Super User

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I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

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Rich People Uncivilized Unsocial Selfish

पहला दृश्य देखिये – पंजाब के खन्ना गाँव के अनपढ़ ग्रामीणों ने कैसा व्यवहार किया। लुधियाना से 50 किमी दूर रात के 3 बजे, खून जमा देने वाली ठंड के बीच एक रेल दुर्घटना हुई। गाँव के सारे लोग एक घंटे के भीतर इकठ्ठा हो चुके थे, गुरुद्वारे के लाउडस्पीकर से सबको जगा-जगाकर दुर्घटनास्थल भेजा जा रहा था, जिसके पास ट्रैक्टर थे उन्होंने अपने ट्रैक्टर रेल्वे लाइन के आसपास हेडलाइट जलाकर चालू हालत में छोड़ दिये ताकि वहाँ रोशनी हो सके। रेल के डिब्बों से लाशों से निकालने का काम शुरु कर दिया गया। गाँव की औरतों ने लालटेन जलाकर और खेत से फ़ूस में आग लगाकर ठंड से काँप रहे घायलों को थोड़ी गर्मी देने की कोशिश की।

जल्दी ही सैकड़ों की संख्या में आरएसएस के कार्यकर्ता वहाँ पहुँच गये, किसी भी सरकारी मदद के बिना उन्होंने गुरुद्वारे में ही एक “टेम्परेरी” अस्पताल खोल दिया और रक्तदान शुरु कर दिया। गाँव वालों ने एक समिति बनाई जिसने अगले एक सप्ताह तक घायलों और मृतकों के रिश्तेदारों और बाहर से आने वाले लगभग 30000 लोगों के लिये भोजन की व्यवस्था की। जिन्दा या मुर्दा किसी की जेब से एक रुपया भी चोरी नहीं हुआ, समिति के अध्यक्ष ने मृतकों की ज्वेलरी और लाखों रुपये कलेक्टर को सौंपे, जब मृतकों के रिश्तेदार भी उन छिन्न-भिन्न लाशों के पास जाने से घबरा रहे थे, तब आरएसएस के युवकों ने उनका सम्मान के साथ अन्तिम संस्कार किया।

अब दूसरा दृश्य देखिये - वह 26 जनवरी 2001 की शाम थी, गुजरात में आये महाविनाशकारी भूकम्प की खबरें तब तक पूरे देश में फ़ैल चुकी थीं। लाशों के मिलने का सिलसिला जारी था और धीरे-धीरे भूकम्प की भयावहता सभी के दिमाग पर हावी होने लगी थी। लेकिन दिल्ली, जो कि देश की राजधानी है, उसके एक केन्द्रीय इलाके में चारों तरफ़ रोशनी थी, धूमधड़ाका था, मौज मस्ती चल रही थी। जब समूचा देश शोक और पीड़ा में डूबा हुआ था, वहाँ एक विशाल पार्टी चल रही थी। उस पार्टी में भारत के जाने-माने रईस, समाज के बड़े-बड़े ठेकेदार तो थे ही, वर्तमान और भूतपूर्व फ़िल्म स्टार, दागी क्रिकेटर, उद्योगपति, गुलशन कुमार की हत्या के आरोपी, नौकरशाह, बैंक अफ़सर, पत्रकार और यहाँ तक कि बुद्धिजीवी माने जाने वाले बड़े शिक्षाविद भी थे। एक बड़े कम्युनिस्ट नेता भी उस पार्टी की शोभा बढ़ा रहे थे। पार्टी का मुख्य आकर्षण था एक भव्य स्टेज जहाँ एक मुख्यमंत्री बेकाबू होकर खुद गाने-बजाने लग पड़े थे, और उनके जवान बेटे को उन्हें यह कह कर शांत करना पड़ा कि गुजरात में आज ही एक राष्ट्रीय आपदा आई है और इस तरह आपका प्रदर्शन शोभा नहीं देता।

आप सोच रहे होंगे कि आखिर यह पार्टी थी किस उपलक्ष्य में? यह पार्टी एक 45 साल के बच्चे के जन्मदिन के उपलक्ष्य में थी। यह पैंतालीस साला बच्चा और कोई नहीं बल्कि एक ख्यात व्यवसायी, उद्योगपति, फ़िल्मी (खासकर हीरोईनों) और क्रिकेट हस्तियों से विशेष मेलजोल रखने वाला, और एक ऐसी पार्टी का मुख्य कर्ता-धर्ता था, जो अपने नाम के आगे “समाजवादी” लगाती है… (क्या अब नाम भी बताना पड़ेगा)। उस पार्टी में शामिल होने के लिये मुम्बई से कुछ लोग चार्टर विमान करके आये थे। यह पार्टी सिर्फ़ 26 जनवरी की रात को ही खत्म नहीं हुई, बल्कि यह 27 जनवरी को भी जारी रही, जबकि यह सभी को पता चल चुका था कि भुज-अंजार में लगभग 15000 लोग मारे गये हैं और तीन लाख से अधिक बेघर हुए हैं। 27 जनवरी की पार्टी उन लोगों के लिये थी, जो 26 जनवरी को उसमें शामिल होने से चूक गये थे। 27 जनवरी तक हालांकि तमाम राजनीतिक लोग इस पार्टी से शर्मा-शर्मी में दूर हो गये थे सिर्फ़ इसलिये कि कहीं वे मीडिया की नजर में न आ जायें, लेकिन दिल्ली और मुम्बई के कुछ प्रसिद्ध अमीर, समाज के प्रमुख स्तम्भ माने जाने वाले लोग इतने बेशर्म और ढीठ थे कि उन्होंने पार्टी स्थगित करना भी उचित नहीं समझा।

और ऐसा करने वाले अकेले दिल्ली के अमीर ही नहीं थे, मुम्बई में भी 26 जनवरी की रात को ही एक फ़ैशन शो आयोजित हुआ (जिसमें जाहिर है कि “एलीट” वर्ग ही आता है)। भविष्य की मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स चुनने के लिये यह शो आयोजित किया गया था। हमेशा की तरह विशिष्ट लोगों ने “माँस” की वह प्रदर्शनी सूट-बूट पहनकर देखी, मीडिया ने भी सुबह गुजरात में लाशों और टूटे घरों की तथा शाम को अधनंगी लड़कियों की तस्वीरें खींची और अपना कर्तव्य निभाया।

लेकिन हमारे-आपके और देश के दुर्भाग्य से दिल्ली के एक छोटे से सांध्य दैनिक के अलावा किसी राष्ट्रीय अखबार ने पंजाब के गाँववालों की इस समाजसेवा के लिये (आरएसएस की तो छोड़िये ही) तारीफ़ में कुछ नहीं छापा। कल्पना कीजिये कि यदि कोई एकाध-दो गुण्डे दो-चार यात्रियों के पैसे या चेन वगैरह लूट लेते तो “आज तक” जैसे नकली चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज क्या होती? “दुर्घटनाग्रस्त यात्रियों से लूटपाट…”, बड़े अखबारों में सम्पादकीय लिखे जाते कि कैसे यह पुलिस की असफ़लता है और कैसे गाँव वालों ने लूटपाट की।

समाज के एक तथाकथित “एलीट” वर्ग ने गाँव वालों को हमेशा “गँवई”, “अनसिविलाइज्ड” कहा और प्रचारित किया है। जबकि हकीकत यह है कि जैसे-जैसे अमीरी बढ़ती जाती है, “मैं”, “मेरा परिवार”, “मेरा पैसा”, “मेरी सुविधायें” वाली मानसिकता बढ़ती जाती है। जब समाज को कुछ योगदान देने की बात आती है तो अमीर सोचता है कि मेरा काम सिर्फ़ “पैसा” देना भर है, और पैसा भी कौन सा? जो उसने शोषण, अनैतिकता, भ्रष्टाचार, साँठगाँठ करके कमाया हुआ है। त्याग, बलिदान, समाजसेवा की बारी आयेगी तो ग्रामीण खुद-ब-खुद आगे आता है…

याद कीजिये कंधार का हवाई अपहरण कांड, कैसे अमीर लोग टीवी कैमरों के सामने अपना “छातीकूट” अभियान लगातार जारी रखे रहे, इक्का-दुक्का को छोड़कर एक भी अमीर यह कहने के लिये आगे नहीं आया, कि “सरकार एक भी आतंकवादी को न छोड़े चाहे मेरे परिजन मारे ही क्यों न जायें…” लेकिन यही अमीर वर्ग सबसे पहले करों में छूट की माँग करता है, सरकार को चूना लगाने के नये-नये तरीके ढूँढता है, बिजली चोरी करता है और बाकी सारे धतकरम भी करता है, यहाँ तक कि हवाई दुर्घटना में मरने पर दस लाख का हर्जाना और बस दुर्घटना में मरने पर एक लाख भी नहीं (यानी मौत में भी भेदभाव), ढिठाई तो इतनी कि सरेआम फ़ुटपाथ पर लोगों को कुचलने के बावजूद मुम्बई में सलमान और दिल्ली में संजीव नन्दा साफ़ बच निकलते हैं, लेकिन आलोचना की जाती है ग्रामीण वर्ग की… क्या खूब दोगलापन है।

कोई यह नहीं चाहता कि अमीरों को नुकसान पहुँचाया जाये, लेकिन कम से कम उन्हें दूसरों की तकलीफ़ों और दुःखों की समझ होनी चाहिये। कोई यह नहीं कह रहा कि वे आगे आकर अन्जान लोगों की लाशों को दफ़नायें/जलायें (वे कर भी नहीं सकते) लेकिन कम से कम जो लोग ये काम कर रहे हैं उनकी तारीफ़ तो कर सकते हैं। कोई उनसे यह नहीं कह रहा कि गुजरात या लुधियाना जाकर मृतकों/घायलों की मदद करो, लेकिन कम से कम बेशर्मी भरी पार्टियाँ तो आयोजित न करें।

माना कि जीवन चलने का नाम है और दुर्घटनाओं से देश रुक नहीं जाता, लेकिन सार्वजनिक रूप से इस प्रकार का भौंडा प्रदर्शन निहायत ही घटिया और शर्मनाक होता है। गाँवों में आज भी कोई बड़ी दुर्घटना होने पर शादी-ब्याह तक रोक दिये जाते हैं, लेकिन अमीरो को कम से कम यह खयाल तो करना ही चाहिये कि पड़ोस में लाश पड़ी हो तो दीवाली नहीं मनाया करते। ऐसे में रह-रह कर सवाल उठता है कि क्या अमीरी के साथ बेशर्मी, ढिठाई, असामाजिकता और स्वार्थीपन भी बढ़ता जाता है?

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Communist Party Double Standards Inflation

वित्तमंत्री चिदम्बरम, प्रमुख योजनाकार अहलूवालिया और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की त्रिमूर्ति एक बेहतरीन अर्थशास्त्रियों की टीम मानी जाती है (सिर्फ़ मानी जाती है, असल में है नहीं)। बजट के पहले सोयाबीन तेल का भाव 60 रुपये किलो था जो बजट के बाद एकदम तीन दिनों में 75 रुपये हो गया… चावल के भाव आसमान छू रहे हैं लेकिन निर्यात जारी है… दालों के भाव को सट्टेबाजों ने कब्जे में कर रखा है, लेकिन उसे कमोडिटी एक्सचेंज से बाहर नहीं किया जा रहा। देश की आम जनता को सोनिया गाँधी के विज्ञापन के जरिये यह समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि “हमने पिछले पाँच साल से मिट्टी के तेल के भाव नहीं बढ़ाये”, मानो गरीब सिर्फ़ केरोसीन से ही रोटी खाता हो और केरोसीन ही पीता हो।

तमाम अखबार चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि कमोडिटी एक्सचेंजों से खुलेआम सट्टेबाजी जारी है, निर्यात ऑर्डरों में भारी घपले करके, बैकडेट आदि में नकली बिलिंग करके खाद्यान्न निर्यातक, करोड़ों को अरबों में बदल रहे हैं और चिदम्बरम साहब हमे 9 प्रतिशत की विकास दर दिखा रहे हैं। पहले तो बैंकों में ब्याज दर कम कर-कर के जनता को शेयर बाजार और म्युचुअल फ़ण्डों में पैसा लगाने की लत लगा दी, अब बाजार नीचे जा रहा है, विदेशी निवेशक कमा कर चले गये तो त्रिमूर्ति को कुछ सूझ नहीं रहा… समूचा देश सट्टेबाजों के हवाले कर दिया गया है, और माननीय वित्तमंत्री कहते हैं कि “महंगाई को काबू करना हमारे बस में नहीं है, यह एक अंतर्राष्ट्रीय घटना है…”। कांग्रेस एक और प्रवक्ता आँकड़े देते हुए कहते हैं कि “कमाई में विकास होता है तो महंगाई तो बढ़ती ही है”, क्या खूब!!! जरा वे यह बतायें कि कमाई किसकी और कितनी बढ़ी है? और महंगाई किस रफ़्तार से बढ़ी है? लेकिन असल में AC कमरों से बाहर नहीं निकलने वाले सरकारी सचिवों और नेताओं को (1) या तो जमीनी हकीकत मालूम ही नहीं है, (2) या वे जानबूझ कर अंजान बने हुए हैं, (3) या फ़िर इस सट्टेबाजी में इनके भी हाथ-पाँव-मुँह सब चकाचक लालमलाल हो रहे हैं… और आने वाले चुनावों के खर्च का बन्दोबस्त किया जा रहा है।

सबसे आपत्तिजनक रवैया तो लाल झंडे वालों का है, वे मूर्खों की तरह परमाणु-परमाणु रटे जा रहे हैं, नंदीग्राम में नरसंहार करवाये जा रहे हैं, लगातार कुत्ते की तरह सिर्फ़ भौंक रहे हैं, लेकिन समन्वय समिति की बैठक में जाते ही सोनिया उन्हें पता नहीं क्या घुट्टी पिलाती हैं, वे दुम दबाकर वापस आ जाते हैं, अगली धमकी के लिये। पाँच साल तक बगैर किसी जिम्मेदारी और जवाबदारी के सत्ता की मलाई चाटने वाले इन लोगों को दाल-चावल-तेल के भाव नहीं दिखते? परमाणु समझौता बड़ा या महंगाई इसकी उन्हें समझ नहीं है। सिर्फ़ तीन राज्यों में सिमटे हुए ये परजीवी (Parasites) सरकार को एक साल और चलाने के मूड में दिखते हैं क्योंकि इन्हें भी मालूम है कि लोकसभा में 62 सीटें, अब इन्हें जीवन में कभी नहीं मिलेंगी। भगवाधारी भी न जाने किस दुनिया में हैं, उन्हें रामसेतु से ही फ़ुर्सत नहीं है। वे अब भी राम-राम की रट लगाये हुए हैं, वे सोच रहे हैं कि राम इस बार चुनावों में उनकी नैया पार लगा देंगे, लेकिन ऐसा होगा नहीं। बार-बार मोदी की रट लगाये जाते हैं, लेकिन मोदी जैसे काम अपने अन्य राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ आदि में नहीं करवा पाते, जहाँ कुछ ही माह में चुनाव होने वाले हैं। जिस तरह से हमारा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया “अमिताभ को ठंड लगी”, “ऐश्वर्या राय ने छत पर कबूतरों को दाने डाले”, जैसी “ब्रेकिंग न्यूज” दे-देकर आम जनता से पूरी तरह कट गया है, वैसे ही हैं ये राजनैतिक दल…जिस तरह एनडीए के पाँच साल में सबसे ज्यादा गिरी थी भाजपा, उसी तरह यूपीए के पाँच साला कार्यकाल में सबसे ज्यादा साख गिरी है लाल झंडे वालों की, और कांग्रेस तो पहले से गिरी हुई है ही…


अब सीन देखिये… चिदम्बरम ने किसान ॠण माफ़ करने की सीमा जून तय की है (किसान खुश), छठा वेतन आयोग मार्च-अप्रैल में अपनी रिपोर्ट सौंप देगा (कर्मचारी खुश), मम्मी के दुलारे राजकुमार भारत यात्रा पर निकल पड़े हैं और उड़ीसा के कालाहांडी से उन्होंने शुरुआत कर दी है (राहुल की प्राणप्रतिष्ठा), परमाणु समझौते पर हौले-हौले कदम आगे बढ़ ही रहे हैं (अमेरिका भी खुश), अखबारों में किसान और कर्मचारी समर्थक होने के विज्ञापन आने लगे हैं, यानी कि चुनाव के वक्त से पहले होने के पूरे आसार बन रहे हैं, लेकिन विपक्षी दल नींद में गाफ़िल हैं। वक्त आते ही “महारानी”, लाल झंडे वालों की पीठ में छुरा घोंप कर (कांग्रेस की परम्परानुसार) चुनाव का बिगुल फ़ूंक देंगी और ये लाल-भगवा-हरे झंडे वाले देखते ही रह जायेंगे। रही बात आम जनता की, चाहे वह किसी को पूर्ण बहुमत दे या खंडित जनादेश, साँप-नाग-कोबरा-अजगर में से किसी एक को चुनने के लिये वह शापित है…


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Bank Loan Waiver VDIS Chidambaram

हमारे महान वित्तमंत्री, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री और इकोनोमिक्स के विशेषज्ञ माने जाने वाले बाकी के दोनों वीर मोंटेकसिंह अहलूवालिया और मनमोहन सिंह ने किसानों के लिये 60 हजार करोड़ रुपये के कर्जों को माफ़ करने की घोषणा की है। राजकुमार राहुल गाँधी तो एक कदम आगे बढ़कर कहते हैं कि ये कर्जमाफ़ी नाकाफ़ी है, और ज्यादा कर्ज माफ़ किये जाना थे (उसकी जेब से क्या जाता है?)। ये घोषणा चुनावी वर्ष में ही क्यों की है, यह सवाल करना बेकार है, लेकिन एकमुश्त कुछ भी बाँट देने की नेताओं की इस आदत ने ईमानदार लोगों के दिलोदिमाग पर गहरा असर किया है।

जनार्दन पुजारी का नाम बहुत लोगों को याद होगा। जिन्हें नहीं मालूम उनके लिये बता दूँ कि अस्सी के दशक में इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में ये महाशय वित्त राज्यमंत्री थे। इन्हीं महाशय को यह कालजयी काम (लोन बाँटने और उसे खा जाने) का सूत्रधार माना जा सकता है। हमारे यहाँ बड़े-बड़े हिस्ट्रीशीटर को जेलमंत्री और अंगूठाटेक को शिक्षामंत्री बनाये जाने का रिवाज है। पुजारी महाशय ने बैंकों पर दबाव डलवाकर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में “लोन मेले” लगवाये थे। इन लोन मेलों की खासियत यह थी कि इनमें से 90% के लोन बैंकों को वापस नहीं मिले। लगभग ऐसी ही योजना है, पीएमआरवाय (PMRY), इसमें भी सरकार ने जमकर लोन बाँटे, उस लोन पर सबसिडी दी, और लोग-बाग करीब-करीब वह पूरा पैसा खा गये। कई बार तो मजाक-मजाक में लोग कहते भी हैं कि यदि पैसों की जरूरत हो तो PMRY से लोन ले लो। (कांग्रेस से घृणा करने के कई कारणों में से एक कारण यह भी है कि आजादी के बाद से इसने कभी सुशासन लाने की कोशिश नहीं की, हमेशा भ्रष्टाचारियों और बेईमानों को संरक्षण दिया)

इन्हीं की राह पर आगे चले चिदम्बरम साहब। नहीं, नहीं, मैं अभी 2007-08 की बात नहीं कर रहा। थोड़ा पीछे जायें सन 1997 में। चिदम्बरम जी एक बड़ी अनोखी(?) योजना लेकर आये थे, जिसे उन्होंने VDIS स्कीम का नाम दिया था, Voluntary Disclosure Income Scheme। इस नायाब योजना के तहत उन्होंने कालाबाजारियों, काला पैसा जमा करने वालों, आयकर चुराने वालों (मतलब बड़े-बड़े डाकुओं) को यह छूट प्रदान की थी कि वे अपनी काली कमाई जाहिर कर दें और उसका तीस प्रतिशत टैक्स के रूप में जमा कर दें तो बाकी की सम्पत्ति को सरकार “सफ़ेद” कमाई मान लेगी। लोगों ने इसका भरपूर फ़ायदा उठाते हुए लगभग 35000 करोड़ रुपये की काली सम्पत्ति जाहिर की और सरकार को 10000 करोड़ से अधिक की आय हो गई, है न मजेदार स्कीम !!! आंध्रप्रदेश के कांग्रेस नेता-पुत्र ने उस वक्त अपनी सम्पत्ति 700 करोड़ जाहिर की थी, यानी 250 करोड़ का टैक्स देकर बाकी की सारी धन-दौलत (जो उसने या उसके बाप ने भ्रष्टाचार, अनैतिकता और साँठगाँठ से ही कमाई थी) पूरी तरह सफ़ेद हो गई, उसका वह जो चाहे उपयोग करे।

कहने का मतलब यह कि हमारी नपुंसक सरकारों ने हमेशा जब-तब यह माना हुआ है कि “भई हमसे तो कुछ नहीं होगा, न तो हम काला पैसा जमा करने वालों के खिलाफ़ कुछ कर पायेंगे, न कभी भी हम बड़े-बड़े सफ़ेदपोश डाकुओं के खिलाफ़ कमर सीधी करके खड़े हो पायेंगे, हमारा काम है सत्ता पाना, भ्रष्टाचार करना और फ़िर चुनाव लड़कर ॠण / आयकर / लोन माफ़ करना…”। कानून का शासन क्या होता है, कांग्रेस कभी जान नहीं पाई न ही कभी उसके इसके लिये गंभीर प्रयास किये। हमेशा नेहरू-नेहरू, गाँधी-गाँधी का ढोल पीटने वाले ये गंदे लोग 1952 के सबसे पहले जीप घोटाले से ही भ्रष्टाचार में सराबोर हैं। इन्हीं की राह पकड़ी भाजपा ने (इसीलिये मैं इसे कांग्रेस की “बी” टीम कहता हूँ)।

मध्यप्रदेश सरकार में सबसे पहले अर्जुनसिंह ने झुग्गी-झोंपड़ियों को पट्टे प्रदान किये थे, यानी जो व्यक्ति जिस जमीन पर फ़िलहाल रहता है, वह उसकी हो गई, यानी सरकार ने मान लिया था, कि हममें तो अतिक्रमण हटाने की हिम्मत नहीं है, इसलिये जो गंद यहाँ-वहाँ बिखरी पड़ी है और भू-माफ़िया (जो हमें चन्दे देता है) चाहे तो सारी जमीन हड़प कर ले। इस महान(?) नीति का फ़ायदा यह हुआ कि रातोंरात लोगों ने हजारों की संख्या में झुग्गियाँ तान दीं, जिसे भू-माफ़िया का संरक्षण हासिल रहा, और बाद में उन्हें वहाँ से भगाकर कालोनियाँ काट दी गईं… अगला नम्बर था भाजपा के सुन्दरलाल पटवा का, सत्ता पाने के लिये उन्होंने सहकारी बैंकों से लिये गये किसानों के दस हजार तक के ॠण माफ़ कर दिये, आज दस साल बाद भी सहकारी बैंक उस झटके से नहीं उबर पाये हैं और यह नवीनतम जोर का झटका भी सबसे ज्यादा सहकारी बैंकों को ही झेलना पड़ेगा। गाँवों में किसान बैंक अधिकारियों से अभी से कहने लगे हैं कि “कैसी वसूली, काहे का पैसा, दिल्ली सरकार ने सब माफ़ कर दिया, वापस भाग जाओ…”। सिर धुन रहा है बेचारा वह किसान जिसने लोकलाज के चलते अपना कर्जा चुका दिया।

सभी जानते हैं कि इस प्रकार की कर्जमाफ़ी या आयकर / कालेधन में छूट का फ़ायदा सिर्फ़ और सिर्फ़ चोरों को ही मिलता है, ईमानदारी से कर्ज चुकाने वाला या आयकर चुकाने वाला इसमें ठगा हुआ महसूस करता है, वह भी सोचने पर मजबूर हो जाता है कि अब मैं भी क्यों कर्ज चुकाऊँ? क्यों न मैं भी बिजली चोरी करूँ, आखिर अन्त में सरकार को यह सब माफ़ करना ही है। सबसे ज्यादा गुस्सा उस नौकरीपेशा व्यक्ति को आता है, उसका टैक्स तो तनख्वाह में से ही काट लिया जाता है।

इसलिये देश-विदेशों में बसे भाईयों और बहनों… भारत में तमाम सरकारों का संदेश स्पष्ट है, कि “हम नालायक, निकम्मे और नपुंसक हैं, कर चोरी करने वालों के खिलाफ़ हम कुछ नहीं कर पायेंगे तो माफ़ कर देंगे, बिजली चोरी हमसे नहीं रुकेगी तो बिल माफ़ कर देंगे, अतिक्रमण हमसे नहीं रुकेगा तो “सीलिंग एक्ट” के बारे में सर्वोच्च न्यायालय में हम बेशर्म बन जायेंगे, एक लाख से ज्यादा किसानों की आत्महत्या के बाद चुनाव जीतने के लिये कर्जमाफ़ी देंगे, आतंकवाद या नक्सलवाद को रोकना हमारे बस का नहीं है इसलिये हम तो x, y, z सुरक्षा ले लेंगे, तुम मरते फ़िरो सड़कों पर… गरज यह कि हमसे कानून-व्यवस्था के अनुसार कोई काम नहीं होगा… जो भी टैक्स आप चुकाते हैं या जो निवेश आप करते हैं अन्त-पन्त वह किसी न किसी हरामखोर की जेब में ही जायेगा… और यदि आप कर्ज लेकर उसे चुकाते भी हैं तो आप परले दर्जे के महामूर्ख हैं…


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American Sub Prime Crisis Indian Economy

जी, मैं कोई मजाक नहीं कर रहा। हालांकि मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ, लेकिन “अमेरिकी रिसेशन” (बाजारों की मंदी) नाम का भूत जब सारी दुनिया को डराता हुआ घूम रहा है, उसके पीछे यही चार्वाक नीति काम कर रही है। अमेरिकी बैंकों और वित्तीय संस्थाओं ने ज्यादा कमाई और ब्याज के लालच में ऐसे-ऐसे लोगों को भी ॠण बाँट दिये जिनकी औकात उतनी थी नहीं, यही है अमेरिकी सब-प्राइम संकट, सरल भाषा में। मंदी छाई हुई है अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर, लेकिन घिग्घी बंधी हुई है हमारी और हमारे शेयर बाजारों की। ऐसा क्यों होता है?

“बचत करना पाप है, खर्च करना गुण है…” एक महान अर्थशास्त्री का यह बयान अमेरिका पर कितना सटीक बैठता है, आइये देखते हैं। आमतौर पर मान्यता है कि जापानी व्यक्ति बेहद कंजूस होता है और बचत में अधिक विश्वास करता है। जापानी अधिक खर्च नहीं करते, जापान की वार्षिक बचत लगभग सौ अरब है, फ़िर भी जापानी अर्थव्यवस्था कमजोर मानी जाती है। दूसरी ओर अमेरिकी खर्चते ज्यादा हैं, बचाते कम हैं, यहाँ तक कि अमेरिका निर्यात से अधिक आयात करता है, उसका व्यापार घाटा चार सौ अरब को पार कर चुका है। फ़िर भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत मानी जाती है और सारी दुनिया उसकी सेहत के लिये फ़िक्रमन्द रहती है।

अब सवाल उठता है कि अमेरिकी लोग खर्च करने के लिये इतना पैसा लाते कहाँ से हैं? असल में वे उधार लेते हैं, जापान से, चीन से, भारत से और भी वहाँ से जहाँ के लोग बचत करते हैं। बाकी सारे देश बचत करते हैं, ताकि अमेरिका उसे खर्च कर सके, क्योंकि लगभग सारे देश अपनी बचत डॉलर या सोने में करते हैं। अकेले भारत ने ही अपनी विदेशी मुद्रा को लगभग 50 अरब डालर की अमेरिकी प्रतिभूतियों में सुरक्षित रखा हुआ है, चीन का आँकड़ा 160 अरब डॉलर का है। अमेरिका ने पूरे विश्व से पाँच खरब डॉलर लिये हुए हैं, इसलिये जैसे-जैसे बाकी का विश्व बचत करता जाता है, अमेरिकी उतनी ही उन्मुक्तता से खर्च करते जाते हैं। चीन ने जितना अमेरिका में निवेश किया हुआ है उसका आधा भी अमेरिका ने चीन में नहीं किया, यही बात भारत के साथ भी है, हमने अमेरिका में लगभग 50 अरब डॉलर निवेश किया है, जबकि अमेरिका ने भारत में 20 अरब डॉलर।

फ़िर सारी दुनिया अमेरिका के पीछे क्यों भाग रही है? इसका रहस्य है अमेरिकियों की खर्च करने की प्रवृत्ति। वे लोग अपने क्रेडिट कार्डों से भी बेतहाशा खर्च करते हैं, जो कि उनकी भविष्य की आमदनी है, इसीलिये अमेरिका निर्यात कम करता है, आयात अधिक करता है, नतीजा – सारा विश्व अपने विकास के लिये अमेरिका के खर्चों पर निर्भर होता है। यह ठीक इस प्रकार है कि जैसे कोई दुकानदार किसी ग्राहक को उधार देता रहता है ताकि वह उसका ग्राहक बना रहे, क्योंकि यदि ग्राहक खरीदना बन्द कर देगा तो दुकानदार का धंधा कैसे चलेगा? इस प्रकार यह चक्र चलता रहता है और उधारी बढ़ती जाती है, इसमें ग्राहक तो उपभोग करके मजे लूटता रहता है, लेकिन दुकानदार उसके लिये मेहनत करता जाता है।

अमेरिकियों के लिये सबसे बड़ा दुकानदार है जापान। जब तक जापानी खर्च करना प्रारम्भ नहीं करते वे विकास नहीं कर सकते। जापान सरकार ने बचतों पर भी टैक्स लगाना शुरु कर दिया है, लेकिन फ़िर भी वहाँ सिर्फ़ पोस्ट ऑफ़िसों की बचत लगभग एक खरब डॉलर है, यानी भारत की अर्थव्यवस्था का तीन गुना।

सभी प्रमुख अर्थशास्त्री यह मानते हैं कि जब तक किसी देश के लोग खर्च करना प्रारम्भ नहीं करते, देश तरक्की नहीं कर सकता, और सिर्फ़ खर्च नहीं करना है, बल्कि उधार ले-लेकर खर्च करना है। अमेरिका में बसे भारतीय अर्थशास्त्री डॉ जगदीश भगवती ने एक बार मनमोहन सिंह से कहा था कि भारतीय लोग खामख्वाह बचत करते हैं, भारत के लोगों को विदेशी कारों, मोबाइल, परफ़्यूम, कॉस्मेटिक्स पर खर्च करने की प्रवृत्ति बढ़ानी होगी, इससे भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ेगी। सरकार ने इस दिशा में काम करते हुए पिछले एक दशक में जमा पूँजी पर ब्याज दरों को क्रमशः कम किया है, और वह दिन दूर नहीं जब आपकी जमापूँजी सुरक्षित रखने के लिये बैंके उलटे आपसे पैसा लेने लगेंगी। सरकार चाहती है कि हर भारतीय खर्चा करता रहे, अपना पैसा शेयर मार्केट में लगाकर सटोरिया बन जाये। ईपीएफ़ के पैसों को भी बाजार में झोंकने की पूरी तैयारी है।

अब आप सोच रहे होंगे कि दुकानदार-ग्राहक वाली थ्योरी कैसे काम करेगी, क्योंकि जब कर्जा लिया है तो कुछ तो लौटाना ही होगा, यह तो हो नहीं सकता कि दुकानदार देता ही रहे। होता यह है कि जब अमेरिका को किसी देश का कर्ज उतारना होता है तो वह उसे हथियार बेचता है, बम बेचता है, F-16 हवाई जहाज बेचता है, दो बेवकूफ़ देशों को आपस में लड़वाकर पहले तो दोनों को हथियार बेचता है, फ़िर एक पर कब्जा करके उसका तेल अंटी करता है, ताकि अमेरिकियों की कारें लगातार चलती रहें… अंकल सैम की खुशहाली का यही राज है “जमकर खर्च करो…”। बचत करने के लिये और आपस में लड़कर उनका हथियारों का धंधा जारी रखने के लिये दुनिया में कई मूर्ख मौजूद हैं…


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Mid Day Meal Scheme ISKCON Ujjain
केन्द्र और राज्य सरकारों की मिलीजुली महती योजना है मध्यान्ह भोजन योजना। जैसा कि सभी जानते हैं कि इस योजना के तहत सरकारी प्राथमिक शालाओं में बच्चों को मध्यान्ह भोजन दिया जाता है, ताकि गरीब बच्चे पढ़ाई की ओर आकर्षित हों और उनके मजदूर / मेहनतकश/ ठेले-रेहड़ी वाले/ अन्य छोटे धंधों आदि में लगे माँ-बाप उनके दोपहर के भोजन की चिंता से मुक्त हो सकें। इस योजना के गुणदोषों पर अलग से चर्चा की जा सकती है क्योंकि इस योजना में कई तरह का भ्रष्टाचार और अनियमिततायें हैं, जैसी कि भारत की हर योजना में हैं। फ़िलहाल बात दूसरी है…

जाहिर है कि उज्जैन में भी यह योजना चल रही है। यहाँ इस सम्पूर्ण जिले का मध्यान्ह भोजन का ठेका “इस्कॉन” को दिया गया है। “इस्कॉन” यानी अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ को जिले के सभी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन (रोटी-सब्जी-दाल) बनाने और पहुँचाने का काम दिया गया है। इसके अनुसार इस्कॉन सुबह अपनी गाड़ियों से शासकीय स्कूलों में खाना पहुँचाता है, जिसे बच्चे खाते हैं। चूँकि काम काफ़ी बड़ा है इसलिये इस हेतु जर्मनी से उन्होंने रोटी बनाने की विशेष मशीन बुलवाई है, जो एक घंटे में 10,000 रोटियाँ बना सकती है। (फ़िलहाल इस मशीन से 170 स्कूलों हेतु 28,000 बच्चों का भोजन बनाया जा रहा है) (देखें चित्र)

जबसे इस मध्यान्ह भोजन योजना को इस्कॉन को सौंपा गया है, तभी से स्थानीय नेताओं, सरपंचों और स्कूलों के पालक-शिक्षक संघ के कई चमचेनुमा नेताओं की भौंहें तनी हुई हैं, उन्हें यह बिलकुल पसन्द नहीं आया है कि इस काम में उन्हें “कुछ भी नहीं” मिल रहा। इस काम को खुले ठेके के जरिये दिया गया था जिसमें जाहिर है कि “इस्कॉन” का भाव सबसे कम था (दो रुपये साठ पैसे प्रति बच्चा)। हालांकि इस्कॉन वाले इतने सक्षम हैं और उनके पास इतना विदेशी चन्दा आता है कि ये काम वे मुफ़्त में भी कर सकते थे (इस्कॉन की चालबाजियों और अनियमितताओं पर एक लेख बाद में दूँगा)। अब यदि मान लिया जाये कि दो रुपये साठ पैसे प्रति बच्चे के भाव पर इस्कॉन जिले भर के शासकीय स्कूलों में रोटी-सब्जी “नो प्रॉफ़िट-नो लॉस” के स्तर पर भी देता है (हालांकि इस महंगाई के जमाने में यह बात मानने लायक नहीं है), तो विचार कीजिये कि बाकी के जिलों और तहसीलों में चलने वाली इस मध्यान्ह भोजन योजना में ठेकेदार (जो कि प्रति बच्चा चार-पाँच रुपये के भाव से ठेका लेता है) कितना कमाता होगा? कमाता तो होगा ही, तभी वह यह काम करने में “इंटरेस्टेड” है, और उसे यह कमाई तब करनी है, जबकि इस ठेके को लेने के लिये उसे जिला पंचायत, सरपंच, स्कूलों के प्रधानाध्यापक, पालक-शिक्षक संघ के अध्यक्ष और यदि बड़े स्तर का ठेका हुआ तो जिला शिक्षा अधिकारी तक को पैसा खिलाना पड़ता है। जाहिर सी बात है कि इस्कॉन को यह ठेका मिलने से कईयों के “पेट पर लात” पड़ गई है (हालांकि सबसे निरीह प्राणी यानी पढ़ाने वाले शिक्षक इससे बहुत खुश हैं, क्योंकि उनकी मगजमारी खत्म हो गई है), और इसीलिये इस योजना में शुरु से ही “टाँग अड़ाने” वाले कई तत्व पनपे हैं। मामले को ठीक से समझने के लिये लेख का यह विस्तार जरूरी था।

“टाँग अड़ाना”, “टाँग खींचना” आदि भारत के राष्ट्रीय “गुण” हैं। उज्जैन की इस मध्यान्ह भोजन योजना में सबसे पहले आरोप लगाया गया कि इस्कॉन इस योजना को चलाने में सक्षम नहीं है, फ़िर जब इस्कॉन ने इस काम के लिये एक स्थान तय किया और वहाँ शेड लगाकर काम शुरु किया तो जमीन के स्वामित्व और शासन द्वारा सही/गलत भूमि दिये जाने को लेकर बवाल मचा दिया गया। जैसे-तैसे इससे निपट कर इस्कॉन ने काम शुरु किया, 10000 रोटियाँ प्रति घंटे बनाने की मशीन मंगवाई तो “भाई लोगों” ने रोटी की गुणवत्ता पर तमाम सवाल उठाये। बयानबाजियाँ हुई, अखबार रंगे गये, कहा गया कि रोटियाँ मोटी हैं, अधपकी हैं, बच्चे इसे खा नहीं सकते, बीमार पड़ जायेंगे आदि-आदि। अन्ततः कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी को खुद वहाँ जाकर रोटियों की गुणवत्ता की जाँच करनी पड़ी, न कुछ गड़बड़ी निकलना थी, न ही निकली (इस्कॉन वालों की सेटिंग भी काफ़ी तगड़ी है, और काफ़ी ऊपर तक है, ये छुटभैये नेता कहाँ लगते उसके आगे)। लेकिन ताजा आरोप (वैसे तो आरोप काफ़ी पुराना है) ज्यादा गंभीर रूप लिये हुए है, क्योंकि इसमें “धर्म” का घालमेल भी कर दिया गया है।

असल में शुरु से ही शासकीय मदद प्राप्त मदरसों ने मध्यान्ह भोजन योजना से भोजन लेने से मना कर दिया था। “उनके दिमाग में किसी ने यह भर दिया था” कि इस्कॉन में बनने वाले रोटी-सब्जी में गंगाजल और गोमूत्र मिलाया जाता है और फ़िर उस भोजन को भगवान को भोग लगाकर सभी दूर भिजवाया जाता है। काजियों और मुल्लाओं द्वारा विरोध करने के लिये “गोमूत्र” और “भगवान को भोग” नाम के दो शब्द ही काफ़ी थे, उन्होंने “धर्म भ्रष्ट होने” का आरोप लगाते हुए मध्यान्ह भोजन का बहिष्कार कर रखा था। इससे मदरसों में पढ़ने वाले गरीब बच्चे उस स्वादिष्ट भोजन से महरूम हो गये थे। कहा गया कि मन्दिर में पका हुआ और गंगाजल मिलाया हुआ भोजन अपवित्र होता है, इसलिये मदरसों में मुसलमानों को यह भोजन नहीं दिया जा सकता (जानता हूँ कि कई पाठक मन ही मन गालियाँ निकाल रहे होंगे)। कलेक्टर और इस्कॉन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने मदरसों में जाकर स्थिति स्पष्ट करने की असफ़ल कोशिश भी की, लेकिन वे नहीं माने। इस तथाकथित अपवित्र भोजन की शिकायत सीधे मानव संसाधन मंत्रालय को कर दी गई। तुरत-फ़ुरत अर्जुनसिंह साहब ने एक विशेष अधिकारी “श्री हलीम खान” को उज्जैन भेजा ताकि वे इस्कॉन में बनते हुए भोजन को खुद बनते हुए देखें, उसे चखें और शहर काजी तथा मदरसों के संचालकों को “शुद्ध उर्दू में” समझायें कि यह भोजन “ऐसा-वैसा” नहीं है, न ही इसमें गंगाजल मिला हुआ है, न ही गोमूत्र, रही बात भगवान को भोग लगाने की तो उससे धर्म भ्रष्ट नहीं होता और सिर्फ़ इस कारण से बेचारे गरीब मुसलमान बच्चों को इससे दूर न रखा जाये। काजी साहब ने कहा है कि वे एक विशेषाधिकार समिति के सामने यह मामला रखेंगे (जबकि भोजन निरीक्षण के दौरान वे खुद भी मौजूद थे) और फ़िर सोचकर बतायेंगे कि यह भोजन मदरसे में लिया जाये कि नहीं। वैसे इस योजना की सफ़लता और भोजन के स्वाद को देखते हुए पास के देवास जिले ने भी इस्कॉन से आग्रह किया है कि अगले वर्ष से उस जिले को भी इसमें शामिल किया जाये।

वैसे तो सारा मामला खुद ही अपनी दास्तान बयाँ करता है, इस पर मुझे अलग से कोई कड़ी टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन फ़िर भी यदि मध्यान्ह भोजन योजना में हो रहे भ्रष्टाचार और इसके विरोध हेतु धर्म का सहारा लेने पर यदि आपको कुछ कहना हो तो कहें…


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Rahul Gandhi Orissa Visit Security Threat
“राजकुमार” आजकल भारत खोज अभियान पर निकले हुए हैं, उन्हें असली भारत खोजना है (शायद उन्होंने अपने परनाना की पुस्तक नहीं पढ़ी होगी)। चुनावी वर्ष में इस भारत को खोजने की शुरुआत उन्होंने उड़ीसा के कालाहांडी से की है। अब दिल्ली में बैठकर उन्हें कालाहांडी के बारे में कैसे पता चलता, न तो उनके पास संचार की कोई व्यवस्था है, न ही कांग्रेस के कार्यकर्ता, न ही पुस्तकें, न ही पत्रकार… सो राहुल बाबा ने उड़ीसा सरकार के लाखों रुपये खर्च करवाने की ठान ही ली। जैसा “स्टंट” उन्होंने बुंदेलखंड में एक दलित के यहाँ खाना खाकर और रात बिताकर किया था, कुछ-कुछ वैसा ही “स्टंट” उन्होंने उड़ीसा की यात्रा के दौरान भी करने की कोशिश की, ये और बात है कि उनके इस स्टंट की देश को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती थी। राहुल गाँधी की इस कलरफ़ुल यात्रा का अन्त एकदम रंगहीन रहा, न तो उन्होंने इन जिलों के बारे में कोई ठोस योजना पेश की, न ही उनके श्रीमुख से कोई खास उदगार फ़ूटे, हाँ लेकिन अपनी खास हरकतों से उन्होंने सुरक्षा अधिकारियों और केन्द्रीय सुरक्षा एजेंसियों की नींद जरूर उड़ा दी थी (और ऐसा उन्होंने पहली बार नहीं किया है)।

उड़ीसा की यात्रा के दौरान राहुल ने स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा अधिकारियों को खासा परेशान रखा। राहुल गाँधी एक बार देर रात को अज्ञात स्थान पर भी गये और उन्होंने स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना तक नहीं दी। अपनी बहरामपुर यात्रा के दौरान राहुल कंकिया नाम के गाँव गये, जो कि गोपालपुर कस्बे से 30 किमी दूर है। उनके साथ एक मिशनरी एनजीओ अधिकारी और सिर्फ़ दो सुरक्षा गार्ड थे। वह उस एनजीओ के दफ़्तर में लगभग रात 10 बजे गये और कुछ घंटे उन्होंने वहाँ बिताये। उसके बाद वे पास ही के एक रहवासी स्कूल में भी गये और वहाँ उन्होंने कुछ चॉकलेट बाँटे। वह एनजीओ एक प्रसिद्ध ईसाई मिशनरी का हिस्सा है और वह सक्रिय रूप से उड़ीसा के दक्षिणी जिलों में खुलकर धर्मान्तरण में लगा हुआ है। राहुल गाँधी ने उस एनजीओ को जितना वक्त दिया उतना वक्त तो उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को भी नहीं दिया। राहुल गाँधी अलसुबह अपने कैम्प में लौटे, जब उनके कार्यकर्ता उन्हें खोजने निकल पड़े थे।

गायब होने का कुछ ऐसा ही स्टंट उन्होंने कोरापुट जिले के दौरे में भी किया, जहाँ उनका स्वागत एक धार्मिक संस्था (जाहिर है कि ईसाई) ने बड़े जोरशोर से किया। यहाँ भी वे सिर्फ़ चार सुरक्षाकर्मियों को साथ लेकर उस संस्था में गये, और स्थानीय प्रशासन को खबर तक नहीं की। राहुल गाँधी ने स्थानीय पुलिस का पायलट वाहन लेने से भी इंकार कर दिया और यहाँ तक कि उन्होंने कोरापुट के एसपी को भी अपने पीछे आने से मना कर दिया, जबकि वे जानते थे कि यह एक खतरनाक नक्सली इलाका है। बेहरामपुर की घटना के बारे में गंजम जिले के एसपी ने स्वीकार किया कि राहुल अपने तय कार्यक्रम से हटकर किसी अज्ञात स्थान पर गये थे, लेकिन इसके बारे में विस्तार से कुछ नहीं बताया।

इस घटना का उल्लेख विधानसभा में बीजद के विधायक कल्पतरु दास ने 11 मार्च को विशेष नोटिस के जरिये उठाया, उन्होंने आरोप लगाया राहुल गाँधी की यह आधी रात की यात्रा पहले से तय थी, एक रिटायर्ड आईपीएस पंकज कुमार गुप्ता, जो कि राजीव गाँधी फ़ाउंडेशन का काम भी देखते हैं, वह राहुल को कहीं ले गये थे और जानबूझकर स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना नहीं दी गई। उनका यह भी कहना है कि राहुल गाँधी अपनी माँ के कहने पर ही उस खास मिशनरी में गुप्त रूप से गये और धर्मांतरण के काम की जानकारी ली। चलो मान भी लिया जाये कि ये बाद वाला आरोप सिर्फ़ राजनैतिक आरोप है, लेकिन यह सच्चाई तो फ़िर भी अपनी जगह है कि घने जंगलों वाले इस इलाके में नक्सली बेहद सक्रिय हैं। नक्सलियों का आंतरिक नेटवर्क भी काफ़ी मजबूत है, यदि राहुल गाँधी की इस कथित गुप्त यात्रा की खबर उन्हें लग जाती और वे कोई अनर्थ कर बैठते, या तो बारूदी सुरंग बिछाते या अपहरण कर लेते, तो क्या होता? क्या तब राज्य की बीजद-भाजपा सरकार के माथे पर ठीकरा नहीं फ़ोड़ा जाता? कि उन्होंने राजकुमार की सुरक्षा ठीक से नहीं की। क्या 39 वर्ष की आयु में भी वे इतने अनजान हैं कि यदि उनकी हत्या हो जाती है तो इसके देश की जनता पर क्या तात्कालिक परिणाम हो सकते हैं? वह इतनी गैरजिम्मेदाराना हरकत कैसे कर सकते हैं, जिससे खुद उनको तो खतरा हो ही सकता है, लेकिन अन्य कई लोगों की नौकरी भी खतरे में पड़ सकती है।

राहुल गाँधी का कहना है कि वे इन आदिवासी क्षेत्रों की जमीनी हकीकत जानने के लिये उत्सुक हैं और वे इन क्षेत्रों का दौरा करके कुछ वनवासियों के जीवन को नजदीक से देखकर “प्रैक्टिकल नॉलेज” ग्रहण करना चाहते हैं। कितनी हास्यास्पद बात है ना !! कोरापुट-बोलांगीर-कालाहांडी के बारे में मैं राहुल गाँधी से ज्यादा जानता हूँ, जबकि मैं कभी उड़ीसा नहीं गया। राहुल बाबा शायद नही जानते कि आजादी के बाद उड़ीसा में कांग्रेस ने चालीस साल तक राज किया ? वे नहीं जानते कि ये तीन जिले राज्य के कुल भूभाग का 20 प्रतिशत हैं ? वे यह भी नहीं जानते कि घने जंगलों, प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर, बेशकीमती खनिजों से भरपूर इन तीन जिलों में राज्य के कुल 24 प्रतिशत गरीब रहते हैं? वे नहीं जानते कि विश्व मीडिया में भुखमरी का उदाहरण देने की शुरुआत कालाहांडी से ही होती है? आखिर राजकुमार क्या जानना चाहते हैं? चार साल के अपने कार्यकाल में संसद में सिर्फ़ दो बार मुँह खोलने वाले राहुल बाबा चमचों से बचने के लिये क्या करने वाले हैं? सिर्फ़ संसद में मम्मी के पीछे बैठने से कुछ नहीं होगा। वे अपना दृष्टिकोण और विचार भी तो मीडिया को स्पष्ट करें। जिस तरह से उनकी मम्मी मीडिया को एक “पैरपोंछ” समझती हैं, कहीं वे भी तो उसी मानसिकता से ग्रस्त नहीं हैं?

यदि धर्मान्तरण के आरोपों को एक तरफ़ रख भी दिया जाये, तो भी राहुल गाँधी का इस प्रकार सुरक्षा व्यवस्था को धोखा देकर गायब हो जाना, मनचाहे “स्टंट” दिखाना, गुपचुप मुलाकातें करना, क्या दर्शाता है? हीरोगिरी, अपरिपक्वता, गैरजिम्मेदाराना हरकत, लापरवाही या सामंती मानसिकता? आप बतायें…


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सन्दर्भ : देबाशीष त्रिपाठी, ऑर्गेनाइजर (भुवनेश्वर)
Foreign Investment Indian Media Groups
भारत में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के मालिक कौन हैं? हाल ही में एक-दो ई-मेल के जरिये इस बात की जानकारी मिली लेकिन नेट पर सर्च करके देखने पर कुछ खास हाथ नहीं लग पाया (हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है, यह तो मीडिया वाले ही बता सकते हैं) कि भारत के कई मीडिया समूहों के असली मालिक कौन-कौन हैं?

हाल की कुछ घटनाओं के मीडिया कवरेज को देखने पर साफ़ पता चलता है कि कतिपय मीडिया ग्रुप एक पार्टी विशेष (भाजपा) के खिलाफ़ लगातार मोर्चा खोले हुए हैं, गुजरात चुनाव और चुनावों के पूर्व की रिपोर्टिंग इसका बेहतरीन नमूना रहे। इससे शंका उत्पन्न होती है कि कहीं हमारा मीडिया और विख्यात मीडियाकर्मी किन्हीं “खास” हाथों में तो नहीं खेल रहे? भारत में मुख्यतः कई मीडिया और समाचार समूह काम कर रहे हैं, जिनमें प्रमुख हैं – टाइम्स ऑफ़ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दू, आनन्दबाजार पत्रिका, ईनाडु, मलयाला मनोरमा, मातृभूमि, सहारा, भास्कर और दैनिक जागरण समूह। अन्य कई छोटे समाचार पत्र समूह भी हैं। आईये देखें कि अपुष्ट और गुपचुप खबरें क्या कहती हैं…

समाचार चैनलों में एक लोकप्रिय चैनल है NDTV, जिसका आर्थिक फ़ंडिंग स्पेन के “गोस्पेल ऑफ़ चैरिटी” से किया जाता है। यह चैनल भाजपा का खासमखास विरोधी है। इस चैनल में अचानक “पाकिस्तान प्रेम” जाग गया है, क्योंकि मुशर्रफ़ ने इस एकमात्र चैनल को पाकिस्तान में प्रसारण की इजाजत दी। इस चैनल के सीईओ प्रणय रॉय, कम्युनिस्ट पार्टी के कर्ता-धर्ता प्रकाश करात और वृन्दा करात के रिश्तेदार हैं। सुना गया है कि इंडिया टुडे को भी NDTV ने खरीद लिया है, और वह भी अब भाजपा को गरियाने लग पड़ा है। एक और चैनल है CNN-IBN, इसे “सदर्न बैप्टिस्ट चर्च” के द्वारा सौ प्रतिशत की आर्थिक मदद दी जाती है। इस चर्च का मुख्यालय अमेरिका में है और दुनिया में इसके प्रचार हेतु कुल बजट 800 मिलियन डॉलर है। भारत में इसके कर्ताधर्ता राजदीप सरदेसाई और उनकी पत्नी सागरिका घोष हैं। गुजरात चुनावों के दौरान नरेन्द्र मोदी और हिन्दुओं को लगातार गाली देने और उनकी छवि बिगाड़ने का काम बड़ी ही “स्वामिभक्ति” से इन चैनलों ने किया। गुजरात के दंगों के दौरान जब राजदीप और बरखा दत्त स्टार टीवी के लिये काम कर रहे थे, तब उन्होंने सिर्फ़ मुसलमानों के जलते घर दिखाये और मुसलमानों पर हुए अत्याचार की कहानियाँ ही सुनाईं, किसी भी हिन्दू परिवार का इंटरव्यू नहीं लिया गया, मानो उन दंगों में हिन्दुओं को कुछ हुआ ही न हो।

टाइम्स समूह “बेनेट कोलमेन” द्वारा संचालित होता है। “वर्ल्ड क्रिश्चियन काउंसिल” इसका 80% खर्चा उठाती है, एक अंग्रेज और एक इतालवी रोबर्टियो मिन्डो इसके 20% शेयरों के मालिक हैं। यह इतालवी व्यक्ति सोनिया गाँधी का नजदीकी भी बताया जाता है। स्टार टीवी तो खैर है ही ऑस्ट्रेलिया के उद्योगपति का और जिसका एक बड़ा आका है सेंट पीटर्स पोंटिफ़िशियल चर्च मेलबोर्न। 125 वर्ष पुराना दक्षिण के एक प्रमुख समाचार समूह “द हिन्दू” को अब जोशुआ सोसायटी, बर्न्स स्विट्जरलैण्ड ने खरीद लिया है। इसके कर्ताधर्ता एन.राम की पत्नी स्विस नागरिक भी हैं। दक्षिण का एक तेलुगु अखबार “आंध्र ज्योति” को हैदराबाद की मुस्लिम पार्टी “एम-आई-एम” और एक कांग्रेसी सांसद ने मिलकर खरीद लिया है। “द स्टेट्समैन” समूह को कम्युनिस्ट पार्टी संचालित करती है, और “कैराल टीवी” को भी। “मातृभूमि” समूह में मुस्लिम लीग के नेताओं का पैसा लगा हुआ है। “एशियन एज” और “डेक्कन क्रॉनिकल” में सऊदी अरब का भारी पैसा लगा हुआ है। जैसा कि मैने पहले भी कहा कि हालांकि ये खबरें सच हैं या नहीं इसका पता करना बेहद मुश्किल है, क्योंकि जिस देश में सरकार को यह तक पता नहीं लगता कि किसी एनजीओ को कुल कितनी मदद विदेश से मिली, वहाँ किसी समाचार पत्र के असली मालिक या फ़ाइनेन्सर का पता लगाना तो बहुत दूर की बात है। अधिग्रहण, विलय, हिस्सेदारी आदि के जमाने में अन्दर ही अन्दर बड़े समाचार समूहों के लाखों-करोड़ों के लेन-देन हुए हैं। ये खबरें काफ़ी समय से इंटरनेट पर मौजूद हैं, हवा में कानोंकान तैरती रही हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कि आपके मुहल्ले का दादा कौन है ये आप जानते हैं लेकिन लोकल थानेदार जानते हुए भी नहीं जानता। अब ये पता लगाना शौकिया लोगों का काम है कि इन खबरों में कितनी सच्चाई है, क्योंकि कोई खोजी पत्रकार तो ये करने से रहा। लेकिन यदि इसमें जरा भी सच्चाई है तो फ़िर ब्लॉग जगत का भविष्य उज्जवल लगता है।

ऐसे में कुल मिलाकर तीन समूह बचते हैं, पहला “ईनाडु” जिसके मालिक हैं रामोजी राव, “भास्कर” समूह जिसके मालिक हैं रमेशचन्द्र अग्रवाल और तीसरा है “जागरण” समूह। ये तीन बड़े समूह ही फ़िलहाल भारतीय हाथों में हैं, लेकिन बदलते वक्त और सरकार की मीडिया क्षेत्र को पूरी तरह से विदेशियों के लिये खोलने की मंशा को देखते हुए, कब तक रहेंगे कहना मुश्किल है। लेकिन एक बात तो तय है कि जो भी मीडिया का मालिक होता है, वह अपनी राजनैतिक विचारधारा थोपने की पूरी कोशिश करता है, इस हिसाब से भाजपा के लिये आने वाला समय मुश्किलों भरा हो सकता है, क्योंकि उसे समर्थन करने वाले “पाञ्चजन्य” (जो कि खुद संघ का मुखपत्र है) जैसे इक्का-दुक्का अखबार ही बचे हैं, बाकी सब तो विरोध में ही हैं।

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Indian Postal Stamps on Celebrities
केन्द्र सरकार के एक बयान के अनुसार सरकार जीवित व्यक्तियों पर भी डाक टिकट निकालने का विचार कर रही है। संचार मंत्री के अनुसार देश की विशिष्ट हस्तियों पर डाक टिकट छापने के लिये एक समिति इस बात का विचार कर रही है। सरकार ने जो दो-चार नाम गिनाये हैं उसके अनुसार शाहरुख खान, सचिन तेंडुलकर, सानिया मिर्जा आदि के चित्रों वाले डाक टिकट जारी किये जाने की योजना है।

हमारे देश में कुछ न कुछ नया अजूबा करने-दिखाने की हमेशा होड़ लगी रहती है। यह कथित नायाब विचार भी इसी “खुजली” का एक नमूना है। सबसे पहली बात तो यह है कि पहले से ही कई मरे हुए व्यक्तियों, प्रकृति, पशु-पक्षी, स्मारक आदि पर डाक टिकट जारी हो चुके हैं, फ़िर ये नया शिगूफ़ा कि “जीवित व्यक्तियों पर भी डाक टिकट” जारी किये जायेंगे, की कोई तुक नहीं है। जिस देश में इतनी मतभिन्नता हो, जहाँ “महान” माने जाने के इतने अलग-अलग पैमाने हों, जहाँ हरेक मरे हुए नेताओं तक की इज्जत नहीं होती हो, कई मरे हुए नेताओं को लोग आज भी खुलेआम गालियाँ देते हों, ऐसे में जीवित व्यक्तियों पर डाक टिकट जारी करना नितांत मूर्खता है, और जरूरत भी क्या है? क्या पहले से मरे हुए व्यक्ति कम पड़ रहे हैं, क्या विभिन्न जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, फ़ूल-पत्तियाँ आदि कम हैं जो नये-नये विवाद पैदा करने का रास्ता बना रहे हो? सरकार खुद ही सोचे, क्या शाहरुख सर्वमान्य हैं? क्या समूचा भारत उन्हें पसन्द करता है? और सबसे बड़ी बात तो यह कि डाक टिकट जारी करने का पैमाना क्या होगा? किस आधार पर यह तय किया जायेगा कि फ़लाँ व्यक्तित्व पर डाक टिकट जारी करना चाहिये? क्या डाक टिकट पर शाहरुख को सिगरेट पीते दिखाया जायेगा? या सचिन कोका-कोला की बोतल के साथ डाक टिकट पर दिखेंगे? सौ बात की एक बात तो यही है कि ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी है? क्या मरे हुए और पुराने “सिम्बॉल” कम पड़ रहे हैं, जो जीवितों के पीछे पड़े हो? या कहीं सरकार भी हमारे “न्यूड” (न्यूज) चैनलों की तरह सोचने लगी है कि धोनी, राखी सावन्त आदि पर डाक टिकट जारी करके वह डाक विभाग को घाटे से उबार लेगी? या उसे कोरियर के मुकाबले अधिक लोकप्रिय बना देगी? कोई तो लॉजिक बताना पड़ेगा…

जब एक बार सरकार कोई नीतिगत निर्णय कर लेगी तो सबसे पहले हमारे नेता उसमें कूद पड़ेंगे। इस बात की क्या गारंटी है कि कांग्रेसी चमचे सोनिया गाँधी पर डाक टिकट जारी नहीं करेंगे, फ़िर राहुल गाँधी, फ़िर प्रियंका गाँधी, फ़िर “वर्ल्ड चिल्ड्रन्स डे” के अवसर पर प्रियंका के दोनो बच्चे एक डाक टिकट पर… यानी एक अन्तहीन सिलसिला चल निकलेगा। एक बात और नजर-अन्दाज की जा रही है कि डाक टिकट पर छपे महापुरुषों के वर्तमान में क्या हाल होते हैं। सबसे अधिक खपत महात्मा गाँधी के डाक टिकटों की होती है। गाँधी की तस्वीर वाले उस डाक टिकट को न जाने कहाँ-कहाँ, और न जाने कैसे-कैसे रखा जाता है, थूक लगाई जाती है, रगड़ा जाता है, पोस्ट मास्टर अपनी बीवी का सारा गुस्सा उस पर जोर से ठप्पा लगाकर निकालता है। नोटों पर छपे गाँधी न जाने कैसे-कैसे लोगों के हाथों से गुजरते हैं, महिलाओं द्वारा जाने कहाँ-कहाँ रखे जाते हैं, क्या ये सब अपमानजनक नहीं है? क्या यह जरूरी है कि महापुरुषों का सम्मान नोटों और डाक टिकट पर ही हो? रही प्रेरणा की बात, तो भाई मल्लिका शेरावत पर डाक टिकट छापने से किसको प्रेरणा मिलने वाली है?

जिस देश में नल से पानी लेने की बात पर हत्या हो जाती हो, घूरकर देखने की बात पर अपहरण हो जाते हों, वहाँ जीवित व्यक्तियों पर डाक टिकट जारी करने से विवाद पैदा नहीं होंगे क्या? सोनिया पर डाक टिकट जारी होगा तो नरेन्द्र मोदी पर भी होगा और ज्योति बसु पर भी होगा। सचिन तेंडुलकर पर जारी होगा तो बंगाली कैसे पीछे रहेंगे… सौरव दादा पर भी एक डाक टिकट लो। सानिया मिर्जा पर डाक टिकट निकाला तो बुर्के में फ़ोटो क्यों नहीं छापा? शाहरुख के डाक टिकट की धूम्रपान विरोधियों द्वारा होली जलाई जायेगी। और फ़िर उद्योगपति पीछे रहेंगे क्या? मुकेश अम्बानी की जेब में 150 सांसद हैं तो उनका डाक टिकट जरूर-जरूर जारी होगा, तो विजय माल्या भी अपनी कैलेण्डर गर्ल्स के साथ एक डाक टिकट पर दिखाई देंगे… मतलब एक न खत्म होने वाली श्रृंखला चालू हो जायेगी। हाँ एक बात जरूर है कि सरकार की डाक टिकटों की बिक्री जरूर बढ़ जायेगी, कैसे? भई जब भी कांग्रेसी किसी राज्य से पोस्टकार्ड अभियान चलायेंगे तो सोनिया के टिकटों की माँग एकदम बढ़ जायेगी। बुद्धदेव भट्टाचार्य के मुखड़े वाले डाक टिकट सिंगूर और नंदीग्राम में खूब बिकेंगे। सबसे ज्यादा मजा लेगी आम जनता, जो अपनी-अपनी पसन्द के मुताबिक डाक टिकट के सामने वाले हिस्से में थूक लगायेगी।

यदि मजाक को एक तरफ़ रख दिया जाये, तो कुल मिलाकर सरकार का यह निर्णय बेहद बेतुका, समय खराब करने वाला और नये बखेड़े खड़ा करने वाला है। इसकी बजाय सरकार को ऐसे वीरों पर डाक टिकट जारी करना चाहिये जो निर्विवाद हों (और ऐसा शायद ही कोई मिले)।

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Third Front Communist Inflation Rate
माकपा के हालिया सम्मेलन में प्रकाश करात साहब ने दो चार बातें फ़रमाईं, कि “हम भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिये कुछ भी करेंगे”, कि “तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिशे जारी हैं”, कि “हम बढती महंगाई से चिन्तित हैं”, कि “यूपीए सरकार गरीबों के लिये ठीक से काम नहीं कर रही”, कि ब्ला-ब्ला-ब्ला-ब्ला… उधर भाकपा ने पुनः बर्धन साहब को महासचिव चुन लिया है, और उठते ही उन्होने कहा कि “हम महंगाई के खिलाफ़ देशव्यापी प्रदर्शन करने जा रहे हैं…”

गत 5 वर्षों में सर्वाधिक बार अपनी विश्वसनीयता खोने वाले ये ढोंगी वामपंथी पता नहीं किसे बेवकूफ़ बनाने के लिये इस प्रकार की बकवास करते रहते हैं। क्या महंगाई अचानक एक महीने में बढ़ गई है? क्या दालों और तेल आदि के भाव पिछले एक साल से लगातार नहीं बढ़ रहे? क्या कांग्रेस अचानक ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की खैरख्वाह बन गई है? जिस “कॉमन मिनिमम प्रोग्राम” का ढोल वे लगातार पीटते रहते हैं, उसका उल्लंघन कांग्रेस ने न जाने कितनी बार कर लिया है, क्या लाल झंडे वालों को पता नहीं है? यदि ये सब उन्हें पता नहीं है तो या तो वे बेहद मासूम हैं, या तो वे बेहद शातिर हैं, या फ़िर वे परले दर्जे के मूर्ख हैं। भाजपा के सत्ता में आने का डर दिखाकर कांग्रेस ने वामपंथियों का जमकर शोषण किया है, और खुद वामपंथियों ने “शेर आया, शेर आया…” नाम का भाजपा का हौआ दिमाग में बिठाकर कांग्रेसी मंत्रियों को इस देश को जमकर लूटने का मौका दिया है।

अब जब आम चुनाव सिर पर आन बैठे हैं, केरल और बंगाल में इनके कर्मों का जवाब देने के लिये जनता तत्पर बैठी है, नंदीग्राम और सिंगूर के भूत इनका पीछा नहीं छोड़ रहे, तब इन्हें “तीसरा मोर्चा” नाम की बासी कढ़ी की याद आ गई है। तीसरा मोर्चा का मतलब है, “थकेले”, “हटेले”, “जातिवादी” और क्षेत्रीयतावादी नेताओं का जमावड़ा, एक भानुमति का कुनबा जिसमें कम से कम चार-पाँच प्रधानमंत्री हैं, या बनने की चाहत रखते हैं। एक बात बताइये, तीसरा मोर्चा बनाकर ये नेता क्या हासिल कर लेंगे? वामपंथियों को तो अब दोबारा 60-62 सीटें कभी नहीं मिलने वाली, फ़िर इनका नेता कौन होगा? मुलायमसिंह यादव? वे तो खुद उत्तरप्रदेश में लहूलुहान पड़े हैं। बाकी रहे अब्दुल्ला, नायडू, चौटाला, आदि की तो कोई औकात नहीं है उनके राज्य के बाहर। यानी किसी तरह यदि सभी की जोड़-जाड़ कर 100 सीटें आ जायें, तो फ़िर अन्त-पन्त वे कांग्रेस की गोद में ही जाकर बैठेंगे, भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के नाम पर। क्या मिला? नतीजा वही ढाक के तीन पात। और करात साहब को पाँच साल बाद जाकर यह ज्ञान हासिल हुआ है कि गरीबों के नाम पर चलने वाली योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार हो रहा है, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को छूट देने के कारण महंगाई बढ़ रही है… वाह क्या बात है? लगता है यूपीए की समन्वय समिति की बैठक में सोनिया गाँधी इन्हें मौसम का हाल सुनाती थीं, और बर्धन-येचुरी साहब मनमोहन को चुटकुले सुनाने जाते थे। तीसरे मोर्चे की “बासी कढ़ी में उबाल लाने” का नया फ़ण्डा इनकी खुद की जमीन धसकने से बचाने का एक शिगूफ़ा मात्र है। इनके पाखंड की रही-सही कलई तब खुल गई जब इनके “विदेशी मालिक” यानी चीन ने तिब्बत में नरसंहार शुरु कर दिया। दिन-रात गाजापट्टी-गाजापट्टी, इसराइल-अमेरिका का भजन करने वाले इन नौटंकीबाजों को तिब्बत के नाम पर यकायक साँप सूंघ गया।

इन पाखंडियों से पूछा जाना चाहिये कि –
1) स्टॉक न होने के बावजूद चावल का निर्यात जारी था, चावल निर्यात कम्पनियों ने अरबों के वारे-न्यारे किये, तब क्या ये लोग सो रहे थे?

2) तेलों और दालों में NCDEX और MCX जैसे एक्सचेंजों में खुलेआम सट्टेबाजी चल रही थी जिसके कारण जनता सोयाबीन के तेल में तली गई, तब क्या इनकी आँखों पर पट्टी बँधी थी?

3) आईटीसी, कारगिल, AWB जैसे महाकाय कम्पनियों द्वारा बिस्कुट, पिज्जा के लिये करोड़ों टन का गेंहूं स्टॉक कर लिया गया, और ये लोग नन्दीग्राम-सिंगूर में गरीबों को गोलियों से भून रहे थे, क्यों?

जब सरकार की नीतियों पर तुम्हारा जोर नहीं चलता, सरकार के मंत्री तुम्हें सरेआम ठेंगा दिखाते घूमते हैं, तो फ़िर काहे की समन्वय समिति, काहे का बाहर से मुद्दा आधारित समर्थन? लानत है…। आज अचानक इन्हें महंगाई-महंगाई चारों तरफ़ दिखने लगी है। ये निर्लज्ज लोग महंगाई के खिलाफ़ प्रदर्शन करेंगे? असल में यह आने वाले चुनाव में संभावित जूते खाने का डर है, और अपनी सर्वव्यापी असफ़लता को छुपाने का नया हथकंडा…


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Sachin Pilgaonkar Marathi Films Actor
असल में सचिन का पूरा नाम कई लोग नहीं जानते हैं। उन्हें सिर्फ़ “सचिन” के नाम से जाना जाता रहा है। इसलिये शीर्षक में नाम पढ़कर कई पाठक चौंके होंगे, ये शायद “सचिन” नाम का कुछ जादू है। सचिन तेंडुलकर, सचिन पिलगाँवकर, सचिन खेड़ेकर, सचिन पायलट… बहुत सारे सचिन हैं, हालांकि सचिन तेंडुलकर इन सभी पर अकेले ही भारी पड़ते हैं (वे हैं भी), लेकिन इस लेख में बात हो रही है सचिन पिलगाँवकर की। हिन्दी फ़िल्मों के स्टार और मराठी फ़िल्मों के सुपर स्टार… जी हाँ, ये हैं मासूम चेहरे वाले, सदाबहार दिखाई देने वाले, हमारे-आपके सिर्फ़ “सचिन”।

जब भी मासूम चेहरे की बात होती है, तब सबसे पहले नाम आता है तबस्सुम का और सचिन का, बाकी जुगल हंसराज और शाहिद कपूर आदि सब बाद में आते हैं। जितनी और जैसी प्रतिभा किशोर कुमार में थी, लगभग उतनी ही प्रतिभा या यूँ कहें कि कलाकारी के विविध आयामों के धनी हैं सचिन पिलगाँवकर। अभिनेता, निर्माता, निर्देशक, गायक, नृत्य निर्देशक, सम्पादक, टीवी सीरियल निर्माता… क्या-क्या नहीं करते हैं ये। (पहले भी मैंने मराठी के दो दिग्गज कलाकारों दादा कोंडके और निळु फ़ुले पर आलेख लिखे हैं, सचिन भी उन्हीं की श्रेणी में आते हैं)

17 अगस्त 1957 को मुम्बई (Mumbai) में एक सारस्वत ब्राह्मण परिवार में जन्में सचिन की परवरिश एक आम मराठी मध्यमवर्गीय परिवार की तरह ही हुई। बचपन से ही उनके मोहक चेहरे के कारण उन्हें फ़िल्मों में काम मिलने लगा था। चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर उनकी पहली फ़िल्म है “एक और सुहागन”, लेकिन उन्हें असली प्रसिद्धि मिली फ़िल्म “ब्रह्मचारी” से, जिसमें उन्होंने शम्मी कपूर के साथ काम किया और उसके बाद “ज्वेल थीफ़” से जिसमें उन्होंने वैजयन्तीमाला के छोटे भाई का रोल बखूबी निभाया।

“स्वीट सिक्सटीन” की उम्र में पहुँचते ही, उन्हें राजश्री प्रोडक्शन की “गीत गाता चल” में किशोरवय हीरो की भूमिका मिली, जिसमें उनकी हीरोइन थीं सारिका। इस जोड़ी ने फ़िर लगातार कुछ फ़िल्मों में काम किया। यूँ तो सचिन ने कई हिट फ़िल्मों में काम किया, लेकिन उल्लेखनीय फ़िल्मों के तौर पर कही जा सकती है “अँखियों के झरोखे से”, “बालिका वधू”, “अवतार”, “घर एक मन्दिर”, “कॉलेज गर्ल”, “नदिया के पार” आदि। जैसे ही उनकी उम्र थोड़ी बढ़ी (लेकिन चेहरे पर वही मासूमियत बरकरार थी), उन्होंने मैदान न छोड़ते हुए चरित्र भूमिकायें निभाना शुरु कर दिया। “शोले”, “त्रिशूल”, “सत्ते पे सत्ता” आदि में वे दिखाई दिये।

1990 के दशक के शुरुआत में जब टीवी ने पैर पसारना शुरु किया तब वे इस विधा की ओर मुड़े और एक सुपरहिट कॉमेडी शो “तू-तू-मैं-मैं” निर्देशित किया, जिसमें मुख्य भूमिका में थीं उनकी पत्नी सुप्रिया और मराठी रंगमंच और हिन्दी फ़िल्मों की “ग्लैमरस” माँ रीमा लागू। उनका एक और निर्माण था “हद कर दी”। एक अच्छे गायक और संगीतप्रेमी होने के कारण (मराठी हैं, तो होंगे ही) उन्होंने स्टार टीवी पर एक हिट कार्यक्रम “चलती का नाम अंताक्षरी” भी संचालित किया। उम्र के पचासवें वर्ष में उन्होंने एक चुनौती के रूप में स्टार टीवी के नृत्य कार्यक्रम “नच बलिये” (Nach Baliye) में अपनी पत्नी के साथ भाग लिया। सभी प्रतियोगियों में ये जोड़ी सबसे अधिक उम्र की थी। इन्होंने भी सोचा नहीं था कि वे इतने आगे जायेंगे, इसलिये हरेक एपिसोड को ये अपना अन्तिम नृत्य मानकर करते रहे और अन्त में जीत इन्हीं की हुई और इस जोड़ी को इनाम के तौर पर चालीस लाख रुपये मिले। उम्र के इस पड़ाव पर एक डांस के शो में युवाओं को पछाड़कर जीतना वाकई अदभुत है। 2007 में जी टीवी मराठी पर इन्होंने एक शो शुरु किया है, जिसमें ये जज भी बने हैं, नाम है “एका पेक्षा एक” (एक से बढ़कर एक)। इसमें सचिन महाराष्ट्र की युवा नृत्य प्रतिभाओं को खोज रहे हैं। इनके बेदाग, चमकदार और विवादरहित करियर में सिर्फ़ एक बार अप्रिय स्थिति बनी थी, जब इनकी गोद ली हुई पुत्री करिश्मा ने इन पर गलतफ़हमी में कुछ आरोप लगाये थे, हालांकि बाद में मामला सुलझ गया था… वैसे इनकी खुद की एक पुत्री श्रिया है, जो अभी अठारह वर्ष की है।

इससे बरसों पहले अस्सी के दशक में सचिन ने कई मराठी फ़िल्मों का निर्देशन किया, जिनमें प्रमुख हैं “माई-बाप”, “नवरी मिळे नवरयाला” (इस फ़िल्म के दौरान ही सुप्रिया से उनका इश्क हुआ और शादी हुई), “माझा पती करोड़पती”, “गम्मत-जम्मत” आदि। मराठी के सशक्त अभिनेता अशोक सराफ़ और स्वर्गीय लक्ष्मीकान्त बेर्डे से उनकी खूब दोस्ती जमती है। बच्चों से उनका प्रेम जगजाहिर है, इसीलिये वे स्टार टीवी के बच्चों के एक डांस शो में फ़रीदा जलाल के साथ जज बने हुए हैं। उनकी हिन्दी और उर्दू उच्चारण एकदम शुद्ध हैं, और कोई कह नहीं सकता कि उसमें मराठी “टच” है (जैसा कि सदाशिव अमरापुरकर के उच्चारण में साफ़ झलकता है)। सचिन अपने शुद्ध उच्चारण का पूरा श्रेय स्वर्गीय मीनाकुमारी (Meena Kumari) को देते हैं, जिनके यहाँ वे बचपन में लगातार मिठाई खाने जाते थे और मीनाकुमारी उन्हें पुत्रवत स्नेह प्रदान करती थीं, उनका उर्दू तलफ़्फ़ुज ठीक करती थीं और हिन्दी से उर्दू के तर्जुमें करके देती थीं। नदिया के पार में उनका भोजपुरी का साफ़ उच्चारण इसका सबूत है।

मेहनत, लगन और उत्साह से सतत काम में लगे रहने वाले इस हँसमुख, विनम्र और महान कलाकार को मेरे जैसे एक छोटे से सिनेमाप्रेमी का सलाम…

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