हमें बंगाल पैटर्न पर हत्याएँ करनी चाहिए : किसने कहा?

Written by रविवार, 26 मार्च 2017 18:28

पहले आप ये बयान पढ़िए... फिर बताता हूँ कि यह किसने कहा?? -- “....हमें बंगाल पैटर्न पर अपने विरोधियों की हत्याएँ करनी चाहिए, जैसी हत्याएँ आप लोग केरल में करते हो उससे मीडिया में हंगामा ज्यादा होता है, और विपक्षियों को भी मौका मिलता है. केरल में आप लोग खूनखराबा बहुत करते हो.

हमें बंगाल से सीखना चाहिए कि किस तरह वहाँ हमारे कामरेड पहले विरोधी का चुपचाप अपहरण कर लेते हैं, फिर उसका मर्डर करने के बाद नमक भरी बोरी में जमीन के अंदर गाड़ देते थे... वर्षों तक किसी को पता भी नहीं चलता और काम हो जाता था...”. रोंगटे खड़े हो गए ना?? जी हाँ!! ये उदगार हैं केरल के वर्तमान मुख्यमंत्री पिनरई विजयन के. जब उन्होंने यह बयान दिया था, उस समय वे चौराहे पर खड़े कोई मामूली गुण्डे या मुम्बईया लौंडेछाप माफिया नहीं, बल्कि खुद को राष्ट्रीय पार्टी कहने वाली माकपा के वरिष्ठ राज्य महासचिव थे.

इस खौफनाक और वीभत्स बयान की सत्यता परखने के लिए आपको माकपा के ही एक पूर्व सांसद एपी अब्दुल्ला कुट्टी के उस लेख को पढ़ना होगा, जिसमें उन्होंने यह “कटु सत्य” बयान किया है. केरल से निकलने वाले काँग्रेस के मुखपत्र “वीक्षनम” में बाकायदा लिखित स्वरूप में खुल्लमखुल्ला लिखे अपने लेख में अब्दुल्ला कुट्टी ने बताया कि जिस समय पिनरई विजयन ऐसा कह रहे थे, तो मैं भौंचक्का होकर उनका मुँह देखता रह गया. एपी अब्दुल्ला कुट्टी की बात पर इसलिए विश्वास किया जाना चाहिए, क्योंकि एक तो वे खुद हिंसक माकपाई भूतकाल लिए हुए हैं, और अब काँग्रेस की तरफ से कन्नूर सीट के विधायक हैं. कन्नूर जिला संघ के स्वयंसेवकों की हत्याओं के लिए बहुत बदनाम हो चुका है. इस बयान पर विश्वास करने का दूसरा कारण यह है कि अब्दुल्ला कुट्टी के इस लेख पर पिनारई विजयन को छोड़कर माकपा के किसी भी नेता ने ना तो कोई आपत्ति दर्ज करवाई और ना ही मानहानि का केस दायर किया. अब्दुल्ला कुट्टी ने भी प्रेस कांफ्रेंस में कहा है कि, मैंने जो लिखा है मैं उस पर कायम हूँ और मुझे नहीं लगता कि माकपा के पास इसे झुठलाने का नैतिक साहस है, क्योंकि मैं खुद माकपाई रहा हूँ और इनकी रग-रग से वाकिफ हूँ.”.

pinarai vijayan72

अपने इस लेख में अब्दुल्ला लिखते हैं कि बंगाल के वामपंथियों द्वारा विरोधियों को नमक की बोरी में डालकर जमीन में गाड़ने संबंधी यह “सलाह”, पिनराई विजयन ने 5 मार्च 2008 को कन्नूर के ही अझिकोडम पार्टी दफ्तर में सरेआम कलेक्टर के सामने और दर्जनों कार्यकर्ताओं के बीच दी थी. अब्दुल्ला ने यह भी बताया कि इस मीटिंग में वामपंथी सांसद पी करुणाकरण, विधायक पी सथिदेवी भी उपस्थित थे. लेख में अब्दुल्ला ने आगे लिखा है कि अपने विरोधियों को खत्म करने की यह ट्रिक उस समय उनके मुँह से निकली, जब विधायक सथिदेवी ने शिकायत की, कि राज्य में धीरे-धीरे भाजपा-संघ का प्रभाव बढ़ता जा रहा है... तभी विजयन ने कहा कि यदि हम लोग भी अधिक खूनखराबा न करते हुए “बंगाल स्टाईल का पैटर्न” अपना लें, तो मृत विरोधी का नामोनिशान तक न मिले. इस बयान को सुनकर मैं हैरान रह गया, पार्टी के एक वरिष्ठतम नेता के मुँह से ऐसी बातें सुनने के बाद मैंने सोचा कि इसे कन्फर्म किया जाए. कुछ दिनों बाद संसद के बाहर मुझे बंगाल के वामपंथी सांसद अनिल बासु मिल गए. जब मैंने उनसे पिनरई विजयन के इस बयान के बारे में पूछा तो उन्हें इस पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ. अनिल बसु ने कहा कि पश्चिम बंगाल में हम खून बहाने से परहेज करते हैं, अक्सर अपने विरोधियों को जिन्दा ही गाड़ देते हैं, नमक से लाश जल्दी गल जाती है और बाहरी दुनिया को विरोधी की हड्डी भी नहीं मिलती. जब अनिल बसु यह बोल रहे थे उस समय संसद के दरवाजे पर उनके साथ पी सुरेश कुरूप भी थे, जो एतुमन्नूर से विधायक भी रहे हैं. पिनरई विजयन से सम्बन्धित यह बात पहले मैंने अपनी आत्मकथा “निंगल एन्ने कोंग्रेस अक्की” (आपने मुझे काँग्रेसी बनाया) में भी लिखी थी, लेकिन माकपा के हिंसक कार्यकर्ताओं की प्रवृत्ति देखते हुए उसे हटा लिया था, लेकिन अब मैं उस पुस्तक के दसवें संस्करण में इसे शामिल करने जा रहा हूँ, चाहे जो हो जाए. अब मुझे यह भी समझ में आ रहा है कि आखिर अच्युतानंदन जैसे वरिष्ठ माकपाई पिनरई जैसे हिंसक व्यक्ति की इन नीतियों के खिलाफ क्यों नहीं बोले. पिनरई विजयन केवल मार्क्स तथा लेनिन की हिंसा वाली भाषा समझते हैं और कन्नूर के लोग यह बात अच्छी तरह जानते हैं. कन्नूर का एक भी मीडिया वाला विजयन के खिलाफ एक शब्द भी नहीं लिख सकता. उल्लेखनीय है कि अब्दुल्ला कुट्टी कन्नूर सीट से दो बार माकपा के सांसद रह चुके हैं. 2009 में गुजरात सरकार के विकास की तारीफ़ करने के कारण इन्हें माकपा से निकाल दिया गया (मोदी की तारीफ़, याने गुनाह-ए-अज़ीम). इसके बाद अब्दुल्ला काँग्रेस में शामिल हो गए और नवंबर 2009 के उपचुनावों तथा 2011 के चुनावों में भी जीते.

अब्दुल्ला कुट्टी के इस बयान को लगभग तीन वर्ष होने आए... अभी तक उन्होंने इसमें जिन-जिनके नाम लिए हैं, उनकी तरफ से ना तो कोई खंडन आया है और ना ही मानहानि का दावा पेश किया गया है... इसी से समझा जा सकता है कि वामपंथी अपनी हिंसा को लेकर कितने आश्वस्त हैं. साथ ही यह तथ्य भी ध्यान देने लायक है कि पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु की वामपंथी सरकार के हजारों विरोधी कैसे लापता(?) हुए होंगे, और इन्होंने वहाँ पर तीस वर्षों तक किस प्रकार से सत्ता हासिल की होगी. इसी वामपंथी हिंसक पद्धति को ममता बनर्जी ने भी अपना रखा है (बल्कि ममता ने तो वामपंथी कैडर को ही तृणमूल में शामिल कर लिया है, क्योंकि वे जानते हैं कि विपक्षियों के साथ हिंसा कैसे की जाती है).... अब ममता का भी यह दूसरा कार्यकाल है.

अब इसका दूसरा पक्ष देखते हैं... डॉक्टर कुंदन चंद्रावत को तो जानते ही होंगे आप. संघ कार्यकर्ताओं की अनवरत हत्याओं से उत्तेजित होकर क्षणिक आवेश में पिनरई विजयन की गर्दन काटकर लाने वाले को ईनाम देने संबंधी उनके बयान को लेकर “मीडियाई टट्टुओं” ने कैसा बवाल खड़ा किया था. चंद्रावत को ताबड़तोड़ संघ की जिम्मेदारियों से मुक्त किया गया, संघ की तरफ से बाकायदा एक माफीनामा भी पेश किया गया. कुंदन चंद्रावत की फेसबुक वाल पर वामपंथियों ने हजारों की संख्या में माँ-बहन की गालियाँ लिखीं, लेकिन दस लाख स्वयंसेवक होने का दावा करने वाले संगठन के पाँच लोग भी चंद्रावत की फेसबुक वाल पर उनका बचाव करने, अथवा हिंसक वामपंथियों के गालीगलौज का जवाब देने नहीं पहुँचे. दूसरी तरफ विपक्षियों को नमक की बोरी में बन्द करके जमीन में गाड़ने की सलाह देने वाला व्यक्ति आज मुख्यमंत्री बन गया... क्योंकि बंगाल में उसके पूर्ववर्तियों ने भी तीस वर्ष तक ऐसे ही सत्ता हथिया रखी थी... हालाँकि वामपंथ के लिए यह कोई नई बात नहीं है, पूरे विश्व में लेनिन-मार्क्स-माओ-पोलपोट-चे ग्वेवारा-फिदेल कास्त्रो जैसों ने जनवाद और गरीबों के नाम पर अपने विरोधियों की करोड़ों हत्याएँ की हैं... 

लब्बेलुआब यह है कि भाजपा-संघ-ABVP को अभी वामपंथियों और काँग्रेस से बहुत कुछ सीखना बाकी है... हवा में चलने वाला मीडिया मैनेजमेंट में भी, और जमीन पर चलने वाली हिंसा में भी...

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