Super User

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I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

Website URL: http://www.google.com
GPS Microchips Terrorism Criminals RFID
अपराध को रोकने या आतंकवादियों के नेटवर्क को तोड़ने में विज्ञान ने बहुत बड़ा सहयोग किया है। विज्ञान की मदद से फ़िंगरप्रिंट, डीएनए (DNA) आदि तकनीकें तो चल ही रही हैं, साथ ही में एक प्रयोग “नार्को-टेस्ट” (Narcotics Test) का भी है, जिसमें अधिकतर अपराधी सच्चाई उगल देते हैं। हालांकि अभी नार्को टेस्ट की वीडियो रिकॉर्डिंग को न्यायालय में मान्यता हासिल नहीं है, क्योंकि अपराधी का उच्चारण अस्पष्ट और लड़खड़ाता हुआ होता है, लेकिन इस उगली हुई जानकारी का उपयोग पुलिस आगे अन्य जगहों पर छापे मारने या उसके साथियों के नाम-पते जानकर उन्हें गिरफ़्तार करने में करती है। इस लिहाज से “नार्को-टेस्ट” एक क्रांतिकारी कदम सिद्ध हुआ है।

बीती सदी में विज्ञान ने निश्चित ही बहुत-बहुत तरक्की की है। वैज्ञानिकों के कई प्रयोगों के कारण आम जनता के साथ ही सरकारों को भी काफ़ी फ़ायदा हुआ है, चाहे वह हरित क्रांति हो या मोबाइल क्रांति। वैज्ञानिक हमेशा जीवन को उद्देश्यपूर्ण और सुलभ बनाने के लिये ही नित्य नये प्रयोग करते रहते हैं, इन्हीं लाखों आविष्कारों में से एक है माइक्रोचिप का आविष्कार। जैसा कि नाम से ही जाहिर है “माइक्रोचिप” मतलब एक कम्प्यूटराइज्ड डाटा चिप जो आकार में अधिकतम चावल के एक दाने के बराबर होती है। अधिकतम इसलिये बताया ताकि पाठकों को इसके आकार के बारे में सही ज्ञान हो जाये, अन्यथा यह इतनी छोटी भी होती है कि इसे इंजेक्शन के सहारे किसी के शरीर में डाला जा सकता है, और व्यक्ति को इसका पता भी नहीं चलेगा। ये माइक्रोचिप दो तरह की तकनीकों में आती है, पहली है RFID (Radio Frequency Identification Device) और दूसरी होती है GPS (Global Positioning System)।



पहले हम देखेंगे GPS तकनीक वाली माइक्रोचिप के बारे में, क्योंकि यह तकनीक नई है, जबकि RFID वाली तकनीक पुरानी है। GPS (Global Positioning System) जैसा कि नाम से ही जाहिर है, एक ऐसी तकनीक है, जिसमें सम्बन्धित उपकरण हमेशा सैटेलाइट के माध्यम से जुड़ा रहता है, पूरी पृथ्वी पर जहाँ कहीं भी वह उपकरण जायेगा, उसकी “लोकेशन” का पता लगाया जा सकता है। यह तकनीक गत कुछ वर्षों में ही इतनी उन्नत हो चुकी है कि उपकरण के पाँच सौ मीटर के दायरे तक यह अचूक काम करती है (इसी तकनीक की सहायता से अमेरिका जीपीएस फ़ोन के सिग्नलों को पकड़कर, अब तक ओसामा पर कई मिसाइल आक्रमण कर चुका है)। इस तकनीक में जिस उपकरण या व्यक्ति को निगरानी में रखना है, उसकी त्वचा में एक माइक्रोचिप फ़िट कर दी जाती है, जिसका सम्बन्ध एक सामान्य जेण्ट्स पर्स के आकार के ट्रांसमीटर से होता है, यह ट्रांसमीटर लगातार सिग्नल भेजता रहता है, जिसे सैटेलाइट के माध्यम से पकड़ा जाता है। पश्चिमी देशों में आजकल कई बड़े उद्योगपतियों ने अपहरण से बचने के लिये इस तकनीक को अपनाया है, लेकिन इसका ॠणात्मक (Negative) पहलू यह है कि सिग्नल भेजने वाला वह ट्रांसमीटर सतत व्यक्ति के साथ होना चाहिये, और उसका साइज इतना बड़ा तो होता ही है कि उसे आसानी से छिपाया नहीं जा सकता (हालांकि उसमें भी ऐसे नये-नये प्रयोग हो चुके हैं कि कोई भी सिर्फ़ देखकर नहीं कह सकता कि यह “ट्रांसमीटर” है, जैसे ग्लोव्स, साबुन, पर्स, सिगरेट लाइटर आदि के आकारों में)। ऐसे में यदि अपहरणकर्ताओं को पहले से मालूम हो कि फ़लाँ व्यक्ति ने यह उपकरण लगवाया हुआ है, तो अपहरण करते ही सबसे पहले वे उस ट्रांसमीटर को पहचानने के बाद निकालकर फ़ेंक देंगे और अपने शिकार को कहीं दूर ले जायेंगे, लेकिन यदि वह ट्रांसमीटर किसी तरह से अपहृत व्यक्ति से दूर नहीं हो पाया तब तो अपराधियों की खैर नहीं, पुलिस तत्काल GPS से उस व्यक्ति की लोकेशन पता कर लेगी और अपहरणकर्ताओं पर चढ़ बैठेगी। आजकल मोबाइल या कारों में GPS तकनीक का जमकर उपयोग हो रहा है। मोबाइल गुम जाये तो ऑफ़ करने के बाद भी पता चल जायेगा कि वह कहाँ है, इसी प्रकार कार ड्रायवर के लिये रास्ता ढूँढने, टक्कर से बचाने आदि के लिये GPS का बड़ा रोल प्रारम्भ हो चुका है।



यहाँ तक तो हुई हकीकत की बात, अब मैं अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाता हूँ। सभी जानते हैं कि आजकल “नैनो-टेक्नोलॉजी” (Nano-Technology) का जोर है, “नैनो” यानी कि “बहुत ही छोटी” और वैज्ञानिकों में हरेक वस्तु छोटी से छोटी बनाने का जुनून सवार है, और यह जगह की दृष्टि से उपयोगी भी है। ऐसे में मेरे मन में एक सवाल आता है कि क्या यह GPS माइक्रोचिप भी “नैनो” आकार में लगभग “तरल द्रव्य” के रूप में नहीं बनाई जा सकती? यह इतनी “नैनो” होना चाहिये कि माइक्रोचिप और उसका ट्रांसमीटर दोनों को मानव शरीर में फ़िट कर दिया जाये और सामने वाले को इसका पता तक न चले। भविष्य की तकनीक को देखते हुए यह बिलकुल सम्भव है। अब सोचिये सुरक्षा एजेंसियों को इस “नैनो तकनीक” का कितना फ़ायदा होगा। जैसे ही कोई अपराधी या आतंकवादी पकड़ा जाये, उसे “नार्को-टेस्ट” के नाम पर बंगलोर ले जाया जाये, पहले तो “नार्को-टेस्ट” में जितना उगलवाया जा सकता है, निकलवा लिया जाये, फ़िर जाते-जाते, उस आतंकवादी के शरीर में यह GPS आधारित ट्रांसमीटर इंजेक्शन के जरिये रोपित कर दिया जाये। हमारी महान न्याय व्यवस्था, भ्रष्ट राजनेताओं और “देशद्रोही” वकीलों की मेहरबानी से आज नहीं तो कल वे खतरनाक आतंकवादी छूट ही जायेंगे, उस वक्त उन पर खास निगरानी रखने में ये माइक्रोचिप बेहद उपयोगी सिद्ध होंगी। जैसे ही कोई आतंकवादी छूटेगा, वह अपने अन्य साथियों से मिलने जरूर जायेगा, तब पुलिस GPS के जरिये उनका ठिकाना आसानी से ढूंढ लेगी, और उन पुलिसवालों में से कोई “असली देशभक्त” निकल आया तो वहीं उनके ठिकाने पर हाथोंहाथ “फ़ैसला” हो जायेगा। यदि वह अपने पुराने ठिकाने पर नहीं भी जाता, या अपने साथियों से नहीं भी मिलता, या किसी तरह से उसे पता चल जाये कि वह GPS की निगरानी में है, तब भी पुलिस को कम से कम यह तो पता रहेगा कि आज की तारीख में वह आतंकवादी भारत में है या पाकिस्तान, नेपाल, मलेशिया में है। सुरक्षा के लिहाज से इतना भी कुछ कम नहीं है।

सवाल है कि क्या ऐसी तकनीक फ़िलहाल उपलब्ध है? यदि नहीं तो क्या वैज्ञानिक इस पर काम कर रहे हैं? और जैसा मैं सोच रहा हूँ, यदि वैसी कोई तकनीक मिल जाये तो सुरक्षा एजेंसियों का काम कितना आसान हो जाये… लेकिन शायद फ़िलहाल ऐसी कोई GPS माइक्रोचिप नहीं आती जिससे कि रोपित व्यक्ति की एकदम सही-सही स्थिति पता चल जाये। हो सकता है कि मेरा यह संदेश देश-विदेश के वैज्ञानिकों और वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों तक पहुँच जाये और वे इस पर प्रयोगों को जोर-शोर से आगे बढ़ायें… वैसे आपको ये आइडिया कैसा लगा?

अगले भाग में RFID तकनीक माइक्रोचिप के बारे में थोड़ा सा…

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GPS Microchips Terrorism Criminals RFID
(भाग-1 से जारी)
पिछले भाग में हमने GPS तकनीक वाली चिप के बारे में जानकारी हासिल की थी, जो कि नवीनतम है, अब थोड़ा जानते हैं एक पुरानी तकनीक RFID के बारे में, जो कि अब काफ़ी आम हो चली है (जी हाँ भारत में भी…)

RFID तकनीक वाली माइक्रोचिप -

RFID तकनीक से काम करने वाली माइक्रोचिप के डाटा को पढ़ने के लिये एक विशेष “रीडर” की आवश्यकता होती है, जिसमें से उस व्यक्ति को गुजारा जाता है (उदाहरण के तौर पर मेटल डिटेक्टर जैसी)। साथ ही इस चिप की “रेंज” मात्र कुछ किलोमीटर तक ही होती है, अर्थात इसमें से निकलने वाली “फ़्रीक्वेंसी” को कुछ दूरी तक ही पकड़ा जा सकता है। इसमें माइक्रोचिप फ़िट किये गये व्यक्ति या जानवर को “स्कैन” किया जाता है, और उसका सारा डाटा कम्प्यूटर पर हाजिर होता है। अक्सर इस तकनीक का उपयोग पालतू जानवरों के लिये किया जाता है। आमतौर पर इस माइक्रोचिप का उपयोग उच्च सुरक्षा वाले इलाकों, महत्वपूर्ण दस्तावेजों की आलमारी, या पुलिस विभाग के गोपनीय विभाग में किया जाता है। इस प्रकार के विभागों में सिर्फ़ वही व्यक्ति घुस सकता है जिसकी बाँह के नीचे यह माइक्रोचिप फ़िट किया हुआ है, कोई अवांछित व्यक्ति जब उस “रेंज” में प्रवेश करता है तो अलार्म बजने लगता है। यह तकनीक परमाणु संस्थानों और सेना के महत्वपूर्ण कार्यालयों की सुरक्षा के लिये बहुत जरूरी है।



अमेरिका में तीस वर्ष पूर्व सबसे पहले भैंस पर इसका सफ़ल प्रयोग किया गया। उस भैंस को चरागाह और जंगल में खुला छोड़ दिया गया और उन पर फ़्रीक्वेंसी के जरिये “निगाह” रखी गई, वे कहाँ जाती है, क्या-क्या खाती हैं, आदि। इस प्रयोग की सफ़लता के बाद तो मछलियों, बैलों, कुत्तों आदि को लाखों माइक्रोचिप्स लगाई जा चुकी हैं। इससे जानवर के गुम जाने पर उसे ढूँढने में आसानी हो जाती है। अब इन RFID चिप का उपयोग नाके पर ऑटोमेटिक पेमेंट के लिये कारों में (अमेरिका में चेक नाकों पर इस तकनीक से पेमेंट सीधे क्रेडिट कार्ड के जरिये कट जाता है), लाइब्रेरी की महत्वपूर्ण और कीमती पुस्तकों में (ताकि चोरी होने की स्थिति में उसका पता लगाया जा सके), यहाँ तक कि वालमार्ट जैसे बड़े मॉल में कीमती सामानों में भी लगाया जाता है (चोर तो हर जगह मौजूद होते हैं ना!!)। इस तकनीक में सुरक्षा एजेंसियों को सिर्फ़ जगह-जगह कैमरे फ़िट करने होते हैं और उन्हें इनकी रेडियो फ़्रिक्वेंसी से “तालमेल” करवा दिया जाता है, बस उन कैमरों के सामने से निकलने वाली हर माइक्रोचिप की गतिविधि, उसकी दिशा आदि का तत्काल पता चल जाता है।

11 सितम्बर के हमले के बाद अमेरिका में आज तक कोई आतंकवादी हमला नहीं हो पाया, जबकि भारत में तो हर महीने एक हमला होता है और मासूम नागरिक मारे जाते हैं। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि हरेक नागरिक को यह “चिप” लगवा लेना चाहिये तथा इसे “निजी मामलों में दखल” न समझा जाये बल्कि देश की सुरक्षा के लिहाज से इसे देखा जाना चाहिये। हालांकि “निजता (Privacy) में सरकारी निगरानी” जैसी बात को लेकर, जनता का रुख अभी नकारात्मक है, लेकिन प्रशासन लोगों को राजी करने में लगा हुआ है। इसे लगाने की तकनीक भी बेहद आसान है, एक मामूली इंजेक्शन के जरिये इसे कोहनी और कंधे के बीच में पिछले हिस्से में त्वचा के अन्दर फ़िट कर दिया जाता है। एक मिर्गी के मरीज ने इसे फ़िट करवा लिया है, जब भी उसे दौरा पड़ने की नौबत आती है, या वह बेहोशी की हालत में अस्पताल में लाया जाता है, इस “चिप” के कारण डॉक्टरों को उसके पिछले रिकॉर्ड के बारे सब कुछ पहले से मालूम रहता है और उसका इलाज तत्काल हो जाता है।

वैसे एक माइक्रोचिप की औसत उम्र 10 से 15 साल होती है, और एक बार फ़िट कर दिये जाने के बाद इसे निकालना आसान नहीं है। हरेक चिप का 16 अंकों का विशेष कोड नम्बर होता है, जिससे इसकी स्कैनिंग आसानी से हो जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन माइक्रोचिप को शरीर से निकाला जा सकता है, लेकिन उसके लिये पहले पूरे शरीर का एक्सरे करना पड़ेगा, क्योंकि वह चिप अधिकतर शरीर में स्किन के नीचे खिसकते-खिसकते कहीं की कहीं पहुँच जाती है। इसमें एक सम्भावना यह भी है कि कहीं वह अपराधी किसी मुठभेड़ में या आपसी गैंगवार में बुरी तरह घायल हो जाये, तो कहीं बहते खून के साथ यह माइक्रोचिप भी न निकल जाये।



अमेरिका की सबसे बड़ी माइक्रोचिप बनाने वाली कम्पनी “वेरीचिप कॉर्प” अब तक 7000 से ज्यादा माइक्रोचिप बना चुकी है जिसे विभिन्न पालतू जानवरों को लगाया जा चुका है, साथ ही 2000 माइक्रोचिप विभिन्न व्यक्तियों को भी लगाई जा चुकी है, जिनमें से अधिकतर गम्भीर डायबिटीज, अल्जाइमर्स पीड़ित या हृदय रोगियों को लगाई गई हैं। चूंकि यह तकनीक अभी नई है, इसलिये फ़िलहाल इसकी कीमत 200 से 300 डॉलर के आसपास होती है, लेकिन जैसे-जैसे यह आम होती जायेगी स्वाभाविक रूप से यह चिप सस्ती पड़ेगी। लेकिन जैसा कि मैंने पिछले लेख में कहा कि यदि “तरल” रूप में नैनो जीपीएस तकनीक वाली माइक्रोचिप आ जाये तो सुरक्षा एजेंसियों को जबरदस्त फ़ायदा हो जायेगा…

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Morning After Pills, FDA, health threats
ऐसा लगता है कि अब यह मान लिया गया है कि “नैतिक शिक्षा” की बात करना दकियानूसी है और सार्वजनिक स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में नैतिकता की बात करना बेवकूफ़ी। सरकारों की सोच है कि समाज को खुला छोड़ देना चाहिये और उस पर कोई बन्धन लागू नहीं करना चाहिये, ठीक वैसे ही जैसा कि सरकारों ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये किया हुआ है। फ़िल्मों और टीवी के बढ़ते खुलेपन ने बच्चों को तेजी से जवान बनाना शुरु कर दिया है, डॉक्टर भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि लड़कियों में मासिक धर्म की औसत आयु काफ़ी कम हो चुकी है। भारत के समाज में धीरे-धीरे कपड़े उतारने की होड़ बढ़ती जा रही है, और दुख की बात यह है कि सरकारें भी इसमें खुलकर साथ दे रही हैं। कभी वह “जोर से बोलो कंडोम” का नारा लगवाती हैं, तो कभी एनजीओ (NGO) के माध्यम से ट्रक ड्रायवरों और झुग्गियों में कंडोम बँटवाती हैं। हाल ही में एक और धमाकेदार(?) गोली कुछ जानी-मानी कम्पनियों ने बाजार में उतारी है, जिसे कहते हैं “मॉर्निंग आफ़्टर पिल्स” (Morning After Pills)। इस गोली की खासियत(?) और कर्म यह है कि यदि यौन सम्बन्धों के दौरान कोई गलती से कोई असुरक्षा हो जाये और गर्भधारण का खतरा बन जाये तो स्त्री को अगले 72 घंटों के दौरान कभी भी यह गोली ले लेनी चाहिये, इससे गर्भधारण का खतरा नहीं रहता। यह गोली स्त्री के शारीरिक हार्मोन्स में परिवर्तन करके सम्भावित गर्भधारण की प्रक्रिया को रोक देती है। शर्त यही है कि इसे यौन सम्बन्ध के तुरन्त बाद जितनी जल्दी हो सके ले लेना चाहिये, ताकि यह अधिक से अधिक प्रभावशाली साबित हो। यहाँ तक तो सब ठीक-ठीक ही नजर आता है, लेकिन असली पेंच आगे शुरु होता है।



जैसा कि सभी जानते हैं कि भारतवासी कानून तोड़ने में सबसे आगे रहते हैं, किस तरह से अनुशासन को तोड़ा जाये, सरकारी कानूनों को धता बताया जाये, कैसे गड़बड़ी करके अपना फ़ायदा देखा जाये इसमें भारत के लोग एकदम उर्वर दिमाग वाले हैं। सरकारी एजेंसियाँ, और सरकारी कर्मचारी अपना काम कितनी ईमानदारी से करते हैं, ये भी सबको मालूम है। एक सर्वेक्षण में यह सामने आया है कि इन “मॉर्निंग आफ़्टर पिल्स” का सर्वाधिक उपयोग कुंआरी लड़कियाँ कर रही हैं। इन गोलियों की सबसे ज्यादा खपत कॉलेज कैम्पस, कोचिंग क्लासेस, ब्यूटी पार्लर के आसपास की मेडिकल दुकानों से हो रही है, ठीक उसी तरह जैसे कि “कंडोम” की बिक्री में उछाल “नवरात्रि” के समय सबसे ज्यादा देखा गया है। उल्लेखनीय है कि इन गोलियों के विज्ञापन में “फ़िलहाल” एक विवाहित स्त्री-पुरुष ही दिखाये जाते हैं, तथा इन गोलियों के पैकेट पर भी फ़िलहाल एक विवाहित स्त्री ही दिखाई गई है। “फ़िलहाल” कहने का तात्पर्य सिर्फ़ यही है कि अभी शुरुआत में कम्पनियों द्वारा ऐसा किया जा रहा है, फ़िर धीरे से पैकेट की स्त्री के माथे से बिन्दी गायब हो जायेगी, फ़िर कुछ वर्षों में उस पैकेट पर अविवाहित नवयुवती दिखाई देगी, इस छुपे हुए संदेश के साथ कि “सेक्स में कोई बुराई नहीं है, जमकर मुक्त आनन्द उठाओ… बस गर्भधारण करना गुनाह है, इससे बचो, हमारी गोली लो और आजाद रहो…”। रही-सही कसर टीवी, अखबार, चिकनी पत्रिकायें पूरी कर ही रही हैं, जो सेक्स पर खुलकर बात कर रही हैं, हमें बताया जा रहा है कि भारतीय नारियों की “सेक्स भूख” बढ़ रही है, हमें लगातार सिखाया जा रहा है कि बाजार में एक से एक कंडोम (सुगंधित भी) मौजूद हैं, सम्बन्ध बनाओ लेकिन सुरक्षित बनाओ…आदि-आदि। कोई भी यह सिखाने को तैयार नहीं कि “संयम” रखना सीखो, “नैतिकता” का पालन करो, एक विशेष उम्र तक यौन सम्बन्धों के बारे में सोचो भी नहीं, बल्कि “रियलिटी शो” में मासूम बच्चों को लिपस्टिक पोतकर, “लव-लव” सिखाया जा रहा है।

यह तो हुआ लेख का नैतिक पहलू, और इसमें बहस की काफ़ी गुंजाइश है, आजकल नारियों-लड़कियों को कोई संदेश देना भी खतरे से खाली नहीं है, क्योंकि “स्त्री मुक्ति” के नाम पर चढ़ दौड़ने वालियाँ कई हैं। तो फ़िलहाल मैं इसे व्यक्तिगत नैतिकता के तौर पर छोड़ देता हूँ कि जिसे ये गोली लेना हो वह ले, न लेना हो तो न ले।

लेकिन दूसरा पहलू जो कि स्वास्थ्य से जुड़ा है वह मानवीय पहलू है। अमेरिका के फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) जो कि सभी प्रकार के खाद्य पदार्थ और दवाओं को अमेरिका में बेचने से पहले अनुमति देता है, ने अपने अध्ययन निष्कर्षों से चेताया है कि इस प्रकार की “मॉर्निंग आफ़्टर पिल्स” के उपयोग से पहले बहुत सावधानी जरूरी है। उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि इस प्रकार की गोलियों में एक जहरीला पदार्थ “डाइ-ईथाइल-स्टिल्बेस्टेरॉल” (DES) पाया जाता है, और कई लड़कियों में (चूँकि अमेरिका में गर्भवती किशोरियाँ नाम की कौम आमतौर पर पाई जाती है) इस DES की मात्रा घातक स्तर तक पाई गई है। असल में होता यह है कि चूँकि ये गोलियाँ “ऑन द काउंटर” (OTC) उत्पाद हैं, इसलिये बगैर सोचे-समझे युवतियाँ इसका उपयोग करने लगती हैं जबकि FDA पहले ही DES को जानवरों के लिये प्रतिबन्धित कर चुका है। जैसा कि मैंने पहले कहा कि इनका असर तभी सर्वाधिक होता है जब यौन सम्बन्ध के 24 घंटे के अन्दर इसे ले लिया जाये, लेकिन अक्सर इसे 72 घंटे बाद तक लिया जा रहा है, इसका नुकसान यह है कि तब तक युवती के गर्भवती होने की प्रक्रिया शुरु हो चुकी होती है। इस स्थिति में घबराहट में वे दो-चार गोलियाँ ले लेती हैं और उसके जहरीले (Carcinogenic) अंश से भ्रूण की हत्या तो हो जाती है, लेकिन स्त्री के शरीर पर इसका बेहद बुरा असर होता है। FDA के अनुसार इन गोलियों के सेवन से कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, सिरदर्द, चक्कर आना, घबराहट, मासिक धर्म में परिवर्तन आदि कई बीमारियाँ भी साथ में हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि मान लो तमाम “सद्प्रयासों” के बावजूद गर्भ ठहर जाये (क्योंकि डॉक्टर स्पष्ट कहते हैं कि इस बात की कोई गारंटी नहीं ली जा सकती कि इस गोली को लेने के बाद गर्भधारण नहीं होगा) तो इन गोलियों के असर के कारण होने वाले बच्चे का मानसिक विकास अवरुद्ध हो सकता है या वह विकलांग पैदा हो सकता है। यह गोली “कभीकभार” लेने के लिये है, लेकिन होता यह है कि “मुक्त समाज” में लड़कियाँ इसे महीने में आठ-दस बार तक ले लेती हैं, और फ़िर इसके भयंकर दुष्परिणाम होते हैं, यह बुरी सम्भावना भारत के युवाओं पर भी लागू होगी।



ऐसे में विचारणीय है कि भारत जैसे देश में जहाँ न तो ईमानदारी से कोई ड्रग कानून लागू होता है, न ही यहाँ किसी दवाई में क्या-क्या मिला हुआ है इसकी सार्वजनिक घोषणा की जाती है, सरेआम क्रोसिन, विक्स, बेनाड्रिल जैसी आम दवाइयाँ तो ठीक एंटीबायोटिक्स तक बगैर डॉक्टरी पर्चे के बेच दिये जाते हैं… पशुओं के साथ इंसानों के लिये भी खतरनाक “ऑक्सीटोसिन” को ज्यादा दूध के लालच में खुलेआम भैंसों को लगाया जा रहा है… कई ड्रग जो कि सारे विश्व में प्रतिबन्धित हो चुके हैं यहाँ आराम से बिक रहे हैं… ये “मॉर्निंग आफ़्टर पिल्स” क्या गजब ढायेंगी? विशेषज्ञ डॉक्टर की देखरेख में ही इन गोलियों को लिया जाना चाहिये, लेकिन असल में क्या होगा ये हम सभी जानते हैं…। पुरुष सत्तात्मक समाज में इन गोलियों के विभिन्न आपराधिक दुरुपयोग होने की भी पूरी सम्भावना है। लेकिन जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि इसके खिलाफ़ आवाज उठाना या नैतिकता की बात करना भी “संघी” विचारधारा का माना जाता है, ऐसे में खुल्लमखुल्ला यौन दुराचरण के साथ-साथ स्त्रियों के गंभीर स्वास्थ्य क्षरण का खतरा सिर पर मंडरा रहा है। पश्चिम की नकल करने के चक्कर में भारत तेजी से अंधे कुंए की ओर दौड़ लगा रहा है। जय हो यौन शिक्षा की…

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Less wood Hindu Cremation Environment
बहुत दिनों से विचार कर रहा था कि इस विषय पर लिखा जाये। खोजबीन करने पर पाया कि इस विषय पर कुछ खास उल्लेखनीय नहीं लिखा गया है, जबकि “मौत” ही इस जीवन का सबसे बड़ा सत्य है जिससे बड़े से बड़ा पैसे वाला, प्रसिद्धि वाला भी नहीं बच सकता। भारत में हिन्दुओं की परम्परा के अनुसार मृत्यु के बाद शव को जलाने की प्रथा है। इस लेख में मैंने सिर्फ़ हिन्दुओं की इस पद्धति पर ही लिखने की कोशिश की है, अन्य धर्मों या समुदायों के अन्तिम संस्कार के बारे में लिखना उचित नहीं है, क्योंकि उनकी पद्धतियाँ, संस्कार आदि अलग-अलग होते हैं जिसके बारे में मेरी जानकारी कम है।

यहाँ तक कि हिन्दुओं में भी चूंकि कई पंथ हैं, समुदाय हैं, जातियाँ हैं, उपजातियाँ हैं, जिनमें दाह संस्कार के अलग-अलग तरीके अपनाये जाते हैं। इस लेख का उद्देश्य किसी की भावनाओं को चोट पहुँचाने का नहीं है, बल्कि दाह संस्कार ठीक ढंग से हो, “मिट्टी” को सही तरीके से ठिकाने लगाया जाये, कोई फ़ूहड़ता न हो, और न ही शोकाकुल व्यक्तियों को मानसिक चोट पहुँचे, यह है।


व्यक्तिगत रूप से मुख्यतः दो कारणों से मैं शव के दाह संस्कार के खिलाफ़ हूँ। पहला, देश में एक वर्ष में लगभग 5 करोड़ पेड़ सिर्फ़ शवदाह के लिये काटे जाते हैं, हिन्दुओं की आबादी एक अरब पहुँचने वाली है और दूसरी तरफ़ जंगल साफ़ होते जा रहे हैं (सोचकर कंपकंपी होती है कि बाकी के कामों के लिये कितने करोड़ पेड़ काटे जाते होंगे)। और दूसरा, हमारी तथाकथित “पवित्र” नदियाँ जो पहले से ही उद्योगपतियों द्वारा प्रदूषित कर दी गई हैं, शवों की राख और अस्थि विसर्जन से बेहद मैली हो चुकी हैं। लेकिन मन में संस्कारों की इतनी गहरी पैठ होती है कि मृत्यु के बाद विद्युत शवदाह के लिये उठने वाली इक्का-दुक्का आवाज सख्ती से दबा दी जाती है और अन्ततः लकड़ियों से ही शव को जलाना होता है। बड़े शहरों में तो धीरे-धीरे (मजबूरी में ही सही) लोग विद्युत शवदाहगृहों का उपयोग करने लगे हैं (एक तो श्मशान पास नहीं होते और दूसरा लकड़ियों के भाव भी अनाप-शनाप बढ़ गये हैं), लेकिन कस्बों और गाँवों में आज भी विद्युत शवदाहगृहों को आम जनता “अच्छी निगाह”(?) से नहीं देखती। अक्सर इन शवदाह गृहों का उपयोग लावारिस लाशों, भिखारियों, बगैर पहचान के सड़क दुर्घटनाओं में मरे हुए लोगों के लिये नगर निगम और पुलिस करती है। जबकि आज जरूरत इस बात की है कि आम जनता को विद्युत शवदाह के बारे में शिक्षित और जागरूक किया जाये। न सिर्फ़ विद्युत शवदाह बल्कि अंगदान के बारे में भी, क्योंकि मरने के बाद तो शरीर मिट्टी हो गया, अब कम से कम उसके दो-चार अंग तो काम में लिये जायें। हाल ही में मालवा के कुछ समाजसेवियों ने सम्पूर्ण “शरीर दान” करने के संकल्प को फ़ैलाने का काम किया है। मेडिकल कॉलेज बढ़ रहे हैं, उनमें छात्रों की संख्या बढ़ रही है, उन्हें “प्रैक्टिकल” के लिये “शरीर” नहीं मिल रहे, कॉलेज प्रबन्धन दुर्घटनाओं में मरे हुए कटे-फ़टे शवों से काम चला रहा है, ऐसे में यदि पूरी तरह से साबुत स्वस्थ शरीर का मुर्दा उन्हें मिल जाये तो विद्यार्थियों को सीखने में आसानी होगी, लेकिन “मरने के बाद मुक्ति” वाला फ़ण्डा(?) शरीर दान करने से रोकता है। राह मुश्किल जरूर है, लेकिन धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ रही है, लोग पहले आँखे ही आसानी से दान नहीं करते थे, परन्तु जैसे अब नेत्रदान तेजी से फ़ैल रहा है, उसी तरह “देहदान” भी बढ़ेगा। विषय इतना विस्तृत और रोचक है कि न चाहते हुए भी विषयांतर हो ही जाता है, मैं बता रहा था शवदाह के बारे में और पहुँच गया “देहदान” पर…

तो पेश है मेरी दसियों शवयात्राओं में शिरकत के अनुभव का निचोड़, मेरी कोशिश होगी कि इसमें अंत तक हरेक बात पर लिखा जाये। भारत इतना विशाल और भिन्नताओं से भरा है अतः पाठकों से भी आग्रह है कि अपने क्षेत्र विशेष की शवदाह परम्परा, तरीके, खासियत आदि का उल्लेख अपनी टिप्पणियों में अवश्य करें, ताकि लोगों को विभिन्न संस्कृतियों के बारे में पता चल सके। हम शुरु करते हैं “एकदम शुरु” से…। शुरु से मेरा मतलब है कि मौत कहाँ हुई है उससे, यदि मौत घर पर ही हुई है तो सबसे पहले उस कमरे को जितना हो सके खाली कर लेना चाहिये, मुर्दे को नीचे कमरे के बीचोंबीच जमीन पर सीधा लेटाकर, सिर्फ़ मुँह खुला रखते हुए बाकी पूरा चादर से ढँक देना चाहिये, ताकि अंतिम दर्शनों के लिये आने वाला आसानी से उसकी परिक्रमा भी कर सके और दण्डवत प्रणाम भी कर सके। जाहिर है कि ये बात शोक संतप्त परिजनों को बाद में सूझेगी, इसलिये यार-दोस्तों-मित्रों को पहल करके सबसे पहले ये काम करना चाहिये। कई बार देखने में आया है कि मुर्दा किसी पलंग पर पड़ा रहता है, जो कि कमरे एक कोने में होता है, आसपास रोने-धोने वालों की भीड़ होती है, ऐसे में जो बाहर से आता है वह बेचारा सहमा सा दरवाजे के बाहर से ही नमस्कार करके चलता बनता है, यदि वाकई कोई मृतक का खास मित्र है तो वह व्यथित होता है कि वह छू न पाया, या ठीक से देख न पाया। नाते-रिश्तेदारों, सगे-सम्बन्धियों में से किसी मुख्य व्यक्ति से पहले ही पूछ लें कि “क्या आसपास के किसी रिश्तेदार का इंतजार करना है?”, यदि ऐसा हो तो आने वालों को तत्काल सूचना दे दें कि शवयात्रा फ़लाँ के आने के बाद इतने बजे निकलेगी। यदि ज्यादा समय लगने वाला हो तो बर्फ़ की सिल्ली की व्यवस्था भी कर लें और शरीर को बर्फ़ की सिल्ली पर शिफ़्ट कर दें। यदि मौत किसी अस्पताल में हुई है, या दुर्घटना की वजह से हुई है तो एम्बुलेंस के घर आने से पहले ये सारी व्यवस्थायें हो जायें तो अच्छा। साथ ही यदि बॉडी पोस्टमॉर्टम की हो और चेहरा विच्छेदित हो तो कोशिश करें कि बॉडी कम से कम समय ही घर पर रखी जाये, और किसी तरह समझा-बुझा कर ऐसे शव का विद्युत शवदाह करवाने का प्रयास करें। जारी रहेगा…अगले भाग में

भाग-2 में आप पायेंगे अर्थी को सजाने और चिता को सही ढंग से लगाने का तरीका…

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(भाग-1 से जारी) अगला क्रम आता है मुर्दे को अंतिम यात्रा हेतु सजाने का। लगभग हर शहर में एक-दो दुकानें ऐसी होती हैं कि जहाँ इस गतिविधि का सामान तैयार “पैकेज” के रुप में मिलता है। आपको सिर्फ़ जाकर बताना होता है कि मृतक हिन्दू था, मुसलमान था या कुछ और था, ब्राह्मण था, ठाकुर था, या कोई और। सम्बन्धित दुकानदार एकदम अचूक तरीके से आपको एक पूरा पैकेज देता है, जिसमें सफ़ेद कपड़ा, दो बाँस, खपच्चियाँ, मटकी, रस्सी, आटा, जौ, काले तिल, गुलाल आदि सभी सामान एकमुश्त होता है। शवयात्रा का समय तय होते ही तत्काल किसी को भेज कर सामान मंगवा लिया जाये और सामान सावधानीपूर्वक अलग-अलग कर लिया जाये ताकि ऐन वक्त पर किसी तरह की परेशानी न हो। कई समाजों में पूरी तैयारी के पश्चात रिश्तेदारों द्वारा मुर्दे को शॉल ओढ़ाने का चलन होता है, ऐसे में पहले ही सम्बन्धित व्यक्तियों से पूछ लें कि क्या उन्होंने शॉल खरीद ली है। कई बार यह देखा गया है कि जब मुर्दे को बाँधने की तैयारी करते हैं तो कोई एक चीज कम पड़ जाती है या दुकानदार द्वारा पैकेज में गलती से नहीं रखी जाती तब खामख्वाह की भागदौड़ मचती है और अप्रिय दृश्य उत्पन्न होता है।
आइये अब बाँधना शुरु करते हैं… कई बयानवीर, घोषणावीर ऐसे वक्त पर एकदम पीछे नजर आते हैं, आप आगे बढ़िये, इसमें डरने की कोई बात नहीं है, यदि आप मरने वाले को जानते भी नहीं तो क्या हुआ, मरने वाला उठ खड़ा नहीं होगा कि “अबे तू कौन है मुझे उठाने वाला…”। मैंने कई लोगों को डरते हुए देखा है, मानो उनके परिवार में कभी कोई मरेगा ही नहीं, बल्कि ऐसे-ऐसे वीर भी देखे हैं जो लठ्ठ लेकर पड़ोसी का सिर खोल देंगे, लेकिन शवयात्रा में इसलिये नहीं जायेंगे कि “डर लगता है…” खैर उन्हें छोड़िये, दो-दो ईंटें कुछ दूरी पर जमाकर उस पर लम्बे वाले बाँस रखें, बाँस की खपच्चियाँ अमूमन सही नाप की होती हैं उन्हें एक निश्चित दूरी बनाकर रखते हुए दोनो सिरों पर बाँधना शुरु करें, दोनों तरफ़ एक-सवा फ़ुट का अन्तर छोड़ा जाना चाहिये ताकि चारों कंधा देने वाले को आसानी हो। पूरी तरह बँधने के बाद उस पर घास के पूले में से घास फ़ैलाकर बिछा दें और सफ़ेद कपड़ा दोनों सिरों पर छेद करके इकहरा फ़ँसा दें (बाकी का कपड़ा वैसा ही रहेगा, क्योंकि वह मुर्दे को अर्थी पर लिटाने के बाद उस पर दूसरी तरफ़ से आयेगा)। अब धीरे से बॉडी को उठाकर अर्थी पर रखें और बाकी का कपड़ा गले तक लाकर उसे बाँधना शुरु करें। बाँधते समय यह ध्यान रखें कि मुर्दे के दोनों पैरों के अंगूठे आपस में कसकर बाँधे जायें, कई बार देखा गया है कि पैर खुल जाते हैं और एक पैर बाहर लटक जाता है, दोनों हाथ यदि पेट पर रखकर बाँधे जायें तो ज्यादा सही रहता है।

अब बारी आती है ले जाने की, आजकल लगभग हर बड़े शहर, कस्बे में “शव वाहन” उपलब्ध होता है, नगर निगम में ड्रायवर को पहले से फ़ोन करके समय बता दें (अपने तय किये समय से आधा घंटा बाद ही बतायें) ताकि उसका भी कीमती समय खराब न हो, क्योंकि उसे तो दिन भर में आठ-दस शव ले जाने हैं। जब शव-वाहन की व्यवस्था न हो और कंधों पर ही ले जाना हो तो पहले से आठ-दस गबरू जवान छाँट लें और उन्हें “समझा” दें ताकि बीच रास्ते में कोई परेशानी न हो। जैसे ही शव वाहन चौराहे के कोने पर आकर रुके, अर्थी उठाने की जल्दी करें, जल्दी-जल्दी अंतिम दर्शन करवाने की पहल करें, यदि इस वक्त संभालने वाले न हों, तो कई बार बड़ी अप्रिय स्थिति उत्पन्न हो जाती है। कृपा करके अपने-अपने मोबाइल “साइलेंस” मोड पर रखें, और इसी वक्त कोई जरूरी फ़ोन आ जाये तो दूर जाकर धीमे-धीमे बातें करें। इस वक्त मोबाइल की रिंगटोन बड़ी खीझ उत्पन्न करती है, और बाकी लोग आपको लगभग मार डालने के अन्दाज में घूरेंगे। एक बार एक सज्जन(?) मुर्दे को हार पहनाने के लिये झुके और “कजरारे-कजरारे तेरे कारे-कारे नैना…” की जोरदार चाइना-स्टाइल रिंगटोन बजी, सोचिये कि शोकाकुल रिश्तेदारों पर क्या प्रभाव पड़ा होगा?

अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर… श्मशान घाट पहुँचने के पहले ही दो-चार पठ्ठों को भेजकर लकड़ी, कंडे, राल (इसका नाम अलग-अलग जगहों पर अलग हो सकता है, हमारे यहाँ इसे “राल” कहते हैं, यह मटमैला सा बड़े दानेदार होता है, जिसे चिता में फ़ेंकने पर आग भड़कती है), फ़ूस, घी, आटा तुलवाकर रख लें। आमतौर पर एक सामान्य व्यक्ति को जलाने के लिये ढाई-तीन क्विंटल लकड़ी (मोटी और पतली मिलाकर) तथा लगभग 40 कण्डे लगते हैं। आजकल गौवंश के बढ़ते नाश के कारण कण्डे आसानी से उपलब्ध नहीं होते हैं, यदि उपलब्ध हों तो बेहतर, शुरुआती आग लगाने के लिये थोड़ा सा फ़ूस (सूखी लम्बी घास) तथा आग भड़काने के लिये घी और राल, बस यही सामान है जो आखिरी वक्त हम और आप सभी कभी न कभी, श्मशान की किसी छत पर बैठकर देख पायेंगे, जी हाँ भूत बनकर। यही वह जगह होती है जहाँ आपको दुनिया भर के “रायचन्द” मिल जाते हैं, जिनके बाप ने भी कभी चिता न देखी हो, वे भी सलाहें देने लगते हैं। वैसे तो श्मशान पर उपलब्ध कर्मचारी सही लकड़ी देगा ही, लेकिन फ़िर भी ध्यान रखें कि कम से कम 6 लकड़ियाँ तो ऐसी हों जिसे हम “डूंड” कहते हैं अर्थात बेहद मोटी, बाकी की लकड़ियाँ पतली होना चाहिये। आपको लकड़ियाँ फ़िल्मों जैसी नहीं मिलेंगी अब जरा मूड हल्का करने के लिये इसे पढ़ें “फ़िल्मी मौत : क्या सीन है”

आखिरी किस्त मिलेगी… भाग-3 में

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(भाग-2 से जारी…) अब चिता को जमाने का सही तरीका… यदि कण्डे उपलब्ध हों तो सबसे नीचे कण्डों की सेज बनाना चाहिये, फ़िर उसके ऊपर एक मोटी लकड़ी सिर की तरफ़ और दो मोटी लकड़ियाँ दोनों बाजू में रखना चाहिये, ताकि शरीर जब जलकर नीचे बैठे तो साइड से खिसक न जाये। अब बीच में बची हुई जगह पर पतली लकड़ियाँ जमाकर मुर्दे को उस पर लिटायें। अब सबसे पहले छाती पर एक मोटी लकड़ी, दूसरी सिर पर तथा तीसरी घुटनों पर रखें, जलने के दौरान अक्सर यही तीन स्थान अपने स्थान से खिसकने की सम्भावना होती है। बाकी की पतली लकड़ियाँ बीच-बीच में फ़ँसा दें, लेकिन इस तरह कि हवा का आवागमन बना रहे। बीच के खाली स्पेस में थोड़ा-थोड़ा फ़ूस भरते रहें जो हल्का सा बाहर की ओर निकला रहे, क्योंकि सबसे पहले उसी में आग लगानी है। प्रदक्षिणा के बाद जैसे ही व्यक्ति अग्नि दे, चारों तरफ़ के फ़ूस में आग लगाना शुरु करें, और बाकी लोगों को वहाँ से “हवा आने दो…” कहकर हटा दें, एक बार कण्डे आग पकड़ लें तो काम आसान हो जाता है, वैसे तो मुर्दे पर कर्मकांड के दौरान घी छिड़का / लेपा ही जायेगा, तो बाकी बची राल को धीरे-धीरे चिता में झोंकना शुरु करें ताकि आग तेजी से भड़के। चिता जमाते समय इस बात का खास खयाल रहे कि मुर्दे के हाथ और पैर पास-पास हों तथा उसके साइड में कम-से-कम एक-दो लकड़ियाँ अच्छी तरह से जमी हुई हों, कई बार देखा गया है कि आधी चिता जलने के बाद मुर्दे का एक हाथ या एक पैर बाहर आ जाता है। खैर, यहाँ आकर काम लगभग समाप्त हो जाता है, बस दूर बैठकर चिता के 75% जलने का इंतजार कीजिये, हो सकता है कि खोपड़ी फ़ूटने की आवाज भी सुनाई दे जाये, न भी दे तो क्या, अब मृतात्मा को अन्तिम नमस्कार कीजिये, शोक संतप्त को धीरज बँधाइये और घर जाइये, नहाइये-धोइये और अपने काम से लग जाइये, एक न एक दिन तो आपको भी यहीं आना है…

अब बात करते हैं पर्यावरण की… जैसा कि मैंने पहले कहा कि लकड़ियों से शवदहन की परम्परा को अब हमें वक्त रहते बदलना होगा, और विद्युत शवदाह की ओर चलना होगा। इसके लिये मन में पैठी ग्रंथियों को निकाल बाहर करने की आवश्यकता है। विद्युत शवदाह एक बेहतरीन, कम खर्च वाला, कम समय वाला, और पर्यावरण हितैषी उपाय है। लेकिन जब तक जागरूकता नहीं फ़ैलती, कम से कम तब तक हमें इस पारम्परिक चिता दहन में ही कुछ बदलाव करके लकड़ियों का उपयोग कम से कम करना चाहिये। यह काम दो क्विंटल और 20 कण्डे में हो सकता है, जरूरत है सिर्फ़ तकनीक को अपनाने की। मुझे इन्दौर, भोपाल, देवास, गोधरा, उज्जैन आदि जगहों पर जाकर शवयात्रा में शामिल होने का मौका मिला है, इन सबमें मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है गोधरा की श्मशान व्यवस्था ने। यहाँ चिता जलाने के लिये लोहे के पिंजरानुमा ब्लॉक बनाये गये हैं, एक स्टैण्ड पर रखे हुए जो ऊपर से खुले हैं, लेकिन नीचे और साइड से जालीनुमा खुला होता है, इसका फ़ायदा यह होता है कि इसमें कम लकड़ी लगती है, मुर्दे के हाथ पैर बाहर आने के कोई चांस नहीं, अस्थि संचय में भी आसानी, राख-राख नीचे गिर जाती है, बड़ी-बड़ी अस्थियाँ चुन ली जाती हैं। एक और जगह है (मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा), जहाँ अर्थी भी लोहे की रेडीमेड बनी हुई मिलती है, पहले जाकर ले आओ, सिर्फ़ मुर्दे को उस पर बाँधना होता है, और जलाने से पहले उसे श्मशान के कर्मचारी के हवाले कर दो बस… इसमें भी बाँस और खपच्चियों की बचत होती है। असल उद्देश्य है लकड़ी बचाना, यानी पेड़ बचाना चाहे वह कैसे भी हो। रही बात परम्पराओं की, तो वक्त के साथ बदलाव तो जरूरी है, महाराष्ट्र में भी लोगों ने घरों के गणेश विसर्जन अपने घर में एक बाल्टी में करना प्रारम्भ कर दिया है, जब चार-आठ दिन में मूर्ति पूरी तरह घुल जाये, उस पानी को पौधों में डाल दिया जाता है। पर्यावरण खतरों को देखते हुए परम्पराओं से मूर्खों की तरह चिपके रहने में कोई तुक नहीं है।

“मोक्षदा” नाम के एक NGO ने चिता दहन के लिये एक नया मॉडल तैयार किया है, जिसमें चार विभिन्न प्रकार के पर्यावरण हितैषी Eco-friendly (कम लकड़ी लगने वाले) चितादहन यन्त्र हैं, जिनकी कीमत 2 लाख से लेकर 20 लाख तक है (नगर निगमों में पैसे की कोई कमी नहीं है, यदि ईमानदारी से खर्च किया जाये तो)। शहर की जनसंख्या और श्मशान में आने वाले “ट्रैफ़िक” के हिसाब से अलग-अलग क्षमता का यन्त्र लगवाया जा सकता है। इस कीमत में उक्त NGO द्वारा एक स्थानीय व्यक्ति को ट्रेनिंग, और एक वर्ष का लकड़ी सहित पूरा खर्चा तथा मशीन की सर्विसिंग भी शामिल है। संस्था के आँकड़ों के अनुसार यदि यह संयंत्र 20 वर्ष तक सतत काम करता है (जिसमें औसतन 6 शव रोजाना का ऐवरेज रखा गया है) तो लगभग साढ़े चार- पाँच करोड़ रुपये की बचत होगी। यह तो हुई सीधी बचत, इसमें पेड़ों द्वारा मिलने वाली ऑक्सीजन, फ़ल-फ़ूल, जड़ी-बूटियाँ, मिट्टी की पकड़ बनाना, वर्षाजल को जमीन मे संरक्षित करना जैसे अनमोल फ़ायदे भी जोड़ लीजिये, और क्या चाहिये?

लम्बी-लम्बी पोस्ट लिखने की “बुरी आदत”(?) के चलते यह पोस्ट भी विस्तारित हो गई, लेकिन जैसा कि मैंने पहले ही कहा “विषय भी एकदम ‘हट-के’ था और मजेदार भी…”। बस यही अपेक्षा करता हूँ कि इसमें कई लोगों को कुछ नई जानकारियाँ मिली होंगी, कुछ लोगों को प्रेरणा मिली होगी (कुछ को घृणा भी आई होगी), लेकिन मेरा उद्देश्य एकदम साफ़ रहता है, “जनजागरण”। विद्युत शवदाह का जितना अधिक प्रचार हो उतना अच्छा, चिता में लकड़ियाँ कम से कम लगें ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी के लिये कुछ तो पेड़ बचें। दो काम मैं पूरी श्रद्धा के साथ करता हूँ, वर्ष भर में दो-तीन रक्तदान और कम से कम 5-6 शवयात्रा। और शवयात्राओं में जाने का मुख्य मकसद होता है वहाँ फ़ुर्सत में खड़े लोगों में से एकाध दो को विद्युत शवदाह, नेत्रदान और देहदान के बारे में “झिलवाना”… अब जैसे आप लोग मेरे इतने बड़े-बड़े लेख “झेल” गये, वैसे ही कुछ लोग तो वहाँ मिल ही जाते हैं, यदि एक साल में मेरे कहने भर से किसी एक व्यक्ति ने भी विद्युत शवदाह का उपयोग कर लिया, तो मेरी मेहनत सफ़ल!!! आपका क्या कहना है? टिप्पणी न करना हो न कीजिये, लेकिन इतना पढ़ने के बाद अब उठिये और शवयात्रा में शामिल हो जाइये। सिर्फ़ मजे लेने के लिये नहीं परन्तु शामिल लोगों को विद्युत शवदाह, नेत्रदान और देहदान के बारे में बताने के लिये। और कुछ नहीं तो ऐसे ही शाम को टहलते-टहलते श्मशान की तरफ़ हो आइये, देखिये वहाँ कितनी शांति है… क्या कहा!! डर लगता है, भाई मेरे जिंदा व्यक्ति से खतरनाक इस धरती पर और कुछ नहीं है… श्मशान काफ़ी अच्छी जगह है बाकी दुनिया के मुकाबले…

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Fairness Creams Market India Imami
सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया निर्णय में कहा है कि “महिलाओं के विरोध में उनके रंग के आधार पर की टिप्पणी को भी शाब्दिक हिंसा माना जायेगा…” इसका अर्थ है कि यदि आप किसी महिला को “कालीकलूटी-बैंगनलूटी” या “कल्लोरानी” कहते हैं तो आप हिंसक हैं और महिला पर अत्याचार कर रहे हैं। एकदम स्वागतयोग्य और सही निर्णय दिया है सुप्रीम कोर्ट ने। हमारे देश में “गोरे रंग” के प्रति एक विशेष आसक्ति का भाव है, कहीं-कहीं यह आसक्ति - भक्ति और चमचागिरी तक पहुँच जाती है (समझदार के लिये इशारा काफ़ी है)। दो कौड़ी की औकात वाला और चेहरे से ओमपुरी या सदाशिव अमरापुरकर से भी गया-बीता लड़का, “गोरी-सुन्दर” दुल्हन चाहिये का फ़ूहड़ विज्ञापन छपवाने से बाज नहीं आता। हमारा मीडिया, और खासकर टीवी एक से बढ़कर एक अत्याचारी (सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय को मानें तो) विज्ञापन लगातार दिखाता रहता है। एक विज्ञापन में काली लड़की निराश है, अचानक उसे एक क्रीम मिलती है, वह गोरी हो जाती है और सीधे एयर-होस्टेस या टीवी अनाउंसर बन जाती है। दूसरे विज्ञापन में एक लड़की “सिर्फ़ पाँच दिन” में गोरी बन जाती है, और उसके माता-पिता भी मूर्खों जैसे हँसते हुए दिखाये जाते हैं। हद तो तब हो जाती है, जब एक काला लड़का (शायद अपनी बहन की) क्रीम चुराकर लगाता है और अचानक शाहरुख खान “ए ए ए ए ए ए ए ए ए मर्द होकर लड़कों वाली क्रीम लगाते हो?” कहते हुए प्रकट होता है, बस फ़िर वह लड़का गोरा बनकर लड़कियों के बीच से इठलाता हुआ निकलता है। क्या ऐसे विज्ञापन भी “अत्याचार” की श्रेणी में नहीं आना चाहिये?



भारत में गोरे रंग के प्रति इतना आकर्षण क्यों है? गोरे रंग को ही सफ़लता का पर्याय क्यों मान लिया गया है? वह क्या मानसिकता या मनोवैज्ञानिक कारण हैं जो अक्सर काले-साँवले लोगों के प्रति निम्न और गलत-सलत धारणा बनाते रहते हैं? यदि हम ऐतिहासिक या शारीरिक दृष्टि से देखें तो यह वैज्ञानिक तथ्य है कि कमनीय स्त्रियाँ अधिक प्रजनन शक्ति रखती हैं, पुष्ट वक्षस्थल और नाजुक कमर के प्रति पुरुष का आकर्षण सदैव रहा है, ठीक इसी प्रकार मजबूत शरीर के, रोगमुक्त और साँवले चेहरे वाले पुरुष सामान्यतः स्त्रियों को पसन्द आते हैं। इनके मिलन से उत्तम संतान पैदा हो ऐसी दोनों की इच्छा रहती है, लेकिन ये साला “गोरा रंग” इन सबके बीच में कहाँ से आ गया? ये गोरे चेहरे वाली या वाला के बारे में आकर्षण कब और कैसे पैदा हो गया? भारत के अधिकतर लोग काले या साँवले हैं, देवताओं का वर्णन भी शास्त्रों में अधिकतर “साँवला”, सुन्दर-सलोना, इस प्रकार किया गया है, राम भी साँवले थे, कृष्ण काले और शिव तो एकदम फ़क्कड़-औघड़ बाबा, ये और बात है कि इनकी पत्नियों को अत्यन्त रूपवती बताया गया है, लेकिन विशेष रूप से “गोरी-गोरी” तो कतई नहीं (गौरी यानी पार्वती के अलावा), फ़िर इन भगवानों के करोड़ों भक्त क्यों मूर्खों की तरह फ़ेयरनेस क्रीम चेहरे पर पोते जा रहे हैं?

एक बात शोध करने लायक है कि “क्या अंग्रेजों के शासन के पूर्व भी भारतीयों में गोरे होने या दिखने की भरपूर चाह थी?” या फ़िर दो सौ वर्षों की मानसिक गुलामी ने हमारे दिमागों में “गोरे रंग” की श्रेष्ठता का भ्रम पैदा किया है? अंग्रेज जाने के साठ साल बाद भी त्वचा का रंग क्यों हमारे दिमाग में खलल पैदा करता है? वर्णभेद, नस्लभेद, जातिभेद के साथ “रंगभेद” भी एक कड़वी सच्चाई बन गया है। फ़िर “गोरे” को श्रेष्ठ और “काले” को पिछड़ा, असफ़ल दर्शाने वाले विज्ञापनों पर कोई कार्रवाई हो सकती है क्या? (इस बारे में वकील बन्धु सलाह दें)।

कहते समय अक्सर “जा मुँह काला कर” कहा जाता है, क्यों भई? ऐसा क्यों नहीं कहा जाता कि “जा मुँह गोरा कर”? सफ़ेद रंग हमेशा स्वतन्त्रता, सच्चाई, पवित्रता आदि का प्रतिनिधि होता है, जबकि काला रंग राक्षसी प्रवृत्ति, दुष्टता, गंदापन आदि दर्शाने के लिये उपयोग किया जाता है, ऐसा क्यों? मुम्बई में टैक्सी-होटल वालों द्वारा किसी नीग्रो पर्यटक के मुकाबले अमेरिकी पर्यटक को ज्यादा “भाव” दिया जाता है, ऐसा क्यों? अभी भी किसी भारतीय नर्तकी को वीसा पाने के लिये नाच के दिखाना पड़ता है, काले खिलाड़ियों पर छींटाकशी की जाती है, गोरे खिलाड़ियों पर नहीं, दोष अक्सर “काले” का ही होता है गोरे का नहीं… अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं… यहाँ तक कि ऑस्कर के लिये भी “ब्लैक” की बजाय “पहेली” भेजी गई (इस वाक्य को मजाक मानें)… जाहिर है कि हमारे मन में गोरे रंग के प्रति एक विशेष आसक्ति है, भारतीयों के दिलोदिमाग में गोरे रंग की “श्रेष्ठता” और काले रंग के प्रति तिरस्कार गहरे तक पैठ बना चुका है, और इसे लगातार हवा देती हैं “गोरा बनाने वाली क्रीमें”।

असल में ये सारा खेल “बाजार” से जुड़ा हुआ भी है, कम्पनियों ने भारतीयों की “गोरा बनने” की चाहत को काफ़ी पहले से भाँप लिया है। पहले वे सिर्फ़ औरतों के लिये क्रीमें बनाते थे, अब जब खपत स्थिर हो गई तो “ए ए ए ए ए ए मर्दों के लिये भी” गोरेपन की “अलग-हट के” क्रीम आ गई। अकेले “फ़ेयर एंड लवली” क्रीम का भारतीय बाजार 600 करोड़ रुपये का है, इसके अलावा यह क्रीम मलेशिया, श्रीलंका आदि देशों को निर्यात भी की जाती है। इसके अलावा कम से कम 40 ब्राण्ड ऐसे हैं जो लाखों रुपये का गोरा बनाने का सामान बेच रहे हैं। अब सवाल उठता है कि क्या वाकई ये क्रीमें इतनी प्रभावशाली हैं? लगता तो नहीं, क्योंकि आँकड़ों के अनुसार इस क्रीम की सर्वाधिक (36%) खपत दक्षिण भारत में होती है, जबकि उत्तर और पश्चिम क्षेत्र 23% बिक्री के साथ दूसरे स्थान पर हैं और पूर्व में सबसे कम यानी 18% खपत होती है। “टेक्निकल” दृष्टि से देखा जाये तो दक्षिण भारतीय लोगों को सर्वाधिक गोरा होना चाहिये ना? लेकिन ऐसा है नहीं, और यदि ये क्रीमें वाकई इतनी प्रभावशाली हैं तो अफ़्रीका में इनकी खपत ज्यादा क्यों नहीं है? और जहाँ है, क्या वहाँ के कितने अफ़्रीकी गोरे हुए? असल में इस प्रकार की क्रीमों की सबसे ज्यादा खपत दक्षिण एशियाई देशों भारत, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, बर्मा आदि मे है। (यहाँ देखें)

अब संक्षेप में देखते हैं कि असल में ये क्रीमें करती क्या हैं और इनमें क्या-क्या मिला हुआ है। FDA द्वारा की गई एक टेस्ट में अधिकतर क्रीमों में “पारे” (Mercury) का स्तर बहुत ज्यादा पाया गया, जबकि अधिकतर देशों में सन-स्क्रीन और फ़ेयरनेस क्रीमों में मरकरी का प्रयोग प्रतिबन्धित है। इसी तरह इनमें “हाइड्रोक्विनोन” की मात्रा भी काफ़ी पाई गई, जो कि त्वचा को ब्लीच कर देता है, जिससे तात्कालिक रूप से व्यक्ति को “लगता है” कि वह गोरा हो गया, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम काफ़ी खतरनाक होते हैं। यहाँ तक कि चर्मरोग विशेषज्ञ भी इन क्रीमों को सुरक्षित नहीं मानते और त्वचा कैंसर, धूप से एलर्जी, मूल रंग खो जाने जैसी कई बीमारियों से ग्रसित मरीज उनके पास आते रहते हैं। अधिकतर डॉक्टरों का मानना है कि इनमें कई घातक रसायन मिले होते हैं, लेकिन इन कम्पनियों का विज्ञापन इतना जोरदार होता है कि लोग झाँसे में आ ही जाते हैं। जबकि हमारे बड़े-बुजुर्ग कह गये हैं कि दूध-बेसन या शहद-नींबू आदि के प्रयोग से ज्यादा सुन्दरता पाई जा सकती है, लेकिन “इंस्टेण्ट” के जमाने में ये बात युवाओं को कौन समझाये?

अंत में एक कविता पेश है जो कि 2005 में विश्व की सर्वश्रेष्ठ कविता पुरस्कार के लिये नामांकित हुई थी, यह कविता एक अफ़्रीकी बालक ने लिखी है, बड़ी मार्मिक और गोरों की “पोल” खोलने वाली कविता है ये…

When I born, I black .
When I grow up, I black .
When go in sun, I black .
When I scared, I black .
When I sick, I black .
& when I die, I still black.
And u white fella,
when you born you pink .
when you grow up u white .
when u go in sun you red.
when u cold u blue.
when u scared u yellow .
when u sick u green .
& when u die u gray .
And u calling me coloured ? ?

इसके बाद कुछ कहने को रह ही नहीं जाता…

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UPA Chidambaram Minority Appeasement Budget
अब तक यह समझा जाता था कि केन्द्रीय बजट भारत के प्रत्येक नागरिक के लिये समान अवसर प्रदान करता है, बजट में किये गये प्रावधानों से किसी एक धर्म का नहीं सबका भला होता है, लेकिन यह सोच कितनी गलत थी, आइये देखते हैं। अपने पिछले लगातार पाँच बजटों में यूपीए सरकार ने एक नया फ़ॉर्मूला गढ़ लिया है जो कि आने वाले समय में और बढ़ता ही जायेगा, वह है “अल्पसंख्यकवाद”। पिछले कुछ दशकों में राजनैतिक और अब आर्थिक लाभ लेने के लिये “अल्पसंख्यक” का लेबल लगवा लेने का फ़ैशन बढ़ता ही जा रहा है, पहले जैन, फ़िर आर्य समाजी, रामकृष्ण मिशन सम्प्रदाय आदि धीरे-धीरे विभिन्न राज्यों में अल्पसंख्यकों में शामिल होने के लिये आवेदन कर रहे हैं, कुछ सम्प्रदाय “राज्य आधारित” सुरक्षा चाहते हैं और “हम हिन्दू नहीं हैं, उनसे अलग हैं…” की गुहार लगाने लगे हैं। ऐसा लगता है कि भारत में “बहुसंख्यक” होना अब असुविधाजनक होता जा रहा है और “अल्पसंख्यक” बन जाना सम्मानजनक!!!

चिदम्बरम साहब के पिछले बजटों में “अल्पसंख्यक” (Minority) शब्द का उल्लेख बार-बार होता रहा है, लेकिन ताजा बजट में शर्म मिटते-मिटते अब अल्पसंख्यक का मतलब हो गया है सिर्फ़ “मुस्लिम”। कैसे? बताते हैं… 2004-05 के बजट में यूपीए सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम को 50 करोड़ रुपये दिये थे, बजट में कहा गया था कि ये पैसा अल्पसंख्यक कल्याण, विशेषकर उनकी शिक्षा के लिये खर्च किया जायेगा (यानी कि उनके कल्याण और शिक्षा के लिये नेहरू, इन्दिरा और राजीव ने अब तक कुछ नहीं किया था), कुछ किया तो सिर्फ़ यूपीए ने। यूपीए के दूसरे बजट में कहा गया कि “अल्पसंख्यकों को देश की मुख्य धारा में लाना है…और उनका विकास करना है…” (इसका मतलब भी यही निकलता है कि 15 अगस्त 1947 से 28 फ़रवरी 2006 तक सारे अल्पसंख्यक सभी कांग्रेस सरकारों द्वारा, विकास से दूर ही रखे गये थे)। लड़कियों के लिये स्कूल, अल्पसंख्यक इलाकों में आंगनवाड़ियाँ, अल्पसंख्यक छात्रों को प्रायवेट कोचिंग की सुविधा जैसे कई “अल्पसंख्यक” कल्याण की विभिन्न योजनाओं का उल्लेख और ढिंढोरा था। अब देखिये, अगले बजट में चुपचाप और धीरे-धीरे “अल्पसंख्यक” का मतलब मुसलमान में बदल गया। अगले बजट में 200 करोड़ रुपये मौलाना आजाद शिक्षा फ़ाउंडेशन को दिये गये और 13 करोड़ रुपये उर्दू के विकास के लिये।



ताजा बजट (2008-09) तो खुल्लमखुल्ला “मुसलमानों” के फ़ायदे के लिये एक-सूत्रीय कार्यक्रम में बदल गया। बजट भाषण के पैराग्राफ़ 47 की हेडिंग है “अल्पसंख्यक”, मतलब क्या? अल्पसंख्यक मामलों के लिये बजट प्रावधान 500 करोड़ से बढ़ाकर 1000 करोड़ कर दिया गया, ताकि “सच्चर कमेटी” की सिफ़ारिशों पर तेजी से अमल किया जा सके (सच्चर कमेटी के लिये भी अल्पसंख्यक का अर्थ केवल और केवल मुसलमान ही था)। बजट की अन्य योजनाओं में, 90 अल्पसंख्यक बहुल जिलों (पढ़ें मुस्लिम) में विभिन्न क्षेत्रों के विकास के लिये 3780 करोड़ रुपये, प्री-मेट्रिक स्कॉलरशिप के लिये 80 करोड़ रुपये, मदरसों के आधुनिकीकरण के लिये 45 करोड़, मौलाना आजाद शिक्षा फ़ाउंडेशन को और 60 करोड़ रुपये, तथा सबसे खतरनाक बात यह कि अल्पसंख्यक बहुल इलाकों (इसे पढ़ें ‘मुस्लिम’) में खासतौर से सरकारी क्षेत्र बैंकों की 544 शाखायें (खामख्वाह… धंधा हो या ना हो) खोलना शामिल हैं, यहाँ खत्म नहीं हुआ है अभी… 2008-09 में अल्पसंख्यकों को केन्द्र की अर्ध-सरकारी सेनाओं में अधिक से अधिक नियुक्तियाँ देना भी इस बजट में शामिल है। जाहिर है कि यह सब सिर्फ़ और सिर्फ़ मुसलमानों को फ़ायदा पहुँचाने के लिये किया गया, इसमें “अल्पसंख्यक” शब्द का कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी आदि बाकी सभी कांग्रेस के अनुसार “अल्पसंख्यक” की परिभाषा में नहीं आते। यह एक बेहद खतरनाक परम्परा शुरु की गई है और समाज को धर्म के आधार पर बाँटने के कई कदमों में से यह एक है… सच्चर कमेटी की रिपोर्ट से भी ज्यादा खतरनाक।

लगभग हरेक भारतीय जानता है कि राजनेताओं की घोषणाओं के मंसूबे क्या होते हैं। सारी घोषणायें सिर्फ़ वोट के लिये होती हैं, चाहे इससे समाज कितने ही टुकड़ों में बँट जाये या कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब हो जाये, इससे उन्हें कोई मतलब नहीं होता है। “अल्पसंख्यक इलाकों” में बैंकों की विशेष शाखायें खोलने के क्या गम्भीर नतीजे हो सकते हैं सेंट्रल बैंक, अम्मापट्टी की इस घटना से सिद्ध हो जायेगा…

तमिलनाडु का एक जिला है पुदुकोट्टई, जिसका एक कस्बा है अम्मापट्टी। यहाँ की सेंट्रल बैंक की शाखा में कुछ मुसलमान युवकों ने बैंक के दो कर्मचारियों को ट्रांसफ़र करने की माँग की। शायद ये कर्मचारी उन मुसलमानों को “लोन देने और अन्य लाभ देने” में अडंगे लगा रहे थे। बैंक मैनेजर ने उनकी माँग सिरे से खारिज कर दी। उन मुसलमान युवकों ने मैनेजर को धमकी दी कि 15 अक्टूबर 2007 तक यदि इन कर्मचारियों का ट्रांसफ़र नहीं किया गया तो वे बैंक को “ताला” लगा देंगे (जी हाँ सही पढ़ा आपने, “ताला लगा देंगे” कहा)। घबराये हुए बैंक मैनेजर ने पुलिस और जिला प्रशासन को शिकायत की और पुलिस सुरक्षा की माँग की। अब देखिये भारत की कानून-व्यवस्था… स्थानीय तहसीलदार के नेतृत्व में “शांति बैठक” आयोजित की गई। सेंट्रल बैंक के जनरल मैनेजर वहाँ शांति से उपस्थित हुए, लेकिन वे मुस्लिम युवक तहसीलदार के दफ़्तर में नहीं आये। उन्होंने माँग की कि पुलिस और बैंक अधिकारी मस्जिद में “जमात” में आयें वहीं बात होगी। बेचारा, जनरल मैनेजर (जो कि किसी अन्य राज्य का था) “जमात” से चर्चा करने को तैयार हो गया, शर्त ये थी कि तहसीलदार, बैंक अधिकारी और जमात के पाँच सदस्य चर्चा करेंगे, लेकिन पाँच की जगह वहाँ सौ से अधिक मुसलमान इकठ्ठा थे। मैनेजर ने चुपचाप उनकी बात सुनी और कहा कि “वह बैंक जाकर उन कर्मचारियों का पक्ष सुनेंगे, उसके बाद नियमानुसार जो होगा वह किया जायेगा”, लेकिन भीड़ ने उनका घेराव कर दिया और उन कर्मचारियों का तत्काल लिखित में ट्रांसफ़र करने की माँग करने लगे। मैनेजर ने यह कहकर मना कर दिया कि ट्रांसफ़र करने के अधिकार उसके पास नहीं हैं। जनरल मैनेजर के बैंक पहुँचने से पहले ही कुछ युवाओं ने बैंक जाकर उसके शटर बन्द कर दिये और ताला लगा दिया, जबकि स्टाफ़ बैंक के अन्दर ही था। वहाँ उपस्थित पुलिस इंस्पेक्टर ने अपने DSP को खबर की, वे खुद आये और बैंक का ताला खोला।

लेकिन मुद्दा हल नहीं हुआ था, बल्कि और बिगड़ गया। मामले की रिपोर्ट एसपी को की गई, जो आधी रात को ताबड़तोड़ अम्मापट्टी पहुँचे और गुस्से में उन मुस्लिम युवकों से कहा कि “आप लोगों का यह काम गैरकानूनी है, जैसे आपने बैंक के कर्मचारियों को बन्द कर दिया है, वैसे ही यदि जमात के सदस्यों को बन्द करें तो आपको कैसा लगेगा?” इस बात पर एक नया मुद्दा भड़क गया कि एसपी ने जमात के खिलाफ़ ऐसा कैसे कहा? कलेक्टर को बीचबचाव करने आना पड़ा, लेकिन जमात की नई माँग थी कि उन कर्मचारियों के ट्रांसफ़र के साथ-साथ एसपी पर भी कार्रवाई होना चाहिये। जबकि बैंक कर्मचारियों की माँग थी कि हमलावरों को गिरफ़्तार किया जाये, वरना एक “नई परम्परा” शुरु हो जायेगी!!! यह सारा वाकया तमिल साप्ताहिक “तुगलक” में दिनांक 31.10.2007 को छप चुका है, यहाँ तक कि “जमात” ने भी इस घटना की पुष्टि की लेकिन विवाद की वजह नहीं बताई। इस समूचे मामले का और भी दुखद पहलू यह है कि किसी अन्य अखबार या पत्रिका ने इस खबर को छापने की “हिम्मत” नहीं दिखाई। रही बात राज्य शासन की तो वह भी उसी तरह चुप्पी साधे रहा जैसा कि सोनिया के सामने मनमोहन साधे रहते हैं या बुश के सामने मुशर्रफ़।

इस घटना के सबक हमारे लिये स्पष्ट हैं, यदि सरकार (कांग्रेस) किसी धर्म विशेष के लोगों के लिये खास उनके “इलाकों” में बैंक खोलती है, तो वह समुदाय (इसे “जमात” पढ़ें) अपनी मनमानी अवश्य करेगा। बैंक अपने नियम-कायदों से नहीं, बल्कि जमात के हुक्म के अनुसार लोन बाँटेंगी या कर्मचारियों के तबादले करेंगी। उन खास इलाकों में धर्म विशेष को सुविधा के नाम पर खोले गये “स्कूल”, आंगनवाड़ी, या बालवाड़ी केन्द्र का हश्र भी कुछ ऐसा ही होगा, जब प्राचार्य को धमकाकर नाजायज काम करवाये जायेंगे। हरेक शहर में एक या दो मोहल्ले ऐसे होते हैं जहाँ मुसलमानों का बाहुल्य होता है, उस मुहल्ले में कभी आयकर छापा नहीं पड़ता, कभी नल नहीं काटे जाते, कभी बिजली चोरी का केस नहीं बनता, कभी अतिक्रमण मुहिम नहीं चलाई जाती, खुलेआम सरकारी सम्पत्ति की मुफ़्तखोरी की जाती है और सरकारें (गुजरात को छोड़कर) पंगु बनकर देखती रहती हैं, सिर्फ़ वोट की खातिर नहीं, बल्कि सरकारों में गलत काम को ठीक करवाने का साहस ही नहीं होता। उससे भी खतरनाक बात यह होती है कि जब दूसरा अल्पसंख्यक समुदाय किसी अन्य अल्पसंख्यक समुदाय को इस प्रकार की “सुविधा” लेता हुआ देखेगा तो उसके मन में या तो गुस्सा आयेगा या निराशा। जी हाँ, चिदम्बरम साहब… आपकी सच्चर समिति और “विशेष बजटीय प्रावधान” कांग्रेस को मुसलमानों के वोट तो दिलवा सकते हैं, लेकिन समाज के बीच बढ़ती खाई को और चौड़ा भी करते जा रहे हैं, इसका आपको जरा भी खयाल नहीं है…

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सन्दर्भ – यह एस.गुरुमूर्ति के एक लेख का संकलन, सम्पादन और अनुवाद है।
Bomb Attack Indian Press Releases
आज _________ को __________ शहर के व्यस्ततम बाजार में कई भीषण बम विस्फ़ोट हुए, जिसमें ____ लोग मारे गये तथा ____ घायलों का इलाज विभिन्न अस्पतालों में चल रहा है। (भाईयों और बहनों अब इन खाली स्थानों में दिनांक / वार, अपने शहर का नाम, मरे हुए लोगों तथा घायलों की संख्या भर लीजिये) इसके बाद के सिलसिलेवार बयान और घटनाक्रम वैसे तो आपको भी मालूम होंगे, फ़िर भी आगे पढ़िये…

(1) प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ने इन बम विस्फ़ोटों की कड़े शब्दों में निंदा की है (जितना बड़ा बम उतनी कड़ी निंदा, ठीक है ना!! आगे चलो)
(2) राष्ट्रपति और गृहमंत्री ने आम जनता से शांति बनाये रखने की अपील की है।
(3) नेता प्रतिपक्ष ने इस घटना की भर्त्सना करते हुए कहा है कि ये कायरों का काम है।
(4) देश के प्रमुख शहरों में “रेड अलर्ट” जारी कर दिया गया है, जगह-जगह तलाशी अभियान चलाये जा रहे हैं।
विस्फ़ोटों के आठ-दस घंटे बाद…
(5) गृहमंत्री ने कहा है कि पुलिस के हाथ कुछ महत्वपूर्ण सुराग लगे हैं, और हम जल्दी ही आतंकवादियों को बेनकाब कर देंगे। इन विस्फ़ोटों में पड़ोसी देश का हाथ है (बूढ़ी औरतों की तरह अभी भी सीधे नाम लेने में शरमाते हैं)
(6) तब तक विदेश से भी शोक संदेश आने लगते हैं और फ़िर से हमारे प्रधानमंत्री गरजते हैं, “आतंकवादियों की इस हरकत को कतई बर्दाश्त नहीं किया जायेगा…” या फ़िर, “हम आतंकवाद के सामने घुटने नहीं टेकेंगे…”, या फ़िर “देश की जनता आतंकवाद के खिलाफ़ एकजुट है…” या फ़िर “आतंकवादियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलायेंगे (अफ़जल गुरु और अबू सलेम की तरह)…” या कि “आतंकवादी कहीं भी छुपे हों उन्हें ढूंढ निकाला जायेगा…(जिससे कि बाद में उन्हें छोड़ा जा सके)”, यानी कि ऐसा ही कुछ अनर्गल सा बयान मिलेगा जिसका आज तक कोई मतलब नहीं निकला।
(7) यदि विस्फ़ोट वाले राज्य में कांग्रेस का शासन हो तो भाजपा कहेगी “यह केन्द्र की घोर असफ़लता है और प्रधानमंत्री को इस्तीफ़ा देना चाहिये…” और यदि राज्य में भाजपा की सरकार है तो कांग्रेस कहेगी “कानून व्यवस्था का मामला राज्य सरकार का है, हमारी सूचनाओं का सही ढंग से इस्तेमाल नहीं किया गया…”।
(8) सोनिया गाँधी, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, नेता प्रतिपक्ष के घटनास्थल के दौरे होंगे, फ़ोटो खिंचेंगे, एक और प्रेस विज्ञप्ति होगी और फ़िर इतिश्री… मोमबत्ती वाले का धंधा चमक जायेगा (लेटेस्ट फ़ैशन है, मोमबत्ती जलाकर श्रद्धांजलि देना)।



पुलिस को भी यह मालूम होता है कि “रेड अलर्ट” दो दिनों तक ही होता है, तीसरे दिन मरने वालों का “उठावना” होते ही फ़िर वही पुराना ढर्रा चालू, और अगले बम विस्फ़ोट का इंतजार… ये सब आपको इसलिये बता दिया कि बम विस्फ़ोट के बाद आपका अखबार पढ़ने में टाइम खराब न हो…

आप लोग तो सुबह घर से निकलो और शाम को सही-सलामत घर पहुँच जाओ तो शुक्र मनाओ कि आज मेरी बारी नहीं आई… लेकिन कल जरूर आयेगी, जब तक भ्रष्टाचार करना नहीं छोड़ोगे और देश से पहले अपनी जेब के बारे में सोचोगे, यदि खुद ऐसा नहीं सोचते तो कम से कम तब तक जब तक कि ऐसा सोचने वालों को नजर-अंदाज करते रहोगे… इसलिये खुद का नाम मृतकों की सूची में देखने से पहले उठो, और देशद्रोहियों, भ्रष्टाचारियों, कालाबाजारियों का गला पकड़ लो…

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How Coward Hindus Face Problems
आत्मपीड़ा और स्व-आलोचना का यदि कोई पैमाना मानें तो हिन्दुओं का स्थान उसमें विश्व में सबसे ऊपर आता है। विगत सौ वर्षों में “खुद से घृणा करने की कला” में हिन्दुओं ने महारत हासिल कर ली है। राजनेता, मीडिया, तथाकथित सेक्यूलर, बुद्धिजीवी(?), मानवाधिकार कार्यकर्ता जो हिन्दुओं को गाली देने में सबसे आगे रहते हैं उनमें ज्यादातर हिन्दू ही हैं। हिन्दुओं का सबसे बड़ा दुश्मन आज की तारीख में कोई है तो वह है “हिन्दू”।

हिन्दुओं के दिमाग को समझना काफ़ी आसान है, इस लेख में पलायनवादी और कायर हिन्दुओं की मानसिकता को समझने की कोशिश की गई है। जब भी हिन्दुओं पर कोई संकट आता है, या कोई समस्या उत्पन्न होती है, या कोई घटना उन्हें नुकसान पहुँचा सकती है, तब हिन्दू समस्या का सामना कैसे करते हैं? किसी भी मुश्किल या समस्या से निपटने के तो तरीके होते हैं, पहला उसे समस्या मानो और उसका मुकाबला करो, उस समस्या का समाधान ढूंढने के लिये उपाय करो, और कुछ कदम उठाओ तथा दूसरा तरीका है संकट या समस्या को समस्या मानो ही मत। यदि हिन्दू हित की कोई समस्या है और उसके हल के लिये कदम उठाना पड़ें तो जाहिर है कि विवाद होंगे, तनाव होगा, झगड़े होंगे, आक्रमण करना पड़ेगा, जबकि यदि हम समस्या को समस्या मानें ही नहीं तो क्या होगा, कुछ नहीं, कोई झगड़ा-टंटा नहीं, कोई विवाद नहीं, कोई लड़ाई नहीं। सीधी सी बात यही है कि दूसरा रास्ता ज्यादा आसान है, पहला वाला कठिन है। बरसों से हिन्दू दूसरा वाला रास्ता अपनाते आये हैं, समस्या की अनदेखी करो, रेत में शतुरमुर्ग की तरह अपना सिर छुपा लो, लेकिन उससे तूफ़ान का खतरा कम नहीं हो जाता, बल्कि और बढ़ जाता है। सुविधाभोगी और कायर हिन्दू अपना “आज” सुविधाजनक बनाने के लिये अपने “कल” को मुश्किलों के हवाले कर रहे हैं।

फ़िर सवाल उठता है कि आखिर ये कायर हिन्दू अपनी समस्याओं को सुलझाते कैसे हैं? कई तरीकों में से सबसे आसान तरीका होता है खुद हिन्दुओं पर, अपने भाई-बन्धुओं पर “सांप्रदायिक” होने का आरोप लगाकर। सबसे पहले “घरघुस्सू” बुद्धिजीवी हिन्दू खुद ही हिन्दुओं पर “संकीर्ण विचारधारा वाले” (Narrow Minded), कट्टरपंथी (Fundamentalist) आदि होने का आरोप करेगा। जाहिर है कि हिन्दू द्वारा हिन्दू पर शाब्दिक हमला करना आसान होता है, क्योंकि हिन्दू खुद ही कम आक्रामक और कम हिंसक है। जबकि असली दुश्मन से निपटना उन बुद्धिजीवियों के लिये काफ़ी मुश्किल है, इसलिये हिन्दू बुद्धिजीवी “संत” होने का ढोंग रचता है और अपने ही धर्म के लोगों को खरी-खोटी सुनाने का उपक्रम करता है। क्योंकि उसे मालूम है कि यदि उसने दूसरे धर्म के खिलाफ़ कुछ कहा तो जूते खाना निश्चित है। ऐसे में नेता, मीडिया, धर्मनिरपेक्ष(?) सभी लोग एक सुर में हिन्दुओं को ही कट्टरवादी और दंगों के लिये दोषी बताने लगते हैं, क्योंकि उनमें यह नैतिक और मानसिक ताकत नहीं होती कि वे “जेहाद”, “आतंकवाद” को गलत ठहरा सकें या उसकी कड़ी आलोचना कर सकें। लगे हाथों हमारे महान मानवाधिकारवादी भी आतंकवादियों और अपराधियों के मानवाधिकारों को लेकर बेहद चिंतित हो जाते हैं, भले ही कश्मीरी पंडित अपने ही देश में सड़ते रहें। हम हिन्दू कभी भी बढ़ती हुई मुसलमान आबादी या तेज होते जा रहे ईसाई धर्मान्तरण को लगातार नजरअंदाज करते जाते हैं। हम ये कभी मानते ही नहीं कि ये कोई समस्या है, या इससे हिन्दुओं को या भारत को खतरा है। है न मजेदार तरीका समस्या से निपटने का, बस उसे नजर-अंदाज कर दो। हिन्दू बुद्धिजीवी इस बात पर भी कभी बहस नहीं करते कि कश्मीर से हिन्दुओं को चुन-चुनकर भगा दिया गया है, उन्हें चिंता होती है फ़िलिस्तीन की या फ़िजी की। यदि गलती से कभी बहस कर भी ली तो उसके हल के नाम पर शून्य, अमेरिका-पाकिस्तान का मुँह तकते रहेंगे जिन्दगी भर, ये है "टिपीकल" धर्मनिरपेक्षतावादी तरीका।



हिन्दुओं ने इतिहास से कभी सबक न सीखने की कसम खा रखी है। सारे आँकड़े और तथ्य चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि अगले बीस वर्षों के भीतर हम दूसरे विभाजन की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन मीडिया और बुद्धिजीवी इसे नहीं मानेंगे। इसके बजाय वे उन संस्थाओं की आलोचना करेंगे जो कि धर्म आधारित जनगणना करती हैं। जब उन्हें धर्म आधारित जनगणना के आँकड़े बताये जायेंगे तो वे उसे खारिज कर देंगे और उसे “बकवास” और एक “सेक्यूलर” देश में गैरजरूरी बतायेंगे। इसके पीछे का उद्देश्य साफ़ होता है, तथाकथित बुद्धिजीवी मुख्य मुद्दे को दरकिनार करके जनसंख्या के आँकड़ों को ही गलत बताकर उसे मुख्य मुद्दा बना देंगे, इससे असली मुद्दे पर पलायन करने में आसानी होती है। सनद रहे कि 1948 में जिन उत्तर-पूर्वी राज्यों में हिन्दू जनसंख्या बहुसंख्यक थी उनमें से पाँच राज्यों में 2001 की जनगणना के अनुसार ईसाई बहुसंख्यक हो गये हैं, जबकि असम में मुसलमान जनसंख्या तेजी से बढ़कर 32% तक हो गई है और किसी-किसी जिले में यह 60% तक है, लेकिन कायर हिन्दू बुद्धिजीवी इसे बकवास कहकर टाल देंगे।

मुसलमान संप्रदाय को मुख्य धारा में लाने के लिये उनमें आधुनिक शिक्षा का प्रसार जरूरी है, परिवार नियोजन अपनाने पर बल देना जरूरी है, उन्हें यह समझाने की जरूरत है कि अवैध बांग्लादेशियों को पनाह देने की बजाय पुलिस में रिपोर्ट करें, लेकिन इसके लिये पहले “समस्या” को “समस्या” मानना होगा न!!! उससे लड़ना होगा, लेकिन पलायन में माहिर हिन्दू बुद्धिजीवी ये नहीं करेंगे। इसलिये जब उमा भारती को हुबली में “विवादित स्थल” पर तिरंगा फ़हराने के आरोप में गिरफ़्तार किया जाता है तब हमारे ही हिन्दू भाई-बन्धु कभी ये जानने की कोशिश नहीं करते कि कथित विवादित स्थल “विवादित” क्यों है, वह विवादित कब और कैसे बना, क्या देश में कहीं भी तिरंगा फ़हराना विवादित हो सकता है? ये जानने की बजाय बुद्धिजीवी भाजपा को कोसने लगते हैं कि वह खामख्वाह विवादित मुद्दों को हवा दे रही है, दंगे करवाना चाहती है, हिन्दू वोटों के लिये यह सब कर रही है आदि-आदि। यही बुद्धिजीवी “भावनाओं को चोट पहुँचने” के आधार पर वन्देमातरम का गायन ऐच्छिक कर देते हैं। जब शंकराचार्य को गिरफ़्तार किया जाता है तब हमें सीख दी जाती है कि “कानून सबके लिये बराबर है, कानून का पालन करना चाहिये…” मीडिया में कहीं यह चर्चा नहीं की जाती कि हो सकता है कि इसके पीछे भी किसी की साजिश हो, यहाँ तक कि जब शंकराचार्य सुप्रीम कोर्ट से बाइज्जत बरी हो जायें तब भी उस खबर को पीछे के पन्ने पर कहीं कोने में छापा जायेगा, भले ही अफ़जल गुरु को फ़ाँसी देने में टालमटोल की जाती रहे (उस वक्त “कानून” और सुप्रीम कोर्ट जाने कहाँ चला जाता है)।

असल में हिन्दुओं में ही काफ़ी सारे “अवैध और काले पैसे वाले”, कुछ “डरपोक” और कुछ “सेक्यूलर” दिमाग वाले गद्दार भरे हुए हैं। इन लोगों को बांग्लादेशियों के अवैध घुसपैठ में कोई समस्या नजर नहीं आती, इन्हें मदरसों से चलाये जा रहे अभियान दिखाई नहीं देते, इन्हें चर्च द्वारा आदिवासियों के बीच किये जा रहे धर्मान्तरण में कुछ भी गैरवाजिब नहीं लगता। ये लोग सोमनाथ मन्दिर को सरकारी पैसे से बनवाने का विरोध करेंगे लेकिन मस्जिदों को प्रतिवर्ष दिये जा रहे करोड़ों रुपये की मदद पर चुप्पी साध जायेंगे। यदि शिक्षा पद्धति में “वैदिक गणित” या “नैतिक शिक्षा” की बात भर की जाये तो उन्हें “भगवाकरण” का खतरा दिखाई देने लगता है, सरस्वती वन्दना के विरोध में भी ये लोग “धर्म” ढूंढ लेते हैं। इनके अनुसार वनवासी क्षेत्रों में सिर्फ़ और सिर्फ़ “चर्च” ही समाजसेवा कर रहा है, बाकी के सब लोग वहाँ शोषण कर रहे हैं।



हकीकत तो ये है कि यदि इन समस्याओं को हम लोग समस्या मानें तो इसके निदान के लिये हमे “कुछ” करना पड़ेगा, लेकिन भगोड़ी मानसिकता वाले हिन्दू कुछ करना नहीं चाहते, इसलिये संकट के हल की बात नहीं उठती। बस लगातार प्रचार करते रहो कि हिन्दू धर्म सहनशील है, अनेकता में एकता का समर्थक है, हिन्दू धर्म आध्यात्म से भरपूर है और कभी हिंसा की पैरवी नहीं करता आदि-आदि। हिन्दुओं का खूब सारा समय, पैसा और ऊर्जा विभिन्न प्रकार की पूजाओं, यज्ञों, भागवत कथाओं, बाबाओं और स्वामियों की चरण-वन्दना जैसे निकम्मे कामों में खर्च होता है। जमाने भर को “गीता के कर्म के सिद्धांत” की दुहाई देते नहीं थकते, लेकिन जब खुद कुछ सच्चा कर्म करने की बारी आती है तो पीठ दिखा कर भाग जाते हैं। जिस गीता में अधिकतर हिन्दुओं का विश्वास है, जिस गीता पर हाथ रखकर कसमें खाई जाती हैं, उसमें स्पष्ट लिखा है कि अधर्म के खिलाफ़ लड़ना हरेक का कर्तव्य है, बल्कि अधर्म का नाश करने के लिये यदि कृष्ण की तरह चालबाजियाँ भी करना पड़ें तो भी कोई हर्ज नहीं, उसी गीता को हम भूल चुके हैं। अपना नपुंसकतावाद छिपाने के लिये हमने “सेक्यूलर” और “अहिंसा” का मुखौटा ओढ़ लिया है। अहिंसा के मूल सिद्धांत को हमने अपनी “अकर्मण्यता” छिपाने के लिये उपयोग कर लिया है। जबकि महात्मा गाँधी ने खुद एक जगह लिखा है “My own experiences but confirm the opinion that the Mussalman as a rule is a bully, and the Hindu is a coward; where there are cowards there will always be bullies.” अर्थात “मुसलमान जब शासक बनता है तब वह निर्दयी और दबंग होता है, जबकि हिन्दू शासक डरपोक…” यहाँ तक कि एक बार उन्होंने यह भी कहा कि “यदि मुझे डरपोक और अत्याचार सहन करने तथा हिंसा में से एक को चुनना पड़े तो मैं हिंसा पसन्द करूँगा…भले ही अहिंसा मेरा सिद्धांत हो”। लेकिन शतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर गड़ाये बैठे हिन्दू ये सोचते रहते हैं कि तूफ़ान नहीं आने वाला या अपने-आप टल जायेगा। उसकी इस मानसिकता को हवा देते रहते हैं हिन्दू बुद्धिजीवी और कथित धर्मनिरपेक्ष लोग, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि बांग्लादेश से घुसपैठ रोकी जाये, पाकिस्तान से आतंकवाद पर सीधी बात की जाये, देश के नागरिकों में देशप्रेम की भावना जगाना, आतंकवादियों को खदेड़-खदेड़ कर मारना, जो आतंकवादी और दुर्दान्त आतंकवादी पकड़ में आ जायें उन्हें तत्काल मार गिराना, पुलिस तंत्र में शामिल राजनीति, खुफ़िया तंत्र को मजबूत करना, जैसे कठोर उपाय किये बिना हम यूँ ही सतत जूते खाते रहेंगे। पाकिस्तान, बांग्लादेश या देश में रह रहे कुछेक गद्दार लोग हिन्दुओं के उतने बड़े दुश्मन नहीं है, असली दुश्मन तो हैं हमारे अपने ही लोग, वे लोग जो समस्या को समस्या मानते ही नहीं और धर्मनिरपेक्षता के उपदेश पिलाते रहते हैं…।

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सन्दर्भ : शची रायरीकर, 22 जनवरी 2005