Super User

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I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

Website URL: http://www.google.com
संयुक्त राष्ट्र में पेश की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि “आतंकवाद से लड़ने के लिये भारत की तैयारी और प्रतिबद्धता काफ़ी कम है और उसे कानूनों में सुधार और सीमाओं पर चौकसी बढ़ाने की आवश्यकता है।“ जिस किसी अधिकारी या संस्था ने यह रिपोर्ट बनाई है और “मासूम” से संयुक्त राष्ट्र ने उसे जस का तस पेश भी कर दिया है, वे भोले हैं, या नादान हैं, या मूर्ख हैं यह तय कर पाना मुश्किल हो गया है। क्या ये लोग नहीं जानते हैं कि –

(१) भारत में देशप्रेम या देश के नाम पर कुछ नहीं किया जाता, यहाँ एक महान (?) लोकतन्त्र है इसलिये यहाँ सब कुछ “वोट” के लिये किया जाता है।

(२) इस देश में राष्ट्रभक्ति १५ अगस्त या २६ जनवरी पर “बासी कढ़ी में उबाल” जैसी आती है, या फ़िर एक मेक-अप की हुई नकली देशभक्ति, “ताज” पर वोट देने के दौरान आती है।

(३) यहाँ “देश की सीमायें” नाम की कोई चीज वजूद में नहीं है, भारत एक “विशाल धर्मशाला” है, बांग्लादेशी, पाकिस्तानी, नेपाली, तिब्बती कोई भी यहाँ कभी भी आ-जा सकता है कितने भी समय रह सकता है।

(४) राष्ट्रीय चरित्र की बात करने वाले को क्या मालूम कि भ्रष्ट कांग्रेस का एक सांसद इस देश का नागरिक ही नहीं है, फ़िर भी संसद में है, फ़र्जी वामपंथियों को बंगाल या असम में घुसपैठ नहीं दिखाई देती, नकली भाजपा वाले रामसेतु के आंदोलन कर रहे हैं, जबकि मध्यप्रदेश में सड़कें ही नहीं हैं। ५२५ सांसदों में से आधे से ज्यादा पर गम्भीर आपराधिक मामले हैं, और संसद में “अपना भत्ता बढ़वाने” के अलावा वे किसी बात पर सहमत नहीं होते हैं।

(५) यहाँ “अफ़जल” को फ़ाँसी से बचाने वाले भी मौजूद हैं, और चालीस-चालीस साल तक मुकदमा चलने के बावजूद फ़ैसला न देने वाली अदालतें मौजूद हैं। अनाथ बच्चों, विकलांगों और वृद्धों को मिलने वाली आर्थिक योजनाओं में भी करोड़ों का भ्रष्टाचार करने वाले सरकारी कर्मचारी हैं, धर्म की अफ़ीम पिलाकर “पाप-पुण्य” की कथायें सुनाने वाले बाबा मौजूद हैं, ज्योतिष-वास्तु-फ़ेंगशुई “बेचने” वाले कलाकार मौजूद हैं।

(६) और अन्त में “सौ बात की एक बात” – पड़ोसी के यहाँ खून होते देखकर अपना दरवाजा बन्द कर लेने वाली जनता, नेताओं की करतूतों को खामोशी से सहने वाली जनता, वोट देकर “सो” जाने वाली जनता, “एसएमएस” करने में भिड़ी हुई जनता, सेंसेक्स को टकटकी लगाये देखने वाली जनता, एकाध लालची अफ़सर को न मार कर खुद मर जाने वाले किसान, “स्टिंग” और टीआरपी के खेल में लगा हुआ मीडिया, सब-सब तो मौजूद हैं।

अब बताईये भला कैसे भारत आतंकवाद से लड़ेगा? पहले हम हर बात में पैसा तो खा लें, फ़िर सोचेंगे देश-वेश के बारे में....
Pepsi, Shahrukh, John, Uncle

हाल ही में पेप्सी का नया विज्ञापन जारी हुआ है जिसमें जॉन अब्राहम और शाहरुख को एक बच्चे द्वारा “अंकल” कहे जाने पर चुहलबाजी करते दिखाया गया है, लेकिन इस विज्ञापन के मूल में सन्देश यही है कि दोनों ही व्यक्ति (जॉन थोड़े युवा, लेकिन अधेड़ावस्था की उम्र पर खड़े शाहरुख भी) उस बालक द्वारा “अंकल” कहे जाने पर आहत होते हैं या एक-दूसरे की हँसी उड़ाते हैं। सहज ही प्रश्न उठता है कि क्या “अंकल” सुना जाना इतना बुरा लगता है? खासकर यदि “सही” उम्र के व्यक्ति द्वारा “सही” व्यक्ति को बोला गया हो। मतलब जैसा कि उस विज्ञापन से परिलक्षित होता है, वह बालक शायद दसवीं-बारहवीं का लगता है (अर्थात सोलह-सत्रह वर्ष का), ऐसे में यदि वह शाहरुख (जो कि चालीस पार हो चुके हैं) को अंकल कहता है तो उन्हें बुरा क्यों लगना चाहिये? यह दृष्टांत एक विशाल “बाजार” (चिरयुवा दिखाई देने के लिये बने उत्पादों का) के खेल का अहम हिस्सा है, जिसमें सतत हमारे दिमाग में ठसाया जाता है, “सफ़ेद बाल बहुत बुरे हैं”, “थोड़ी सी भी तोंद निकलना खतरे का संकेत है”, “लड़कियों वाली क्रीम नहीं बल्कि जवान दिखने के लिये मर्दों वाली क्रीम वापरना चाहिये” और तो और “सिगरेट पीने से बहादुरी और जवानी आती है” आदि-आदि-आदि। जबकि देखा जाये तो आजकल के किशोरों और युवाओं में “अंकल” बोलना एक फ़ैशन बन चुका है। फ़ैशन का मतलब होता है कि “ऐसी कोई बात जिसकी आपको कोई समझ नहीं है लेकिन सिर्फ़ भेड़चाल के लिये या किसी हीरो-हीरोइन की नकल करनी है, उसे फ़ैशन कहते हैं” जो कि युवाओं की स्वाभाविक हरकत होती है, लेकिन आश्चर्य तो तब होता है कि “अनुभव” और “अध्ययन” के कारण कनपटी पर पके बालों को भी अधेड़ लोग छुपाने के लिये विभिन्न उपाय करते पाये जाते हैं।

यदि अपने से आधी उम्र का कोई बालक-बालिका अंकल कहे तो उसमें बुरा मानने वाली क्या बात है (औरतों को उनके स्त्रीत्व की एक विशेष भावना के चलने “आंटी” सुनना बुरा लग सकता है, बल्कि लगता भी है)। लेकिन तथाकथित “फ़ैशन” की नकल के चलते कई बार “कमर पर चर्बी का टायर चढ़ाये” नवयौवनायें भी अपने से सिर्फ़ दो-पाँच साल बड़े व्यक्ति को अंकल कहती फ़िरती हैं, और स्थिति तब अधिक हास्यास्पद हो जाती है, जबकि आमतौर पर दिखने-चलने-फ़िरने में वह व्यक्ति उससे अधिक जवान दिखाई देता है। एक चीज होती है “कॉमन सेंस” (सामान्य बोध), जो कि आजकल “अनकॉमन” हो गया है, (यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है - जब एक “स्लीवलेस” पहनी हुई “युवती” जिसकी बाँहें, दो लटकी हुई बड़ी लौकियों की तरह दिखाई दे रही थीं, वह मुझे अंकल संबोधित कर रही थी, और तब मजबूरन मुझे, उन्हें “हाँ, बोलो बेटी...” कहना पड़ा था)।

सवाल फ़िर यही खड़ा होता है कि क्यों लोग उम्र को सही सन्दर्भों में नहीं लेते? (खुद की भी और दूसरों की भी), क्यों वे आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते कि अब नौजवानी का दामन छूटने को है और अधेड़ावस्था की आहट आ गई है? क्यों आजकल “सफ़ेद बालों” को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है? अक्षय खन्ना, सलमान खान, संजय दत्त या शाहरुख को “अंकल” सुनना क्यों बुरा लगता है? क्यों अमिताभ ने आज तक सार्वजनिक तौर पर अपनी “विग” नहीं उतारी, जबकि रजनीकान्त आमतौर पर सभाओं में बिना मेक-अप के, सफ़ेद बालों, गंजे सिर और सादी सी लुंगी में दिखाई दे जाते हैं (और फ़िर भी वे अपनी नाती की उम्र के साथ हीरो के रूप में अमिताभ से अधिक सुपरहिट हो जाते हैं), ऐसी हिम्मत अन्य कथित “स्टार”(?) क्यों नहीं दिखा पाते? आपका क्या कहना है?

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India, Cricket, Invention

आज 20-20 ओवर के विश्व-कप का यह नया रूप लोगों को लुभा रहा है, यह आकर्षक है, तेज गति वाला है, जोशीला है, युवाओं के लिये है, और निश्चित ही आने वाला समय इसी तरह के क्रिकेट का है। क्रिकेट को यदि विश्वव्यापी बनाना है तो इस “फ़ॉर्मेट” को ही आगे बढ़ाना होगा और इसी में कुछ नये-नये प्रयोग करने होंगे। इस जोरदार हंगामे और नवीन आविष्कार ने पुनः यह प्रश्न खड़ा किया है कि भारत नाम के देश, जहाँ क्रिकेट को लगभग एक धर्म समझा जाता है, खिलाड़ियों को पल में देवता और पल में शैतान निरूपित किया जाता है, क्रिकेट का उन्माद है, पागलपन है, अथाह पैसा है, करोड़ों टीवी दर्शक हैं, गरज कि काफ़ी कुछ है, लेकिन इस “भारत” ने क्रिकेट के खेल में क्या नया योगदान दिया है? क्या भारतीय क्रिकेट के कर्ताधर्ताओं ने यहाँ के महान क्रिकेट खिलाड़ियों ने आज तक इस खेल में कोई नया आविष्कार करके बताया है? कोई नवीन विचार लाकर दुनिया को चौंकाया है? या हम लोग सिर्फ़ “पिछलग्गू” हैं?

अब तो यह बात सभी जान गये हैं कि भारत के खिलाड़ी “भारत” के लिये नहीं खेलते हैं, भारतीय(?) खिलाड़ी एक निजी सोसायटी के कर्मचारी हैं, जो कि तमिलनाडु सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत पंजीकृत सोसायटी है। बीसीसीआई, जो अपने-आपको “क्रिकेट का खुदा” समझती है, असल में एक “लिमिटेड कम्पनी” है, जो कि ब्रिटिश वर्जिन द्वीप मे पंजीकृत एक संस्था जिसे आईसीसी कहा जाता है से सम्बद्ध है, और जिसे भारत सरकार ने देश में क्रिकेट मैच आयोजित करने की अनुमति दे रखी है, मतलब साफ़ है कि विश्व कप में शर्मनाक रूप से हार रही या पाकिस्तान को “मरने-मारने वाले खेल”(?) में हराने वाले खिलाड़ी सिर्फ़ भारत के “कहे जा सकते हैं” (हैं या नहीं यह आप तय करें), हकीकत में इनका देश के क्रिकेट ढाँचे से कोई लेना-देना नहीं होता है। ये खिलाड़ी इस “लिमिटेड कम्पनी” से पैसा पाते हैं और उसके लिये खेलते हैं। जैसे ही “आईसीएल” की घोषणा हुई और जब “प्रतिस्पर्धा” का खतरा मंडराने लगा, बीसीसीआई की कुम्भकर्णी नींद खुली और ताबड़तोड़ कई जवाबी घोषणायें की गईं और एक और पैसा कमाने की जुगाड़ “आईपीएल” के गठन और आयोजन की तैयारी होने लगी है। हालांकि यह विषयांतर हो गया है, जबकि मेरा असल मुद्दा है कि क्रिकेट खेल को इन महानुभावों ने अब तक क्या “नया” दिया है?

जिस जमाने में टेस्ट मैच लगभग निर्जीव हो चले थे, इंग्लैंड में साठ-साठ ओवरों वाले एक-दिवसीय मैच का प्रयोग किया गया, प्रयोग सफ़ल रहा, आगे चलकर वह पचास-पचास ओवरों का हुआ, उसके शुरुआती तीन विश्व कप इंग्लैंड में आयोजित हुए। ऑस्ट्रेलियन मीडिया मुगल कैरी पैकर ने क्रिकेट में रंगीन कपड़े, सफ़ेद गेंदें, काली साईट स्क्रीन, विज्ञापन, टीवी कवरेज आदि का आविष्कार किया। यहाँ तक कि इसी खेल में हमारे पड़ोसी श्रीलंका ने जयसूर्या-कालूवितरणा की सात-आठ नम्बर पर खेलने वाले खिलाड़ियों से ओपनिंग करवा कर सबको चौंका दिया और एक नई परम्परा का चलन प्रारम्भ किया, जिसमें पहले पन्द्रह ओवरों में एक सौ बीस रन तक बनने लगे। उससे पहले न्यूजीलैंड के मार्टिन क्रोव ने एक स्पिनर दीपक पटेल से मैच का पहला ओवर फ़िंकवा कर एक विशेष बात पैदा करने की कोशिश की और कुछ हद तक सफ़ल भी रहे। ऑस्ट्रेलिया ने सबसे पहले दो विभिन्न टीमों (एक दिवसीय और टेस्ट की अलग-अलग) का प्रयोग किया, जिसे आज लगभग सभी टीमें अपना चुकी हैं। और पहले की बात करें, तो वेस्टइंडीज के कप्तान क्लाईव लॉयड ने अपनी अपमानजनक हार का बदला लेने के लिये स्पिन को पूरी तरह से दरकिनार करके पाँच तेज गेंदबाजों की फ़ौज खड़ी की, जिसने ऑस्ट्रेलिया को भी हिलाकर रख दिया था और लगभग एक दशक तक तेज गेंदबाजों ने विश्व क्रिकेट पर राज किया...और पीछे जायें तो इंग्लैंड के कप्तान डगलस जार्डिन ने डॉन ब्रेडमैन को रोकने के लिये लारवुड-ट्रूमैन से “बॉडीलाइन” गेंदबाजी करवाई थी, जिसकी आलोचना भी हुई, लेकिन था तो वह एक “नवोन्मेषी” विचार ही। कुछ “अलग”, “हटकर” करने की इस परम्परा में पाकिस्तान ने भी वकार-वसीम की मदद से “रिवर्स स्विंग” ईजाद किया, पहले सभी ने इसकी आलोचना की, लेकिन आज सभी सीम गेंदबाज एक तरफ़ से गेंद पर थूक लगा-लगाकर उसे असमान भारी बनाकर रिवर्स स्विंग का फ़ायदा उठाते हैं, इसे पाकिस्तान की देन कहा जा सकता है।

यदि खेल में वैज्ञानिकता, तकनीक और उपकरणों की बात की जाये तो यहाँ भी भारत का योगदान लगभग शून्य ही नजर आता है। “हॉक-आई” तकनीक जिसमें गेंद की सारी “मूवमेंट” का बारीकी से अध्ययन किया जा सकता है का आविष्कार “सीमेंस” के वैज्ञानिकों ने इंग्लैंड में किया, “स्पिन विजन”, “स्निकोमीटर”, “सुपर स्लो-मोशन” सारी तकनीकें पश्चिमी देशों से आईं, वूल्मर की लैपटॉप तकनीक हो या जोंटी रोड्स की अद्भुत फ़ील्डिंग तकनीक, हर मामले में भारतीयों को उनकी नकल करने पर ही निर्भर रहना पड़ता है। ऐसा क्यों? क्या भारत में पैसा नहीं है, या वैज्ञानिक नहीं हैं या सॉफ़्टवेयर इंजीनियर नहीं हैं? या बोर्ड के पास धन की कमी है? सब कुछ है, बस कमी है इच्छाशक्ति की और कुछ नया कर दिखाने में अलाली की।

ऑस्ट्रेलिया में घरेलू क्रिकेट की योजना बनाने, उसे प्रायोजक दिलवाने के लिये बाकायदा खिलाड़ियों की एक समिति है, जबकि यहाँ रणजी टीमों को ही प्रायोजक नहीं मिल पाते हैं। एक बार तो मुम्बई टीम को नाश्ते में अंडे सिर्फ़ इसलिये मिल सके थे, कि तेंडुलकर उस टीम में खेल रहे थे, वरना पहले तो सिर्फ़ चाय-बिस्किट पर ही रणजी मैच निपटा दिये जाते थे। आईसीएल के आने के बाद स्थिति बदली है और खिलाड़ियों का भत्ता बढ़ाया गया है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर नतीजा वही ढाक के तीन पात। भारत में स्टेडियम में जाकर मैच देखना एक त्रासदी से कम नहीं होता। जगह-जगह सुरक्षा जाँच के नाम पर बदतमीजी, स्टेडियम में पीने के पानी, टॉयलेट की असुविधायें, धूप की परेशानी, अस्सी प्रतिशत स्टेडियमों में बड़ी स्क्रीन ना होना आदि कई समस्यायें हैं। जबकि बोर्ड के पास इतना धन है कि वह सारे स्टेडियमों में मुलायम कृत्रिम घास बिछवा सकता है, लेकिन बोर्ड सुविधायें देता है पेवेलियन में बैठे नेताओं, अफ़सरों, उनके मुफ़्तखोर (पास-जुगाड़ू) चमचों और लगुए-भगुओं को जिन्हें अधिकतर समय खेल से कोई लेना-देना नहीं होता, बस “झाँकी” जमाने से वास्ता होता है। जबकि आम जनता जो वाकई क्रिकेटप्रेमी है, वह कष्ट भोगते हुए मैच देखती है। जिस खेल और जनता के बल पर बोर्ड आज अरबों में खेल रहा है, उस बोर्ड के अदना से अधिकारी भी पाँच सितारा होटल में ही ठहरते हैं, दो कौड़ी के राजनेता, जो क्षेत्रीय क्रिकेट बोर्डों में कब्जा जमाये बैठे रहते हैं, भी टीम मैनेजर बनकर घूमने-फ़िरने की फ़िराक में रहते हैं, लेकिन खेल को कुछ नया देने के नाम पर शून्य।

हाँ... एक बात है, क्रिकेट को भारत और पाकिस्तान (जो कम से कम इस मामले में उसका छोटा भाई शोभा देता है) ने दिया है, अकूत धन-सम्पदा, माफ़िया, सट्टेबाजी, मैच फ़िक्सिंग, राजनेता-अधिकारी का अनैतिक गठजोड़, चरण चूमते क्षेत्रीय बोर्ड के “सी” ग्रेड के खिलाड़ी, और कुल नतीजे के रूप में बॉब वूल्मर की हत्या। यह योगदान है भारत-पाक क्रिकेट बोर्ड का। इस सबमें दोषी वह सट्टेबाज और मूर्ख जनता भी है, जो “हीरो” को पूजती है, फ़िर उसी हीरो को टीवी पर आने के लिये कभी घटिया सा यज्ञ करवाती है, कभी उसी को जुतियाने के लिये कैमरा बुलवाकर तस्वीर पर चप्पलों की माला पहनाती है।

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Gujrat, Narmada, Pollution

मध्यप्रदेश के तीन विश्वविद्यालयों की एक संयुक्त शोध टीम ने अपने पिछले दो वर्षों के शोध में पाया है कि मध्यप्रदेश में बहने वाली नर्मदा नदी देश की सबसे साफ़ (या कहें कि सबसे कम प्रदूषित) नदी है। ज्यादा विस्तार में न जाते हुए मोटे तौर पर बताना चाहूँगा कि, जल में प्रदूषण नापने की सबसे प्रमुख इकाई है बीओडी (BOD – Biological Oxygen Demand), जिसके कम या ज्यादा होने के स्तर द्वारा यह पता लगता है कि पानी किस हाल तक पहुँच चुका है, जितना कम बीओडी होगा जल उतना ही कम प्रदूषित होगा, और ठीक इसके विपरीत जितना अधिक बीओडी होगा, बैक्टीरिया, मछलियों, केकडों, कछुओं एवं अन्य जलजीवों का जीवन समाप्त होता जायेगा (जो कि नदी या किसी भी जलस्रोत को साफ़ रखने में महत्वपूर्ण होते हैं)और नदी प्रदूषित होगी।

इन विश्वविद्यालयों द्वारा जारी ताजा आँकडों के अनुसार नर्मदा जब तक मध्यप्रदेश में बहती है उसका बीओडी स्तर 2 से 5 मिलीग्राम प्रतिलीटर रहता है (जबकि बीओडी का मानक सुरक्षित स्तर केन्द्रीय प्रदूषण बोर्ड द्वारा 3 mg/l तय किया गया है)। अब नजर डालें देश की बाकी प्रमुख नदियों के बीओडी स्तर पर – गंगा (कानपुर में) 16 mg/l, यमुना (दिल्ली में) 35 mg/l, ताप्ती (अजनाल महाराष्ट्र में) 36 mg/l, खान (इन्दौर में) 60 mg/l, सतलज (लुधियाना में) 64 mg/l, अंत में सबसे महत्वपूर्ण और चिंताजनक आँकड़े, साबरमती (अहमदाबाद में) 380 mg/l, अमलवाड़ी (अंकलेश्वर में) 946 mg/l.... अब सोचिये जरा... कहाँ नर्मदा का बीओडी 5 mg/l और कहाँ साबरमती का 380 mg/l. क्या साबरमती में कोई जलचर जीवित रह सकता है, और अमलवाड़ी नदी की बात करना तो बेकार ही है, क्योंकि जब हम उज्जैनवासी इन्दौर से आने वाली “खान” नदी (?) को ही नाला कहते हैं, तो फ़िर गुजरात की इन नदियों की क्या हालत होगी।

शोध करने वाले वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि नर्मदा के तुलनात्मक रूप से साफ़ रह पाने के दो मुख्य कारण हैं, पहला मध्यप्रदेश में अभी भी नर्मदा किनारे वनक्षेत्र काफ़ी मात्रा में है, और दूसरा कि नर्मदा के किनारे बड़ी संख्या में उद्योग नहीं लगे हैं, जिनका अपशिष्ट नदी में मिलता है। इसी प्रकार मध्यप्रदेश में नर्मदा के किनारे जबलपुर को छोड़कर कोई बड़ा शहर नहीं है, जो गंदगी, कचरे और मल-मूत्र से नदी को गंदा करे, लेकिन जैसे ही यह नदी गुजरात में प्रवेश करती है, अंधाधुंध स्थापित किये गये उद्योगों द्वारा छोड़े गये केमिकल, सीवेज और विभिन्न “ट्रीटमेंट युक्त” पानी नदी में छोड़ने के कारण भरूच पहुँचते-पहुँचते यह नदी भयानक रूप से प्रदूषित हो जाती है। महानगर बनने की होड़ में लगे अहमदाबाद और औद्योगिक नगर अंकलेश्वर के आँकड़े भी बेहद चिंताजनक हैं। जिस तीव्र गति से गुजरात का औद्योगिकीकरण किया गया है, उस गति से प्रदूषण नियंत्रण के उपाय नहीं किये गये हैं। राज्यों और केन्द्र के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मात्रा खानापूर्ति और भ्रष्टाचार के अड्डे बन गये हैं, और उद्योगपति कभी भी अपनी मर्जी से “ट्रीटमेंट प्लांट” नहीं लगाता है। लगाते भी हैं तो कागजी, और मौका मिलते ही फ़ैक्ट्री का गंदा पानी नदी में छोड़ने से बाज नहीं आते। सवाल यह है कि सरदार सरोवर और नर्मदा पर गाहे-बगाहे बाँहें चढ़ाने वाले गुजरात के भूजल प्रदूषण का क्या होगा? कई जल आधारित प्रजातियाँ समाप्ति की ओर अग्रसर हैं, कोई चिंता कर रहा है? गुजरात की नदियों का भविष्य क्या है?

मध्यप्रदेश में भी बेतवा नदी के किनारे लगे हुए “अल्कोहल प्लांट” और शराब के कारखाने आये दिन लाल-लाल पानी नदी में छोड़ते रहते हैं, और अखबारों में खबर छपती रहती है कि “प्रदूषण फ़ैल रहा है”, “मछलियाँ मर रही हैं”, “ग्रामीणों के यहाँ कुँए का पानी लाल हुआ” आदि-आदि, लेकिन “चांदी के जूते” के चलते होता-जाता कुछ नहीं। यदि छोटे स्तर पर देखें तो, इन्दौर से उज्जैन आने वाली खान नदी इन्दौर शहर के सीवेज और बीच के छोटे-बड़े कारखानों की गन्दगी को समेटे हुए उज्जैन में क्षिप्रा में आकर “त्रिवेणी” नामक धार्मिक (?) स्थान पर मिलती है, जहाँ सोमवती/शनीचरी अमावस्या, विभिन्न त्योहारों और मेलों के दौरान ग्रामीण/शहरी जनता “पुण्य” कमाने के लिये स्नान करती है। इसी को यदि बड़े स्तर पर देखा जाये तो यमुना को सबसे ज्यादा गन्दा करने वाले दिल्ली और आगरा से चलकर यह इलाहाबाद में “त्रिवेणी” पर गंगा को पवित्र (?) करती है। अब मुझे यह नहीं समझ रहा कि मध्यप्रदेश में उद्योगों की कमी के कारण स्वच्छ नर्मदा पर खुश होऊँ, या बेरोजगारी और विकास की दौड़ में पीछे रह जाने पर मध्यप्रदेश की दुर्दशा पर आँसू बहाऊँ?

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Ridiculous Foolish Statements

स्वतंत्रता के साठ वर्षों का जश्न हमने अभी-अभी ही मनाया। देश के पिछले साठ सालों पर सरसरी नजर डालें तो सबसे ज्यादा खटकने वाली बात हम पाते हैं नेताओं और प्रशासन द्वारा दिये गये मूर्खतापूर्ण, निरर्थक, ऊटपटाँग और उलजलूल वक्तव्य। नेता क्या बोलते हैं, क्यों बोलते हैं, प्रेस विज्ञप्ति क्यों जारी की जाती है, इस बात का न तो उन्हें कोई मतलब होता है, न ही जनता को इससे कुछ मिलता है। हम सभी रोज अखबार पढते हैं, उसमें प्रथम पृष्ठ पर स्थित कुछ “हेडलाइनों” पर नजर पड़ती ही हैं, लेकिन इतने सालों के बाद अब समाचार पर नजर पड़ते ही समझ में आ जाता है कि भीतर क्या लिखा होगा, कुछ वाक्यों की तो आदत सी पड़ गई है । आइये नजर डालें ऐसे ही कुछ बेवकूफ़ी भरे वाक्यों पर – “विकास का फ़ल आम आदमी को मिलना चाहिये”, “गरीबों और अमीरों के बीच की खाई कम होनी चाहिये”, “हमें गरीबी हटाना है”, “विकास की प्रक्रिया में सभी को समाहित करना आवश्यक है”, “आम आदमी का भला होना ही चाहिये”.... इस प्रकार के कुछ अनर्गल से वाक्य देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोग गाहे-बगाहे अपने मुखारविन्द से उवाचते रहते हैं, सतत और अनथक रूप से। बस भाषण देना है इसलिये देना है और इन वाक्यों का समावेश किये बगैर भाषण पूरा नहीं होगा, फ़िर उस “खास” (?) व्यक्ति ने बोला है तो अखबारों को छापना ही है, छपा है तो हम जैसों को पढ़ना ही है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इन नेताओं को ये रटे-रटाये और निरर्थक वाक्य बोलने में शर्म नहीं आती? स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात लोकतंत्र स्वीकार करने के बाद आम जनता के लिये न्यायपालिका, प्रेस, अफ़सरशाही और विधायिका का गठन हो गया है, तो अब आम आदमी का भला करने से इन्हें कौन रोक रहा है, जनता ने चुनाव में वोट देकर सरकार बनवा दी तो अब विकास की दौड़ में सभी को शामिल करना उनका कर्तव्य है, इसके लिये लाऊडस्पीकर पर जोर-जोर से चिल्लाने की क्या जरूरत है? अब तो पन्द्रह अगस्त का प्रधानमंत्री का भाषण हो या छब्बीस जनवरी का राष्ट्रपति का भाषण, अव्वल तो कोई सुनता ही नहीं, सुनता भी है तो हँसी ही आती है, उसमें भी ऐसे ही वाक्यों की भरमार होती है, “ऐसी ऊँची-ऊँची रख-रख के देते हैं कि कनपटी सुन्न हो जाती है”, अरे भाई करके दिखा ना, कि बस यूँ ही बोलता रहेगा...लेकिन नहीं...साठ साल हो गये बकबक जारी है। साठ साल बाद भी प्रधानमंत्री यह कहें कि हमें गरीबी मिटाना है और आम आदमी का भला होना चाहिये तो बात कुछ समझ नहीं आती। ये तो ऐसे ही हुआ कि अंबानी अपने कर्मचारियों से कहे कि कंपनी की प्रगति होना चाहिये, सबको वेतनवृद्धि मिलनी चाहिये, लेकिन खुद मुकेश अंबानी कुछ ना करे। ये सब होना चाहिये, इसीलिये तो वह मालिक है, तमाम मैनेजर हैं, शेयर होल्डर हैं, मजदूर तो सिर्फ़ वही करेगा जो उसे कहा जायेगा। लेकिन “आम आदमी”... शब्द का उपयोग करके नेता सोचते हैं कि वे अपनी “इमेज” बना रहे हैं, जबकि लोग मन-ही-मन गालियाँ निकाल रहे होते हैं। यही हाल प्रत्येक आतंकवादी हमले के बाद आने वाली वक्तव्यों की बाढ़ का है – “सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है” (हँसी), “रेड अलर्ट जारी कर दिया गया है” (तेज हँसी), “हम आतंकवाद के सामने नहीं झुकेंगे”, “दोषी को सजा दिला कर रहेंगे” (ठहाके मार कर दोहरा होने लायक), “आम जनता से शांति बनाये रखने की अपील की है”, “मरने वाले को इतना और घायल को उतना मुआवजा दिया जायेगा”... अगड़म-बगड़म-तगड़म... क्या बकवास है यह सब? न उन्हें शर्म आती है, न हमें, न उन्हें गुस्सा आता है, न हमें। जेड श्रेणी की सुरक्षा में बैठा हुआ नेता यह सब बोलता रहता है, अखबारों में छपता है, हम पढ़ते हैं, फ़िर उसी अखबार में बच्चे को हगवा कर उसे नाली में फ़ेंक देते हैं, अगले दिन के अखबार की “हेडिंग” पढ़ने के इंतजार में.....

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मंगलवार, 02 अक्टूबर 2007 13:30

भाषा, उच्चारण और वर्णमाला (भाग-१)

Phonetics, Language, Alphabets in Hindi

अक्सर हमारे मन में सवाल उठते हैं कि आखिर “भाषा” का उद्‌भव कैसे हुआ? वर्णमाला कैसे बनी?, उच्चार क्रिया क्या है? क, ख, ग, घ के बाद ङ ही क्यों आता है, ण क्यों नहीं आता?

किसी भी भाषा का विकास एक सतत प्रक्रिया है, मानव जीवन के हजारों वर्षों के इतिहास में कई बोलियाँ आईं-गईं, कई लिपियाँ बनीं-मिटीं, कई भाषाओं का उत्थान-पतन हुआ, कुछ लुप्त हो गईं या होने की कगार पर हैं। इस सारी प्रक्रिया में हमारे पूर्वजों, उनके पूर्वजों, साधु-महात्माओं, विद्वानों आदि सभी नें भाषा और उच्चारण क्रिया में कुछ ना कुछ शोध करके उसे आगे, और आगे बढाने का महती कार्य किया है।

उच्चार क्रिया और वर्णमाला के अध्ययन हेतु विभिन्न साईटों के भ्रमण के दौरान, और मराठी ब्लॉग जगत तथा विभिन्न फ़ोरमों से जुड़े होने के कारण विचार आया कि इस रोचक सामग्री को एकत्रित किया जाये। इस लेखमाला में, मुम्बई विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान में अध्ययनरत एक छात्रा सुश्री राधिका द्वारा एक मराठी साईट "उपक्रम" पर लिखे गये विभिन्न लेख यह, यह और यह, तथा यहाँ हैं, इसके साथ ही “राजस्थान पत्रिका” के विशेष अंक के कुछ हिस्सों को भी इसमें यूनिकोडित करके समाहित करने का प्रयास किया गया है। कुछ और “फ़ोनेटिक उच्चार” सम्बन्धी अंग्रेजी साईटों के कुछ हिस्से का अनुवाद भी है। हिन्दी के पाठकों को भी इसका पूरा रसास्वादन मिलना चाहिये, इसलिये इन विस्तृत लेखों और विभिन्न जगह पर बिखरी सामग्री का अनुवाद करने की कोशिश कर रहा हूँ, विषय भी अत्यंत रोचक है। विद्वानों द्वारा प्रस्तुत जानकारी भी गहराई लिये हुए और विषद्‌ अध्ययन से भरपूर है। इस लेखमाला का संकलन, संपादन और अनुवाद करना एक मुश्किल और मेहनत भरा काम रहा। प्रस्तुत है इस लेखमाला का पहला भाग, जिसमें वर्णमाला, भाषा, उच्चारण आदि के बारे में प्रारम्भिक लेकिन वैज्ञानिक जानकारी दी गई है।

बहुत वर्षों पहले किसी ने मुझसे पूछा था कि “भाषा सीखते समय संस्कृत का क्या फ़ायदा होता है?” मैंने भी एक सर्वसाधारण सा जवाब दिया कि “संस्कृत में सभी प्रकार के उच्चार होने के कारण व्यक्ति की जीभ वह चाहे जैसे घुमा-फ़िरा सकता है, इसलिये अन्य भाषाओं के कैसे भी उच्चार करना उसके लिये आसान होता है”, मजे की बात यह कि यह जवाब सामने वाले व्यक्ति को उचित भी लगा और वह संतुष्ट हो गया, लेकिन जब असल में भाषाशास्त्र का अध्ययन प्रारम्भ किया तब पता चला कि मुझे कितनी बड़ी गलतफ़हमी थी। हम सभी को यह गलतफ़हमी आमतौर पर होती है कि “हम अक्षरों को ही उच्चार समझते हैं”। जैसे कि हमें अंग्रेजी सिखाते समय बताया जाता है कि इसमें पाँच स्वर हैं – a, e, i, o, u, लेकिन ये तो सिर्फ़ अक्षर हैं, उच्चार पद्धति से देखा जाये तो अंग्रेजी में ५-१० नहीं बल्कि २० स्वर हैं। इसका मतलब यह कि हम जो अक्षर लिखते हैं और उनका उच्चारण, इसमें काफ़ी अन्तर होता है।

इस प्रकार यह गलतफ़हमी हमें दूर कर लेनी चाहिये कि संस्कृत भाषा में सभी उच्चार हैं, किसी भी भाषा में दुनिया के सभी उच्चार नहीं होते हैं, न ही हो सकते हैं। उदाहरण के तौर पर अंग्रेजी में “भ” नहीं है और संस्कृत में “ऍ” नहीं है, और ऐसे भी कई उच्चार हैं जो इन दोनों भाषाओं में नहीं हैं। संक्षेप में कहा जाये तो अन्य भाषाओं की तरह ही संस्कृत भी मानव निर्मित ही है और उसकी भी कुछ सीमायें हैं। हर शिक्षित व्यक्ति के लिये यह ज्ञान भी शिक्षा जैसा ही महत्वपूर्ण है, यानी मातृभाषा का ज्ञान, हिन्दी वर्णमाला का ज्ञान। इस लेखमाला में वर्णमाला के स्वर-व्यंजन, उनके निर्माण के नियम, शब्दों की रचना के सूत्र, ध्वनि विज्ञान की भारतीय अवधारणा आदि से लेकर शब्द ब्रह्म तक की विवेचना होगी। यही सब तो है जिन पर हमारा जीवनक्रम आधारित है। इसी लेखमाला से हमारी भाषा की वैज्ञानिकता भी सिद्ध होगी। पाठकों के लिये हिन्दी एक रुचिकर भाषा बन जायेगी। मुझे खुशी होगी यदि इन लेखों से एक प्रतिशत पाठक भी भाषा शक्ति का अनुभव कर सकें, अपने उच्चारण और लेखन में शुद्धता ला सकें, तब भारतीय संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठा भी हो सकेगी।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि भाषा में भी अनेक प्रकार की मजेदार बातें हैं, और उन्हें पहचान कर प्राचीन काल के अध्ययनकर्ताओं ने उसका एक स्वतंत्र तर्कसंगत शास्त्र या विज्ञान बनाया, जिसे उच्चारशास्त्र (Phonetic Science) या भाषा विज्ञान कहते हैं। संस्कृत भाषा को समझने की पहली पायदान के रूप में हैं इस भाषा के विभिन्न उच्चारण और वे जिसके द्वारा एक माला में गुँथे हुए हैं, वह होती है वर्णमाला। अभी स्थिति यह हो रही है कि न तो हम हिन्दी पूरी तरह से सीख पा रहे हैं, ना ही अंग्रेजी। व्यक्ति यह मानने को तैयार नहीं है कि भाषा हमारे व्यक्तित्व का दर्पण होती है। क्या गलत भाषा अथवा शब्दों का प्रयोग करना हमें शोभा देता है? पर्सनालिटी डेवलपमेंट और तथाकथित मैनेजमेंट गुरु सबसे पहले बताते हैं कि सामने वाले पर प्रभाव का सबसे पहला सूत्र है भाषा, चाहे वह हिन्दी हो या अंग्रेजी। जब व्यक्ति भाषा को सही रूप में प्रयोग करता है, सही शब्दों का चुनाव करता है, तब सुनने-पढ़ने वाले पर विशेष प्रभाव पड़ता है। यह इस बात का सूचक भी है कि आप सामने वाले का कितना सम्मान करते हैं। गलत भाषा का अर्थ या तो लापरवाही होता है, या जानबूझकर सामने वाले का अपमान करना होता है, और दोनों ही बातें उचित नहीं हैं।

इसका मतलब है हमें शब्दों के साथ-साथ अर्थों की भी जानकारी होना चाहिये। अर्थ के कारण ही ज्ञान पकड़ में आता है। इसी प्रकार शब्द को समझने के लिये अक्षर या वर्ण को समझने की जरूरत है। आज अनेक शब्दों का गलत प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है, प्रयोग भी इतना कि कई जगह पर गलती भी रूढ़ि बन चुकी है। जैसे एक शब्द है अस्मिता, इसका अर्थ है हठ करना, हम कहने लगे हैं कि यह देश की अस्मिता का प्रश्न है। इस रूप में अस्मिता का अर्थ इज्जत हो गया है, जो कि गलत ही है, लेकिन अब यही प्रचलन में है। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है, इसके माध्यम से हम अपने मन की बात करते हैं या लिखकर भेजते हैं। भाषा सही होगी, शब्दों का चुनाव सही होगा तभी हमारी बात दूसरे व्यक्ति को सही-सही समझ में आयेगी। खान-पान और पहनावे के साथ-साथ हम भाषा का स्वरूप भी बदलते रहते हैं, यह और बात है कि आगे चलकर हमें इसे पुनः सही और शुद्ध करना ही पड़ता है, फ़िर शुरु से ही सही भाषा का उपयोग क्यों ना किया जाये? आज भाषा, रुढ़ि में बँधकर वास्तविक अर्थों से दूर होती जा रही है। अर्थ का अनर्थ हो रहा है। शब्द अपने मूल स्वरूप से अलग दिखाई देने लगा है, क्योंकि उसपर कई आवरण चढ़ गये हैं। (भाग-२ में जारी......)

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Phonetics, Language, Alphabets in Hindi

(भाग-१ से जारी...)
हमारी सृष्टि अक्षर से उत्पन्न होती है, इनका क्षरण नहीं होता इसलिये ये अक्षर कहलाते हैं। हमारी भाषा भी अक्षरों पर आधारित होती है, इन अक्षरों का भी क्षरण नहीं होता। अक्षर में स्वर और व्यंजन दोनों आते हैं, इन्हें वर्ण भी कहा जाता है। ये सारे वर्ण ध्वनि पर आधारित हैं, ध्वनि ही नाद है, और यह नाद सम्पूर्ण आकाश में व्याप्त रहता है - सूक्ष्म रूप में। इसीलिये आज वैज्ञानिक, कृष्ण द्वारा कही गई गीता को अंतरिक्ष से प्राप्त करने के प्रयास में जुटे हैं।

वर्णमाला के भी कुछ निश्चित सिद्धान्त हैं। वर्णमाला अ से ह तक होती है। पाँच-पाँच वर्णों की एक-एक पंक्ति की भी निश्चित भूमिका है, निश्चित स्थान है, निर्धारित पाँचों अक्षरों के निर्माण का भी एक क्रम है, वर्णमाला क्रम ऐसे ही नहीं बना दिया गया है, और इसीलिये प्रत्येक वर्ण का अपना-अपना अर्थ और स्थान होता है।

ऋग्वेद के अनुसार “स्वर्यन्त शब्द्यन्त अति स्वराः” अर्थात अन्य वर्ण की सहायता के बिना उच्चारित होने वाले वर्ण ‘स्वर’ कहलाते हैं। जबकि अर्थों को प्रकट करने वाले, व्यंजना करने वाले और स्वरों को मिलाकर उच्चारित होने वाले वर्णों को व्यंजन कहा जाता है। इस विस्तृत लेख की पृष्ठभूमि बताना अत्यंत आवश्यक था, जिससे कि पाठकों को इस विषय के बारे में थोड़ा विचार करने और एक भिन्न दृष्टिकोण रखने में मदद मिले, साथ ही भाषा विज्ञान से सम्बन्ध रखने वाले अन्य हिन्दी, संस्कृत के लेखक इसमें मदद कर सकें, क्योंकि मैं कोई भाषा विज्ञानी नहीं हूँ, सिर्फ़ अध्ययन की रुचि के कारण तथा हिन्दी पाठक समुदाय को इसका लाभ मिले इसलिये यह लेखमाला प्रस्तुत कर रहा हूँ।

मूलतः देखा जाये तो स्वर १२ ही हैं अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ, ॠ। इसमें के आठ अक्षरों (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ) को समानाक्षर और बाकी चार (ए, ऐ, ओ, औ) को सन्ध्याक्षर कहा जाता है। समानाक्षर मूल प्रवृत्ति के होते हैं, जबकि सन्ध्याक्षर स्वरों के योग से बने हैं, जैसे अ+इ=ए, अ+उ=ओ। हमारी वर्णमाला आमतौर पर हमें पूरी तरह याद होती ही है, कुछ लोगों को “दन्त्य”, “तालव्य” आदि शब्दों के अर्थ भी पता होंगे, लेकिन इस वर्णमाला की रचना ऐसी ही क्यों की गई? या इसके पीछे कोई तर्कसंगत कारण है? त्‌ थ्‌ द्‌ ध्‌ न्‌ ये सभी दन्त्य उच्चार हैं, यह तो पता है, लेकिन इसे इसी क्रम से क्यों लिया गया? थ्‌, त्‌, ध्‌, द्‌, न्‌ अथवा थ्‌, ध्‌, न्‌, त्‌, द्‌ इस क्रम से क्यों नहीं लिया गया? ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है। ऋ और लृ को स्वर क्यों माना जाता है? श्‌ और ष्‌ में क्या फ़र्क है? इन सभी प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास इस लेखमाला में किया गया है।

इस लेखमाला को पढते समय जब कभी मैं थ्‌, द्‌ अथवा “आ” आदि अक्षर लिखूँ तो पाठक उसे मात्र एक अक्षर के तौर पर ना देखें। हमारे मुँह से बाहर निकलने वाले उच्चार कैसे हो रहे हैं, यह दृष्टिकोण होना चाहिये। व्यंजन लिखते समय अक्षरों को हलन्त के साथ ही लिखा गया है, जिससे कि व्यंजन की शुद्धता बरकरार रहे, उसमें स्वर की मिलावट नहीं हो, जैसे कि ‘ण’ उच्चार में “ण्‌” और “अ” का मिश्रण है, एक व्यंजन है, दूसरा स्वर है। यह मिलावट रोकने और भ्रम से बचने के लिये व्यंजनों को हलन्त के साथ लिखा गया है। इसे और स्पष्ट तौर पर समझने के लिये हम साइंस के विद्यार्थियों की तरह परमाणु-अणु का सिद्धांत वापरेंगे – “ण्‌” एक परमाणु और “अ” दूसरा परमाणु है, जिससे मिलकर “ण” अणु बनता है, जैसे कि ‘क्ष’ नामक अणु ‘क्‌’, ‘ष्‌’ और ‘अ’ इन परमाणुओं से बना है, लेकिन वर्णमाला में अन्य स्वर-व्यंजनों के साथ-साथ ‘क्ष’ और ‘ज्ञ’ को भी रखा जाता है।

लेखमाला के अगले भाग (भाग-३) में हम देखेंगे कि उच्चार करने वाले हमारे शरीर के विभिन्न अवयवों (Vocal tract) के बारे में, तब तक यहाँ मैं वर्णमाला प्रस्तुत करता हूँ, ताकि यदि किसी को मालूम ना हो तो एक बार इन अक्षरों पर नज़रे-इनायत करे, मनन करे, कंठस्थ करे, जिससे कि वह इस लेखमाला का और अधिक आनन्द उठा सके –

स्वर - अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ, ॠ, लृ
व्यंजन वर्ग –
क वर्ग - क्‌, ख्‌, ग्‌, घ्‌, ङ्‌
च वर्ग - च्‌, छ्‌, ज्‌, झ्‌, ञ्‌
ट वर्ग - ट्‌, ठ्‌, ड्‌, ढ्‌, ण्‌
त वर्ग - त्‌, थ्‌, द्‌, ध्‌, न्‌
प वर्ग - प्‌, फ़्‌, ब्‌, भ्‌, म्‌

य्‌, र्‌, ल्‌, व्‌
स्‌, श्‌, ष्‌, ह्‌, ळ्‌
(विद्वान पाठक जरूर सोच रहे होंगे कि इसमें ‘अं’ और ‘अः’ का तथा ‘क्ष’ ‘त्र’, ‘ज्ञ’ का समावेश क्यों नहीं है? इसका जवाब आगे की सम्पूर्ण लेखमाला पढकर मिल जायेगा)।

अगले भाग में हम देखेंगे स्वर और व्यंजन का उच्चार, उच्चारित होने वाले शब्दों के लिये शरीर के ध्वनि तंत्र का अध्ययन, कण्ठ्य, तालव्य, दन्त्य उच्चार आदि के बारे में जानकारी....

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शुक्रवार, 05 अक्टूबर 2007 21:02

भाषा, उच्चारण और वर्णमाला (भाग-३)

Phonetics, Language, Alphabets in Hindi

(भाग-२ से जारी...)

कभी-कभी आश्चर्य होता है, अपने मुँह से हम इतने सारे शब्द, इतनी ध्वनियाँ कैसे निकालते हैं, यही तो हमारे वाणी तंत्र की विशेषता है। मानव का वाणी तंत्र नाभि से होंठ तक होता है, यह ध्वनि का एक अद्‌भुत उपकरण है। मनुष्य का वाणी तंत्र सर्वाधिक विकसित होता है। अन्य प्राणियों, पशु-पक्षियों में यह तंत्र इतना विकसित नहीं होता, इसीलिये उनकी ध्वनियाँ बहुत सीमित होती हैं। चिड़िया सिर्फ़ चीं-चीं करती सुनाई देती है, शेर-गाय-बकरी आदि की ध्वनियाँ भी सीमित हैं। लेकिन मनुष्य में हर वर्ण का एक अलग स्थान से उच्चारण होता है। इस तंत्र के ज्यादा से ज्यादा इतने हिस्से तय किये गये हैं कि प्रत्येक वर्ण के लिये एक-एक स्थान निर्धारित है।

हम कोई उच्चारण करते हैं, तो असल में क्या होता है? जब मन में बोलने की इच्छा होती है, तब मन शरीर की अग्नि में नाभि स्थान पर आघात करता है। अग्नि की प्रवृत्ति ऊपर उठना है, वह हृदय स्थान पर वायु को प्रेरित करती है। हमारे नाभि से फ़ेफ़ड़ों के द्वारा हवा ऊपर आती है, वह हवा फ़िर गले, तालू, जीभ और दाँतों के रास्ते मुँह या नाक से बाहर आकर एक स्वर उत्पन्न करती है, जिसे हम उच्चार कहते हैं। यही वायु कण्ठ स्थान में अक्षर के रूप में प्रकट होता है। इस तरह नाभि से उठने वाली ध्वनि प्राण के सहारे ऊपर उठती है और वाणी तंत्र के जिस हिस्से में टकराती है उसी पर वर्ण की पहचान टिकी हुई है। इस प्रक्रिया में इन सभी अंगों और अवयवों का विभिन्न तरह और तरीकों से खुलना-बन्द होना होता है, और एक उच्चारण तैयार होता है, यह ठीक कुम्हार द्वारा कच्ची मिट्टी के घड़े को आकार देने के समान होता है, कहाँ पर, कितना और कैसा दबाना है जिससे कि पतले गले वाली सुराही बने या मोटे पेट वाला घड़ा बने यह कुम्हार के हाथों का दबाव तय करता है, उसी प्रकार उच्चार क्रिया में दाँत, होंठ या जीभ के अलग-अलग सम्बन्ध होने पर विभिन्न उच्चार उत्पन्न होते हैं। इसे समझने के लिये चित्र देखें –



नाभि से उठने वाली ध्वनि विसर्ग के रूप में उठती है, वह कण्ठ मूल में आकर जब “अकार” से मिलती है तब वर्ण के रूप में प्रकट होती है। विसर्ग ही ध्वनि को कण्ठ तक लाता है और लौट जाता है। विसर्ग ही “ह” के रूप में प्रकट होता है। ‘अ’ और ‘ह’ एक दूसरे के विपरीत अर्थ दर्शाते हैं, इसीलिये ये दोनो विरोधाभासी अक्षर हैं। कृष्ण ने भी गीता में कहा है “अक्षराणाम्‌अकारोस्मि” अर्थात अक्षरों में मैं अकार हूँ। इसका अर्थ यही है कि ‘अ’कार के बिना शब्द सृष्टि आगे नहीं बढ़ सकती। हर अक्षर का निर्माण में अकार के मिलने से ही होता है, इसीलिये व्यंजनों को योनि रूप और स्वर को बीज रूप कहा गया है। दोनो के मिलने से ही शब्द की सृष्टि होती है।

अक्षरों में ‘अकार’ ही एक ऐसा वर्ण है, जिसका उच्चारण कंठमूल से होता है। ‘अ’ के उच्चारण में कंठ, जीभ, होंठ अथवा मुँह की कोई भूमिका नहीं होती, यानी मुँह के किसी हिस्से को न तो सिकोड़ना होता है, न फ़ैलाना होता है। ‘अ’ के उच्चारण के समय मुँह एक जैसा गोलाकार खुला रहता है। ‘अ’ के अलावा शेष सभी वर्णों के उच्चारण में कंठ, जीभ, होंठ और मुँह का संकुचन या विस्तार होता ही है। भाषा वैज्ञानिक महेन्द्रपाल सिंह ने वर्णों की उच्चारण प्रक्रिया की वैज्ञानिक विवेचना बहुत ही रोचक रूप में की है। इसे वर्णोच्चारण विज्ञान कहते हैं। उन्होंने वाणी तंत्र की पूरी प्रक्रिया बताई है। नाभि से लेकर होंठ तक वाणी तंत्र का विस्तार है। कंठमूल से थोड़ा नीचे ‘इ’ का स्थान है, इ के स्थान से थोड़ा नीचे ‘उ’ का उच्चारण स्थान है। उ के स्थान से थोड़ा नीचे ऋ और ॠ से थोड़ा नीचे ‘ए’ का उच्चारण होता है। ‘ए’ से जुड़ा हुआ ही ‘ऐ’ का स्थान है, इन दोनों में बहुत हल्का सा फ़र्क है। ‘ए’ के स्थान के नीचे ‘ओ’, ‘औ’ का उच्चारण किया जाता है। ‘औ’ के स्थान के पीछे से नाभि के निकट से अनुस्वार तथा नाभि के केन्द्र से विसर्ग का उच्चारण किया जाता है।

प्रस्तुत चित्र में हमें स्पष्ट तौर पर ध्वनि यंत्र (Vocal Tract) के सभी अवयव दिखाई देते हैं। कोई जरूरी नहीं कि बोलते समय इन सभी अवयवों का उपयोग हो ही, लेकिन जीभ का पिछला हिस्सा (Velum), तालू (Palate), नाक के छेद (Nasal Cavity), होंठ (Lips), दाँत (Teeth), जीभ का अगला भाग (Tip of the tongue), जीभ का मुख्य भाग (Body of the tongue), जीभ का निचला हिस्सा (Root of the tongue) इनका विभिन्न तरीकों से प्रयोग होता है। जीभ के निचले हिस्से का सबसे पीछे का भाग जिसे Uvula कहा जाता है (चित्र में नहीं है), वह भाग उर्दू के कुछ शब्दों जैसे – क़, ख़, ग़ आदि के लिये उपयोग होता है (जंग और ज़ंग बोल कर इसे समझा जा सकता है)। सुविधा के लिये इन तमाम अंगों और अवयवों को एक ही शब्द “उच्चारक” के रूप में हम लेते हैं। इनमें से दो के आपस में मिलने पर कैसे व्यंजन तय होते हैं उसी प्रकार उन्हें नाम दिये गये हैं- जैसे
१. कण्ठ्‌य – जीभ के निचले और पिछले हिस्से के संयोग से निर्माण होने वाले – क्‌, ख्‌, ग्‌, घ्‌, ङ्‌
२. तालव्य – तालू और जीभ के आपस में स्पर्श होने से निर्माण होने वाले – च्‌, छ्‌, ज्‌, झ्‌, ञ्‌, श्‌
३. मूर्धन्य – इसमें भी तालू और जीभ के स्पर्श होने से ही शब्द का निर्माण होता है लेकिन यह स्पर्श भिन्न तरीके से होता है, तालव्य में जीभ सीधी रहती है, जबकि मूर्धन्य में जीभ थोड़ी अंदर की दिशा में मुड़ जाती है, जैसे – ट्‌, ठ्‌, ड्‌, ढ्‌, ण्‌, ष्‌
४. दन्त्य – दाँतों और जीभ का स्पर्श होने से निर्माण होने वाले – त्‌, थ्‌, द्‌, ध्‌, न्‌, स्‌
५. ओष्ठ्‌य – दोनों होंठों के साथ आकर स्पर्श से निर्माण होने वाले – प्‌, फ़्‌, ब्‌, भ्‌, म्‌

भाषा में वर्णों का निर्धारण वैज्ञानिक तरीके से हुआ है, इसे समझने के लिये गणितीय संवर्ग के सिद्धांत और “द्वंद्वात्मक तर्क” की प्रक्रिया को समझना होगा। सबसे पहले एक विचार वाद के रूप में मन में आता है। यह विचार अपने अन्दर से एक विरोधी विचार को पैदा करता है, जिसे हम प्रतिवाद कहते हैं। वाद और प्रतिवाद एक-दूसरे के विरोधी होते हैं। वाद-प्रतिवाद के समन्वय से बनी हुई स्थिति को ‘संवाद’ कहते हैं। इसी संवाद-प्रतिवाद के सिलसिले को द्वंद्वात्मक तर्क का सिद्धांत कहा जाता है। इसी तर्क के आधार पर हमारी भाषा में व्यंजन वर्णों की रचना हुई है। व्यंजनों के स्पष्ट उच्चारण के लिये मुख, कंठ और होंठ तक फ़ैले उच्चारण स्थानों के पहले पाँच भाग किये गये हैं, फ़िर इन पाँच बड़े भागों में से प्रत्येक बड़े भाग के पाँच छोटे-छोटे हिस्से किये गये हैं। इस तरह व्यंजनों के पाँच वर्ग और प्रत्येक वर्ग के पाँच उप-उच्चारण स्थान माने गये हैं। पाँच से अधिक हिस्से करने पर वर्णसंकर दोष पैदा हो जाता, और ध्वनियाँ स्पष्ट उच्चारित नहीं होतीं।

जैसा कि पहले हम देख चुके हैं व्यंजनों के पाँच वर्ग होते हैं –
क वर्ग – क, ख, ग, घ, ङ
च वर्ग – च, छ, ज, झ, ञ
ट वर्ग – ट, ठ, ड, ढ, ण
त वर्ग – त, थ, द, ध, न
प वर्ग – प, फ़, ब, भ, म

बोले और लिखे जाने के क्रम में सबसे अन्त में ‘प’ वर्ग का स्थान है। दरअसल हमारा वाणी तंत्र एक ग्राफ़ की तरह से बनाया गया है। इसके अन्तिम छोर से यानी होंठ के नीचे के छोर से ‘प’ का उच्चारण होता है। ऊपरी होंठ के पाँच भाग करने पर निचले सिरे से ऊपरी सिरे तक बढने पर ‘प, फ़, ब, भ, म’ का उच्चार होता है। इससे कुछ पीछे हटने पर ऊपर दन्त स्थान का निचला छोर आता है। इस दन्त स्थान के भी पाँच विभाग किये गये हैं, नीचे से ऊपर की ओर जीभ के प्रत्येक हिस्से से टकराने पर त, थ, द, ध, न बोले जाते हैं। दन्त मूल से थोड़ा सा ऊपर मूर्धा के अन्तिम अथवा अगले हिस्से पर जीभ के लगने से ‘ट’ की ध्वनि निकलती है, ट के स्थान से थोड़ा सा पीछे हटने पर मूर्धा के चार स्थानों पर जीभ टकराती है, तो क्रमशः ठ, ड, ढ, ण का उच्चारण होता है। ‘ण’ का उच्चारण मूर्धा के सबसे ऊपरी हिस्से में होता है, ये मूर्धा का मूल भाग माना गया है। मूर्धा के बाद तालू का प्रारंभ होता है, तालू के अग्र भाग से जीभ के स्पर्श करने से ‘च’ का उच्चारण होता है। च के स्थान के पीछे तालू के भी चार हिस्से किये गये हैं जिस पर जीभ स्पर्श करने से छ, ज, झ, ञ का उच्चारण होता है। तालू के पीछे से कंठ की सीमा प्रारम्भ होती है। ञ के पिछले स्थान से कंठ के चार स्थानों पर ख, ग, घ और ङ उत्पन्न होते हैं। जिन लोगों को पहले यह दन्त्य, कण्ठ्य या तालव्य की अवधारणा मालूम नहीं थी, उन्हें अब यह पता चल गया होगा कि इन व्यंजनों को इस प्रकार ही क्यों तालिका में रखा गया है।

लेकिन फ़िर भी एक प्रश्न उठता है कि जब “स्‌”, ‘श्‌’ और ‘ष्‌’ जैसे शब्द इन्हीं व्यंजनों की श्रृंखला में आते हैं, तो फ़िर उन्हें इन पहले २५ व्यंजनों से अलग क्यों रखा गया है? ‘श्‌’ और ‘ष्‌’ में क्या अन्तर है, हालांकि इसका उत्तर पाठकों को स्वयं इन व्यंजनों के उच्चार करके देखने से स्पष्ट तौर पर समझ में आ जायेगा, फ़िर भी आने वाले लेखों में इसका विस्तार करने की कोशिश की जायेगी।

अगले भाग में हम देखेंगे व्यंजनों के बारे में और गहराई से विवेचन..... तब तक सुधी पाठक कृपया इनका गंभीरता से अध्ययन करके मेरी गलतियों से अवगत कराते रहें, ताकि उस पर चर्चा-प्रतिचर्चा का द्वार खुले।

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Kumaraswami, BJP, Karnatak, Power sharing

जो काम मायावती एक जमाने में करते-करते रह गईं थी, वह बाप-बेटे की जुगलबन्दी और काँग्रेस की पिछवाड़े से की गई “उँगली” ने कर दिखाया। कर्नाटक में सत्ता की बन्दरबाँट में जब माल देने की बारी आई तो बिल्ली सारा माल अकेले हजम करने की जिद कर बैठी, और “बन्दर” देखते ही रह गये। इसे कहते हैं “चोरों को पड़ गये मोर”...। इन भाजपा वालों के साथ कम से कम एक बार यह चोट होना जरूरी था, सत्ता के लिये “यहाँ-वहाँ-जहाँ-तहाँ, मत पूछो कहाँ-कहाँ” मुँह मारते भाजपाईयों को यह चमाट कुछ ज्यादा ही जोरदार लगा है (जोर का झटका धीरे से)। आश्चर्य सिर्फ़ इस बात का है कि जनता को ठगने वाले दो चोर आपस में ही एक दूसरे को ठग लिये और जनता को मजा आ गया। इसे कहते हैं “बिन पैसे का तमाशा”, क्या-क्या नहीं किया भाजपा ने इनके लिये, लग्जरी बस से गुजरात और मध्यप्रदेश घुमाने ले गये, पहले सत्ता भी दी, मुख्यमंत्री पद भी नहीं माँगा, इतने सारे “त्याग” के बदले मिला क्या... ठेंगा...। कम से कम अब तो भाजपा वालों को अकल आ जानी चाहिये कि “धर्मनिरपेक्ष दल” (हा हा हा हा) अपने बाप के भी सगे नहीं है, तो इनके क्या होंगे। मजे की बात तो यह है कि तमाम विचार मंथन, शिविर और जाने क्या-क्या आयोजित करने वाले इनके आका इन्हें समझाते क्यों नहीं कि भाजपा को अकेले ही चलना चाहिये, जब तक पूर्ण सत्ता ना मिले (चाहे वह पचास साल बाद मिले)। भानुमति का जो पिटारा वाजपेयी जी किसी तरह पाँच साल चला ले गये, उस वक्त ने ही इनकी खटिया खड़ी की है। कल्पना करें कि भाजपा कह देती कि जब तक हमारे तीन मुद्दे – राम मन्दिर, धारा ३७० और समान नागरिकता कानून नहीं माने जायेंगे, हमे किसी से गठबन्धन नहीं करना, सब जाओ भाड़ में। उस वक्त ये सारे चूहे जैसे दल कहाँ जाते, निश्चित रूप से कांग्रेस की गोद में तो नहीं, क्योंकि अपने-अपने राज्यों में तो ये कांग्रेस के खिलाफ़ ही जीत कर आये थे, लेकिन भाजपा वालों को अपने मुद्दे या अपनी पहचान या सौदेबाजी करने से ज्यादा सत्ता की मलाई चाटने की जल्दी थी और ताबड़तोड़ “एनडीए” नाम का जमूरा खड़ा किया (ठीक वैसा ही जैसा की अभी “यूपीए” नाम का है), अंततः हुआ क्या, कन्धार का दाग सदा के लिये माथे पर लग गया, नायडू साहब, जयललिता और ममता केन्द्र को चूस कर अपने-अपने रास्ते निकल लिये, ये “राम के बन्दर” बैठे रह गये हाथ में फ़टा हुआ भगवा लिये। अब भी वक्त हाथ से नहीं निकला है, मोदी को आगे करो, हिन्दुत्व की राजनीति खुलकर करो, कम से कम इतनी सीटें लाओ (और मिल भी जायेंगी) कि मजबूत सौदेबाजी की स्थिति में आ जाओ, फ़िर अपना मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनवाओ.... राम मन्दिर पर जोरदार काम करो, सरकार गिर जाती है तो गिर जाने दो, अगली बार, उसकी अगली बार, नहीं तो और अगली बार... कभी न कभी ये “धर्मनिरपेक्ष”(?) दल भाजपा को उनकी शर्तों पर समर्थन जरूर देंगे, लेकिन उसके लिये सत्ता का त्याग करना पड़ेगा, जो कि भाजपा के लिये एक मुश्किल भरा काम है... आगे “राम” जाने....


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मंगलवार, 09 अक्टूबर 2007 12:43

भाषा, उच्चारण और वर्णमाला (भाग-४)

Phonetics, Language, Alphabets in Hindi

(भाग-१, भाग-२ और भाग-३ से आगे जारी...)

‘अ’ की तरह ‘ह’ को भी सभी वर्णों का प्रकाशक कहा जाता है। कोई भी वर्ण बिना विसर्ग और अकार के बिना उच्चारित नहीं हो सकता। अ ही नाभि की गहराई से उच्चरित होने पर विसर्ग बन जाता है। इस प्रकार अ स्वयं अपने में से अपना विरोधी स्वर उत्पन्न करता है। तात्पर्य यह कि अ से ह तक की वर्णमाला में विसर्ग और अकार किसी ना किसी रूप में मौजूद रहते हैं।

स्वरों के उच्चारण स्थल कुछ व्यंजनों के उच्चारण स्थानों के इतने निकट होते हैं कि इन स्वरों का उच्चारण उन स्थानों से होने का भान होता है, लेकिन होते अलग हैं, इन्हें उप-उच्चारण स्थान कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर ‘ई’ का उप-उच्चारण वहाँ है, जहाँ से ‘क’ का उच्चार होता है, जबकि जहाँ से ‘ख’ उच्चारित होता है उसके पास ही ‘उ’ का स्थान निहित है। इसी प्रकार ‘घ’ वाले स्थान के पास ‘ए’ और ‘ङ’ के पास ‘ओ’ का उप उच्चारण स्थान होता है। ऋ के लिये मूर्धा का अंतिम हिस्सा तथा लृ के लिये दन्तमूल उप-उच्चारण स्थान माने गये हैं। अनुस्वार तथा ङ, ञ, ण, न और म के लिये नाक का भीतरी हिस्सा उप-उच्चारण स्थान माना गया है और इसीलिये इन्हें ‘अनुनासिक’ कहा जाता है। इस तरह स्वर और व्यंजन अपने-अपने निर्धारित स्थान से प्रकट होते हैं।

अधिकांश व्यंजन अकार और विसर्ग के द्वन्द्व से बने हैं। अकार (अ) कंठमूल के ध्रुव बिन्दु पर और उसका विरोधी विसर्ग (ह) नाभि के ध्रुव पर बैठा है। मतलब नाभि से होने वाले वायु के फ़ैलाव से सभी व्यंजनों का प्रारम्भ होता है और कंठ में अकार के उच्चारण के साथ वर्णाकार लेकर उनका समापन हो जाता है। हर व्यंजन का पहला और तीसरा वर्ण केवल ‘अ’ के योग से बना है, जबकि दूसरा और चौथा वर्ण विसर्ग या हकार से बनता है। ‘क’ बनता है क+अ से जबकि ‘ख’ बनता है क्‌+ ह्‌ से, इसी प्रकार ग= ग+अ लेकिन घ=ग्‌+ह्‌ और प्रत्येक ग्रुप का अन्तिम अक्षर अनुनासिक। अब हम देखते हैं प्रत्येक वर्ग के पाँचवें वर्ण के बारे में – असल में ङ ही नहीं बल्कि ञ, ण, न, म को भी समझना जरूरी है। सभी व्यंजन कंठ से होंठ तक फ़ैले हुए ग्राफ़ पर बैठे हैं, लेकिन ये पाँचों अनुनासिक वर्ण ग्राफ़ से हटकर नाक में अनुस्वार के आधार पर स्थित हैं। ग्राफ़ से अलग होने के कारण ये ग्राफ़ के सभी वर्णों को नकारते हैं, इसलिये इन सभी का अर्थ ‘नकार’ यानी ‘नहीं’ को स्वाभाविक रूप से प्रकट करता है। यह सिद्धांत संवर्ग के पाँचों सदस्यों पर लागू होता है।

आमतौर पर सबने देखा होगा कि सर्दी-जुकाम के दौरान नाक बन्द होने पर हमारे उच्चारण में दोष पैदा हो जाता है, ‘अम्बे’ को ‘अब्बे’ या कभी ‘झण्डा’ को ‘झड्डा’ स्वर निकलता है (क्योंकि अनुनासिक बन्द हो जाता है) यही बात कोई दाँत टूट जाने अथवा चाय-दूध से जीभ जल जाने के बाद त, थ, द, ध के उच्चारण में विकार आ जाता है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि शुद्ध उच्चारण के लिये वाणी तन्त्र के सभी अवयव ठीक-ठाक अवस्था में भी होना चाहिये।

अब और आगे चलें तो बचे हुए निम्नलिखित वर्ण इस प्रकार हैं -
य्- तालव्य
र्, ळ्- मूर्धन्य
ल्- दन्त्य
व्- दन्तोष्ठ्य
ह्- कण्ठ्य (संस्कृत के अनुसार)

अब तक हम काफ़ी परिभाषायें देख चुके हैं जैसे उच्चारक्रिया (Articulation), उच्चारक स्थान (Articulator), कण्ठ्य (Velar), तालव्य (Palatal), दन्त्य (Dental), ओष्ठ्य (Bilabial) आदि, यह सभी प्राचीन भारतीय उच्चार पद्धति के ही स्वरूप हैं, इससे हमें यह भी पता चलता है कि उस जमाने में भी उच्चारशास्त्र बेहद विकसित था और उसी के अनुरूप वर्णमाला की रचना की गई थी। पाटकों को याद होगा कि पिछले भाग में मैने व्यंजनों की एक तालिका समान बनाई थी, जिसमें तीन दल बनाये थे। तीन अलग गुट बनाने का कारण यह था कि इन तीनों गुटों के उच्चारण के वक्त तंत्र का प्रयत्न अलग-अलग होता है। पहला गुट था ‘क से म’ इन २५ वर्णों का, इन्के लिये वाणी तंत्र “स्पर्श” प्रयत्न का उपयोग करता है। मतलब दो उच्चारकों का आपस में पूर्ण स्पर्श होता है और वायु दोनों उच्चारकों द्वारा तैयार की गई दीवार के बीच होती है। दोनों उच्चारकों के दूर जाने पर हवा जोर से बाहर निकलती है, इन वर्णों को “स्पृष्ट” या Plosive कहते हैं।

दूसरा गुट था ‘य्‌, र्‌, ल्‌, व्‌’ का, इनके लिये जो विधि अपनाई जाती है उसे “ईषत्स्पर्श” कहते हैं, मतलब इनमें दो उच्चारक एक दूसरे को हल्का सा स्पर्श करते हैं, इसलिये हवा बीच में न दबकर स्पर्श होते हुए भी बाहर निकलती है। ऐसे वर्णों को ‘अन्तस्थ’ कहते हैं, अन्तस्थ यानी व्यंजन और स्वर के बीचोंबीच रहने वाले या कहें “अर्धस्वर”। हालांकि अंग्रेजी में य्‌ और व्‌ को ही Semivowels की संज्ञा दी गई है, और र्‌ तथा ल्‌ को Consonant माना गया है।

तीसरा गुट है श्‌, ष्‌, स्‌ और ह्‌ का। इन्हें ‘ईषद्विवृत्त” कहते हैं, मतलब इनमें दो उच्चारक एक दूसरे को स्पर्श नहीं करते हैं, लेकिन हवा निकलने के लिये थोड़ा सा ही स्थान बाकी रहता है, इसलिये हवा बगैर किसी speed breaker के लेकिन कम जगह होने से तेजी से बाहर निकलती है। इन वर्णों को ‘नेमस्पृष्ट’ या Fricatives कहते हैं।

एक और वर्ण होता है ‘ळ’। इस वर्ण के बारे में विद्वानों में थोड़ा भ्रम सा है, क्योंकि ‘ळ्‌’ वर्ण आभिजात्य संस्कृत में नहीं है, और संस्कृत की प्राचीन पुस्तकों में इसका उल्लेख नहीं मिलता। वर्णमाला में ३३ व्यंजन हैं ऐसा ही कहा जाता है, लेकिन मराठी में ळ्‌ मिलाकर ३४ व्यंजन माने जाते हैं। वैदिक संस्कृत में ळ्‌ पाया जाता है लेकिन लगभग ड्‌ के रूप में, अर्थात दो स्वरों के बीच में ड्‌ का उच्चार आया तभी ळ्‌ होता है, अन्यथा ळ्‌ का अस्तित्व थोड़ा धूमिल सा है। संस्कृत से अधिक सम्बन्ध ना होने से इसे वर्णमाला में अंतिम स्थान दिया गया है और विद्वानों ने इसके बारे में अधिक विचार शायद नहीं किया है (यदि किसी पाठक को इस वर्ण ‘ळ्‌’ के बारे में अधिक जानकारी या साहित्य मिले तो वह अवश्य उल्लेख करें)। इस प्रकार हमने देखा कि तीनों दलों या टीमों में वर्णों के स्थान कहाँ-कहाँ और कैसे निहित हैं, प्रयास यह था कि इनके बीच का जो फ़र्क है वह स्पष्ट उभरकर सामने आये।

अब आगे हम देखेंगे कि स्पृष्ट वर्णों की रचना जैसी की गई है, वैसी ही क्यों की गई है, उसका वैज्ञानिक आधार क्या है? पाठकगण कृपया एक बार फ़िर से दोहरा लें इसलिये निम्नांकित तालिका दे रहा हूँ -
क् ख् ग् घ् ङ् - कण्ठ्य
च् छ् ज् झ् ञ् - तालव्य
ट् ठ् ड् ढ् ण् - मूर्धन्य
त् थ् द् ध् न् - दन्त्य
प् फ् ब् भ् म् - ओष्ठ्य

हम शुरुआत करते हैं तालिका के पाँचवे कॉलम से, जिसमें हैं ङ्‌, ञ्‌, ण्‌, न्‌ और म्‌। प्रश्न उठता है कि लगभग एक जैसे पाँच-पाँच अनुनासिक वर्णों की क्या जरूरत है? दरअसल इनमें हवा मुँह के द्वारा न जाकर नाक के द्वारा बाहर निकलती है। बचपन में व्याकरण सीखते समय का मूल सिद्धांत भी यही है कि अनुस्वार के बाद जो अगला व्यंजन आता है उसी वर्ग का अनुनासिक शब्द में उपयोग किया जाना चाहिये, जैसे ‘अंक’ में अनुस्वार के सामने चूँकि ‘क’ आया है, इसलिये इसे “अङ्‍क्‌’ लिखना चाहिये। इसी प्रकार काञ्चन, कण्टक, अन्त, अम्बर के मामले में होगा। इसका कारण यह है कि शब्द उच्चारण करते समय अनुस्वार के बाद कौन सा व्यंजन आने वाला है यह हमें ज्ञात होता है, इसलिये जीभ उसी दिशा में वाणी तन्त्र में टकराती है और उतनी मात्रा में हवा नाक के द्वारा छोड़ी जाती है। इसीलिये जैसा कि मैंने पहले कहा, जुकाम हो जाने पर हम अनुनासिक शब्दों का उच्चार ठीक से नहीं कर पाते।

अब बात चौथे और तीसरे कॉलम की (ग, घ, ज, झ, ड, ढ आदि) – इन वर्णों का उच्चार करते समय स्वरयंत्र के बीच से हवा थोड़ी रुकावट के साथ आती है, इसलिये हल्का सा कम्पन होता है और इसीलिये इन्हें ‘घोष’ या ‘मृदु’ व्यंजन (Voiced) कहा जाता है। फ़िर बारी आती है दूसरे और पहले कॉलम की – इनमें स्वरयंत्र की हलचल ज्यादा नहीं होती, इसलिये हवा बगैर किसी रुकावट के निकलती है और किसी प्रकार का कम्पन आदि नहीं होता, इसलिये इन व्यंजनों को ‘अघोष’ अथवा ‘कठोर’ (Unvoiced) कहा जाता है। ‘क्‌’ के उच्चारण के समय थोड़ी अधिक हवा मुँह से बाहर निकालें तो ‘ख्‌’ तैयार होता है। कम हवा का उपयोग करेंगे तो ‘क्‌’ का उच्चार होगा। कम हवा के उपयोग वाले व्यंजनों को ‘अल्पप्राण’ और ज्यादा हवा के उपयोग वाले व्यंजनों को ‘महाप्राण’ कहा जाता है।

‘श्‌’ और ‘ष्‌’ के उच्चारण के दौरान हमें इनके बीच का अन्तर साफ़ पता चल जाता है। हालांकि इनके उपयोग के बारे में विस्तार से जानकारी तो नहीं मिल पाई, लेकिन फ़िर भी कुछ प्राप्त करने की कोशिश की है, उसके अनुसार मुझे ऐसा लगता है कि ऋ, र, ट, ठ, ड, ढ और ण के पहले ‘ष’ का उपयोग होता है, क्योंकि ये वर्ण ‘ष्‌’ के मूर्धन्य “बन्धु” कहे जाते हैं। जैसे – ‘शटकोण’ गलत है, और “षटकोण” सही वैसे ही ‘ज्योतिश’ गलत है, ‘ज्योतिष’ सही। ‘ष’ से शुरु होने वाले शब्द बहुत ज्यादा नहीं हैं, लेकिन षट्‌कोण, षड्‌यंत्र, षण्मुखानन्द (यहाँ अनुस्वार आने से ‘ण’ आधा हो गया है), षोडशी (शोडशी नहीं)। लगभग यही नियम तब भी लागू होता है जब ‘ष’ बीच में आता है, जैसे- आकृष्ट, निकृष्ट, राष्ट्र, देहयष्टि, चेष्टा, कोष्ठक, अंत्येष्टि, घनिष्ठ, बलिष्ठ, श्रेष्ठ, कुष्ठ, आषाढ़, निषेध, पार्षद, अभिषेक, प्रदूषण, सामिष/निरामिष, भाषा, मनीषा, पोषण, शोषण, आदि, इनमें से किसी में भी ‘श’ का उपयोग नहीं होता है, प्रत्येक जगह ‘ष्‌’ ही उपयोग किया गया है। कई जगह ‘ष्‌’ को ‘क’ वर्ग के साथ भी रखा गया है, जैसे- आविष्कार, पुष्कर, चतुष्कोण आदि, और कहीं पुष्य, ऋष्यमूक आदि, लेकिन जैसा कि मैने पहले ही कहा कि इसका कोई तार्किक या वैज्ञानिक आधार और परिभाषा मुझे ढूँढने के बावजूद नहीं मिल सका, यदि किसी पाठक को जानकारी हो तो स-सन्दर्भ भेजें।

अभी तक पाठक यह तो जान ही गये होंगे कि व्यंजनों की उच्चारक्रिया जितनी आसान लगती है, हकीकत में वह कई प्रयत्नों और वाणी तंत्रों का मिश्रण होती है। हमें पता भी नहीं चलता और हमारा अद्‌भुत वाणी तंत्र कई प्रकार की क्रिया करके शब्दों का उच्चार कर देता है।

अब स्वरों के बारे में कुछ विस्तार से अगले अंक में.....

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