज रहे हैं उसकी एक बानगी देखिये -

1) क्या आपने देश के गृहमंत्री पी चिदम्बरम को देखा है, वह अधिकतर भारतीय वेशभूषा अर्थात परम्परागत लुंगी और मुण्डू पहने दिखाई देते हैं, वे जब भी बोलते हैं या तो अंग्रेजी बोलते हैं या तमिल बोलते हैं… ऐसा क्यों?

2) रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपना सारा काम बंगाली में लिखा लेकिन उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला…

3) जब मुम्बई में कुछ टैक्सियाँ फ़ोड़ी जाती हैं तब देश में ऐसा हल्ला मचता है मानो देश जलने लगा हो, जबकि असम में इससे दस गुना होने पर भी कोई खबर नहीं बनती…

4) सत्यजीत रे की अधिकतर फ़िल्में बंगाली में हैं, फ़िर भी उन्हें ऑस्कर मिला…

फ़िर वे बरसते हैं… "तो फ़िर ऐ मराठियों, तुम्हें मराठी बोलने-लिखने में क्या परेशानी है? ऐसा क्यों होता है कि कोई भी बाहरी आदमी, जिसे मराठी नहीं आती तुम्हारा महापौर, विधायक, सांसद, मंत्री बन सकता है, क्या तुम लोगों को शर्म नहीं आती? रजनीकान्त भी तमिल नहीं है, इसलिये उसे वहाँ की राजनीति में कूदने के बारे में दस बार सोचना पड़ता है… फ़िर सारा ठीकरा मराठियों के माथे पर ही क्यों? मराठी अस्मिता के बारे में बात करके क्या मैं गुनाह करता हूं?" यह सुनकर युवाओं की भीड़ उत्तेजित हो जाती है…

महाराष्ट्र से बाहर रहने वालों तथा मेरे और आप जैसे लोगों को यह भाषणबाजी भले ही बकवास और भड़काऊ लगे, लेकिन राज ठाकरे वहाँ के बेरोजगार युवकों पर अपना असर छोड़ने में कामयाब हो जाते हैं। राज ठाकरे अपने भाषणों में महाराष्ट्र के लिये कोई योजना पेश नहीं करते, न ही विकास अथवा ग्रामीण उत्थान की बात बताते हैं… वे अपने भाषणों में सोनिया गाँधी की नकल उतारते हैं, विलासराव देशमुख और अशोक चव्हाण की खिल्ली उड़ाते हैं, मराठियों को केन्द्र और राज्य में उचित सम्मान न दिलाने के कारण महाराष्ट्र के पुराने नेताओं को लताड़ते हैं, भीड़ नारे लगाती है, तालियाँ पीटती है… सिर्फ़ एक बात ध्यान देने वाली है कि राज ठाकरे शिवसेना, उद्धव और कई अन्य वरिष्ठ नेताओं की आलोचना करते हैं, उनकी हँसी उड़ाते हैं, लेकिन बाल ठाकरे के विरुद्ध आज तक उन्होंने हमेशा सम्मान की भाषा में बात की है, भले ही बाल ठाकरे ने उन्हें "मराठियों का जिन्ना" कहा हो।

इस सबके मायने क्या हैं? राज की सभाओं में उमड़ने वाली भीड़ को देखकर सबसे अधिक परेशानी सेना-भाजपा गठबन्धन को हो रही है, क्योंकि राज ठाकरे को जो भी वोट मिलेंगे इन्हीं के वोटों से मिलेंगे, अर्थात राज ठाकरे, कांग्रेस का रास्ता आसान बना रहे हैं। सवाल उठता है कि राज की सभाओं में उन्हें सुनने के लिये उमड़ने वाली भीड़ क्या वोटों में तब्दील हो पायेगी? क्योंकि हाल के आंध्रप्रदेश के चुनाव में हमने देखा कि वहाँ के सुपरस्टार चिरंजीवी को सुनने-देखने के लिये लाखों की भीड़ जुटती थी, लेकिन उन्हें वोट नहीं मिले और चुनिंदा सीटें ही मिलीं। संयोग देखिये कि चिरंजीवी और राज ठाकरे दोनों को चुनाव चिन्ह "रेल का इंजन" ही मिला है। अगर लोकसभा चुनावों के आँकड़े देखें, तो साफ़ ज़ाहिर होता है कि राज ठाकरे, शिवसेना को नुकसान पहुँचाने में सफ़ल हो रहे हैं, इसीलिये बुढ़ापे में प्रचार से दूर रहने का इरादा जताने के बावजूद बालासाहेब अपने पुत्रमोह के कारण अब "सामना" में लिख भी रहे हैं, सीडी के जरिये भाषण भी दे रहे हैं।

जैसे-जैसे वक्त बीत रहा है, तथा राज ठाकरे आक्रामक होते जा रहे हैं, उससे अब कांग्रेस की भी परेशानी बढ़ती जा रही है, कांग्रेस को लगने लगा है कि हमारा ही खड़ा किया हुआ "बिजूका", कहीं हमारा ही नुकसान न कर दे। इस आशंका की एक वजह, राज ठाकरे द्वारा प्रचार के अन्तिम दिनों में सोनिया पर अधिकाधिक हमला बोलना है। राज ठाकरे के लिये भी यह चुनाव उसके "राजनैतिक कैरियर" का सबसे बड़ा दांव है, और वह यह बात जानते भी हैं, इसीलिये वे और भी उग्र हो रहे हैं। राज ठाकरे मजाकिया अंदाज में कहते हैं कि "…आंध्रप्रदेश में कांग्रेसी मुख्यमंत्री के चले जाने से लोग आत्महत्याएं कर रहे हैं, जबकि महाराष्ट्र में लोग कांग्रेसी मुख्यमंत्री बना हुआ है इसलिये आत्महत्याएं कर रहे हैं…"। अपनी हर सभा के अन्त में वे एक कागज़ दिखाते हैं जिसमें राज्य के नासिक, मुम्बई, जलगाँव, ठाणे आदि जिलों में महाराष्ट्र सरकार के अधिकृत आंकड़ों के अनुसार बिहार, उत्तरप्रदेश और बांग्लादेश से आये हुए बाहरी लोगों की संख्या दिखाई गई है, और वे जाते-जाते युवाओं को भड़का जाते हैं कि "ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन तुम्हारी भाषा, संस्कृति, अस्मिता खतरे में पड़ जायेगी…"।

13 अक्टूबर को महाराष्ट्र में मतदान होगा, सभी का भाग्य मशीनों में बन्द हो जायेगा, लेकिन यदि परिणामों की सम्भावनाओं पर एक नज़र डालें तो इस प्रकार के दृश्य उभरते हैं -

1) कांग्रेस-NCP को मिलाकर पूर्ण बहुमत मिल जाता है, और वे राज ठाकरे को दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल बाहर फ़ेंकते हैं। ("यूज़ एण्ड थ्रो" की कांग्रेसी संस्कृति, वर्तमान माहौल और वोटों के बंटवारे को देखते हुए फ़िलहाल यह सम्भावना सबसे मजबूत लगती है)।

2) राज ठाकरे की पार्टी अप्रत्याशित प्रदर्शन कर जाती है और उसे 25-30 सीटें मिल जाती हैं, तब वे किंगमेकर की भूमिका में भी आ सकते हैं, यह बाकी की चारों पार्टियों को मिलने वाली सीटों से निश्चित होगा।

3) सेना-भाजपा को मिलाकर पूर्ण बहुमत आ जाता है और राज ठाकरे, हार मानकर बाल ठाकरे के शरणागत हो जाते हैं।

4) सेना-भाजपा को बहुमत से थोड़ा कम मिलता है और राज ठाकरे का समर्थन लेना पड़े, तो क्या बाल ठाकरे, राज को मनाएंगे? यदि ऐसा होता है तब बाल ठाकरे के जीवनकाल की संध्या में यह उनके जीवन की पहली बड़ी हार होगी, वह भी अपने भतीजे के हाथों।

5) कुछ "जंगली" सम्भावनाएं (अंग्रेजी शब्द Wild Possibilities को यदि शब्दानुरूप देखें) ये भी हैं - भाजपा और NCP मिलकर सरकार बना लें, कांग्रेस और शिवसेना देखती रह जायें, अथवा शिवसेना-पवार का चुनाव बाद गठबंधन हो जाये और भाजपा टापती रह जाये… राजनीति में कुछ भी सम्भव है…

जो भी होगा वह तो नतीजों के बाद ही सामने आयेगा, लेकिन आज की स्थिति में तो राज ठाकरे सभी के लिये सिरदर्द बने हुए हैं, सेना-भाजपा के लिये प्रत्यक्ष रूप से, कांग्रेस-NCP के लिये अप्रत्यक्ष रूप से जबकि देश और हिन्दुत्व का भला सोचने वालों के लिये एक "घरतोड़क" के रूप में… क्योंकि आखिर नुकसान तो हिन्दुत्व और हिन्दू वोटों के एकत्रीकरण का हो रहा है…

इस स्थिति के लिये कुछ हद तक बाल ठाकरे का पुत्रमोह ही कारणीभूत लगता है, जो लोग राज ठाकरे और उद्धव को बचपन से जानते हैं, उन्हें पता है कि राज ठाकरे, उद्धव से राजनीति, वक्तृत्व कला, मैनरिज़्म, और युवाओं को अपील करने के मामले में हमेशा आगे रहे हैं, फ़िर भी उन्होंने शिवसेना की कमान उद्धव के हाथों में दी। ज़रा सोचिये कि यदि आज राज ठाकरे पर बाल ठाकरे का वरदहस्त होता और शिवसेना का नेतृत्व उनके हाथों में होता, तो राज के सामने महाराष्ट्र में राहुल गाँधी कहीं नहीं लगते, शिवसेना को एक युवा नेतृत्व मिल जाता, न मराठी-अमराठी का मुद्दा पैदा होता, न ही कोई बवाल होता। एक तरह से देखा जाये तो राज ठाकरे की "एनर्जी" का दुरुपयोग हो रहा है, भाषा और प्रान्त के नाम पर, जबकि उसे पता होना चाहिये कि वह हिन्दुत्व का नुकसान और कांग्रेस का फ़ायदा करवा रहा है। बुढ़ापे में हर व्यक्ति को अपने बेटों का कैरियर संवरते देखने की तीव्र इच्छा होती है और बाल ठाकरे वही चाहत अब दोनों पार्टियों को ले डूबेगी।

इस झमेले में एक "एंगल" बिके हुए मीडिया का भी है। मीडिया में आजकल ठाकरे परिवार के बड़े चर्चे हैं। हो भी क्यों ना, चुनाव कवरेज के समय मीडिया को ऐसा तैयार मिर्च-मसाला भला कब मिलेगा। यदि आप महाराष्ट्र की समस्याओं और प्रदेश की हालत का जायज़ा लेने के लिये मीडिया द्वारा किया जा रहे चुनाव कवरेज की रिपोर्ट देखना चाहते हैं तो आपको कुछ नहीं मिलने वाला, क्योंकि मीडिया के लिये महंगाई, किसानों की आत्महत्या, मुम्बई हमले के आरोपियों पर कार्रवाई, मुम्बई को शंघाई बनाने के सपने, गढ़चिरौली की नक्सल समस्या आदि कोई मुद्दा है ही नहीं, मीडिया के सामने एकमात्र और मुख्य मुद्दा है "ठाकरे परिवार" में चल रही जंग। चूंकि भाजपा और शिवसेना कोई भी साम्प्रदायिक मुद्दा नहीं उठा रहे और सिर्फ़ महाराष्ट्र के विकास की बात कर रहे हैं तो बेचारे "सेकुलरों" को उन्हें कोसने का कोई मौका भी नहीं मिल रहा।

एक विशेष रणनीति के तहत, कांग्रेस द्वारा हमेशा की तरह मैनेज किये हुए चापलूस मीडिया ने राज ठाकरे को जबरदस्त कवरेज देकर हीरो बनाया हुआ है, ठाकरे परिवार, उनके झगड़े-विवाद, राज-उद्धव-बाल ठाकरे के बारे में ऑफ़िस में बैठे-बैठे तैयार की गई रिपोर्टें सतत 24 घंटे आपको विभिन्न चैनलों पर दिखाई देंगी। कांग्रेस के दोनों हाथों में लड्डू हैं, और लगातार तीसरी बार सत्ता में आने के पूरे आसार नज़र आ रहे हैं (जो कि महाराष्ट्र का भीषण दुर्भाग्य ही होगा, ठीक वैसे ही जैसे केन्द्र में कांग्रेस का लगातार दूसरा कार्यकाल शुरु से ही जनता की रातों की नींद हराम किये हुए है)।

देखना है कि कांग्रेस द्वारा शतरंज पर खड़ा किया हुआ यह राज ठाकरे नामक मोहरा "हाथी" की तरह सीधा चलता है या "घोड़े" की तरह ढाई घर… या फ़िर "पैदल" की तरह बिना कुछ किये गायब हो जायेगा, बस कुछ दिन का इंतज़ार और…। तब तक हिन्दुत्ववादी वोटों के बिखराव का सदाबहार और सनातन "मातम" जारी रखिये…, और यदि कांग्रेसी हैं तो खुशियाँ मनाईये…

Raj Thakre, Raj Thakrey, Bal Thakre, Shivsena, MNS, BJP-Shivsena Alliance, Hindutva Politics and Maharashtra Assembly Elections, Marathi Votes Issue, राज ठाकरे, बाल ठाकरे, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, शिवसेना-भाजपा गठबंधन, हिन्दुत्व की राजनीति, मराठी वोटों का मुद्दा, Blogging, Hindi Blogging, Hindi Blog and Hindi Typing, Hindi Blog History, Help for Hindi Blogging, Hindi Typing on Computers, Hindi Blog and Unicode
Published in ब्लॉग
संभाजी नगर से राष्ट्रवादी कांग्रेस के उम्मीदवार कदीर मौलाना ने अपने चुनावी पोस्टर में मतदाताओं से अपील की है कि वे हिन्दुओं का नामोनिशान मिटा दें, तथा औरंग की ज़मीं पर चांद-सितारा फ़िर से लहरायें…। सोचा था कि दीपावली तक इस प्रकार की कोई भी पोस्ट नहीं लिखूंगा कि जिससे माहौल खराब हो, लेकिन "कांग्रेसी औलादें" देश को चैन से नहीं बैठने देंगी। इस पोस्टर को  देखिये, इसे ऑल इंडिया मस्जिद कमेटी ने जारी किया है (जिससे वे अब इंकार कर रहे हैं)… लेकिन सवाल ये उठता है कि शिवसेना के एक उम्मीदवार के पोस्टर में कृष्ण की गीता का उल्लेख और चित्र आता है तो चुनाव आयोग कार्रवाई करने पोस्टर भी हटवाता है और नोटिस भी देता है… क्या इस मामले में नवीन चावला अब तक सो रहे हैं? या अपने किसी "आका" के चरणों को चूम रहे हैं…। यह पोस्टर "बुरका दत्त" को अभी तक नहीं दिखाई दिया होगा… न ही अपने-आपको एसपी सिंह समझते, हाथ मलते हुए समाचार पढ़ने वाले पुण्य प्रसून वाजपेयी जी को…




ज्यादा क्या लिखूं, आप खुद ही पोस्टर देखिये, उसकी भाषा देखिये, उनके संस्कार देखिये, चुनाव आयोग के बारे में सोचिये, कांग्रेस की नीचता का विचार कीजिये, और हिन्दुओं को राजनैतिक रूप से इकठ्ठा क्यों होना चाहिये… सेकुलरों के मुँह पर इस पोस्ट को मारकर बताईये…


(स्रोत - शिवसेना सांसद संजय राउत द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर)
Published in ब्लॉग
जी हाँ, कोई गलती नहीं, कोई मिसप्रिंट नहीं, आपने शीर्षक में एकदम सही पढ़ा है, महाराष्ट्र के आदिवासी इलाके मेलघाट में पिछले 24 साल से काम कर रहे, डॉ रवीन्द्र कोल्हे की फ़ीस सिर्फ़ 2 रुपये है (पहली बार) और दूसरी बार में 1 रुपया, और निम्न पंक्ति किसी घटिया नेता की झूठी बात नहीं, बल्कि महात्मा गाँधी और विनोबा भावे के "सच्चे अनुयायी" डॉ रवीन्द्र कोल्हे की हैं, जो सभी से रस्किन बांड का यह वाक्य कहते हैं, कि "यदि आप मानव की सच्ची सेवा करना चाहते हैं तो जाईये और सबसे गरीब और सबसे उपेक्षित लोगों के बीच जाकर काम कीजिये…"।



जब रवीन्द्र कोल्हे नामक नौजवान ने एमबीबीएस की पढ़ाई के बाद मेलघाट के अति-पिछड़े इलाके में नौकरी की तब उन्हें अहसास हुआ कि इन आदिवासियों की गहन पीड़ा और आवश्यकताएं अलग हैं, तब उन्होंने वापस जाकर एमडी की डिग्री हासिल की, और पुनः मेलघाट आकर कोरकू आदिवासियों के बीच काम करने लगे। इन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से एमबीबीएस किया, वे शुरु से ही विनोबा भावे के कार्यों और विचारों से बेहद प्रभावित थे। उन्होंने मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के कई जिलों का दौरा किया और पाया कि महाराष्ट्र का गढ़चिरौली इलाका नक्सलवाद, गरीबी और बीमारी से जूझ रहा है तब उन्होंने मेलघाट को ही अपना स्थाई ठिकाना बनाने का फ़ैसला किया। उनकी माँ ने नक्सलवाद के खतरे को देखते हुए उन्हें मनाने की बहुत कोशिश की लेकिन रवीन्द्र कोल्हे ठान चुके थे कि उन्हें आदिवासियों के बीच ही काम करना है। उनका पहनावा और हुलिया देखकर कोई भी नहीं कह सकता कि यह एक MD डॉक्टर हैं। 

अपने पुराने दिनों को याद करते हुए डॉ रवीन्द्र कोल्हे कहते हैं, "उन दिनों इस पूरे इलाके में सिर्फ़ 2 स्वास्थ्य केन्द्र थे, मुझे अपनी क्लिनिक तक पहुँचने के लिये धारणी से बैरागढ़ तक रोजाना 40 किमी पैदल चलना पड़ता था, मुझे इन जंगलों में रोजाना कम से कम एक शेर जरूर दिखाई दे जाता था, हालांकि पिछले 4 साल से मैने यहाँ कोई शेर नहीं देखा…"।

मेलघाट का मतलब होता है, वह जगह जहाँ दो घाटों का मिलन होता है। यह गाँव महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की सीमा पर बसा हुआ है, और पहाड़ियों की गहरी हरियाली को सिर्फ़ एक ही बात भेदती है वह है यहाँ के स्थानीय निवासी कोरकू आदिवासियों का रंगीन पहनावा। विकास के नाम पर इस पूरे इलाके में कुछ भी नहीं है, मीलों तक सड़कें नहीं हैं और गाँव के गाँव आज भी बिजली के बिना अपना गुज़ारा कर रहे हैं। टाइगर रिज़र्व इलाका होने की वजह से यहाँ किसी प्रकार का "इंफ़्रास्ट्रक्चर" बनाया ही नहीं गया है, ये और बात है कि पिछले कई साल से यहाँ एक भी टाइगर नहीं देखा गया है, अलबत्ता केन्द्र और राज्य से बाघ संरक्षण के नाम पर पैसा खूब आ रहा है। जंगलों के अन्दर आदिवासियों के गाँव तक पहुँचने के लिये सिर्फ़ जीप का ही सहारा है, जो ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर चल जाती है। यहाँ के आदिवासी सिर्फ़ पहाड़ी झरनों और छोटी नदियों के सहारे ही छोटी-मोटी खेती करके अपना पेट पालते हैं, क्योंकि न तो यहाँ सिंचाई व्यवस्था है, न ही पम्प, क्योंकि बिजली भी नहीं है। ऐसी जगह पर डॉ रवीन्द्र कोल्हे पिछले 24 साल से अपना काम एक निष्काम कर्मयोगी की तरह कर रहे हैं।

पहली बार जब भी कोई रोगी आता है तब वे उससे सिर्फ़ दो रुपये फ़ीस लेते हैं और अगली बार जब भी वह दोबारा चेक-अप के लिये आता है तब एक रुपया। अपने खुद के खर्चों से उन्होंने एक छोटा क्लिनिक खोल रखा है, और वे वहीं रहते भी हैं जहाँ कोई भी 24 घण्टे उनकी सलाह ले सकता है।




"जब मैं यहाँ आया था, उस समय शिशु मृत्यु दर, प्रति 1000 बच्चों में 200 की थी, लेकिन अब यह घटते-घटते 60 पर आ चुकी है, जबकि केरल में यह सिर्फ़ 8 है और भारत के अन्य ग्रामीण इलाकों में शिशु मृत्यु दर 10-12 है…" वे कहते हैं। इस इलाके में स्वास्थ्य केन्द्रों की बढ़ोतरी और स्वास्थ्य सेवाओं की तरफ़ ध्यान आकर्षित करने के लिये डॉ कोल्हे ने मुम्बई हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की, लेकिन सरकार ने उसका महीनों तक कोई जवाब नहीं दिया (शायद गरीबों का कोई जनहित नहीं होता होगा)। डॉ कोल्हे कहते हैं कि यदि सरकार हमसे बात ही नहीं करना चाहती तब हम क्या कर सकते हैं? हमें तो अपनी समस्याओं का हल खुद ही निकालना है। इलाके के स्वास्थ्य केन्द्रों पर डॉक्टरों की तैनाती ही नहीं होती, ऐसे में शिशु मृत्यु दर अधिक होना स्वाभाविक है। यहाँ पर वर्षा की कमी की वजह से साल के लगभग 8 महीने खेती सम्बन्धी कोई काम नहीं होता, पशुओं की मृत्यु दर भी डॉक्टर न होने की वजह से अधिक है इसलिये दूध की भी कमी रहती है। 1978 से पहले आदिवासी लोग खरगोश, छोटे हिरन आदि का शिकार करके अपना पेट भर लेते थे, लेकिन जब से इसे टाइगर रिज़र्व घोषित किया है, तब से शिकार पर भी प्रतिबन्ध लग गया है। मेलघाट एक बार राष्ट्रीय सुर्खियों में आया था जब यहाँ पर बच्चों की मौत "कुपोषण" से हुई थी, डॉ कोल्हे इसे नकारते हुए कहते हैं कि यह कुपोषण से नहीं बल्कि भूख से हुई मौतें थीं।

जिस "नरेगा" का मीडिया में सबसे अधिक ढोल पीटा जाता है, यहाँ शुरु होकर बन्द भी हो गई। स्थानीय आदिवासी बताते हैं कि धारणी और चिकलधारा तहसील में यह योजना चलाई गई, लेकिन मजदूरों की मेहनत के 3 करोड़ रुपये अभी भी नहीं मिले हैं। सरकार ने एक ही अच्छा काम किया है कि पूरे क्षेत्र में 300 से अधिक सरकारी स्कूल खोले हैं, जिसके कारण इन गरीबों को पढ़ने का मौका मिला है, इसी के साथ बहुत संघर्ष करने के बाद कोरकू भाषा में प्राथमिक स्कूलों में बच्चों की पुस्तकें भी वितरित करवाई हैं जिससे बच्चे जल्दी सीख जाते हैं। डॉ कोल्हे क्लिनिक में आदिवासी युवाओं को सरकार की विभिन्न योजनाओं के बारे में जानकारी भी देते जाते हैं। "मैंने उन्हें अपने हक के लिये लड़ना सिखाया है और कभी भी रिश्वत नहीं लेने-देने की कसम दी है…"। वे ग्रामीणों को सलाह देते हैं कि अब उन्हें सरकारी ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्रों पर जाना चाहिये ताकि सरकारी गतिविधियाँ और बढ़ें, इसी के साथ स्वास्थ्य केन्द्र पर काम करने वाले जूनियर डॉक्टरों और कम्पाउंडरों को उन्होंने कह रखा है कि वे जब चाहें निःसंकोच उनकी डॉक्टरी सलाह ले सकते हैं। धीरे-धीरे इन आदिवासियों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ी है और जब डॉ कोल्हे उनके आसपास ही हैं तब वे आश्वस्त भी रहते हैं। आज इतने साल बाद, जबकि इलाके में थोड़ी बहुत तरक्की हुई है, डॉ कोल्हे की फ़ीस 2 रुपये ही है।

हाल ही में AIMS के डॉक्टरों को तनख्वाह बढ़ाने के लिये मांगें करते, कई राज्यों में चारों तरफ़ डॉक्टरों को हड़ताल करते और निजी डॉक्टरों, नर्सिंग होम्स और 5 सितारा अस्पतालों को मरीजों का खून चूसते देखकर, डॉ कोल्हे का यह समर्पण एक असम्भव सपने सी बात लगती है। लेकिन आज के गंदगी भरे समाज, पैसे के भूखे भ्रष्टाचारी भेड़ियों, महानगर की चकाचौंध में कुत्ते के बिस्किट पर महीने के हजारों रुपये खर्चने वाले और हर साल कार तथा हर महीने मोबाइल बदलने वाले घृणित धनपिपासुओं की चारों ओर फ़ैली सड़ांध के बीच ऐसे लोग ही एक "सुमधुर अगरबत्ती" की तरह जलते हैं और मन में आशा और विश्वास का संचार करते हैं कि "मानवता अभी जिन्दा है…" और हमें संबल मिलता है कि बुराईयाँ कितनी भी हों हमें उनसे अविरत लड़ना है…

दीपावली के अवसर पर डॉ कोल्हे के त्याग और समर्पण के जरिये, सभी स्नेही पाठकों का अभिवादन और दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं… दिल में उम्मीदों के दीप जलायें…

डॉ रवीन्द्र कोल्हे से बैरागढ़ में (07226) 202002, धारणी में (07226) 202829 और उनके मोबाइल पर 0-94231-46181 पर सम्पर्क किया जा सकता है।
(सभी सन्दर्भ - रेडिफ़.कॉम)

"समाज की अगरबत्तियाँ" टाइप का इसी से मिलता-जुलता एक लेख यहाँ भी पढ़ें…
http://desicnn.com/wp/2008/12/30/iit-engineer-farmer-indias-food-crisis/

(विषयांतर - कई ब्लॉगरों द्वारा लगातार अनुरोध किया जा रहा है कि हिन्दी ब्लॉग जगत में छाई सड़ांध को दूर करें और धार्मिक विषयों पर तथा साम्प्रदायिक लेखन न किया जाये… दीप पर्व के पावन अवसर पर माहौल बदलने के लिये यह पोस्ट लिख रहा हूं… मैं भी चाहता हूं कि ऐसी कई पोस्ट लिखूं, लिखी जायें। फ़िर भी इस बात से मैं असहमत हूं और रहूंगा कि गुमराह करने वाली, उन्मादी धार्मिक प्रचार वाली बातों का जवाब ही न दिया जाये… इग्नोर भी एक हद तक ही किया जा सकता है, जब कोई आपके धर्म को, आपके धर्मग्रंथों को, आपके वेदों-पुराणों को दूसरों के मुकाबले श्रेष्ठ बताने लगे, उसके बारे में दुष्प्रचार करे, कुतर्क करे… तब निश्चित रूप से उसका जवाब दिया जाना चाहिये, तरीका अलग-अलग हो सकता है, लेकिन पीछे हटना या भागना शोभा नहीं देता…फ़िलहाल दीपावली के शुभ अवसर पर सभी को अग्रिम बधाईयाँ…और कटुतापूर्ण माहौल को शांत और सुगंधित करने के लिये इसी प्रकार की "अगरबत्ती" वाली पोस्टें लिखें…)

Blogging, Hindi Blogging, Hindi Blog and Hindi Typing, Hindi Blog History, Help for Hindi Blogging, Hindi Typing on Computers, Hindi Blog and Unicode
Published in ब्लॉग
हाल ही में भारत ने अपने एक "राष्ट्र सन्त" को खोया है, जी हाँ, मैं बात कर रहा हूं वाय सेमुअल राजशेखर रेड्डी की… उनकी याद में, उनके गम में, उनकी जुदाई की वजह से आंध्रप्रदेश में 400 से भी अधिक गरीब किसानों ने टपाटप-टपाटप आत्महत्याएं की हैं (ऐसा तो MGR के समय भी नहीं हुआ न ही NTR के समय)… लेकिन सिर्फ़ इतने भर से यह महान राष्ट्रसन्त नहीं हो जाते, बल्कि अब आंध्रप्रदेश की राज्य सरकार ने कुरनूल जिले के नल्लामल्ला जंगलों में 1412 हेक्टेयर (जी हाँ, सही पढ़ा आपने… 1412 हेक्टेयर) के इलाके में "YSR स्मृति वनम" के नाम से उनका मेमोरियल बनाने की योजना को हरी झण्डी दे दी है। अब दिल्ली में स्थापित सारी समाधियाँ, सारे स्मारक, सारे मेमोरियल, सारे घाट, इस महाकाय स्मारक के आगे पानी भरते नज़र आयेंगे, और ऐसा तभी होता है जब कोई व्यक्ति "राष्ट्र सन्त" बने और गुज़र जाये… न सिर्फ़ गुज़र जाये, बल्कि ऐसा गुज़रे कि उसके लिये दो दिन तक सेना, वायुसेना, भारतीय सेटेलाईट, अमेरिकी उपग्रह, पुलिस, जंगल में रहने वाले आदिवासी ग्रामीण, खोजी कुत्ते… सब के सब भिड़े रहें, किसी भी खर्चे की परवाह किये बिना… क्योंकि राष्ट्र सन्त की खोज एक परम कर्तव्य था (छत्तीसगढ़ में भी एक बार एक हेलीकॉप्टर लापता हुआ था, उसे खोजने का प्रयास तक नहीं किया गया, क्योंकि उसमें दो-चार मामूली पुलिस अफ़सर बैठे थे, जबकि राष्ट्रसन्त सेमुअल तो वेटिकन के भी प्रिय हैं और इटली के भी)।

तो मित्रों, बात हो रही थी 1412 हेक्टेयर के विशाल वन क्षेत्र में फ़ैले इस प्रस्तावित मेमोरियल की। योजना के अनुसार आत्माकुर वन क्षेत्र में आने वाले नल्लामल्ला जंगल, जो कि लगभग 5 जिलों में फ़ैला है, में उस पहाड़ी पर वायएसआर स्तूप बनाया जायेगा, जहाँ उनका हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। जंगल और पहाड़ी की शुरुआत से अर्थात पवुरलागुट्टा गाँव से सैलानी लोग, सॉरी "दर्शनार्थी"… अरे फ़िर सॉरी "भक्तगण" उस पहाड़ी पर ट्रेकिंग करते हुए चढ़ेंगे, और पहाड़ी पर बने इस विशाल स्तूप तक पहुँचेंगे। कैबिनेट ने कहा है कि प्रकृति के सुरम्य वातावरण को बनाये रखा जायेगा, और वन क्षेत्र को कोई नुकसान नहीं पहुँचेगा (अर्थात उस जंगल में रहने वाले जीव-जन्तुओं और पक्षियों को चिंता करने की कोई बात नहीं है, "जगन बाबू" उनसे आत्महत्या करने को नहीं कहने वाले है)। इस पूरे प्रोजेक्ट पर सिर्फ़ साढ़े तीन करोड़ का खर्च होगा और इसे सितम्बर 2010 तक बना लिया जायेगा। इस सम्बन्ध में पर्यावरणवादियों और प्रकृतिप्रेमियों की आपत्तियों को खारिज करते हुए राज्य की मंत्री गीता "रेड्डी" ने कहा, कि सरकार की उस वनक्षेत्र में किसी बड़े बदलाव की योजना नहीं है और उससे पर्यावरण अथवा जंगल को कोई नुकसान नहीं पहुँचेगा। उन्होंने आगे कहा कि उस पहाड़ी पर किसी पेड़ को नहीं काटा जायेगा और कोई बड़ा निर्माण कार्य नहीं किया जायेगा (अब सरकार कह रही है तो मानना ही पड़ेगा), उन्होंने यह भी कहा कि कैबिनेट के अधिकतर मंत्रियों की राय यह भी है कि हैदराबाद में भी एक स्मारक बनाया जाये (यानी कि एक और बेशकीमती ज़मीन)। इस विशाल कार्य की देखरेख और उसे सुचारू रूप से चलाने के लिये 6 मंत्रियों की एक समिति बनाई गई है। कैबिनेट में पास किये गये एक और प्रस्ताव के अनुसार कडप्पा जिले का नाम बदलकर राजशेखर रेड्डी जिला रखा जायेगा… अब आप खुद ही बताईये, क्या मैं उन्हें "राष्ट्रसन्त" की उपाधि देकर कुछ गलत कर रहा हूं?





चित्र - अपने जन्मदिन पर पुलिवेन्दुला में एक चर्च में बिशप को केक खिलाते हुए…



इस खबर को आप यहाँ पढ़ सकते हैं
http://timesofindia.indiatimes.com/news/city/hyderabad/1412-hectare-Nallamala-forest-land-for-YSR-memorial/articleshow/5053354.cms

http://andhralekha.com/news/11-19619-Govt%20gets%20forest%20land%20ready%20for%20YS%20memorial

देश के इस सबसे विशालतम समाधि स्थल के लिये अधिगृहीत की जाने वाली ज़मीन और फ़िर हैदराबाद में भी एक विशाल स्मारक बनाये जाने की योजना से इस बात को बल मिलता है कि इस "राष्ट्रसन्त" और उनके लायक पुत्र के मन में ज़मीन के प्रति कितना मोह है, कितना लगाव है, कितनी चाहत है… आखिर धरतीपुत्र जो ठहरे… आईये देखते हैं कि YSR ने पिछले 5 साल के अपने मुख्यमंत्रित्व काल में गरीबों के लिये जो थोड़ा-बहुत काम किया, वह क्या-क्या हैं… ताकि इस राष्ट्रसन्त को आप सच्ची श्रद्धांजलि दे सकें…

- हैदराबाद में रहेजा कॉर्पोरेशन को इंफ़्रास्ट्रक्चर के लिये 300 एकड़ ज़मीन दी, इसमें 50% की भागीदारी जगन रेड्डी की है।
- गंगावरम बंदरगाह बनाने के लिये 1000 एकड़ ज़मीन (इसमें भी जगन की हिस्सेदारी है)।
- ब्राहमनी स्टील्स कम्पनी में धरतीपुत्र के पुत्र की हिस्सेदारी है।
- सिक्किम में चल रहे 6000 करोड़ के एक हाईड्रो-इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट में जगन की आधी हिस्सेदारी है।
- जगन बाबू कुछ साल पहले तक बंगलोर में ही रहते थे, उनके पप्पा ने उन्हें हाल ही में सांसद बनवाया है, अतः बंगलोर के बाहरी इलाके में तीन करोड़ रुपये प्रति एकड़ की दर से कृषि भूमि खरीदकर फ़ार्म हाउस बनवाया है।
- बंगलोर के ही बन्नरघट्टा रोड पर एक विशाल शॉपिंग मॉल काम्पलेक्स भी जगन बाबू का ही बताया जाता है।
- हैदराबाद की कुक्कापल्ली हाउसिंग बोर्ड सोसायटी में 25 एकड़ का प्लाट
- प्रकासम जिले की मशहूर ग्रेनाइट खदानों में 150 एकड़ की खनन भूमि (एक बेनामी कम्पनी गिम्पेक्स के नाम से)
- अखबार "साक्षी" जिसके मालिक और चेयरमैन जगन रेड्डी हैं, उस अखबार ने पिछले 5 साल में कोलकाता, गुजरात, चेन्नई और बंगलोर में 600 करोड़ का निवेश किया है।
- साक्षी ग्रुप में दो मुख्य निवेशक हैं आर्टिलियन्स बायोइन्नोवेशंस तथा स्टॉकनेट इंटरनेशनल, जिन्हें विश्व के स्टॉक मार्केट में लिस्टेड किया गया है, इनकी शेयर प्राइस एक रुपये से कम है और प्रमोटर का हिस्सा 0.3 प्रतिशत है, लेकिन यह दोनों निवेशक कम्पनियाँ साक्षी की स्क्रिप पर 350 रुपये का प्रीमियम देती हैं।
- साक्षी और जगति पब्लिकेशन में निवेश करने वाली कम्पनियों को ही बड़े-बड़े सरकारी ठेके मिलते हैं, जैसे SEZ, बन्दरगाह निर्माण और ग्रेनाईट खदानों में खनन की अनुमति।
- जगति पब्लिकेशन के ऑडिटर हैं PWC, जी हाँ वही प्राइस वाटर कूपरहाउस, जिसने सत्यम के बही खातों की उम्दा जाँच करके बताया था कि "सब ठीक है"।
- इसी PWC ने साक्षी अखबार की "जाँच" करके सर्टिफ़िकेट दिया कि इसकी दैनिक खपत 12 लाख प्रतियाँ रोज़ाना की है, और साक्षी अखबार को सरकार की ओर से बड़े-बड़े विज्ञापन मिलने लगे।
- अरुणाचल प्रदेश में लगने वाले 3000 मेगावाट के प्रोजेक्ट में काम करने वाली कम्पनियों, एपी जेन्को तथा मेसर्स एथेना पावर एनर्जी की भी जगति पब्लिकेशन्स में हिस्सेदारी है।
- पुल्लिवेन्दुला में 5 एकड़ में निर्मित वायएसआर के बंगले की कीमत कम से कम 4 करोड़ रुपये है।

अब जबकि "धरतीपुत्र" को ही धरती इतनी प्रिय है तब उनके पीछे-पीछे लगे "भूमिपुत्रनुमा" रिश्तेदारों को क्यों न होगी, और वे क्यों पीछे रहें…

वायएस विवेकानन्द रेड्डी (राष्ट्रसन्त के भाई) -

- कडप्पा से सांसद विवेकानन्द रेड्डी के पास मधापुर की हाईटेक सिटी में 2000 वर्गमीटर की ज़मीन है, जो फ़िलहाल एक सॉफ़्टवेयर कम्पनी को किराये पर दी गई है (कीमत बताने का क्या फ़ायदा, सभी अन्दाज़ लगा ही लेंगे)

वायवी सुब्बा रेड्डी (राष्ट्रसन्त के एक और भाई) -

- तुंगभद्रा नदी पर बनने वाले एक हाईड्रो प्रोजेक्ट में हिस्सेदार।
- अपनी पत्नी स्वर्णलता रेड्डी के नाम पर 1000 वर्गफ़ीट का प्लाट जुबली एनक्लेव इलाके में।

सुधाकर रेड्डी (चचेरे दामाद)

- उत्तरी आंध्रप्रदेश के समुद्री तटों पर रेती की खुदाई और ढुलाई के ठेके, स्विट्ज़रलैण्ड की कम्पनी बोथलिट्रेड इंक के साथ भागीदारी में।

बी युवराज रेड्डी (राष्ट्रसन्त के भतीजे)

युवराज चिटफ़ण्ड कम्पनी बनाकर 2.60 करोड़ का घोटाला किया।

रबिन्द्रनाथ रेड्डी (YSR के साले)

- डेन्दुलुरु गाँव में फ़र्टिलाइज़र कम्पनी बनाने के नाम पर कई एकड़ भूमि हड़प की।
- गेमन इंडिया लिमिटेड (दिल्ली मेट्रो के काम में गड़बड़ी के लिये ब्लैक लिस्टेड कम्पनी) के साथ मिलकर सर्वारासागर-वामिकोण्डा नहर प्रोजेक्ट को हासिल करने के लिये सम्बन्धों का उपयोग।

अन्य रिश्तेदार -
- मधुसूदन रेड्डी, वेणुगोपाल रेड्डी, प्रताप रेड्डी ने मिलकर कडप्पा नगर सुब्बा रेड्डी कॉलेज के पास की 15 करोड़ की ज़मीन गैरकानूनी रूप से दबाई हुई है (खसरा सर्वे क्रमांक 682/4, 684/4, 700/2).

- YSR के बड़े भाई की पत्नी भारती रेड्डी ने सितम्बर 2005 में कोल्लुरू में 35 लाख की ज़मीन (सर्वे क्रमांक 148) खरीदी, जो कि अचानक "रिंग रोड" के निर्माण की वजह से 13 करोड़ की हो गई।
- इसी रिंग रोड ने कई अन्य छोटे-मोटे रिश्तेदारों के भी वारे न्यारे करवा दिये, जैसे वायवी सुब्बा रेड्डी ने इसी रोड के पास सर्वे क्रमांक 117, 119, 121, 123, 124, 125, 126, 131, 132, 134, 136, 141 को 20 करोड़ में खरीदा, और "अचानक" वहाँ रिंग रोड बनाने की घोषणा हो गई, जिससे इस ज़मीन का भाव एक साल में ही 125 करोड़ पहुँच गया।
- YSR के नज़दीकी मित्र पार्थसारथी रेड्डी जो कि हेटेरो ड्रग्स नामक दवा कम्पनी के मालिक हैं, उन्हें SEZ बनाने के लिये कौड़ियों के दाम ज़मीन दी गई और कुछ ही दिन बाद उन्होंने जगति पब्लिकेशन में 13 करोड़ का निवेश कर दिया।

(इस लिस्ट में सत्यम और मेटास कम्पनी में हुआ महाघोटाला शामिल नहीं है)

यह तो हुई एक छोटी सी बानगी इस महान राष्ट्रसन्त के खुले कारनामों की (बाकी के जो भी घोटाले छिपे हुए हैं वह अलग हैं)। यदि आप पढ़ते-पढ़ते उकता गये हों तो आपको बता दूं कि ऐसा नहीं कि अपने मुख्यमंत्रित्व काल में इन्होंने सिर्फ़ अथाह पैसा ही कमाया हो, इन्होंने "धर्म" की भी सेवा की है, और जिस स्मारक या समाधि को बनाने में इतना पैसा खर्च किया जा रहा है, और हेलीकॉप्टर दुर्घटना होने पर इनकी खोज के लिये अमेरिका सहित सोनिया गाँधी भी चिंता में दुबली हुई जा रही थीं उसका कारण इनकी "धर्म" सेवा ही है, आईये यह ज्ञान भी प्राप्त कर ही लीजिये -

- 3 दिसम्बर 2007 को एक आदेश जारी करके "सेमुअल" ने प्रदेश के सभी 1,84,000 मन्दिरों, 181 मठों और विभिन्न धार्मिक ट्रस्टों को अधिगृहीत कर लिया ताकि उनकी करोड़ों की आय पर कब्जा किया जा सके। (डेक्कन क्रानिकल 3.12.2007)
- भद्राचलम : मन्दिर की 1289 एकड़ में से 884 एकड़ ज़मीन एक चर्च को दान कर दी।
- श्रीसेलम : प्रसिद्ध मल्लिकार्जुन मन्दिर की 1600 एकड़ भूमि को विभिन्न ईसाई-आदिवासी संगठनो में बाँट दिया।
- पुरानी मस्जिदों के लिये 2 करोड़, चर्चों की मरम्मत के लिये 7 करोड़ अनुदान दिया, भारत के इतिहास में पहली बार किसी ईसाई को बेथलेहम जाने के लिये सरकारी तौर पर अनुदान दिया। महाशिवरात्रि के अवसर पर बसों में अधिक भीड़ को देखते हुए हिन्दुओं की सुविधा(?) हेतु टिकट पर अतिरिक्त प्रभार लगाया। (डेक्कन क्रानिकल 23 अगस्त 2006, 18 दिसम्बर 2006, ईनाडु 16 फ़रवरी 2007)।
- प्रसिद्ध तिरुपति मन्दिर की 7 पहाड़ियों में से 5 पहाड़ियों पर चर्च निर्माण की अनुमति। अपने परिजन के नाम पर होने वाले हॉकी टूर्नामेंट के लिये तिरुपति मन्दिर की आय से पैसा खर्च किया (द हिन्दू 17 जुलाई 2006, डेक्कन क्रानिकल 8 मार्च 2007)।
- मन्तपम में गोल्फ़ कोर्स बनाने के लिये 10 मन्दिरों को तोड़ा गया, जबकि सेमुअल रेड्डी के बेटे जगन ने अनन्तपुर में एक मन्दिर तुड़वाया ( द हिन्दू 27 अगस्त 2004, डेक्कन क्रानिकल 8 मार्च 2007)।

(कम से कम अन्तिम संस्कार के मामले में YSR ईमानदार रहे और ईसाई पद्धति से ही उनका अन्तिम संस्कार किया गया, जबकि कुछ "परिवार" तो ऐसे ढोंगी हैं कि उन्हें पता है कि वे हिन्दू नहीं हैं फ़िर भी राजनीति और दिखावे की खातिर उन्हें हिन्दू धार्मिक पद्धति से अन्तिम संस्कार करवाना पड़ा… बेचारे)

(तात्पर्य यह कि जब उन्होंने "धरती" और धर्म की इतनी सेवा की है, तो उनके "लायक" पुत्र का हक बनता है कि वह इसे परम्परा को आगे बढ़ाये… इसीलिये तो आंध्रप्रदेश में इस राष्ट्रसंत के दुःख में लोगों ने टपाटप-टपाटप आत्महत्याएं कीं…)

मैं जानता हूं कि इस "राष्ट्रसन्त" के इन कारनामों और मेरी इस छोटी सी पोस्ट के मद्देनज़र आपकी आँखें श्रद्धा से छलछला उठी होंगी, अतः यहीं पर समाप्त करता हूं ताकि आप भी अपनी "विनम्र" श्रद्धांजलि उन्हें अर्पित कर सकें…

अन्य स्रोत -
1) Vijaya Karnataka, a kannada daily (20-6-06)
2) Eenadu Daily, A Telgu Daily
3) Deccan Chronicle, (15-06-2006)
4) Vikrama (28-05-2006)
5) Sudarshan TV (24-06-06)
6) Pungava news Magazine (1-06-06)
तथा http://www.outlookindia.com/article.aspx?229456

http://www.christianaggression.org/item_display.php?type=ARTICLES&id=1122662970

http://www.hindujagruti.org/news/index.php?print/id:1856,pdf:1


YSR, YS Rajshekhar Reddy Memorial, Land Grab and Forest Destruction in AP, Tirumala, Tirupati Devasthanam, Anti-Hindu Activities in Andhra Pradesh, Land Scams of Jagan Reddy and Reddy Family, Satyam and Maytas Scam, YSR in Satyam, वाईएसआर रेड्डी, राजशेखर रेड्डी मेमोरियल समाधि, विशाल भूमि अधिग्रहण और वनों का विनाश, तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम, हिन्दू विरोधी गतिविधियाँ और राजशेखर रेड्डी, रेड्डी परिवार की आर्थिक घोटाले, सत्यम घोटाला और जगन रेड्डी, Blogging, Hindi Blogging, Hindi Blog and Hindi Typing, Hindi Blog History, Help for Hindi Blogging, Hindi Typing on Computers, Hindi Blog and Unicode
Published in ब्लॉग
न्यूज़ लैटर के लिए साइन अप करें