Super User

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I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

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जब श्रीलंका ने तमिल चीतों पर निर्णायक हमला बोलने का निर्णय लिया तब कई लोगों को आश्चर्य हुआ था, कि आखिर श्रीलंका कैसे यह कर सकेगा। लेकिन इलाके पर बारीक नज़र रखने वाले विशेषज्ञ जानते थे कि चीन का हाथ अब पूरी तरह से श्रीलंका की पीठ पर है और प्रभाकरन सिर्फ़ कुछ ही दिनों का मेहमान है। चीन की मदद से न सिर्फ़ श्रीलंका ने जफ़ना और त्रिंकोमाली पर पकड़ मजबूत कर ली बल्कि “अन्तर्राष्ट्रीय आवाजों” और “पश्चिम की चिंताओं” की परवाह भी नहीं की।

श्रीलंका के दक्षिणी तट पर, विश्व के सबसे व्यस्ततम जलमार्ग से सिर्फ़ 10 समुद्री मील दूर एक विशालकाय निर्माण कार्य चल रहा है। “हम्बनतोटा” नामक इस मछलीमार गाँव की शान्ति भारी मशीनों ने भंग की हुई है… यहाँ चीन की आर्थिक और तकनीकी मदद से एक बहुत बड़ा बन्दरगाह बनाया जा रहा है, जिसे चीन अपने हितों के लिये उपयोग करेगा।



मार्च 2007 में जब श्रीलंका और चीन की सरकारों के बीच इस बन्दरगाह को बनाने का समझौता हुआ तभी से (यानी पिछले दो साल से) चीन ने श्रीलंका को इसके बदले में हथियार, अन्य साजो-सामान की सहायता और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मनोवैज्ञानिक मदद सब कुछ दिया। असल में लगभग 1 अरब डॉलर की भारी-भरकम लागत से बनने वाले इस सैनिक-असैनिक बन्दरगाह से चीन अपने सभी जहाजों और तेल टैंकरों की मरम्मत और ईंधन की देखभाल तो करेगा ही, इस सामरिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री इलाके से सऊदी अरब द्वारा आने वाले उसके तेल पर भी नज़र रखेगा। भले ही चीन कहे कि यह एक व्यावसायिक बन्दरगाह है और श्रीलंका का इस पर पूरा नियन्त्रण होगा, लेकिन जो लोग चीन को जानते हैं वे यह जानते हैं कि चीन इस बन्दरगाह का उपयोग निश्चित रूप से क्षेत्र में अपनी सामरिक उपस्थिति दर्ज करने के लिये करेगा, और दक्षिण प्रशान्त और हिन्द महासागर में उसकी एक मजबूत उपस्थिति हो जायेगी।

इस जलमार्ग की विशिष्टता और उपयोगिता कितनी है यह इस बात से भी स्पष्ट होता है कि 1957 तक ब्रिटेन ने भी त्रिंकोमाली में अपना नौसेनिक अड्डा बनाया हुआ था और आज भी दिएगो गार्सिया में वह अमेरिका के साथ साझेदारी में एक महत्वपूर्ण द्वीप पर काबिज है। चीन की नज़र श्रीलंका पर 1990 से ही थी, लेकिन अब तमिल चीतों के सफ़ाये में मदद के बहाने से चीन ने श्रीलंका में पूरी तरह से घुसपैठ कर ली है, जब पश्चिमी देशों और भारत ने श्रीलंका को मदद देने से इंकार कर दिया तब चीन ने सभी को ठेंगे पर रखते हुए “लंका लॉजिस्टिक्स एण्ड टेक्नोलॉजीस” (जिसके मालिक श्रीलंकाई राष्ट्रपति के भाई गोतभाया राजपक्षे हैं) से श्रीलंका को खुलकर भारी हथियार दिये। अप्रैल 2007 में 40 करोड़ डॉलर के हथियारों के बाद छः F-7 विमान भी लगभग मुफ़्त में उसने श्रीलंका को दिये ताकि वह लिट्टे के हवाई हमलों से निपट सके। क्या इतना सब चीन मानवता के नाते कर रहा है? कोई मूर्ख ही यह सोच सकता है। खासकर तब, जबकि चीन ने पिछले दस साल में पाकिस्तान में ग्वादर बन्दरगाह, बांग्लादेश में चटगाँव बन्दरगाह और बर्मा में सिटवे बन्दरगाह को आधुनिक बनाने में अच्छा-खासा पैसा खर्च किया है। (खबर यहाँ देखें)

क्या अब किसी के कानों में खतरे की घंटी बजी? जरूर बजी, हरेक समझदार व्यक्ति इस खतरे को भाँप रहा है, सिवाय भारत की कांग्रेसी सरकार के, जिसकी विदेश नीति की विफ़लता का आलम यह है कि तिब्बत के बाद अब नेपाल के रास्ते चीन पूर्वी सीमा पर आन खड़ा हुआ है तथा देश के चारों ओर महत्वपूर्ण ठिकानों पर अपने बन्दरगाह बना चुका है। सिर्फ़ अमेरिका की चमचागिरी करना ही “विदेश नीति” नहीं होती, यह बात कौन हमारे नेताओं को समझायेगा? आखिर कब भारत एक तनकर खड़ा होने वाला देश बनेगा। तथाकथित मानवाधिकारों की परवाह किये बिना कब भारत “अपने फ़ायदे” के बारे में सोचेगा? जो कुछ चीन ने श्रीलंका में किया क्या हम नहीं कर सकते थे? बांग्लादेश और पाकिस्तान को छोड़ भी दें (क्योंकि वे इस्लामिक देश हैं) तब भी कम से कम श्रीलंका और बर्मा में भारत अपने “पैर” जमा सकता था, लेकिन हमारी सरकारों को कभी करुणानिधि का डर सताता है, कभी “मानवाधिकारवादियों” का, तो कभी “लाल झण्डे वालों” का…, देश का फ़ायदा (दूरगामी फ़ायदा) कैसे हो यह सोचने की फ़ुर्सत किसी के पास नहीं है। उधर महिन्द्रा राजपक्षे की चारों तरफ़ से मौज है, सन् 2005 से लेकर अब तक चीन उसे 1 अरब डॉलर की अतिरिक्त मदद दे चुका है, जबकि इसी अवधि में अमेरिका ने सिर्फ़ 7 करोड़ डॉलर और ब्रिटेन ने सिर्फ़ 2 करोड़ पौंड की मदद दी है। आतंकवाद से लड़ने के नाम पर राजपक्षे विश्व की सहानुभूति तो बटोर ही रहे हैं, माल भी बटोर रहे हैं। चीन ने उसे संयुक्त राष्ट्र में उठने वाली किसी भी आपत्ति पर कान न देने को कहा है, और श्रीलंका जानता है कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन का वरदहस्त होने के क्या मायने हैं, इसलिये वह भारत को भी “भाव” देने को तैयार नहीं हैं, जबकि इधर भारतीय नेता खामखा मुगालते में बैठे हैं कि श्रीलंका हमारी कोई भी बात सुनेगा।

इस सारे झमेले में एक “मिशनरी/चर्च” का कोण भी है, जिसकी तरफ़ अभी बहुत कम लोगों का ही ध्यान गया है। श्रीलंका में बरसों से जारी सिंहली-तमिल संघर्ष के दौरान जिस लिट्टे का जन्म हुआ, अब वह लिट्टे पुराना लिट्टे नहीं रहा। उसके प्रमुख प्रभाकरण भी ईसाई बन चुके और कई प्रमुख ओहदेदार भी। लिट्टे अपने सदस्यों का अन्तिम संस्कार भी नहीं करने देता बल्कि उन्हें कब्र में दफ़नाया जाता है। लिट्टे की सबसे बड़ी आर्थिक और शस्त्रास्त्रों की आपूर्ति करने वाली संस्था रही “पश्चिम का एवेंजेलिकल चर्च”। चर्च (खासकर नॉर्वे, जर्मनी, स्पेन) और पश्चिम के अन्य देशों के पैसों के बल पर तमिलनाडु और उत्तरी श्रीलंका को मिलाकर एक “तमिल ईलम” बनाने की योजना थी, फ़िलहाल जिस पर चीन की मेहरबानी से पानी फ़िर गया है। गत 5 साल में चर्च का सर्वाधिक पैसा भारत में जिस राज्य में आया है वह “तमिलनाडु” है। करुणानिधि भले ही अपने-आप को नास्तिक बताते रहे हों, लेकिन गले में पीला दुपट्टा ओढ़कर भी वे सदा चर्च की मदद को तत्पर रहे हैं। शंकराचार्य की गिरफ़्तारी हो या चेन्नै हाईकोर्ट में वकीलों द्वारा किया गया उपद्रव हो, हरेक घटना के पीछे द्रमुक का हिन्दू और ब्राह्मणविरोधी रुख स्पष्ट दिखा है। जबकि चीन के लिये अपना फ़ायदा अधिक महत्वपूर्ण है, “चर्च” वगैरह की शक्ति को वह जूते की नोक पर रखता है, इसलिये उसे इस बात से कोई मतलब नहीं कि श्रीलंका में चल रहा संघर्ष असल में “बौद्ध” और “चर्च” का संघर्ष था। पश्चिमी देशों की श्रीलंका में मानवाधिकार आदि की “चिल्लपों” इसी कारण है कि चर्च का काफ़ी पैसा पानी में चला गया, जबकि श्रीलंका सरकार का रुख “कान पर बैठी मक्खी उड़ाने” जैसा इसलिये है, क्योंकि वह जानता है कि चीन उसके साथ है।

फ़िलहाल तो भारत सरकार एक मूक दर्शक की भूमिका में है (जैसा कि वह अधिकतर मामलों में होती है), चाहे करुणानिधि खुलेआम तमिलनाडु में “तमिल ईलम” की स्थापना की घोषणा कर रहे हों, वाइको सरेआम “खून की नदियाँ” बहाने की बात कर रहे हों। छोटी-मोटी पार्टियाँ जनता को उकसाकर भारतीय सेना के ट्रकों को लूट रही हैं, जला रही हैं… लेकिन शायद केन्द्र की कांग्रेस सरकार करुणानिधि या जयललिता से भविष्य में होने वाले राजनैतिक समीकरण पर ध्यान टिकाये हुए है, जयललिता को पटाने में लगी है, फ़िर चाहे “देशहित” जाये भाड़ में।

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केन्द्र सरकार द्वारा 10 रुपये का नया सिक्का जारी किया गया है, जो दो धातुओं से मिलकर बना है तथा जिस पर एक तरफ़ “ईसाई क्रूसेडर क्रॉस” का निशान बना हुआ है। हालांकि इस सिक्के पर सन् 2006 खुदा हुआ है, लेकिन हमें बताया गया है कि यह हाल ही में जारी किया गया है। इससे पहले भी सन् 2006 में ही 2 रुपये का जो सिक्का जारी किया गया था, उसमें भी यही “क्रॉस” का निशान बना हुआ था। “सेकुलरों के प्रातः स्मरणीय” नरेन्द्र मोदी ने उस समय गुजरात के चुनावों के दौरान इस सिक्के की खूब खिल्ली उड़ाई थी और बाकायदा लिखित में रिजर्व बैंक और केन्द्र सरकार का विरोध किया, तब वह सिक्का वापस लेने की घोषणा की गई। लेकिन सन् 2009 आते-आते फ़िर से नौकरशाही को फ़िर से वही बेशर्मी भरे “सेकुलर दस्त” लगे और दस रुपये का नया सिक्का जारी कर दिया गया, जिसमें वही क्रूसेडर क्रॉस खुदा हुआ है।



दूसरा फ़ोटो – एक रुपये के सिक्के में एक लकीर वाला क्रॉस तथा पुराने दो रुपये के सिक्के का जिसमें दोनाली क्रॉस दर्शाया गया है (जो मोदी द्वारा विरोध के बाद बन्द किया गया)



इसके बाद जो एक और दो रुपये के सिक्के जारी किये गये उसमें एक रुपये के सिक्के पर “अंगूठा दिखाते हुए” (Thumbs up) तथा दो रुपये के सिक्के पर “दो उंगलियों वाली विजयी मुद्रा” (Victory Sign) के चित्र खुदे हुए हैं। (इन सिक्कों पर ये “ठेंगा” किसे दिखाया जा रहा है, और “विक्ट्री साइन” किसे, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है)।


एक रुपये का नया सिक्का जिसमें “अंगूठा” दिखाया जा रहा है।

अब आते हैं मूल बात पर – सन् 2005 वाले एक रुपये के सिक्के में जो क्रॉस दिखाया गया था वह साफ़-साफ़ क्रिश्चियन क्रॉस था, लेकिन जब हल्ला मचा तो सिक्का वापस ले लिया गया, लेकिन फ़िर से 2006 में जारी दो रुपये के सिक्के पर वही क्रॉस “थोड़े से अन्तर” के साथ आ गया। इस बार क्रॉस को दोहरी लाइनों वाला कर दिया गया, फ़िर से विरोध हुआ तो सिक्का वापस लिया गया, अब पुनः दस रुपये के सिक्के पर वही क्रॉस दिया गया है…। देश में इस्लामीकरण को बढ़ावा देना हो या धर्म परिवर्तन को, यह एक आजमाया हुआ सेकुलर तरीका है, पहले चुपके से कोई हरकत कर दी जाती है, एकाध-दो बार विरोध होता है, लेकिन कुछ समय बाद वही हरकत दोहरा दी जाती है, और फ़िर धीरे से वह परम्परा बन जाती है। हिन्दू संगठन कोई विरोध करें तो उन्हें “साम्प्रदायिक” घोषित कर दिया जाता है, बिके हुए मीडिया के सहारे “वर्ग विशेष” के एजेण्डे को लगातार आगे बढ़ाया जाता है। सिक्कों पर क्रूसेडर क्रॉस रचने के पीछे किस चापलूस मंत्री या सरकारी अधिकारी का हाथ है यह भी एक जाँच का विषय है। क्या सोनिया गाँधी का कोई ऐसा “सुपर-चमचा” अधिकारी है जो किसी “पद्म पुरस्कार” या अपनी पत्नी द्वारा चलाये जा रहे NGO को मिलने वाली भारी आर्थिक मदद के बदले में “ईसाईकरण” को बढ़ावा देने में लगा है? क्योंकि इस प्रक्रिया को सन् 2004 के बाद ही तेजी मिली है, अर्थात जबसे “माइनो सरकार” स्थापित हुई। जो भी हो, यह अपने देश की संस्कृति और परम्परा पर अभिमान करने वालों के लिये एक अपमानजनक बात तो है ही।

लुई द पायस द्वारा जारी सोने का सिक्का

दो और दस रुपये के सिक्के पर जो क्रूसेडर क्रॉस खुदा हुआ है वह असल में फ़्रांस के शासक लुई द पायस (सन् 778 से सन् 840) द्वारा जारी किये गये सोने के सिक्के में भी है। लुई का शासनकाल फ़्रांस में सन् 814 से 840 तक रहा, और उसी ने इस क्रूसेडर क्रॉस वाले सिक्के को जारी किया था। (लुई द पायस के सिक्के का चित्र देखें) अब चित्र में विभिन्न प्रकार के “क्रॉस” देखिये जिसमें सबसे अन्तिम आठवें नम्बर वाला क्रूसेडर क्रॉस है जिसे दस रुपये के नये सिक्के पर जारी किया है, जिसे सन् 2006 में ही ढाला गया है, लेकिन जारी अभी किया।


विभिन्न तरह के क्रॉस

जैसा कि चित्र में दिखाया गया है इस क्रूसेडर क्रॉस में चारों तरफ़ आड़ी और खड़ी लाइनों के बीच में चार बिन्दु हैं। RBI अधिकारियों का एक हास्यापद तर्क है कि यह चिन्ह असल में देश की चारों दिशाओं का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें चारों बिन्दु एकता को प्रदर्शित करते हैं, तथा “अंगूठे” और “विक्ट्री साइन” का उपयोग नेत्रहीनों की सुविधा के लिये किया गया है… अर्थात सूर्य, कमल, गेहूँ की बालियाँ, अशोक चक्र, सिंह आदि देश की एकता और संस्कृति को नहीं दर्शाते? तथा इसके पहले जो भी सिक्के थे उन्हें नेत्रहीन नहीं पहचान पाते थे? किसे मूर्ख बना रहे हैं ये?

जबकि इस क्रूसेडर क्रॉस के चारों बिन्दुओं का मतलब कुछ और है – जैसा कि सभी जानते हैं, “क्रूसेड (Crusade)” का मतलब होता है “धर्मयुद्ध”। नवीं शताब्दी के उन दिनों में “बाइज़ेन्टाइन शासनकाल” में क्रॉस के चारों तरफ़ स्थित इन चारों बिन्दुओं को को “बेसेण्ट” (Besants) कहते थे, Besant का ही दूसरा नाम था “सोलिडस” (Solidus), और यही चार बिन्दुओं वाले सोने के सिक्के नवीं शताब्दी में लुई तृतीय ने जारी किये थे। रोमन साम्राज्य द्वारा यूरोप में भी 15वीं शताब्दी में इन चिन्हों वाले सिक्के चलन में लाये गये थे, यह क्रॉस कालान्तर में “जेरुसलेम क्रॉस” के नाम से जाना गया। यह चारों बिन्दु आगे चलकर चार छोटे से क्रॉस में तब्दील हुए, जो कि यरूशलम से प्रारम्भ होकर धरती के चार कोनों में स्थित चार “एवेंजेलिस्ट गोस्पेल” (सिद्धान्त) के रूप में भी माने गये, जो कि क्रमशः “Gospel of Matthew”, “Gospel of Mark”, “Gospel of Luke” तथा “Gospel of John” हैं, जबकि बड़ा वाला क्रॉस स्वयं यीशु का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे में रिज़र्व बैंक के अधिकारियों के “एकता” वाला तर्क बेहद थोथा और बोदा है, यह बात हमारे सदाबहार “सेकुलर” नहीं समझेंगे और हिन्दू समझना नहीं चाहते।

माइनो सरकार जबसे सत्ता में आई है, भारतीय संस्कृति के प्रतीक चिन्हों पर एक के बाद आघात करती जा रही है। सिक्कों से भारत माता, भारत के नक्शे और अन्य राष्ट्रीय महत्व के चिन्ह गायब करके “क्रॉस”, “अंगूठा” और “विक्ट्री साइन” के मूर्खतापूर्ण प्रयोग किये गये हैं, केन्द्रीय विद्यालय के प्रतीक चिन्ह “उगते सूर्य के साथ कमल पर रखी पुस्तक” को भी बदल दिया गया है, सरकारी कागज़ों, दस्तावेजों और वेबसाईटों से धीरे-धीरे “सत्यमेव जयते” हटाया जा रहा है, दूरदर्शन के “स्लोगन” “सत्यं शिवम् सुन्दरम्” में भी बदलाव किया गया है, बच्चों को “ग” से “गणेश” की बजाय “गधा” पढ़ाया जा रहा है, तात्पर्य यह कि भारतीय संस्कृति के प्रतीक चिन्हों को समाप्त करने के लिये धीरे-धीरे अन्दर से उसे कुतरा जा रहा है, और “हिन्दू” जैसा कि वे हमेशा से रहे हैं, अब भी गहरी नींद में गाफ़िल हैं। बहरहाल, यह तो खैर हिन्दुओं की शोकान्तिका है ही कि 60 में 50 साल तक एक “मुस्लिम-ईसाई परिवार” का शासन इस देश पर रहा।

किसी कौम को पहले मानसिक रूप से खत्म करने के लिये उसके सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीकों पर हमला बोला जाता है, उसे सांस्कृतिक रूप से खोखला कर दिया जाता है, पहले अपने “सिद्धान्त” ठेल दिये जाते हैं, दूसरों की संस्कृति की आलोचना करके, उसे नीचा दिखाकर एक अभियान चलाया जाता है, इससे धर्म परिवर्तन का काम आसान हो जाता है और वह कौम बिना लड़े ही आत्मसमर्पण कर देती है, क्योंकि उसकी पूरी एक पीढ़ी पहले ही मानसिक रूप से उनकी गुलाम हो चुकी होती है। वेलेंटाइन-डे, गुलाबी चड्डी, पब संस्कृति, अंग्रेजियत, कम कपड़ों और नंगई को बढ़ावा देना, आदि इसी “विशाल अभियान” का एक छोटा सा हिस्सा भर हैं।

किसी भी देश के सिक्के एक ऐतिहासिक धरोहर तो होते ही हैं, उस देश की संस्कृति और वैभव को भी प्रदर्शित करते हैं। पहले एक, दो और पाँच के सिक्कों पर कहीं गेहूँ की बालियों के, भारत के नक्शे के, अशोक चिन्ह के, किसी पर महर्षि अरविन्द, वल्लभभाई पटेल आदि महापुरुषों के चेहरे की प्रतिकृति, किसी सिक्के पर उगते सूर्य, कमल के फ़ूल अथवा खेतों का चिन्ह होता था, लेकिन ये “ईसाई क्रूसेडर क्रॉस”, “अंगूठा” और “विक्ट्री साइन” दिखाने वाले सिक्के ढाल कर सरकार क्या साबित करना चाहती है, यह अब स्पष्ट दिखाई देने लगा है। इस देश में “हिन्दू-विरोधियों” का एक मजबूत नेटवर्क तैयार हो चुका है, जिसमें मीडिया, NGO, पत्रकार, राजनेता, अफ़सरशाही सभी तबकों के लोग मौजूद हैं, तथा उनकी सहायता के लिये कुछ प्रत्यक्ष और कुछ अप्रत्यक्ष लोग “सेकुलर” अथवा “कांग्रेसी-वामपंथी” के नाम से मौजूद हैं।

इन सिक्कों के जरिये आने वाली पीढ़ियों के लिये यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि, सन् 2006 के काल में भारत पर “इटली की एक ईसाई महारानी” राज्य करती थी… तथा भारत की जनता में ही कुछ “जयचन्द” ऐसे भी थे जो इस महारानी की चरणवन्दना करते थे और कुछ “चारण-भाट” उसके गीत गाते थे, जिन्हें “सेकुलर” कहा जाता था।

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आखिर लोकसभा के बहुप्रतीक्षित नतीजे आ ही गये, और अनपेक्षित रूप से कांग्रेसनीत यूपीए लगभग बहुमत में आ चुका है और भाजपानीत एनडीए को जनता ने नकार दिया है। यह पोस्ट लिखते समय (सुबह 11.30 बजे) हालांकि नतीजे पूरे नहीं आये, लेकिन तात्कालिक विश्लेषण करने के लिये रुझान ही पर्याप्त हैं।

कांग्रेस का मानना है नतीजे आश्चर्यजनक रहे हैं, यही हाल भाजपा का भी है। किसी ने भी नहीं सोचा था कि इतनी महंगाई (आम आदमी के रोज़मर्रा के जीवन को छूने वाला एक मुद्दा) तथा भयानक आतंकवाद (“एलीट क्लास” का मुद्दा) जैसे मुद्दों के बावजूद जनता कांग्रेस-यूपीए को जितायेगी, लेकिन यह हुआ। क्यों हुआ, कैसे हुआ इसको लेकर माथापच्ची तो अगले 5 साल तक चलती ही रहेगी।

यदि सरसरी तौर पर विश्लेषण किया जाये तो भाजपा की हार के कुछ कारण दिखाई देते हैं, वे इस प्रकार हैं –

1) लालकृष्ण आडवाणी की स्वीकार्यता जनता में नहीं होना,

2) कम वोटिंग प्रतिशत, तथा

3) मीडिया का एकतरफ़ा सतत चलने वाला भाजपा-विरोधी अभियान।

1) आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना शायद एक गलत कदम था, उनकी बजाय नरेन्द्र मोदी या सुषमा स्वराज को यदि ठीक से “मार्केटिंग” करके मैदान में उतारा जाता तो युवा वोटर का रुझान भाजपा को अधिक मिलता। सुषमा स्वराज को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने से महिलाओं के वोट लेने में भी आसानी हो सकती थी, क्योंकि उनकी “इमेज” साफ़-सुथरी और एक परम्परागत भारतीय स्त्री वाली है, इसी प्रकार नरेन्द्र मोदी को गुजरात के विकास का चित्र सामने रखकर उन पर दाँव खेला जा सकता था।

2) कम वोटिंग प्रतिशत – जो वर्ग सबसे अधिक सरकार की आलोचना करता है, अखबारों में, टीवी पर, ड्राइंग रूम में उसी वर्ग ने भीषण गर्मी के चलते मतदान में सबसे कम हिस्सा लिया। सारे देश का प्रतिशत देखा जाये तो कुल 41% प्रतिशत मतदान हुआ, इसका अर्थ यह है कि बाकी के 49% लोग “पप्पू” बने (जानबूझकर बने)। एक आम मतदाता ने तो अपना वोट बराबर डाला, लेकिन मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा पप्पू बना, इसके चलते भाजपा का परम्परागत वोटबैंक घर में (एसी की ठण्डी हवा में) ही बैठा रहा, नतीजा सबसे सामने है। इस 41% वोटिंग का एक मतलब यह भी है कि देश पर ऐसी पार्टी शासन करेगी जिसे असल में देश के सिर्फ़ 22% लोग चाहते हैं।

3) मीडिया की भूमिका – जैसा कि पहले भी कई बार कहा गया है देश में मीडिया पूरी तरह से भाजपा-विरोधी मानसिकता लिये हुए है और भाजपा के विरोध में जहर उगलने के लिये तैयार बैठा रहता है। मीडिया ने हर समय, प्रतिदिन चौबीसों घण्टे भाजपा की नकारात्मक छवि पेश की। भले ही पढ़े-लिखे वर्ग पर मीडिया का असर कम होता है, लेकिन रोज-ब-रोज़ टीवी पर सोनिया-राहुल-कांग्रेस का गुणगान देख-देखकर जनता के मन में कहीं न कहीं तो “सॉफ़्ट कॉर्नर” बन ही जाता है, लेकिन आश्चर्य यह है कि इतनी भीषण महंगाई के बावजूद देश की जनता ने कांग्रेस को कैसे चुना? आखिर क्या सोच रही होगी मतदाता के मन में?

बहरहाल, पोस्ट खत्म होते-होते (दोपहर 1 बजे) लगभग स्थिति साफ़ हो चुकी है कि यूपीए ही सरकार बनायेगा। इस सारे झमेले में सिर्फ़ एक बात ही सकारात्मक हुई है वह ये कि अब आगामी सरकार पर “वामपंथी” नामक ढोंग का काला साया नहीं रहेगा और शायद मनमोहन सिंह और खुलकर काम कर पायेंगे। भाजपा में भी अब आत्ममंथन का दौर चलेगा और यदि आडवाणी अपने शब्दों पर खरे उतरते हैं तो उन्हें सन्यास ले लेना चाहिये। लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि भाजपा-संघ-हिन्दुत्ववादी कार्यकर्ताओं को हतबल होकर बैठ जाना चाहिये। निराशा है, उदासी है लेकिन ऐसा तो लोकतन्त्र में होता ही रहता है।

माना कि “हिन्दुओं” को एकत्र करने, उनमें “राष्ट्रवाद” जगाने, देश को इस्लामीकरण के खतरे समझाने, अफ़ज़ल-कसाब को पार्टी मनाने देने, “मिशनरी” के बढ़ते वर्चस्व को समझाने में हम नाकाम रहे। क्या कांग्रेस को सत्ता मिल जाने से देश के समक्ष उपस्थित समस्याओं का समाधान हो गया है? क्या हिन्दुओं और हिन्दुत्व के चारो ओर मंडरा रहे संकेत मद्धिम हो गये, हरगिज़ नहीं। आज जनता इस बात को समझने में नाकाम रही है, तो हमारा यह कर्तव्य है कि उसे समझाने का प्रयास लगातार करते रहें…

“रुके न तू… थके न तू…” की तर्ज पर हमें फ़िर से उठ खड़े होना है, निराश-हताश होने से काम नहीं चलेगा… अभी बहुत काम बाकी है, यह तो सिर्फ़ एक पड़ाव है और ऐसी ठोकरें तो लगती ही रहती हैं… आखिर 1984 में 400 से अधिक सीटों पर जीतने वाली कांग्रेस को 140 तक ले ही आये थे, और 1984 में हम 2 थे और फ़िर 189 तक पहुँचे भी थे, तो फ़िर घबराना कैसा? यह उतार-चढ़ाव तो आते ही रहेंगे… लक्ष्य पर निगाह रखो और पुनः उठ खड़े हो, चलो…
किसी भी देश की सार्वभौमिकता, एकता और अखण्डता के साथ-साथ उस देश का “राष्ट्रीय स्वाभिमान” या राष्ट्र-गौरव भी एक प्रमुख घटक होता है। भारत की अब तक यह नीति रही है कि “हमारे अन्दरूनी मामलों में कोई भी देश, संस्था या अन्तर्राष्ट्रीय संगठन हस्तक्षेप नहीं कर सकता…”, लेकिन सोनिया सरकार ने इस नीति को उलट दिया है। अमेरिका की एक संस्था है “USCIRF” अर्थात US Commission on International Religious Freedom, इस संस्था को जून 2009 में पहली बार भारत का दौरा करने की अनुमति “सोनिया गाँधी सरकार” द्वारा प्रदान कर दी गई है। यह संस्था (कमीशन) अमेरिकी कांग्रेस द्वारा बनाई गई है जिसे अमेरिकी सरकार द्वारा पैसा दिया जाता है। इस संस्था का गठन 1998 में अमेरिका के एक कानून International Religious Freedom Act 1998 के तहत किया गया है, और 1998 से लगातार यह संस्था भारत पर दौरा करने का दबाव बनाये हुए थी, लेकिन भारत की सरकार ने उसे अनुमति और इसके सदस्यों को वीज़ा नहीं दिया। भारत के अन्दरूनी मामलों में दखल-अंदाजी को बर्दाश्त न करने की इस नीति को NDA (1999-2004) और UPA (2004-2009) की सरकारों ने बनाये रखा, जो कि नरसिम्हाराव, देवेगौड़ा और गुजराल सरकार की भी नीति रही।

आईये देखें कि यह अमेरिकी संस्था आखिर करती क्या है? इस अमेरिकी संस्था का गठन अमेरिकी कानूनों के अन्तर्गत हुआ है, लेकिन जिस तरह “दुनिया का खून चूसकर खुद भी और दुनिया को भी आर्थिक मन्दी में फ़ँसाने वाला अमेरिका” अभी भी सोचता है कि वह “विश्व का चौधरी” है, ठीक वैसे ही यह संस्था USCIRF समूचे विश्व में “धार्मिक स्वतन्त्रता” और मानवाधिकारों का हनन कहाँ-कहाँ हो रहा है यह देखती है। भारत में “धार्मिक स्वतन्त्रता” और “मानवाधिकारों” का हनन किस सम्प्रदाय पर ज्यादा हो रहा है? जी हाँ, बिलकुल सही पहचाना आपने, सिर्फ़ और सिर्फ़ “ईसाईयों” पर। वैसे तो कहने के लिये “मुस्लिमों” पर भी भारत में “भारी अत्याचार”(??) हो रहे हैं, लेकिन उनकी फ़िक्र करने के लिये इधर पहले से ही बहुत सारे “सेकुलर” मौजूद हैं, और अमेरिका को वैसे भी मुस्लिमों से विशेष प्रेम नहीं है, सो वह इस संस्था के सदस्यों को पूरे विश्व में सिर्फ़ “ईसाईयों” पर होने वाले अत्याचारों की रिपोर्ट लेने भेजता है।

इस संस्था के भारत दौरे पर पहले विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी नाखुशी जता चुके हैं और दबे स्वरों में इसका विरोध भी कर चुके हैं, लेकिन चूंकि मामला “ईसाईयों” से जुड़ा है और जब “महारानी” की अनुमति है तो विदेश नीति और देश का स्वाभिमान जाये भाड़ में, किसे परवाह है?

इस वर्ष जून में इस संस्था का भारत दौरा प्रस्तावित हो चुका है। इसके सदस्य भारत में कहाँ का दौरा करेंगे? इस आसान सवाल पर कोई ईनाम नहीं मिलेगा, क्योंकि वे गुजरात में डांग, गोधरा तथा उड़ीसा में कंधमाल का दौरा करने वाले हैं। नवीन पटनायक तो शायद इसके सवाल-जवाबों से बच जायेंगे, क्योंकि भाजपा का साथ छोड़ते ही वे “शर्मनिरपेक्ष” बन गये हैं, लेकिन USCIRF के सदस्य डांग्स और गोधरा का दौरा करेंगे तथा नरेन्द्र मोदी और भाजपा से सवाल-जवाब करेंगे। ये अमेरिकी संस्था हमें बतायेगी कि “धार्मिक स्वतन्त्रता” और मानवाधिकार क्या होता है, तथा इसके “निष्पक्ष महानुभाव सदस्य”(?) भारत सरकार के अधिकृत आँकड़ों को दरकिनार करते हुए अपनी खुद की तैयार की हुई रिपोर्ट अमेरिकी कांग्रेस को पेश करेंगे।

इस समिति के सदस्यों के “असीमित ज्ञान” के बारे में यही कहा जा सकता है कि गत वर्ष पेश की गई अपनी आंतरिक रिपोर्ट में इन्होंने नरेन्द्र मोदी को “गुजरात राज्य का गवर्नर” (मुख्यमंत्री नहीं) बताया है, और नरेन्द्र मोदी की स्पेलिंग कई जगह “Nahendra” लिखी गई है, और यह स्थिति तब है जबकि इस संस्था के पास 17 सदस्यों का “दक्षिण एशिया विशेषज्ञों” का एक शोध दल है जो इलाके में धार्मिक स्वतन्त्रता हनन पर नज़र रखता है।

किसी मूर्ख को भी साफ़ दिखाई दे रहा है कि यह साफ़ तौर पर भारत में खुल्लमखुल्ला “अतिक्रमण” है, एक प्रकार का अनुचित हस्तक्षेप है। भारत के अन्दरूनी मसलों पर जाँच करने या दौरा करके अपनी रिपोर्ट अमेरिकी कांग्रेस को पेश करने का इस समिति को क्या हक है? क्या यह एक सार्वभौम राष्ट्र का अपमान नहीं है? यदि एक मिनट के लिये कांग्रेस-भाजपा या सेकुलर-साम्प्रदायिक के मतभेदों को अलग रख दिया जाये तो यह कृत्य प्रत्येक देशभक्त भारतीय को निश्चित ही यह अपमानजनक लगेगा, लेकिन बुद्धिजीवियों की एक कौम है “सेकुलर”… शायद उन्हें यह अपमानजनक या आपत्तिजनक न लगे, क्योंकि इस कौम को उस वक्त भी “बहुत खुशी” महसूस हुई थी, जब अमेरिका ने नरेन्द्र मोदी को वीज़ा देने से इन्कार कर दिया था। उस वक्त इस सेकुलर कौम के लिये नरेन्द्र मोदी, भारत नामक सबसे बड़े लोकतन्त्र के लगातार तीसरी बार निर्वाचित मुख्यमंत्री नहीं थे, बल्कि एक “हिन्दू” थे। सेकुलरों का मानना है कि नरेन्द्र मोदी को वीज़ा न देना “भारत का अपमान” नहीं था, बल्कि एक “हिन्दू” का अपमान था, इससे ये लोग बहुत खुश हुए थे, ये नज़रिया है इन लोगों का देश और खासकर “हिन्दुओं” के प्रति। नरेन्द्र मोदी को वीज़ा न देने सम्बन्धी भारत गणराज्य के अपमान का ऊँची आवाज़ में विरोध करना तो दूर, सेकुलरिस्टों ने दबी आवाज़ में भी अमेरिका के प्रति नाराज़गी तक नहीं दिखाई, जबकि यही लोग देवी-देवताओं की नंगी तस्वीरें बनाने वाले एमएफ़ हुसैन के भारत लौटने के लिये ऐसे बुक्का फ़ाड़ रहे हैं, जैसे इनका कोई “सगा-वाला” इनसे बिछुड़ गया हो, जबकि तसलीमा नसरीन के साथ सरेआम प्रेस कांफ़्रेंस में मारपीट करने वाले हैदराबाद के एक “सेकुलर नेता” की कोई आलोचना नहीं होती… इनके दोगलेपन की कोई हद नहीं है।

बहरहाल, बात हो रही थी अमेरिकी समिति USCIRF की, इस समिति की निगाहे-करम कुछ खास देशों पर हमेशा रही है, जैसे क्यूबा, रूस, चीन, वियतनाम, म्यांमार, उत्तर कोरिया आदि (और ये देश अमेरिका को कितने “प्रिय” हैं यह अलग से बताने की आवश्यकता नहीं है)। ये और बात है कि इस समिति को क्यूबा सरकार ने देश में घुसने की अनुमति नहीं दी, चीन सरकार ने भी लगातार तीन साल तक लटकाने के बाद कड़ी शर्तों के बाद ही इन्हें सन् 2005 में देश में घुसने दिया था और इसकी रिपोर्ट आते ही चीन ने उसे “विद्वेषपूर्ण कार्यवाही” बता दिया था। वियतनाम ने 2002 में इसकी रिपोर्ट सिरे से ही खारिज कर दी थी। भारत के बारे में इस संस्था की रिपोर्ट इनकी वेबसाईट पर देखी जा सकती है। USCIRF धर्म परिवर्तन विरोधी कानून बनाने वालों के खिलाफ़ खास “लॉबी” बनाती है, यह समिति विभिन्न देशों को अलग-अलग “कैटेगरी” में रखती है, जैसे – Countries of Particular Concern (CPC), Country Watch List (CWL) तथा Additional Countries Monitored (ACM)। भारत का दर्जा फ़िलहाल ACM में रखा गया है, जहाँ “धार्मिक स्वतन्त्रता” (यानी धर्मान्तरण की छूट) को खतरा उत्पन्न होने की आशंका है, श्रीलंका भी इसी श्रेणी में रखा गया है, जहाँ हाल ही में चीन की मदद से श्रीलंका ने “चर्च” की तमिल ईलम बनाने की योजना को ध्वस्त कर दिया है।

सवाल यह भी उठता है कि क्या यह अमेरिकी कमीशन केरल भी जायेगा, जहाँ ननों के साथ बलात्कार और हत्याएं हुई हैं? क्या यह कमीशन कश्मीर भी जायेगा जहाँ से हिन्दुओं को बेदखल कर दिया गया है? क्या यह कमीशन पाकिस्तान भी जायेगा जहाँ सिखों से जज़िया न मिलने की सूरत में उन पर अत्याचार हो रहे हैं? जब यह समिति कंधमाल जायेगी, तो स्वामी लक्षमणानन्द सरस्वती की हत्या क्यों हुई, इस पर भी कोई विचार करेगी? क्या यह समिति गुजरात के दंगों में 200 से अधिक हिन्दू “भी” क्यों मारे गये, इसकी जाँच करेगी? ज़ाहिर है कि यह ऐसा कुछ नहीं करेगी। असल में दोगले सेकुलर, इस समिति से अपनी “पसन्दीदा” रिपोर्ट चाहते हैं, इसका एक उदाहरण यह भी है कि गत मार्च में ऐसी ही एक और मानवाधिकार कार्यकर्ता पाकिस्तान की अस्मां जहाँगीर को भारत सरकार ने गुजरात का दौरा करने की अनुमति दी थी (अस्मां जहाँगीर यूएन मानवाधिकार आयोग की विशेष सदस्या भी हैं)। उम्मीदों के विपरीत नरेन्द्र मोदी ने असमां जहाँगीर का स्वागत किया था और उन्हें सभी सुविधायें मुहैया करवाई थीं, तब सभी “मानवाधिकारवादी” और “सेकुलरिस्ट” लोगों ने असमां जहाँगीर की इस बात के लिये आलोचना की कि उन्हें नरेन्द्र मोदी से नहीं मिलना चाहिये था। यानी कि जो भी रिपोर्ट उनकी पसन्द की होगी वही स्वीकार्य होगी, अन्यथा नहीं। इसलिये इस अमेरिकी समिति की “धर्मान्तरण” और “भारत में धार्मिक स्वतन्त्रता” सम्बन्धी रिपोर्ट क्या होगी, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। यह देखना रोचक होगा कि “हिन्दू हृदय सम्राट” नरेन्द्र मोदी भी आडवाणी की तरह “सेकुलरता” का ढोंग करके USCIRF के गोरे साहबों का स्वागत करते हैं या सच्चे हिन्दू देशभक्त की तरह उन्हें लतियाकर बेरंग लौटाते हैं, यह भी देखना मजेदार होगा कि ताजा-ताजा सेकुलर बने पटनायक उन्हें उड़ीसा के आदिवासी इलाकों में चल रही “हरकतों” की असलियत बतायेंगे या नहीं।

देश पर हो रहे इस “अनैतिक अतिक्रमण” को केन्द्र सरकार का पूर्ण समर्थन हासिल है। क्या इस प्रकार की गतिविधि देश की अखण्डता के साथ खिलवाड़ नहीं है? काल्पनिक ही सही लेकिन भविष्य में अगले कदम के तौर पर हो सकता है कि अमेरिका कहे कि आपसे कश्मीर नहीं संभलता इसलिये हम अपनी सेना वहाँ रखना चाहते हैं। क्या यह हमें मंजूर होगा? लेकिन यहाँ मामला सिर्फ़ और सिर्फ़ येन-केन-प्रकारेण भाजपा-मोदी-संघ को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करके ओछी राजनीति करने का है, जबकि उसकी बहुत बड़ी कीमत यह देश चुकायेगा। इन्हें यह छोटी सी बात समझ नहीं आती कि देश की घरेलू राजनीति में भले ही कांग्रेस-भाजपा और सेकुलर-साम्प्रदायिक में घोर मतभेद हों, लेकिन उस मतभेद का पूरी दुनिया के सामने इस तरह से भौण्डा प्रदर्शन करने की कोई जरूरत नहीं है, सवाल है कि “सेकुलर” राजनीति बड़ी है या देश का स्वाभिमान? अल्पसंख्यकों को खुश करने और हिन्दुओं की नाक मोरी में रगड़ने के लिये सेकुलरिस्ट किस हद तक जा सकते हैं यह अगले 5 साल में हमें देखने मिलेगा, क्योंकि आखिर इस देश की जनता ने “स्थिर सरकार”, “रोजी-रोटी देने वाली सरकार”, “गरीबों का साथ देने वाली सरकार” को चुन लिया है…

(खबरों के स्रोत के लिये यहाँ तथा यहाँ चटका लगाया जा सकता है…)



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अमेरिका के एक रिटायर्ड प्रोफ़ेसर साईंनाथ ने यह दावा किया है कि इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों से छेड़छाड़ करके उनके द्वारा धोख़ाधड़ी की जा सकती है। श्री साईंनाथ ने सन् 2004 के चुनावों के दौरान इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को लेकर एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगाई थी, उन्हें शक था कि शायद NDA लोकसभा चुनावों में इन मशीनों द्वारा बड़े पैमाने पर धांधली कर सकता है। हालांकि कांग्रेस के चुनाव जीतने की दशा में उन्होंने अपना केस वापस ले लिया था। साईनाथ ने अमेरिका में सम्पन्न हुए चुनावों में भी इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी कैसे की जा सकती है इसका प्रदर्शन किया था।

इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों मे गड़बड़ी करना एक “बच्चों का खेल” है, यह बताते हुए प्रोफ़ेसर साईनाथ कहते हैं (रिपोर्ट यहाँ देखें http://www.indianexpress.com/oldStory/45296/) कि EVM (Electronic Voting Machines) को नियन्त्रित करने वाली कम्प्यूटर चिप को एक विशिष्ट तरीके से प्रोग्राम करके इस प्रकार से सेट किया जा सकता है कि उस मशीन में पड़ने वाले वोटों का एक निश्चित प्रतिशत एक पूर्व-निर्धारित उम्मीदवार के खाते में ही जाये, चाहे कोई भी बटन दबाया गया हो। इस प्रकार की और भी गड़बड़ियाँ मशीन में पैदा की जा सकती हैं। मशीनों में की गई इस प्रकार की छेड़छाड़ को पकड़ना आसान नहीं होता, पार्टियों के “लगभग अनपढ़” चुनाव एजेण्टों के लिये तो बिलकुल भी नहीं। उल्लेखनीय है कि EVM उम्मीदवारों के क्रमवार नम्बर के आधार पर वोटिंग की गणना करती है। नामांकन हो चुकने के बाद यह तय होता कि किस क्षेत्र की मशीन में किस पार्टी के किस उम्मीदवार का नाम कौन से क्रम पर रहेगा। प्रोफ़ेसर साईनाथ के अनुसार नाम वापसी के बाद दो सप्ताह का समय बीच में होता है, इस बीच में मशीनों में कम्प्यूटर चिप की जगह “Pre-Coded Malicious” चिप स्थापित की जा सकती हैं, अथवा सम्भव हुआ तो पूरी की पूरी मशीन भी नकली स्थापित की जा सकती है और यह निश्चित किया जा सकता है कि कौन सी मशीन किस इलाके में जायेगी।

(श्री साईनाथ 1964 की बैच के आईआईटी इंजीनियर हैं, फ़िलहाल अमेरिका में कम्प्यूटर साइंस के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर हैं, और “Better Democracy Forum” नाम की संस्था के अध्यक्ष भी हैं)।

इस प्रक्रिया में चुनाव अधिकारी (जो कि अधिकतर सत्ताधारी पार्टी के इशारों पर ही नाचते हैं) की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे में एक गम्भीर सवाल उठता है कि क्या इन मशीनों का “चावलाईकरण” किया जा सकता है? “चावलाईकरण” की उपमा इसलिये, क्योंकि चुनावों में धांधली का कांग्रेस का इतिहास बहुत पुराना है। ऊपर से इस पार्टी को नवीन चावला जैसे “स्वामीभक्त” चुनाव आयुक्त भी प्राप्त होते रहे हैं (इसका एक और सबूत, मान्य संवैधानिक परम्पराओं के विपरीत, सेवानिवृत्ति के तत्काल बाद पूर्व चुनाव आयुक्त एम एस गिल को मंत्रीपद की रेवड़ी दिया जाना भी है)।

शिवसेना ने चुनाव आयोग को इन वोटिंग मशीनों द्वारा धांधली किये जाने की आशंका व्यक्त करते हुए इनकी जाँच की माँग करते हुए लिखित में शिकायत की है, जिसमें बताया गया है कि दक्षिण मुम्बई से शिवसेना के लोकप्रिय उम्मीदवार मोहन रावले को कई वोटिंग मशीनों पर शक है, क्योंकि उन्हें शिवसेना के कुछ मजबूत माने जाने वाले इलाकों में से कई मशीनों में 5 या 7 वोट ही मिले (क्या मोहन रावले अचानक अपने ही गढ़ में इतने अलोकप्रिय हो गये?)। रावले ने आगे बताया कि अमेरिका और इंडोनेशिया में भी इन मशीनों के “ठीक से काम न करने” की वजह से इन्हें चुनाव प्रक्रिया से हटा लिया गया था।

अब नज़र डालते हैं हाल ही में सम्पन्न लोकसभा चुनावों के नतीजों पर – पूरे देश में (जहाँ भाजपा का शासन था उन राज्यों को छोड़कर) लगभग सारे नतीजे कुछ इस प्रकार से आये हैं कि जो भी पार्टी कांग्रेस के लिये “सिरदर्द” साबित हो सकती थी या पिछली सरकार में सिरदर्द थी, उनका या तो सफ़ाया हो गया अथवा वे पार्टियाँ लगभग निष्क्रिय अवस्था में पहुँच गईं, उदाहरण के तौर पर – वामपंथियों की सीटें 50% कम हो गईं, मायावती भी लगभग 50% नीचे पहुँच गईं (जबकि सभी सर्वे, चैनल और विशेषज्ञ उनसे बेहतर नतीजों की उम्मीद कर रहे थे), जयललिता भी कुछ खास नहीं कर पाईं और तमिल भावनाओं के उफ़ान और सत्ता विरोधी लहर के बावजूद डीएमके को अच्छी खासी सीटें मिल गईं, लालू-पासवान का सफ़ाया हो गया, आंध्र में चिरंजीवी से खासी उम्मीद लगाये बैठे थे, वे भी कुछ खास न कर सके। जबकि दूसरी तरफ़ आंध्रप्रदेश में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिल गया, उत्तरप्रदेश में (कांग्रेस की) आशा के विपरीत भारी सफ़लता मिली, उड़ीसा में नवीन पटनायक को अकेले दम पर बहुमत मिल गया। जबकि कर्नाटक, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार जैसे राज्यों में कांग्रेस उतना अच्छा नहीं कर पाई, ऐसा क्यों?

ऐसा नहीं कि खामख्वाह बाल की खाल निकाली जा रहा है, भारत और विश्व के अन्य हिस्सों में भी ताज़ा लोकसभा चुनाव नतीजों को लेकर संशय बना हुआ है, इसका सबूत गूगल की सर्च रिपोर्ट से देखा जा सकता है, जहाँ कि जनता ने ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी की आशंका और इनकी विश्वसनीयता को लेकर विभिन्न सर्च किये हैं… यहाँ देखें

http://www.google.com/trends?q=electronic+voting+machine&ctab=398065024&geo=all&date=all

इसी प्रकार अमेरिका के कुछ कम्प्यूटर इंजीनियरों द्वारा फ़्लोरिडा के गवर्नर चुनावों के बाद ई-वोटिंग मशीनों की संदिग्धता के बारे में एक रिपोर्ट की पीडीएफ़ फ़ाइल भी यहाँ देखें…

http://www.computer.org/portal/cms_docs_computer/computer/homepage/May09/r5pra.pdf

तात्पर्य यह कि यदि भारत का मतदाता वाकई में इतना समझदार, परिपक्व और “स्थिरता”(?) के प्रति सम्मोहित हो गया है तब तो यह लोकतन्त्र के लिये अच्छी बात है, लेकिन यदि जैसा कि अभी भी कई लोगों को शक हो रहा है कि इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी की गई है, तब तो स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण कही जायेगी। हालांकि अभी इस बात के कोई प्रमाण मौजूद नहीं हैं, लेकिन शक के आधार पर इन मशीनों की जाँच हेतु एक दल या आयोग बनाये जाने की आवश्यकता है, कि जब अमेरिका में भी इन मशीनों को “संदिग्ध” पाया गया है तो भारत में भी इसकी विश्वसनीयता की “फ़ुलप्रूफ़” जाँच होनी ही चाहिये। सोचिये, कि अभी तो यह सिर्फ़ शक ही है, कोई सबूत नहीं… लेकिन यदि कहीं कोई सबूत मिल गया तो 60 साल पुराने लोकतन्त्र का क्या होगा?


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नईदुनिया अखबार (27 मई) में प्रकाशित समाचार के अनुसार मुम्बई हमले के शहीद हेमन्त करकरे की पत्नी ने बताया है कि उन्हें रुपये 15,000/- का करकरे के “अन्तिम संस्कार का बिल”(???) दिया गया है। इसी प्रकार परिजनों को 25 लाख रुपये देने की घोषणा हुई थी जिसमें से अब तक सिर्फ़ 10 लाख रुपये ही मिले हैं। उधर कसाब को सुरक्षा प्रदान करने और अदालती कार्रवाई के लिये करोड़ों रुपये अब तक खर्च हो चुके हैं। अब चूंकि कसाब तो “देश का जमाई” है इसलिये उसे तो कोई “बिल” थमा नहीं सकता।

एक और महान क्रांतिकारी “विनायक सेन” भी रिहा हो गये हैं, उनके लिये कई बड़े-बड़े लोगों ने प्रार्थनायें कीं, मोमबत्तियाँ जलाई, गीत गाये, हस्ताक्षर अभियान चलाये… कहने का मतलब ये कि विनायक सेन बहुत-बहुत महान व्यक्ति हैं। साध्वी प्रज्ञा के लिये महिला आयोग सहित किसी ने भी ऐसा कुछ नहीं किया, क्योंकि वे कीड़ा-मकोड़ा हैं। विनायक सेन की रिहाई की खुशियाँ मनाई जा रही हैं, इसे “जीत” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है… उधर नक्सली हमलों में रोज-ब-रोज हमारे आर्थिक रूप से गरीब जवान मारे जा रहे हैं, किसी-किसी के तो शव भी नहीं मिलते और जब अफ़सर ग्रेड वाले करकरे की पत्नी के यह हाल हैं तो बेचारे छोटे-मोटे जवानों के परिवारों के क्या हाल होते होंगे…

अरे… ये आप भी किन खयालों में खो गये भाई… मैं तो इस प्रकार के अनर्गल प्रलाप जब-तब करता ही रहता हूँ… आप तो कांग्रेस की जय बोलिये, राहुल बाबा के नेतृत्व के गुण गाईये, प्रियंका की मुस्कान पर फ़िदा होईये, भाजपा को साम्प्रदायिक कहकर कोसिये, अफ़ज़ल की फ़ाँसी के बारे में चिदम्बरम के मासूम बयान सुनिये… आर्थिक तरक्की के सपने देखिये, सेंसेक्स के बूम की कल्पना करते रहिये, संघियों के “राष्ट्रवाद” को बकवास कहिये…।

कहाँ इन शहीदों और जवानों के परिवारों के चक्करों में पड़ते हैं… मेरा क्या है, मेरे जैसे “पागल” तो चिल्लाते ही रहते हैं…
भाजपा को पानी पी-पीकर कोसने वालों में वामपंथी सबसे आगे रहते हैं, ये अलग बात है कि भाजपा को गरियाते-गरियाते कब वे खुद ही पूरे भारत में अप्रासंगिक हो गये उन्हें पता ही नहीं चला। लेकिन इस लेख में प्रस्तुत आँकड़े सिद्ध करते हैं कि यदि पश्चिम बंगाल में भाजपा एक “ताकत” के रूप में न उभरती तो वामपंथियों को मुँह छिपाना मुश्किल पड़ जाता। सिर्फ़ और सिर्फ़ भाजपा के कारण पश्चिम बंगाल में कांग्रेस-तृणमूल गठबन्धन को कम से कम 7 सीटों का नुकसान हुआ, जो कि वामपंथी खाते में गई, वरना लाल बन्दरों का तो पूरा “सूपड़ा” ही साफ़ हो जाता। ज़रा एक नज़र डालिये इन पर–

1) बर्दवान सीट पर सीपीएम के उम्मीदवार की जीत का अन्तर है 59,419, जबकि भाजपा उम्मीदवार को मिले 71,632 वोट, सोचिये यदि वहाँ भाजपा का उम्मीदवार ही न होता तो?

2) जलपाईगुड़ी सीट पर भाजपा के उम्मीदवार सुखबिलदास बर्मा ने 94,000 वोट लेकर कांग्रेस को नहीं जीतने दिया, यहाँ से सीपीएम का उम्मीदवार 90,000 वोट से जीता।

3) अलीपुरद्वार में आरएसपी के मनोहर टिर्की जीते 1,12,822 वोट से जबकि भाजपा को आश्चर्यजनक रूप से 1,99,843 वोट मिले और कांग्रेस हार गई।

4) बेलूरघाट सीट पर आरएसपी का उम्मीदवार बड़ी मुश्किल से 5,105 वोट से जीत पाया, जबकि भाजपा उम्मीदवार को मिले 60,000 वोट।

5) फ़ॉरवर्ड ब्लॉक का उम्मीदवार कूच बिहार सीट से 33,632 वोट से जीता, यहाँ भाजपा की झोली में 64,917 वोट आये।

6) मिदनापुर में भाकपा के प्रबोध पाण्डा, भाजपा को मिले 52,000 वोटों की बदौलत हारने से बच गये।

माकपा के स्थानीय नेता भी मानते हैं कि भाजपा के कारण हम भारी शर्मिन्दगी भरी हार से बच गये वरना कांग्रेस-ममता को लगभग 31 सीटें मिलतीं। लगभग यही आरोप ममता बैनर्जी ने भी लगाया और कहा कि भाजपा के उम्मीदवार, वामपंथी खेमे को मदद पहुँचाने के लिये खड़े हैं (हा हा हा हा)।

इस सारे घटनाक्रम से स्पष्ट होता है कि जो बात भाजपा के मामूली कार्यकर्ता को भी मालूम है उससे पार्टी का शीर्ष नेतृत्व कैसे अनजान है, कि भाजपा को अब अकेले चुनाव लड़ना चाहिये। NDA वगैरह बकवास है, यह भाजपा की बढ़त तो रोक ही रहा है, साथ ही साथ उसे वैचारिक रूप से भ्रष्ट भी कर रहा है। “सेकुलरों” की बातों और सेकुलर मीडिया के प्रभाव में आकर भाजपा ने अपनी छवि बदलने का जो प्रयास किया है, अब सिद्ध हो चुका है कि वह प्रयास पूरी तरह से असफ़ल रहा है। सेकुलर बनने के चक्कर में भाजपा “धोबी का कुत्ता” बन गई है। आँकड़ों से स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा अकेले चुनाव लड़कर राज्य स्तर पर “तीसरी ताकत” के रूप में उभरी है, ऐसा ही समूचे देश में आसानी से किया जा सकता है। जब किसी “मेंढक” से गठबन्धन ही नहीं होगा, तो उसके फ़ुदकने का कोई असर भी नहीं होगा, तब भाजपा अपनी वैचारिक बात जनता तक ठोस रूप में पहुँचाने में कामयाब होगी। इस रणनीति का फ़ायदा दूरगामी होगा, यह करने से लगभग प्रत्येक गैर-भाजपा शासित राज्य में भाजपा दूसरी या तीसरी शक्ति के रूप में “अकेले” उभरेगी। ऐसे में स्थानीय पार्टियाँ बगैर शर्त के और स्वाभाविक रूप से भाजपा के पाले में आयेंगी क्योंकि देर-सवेर कांग्रेस या तो उन्हें “खाने” वाली है या अपने दरवाजे पर अपमानित करके खड़ा करेगी, तब ऐसी स्थानीय पार्टियों से “लोकसभा में हम और विधानसभा में तुम” की तर्ज पर समझौता किया जा सकता है, जैसा कि पश्चिम बंगाल में दार्जीलिंग सीट पर किया गया और जसवन्त सिंह तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद विजेता बने, कृष्णनगर में भी भाजपा प्रत्याशी को 1,75,283 वोट मिले। भाजपा के प्रदेश महासचिव राहुल सिन्हा कहते हैं कि “यह सफ़लता बंगाल में हमारे संगठनात्मक ढाँचे की ताकत के कारण मिली है…”। क्षेत्रीय पार्टियाँ हों या वामपंथी, ये लोग जब तक भाजपा को अपना प्रतिद्वन्द्वी नम्बर एक मानते रहेंगे, तब तक कांग्रेस मजे करती रहेगी, क्योंकि उसने बड़ी चतुराई से अपनी छवि “मध्यमार्गी” की बना रखी है और “धर्मनिरपेक्षता” नाम का ऐसा सिक्का चला दिया है कि बाकी सभी पार्टियों को मजबूरन कांग्रेस का साथ देना ही पड़ता है।

पश्चिम बंगाल में भाजपा सभी 42 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ी, एक सीट (दार्जीलिंग) जीती, लेकिन कम से कम दस सीटों पर उसने कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया। एक चुनाव हारने पर भाजपा को दिन-रात सलाह देने में लगे ऐरे-गैरे-नत्थू-खैरे भी “लाल-गढ़” में भाजपा प्रत्याशियों को मिले वोटों को देखकर हैरान होंगे, लेकिन इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है, जिस तरह उत्तरप्रदेश में कांग्रेस अकेले लड़ी और जीती, भाजपा भी अकेले ही लड़े। इस बार नहीं तो अगले चुनाव में, अगले नहीं तो उसके अगले चुनाव में, जीत निश्चित मिलेगी। आज लाखों-करोड़ों लोग कांग्रेस-वामपंथियों की नीतियों से त्रस्त हो चुके हैं, उनकी भावनाओं को आवाज़ देने वाली कोई पार्टी उन्हें दिखाई नहीं दे रही, इसलिये उन्होंने कांग्रेस को ही चुन लिया, जब उनके पास एक सशक्त विकल्प मौजूद रहेगा तब वे निश्चित ही उसे चुनेंगे। लेकिन लौहपुरुष का विशेषण और कंधार जैसा शर्मनाक समर्पण तथा राम मन्दिर आंदोलन और जिन्ना की मज़ार पर जाने जैसा वैचारिक अन्तर्द्वन्द्व अब नहीं चलेगा। पश्चिम बंगाल जैसे राजनैतिक रूप से संवेदनशील, लगभग 23 सीटों पर 40% से अधिक मुस्लिम वोटरों तथा वामपंथियों द्वारा इतने वर्षों से शासित राज्य में भाजपाई उम्मीदवारों को कई जगह एक लाख से अधिक वोट मिल रहे हैं, इसका क्या अर्थ है यह मेरे जैसे छोटे से व्यक्ति को समझाने की जरूरत नहीं है।

रही बात वामपंथियों की तो उन्हें भाजपा का शुक्र मनाना चाहिये कि उनकी कम से कम 6-7 सीटें भाजपा के कारण ही बचीं, वरना इज्जत पूरी लुट ही गई थी, लेकिन वे ऐसा करेंगे नहीं। रस्सी तो जल गई है, मगर……

(खबर का मूल स्रोत यहाँ है)


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मराठी भाषा में नाटकों, कला और संस्कृति का एक विस्तृत और समृद्ध इतिहास रहा है। मराठी रंगमंच ने देश के कला जगत को गायन, वादन, नाटक, संगीत आदि क्षेत्रों में कई महान कलाकार दिये हैं। इन्हीं में से एक हैं प्रख्यात नाटककार विजय धोण्डोपन्त तेंडुलकर। कई प्रसिद्ध और विवादास्पद नाटकों के लेखक श्री तेंडुलकर की हाल ही में 19 मई को पहली पुण्यतिथि थी। तेंडुलकर के कई नाटक अपने विषयवस्तु को लेकर सामाजिक रूप से विवादित रहे, लेकिन कभी भी उन्होंने अपने लेखन से समझौता नहीं किया।


संयोग देखिये कि पाकिस्तान के अखबारों को पढ़ते समय अचानक यह खबर मिली कि विजय तेंडुलकर के प्रसिद्ध नाटक “शांतता…कोर्ट चालू आहे…” (खामोश… अदालत जारी है) का उर्दू भाषा में सफ़ल मंचन कराची में किया जा रहा है। इस खबर को “डॉन” अखबार की इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है…

http://www.dawn.com/wps/wcm/connect/dawn-content-library/dawn/news/entertainment/05-silence-the-court-is-in-session

डॉन अखबार मे तेंडुलकर के इस नाटक और उस नाटक की उर्दू प्रस्तुति की खूब तारीफ़ की गई है। यह खबर भारत के कलाप्रेमियों और आम जनता के लिये एक सुखद आश्चर्यजनक धक्का ही है। “धक्का” इसलिये, कि विश्वास नहीं होता कि पाकिस्तान की छवि और वहाँ के वर्तमान हालातों को देखते हुए वहाँ अभी भी “नाटक परम्परा” न सिर्फ़ जीवित है, बल्कि सफ़लतापूर्वक उसका मंचन भी किया जा रहा है। अगला धक्का यह कि, खबर के अनुसार नाटक का टिकट 500/- रुपये रखा गया है (मराठी में तो हम आसानी से कल्पना कर सकते हैं, लेकिन हिन्दी नाट्य जगत 500 रुपये के टिकट लेकर आने वाले दर्शक खींच सकेगा, ऐसा मुश्किल लगता है)। 500 रुपये के टिकट के बाद, एक तीसरा धक्का यह कि भारत के किसी कलाकार का लिखा हुआ और वह भी “कुमारी माता” और गर्भपात जैसे विवादास्पद मुद्दों पर बेलाग बात करने वाला नाटक पाकिस्तान में खेला जा रहा है, है न आश्चर्य की बात… लेकिन यही विजय तेंडुलकर की सफ़लता है। उनके लिखे हुए नाटक और फ़िल्मों को किसी भी भाषा में अनुवादित किया जाये उनका “असर” उतना ही तीव्र होता है, जितना मराठी में हुआ है।

तेंडुलकर के इस नाटक “शांतता कोर्ट चालू आहे…” का हिन्दी सहित अन्य भाषाओं में भी मंचन हो चुका है। संक्षिप्त में इस नाटक की कहानी कुछ इस प्रकार है कि – एक थियेटर ग्रुप जो कि गाँव-गाँव जाकर अपने नाटक दिखाता है, उसे अचानक एक गाँव में किसी कारणवश अधिक रुकना पड़ जाता है। थियेटर ग्रुप के सदस्य टाइमपास के लिये एक नकली अदालत का दृश्य रचते हैं और आपस में मुकदमा चलाते हैं। नाटक के भीतर एक नाटक की शुरुआत तो हल्के-फ़ुल्के माहौल में होती है, लेकिन जल्दी ही ग्रुप के सदस्य अपने असली “रंग” में आ जाते हैं। पुरुष मानसिकता और हिंसा के घालमेल के दर्शन होने लगते हैं। थियेटर ग्रुप की एक महिला सदस्य “सुश्री बेनारे” को लेकर पुरुष सदस्य उस पर विभिन्न आरोप लगाते हैं, क्योंकि वे जानते थे कि मिस बेनारे यौन उत्पीड़ित रही है और वह एक बार गर्भपात भी करवा चुकी है। टाइम पास के लिये शुरु की गई नकली अदालत में सभी पात्र, कब अपनी आपसी रंजिश और पूर्वाग्रहों को उजागर करने लगते हैं पता ही नहीं चलता, अन्त में मिस बेनारे टूट जाती है, वह स्वीकार करती है कि हाँ वह भी एक “कुमारी माता” है, लेकिन सभी पुरुष पात्रों की हिंसात्मक और नारी विरोधी मानसिकता को उजागर करके उनकी “असली औकात” दिखाने के बाद…”।

विजय तेंडुलकर ने मात्र 6 वर्ष की उम्र में पहली कहानी लिखी और 11 वर्ष की आयु में पहला नाटक लिखा, उसमें अभिनय किया और उसका निर्देशन भी किया। तेंडुलकर का झुकाव वामपंथी विचारधारा की ओर रहा है, लेकिन फ़िर भी भारत की सांस्कृतिक परम्परा और भारत की मिट्टी के प्रति उनका गहरा लगाव था। गुजरात दंगों के बाद उनका वह वक्तव्य बेहद विवादित हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था कि “यदि मेरे पास पिस्तौल होती तो मैं नरेन्द्र मोदी को गोली से उड़ा देता…” हालांकि बाद में उन्होंने सफ़ाई देते हुए कहा था कि गुस्सा किसी भी बात का हल नहीं निकाल सकता और वह वक्तव्य गुस्से में दिया गया था। विजय तेंडुलकर को महाराष्ट्र तथा भारत सरकार की ओर से कई पुरस्कार और सम्मान मिले, जिसमें प्रमुख हैं 1999 में “महाराष्ट्र गौरव”, 1970 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1984 में पद्मभूषण। उनकी लिखी कई फ़िल्मों की पटकथाओं पर कलात्मक फ़िल्में बनीं, जैसे मंथन, निशांत, आक्रोश, अर्धसत्य आदि।

पाकिस्तान में चल रहे नाटक के बारे में एक बात का दुःख जरूर है कि उस नाटक से पैसा बनाने वालों ने तेंडुलकर परिवार को कभी रॉयल्टी का एक रुपया भी ईमानदारी से नहीं दिया है। तेंडुलकर के अवसान के बाद उनकी बौद्धिक सम्पत्ति की देखभाल कर रहीं उनकी पुत्री तनुजा मोहिते ने बताया कि “जब तक बाबा (यानी पिताजी) जीवित थे तब तक तो कई जगहों से ईमानदारी, या शर्म के मारे ही सही रॉयल्टी आ जाती थी, लेकिन उनके निधन के पश्चात इसमें ढील आती जा रही है। श्री तेंडुलकर ने तय किया था कि उनके प्रत्येक प्रमुख नाटक के एक शो पर 1000 रुपये, एकांकी नाटक के प्रति शो 500 रुपये, बाल नाट्य के 300 रुपये तथा लेखों के अनुवाद हेतु प्रति लेख 1500 रुपये रॉयल्टी वे लेंगे। नाटक “शांतता…” के पाकिस्तान में कई सफ़ल शो 500 रुपये प्रति व्यक्ति के टिकट की दर से आयोजित हो चुके हैं, इस नाटक का अनुवाद भी मुम्बई में रहने वाले एक लेखक इंतिज़ार हुसैन ने किया है, लेकिन रॉयल्टी के नाम पर तेंडुलकर परिवार को अब तक कुछ नहीं मिला है। इस सम्बन्ध में सुश्री मोहिते ने बताया कि बौद्धिक सम्पदा की चोरी रोकने के लिये उन्होंने कई कम्युनिटी वेबसाईटों और गूगल अलर्ट पर भी सावधान किया है कि यदि इस प्रकार के नाटक या तेंडुलकर के कोई लेख आदि प्रकाशित होते हैं तो उन्हें 9820362103 पर सम्पर्क करके बताने का कष्ट करें, ताकि रॉयल्टी के बारे में निश्चित स्थिति पता चल सके। उन्होंने आगे बताया कि महाराष्ट्र के छोटे शहरों में कई छोटी संस्थायें हैं जो “बाबा” के नाटकों का मंचन करती हैं और अधिकतर बार ईमानदारी से रॉयल्टी का पैसा देती हैं, या पूर्व-अनुमति लेकर मुफ़्त में नाटक करती हैं… लेकिन बड़ी संस्थायें या जाने-माने नाट्य ग्रुप रॉयल्टी देने में आनाकानी करते हैं।

अपनी पुत्री प्रिया तेंडुलकर (“रजनी” फ़ेम) के निधन (सितम्बर 2002) के पश्चात विजय तेंडुलकर भीतर से टूट गये थे और 19 मई 2008 को पुणे में उनका देहान्त हुआ। इस महान नाटककार को विनम्र श्रद्धांजलि…
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नोट – मेरे कुछ नये पाठकों (जिन्होंने मेरे पुराने लेख नहीं पढ़े) ने ई-मेल पर कहा कि क्या मैं सिर्फ़ कांग्रेस विरोध, राजनीति और “शर्मनिरपेक्षता” आदि पर ही लेख लिखता हूँ? क्योंकि गत 6 महीने में मैंने अधिकतर लेख “राजनीति, समाज और हिन्दुत्व को हो रहे नुकसान पर ही लिखे। इसलिये एक वाम विचारधारा के, धर्म आधारित राजनीति के प्रखर विरोधी, समाज को हिलाकर रख देने वाले कालजयी नाटकों के रचयिता तेंडुलकर, पर यह लेख उनकी शिकायत को दूर करने के लिये है…

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आज समूची दुनिया पाकिस्तान और उसकी पैदाइश “तालिबान” से आशंकित है, कि पता नहीं ये “ज्यादा समझदार” लोग कब, क्या कर बैठें। लेकिन इनकी यह मानसिकता कैसे बनी और इसके पीछे क्या सोच है इसका आभास इस इंटरव्यू से लगाया जा सकता है। यह इंटरव्यू दस वर्ष पहले अर्थात 1999 में लिया गया है। पंजगार (अफ़गानिस्तान) से प्रकाशित होने वाली “जम्हूरिया-इस्लामिया” नामक बलूची मासिक पत्रिका के लिये पत्रकार जलील आमिर द्वारा मौलाना नवाबज़ादा नबीउल्लाह खान जो कि पाकिस्तान की मुख्य इस्लामिक पार्टी जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख मौलाना काज़ी अहमद के दायें हाथ हैं, का इंटरव्यू लिया गया है, जिसमें मौलाना साहब ने “तालिबान” की सोच को स्पष्ट किया है। यह इंटरव्यू दस साल पहले (फ़रवरी 1999) का है, लेकिन इसमें जो “महान विचार” मौलाना साहब ने छोटे-छोटे बीजों के रूप में प्रकट किये हैं, वे इतने वर्षों में एक “जहरीले पेड़” का रूप ले चुके हैं। इस इंटरव्यू में प्रस्तुत मौलाना साहब के विचारों से यह भी ज्ञात होता है कि किस तरह से ये लोग धर्म का नाम लेकर युवाओं और बच्चों का ब्रेन-वॉश करते रहे हैं और आज तालिबान यानी छात्र (ऐसे छात्र ??) पूरी मानवता के लिये खतरा बन गये हैं। ऊपर से तुर्रा यह, कि ये मौलाना साहब इन सभी विचारों पर कुरआन के स्तर पर किसी से भी बहस करने को तैयार हैं… (है कोई कुरआन का जानकार जो इन साहब से बहस कर सके?)… इस इंटरव्यू में ज़ाहिर किये गये विचारों को पढ़कर कभी आप हँसेंगे, कभी आप माथा पीटेंगे, कभी गुस्सा होंगे, लेकिन कुल मिलाकर है बड़ा ही मजेदार इंटरव्यू। प्रस्तुत हैं जमात-ए-इस्लामी के मौलाना साहब के इंटरव्यू का हिन्दी अनुवाद…

महिलाओं और पुरुषों की बराबरी की बात करना मूर्खता है

(पत्रकार ज़लील आमिर) प्रश्न – मौलाना साहब, पाकिस्तान में आजकल महिलाओं का सवाल बहुत महत्वपूर्ण हो गया है, तालिबान जैसे संगठन महिलाओं की आज़ादी के खिलाफ़ हैं, जबकि कुछ प्रगतिशील मुस्लिम विद्वानों ने महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा दिया है। इस सम्बन्ध में आपका क्या नज़रिया है?
(मौलाना नबीउल्लाह) उत्तर – मैं पहले भी कह चुका हूँ, महिलाओं के बारे में पैगम्बर मोहम्मद (PBUH) और जमात के विचार एकदम समान हैं और इसके अनुसार “महिलाओं और पुरुषों की बराबरी की बात करना नितांत मूर्खता है”, जो काम मर्द कर सकता है, महिला नहीं कर सकती। महिलायें पुरुषों के मुकाबले शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होती हैं। पुरुष को हमेशा महिलाओं की “देखरेख” करनी चाहिये। महिलाओं को घर में ही रहना चाहिये, उन्हें शिक्षा तो दी जा सकती है, लेकिन वह शिक्षा पुरुषों से मुकाबले के लिये नहीं होना चाहिये। काज़ी साहब ने आगे फ़रमाया कि जब भी जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान में सत्ता में आयेगी तब महिलाओं और अल्पसंख्यकों का मताधिकार समाप्त कर दिया जायेगा, “शरीयत” में उन्हें वोट देने का कोई अधिकार नहीं है। सिर्फ़ मुस्लिम पुरुष की मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं।

जब पत्रकार ज़लील आमिर ने उनसे इस सम्बन्ध में कुर-आन की हदीसों का उदाहरण देने की गुज़ारिश की तो उन्होंने इस सम्बन्ध में कई हदीसों का उदाहरण भी दिया। आमिर ने उनसे अगला सवाल किया कि “फ़िर इस बारे में जमात पूरे पाकिस्तान में कुर-आन की हदीसों को लेकर एक खुला आन्दोलन क्यों नहीं चलाती? इसके जवाब में मौलाना कहते हैं कि चूंकि अभी जमात-ए-इस्लामी अल्पमत में है और इस बात पर कहीं वोट दे रही महिलायें जमात के खिलाफ़ वोट न कर दें इसलिये अभी इसे नहीं उठाया जा रहा, लेकिन “वक्त आने पर” कुर-आन के अनुसार महिलाओं को वोट का अधिकार से वंचित किया जायेगा।

सभी गैर-मुस्लिमों को जज़िया देना होगा

प्रश्न – पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय जज़िया को लेकर आशंकित है, इस बारे में आपके क्या विचार हैं?
उत्तर – हाँ, सभी गैर-मुस्लिमों को जज़िया देना ही चाहिये। जज़िया कोई सुरक्षा धनराशि नहीं है, बल्कि यह सभी गैर-मुस्लिमों पर बन्धनकारक है कि वे जज़िया अदा करें। जब जमात पाकिस्तान में सत्ता में आयेगी तब जज़िया पूरी तरह से लागू किया जायेगा, यदि कोई इस्लाम स्वीकार करना चाहे तभी उसे छूट दी जा सकती है, वरना कोई रियायत नहीं।

सभी भारतीय हिन्दुओं को इस्लाम धर्म स्वीकार करना होगा

प्रश्न - भारत के बारे में आपके क्या विचार हैं?
उत्तर – जमात-ए-इस्लामी पहले से ही भारत को लेकर काम कर रहा है, हमारा लक्ष्य है कि भारत के सभी हिन्दुओं को मुस्लिम बनाया जाये। बाबरी मस्जिद के गिराये जाने के बाद इसकी योजना को और बढ़ाया गया है। पाकिस्तान के पंजाब और सिंध में कई मन्दिर गिराये जा चुके हैं और हमने हिन्दुओं की सम्पत्ति को नष्ट करने का फ़रमान भी जारी किया हुआ है, लेकिन हमारा फ़ोकस मन्दिर ढहाने पर ज्यादा होता है। हमने हाल ही में जारी अपने पेम्फ़लेट में कहा है कि प्रत्येक काफ़िर के पूजास्थल को ढहाने से मुस्लिम अल्लाह के और करीब आ जाता है। इस हेतु हमने सभी पेम्फ़लेट्स पर कुर-आन की हदीसों का भी उल्लेख किया है। जिस प्रकार बाबर ने राम मन्दिर गिराया उसी प्रकार सच्चे मुसलमान को पाकिस्तान में स्थित सभी मन्दिरों को तोड़ देना चाहिये। हमारी योजना है कि भारत के मुसलमानों को भी वहाँ मन्दिर गिराने के लिये कहा जाये, लेकिन “हिन्दू पुलिस” ने भारत के मुसलमानों पर अत्याचार करना शुरु कर दिया।

प्रश्न – यदि सत्ता में आये तो पाकिस्तान में आप किस प्रकार की सरकार की स्थापना करेंगे?
उत्तर – ज़ाहिर है कि यह एक “शरीयत” पर चलने वाली सरकार होगी। संविधान में शरीयत को शामिल किया जायेगा, मदरसों में पढ़े हुए आलिमों को ही हर न्यायालय में काज़ी नियुक्त किया जायेगा, जिनका फ़ैसला अन्तिम होगा।

हमारा उद्देश्य है “सतत जिहाद”
जमात-ए-इस्लामी का मूल उद्देश्य काफ़िरों द्वारा शासित ज़मीन को इस्लाम के झण्डे तले लाना है। काज़ी साहब का दृष्टिकोण है कि कश्मीर से लेकर भारत, श्रीलंका, बर्मा और इधर अफ़गानिस्तान और ताजिकिस्तान तक दारुल-इस्लाम की स्थापना होनी चाहिये। जमात के नेताओं ने बांग्लादेश में यह करने में लगभग सफ़लता हासिल कर ली है।

प्रश्न – लेकिन श्रीलंका और बर्मा तो बौद्ध धर्म वाले देश हैं इनके बारे में आपके क्या विचार हैं?
उत्तर – हाँ हम जानते हैं कि ये दोनों देश बौद्ध हैं लेकिन एक ज़माने में बलूचिस्तान और अफ़गानिस्तान में बड़ी संख्या में बौद्ध रहा करते थे। हम इन दोनों देशों पर इस्लाम लागू करवाने के लिये हर प्रकार का दबाव डालेंगे, लेकिन हमारा पहला लक्ष्य भारत है।

प्रश्न – भारत के सम्बन्ध में आपकी क्या योजनायें हैं? आपकी सारी बातें कश्मीर पर ही क्यों आधारित होती हैं?
उत्तर – देखिये, एक इमारत में नींव होती है और ऊपर मेहराब होती है, जब नींव का पत्थर गिरा दिया जाता है तो मेहराब भी अपने आप गिर जाती है, कश्मीर को हम भारत की नींव मानते हैं, एक बार कश्मीर को भारत से अलग कर दिया जाये तो वह सेकुलर नहीं रह सकेगा। कश्मीर के आज़ाद होते ही हमारा काम आसान हो जायेगा और कश्मीर की तर्ज़ पर नागालैण्ड, आसाम, मिजोरम, झारखण्ड, तमिलनाडु और खालिस्तान को भी अलग होते देर नहीं लगेगी।

भारत को 100% मुस्लिम बनाया जायेगा…

प्रश्न – जैसा कि आप कह रहे हैं, यदि भारत के टुकड़े हो गये तो फ़िर इस प्रकार के कई “हिन्दू” देशों को आप इस्लामिक कैसे बना पायेंगे? वे फ़िर से एकत्रित होकर पाकिस्तान के लिये चुनौती बन सकते हैं।
उत्तर – संगठित और हिन्दू बहुसंख्यक वाला भारत दारुल-इस्लाम की राह में सबसे बड़ी बाधा है, एक बार उसके टुकड़े शुरु हुए तो इस्लामीकरण में आसानी होगी।

प्रश्न – यह तो बहुत विशाल सपना है, 700 वर्ष के मुगल शासनकाल में भी यह सम्भव नहीं हुआ तो अब कैसे होगा?
उत्तर – सही कहा आपने, लेकिन उस वक्त मुस्लिम (मुगल) बादशाहों ने हिन्दुओं को अपने दरबार और कामकाज में अधिकार दे रखे थे। जब एक बार यह तय हो जायेगा कि भारत में सिर्फ़ मुस्लिम ही वोट दे सकेंगे और भारत एक इस्लामिक देश बन गया है, अपने-आप स्थितियाँ बदल जायेंगी, हालांकि इसके लिये भारत के हिन्दुओं और ईसाईयों के दिल में डर पैदा करना ज़रूरी है। मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ, आज़ादी से पहले पाकिस्तान के काफ़ी सारे इलाकों में 25% से अधिक हिन्दू बच गये थे, लेकिन आज या तो वे भाग गये हैं या उन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया है, यही हमें धीरे-धीरे भारत में भी करना है। आज की तारीख में पाकिस्तान में सिर्फ़ 2% हिन्दू बचे हैं, आखिर यह सब कैसे हुआ? 700 साल के मुगल शासनकाल में जो नहीं हुआ वह हमने 50 साल में ही कर दिया है, हिन्दुओं में हम इतना आतंक पैदा कर देते हैं कि वे डरकर इस्लाम कबूल कर ही लेते हैं। धर्मान्तरण करने का सबसे सही तरीका आतंक ही है। हमने यही तकनीक पंजाब और सिंध में अपनाई है, हिन्दुओं, ईसाईयों और अहमदिया सम्प्रदाय के लोगों को लगातार आतंक में जीने को मजबूर किया और नतीजा आपके सामने है, इंशाअल्लाह हम भारत में भी कामयाब होंगे।

(भाग-2 में जारी रहेगा…)

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(भाग-1 से जारी…)
जैसा कि पहले कहा गया है, इस इंटरव्यू में ज़ाहिर किये गये विचारों को पढ़कर कभी आप हँसेंगे, कभी आप माथा पीटेंगे, कभी गुस्सा होंगे, लेकिन कुल मिलाकर है बड़ा ही मजेदार इंटरव्यू। प्रस्तुत हैं जमात-ए-इस्लामी (पाकिस्तान) के मौलाना साहब के इंटरव्यू के हिन्दी अनुवाद का दूसरा भाग… जिसमें उन्होंने भारत के मुसलमानों के बारे में भी आश्चर्यजनक बयान दिये हैं…

प्रश्न (पत्रकार ज़लील आमिर) – क्या आपको नहीं लगता कि यदि कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा बन गया तो भारत में व्यापक पैमाने पर हिन्दू-मुस्लिम दंगे होंगे और उसमें काफ़ी संख्या में हमारे मुस्लिम भाई भी मारे जायेंगे?

उत्तर (मौलाना नबीउल्लाह) – हाँ, हो सकता है, लेकिन हमारी विचारधारा सिर्फ़ कुर-आन और हदीस की व्याख्याओं पर आधारित है। पैगम्बर मुहम्मद ने कहा है कि जो भी मुस्लिम, किसी अन्य गैर-मुस्लिम से मधुर सम्बन्ध रखता है वह सच्चा मुसलमान नहीं हो सकता। इसमें हिन्दू, ईसाई और यहूदी सभी शामिल हैं। पैगम्बर मोहम्मद ने यह भी कहा है कि यदि कोई मुस्लिम शासक खराब है तब भी मुस्लिमों को वह देश छोड़कर गैर-मुस्लिम देश में नहीं जाना चाहिये। इस बारे में हदीस और कुर-आन में स्पष्ट निर्देश हैं। इसलिये जो मुसलमान विभाजन के दौरान भारत से पाकिस्तान की तरफ़ नहीं आये, वे भी हमारी नज़र में “हिन्दू” ही हैं। वे भले ही सोचते रहें कि वे मुस्लिम हैं लेकिन अल्लाह के सामने ऐसा नहीं होगा। उदाहरण के तौर पर जैसे कि “अहमदिया” हैं, वे अपने आपको मुस्लिम मानते हैं लेकिन असल में वे हैं नहीं, इसलिये जब तक भारत के मुस्लमान किसी मुस्लिम देश में नहीं चले जाते तब तक वे सच्चे मुस्लिम नहीं हो सकते। अपने भारत दौरे के समय मैंने पाया कि भारत के हिन्दू किसान फ़सल लेने पर अपनी सारी उपज पूजा करके पहले भगवान को समर्पित कर देते हैं, इसलिये इस प्रकार की उपज मुसलमानों के लिये “हराम” है। क्योंकि भारत के सभी “तथाकथित” मुसलमान ऐसी फ़सल और अनाज खाते हैं जो कि अल्लाह से पहले किसी और भगवान को पहले ही समर्पित की जा चुकी है, कुर-आन में इसकी सख्त बन्दिश है और इसीलिये वे लोग सच्चे मुस्लमान नहीं हैं। पैगम्बर मोहम्मद का आदेश है कि मुसलमान उसी देश में रहें जहाँ वे बहुसंख्यक हैं, जो मुसलमान इस्लामिक देश छोड़कर दूसरे देश में बसता है वह काफ़िर माना जाये, सिर्फ़ उसी को मुसलमान माना जायेगा जो अल्लाह द्वारा शासित देश में आने को उत्सुक हो, गैर-इस्लामी देश में सदा के लिये बस चुका व्यक्ति मुसलमान नहीं है। ऐसे में यदि भारत के किसी दंगे में कोई मुसलमान मारा भी जाता है तो हमें उसकी परवाह क्यों होनी चाहिये? लेकिन फ़िलहाल रणनीतिक तौर पर हम भारत के मुसलमानों से मधुर सम्बन्ध बनाये हुए हैं। पाकिस्तान की बेहतरी के लिये काम करने वाले ही असली मुसलमान हैं। कश्मीर के मुसलमानों को मैं असली मुसलमान मान सकता हूँ, क्योंकि वे “हिन्दू शासन”(?) से मुक्ति हेतु संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन भारत के बाकी मुसलमानों ने भारत-पाक विभाजन स्वीकार कर लिया है और इसलिये वे मुस्लिम नहीं रहे।

जमात-ए-इस्लामी पार्टी “गुलाम प्रथा” को फ़िर शुरु करेगी…

सभी अरब देशों में “गुलाम” प्रथा चलती है, पैगम्बर मोहम्मद ने भी कहा है कि गुलामों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उन्हें समय-समय पर आज़ाद करते रहो। जमात जब पाकिस्तान में सत्ता में आयेगी तो “गुलाम प्रथा” फ़िर शुरु की जायेगी, सभी पकड़े गये हिन्दू कैदियों को गुलाम बनाया जायेगा। लगभग सभी अरब देशों में यह प्रथा धड़ल्ले से जारी है, हालांकि अरब देशों में भारी संख्या में हिन्दू काम कर रहे हैं, लेकिन हमारा इरादा अरबों की पवित्र भूमि को पुनः पवित्र बनाना है और यह काम हिन्दुओं को वहाँ से निकालकर या गुलाम बनाकर ही किया जा सकता है। फ़िलहाल वहाँ के हिन्दुओं ने अरबों को मानसिक रूप से भ्रष्ट कर दिया है।

हिन्दुओं के मन्दिर, मुस्लिम भूमि को अपवित्र करते हैं…

अरब देशों और कतर आदि में मैंने देखा कि वहाँ हिन्दुओं के कई मन्दिर हैं, अरब के बादशाह ने मन्दिर बनाने की अनुमति देकर ही गलती की है, ऊपर से सुल्तान के परिवार के सदस्य मन्दिर का उद्घाटन करने भी गये। काज़ी अहमद इस बात से भी काफ़ी नाराज़ हैं कि कतर की रॉयल परिवार के कुछ सदस्य भगवान “अय्यप्पा” में भी आस्था रखते हैं। इससे जमात प्रमुख बेहद खफ़ा हैं और उन्होंने इन शैतानी शक्तियों से लड़ने का संकल्प लिया है।

धर्म-परिवर्तन की सजा मौत है…
मौलाना साहब फ़रमाते हैं कि मुसलमानों के लिये धर्म परिवर्तन या अन्य धर्मों की ओर झुकाव की सजा सिर्फ़ मौत है। पाकिस्तान में अभी शरीयत का कानून लागू नहीं है, इसलिये यहाँ संविधान के तहत धर्म परिवर्तन किया जा सकता है, लेकिन जब जमात सत्ता में आयेगी तब इसके लिये मौत की सजा मुकर्रर की जायेगी।

विश्व का सारा ज्ञान कुरान और हदीस में समाया हुआ है…
मौलाना साहब आगे फ़रमाते हैं कि विश्व का समूचा ज्ञान कुर-आन और हदीस में समाया हुआ है, कुर-आन से अधिक जानने पर एटम बम और टीवी जैसी विनाशकारी समस्याएं पैदा होती हैं। संगीत, टीवी, फ़ोटोग्राफ़ी आदि शैतानी और हराम वस्तुएं हैं। पहले के ज़माने में संगीत सिर्फ़ गायन तक सीमित था, लेकिन नई तकनीक ने इसे घर-घर में पहुँचा दिया है, हमें इस शैतानी चीज़ से नई पीढ़ी का बचाव करना है।

साइंस और टेक्नोलॉजी मानव सभ्यता के लिये बुरी बातें हैं…
मौलाना के महान विचार यहीं नहीं थमते, वे कहते हैं… “मैं भी एक सिविल इंजीनियर हूँ, और मेरा मानना है कि साइंस और टेक्नोलॉजी सभ्यता के विकास के लिये बहुत बुरी बातें हैं। जितना ज्यादा आप इसका ज्ञान प्राप्त करते जाते हैं, आप सर्वकालिक महान पुस्तक कुर-आन पर सवाल उठाने लगते हैं। हदीस में स्पष्ट कहा गया है कि “धरती गोल नहीं चपटी है… लेकिन वैज्ञानिक हमें बताते हैं कि धरती गोल है, लेकिन कुप्रचार के जरिये लोगों के मन में कुर-आन के प्रति संशय पैदा कर दिये गये हैं। हम कुर-आन के वैज्ञानिक पहलुओं को जनता के सामने लायेंगे और सिद्ध करेंगे कि कुर-आन ही पूरी तरह वैज्ञानिक है और पूर्ण सत्य है।

प्रश्न – आप साइंस और टेक्नोलॉजी को बुरा कह रहे हैं, फ़ोटोग्राफ़ी को हराम बता रहे हैं, लेकिन पश्चिमी देशों से हथियार आयात करते हैं और पासपोर्ट के लिये फ़ोटो भी तो खिंचवाते हैं?

उत्तर – आपका कहना सही है, लेकिन यह सिर्फ़ रणनीति के तौर पर है। अल्लाह ने हमे पेट्रोल की ताकत दी है, जिससे पश्चिमी देशों की कारें चलती हैं, इसके बदले में हम उनसे हथियार लेते हैं और यही हथियार आगे चलकर उन्हें खत्म करने में काम आयेंगे।

प्रश्न – आजकल पाकिस्तान में भी आरक्षण को लेकर झगड़े बढ़ रहे हैं, इस सम्बन्ध जमात की क्या नीति होगी।

उत्तर – यह समस्या असल में भाषा की समस्या है, फ़िलहाल उर्दू बोलने वाले मुसलमान और सिन्धी बोलने वाले मुसलमानों (मोहाजिरों) के बीच झगड़े अधिक हैं। हम सत्ता में आये तो सभी क्षेत्रीय भाषाओं (पश्तो, सिंधी, बलूची, उर्दू, पंजाबी आदि) को बन्द करके सिर्फ़ अरबी को राजकाज की भाषा बनायेंगे। यही एकमात्र पवित्र भाषा है। इसके द्वारा सभी जनता कुर-आन और हदीस की व्याख्या को ठीक से समझ सकेगी, और धर्म आधारित आरक्षण के झगड़े बन्द होंगे।

प्रश्न- पाकिस्तान के कुछ सेकुलर पत्रकार जमात का कड़ा विरोध करते हैं, डॉन और कराची से निकलने वाले कई अखबार आपके विरोधी हैं। इस बारे में आपके क्या विचार हैं?
उत्तर – जब पाकिस्तान में शरीयत लागू होगी तब इनमें से एक भी पत्रकार नहीं दिखाई देगा, वे कोर्ट भी नहीं जा पायेंगे। ये सेकुलर पत्रकार हमारे वक्तव्यों को तोड़-मरोड़कर जनता के सामने पेश करते हैं और हमारी छवि खराब करते हैं। ये लोग पाकिस्तान का इतिहास अंग्रेजों के जमाने से लिखते हैं और शुरु करते हैं, जबकि पाकिस्तान का इतिहास विभाजन और आज़ादी के बाद ही शुरु होता है। सेकुलर पत्रकार “काफ़िर” हैं, वे मुस्लिम हैं ही नहीं। वे हमारे पास आयें और कुर-आन और हदीस की व्याख्या के बारे में पूछें, हम उनकी हरेक शंका का समाधान कुर-आन की रौशनी में करने को तैयार हैं। वे यह सिद्ध करें कि जो हमने कहा है कुर-आन के अनुसार वह गलत है, तो हम मान लेंगे, लेकिन वे ऐसा नहीं कर सकते। ये लोग कुर-आन और हदीस पर कोई बहस नहीं करना चाहते। हम साबित कर देंगे कि कुर-आन के हिसाब से ये लोग गैर-मुस्लिम हैं, ये लोग “कादियानियों” की तरह हैं जो कहते हैं कि “जेहाद” कोई अनिवार्य बात नहीं है… यह बकवास है।
प्रश्न – आपका अमूल्य समय देने के लिये धन्यवाद…
उत्तर – अल्लाह का रहमोकरम आपके साथ रहे…

इस इंटरव्यू के मूल अंग्रेजी भाग को यहाँ देखा जा सकता है…
http://www.islam-watch.org/JihadiUmmah/What-Islam-Wants-Nabiullah-Khan.htm


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