Super User

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I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

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गुरुवार, 26 अप्रैल 2007 13:41

Why Media is So Negative in India?

मीडिया सकारात्मक कब बनेगा ? 

गत वर्ष एक समाचार पढा था कि हमारे राष्ट्रपति डॉ.अब्दुल कलाम ने हर वर्ष आयोजित होने वाली इफ़्तार पार्टी को रद्द कर दिया है, एवं उस पार्टी के खर्च को एक अनाथालय को दान करने की घोषणा की है, लगभग उन्हीं दिनों में रामविलास पासवान द्वारा आयोजित इफ़्तार पार्टी में उन्हें लालू प्रसाद यादव को जलेबी खिलाते हुए एवं दाँत निपोरते हुए चित्र समाचार पत्रों मे नजर आये थे । उक्त दोनों समाचारों पर मीडिया की भूमिका ने जरूर कई सवाल खडे किये । भारतपुत्र अब्दुल कलाम के सकारात्मक और उत्कृष्ट कदम को लगभग सभी अखबारों में नगण्य सा स्थान मिला (समाचार पत्र के कोने में या पिछले पृष्ट पर), जबकि ऐसे लोग जिनका "इफ़्तार" और "रोजे" से कोई लेना-देना नहीं है, उनके समाचार एवं चित्र इलेक्ट्रानिक एवं प्रिण्ट मीडिया की सुर्खियाँ बने रहे । ऐसा क्यों ?

इन घटनाक्रमों की रिपोर्टिंग की नकारात्मक भूमिका को लेकर बुद्धिजीवियों एवं सामाजिक संगठनों को सवाल उठाने चाहिये । एक अच्छे और महान कार्य अथवा पहल को उतना "कवरेज" क्यों नहीं मिलता, जबकि गुण्डे-बदमाशों एवं घटिया नेताओं को लगभग पूरे पेज का कवरेज मिलता है । जरा कल्पना करें कि राष्ट्रपति के इस कदम को यदि समाचार पत्रों में "हेडलाईन" के रूप में छापा जाता, तो उस समाचार का कितना और कैसा "असर" होता, न सिर्फ़ मुस्लिमों में, बल्कि पूरे देश में । राष्ट्रपति के इस क्रांतिकारी कदम को व्यापक प्रचार मिलना चाहिये था, जो कि नहीं मिला, उलटे इस बात पर खामख्वाह की चर्चा की गई और समय बर्बाद किया गया कि, इस नेता की इफ़्तार पार्टी में कौन-कौन आया, कौन नहीं आया, उस नेता की इफ़्तार पार्टी में किसे नहीं बुलाया गया था, किसने क्या खाया, किसने-किससे कितनी देर तक बात की आदि-आदि बकवास । जबकि दूसरी ओर सच तो यही है कि आज भी औसत रूप से मुस्लिम समाज बेहद गरीब और अशिक्षित है, क्या उसे वाकई कोई फ़र्क पडता है कि किस नेता ने इफ़्तार पार्टी दी या नहीं दी ? रोजा रखना और इफ़्तार करना एक धार्मिक क्रिया है, उस माहौल में यदि अब्दुल कलाम के सकारात्मक कदम को मुख्य पृष्ठ पर जगह मिलती तो उसका भरपूर असर होता । यह तो मात्र एक उदाहरण है, आज तो हमें मीडिया परिदृश्य में इस प्रकार की प्रवृत्ति सहज ही देखने को मिल जाती है ।

किसी भी नकारात्मक समाचार को बढा-चढा कर पेश करना, फ़िर उस समाचार को लगातार "फ़ॉलोअप" करना (तभी तक कि जब तक कोई नया "चटपटा" समाचार ना मिल जाये), फ़िर उसे भूल जाना और किसी नई तथाकथित "एक्सक्लूसिव" की तलाश में लग जाना, यह आजकल के पत्रकारों (?) का शगल बन गया है । क्या हम तेजी से ब्रिटेन की "टेब्लॉयड" संस्कृति की ओर बढ रहे हैं, जहाँ प्रसिद्ध लोगों (?) (अच्छे और आदर्श लोगों नहीं) के व्यक्तिगत सम्बन्धों, शादी, तलाक, बलात्कार आदि के बारे में छ्पाई होती रहती है । "शिवानी हत्याकांड", "मधुमिता हत्याकांड", "जेसिका लाल हत्याकांड" और सबसे बढ कर ऐश-अभिषेक की शादी का जैसा और जितना कवरेज हुआ उतना तो भारत के प्रथम अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा को भी नहीं मिला । परन्तु क्या इन समाचारों के सामाजिक प्रभाव के बारे में भी मीडिया को नहीं सोचना चाहिये ? इन समाचारों को लगातार देखने-सुनने-पढने से हमारी युवा पीढी और बच्चों पर क्या असर हो रहा है, इसकी जिम्मेदारी किसकी है ? जबकि मीडिया यदि अपनी "असली शक्ति" का उपयोग करे तो वह क्या नहीं कर सकता । यहाँ पर उल्लेखनीय है कि शीतयुद्ध के जमाने में रूस और अमेरिका के अखबार अपने-अपने देशों को आगे बताने के लिये प्रचार-दुष्प्रचार का सहारा लिया करते थे, दोनो ही देशों के समाचार पत्रों एवं मीडिया में देशभक्ति की होड लगी रहती थी, उद्देश्य था देशवासियों का मनोबल बढाना एवं बनाये रखना ।

एक घटना का उल्लेख करना आवश्यक है - किसी तीसरे देश में हुई एक दौड प्रतियोगिता में अमरीकी धावक पहले स्थान पर एवं रूसी धावक मात्र कुछ सेकण्डों से दूसरे स्थान पर रहा । अब एक ही समाचार को किस तरह छापा गया - अमरीकी अखबार ने लिखा "हमारे महान धावक ने रूसियों के गर्व को चूर-चूर करते हुए भारी अन्तर से दौड जीती", वही रूसी अखबार ने लिखा - "रूस की महान खेल परम्परा को आगे बढाते हुए हमारे धावक ने जोरदार प्रदर्शन करते हुए प्रतियोगिता में दूसरा स्थान प्राप्त किया" (इस समाचार में प्रथम आये अमरीकी का कोई उल्लेख नही था) । तात्पर्य यह कि मीडिया की सुर्खियाँ हमेशा सकारात्मक समाचारों से परिपूर्ण होना चाहिये, न कि भ्रष्टाचार, अनैतिकता, हिंसा, दंगो से । जरा पाठकगण याद करें कि उन्होंने कितनी बार अण्णा हजारे, अब्दुल कलाम (राष्ट्रपति बनने से पहले), डॉ. पद्मनाभन, बचेन्द्री पाल, धनराज पिल्लै, राजेन्द्र सिंह (पानी वाले बाबा के नाम से मशहूर), नारायण मूर्ति, किरण बेदी आदि जैसी हस्तियों को कितनी बार मुखपृष्ठ पर बडे-बडे अक्षरों के साथ देखा है ? नहीं देखा, क्योंकि अच्छे-अच्छे कारनामों को हमारा मीडिया (प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनो) अन्दर के पृष्ठों पर जगह देता है, वह भी कंजूसी से । जबकि घोटालों, स्कैण्डलों, बम विस्फ़ोटों, दंगों, दो कौडी के सलेम टाईप के गुण्डों को हमेशा मुखपृष्ठ पर जगह मिलती है । हाल ही मेरे एक मित्र ने जो कि इसराइल से लौटकर आया, वहाँ के समाचार पत्रों के बारे में बताया कि वहाँ लगभग सभी अखबार या चैनल कोई ना कोई सकारात्मक समाचार छापते-दिखाते रहते हैं, जिससे जनता में एक धनात्मक सन्देश जाता है । इसराईल में बस में हुए एक विस्फ़ोट के समय यह समाचार दूसरे पृष्ठ पर था, जबकि उसी दिन एक किसान ने अपने खेत में नई तकनीक का इस्तेमाल कर सिंचाई की नई पद्धति विकसित की, यह समाचार मुख्यपृष्ठ पर था, तस्वीर सहित । जबकि बम विस्फ़ोट की दूसरे पृष्ठ पर भी कोई तस्वीर नहीं छापी गई । ठीक यही अमेरिका में ग्यारह सितम्बर के हमले के बाद हुआ, लाशों की, बिलखते लोगों, रोती महिलाओं की या अस्पतालों में घायलों की तस्वीरें वहाँ मीडिया ने स्वेच्छा से नहीं दिखाई, जबकि आग बुझाने वाले और घायलों का बचाव करने वाले दमकलकर्मियों और युवाओं को जब पुरस्कार बाँटे गये, तो सभी समाचार पत्रों ने उसे मुख्यपृष्ठ पर स्थान दिया, यही तो है सकारात्मक पत्रकारिता । इससे आम जनता, जो अपनी परेशानियों में पहले से ही त्रस्त है, का मनोबल बढता है, अच्छे और ऊर्जावान लोगों के समाचार पढने से मन में भी उसी प्रकार के विचार उत्पन्न होते हैं ।

भारत से तुलना करें तो हमारा मीडिया, मुशर्रफ़ की "बॉडी लैंग्वेज" पढने में ही उलझा रहता है, और वे सबको गरिया कर चले गये.... ऐश-अभिषेक की शादी में कुत्ते की तरह गेट के बाहर खडे रहे, डंडे खाये फ़िर भी शर्म नहीं आई... मीडिया का एक ही काम रह गया है, पहले विवाद पैदा करना, फ़िर उसे खूब सेंकना / चबाना, आपस में भिडाना, फ़िर नया शिगूफ़ा छोडकर नई खबर में लग जाना, पुराने घोटाले का क्या हुआ इस बारे में सोचना उसका काम नहीं (तेलगी, निठारी... आदि) । असली दिक्कत यह है कि कुछ बडे समाचार घराने अपने-आप को "किंगमेकर" समझने लगे हैं, और साबुन बेचना और अखबार चलाने को एक जैसा ही काम मानते हैं । सभी प्रतिष्ठित समाचार पत्रों, चैनलों, पत्रकरों, "मीडिया-मुगलों" को इस दिशा में विचार करना चाहिये, कि क्या देश में किसी नई प्रेस आचार संहिता की आवश्यकता है ? या बाजारवाद की अंधी दौड में मीडिया भी शामिल रहेगा, जिसका मुख्य काम है जनजागरण और समाज को नई दिशा देना, न कि समाचार "बेचना" (!) । ऊपर जिन हस्तियों के नाम लिखे हैं उनमें से कई के नाम तो आज के युवाओं ने सुना भी नहीं होगा, उनके काम के बारे में जानना तो बहुत बडी बात है, लेकिन उसी युवा को यह जरूर पता होगा कि शाहरुख खान का पीठ दर्द अब कैसा है, या सलमान खान कब और किससे शादी करेगा, या नहीं भी करेगा । अब यदि हमारे बच्चे छोटा राजन, अबू सलेम और वीरप्पन को ज्यादा जानते-पहचानते है बजाय वर्गीज कुरियन के तो इसमें किसका दोष है ?
शुक्रवार, 27 अप्रैल 2007 16:53

Gulzar - Dil Dhoondhta hai (Mausam)

गुलजा़र : दिल ढूँढता है....

हिन्दी फ़िल्मों के गीतों और गीतकारों के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है और आगे भी लिखा जाता रहेगा । गुलजा़र एक ऐसे गीतकार हैं जिनके बारे में जितना भी लिखा जाये कम है । फ़िल्म "मौसम" में लिखा हुआ उनका गीत "दिल ढूँढता है फ़िर वही फ़ुर्सत के रात दिन..." जितनी बार भी सुना, हमेशा मुझे एक नई दुनिया में ले गया है... यह गीत सुनकर लगता है कि फ़ुर्सत के पलों को यदि किसी ने मजे और शिद्दत से जिया है तो वे गुलजा़र ही हैं.... क्या गजब के बोल हैं और उतनी ही गजब की मदनमोहन साहब की धुन....। जब यूनुस खान साहब का रेडियोवाणी ब्लोग पढा, तो सोचा कि इस गीत के बारे में कुछ ना कुछ लिखना चाहिये...इस गीत की एक और खासियत भूपेन्द्र जी की आवाज है... तलत महमूद के बाद मुझे सबसे अधिक मखमली आवाज यही लगती है, आश्चर्य होता है कि कोई इतने मुलायम स्वरों में कैसे गा सकता है.... कहने का मतलब यही है कि गुलजार साहब की उम्दा शायरी, मदनमोहन का कर्णप्रिय संगीत, भूपेन्द्र की वादियों में गूँजती सी आवाज, परदे पर संजीवकुमार की गरिमामय उपस्थिति, सब के सब मिलकर इस गीत को बेहतरीन से बेहतरीन बनाते हैं...इस गीत में अखरने वाली बात सिर्फ़ यही है कि गुलजार साहब ने बारिश के दौरान फ़ुर्सत के पलों को कैसे जिया जाये यह उनके शब्दों में बयान नहीं किया है....शुरुआत होती है जाडो़ के मौसम से -

जाडों की नर्म धूप और
आँगन में लेटकर....
आँखों पे खींच कर तेरे आँचल के साये को
औन्धे पडे़ रहें कभी करवट लिये हुए...

क्या खूब कही है... यह अनुभव कोई भी आम आदमी कभी भी कर सकता है, किसी भी रविवार या छुट्टी के दिन जब वाकई जाडों की नर्म धूप हो... इस मंजर का मजा कुछ और ही है... साथ में चाय और पकौडे हों तो बात ही क्या, लेकिन पकौडे बनाने के लिये गई माशूका का आँचल फ़िर आँखों पर कैसे मिलेगा, इसलिये पकौडे कैन्सल...

फ़िर गुलजार साहब आते हैं गर्मियों की रातों पर और इस अनुभव को तो कई लोग आजमा चुके हैं...
या गर्मियों की रात जो
पुरवाईयाँ चलें....
ठंडी सफ़ेद चादरों पर
जागें देर तक
तारों को देखते रहें छत पर पडे हुए...

इस अनुभव में मात्र एक कमी है कि साथ में एक ट्रांजिस्टर हो जिसमें विविध भारती का छायागीत कार्यक्रम आ रहा हो, तो इस अनुभव में चार या छः चाँद और लग जायें....गौर करने वाली बात यह भी है कि इसमें गुलजार साहब ने "पुरवैया" हवाओं की बात कही है... जो नाम से ही शीतलता का अहसास दिलाती हैं....
अगला अंतरा आम आदमी के लिये नहीं है...(क्योंकि बर्फ़ीली सर्दियों में पहाड पर छुट्टी मनाने जाना यह किसी आम आदमी के बस की बात नहीं है) यह बात फ़िल्म में संजीव कुमार के लिये कही गई है....
बर्फ़ीली सर्दियों में
किसी भी पहाड पर...
वादी में गूँजती हुई
खामोशियाँ सुनें...
आँखों में भीगे-भीगे से लम्हे लिये हुए..

गुलजार साहब ने बर्फ़ीली सर्दियों में किसी भी पहाड पर जाने की बात कही है न कि किसी कमरे मे कम्बल के नीचे दुबक कर बैठ जाने की...क्या नवोन्मेषी विचार है... बर्फ़ीली सर्दियों में पहाडों की हसीन लेकिन गुमसुम वादियाँ क्या रोमाँटिक होंगी यह कल्पना ही की जा सकती है... यही तो है गुलजार साहब का "Orthodox" लेखन और चिन्तन जिसके हम जैसे लाखों मुरीद हैं..."मोरा गोरा अंग लई ले" से "बीडी जलई ले"... तक एक से बढकर एक तोहफ़े उन्होंने हमे दिये हैं.... और हम उनके आभारी हैं...
सोमवार, 30 अप्रैल 2007 16:58

Soharabuddin Encounter Case and Gujarat Police

सोहराबुद्दीन एनकाउंटर और "गंगाजल"

सोहराब के फ़र्जी एनकाऊँटर पर बडा बावेला मचा हुआ है और गुजरात पुलिस के कुछ अधिकारियों पर केस भी चालू हो गया है (हालाँकि सोहराब पर हल्ला ज्यादा इसलिये मचा है क्योंकि एक तो वह मुसलमान है और फ़िर गुजरात में मारा गया है, तो फ़िर क्या कहने... सेकुलरवादियों और मानवाधिकारवादियों के पास काम ही काम)... बहरहाल यह बहस का अलग विषय है... मेरा फ़ोकस है सोहराब पर हुई कार्रवाई । शायद कुछ लोग ना जानते हों, लेकिन उज्जैन के लोग जानते हैं कि सोहराब का सपना था मालवा का डॉन बनना, उसके घर के कुँए से एके ५६ और पिस्तौलें भी बरामद हुई थीं और पहले से उस पर कई आपराधिक मामले चल रहे थे, कुल मिलाकर सोहराब कोई संत-महात्मा या पीर-फ़कीर नहीं था, ना ही कोई आम सीधा-सादा इन्सान...कुछ समय पहले आई थी फ़िल्म गंगाजल । जैसा कि सब जानते हैं फ़िल्म की पृष्ठभूमि भागलपुर (बिहार) के आँखफ़ोडवा कांड पर आधारित थी, जिसमें पुलिस ने जेल में बन्द विचाराधीन कैदियों की आँखों में तेजाब डालकर उन्हें अन्धा कर दिया था और उसे "गंगाजल" नाम दिया था । बाद में उस घटना की जाँच भी हुई थी, लेकिन तत्कालीन सरकार को जनता के विरोध के कारण मामले को रफ़ा-दफ़ा करना पडा । जनता यह समझती थी कि उन अपराधियों के साथ पुलिस ने ठीक किया है । उनमें से अधिकतर आरोपी हत्या और बलात्कार के आरोपी थे ।

यह घटना वैसे तो साफ़-साफ़ कानून को अपने हाथ में लेने की थी, लेकिन जनता के खुले समर्थन के कारण स्थिति अजीब सी हो गई थी । एक और फ़िल्म है जिसका नाम है "अब तक छप्पन" । फ़िल्म मुम्बई पुलिस के इंस्पेक्टर दया नायक के जीवन पर आधारित थी, जिन्होंने अब तक छप्पन खूँखार अपराधियों को मौत के घाट उतार दिया है, उन्हें मुम्बई पुलिस एन्काउण्टर विशेषज्ञ मानती है (हालाँकि दया नायक फ़िलहाल कई आरोपों से घिरे हुए हैं, जिसके पीछे भी राजनैतिक या उनके आला अफ़सरों का हाथ हो सकता है).... ऐसे ही कुछ वर्षों पहले एक फ़िल्म आई थी "यशवन्त", जिसमें नाना पाटेकर ने ही पुलिस इंस्पेक्टर का रोल निभाया था, उस फ़िल्म के एक दृश्य में एक पत्रकार अपने अखबार में इंस्पेक्टर यशवन्त की कार्यशैली की कडी आलोचना करता है, कि यह इंस्पेक्टर अपराधियों के साथ बहुत मारपीट करता है, जानवरों की तरह से पेश आता है, इसे मानवाधिकारों का कोई खयाल नहीं है आदि-आदि । उसी पत्रकार का बैग एक बार चोरी हो जाता है, वह पत्रकार यशवन्त के थाने में रिपोर्ट लिखाने जाता है, यशवन्त उससे वारदात का इलाका पूछता है और बैठने को कहता है, फ़िर हवलदार को आदेश देता है कि फ़लाँ व्यक्ति को पकड़कर लाओ । एक गुण्डे को थाने में लाया जाता है, यशवन्त उससे बडे प्यार से पूछता है कि पत्रकार साहब का बैग तूने चुराया है, उन्हें वापस कर दे, जैसा कि उसे अपेक्षित होता है, गुण्डा मना करता है कि मैने कोई बैग नहीं चुराया है । फ़िर भी यशवन्त उस गुण्डे को ठंडा पिलाता है और बिरयानी भी खिलाता है और फ़िर एक बार प्यार से पूछता है, गुण्डा फ़िर इनकार करता है । फ़िर यशवन्त अपने पुलिसिया अन्दाज में गुण्डे को जोरदार तमाचे रसीद करता है, और गुण्डा तत्काल उस पत्रकार का बैग का पता बता देता है । यह तो हुई फ़िल्मों की बात, लेकिन सामान्य जनजीवन में भी हमारे सामने जे.एफ़.रिबेरो, केपीएस गिल और किरण बेदी जैसे साक्षात उदाहरण हैं, जिन्होने अपराधियों, आतंकवादियों और कानून तोडने वालों के खिलाफ़ जंग सफ़लतापूर्वक जीती है ।


उपरोक्त उदाहरण देने का मकसद सिर्फ़ यही सवाल उठाना है, कि अपराधियों के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिये ? क्या मानवाधिकार सिर्फ़ गुण्डे-बदमाशों के लिये हैं, जान पर खेलने वाले और चौबीस घण्टे "ऑन ड्यूटी" रहने वाले पुलिस वालों के लिये नहीं ? अपराधियों के साथ मानवीय व्यवहार किया जाना चाहिये, परन्तु उसकी सीमा क्या हो, यह कौन तय करेगा, और कैसे ? इस बात की क्या गारण्टी है कि बिहार की उन जेलों में बन्द वे हत्यारे और बलात्कारी (जिनको सजा भी हो पाती या नहीं यह कहना मुश्किल है) मानवीय व्यवहार पाकर वे सुधर जाते ? क्या जेल से बाहर आकर वे पुनः वैसा ही घृणित अपराध नहीं करते ? ऐसे आदतन अपराधियों को यदि कतिपय पुलिसकर्मियों ने अन्धा करके भविष्य के लिये निष्क्रिय कर दिया, तो इससे समाज का भला हुआ या नहीं ? मुम्बई पुलिस के नायाब इंस्पेक्टर दया नायक को रोज नया रास्ता बदलकर ऑफ़िस जाना पडता है, वे अपने परिवार के साथ सहज रूप से समय नहीं बिता सकते, चौराहे पर खडे होकर चाट-पकौडी नहीं खा सकते, भरा हुआ रिवाल्वर हरदम (सोते समय भी) उनके पास होता है चाहे वे ड्यूटी पर हों या नहीं । ऐसे में सवाल उठता है कि क्या उनके कोई मानवाधिकार नहीं हैं ? क्या उन्हें आम जिन्दगी जीने का हक नहीं है ? या उनका यह कसूर है कि उन्होंने पुलिस की नौकरी करके कुछ गुण्डों को खत्म कर दिया ? जबकि तथाकथित "ए" क्लास कैदी (?) (मुझे तो यह अवधारणा भी हास्यास्पद लगती है... "ए" क्लास कैदी क्या होता है और क्यों होता है, पता नहीं) को घर से लाया खाना, टीवी, मोबाईल की सुविधा उपलब्ध है, यह भेदभाव क्यों ? अपराधी को पकडने वाले ईमानदार पुलिस अफ़सर पर सदा तलवार लटकती रहे और अपराधी जेल में चिकन उडाये ? जैसा कि "यशवन्त" फ़िल्म के उदाहरण से स्पष्ट है कि अपराधी को पुलिस से डरना चाहिये, यदि पुलिस अफ़सर को यकीन है और उसके पास पुख्ता जानकारी है कि फ़लाँ व्यक्ति अपराधी है, तो अपराधी से सच उगलवाने की पूरी छूट उसे मिलनी चाहिये, जबकि हकीकत में आज उलटा हो रहा है ।

पुलिसवाले डरने लगे हैं कि कहीं अपने ऊपर केस न बन जाये, विभागीय जाँच न प्रारम्भ हो जाये, कहीं लॉक-अप में मर गया तो जिन्दगी बीत जायेगी कोर्ट के चक्कर खाते-खाते, कोई रसूखदार गुण्डा (लगभग सभी रसूखदार ही होते हैं) प्रेस के सामने मानवाधिकार की गुहार ना लगाने लग जाये । इस सबसे बचने के बाद सबूत इकठ्ठा करना, लम्बी कागजी और अदालती कार्रवाईयों को झेलना और फ़िर उसके बाद उसी गुण्डे को बाइज्जत बरी होते देखना, फ़िर कुछ वर्षों बाद उसी गुण्डे को विधायक या मंत्री बने देखकर उसे सेल्यूट करना, किसी भी पुलिस वाले के लिये यह एक भयानक दुःस्वप्न के समान है, जिसे केवल और केवल भुक्तभोगी ही जान सकता है । ऐसे में दबाव अब पुलिस पर बनने लगा है और गुण्डे ऐश करते हैं । पुलिस का "जलवा" अब कम होने लगा है । पंजाब में जब आतंकवाद अपने चरम पर था, तब केपीएस गिल ने उसपर काबू पाया, परन्तु जैसे ही आतंकवाद खत्म हुआ मानवाधिकारवादी सक्रिय हुए, कई पुलिस वालों को प्रताडित किया गया, कई पर मुकदमे चलाये गये, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने रेल से कटकर आत्महत्या तक कर ली । कहा गया कि उन्होंने मासूम लोगों को पूछताछ के नाम पर यातनायें दीं, हत्यायें कीं आतंकवाद को रोकने के नाम पर कई युवाओं को गायब करवा दिया... लेकिन परिणाम किसी ने नहीं देखा... अपनी जान हथेली पर लेकर आतंकवाद को खत्म करने वाले पुलिस अधिकारियों को यह इनाम, ऐसा सलूक । माना कि उनसे भी गलतियाँ हुई होंगी हो सकता है कि गेहूँ के साथ घुन भी पिस गया हो... लेकिन ऐसा तो युद्धकाल में होता ही है, तत्कालीन पंजाब के हालात शांतिकाल के नहीं थे ऐसी स्थिति में उस पुलिस अधिकारी के खिलाफ़ सुनवाई करते वक्त यह बात ध्यान में रखना चाहिये । काँटे को निकालने के लिये सुई का इस्तेमाल करना ही पडता है, एक फ़ूल की पत्ती से काँटा नहीं निकाला जा सकता । तात्पर्य यह कि एक सीमा तक तो दया, नरमी, मानवता आदि ठीक है, लेकिन जब पानी सर से ऊपर हो जाये अथवा गुण्डे पुलिस पर भारी पडने लगें तब दया नायक वाला तरीका ही ठीक है । किसी मामले में यदि सन्देह है तब तो शुरुआत में नर्मी दिखाई जा सकती है, लेकिन किसी के पास से एके ४७, लाखों की नोटों की गड्डियाँ, दारू की बोतलों के क्रेट बरामद हो रहे हों तब तो उससे पुलिसिया अंदाज में ही "व्यवहार" होना चाहिये । उस व्यक्ति की मंशा तो साफ़ दिख रही है, उसके साथ रियायत बरतना तो मूर्खता ही है । ऐसे में आतंकवादियों को पहले तो मुश्किल से पकडना, भारी सुरक्षा व्यवस्था बनाये रखकर उन्हें वर्षों तक जेल में रखना आदि कितने खर्चे का काम है ।

यदि कल्पना के लिये मान लिया जाये कि कंधार प्रकरण के वक्त भारत सरकार स्पष्ट कह देती कि यदि सभी यात्रियों को नहीं छोडा तो जिन आतंकवादियों को छोडने की माँग कर रहे हो सबसे पहले उन्हें ही चौराहे पर लाकर गोली से उडा देंगे... तो कैसा सन्देश जाता...और ये तो बाद की बात है, वर्षों पहले यदि रूबिया सईद के बदले में आतंकवादियों को मार दिया जाता भले ही रुबिया शहीद हो जातीं तो आज कश्मीर और भारत में आतंकवाद का इतिहास ही कुछ और ही होता, लेकिन हमारी लोकतंत्री (?) शासन व्यवस्था इतनी लुंजपुंज है कि चाहे जो आकर सरकारों को झुकने को कहता है और झुकने की बजाय सरकारें लेट जाती हैं । क्या कभी हम इतने कठोर बनेंगे कि गुण्डे बदमाश, बलात्कारी, आतंकवादी अपराध करने से पहले दस बार अपने अंजाम के बारे में सोचे । आज चारों तरफ़ अफ़जल को माफ़ी देने की बात की जा रही है, सिर्फ़ कल्पना ही की जा सकती है कि उन सैन्य परिवारों पर क्या गुजरती होगी जो उस हमले में शहीद हुए । लेकिन राजनीति इतने नीचे गिर चुकी है कि उसके बारे में कुछ कहना ही बेकार है । लेकिन समस्या का हल तो ढूँढना ही होगा, और मेरे अनुसार आज का समय भी युद्ध काल ही है इसलिये अब "ऑपरेशन गंगाजल - भाग २" का वक्त आ गया है । यदि हरेक शहर में दो-चार ईमानदार पुलिस वाले भी मिल जायें, जो दया नायक वाले तरीके में विश्वास रखते हों, तो देखते- देखते असामाजिक तत्वों में खौफ़ फ़ैलते देर नहीं लगेगी । "ईमानदार पुलिस वाले" शब्द का उपयोग इसलिये किया, क्योंकि यह पूरी तरह से उन्हीं पर निर्भर होगा, कि वे किस गुण्डे-बदमाश को "निष्क्रिय" करना चाहते हैं, इसलिये यह उनकी नैतिक जिम्मेदारी है कि पहले वे पूरी तरह से आश्वस्त हो जायें कि वाकई यह व्यक्ति समाज के लिये एक खतरा बन चुका है और आगे भी न तो आम जनता को और ना ही पुलिस को यह चैन से रहने देगा, उस व्यक्ति को किसी ऐसे तरीके से समाप्त किया जाये कि "साँप भी मर जाये और लाठी भी ना टूटे" ।

अब ये तो पुलिस वालों को बताने की जरूरत नहीं है कि ऐसे "सुरक्षित तरीके" क्या और कैसे होने चाहिये...."गंगाजल" या किसी ऐसे जहर का इंजेक्शन जिससे वे धीरे-धीरे २-४ महीनों में एडि़याँ रगड-रगड कर घर में ही मर जायें (यह काम आधुनिक "टॉक्सिकोलॉजी" के जरिये आसानी से हो सकता है) (उन्हें आसान मौत मिलना भी नहीं चाहिये), या फ़िर ऐसी कोई दवाई, जिससे उन्हें "पैरेलिसिस" हो जाये... या कुछ और । मतलब तो सिर्फ़ यही है कि पुलिस का काम है समाज की गंदगी की सफ़ाई करना, चाहे जैसे भी हो आम जनता का भला होना चाहिये बस.... हो सकता है कि ऐसे काम करते वक्त एकाध गलत केस भी हो जाये, लेकिन जैसा कि मैने पहले ही कहा है कि "पूरी तरह से आश्वस्त होने के बाद ही" ऐसा किया जाना उचित होगा । मानवाधिकारवादियों से घबराने की कोई जरूरत नहीं है, हमारे देश में तो जब अफ़जल को भी माफ़ करने की बात की जा रही है, हो सकता है कि कल अब्दुल करीम तेलगी, अबू सलेम और दाऊद को भी मानवीयता (?) के नाते आम माफ़ी देने की माँग उठने लगे.... हाँ... इस मामले में मैं पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष हूँ और चाहता हूँ कि तेलगी, सलेम, दाऊद के साथ-साथ बबलू श्रीवास्तव, छोटा राजन आदि को भी उसी तरीके से निपटाया जाये...ताकि सेकुलरवादियों (???) को शिकायत का मौका ना मिले....
बुधवार, 02 मई 2007 18:34

Tu Chanda Mai Chandni - Reshma aur Shera (Bal Kavi Bairagi)

तू चंदा.. मैं चाँदनी (Reshma aur Shera) : बालकवि बैरागी

आज जिस गीत के बारे में मैं लिखने जा रहा हूँ, वह गीत लिखा है बालकवि बैरागी जी ने, फ़िल्म है "रेशमा और शेरा" (निर्माता - सुनील दत्त) । ये गीत रेडियो पर कम बजता है, और बजता भी है तो अधूरा (दो अन्तरे ही), इस गीत का तीसरा अंतरा बहुत कम सुनने को मिलता है, जाहिर है कि रेडियो की अपनी मजबूरियाँ हैं, वे इतना लम्बा गीत हमेशा नहीं सुनवा सकते (जैसे कि फ़िल्म "बरसात की रात" की मशहूर कव्वाली "ये इश्क-इश्क है इश्क-इश्क" भी हमें अक्सर अधूरी ही सुनने को मिलती है, जिसके बारे में अगली किसी पोस्ट में लिखूँगा)... बहरहाल... ये गीत राजस्थानी शैली में लिखा हुआ गीत है, गीत क्या है एक बहती हुई कविता ही है, जिसे सरल हृदय बालकवि जी ने अपने शब्दों के जादू से एक अनोखा टच तो दिया ही, लेकिन असली कमाल है संगीतकार जयदेव का । गीत के बीच-बीच में जो "इंटरल्यूड्स" उन्होंने दिये हैं वे चमत्कारिक हैं । जलतरंग और शहनाई का अदभुत उपयोग उन्होंने किया है और किसी कविता को सुरों में बाँधना वैसे भी मुश्किल ही होता है... जयदेव जी हमेशा इस बात के पक्षधर रहे हैं कि पहले गीत के बोल लिखे जायें और फ़िर उसकी धुन बनाई जाये... और बालकवि बैरागी जी के इन शब्दों को धुन में पिरोना वाकई मुश्किल रहा होगा, जबकि साथ में यह जिम्मेदारी भी हो कि फ़िल्म के साथ उसका तारतम्य ना टूटने पाये और उसी पृष्ठभूमि में वह फ़िट भी लगे...गीत शुरू होता है धीमी-धीमी धुन से.... फ़िर जैसे कहीं दूर रेगिस्तान से सुरदेवी लता की आवाज आना शुरू होती है....

तू चन्दा... मैं चाँदनी... चाँदनी...
तू तरुवर मैं शाख रे...
तू बादल मैं बिजुरी... तू बादल मैं बिजुरी...
तू पंछी मैं पाँख रे...
तू चन्दा मैं चाँदनी......

गीत अपनी शुरुआत के इस पहले हिस्से से ही पकड़ बना लेता है, खासकर लताजी जब ऊँचे सुरों से शुरुआत करके "तू चन्दा मैं चाँदनी" के बाद बेहद धीमे सुरों में "तू बादल मैं बिजुरी" गाती हैं और फ़िर पुनः ऊँचे सुर में "तू पंछी मैं पाँख रे" की तान छेडकर हमें हिंडोले का मजा देती हैं...
अगला अंतरा बेहद शांति से शुरु होता है और इसमें लता जी की आवाज हमें एक दूसरी ही दुनिया में ले जाती है... मुझे लगता है कि गीत के हिस्से में जयदेव जी ने जानबूझकर ही वाद्यों का प्रयोग नहीं के बराबर किया... ताकि वहीदा रहमान का सुनील दत्त के प्रति समर्पण भाव खुलकर सामने आ सके और रेगिस्तान की पृष्ठभूमि का सही आभास वे पैदा कर सकें....
ना....सरवर ना... बावडी़
ना... कोई ठंडी छाँव..
ना कोयल ना पपीहरा
ऐसा मेरा गाँव से
कहाँ बुझे तन की तपन, कहाँ बुझे तन की तपन
ओ सैँया सिरमोर, चन्द्र किरन को छोड़कर जाये कहाँ चकोर रे
जाग उठी है साँवरे, मेरी कुआँरी प्यास रे...
अंगारे से लगने लगे, पिया अंगारे से लगने लगे
आज मुझे मधुमास रे, मधुमास रे... आज मुझे मधुमास....


इस अंतरे में बालकवि जी ने रेगिस्तान के गाँवों का वर्णन करके उसे "तन की तपन" से जोड़ दिया है, जो कि अदभुत है...जैसा कि अपने पोस्ट में यूनुस भाई ने कहा था कि इतने कोमल शब्द किसी-किसी गीत में ही मिलते हैं, और एक समर्पित प्रेमिका की अपने प्रेमी के प्रति आसक्ति की अधिकता में शब्दों की अश्लीलता ना आने पाये, यह कमाल किया है बैरागी जी ने... हिन्दी के कुछ उम्दा शब्दों को उन्होंने लिया है ताकि भावना भी व्यक्त हो जाये और अश्लीलता का तो सवाल ही नहीं....इस अंतरे के शुरु में वाद्य नहीं हैं, फ़िर धीरे-धीरे चौथी पंक्ति तक वे आते हैं और पैरा के अन्तिम लाईन आते-आते तेज हो जाते हैं (जब लताजी "आज मुझे मधुमास रे.... खासकर मधुमास शब्द के बीच में जो मुरकियाँ लेती हैं तो कलेजा चीर कर रख देती हैं)....

दूसरा अंतरा भी उसी प्रकार से शुरू होता है, लेकिन इस बार वाद्य भी साथ होते हैं....
तुझे आँचल में रखूँगी ओ साँवरे...
काली अलकों से बाँधूंगी ये पाँव रे...
गलबहियाँ वो डालूँ के छूटे नहीं...
मेरा सपना सजन अब छूटे नहीं...
मेहंदी रची हथेलियाँ, मेहंदी रची हथेलियाँ..
मेरे काजर वारे नैन रे...
पल-पल तुझे पुकारते, पिया पल-पल तुझे पुकारते, हो-हो कर बेचैन रे...
हो-हो कर बेचैन रे...


यहाँ भी "बेचैन रे...." की तान ठीक वैसी ही रखी गई है जैसी "मधुमास" शब्द की रखी गई है....मंतव्य वही है... आपसी दुश्मनी वाले दो कबीलों के दो प्रेमियों के बीच "तन की तपन", "मधुमास", "बेचैन", "गलबहियाँ", "काली अलकों" जैसे रहस्यमयी शब्द वाकई में गहरे असरकारक हैं...
तीसरा अंतरा जो कि कम सुनने को मिलता है....
ओ मेरे सावन सजन, ओ मेरे सिन्दूर..
साजन संग सजनी बनी, मौसम संग मयूर..
चार पहर की चाँदनी, मेरे संग बिता...
अपने हाथों से पिया मुझे लाल चुनर उढा..
केसरिया धरती लगे, अम्बर लालम-लाल रे..
अंग लगाके सायबा... अंग लगा के सायबा...
कर दे मुझे निहाल रे....कर दे मुझे निहाल रे...
तू चन्दा मैं चाँदनी.... तू तरुवर मैं शाख रे...


फ़िल्म की सिचुएशन के हिसाब से प्रेमिका जानती है कि उनका मिलन होना आसान नहीं है "चार पहर की चाँदनी, मेरे संग बिता...." और "केसरिया धरती लगे, लेकिन भविष्य की कल्पना करके अम्बर लालम-लाल" ऐसा उच्च श्रेणी का मेलजोल है सिचुएशन और गीत के बोलों में...तो इस प्रकार एक अनोखे गीत का अंत होता है... जिसमें क्या नहीं है, हिन्दी कविता का झरना, जयदेव का संगीत, लताजी की दैवीय आवाज, रेगिस्तान की पृष्ठभूमि में फ़िल्मांकन, सब मिलाकर एक बेहतरीन गीत....

दो दर्जन से अधिक पुस्तकों के लेखक, सच्चे गाँधीवादी काँग्रेसी, बालकवि बैरागी जी मध्यप्रदेश से विधायक, सांसद, केन्द्रीय मन्त्री रह चुके हैं, लेकिन उनकी सादगी अचंभित कर देने वाली है, आज भी वे सैकडों पत्रों का उत्तर अपने हाथों से देते हैं, और कुछ दिन पहले ही एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि डाक की बढती दरों के कारण उन्हें काफ़ी मुश्किल होती है... जिस जमाने में एक अदना सा महापौर भी पाँच साल में इतना कमा लेता है कि उसे पूरे जीवन भर कुछ नहीं करना पडता, ऐसे में बालकवि जी एक चमकदार लैम्प पोस्ट का काम करते हैं जो रास्ता दिखाता है...खैर....

यूनुस भाई के रेडियोवाणी से प्रेरित होकर मैने सोचा कि फ़िल्मी गीतों की गहराई और हिन्दी फ़िल्मों पर भी कुछ लिखा जाये... जैसे "दिल ढूँढता है" और अब यह गीत, हालांकि मेरे शब्दों में अधिक मुलायमियत नहीं है (शायद इसलिये कि मैने अधिकतर लेखन राजनीति और समाज पर किया है..) लेकिन यदि पाठकों को पसन्द आया तो यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा... आमीन...
शुक्रवार, 04 मई 2007 12:00

Marathi Actors and Characters in Hindi Films

हिन्दी फ़िल्मों में मराठी चरित्र : कितने वास्तविक ?

हिन्दी फ़िल्में हमारे यहाँ थोक में बनती हैं, और जाहिर है कि फ़िल्म है तो विभिन्न चरित्र और पात्र होंगे ही, और उन चरित्रों के नाम भी होंगे । हिन्दी फ़िल्मों पर हम जैसे फ़िल्म प्रेमियों ने अपने कई-कई घंटे बिताये हैं (हालांकि पिताजी कहते हैं कि मेरी आज की बरबादी के लिये हिन्दी फ़िल्में और क्रिकेट ही जिम्मेदार हैं), लेकिन कहते हैं ना प्यार तो अंधा होता है ना, तो अंधेपन के बावजूद फ़िल्में देखना और क्रिकेट खेलना नहीं छोडा तो नहीं छोडा, खैर...हिन्दी फ़िल्मों में वैसे तो काफ़ी नाम विभिन्न नायकों पर लगभग ट्रेण्ड बन चुके हैं, जैसे अमिताभ बच्चन के लिये "विजय", जीतेन्द्र के लिये "रवि", या महमूद के लिये "महेश" आदि और वे पसन्द भी किये गये, लेकिन जब फ़िल्म निर्माता किसी किरदार के साथ उसका उपनाम भी जोड देता है तब वह निपट अनाडी लगने लगता है, क्योंकि जो भी उपनाम वह हीरो या विलेन के आगे लगाता है, उस समाज या धर्म के लोग उससे अलग सा जुडाव महसूस करने लगते हैं (जाति व्यवस्था पर हजारों ब्लोग लिखे जा सकते हैं लेकिन यह एक सच्चाई है इससे कोई मुँह नहीं मोड सकता).

तो बात हो रही है, फ़िल्मों में चरित्रों के नाम के आगे उपनाम जोडने की, दुर्भाग्य से हमारे हिन्दी फ़िल्म निर्माता-निर्देशक इस मामले में फ़िसड्डी ही साबित हुए हैं । यदि अमिताभ का नाम सिर्फ़ विजय रखा जाये तो कोई आपत्ति नहीं है, और दर्शक एक बार भी नहीं पूछेगा कि इस "विजय" का सरनेम क्या है, लेकिन जब निर्माता "विजय" के आगे श्रीवास्तव, वर्मा या जैन लगा दिया जाता है तो बात कुछ अलग हो जाती है.... फ़िर उस निर्माता का यह दायित्व है कि वह उस उपनाम के साथ जुडी़ संस्कृति का भी प्रदर्शन करे...। ईसाईयों को हमेशा यह शिकायत रही है कि उनके समाज का सही चित्रण सच्चे अर्थों में अब तक फ़िल्मों में नहीं हो पाया है, इक्का-दुक्का "जूली" या "त्रिकाल" जैसी फ़िल्मों को छोड दिया जाये तो फ़िल्मों में अक्सर जूली, लिली, रोजी, डिसूजा, एन्थोनी, जोसेफ़ आदि जैसे बेहद घिसे-पिटे नाम ही दिये जाते हैं और वे भी उन चरित्रों को जो गले में क्रास लटकाये मामूली से गुंडे होते हैं, या फ़िर एकदम दरियादिल चर्च के फ़ादर, बस....।

ठीक इसी प्रकार मराठी (महाराष्ट्र समाज) लोगों के चरित्र चित्रण में भी ये हिन्दी फ़िल्म निर्माता लगभग अन्याय की हद तक चले जाते हैं, जबकि फ़िल्म निर्माण का श्रीगणेश ही दादा साहब फ़ाल्के ने किया था, और इस बात को अलग से लिखने की आवश्यकता नहीं है कि मराठी कलाकारों ने हिन्दी फ़िल्मों को क्या और कितना योगदान दिया है । शोभना समर्थ, लीला चिटणीस से लेकर माधुरी दीक्षित और उर्मिला तक, या फ़िर दादा साहेब फ़ालके से लेकर अमोल पालेकर और नाना तक, सब एक से बढकर एक । लेकिन जब हम हिन्दी फ़िल्मों पर नजर डालते हैं तो पाते हैं कि मराठी पात्रों का चित्रण या तो हवलदार, क्लर्क, या मुम्बई के सडक छाप गुण्डे के रूप में किया जाता है, बहुत अधिक मेहरबानी हुई तो किसी को अफ़सर बता दिया जाता है ।

चूँकि हिन्दी फ़िल्म निर्माताओं का पाला मुम्बई पुलिस से बहुत पडता है, इसलिये हवलदारों का नाम भोंसले, पाटिल या वागले रखे जाते हैं । शिकायत इस बात से नहीं है कि इस प्रकार के चरित्र क्यों दिखाये जाते हैं, बल्कि इस बात से है कि निर्माता उस समाज की छवि के बारे में जरा भी परवाह क्यों नहीं करता । जब निर्माता फ़िल्मों में उपनाम रखता है तो स्वतः ही उनकी बोली, भाषा, हावभाव और संस्कृति उस किरदार से जुड जाते हैं । जैसे कि फ़िल्म "गर्दिश" में अमरीश पुरी का नाम है पुरुषोत्तम साठे, क्या विसंगतिपूर्ण नाम रखा गया... मुम्बई में पला-बढा और वहीं नौकरी करने वाला एक हवलदार पंजाबी स्टाईल में डॉयलाग क्यों बोलता है ? अमरीश पुरी किसी भी कोण से मराठी लगते हैं उस फ़िल्म में ? किसी फ़िल्म में शक्ति कपूर (शायद "इंसाफ़" या "सत्यमेव जयते" में) "इन्स्पेक्टर भिण्डे" बने हैं (भेण्डे नहीं) और पूरी फ़िल्म में जोकर जैसी हरकतें करते हुए "मी आहे इंस्पेक्टर भिण्डे" जैसा कुछ बडबडाते रहते हैं । तेजाब में अनिल कपूर का नाम "देशमुख" रखा गया है, ये तो गनीमत है कि उसके बाप को बैंक में कैशियर बताया गया है, लेकिन पूरी फ़िल्म में कहीं भी अनिल कपूर "देशमुख" जैसे नहीं लगते । इसके उलट हाल ही की एक फ़िल्म "हेराफ़ेरी" में परेश रावल को बाबूराव नाम के चरित्र में पेश किया है, तो वह एक "टिपिकल" मुम्बईया मराठी टोन में बोलता तो है, वही परेश रावल "हंगामा" में बिहारी टोन में बोलते हैं, तो कम से कम प्रियदर्शन ने इस बात का तो ध्यान रखा ही, "कथा" फ़िल्म में सई परांजपे ने उम्दा तरीके से एक मुम्बई की एक मराठी चाल का चित्रण किया था, महेश मांजरेकर चूंकि मुम्बईया पृष्ठभूमि से हैं इसलिये उन्होंने "वास्तव" में थोडा मराठीपन का ठीकठाक चित्रण किया । इसी प्रकार अर्धसत्य फ़िल्म में इंस्पेक्टर वेलणकर और उनकी पत्नी के रोल में स्मिता पाटिल खूब जमते हैं, और बैकग्राऊँड में जो रेडियो बजता है वह मराठी माहौल पैदा करता है । जबकि किसी एक फ़िल्म में आशीष विद्यार्थी "आयेला-जायेला" टाईप की मराठी बोलते पाये जाते हैं ।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि हिन्दी फ़िल्मों में कोई तमिल पात्र आता है तो सबसे पहले तो उसे "मद्रासी" का तमगा लगा दिया जाता है, फ़िर उसे लुंगी पहनाकर "अई..अई...यो... टाईप के डायलाग देकर रोल की इतिश्री कर दी जाती है । दरअसल इसके मूल में है पैसा, अधिकतर निर्माता निर्देशक गैर मराठी हैं, उन्हें न तो मराठी संस्कृति का विशेष ज्ञान होता है (इतने वर्षों तक मुम्बई में रहने के बावजूद), न उससे जुडाव, और जाहिर है कि फ़िल्म बनाने के लिये पैसा लगता है... । महेश मांजरेकर ने एक बार कहा था कि उन्हें मराठी पृष्ठभूमि पर एक जोरदार कहानी पसन्द आई थी, लेकिन फ़ायनेंसर ने कहा "यदि बनाना ही है तो हिन्दी फ़िल्म बनाओ, मराठी नहीं चलेगा", अर्थात पंजाब की मिट्टी, सरसों का साग, खेत, राजपूती आन-बान-शान, गुजराती डांडिया सब चलेगा, लेकिन मराठी की पृष्ठभूमि नहीं चलेगी ! फ़ूलनदेवी की बाईस हत्याओं और बलात्कार की फ़िल्म के लिये निर्माता आसानी से मिल जायेगा, लेकिन वीर सावरकर की फ़िल्म के लिये सुधीर फ़डके साहब को जाने कितने पापड बेलने पडे ।

हिन्दी के अभिनेताओं को क्या दोष देना, मराठी के सुपर स्टार अशोक सराफ़ और लक्ष्मीकांत बेर्डे भी हिन्दी में नौकर, हीरो का दोस्त, या मुनीम जैसे दस मिनट के रोल से संतुष्ट हो जाते हैं, जबकि ये रोल उन जैसे उत्कृष्ट कलाकारों के लायक नहीं हैं । देखते हैं कब कोई चोपडा, खन्ना, कपूर या खान, मराठी माहौल और नामों को सही ढंग से चित्रित करता है... और यह शिकायत हिन्दी फ़िल्म निर्माताओं से सभी को रहेगी, जैसे किसी पारसी का चरित्र निभाते-निभाते दिनेश हिंगू बूढे हो गये, सिन्धी चरित्र "अडी... वडीं साईं" से आगे नहीं बढते, इसलिये सबसे अच्छा तरीका है कि फ़िल्मों में उपनाम रखे ही ना जायें, उससे कहानी और फ़िल्म पर कोई फ़र्क नहीं पडने वाला है...

मराठी लोग आमतौर पर मध्यमवर्गीय, अपने काम से काम रखने वाले, कानून, नैतिकता और अनुशासन का अधिकतम पालन करने वाले होते हैं (जरा अपने दोस्तों, रिश्तेदारों से मराठियों के बारे में अपने अनुभव पूछ कर देखिये, या फ़िर साक्षात किसी साठे, गोडबोले, पटवर्धन, परांजपे, देशपांडे और हाँ... चिपलूनकर से मिलकर देखिये कि हिन्दी फ़िल्मों में मराठी नामों के साथ कैसी "इमेज" दिखाई जाती है, और असल में वे कैसे हैं)...
बुधवार, 09 मई 2007 12:42

India Pakistan Atomic War

भारत-पाकिस्तान परमाणु युद्ध...

अब चूँकि अमेरिका की लाख कोशिशों के बावजूद भारत-पाकिस्तान दोनो के पास परमाणु मिसाईल तकनीक मौजूद है, ऐसे में यदि भारत-पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध छिड जाये तो क्या मंज़र होगा इसका अध्ययन किया गया, और चूंकि अध्ययन एक अमेरिकी एजेन्सी ने किया है, इसलिये वह सही ही होगा (ऐसा मानने वाले अमेरिका से भारत में ज्यादा हैं)। उक्त अध्ययन के निष्कर्ष इस प्रकार हैं -

एक बार पाकिस्तानी सेना ने निश्चय किया कि भारत पर परमाणु मिसाइलों से हमला किया जाये, उन्होंने उसे लांच-पैड पर लगा दिया, क्योंकि उन्हें पाक सरकार की इजाजत की आवश्यकता नहीं थी, और मिसाइल दागने के लिये उल्टी गिनती चालू कर दी । भारत की तकनीक इतनी उन्नत है कि मात्र अठारह सेकंड में भारत को पता चल गया कि हम पर परमाणु हमला होने वाला है, लेकिन भरतीय सेना को सरकार की मंजूरी लेना होती है इसलिये भारतीय सेना ने सरकार के सामने परमाणु हमले को विफ़ल करने के लिये स्वयं पहले हमला करने की अनुमति राष्ट्रपति से माँगी । राष्ट्रपति ने सेना की यह सिफ़ारिश मंत्रिमण्डल के सामने रखी । प्रधानमन्त्री ने तत्काल लोकसभा की एक आपात बैठक बुलाई । लोकसभा का वह विशेष सत्र बहिष्कार और नारेबाजी के कारण अनिश्चितकाल के लिये स्थगित कर दिया । राष्ट्रपति ने टीवी पर भाषण देकर तुरन्त निर्णय लेने की आवश्यकता पर जोर दिया। इस बीच पाकिस्तान की मिसाइल में कुछ तकनीकी खराबी आ गई, और उन्होंने दोबारा उलटी गिनती चालू की । लेकिन इधर भारत मे सरकार अल्पमत में आ गई, क्योंकि उसे समर्थन दे रही एक विशेष पार्टी ने समर्थन वापस ले लिया । राष्ट्रपति ने प्रधानमन्त्री को विश्वास मत हासिल करने के निर्देश दिया । सरकार विश्वास मत में पराजित हो गई और राष्ट्रपति ने अगली व्यवस्था होने तक कामचलाऊ प्रधानमन्त्री को बने रहने को कहा ।

कामचलाऊ प्रधानमन्त्री ने सेना को परमाणु मिसाइल छोडने के आदेश दिये, लेकिन चुनाव आयोग ने कहा कि कामचलाऊ सरकार नीतिगत फ़ैसले नहीं कर सकती, क्योंकि चुनाव आचार संहिता लागू हो गई है, चुनाव आयोग ने एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगाई । हालांकि उच्चतम न्यायालय ने सत्ता और शक्ति के दुरुपयोग को मान लिया लेकिन "इमरजेंसी" को देखते हुए कामचलाऊ प्रधानमन्त्री को मिसाइल के उपयोग के लिये अधिकृत कर दिया । उसी समय पाक मिसाइल सही ढंग से छूट तो गई, लेकिन अपने निशाने से चार सौ किलोमीटर दूर इस्लामबाद में पाकिस्तान की ही एक सरकारी इमारत पर ठीक बारह बजे गिरी, संयोग से कोई जनहानि नहीं हुई, क्योंकि भारत की ही तरह वहाँ भी सरकारी कर्मचारी इमारत से बाहर थे । साथ ही उस मिसाइल पर लगा परमाणु बम भी कहीं पास की झील में जा गिरा था । अब पाकिस्तान ने चीन से उच्च तकनीक आयात करने का फ़ैसला किया । इस दरम्यान, भारत में इस मुद्दे पर विचार करने के लिये एक सर्वदलीय बैठक बुलाई गई और सर्वसम्मति से फ़ैसला हुआ कि भारत को पाकिस्तान पर परमाणु हमला कर देना चाहिये, तब तक सेना को अनुमति माँगे तीन माह का समय बीत चुका था ।

इसी समय अचानक मीडिया में "मानवतावादी", "परमाणु विरोधी" आदि लोगों ने मानव-श्रंखला वगैरह बनाना शुरु कर दिया था, एक विपक्षी पार्टी ने "रास्ता-रोको" का आयोजन कर डाला था, कुछ लोग जो तेंडुलकर का पुतला नहीं जला सके थे, उन्होंने टीवी पर आने के लिये मुशर्रफ़ का पुतला हाथों-हाथ जला लिया और अपने चेहरे टीवी पर देख कर खुश हो लिये । आप्रवासी भारतीयों ने भी वॉशिंगटन और कैलिफ़ोर्निया से ई-मेल का ढेर लगा दिया, उन्हें अपने देश से ज्यादा निवेश की चिंता होने लगी थी । दूसरी तरफ़ पाकिस्तान की मिसाइलें एक के बाद एक फ़ेल होती गईं, कुछ मिसाइलें तेज राजस्थानी हवाओं के कारण अरब सागर में जा गिरीं तो कुछ पाक अधिकृत जंगलों में । आखिर में अमेरिका से तस्करी की हुई एक मिसाईल सही तरीके से चली, लेकिन चूँकि पाकिस्तानियों को उसका सॉफ़्टवेयर समझ में नहीं आया था और वे कोड नहीं बदल पाये थे, इसलिये मिसाइल उसके मूल निशाने अर्थात मास्को की तरफ़ बढ चली । रूसियों ने तत्काल उस मिसाइल को मार गिराया और अपनी ओर से एक मिसाइल इस्लामाबाद पर गिरा दी । बस फ़िर क्या था, अफ़रातफ़री मच गई ।

हजारों मौतों के कारण पाकिस्तान ने विश्व समुदाय से मदद की अपील की, भारत ने भी इस घटना पर गहरा अफ़सोस जाहिर किया और एक हवाई जहाज भरकर बिस्किट भेजने का प्रबन्ध किया, ताकि उनके "भाई" भूखे ना रहें । फ़िर एक बार भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कसम खाई कि वह कभी भी अपनी ओर से परमाणु हमले की पहल नहीं करेगा, और खुशी-खुशी रहने लगा । पाकिस्तान की जनता में तो कभी भी सेना से जवाबतलब करने की हिम्मत नहीं थी, सो वह भी खुशी-खुशी रहने लगी, और इस तरह समूचे "तंत्र" की "जागरूकता" और "सक्रियता" के कारण भारत-पाकिस्तान के बीच का परमाणु युद्ध होते-होते रह गया और मानवता कलंकित होने से बच गई ।
आजकल जमाना मीडिया और विज्ञापन का है, चाहे वह प्रिंट मीडिया हो अथवा इलेक्ट्रानिक मीडिया, चहुँओर विज्ञापनों की धूम है । इन विज्ञापनों ने सभी आय वर्गों के जीवन में अच्छा हो या बुरा, आमूलचूल परिवर्तन जरूर किया है । कई विज्ञापन ऐसे हैं जो बच्चों के अलावा बडों कि जुबान पा भी आ जाते हैं । शोध से यह ज्ञात हुआ है कि विज्ञापनों से बच्चे ही सर्वाधिक प्रभावित होते हैं, उसके बाद टीनएजर्स और फ़िर युवा । व्यवसाय की गलाकाट प्रतियोगिता ने विज्ञापनों का होना आवश्यक कर दिया है, और कम्पनियाँ, गैर-सरकारी संगठन और यहाँ तक कि सरकारें भी बगैर विज्ञापन के नहीं चल सकते । लेकिन इस आपाधापी में तमाम पक्ष एक महत्वपूर्ण बात भूल जाते हैं, वह है विज्ञापनों में नैतिकता का लोप, अश्लीलता, छिछोरेपन और उद्दण्डता का बढता स्तर । एक मामूली सा उदाहरण - दस वर्षीय एक बालक ने अपने साथ क्रिकेट देख रहे माता-पिता से पूछा - पापा कंडोम क्या होता है ? मम्मी-पापा एक दूसरे का मुँह देखने के अलावा क्या कर सकते थे... बच्चे ने यह सवाल क्यों पूछा, क्योंकि मैच के दौरान राहुल द्रविड और वीरेन्द्र सहवाग जनता को हेल्मेट और पैड पहनकर यह सन्देश देते हैं कि "एड्स से बचाव ही सर्वोत्तम उपाय है", सन्देश सही है लेकिन उसका सम्प्रेषण गलत समय और गलत तरीके से होता है, बच्चे को तो यही लगता है कि राहुल द्रविड या सहवाग जरूर किसी क्रिकेट की वस्तु का विज्ञापन कर रहे होंगे, और हेलमेट और पैड पहनने के बाद कंडोम भी पहनना जरूरी है, और वह सहजता से अपना सवाल पूछता है, इसमें गलती किस की है, जाहिर है विज्ञापन बनाने वाले और उसे प्रसारित करने वाले दोनों की । जब कंडोम के विज्ञापन मैच के बीच में आयेंगे, तो यही समझा जायेगा कि यह सभी आयु वर्ग के लोगों के उपयोग की वस्तु है, जैसे कि चॉकलेट, साबुन या कोक । सारा परिवार साथ बैठकर एक सीरियल देख रहा है, अचानक एक "सेनेटरी नैपकिन" का विज्ञापन आता है, जिसमें एक आकर्षक युवती उसके गुणों के बारे में "विस्तार" से बताती है, अब नर्सरी अथवा प्रायमरी में पढने वाले बच्चे को उसके बारे में आप क्या समझायेंगे ? उस बच्चे को तो एक ही नैपकिन मालूम है, जिससे नाक पोंछी जाती है, यदि उसने टीवी वाला नैपकिन लाने की जिद पकड ली तो आप क्या करेंगे ? तात्पर्य यह कि न तो विज्ञापन कंपनियों, न ही टीवी चैनलों और ना ही सरकार को इस बात की समझ है कि जिस विज्ञापन को वे दिखा रहे हैं, उस विज्ञापन का "टारगेट ऑडियन्स" क्या है ? कहीं विज्ञापन फ़ूहड तो नहीं (फ़ूहड और अश्लील तो कोई विज्ञापन होता ही नहीं ऐसा सभी कम्पनियाँ मानती हैं) ? उस विज्ञापन का समाज और दर्शक वर्ग पर क्या और कैसा असर हो रहा है, इस बात की चिन्ता भी किसी को नहीं होती । तथाकथित ऎड-गुरु और मैनेजमेंट के दिग्गज हमें यदाकदा ज्ञान बाँटते रहते हैं कि विज्ञापन तभी अधिक प्रभावी और शक्तिशाली होता है, जब वह सही समय और सही दर्शक या श्रोता तक पहुँचे । जैसे गाँव में मर्सिडीज का विज्ञापन करना बेकार है और एयरपोर्ट पर खाद-बीज का... फ़िर कंडोम, सेनेटरी नैपकिन, महिलाओं-पुरुषों के अन्तर्वस्त्रों के विज्ञापन के लिये क्रिकेट मैच क्यों ? क्या इसलिये कि दर्शक संख्या ज्यादा है, लेकिन इसके दुष्प्रभावों के बारे में क्या ? सरकार अपनी ओर से यदि कोई कदम उठाये तो महेश भट्ट नुमा "अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पक्षधर" लोगों की आजादी खतरे में पड़ जाती है, या प्रीतीश नन्दी टाईप कोई बुद्धिजीवी पानी पी-पीकर सरकार को कोसने लगता है, फ़िर इसका इलाज कैसे हो ? क्या विज्ञापन एजेंसियों और मीडिया को स्व-अनुशासन नहीं रखना चाहिये ? इसका सर्वमान्य और लोकतांत्रिक हल यही हो सकता है कि मीडिया, विज्ञापन जगत की हस्तियाँ और प्रेस काऊंसिल के लोग साथ बैठें और तय करें कि "एडल्ट" विज्ञापन क्या हैं, और उनके प्रसारण का समय और कार्यक्रम क्या-क्या होने चाहिये, ताकि परिवार के साथ बैठकर टीवी देखने वालों को असुविधा का सामना ना करना पडे़, क्योंकि बच्चों का कोई ठिकाना नहीं, पता नहीं कब, क्या पूछ बैठें ? और हर व्यक्ति महेश भट्ट भी नहीं बन सकता । एक मजेदार उदाहरण याद आ रहा है - एक डिटर्जेण्ट बनाने वाली कम्पनी का विज्ञापन सऊदी अरब में करने का ठेका एक विज्ञापन एजेन्सी को दिया गया, लेकिन दस दिनों में ही वहाँ कम्पनी की सेल में भारी गिरावट दर्ज की गई, कारणों का पता करने पर यह बात सामने आई कि भारत की तरह ही विज्ञापन एजेन्सी ने सऊदी अरब में भी तीन पोस्टरों वाला "ऐड-केम्पेन" किया था, जिसमें पहले पोस्टर में एक चमकती हुई महिला मुस्कराते हुए एक गन्दा शर्ट दिखाती है, दूसरे पोस्टर में वह उसे डिटर्जेण्ट की बालटी में डालते हुए दिखती है, और तीसरे पोस्टर में वह सफ़ेद शर्ट निकालती है...दिक्कत यह थी कि सऊदी अरब में जैसा कि उर्दू पढते हैं (दाँये से बाँई ओर) वैसा जनता ने पढा और मतलब निकाला कि सफ़ेद शर्ट को इसमें डालने पर यह गन्दा हो जाता है..मतलब यह कि विज्ञापन कहाँ, कैसा और किसके बीच किया जा रहा है, इसका ध्यान रखना बहुत जरूरी है...तो उम्मीद करता हूँ कि विज्ञापन जगत के कुछ लोग मेरे इस ब्लोग को पढेंगे और "ऊ...प्पर" तक मेरी बात पहुँचायेंगे, ताकि भौण्डे विज्ञापनों पर अंकुश लग सके । कहीं यह ब्लोग ज्यादा भारी ना हो जाये इसलिये अब कुछ मजेदार (?) विज्ञापन भी देख लें ...


इसमें "कोक" हमसे कह रहा है कि जमीन का सारा पानी तो हमने ले लिया, अब आप लोग कोक पियो और मजे में जियो....


नीम की दातून की जगह "कोलगेट" उपयोग करो तो ऐसे दिखोगे....


"नाईकी" के आदेश को मानते हुए बच्चा वही कर रहा है, जो उसे कहा गया है... यानी "जस्ट डू इट"...

तो भैया.. मजा आया हो तो टिपियायें और दूसरों को भी टिपियाने का मौका दें वरना पैसा वापस...
किसी ने सच ही कहा है कि जिस देश को बरबाद करना हो सबसे पहले उसकी संस्कृति पर हमला करो और वहाँ की युवा पीढी को गुमराह करो । जो समाज इनकी रक्षा नहीं कर सकता उसका पतन और सर्वनाश निश्चित हो जाता है । हमारे आसपास घटने वाली काफ़ी बातें समाज के गिरते नैतिक स्तर और खोखले होते सांस्कृतिक माहौल की ओर इशारा कर रही हैं, एक खतरे की घंटी बज रही है, लेकिन समाज और नेता लगातार इसकी अनदेखी करते जा रहे हैं । इसके लिये सामाजिक ढाँचे या पारिवारिक ढाँचे का पुनरीक्षण करने की बात अधिकतर समाजशास्त्री उठा रहे हैं, परन्तु मुख्यतः जिम्मेदार है हमारे आसपास का माहौल और लगातार तेज होती जा रही "भूख" । जी हाँ "भूख" सिर्फ़ पेट की नहीं होती, न ही सिर्फ़ तन की होती है, एक और भूख होती है "मन की भूख" । इसी विशिष्ट भूख को "बाजार" जगाता है, उसे हवा देता है, पालता-पोसता है और उकसाता है। यह भूख पैदा करना तो आसान है, लेकिन क्या हमारा समाज, हमारी राजनीति, हमारा अर्थतन्त्र इतना मजबूत और लचीला है, कि इस भूख को शान्त कर सके ।
दृश्य-श्रव्य माध्यमों का प्रभाव कोमल मन पर सर्वाधिक होता है, एक उम्र विशेष के युवक, किशोर, किशोरियाँ इसके प्रभाव में बडी जल्दी आ जाते हैं । जब यह वर्ग देखता है कि किसी सिगरेट पीने से बहादुरी के कारनामे किये जा सकते हैं, या फ़लाँ शराब पीने से तेज दौडकर चोर को पकडा जा सकता है, अथवा कोई कूल्हे मटकाती और अंग-प्रत्यंग का फ़ूहड प्रदर्शन करती हुई ख्यातनाम अभिनेत्री किसी साबुन को खरीदने की अपील (?) करे, तो वयःसन्धि के नाजुक मोड़ पर खडा किशोर मन उसकी ओर तेजी से आकृष्ट होता है । इन्तिहा तो तब हो जाती है, जब ये सारे तथाकथित कारनामे उनके पसन्दीदा हीरो-हीरोईन कर रहे होते हैं, तब वह भी उस वस्तु को पाने को लालायित हो उठता है, उसे पाने की कोशिश करता है, वह सपने और हकीकत में फ़र्क नहीं कर पाता । जब तक उसे इच्छित वस्तु मिलती रहती है, तब तक तो कोई समस्या नहीं है, परन्तु यदि उसे यह नहीं मिलती तो वह युवक कुंठाग्रस्त हो जाता है । फ़िर वह उसे पाने के लिये नाजायज तरीके अपनाता है, या अपराध कर बैठता है । और जिनको ये सुविधायें आसानी से हासिल हो जाती हैं, वे इसके आदी हो जाते हैं, उन्हें नशाखोरी या पैसा उडाने की लत लग जाती है, जिसकी परिणति अन्ततः किसी मासूम की हत्या या फ़िर चोरी-डकैती में शामिल होना होता है । ये युवक तब अपने आपको एक अन्धी गली में पाते हैं, जहाँ से निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझता । आजकल अपने आसपास के युवकों को धडल्ले से पैसा खर्च करते देखा जा सकता है । यदि सिर्फ़ पाऊच / गुट्खे का हिसाब लगाया जाये, तो एक गुटका यदि दो रुपये का मिलता है, और दिन में पन्द्रह-बीस पाऊच खाना तो आम बात है, इस हिसाब से सिर्फ़ गुटके का तीस रुपये रोज का खर्चा है, इसमें दोस्तों को खिलाना, सिगरेट पिलाना, मोबाइल का खर्च, दिन भर यहाँ-वहाँ घूमने के लिये पेट्रोल का खर्चा, अर्थात दिन भर में कम से कम सौ रुपये का खर्च, मासिक तीन हजार रुपये । क्या भारत के युवा अचानक इतने अमीर हो गये हैं ? यह अनाप-शनाप पैसा तो कुछ को ही उपलब्ध है, परन्तु जब उनकी देखादेखी एक मध्यम या निम्नवर्गीय युवा का मन ललचाता है, तो वह रास्ता अपराध की ओर ही मुडता है । यह "बाजार" की मार्केटिंग की ताकत (?) ही है, जो इस "मन की भूख" को पैदा करती है, और यही सबसे खतरनाक बात है ।
अपसंस्कृति की भूख फ़ैलाने में बाजार और उसके मुख्य हथियार (!) टीवी का योगदान (?) इसमें अतुलनीय है । उदारीकरण की आँधी में हमारे नेताओं द्वारा सांस्कृतिक प्रदूषण की ओर से आँखें मूंद लेने के कारण इनकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने वाला कोई न रहा, जिसके कारण ये तथाकथित "मीडिया" और अधिक उच्छृंखल और बदतर होता गया है । एक जानकारी के अनुसार फ़्रेण्डशिप डे के लिये पूरे देश के "बाजार" में लगभग चार सौ करोड़ रुपयों की (ग्रीटिंग, गुलाब के फ़ूल, चॉकलेट और उपहार मिलाकर) खरीदारी हुई । जो चार सौ करोड रुपये (जिनमें से अधिकतर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की जेब में गये हैं) अगले वर्ष बढकर सात सौ करोड हो जायेंगे, इसका उन्हें पूरा विश्वास है । लेकिन "प्रेम" और "दोस्ती" के इस भौंडे प्रदर्शन में जिस "धन" की भूमिका है वही सारे पतन की जड है, और इसका सामाजिक असर क्या होगा, इस बारे में कोई सोचने को भी तैयार नहीं है । जिस तरह से भावनाओं का बाजारीकरण किया जा रहा है, युवाओं का मानसिक और आर्थिक शोषण किया जा रहा है, वह गलत है, कई बार यह आर्थिक शोषण, शारीरिक शोषण में बदल जाता है । मजे की बात तो यह है कि कई बार कोई दिवस क्यों मनाया जाता है, इसका पता भी उन्हें नहीं होता, परन्तु जैसा मीडिया बता दे अथवा जैसी "भेडचाल" हो वैसा ही सही, जैसा कि वेलेण्टाइन के मामले मे है कि "जिस दिन को ये युवा प्रेम-दिवस के रूप में मनाते हैं दरअसल वह एक शहीद दिवस है, क्योंकि संयोगवश तीनों वेलेण्टाइनों को तत्कालीन राजाओं ने मरवा दिया था, और वह भी चौदह फ़रवरी को" । अब आपत्ति इस बात पर है कि जब आप जानते ही नहीं कि यह उत्सव किसलिये और क्यों मनाया जा रहा है, ऐसे दिवस का क्या औचित्य है ? मार्केटिंग के पैरोकारों की रटी-रटाई दलील होती है कि "यदि इन दिवसों का बाजारीकरण हो भी गया है तो इसमें क्या बुराई है ? क्या पैसा कमाना गलत बात है ? किसी बहाने से बाजार में तीन-चार सौ करोड रुपया आता है, तो इसमें हाय-तौबा क्यों ? जिसे खरीदना हो वह खरीदे, जिसे ना खरीदना हो ना खरीदे, क्या यह बात आपत्तिजनक है ?" नहीं साहब पैसा कमाना बिलकुल गलत बात नहीं, लेकिन जिस आक्रामक तरीके उस पूरे "पैकेज" की मार्केटिंग की जाती है, उसका उद्देश्य युवाओं से अधिक से अधिक पैसा खींचने की नीयत होती है और वह "मार्केटिंग" उस युवा के मन में भी खर्च करने के भाव जगाती है जिसकी जेब में पैसा नहीं है और ना कभी होगा, यह गलत बात है । पढने-सुनने में भले ही अजीब लगे, परन्तु सच यही है कि आज की तारीख में भारत के पचास-साठ प्रतिशत युवाओं की खुद की कोई कमाई नहीं है, और ऐसे युवाओं की संख्या भी कम ही है जिन्हें नियमित जेबखर्च मिलता हो । बाप वीआरएस और जबरन छँटनी का शिकार है, और बेटे को कोई नौकरी नहीं है, इसलिये दोनों ही बेकार हैं और टीवी उन्हें यह "भूख" परोस रहा है, पैसे की भूख, साधनों की भूख । भूख जो कि एक दावानल का रूप ले रही है । इसी मोड पर आकर "सामाजिक परिवर्तन", "सामाजिक क्रान्ति", "सामाजिक असर" की बात प्रासंगिक हो जाती है, लेकिन लगता है कि देश कानों में तेल डाले सो रहा है । आज हमारे चारों तरफ़ घोटाले, राजनीति, पैसे के लिये मारामारीम हत्याएं, बलात्कार हो रहे हैं, इन सभी के पीछे कारण वही "भूख" है । समाजशास्त्रियों की चिंता वाजिब है कि ऐसे लाखों युवाओं की फ़ौज समाज पर क्या असर डालेगी ? लेकिन "मदर्स डे", "फ़ादर्स डे", "वेलेन्टाईन", "फ़्रेण्डशिप डे", ये सब प्रतीक मात्र नहीं है, बल्कि इनसे आपको कमतरी का एहसास कराया जाता है कि यदि आपने कोई उपहार नहीं दिया तो आपको दोस्ती करना नहीं आता, यदि आपने कार्ड या फ़ूल नहीं खरीदा इसका मतलब है कि आप प्रेम नहीं करते, परिणाम यह होता है कि विवेकानन्द या अपने कोर्स की कोई किताब खरीदने की बजाय व्यक्ति किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी की कोई बेहूदा चॉकलेट खरीद लेता है, क्योंकि उस चॉकलेट से तथाकथित "स्टेटस" (?) जुडा है, और यही "स्टेटस" यानी एक और "भूख" । बाजार को नियन्त्रित करने वालों से यही अपेक्षा है कि उस "भूख" को भडकाने का काम ना करें, जो आज समाज के लिये "भस्मासुर" साबित हो रही है, कल उनके लिये भी खतरा बन सकती है ।
गुरुवार, 31 मई 2007 15:51

भुतहा संयोग या कुछ और ?



अब्राहम लिंकन कॉंग्रेस के लिये 1846 में चुने गये,
जॉन एफ़ केनेडी कॉंग्रेस के लिये 1946 में चुने गये..

अब्राहम लिंकन 1860 में राष्ट्रपति चुने गये,
जॉन एफ़ केनेडी 1960 में राष्ट्रपति चुने गये..

दोनों नागरिक कानूनों के जोरदार पैरोकार रहे,
दोनों की पत्नियों ने अपनी-अपनी संतान खोई, जब वे व्हाईट हाऊस में थीं...

दोनों को शुक्रवार को गोली मारी गई,
दोनों के सिर में गोली मारी गई..

आगे और जबरदस्त भुतहा संयोग....

लिंकन की सेक्रेटरी का नाम था केनेडी
केनेडी की सेक्रेटरी का नाम था लिंकन..

दोनों की हत्या दक्षिणपंथियों ने की,
दोनों के उत्तराधिकारी दक्षिणपंथी जॉनसन नामधारी थे..

एण्ड्र्यू जॉनसन, जो लिंकन के उत्तराधिकारी बने, का जन्म हुआ 1808 में,
लिंडन जॉनसन, जो केनेडी के उत्तराधिकारी बने, का जन्म हुआ 1908 में..

लिंकन के हत्यारे जॉन विल्क्स बूथ का जन्म हुआ 1839 में,
केनेडी के हत्यारे ली हार्वे ओसवाल्ड का जन्म हुआ 1939 में..

दोनों के हत्यारों को तीन नामों से जाना जाता था,
दोनों के हत्यारों के नाम की स्पेलिंग में 15 अक्षर आते हैं..

अब जरा कुर्सी थाम लीजिये....

लिंकन की हत्या जिस थियेटर में हुई उसका नाम था "फ़ोर्ड"
केनेडी की हत्या जिस कार में हुई उसका नाम था "फ़ोर्ड"..

लिंकन की हत्या थियेटर में हुई और हत्यारा भागकर गोदाम में छुपा,
केनेडी की हत्या गोदाम से हुई और हत्यारा भागकर थियेटर में छुपा..

बूथ और ओसवाल्ड दोनों हत्यारों की कोर्ट में सुनवाई से पहले ही हत्या हो गई.

हत्या से एक सप्ताह पहले लिंकन की सभा जिस जगह थी उसका नाम था "मुनरो मेरीलैण्ड"
हत्या से एक सप्ताह पहले केनेडी की मुलाकात हुई उसका नाम था "मर्लिन मुनरो"

अब इन संयोगों के बारे में क्या कहा जा सकता है ? किसी इतिहासकार से पूछें या किसी बंगाली जादूगर से...

(स्रोत : ई-मेल मित्रमंडली)
रविवार, 03 जून 2007 11:02

फ़िल्मी मौत : क्या सीन है !

हिन्दी फ़िल्मों से हम प्यार करते हैं वे कैसी भी हों, हम देखते हैं, तारीफ़ करते हैं, आलोचना करते हैं लेकिन देखना नहीं छोडते, इसी को तो प्यार कहते हैं । हमारी हिन्दी फ़िल्मों में मौत को जितना "ग्लैमराईज" किया गया है उतना शायद और कहीं नहीं किया गया होगा । यदि हीरो को कैन्सर है, तो फ़िर क्या कहने, वह तो ऐसे मरेगा कि सबकी मरने की इच्छा होने लगे और यदि उसे गोली लगी है (वैसे ऐसा कम ही होता है, क्योंकि हीरो कम से कम चार-छः गोलियाँ तो पिपरमेंट की गोली की तरह झेल जाता है, वो हाथ पर गोली रोक लेता है, पीठ या पैर में गोली लगने पर और तेज दौडने लगता है), खैर... यदि गोली खाकर मरना है तो वह अपनी माँ, महबूबा, दोस्त, जोकरनुमा कॉमेडियन, सदैव लेटलतीफ़ पुलिस आदि सबको एकत्रित करने के बाद ही मरता है । जितनी देर तक वो हिचकियाँ खा-खाकर अपने डॉयलॉग बोलता है और बाकी लोग मूर्खों की तरह उसका मुँह देखते रहते हैं, उतनी देर में तो उसे गौहाटी से मुम्बई के लीलावती तक पहुँचाया जा सकता है । हीरो गोली खाकर, कैन्सर से, कभी-कभार एक्सीडेंट में मरता तो है, लेकिन फ़िर उसकी जगह जुडवाँ-तिडवाँ भाई ले लेता है, यानी कैसे भी हो "फ़ुटेज" मैं ही खाऊँगा ! साला..कोई हीरो आज तक सीढी से गिरकर या प्लेग से नहीं मरा ।

चलो किसी तरह हीरो मरा या उसका कोई लगुआ-भगुआ मरा (हवा में फ़डफ़डाता दीपक अब बुझा कि तब बुझा..बच्चा भी समझने लगा है कि दीपक बुझा है मतलब बुढ्ढा चटकने वाला है...) फ़िर बारी आती है "चिता" की और अंतिम संस्कार की । उज्जैन में रहते हुए इतने बरस हो गये, लोग-बाग दूर-दूर से यहाँ अंतिम संस्कार करवाने आते हैं, आज तक सैकडों चितायें देखी हैं, लेकिन फ़िल्मों जैसी चिता... ना.. ना.. कभी नहीं देखी, क्या "सेक्सी" चिता होती है । बिलकुल एक जैसी लकडियाँ, एक जैसी जमी हुई, खासी संख्या में और एकदम गोल-गोल, "वाह" करने और तड़ से जा लेटने का मन करता है... फ़िर हीरो एक बढिया सी मशाल से चिता जलाता है, और माँ-बहन-भाई-दोस्त या किसी और की कसम जरूर खाता है, और इतनी जोर से चीखकर कसम खाता है कि लगता है कहीं मुर्दा चिता से उठकर न भाग खडा हो...।

यदि चिता हीरोईन की है, और वो भी सुहागन, फ़िर तो क्या कहने । चिता पर लेटी हीरोईन ऐसी लगती है मानो "स्टीम बाथ" लेने को लेटी हो और वह भी फ़ुल मेक-अप के साथ । हीरो उससे कितना भी लिपट-लिपट कर चिल्लाये, मजाल है कि विग का एक बाल भी इधर-उधर हो जाये, या "आई-ब्रो" बिगड़ जाये, चिता पूरी जलने तक मेक-अप वैसा का वैसा । शवयात्रा के बाद बारी आती है उठावने या शोकसभा की । हीरो-हीरोईन से लेकर दो सौ रुपये रोज वाले एक्स्ट्रा के कपडे भी एकदम झकाझक सफ़ेद..ऐसा लगता है कि ड्रेस-कोड बन गया हो कि यदि कोई रंगीन कपडे पहनकर आया तो उसे शवयात्रा में घुसने नहीं दिया जायेगा । तो साथियों आइये कसम खायें कि जब भी हमारी चिता जले ऐसी फ़िल्मी स्टाईल में जले, कि लोग देख-देखकर जलें । जोर से बोलो...हिन्दी फ़िल्मों का जयकारा...