desiCNN - Items filtered by date: जुलाई 2007
गुरुवार, 26 जुलाई 2007 20:46

"क्रेन बेदी" हार गईं ?

एक बार फ़िर से हमारी "व्यवस्था" एक होनहार और काबिल व्यक्ति के गले की फ़ाँस बन गई, टीवी पर किरण बेदी की आँखों में आँसू देखकर किसी भी देशभक्त व्यक्ति का खून खौलना स्वाभाविक है । (जिन लोगों को जानकारी नहीं है उनके लिये - किरण बेदी से दो साल जूनियर व्यक्ति को दिल्ली का पुलिस कमिश्नर बना दिया गया है, जबकि उस पर गंभीर किस्म के आरोप हैं) हमारी भ्रष्ट व्यवस्था के आगे "क्रेन बेदी" के नाम से मशहूर एक फ़ौलादी महिला को जिस कदर दरकिनार कर दिया गया, उससे एक बार फ़िर स्पष्ट हो गया है कि इटली की महिला का "महिला सशक्तिकरण" का दावा कितना खोखला है । "त्याग", "बलिदान" और "संस्कृति" की दुहाई देने वाली एक औरत दिल्ली में सत्ता की केन्द्र है, एक और औरत उसकी रबर स्टाम्प है, एक गैर-लोकसभाई (गैर-जनाधारी)उसका "बबुआ" बना हुआ है तथा एक और महिला (शीला दीक्षित) की नाक के नीचे ये सारा खेल खेला जा रहा है, इससे बडी़ शर्म की बात इस देश के लिये नहीं हो सकती । शायद किरण बेदी का अपराध यह रहा कि वे सिर्फ़ "ईमानदारी" से काम करने में यकीन रखती हैं, उन्हें अपने अफ़सरों और मातहतों को दारू-पार्टियाँ देकर "खुश" करना नहीं आता । वे पुस्तकें लिखती हैं, कैदियों को सुधारती हैं, अनुशासन बनाती हैं, लेकिन वे यह साफ़-साफ़ भूल जाती हैं कि हमारे "कीचड़ से सने" नेताओं के लिये यह बात मायने नहीं रखती, उन्हें तो चाहिये "जी-हुजूर" करने वाले "नपुंसक और बिना रीढ़ वाले" अधिकारी, जो "खाओ और खाने दो" में यकीन रखते हैं । एक तरफ़ कलाम साहब कल ही 2020 तक देश को महाशक्ति बनाने के लिये सपने देखने की बात फ़रमा कर, सिर्फ़ दो सूटकेस लेकर राष्ट्रपति भवन से निकल गये, वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट को दिल्ली के बंगलों पर काबिज नेताओं और उनके लगुए-भगुओं को निकाल बाहर करने में पसीना आ रहा है, और ये भी मत भूलिये कि "महिला सशक्तिकरण" तो हुआ है, क्योंकि मोनिका बेदी छूट गई ना ! किरण बेदी की नाक भले ही रगड़ दी गई हो । क्या देश है और क्या घटिया व्यवस्था है ?
आईये हम सब मिलकर जोर से कहें - "इस व्यवस्था की तो %&^$*&&%**$% (इन स्टार युक्त चिन्हों के स्थान पर अपने-अपने गुस्से, अपनी-अपनी बेबसी और अपने-अपने संस्कारों के मुताबिक शब्द भर लें) और स्वतंत्रता दिवस नजदीक आ रहा है... झूठा ही सही "मेरा भारत महान" कहने में किसी का क्या जाता है ?

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शुक्रवार, 20 जुलाई 2007 20:50

दाऊद भाई..पधारो ना म्हारे देस

दाऊद भाई, आपको ये पत्र लिखते हुए बहुत खुशी हो रही है, चारों तरफ़ खुशी जैसे पसरी हुई है, खुशी का कारण भी है, मोनिका "जी" को भोपाल की एक अदालत ने फ़र्जी पासपोर्ट मामले में बरी कर दिया है, जिसकी खुद मोनिका ने भी सपने में कल्पना नहीं की होगी, लेकिन कल्पना करने से क्या होता है, आप तो जानते ही हैं कि हमारे यहाँ का सिस्टम कैसा "यूजर-फ़्रेंण्डली" हो गया है (जो इस सिस्टम को "यूज़" करता है, ये सिस्टम उसका फ़्रेण्ड बन जाता है), अब आप हों या अबू भाई, कहीं भी बैठे-बैठे सारी जेलों को अपने तरीके से संचालित कर सकते हैं (मैं तो कहता हूँ कि सरकार को आपको जेल सुधार का ठेका दे देना चाहिये)... तो भाई, भूमिका बनाने का तात्पर्य यही है कि हम पलक-पाँवडे़ बिछाये बैठे हैं आपकी राहों में, क्यों खामख्वाह हमारे सीबीआई अधिकारियों को तकलीफ़ देते हो और हमारे गाढे़ पसीने की कमाई जैसी पुर्तगाल से अबू-मोनिका को लाने में बहाई गई, उसे दुबई या कहीं और बहने देना चाहते हो ? भाई सब कुछ तो आपका ही है, हमारे लिये जैसे आप, वैसे पप्पू यादव, वैसे ही शहाबुद्दीन, हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता । तो भाई तारीख बताओ और आ जाओ.. मोनिका दीदी पहले ही फ़रमा चुकी हैं कि जेल से ज्यादा सुरक्षित जगह भारत में कोई नहीं है (देखा ! क्या रोशन ख्याल आया है संगत के असर से), एकदम सुरक्षित जेलें हैं यहाँ की, अदालतें भी, कानून भी, वकील भी उनके गुर्गे भी, सब से सब एकदम गऊ, आप जहाँ भी रहना चाहेंगे व्यवस्था करा दी जायेगी, अस्पताल में रहें तो भी कोई बात नहीं हम आप जैसों की सेहत का खयाल रखने वालों में से हैं, सच्ची कहता हूँ भाई खुदा ने चाहा तो एकाध साल में ही मोटे हो जाओगे, जब तक जी करे हमसे सेवा-चाकरी करवाओ, और जब जाने की इच्छा हो बोल देना, हम आपको फ़िर से हवाई जहाज का अपहरण करने की तकलीफ़ नहीं देंगे..वैसे ही छोड़ देंगे.. हाँ, लेकिन आने से पहले "मुझे भारतीय न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है" यह सूत्रवाक्य बोलना मत भूलना... फ़िर देखना कैसे हाथों-हाथ उठाये जाते हो हमारे चिरकुट मीडिया द्वारा, जो आपकी बरसों पुरानी फ़िल्में दिखा-दिखा कर ही टाईम पास कर रहा है, मुम्बई बम ब्लास्ट के चौदह साल बाद फ़ैसले आना शुरु हुए हैं और अभी सुप्रीम कोर्ट बाकी है, तो भाई आपकी बाकी की जिन्दगी तो आराम से कटना तय है यहाँ... फ़िर आपके भाई-बन्धु भी काफ़ी मौजूद हैं यहाँ पहले से ही, जहाँ चार यार मिल जायेंगे रातें गुलजार हो जायेंगी...
आपकी मदद के लिये यहाँ राजनैतिक पार्टियाँ हार-फ़ूल लिये तैयार खडी़ हैं, इधर आपने पावन धरती पर कदम रखा और उधर तड़ से आपकी संसद सदस्यता पक्की... फ़िर मानवाधिकार वाले हैं (जो सूअर के मानवाधिकार भी सुरक्षित रखते हैं)... कई "उद्दीन" जैसे शहाबुद्दीन, तस्लीमुद्दीन और सोहराबुद्दीन (कुछ सरेआम, कुछ छुपे हुए) भी मौजूद हैं जो आपको सर-माथे लेने को उतावले हो उठेंगे.. बस..बस अब मुझसे बयान नहीं किया जाता कि आपको कितनी-कितनी सुविधायें मिलने वाली हैं यहाँ...। मन पुलकित-पुलकित हो रहा है यह सोच-सोचकर ही कि जिस दिन आप इस "महान" देश में पधारेंगे क्या माहौल होगा...यहाँ पासपोर्ट की अदला-बदली आम बात है, कार से कुचलना और बरी होना तो बेहद मामूली बात है, और आप तो माशाअल्लाह.. अब आपकी तारीफ़ क्या करूँ, आपने बडे़ काम किये हैं कोई ऐरे-गैरे जेबकतरे या झुग्गी वाले थोडे़ ही ना हैं आप, अकेले मध्यप्रदेश में बडे़ उद्योगपतियों पर सिर्फ़ बिजली का हजारों करोड़ रुपया बकाया है, मतलब कि आप अकेले नहीं रहेंगे यहाँ... बस अब और मनुहार ना करवाओ... कराची, दुबई, मुम्बई पास-पास ही तो है...आ जाओ... कहीं मुशर्रफ़ का दिमाग सटक गया तो.. नहीं..नहीं.. रिस्क ना लो, आप तो दुनिया की सबसे "सेफ़" जगह पर आ ही जाओ... मैं इन्तजार कर रहा हूँ...
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मंगलवार, 17 जुलाई 2007 17:45

"माँ" पर निबन्ध : माँ से पहचान

राहुल.. होमवर्क हो गया क्या ? चलो जल्दी करो.. स्कूल को देर हो रही है । हो गया मम्मी.. देखो स्कूल में मुझे "मेरी माँ" पर निबन्ध लिखकर ले जाना है, मैने लिखा है - "मेरी माँ मुझे जल्दी उठाती है, होमवर्क करवाती है, पढा़ती है, मुझे कहानियाँ सुनाती है, मुझे डॉक्टर के यहाँ ले जाती है..." चलो,चलो ठीक है, जल्दी से नाश्ता कर लो... बस आती ही होगी । माँ ने राहुल को मदद करके उसे स्कूल भेज दिया । लेकिन शाम को जब राहुल स्कूल से वापस आया तो गुमसुम सा था, निराश सा था । स्कूल में मैडम ने कहा कि जो तुम लोग लिखकर लाये हो, वह तो सभी बच्चों ने थोडे-बहुत फ़ेरबदल के साथ लिखा है, तुम लोगों ने निबन्ध में नया क्या लिखा ? माँ तुम्हारे लिये इतना कुछ करती है, इसलिये वह तुम्हें अच्छी लगती है, लेकिन अपनी माँ के बारे में तुम्हें क्या-क्या मालूम है, वह लिखो... तुम्हारी माँ को क्या पसन्द-नापसन्द है, उसके शौक क्या हैं, उसका जन्मदिन, उसकी मेहनत... इन सब के बारे में तुम्हारे पिताजी को, तुम्हारी दीदी और भैया को क्या लगता है, तुम लोग अपनी माँ के लिये क्या करते हो ? इन सब बातों को देखो, परखो और निरीक्षण करके नया निबन्ध लिखकर लाओ, चाहो तो अपने दीदी, भाई या पिताजी से मदद ले सकते हो... तुम लोग अब आठवीं के बच्चे हो, जरा अपना भी दिमाग लगाओ और फ़िर से निबन्ध लिख कर लाओ..
राहुल के निरीक्षण की शुरुआत हो गई.... माँ की पसन्द-नापसन्द... मैं तो सिर्फ़ आलू की सब्जी खाता हूँ, माँ तो सभी सब्जियाँ, चटनियाँ खाती है, हम सभी को ताजा परोसती है, और यदि किसी दिन कम पड़ जाये तो थोडा़ सा ही खाती है.. बचा हुआ खाना बेकार ना जाये इसलिये कई बार खामख्वाह एक रोटी ज्यादा भी खा लेती है । ताजा और गरम खाना हमें परोसती है, और सुबह का या कल का बासी खुद की थाली में लेती है...अरे.. मैने तो कभी माँ से नहीं कहा कि आज मुझे बासी खाना दे दो, ताजी रोटी तुम खा लो.. मैं ही क्यों, दीदी, भैया और पिताजी ने भी माँ से ऐसा नहीं कहा । मुझे टेबल टेनिस खेलना पसन्द है, इसलिये माँ ने मेरे बर्थ-डे पर बैट लाकर दिया । माँ के शौक क्या हैं ? ... हाँ ठीक.. उसे पत्रिकायें पढना और हारमोनियम बजाना अच्छा लगता है, लेकिन बहुत सालों से हमारा हारमोनियम खराब हो गया है, माँ ने तो सभी से कहा था, लेकिन ना तो भैया, न पापा, किसी ने उस हारमोनियम को ठीक नहीं करवाया... थोडा़ सा समय मिलता है तो माँ कुछ पढने बैठ जाती है, लेकिन एकाध पुस्तक खरीदने की बात चलते ही पापा कहते हैं, पत्रिकायें बहुत महंगी हो गई हैं, इतने में तो दीदी की एक किताब आ जायेगी । अब.. रंग.. रंग.. रंग.. माँ को कौन सा रंग पसन्द है ? पता नहीं, क्योंकि माँ खुद के लिये बहुत ही कम साडियाँ खरीदती है, शादी-ब्याह में जो मिल जाती हैं उसी से काम चलाती है, हाँ, लेकिन बिस्तर की चादरें माँ ने हल्के नीले रंग की ली थीं... निबन्ध में नीला लिख लेता हूँ.. । माँ का जन्मदिन.. कब होता है.. मैडम ने कहा है कि कुछ भी माँ से नहीं पूछना है, दीदी ने बताया - ४ जनवरी... इस दिन हम लोग क्या करते हैं... छिः माँ का जन्मदिन तो हमने कभी ठीक से मनाया ही नहीं.. मेरे, दीदी और पापा के बर्थ-डे पर माँ लौकी का हलवा, गुलाब जामुन और पुरणपोली बनाती है । माँ को कौन सी मिठाई पसन्द है ? मालूम नहीं.. क्यों पापा, माँ को मीठे में क्या पसन्द है ? पापा... पापा... "अरे क्या चाहिये, मैं अखबार पढ रहा हूँ, दिखता नहीं क्या ? माँ से पूछो.. मुझे क्या मालूम !
पिछले हफ़्ते दीदी अपनी सहेलियों के साथ पिकनिक गई थी.. माँ ने सुबह जल्दी उठकर उसके लिये आलू की सब्जी और पूडि़याँ बनाकर दी थीं, पापा ने जो पैसे दिये थे, उसके अलावा अपने पास से पचास रुपये भी दिये... माँ कब पिकनिक पर गई थी ? याद नहीं.. पिछले महीने माँ के महिला मंडल की पिकनिक थी, लेकिन पिताजी ने अपने दोस्तों को खाने पर बुला लिया था और माँ पिकनिक पर नहीं जा पाई । माँ की पढाई के बारे में...मुझे ऐसा याद आ रहा है कि माँ किसी को बता रही थी कि दो मामाओं की पढाई के लिये माँ को कॉलेज बीच में ही छोड़ना पडा़ और उसकी शादी कर दी गई थी । अखबार पढना भी माँ को बहुत पसन्द है, दोपहर में सारे काम निपटाकर माँ अखबार पढती थी, लेकिन दीदी कॉलेज जाने लगी और मैं आठवीं में आ गया तो पिताजी ने हमारी अंग्रेजी सुधारने के लिये हिन्दी अखबार बन्द करके इंग्लिश अखबार लगवा दिया । माँ को टीवी देखना भी अच्छा लगता है, लेकिन रात को पिताजी घर आते ही अंग्रेजी कार्यक्रम और न्यूज लगा देते हैं और मैं दोपहर में कार्टून देखता हूँ, इन सब के बीच माँ को टीवी भी देखने को नहीं मिलता । माँ की सहेलियाँ... एकाध ही हैं महिला मंडल को छोड़कर... मतलब इतने सारे काम करते-करते माँ को सहेलियों के यहाँ जाने का समय ही नहीं मिलता... दीदी अपनी सहेलियों के साथ पिकनिक, फ़िल्में जाती है, मैं शाम को क्रिकेट खेलने जाता हूँ..पिताजी के दोस्त भी हर रविवार को ताश खेलने आ जाते हैं, माँ उनके लिये चाय-नाश्ता बनाती रहती है । माँ को शाम को घूमने जाना अच्छा लगता है, लेकिन पिताजी तो हमेशा रात को देर से घर आते हैं, मैं खेलने में मगन, दीदी और भैया अपने-अपने दोस्तों में, ऐसे में माँ अकेले ही सब्जी खरीदने के बहाने घूमकर आती है, लेकिन उसे वहाँ से भी जल्दी लौटना पडता है, क्योंकि यदि उसे देर हो जाये तो हम "भूख लगी..भूख लगी" करके उसे परेशान कर देते हैं । माँ कभी-कभी क्यों जरा-जरा सी बात पर चिढ जाती है, अब मुझे समझने लगा है ।
मैडम ने निबन्ध लिखने के लिये दस दिन का समय दिया था, राहुल का निरीक्षण जारी था... माँ के कामकाज, उसकी दिनचर्या और दूसरों के साथ उसकी तुलना करते-करते राहुल की धीरे-धीरे अपनी माँ से "पहचान" हो गई थी.. माँ पर निबन्ध लगभग पूरा हो चला था... और अचानक निबन्ध समाप्त करते-करते उसकी कॉपी पर दो बूँद आँसू टपक पडे़ ।
(एक मराठी रचना का अनुवाद, आंशिक फ़ेरबदल व सम्पादन के साथ)
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दादा कोंडके - यह नाम आते ही हमारे सामने छवि उभरती है द्विअर्थी संवादों वाली फ़िल्में बनाने वाले, एक बेहद साधारण से चेहरे मोहरे वाले, नाडा़ लटकती हुई ढीली-ढाली चड्डीनुमा पैंट पहनने वाले, अस्पष्ट सी आवाज में संवाद बोलने वाले एक शख्स की । दादा कोंडके के नाम पर अक्सर हमारे यहाँ का तथाकथित उच्च वर्ग समीक्षक नाक-भौंह सिकोड़ता है, हमेशा दादा को एक दोयम दर्जे का, सिर्फ़ द्विअर्थी और अश्लील संवादों के सहारे अपनी फ़िल्में बनाने वाले के रूप में उनकी व्याख्या की जाती है । यह सुविधाभोगी वर्ग आसानी से भूल जाता है कि मल्टीप्लेक्स के बाहर भी जनता रहती है और उसे भी मनोरंजन चाहिये होता है, उसी वर्ग के लिये फ़िल्में बनाकर दादा का नाम लगातार नौ सिल्वर जुबली फ़िल्में बनाने के लिये "गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स" में शामिल हुआ है (जबकि राजकपूर, यश चोपडा़ और सुभाष घई की भारी-भरकम बजट और अनाप-शनाप प्रचार पाने वाली फ़िल्में कई बार टिकट खिडकी पर दम तोड़ चुकी हैं)।

हिन्दी फ़िल्मों के कलाकार, निर्देशक और यहाँ तक कि फ़िल्म समीक्षक भी एक विशेष प्रकार के घमंड में रहते हैं । उन्हें लगता है कि कुछ चुनिंदा हिन्दी फ़िल्मों में काम करके, करोडों रुपये कमाकर उन्होंने कोई बहुत बडा तीर मार लिया हो या "कला" की बहुत सेवा कर दी हो । जबकि हकीकत यह है कि रजनीकांत की "फ़ैन फ़ॉलोइंग" के आगे अमिताभ बच्चन कहीं नहीं ठहरते, यहाँ तक कि भोजपुरी में भी रवि किशन का जलवा शाहरुख से कहीं ज्यादा है । मराठी भाषा में तो नाटकों की इतनी समृद्ध परम्परा है कि उसके कथ्य, प्रस्तुतीकरण और अभिनय (और सबसे बढकर, एक बडे़ दर्शक वर्ग) के आगे हिन्दी के नाटक कहीं नहीं ठहरते, एक मराठी कलाकार प्रशान्त दामले का नाम रिकॉर्ड बुक्स में इसलिये है कि उन्होंने एक ही दिन में अलग-अलग नाटकों के पाँच शो किये, उन्होंने अब तक तेईस वर्ष में लगभग आठ हजार नाटकों के शो किये, लेकिन फ़िर भी ना जाने क्यों क्षेत्रीय भाषा के कलाकारों को हिन्दी का एक वर्ग जरा हेय दृष्टि से देखता है । दादा कोंडके ने कुछ फ़िल्में हिन्दी में भी बनाईं और वे हिट भी हुईं, लेकिन आरोप लगाने वाले सदा यही राग अलापते रहे कि दादा अश्लील और द्विअर्थी संवाद रखते हैं, इस कारण उनकी फ़िल्में चलती हैं । लेकिन ये आरोप लगाने वाले महेश भट्ट और उनकी टीम को भूल जाते हैं, जो हीरोईन को अर्धनग्न दिखाने के बावजूद फ़िल्म हिट नहीं करवा पाते । खैर.. इस लेख का उद्देश्य है जनता के दिमाग में दादा कोंडके को लेकर बनी छवि को बदलना ।


जन्माष्टमी को मुम्बई के लालबाग इलाके में एक साधारण से परिवार में पैदा हुए दादा कोंडके को बचपन में लोग कृष्णा कहकर बुलाते थे । परिवेश के कारण उनका बचपन गलियों और छोटे-छोटे झगडों में बीता, खुद दादा के शब्दों में - "मेरे बचपन में सभी मुझसे डरते थे, क्योंकि मैं मारपीट करने से नहीं हिचकता था, हमारे मोहल्ले की किसी लड़की को छेडा़ कि समझो उसपर सोडावाटर की बोतलों, ईंटों और पत्थरों से हमला हो जाता था" । बचपन से ही उनमें संगीत की प्रतिभा थी, इसीलिये जब वे एक स्थानीय बैंड पार्टी में शामिल हुए तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ, और इस कारण पहले लोग उन्हें बैंडवाले दादा कहा करते थे । उन्हें नाटकों में पहला मौका दिया वसंत सबनीस ने अपने नाटक "विच्छा माझी पुरी करा" (मेरी इच्छा पूरी करो) । अपने गजब के कॉमेडी सेंस और संवाद अदायगी के कारण दादा कोंडके और वह नाटक बेहद हिट हुआ, उस नाटक के पन्द्रह सौ से अधिक शो में दादा ने काम किया ।

मराठी फ़िल्मों के पितामह तुल्य श्री भालजी पेंढारकर ने दादा को पहली बार "तांबडी माती" (लाल मिट्टी) फ़िल्म मे काम दिया, फ़िर उसके बाद आई फ़िल्म "सोंगाड्या" (बहुरूपिया जोकर) ने उन्हें प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँचा दिया, और उसके बाद तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा । एक के बाद एक हिट और सुपरहिट की झडी लगा दी दादा ने । एक समय साठ रुपये महीने पर "अपना बाजार" में पैकिंग करने वाले इस गांवठी व्यक्ति को मराठी जनता ने भरपूर प्यार और पैसा दिया, चाल के एक मामूली से कमरे से मुम्बई के शिवाजी पार्क जैसे पॉश इलाके में एक अपार्टमेंट का मालिक और करोड़पति बनाया, वही शिवाजी पार्क जहाँ सचिन और गावस्कर खेलते-खेलते बच्चे से बडे़ हुए । दादा की पृष्ठभूमि मराठी "तमाशा" और नाटकों की थी इसलिये अपनी फ़िल्मों में भी उन्होंने आम आदमी से जुडे मुद्दों और उसके मनोरंजन का पूरा खयाल रखा । वे हमेशा कहते थे कि "मेरी फ़िल्में मिल मजदूरों, किसानों और सडक के आदमी के लिये हैं, क्योंकि उन्हें भी मनोरंजन का पूरा हक है । मेरी फ़िल्में उच्च वर्ग के लोगों के लिये नहीं हैं, ये तथाकथित उच्च वर्ग के लोग मेरी फ़िल्म यदि अच्छी भी होगी तो एक बार ही देखेंगे, लेकिन एक श्रमिक मेरी फ़िल्म तीन-तीन बार देखेगा और उसे हमेशा मजा आयेगा...(ख्यात अभिनेता और निर्देशक सचिन ने उनके नाटक "विच्छा माझी पुरी करा" अठ्ठाईस बार और "सोंगाड्या" फ़िल्म दस बार देखी) मेरी फ़िल्में "मास" के लिये हैं, "क्लास" के लिये नहीं"। जो व्यक्ति अपनी सीमायें वक्त रहते जान जाता है वही सफ़ल भी हो जाता है, दादा को अपनी शक्लो-सूरत की सीमाओं का ज्ञान था इसलिये कभी भी उन्होंने फ़िल्मों में "शिवाजी" का रोल करने का दुस्साहस नहीं किया, हाँ.. अपने अन्तिम दिनों में वे एक गंभीर फ़िल्म पर काम कर रहे थे, वे शांताराम बापू की "दो आँखे बारह हाथ" से बहुत प्रभावित थे और वैसी ही फ़िल्म बनाना चाहते थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था ।

वे हमेशा जमीन से जुडे़ अभिनेता रहे... दोस्तों को बच्चों की शादी के लिये पैसे की मदद करना, लोगों के आग्रह पर उनके घर जाकर फ़ोटो खिंचवाना, मुफ़्त में उदघाटन करना तो उन्होंने कई बार किया । जब वे सुपर स्टार बन गये थे तब भी वे अपने पुराने बैंड वाले साथियों को नहीं भूले, जब भी समय मिलता वे उनसे मिलने जरूर जाते और उनके साथ ही दरी पर बैठते, जबकि वे लोग कहते ही रहते कि दादा अब आप बडे़ आदमी बन गये हो कम से कम कुर्सी पर तो बैठो...उनके सेक्रेटरी और स्टाफ़ के सदस्य अक्सर उनसे कहते कि दादा आपको फ़िल्म के सेट पर या आऊटडोर में गाँवों में किसी से पान नहीं लेना चाहिये, हो सकता है उसमें जहर मिला हो... लेकिन दादा हमेशा कहते थे कि जिस दिन मैं स्टार जैसा बर्ताव करूँगा तो मैं खुद से ही निगाह नहीं मिला सकूँगा और ये समझूँगा कि क्या मैने अपने बचपन के दिन भुला दिये ? नहीं.. मैं आम आदमी का हूँ और उसी का रहूँगा...।

लगभग बीस वर्षों तक वे मराठी फ़िल्मों के एकछत्र राजा रहे, लेकिन हिन्दी फ़िल्मों में उन्हें उस तरह की सफ़लता नहीं मिली । उन्हें हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री का मिजाज कभी समझ नहीं आया, वे अक्सर मजाक में कहा करते थे कि हिन्दी फ़िल्मों के कलाकार "चरण सिंह" हैं - "वे पल भर में आपके चरण पकड़ते हैं और कुछ दिन बाद ही चरण खींचने भी लगते हैं", "हिन्दी फ़िल्मों की हीरोईने कोई काम-धाम ना होने पर भी हमेशा कहती हैं कि मैं ३६ फ़िल्मों में काम कर रही हूँ.." । अस्सी के मध्य दशक में जब शिवसेना का जनाधार उफ़ान पर था तब बालासाहेब ठाकरे के साथ दादा कोंडके सर्वाधिक भीड़खेंचू नेता थे । दादा की पहली सुपरहिट फ़िल्म "सोंगाड्या" के प्रदर्शन के दौरान जबकि दादा ने कोहिनूर थियेटर अग्रिम राशि देकर बुक कर लिया था, बावजूद इसके थियेटर मालिक देव आनन्द की फ़िल्म "तीन देवियाँ" प्रदर्शित करने पर अड़ गया था, तब बालासाहेब ठाकरे ने अपने "प्रभाव" से दादा कोंडके की फ़िल्म उसी थियेटर में प्रदर्शित करवाई, उस दिन से बाल ठाकरे और दादा अभिन्न मित्र बन गये और मित्रता भी ऐसी कि दादा के पार्थिव शरीर पर बाल ठाकरे ने सिर्फ़ हार नहीं चढाये बल्कि उनके पैरों पर सिर भी रखा । मजे की बात यह है कि बाल ठाकरे और दादा कोंडके दोनो का कैरियर लगभग साथ-साथ ही शुरु हुआ और अपने शीर्ष पर पहुँचा...(ये और बात है कि जिस कार्टूनिस्ट बाल ठाकरे की तारीफ़ आर.के.लक्ष्मण नें सर्वाधिक प्रतिभाशाली और प्रभावशाली के रूप में की थी, वह राजनीति की भूलभुलैया में उस कला को खो बैठा), लेकिन दादा कोंडके ने कभी अपनी राह नहीं खोई और आम आदमी के लिये फ़िल्में बनाना जारी रखा ।

दरअसल उनकी कॉमेडी यात्रा का आरम्भ तब हुआ जब एक ही साल के अन्दर उनके कई नजदीक के नाते-रिश्तेदारों की मृत्यु हो गई, दादा कहते थे - मैं इन मौतों से बुरी तरह से हिल गया था, एक साल तक मैने किसी से बात नहीं की, खाने की इच्छा भी नहीं होती थी, मुझे लगता था कि मैं पागल हो जाऊँगा, लेकिन अचानक पता नहीं क्या हुआ मैने मन में ठाना कि अब अपने दुःख भुलाकर मैं लोगों को हँसाऊँगा..और मैने कॉमेडी शुरु कर दी" । दादा कोंडके ने कई लोगों को मौका दिया, जिनमें से प्रमुख हैं मराठी के एक और सुपरस्टार अशोक सराफ़ और संगीतकार राम-लक्ष्मण । दादा की फ़िल्मों की हीरोइन अधिकतर फ़िल्मों में ऊषा चव्हाण ही रहीं, दादा पर फ़िल्माये अधिकतर गाने महेन्द्र कपूर ने गाये और हीरोईन के ऊषा मंगेशकर ने । महेन्द्र कपूर ने पंजाबी होते हुए भी मराठी में दादा के लिये इतने गाने गाये कि एक बार दादा ने मजाक में उनसे पूछ लिया था कि "महेन्द्र जी कहीं अब आप हिन्दी गाना भूल तो नहीं गये" । १४ मार्च १९९८ को अड़सठ वर्ष की आयु में दादा का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया और मराठी सिनेमा का एक युग समाप्त हुआ...

संक्षेप में कहें तो - दादा कोंडके हों या रजनीकांत (जो आज भी अपने बरसों पुराने ड्रायवर दोस्त से मिलने बंगलोर जाते हैं तो उसी के घर ठहरते हैं) या एनटीआर (दो रुपये किलो चावल वाली सफ़ल योजना उन्हीं की देन थी), ये सभी लोग महान इसलिये बने हैं क्योंकि वे शिखर पर पहुँचने के बावजूद जमीन से जुडे रहे, हमेशा आम आदमी की समस्याओं को लेकर फ़िल्में बनाईं या गरीब तबके के लोगों का शुद्ध मनोरंजन किया । मुझे पूरा विश्वास है कि यदि दादा कोंडके आज विज्ञापन बनाते तो वे ब्रा-पैंटी और कंडोम के विज्ञापन भी इस तरह से बनाते कि जिसे समझना है वह पूरी तरह समझ जाये और जिस उम्र के लायक नहीं है वह बिलकुल भी ना समझ पाये, और तब शायद दादा को द्विअर्थी और अश्लील कहने वाले बगलें झाँकते (अभी वे लोग इसलिये बगलें झाँकते हैं कि टीवी पर दिखाया जा रहा "तमाशा" और तथाकथित "सभ्य विज्ञापन" उन्हें अश्लील नहीं दिखते)। अश्लीलता या सेक्स मानव की आँखों से दिमाग मे होते हुए कमर के नीचे पहुँचता है, यदि दिमाग पर व्यक्ति का नियंत्रण है तो अनावृत्त नारी या अश्लील बातें भी पुरुष को उत्तेजित नहीं कर सकतीं । यह लोगों को तय करना है कि "खुल्लमखुल्ला" अच्छी बात है या "द्विअर्थी" होना... उम्मीद है कि दादा कोंडके की तरफ़ देखने का हिन्दीभाषियों का नजरिया कुछ बदलेगा...
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