Super User

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I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

Website URL: http://www.google.com
हमारे "मर्द" प्रधानमन्त्री ने एक बार फ़िर वामपंथियों को जोर का "चमाट" लगाया है। परमाणु मुद्दे पर जिस तरह इस्तीफ़े की धमकी देकर वामों को पटखनी दी है, वह लाजवाब है। ऐसा लगता है कि वामपंथियों ने "आयोडीन युक्त नमक" (Iodine Salt) का सेवन ठीक से नहीं किया है। क्योंकि जब-तब उन्हें जोर से बोलते वक्त "गले का घेंघा" हो जाता है, उनसे कोई कदम भी उठाते नहीं बनता क्योंकि आयोडीन की कमी से "हाथीपाँव" की शिकायत भी है। इधर हाल ये है कि वामपंथी हैं सत्ता में (केरल और बंगाल के लिये माल बटोरने में लगे हैं), लेकिन विपक्षी भी दिखना चाहते हैं, सरकार का विरोध भी करना चाहते हैं, समर्थन भी जारी रखना चाहते हैं, गेहूँ और दाल के भाव बढते रहें कोई बात नहीं, लेकिन अमेरिका के नाम पर नौटंकी जरूर करेंगे, साधारण नमक डेढ रुपये किलो था लेकिन अब आयोडीन युक्त नमक आठ रुपये किलो, बेचारा गरीब खा रहा है, लेकिन ये ढोंगी परमाणु, ईराक और गुजरात पर हल्ला जरूर मचायेंगे। तीसरे मोर्चे की तरफ़ हाथ बढाते भी डर लगता है, कहीं "एड्स" ना हो जाये, जबकि ऐसा कुछ है नहीं, क्योंकि तीसरा मोर्चा एड्स से नहीं बल्कि "कुपोषण" से ग्रस्त है, क्योंकि जब-जब तीसरे मोर्चे (Third Front Government) की सरकार बनी, ठीक से कुछ "खाने" से पहले ही सरकार गिर गई, तो भला कुपोषण नहीं होगा क्या? भाजपा का हाल उलटा हुआ था, वे सत्ता में मुख्य पार्टी थे तब चन्द्रबाबू और ममता आँखे दिखाते रहते थे, भाजपा वालों ने भी "पोलियो" (Polio Drops in India) का टीका नहीं लगवाया था, इसीलिये उन्हें ठीक से तनकर खडे़ होने में समस्या होती थी। यदि वक्त रहते आरएसएस का दिया हुआ ORS का घोल भी पी लिया होता तो कम से कम बंगारू और जूदेव टाईप के "दस्त" तो नहीं लगते और हाजमा ठीक रहता। ऐसी कोई पार्टी इस देश में नहीं बची जो बीमारी से ग्रस्त ना हो। अब मुझसे कॉंग्रेस के बारे में न पूछियेगा, वरना मुझे "गुप्त रोग" के बारे में विस्तार से बताना पडे़गा।
हिन्दी फ़िल्मों ने हमें कई-कई अविस्मरणीय गीत दिये हैं। फ़िल्म संगीतप्रेमी सोते-जागते, उठते-बैठते इन गीतों को गुनगुनाते रहते हैं। हमारे महान गीतकारों और फ़िल्मकारों ने जीवन के हरेक मौके, अवसर और उत्सव के लिये गीत लिखे हैं और खूब लिखे हैं। जन्म, किशोरावस्था, युवावस्था, प्रेम, विवाह, बिदाई, बच्चे, बुढापा, मौत... सभी-सभी के लिये गीत हमें मिल जायेंगे। जो दो गीत मैंने आज चुने हैं, वे जीवन के एक विशेष कालखंड अर्थात गर्भावस्था और मातृत्व प्राप्त करने के बीच का स्वप्निल समय। जैसे मातृत्व स्त्रियों के लिये जीवन का सबसे महत्वपूर्ण क्षण होता है, ठीक वैसे ही पुरुषों के लिये पितृत्व भी एक गौरवशाली क्षण होता है। हालांकि माँ बनने के दौरान और प्रसूति के बाद स्त्री का योगदान तो अतुलनीय होता ही है, लेकिन इस भागमभाग में लोग “बाप” को भूल जाते हैं, दवाईयों के लिये भागदौड़ करता, रक्त की बोतलों की जुगाड़ में लगा बदहवास सा, बेचैनी से अस्पताल के बरामदे में टहलता बाप लोग अक्सर नजर-अंदाज कर जाते हैं, और वह भी “मर्द” होने के नाते अपनी व्यथा किसी से कहता नहीं। बहरहाल... प्रस्तुत दोनों गीत गर्भावस्था के उस सपनीले दौर के हैं, जब पति-पत्नी सपने देखने में मगन होते हैं, और यह दौर लगभग हरेक के जीवन में आता है, जब वह अपने होने वाले बच्चे के लिये न जाने क्या-क्या सोचा करता है। यह गीत खास इसीलिये हैं कि इनमें माता-पिता दोनों की भावनाओं को बराबरी से व्यक्त किया गया है। पहला गीत है फ़िल्म “मन-मन्दिर” का, जो सन १९७१ में आई थी, लिखा है राजेन्द्र कृष्ण ने और संगीत दिया है लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने, गीत गाया है मुकेश और लता मंगेशकर ने.... गीत के बोल हैं “ऐ मेरी आँखों के पहले सपने...”, गीत क्या है, चार पंक्तियों की मधुर कविता है, ध्यान से सुनें तो दो लाईन लता के लिये और दो लाईन मुकेश के लिये, बस... इतने में ही लक्ष्मी-प्यारे ने पूरा गीत बाँध दिया है-

लता - ऐ मेरी आँखों के पहले सपने, रंगीन सपने मासूम सपने
पलकों का पलना झुलाऊँ तुझे, गा-गा के लोरी सुलाऊँ तुझे...
(१) एक-एक पल गिनूँ, उस घड़ी के लिये
जिसकी उम्मीद में हर कोई माँ जिये (२)
ऐ मेरी आँखों के पहले सपने....

इस अंतरे के बाद मुकेश कमान संभाल लेते हैं, ठीक वैसे ही जैसे कोई दौड़ के दौरान अपने 'पार्टनर' को हौले से “बेटन” थमाता है...

ऐ मेरी आँखों के पहले सपने...
(२) मैं अभी से तेरी सुन रहा हूँ सदा,
दूर जैसे कहीं साज हो बज रहा (२)
फ़िर दोनों गाते हैं
ऐ मेरी आँखों के पहले सपने, रंगीन सपने मासूम सपने
पलकों का पलना झुलाऊँ तुझे, गा-गा के लोरी सुलाऊँ तुझे...

एक विशिष्ट भावना में छोड़ जाता है यह मधुर गीत आपको..... इसे सुनने के लिये आप नीचे दिये विजेट में “प्ले” पर चटकायें...


AYE MERI AANKHON K...



दूसरा गीत भी कालजयी है, लिखा है कवि नीरज ने, धुन बनाई है सचिन देव बर्मन ने, गाया है किशोर कुमार और लता मंगेशकर ने, फ़िल्म है तेरे-मेरे सपने और बोल हैं, “जीवन की बगिया महकेगी, लहकेगी, चहकेगी...”। पूरा गीत पति-पत्नी के आपसी सामंजस्य, उनके सपनों, आने वाले बच्चे के बारे में उनकी कल्पनाओं में डूबा हुआ है। इस गीत में सचिन दा और नीरज ने मिलकर अनोखा संसार रचा है। इस गीत के बोल इस प्रकार हैं -

जीवन की बगिया महकेगी, लहकेगी, चहकेगी
खुशियों की कलियाँ, झूमेंगी, झूलेंगी, फ़ूलेंगी
जीवन की बगिया....
वो मेरा होगा, वो सपना तेरा होगा
मिलजुल के माँगा, वो तेरा-मेरा होगा
जब-जब वो मुस्कुरायेगा, अपना सवेरा होगा
थोड़ा हमारा, थोड़ा तुम्हारा, आयेगा बचपन फ़िर से हमारा....
जीवन की बगिया...
हम और बँधेंगे, हम तुम कुछ और बँधेंगे
होगा कोई बीच तो हम तुम और बँधेंगे
बाँधेगा धागा कच्चा, हम तुम तब और बँधेंगे
थोड़ा हमारा, थोड़ा तुम्हारा, आयेगा बचपन फ़िर से हमारा....
जीवन की बगिया...
मेरा राजदुलारा, वो जीवन प्राण हमारा
फ़ूलेगा एक फ़ूल, खिलेगा प्यार हमारा
दिन का वो सूरज होगा, रातों का चाँद सितारा...
थोड़ा हमारा, थोड़ा तुम्हारा, आयेगा बचपन फ़िर से हमारा....
जीवन की बगिया...

जैसे पहले गीत में एक पंक्ति “एक-एक पल गिनूँ उस घड़ी के लिये, जिसकी उम्मीद में हर कोई माँ जिये” है वैसे ही इस गीत में “हम और बँधेंगे, हम-तुम कुछ और बँधेंगे, बाँधेगा धागा कच्चा... होगा कोई बीच तो हम तुम और बँधेंगे..” ये पंक्तियाँ कितने गूढ़ार्थ लिये हुए है, क्या खूब शब्द हैं। यही है हमारे पुराने फ़िल्मी गीतों का जादू... एक बार दिल लगाकर ध्यान से सुन लिया तो फ़िर व्यक्ति दूसरी दुनिया में खो जाता है। इस गीत को नीचे दिये विजेट में प्ले करके भी सुन सकते हैं, और यदि तेजगति इंटरनेट के मालिक हैं तो “यू-ट्यूब” पर इसका बेहतरीन वीडियो भी देख सकते हैं, जिसमें देव आनन्द और मुमताज एक शोख लेकिन परिपक्व अन्दाज में दिखाई देंगे। आनन्द लीजिये, मुझे उम्मीद है कि हमारे कुँवारे पाठक भी इसका भरपूर रसास्वादन करेंगे, क्योंकि कल नहीं तो परसों उन्हें भी इस क्षण से गुज़रना ही होगा। यही तो जीवन है....


Jeevan Ki Bagia Ma...




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Do You Know Sonia Gandhi? (Part-3)
(इस भाग में – सोनिया गाँधी का जन्म, उनका पारिवारिक इतिहास, उनके सम्बन्ध, उनके झूठ, उनके द्वारा कानून से खिलवाड़ आदि शामिल हैं)
सोनिया गाँधी से सम्बन्धित पिछले दोनों अनुवादों में हमने सोनिया गाँधी के बारे में काफ़ी कुछ जाना (क्या वाकई?) लेकिन जितना जाना उतने ही प्रश्न दिमागों में उठते गये। उन दोनो पोस्टों पर मुझे ब्लॉग पर और व्यक्तिगत रूप से कई अच्छे-बुरे मेल प्राप्त हुए, जिसका जिक्र मैंने तीसरी पोस्ट “सोनिया गाँधी की पोस्ट पर उठते सवाल-जवाब” में किया था। और जैसा कि मैं पहले ही अर्ज कर चुका हूँ, कि मेरी सोनिया गाँधी से कोई व्यक्तिगत रंजिश नहीं है और ना ही मुझे इस बात का कोई मुगालता है कि मैं कोई बहुत बड़ा “शोधक” हूँ, फ़िर भी सोनिया भक्तों (इसे कॉंग्रेस भक्तों भी पढ़ा जा सकता है) ने ईमेल-हमले लगातार जारी रखे। मैं उनसे सिर्फ़ एक-दो सवाल पूछना चाहता था (लेकिन Anonymous मेल होने के कारण पूछ ना सका), कि इतना हल्ला मचाने वाले ये लोग जानते हैं कि सोनिया गाँधी का जन्म कहाँ हुआ? उनकी शिक्षा-दीक्षा कहाँ और कितनी हुई? उनकी पृष्ठभूमि क्या है? वे किस परिवार से हैं? इसलिये डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा लिखित इस लेख का अनुवाद “सोनिया गाँधी, भाग-३” के रूप में पेश करना मैं अपना कर्तव्य मानता हूँ (क्योंकि कई लोगों ने मुझे ईमेल से जवाब देने का मौका नहीं दिया)। बहरहाल, पेश है डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी द्वारा लिखित एक विस्तृत लेख का हिन्दी अनुवाद, जिसमें इनमें से कई प्रश्नों के जवाब मिलते हैं (और आज तक न तो सोनिया गाँधी द्वारा अथवा कॉंग्रेस भक्तों द्वारा डॉ. स्वामी पर कोई “मानहानि” (!) का मुकदमा दायर किया गया है)

“मेरा (मतलब डॉ.स्वामी का) सोनिया गाँधी का विरोध सिर्फ़ इसी बात को लेकर नहीं है कि उनका जन्म इटली में हुआ है, क्योंकि यह कोई मुद्दा नहीं है, बल्कि इटली सहित किसी और देश में विदेशी मूल की बात का फ़ैसला वहाँ के न्यायालयों ने किया हुआ है, कि सर्वोच्च और महत्वपूर्ण पदों पर विदेशी मूल का व्यक्ति नहीं पदासीन हो सकता, लेकिन भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है। 17 मई 2004 को 12.45 पर राष्ट्रपति ने मुझे मिलने का समय दिया था, उसी समय मैंने उनसे कहा था कि यदि सोनिया गाँधी प्रधानमंत्री बनती हैं तो मैं इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दूँगा, और “रजिस्ट्रेशन” द्वारा नागरिकता हासिल किये जाने के कारण उसे रद्द किया भी जा सकता है।

भारतीय नागरिकों को सोनिया की पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी हासिल करना बेहद मुश्किल बात है, क्योंकि इटली के जन्म के कारण और वहाँ की भाषाई समस्याओं के कारण किसी पत्रकार के लिये भी यह मुश्किल ही है (भारत में पैदा हुए नेताओं की पृष्ठभूमि के बारे में हम कितना जानते हैं?) लेकिन नागरिकों को जानने का अधिकार तो है ही। सोनिया के बारे में तमाम जानकारी उन्हीं के द्वारा अथवा काँग्रेस के विभिन्न मुखपत्रों में जारी की हुई सामग्री पर आधारित है, जिसमें तीन झूठ साफ़ तौर पर पकड़ में आते हैं।

पहला झूठ – सोनिया गाँधी का असली नाम “सोनिया” नहीं बल्कि “ऎंटोनिया” है, यह बात इटली के राजदूत ने 27 अप्रैल 1983 को लिखे पत्र में स्वीकार की है, यह पत्र गृह मंत्रालय नें अपनी मर्जी से कभी सार्वजनिक नहीं किया। “एंटॊनिया” नाम सोनिया गाँधी के जन्म प्रमाणपत्र में अंकित है। सोनिया गाँधी को “सोनिया” नाम उनके पिता स्व.स्टेफ़ानो माईनो ने दिया था। स्टीफ़ानो माइनो द्वितीय विश्व युद्ध के वक्त रूस में युद्ध बन्दी थे। स्टीफ़ानो ने एक कार्यकर्ता के तौर पर “नाजी” सेना में काम किया था, जैसा कि कई इटालियन फ़ासिस्टों ने किया था। “सोनिया” एक रूसी नाम है न कि इटालियन। रूस में बिताये जेल के लम्हों में सोनिया के पिता धीरे-धीरे रूस समर्थक बन गये थे, खासकर तब जबकि उन समेत इटली के सभी “फ़ासिस्टों” की सम्पत्ति अमेरिकी सेनाओं द्वारा नष्ट या जब्त कर ली गई थी।

दूसरा झूठ – उनका जन्म इटली के लूसियाना में हुआ, ना कि जैसा उन्होंने संसद में दिये अपने शपथ पत्र में उल्लेख किया है कि “उनका जन्म ओरबेस्सानो में हुआ”। शायद वे अपना जन्म स्थान “लूसियाना” छुपाना चाहती हैं, क्योंकि इससे उनके पिता के नाजियों और मुसोलिनी से सम्बन्ध उजागर होते हैं, जबकि उनका परिवार लगातार नाजियों और फ़ासिस्टों के सम्पर्क में रहा, युद्ध समाप्ति के पश्चात भी। लूसियाना नाजियों के नेटवर्क का मुख्य केन्द्र था और यह इटली-स्विस सीमा पर स्थित है। इस झूठ का कोई औचित्य नजर नहीं आता और ना ही आज तक उनकी तरफ़ से इसका कोई स्पष्टीकरण दिया गया है।

तीसरा झूठ – सोनिया गाँधी का आधिकारिक शिक्षण हाई स्कूल से अधिक नहीं हुआ है। लेकिन उन्होंने रायबरेली के 2004 लोकसभा चुनाव में एक शपथ पत्र में कहा है कि उन्होंने केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में डिप्लोमा किया हुआ है। यही झूठ बात उन्होंने सन 1999 में लोकसभा में अपने परिचय पत्र में कही थी, जो कि लोकसभा द्वारा “हू इज़ हू” के नाम से प्रकाशित की जाती है। बाद में जब मैंने लोकसभा के स्पीकर को लिखित शिकायत की, कि यह घोर अनैतिकता भरा कदम है, तब उन्होंने स्वीकार किया कि ऐसा “टाईपिंग” की गलती की वजह से हुआ (ऐसा “टायपिंग मिस्टेक” तो गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड़्स में शामिल होने लायक है)। सच्चाई तो यह है कि सोनिया ने कॉलेज का मुँह तक नहीं देखा है। वे जिआवेनो स्थित एक कैथोलिक स्कूल जिसका नाम “मारिया ऑसिलियाट्रिस” में पढने जाती थीं (यह स्कूल उनके तथाकथित जन्म स्थान ओरबेस्सानो से 15 किमी दूर स्थित है)। गरीबी के कारण बहुत सी इटालियन लड़कियाँ उन दिनों ऐसी मिशनरी में पढने जाया करती थीं, और उनमें से बहुतों को अमेरिका में सफ़ाई कर्मचारी, वेटर आदि के कामों की नौकरी मिल जाती थी। उन दिनों माइनो परिवार बहुत गरीब हो गया था। सोनिया के पिता एक मेसन और माँ एक खेतिहर मजदूर के रूप में काम करती थीं (अब इस परिवार की सम्पत्ति करोड़ों की हो गई है!)। फ़िर सोनिया इंग्लैंड स्थित केम्ब्रिज कस्बे के “लेन्नॉक्स स्कूल” में अंग्रेजी पढने गईं, ताकि उन्हें थोड़ा सम्मानजनक काम मिल जाये। यह है उनका कुल “शिक्षण”, लेकिन भारतीय समाज को बेवकूफ़ बनाने के लिये उन्होंने संसद में झूठा बयान दिया (जो कि नैतिकता का उल्लंघन भी है) और चुनाव में झूठा शपथ पत्र भी, जो कि भारतीय दंड संहिता के अनुसार अपराध भी है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार प्रत्याशी को उसकी सम्पत्ति और शिक्षा के बारे में सही-सही जानकारी देना आवश्यक है। इन तीन झूठों से साबित होता है कि सोनिया गाँधी कुछ “छिपाना” चाहती हैं, या उनका कोई छुपा हुआ कार्यक्रम है जो किसी और मकसद से है, जाहिर है कि उनके बारे में और जानकारी जुटाना आवश्यक है।

कुमारी सोनिया गाँधी अच्छी अंग्रेजी से अवगत होने के लिये केम्ब्रिज कस्बे के वार्सिटी रेस्टोरेंट में काम करने लगीं, वहीं उनकी मुलाकात 1965 में राजीव गाँधी से पहली बार हुई। राजीव उस यूनिवर्सिटी में छात्र थे और पढ़ाई मे कुछ खास नहीं थे, इसलिये राजीव 1966 में लन्दन चले गये जहाँ उन्होंने इम्पीरियल इंजीनियरिंग कॉलेज में थोड़ी शिक्षा ग्रहण की। सोनिया भी लन्दन चली गईं जहाँ उन्हें एक पाकिस्तानी सलमान थसीर के यहाँ नौकरी मिल गई। सलमान थसीर साहब का अधिकतर बिजनेस दुबई से संचालित होता था, लेकिन वे अधिकतर समय लन्दन में ही डटे रहते थे। इस नौकरी में सोनिया गाँधी ने अच्छा पैसा कमाया, कम से कम इतना तो कमाया ही कि वे राजीव गाँधी की आर्थिक मदद कर सकें, जिनके “खर्चे” बढते ही जा रहे थे (इन्दिरा गाँधी भी उनके उन खर्चों से काफ़ी नाराज थीं और ऐसा उन्होंने खुद मुझे बताया था जब मेरी मुलाकात ब्रांडेस विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में उनसे हुई थी और उस वक्त मैं हार्वर्ड में वाणिज्य का प्रोफ़ेसर लगा ही था)। संजय गाँधी को लिखे राजीव गाँधी के पत्रों से यह स्पष्ट था कि राजीव, सोनिया के आर्थिक कर्जे में फ़ँसे हुए थे और राजीव ने संजय से मदद की गुहार की थी, क्योंकि संजय उनके कर्जों को निपटाने में सक्षम(?) थे। उस दौरान राजीव अकेले सोनिया गाँधी के मित्र नहीं थे, माधवराव सिंधिया और एक जर्मन स्टीगलर उनके अंतरंग मित्रों में से एक थे। माधवराव से उनकी दोस्ती राजीव से शादी के बाद भी जारी रही।

बहुत कम लोगों को यह पता है कि 1982 में एक रात को दो बजे माधवराव की कार का एक्सीडेंट आईआईटी दिल्ली के गेट के सामने हुआ था, और उस समय कार में दूसरी सवारी थीं सोनिया गाँधी। दोनों को बहुत चोटें आई थीं, आईआईटी के एक छात्र ने उनकी मदद की, कार से बाहर निकाला, एक ऑटो रिक्शा में सोनिया को इंदिरा गाँधी के यहाँ भेजा गया, क्योंकि अस्पताल ले जाने पर कई तरह से प्रश्न हो सकते थे, जबकि माधवराव सिन्धिया अपनी टूटी टाँग लिये बाद में अकेले अस्पताल गये। जब परिदृश्य से सोनिया पूरी तरह गायब हो गईं तब दिल्ली पुलिस ने अपनी भूमिका शुरु की। बाद के वर्षों में माधवराव सिंधिया सोनिया के आलोचक बन गये थे और मित्रों के बीच उनके बारे में “कई बातें” करने लगे थे। यह बड़े आश्चर्य और शर्म की बात है कि 2001 में माधवराव की मृत्यु और उनके विमान दुर्घटना की कोई गहन जाँच नहीं हुई, जबकि उसी विमान से मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित भी जाने वाले थे और उन्हें आखिरी समय पर सिंधिया के साथ न जाने की सलाह दी गई थी।

राजीव गाँधी और सोनिया का विवाह ओर्बेस्सानो में एक चर्च में हुआ था, हालांकि यह उनका व्यक्तिगत लेकिन विवादास्पद मामला है और जनता को इससे कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन जनता का जिस बात से सरोकार है वह है इन्दिरा गाँधी द्वारा उनका वैदिक रीति से पुनः विवाह करवाना, ताकि भारत की भोली जनता को बहलाया जा सके, और यह सब हुआ था एक सोवियत प्रेमी अधिकारी टी.एन.कौल की सलाह पर, जिन्होंने यह कहकर इन्दिरा गाँधी को इस बात के लिये मनाया कि “सोवियत संघ के साथ रिश्तों को मजबूत करने के लिये यह जरूरी है”, अब प्रश्न उठता है कि कौल को ऐसा कहने के लिये किसने उकसाया?

जब भारतीय प्रधानमंत्री का बेटा लन्दन में एक लड़की से प्रेम करने में लगा हो, तो भला रूसी खुफ़िया एजेंसी “केजीबी” भला चुप कैसे रह सकती थी, जबकि भारत-सोवियत रिश्ते बहुत मधुर हों, और सोनिया उस स्टीफ़ानो की पुत्री हों जो कि सोवियत भक्त बन चुका हो। इसलिये सोनिया का राजीव से विवाह भारत-सोवियत सम्बन्धों और केजीबी के हित में ही था। राजीव से शादी के बाद माइनो परिवार के सोवियत संघ से सम्बन्ध और भी मजबूत हुए और कई सौदों में उन्हें दलाली की रकम अदा की गई । डॉ.येवेग्निया अल्बाट्स (पीएच.डी. हार्वर्ड) एक ख्यात रूसी लेखिका और पत्रकार हैं, वे बोरिस येल्तसिन द्वारा सन 1991 में गठित एक आयोग की सदस्या थीं, ने अपनी पुस्तक “द स्टेट विदिन अ स्टेट : द केजीबी इन सोवियत यूनियन” में कई दस्तावेजों का उल्लेख किया है, और इन दस्तावेजों को भारत सरकार जब चाहे एक आवेदन देकर देख सकती है। रूसी सरकार ने सन 1992 में डॉ. अल्बाट्स के इन रहस्योद्घाटनों को स्वीकार किया, जो कि “हिन्दू” में 1992 में प्रकाशित हो चुका है । उस प्रवक्ता ने यह भी कहा कि “सोवियत आदर्शों और सिद्धांतों को बढावा देने के लिये” इस प्रकार का पैसा माइनो और कांग्रेस प्रत्याशियों को चुनावों के दौरान दिया जाता रहा है । 1991 में रूस के विघटन के पश्चात जब रूस आर्थिक भंवर में फ़ँस गया तब सोनिया गाँधी का पैसे का यह स्रोत सूख गया और सोनिया ने रूस से मुँह मोड़ना शुरु कर दिया। मनमोहन सिंह के सत्ता में आते ही रूस के वर्तमान राष्ट्रपति पुतिन (जो कि घुटे हुए केजीबी जासूस रह चुके हैं) ने तत्काल दिल्ली में राजदूत के तौर पर अपना एक खास आदमी नियुक्त किया जो सोनिया के इतिहास और उनके परिवार के रूसी सम्बन्धों के बारे में सब कुछ जानता था। अब फ़िलहाल जो सरकार है वह सोनिया ही चला रही हैं यह बात जब भारत में ही सब जानते हैं तो विदेशी जासूस कोई मूर्ख तो नहीं हैं, इसलिये उस राजदूत के जरिये भारत-रूस सम्बन्ध अब एक नये दौर में प्रवेश कर चुके हैं। हम भारतवासी रूस से प्रगाढ़ मैत्री चाहते हैं, रूस ने जब-तब हमारी मदद भी की है, लेकिन क्या सिर्फ़ इसीलिये हमें उन लोगों को स्वीकार कर लेना चाहिये जो रूसी खुफ़िया एजेंसी से जुड़े रहे हों? अमेरिका में भी किसी अधिकारी को इसराइल के लिये जासूसी करते हुए बर्दाश्त नहीं किया जायेगा, भले ही अमेरिका के इसराइल से कितने ही मधुर सम्बन्ध हों। सम्बन्ध अपनी जगह हैं और राष्ट्रहित अलग बात है। दिसम्बर 2001 में मैने दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर करके सभी दस्तावेज प्रस्तुत कर, केजीबी और सोनिया के सम्बन्धों की सीबीआई द्वारा जाँच की माँग की थी, जिसे वाजपेयी सरकार द्वारा ठुकरा दिया गया। इससे पहले तत्कालीन राज्य मंत्री वसुन्धरा राजे सिंधिया ने 3 मार्च 2001 को इस केस की सीबीआई जाँच के आदेश दे दिये थे, लेकिन कांग्रेसियों द्वारा इस मुद्दे पर संसद में हल्ला-गुल्ला करने और कार्रवाई ठप करने के कारण वाजपेयी ने वसुन्धरा का वह आदेश खारिज कर दिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने मई 2002 में सीबीआई को रूसी सम्बन्धों के बारे में जाँच करने के आदेश दिये। सीबीआई ने दो वर्ष तक “जाँच” (?) करने के बाद “बिना एफ़आईआर दर्ज किये” कोर्ट को यह बताया कि सोनिया और रूसियों में कोई सम्बन्ध नहीं है, लेकिन सीबीआई को FIR दर्ज करने से किसने रोका, वाजपेयी सरकार ने, क्यों? यह आज तक रहस्य ही है। इस केस की अगली सुनवाई होने वाली है, लेकिन अब सोनिया “निर्देशक” की भूमिका में आ चुकी हैं और सीबीआई से किसी स्वतन्त्र कार्य की उम्मीद करना बेकार है।
............ जारी ..... है (भाग-४ शीघ्र ही), जिसमें हम पायेंगे कई अनसुलझे और बेचैन करने वाले प्रश्न.... तब तक प्रिय आलोचकों, "मेरा मेल बॉक्स खुला है खुला ही रहेगा, तुम्हारे लिये..."

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Know Sonia Gandhi (Part-4)

गतांक (सोनिया...भाग-३) से आगे जारी...

राजीव से विवाह के बाद सोनिया और उनके इटालियन मित्रों को स्नैम प्रोगैती की ओट्टावियो क्वात्रोची से भारी-भरकम राशियाँ मिलीं, वह भारतीय कानूनों से बेखौफ़ होकर दलाली में रुपये कूटने लगा। कुछ ही वर्षों में माइनो परिवार जो गरीबी के भंवर में फ़ँसा था अचानक करोड़पति हो गया । लोकसभा के नयेनवेले सदस्य के रूप में मैंने 19 नवम्बर 1974 को संसद में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी से पूछा था कि “क्या आपकी बहू सोनिया गाँधी, जो कि अपने-आप को एक इंश्योरेंस एजेंट बताती हैं (वे खुद को ओरियंटल फ़ायर एंड इंश्योरेंस कम्पनी की एजेंट बताती थीं), प्रधानमंत्री आवास का पता उपयोग कर रही हैं?” जबकि यह अपराध है क्योंकि वे एक इटालियन नागरिक हैं (और यह विदेशी मुद्रा उल्लंघन) का मामला भी बनता है”, तब संसद में बहुत शोरगुल मचा, श्रीमती इन्दिरा गाँधी गुस्सा तो बहुत हुईं, लेकिन उनके सामने और कोई विकल्प नहीं था, इसलिये उन्होंने लिखित में यह बयान दिया कि “यह गलती से हो गया था और सोनिया ने इंश्योरेंस कम्पनी से इस्तीफ़ा दे दिया है” (मेरे प्रश्न पूछने के बाद), लेकिन सोनिया का भारतीय कानूनों को लतियाने और तोड़ने का यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। 1977 में जनता पार्टी सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय के जस्टिस ए.सी.गुप्ता के नेतृत्व में गठित आयोग ने जो रिपोर्ट सौंपी थी, उसके अनुसार “मारुति” कम्पनी (जो उस वक्त गाँधी परिवार की मिल्कियत था) ने “फ़ेरा कानूनों, कम्पनी कानूनों और विदेशी पंजीकरण कानून के कई गंभीर उल्लंघन किये”, लेकिन ना तो संजय गाँधी और ना ही सोनिया गाँधी के खिलाफ़ कभी भी कोई केस दर्ज हुआ, ना मुकदमा चला। हालांकि यह अभी भी किया जा सकता है, क्योंकि भारतीय कानूनों के मुताबिक “आर्थिक घपलों” पर कार्रवाई हेतु कोई समय-सीमा तय नहीं है।

जनवरी 1980 में श्रीमती इन्दिरा गाँधी पुनः सत्तासीन हुईं। सोनिया ने सबसे पहला काम यह किया कि उन्होंने अपना नाम “वोटर लिस्ट” में दर्ज करवाया, यह साफ़-साफ़ कानून का मखौल उड़ाने जैसा था और उनका वीसा रद्द किया जाना चाहिये था (क्योंकि उस वक्त भी वे इटली की नागरिक थीं)। प्रेस द्वारा हल्ला मचाने के बाद दिल्ली के चुनाव अधिकारी ने 1982 में उनका नाम मतदाता सूची से हटाया। लेकिन फ़िर जनवरी 1983 में उन्होंने अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वा लिया, जबकि उस समय भी वे विदेशी ही थीं (आधिकारिक रूप से उन्होंने भारतीय नागरिकता के लिये अप्रैल 1983 में आवेद दिया था)। हाल ही में ख्यात कानूनविद, ए.जी.नूरानी ने अपनी पुस्तक “सिटीजन्स राईट्स, जजेस एंड अकाऊण्टेबिलिटी रेकॉर्ड्स” (पृष्ठ 318) पर यह दर्ज किया है कि “सोनिया गाँधी ने जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल के कुछ खास कागजात एक विदेशी को दिखाये, जो कागजात उनके पास नहीं होने चाहिये थे और उन्हें अपने पास रखने का सोनिया को कोई अधिकार नहीं था।“ इससे साफ़ जाहिर होता है उनके मन में भारतीय कानूनों के प्रति कितना सम्मान है और वे अभी भी राजतंत्र की मानसिकता से ग्रस्त हैं। सार यह कि सोनिया गाँधी के मन में भारतीय कानून के सम्बन्ध में कोई इज्जत नहीं है, वे एक महारानी की तरह व्यवहार करती हैं। यदि भविष्य में उनके खिलाफ़ कोई मुकदमा चलता है और जेल जाने की नौबत आ जाती है तो वे इटली भी भाग सकती हैं। पेरू के राष्ट्रपति फ़ूजीमोरी जीवन भर यह जपते रहे कि वे जन्म से ही पेरूवासी हैं, लेकिन जब भ्रष्टाचार के मुकदमे में उन्हें दोषी पाया गया तो वे अपने गृह देश जापान भाग गये और वहाँ की नागरिकता ले ली।

भारत से घृणा करने वाले मुहम्मद गोरी, नादिर शाह और अंग्रेज रॉबर्ट क्लाइव ने भारत की धन-सम्पदा को जमकर लूटा, लेकिन सोनिया तो “भारतीय” हैं, फ़िर जब राजीव और इन्दिरा प्रधानमंत्री थे, तब बक्से के बक्से भरकर रोज-ब-रोज प्रधानमंत्री निवास से सुरक्षा गार्ड चेन्नई के हवाई अड्डे पर इटली जाने वाले हवाई जहाजों में क्या ले जाते थे? एक तो हमेशा उन बक्सों को रोम के लिये बुक किया जाता था, एयर इंडिया और अलिटालिया एयरलाईन्स को ही जिम्मा सौंपा जाता था और दूसरी बात यह कि कस्टम्स पर उन बक्सों की कोई जाँच नहीं होती थी। अर्जुन सिंह जो कि मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं और संस्कृति मंत्री भी, इस मामले में विशेष रुचि लेते थे। कुछ भारतीय कलाकृतियाँ, पुरातन वस्तुयें, पिछवाई पेंटिंग्स, शहतूश शॉलें, सिक्के आदि इटली की दो दुकानों, (जिनकी मालिक सोनिया की बहन अनुस्का हैं) में आम तौर पर देखी जाती हैं। ये दुकानें इटली के आलीशान इलाकों रिवोल्टा (दुकान का नाम – एटनिका) और ओर्बेस्सानो (दुकान का नाम – गनपति) में स्थित हैं जहाँ इनका धंधा नहीं के बराबर चलता है, लेकिन दरअसल यह एक “आड़” है, इन दुकानों के नाम पर फ़र्जी बिल तैयार करवाये जाते हैं फ़िर वे बेशकीमती वस्तुयें लन्दन ले जाकर “सौथरबी और क्रिस्टीज” द्वारा नीलामी में चढ़ा दी जाती हैं, इन सबका क्या मतलब निकलता है? यह पैसा आखिर जाता कहाँ है? एक बात तो तय है कि राहुल गाँधी की हार्वर्ड की एक वर्ष की फ़ीस और अन्य खर्चों के लिये भुगतान एक बार केमैन द्वीप की किसी बैंक के खाते से हुआ था। इस सबकी शिकायत जब मैंने वाजपेयी सरकार में की तो उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया, इस पर मैंने दिल्ली हाइकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट की बेंच ने सरकार को नोटिस जारी किया, लेकिन तब तक सरकार गिर गई, फ़िर कोर्ट नें सीबीआई को निर्देश दिये कि वह इंटरपोल की मदद से इन बहुमूल्य वस्तुओं के सम्बन्ध में इटली सरकार से सहायता ले। इटालियन सरकार ने प्रक्रिया के तहत भारत सरकार से अधिकार-पत्र माँगा जिसके आधार पर इटली पुलिस एफ़आईआर दर्ज करे। अन्ततः इंटरपोल ने दो बड़ी रिपोर्टें कोर्ट और सीबीआई को सौंपी और न्यायाधीश ने मुझे उसकी एक प्रति देने को कहा, लेकिन आज तक सीबीआई ने मुझे वह नहीं दी, और यह सवाल अगली सुनवाई के दौरान फ़िर से पूछा जायेगा। सीबीआई का झूठ एक बार और तब पकड़ा गया, जब उसने कहा कि “अलेस्सान्द्रा माइनो” किसी पुरुष का नाम है, और “विया बेल्लिनी, 14, ओरबेस्सानो”, किसी गाँव का नाम है, ना कि “माईनो” परिवार का पता। बाद में सीबीआई के वकील ने कोर्ट से माफ़ी माँगी और कहा कि यह गलती से हो गया, उस वकील का “प्रमोशन” बाद में “ऎडिशनल सॉलिसिटर जनरल” के रूप में हो गया, ऐसा क्यों हुआ, इसका खुलासा तो वाजपेयी-सोनिया की आपसी “समझबूझ” और “गठजोड़” ही बता सकता है।

इन दिनों सोनिया गाँधी अपने पति हत्यारों के समर्थकों MDMK, PMK और DMK से सत्ता के लिये मधुर सम्बन्ध बनाये हुए हैं, कोई भारतीय विधवा कभी ऐसा नहीं कर सकती। उनका पूर्व आचरण भी ऐसे मामलों में संदिग्ध रहा है, जैसे कि – जब संजय गाँधी का हवाई जहाज नाक के बल गिरा तो उसमें विस्फ़ोट नहीं हुआ, क्योंकि पाया गया कि उसमें ईंधन नहीं था, जबकि फ़्लाईट रजिस्टर के अनुसार निकलते वक्त टैंक फ़ुल किया गया था, जैसे माधवराव सिंधिया की विमान दुर्घटना के ऐन पहले मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित को उनके साथ जाने से मना कर दिया गया। इन्दिरा गाँधी की मौत की वजह बना था उनका अत्यधिक रक्तस्राव, न कि सिर में गोली लगने से, फ़िर सोनिया गाँधी ने उस वक्त खून बहते हुए हालत में इन्दिरा गाँधी को लोहिया अस्पताल ले जाने की जिद की जो कि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AAIMS) से बिलकुल विपरीत दिशा में है? और जबकि “ऐम्स” में तमाम सुविधायें भी उपलब्ध हैं, फ़िर लोहिया अस्पताल पहुँच कर वापस सभी लोग AAIMS पहुँचे, और इस बीच लगभग पच्चीस कीमती मिनट बरबाद हो गये? ऐसा क्यों हुआ, क्या आज तक किसी ने इसकी जाँच की? सोनिया गाँधी के विकल्प बन सकने वाले लगभग सभी युवा नेता जैसे राजेश पायलट, माधवराव सिन्धिया, जितेन्द्र प्रसाद विभिन्न हादसों में ही क्यों मारे गये? अब सोनिया की सत्ता निर्बाध रूप से चल रही है, लेकिन ऐसे कई अनसुलझे और रहस्यमयी प्रश्न चारों ओर मौजूद हैं, उनका कोई जवाब नहीं है, और कोई पूछने वाला भी नहीं है, यही इटली की स्टाइल है।

[आशा है कि मेरे कई “मित्रों” (?) को कई जवाब मिल गये होंगे, जो मैंने पिछली दोनो पोस्टों में जानबूझकर नहीं उठाये थे, यह भी आभास हुआ होगा कि कांग्रेस सांसद “सुब्बा” कैसे भारतीय नागरिक ना होते हुए भी सांसद बन गया (क्योंकि उसकी महारानी खुद कानून का सम्मान नहीं करती), क्यों बार-बार क्वात्रोच्ची सीबीआई के फ़ौलादी (!) हाथों से फ़िसल जाता है, क्यों कांग्रेस और भाजपा एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं? क्यों हमारी सीबीआई इतनी लुंज-पुंज है? आदि-आदि... मेरा सिर्फ़ यही आग्रह है कि किसी को भी तड़ से “सांप्रदायिक या फ़ासिस्ट” घोषित करने से पहले जरा ठंडे दिमाग से सोच लें, तथ्यों पर गौर करें, कई बार हमें जो दिखाई देता है सत्य उससे कहीं अधिक भयानक होता है, और सत्ता के शीर्ष शिखरों पर तो इतनी सड़ांध और षडयंत्र हैं कि हम जैसे आम आदमी कल्पना भी नहीं कर सकते, बल्कि यह कहना गैरवाजिब नहीं होगा कि सत्ता और धन की चोटी पर बैठे व्यक्ति के नीचे न जाने कितनी आहें होती हैं, कितने नरमुंड होते हैं, कितनी चालबाजियाँ होती हैं.... राजनीति शायद इसी का नाम है...]
बुधवार, 29 अगस्त 2007 11:44

हम हैं मालवा के "खवैय्ये"

Pohe-Jalebi, Dal Bafla and Rabdi of Malwa Region

पश्चिमी मध्यप्रदेश का एक बड़ा भूभाग है जिसे कहते हैं “मालवा” जिसमें मुख्यतः इन्दौर, उज्जैन, देवास, रतलाम और मन्दसौर जिले आते हैं। “पग-पग रोटी, डग-डग नीर” यह कहावत पहले मालवा के लिये कही जाती थी (कही तो अब भी जाती हैं, लेकिन अब डग-डग नीर यहाँ मौजूद नहीं है)। लेकिन मौजूद है यहाँ की “खवैय्येगिरी” की परम्परा। दूध, सोयाबीन और हरी सब्जियों की बहुतायत वाला यह इलाका विभिन्न बेहतरीन व्यंजनों के लिये जाना जाता है। सुबह होती है नाश्ते हेतु पोहे-जलेबी से। कई लोगों को, जिन्होंने यह “कॉम्बिनेशन” नहीं खाया है वह आश्चर्य करेंगे, लेकिन भाप पर पके हुए (जी हाँ, भट्टी पर तपेले में गर्म पानी रखकर उसपर पोहे की कढाई रखी जाती है, और बिना तेल के सीधे हल्दी-मसाला-खड़े धने-अनारदाना- सेंव-प्याज मिलाकर दूर से ही लोगों की लार टपकाने हेतु सजाकर रख दिया जाता है) गरमागरम पोहे का स्वाद वही जान सकता है, जिसने खाया हो। साथ में होती हैं गरम और कड़क जलेबियाँ। एक कौर पोहे का जिसमें एक छोटा सा टुकड़ा जलेबी का, म्म्म्म्म्म मजा आ जाता है, कई बार गप्पें मारते हुए, या “जलेबी बच गई है इसलिये” एक की जगह पोहे की दो प्लेट हो जाती हैं। इतना भारी नाश्ता करने के बाद भोजन दो-तीन बजे के बाद ही होता है। भोजन के लिये हाजिर होते हैं “दाल-बाफ़ले”। दाल-बाफ़ले मालवा का शाही भोजन माना जाता है, जब कोई विशेष आयोजन (मुंडन, सूरज-पूजा, जन्मदिन पार्टी आदि) होता है तब मेजबान दाल-बाफ़ले का कार्यक्रम रखते हैं। संक्षेप में, “बाफ़ला” कहते हैं आटे के एक बड़े, घी में पके हुए गोले को, जिसे दाल में चूरा-चूरा करके खाया जाता है।

बाफ़ला बनाने के लिये रोटी के आटे से थोड़ा मोटा (दरदरा) आटा गूँथा जाता है, फ़िर उसमें नमक, हल्दी आदि मिलाकर उसके गोले बना लिये जाते हैं (आकार में टेनिस गेंद से थोड़े बड़े)। इन आटे के गोलों को कंडे के ढेर में दबा कर उन कंडों को सुलगा दिया जाता है, कंडों की धीमी-धीमी आँच से ये गोले भीतर तक पूरी तरह पक जाते हैं। फ़िर इन्हें बाहर निकालकर उस पर लगी राख आदि को कपड़े से साफ़ करके, शुद्ध घी से भरी हुई एक बड़ी परात में उन्हें हल्का सा “चीरा” लगाकर डुबाया जाता है, इससे गरम-गरम बाफ़ले अन्दर तक घी से पूरी तरह नहा जाते हैं। दाल तो जैसी आपकी मर्जी हो बना दी जाती है (आमतौर पर खट्टी-मीठी), लेकिन इन दोनो के साथ रवे-मावे के लड्डू भी होते हैं, जिसमें सूखा मेवा और मिश्री डाली जाती है, हरी मिर्ची की तीखी चटनी और गोभी या आलू की सब्जी, अब हुई पूरी “डिश” तैयार। पूरी थाली (एक बाफ़ला, दाल, एक लड्डू, चटनी और थोडी सी सब्जी) परोसने के बाद यदि कोई एक और पूरा बाफ़ला लेता है, तो मानना पड़ेगा कि उसकी खुराक बेहतरीन है। लेकिन इसकी नौबत कम ही आती है। इस शानदार और शाही भोजन के बाद शाम चार बजे से पाँच बजे तक एक नींद जरूरी हो जाती है। यह भोजन “एलीट” वर्ग के लिये नहीं है, और उन लोगों के लिये भी नहीं जो आजकल “घी” के नाम से ही चकरा जाते हैं। यह खाना खालिस देसी लोगों के लिये है (ना तो छुरी काँटे से खाया जा सकता है ना चम्मच से, सिर्फ़ भगवान के दिये हाथों से ही), पाचक भी तभी है जब आलथी-पालथी मार कर, पंगत में बैठकर, हाथ पर लगे शुद्ध घी को स्वाद लेकर खाया जाये।

इस असाधारण खाने के बाद शाम को भोजन करने की तो कोई गुंजाइश ही नहीं बनती है, इसलिये आठ-नौ बजे पैदल घूमने निकल जाईये, लम्बी-लम्बी गप्पें हाँकते जाईये, कोई बन्दिश नहीं है, उज्जैन में हों तो महाकाल का दर्शन करते हुए, इन्दौर में हों तो होलकरों के राजवाड़े आदि को देखते हुए, वापस मुख्य बाजार में आइये, जहाँ जवान होती हुई रात के दस बजे के लगभग “लच्छेदार रबड़ी” आपका इन्तजार कर रही है। ऐसी रबड़ी और कहीं नहीं खाई होगी आपने। “रबड़ी”, दूध से बना हुआ ही एक प्रकार है। एक बड़े कढ़ाव में शाम से ही दूध उबलने के लिये छोड़ दिया जाता है, आते-जाते एक हलवाई उस दूध पर एक के बाद एक आती जा रही मलाई की परतों को एक बारीक लोहे की सलाई से कढ़ाव के चारों तरफ़ इकठ्ठा करता जाता है, इससे धीरे-धीरे दूध अटते-अटते कम होता जाता है और तब तक कढ़ाव के चारों तरफ़ किनारों पर मलाई की एक मोटी परत जम चुकी होती है। बस, अन्त में थोड़े से बचे हुए दूध में (जो कि लगभग गुलाबी रंग का हो जाता है) में इस मलाई को काट-काट कर डाल दिया जाता है और उसमें थोड़ी सी शक्कर मिला दी जाती है, हो गई तैयार “रबड़ी”, बस बगल में ओटले पर बैठ जाइये (ना, ना पैंट की चिंता ना करें, ओटले पर बैठकर ही रबड़ी खाने का असली मजा आयेगा), दोने में सौ ग्राम रबड़ी मंगवाईये और (थोड़े ज्यादा हिम्मत वाले हों, तो) उंगली से धीरे-धीरे चाटकर खायें, ऐसा मजा ना मिला होगा, ना दोबारा कहीं मिलेगा। मालवा में आकर यदि आपने दाल-बाफ़ले और रबड़ी नहीं खाई तो यह ठीक वैसा ही होगा जैसे कोई आगरा जाकर ताजमहल ना देखे।

इन सब व्यंजनों के अलावा उज्जैन की एक खासियत और है, वह है भगवान शिव का प्रसाद यानी बूटी, या विजया, सीधी-सीधी भाषा में कहूँ तो “भाँग” (कृपया नाक-भौंह ना सिकोड़ें, क्योंकि जिसने यह “प्रसाद” चखा ही ना हो उसे कोई हक नहीं है इसकी बुराई करने का)। दिनचर्या के दो खास समय जिनका उल्लेख उपर करना रह गया वे हैं नाश्ते के बाद सुबह नौ बजे और दाल-बाफ़ले खाने के बाद शाम को, जी हाँ यही समय है “विजया” लेने का, और आपको कुछ भी नहीं करना है, मुख्य बाजार में कई भाँग-घोटे की दुकानें मिल जायेंगी, सिर्फ़ और सिर्फ़ दो रुपये की गोली घुटवा लीजिये, भोले बाबा का नाम लीजिये और गटक जाइये, बस आधे घंटे के भीतर ही आप “स्वर्गवासी” होंगे... बिलकुल... भाई जब आपको अपने आसपास मेनका, रंभा, उर्वशी नजर आने लगें तो आप “स्वर्गवासी” ही हुए ना! और सिर्फ़ दो रुपये इसलिये कहा कि एक तो सस्ता, सुन्दर और “टिकाऊ” सौदा, और साथ ही यह मात्रा इतनी होती है कि ना तो नाली में गिरने का खतरा होता है, ना ही बीबी को पता चलने का, यानी मौज ही मौज। एक बात और, कि शिवबूटी का सेवन करने पर आपकी भूख खुल जाएगी, तब या तो हँसते-हँसते आप आधा बाफ़ला ज्यादा खा जायेंगे, या फ़िर सौ ग्राम रबड़ी का एक दोना और पेट में खिसका देंगे.... राम कसम हम मालवा वाले तो खाने में ही लुट गये हैं... तो आप किस बात का इन्तजार कर रहे हैं हुजूर... चले आईये म्हारे मालवा मां...

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“बाराहा” के वासु, “अक्षरमाला” के श्रीनिवास अन्नम, “कैफ़े-हिन्दी” के मैथिली गुप्त, लिनक्स हिन्दीकरण के महारथी रवि रतलामी, “गमभन” के ओंकार जोशी, प्रभासाक्षी के बालेन्दु शुक्ल, “वेबदुनिया” के विनय छजलानी, हिन्दी ब्लॉगिंग और हिन्दी कम्प्यूटिंग को आसान बनाने वाली हस्तियाँ अविनाश चोपड़े, रमण कौल, आलोक कुमार, हरिराम जी, देबाशीष, ई-स्वामी, हिमांशु सिंह, श्रीश शर्मा....और इन जैसे कई लोग हैं... ये लोग कौन हैं? क्या करते हैं? कितने लोगों ने इनका नाम सुना है?....मैं कहता हूँ, ये लोग “हिन्दी” भाषा को कम्प्यूटर पर स्थापित करने के महायज्ञ में दिन-रात प्राणपण से आहुति देने में जुटे हुए “साधक” हैं, मौन साधक।

अब एक और “हिन्दी दिवस” आने वाला है, सरकारी गोष्ठियाँ, सेमिनार, शोधपत्र आदि की बरसात होने ही वाली है, हिन्दी की महिमा का बखान किया जायेगा, फ़ाईव स्टार होटलों में सभायें की जायेंगी, हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग करने की सनातन कसमें खाई जायेंगी, फ़िर अगली १४ सितम्बर तक सभी चादर ओढ़कर सो जायेंगे। अगले ही दिन से भारत की तरक्की, आईटी ज्ञान, दस फ़ीसदी की विकास दर, सॉफ़्टवेयर निर्यात करने के डॉलरों की गिनती, छलांग मारता हुआ सेंसेक्स, यह सब प्रपंच चालू हो जायेगा। सरकार यह कहते नहीं अघाती कि भारत ने आईटी में सबको पीछे छोड़ दिया है, हमारी सॉफ़्टवेयर कम्पनियाँ और इंजीनियर दुनिया भर में अपना परचम लहरा रहे हैं। इन्फ़ोसिस, टीसीएस, विप्रो और सत्यम की कुल आमदनी कई अफ़्रीकी देशों के कुल बजट से भी अधिक होगी। इस सारी चकाचौंध में एक सवाल रह-रहकर उठता है कि इन “महान” भारतीय आईटी कम्पनियों ने भारतीय भाषाओं के उत्थान के लिये अब तक क्या योगदान दिया है? डॉलरों मे कमाने वाली और अपने कर्मचारियों को लाखों के पैकेज देकर समाज में एक असंतुलन पैदा करने वाली इन कम्पनियों ने सरकार से जमीनें लीं, पानी-बिजली में सबसिडी ली, टैक्स में छूट ली, हार्डवेयर आयात करने के लिये ड्यूटी कम करवाई, यहाँ तक कि जब रुपया मजबूत होने लगा और घाटा (?) बढने लगा तो वहाँ भी वित्तमंत्री ने दखल देकर उनका नुकसान होने से उन्हें बचाया। तात्पर्य यही कि इतनी “महान” कम्पनियों ने क्या आज तक भारत के आम लोगों के लिये एक भी मुफ़्त वितरित करने वाला हिन्दी सॉफ़्टवेयर बनाया है? या किसी अन्य भारतीय भाषा को बढ़ावा देने के लिये कुछ किया है? याद तो नहीं पड़ता.... जबकि ऊपर जिन व्यक्तियों का उल्लेख किया गया है, उनमें से शायद ही कोई करोड़पति या अरबपति हो, किसी एकाध-दो नें कुछेक हजार डॉलर कमा भी लिये होंगे तो वह इन्फ़ोसिस आदि के सामने नगण्य ही है। जबकि ये सभी और इन जैसे कई लोग आम आदमी को कम्प्यूटर पर हिन्दी से परिचित करवाने के लिये संघर्षरत हैं, एक अथक साधना में लगे हुए हैं, कईयों ने तो अपनी जेब से रुपये खर्चा करके हिन्दी सॉफ़्टवेयर बनाये, और उन्हें मुफ़्त में लोगों को बाँटा, क्यों? क्योंकि व्यक्ति या संस्था के ज्ञान का उपयोग समाज को होना चाहिये, यह एक प्रकार की समाजसेवा ही है। क्या ये लोग डॉलर नहीं कमा सकते थे? क्या ये सभी लोग अमेरिका जाकर ऐशो-आराम की जिन्दगी नहीं बिता सकते थे? सरासर कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, इनमें से कई ने भारत में ही रहकर हिन्दी की असली सेवा की, कुछ लोगों ने विदेश में रहकर भी हिन्दी की लौ को दिल से बुझने नहीं दिया, बिना किसी स्वार्थ के। आज धीरे-धीरे हिन्दी और यूनिकोड का संसार बड़ा होता जा रहा है उसके पीछे इन लोगों की मेहनत छुपी हुई है।

बाराहा और वेबदुनिया पिछले आठ-दस वर्षों से हिन्दी पर काम कर रहे हैं, मैथिली गुप्त जी के बनाये हुए “कृतिदेव” फ़ॉट का उपयोग तो शायद भारत में हिन्दी टाइप करने वाला प्रत्येक व्यक्ति करता है, बालेन्दु शुक्ल और रवि रतलामी को माइक्रोसॉफ़्ट का विशेष पुरस्कार/प्रशस्ति मिल चुकी है (बाकी सभी हस्तियों पर अगले लेख “हिन्दी दिवस-भाग २” में चर्चा करूँगा ही), लेकिन फ़िर वही सवाल, क्या आम भारतवासी को हिन्दी में काम करने, उसे बढ़ावा देने, दैनंदिन जीवन में उपयोग करने लायक एक आसान सा सॉफ़्टवेयर किसी भारतीय कम्पनी ने बनाया? भारतीयों को हमेशा प्रत्येक बात के लिये माइक्रोसॉफ़्ट या गूगल का मुँह क्यों ताकना पड़ता है? ये विदेशी कम्पनियाँ भारतीय भाषाओं को जब अपने सॉफ़्टवेयरों में लायेंगी, जब सभी कम्प्यूटरों में ये आ जायेंगी, ज्यादा से ज्यादा लोग इनका उपयोग करने लगेंगे तब हिन्दी और अन्य भाषायें फ़ैलेंगी, इसमें नया क्या होगा? ये तो हमेशा से होता आया है, और इन कम्पनियों को भी मालूम है कि अब अंग्रेजी जानने वाले तबके (अर्थात भारत की जनसंख्या का लगभग बीस प्रतिशत) में कम्प्यूटरों की खपत का “सेचुरेशन” बिन्दु लगभग करीब आ चुका है, अब बारी है नये-नवेले पैदा हुए मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग की, जो कि हिन्दी कम्प्यूटरों को हाथोंहाथ लेगा (सुना है कि “विस्टा” में हिन्दी “इन-बिल्ट” ही कर दिया गया है), सब ठीक है, बढिया है, लेकिन इस सबमें करोड़ों डॉलर का मुनाफ़ा कमाने वाली भारतीय कम्पनियों का क्या योगदान है? और यदि “बैक-ऑफ़िस” (इसका हिन्दी अनुवाद तो “पिछवाड़े” में काम करने वाला/वाली होता है) में इन्होंने बैंक, एयरलाइंस या किसी अन्य सॉफ़्टवेयर के लिये हिन्दी में योगदान दिया भी हो, तो वह उनके प्रिय “डॉलर” के लिये है, ना कि किसी भाषा-प्रेम के कारण। इन्फ़ोसिस में लगभग पन्द्रह प्रतिशत कर्मचारी “बेंच-स्ट्रेन्थ” के नाम पर फ़ालतू बिठाकर रखे जाते हैं, ऐसे सॉफ़्टवेयर इंजीनियर रोज सुबह कार्यालय आते हैं, कोक-पेप्सी पीते हैं, गेम खेलते हैं, किसी नये प्रोजेक्ट के इन्तजार में बेकार बैठे-बैठे इनकी क्षमतायें कुन्द हो जाती हैं, शाम को ये घर चले जाते हैं, वह भी एक मोटी तनख्वाह लेकर। क्या इन कर्मचारियों से, जो कि फ़िलहाल “फ़ालतू” ही हैं, भारतीय भाषाओं पर सॉफ़्टवेयर तैयार करने को नहीं कहा जा सकता? उन्हें भी एक नया अनुभव मिलेगा, और जब भी कोई नया प्रोजेक्ट मिले उन्हें वहाँ काम पर लगाया जा सकता है, तब तक नये “फ़ालतू” भर्ती हो ही जायेंगे, उन्हें ये काम सौंपा जाये।

हर काम “कमाई” के लिये नहीं किया जाता, समाज के लिये भी कुछ किया जाना चाहिये। वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम ने विकलांगों के लिये वरदान साबित हुए “जयपुर फ़ुट” में कुछ संशोधन करके उसमें टाइटेनियम धातु का मिश्रण किया जिससे उनका वजन कम हो गया, और विकलांगों को एक नई ऊर्जा मिली, उन्होंने यह काम “पेटेंट” के लालच में या “डॉलर” कमाने के लिये नहीं किया (शायद इसीलिये वह “कलाम साहब” हैं)। माना कि इन कम्पनियों ने भी स्कूल खोले हैं, गरीबों को मुफ़्त शिक्षा का अवसर दिया है, कई सरकारी स्कूलों में नये/पुराने कम्प्यूटर मुफ़्त में दिये हैं, स्कॉलरशिप दी हैं, लेकिन क्या इतना पर्याप्त है?

क्या एक आम भारतवासी को यह गर्व नहीं होना चाहिये कि वह जिस सॉफ़्टवेयर पर “निजभाषा” में काम करता है, वह उसी के देश की सबसे बड़ी कम्पनी ने बनाया है, और भारत में रहने वाले लोग बिल गेट्स पर निर्भर नहीं हैं? कब तक हम लोग चोरी के, पायरेटेड, आधे-अधूरे से और वह भी माइक्रोसॉफ़्ट के, सॉफ़्टवेयरों पर काम करते रहेंगे? लेकिन क्या मेरे जैसे अदना से व्यक्ति की यह आवाज “वहाँ” तक पहुँच पाएगी? क्या ये बड़े लोग, विदेशों में कम्पनियाँ अधिग्रहण करते-करते, कुछ करोड़ डॉलर हिन्दी के लिये भी छोड़ देंगे?

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Teacher’s Day Siddhanath Verma

“एक पैर से उचक-उचक कर चलना मजबूरी, दो हाथ नहीं, सिर्फ़ एक पैर विकसित है”

मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में शाजापुर नामक जिले में एक जिजीविषा की साक्षात मिसाल हैं श्री सिद्धनाथ वर्मा जी। शिक्षक दिवस पर राष्ट्रपति पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया जायेगा। सिद्धनाथ जी स्थानीय शासकीय नवीन कन्या माध्यमिक विद्यालय में सहायक शिक्षक हैं। वर्मा जी सम्भवतः देश के ऐसे पहले शिक्षक हैं जो पैर से बोर्ड पर लिखकर पढाते हैं, क्योंकि जन्म से ही उनके दोनो हाथ नहीं है और दाहिना पैर अविकसित है। इस महान व्यक्ति ने पैर से ही लिखकर बी.कॉम, एम.कॉम., बी.एड., एलएलबी की परीक्षायें प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। दोनो बाहें ना होने के कारण वे बैसाखी का उपयोग भी नहीं कर सकते। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी गई-गुजरी रही कि ट्रायसिकल खरीदने के पैसे ही नहीं थे। अतः एक ही पैर से उचक-उचक कर अपने गाँव “करजू” से छः किमी दूर बड़ोदिया परीक्षा देने जाते थे, बाद में जब इनकी नौकरी लगी तब कहीं जाकर ट्रायसिकल खरीद पाये।

वे बताते हैं कि कुदरत के इस क्रूर मजाक को उन्होंने एक चुनौती के रूप में लिया, एक पैर से उचककर चलना सीखा, हाथों का काम पैर से लिये, लिखना सीखा, प्राथमिक स्तर तक की पढाई गाँव में, माध्यमिक स्तर की मो.बड़ोदिया में और महाविद्यालयीन स्तर की पढ़ाई शाजापुर में सम्पन्न की। वर्मा जी ने कई वर्षों तक इलेक्ट्रॉनिक घड़ियों के सेल्समैन के रूप में काम किया, क्योंकि नौकरी के लिये इन्हें काफ़ी भटकना पड़ा (किसी नेता के भतीजे नहीं हैं, और ना ही रिश्वत देने के लिये हराम के रुपये थे)। सामाजिक न्याय अधिकारिता मंत्रालय द्वारा उन्हें 1998 में पुरस्कृत किया जा चुका है। कई स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा भी उन्हें अलंकृत किया गया है (उस समय ये सभी एनजीओ और तमाम “क्लब” पता नहीं कहाँ थे, जब वे ट्रायसिकल के लिये संघर्षरत थे)। और अब राष्ट्रपति द्वारा आगामी शिक्षक दिवस पर इन्हें सम्मानित किया जायेगा। आइये सलाम करें जीवट के धनी इस महान व्यक्ति को, जिसे मीडिया का कवरेज शायद कभी नहीं मिलेगा, क्योंकि हमारा मीडिया सुबह से इस खबर की खोज (?) में जुट जाता है कि “कहाँ, किस शिक्षक या शिक्षिका ने बच्चों के साथ यौन कुंठा व्यक्त की”, या “कहाँ, किस शिक्षक का मुँह उन लाड़लों द्वारा काला किया गया, जो कनपटी पर मोबाईल और पिछवाड़े के नीचे “बाइक” लिये घूमते रहते हैं, और दो-दो हाथ और पैर होने के बावजूद एक डिग्री भी ईमानदारी से नहीं पा सकते”।

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Wedding Ring Finger

शायद वर्षों से यह परम्परा चली आ रही है कि सगाई या शादी की अंगूठी हमेशा “अनामिका” उंगली में ही पहनी जाती है। हालांकि इस परम्परा के बारे में अधिक जानकारी का अभाव है, लेकिन अब चूँकि परम्परा है तो लोग लगातार निभाये जाते हैं। हाल ही में एक ई-मेल में यह रोचक जानकारी मिली, जिसमें अनूठे “लॉजिक” के जरिये यह सिद्ध किया गया है कि अंगूठी उसी उंगली में क्यों पहनना चाहिये, आप भी मुलाहिजा फ़रमाईये –

सर्वप्रथम माना कि सबसे मजबूत होते हैं अंगूठे अर्थात उन्हें हम माता-पिता की संज्ञा दें –
फ़िर अगली उंगली “तर्जनी” को माना जाये हमारे भाई-बहन –
फ़िर आती है बीच की उंगली “मध्यमा” ये हैं हम स्वयं (परिवार का केन्द्रबिन्दु) –
उसके बाद रिंग फ़िंगर “अनामिका” जिसे हम मान लेते हैं, पत्नी –
सबसे अन्त में “कनिष्ठा” उंगली को हम मानते हैं, हमारे बच्चे –

अब चित्र में दिखाये अनुसार अपनी दोनों हथेलियाँ पूरी फ़ैलाकर उनके पोर आपस में मिला लीजिये और बीच की दोनो उंगलियाँ “मध्यमा” (ऊपर माना गया है कि जो आप स्वयं हैं) को अपनी तरफ़ मोड़ लीजिये, हथेलियों को जोड़े रखिये –



अब दोनो अंगूठों (जिन्हें हमने माता पिता माना है) को अलग-अलग कीजिये, क्योंकि अनचाहे ही सही माता-पिता जीवन भर हमारे साथ नहीं रह सकते। फ़िर अंगूठों को साथ मिला लीजिये।
अब दोनों तर्जनी (जिन्हें हमारे भाई-बहन, रिश्तेदार माना है) को अलग-अलग करके देखिये, क्योंकि भाई-बहन और रिश्तेदार भी उम्र भर साथ नहीं रहने वाले, उनके भी अपने परिवार हैं। फ़िर वापस तर्जनी अपनी पूर्व स्थिति में ले आईये।
अब सबसे छोटी कनिष्ठा (हमारे बच्चे) को भी अलग कर देखिये, वे भी जीवन भर हमारे साथ नहीं रहने वाले हैं, बड़े होकर कहीं दूर निकल जायेंगे। पुनः दोनो उंगलियों को वापस पूर्वस्थान पर रख लें।
अब सबसे अन्त में “अनामिका” को अलग-अलग करने की कोशिश कीजिये, नहीं होंगी, क्योंकि पति-पत्नी को आजीवन साथ रहना होता है, तमाम खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ, इसीलिये “अनामिका” में शादी की अंगूठी पहनाई जाती है। एक बार यह करके देखिये....
Hindi Computing Hindi Diwas

जब मैंने पिछली पोस्ट (हिन्दी दिवस भाग-१ : हिन्दी के लिये आईटी उद्योग ने क्या योगदान किया?) लिखी, उसमें मैंने हिन्दी के कतिपय निस्वार्थ सेवकों का मात्र उल्लेख किया था। अब इस भाग में मैं उनके कामों पर कुछ रोशनी डालूँगा। हालांकि यह जानकारी ब्लॉग जगत में रमने वाले को आमतौर पर है, लेकिन ब्लॉग जगत के बाहर भी कई मित्र, शुभचिंतक हैं जिन्हें यह जानकारी उपयोगी, रोचक और ज्ञानवर्द्घक लगेगी। उन्हें यह पता चलेगा कि कैसे संगणक पर हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के बारे में बिखरे तौर पर ही सही लेकिन समाजसेवियों ने काम शुरु किया, उसे आगे बढाया, प्रचारित किया, मुफ़्त में लोगों को बाँटा, नेटवर्क तैयार किया, उसे मजबूत किया और धीरे-धीरे हिन्दी को कम्प्यूटर पर आज यह मुकाम दिलाने में सफ़ल हुए।

यदि बहुत पहले से शुरु किया जाये, अर्थात कम्प्यूटर पर हिन्दी को स्थापित करने की शुरुआत के तौर पर, तो सबसे पहले कुछ नाम तत्काल दिमाग में आते हैं जैसे बाराहा के श्री वासु और सुवि इन्फ़ॉर्मेशन सिस्टम (जो बाद में वेबदुनिया बन गया) के विनय छजलानी, जो लगभग सन 1992-93 से हिन्दी के विकास के लिये तत्पर हो गये थे (पहला वेबदुनिया हिन्दी पैड मैने सन 1996 में उपयोग कर लिया था, जब विन्डोज95 आया-आया ही था)। कालान्तर में “सुवि” के काम को माइक्रोसॉफ़्ट ने प्रशंसित किया और इसके साथ सहयोग करने की इच्छा जताई। हिन्दी के कई ऑनलाईन या इंटरनेट समाचार पत्रों हेतु सबसे पहले “सुवि” ने कई फ़ॉन्ट उपलब्ध करवाये। अगला नाम है iTrans के जनक अविनाश चोपड़े जी का, जिन्हें फ़ोनेटिक औजारों का पितामह कहा जा सकता है। इसके अलावा सराय.नैट से जुड़े काफी लोगों ने भी काम किया है जैसे राघवन जी तथा सुरेखा जी ने एक जावास्क्रिप्ट आधारित IME बनाया था, उस पर आधारित बहुत से औजार बाद में बने। आज जितने भी फोनेटिक औजार चल रहे हैं, वे सब iTrans स्कीम पर आधारित हैं। मैथिली गुप्त जी ने “कृतिदेव” नामक अब तक का सबसे लोकप्रिय फ़ॉन्ट बनाया, जिसे माइक्रोसॉफ़्ट ने अपने तमाम विन्डोज में “बाय-डिफ़ॉल्ट” डाल रखा है। इसके अलावा मैथिली जी ने हिन्दी पैड और कई औजार भी बना-बना कर मुफ़्त में बाँटे। यूनिकोड आने के बावजूद आज भी टायपिंग, वर्ड प्रोसेसिंग और डीटीपी के लिये सबसे लोकप्रिय फ़ॉन्ट कृतिदेव ही है। यूनिकोड के आने से पहले इंटरनैट पर हिन्दी साइटें आम तौर पर दो फॉन्टों में होती थीं - कृतिदेव तथा शुषा। शुषा को भारतभाषा.कॉम नामक किसी ग्रुप ने बनाया तथा मुफ्त में जारी किया। ये शायद पहला ऐसा फॉन्ट था जो फोनेटिक से मिलता-जुलता था। अभिव्यक्ति पत्रिका पहले इसी फॉन्ट में होती थी। एक और नाम है आलोक कुमार , जिन्होंने इंटरनैट पर यूनिकोड हिन्दी के बारे में शायद सबसे पहले खास फिक्र करनी शुरु की, देवनागरी.नैट साइट बनाई, जिस पर हिन्दी UTF-8 का समर्थन आदि बारे सहायता दी। आज भले ही वो खास न लगे, पर पुराने टाइम में इस साइट ने बहुतों की मदद की। इसके अतिरिक्त लिप्यांतरण टूल गिरगिट भी आलोक जी ने बनाया। शून्य नामक टेक्नीकल साइट शुरु करने में भी इनका हाथ था। आलोक जी शायद सबसे पुराने तकनीकी अनुवादकों में से हैं, उन्होंने बहुत से ऑनलाइन तंत्रों का हिन्दी अनुवाद किया। ब्लॉग जगत के “स्टार” रवि रतलामी जी, लिनक्स के हिन्दीकरण में इनका अहम योगदान रहा है, कई तकनीकी और तन्त्रज्ञान सम्बन्धी अनुवाद भी इन्होंने किये हैं।

हिन्दी के एक और सेवक हैं हरिराम जी, सीडैक तथा अन्य राजकीय विभागों के साथ कई प्रोजैक्टों मे शामिल रहे हैं। इसके अतिरिक्त ये हिन्दी कम्प्यूटिंग के कोर स्तर की जानकारी रखते हैं तथा इसको कोर स्तर पर यानि की जड़ से ही सरल बनाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। चिठ्ठाजगत में एक और जाना-पहचाना नाम है देबाशीष जी का, शायद ये सबसे पुराने हिन्दी चिट्ठाकारों में से एक हैं। इन्होंने हिन्दी का पहला लोकप्रिय एग्रीगेटर ‘चिट्ठाविश्व’ बनाया। इंडीब्लॉगीज की शुरुआत करके भारतीय भाषी चिट्ठों को नई पहचान दी। बांग्ला के भी ये आधारस्तंभ ब्लॉगर हैं, और भी बहुत से हिन्दी संबंधी नए प्रयोग इन्होंने किए ज्यादातर साइटों आदि के रुप में। जब ये हिन्दी चिट्ठाकारी से जुडे़ तो इन्हें लगा कि हिन्दी संबंधी सहायता लिखित रुप में सही तरीके से उपलब्ध नहीं है, तो इन्होंने अपने चिट्ठे पर लिखना शुरु किया। जीतेन्द्र चौधरी (“नारद” के कर्ताधर्ता), मिर्ची सेठ आदि अक्षरग्राम के लोगों की मदद और रुचि से “सर्वज्ञ” चालू हुआ। आज सर्वज्ञ काफी बेहतर स्थिति में है, इन लोगों ने जब से सर्वज्ञ पर नवीनतम जानकारी सहित सभी जरुरी लेख डाले, तो हिन्दी प्रयोक्ताओं की सँख्या में जबरदस्त उछाल आया।

शुरुआत में हिन्दी चिट्ठाकारों का मुख्य काम हिन्दी का प्रचार तथा विभिन्न फ्रंटएंड के औजार बनाने में रहा, क्योंकि लगभग सभी चिठ्ठाकार तकनीकी लोग ही थे। एक और सज्जन हैं रमण कौल, इन्होंने छाहरी के औजार को संशोधित कर विभिन्न ऑनलाइन कीबोर्ड बनाए, रमण कौल जी का एक मुख्य प्रयास रहा इनस्क्रिप्ट तथा रेमिंगटन के लिए ऑनलाइन कीबोर्ड उपलब्ध कराना। फोनेटिक के तो बहुत से ऑनलाइन कीबोर्ड पहले से थे पर इन दोनों के नहीं थे। रमण जी ने इनको उपलब्ध करवा को लोगों को बहुत आसानी कर दी। ईस्वामी जी ने “हग” टूल बनाया जो पुराने समय में जब कि कीबोर्ड ड्राइवर इंजन (बरहा आदि) ज्यादा प्रचलित नहीं थे तब काफी काम आता था। ईस्वामी के हग को कोड से भी बहुत लोगों ने प्रेरणा ली। “परिचर्चा” पर “हग” लगा है, एक दो फायरफॉक्स एक्सटेंशनों में है, हिमांशु सिंह की हिन्दी-तूलिका सेवा में है। हग आधारित एक वर्डप्रैस प्लगइन बन चुका है। जिसे वर्डप्रैस ब्लॉग पर टिप्पणी के लिए लगा सकते हैं। हिमांशु सिंह ने इण्डिक आईएमई को हैक करके नया टूल बनाया जो कि विंडोज 2000 तथा एक्स पी में इण्डिक लैंग्वेज सपोर्ट स्वतः इंस्टाल कर देता है साथ ही इण्डिक आईएमई भी इंस्टाल करता है, इससे एक कम जानकारी वाला (मेरे जैसा) कम्प्यूटर उपयोगकर्ता भी आसानी से संगणक में हिन्दी इन्स्टाल कर लेता है, साथ ही उन्होंने हिन्दी-तूलिका नामक ऑनलाइन औजार भी हग के कोड के आधार पर बनाया है। रजनीश मंगला जी ने भी फॉन्टों संबंधी कई काम के टूल बनाए हैं। “अक्षरग्राम” ने एक विशाल नैटवर्क तैयार किया, इसने भले ही खुद कोई विशेष हिन्दी कंप्यूटिंग में अंदरुनी काम नहीं किया लेकिन जन-जन तक हिन्दी को पहुँचाने में अक्षरग्राम का महती योगदान रहा। मितुल पटेल जी हिन्दी विकिपीडिया के संपादक हैं, इन्होंने हिन्दी विकीपीडिया पर जानकारी बढ़ाने में काफी योगदान दिया। एक साहब हैं अनुनाद सिंह जी, इन्होंने इंटरनैट पर हिन्दी संबंधी विभिन्न जगहों पर मौजूद ढेरों लिंक्स को संग्रहित किया। फ़ोनेटिक का एक और औजार है "गमभन" जो मराठी ब्लॉग लिखने वालों में अधिक प्रचलित है, उसके जनक हैं ओंकार जोशी, विनय जैन जी गूगल की कुछ सेवाओं सहित कई तंत्रों के हिन्दी अनुवाद से जुड़े रहे हैं।

सबसे अन्त में नाम लूँगा श्रीश शर्मा जी (ई-पंडित) का, कम्प्यूटर की तकनीकी, ब्लॉगिंग सम्बन्धी अथवा अन्य कोई भी जानकारी हो, सरलतम भाषा में समझाने वाले शिक्षक हैं ये। सभी की मदद के लिये सदैव तत्पर और विनम्र श्रीश जी ने हिन्दी कंप्यूटिंग के प्रति लोगों की मानसिकता को समझा तथा उसी हिसाब से पर्याप्त मात्रा में आम बोलचाल वाली हिन्दी में जानकारी उपलब्ध करवाई, अपने चिट्ठे पर तथा सर्वज्ञ पर। अक्षरग्राम के विभिन्न प्रोजैक्टों में इनका सक्रिय सहयोग रहता है। श्रीश जी का मकसद है कि हिन्दी कंप्यूटिंग संबंधी जानकारी से “सर्वज्ञ” को लबालब भर देना ताकि वो इंटरनैट पर हिन्दी उपयोगकर्ताओं के मार्गदर्शन हेतु “एकल खिड़की प्रणाली” बन जाए। यह विस्तृत लेख भी उनसे हुई लम्बी चर्चा के फ़लस्वरूप ही आकार ले पाया है।

इसके अलावा भारत सरकार के अंतर्गत राजभाषा विभाग, सीडैक तथा ildc जैसे विभागों द्वारा यूनिकोड में देवनागरी के मानकीकरण तथा इनस्क्रिप्ट कीबोर्ड के विकास आदि महत्वपूर्ण कार्य किए गए हैं। बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिन्हें हम नहीं जानते, उनमें सीडैक के बहुत से प्रोग्रामर आदि सहित विभिन्न स्वतंत्र प्रोग्रामर भी हैं, यह भी हो सकता है कि कई लोगों के नाम इसमें छूट गये हों, लेकिन ऐसा सिर्फ़ मेरे अज्ञान की वजह से हुआ होगा। तात्पर्य यह कि ऐसे कई नामी, बेनामी, सेवक हैं जिन्होंने हिन्दी कम्प्यूटिंग और यूनिकोड की नींव रखी, परदे के पीछे रहकर काम किया। आज जो हिन्दी के पाँच-छः सौ ब्लॉगर, की-बोर्ड पर ताल ठोंक रहे हैं यह सब इन्हीं लोगों की अथक मेहनत का नतीजा है। यह कारवाँ आगे, आगे और आगे ही बढ़ता चले, इसमें सैकड़ों, हजारों, लाखों लोग दिन-ब-दिन जुड़ते जायें, तो बिना किसी के आगे हाथ फ़ैलाये हिन्दी विश्व की रानी बन कर रहेगी। आमीन...

(अगले भाग “हिन्दी दिवस भाग-३” में हिन्दी भाषा में बढते भ्रष्टाचार, उसके कारणों और निवारण के बारे मे.... जारी...)

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Corrupt Hindi Language & Education

“लफ़ड़ा”, “हटेले”, “खाली-पीली”, “बोम मत मार”, “निकल पड़ी”..... क्या कहा, इन शब्दों का मतलब क्या है? मत पूछिये, क्योंकि यह एक नई भाषा है, जिसका विस्तार (?) तेजी से हो रहा है, स्रोत है मायानगरी मुम्बई की हिन्दी फ़िल्में। दृश्य मीडिया की भाषा की एक बानगी – “श्रीलंकन गवर्नमेंट ने इस बात से डिनाय किया है कि उसने जफ़ना अपने ट्रूप्स को डिप्लॉय करने का प्लान बनाया है”, हाल ही में हिन्दी के सबसे ज्यादा प्रसार संख्या वाले “भास्कर” में छपा एक विज्ञापन- “कृतिकार भास्कर क्रिएटिव अवार्ड्स में एंट्री भेजने की लास्ट डेट है 31 अगस्त“... ऐसी भाषा का स्रोत हैं नये-नवेले भर्ती हुए तथाकथित चॉकलेटी पत्रकार जो कैमरा और माईक हाथ में आते ही अपने-आप को सभी विषयों का ज्ञाता और जमीन से दो-चार इंच ऊपर समझने लगते हैं। जिन्हें न तो भाषा से कोई मतलब है, ना हिन्दी से कोई वास्ता है, ना इस बात से कि इस प्रकार की भाषा का संप्रेषण करके वे किसके दिलो-दिमाग तक पहुँचना चाहते हैं।

किसी भी भाषा का विस्तार, उसका लगातार समृद्ध होना एवं उस भाषा के शब्दकोष का विराटतर होते जाना एक सतत प्रक्रिया है, जो वर्षों, सदियों तक चलती है। इसमें हिन्दी या अंग्रेजी भी कोई अपवाद नहीं है, परन्तु उपरोक्त उदाहरण हमारे सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा करते हैं कि आने वाले दस-बीस वर्षों मे आम बोलचाल की भाषा क्या होगी? उसका स्वरूप कैसा होगा? क्या इस “हिंग्लिश” को ही हम धीरे-धीरे मान्यता प्रदान कर देंगे (यह हमारी मातृभाषा कहलायेगी?), न सिर्फ़ हिंग्लिश बल्कि मुम्बईया टपोरी भाषा भी तेजी से फ़ैल रही है और प्रचलित भाषा को भ्रष्ट किये दे रही है।

आमतौर पर इस बात पर बहस चलती रहती है कि समाज में जो घटित होता उसका असर फ़िल्मों पर होता है या फ़िल्मों मे जो दिखाया जाता है उसका असर समाज पर होता है, लेकिन जिस तेजी से जनता “पेटी” और “खोके” का मतलब समझने लगी है वह निश्चित तौर पर फ़िल्मों का ही असर है। इस बहस में न पड़ते हुए यदि हम गहराई से भाषा के भ्रष्टाचार पर ही विचार करें तो हम पायेंगे कि बोली को सबसे अधिक प्रभावित किया है फ़िल्मों और टीवी ने, और अब यह तथाकथित भाषा केबल और डिश के जरिये गाँवों तक भी पहुँचने लगी है। हालांकि आज भी गाँव का कोई युवक जब महानगर जाता है तो उसके आसपास के युवक जिस तरह की अजीब-अजीब भाषा और शब्द बोलते हैं तो उसे लगता है कि वह फ़िनलैंड या वियतनाम पहुँच गया है। महानगरीय नवयुवकों द्वारा बोले जाने वाले कुछ शब्दों का उदाहरण- “सत्संग में चलें” का मतलब होता है दारू पार्टी, झकास मतलब बहुत बढिया, बैटरी मतलब चश्मेवाला, खंभा मतलब बीयर की पूरी बोतल... ऐसे अनेकों शब्द सुनकर आप कभी समझ नहीं सकते कि असल में क्या कहा जा रहा है।

जनमानस पर समाचार-पत्र, फ़िल्में और टीवी गहरा असर डालते हैं। यह प्रभाव सिर्फ़ पहनावे, आचार-विचार तक ही सीमित नहीं होता, भाषा पर भी होता है। इसमें सर्वाधिक नुकसान हो रहा है उर्दू का, नुकसान तो हिन्दी का भी हो ही रहा है लेकिन अब आम बोलचाल में उर्दू शब्दों का स्थान अंग्रेजी ने ले लिया है। जैसे फ़िल्मी गीत भी धीरे-धीरे “शबनम”, “नूर” “हुस्न” से हटकर “खल्लास”, “कम्बख्त” और “कमीना” पर आ गये हैं उसी तरह संवाद भी “मुलाहिजा”, “अदब”, “तशरीफ़” से हटकर “कायको”, “चल बे”, “फ़ोकट में” पर उतर आये हैं। रही-सही कसर कम्प्यूटर के बढ़ते प्रचलन और ई-मेल ने पूरी कर दी है, जिसमें फ़िलहाल अंग्रेजी की ही बहुतायत है। भाई लोगों ने यहाँ पर भी “how are you” को “h r U” तथा “Respected Sir” को “R/sir” बना डाला है। पता नहीं इससे समय की बचत होती है या “गलत आदत” मजबूत होती है। हिन्दी में भी “ङ्” का प्रयोग लगभग समाप्त हो चला है, “ञ” तथा “ण” का प्रयोग भी खात्मे की ओर है, अब हमें “मयङ्क” या “रञ्ज”, “झण्डा” या “मन्दिर” कम ही देखने को मिलते हैं ये सभी सीधे-सीधे बिन्दु सिर पर लेकर “मयंक, रंज, झंडा और मंदिर” बन गये हैं। हमे बताया गया है कि प्रकाशन की सुविधा के कारण यह समाचार पत्रों आदि ने भी इन बीच के अक्षरों को बिन्दु में बदल दिया है, लेकिन इससे तो ये अक्षर सिर्फ़ पुस्तकों में ही रह जायेंगे। यही बात अंकों के साथ भी हो रही है, अंतरराष्ट्रीय और बाजार की ताकतों के आगे झुकते हुए “१,२,३,४,५,६,७,८,९” को “1,2,3,4,5,6,7,8,9” में बदल दिया गया है। माना कि भाषा को लचीला होना चाहिये, लेकिन लचीला होने और भ्रष्ट होने में फ़र्क होना चाहिये। ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोष ने भी “पराठा”, “अचार” और “लस्सी” आदि को शामिल कर लिया है, तो हमने भी “स्टेशन”, “पेन”, “ट्रेन” आदि को सरलता से अपना लिया है, लेकिन “हटेले” को आप कैसे परिभाषित करेंगे?

अब बात करते हैं समस्या की जड़ की और उसके निवारण की। अकेले मीडिया के दुष्प्रभाव को दोषी ठहराना एकतरफ़ा होगा, अन्य दो मुख्य कारण जो तत्काल नजर आते हैं वे प्राथमिक शिक्षा से जुड़े हुए हैं। हम सभी जानते हैं कि हमारे देश में प्राथमिक स्कूलों की क्या दशा है। पहला कारण है, हिन्दी को गंभीरता से न लेना और दूसरा कारण है हिन्दी शिक्षक और शिक्षण को भी गंभीरता से न लेना। आजकल टीवी, कम्प्यूटर, वीडियो गेम के जमाने में युवा वर्ग में पठन-पाठन की रुचि में कमी आई है (सात सौ रुपये की हैरी पॉटर वह पढ लेगा, लेकिन चालीस रुपये की प्रेमचन्द की कहानियाँ पढने का समय उसके पास नहीं होगा)। हिन्दी पढने का मकसद सिर्फ़ पास होना या रट कर अच्छे अंक लाना भर होता है, उसका ज्ञान अर्जित करने या साहित्य सेवन करने से कोई लेना-देना नहीं होता। इस कारण युवाओं में हिन्दी के प्रति जो “अपनत्व” की भावना पैदा होनी चाहिये वह नहीं होती। भावनाओं को व्यक्त करते समय हिन्दी और अंग्रेजी दोनो पर समान अधिकार की चाहत में वे “न घर के रहते हैं न घाट के” और इस प्रकार “हिंग्लिश” का जन्म होता है। प्राथमिक स्कूलों में (जब बच्चे की नींव पड़ रही होती है) हिन्दी के शिक्षकों द्वारा भाषा को गंभीरता से नहीं लिया जाता। “हिन्दी तो कोई भी पढ़ा सकता है” वाली मानसिकता आज भी प्राचार्यों पर हावी है, ऐसे में जबकि आमतौर पर विज्ञान अथवा गणित विषय को उनके विशेषज्ञ ही पढ़ाते हैं, लेकिन हिन्दी की कक्षा में कोई भी आकर पढ़ाने लगता है। और यदि वह तथाकथित रूप से “हिन्दी” का ही शिक्षक है तब भी वह बच्चों की कॉपी जाँचते समय मात्राओं, बिन्दु, अनुस्वारों, अल्पविराम आदि पर बिलकुल ध्यान नहीं देता। बच्चे तो बच्चे हैं, वे उसी गलत-सलत लिखे शब्द या वाक्य को सही मानकर उसकी पुनरावृत्ति करते चलते हैं, धीरे-धीरे अशुद्ध लेखन उसकी आदत बन जाती है, जिसे बड़े होने के बाद सुधारना लगभग नामुमकिन होता है (कई बड़े अफ़सरों और डिग्रीधारियों को मैंने “दुध”, “लोकी”, “कुर्सि” जैसी भयानक गलतियाँ करते देखा है), यह स्थिति बदलनी चाहिये। प्रायवेट स्कूलों मे “लायब्रेरी फ़ीस” के नाम पर जो भारी-भरकम वसूली की जाती है, उसमें से कम से कम बीस प्रतिशत खर्च हिन्दी के महान साहित्यकारों की कृतियों, उपन्यासों, कहानियों के संकलन में होना चाहिये, ताकि बच्चे उन्हें एक बार तो पढ़ें और जानें कि हिन्दी साहित्य कितना समृद्ध है, वरना वे तो यही समझते रहेंगे कि शेक्सपीयर और कीट्स ही महान लेखक हैं, कालिदास, प्रेमचन्द, महादेवी वर्मा आदि तो “बस यूँ ही” हैं। बच्चों की “भाषा” की समझ विकसित होना आवश्यक है, जाहिर है कि इसके लिये शुरुआत घर से होनी चाहिये, फ़िर दायित्व है हिन्दी के शिक्षक का, वरना उस निजी चैनल के कर्मचारी को दोष देने से क्या होगा, जो प्रेमचन्द की कहानियों पर धारावाहिक बनाने के लिये “बायोडाटा और फ़ोटो लेकर प्रेमचन्द को भेजो” जैसी शर्त रख देता है। सवाल यही है खुद हमने, पिछली बार हिन्दी में पत्र कब लिखा था? या अपने बच्चे की गलत हिन्दी या अंग्रेजी पर उसे कितनी बार टोका है?

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