Super User

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I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

Website URL: http://www.google.com
Panchayati Raj Illiteracy and Society

भारत के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक है झाबुआ, उसके ग्राम सारंगी की सरपंच हैं श्रीमती फ़ुन्दीबाई। पूर्णतः अशिक्षित, “श्रीमती” लगाने भर से असहज हो जाने वाली, एकदम भोली-भाली, सीधी-सादी आदिवासी महिला सरपंच। आप सोच रहे होंगे कि भला यह कैसे “बदलते भारत की महिला” हो सकती हैं... लेकिन वे हैं... आरक्षण के कारण अजजा महिला सीट घोषित हुई सारंगी ग्राम से फ़ुन्दीबाई सरपंच बनीं। आजादी के साठ साल बीत जाने के बावजूद रेल की पटरी न देख पाने वाले झाबुआ के अन्दरूनी ग्रामों की हालत आज भी कुछ खास बदली नहीं है। यहाँ के आदिवासियों ने आज तक अफ़सरों और नेताओं को बड़ी-बड़ी जीपों और “चीलगाड़ी” (हेलीकॉप्टर) मे सिर्फ़ दौरे करते देखा है, आदिवासी आज भी गरीब का गरीब है, जबकि झाबुआ और आदिवासियों के नाम पर पिछले पचास वर्षों में जितना पैसा आया, उतने में कम से कम चार मुम्बई और बसाई जा सकती हैं। ऐसे भ्रष्ट माहौल में जब कोई सरपंच बनता है, तो समझो उसकी “लॉटरी” लग जाती है।


फ़ुन्दीबाई एक प्रतिबद्ध महिला सरपंच, साहसी और दबंग, जो अपने इलाके में “स्कूल वाली बाई” के नाम से मशहूर हो गई हैं


लेकिन फ़ुन्दीबाई कोई साधारण महिला नहीं हैं, सरपंच बनते ही सबसे पहले उन्होंने अपनी पंचायत में लड़कियों की ऐसी सूची बनाई जो स्कूल नहीं जा रही, फ़िर खुद उनके घर जा-जाकर उनके माता-पिता को लड़कियों को स्कूल जाने को तैयार किया। समय जरूर लगा, लगता ही है, लेकिन आज ग्राम सारंगी में बालिकाओं ने हायरसेकंडरी में कदम रख दिया है और इस साल लगभग 22 लड़कियों को शासन की तरफ़ से स्कूल जाने के लिये साइकल दिलवा दी गई है। पंचायत के सभी स्कूलों में फ़ुन्दीबाई स्वयं सुबह से भ्रमण करती हैं, जहाँ भी गंदगी या कचरा दिखाई देता है, उसे अपने हाथों से साफ़ करती हैं। लड़कियों को पढ़ाने के बारे में उनका अलग ही “फ़लसफ़ा” है, वे कहती हैं “वगर भणेली सोरी, लाकड़ा नी लोगई बणी जावे” मतलब.. “बगैर पढ़ी-लिखी लड़की काठ की पुतली बनी रह जाती है”। उनका सोचना है कि एक लड़की के पढ़ने से तीन घर सुधर जाते हैं, एक तो उसका मायका, दूसरा उसका ससुराल और तीसरा उसकी होने वाली लड़की का घर..। उच्च जाति के दबदबे वाले समाज में वह साहस और दबंगता से अपनी बात रखती हैं और नतीजा यह कि आसपास के इलाके में वे “स्कूल वाली बाई” के नाम से मशहूर हैं। वे खुद अशिक्षित हैं इसलिये इसकी हानियों से वे अच्छी तरह परिचित थीं, इसलिये उनके एजेंडे में सबसे पहला काम था शिक्षा और खासकर बालिका शिक्षा। वे अपनी तीन लड़कियों को तो पढ़ा ही रही हैं खुद भी प्रारंभिक अक्षर-ज्ञान लेने में लगी हैं। उनका अगला लक्ष्य है ग्राम में स्थित सभी पेड़-पौधों और आसपास के वृक्षों की रक्षा करना और उनकी वृद्धि करना। उनके सरपंच कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे हो चुके हैं, अब यदि उन्हें अगला कार्यकाल मिला तो निश्चित ही वे यह भी कर दिखायेंगी।

भारत में पंचायती राज लागू हुए कई वर्ष हो गये। अखबारों, दृश्य-मीडिया आदि में अधिकतर पंचायतों के बारे में, पंचायती राज के बारे में नकारात्मक खबरें ही आती हैं। “फ़लाँ सरपंच अनपढ़ है, फ़लाँ सरपंच ने ऐसा किया, वैसा किया, यहाँ-वहाँ पैसा खा लिया, पैसे का दुरुपयोग किया, अपने रिश्तेदारों और अपने घर के पास निर्माण कार्य करवा लिये.... आदि-आदि। माना कि इनमें से अधिकतर सही भी होती हैं, क्योंकि वाकई में पंचायती राज ने भ्रष्टाचार को साहबों की टेबल से उठाकर गाँव-गाँव में पहुँचा दिया है। लेकिन सवाल उठता है कि मीडिया इस प्रकार की सकारात्मक खबरें क्यों नहीं देता? या सिर्फ़ नकारात्मक खबरों से ही टीआरपी बढ़ती है? या पैसा कमाने के लिये मीडिया ने अपना आत्मसम्मान गिरवी रख दिया है?

जीवन को जीना और जीवन को ढोना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आजकल का पढ़ा-लिखा युवा या मध्यमवर्गीय आदमी “जैसा है वैसा चलने दो” वाला भाव अपनाये रहता है, उसे कहते हैं जीवन को ढोना, जबकि फ़ुन्दीबाई की सृजनशीलता ही जीवन को जीना कहलाता है। कोई जरूरी नहीं कि उच्च शिक्षा, या भरपूर कमाई या कोई बड़ी महान कृति ही सब कुछ है। समाज में बड़े बदलाव लाने के लिये हमेशा छोटे बदलावों से ही शुरुआत होती है, जरूरत है सिर्फ़ समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के अहसास की, उच्च शिक्षा तो उसमें मददगार हो सकती है....नितांत जरूरत नहीं।

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Anti Smoking Decisions Ambumani Ramdas

धूम्रपान को रोकने या उसे निरुत्साहित करने के लिये अम्बुमणि रामदास साहब एक से एक नायाब आईडिया लाते रहते हैं, ये बात और है कि उन आईडिया का उद्देश्य सस्ती लोकप्रियता हासिल करना होता है न कि गम्भीरता से सिगरेट-बीड़ी के प्रयोग को रोकने की। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने संसद के पिछले एक और विधेयक पारित किया है जिसमें सिगरेट कम्पनियों को सिगरेट के पैकेट पर कैन्सरग्रस्त मरीजों की तस्वीरें और “खतरा है” के निशान वाली मानव खोपड़ी का चित्र छापना जरूरी कर दिया गया है। सिगरेट के पैकेट पर गले, दाँत आदि के कैन्सर के भयानक चित्र भी छापने का प्रस्ताव है। इसके पहले भी रामदास जी फ़िल्मों में धूम्रपान के दृश्य न दिखाने का संकल्प व्यक्त कर चुके हैं (ये और बात है कि आज तक इसका पालन करवा नहीं पाये हैं, ना ही यह सम्भव है, क्योंकि टीवी सीरियलों आदि में धूम्रपान चित्रण को वे कैसे नियंत्रित करेंगे?)। एक और हास्यास्पद निर्णय माननीय स्वास्थ्य मंत्री ने जो लिया है, वह यह है कि घर पर सिगरेट पीते समय पुरुष अपनी पत्नियों की इजाजत लें.... क्या बेतुका निर्णय और सुझाव है।

अब सवाल उठता है कि क्या वाकई इस प्रकार के “टोटकों” से धूम्रपान करने वाले पर कोई फ़र्क पड़ता है? या फ़िर इस प्रकार के निर्णय मात्र “चार दिन की चाँदनी” बनकर रह जाते हैं। धूम्रपान का विरोध होना चाहिये, सिगरेट कंपनियों पर कुछ प्रतिबन्ध होना चाहिये, इसका सभी समर्थन करते हैं, लेकिन जब धूम्रपान रोकने के उपायों की बात आती है, तब साफ़-साफ़ किसी “होमवर्क” की कमी का अहसास होता है। साफ़ जाहिर होता है कि विधेयक बगैर सोचे-समझे, बिना किसी तैयारी के और सामाजिक संरचना या इन्सान के व्यवहार का अध्ययन किये बिना लाये जाते हैं और अन्ततः विवादास्पद या हास्यास्पद बन जाते हैं।

भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी तक की परिस्थितियाँ बहुत-बहुत अलग-अलग हैं, शहरी और ग्रामीण जनता का स्वभाव अलग-अलग है, आर्थिक-सामाजिक स्थितियाँ भी जुदा हैं, ऐसे में दिल्ली में बैठकर सभी को एक ही चाबुक से हाँकना सही नहीं है। भले ही इन उपायों का मकसद धूम्रपान से लोगों को विमुख करना हो, लेकिन यह लक्ष्य साध्य हो पायेगा यह कहना मुश्किल है। क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि भारत में कितने प्रतिशत लोग सिगरेट का पूरा पैकेट खरीदते हैं? महंगी होती जा रही सिगरेट का पूरा पैकेट लेने वाले इक्का-दुक्का लोग ही होते हैं। और जो भी पूरा पैकेट खरीदते हैं उन्हें सिर्फ़ अपने ब्रांड से मतलब होता है, वे उस पर छपे चित्र की ओर झाँकेंगे तक नहीं... उस पैकेट पर क्या लिखा है यह पढ़ना तो और भी दूर की बात होती है। न उनके पास इस बात का समय होता है न ही “इंटरेस्ट”, ऐसे में सिगरेट के पैकेट पर 40 के फ़ोंट साईज में भी लिख दिया जाये “सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है” तो भी उस पर किसी की नजर नहीं पड़ेगी।

घर में धूम्रपान करते समय महिलाओं की अनुमति लेने वाला सुझाव तो निहायत मूर्खता भरा कदम है। भारत के कितने घरों में महिलाओं की बातें पुरुष ईमानदारी से मानते हैं? कृपया महिलायें इसे अन्यथा न लें, लेकिन कड़वी हकीकत यही है कि घर में पुरुष, महिलाओं की कम ही सुनते हैं, बल्कि एक कदम आगे बढ़कर अपने बच्चे को सिगरेट लेने के लिये भेजने वाले “बाप” भी काफ़ी संख्या में हैं। ऐसे में यह निर्णय या सुझाव किस काम का है?

फ़िल्म या टीवी सीरियल में धूम्रपान के दृश्यों पर प्रतिबन्ध लगाने से तो समस्या का हल कतई होने वाला नहीं है। मुझे ऐसे सौ व्यक्ति भी दिखा दीजिये जो कहें कि “फ़िल्मों में धूम्रपान दिखाया जाना बन्द करने के बाद मैंने भी धूम्रपान बन्द कर दिया”, समर्थक तर्क देते हैं कि कम से कम बच्चे तो इससे नहीं सीखेंगे, लेकिन बच्चों को टीवी पर दिखाये जाने वाले सेक्स, हिंसा से बचाने का प्रबन्ध तो पहले कर लो यारों!! फ़िर सिगरेट-बीड़ी के पीछे पड़ना।

सिगरेट-बीड़ी पीने वाले लगभग पचास-साठ प्रतिशत लोगों को इसके दुष्परिणामों के बारे में पहले से ही पता होता है, कुछ तो भुगत भी रहे होते हैं फ़िर भी पीना नहीं छोड़ते, ऐसे में इस प्रकार के बेतुके निर्णयों की अपेक्षा अलग-अलग क्षेत्रों के नागरिकों की शैक्षणिक, व्यावसायिक, आर्थिक परिस्थिति का अध्ययन करके उस हिसाब से योजना बनानी चाहिये। सिर्फ़ वाहवाही लूटने के लिये ऊटपटांग निर्णय लेने से कुछ हासिल नहीं होगा।


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Marathi Film Industry Nilu Fule

हिन्दी फ़िल्मों में जो स्थान प्राण साहब का है, लगभग वही स्थान मराठी सिनेमा में निळू फ़ुले साहब का है। प्राण साहब अपने-आप में एक “लीजेण्ड” हैं, एक आँख छोटी करके, शब्दों को चबा-चबाकर बोलने और “विलेन” नामक पात्र को उस ऊँचाई पर पहुँचाना जहाँ “हीरो” भी छोटा दिखाई देने लगे, और जिस प्रकार से पूरी फ़िल्म पर वे हावी हो जाते हैं, ठीक उसी प्रकार निळू फ़ुले साहब का नाम मराठी फ़िल्म इंडस्ट्री में बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। एक क्रूर, कपटी, धूर्त, धोखेबाज, शोषक जमींदार, चालाक मुनीम आदि की भारतीय फ़िल्मों के जाने-पहचाने रोल निळू फ़ुले जी ने बेहतरीन अन्दाज में प्रस्तुत किये हैं। मराठी फ़िल्मों में निळू फ़ुले का पहनावा अर्थात “टिपिकल” ग्रामीण मराठी “सफ़ेद टोपी, काली जैकेट, और धोती”, लेकिन चेहरे पर चिपकाई हुई धूर्त मुस्कराहट और संवाद-अदायगी का विशेष अन्दाज दर्शकों के दिलोदिमाग पर छा जाता है। उनकी आवाज भी कुछ विशेष प्रकार की है, जिसके कारण जब वे अपने खास स्टाइल में “च्या मा...यला” (माँ की गाली का शॉर्ट फ़ॉर्म) बोलते हैं तो महिलाओं के दिल में कँपकपी पैदा कर देते हैं।

(प्रस्तुत चित्र एक कलाकार द्वारा तैयार किया गया कैरीकैचरनुमा चित्र है, जबकि उनके अभिनय की झलक देखने के लिये लेख में नीचे एक वीडियो क्लिप दिया गया है)


मराठी फ़िल्मोद्योग के अधिकतर कलाकार चूँकि नाटकों की पृष्ठभूमि से आये हुए होते हैं, इसलिये निर्देशक को उनके साथ अपेक्षाकृत कम मेहनत करनी पड़ती है। (मराठी में नाट्य परम्परा कितनी महान, विस्तृत, समृद्ध और सतत चलायमान है यह हिन्दी पाठकों को अलग से बताने की आवश्यकता नहीं है, फ़िर भी जो लोग नहीं जानते उनके लिये बता दूँ कि आज टीवी, फ़िल्मों और धारावाहिकों के जमाने में भी कई मराठी नाटक हाउसफ़ुल जाते हैं, किसी प्रसिद्ध मराठी नाटक के 2000-3000 शो हो जाना मामूली बात है प्रशान्त दामले जैसे कलाकार एक ही दिन में अलग-अलग नाटकों के चार शो भी कर डालते हैं, बगैर एक भी डायलॉग भूले…)

शुरुआत में निळू फ़ुले ने गाँव में एक आर्ट ग्रुप के साथ जुड़कर कई स्थानीय और ग्रामीण नाटकों में काम किया। कुछ वर्षों बाद उन्होंने नाटक को “प्रोफ़ेशन” के तौर पर अपनाया और एक लोकनाटक “कथा अक्लेच्या कांड्याची” में काम किया। यह नाटक बेहद प्रसिद्ध हुआ। इसके पहले भाग के 2000 शो हुए इसी नाटक के दूसरे भाग के दौरान निर्देशक अनन्तराव माने की निगाह उन पर पड़ी और उन्होंने निळू फ़ुले को मराठी फ़िल्मों में काम करने की सलाह दी फ़ुले की पहली फ़िल्म थी “एक गाव बारा भानगडी” (एक गाँव और बारह लफ़ड़े), यह फ़िल्म सुपरहिट रही, और फ़िर निळू फ़ुले ने पीछे मुड़कर नहीं देखा उसी वर्ष उन्हें लगातार सात हिट फ़िल्में भी मिलीं उनका कहना है कि “प्रत्येक कलाकार को अपने रोल के साथ हमेशा पूरा न्याय करने की कोशिश करना चाहिये, भले ही मैं अपने जीवन में एकदम सीधा-सादा हूँ, लेकिन परदे पर मुझे हमेशा बुरा आदमी ही बताया गया है, लेकिन यह तो काम है और मुझे खुशी है कि मैंने अपना काम इतनी बेहतरीन तरीके से किया है कि आज भी जब मैं समाजसेवा के लिये अन्दरूनी गाँवों में जाता हूँ तो ग्रामीणों के दिमाग में मेरी छवि इतनी गहरी है कि वहाँ की स्कूल शिक्षिकायें, नर्सें और आम गृहिणियाँ आज भी मुझसे दूरी बनाकर रखती हैं, वे लोग अब भी यह सोचते हैं कि जरूर यह कोई शोषण करने या बुरी नजर रखने वाला व्यक्ति है, लेकिन इसे मैं अपनी सफ़लता मानता हूँ…” हालांकि समय-समय पर मराठी में उन्होंने चरित्र भूमिकायें भी की हैं, क्या आपको फ़िल्म “प्रेम प्रतिज्ञा” याद है, जिसमें माधुरी दीक्षित के हाथठेला चलाने वाले दारूबाज पिता की भूमिका में निळू फ़ुले साहब थे

लगभग प्रत्येक मराठी अभिनेता की तरह उनकी पहली पसन्द आज भी नाटक ही हैं, उनका कहना है कि “जो मजा नाटकों में काम करने में आता है, वह फ़िल्मों में कहाँ…हर अभिनेता को नाटक करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी होती है, क्योंकि आपके एक-एक संवाद पर तत्काल सामने से तारीफ़ या हूटिंग की सम्भावना होती है, और वहीं अच्छे अभिनेता की असली परीक्षा होती है…” निळू फ़ुले आज के आधुनिक मराठी नाटकों और युवा निर्देशकों से प्रभावित हैं, उनकी खुद के अभिनय की पसन्दीदा फ़िल्में हैं – सामना, सिंहासन, चोरीचा मामला, शापित, पुढ़चे पाऊल आदि, जबकि नाटकों में उन्हें “सूर्यास्त” और जाहिर है उनका पहला नाटक “कथा अकलेच्या कांड्याची” पसन्द हैं डॉ. श्रीराम लागू के साथ मराठी नाटकों में उनकी जोड़ी बेहतरीन जमती थी, जिनमें उल्लेखनीय हैं फ़िल्म “पिंजरा” और नाटक “सूर्यास्त”, जिसमें दर्शकों ने उन्हें बेहद पसन्द किया

यहाँ प्रस्तुत है एक फ़िल्म की छोटी सी क्लिप जिसमें पाठक उनके “खाँटी विलेन” के रूप के दर्शन कर पायेंगे… हिन्दी दर्शकों को शायद कुछ संवाद समझ में न आयें उनके लिये बताना उचित होगा कि प्रस्तुत दृश्य में निळू फ़ुले अपने पोते को छुड़वाने के लिये पुलिस थाने जाकर अपने खास अन्दाज में “पुलिस” को धमकाते हैं, कोई चिल्लाचोट नहीं, खामख्वाह के चेहरे बिगाड़ने का अभिनय नहीं, लेकिन अपनी विशिष्ट आवाज और खास संवाद अदायगी से वह पूरा सीन लूट ले जाते हैं… सीन है मराठी फ़िल्म “सात च्या आत घरात” का और इसमें उनके अभिनय के जलवे देखने लायक हैं…



आप सोच रहे होंगे कि इतने सशक्त अभिनेता और बेहद सादगीपसन्द इन्सान आजकल आखिर क्या कर रहे हैं? मराठी फ़िल्मों में चालीस वर्ष गुजारने और लगभग 140 मराठी और 12 हिन्दी फ़िल्मों में काम करने के बाद निळू फ़ुले आजकल समाजसेवा के साथ सेवानिवृत्ति का जीवन जी रहे हैं। “अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति” के साथ गाँव-गाँव का दौरा करके वे ग्रामीणों को अँधविश्वास से दूर करने, जादू-टोने, तंत्र-मंत्र, झाड़-फ़ूँक आदि के बारे में शिक्षित और जागरूक करने के प्रयास में लगे रहते हैं अपने सहयोग और प्रभाव से उन्होंने एक कोष एकत्रित किया है, जिसके द्वारा संघर्षरत युवा नाटक कलाकारों की आर्थिक मदद भी वे करते हैं मराठी लोकनृत्य “तमाशा” और “लावणी” को राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने, लोकप्रिय बनाने और उसे सरकार के स्तर पर हर तरह की मदद दिलवाने के लिये निळू फ़ुले हमेशा प्रयासरत रहते हैं बागवानी, पुस्तकें पढ़ना, अच्छी फ़िल्में देखना आदि शौक वे अब पूरे करते हैं अभिनय का यह तूफ़ानी चेहरा भले ही अब चकाचौंध से दूर हो गया हो, लेकिन उनकी स्टाईल का प्रभाव लोगों के दिलोदिमाग पर हमेशा रहेगा

उन्हें महाराष्ट्र सरकार की ओर से लगातार सन 1972, 1973 और 1974 में सर्वश्रेष्ठ कलाकार के रूप में सम्मानित किया गया था “साहित्य संगीत समिति” का राष्ट्रीय पुरस्कार भी राष्ट्रपति के हाथों ग्रहण कर चुके हैं और नाटक “सूर्यास्त” के लिये उन्हें “नाट्यदर्पण” का अवार्ड भी मिल चुका है ऐसे महान कलाकार, एक बेहद नम्र इन्सान, और समाजसेवी को मेरा सलाम…

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Congress, Madarsa, Tricolour and Bribe

सोचा था कि उप्र, गुजरात, हिमाचल में जूते खाने के बाद कांग्रेस को अक्ल आ गई होगी, लेकिन नहीं… बरसों की गन्दी आदतें जल्दी नहीं बदलतीं 31 दिसम्बर के “टाइम्स ऑफ़ इंडिया” और “रेडिफ़.कॉम” की इस खबर के अनुसार केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने फ़ैसला किया है कि 11वीं पंचवर्षीय योजना में अब से मदरसों में 15 अगस्त और 26 जनवरी को तिरंगा फ़हराने पर उन्हें विशेष अनुदान दिया जायेगा अब इस घृणित निर्णय के पीछे कांग्रेस की वही साठ साल पुरानी मानसिकता है या कुछ और कहना मुश्किल है, लेकिन इस निर्णय ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं…

(1) क्या तिरंगा फ़हराना धर्म आधारित है या देशभक्ति आधारित?
(2) क्या मदरसों में तिरंगा फ़हराने के लिये इस प्रकार की रिश्वत जायज है?
(3) 11 वीं पंचवर्षीय योजना से इस प्रकार का विशेष (?) अनुदान देना क्या ईमानदार आयकरदाताओं के साथ विश्वासघात नहीं है?
(4) क्या एक तरह से कांग्रेस यह स्वीकार नहीं कर चुकी, कि मदरसों में तिरंगा नहीं फ़हराया जाता? और वहाँ देशभक्त तैयार नहीं किये जा रहे? लेकिन इसके लिये दण्ड की बजाय पुरस्कार क्यों?
(5) क्या अब कांग्रेस इतनी गिर गई है कि देशभक्ति “खरीदने”(?) के लिये उसे “रिश्वत” का सहारा लेना पड़ रहा है?

इन सब प्रश्नों के मद्देनजर अब ज्यादा कुछ कहने को नहीं रह जाता, सिवाय इसके कि लगता है कांग्रेस को 2008 के विभिन्न विधानसभाओं और फ़िर आने वाले लोकसभा चुनाव में भी “सबक” सिखाना ही पड़ेगा…इस फ़ैसले के पहले भी “बबुआ” प्रधानमंत्री, बजट में अल्पसंख्यकों के लिये 15% आरक्षित करने का संकल्प ले चुके हैं, यानी उस 15% से जो सड़क बनेगी उस पर सिर्फ़ अल्पसंख्यक ही चलेगा, या उस 15% से जो बाँध बनेगा उससे बाकी लोगों को पानी नहीं मिलेगा… पता नहीं ऐसे फ़ैसलों से कांग्रेस क्या साबित करना चाहती है, लेकिन यह बात पक्की है कि ऐसे नेहरू (जो केरल के मन्दिर में धोती बाँधने के आग्रह पर आगबबूला होते थे, लेकिन अजमेर में खुशी-खुशी टोपी पहनते थे) या फ़िर वह नेहरू जिन्होंने आजादी के वक्त एकमात्र रियासत “कश्मीर” को समझाने(?) का काम हाथ में लिया था और सरदार पटेल को बाकी चार सौ रियासतें संभालने को कहा था… इतिहास गवाह है कि नेहरू से एक रियासत तक ठीक से “हैण्डल” नहीं हो सकी, या शायद जानबूझकर नहीं की… उन्हीं नेहरु की संताने देश को बाँटने के अपने खेल में सतत लगी हुई हैं… यदि जनता अब भी नहीं जागी तो पहले असम सहित उत्तर-पूर्व फ़िर कश्मीर और आधा पश्चिम बंगाल भारत से अलग होते देर नहीं लगेगी… दिक्कत यह है कि जनता और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को “सेक्स” और “सेंसेक्स” से ही फ़ुर्सत नहीं है…

(आम तौर पर मैं बड़े-बड़े ब्लॉग लिखता हूँ, लेकिन इस मामले में गुस्से की अधिकता के कारण और ज्यादा नहीं लिखा जा रहा, यदि आपको भी गुस्सा आ रहा हो तो इस खबर को आगे अपने मित्रों में फ़ैलायें)

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Bucknor Umpiring Sharad Pawar Indian Cricket

जिस किसी ने सिडनी का टेस्ट मैच देखा होगा, वह साफ़-साफ़ महसूस कर सकता है कि भारत की टीम को हराने के लिये ऑस्ट्रेलिया 13 खिलाड़ियों के साथ खेल रहा था दोनों अम्पायर जिनमें से स्टीव बकनर तो खासतौर पर “भारत विरोधी” रहे हैं, ने मिलकर भारत को हरा ही दिया पहली पारी में चार गलत निर्णय देकर पहले बकनर ने ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाजों को ज्यादा रन बनाने दिये, और आखिरी पारी में दो गलत निर्णय देकर भारत को ऑल-आऊट करवा दिया सबसे शर्मनाक तो वह क्षण था जब गांगुली के आऊट होने के बारे में बकनर ने पोंटिंग से पूछ कर निर्णय लिया वैसे ही बेईमानी के लिये कुख्यात ऑस्ट्रेलियाई कप्तान क्या सही बताते? ठीक यही बात हरभजन के नस्लभेदी टिप्पणी वाले मामले में है, साफ़ दिखाई दे रहा है कि यह आरोप “भज्जी” को दबाव में लाने और फ़िर भारतीय टीम को तोड़ने के लिये लगाया गया है खेल में ‘फ़िक्सिंग’ होती है, होती रहेगी, लेकिन खुद अम्पायर ही मैच फ़िक्स करें यह पहली बार हुआ है शंका तो पहले से ही थी (देखें सायमंड्स सम्बन्धी यह लेख) कि इस दौरे पर ऐसा कुछ होगा ही, लेकिन भारत से बदला लेने के लिये ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी इस स्तर तक गिर जायेंगे, सोचा नहीं था…

इस सबमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि “महान भारत की महान की परम्परा”(??) के अनुसार भारत के कंट्रोल बोर्ड ने अम्पायरिंग की कोई शिकायत नहीं करने का फ़ैसला किया है नपुंसकता की भी कोई हद होती है, और यह कोई पहली बार भी नहीं हो रहा है… याद कीजिये पाकिस्तान में हुए उस मैच को जिसमें संजय मांजरेकर को अम्पायरों ने लगभग अन्धेरे में खेलने के लिये मजबूर कर दिया था, लेकिन हमेशा ऐसे मौकों पर भारतीय बोर्ड “मेमना” बन जाता है जरा श्रीलंका के अर्जुन रणतुंगा से तो सीख लेते, कैसे उसने मुरली का साथ दिया, जब लगातार अम्पायर उसे चकर घोषित कर रहे थे और ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी उस पर नस्लभेदी टिप्पणी कर रहे थे रणतुंगा समूची टीम के साथ मैदान छोड़कर बाहर आ गये थे और फ़िर आईसीसी की हिम्मत नहीं हुई कि जिस मैच में श्रीलंका खेल रहा हो उसमें डेरेल हेयर को अम्पायर रखे

लेकिन कोई भी बड़ा और कठोर निर्णय लेने के लिये जो “रीढ़ की हड्डी” लगती है वह भारतीय नेताओं में कभी भी नहीं थी, ये लोग आज भी गोरों के गुलाम की तरह व्यवहार करते हैं… शर्म करो शरद पवार… यदि अब भी टीम का दौरा जारी रहता है तो लानत है तुम पर…तुम्हारे चयनकर्ताओं पर जो अब ऑस्ट्रेलिया घूमने जा रहे हैं… और दुनिया के सबसे धनी क्रिकेट बोर्ड के अरबों रुपये पर…

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Sharad Pawar, ICC, Cricket Australia

अम्पायरों की मिलीभगत से पहले तो भारत को सिडनी टेस्ट में हराया गया और फ़िर अब हरभजन को “नस्लभेदी”(??) टिप्पणियों के चलते तीन टेस्ट का प्रतिबन्ध लगा दिया गया है, यानी “जले पर नमक छिड़कना”…शरद पवार जी सुन रहे हैं, या हमेशा की तरह बीसीसीआई के नोटों की गड्डियाँ गिनने में लगे हुए हैं पवार साहब, ये वही बेईमान, धूर्त और गिरा हुआ पोंटिंग है जिसने आपको दक्षिण अफ़्रीका में मंच पर “बडी” कहकर बुलाया था, और मंच से धकिया दिया था विश्वास नहीं होता कि एक “मर्द मराठा” कैसे इस प्रकार के व्यवहार पर चुप बैठ सकता है हरभजन पर नस्लभेदी टिप्पणी का आरोप लगाकर उन्होंने पूरे भारत के सम्मान को ललकारा है, जो लोग खुद ही गाली-गलौज की परम्परा लिये विचरते रहते हैं, उन्होंने एक “प्लान” के तहत हरभजन को बाहर किया है, बदतमीज पोंटिंग को लगातार हरभजन ने आऊट किया इसलिये… आईसीसी का अध्यक्ष भी गोरा, हरभजन की सुनवाई करने वाला भी गोरा… शंका तो पहले से ही थी (देखें सायमंड्स सम्बन्धी यह लेख) कि इस दौरे पर ऐसा कुछ होगा ही, लेकिन भारत से बदला लेने के लिये ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी इस स्तर तक गिर जायेंगे, सोचा नहीं था…

अब तो बात देश के अपमान की आ गई है, यदि अब भी “बिना रीढ़” के बने रहे और गाँधीवादियों(??) के प्रवचन (यानी… “जो हुआ सो हुआ जाने दो…” “खेल भावना से खेलते रहो…” “हमें बल्ले से उनका जवाब देना होगा…” “भारत की महान संस्कृति की दुहाईयाँ…” आदि-आदि) सुनकर कहीं ढीले न पड़ जाना, वरना आगे भी उजड्ड ऑस्ट्रेलियाई हमें आँखें दिखाते रहेंगे सबसे बड़ी बात तो यह है कि जब हमारा बोर्ड आईसीसी में सबसे अधिक अनुदान देता है, वेस्टईंडीज और बांग्लादेश जैसे भिखारी बोर्डों की मदद करता रहता है, तो हम किसी की क्यों सुनें और क्यों किसी से दबें…? कहा जा रहा है कि अम्पायरों को हटाकर मामला रफ़ा-दफ़ा कर दिया जाये… जबकि भारत के करोड़ों लोगों की भावनाओं को देखते हुए हमारी निम्न माँगें हैं… जरा कमर सीधी करके आईसीसी के सामने रखिये…

(1) सिडनी टेस्ट को “ड्रॉ” घोषित किया जाये
(2) “ब” से बकनर, “ब” से बेंसन यानी “ब” से बेईमानी… को हमेशा के लिये “ब” से बैन किया जाये
(3) हरभजन पर लगे आरोपों को सिरे से खारिज किया जाये
(4) अन्तिम और सबसे महत्वपूर्ण यह कि टीम को तत्काल वापस बुलाया जाये…


ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? आईसीसी दौरा बीच में छोड़ने के लिये भारतीय बोर्ड पर जुर्माना कर देगा? क्या जुर्माना हम नहीं भर सकते, या जुर्माने की रकम खिलाड़ियों और देश के सम्मान से भी ज्यादा है? राष्ट्र के सम्मान के लिये बड़े कदम उठाने के मौके कभी-कभी ही मिलते हैं (जैसा कि कन्धार में मिला था और हमने गँवाया भी), आशंका इसलिये है कि पहले भी सोनिया गाँधी को विदेशी मूल का बताकर फ़िर भी आप उनके चरणों में पड़े हैं, कहीं ऐसी ही “पलटी” फ़िर न मार देना… अब देर न करिये साहब, टीम को वापस बुलाकर आप भी “हीरो” बन जायेंगे… अर्जुन रणतुंगा से कुछ तो सीखो… स्टीव वॉ ने अपने कॉलम में लिखा है कि “इस प्रकार का खेल तो ऑस्ट्रेलियाई संस्कृति है”, अब हमारी बारी है… हम भी दिखा दें कि भारत का युवा जाग रहा है, वह कुसंस्कारित गोरों से दबेगा नहीं, अरे जब हम अमेरिका के प्रतिबन्ध के आगे नहीं झुके तो आईसीसी क्या चीज है… तो पवार साहब बन रहे हैं न हीरो…? क्या कहा… मामला केन्द्र सरकार के पास भेज रहे हैं… फ़िर तो हो गया काम…


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BCCI, Sharad Pawar, Australia Cricket Board

एक बार फ़िर वही कहानी दोहराई गई, नेताओं ने हमेशा की तरह देश के आत्मसम्मान की जगह पैसे को तरजीह दी, कुर्सी को प्रमुखता दी| मैंने पिछले लेख में लिखा था कि “शरद पवार कम से कम अब तो मर्दानगी दिखाओ”…लेकिन नहीं समूचे देश के युवाओं ने जमकर विरोध प्रकट किया, मीडिया ने भी (अपने फ़ायदे के लिये ही सही) दिखावटी ही सही, देशभक्ति को दो दिन तक खूब भुनाया इतना सब होने के बावजूद नतीजा वही ढाक के तीन पात| शंका तो उसी समय हो गई थी जब NDTV ने कहा था कि “बीच का रास्ता निकालने की कोशिशें जारी हैं…”, तभी लगा था कि मामले को ठंडा करने के लिये और रफ़ा-दफ़ा करने के लिये परम्परागत भारतीय तरीका अपनाया जायेगा भारत की मूर्ख जनता के लिये यह तरीका एकदम कारगर है, मतलब एक समिति बना दो, जो अपनी रिपोर्ट देगी, फ़िर न्यायालय की दुहाई दो, फ़िर भी बात नहीं बने तो भारतीय संस्कृति और गांधीवाद की दुहाई दो… बस जनता का गुस्सा शान्त हो जायेगा, फ़िर ये लोग अपने “कारनामे” जारी रखने के लिये स्वतन्त्र !!!

आईसीसी के चुनाव होने ही वाले हैं, शरद पवार की निगाह उस कुर्सी पर लगी हुई है, दौरा रद्द करने से पवार के सम्बन्ध अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर खराब हो जाते, क्योंकि जो लोग हमसे भीख लेते हैं (वेस्टइंडीज, बांग्लादेश आदि) उनका भी भरोसा नहीं था कि वे इस कदम का समर्थन करते, क्योंकि इन देशों के मानस पर भी तो अंग्रेजों की गुलामी हावी है, इसलिये टीम को वहीं अपमानजनक स्थिति में सिडनी में होटल में रुकने को कह दिया गया, ताकि “सौदेबाजी” का समय मिल जाये| दौरा रद्द करने की स्थिति में लगभग आठ करोड़ रुपये का हर्जाना ऑस्ट्रेलिया बोर्ड को देना पड़ता जो बोर्ड अपने चयनकर्ताओं के फ़ालतू दौरों और विभिन्न क्षेत्रीय बोर्डों में जमें चमचेनुमा नेताओं (जिन्हें क्रिकेट बैट कैसे पकड़ते हैं यह तक नहीं पता) के फ़ाइव स्टार होटलों मे रुकने पर करोड़ों रुपये खर्च कर सकता है, वह राष्ट्र के सम्मान के लिये आठ करोड़ रुपये देने में आगे-पीछे होता रहा फ़िर अगला डर था टीम के प्रायोजकों का, उन्हें जो नुकसान (?) होता उसकी भरपाई भी पवार, शुक्ला, बिन्द्रा एन्ड कम्पनी को अपनी जेब से करनी पड़ती? इन नेताओं को क्या मालूम कि वहाँ मैदान पर कितना पसीना बहाना पड़ता है, कैसी-कैसी गालियाँ सुननी पड़ती हैं, शरीर पर गेंदें झेलकर निशान पड़ जाते हैं, इन्हें तो अपने पिछवाड़े में गद्दीदार कुर्सी से मतलब होता है तारीफ़ करनी होगी अनिल कुम्बले की… जैसे तनावपूर्ण माहौल में उसने जैसा सन्तुलित बयान दिया उसने साबित कर दिया कि वे एक सफ़ल कूटनीतिज्ञ भी हैं|

इतना हो-हल्ला मचने के बावजूद बकनर को अभी सिर्फ़ अगले दो टेस्टों से हटाया गया है, हमेशा के लिये रिटायर नहीं किया गया है हरभजन पर जो घृणित आरोप लगे हैं, वे भी आज दिनांक तक नहीं हटे नहीं हैं| आईसीसी का एक और चमचा रंजन मदुगले (जो जाने कितने वर्षों से मैच रेफ़री बना हुआ है) अब बीच-बचाव मतलब मांडवाली (माफ़ करें यह एक मुम्बईया शब्द है) करने पहुँचाया गया है मतलब साफ़ है, बदतमीज और बेईमान पोंटिंग, क्लार्क, सायमंड्स, और घमंडी हेडन और ब्रेड हॉग बेदाग साफ़…(फ़िर से अगले मैच में गाली-गलौज करने को स्वतन्त्र), इन्हीं में से कुछ खिलाड़ी कुछ सालों बाद आईपीएल या आईसीएल में खेलकर हमारी जेबों से ही लाखों रुपये ले उड़ेंगे और हमारे क्रिकेट अधिकारी “क्रिकेट के महान खेल…”, “महान भारतीय संस्कृति” आदि की सनातन दुहाई देती रहेंगे|

सच कहा जाये तो इसीलिये इंजमाम-उल-हक और अर्जुन रणतुंगा को सलाम करने को जी चाहता है, जैसे ही उनके देश का अपमान होने की नौबत आई, उन्होंने मैदान छोड़ने में एक पल की देर नहीं की…| अब देखना है कि भारतीय खिलाड़ी “बगावत” करते हैं या “मैच फ़ीस” की लालच में आगे खेलते रहते हैं… इंतजार इस बात का है कि हरभजन के मामले में आईसीसी कौन सा “कूटनीतिक” पैंतरा बदलती है और यदि उसे दोषी करार दिया जाता है, तो खिलाड़ी और बीसीसीआई क्या करेंगे? इतिहास में तो सिडनी में हार दर्ज हो गई…कम से कम अब तो नया इतिहास लिखो…

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English Medium Convent, Parents Children

मेरे शहर में कई स्कूल हैं (जैसे हर शहर में होते हैं), कई स्कूलों में से एक-दो कथित प्रतिष्ठित स्कूल(?) भी हैं (जैसे कि हर शहर में होते हैं), और उन एक-दो स्कूलों के नाम में “सेंट” या “पब्लिक” है (यह भी हर शहर में होता है)। जिस स्कूल के नाम में “सेंट” जुड़ा होता है, वह तत्काल प्रतिष्ठित होने की ओर अग्रसर हो जाता है। इसका सबसे पहला कारण तो यह है कि “सेंट” नामधारी स्कूलों में आने वाले माता-पिता भी “सेंट” लगाये होते हैं, दूसरा कारण है “सन्त” को “सेंट” बोलने पर साम्प्रदायिकता की उबकाई की बजाय धर्मनिरपेक्षता की डकार आती है, और भरे पेट वालों को भला-भला लगता है। रही बात “पब्लिक” नामधारी स्कूलों की…तो ऐसे स्कूल वही होते हैं, जहाँ आम पब्लिक घुसना तो दूर उस तरफ़ देखने में भी संकोच करती है।

ऐसे ही एक “सेंट”धारी स्कूल में कल एडमिशन फ़ॉर्म मिलने की तारीख थी, और जैसा कि “हर शहर में होता है” यहाँ भी रात 12 बजे से पालक अपने नौनिहाल का भविष्य सुधारने(?) के लिये लाइन में लग गये थे। खिड़की खुलने का समय था सुबह नौ बजे, कई “विशिष्ट” (वैसे तो लगभग सभी विशिष्ट ही थे) लोगों ने अपने-अपने नौकरों को लाईन में लगा रखा था। खिड़की खुलने पर एक भदेस दिखने वाले लेकिन अंग्रेजी बोलने वाले बाबू के दर्शन लोगों को हुए, जो लगभग झिड़कने के अन्दाज में उन “खास” लोगों से बात कर रहा था, “जन्म प्रमाणपत्र की फ़ोटोकॉपी लेकर आओ, फ़िर देखेंगे”, “यह बच्चे का ब्लैक-व्हाईट फ़ोटो नहीं चलेगा, कलर वाला लगाकर लाओ”, “फ़ॉर्म काले स्केच पेन से ही भरना”… आदि-आदि निर्देश (बल्कि आदेश कहना उचित होगा) वह लगे हाथों देता जा रहा था।

मुझ जैसे आम आदमी को जो यत्र-तत्र और रोज-ब-रोज धक्के खाता रहता है, यह देखकर बड़ा सुकून सा महसूस हुआ कि “चलो कोई तो है, जो इन रईसों को भी धक्के खिला सकता है, झिड़क सकता है, हड़का सकता है, लाईन में लगने पर मजबूर कर सकता है…”। स्कूल के बाहर खड़ी चमचमाती कारों को देखकर यह अहसास हो रहा था कि “सेंट” वाले स्कूल कितने “ताकतवर” हैं, जहाँ एडमिशन के लिये स्कूली शिक्षा मंत्री की सिफ़ारिश भी पूरी तरह काम नहीं कर रही थी। एक फ़ॉर्म की कीमत थी मात्र 200 रुपये, स्कूल वालों को कुल बच्चे लेने थे 100, लेकिन फ़ॉर्म बिके लगभग 1000, यानी दो लाख रुपये की “सूखी कमाई”, फ़िर इसके बाद दौर शुरु होगा “इंटरव्यू” का, जिसके लिये अभी से माता-पिता की नींदें उड़ चुकी हैं, यदि इंटरव्यू में पास हो गया (मतलब बगैर रसीद के भारी डोनेशन को लेकर सौदा पट जाये) तो फ़िर आजीवन स्कूल वालों की गालियाँ भी खाना है, क्योंकि यह मूर्खतापूर्ण मान्यता विकसित की गई है कि इन स्कूलों से "शासक" निकलते हैं, बाकी स्कूलों से "कामगार", जबकि यही वह स्कूल है, जहाँ हिन्दी में बातें करने पर दण्ड लगता है, बिन्दी लगा कर आने पर लड़कियों को सजा दी जाती है, और मेहंदी लगाकर आने पर कहर ही बरपा हो जाता है। लेकिन बच्चे के उज्जवल भविष्य(?) के लिये यह सब तो सहना ही होगा…

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Road Art Pictures Drawings Artist

सड़क पर बनाये जाने वाले चित्रों की श्रृंखला…यहाँ प्रस्तुत चित्र जूलियन बीवर नामक अंग्रेज चित्रकार ने बनाये हुए हैं, इन चित्रों की खासियत इनका 3-D दिखना है… सिर्फ़ रंगीन पेंसिलों, चॉक, वाटर कलर और पेस्ट कलर से ये चित्र बनाये हैं। यह कलाकार सड़कों पर, फ़ुटपाथ की टाइल्स पर चित्र बनाता है। जूलियन साहब फ़्रांस, जर्मनी, स्विटजरलैंड आदि यूरोपीय देशों में अपने कला-कौशल के हाथ दिखा चुके हैं… आप खुद देखिये कि यह चित्र कितने उम्दा हैं और कितना असाधारण कलाकार है, और क्या गजब की उसकी दृष्टि है…

पहले चित्र में आपको कोकाकोला की बोतल की छाया तक दिखाई देगी…


इस चित्र में बहता हुआ पानी बिलकुल असली लगता है, आपको आश्चर्य होगा कि जो पानी का पाईप दिखाया गया है वह भी चित्र ही है…


रास्ते के बीच में छोटी सी झील और उसमें तैरती नाव (साथ में नाव की परछाँई भी)…


बीच सड़क पर एक गढ़ढा और उसमें बसा एक छोटा शहर…


फ़ुटपाथ के नीचे की बिलकुल असली लगने वाली पाईप लाइन, और एक फ़व्वारा भी…


सड़क की हटी हुई टाइल्स का हूबहू चित्र (यहाँ तक कि गुजरने वाले लोग भी समझते हैं कि शायद इस जगह सड़क नहीं है), है ना कमाल की चीज…


स्वयं चित्रकार ने अपने कलर बॉक्स का चित्र बनाया है…


एक असली और एक नकली (बीयर का कौन सा गिलास असली है?)


सड़क के बीच सोने की खान…


ये रहा स्वीमिंग पूल और उसमें एक हसीना…


और यह रहा इन चित्रों के 3-D होने का राज… यह चित्र स्वीमिंग पूल वाली हसीना का ही है, दूसरी तरफ़ से…


जैसे कि यह रहा पृथ्वी से "गरीबी हटाओ" के नारे के साथ कलाकार…


और वही चित्र साईड एंगल से (लगभग चालीस फ़ुट लम्बा) है ना असाधारण कलाकार?


और अन्त में "बच्चे को खाने जा रहा केकड़ा"… चित्र में सड़क की टाईल्स स्पष्ट दिखाई दे रही हैं…


ऐसे उम्दा कलाकार की कलाकारी को मेरा सलाम…


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Indian Nationalism, Brad Hogg and Bastard

जैसा कि हमेशा होता आया है, नेता संकट खड़े करते है, देश का अपमान करवाते हैं, लेकिन जनता अपने संघर्षों से देश को सही राह पर लाने और उसका गौरव वापस पाने की जद्दोजहद में जुटी रहती है, ठीक उसी प्रकार पर्थ में भारतीय टीम ने सब कुछ भुलाकर जोरदार संघर्ष किया और ऑस्ट्रेलिया को नाकों चने चबवा कर जीत हासिल की। तारीफ़ करना होगी अनिल कुंबले के नेतृत्व की और युवाओं के जोश की जिसने यह अभूतपूर्व कामयाबी हासिल की। पता नहीं हमारे नेता इस नई सदी के जोश और आत्मविश्वास से भरे भारतीय युवा की ताकत को क्यों नहीं पहचानते और जब-तब देश को नीचा दिखाने में लगे रहते हैं।

“बास्टर्ड” शब्द का अर्थ शब्दकोष के अनुसार “अवैध संतान” या “हरामी” होता है। सिडनी टेस्ट के बाद में जो “तात्कालिक” राष्ट्रवाद बासी कढ़ी की तरह पैदा हुआ था, उसका झाग अब बैठ गया है, और हम वापस अपने “गाँधीवाद” और “पूंजीवाद” की ओर लौट आये हैं। ऐसा हमेशा ही होता है, हमारा “राष्ट्रवाद” क्षणिक होता है, या तो मीडिया द्वारा पैदा किया गया नकली राष्ट्रवाद (जैसा कि ताजमहल वोटिंग के मामले में हुआ था) या फ़िर कारगिल युद्ध के समय चन्दा माँगने जैसा… पाठक सोच रहे होंगे कि इस बात का “बास्टर्ड” शब्द से क्या लेना-देना? दरअसल सिडनी टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी ब्रेड हॉग ने गांगुली, कुम्बले और धोनी को “बास्टर्ड्स” कहा था, और हरभजन ने तथाकथित रूप से सायमंड्स को “मंकी” कहा था। दोनों टीमों ने इस मामले में एक दूसरे की शिकायत की थी। हरभजन का मामला आईसीसी की धाराओं के मुताबिक 3.3 स्तर का और हॉग के अपशब्द 3.0 स्तर के माने गये। नियमों के अनुसार दोनों खिलाड़ियों को सजा के तौर पर कम से कम तीन टेस्ट से बाहर किया जा सकता है। ऐसे में विश्व के सबसे धनी क्रिकेट बोर्ड के रीढ़विहीन रवैये और शर्मनाक समर्पण के कारण आज की स्थिति यह है कि कुंबले ने अज्ञात(??) दबाव के कारण ब्रेड हॉग पर लगाये गये आरोपों को न सिर्फ़ वापस ले लिया बल्कि उन्हें “माफ़”(?) भी कर दिया है, बेईमान और अक्खड़ रिकी पोंटिंग ने सिर्फ़ शाब्दिक तौर पर कहा कि “उनसे सिडनी में एक-दो गलतियाँ हुई हैं…”, गिलक्रिस्ट ने भी खुलेआम कहा कि “ऐसा खेल” तो हमारी संस्कृति है और हम इसे जारी रखेंगे, अम्पायरों को भी मीडिया के दबाव के कारण सिर्फ़ आगामी दो मैचों से हटाया गया, लेकिन सबसे मुख्य बात यानी हरभजन पर नस्लभेदी टिप्पणी वाले मामले में ऑस्ट्रेलिया ने अपने आरोप वापस नहीं लिये, यानी हरभजन मामले की सुनवाई होगी और हो सकता है कि उन्हें कुछ सजा भी हो जाये।
“एक गाल पर थप्पड़ खाकर दूसरा गाल आगे करने…” की जो गाँधीवादी घुट्टी हमारे खून में रच-बस गई है, उसने कई मौकों पर देश के स्वाभिमान के साथ खिलवाड़ किया है। नेताओं को देश की “ताकत” का अन्दाजा तो है, लेकिन उस ताकत का उपयोग वे अपने निजी स्वार्थ पूरे करने में लगाते हैं, देश के स्वाभिमान की बजाय।
आजादी के समय पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने हों, 1962 में चीन से पीठ में छुरा खाना हो, एहसानफ़रामोश बांग्लादेश का जब-तब आँखें दिखाना हो या कंधार-कारगिल में मुशर्रफ़ का षडयंत्र हो…… “एक गाल पर थप्पड़ खाकर दूसरा गाल आगे करने…” की जो गाँधीवादी घुट्टी हमारे खून में रच-बस गई है, उसने कई मौकों पर देश के स्वाभिमान के साथ खिलवाड़ किया है। लेकिन इक्कीसवीं सदी में भी हमारे नेता यह बात समझने को तैयार नहीं हैं कि देश की पचास प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या “युवा” है, जो अपने हुनर और शिक्षा के बल पर समूचे विश्व में डंका बजा रहे हैं, जबकि “कब्र में पैर लटकाये” हुए चन्द नेता अपने स्वार्थ की खातिर देश को नीचा दिखाने में लगे हुए हैं। अब वे 1974 के दिन नहीं रहे जब इंग्लैंड दौरे पर एक क्रिकेटर सुधीर नाईक पर एक जोड़ी मोजे चुराने का आरोप लगाया गया था, और हमारे “अंग्रेजों के मानसिक गुलाम” क्रिकेट बोर्ड ने आरोप को मान भी लिया और उस बेचारे को देश लौटने का आदेश दे दिया था… अब 2007 का समय है लेकिन नेता आज भी नहीं बदले। इन्हें देश की “ताकत” का अन्दाजा तो है, लेकिन उस ताकत का उपयोग वे अपने निजी स्वार्थ पूरे करने में लगाते हैं, देश के स्वाभिमान की बजाय।

सिडनी के इस मामले में कई घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय पेंच भी जुड़ गये थे। बीसीसीआई की सनातन राजनीति में गहरे धँसे डालमिया ने तत्काल पवार पर मामले को ढील देने का आरोप जड़ दिया, दूसरी तरफ़ लालू हुँकार भरते रहे कि “यदि मैं बीसीसीआई अध्यक्ष होता तो अब तक टीम वापस बुला लेता…” (क्योंकि उन्हें अगला अध्यक्ष बनना है और अपने बेटे को भारत की टीम में लाना है)। अब पवार अपने विरोधियों की बात कैसे मानते, भले ही मुद्दा राष्ट्रप्रेम से जुड़ा हो। उन्होंने नया “गणित” लगाया और भारत सरकार पर दबाव बनाया कि यदि इस मुद्दे को ज्यादा तूल दिया गया तो दोनों देशों के आपसी सम्बन्ध बिगड़ सकते हैं जिससे कि हमें ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम मिलने में दिक्कत होगी। बात में “वजन” था, विदेश सचिव स्तर का प्रतिनिधिमंडल ऑस्ट्रेलिया में यूरेनियम की भीख माँगने पहुँचा हुआ ही था। बस फ़िर क्या था… कुंबले को बुलाकर दबाव बनाया गया कि ब्रेड हॉग के खिलाफ़ मामला वापस ले लो, बात को यहीं रफ़ा-दफ़ा करो (दूसरे अर्थों में, मान लो कि हम “बास्टर्ड” हैं)। जबकि असल में पवार साहब को अपनी आईसीसी की कुर्सी खतरे में दिखाई दे रही थी। ये और बात है कि इतना सब करने के बावजूद ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने यूरेनियम के नाम पर हमें “ठेंगा” दिखा ही दिया है। रही बात बकनर के कारण वेस्टईंडीज के नाराज होने की, तो भविष्य में उसे एक “बड़ा टुकड़ा” देकर राजी कर लिया जायेगा। अब निश्चित ही अन्दर ही अन्दर हरभजन पर दबाव बनाया जा रहा होगा कि मामले की सुनवाई हो जाने दो, मैच रेफ़री (मांडवाली करने गये बिचौलिये) रंजन मदुगले को “सेट” कर लिया जायेगा कि तीन की बजाय सिर्फ़ एक टेस्ट का ही प्रतिबन्ध लगाया जायेगा, जिसे हरभजन सिंह और हमारी क्रिकेट टीम सहर्ष स्वीकार कर लेगी, नेता लोग कुछ “गाँधीवादी” बयान (“बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि ले” या फ़िर “खेल भावना के सम्मान” टाईप का) देंगे। भारतीय जनता (और मीडिया भी) जिसकी याददाश्त बहुत कमजोर होती है, इसे वक्त के साथ भुला देंगे, और फ़िर से हमारे खिलाड़ी ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और दक्षिण अफ़्रीका में गालियाँ खाने को तैयार… (सम्बन्धित लेख “शरद पवार जी अब तो मर्दानगी दिखाओ…)

इस सारे मामले में “पैसे” ने भी अपना खासा रोल निभाया है, दौरा निरस्त कर टीम के वापस लौटने की सूरत में भारत पर आठ करोड़ (क्या यह BCCI के लिये बड़ी रकम है?) का जुर्माना हो जाता, आगामी वन-डे ट्राई-सीरिज पर भी खतरा मंडराने लगता, जिससे प्रति खिलाड़ी कम से कम पाँच करोड़ तथा बोर्ड को कम से कम 400 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ सकता था… ऐसे में आसान रास्ता यही था कि राष्ट्रवाद को भाड़ में झोंको, “बास्टर्ड” सुनकर भी मुस्करा दो, यहाँ तक कि अपने आपको “नस्लभेदी” भी मान लो… खैर, ऑस्ट्रेलिया की घटना के कारण भारत में हुए मीडिया प्रायोजित “देशभक्ति” नाटक का फ़िलहाल अन्त हो गया लगता है। जैसा कि भारत में हरेक मुद्दे का अन्त होता है मतलब शर्मनाक, खुद को महाशक्ति कहने वाले देश के पिलपिले साबित होने जैसा, ठीक वैसा ही अंत (फ़िलहाल) इस मामले का हुआ है। साथ ही कुछ बातें भी साफ़ हो गई हैं… जैसे –

(1) किसी भारतीय को “बास्टर्ड” (हरामी) कहा जा सकता है, लेकिन अंग्रेज को “मंकी” (बन्दर) नहीं कहा जा सकता…
(2) आठ करोड़ का जुर्माना ज्यादा बड़ा है देश की टीम के स्वाभिमान से…
(3) यूरेनियम की भीख माँगना ज्यादा जरूरी है, राष्ट्र के सम्मान की रक्षा की बजाय…
(4) भले ही हम “नस्लवादी” साबित कर दिये जायें, लेकिन “माफ़” करने की महान गाँधीवादी परम्परा नहीं टूटनी चाहिये…


लेकिन भारतीय युवाओं ने साबित कर दिया है कि जैसे हम “मुँहजोर” हो गये हैं वैसे ही मैदान में भी दमखम दिखा सकते हैं, बशर्ते कि देश और बीसीसीआई का नेतृत्व उनका खुलकर साथ दे, और गाली के बदले गाली, गोली के बदले गोली (प्रतिभा ताई सुन रही हैं ना… अफ़जल वाली फ़ाईल अभी भी आपकी टेबल पर पड़ी है) वाली नीति अपनाये…

और अब अन्त में एक गुप्त बात… असल में हरभजन ने सायमंड्स को “माँ की……” कहा था, लेकिन दर्शकों के शोर में सायमंड्स ने उसे “मंकी……” सुन लिया, इसलिये आईसीसी से अनुरोध है कि इसे भाषा सम्बन्धी समस्या माना जाये, न कि नस्लभेदी प्रकरण…

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