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I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

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रविवार, 20 जनवरी 2013 11:17

Narendra Modi from Lucknow Seat - Game Changer...



लखनऊ सीट से नरेंद्र मोदी :- भारत और उत्तरप्रदेश के राजनीतिक गणित को बदल डालेगा...  


यूपीए-२ द्वारा धीरे-धीरे खाद्य सुरक्षा बिल, कैश सब्सिडी जैसी लोकलुभावन योजनाओं की तरफ बढ़ने से अब २०१४ के लोकसभा चुनावों की आहट सुनाई देने लगी है. जैसा कि सभी को मालूम है कि आमतौर पर दिल्ली की सत्ता की चाभी उसी के पास होती है, जो पार्टी उत्तरप्रदेश व बिहार में उम्दा प्रदर्शन करे. हालांकि यूपीए-२ की सरकार बगैर उत्तरप्रदेश और बिहार के भी धक्के खाती हुई चल ही रही है, फिर भी जिस तरह आए दिन कांग्रेस को मुलायम अथवा मायावती में से एक या दोनों की चिरौरी करनी पड़ती है, उनका समर्थन हासिल करने के लिए कभी लालच, तो कभी सीबीआई का सहारा लेना पड़ता है, उससे इन दोनों प्रदेशों (विशेषकर उप्र) की महत्ता समझ में आ ही जाती है. संक्षेप में तात्पर्य यह है कि २०१४ के घमासान के लिए उप्र-बिहार की १३० से अधिक सीटें बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली हैं. 

Narendra Modi from UP


गुजरात में नरेंद्र मोदी ने शानदार पद्धति से लगातार तीसरा चुनाव जीतकर सभी राजनैतिक पार्टियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है, क्योंकि अब सभी राजनैतिक पार्टियों को यह पक्का पता है कि २०१४ के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी “एक प्रमुख भूमिका” निभाने जा रहे हैं. हालांकि खुद भाजपा में ही इस बात को लेकर हिचकिचाहट है कि नरेंद्र मोदी को पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करे या ना करे? यदि करे, तो उसका टाइमिंग क्या हो? मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मेदवार घोषित करने से NDA के ढाँचे पर क्या फर्क पड़ेगा? इत्यादि... हालांकि इन सवालों पर निरंतर मंथन चल रहा है, लेकिन यह तो निश्चित है कि अब नरेंद्र मोदी के “दिल्ली-कूच” को रोकना लगभग असंभव है. 

२०१४ के आम चुनावों में उप्र की सीटों की महत्ता को देखते हुए मेरा सुझाव यह है कि सबसे पहले तो भाजपा अपनी “सेकुलर-साम्प्रदायिक” मानसिक दुविधा से मुक्ति पाकर, सबसे पहले जल्दी से जल्दी नरेंद्र मोदी को “आधिकारिक” रूप से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करे. चूंकि प्रत्येक पार्टी अपना उम्मीदवार चुनने के लिए स्वतन्त्र है, इसीलिए भाजपा को NDA का मुंह ताकने की जरूरत नहीं है. एक बार भाजपा की तरफ से यह आधिकारिक घोषणा होने के बाद NDA में जो भी और जैसा भी आतंरिक घमासान मचना है, उसे पूरी तरह से मचने देना चाहिए. इस काम में मीडिया भी भाजपा की मदद ही करेगा, क्योंकि मोदी की उम्मीदवारी घोषित होते ही “तथाकथित सेकुलर मीडिया” को हिस्टीरिया का दौरा पड़ना निश्चित है. गुजरात और नरेंद्र मोदी की छवि को देखते हुए मीडिया मोदी के खिलाफ जितना दुष्प्रचार करेगा, वह भाजपा के लिए लाभकारी ही सिद्ध होगा. 


जब भाजपा एक बार यह “पहला महत्वपूर्ण कदम” उठा लेगी, तो उसके लिए आगे का रास्ता और रणनीति बनाना आसान सिद्ध होगा. मोदी को “प्रमं” पद का उम्मीदवार घोषित करते ही स्वाभाविक रूप से बिहार में नीतीश कुमार अपना झोला-झंडा लेकर अलग घर बसाने निकल पड़ेंगे, तो बिहार के मुसलमान वोटों के लिए नीतीश कुमार, लालूप्रसाद यादव और कांग्रेस के बीच आपसी खींचतान मचेगी और भाजपा को अपने परम्परागत वोटरों पर ध्यान देने का मौका मिलेगा. फिलहाल सुशील कुमार मोदी की वजह से बिहार में भाजपा, नीतीश की “चपरासी” लगती है, वह नीतीश के अलग होने पर “अपनी दूकान-स्वयं मालिक” की स्थिति में आ जाएगी. मोदी की खुलेआम उम्मीदवारी का यह तो हुआ सबसे पहला फायदा... अब आगे बढ़ते हैं और उत्तरप्रदेश चलते हैं, जहाँ नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी से भाजपा को २०१४ के चुनावों में कैसे और कितना फायदा होगा, यह समझते हैं. 

१)      नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके भाजपा उन्हें दो सीटों से चुनाव लडवाए... पहली गांधीनगर और दूसरी लखनऊ. गांधीनगर में तो मोदी का जीतना तय है ही, परन्तु लखनऊ में नरेंद्र मोदी के लोकसभा चुनाव में उतारते ही, उत्तरप्रदेश की राजनीति का माहौल ही बदल जाएगा. लखनऊ और इसके आसपास रायबरेली, फैजाबाद, अमेठी, कानपुर सहित लगभग २० सीटों पर मोदी सीधा प्रभाव डालेंगे. चूंकि नरेंद्र मोदी को प्रचार के लिए गांधीनगर में अधिक समय नहीं देना पड़ेगा, इसलिए स्वाभाविक रूप से मोदी लखनऊ और बाकी उत्तरप्रदेश में चुनाव प्रचार में अधिक समय दे सकेंगे. भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने में बाकी का काम खुद “सेकुलर मीडिया” कर देगा. क्योंकि मोदी की उम्मीदवारी घोषित होते ही उत्तरप्रदेश में सपा-बसपा-कांग्रेस के बीच मुस्लिम वोटों को रिझाने की ऐसी घमासान मचेगी, कि भाजपा की कोशिश के बिना भी अपने-आप वोटों का ध्रुवीकरण शुरू हो जाएगा. चूंकि कल्याण सिंह भाजपा में वापस आ ही चुके हैं, योगी आदित्यनाथ भी खुलकर नरेंद्र मोदी का साथ देने की घोषणा पहले ही कर चुके हैं, तो इस स्थिति में यदि भाजपा “हिन्दुत्व” शब्द का उच्चारण भी न करे, तब भी मीडिया और “सेकुलर”(?) पार्टियां जैसा “छातीकूट अभियान” चलाएंगी, वह भाजपा के पक्ष में ही जाएगा.


२)     मोदी को लखनऊ सीट से उतारने तथा उत्तरप्रदेश में गहन प्रचार करवाने का दूसरा फायदा यह होगा कि इस कदम से उत्तप्रदेश के जातिवादी नेताओं तथा जातिगत वोटों की राजनीति पर भी इसका असर पड़ेगा. जैसा कि सभी जानते हैं नरेंद्र मोदी “घांची” समुदाय से आते हैं, जो कि “अति-पिछड़ी जाति” वर्ग में आता है, तो स्वाभाविक है कि मोदी की उम्मीदवारी से एक तरफ भाजपा के खिलाफ जारी “ब्राह्मणवाद” का नारा भी भोथरा हो जाएगा, दूसरी तरफ मुलायम से नाराज़ पिछड़े वोटरों में सेंध लगाने में भी मदद मिलेगी.

३)     मोदी की उत्तरप्रदेश से उम्मीदवारी का तीसरा लाभ यह होगा कि “झगडालू बीबी” टाइप के उत्तरप्रदेश के जितने भी भाजपा नेता हैं, उन पर एक अदृश्य नकेल कस जाएगी. इन नेताओं में से अधिकाँश नेता(?) ऐसे हैं जो खुद को मुख्यमंत्री से कम समझते ही नहीं हैं, ये बात और है कि इनमें से किसी ने भी उत्तरप्रदेश में भाजपा को उंचाई पर ले जाने के लिए कोई विशेष योगदान नहीं दिया है. नरेंद्र मोदी जैसे कद्दावर नेता के उप्र के परिदृश्य पर आने तथा मोदी को मिलने वाले अपार जनसमर्थन को देखते हुए, इन स्थानीय नेताओं को ज्यादा कुछ बताने-समझाने की जरूरत नहीं रहेगी. इस सारी कवायद में सबसे अहम् रोल डॉक्टर मुरलीमनोहर जोशी का होना चाहिए, जिन्हें अपना कुशल निर्देशन देना होगा. 

इस प्रकार हमने देखा कि, नरेंद्र मोदी को उत्तरप्रदेश से चुनाव लड़वाने के तीन सीधे फायदे, और एक अप्रत्यक्ष फायदा (नीतीश की अफसरी से छुटकारा) मिलेंगे. जयललिता, और बादल पहले ही मोदी के नेतृत्व को स्वीकार कर चुके हैं, बालासाहेब ठाकरे अब रहे नहीं, इसलिए उद्धव ठाकरे को भी नरेंद्र मोदी सहज स्वीकार्य हो जाएंगे, उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह की भाजपा में वापसी हो ही चुकी है, उमा भारती को भी उप्र में ही सक्रिय रहते हुए मप्र से दूर रहने की हिदायत दी जा चुकी है, नीतीश कुमार की परवाह करने की कोई जरूरत नहीं है, यह बात भी अंदरखाने तो मान ही ली गयी है. यानी अब रह जाते हैं ममता, पटनायक, और शरद पवार, तो ये लोग उसी पार्टी की तरफ हो लेंगे जिसके पास २०० सीटों का जादुई आँकड़ा हो जाएगा. ऐसे में यदि नरेंद्र मोदी भाजपा को उत्तरप्रदेश में लगभग ४० सीटें और बिहार में २५ सीटें भी दिलवाने में कामयाब हो जाते हैं, और मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, झारखंड, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ को मिलाकर भाजपा २०० सीटों के आसपास भी पहुँच जाती है तो “थाली के बैंगनों”” को भाजपा की तरफ लुढकते देर नहीं लगेगी, तय जानिये कि इन “बैंगनों” और “बिना पेंदी के लोटों” द्वारा इस स्थिति में “सेकुलरिज्म” की परिभाषा भी रातोंरात बदल दी जाएगी. वैसे भी जब मायावती खुल्लमखुल्ला दलित-कार्ड खेल सकती हैं, मुलायम भी खुल्लमखुल्ला "यादव-मुल्ला" कार्ड खेल सकते हैं, जब कांग्रेस मनरेगा-कैश सब्सिडी जैसी "मुफ्तखोरी" वाली वोट बैंक राजनीति खेल सकती है, तो भाजपा को "हिंदुत्व" का कार्ड खेलने मे कैसी शर्म?

अब लगे हाथों “बुरी से बुरी स्थिति” पर भी विचार कर लिया जाए. यदि भाजपा की २०० सीटें आ भी जाएं तब भी भाजपा को १९९८ वाली गलती नहीं दोहरानी चाहिए, जब वाजपेयी जी ने “२५ बैंगनों और लोटों”” को मिलाकर सरकार बनाने की जल्दबाजी कर ली, फिर उनकी नाजायज़ शर्तों और बेहिसाब मांगों के बोझ तले दबकर उनके घुटने तक खराब हो गए थे. अबकी बार भाजपा को “अपनी शर्तों” व “अपने घोषणापत्र” पर बिना शर्त समर्थन देने वाले दलों को ही साथ लेना चाहिए. यदि नरेंद्र मोदी को उप्र में आगे करते हुए भाजपा किसी तरह २०० (या १८०) सीटें लाने में कामयाब हो जाती है, और फिर भी पिछले २० साल से “सेकुलरिज्म” के नाम पर चलने वाला “गन्दा खेल” इन क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस के पाले में धकेल देता है, तो सबसे बेहतर उपाय यही होगा कि भाजपा नरेंद्र मोदी को नेता प्रतिपक्ष बनाकर २०१४ में विपक्ष में बैठे, क्योंकि जो भी सरकार बनेगी, वह अधिक चलेगी नहीं. इसी बहाने नरेंद्र मोदी का नेता प्रतिपक्ष के रूप में “एसिड टेस्ट” भी हो जाएगा, जो उससे अगले लोकसभा चुनाव में काम आएगा, तथा जब एक बार भाजपा “अपनी शर्तों” पर अड़कर बात करेगी तो अन्य दल और आम जनता भी पहले से अपनी “मानसिक तैयारी” बनाकर चलेंगे. गाँधी नगर में चुनाव जीतने में मोदी को विशेष दिक्कत नहीं होगी, लेकिन यदि नरेंद्र मोदी लखनऊ सीट से भी जीत जाते हैं, तो यह संकेत भी जाएगा कि अब "नरेंद्र मोदी का पाँव आडवाणी-वाजपेयी जी के जूते में बराबर फिट बैठने लगा है" जो कि बहुत गूढ़ और महत्वपूर्ण सन्देश और संकेत होगा.

संक्षेप में कहें तो आम जनता अब कांग्रेस के घोटालों, नाकामियों और लूट से बुरी तरह परेशान हो चुकी है, वह किसी “दबंग” किस्म के प्रधानमंत्री की राह तक रही है. गुजरात के विकास को मॉडल बनाकर, नरेंद्र मोदी को उत्तरप्रदेश के लखनऊ से चुनाव में उतारने की चाल तुरुप का इक्का साबित होगी. इस मुहिम में हमारा तथाकथित “राष्ट्रीय और सेकुलर मीडिया”(?) ही भाजपा को सबसे अधिक लाभ पहुंचाएगा, क्योंकि जैसा कि मैंने पहले कहा, मोदी की प्रधानमंत्री पद पर उम्मीदवारी की घोषणा मात्र से कई चैनलों व स्वयंभू सेकुलरों को “हिस्टीरिया”, “मिर्गी”, “पेटदर्द” और “दस्त” की शिकायत हो जाएगी,  यह बात तय जानिये कि नरेंद्र मोदी का “जितना और जैसा” विरोध किया जाएगा, वह भाजपा को फायदा ही पहुंचाएगा. अब यह संघ-भाजपा नेतृत्व पर है कि वह कितनी जल्दी नरेंद्र मोदी को अपना “घोषित” उम्मीदवार बनाते हैं, क्योंकि अब अधिक समय नहीं बचा है.

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अंत में एक मास्टर स्ट्रोक – स्वयं नरेंद्र मोदी को उचित समय देखकर एक घोषणा करनी चाहिए, कि वे “निजी यात्रा” (जी हाँ, निजी यात्रा... जिसमे न कोई इन्टरव्यू होगा, न कोई प्रेस विज्ञप्ति होगी), हेतु  अयोध्या में राम मंदिर के दर्शनों के लिए जा रहे हैं, बस!!! बाकी का काम तो मीडिया कर ही देगा... जैसा कि मैंने ऊपर कहा है, राजनीति में "संकेत द्वारा दिया गया सन्देश" बहुत महत्वपूर्ण होता है, इसलिए मोदी की अयोध्या के राम मंदिर की "निजी धर्म यात्रा" के संकेत जहाँ पहुँचने चाहिए, वहाँ पहुँच ही जाएंगे, और नरेंद्र मोदी के "अंध-विरोध" से ग्रसित मीडिया की रुदालियों का फायदा भी भाजपा को ही मिलेगा... 

                                                           -          सुरेश चिपलूनकर
रविवार, 24 फरवरी 2013 18:40

Save Ganga : Prof GD Agrawal on Fast Unto Death

गंगापुत्र  प्रोफ़ेसर जीडी अग्रवाल उर्फ स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद फिर से अनशन पर... 


IIT के भूतपूर्व प्रोफ़ेसर और प्रख्यात पर्यावरणवादी जीडी अग्रवाल उर्फ स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद, गंगा को बचाने के लिए विगत २६ जनवरी से अनशन पर हैं. लेकिन इस सम्बन्ध में कहीं कोई मीडिया कवरेज, हलचल या चर्चा तक नहीं है...

पिछले वर्ष २०१२ में ही प्रोफ़ेसर ने १४ जनवरी से १३ मार्च (तीन माह) का अनशन किया था, जो सरकारों के आश्वासन पर खत्म किया था. इसके पहले भी वे कई बार मौत के मुँह से वापस आ चुके हैं. खनन माफिया और बाँध माफिया की आँखों की किरकिरी तो वे हैं ही...

गंगा के प्रवाह को बचाने के लिए, अपने अनशन के जरिये प्रोफ़ेसर अग्रवाल पहले भी उत्तरकाशी से ऊपर तीन बाँध परियोजनाओं को रद्द करवा चुके हैं, इसके अलावा गोमुख से धरासूं तक भागीरथी नदी की के १३५ किमी किनारे को पर्यावरण की दृष्टी से संवेदनशील भी घोषित करवा चुके हैं. 




मीडिया की आपराधिक लापरवाही शायद इसलिए है क्योंकि प्रोफ़ेसर साहब, गंगा नदी के किनारे कुम्भ की चमक-दमक और साधू-संतों के वैभव से दूर नर्मदा किनारे अमरकंटक में अनशन पर बैठे हैं... हालांकि उनकी कई मांगों के साथ पहले भी कई बार सरकारों द्वारा विश्वासघात हो चुका है, परन्तु वर्तमान अनशन तीन प्रमुख मांगों को लेकर है, जिसका वादा पहले भी किया गया था.

१- भागीरथी, अलकनंदा,मंदाकिनी, नंदाकिनी और विश्नुगंगा, इन पाँच मूल धाराओं पर बनने वाली समस्त परियोजनाएं रद्द की जाएँ.

२- गंगा और गंगा नदी में मिलने वाले सभी नालों के आसपास स्थित चमड़ा और पेपर उद्योगों को पचास किमी दूर हटाया जाए.

३- गंगा नदी में नारोरा से प्रयाग तक हमेशा कम से कम १०० घनमीटर प्रति सेकण्ड प्रवाह मिले, जबकि कुम्भ या ऐसे पर्वों के दौरान कम से कम २०० घनमीटर प्रति सेकण्ड का प्रवाह मिले.


दुःख की बात यह है कि गंगा सफाई के नाम पर गत कई वर्षों में तीस हजार करोड़ से भी अधिक खर्च हो जाने के बावजूद गंगा की स्थिति बदतर ही होती जा रही है. न ही किसी धर्म प्रमुख या धर्म संसद ने कभी यह कहा कि अगर गंगा की स्थिति ऐसी ही विकट रही तो हम कुम्भ का बहिष्कार करेंगे. 

प्रोफ़ेसर अग्रवाल से पहले भी गत वर्ष युवा स्वामी निगमानंद की मौत लंबे अनशन के बाद हो चुकी है, फिर भी जो वास्तविक गंगा-पुत्र हैं वे चुपचाप अपना संघर्ष कर रहे हैं, परन्तु न तो जन-सरोकार से कौड़ी भर का संपर्क न रखने वाले मीडिया को... और न ही गंगा के नाम पर माल कूटने और नेतागिरी चमकाने वालों इस बात की कतई कोई परवाह है.




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मित्रों, सरकारों की ऐसी बेरुखी दुखद है...


जस्टिस आफताब आलम, तीस्ता जावेद, “सेमुअल” राजशेखर रेड्डी  और NGOs के आपसी आर्थिक हित-सम्बन्ध,...


मित्रों...
जैसा कि पहले भी कई बार लिखा जा चुका है कि भारत में कई NGOs का एक विशाल नेटवर्क काम कर रहा है, जो भ्रष्टाचार और हिंदुत्व विरोधी कार्यों में लिप्त है. इन NGOs का आपस में एक “नापाक गठबंधन” (Nexus) है, जिसके जरिये ये देश के प्रभावशाली लोगों से संपर्क बनाते हैं तथा अपने देशद्रोही उद्देश्यों के लिए उन लोगों द्वारा प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष काम करवाने में सफल होते हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इन NGOs पर सरकार की कठोर निगरानी नहीं है (या शायद जानबूझकर नहीं रखी जाती). हाल ही में ऐसी दो घटनाक्रम सामने आए हैं जिनसे पता चलता है कि भारत के हितों और हिंदुत्व को चोट पहुँचाने के लिए ऐसे NGOs किस प्रकार मिल-जुलकर काम कर रहे हैं, कैसे इनमे अथाह धन का प्रवाह हो रहा है और ये लोग किस प्रकार “नेटवर्क” बनाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं....

पहला मामला है गुजरात की “कुख्यात” समाजसेविका(?) तीस्ता जावेद सीतलवाड (Teesta Javed Setalvad) से जुड़ा हुआ. फर्जी शपथ-पत्र और नकली गवाहों के मामले में सुप्रीम कोर्ट की लताड़ खा चुकी तथा घोषित रूप से हिन्दू-विरोधी इन मोहतरमा के NGO पर पहले भी कई आरोप लगते रहे हैं. ताज़ा मामला थोड़ा और गंभीर है, क्योंकि इसमें अप्रत्यक्ष रूप से न्यायपालिका की गरिमा और निष्पक्षता का सवाल भी भी जुड़ गया है. 

पहला मामला इस प्रकार है - एक समय पर तीस्ता “जावेद” सीतलवाड के खासुलखास रहे, लेकिन तीस्ता द्वारा पीठ में छुरा घोंपने के बाद उसकी तमाम पोल खोलने वाले रईस खान पठान ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर करते हुए मांग की है कि गुजरात दंगों से सम्बंधित सभी मामलों में हाईकोर्ट के Justice Aftab Alam को बेंच से हटाया जाए. जिस बेंच या अदालत में गुजरात के मामलों की सुनवाई हो रही हो, उससे जस्टिस आफताब आलम को दूर रखा जाए. रईस पठान ने जस्टिस आफताब आलम पर साफ़-साफ़ आरोप लगाते हुए कहा है कि चूँकि जस्टिस आलम की बेटी के “आर्थिक हित-सम्बन्ध” तीस्ता और अन्य कई NGOs से जुड़े हुए हैं, इसलिए जस्टिस आलम की निष्पक्षता पर संदेह उठना स्वाभाविक है. 

रईस पठान ने खुलासा करते हुए बताया है कि जस्टिस आफताब आलम की बेटी शाहरुख आलम एक NGO चलाती है, जिसका नाम है “पटना कलेक्टिव”, इस एनजीओ को नीदरलैंड्स की संस्था HIVOS बड़ी मात्रा में धनराशि अनुदान के रूप में देती है. “संयोग”(?) कुछ ऐसा है कि तीस्ता जावेद के एनजीओ “सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस” (CJP) को भी नीदरलैंड की यही संस्था भारी पैसा देती है. HIVOS तथा नीदरलैंड की एक और संस्था जिसका नाम है “कोस्मोपोलिस इंस्टीट्यूट”, दोनों ने मिलकर 2010 में रिसर्च पेपर प्रकाशित करने की एक श्रृंखला शुरू की थी जिसे नाम दिया गया “Promoting Pluralism Knowledge Programme” (PPKP). इस कार्यक्रम में स्वयं जस्टिस आफताब आलम ने लन्दन में अक्टूबर 2009 में एक पेपर प्रस्तुत किया था जिसका शीर्षक था, “The Idea of Secularism and Supreme Court of India” . 


रईस पठान ने इन कड़ियों को जोड़ते हुए आगे एक और एनजीओ के बारे में लिखित में दिया है, जिसका नाम है “Centre for Study of Culture and Society” (CSCS), बंगलौर. यह एनजीओ ऊपर बताई गई संस्था PPKP के कार्यक्रमों की संयोजक है और जस्टिस आलम द्वारा पेश किए गए पेपर प्रायोजक भी. अब और आगे बढते हैं.... याचिका के अनुसार यह NGO भी नीदरलैंड के HIVOS के साथ संयुक्त उपक्रम में एक वेबसाईट चलाता है, जिसका नाम है Pluralism.in. इस वेब पोर्टल की कोर कमेटी में जस्टिस आलम साहब की बेटी भी शामिल हैं. इस वेबसाईट की सामग्री में गुजरात दंगों के लिए एक विशेष खण्ड बनाया गया है, जिसमें “सेकुलरिज्म” और “गुजरात को नसीहतें” देते हुए लगभग 60 लेख लिखे गए हैं, इनमें से अधिकाँश लेख “सबरंग कम्यूनिकेशन एंड पब्लिशिंग, मुंबई” द्वारा लिखे हैं, जो कि तीस्ता जावेद की ही संस्था है. संयोग देखिये कि जस्टिस आलम की सुपुत्री जुलाई 2008 से मार्च 2010 के बीच बंगलौर के इसी CSCS नाम एनजीओ की “सवैतनिक रिसर्च फेलो” रहीं. इस अवधि के दौरान इन्होंने वेतन के नाम पर चार लाख पैंतालीस हजार रूपए प्राप्त किए, जबकि स्वयं के एनजीओ के लिए ग्यारह लाख अडतालीस हजार रूपए प्राप्त किए. CSCS संस्था ने लिखित में स्वीकार किया है कि यह पैसा उन्होंने नीदरलैंड्स की संस्था HIVOS से विदेशी अनुदान के तहत प्राप्त किया. यहाँ पेंच यह है कि चूँकि शाहरुख की संस्था “पटना कलेक्टिव” भारत सरकार के विदेशी अनुदान क़ानून (FCRA) के तहत रजिस्टर्ड नहीं है, इसलिए “हाथ घुमाकर कान पकड़ा गया” और CSCS ने एक हाथ से पैसा लिया और उसी पैसे को पेपर प्रस्तुतीकरण और अनुदान के रूप में आलम साहब की बेटी के NGO को आगे बढ़ा दिया. 

नीदरलैंड्स की इस संदिग्ध संस्था HIVOS ने तीस्ता जावेद सीतलवाड के एनजीओ सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) को तो सीधे ही अनुदान दिया है, 23 नवंबर 2009 को CJP के अकाउंट में दस हजार यूरो (लगभग 7 लाख रूपए) का भुगतान हुआ है (जिसका हिसाब-किताब यात्रा, पुस्तकें व सेमीनार आयोजित करने जैसे मदों में दर्शाया गया है). इसके अलावा तीस्ता जावेद के वकील मिहिर देसाई को भी नवंबर 2009 में ही एक बार 45,000 व दूसरी बार 75,000 रूपए का भुगतान हुआ है. 

रईस पठान ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि, “न्यायिक प्रक्रिया के सम्मान” और सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा को ध्यान में रखते हुए गुजरात दंगों की सुनवाई से सम्बन्धित सभी मामलों से जस्टिस आफताब आलम को हटाया जाए, ताकि न्याय की निष्पक्षता पर कोई संदेह न रहे. याचिका में कहा गया है कि गुजरात दंगों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने तथा ऐसे कई NGOs जो कि स्वयं कई मामलों में एक पक्ष हैं, उनके सुश्री शाहरुख आलम के साथ आर्थिक हित सम्बन्धों के मद्देनज़र स्वाभाविक रूप से जस्टिस आफताब आलम को स्वयं ही इन सभी सुनवाइयों से अलग हो जाना चाहिए, ताकि न्यायालय का गौरव बना रहे और तमाम शंकाओं का निवारण हो. 

विदेशी अनुदान प्राप्त और भारत सरकार द्वारा कड़ा नियंत्रण नहीं होने की वजह से पिछले कुछ वर्षों में ऐसे ढेरों NGOs पनप गए हैं, जिनका एकमात्र एजेंडा “सिर्फ और सिर्फ गुजरात” ही है. ज्ञातव्य है कि पिछले दिनों शबनम हाशमी के NGOs पर भी उंगलियाँ उठी थीं जिनका समुचित समाधान या जवाब अभी तक नहीं दिया गया है. सवाल यही उठता है कि आखिर ऐसे NGOs पर नकेल क्यों नहीं कसी जाती? इन NGOs के आपसी लेनदेन पर निगाह क्यों नहीं रखी जाती है? 

जस्टिस आफताब आलम कितने "साम्प्रदायिक" मानसिकता के हैं, इस बारे में उन्हीं के साथ काम करने वाले जज जस्टिस सोनी ने सुप्रीम कोर्ट में पत्र लिखकर विस्तार से आफताब आलम की शिकायत की थी... जिसका लिंक इस प्रकार है... 

http://www.scribd.com/doc/101311814/Keep-Communal-Mindset-Justice-Aftab-Alam-Away-From-Gujarat-Cases-Justice-Soni-to-Chief-Justice-of-India#download


दूसरा मामला और भी मजेदार है... यहाँ पर एक ईसाई NGO की कड़ी ताजातरीन हेलीकाप्टर घोटाले से जुड़ने जा रही है... 

संदिग्ध गतिविधियों वाले NGOs की फेहरिस्त में एक नया नाम जुड़ने जा रहा है, जिसका नाम है “आर्बोर चैरिटेबल फाउन्डेशन” का. यह ईसाई संस्था आंध्रप्रदेश के खम्मम जिले में कार्यरत है. भारत में इस फाउन्डेशन के कर्ता-धर्ता रहे कार्लोस गेरोसा, जो कि हाल ही में उजागर हुए औगास्ता-वेस्टलैंड हेलीकाप्टर घोटाले के आरोपियों में से एक है. जैसा कि सभी जानते हैं आंध्रप्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री “सैमुअल” राजशेखर रेड्डी ईसाई संस्थाओं के पक्के समर्थक थे, जबकि उनके दामाद अनिल कुमार तो घोषित रूप से एक “एवेंजेलिस्ट” (ईसाई धर्म-प्रचारक) हैं ही. आर्बोर चैरिटेबल फाउन्डेशन का रजिस्ट्रेशन दिसंबर 2007 में सैमुअल रेड्डी के कार्यकाल में ही हुआ. रजिस्ट्रेशन के वक्त बताया गया कि यह NGO जल प्रबंधन, बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा इत्यादि क्षेत्रों में कार्य करेगा (रजिस्ट्रेशन के वक्त अक्सर ऐसी ही लफ्फाजियाँ हांकी जाती हैं, जबकि “वास्तविक काम” कुछ और ही करना होता है). 

सैमुअल रेड्डी के कार्यकाल में यह एनजीओ खूब फला-फूला. मजे की बात देखिए, कि दिसंबर 2007 में इस एनजीओ के रजिस्ट्रेशन के तत्काल बाद ही सेमुअल राजशेखर रेड्डी ने इस संस्था को 2000 एकड़ की जमीन आवंटित कर दी. मार्च 2008 में जैसे ही कार्लोस गेरोसा, खम्मम जिले में इस एनजीओ के भारत प्रमुख बने, उसके सिर्फ दो माह के अंदर ही “सेमुअल” रेड्डी आन्ध्र सरकार ने इटली की अगस्ता वेस्टलैंड कम्पनी को 63 करोड़ रुपये में एक हेलीकाप्टर खरीदने का ऑर्डर दे दिया, जबकि आँध्रप्रदेश सरकार के पास पहले से ही Bell-430 कम्पनी का एक हेलीकाप्टर था जो कि जून 1999 में खरीदा गया था, परन्तु आर्बोर फाउन्डेशन की गतिविधियों में कार्लोस गेरोसा के शामिल होते ही यह हेलीकाप्टर खरीदा गया.


सितम्बर 2009 में सेमुअल रेड्डी की हेलीकाप्टर दुर्घटना में मौत के बाद कार्लोस गेरोसा तत्काल इटली वापस चला गया. सेमुअल रेड्डी का दामाद जिसका नाम “ब्रदर अनिल कुमार” है, उसने इस आर्बोर फाउन्डेशन के प्रचार-प्रसार और इसकी आड़ में धर्मांतरण का खेल आगे बढ़ाया. तेलोगू देसम पार्टी के सांसद द्वय नामा नागेश्वर राव और सीएम रमेश ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा है कि “हमारे पास इस बात के कई सबूत हैं जिनसे अनिल कुमार और राजशेखर रेड्डी के साथ आर्बोर फाउन्डेशन तथा हेलीकाप्टर घोटाले से उनके सम्बन्ध स्थापित होते हैं, समय आने पर हम वह CBI को देंगे”.

संक्षेप में तात्पर्य यह है कि देशद्रोही, भ्रष्टाचारी और हिन्दू-विरोधी NGOs का मकडजाल इस देश में गहरे तक फ़ैल चुका है, इन संस्थाओं को विदेशी मिशनरियों से बड़ी मात्रा में पैसा मिलता है, जिसका उपयोग कागजों पर तो अस्पताल, बच्चों की शिक्षा, जल प्रबंधन इत्यादि में होता है, लेकिन वास्तव में इस पैसे का बड़ा हिस्सा इन NGOs के “असली कामों” यानी धर्मांतरण करना, जेहादियों को अप्रत्यक्ष आर्थिक मदद करना, भारत-विरोधी विचार समूहों को बढ़ावा देना, सेमीनार-कान्क्लेव इत्यादि के नाम पर देश के प्रभावशाली लोगों को “उपकृत”(?) करना इत्यादि. यह “खेल” अब बहुत आगे बढ़ चुका है, यदि समय रहते ऐसे NGOs पर नकेल नहीं कसी गई, तो आने वाले दिनों में हालात और भी मुश्किल होने वाले हैं...

शनिवार, 02 मार्च 2013 13:24

Hindutva and Development Cocktail - Narendra Modi



हिंदुत्व और विकास का कॉकटेल – नरेंद्र मोदी

२०१२ के गुजरात विधानसभा चुनावों की तैयारी के दौरान जिस समय नरेंद्र मोदी सदभावना यात्रा और उपवास के मिशन पर गुजरात भर में घूमने निकले थे, उस समय एक अप्रत्याशित घटना घटी थी. एक कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी का स्वागत करते हुए एक मौलवी ने उन्हें मुसलमानों की सफ़ेद जाली वाली टोपी पहनाने का उपक्रम किया था, जिसे नरेंद्र मोदी ने विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया था. इस बात को भारत के पक्षपाती (यानी तथाकथित सेकुलर) मीडिया ने लपक लिया और मोदी के इस व्यवहार(?) को लेकर हमेशा की तरह मोदी पर हमले आरम्भ कर दिए थे. उसी दिन शाम को एक कम पढ़ी-लिखी महिला से मेरी बातचीत हुई और मैंने उससे पूछ लिया कि नरेंद्र मोदी ने उस मौलवी की “टोपी” नहीं पहनकर कोई गलती की है क्या? उस महिला का जवाब था नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी ने गुजरात विधानसभा का आधा चुनाव तो सिर्फ इसी बात से जीत लिया है. साफ़ बात है कि जो बात एयरकंडीशन कमरों में बैठे बुद्धिजीवी नहीं समझ पाते, वह बात एक सामान्य महिला की समझ में आ रही थी कि यदि नरेंद्र मोदी भी दिल्ली-मुंबई-पटना में बैठे हुए सेकुलर नेताओं की तरह “मुल्ला टोपी” पहनकर इतराने का भौंडा प्रयास करते तो उनके वोट और भी कम हो जाते, वैसा न करके उन्होंने अपने वोटों को बढ़ाया ही था. परन्तु जो “बुद्धिजीवी”(?) वर्ग होता है वह अक्सर नरेन्द्र मोदी को बिन मांगे सेकुलर सलाह देता है, क्योंकि उसे पता ही नहीं होता कि जमीनी हकीकत क्या है.


इस प्रस्तावना का मोटा अर्थ यह है कि यदि विकास सही तरीके से किया जाए, जनता के कामों को पूरा किया जाए, लोगों की तकलीफें कम होती हों, उन्हें अपने आर्थिक बढ़त के रास्ते दिखाई देते हों और राज्य की बेहतरी के लिए सही तरीके से आगे बढ़ा जाए, तो जनता को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि आप “हिन्दुत्ववादी” हैं या “मुल्लावादी”. नरेन्द्र मोदी और देश के बाकी मुख्यमंत्रियों में यही एक प्रमुख अंतर है कि नरेन्द्र मोदी अपनी “छवि” (जो कि उन पर थोपी गई है) की परवाह किए बिना, चुपचाप अपना काम करते जाते हैं, मीडिया के “वाचाल टट्टुओं” को बिना मुँह लगाए, क्योंकि उन्हें यह स्पष्ट रूप से पता है कि मीडिया नरेन्द्र मोदी के विपक्ष में जितना अधिक चीखेगा उसका उतना ही फायदा उन्हें होगा. मीडिया जब-जब मोदी के खिलाफ जहर उगलता है, मोदी को लाभ ही होता है. नरेन्द्र मोदी का इंटरव्यू लेने पर सपा के शाहिद सिद्दीकी की पार्टी से बर्खास्तगी हो, या मोदी की तारीफ़ करने पर मुस्लिम बुद्धिजीवी मौलाना वस्तानावी के साथ जैसा “सलूक” सेकुलरों ने किया, उसका अच्छा सन्देश ही हिंदुओं में गया. लोगों को यह महसूस हुआ कि जिस तरह से नरेन्द्र मोदी के साथ “अछूतों” की तरह व्यवहार किया जाता है, वह मीडिया और विपक्षियों की घटिया चालबाजी है.

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने द्वारा किए गए विकास को कई बार साबित किया है। आश्चर्य तो यह है कि उनके इस विकासवादी एजेंडा पर महबूबा मुफ्ती, अमरिंदर सिंह, गुजरात कांग्रेस और शीला दीक्षित भी मुहर लगा रही हैं। यहाँ पर यह याद रखना जरूरी है कि उन पर लगाए गए दंगों के आरोप अभी तक किसी अदालत में साबित होना तो दूर, उन पर अभी तक कोई FIR भी नहीं है, जबकि नरेन्द्र मोदी को घेरने की पूरी कोशिशें की जा चुकी हैं. NGOवादी “परजीवी गैंग” ने भी मोर्चा खोला हुआ है, केंद्र की तरफ से तमाम एसआईटी और सीबीआई तथा गुजरात के सभी मामलों की सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वयं निगरानी... इन सबके बावजूद नरेन्द्र मोदी यदि डटे हुए हैं, तो यह उनके विकास कार्यों और हिन्दुत्ववादी छवि के कारण.

पार्टी हो या पार्टी से बाहर... किसी भी व्यक्ति या संस्था को मोदी से निपटने का कोई कारगर रास्ता नहीं सूझ रहा है, उन्होंने अपनी पार्टी और पार्टी से बाहर विरोधियों से निपटने के लिए गुजरात-मोदी-विकास-हिंदुत्व का एक चौखट बना लिया है, जिसे तोड़ना लगभग असंभव होता जा रहा है, तभी तो महबूबा मुफ्ती जैसी नेता को भी मोदी की तारीफ करनी पड़ती है। चेन्नै के एक मुस्लिम व्यापारी की फाइल को सबसे तेजी से कुछ घंटों में सरकारी महकमों से निपटाकर वापस करने के लिए। क्या देश के तथाकथित सेक्युलर मुख्यमंत्रियों को ऐसा काम करने से कोई रोकता है? भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार 2007 में गुजरात के मुसलमानों की प्रति व्यक्ति आय (पीसीआई) देश में सबसे ज्यादा थी। देश के अन्य “सेकुलर”(?) राज्यों में भी ऐसा किया जा सकता था लेकिन नहीं किया गया, क्योंकि अव्वल तो उन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को “हिंदुत्व” शब्द से ही घृणा है और दूसरा यह कि उन्हें सेकुलरिज्म का एक ही अर्थ मालूम है कि “जैसे भी हो मुसलमानों को खुश करो”. जबकि नरेन्द्र मोदी का हिंदुत्व एकदम उलट है, कि विकास सभी का करो लेकिन तुष्टिकरण किसी का भी न करो. इसीलिये जब अहमदाबाद की विश्व प्रसिद्द बीआरटीएस (रोड ट्रांसपोर्ट योजना) के निर्माण की राह में जो भी मंदिर-मस्जिद या दरगाह आईं, नरेन्द्र मोदी ने बगैर पक्षपात के उन्हें तुडवा दिया और अहमदाबाद को विश्व के नक़्शे पर एक नई पहचान दी. आज अहमदाबाद के BRTS की तर्ज पर कई शहरों में “विशेष ट्रांसपोर्ट गलियारों” का निर्माण हो रहा है. मजे की बात यह है कि इस दौरान मंदिरों को गिराने या विस्थापित करने का किसी भी हिन्दू संगठन ने कोई विरोध नहीं किया, स्वाभाविक है कि मस्जिद या दरगाह को तोड़ने का विरोध भी होने की संभावना खत्म हो गई... यही है हिंदुत्व और विकास, जिसे “सेकुलर” लोग कभी नहीं समझ सकेंगे क्योंकि उनकी आँखों पर “मुस्लिम तुष्टिकरण” की पट्टी चढ़ी होती है.


दरअसल, संघ ने २०१४ के महाभारत के लिए एक दोधारी तलवार चुनी है। एक धार विकास की, दूसरी धार हिंदू राष्ट्र की। मोदीत्व और हिंदुत्व को मिलाकर जो आयुर्वेदिक दवाई बनी है, वह फिलहाल अब तक लाजवाब साबित हो रही है. इस मोदीत्व में कई बातें शामिल हैं। 'विकास' और 'सुशासन' का एक मोदी फॉर्मूला तो है ही, और भी बहुत कुछ है। जैसे कि धुन का पक्का एक कद्दावर नेता, जो अपने समर्थकों के बीच “दबंग” छवि वाला है, राजधर्म की दुहाई देनेवाले अटल बिहारी वाजपेयी हों या बात-बात पर देश की अदालतों की फटकार हो, यह व्यक्ति चुटकियों में दो-टूक फैसले लेता है और आनन-फानन में उन्हें लागू भी कर देता है, यह इंसान हाज़िर-जवाब है जो मीडिया के महारथियों(?) को उन्हीं की भाषा में जवाब देता है, जिसने “गुजराती अस्मिता', “मेरा गुजरात”, “छः करोड़ गुजराती” इत्यादि शब्दों को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है, समर्थकों को भरोसा है कि यह हमेशा हिंदुत्व की रक्षा करेगा। इन तमाम तत्वों से मिलकर बनता है मोदीत्व. यानी हिंदुत्व और विकास का कॉकटेल| कुम्भ मेले के दौरान साधू-संतों और अखाड़ों द्वारा लगातार मोदी-मोदी-मोदी की मांग करना और ऐन उसी वक्त मोदी द्वारा दिल्ली के श्रीराम कालेज में युवाओं को संबोधित करना महज संयोग नहीं है, यह एक सोची-समझी रणनीति के तहत हुआ है, अर्थात परम्परागत वोटरों को “हिंदुत्व” से और युवा शक्ति को “विकास और आर्थिक समृद्धि” के उदाहरणों के सहारे वोट बैंक में तब्दील किया जा सके. सीधी सी बात है कि “हिंदुत्व और विकास” की इस जोड़-धुरी के प्रमुख नायक हैं नरेन्द्र मोदी.

भाजपा की इस कॉकटेल के सबसे बड़े प्रतीक मोदी हैं। गुजरात दंगों की वजह से मोदी की छवि आज वैसी ही है जैसी कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान आडवाणी की थी। राम मंदिर आंदोलन ने आडवाणी को हिंदू ह्रदय सम्राट बना दिया था। लेकिन “विकास” कभी भी आडवाणी के साथ नहीं चिपक पाया। गृह मंत्री के तौर पर भी उनका कार्यकाल प्रेरणादायी नहीं था, बल्कि कंधार प्रकरण की वजह से उनकी किरकिरी ही हुई थी. आडवाणी को अटल बिहारी वाजपेयी की परछाई के नीचे काम करना पड़ा ऐसे में अच्छे शासन का श्रेय तो वाजपेयी को मिला प्रधानमंत्री के रूप में, लेकिन आड़वाणी को नहीं। नरेन्द्र मोदी के साथ ये दिक्कत नहीं है। मोदी ने भाजपा के लिये लगातार तीन चुनाव जीते हैं। पहला चुनाव निश्चित रूप से उन्होंने सांप्रदायिकता के मुद्दे पर लड़ा और जीत हासिल की, हालांकि यह मुद्दा भी मीडिया और कांग्रेस द्वारा बारम्बार “हिटलर” और “मौत का सौदागर” जैसे शब्दों की वजह से प्रमुख बना। लेकिन गुजरात विधानसभा के दूसरे चुनावों में “विकास” उनके एजेंडे पर प्रमुख हो गया। गुजरात दंगों की छवि उनके साथ खामख्वाह चिपकी जरूर रही लेकिन उन्होंने उस पर बात करना ही बंद कर दिया, और अब तीसरा चुनाव जीतते ही नरेन्द्र मोदी भाजपा में निर्विवाद नेता हो गये हैं। सबसे बड़े जनाधार वाले नेता और एक ऐसा नेता जो फैसले लेने से डिगता नहीं है। नरेन्द्र मोदी अब धीरे-धीरे भाजपा की अपरिहार्य आवश्यकता बनते जा रहे हैं। ये लगभग तय है कि बीजेपी अगला चुनाव उनकी ही अगुआई में लड़ेगी। पार्टी की कमान राजनाथ सिंह संभालेंगे और देश भर में लहर पैदा करने की जिम्मेदारी मोदी की होगी।

राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद मुंबई की रैली से जिस तरह लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज जैसे राष्ट्रीय नेता छोटे-छोटे और नाकाफी कारणों से गैरहाजिर रहे और मंच पर नरेंद्र मोदी का एकछत्र दबदबा दिखा, उससे साफ है कि भाजपा में मोदी युग की शुरुआत हो चुकी है। मोदी भी कल्याण सिंह, उमा भारती और येदियुरप्पा की तरह “स्वतंत्र स्वभाव के पिछडे वर्ग के” नेता हैं। यह बात जाहिर है कि अटल बिहारी वाजपेयी 2002 के दंगों के बाद उन्हें  हटाना चाहते थे लेकिन कार्यकर्ताओं और जनता के दबाव की वजह से नहीं हटा पाए। २०१२ की तीसरी विधानसभा जीत में जिस तरह से गुजरात के मुसलमानों ने मोदी के नाम पर वोट दिया है, वह सेकुलर पार्टियों, खासकर मुस्लिमों को वोट बैंक समझने वाली कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी है. हाल ही में एक नगरपालिका चुनाव में सभी की सभी सीटें भाजपा ने जीतीं, जबकि वहाँ कि जनसंख्या में ७२% मुसलमान हैं, नरेन्द्र मोदी की यही बात विपक्षियों की नींद उडाए हुए है.

नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह कुशलता से “हिंदुत्व और विकास” का ताना-बाना बुना और लागू किया है, वह भाजपा के अन्य मुख्यमंत्रियों के लिए भी सबक है. यदि उन्हें सत्ता में टिके रहना है तो यह फार्मूला कारगर है, दुर्भाग्य से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने धार की भोजशाला मामले में “सेकुलर” रुख अपनाकर अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं की नाराजगी मोल ले ली है. जबकि इसके उलट नरेन्द्र मोदी ने केंद्र की और से अल्पसंख्यकों के लिए भेजी जाने वाली छात्रवृत्ति का वितरण करने से इस आधार पर मना कर दिया कि छात्रों के साथ धार्मिक भेदभाव करना उचित नहीं है. फिलहाल यह मामला केन्द्र-राज्य के बीच झूल रहा है, लेकिन नरेन्द्र मोदी को अपने समर्थकों और वोटरों को जो सन्देश देना था, वह पहुँच गया. इसके बावजूद, गुजरात के मुसलमानों की आर्थिक स्थिति में भरपूर सुधार हुआ है तथा अन्य राज्यों (विशेषकर पश्चिम बंगाल और उत्तरप्रदेश) के मुकाबले गुजरात में मुसलमानों की सामाजिक स्थिति काफी सुधरी हुई है.

तात्पर्य यह है कि “विकास और हिंदुत्व का काकटेल” धीरे-धीरे सिर चढ़कर बोलने लगा है, दिल्ली विश्वविद्यालय के श्री राम कालेज में युवाओं को सम्मोहित करने वाले संबोधन और सेकुलर मीडिया द्वारा उस अदभुत भाषण की बखिया उधेड़ने की कोशिश भी उनके लिए फायदेमंद ही रही, क्योंकि आज के मध्यमवर्गीय युवा को किसी भी कीमत पर विकास और रोजगार चाहिए, इस युवा के रास्ते में यदि 4-M (अर्थात मार्क्स-मुल्ला-मिशनरी-मैकाले) भले ही कितने भी रोड़े अटकाएं, युवा किसी की सुनने वाला नहीं है. इसकी बजाय आज का युवा पांचवां M (अर्थात मोदी) चुनना अधिक पसंद करेगा, जो दबंगई से अपने निर्णय लागू करे और युवाओं के साथ संवाद स्थापित करे, ऐसे में यदि इन सब के बीच “हिंदुत्व का तडका-मसाला” भी लग जाए तो क्या बुरा है? 

Suresh Chiplunkar


क्या इस “विराट प्रोजेक्ट” में आप हमारा सहयोग करेंगे???



मित्रों...
शुरुआत मामूली प्रश्नों से करते हैं –

१) क्या आप मानते हैं कि युवाओं में इंटरनेट पर "हिन्दी" में लिखे लेख, पुस्तकें पढ़ने की ललक बढ़ रही है?

२) क्या आप चाहते हैं कि भारतीय संस्कृति, कला, इतिहास, वास्तु, राजनीति इत्यादि पर आधारित प्रमुख पुस्तकें व ख्यात लेखकों के लेख (जो अंगरेजी में हैं), आपको हिन्दी में पढ़ने को मिलें?

३) क्या आप पसंद करेंगे कि हिन्दी में प्रकाशित प्रसिद्ध पुस्तकें, जो इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं हैं, ऐसी पुस्तकें स्कैन करके आपको अपने कंप्यूटर, मोबाईल, किंडल पर पढ़ने को मिलें?

मैं जानता हूँ कि तीनों प्रश्नों का जवाब "हाँ" में ही होगा. अतः इस सम्बन्ध में एक विशाल प्रोजेक्ट में आप सभी मित्रों से "सभी प्रकार के सहयोग" की आकांक्षा है...

जैसा कि आप जानते ही हैं भारत की कला, संस्कृति, इतिहास, वास्तुकला सहित अनेक विषयों को जितना मुगलों और अंग्रेजों ने विकृत नहीं किया था, उससे कहीं अधिक दूषित और विकृत “काले अंग्रेजों” अर्थात नेहरूवादी सेकुलरों और वामपंथियों ने कर दिया है. कई महत्वपूर्ण पुस्तकें, लेख और ऐतिहासिक दस्तावेज़ आम जनता से जानबूझकर षड्यंत्रपूर्वक छिपाकर रखे गए हैं. एक समस्या यह भी है कि इनमें से अधिकाँश लेख और पुस्तकें अंग्रेजी में हैं, हिन्दी में नहीं हैं. इसके अलावा यदि कई पुस्तकें हिन्दी में उपलब्ध भी हैं तो वह प्रकाशित स्वरूप में हैं, इंटरनेट पर डाउनलोड हेतु उपलब्ध नहीं हैं. साथ ही कुछ पुस्तकें व लेख ऐसे भी हैं, जो क्षेत्रीय भाषा में हैं जैसे वीर सावरकर लिखित कुछ साहित्य, गोवा, मैसूर, विजयनगरम इत्यादि के “वास्तविक इतिहास” संबंधी कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज इत्यादि. इन क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य को भी धीरे-धीरे हिन्दी में अनुवाद करके इंटरनेट पर अपलोड किया जाएगा. जो पुस्तकें हिन्दी में तो हैं, परन्तु सिर्फ प्रकाशित हैं इंटरनेट पर नहीं हैं, उन्हें “स्कैन” करके PDF स्वरूप में ई-बुक बनाकर अपलोड कर दिया जाएगा.

मित्रों... संक्षेप में योजना का मूल खाका इस प्रकार है –

कुछ मित्र मिलकर “गैर-लाभकारी संस्था” के रूप में एक फाउन्डेशन का गठन करने जा रहे हैं. यह फाउन्डेशन “दान व आर्थिक सहयोग” की अवधारणा पर काम करेगा. डोनेशन से प्राप्त पूरा पैसा किसी भी लाभकारी कार्य में उपयोग नहीं किया जाएगा. फाउन्डेशन का मुख्य कार्य और उद्देश्य उपरोक्त पुस्तकों, लेखों अथवा दस्तावेजों को अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद करके उसे इंटरनेट पर “मुक्त स्रोत” के रूप में उपलब्ध करवाना है, ताकि युवाओं में इंटरनेट पर हिन्दी पढ़ने की जो ललक बढ़ रही है, उसे देखते हुए उन्हें ऐसी महत्वपूर्ण सामग्री हिन्दी में भी उपलब्ध हो.


मुझे इस फाउन्डेशन के “अवैतनिक मानद निदेशक” का कार्यभार सौंपा जाने वाला है. अतः इस विराट कार्य में आप सभी मित्रों के अधिकाधिक सहयोग की आवश्यकता होगी. फाउन्डेशन के इस सामाजिक कार्य में सबसे बड़ी चुनौती होगी “धन जुटाना”, जबकि दूसरी बड़ी चुनौती है अंग्रेजी से हिन्दी, मराठी से हिन्दी, तमिल से हिन्दी इत्यादि अच्छे अनुवादकों (अथवा टाइपिस्टों) की टीम जुटाना.

फाउन्डेशन के निदेशक के रूप में मेरा काम मुख्यतः यह होगा :- धन जुटाने के लिए समय-समय पर लोगों से मिलना और इस कार्य के उद्देश्यों को उन्हें समझाकर उनसे आर्थिक सहयोग प्राप्त करना, अनुवादकों की टीम के बीच समन्वय और तालमेल बैठाना, अनुवाद की गुणवत्ता जाँचना, देश के विभिन्न क्षेत्रों के पुस्तकालयों का कम से कम एक दौरा करके अनुवाद की जाने वाले साहित्य की प्राथमिकताएं तय करना.

जो भी मित्र इस समाज-कार्य में अपना सहयोग देना चाहते हों, वे मुझसे संपर्क करें. एक सूची तैयार की जा रही है ताकि समुचित कार्य-विभाजन किया जा सके. जो मित्र “स्वयं” आर्थिक सहयोग कर सकते हों उनकी एक सूची, जो मित्र किसी धनपति अथवा दानवीर संस्था के जरिए आर्थिक सहयोग करवा सकते हों उनकी एक सूची, जो मित्र अनुवाद के कार्य में अपना समय “निःशुल्क” दे सकते हों, उनकी अलग सूची, तथा जो मित्र सशुल्क अनुवाद करना चाहते हों उनकी अलग सूची... ऐसा करने से मुझे विभिन्न प्रकार के कार्य विभाजन में मदद मिलेगी. जो मित्रगण सशुल्क कार्य करना चाहते हैं, वे अपनी दरें निःसंकोच होकर बताएं, इसी प्रकार जो मित्र इस प्रोजेक्ट में निःशुल्क सेवा देना चाहते हैं वे भी बिना किसी झिझक या मुलाहिजे के साफ़-साफ़ बताएं कि वे सप्ताह में कितने घंटे इस कार्य के लिए दे सकते हैं, ताकि मुझे समुचित योजना बनाने में आसानी हो.

फिलहाल यह फाउन्डेशन आरंभिक अवस्था अर्थात प्रथम चरण में है, फाउन्डेशन के रजिस्ट्रेशन और नामकरण हेतु आवेदन दिया जा चुका है. इस प्रक्रिया की समस्त कागजी कार्रवाई पूर्ण होने के बाद, इस फाउन्डेशन के बारे में संक्षेप में एक फोल्डर या पैम्फलेट तैयार किया जाएगा, फाउन्डेशन को जो भी नाम मिलेगा उसके प्रतीक चिन्ह का डिजाइन, लेटर-हेड इत्यादि का प्रकाशन होगा. हालांकि इस बीच अनुवाद का कार्य शुरू कर दिया जाएगा, ताकि जैसे ही वेबसाईट का निर्माण हो उस पर सामग्री डालने की शुरुआत की जा सके.

इस दिशा में आरंभिक रुझान बहुत ही उत्साहवर्धक हैं. अर्थात लोगों की दिली इच्छा है कि ऐसा साहित्य, पुस्तकें, लेख व ऐतिहासिक दस्तावेज उन्हें हिन्दी में पढ़ने को मिलें. चूँकि मेरे पास तो सदा की तरह आर्थिक संसाधनों का टोटा है इसलिए इस फाउन्डेशन के गठन और सरकारी प्रक्रिया में जो पैसा लग रहा है, वह एक मित्र दे रहे हैं... इसी प्रकार एक अन्य मित्र उस वेबसाईट को बनाने और सुचारू रूप से चलाने का जिम्मा उठा चुके हैं... एक अन्य मित्र ने कह दिया है कि वे इस फाउन्डेशन के प्रतीक चिन्ह, लेटर-पैड, विजिटिंग कार्ड इत्यादि का डिजाईन कर देंगे...| तात्पर्य यह है कि मेरे जैसे फक्कड़ और मामूली इंसान द्वारा की गई, सिर्फ एक अनुनय-विनय पर ही आरंभिक कार्य के लिए लोगों ने अपनी जेब और अपने संसाधनों से कार्य शुरू कर दिया है. इसी प्रकार मुझे उम्मीद है कि मैं अनुवादकों की टीम जुटाने में भी सफल हो जाऊँगा. साथ ही यदि इस प्रोजेक्ट हेतु धन जुटाने, चंदा मांगने के लिए मुझे किसी के चरणों में माथा भी रखना पड़े तो मैं रखूंगा, क्योंकि यह कार्य मैं अपने लाभ के लिए नहीं कर रहा हूँ, राष्ट्रवाद की भावना को मजबूत करने तथा आने वाली युवा पीढ़ी तक भारत के इतिहास, कला-संस्कृति का सटीक ज्ञान “हिन्दी में’ पहुँचाने हेतु कर रहा हूँ.

मित्रों... मैं आप सभी से आग्रह करता हूँ कि आप इस प्रोजेक्ट से जुड़ें और “यथायोग्य” सहयोग करने का प्रयास करें... ईश्वर की इच्छा होगी तो निश्चित रूप से हम भारत के इस समृद्ध ज्ञान को हिन्दी में संजोकर रख सकेंगे, ताकि आने वाले समय में यह एक “सन्दर्भ बिंदु” अथवा विशाल डाटा बैंक के रूप में तैयार हो सके.  
मंगलवार, 19 मार्च 2013 11:23

Drought in Maharashtra - Government and Beer Companies

रोटी नहीं मिलती तो केक खाओ... जलसंकट है तो बियर पियो...


महाराष्ट्र में विदर्भ सहित कई हिस्सों में अभी से भीषण सूखा पड़ रहा है. पीने के पानी की भारी किल्लत के बीच नगरपालिका द्वारा मनमाड जैसे शहर में "बीस दिन" छोड़कर एक टाइम पानी दिया जा रहा है. गाँव के गाँव खाली हो रहे हैं, क्योंकि लगभग सभी जलस्रोत मार्च में ही सूख चुके हैं...

अब हम आते हैं किसानों की परम-हितैषी(?) महाराष्ट्र सरकार और "तथाकथित" कृषि मंत्री शरद पवार के राज्य की नीतियों पर... इतने भयानक जल संकट के बावजूद राज्य में कार्यरत बियर कंपनियों को नियमित रूप से पानी की सप्लाय में वृद्धि की जा रही है.("तथाकथित" कृषि मंत्री, इसलिए लिखा, क्योंकि खेती और किसानों की दशा सुधारने का काम छोड़कर पवार साहब बाकी सारे काम करते हैं, चाहे वह बिल्डरों के हित साधना हो या क्रिकेट के छिछोरेपन और इसमें शामिल काले धन को बढ़ावा देने का काम हो...)



अब देखते हैं... महाराष्ट्र सरकार की अजब-गजब नीतियों की एक झलक -

१) मिलेनियम बियर इंडिया लिमिटेड :- जनवरी २०१२ में 12880 मिलियन लीटर पानी दिया जा रहा था, जिसे नवंबर २०१२ तक बढ़ाकर 22140 मिलियन लीटर कर दिया गया...

२) फ़ॉस्टर इंडिया लि. :- जनवरी २०१२ में 8887मिलियन लीटर पानी मिलता था, आज इसे 10,100 मिलियन लीटर पानी दिया जा रहा है.

३) इंडो-यूरोपियन ब्रोअरीज :- जनवरी २०१२ में कंपनी को 2521 मिलियन लीटर पानी दिया जा रहा था, जो अब बढ़कर 4701 मिलियन लीटर तक पहुँच गया है...

४) औरंगाबाद ब्रुअरीज :- हाल ही में इस कंपनी को जारी पानी के कोटे को 14,000 से 14621 मिलियन लीटर कर दिया गया है...


तात्पर्य  यह है कि किसानों को देने के लिए पानी नहीं है...भूजल स्तर चार सौ फुट से भी नीचे जा चुका है... शहरों-गाँवों को पीने के लिए पानी नहीं है, परन्तु बियर कम्पनियाँ बंद न हो जाएँ इसकी चिंता सरकार को अधिक है. 

उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र विधानसभा में सेना-भाजपा-रिपब्लिकन के संयुक्त मोर्चा ने सूखे से सम्बन्धित हर बात के घोटालों को प्रमुखता से उठाया है, परन्तु चूँकि केन्द्र में भी काँग्रेस सरकार है और पवार इसके प्रमुख घटक हैं, इसलिए न सिर्फ अजित पवार का सिंचाई घोटाला सफाई से दबा दिया गया है, बल्कि अब सूखे की वजह से चारा घोटाला तथा नया-नवेला "टैंकर घोटाला" भी सामने आ गया है. 


(टैंकर घोटाला = महाराष्ट्र में विदर्भ तथा अन्य सूखाग्रस्त क्षेत्रों में जहाँ टैंकरों से पानी सप्लाय किया जा रहा है, उनमें से अधिकाँश टैंकर NCP और काँग्रेस के बड़े और छुटभैये नेताओं के हैं, जो जनता से मनमाना पैसा वसूल रहे हैं)

हाल ही में केन्द्र सरकार ने राज्य में सूखे से निपटने के लिए सत्रह सौ करोड़ रूपए का पॅकेज जारी किया है, लेकिन किसी को भी विश्वास नहीं है कि इसमें से सत्रह करोड़ रूपए भी वास्तविक किसानों और पानी के लिए मारामारी और हाहाकार कर रहे लोगों तक पहुँचेगी.

अलबत्ता मूल मुद्दे और पानी में भ्रष्टाचार से ध्यान भटकाने के लिए आसाराम बापू द्वारा भक्तों के साथ सिर्फ चार टैंकरों से खेली गई होली को मुद्दा बनाकर NCP और कांग्रेसी नेता अपनी छाती कूट रहे हैं...

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कुल मिलाकर यह कि सरकार का सन्देश स्पष्ट है...

- रोटी नहीं मिल रही, तो केक खाओ... जलसंकट के कारण पानी नहीं मिल रहा, तो बियर पियो...

महाराष्ट्र के कफ़न-खसोट नेताओं पर जितनी भी लानत भेजी जाए वह कम ही होगी.. 
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शनिवार, 23 मार्च 2013 13:55

Gujrat Electricity Companies Performance and Jyotiraditya Scindia



गुजरात की तरक्की और नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता से इतनी जलन और घबराहट??  


भारत सरकार के ऊर्जा मंत्रालय ने, गुजरात की बिजली कंपनियों की उत्तम कार्यकुशलता तथा शानदार वितरण प्रणाली को मिलने वाले पुरस्कार के भव्य समारोह को ऐन मौके पर रद्द कर दिया, कि कहीं इस पुरस्कार के राष्ट्रीय प्रसारण और प्रचार की वजह से नरेंद्र मोदी को राजनैतिक लाभ न मिल जाए.

असल में मामला यह है कि, समूचे भारत में बिजली चोरी रोकने और उसके अधिकतम वितरण को सुनिश्चित और पुरस्कृत करने के लिए भारत सरकार के ऊर्जा मंत्रालय ने गत वर्ष दो सुविख्यात रेटिंग एजेंसियों ICRA और CARE को यह काम सौंपा था कि वे भारत की विभिन्न सरकारी विद्युत वितरण कंपनियों के कामकाज, विद्युत की हानि और चोरी के बारे में विस्तार से एक रिपोर्ट बनाकर पेश करें, और उसी के अनुसार उन बिजली बोर्डों या कंपनियों को रेटिंग प्रदान करें.

इस कवायद में भारत के बीस विभिन्न राज्यों की 39 बिजली कंपनियों को शामिल किया गया, तथा इनके कामकाज और नुक्सान के बारे में व्यापक सर्वे किया गया. इस के नतीजों के अनुसार “दक्षिण गुजरात वीज कम्पनी लिमिटेड (DGVCL)” को सर्वाधिक अंक 89% तथा “A+” की रेटिंग प्राप्त हुई. इसी प्रकार “पश्चिम बंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिट कम्पनी” तथा “महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कम्पनी” को 70% अंक और “A” ग्रेड मिला. घटिया प्रदर्शन तथा बिजली चोरी के मामलों में कमी न ला सकने के लिए 11 अन्य कंपनियों को “B+” की रेटिंग मिली, जबकि 8 राज्यों की बिजली कंपनियों को और भी नीचे “C” और “C+” तक की ग्रेड मिली. सूची में सबसे निचले स्थान पर रहने वाली बिजली कंपनियों में उत्तरप्रदेश और बिहार की कम्पनियाँ रहीं.


इस प्रदर्शन सूची और रेटिंग में अव्वल स्थान पर रहने वाली कंपनियों के प्रबंध निदेशकों को ऊर्जा मंत्रालय की तरफ से मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया सम्मानित करने वाले थे, परन्तु जैसे ही उन्हें पता चला कि इस सूची में “टॉप टेन” कंपनियों में से नौ गुजरात से और एकमात्र महाराष्ट्र की हैं, तो सम्मान देने का यह कार्यक्रम ताबड़तोड़ रद्द कर दिया गया. सूची में निचले चार स्थानों पर उत्तरप्रदेश और बिहार की बिजली कम्पनियाँ हैं.

मंत्रालय के इस कार्यक्रम में गुजरात की तीन कंपनियों द्वारा “पावर पाइंट प्रेजेंटेशन” द्वारा यह समझाया जाना था कि उन्होंने बिजली चोरी पर अंकुश कैसे लगाया, बिजली वितरण में होने वाले नुक्सान को कैसे रोका... इत्यादि. उल्लेखनीय है कि बिजली कंपनियों का जो घाटा २००९-१० में 63,500 करोड़ था, वह २०११-१२ में बढ़कर 80,000 करोड़ रूपए तक पहुँच गया है. इसीलिए ऊर्जा मंत्रालय ने ICRA को २० कंपनियों तथा CARE संस्था को १९ कंपनियों का पूर्ण लेखा-जोखा, जमीनी हकीकत, आर्थिक स्थिति इत्यादि के बारे में रिपोर्ट देने को कहा था.

गुजरात और मोदी की सफलता से केन्द्र सरकार इतनी आतंकित है कि इस रिपोर्ट के बारे में की गई प्रेस कांफ्रेंस में सिंधिया ने दस सर्वाधिक मजबूत और सफल कंपनियों का नाम तक लेना जरूरी नहीं समझा, क्योंकि शुरुआती दस में से नौ बिजली कम्पनियाँ तो गुजरात या भाजपा शासित राज्यों की ही हैं, जबकि सिर्फ एक महाराष्ट्र की है. नरेंद्र मोदी लगातार केन्द्र पर तथ्यों और आंकड़ों के साथ यह आरोप लगाते रहे हैं कि कोयला और प्राकृतिक गैस के आवंटन के मामले में केन्द्र हमेशा गुजरात के साथ सौतेला व्यवहार करता आ रहा है. इसके बावजूद बिजली चोरी रोकने, बकाया बिलों की वसूली एवं उत्तम वितरण में गुजरात की बिजली कम्पनियाँ अव्वल आ रही हैं तो जलन इतनी बढ़ गई कि सम्मान समारोह ही रद्द कर दिया.

पावर फाइनेंस कार्पोरेशन द्वारा आयोजित किए जाने वाले इस कार्यक्रम को रद्द किए जाने की सूचना भी एकदम अंतिम समय पर दी गई, जब गुजरात की तीन बिजली कंपनियों के प्रबंध निदेशक, सर्वश्री एन श्रीवास्तव, एचएस पटेल और एसबी ख्यालिया इस सम्मान को लेने दिल्ली भी पहुँच चुके थे. ऊर्जा मंत्रालय ने उन्हें सूचित किया था कि उनका सम्मान किया जाएगा, परन्तु उलटे पाँव लौटाकर उनका अपमान ही कर दिया, क्योंकि मंत्री जी नहीं चाहते थे कि मीडिया में यह बात जोर-शोर से प्रसारित और प्रचारित हो कि नरेंद्र मोदी के गुजरात में बिजली कम्पनियाँ उत्तम कार्यकुशलता दिखा रही हैं, जबकि खोखले विकास के दावे करने और दिल्ली में विशेष राज्य के नाम पर “भीख का कटोरा” लिए खड़े नीतीश और अखिलेश यादव के राज्य बेहद घटिया बिजली कुप्रबंधन और चोरी के शिकार हैं.

अब जबकि नरेंद्र मोदी ने मीडिया में खुलेआम केन्द्र सरकार की धज्जियाँ उडानी शुरू कर दी हैं, श्रीराम कॉलेज तथा इंडिया टुडे कान्क्लेव में दिए गए भाषणों से देश के निम्न-मध्यम वर्ग के बीच उनकी छवि और कार्यकुशलता के चर्चे जोर पकड़ने लगे हैं, तो अगले एक साल में मोदी की छवि बिगाड़ने के लिए (अथवा नहीं बनने देने हेतु) ऐसे कई कुत्सित प्रयास किए जाएंगे. गुजरात की जनता तो जानती है कि वहाँ बिजली-पानी और सड़क की स्थिति कितनी शानदार है, परन्तु यह बात भारत के अन्य राज्यों तक न पहुंचे इस हेतु न सिर्फ जोरदार प्रयास किए जाएंगे, बल्कि मोदी द्वारा विकास को चुनावी मुद्दा बनाने की बजाय, काँग्रेस और सेकुलरों की सुई २००२ के दंगों पर ही अटकी रहेगी.

विशेष नोट :- जो भी काँग्रेस के साथ जब तक रहता है, तब तक उसके सारे गुनाह माफ होते हैं वह महान भी कहलाता है. लेकिन जैसे ही कोई काँग्रेस से मतभिन्नता रखता है या काँग्रेस को कोई गंभीर चुनौती पेश करता है तो काँग्रेस तत्काल उसके साथ “खुन्नस” का व्यवहार पाल लेती है. DMK समर्थन वापसी का मामला तो एकदम ताज़ा है, मैं यहाँ एक पुराना उदाहरण देना चाहूँगा :- एक समय पर अमिताभ बच्चन, गाँधी परिवार के खासुलखास हुआ करते थे, राजीव गाँधी के बाल-सखा और काँग्रेस के सक्रिय सदस्य. इलाहाबाद से चुनाव लड़ा, जीता भी... बोफोर्स कांड में राजीव गाँधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मीडिया से लड़े... लेकिन राजीव की मौत के बाद जैसे ही अमिताभ बच्चन और गाँधी परिवार के रिश्ते तल्ख़ हुए, तत्काल सोनिया गाँधी की खुन्नस खुलकर सामने आ गई... अमिताभ बच्चन की माँ अर्थात तेजी बच्चन के अन्तिम संस्कार में गाँधी परिवार का एक भी सदस्य मौजूद नहीं था, जबकि भैरोंसिंह शेखावत अपने खराब स्वास्थ्य के बावजूद इसमें शामिल हुए। तेजी बच्चन के स्व.इन्दिरा गाँधी से व्यक्तिगत सम्बन्ध रहे और उन्होंने हमेशा राजीव गाँधी को अपने पुत्र के समान माना और स्नेह दिया। अब तक तो यही देखने में आया है कि अमिताभ के खिलाफ़ आयकर विभाग को सतत काम पर लगाया गया, जया बच्चन की राज्यसभा सदस्यता “दोहरे लाभ पद” वाले मामले में कुर्बान करनी पड़ी, जबकि सोनिया गाँधी को इससे छूट देने के लिए जमीन-आसमान एक किए गए थे. 

संक्षेप में तात्पर्य यह है कि नरेंद्र मोदी से काँग्रेस की खुन्नस इतनी अधिक है कि अब गुजरात में अच्छा काम करने वाली कंपनियों को सम्मानित करने में भी इन्हें झिझक महसूस होने लगी है.

सन्दर्भ :-

सोमवार, 01 अप्रैल 2013 13:27

Maldives : A New Headache to India??



क्या अब मालदीव, भारत का नया “सिरदर्द” बनने जा रहा है??


हाल ही में भारत सरकार ने तमिलनाडु की दोनों क्षेत्रीय पार्टियों के दबाव में आकर LTTE के मुद्दे पर श्रीलंका से खामख्वाह बुराई मोल ले ली. श्रीलंका पहले ही अपने बंदरगाह हम्बनटोटा को चीन की मदद से विकसित करके चीन की मदद कर रहा था, लेकिन संयुक्त राष्ट्र में भारत के इस रुख के बाद तो श्रीलंका पूरी तरह से चीन के पाले में चला जाएगा.  

यूपीए-२ के शासनकाल में वैसे ही भारत की विदेश नीति और विदेशी मोर्चों पर लगातार भारी फजीहत हो रही है तथा नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार सहित विभिन्न पड़ोसी देशों से हमारे रिश्ते लगातार खराब होते जा रहे हैं. ऐसे माहौल में एक और बुरी खबर सामने आ रही है. अमेरिका के पोर्टलैंड ओरेगान से अमेरिकी FBI ने रियाज़ कादिर खान नामक एक अमरीकी निवासी को गिरफ्तार किया है, जिसका हाथ लाहौर में हुए बम विस्फोटों में पाया गया है.


इस बम विस्फोट में ३० लोग मारे गए थे और ३०० से अधिक घायल हुए थे. एफबीआई ने अपनी जाँच में पाया कि रियाज़ कादिर ने बम विस्फोट के एक अन्य आरोपी जलील खान को यह सलाह दी थी कि वह मालदीव के रास्ते बिना किसी जाँच के सीधे पाकिस्तान जा सकता है, और जलील ने वैसा ही किया भी. रियाज़ कादिर ने ही जलील खान से कहा था, कि वह पहले मालदीव में एक पर्यटक के रूप में जाए और इसके बाद अपनी दोनों पत्नियों को वहाँ ले जाए.  

एफबीआई ने भारत सरकार को सूचित किया है कि मालदीव बड़ी तेजी से इस्लामिक जेहादियों का केन्द्र और यात्रा स्थानक बनता जा रहा है. यह खबर भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ाने के लिए काफी है.  हालांकि भारत सरकार की एजेंसियों ने काफी पहले ही मालदीव सरकार को सचेत कर दिया था कि उनका देश भी धीरे-धीरे नेपाल के रास्ते जा रहा है, जहाँ से बिना किसी विशेष जाँच-पड़ताल के जेहादी तत्व श्रीलंका, पाकिस्तान और भारत में प्रवेश कर जाते हैं. इसके अलावा मालदीव में दूर-दूर तक फैले हुए कम से कम ११०० छोटे द्वीप ऐसे हैं जो पूरी तरह से निर्जन हैं, और इन द्वीपों की निगरानी या सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है.

यही निर्जन द्वीप भारत-पाकिस्तान और अमेरिका का सिरदर्द बने हुए हैं, क्योंकि जेहादी तत्व यहाँ पर बड़ी आसानी से हथियार, गोला-बारूद और नगद पैसा छिपकर रख सकते हैं, बल्कि कुछ मामलों में ऐसा पाया भी गया है. एक तरह से इस्लामिक आतंकवादियों के लिए यह निर्जन द्वीप “लांचपैड” के रूप में काम कर रहे हैं. हालांकि मालदीव सरकार इन आतंकवादियों की मददगार नहीं है, परन्तु वास्तव में मालदीव के पास इतने संसाधन ही नहीं हैं कि वह इन निर्जन द्वीपों की सतत निगरानी कर सके. यहाँ तक कि भारत ने भी स्वीकार किया कि यदि भारत की वायुसेना भी इनकी निगरानी करे तब भी २४ घंटे / सातों दिन इन की निगरानी करना संभव ही नहीं है.


मालदीव की दूसरी समस्या यह है कि इसकी पूरी अर्थव्यवस्था पर्यटन पर ही टिकी हुई है. इसलिए इसने पर्यटन तथा “सी-फ़ूड” के आयात-निर्यात के नियमों में कई प्रकार की ढील दी हुई है. इसकी आड़ में जेहादी तत्व अपने विशाल नेटवर्क का फायदा उठाते हुए फर्जी कंपनियों के जरिए अपने धन का प्रवाह मालदीव में बना रहे हैं. इस धन को विभिन्न संस्थाओं और माध्यमों के जरिए पहले श्रीलंका, केरल और तमिलनाडु में आसानी से पहुँचाने की व्यवस्था भी अब जड़ें पकड़ चुकी है.

मालदीव की राजधानी माले में २००६ में हुए बम विस्फोट के प्रमुख आरोपी इब्राहीम खान ने खुलासा किया था कि उसे भारत में केरल के नज़दीक एक मजबूत बेस बनाने का निर्देश दिया गया था, जिसे उसने मालदीव में सफल प्रयोग करके सिद्ध भी किया, इसके लिए उसे खाड़ी देशों और पाकिस्तान से धन प्राप्त हुआ था. लश्कर और अल-कायदा ने मालदीव में एक फर्जी संगठन खड़ा कर रखा है जिसका नाम है जमात-ए-मुसलमीन. चूँकि पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए मालदीव में नब्बे दिनों तक कोई वीसा नहीं लेना पड़ता, इस नियम का फायदा उठाकर ढेर सारे जेहादी तत्व वहाँ बड़े आराम से आवाजाही करते रहते हैं.

सुरक्षा अधिकारी स्वीकार करते हैं कि हमें अमेरिका की एजेंसियों से मिलने वाली सूचनाओं का बहुत लाभ होता है, अतः हमें उनके साथ सक्रिय सहयोग स्थापित करना ही चाहिए. अब अमेरिका के भी कान खड़े हो चुके हैं और वह भी मालदीव पर निगाह रखने की फिराक में है. इसलिए इस क्षेत्र और विशेषकर मालदीव के समुद्री इलाके में भारत को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी ही होगी ताकि सुरक्षा और प्रभावशाली गुप्तचर सेवा का लाभ, केरल और तमिलनाडु में पनप रहे जेहादी तत्वों पर नकेल कसने में उठाया जा सके, वर्ना आने वाले समय में जैसे जमीन के रास्ते नेपाल और बांग्लादेश हमारे लिए बड़ी समस्या बन चुके हैं, वैसे ही मालदीव भी बन जाएगा.
सोमवार, 08 अप्रैल 2013 12:05

Suspected Church Activities in India and Mainstream Media



क्या भारत के चर्च और मदरसे सिर्फ “पवित्रता की प्रतिमूर्ति” हैं?


गत शनिवार को तमिलनाडु के कोयम्बटूर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में उस समय अच्छा ख़ासा हंगामा खड़ा हो गया, जब पोस्टमार्टम के पश्चात एक नन के परिजनों ने उसका शव लेने से इंकार करते हुए जाँच की मांग को लेकर धरना दे दिया. पोस्टमार्टम में पाया गया था कि नन ने जहर खाकर आत्महत्या की है, लेकिन परिजनों का कहना था कि उनकी बेटी ने चर्च अधिकारियों की प्रताड़ना और शोषण से तंग आकर आत्महत्या की है, इसलिए चर्च के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ भी रिपोर्ट दर्ज करते हुए जाँच की जाए. हालांकि पुलिस अधिकारियों का कहना था कि पोस्टमार्टम में भले ही जहर खाने की बात सामने आई हो, परन्तु शोषण अथवा मानसिक प्रताड़ना के सम्बन्ध में अभी कुछ भी नहीं कहा जा सकता.


२६ वर्ष की निर्मला एंजेलीना, जो कि सौरीपालायम की निवासी थी, वह सं २००४ में “नन” बनी और उसने अपना जीवन रोमन कैथोलिक चर्च और जीसस को समर्पित कर दिया. वह कोयम्बटूर के लओली रोड पर स्थित डी ब्रिटो चर्च परिसर में ही निवास करती थी. शनिवार को नाश्ते के बाद उसने अपनी साथी ननों को बताया कि उसने जहर खा लिया है, उसे तत्काल आरके पुरम के अस्पताल ले जाया गया, जहाँ से उसे पोदानूर के सेंट मैरिस अस्पताल ले जाया गया, वहाँ उसे मृत घोषित कर दिया गया.

रविवार की सुबह सिस्टर एंजेलीना के परिजन एम्बुलेंस के सामने ही धरने पर बैठ गए और उन्होंने चर्च के वरिष्ठ अधिकारियों को गिरफ्तार करने की मांग की. उन्होंने कहा कि चर्च के प्रमुख बिशप स्वयं अस्पताल आएं और एंजेलीना की मौत के बारे में स्पष्टीकरण दें. एंजेलीना की माँ एलीश मेरी ने कहा कि, उनकी बेटी बहुत हिम्मत वाली थी, वह ऐसा कदम उठा ही नहीं सकती. वह अंग्रेजी साहित्य में बीए कर रही थी, और अचानक वह नन बन गई. कुछ ही समय में उसने एक वरिष्ठ नन पर प्रताड़ना का आरोप लगाया था, लेकिन चर्च के अधिकारियों ने कोई ध्यान नहीं दिया. एंजेलीना के भाई चार्ल्स ने कहा कि यह आत्महत्या नहीं, बल्कि हत्या है और इसके पीछे बिशप और कुछ वरिष्ठ ननों का हाथ है, जो मेरी बहन से कुछ गलत काम करवाना चाहते थे. फिलहाल पुलिस ने कुछ ननों से पूछताछ की है और आरके पुरम पुलिस स्टेशन में धारा १७४ (अस्वाभाविक मौत) के तहत मामला दर्ज कर लिया है.

इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि दक्षिणी राज्यों में, जहाँ कि “चर्च” अब बेहद मजबूत शक्ति बन चुका है, वहाँ इन परिसरों और कान्वेंट के भीतर स्थितियाँ सही नहीं हैं. आए दिन हम केरल, तमिलनाडु, आंधप्रदेश के चर्चों में इस प्रकार की घटनाओं के बारे में सुनते हैं, परन्तु हमारा तथाकथित मुख्यधारा(??) का मीडिया, जो कि आसाराम बापू के आश्रम में चार बच्चों की मौत की खबर को राष्ट्रीय समस्या बना देता है, जो मीडिया आधी रात को शंकराचार्य की गिरफ्तारी को लेकर पूरी तरह से एकपक्षीय हिन्दू विरोधी मानसिकता के साथ अपनी रिपोर्टिंग करता है, उसे चर्च (और मदरसों) के भीतर चल रही (और पल रही) संदिग्ध गतिविधियों के बारे में रिपोर्टिंग करने की आवश्यकता महसूस नहीं होती??? ऐसा क्यों होता है कि केरल में सिस्टर अभया की बहुचर्चित रहस्यमयी मौत पर न्यायालयों के निर्णय (http://en.wikipedia.org/wiki/Sister_Abhaya_murder_case) आने के बाद भी उस पर कभी राष्ट्रीय बहस नहीं होती?? अक्सर विभिन्न चैनलों पर देश के प्रसिद्ध मंदिरों में आने वाले चढावे, दान पर चर्चाएँ होती हैं, हिन्दू रीती-रिवाजों और संस्कारों की खिल्ली उड़ाने वाले कार्यक्रम अक्सर चैनलों और अखबारों में छाए रहते हैं. तथाकथित बुद्धिजीवी अपना समस्त ज्ञान हिंदुओं को उपदेश झाड़ने में ही खर्च कर देते हैं, परन्तु इस्लाम या ईसाइयत के बारे में बात करते समय उनके मुँह में दही जम जाता है. 

किसी भी चैनल या अखबार में इस बात की चर्चा क्यों नहीं होती कि आज की तारीख में सरकार के बाद “चर्च” ही ऐसी संस्था है जिसके पास देश भर में सर्वाधिक व्यावसायिक जमीन है. कान्वेंट स्कूलों में भारतीय संस्कृति और परम्पराओं पर अपरोक्ष हमले किए जाते हैं, लड़कियों को चूड़ी, बिंदी, मेहंदी लगाने से रोका जाता है, छात्रों को तिलक लगाने और हिन्दी बोलने पर न सिर्फ खिल्ली उड़ाई जाती है, बल्कि सजा भी दी जाती है, चैनल इस बारे में कभी कोई आवाज़ क्यों नहीं उठाते? उन्हें सिर्फ सरस्वती शिशु मंदिरों में होने वाले सूर्य नमस्कार और वन्देमातरम पर विवाद खड़ा करना क्यों अच्छा लगता है? अक्सर विश्व हिन्दू परिषद पर राम मंदिर का पैसा खाने का मनगढंत आरोप लगाने वाले स्वयंभू पत्रकार कभी इस बात पर खोजी पत्रकारिता क्यों नहीं करते, कि चर्च को वेटिकन और विभिन्न NGOs से और मदरसों को खाड़ी देशों से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कितना धन मिल रहा है? यदि ईश्वर को समर्पित “देवदासी” की परम्परा, हिंदुत्व के नाम पर कलंक है, तो जीसस के नाम पर समर्पित होने वाली “नन” की परम्परा क्या है? कभी इनकी भूमिका और ननों के शोषण पर राष्ट्रीय चर्चा हुई है? नहीं... इसी प्रकार ईसाई समूहों द्वारा बड़े पैमाने पर किए जाने वाले धर्मान्तरण पर तो शायद कभी कोई बड़ा कार्यक्रम अब तक बना ही नहीं है, जब भी धर्मान्तरण संबंधी कोई बहस होती है, तो उसका मकसद सिर्फहिन्दू संगठनों को "नकारात्मक रंग" में रंगना ही होता है. क्योंकि ऐसा “सेकुलर सोच”(??) बना दिया गया है कि भारत के सभी चर्च और मदरसे सिर्फ “पवित्रता और ईमानदारी की प्रतिमूर्ति” हैं, जबकि सभी मंदिर-मठ और हिन्दू धर्मगुरु तो लालची-पाखंडी और लुटेरे हैं.


इस दोहरे रवैये के कारण ही सोशल मीडिया आम जनता में धीरे-धीरे न सिर्फ लोकप्रिय हो रहा है, बल्कि अब स्थिति यहाँ तक पहुँचने लगी है कि लोग चैनलों या अखबारों की ख़बरों पर आसानी से भरोसा नहीं करते. “पार्टी विशेष”, “परिवार विशेष” और “कारपोरेट विशेष” की चमचागिरी कर-करके मीडिया ने अपनी छवि इतनी खराब कर ली है कि अब उस पर सहज विश्वास करना कठिन है. फिलहाल मीडिया के पक्ष में सिर्फ दो बातें हैं, पहली है इनकी व्यापक पहुँच और दूसरी इनके पास प्रचुर धन की उपलब्धता. जिस दिन यह दोनों बातें सोशल मीडिया के पास भी होंगी, उस दिन देश में वास्तविक लोकतंत्र दिखाई देगा. 

इस संक्षिप्त लेख का मकसद यही है कि जब तक मीडिया सभी धर्मों, धर्मगुरुओं और धर्मस्थानो की कुरीतियों, शोषण, अत्याचार व लूट के बारे में बड़े ही रहस्यमयी तरीके से सिर्फ “एकपक्षीय रिपोर्टिंग” करता रहेगा, बारम्बार सिर्फ हिन्दू धर्म को ही टारगेट किया जाता रहेगा, जनता में उसके प्रति घृणा और उपेक्षा का भाव बढ़ता ही जाएगा. यह कोई अच्छी बात नहीं बल्कि एक खतरनाक संकेत है, क्योंकि मुख्यधारा के मीडिया का अपना स्थान है, उसे सोशल मीडिया कभी विस्थापित नहीं कर सकता... परन्तु चाहे भ्रष्टाचार की खबरें हो या धार्मिक या सामाजिक... सभी ख़बरों में प्रत्येक वर्ग और समूह के बीच "संतुलन" बनाना बेहद जरूरी है, जो कि अभी नहीं हो रहा.
सोमवार, 15 अप्रैल 2013 12:10

Church Article and Disputes Regarding Charaiveti Website



मुख्य मुद्दे को दरकिनार कर, आपसी उठापटक (सन्दर्भ – भाजपा का चरैवेति प्रकरण)


चर्च संस्था की समस्याओं और अनियमितताओं पर नियमित रूप से अपनी सशक्त लेखनी चलाने वाले "पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट" के अध्यक्ष आर एल फ्रांसिस ने मप्र भाजपा की पत्रिका "चरैवेति" में जो लेख लिखा है, उसकी चंद पंक्तियाँ इस प्रकार हैं... -

फ्रांसिस ने आयोग के हवाले से ननों की स्थिति बेहतर बनाने के लिए जो सुझाव हैं वे भी पेश किए - जैसे कि 
१)    जो माँ-बाप अपनी नाबालिग बेटियों को जबरन नन बनने के लिए मजबूर करते हैं, उन पर कार्रवाई हो...
२)    ननों की संपत्ति से बेदखली रोकी जाए ताकि यदि कोई नन सामान्य जीवन में लौटना चाहे तो उसे अपने पिता की संपत्ति में अधिकार मिल सके...
३)    यह जाँच की जाए कि केरल में कितनी नाबालिग ननें बनीं हैं और उनमें से कितनी वापस पारिवारिक जीवन में लौटना चाहती हैं... इत्यादि...

फ्रांसिस ने अपने लेख में कई उदाहरण दिए हैं, जिसमें सिस्टर जेस्मी की आत्मकथा "आमीन", कई वर्ष पहले की गई सिस्टर अभया की हत्या, कोल्लम की सिस्टर अनुपा मैरी की आत्महत्या जैसे उदाहरण शामिल हैं...


भला इस लेख में आपत्ति जताने लायक क्या है?? और भाई फ्रांसिस से ज्यादा कौन जान सकता है कि चर्च के भीतर क्या चल रहा है?? लेकिन ईसाई संगठनों ने अपनी गिरेबान में झाँकने की बजाय "चरैवेति" पर ही वैमनस्यता फ़ैलाने का आरोप मढ़ दिया... भोपाल के ईसाई संगठनों को चर्च के अंदर की यह "कड़वी सच्चाई" नहीं सुहाई, और वे "चरैवेति" पत्रिका की शिकायत लेकर पुलिस के पास पहुँच गए....

यहाँ तक तो सब ठीक था, किसी भी धर्म या संस्था में हो रही गडबड़ी अथवा समस्याओं को उजागर करना कोई गलत काम नहीं है... लेकिन जैसा कि अक्सर होता आया है, अचानक पता नहीं कहाँ से भाजपा के भीतर से ही “सेकुलरिज्म” की चिंताएँ उभरने लगीं. एक ईसाई लेखक द्वारा चर्च की समस्याओं को उजागर करने वाले लेख के प्रकाशन से, भाजपा के ही एक वर्ग को "आपत्ति" हो गई. कुछ लोगों को प्रदेश के मुठ्ठी भर ईसाई वोटों की चिंता सताने लगी, और इस लेख में प्रस्तुत मूल मुद्दों (अर्थात चर्च में ननों के शोषण और उनकी दयनीय स्थिति) पर चर्चा करने (या करवाने) की बजाय भाजपा के एक वर्ग ने चरैवेति पत्रिका के मालिकाना हक और विज्ञापनों को लेकर निरर्थक किस्म की बयानबाजी और अखबारी युद्ध छेड़ दिया... जिसकी कोई तुक नहीं थी. वेबसाइटों का हिसाब रखने वाली वेबसाईट whois.com के अनुसार Charaiveti.in के नाम से 19.04.2012 को साईट रजिस्टर हुई है, जबकि Charaiveti.net के नाम से जो वेबसाईट है वह 12.10.2012 को, अर्थात बाद में रजिस्टर हुई है... मजे की बात यह है कि दोनों वेबसाईटों में पत्राचार का पता E-2. दीनदयाल परिसर, अरेरा कालोनी भोपाल ही दिया है. यह तो जाँच से ही पता चलेगा कि पहले रजिस्टर हुई साईट को असली माना जाए या बाद में रजिस्टर हुई साईट को? (हालांकि सामान्य समझ तो यही कहती है कि जिसने चरैवेति नाम से पहले रजिस्टर कर लिया, वही मूल साईट है, बाद में रजिस्टर होने वाली नक़ल मानी जाती है. खासकर उस स्थिति में जबकि Charaiveti.in के बारे में जानकारी बताती है कि, इस साईट के एडमिनिस्ट्रेटर के रूप में अनिल सौमित्र का नाम है, और तो और रजिस्ट्रेशन में जो ई-मेल पता दिया है, वह भी चरैवेति पत्रिका में नियमित रूप से प्रकाशित होता है).

दोनों ही वेबसाईट सरसरी तौर से देखने पर एक जैसी लगती हैं, दोनों में भाजपा और संगठन से सम्बन्धित ख़बरें और तस्वीरें हैं, ऐसे में सवाल उठता है कि वास्तव में मध्यप्रदेश जनसंपर्क विभाग से किस वेबसाईट को विज्ञापन मिल रहे हैं? कौन सी वेबसाईट को भुगतान हुआ है और कौन सी वेबसाईट “जनसेवा” के तौर पर खामख्वाह सरकारी प्रचार कर रही है? यह जानकारियाँ और जाँच तो दोनों पक्षों को साथ बैठाकर दस मिनट में ही संपन्न हो सकती थी... यह तो पार्टी का अंदरूनी मामला होना चाहिए था, इसके लिए चौराहे पर जाकर कपड़े धोने की क्या जरूरत थी?

इस “फोकटिया अखबारी युद्ध” के कारण फ्रांसिस साहब के लेख और चर्च की अनियमितताओं संबंधी मुद्दों पर जैसी “हेडलाइंस” बननी चाहिए थीं, उनका फोकस हटकर “चरैवेति” और विज्ञापनों पर आकर टिक गया... फ्रांसिस को खामख्वाह अपनी सफाई पेश करनी पड़ी और मूल मुद्दा तो पता नहीं कहाँ गायब हो गया. भोपाल से प्रकाशित होने वाले लगभग प्रत्येक बड़े अखबार ने फ्रांसिस के लेख और उसमें दर्शाई गई चर्च की गंभीर समस्याओं पर शायद ही कुछ छापा हो, किसी भी अखबार के “संवाददाता”(?) ने यह ज़हमत नहीं उठाई कि वह थोड़ी खोजबीन करके पिछले दस साल के दौरान केरल में चर्च की गतिविधियों के बारे में कोई खबर या लेख लिखता... लेकिन “चरैवेति” के अनावश्यक विवाद पर अखबारों ने जरूर चार-चार कॉलम भर दिए, यह कैसा रहस्य है? जिन तत्वों ने यह खबर प्लांट करवाई है, उन्हें उस समय  मायूसी हुई होगी जब मप्र जनसंपर्क विभाग ने बाकायदा घोषणा की, कि चरैवेति.इन को और चरैवेति.नेट, दोनों को ही किसी प्रकार का भुगतान नहीं किया गया है. यानी “सूत न कपास, जुलाहों में लठ्ठमलट्ठा”, और चर्च की मुख्य समस्या पर चर्चा गायब!!!!


भोपाल के अधिकाँश अखबारों की हेडलाइन है :- “चर्च में ननों का शोषण – चरैवेति में छपे लेख से भाजपा में हडकंप”... क्या??? भाजपा में हडकंप???? - क्यों भाई, जहाँ हडकंप मचना चाहिए (यानी की चर्च में) वहाँ तो हडकंप मचा नहीं, इस खबर से भाजपा में हडकंप कैसे मच सकता है? और क्यों मचना चाहिए? उल्लेखनीय है कि “चरैवेति” नामक पत्रिका, भाजपा के लगभग एक लाख कार्यकर्ताओं, व जिला-मंडल कार्यालयों में भेजी जाती है. तो फिर इस पत्रिका में एक ईसाई समाज सुधारक द्वारा लिखे गए लेख से इतना विवाद क्योंकर हुआ? क्या भाजपा की “अपनी आंतरिक पत्रिका” को भी “सेकुलरिज्म की बीमारी” से घिर जाना चाहिए, जहाँ चर्च से जुडी हर खबर “पवित्र” ही हो, वर्ना न हो? जाहिर है कि यह मामला भाजपा की अंदरूनी उठापटक का है, जिसके लिए फ्रांसिस साहब के इतने महत्वपूर्ण लेख को दरकिनार करते हुए असली-नकली वेबसाईट और उसे मिलने वाले विज्ञापन जैसे बकवास मुद्दों को षडयंत्रपूर्वक तूल दे दिया गया.

ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा के गढ़ भोपाल तक में ईसाई संगठनों का दबदबा इतना बढ़ चुका है कि अब प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनसे सम्बन्धित किसी भी नकारात्मक खबर को दबाने में उन्हें सफलता मिलने लगी है. जैसा कि हम राष्ट्रीय स्तर पर भी देख चुके हैं कि भारत सरकार के बाद देश में “जमीन” का सबसे बड़ा मालिक होने के बावजूद चर्च की आमदनी और विदेशों से आने वाले अकूत धन पर सरकार का न तो कोई अंकुश है और ना ही नियंत्रण. आए दिन केरल से ननों के शोषण की ख़बरें आती हैं, लेकिन सब बड़ी सफाई से दबा दी जाती हैं.

ऐसा क्यों होता है कि सत्ता में आते ही भाजपा के कुछ लोगों पर “सेकुलरिज्म” की अफीम चढ़ जाती है? वर्ना क्या कारण है कि भाजपा की अपनी ही पत्रिका में छपे लेख पर पार्टी न सिर्फ सफाई देती फिरे, न सिर्फ बैकफुट पर चली जाए, बल्कि मूल मुद्दे को छोड़कर उनके आपसी विवाद अखबारों की हेडलाइंस बन जाएँ? निश्चित रूप से कहीं न कहीं आपसी समन्वय की कमी (बल्कि उठापटक कहिये) और “विचारधारा का क्षरण”, साफ़ दिखाई देता है...

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विशेष नोट :- बात निकली ही है तो यहाँ यह बताना उचित होगा कि कुछ माह पहले यह समाचार प्रकाशित हुआ था और जिसकी पुष्टि भी हुई थी कि मप्र के जनसंपर्क विभाग ने किसी नामालूम सी वेबसाईट www.mppost.com को पन्द्रह लाख का भुगतान, विज्ञापन मद में कर दिया था. इस खबर के चित्र भी साथ में संलग्न हैं. यही हाल चरैवेति की दोनों वेबसाईटों का है. इन वेबसाईटों पर पाठकों के नाम पर कव्वे उड़ते रहते हैं, शायद भाजपा के कार्यकर्ता तक इन साईटों पर झाँकते नहीं होंगे.




Mppost.com से सम्बन्धित इस खबर पर उस समय प्रतिक्रिया व्यक्त करते समय मैंने टिप्पणी भी की थी, कि एक अनजान सी वेबसाईट को न जाने किस “सेटिंग” और “जुगाड़” के चलते लाखों का भुगतान हो जाता है, और मेरे जैसे लोग जिसके ब्लॉग का ट्रेफिक और लोकप्रियता इन साईटों के मुकाबले कहीं अधिक है, लेकिन मुझे आज तक मप्र जनसंपर्क की तरफ से फूटी कौड़ी भी नहीं मिली है, क्योंकि मुझे न तो जुगाड़ आती है, न सेटिंग करना आता है और किसी अफसर या नेता की चाटुकारिता तो बिलकुल भी नहीं आती. स्वाभाविक है कि मुझे अपना ब्लॉग चलाने के लिए इधर-उधर भीख मांगकर काम चलाना पड़ता है... “विचारधारा” के लिए लड़ने वाले मेरे जैसे सामान्य कार्यकर्ता दर-दर की ठोकरें खाते हैं, और इधर भोपाल में बैठे लोग ईसाईयों से सम्बन्धित मुद्दे पर एकजुटता दिखाने और चर्च के कुप्रचार/दबाव का मुकाबला करने की बजाय, आपसी सिर-फुटव्वल में लगे हुए हैं... इसे क्या कहा जाए?? 

कम  से कम एक बात तो स्पष्ट है कि सोशल मीडिया के लिए, मप्र जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी किए जाने विज्ञापनों की नीति और भुगतान के सम्बन्ध में गहन जाँच होनी आवश्यक है...