Super User

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I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

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Muslims-Hindus Take a Lesson from Jews

विश्व की कुल आबादी में से यहूदियों की संख्या लगभग डेढ़ करोड़ है, जिसमें से लगभग 70 लाख अमेरिका में रहते हैं, 50 लाख यहूदी एशिया में, 20 लाख यूरोप में और बाकी कुछ अन्य देशों में रहते हैं… कहने का मतलब यह कि इज़राईल को छोड़कर सभी देशों में वे “अल्पसंख्यक” हैं। दूसरी तरफ़ दुनिया में मुस्लिमों की संख्या लगभग दो अरब है जिसमें से एक अरब एशिया में, 40 करोड़ अफ़्रीका में, 5 करोड़ यूरोप में और बाकी के सारे विश्व में फ़ैले हुए हैं, इसी प्रकार हिन्दुओं की जनसंख्या लगभग सवा अरब है जिसमें लगभग 80 करोड़ भारत में व बाकी के सारे विश्व में फ़ैले हुए हैं… इस प्रकार देखा जाये तो विश्व का हर पाँचवा व्यक्ति मुसलमान है, प्रति एक हिन्दू के पीछे दो मुसलमान और प्रति एक यहूदी के पीछे सौ मुसलमान का अनुपात बैठता है… बावजूद इसके यहूदी लोग हिन्दुओं या मुसलमानों के मुकाबले इतने श्रेष्ठ क्यों हैं? क्यों यहूदी लोग इतने शक्तिशाली हैं?

प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आईन्स्टीन एक यहूदी थे, प्रसिद्ध मनोविज्ञानी सिगमण्ड फ़्रायड, मार्क्सवादी विचारधारा के जनक कार्ल मार्क्स जैसे अनेकों यहूदी, इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं जिन्होंने मानवता और समाज के लिये एक अमिट योगदान दिया है। बेंजामिन रूबिन ने मानवता को इंजेक्शन की सुई दी, जोनास सैक ने पोलियो वैक्सीन दिया, गर्ट्र्यूड इलियन ने ल्यूकेमिया जैसे रोग से लड़ने की दवाई निर्मित की, बारुच ब्लूमबर्ग ने हेपेटाइटिस बी से लड़ने का टीका बनाया, पॉल एल्हरिच ने सिफ़लिस का इलाज खोजा, बर्नार्ड काट्ज़ ने न्यूरो मस्कुलर के लिये नोबल जीता, ग्रेगरी पिंकस ने सबसे पहली मौखिक गर्भनिरोधक गोली का आविष्कार किया, विल्लेम कॉफ़ ने किडनी डायलिसिस की मशीन बनाई… इस प्रकार के दसियों उदाहरण गिनाये जा सकते हैं जिसमें यहूदियों ने अपनी बुद्धिमत्ता और गुणों से मानवता की अतुलनीय सेवा की है।

पिछले 105 वर्षों में 129 यहूदियों को नोबल पुरस्कार मिल चुके हैं, जबकि इसी अवधि में सिर्फ़ 7 मुसलमानों को नोबल पुरस्कार मिले हैं, जिसमें से चार तो शान्ति के नोबल हैं, अनवर सादात और यासर अराफ़ात(शांति पुरस्कार??) को मिलाकर और एक साहित्य का, सिर्फ़ दो मेडिसिन के लिये हैं। इसी प्रकार भारत को अब तक सिर्फ़ 6 नोबल पुरस्कार मिले हैं, जिसमें से एक साहित्य (टैगोर) और एक शान्ति के लिये (मदर टेरेसा को, यदि उन्हें भारतीय माना जाये तो), ऐसे में विश्व में जिस प्रजाति की जनसंख्या सिर्फ़ दशमलव दो प्रतिशत हो ऐसे यहूदियों ने अर्थशास्त्र, दवा-रसायन खोज और भौतिकी के क्षेत्रों में नोबल पुरस्कारों की झड़ी लगा दी है, क्या यह वन्दनीय नहीं है?

मानव जाति की सेवा सिर्फ़ मेडिसिन से ही नहीं होती, और भी कई क्षेत्र हैं, जैसे पीटर शुल्ट्ज़ ने ऑप्टिकल फ़ायबर बनाया, बेनो स्ट्रॉस ने स्टेनलेस स्टील, एमाइल बर्लिनर ने टेलीफ़ोन माइक्रोफ़ोन, चार्ल्स गिन्सबर्ग ने वीडियो टेप रिकॉर्डर, स्टैनली मेज़ोर ने पहली माइक्रोप्रोसेसर चिप जैसे आविष्कार किये। व्यापार के क्षेत्र में राल्फ़ लॉरेन (पोलो), लेविस स्ट्रॉस (लेविस जीन्स), सर्गेई ब्रिन (गूगल), माइकल डेल (डेल कम्प्यूटर), लैरी एलिसन (ओरेकल), राजनीति और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में येल यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष रिचर्ड लेविन, अमरीकी सीनेटर हेनरी किसींजर, ब्रिटेन के लेखक बेंजामिन डिज़रायली जैसे कई नाम यहूदी हैं। मानवता के सबसे बड़े प्रेमी, अपनी चार अरब डॉलर से अधिक सम्पत्ति विज्ञान और विश्व भर के विश्वविद्यालयों को दान करने वाले जॉर्ज सोरोस भी यहूदी हैं। ओलम्पिक में सात स्वर्ण जीतने वाले तैराक मार्क स्पिट्ज़, सबसे कम उम्र में विंबलडन जीतने वाले बूम-बूम बोरिस बेकर भी यहूदी हैं। हॉलीवुड की स्थापना ही एक तरह से यहूदियों द्वारा की गई है ऐसा कहा जा सकता है, हैरिसन फ़ोर्ड, माइकल डगलस, डस्टिन हॉफ़मैन, कैरी ग्राण्ट, पॉल न्यूमैन, गोल्डी हॉन, स्टीवन स्पीलबर्ग, मेल ब्रुक्स जैसे हजारों प्रतिभाशाली यहूदी हैं।

इसका दूसरा पहलू यह है कि हिटलर द्वारा भगाये जाने के बाद यहूदी लगभग सारे विश्व में फ़ैल गये, वहाँ उन्होंने अपनी मेहनत से धन कमाया, साम्राज्य खड़ा किया, उच्च शिक्षा ग्रहण की और सबसे बड़ी बात यह कि उस धन-सम्पत्ति पर अपनी मजबूत पकड़ बनाये रखी, तथा उसे और बढ़ाया। शिक्षा का उपयोग उन्होंने विभिन्न खोज करने में लगाया। जबकि इसका काला पहलू यह है कि अमेरिका स्थित हथियार निर्माता कम्पनियों पर अधिकतर में यहूदियों का कब्जा है, जो चाहती है कि विश्व में युद्ध होते रहें ताकि वे कमाते रहें। जबकि मुस्लिमों को शिक्षा पर ध्यान देने की बजाय, आपस में लड़ने और विश्व भर में ईसाईयों से, हिन्दुओं से मूर्खतापूर्ण तरीके से लगातार सालों-साल लड़ने में पता नहीं क्या मजा आता है? यहूदियों का एक गुण (या कहें कि दुर्गुण) यह भी है कि वे अपनी “नस्ल” की शुद्धता को बरकरार रखने की पूरी कोशिश करते हैं, अर्थात यहूदी लड़के/लड़की की शादी यहूदी से ही हो अन्य धर्मावलम्बियों में न हो इस बात का विशेष खयाल रखा जाता है, उनका मानना है कि इससे “नस्ल शुद्ध” रहती है (इसी बात पर हिटलर उनसे बुरी तरह चिढ़ा हुआ भी था)।

(भाग-2 में जारी रहेगा…)

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Muslims-Hindus Take a Lesson from Jews

इस लेख के पहले भाग का मकसद सिर्फ़ यहूदियों का गुणगान करना नहीं है, बल्कि यह सोचना है कि आखिर यहूदी इतने शक्तिशाली, बुद्धिमान और मेधावी क्यों हैं? ध्यान से सोचने पर उत्तर मिलता है – “शिक्षा”। इतनी विशाल जनसंख्या और दुनिया के सबसे मुख्य ऊर्जा स्रोत पेट्रोल पर लगभग एकतरफ़ा कब्जा होने के बावजूद मुसलमान इतने कमजोर और पिछड़े हुए क्यों हैं? ऑर्गेनाईज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉन्फ़्रेंस यानी OIC के 57 सदस्य देश हैं, उन सभी 57 देशों में कुल मिलाकर 600 विश्वविद्यालय हैं, यानी लगभग तीस लाख मुसलमानों पर एक विश्वविद्यालय। अमेरिका में लगभग 6000 विश्वविद्यालय हैं और भारत में लगभग 9000। सन् 2004 में एक सर्वे किया गया था, जिसमें से टॉप 500 विश्वविद्यालयों की सूची में मुस्लिम देशों की एक भी यूनिवर्सिटी अपना स्थान नहीं बना सकी। संयुक्त राष्ट्र से सम्बन्धित एक संस्था UNDP ने जो डाटा एकत्रित किया है उसके मुताबिक ईसाई बहुल देशों में साक्षरता दर 90% से अधिक है और 15 से अधिक ईसाई देश ऐसे हैं जहाँ साक्षरता दर 100% है। दूसरी तरफ़ सभी मुस्लिम देशों में कुल साक्षरता दर 40% के आसपास है, और 57 मुस्लिम देशों में एक भी देश या राज्य ऐसा नहीं है जहाँ की साक्षरता दर 100% हो (हमारे यहाँ सिर्फ़ केरल में 90% के आसपास है)। साक्षरता के पैमाने के अनुसार ईसाई देशों में लगभग 40% साक्षर विश्वविद्यालय तक पहुँच जाते हैं जबकि मुस्लिम देशों में यही दर सिर्फ़ 2% है। मुस्लिम देशों में प्रति दस लाख व्यक्तियों पर 230 वैज्ञानिक हैं, जबकि अमेरिका में यह संख्या 4000 और जापान में 5000 है। मुस्लिम देश अपनी कुल आय (GDP) का सिर्फ़ 0.2 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करते हैं, जबकि ईसाई और यहूदी 5% से भी ज्यादा।

एक और पैमाना है प्रति 1000 व्यक्ति अखबारों और पुस्तकों का। पाकिस्तान में प्रति हजार व्यक्तियों पर कुल 23 अखबार हैं, जबकि सिंगापुर जैसे छोटे से देश में यह संख्या 375 है। प्रति दस लाख व्यक्तियों पर पुस्तकों की संख्या अमेरिका में 2000 और मिस्त्र में 20 है। उच्च तकनीक उत्पादों के निर्यात को यदि पैमाना मानें पाकिस्तान से इनका निर्यात कुल निर्यात का सिर्फ़ 1.5 प्रतिशत है, सऊदी अरब से निर्यात 0.3% और सिंगापुर से 58% है।

निष्कर्ष निकालते समय मुसलमानों की बात बाद में करेंगे, पहले हमें अपनी गिरेबान में झाँकना चाहिये। 1945 में दो अणु बम झेलने और विश्व बिरादरी से लगभग अलग-थलग पड़े जापान और लगभग हमारे साथ ही आजाद हुए इज़राइल आज शिक्षा के क्षेत्र में भारत के मुकाबले बहुत-बहुत आगे हैं। आजादी के साठ सालों से अधिक के समय में भारत में प्राथमिक शिक्षा का स्तर और स्कूलों की संख्या जिस रफ़्तार से बढ़ना चाहिये थी वह नहीं बढ़ाई गई। आधुनिक शिक्षा के साथ संस्कृति के मेल से जो शिक्षा पैदा होना चाहिये वह जानबूझकर नहीं दी गई, आज भी स्कूलों में मुगलों और अंग्रेजों को महान दर्शाने वाले पाठ्यक्रम ही पढ़ाये जाते हैं, बचपन से ही ब्रेन-वॉश करके यह बताने की कोशिश होती है कि भारतीय संस्कृति नाम की कोई बात न कभी थी, न है। शुरु से ही बच्चों को “अपनी जड़ों” से काटा जाता है, ऐसे में पश्चिम की दुनिया को जिस प्रकार के “पढ़े-लिखे नौकर” चाहिये थे वैसे ही पैदा हो रहे हैं, और यहाँ से देश छोड़कर जा रहे हैं।

भारत के लोग आज भी वही पुराना राग अलापते रहते हैं कि “हमने शून्य का आविष्कार किया, हमने शतरंज का आविष्कार किया, हमने ये किया था, हमारे वेदों में ये है, हमारे ग्रंथों में वो है, हमने दुनिया को आध्यात्म सिखाया, हमने दुनिया को अहिंसा का संदेश दिया, हम विश्व-गुरु हैं… आदि-आदि। हकीकत यह है कि गीता के “कर्म” के सिद्धान्त को जपने वाले देश के अधिकांश लोग खुद ही सबसे अकर्मण्य हैं, भ्रष्ट हैं, अनुशासनहीन और अनैतिक हैं। लफ़्फ़ाजी को छोड़कर साफ़-साफ़ ये नहीं बताते कि सन् 1900 से लेकर 2000 के सौ सालों में भारत का विश्व के लिये और मानवता को क्या योगदान है? जिन आईआईएम और आईआईटी का ढिंढोरा पीटते हम नहीं थकते, वे विश्व स्तर पर कहाँ हैं, भारत से बाहर निकलने के बाद ही युवा प्रतिभाएं अपनी बुद्धिमत्ता और मेधा क्यों दिखा पाती हैं? लेकिन हम लोग सदा से ही “शतुरमुर्ग” रहे हैं, समस्याओं और प्रश्नों का डटकर सामना करने की बजाय हम हमेशा ऊँची-नीची आध्यात्मिक बातें करके पलायन का रास्ता अपना लेते हैं (ताजा उदाहरण मुम्बई हमले का है, जहाँ दो महीने बीत जाने बाद भी हम दूसरों का मुँह देख रहे हैं, मोमबत्तियाँ जला रहे हैं, गाने गा रहे हैं, हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं, भाषण दे रहे हैं, आतंकवाद के खिलाफ़ शपथ दिलवा रहे हैं, गरज यह कि “कर्म” छोड़कर सब कुछ कर रहे हैं)। हमारी मूल समस्या यह है कि “राष्ट्र” की अवधारणा ही जनता के दिमाग में साफ़ नहीं है, साठ सालों से शिक्षा प्रणाली भी एक “कन्फ़्यूजन” की धुंध में है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि आज तक हम “हिन्दू” नहीं बन पाये हैं, यानी जैसे यहूदी सिर्फ़ और सिर्फ़ यहूदी है चाहे वह विश्व के किसी भी कोने में हो, जबकि हम ब्राह्मण हैं, बनिये हैं, ठाकुर हैं, दलित हैं, उत्तर वाले हैं, दक्षिण वाले हैं, सब कुछ हैं लेकिन “हिन्दू” नहीं हैं। हालांकि मूलभूत शिक्षा और तकनीकी के मामले में हम इस्लामिक देशों से काफ़ी आगे हैं, लेकिन क्या हम उनसे तुलना करके खुश होना चाहिये? तुलना करना है तो अपने से ज्यादा, अपने से बड़े से करनी चाहिये…

संक्षेप में इन सब आँकड़ों से क्या निष्कर्ष निकलता है… कि मुस्लिम देश इसलिये पिछड़े हैं क्योंकि वे शिक्षा में पिछड़े हुए हैं, वे अपनी जनसंख्या को आधुनिक शिक्षा नहीं दिलवा पाते, वे “ज्ञान” आधारित उत्पाद पैदा करने में अक्षम हैं, वे ज्ञान को अपनी अगली पीढ़ियों में पहुँचाने और नौनिहालों को पढ़ाने की बजाय हमेशा यहूदियों, ईसाईयों और हिन्दुओं को अपनी दुर्दशा का जिम्मेदार ठहराते रहते हैं। सारा दिन अल्लाह और खुदा चीखने से कुछ नहीं होगा, शिविर लगाकर जेहादी पैदा करने की बजाय शिक्षा का स्तर बढ़ाना होगा, हवाई जहाज अपहरण और ओलम्पिक में खिलाड़ियों की हत्या करवाने की बजाय अधिक से अधिक बच्चों और युवाओं को शिक्षा देने का प्रयास होना चाहिये। सारी दुनिया में इस्लाम का ही राज होगा, अल्लाह सिर्फ़ एक है, बाकी के मूर्तिपूजक काफ़िर हैं जैसी सोच छोड़कर वैज्ञानिक सोच अपनानी होगी। सभी मुस्लिम देशों को खुद से सवाल करना चाहिये कि मानव जीवन और मानवता के लिये उन्होंने क्या किया है? उसके बाद उन्हें दूसरों से इज्जत हासिल करने की अपेक्षा करना चाहिये। इजराईल और फ़िलीस्तीन के बीच चल रहे युद्ध और समूचे विश्व में छाये हुए आतंकवाद के मद्देनज़र बेंजामिन नेतान्याहू की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि “यदि अरब और मुसलमान अपने हथियार रख दें तो हिंसा खत्म हो जायेगी और यदि यहूदियों ने अपने हथियार रख दिये तो इज़राइल खत्म हो जायेगा…”।

[सन्दर्भ और आँकड़े : डॉ फ़ारुख सलीम (फ़्री लांस पत्रकार, इस्लामाबाद)]

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Kandhar Hijack Indian Society and BJP

हाल ही में गृहमंत्री चिदम्बरम ने एक सेमिनार में कहा कि “कंधार घटना के वक्त कांग्रेस क्या करती” यह कहना बेहद मुश्किल है, क्योंकि वह स्थिति पेचीदा थी और उसमें कई प्रकार की भावनायें भी शामिल थीं, लेकिन इस सवाल से वे कन्नी काट गये कि क्या एनडीए द्वारा आतंकवादियों को छोड़ने के फ़ैसले में कांग्रेस भी शामिल नहीं थी?

आजादी के बाद भारत में सैकड़ों हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो चुके हैं, और स्वाभाविक तौर पर लगभग सभी दंगे कांग्रेस शासित राज्यों में ही हुए हैं, लेकिन जिस तरह अकेले ईसा मसीह को सलीब ढोने पर मजबूर किया गया था, उसी तरह से गुजरात के 2002 के दंगों के लिये अकेले नरेन्द्र मोदी को जिम्मेदार मानकर मीडिया, सेकुलरों की गैंग(?) और तथाकथित पढ़े-लिखे लोग “रुदाली” बने हुए हैं, इस मानसिकता को सिर्फ़ “घृणित” कहना उचित नहीं है इसके लिये कोई और शब्द खोजना पड़ेगा… (इस विशेषण को नरेन्द्र मोदी और ईसा मसीह की तुलना नहीं माना जाये बल्कि उन पर पत्थर फ़ेंकने वाली हजारों मूर्खों की भीड़ पर कटाक्ष समझा जाये, जो आसानी से भारत के इतिहास के सभी दंगो को भुला चुकी है, जबकि गुजरात के दंगों को “बन्दरिया के मरे हुए बच्चे की तरह छाती से चिपकाए” हुए हैं…… मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताने भर से जिस प्रकार कई वरिष्ठ पत्रकारों(?), सेकुलरों(?) और वरिष्ठ ब्लॉगरों(?) के “पेट में मरोड़” उठी उस पर अलग से एक लेख लिखूँगा ही, लेकिन फ़िलहाल इस लेख का विषय मोदी नहीं है)… इसी प्रकार जब कभी आतंकवादियों से बातचीत या कोई समझौता होने की बात आती है तो तत्काल एनडीए के कंधे पर “कंधार” की सलीब रख दी जाती है… हालांकि कंधार की घटना और उसके बाद आतंकवादियों को छोड़ने का जो कृत्य एनडीए ने किया था उसे कभी माफ़ किया ही नहीं जा सकता (भाजपा के कट्टर से कट्टर समर्थक भी इस घटना के लिये पार्टी नेतृत्व को दोषी मानते हैं, और ध्यान रखें कि इस प्रकार की भावनाएं कांग्रेसियों में नहीं पाई जाती कि वे अपने नेतृत्व को सरेआम दोषी बतायें, खुद भाजपा वाले कंधार को अमिट कलंक मानते हैं, जबकि कांग्रेसी, सिख विरोधी दंगों और आपातकाल को भी कलंक नहीं मानते…) कहने का मतलब यह कि कंधार प्रकरण में जो भी हुआ शर्मनाक तो था ही, लेकिन इस विकट निर्णय के पीछे की घटनायें हमारे देश के “आभिजात्य वर्ग” का असली चेहरा सामने रखती हैं, (आभिजात्य वर्ग इसलिये कि नौ साल पहले एयरलाइंस में अमूमन आभिजात्य वर्ग के लोग ही सफ़र करते थे, आजकल मध्यमवर्ग की भी उसमें घुसपैठ हो गई है)… आईये देखते हैं कि कंधार प्रकरण के दौरान पर्दे के पीछे क्या-क्या हुआ, जिसके कारण भाजपा के माथे पर एक अमिट कलंक लग गया…। ऐसा नहीं है कि महान भारत के सार्वजनिक अपमान की घटनायें कांग्रेसियों के राज में नहीं हुईं, हजरत बल, चरारे-शरीफ़ प्रकरण हो या महबूबा मुफ़्ती के नकली अपहरण का मामला हो, कोई न कोई कांग्रेसी उसमें अवश्य शामिल रहा है (वीपी सिंह भी कांग्रेसी संस्कृति के ही थे), लेकिन कंधार का अपहरण प्रकरण हमेशा मीडिया में छाया रहता है और ले-देकर समूचा मीडिया, भाजपा-एनडीए के माथे पर ठीकरा फ़ोड़ता रहता है।

जिस वक्त काठमाण्डू-दिल्ली हवाई उड़ान सेवा IC814 का अपहरण हो चुका था, प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी दिल्ली से बाहर अपने तय दौरे पर थे। जब उनका विमान दिल्ली लौट रहा था उस समय विमान के एयरफ़ोर्स के पायलट को अपहरण की सूचना दी गई थी। चूंकि विमान हवा में था इसलिये वाजपेयी को इस घटना के बारे में तुरन्त नहीं बताया गया (जो कि बाद में विवाद का एक कारण बना)। जब शाम 7 बजे प्रधानमंत्री का विमान दिल्ली पहुँचा तब तक IC-814 के अपहरण के 1 घण्टा चालीस मिनट बीत चुके थे। वाजपेयी को हवाई अड्डे पर लेने पहुँचे थे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र, जिन्होंने तत्काल वाजपेयी को एक कोने में ले जाकर सारी स्थिति समझाई। सभी अपहरणकर्ताओं की पहचान स्थापित हो चुकी थी, वे थे इब्राहीम अतहर (निवासी बहावलपुर), शाहिद अख्तर सईद, गुलशन इकबाल (कराची), सनी अहमद काजी (डिफ़ेंस कालोनी, कराची), मिस्त्री जहूर आलम (अख्तर कालोनी, कराची), और शाकिर (सक्खर सिटी)। विमान में उस वक्त 189 यात्री सवार थे।

प्रधानमंत्री निवास पर तत्काल एक उच्च स्तरीय समिति की मीटिंग हुई, जिसमें हालात का जायजा लिया गया, वाजपेयी ने तत्काल अपने निजी स्टाफ़ को अपने जन्मदिन (25 दिसम्बर) के उपलक्ष्य में आयोजित सभी कार्यक्रम निरस्त करने के निर्देश जारी किये। उसी समय सूचना मिली कि हवाई जहाज को लाहौर में उतरने की इजाजत नहीं दी गई है, इसलिये हवाई जहाज पुनः अमृतसर में उतरेगा। अमृतसर में विमान लगभग 45 मिनट खड़ा रहा और अपहर्ता विभिन्न अधिकारियों को उसमें तेल भरने हेतु धमकाते रहे, और अधिकारी “सिर कटे चिकन” की तरह इधर-उधर दौड़ते रहे, क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था कि इस स्थिति से निपटने के लिये क्या करना चाहिये। प्रधानमंत्री कार्यालय से राजा सांसी हवाई अड्डे पर लगातार फ़ोन जा रहे थे कि किसी भी तरह से हवाई जहाज को अमृतसर में रोके रखो…एक समय तो पूर्व सैनिक जसवन्त सिंह ने फ़ोन छीनकर चिल्लाये कि “कोई भारी ट्रक या रोड रोलर को हवाई पट्टी पर ले जाकर खड़ा कर दो…”, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ। NSG कमाण्डो को अलर्ट रहने का निर्देश दिया जा चुका था, लेकिन 45 मिनट तक अमृतसर में खड़े होने के बावजूद NSG के कमाण्डो उस तक नहीं पहुँच सके। इसके पीछे दो बातें सामने आईं, पहली कि NSG कमाण्डो को अमृतसर ले जाने के लिये सही समय पर विमान नहीं मिल सका, और दूसरी कि मानेसर से दिल्ली पहुँचने के दौरान NSG कमाण्डो ट्रैफ़िक जाम में फ़ँस गये थे, सचाई किसी को नहीं पता कि आखिर क्या हुआ था।

अपहर्ता NSG कमाण्डो से भयभीत थे इसलिये उन्होंने पायलट और यात्रियों पर दबाव बनाने के लिये रूपेन कत्याल की हत्या कर दी और लगभग खाली पेट्रोल टैंक सहित हवाई जहाज को लाहौर ले गये। लाहौर में पुनः उन्हें उतरने की अनुमति नहीं दी गई, यहाँ तक कि हवाई पट्टी की लाईटें भी बुझा दी गईं, लेकिन पायलट ने कुशलता और सावधानी से फ़िर भी हवाई जहाज को जबरन लाहौर में उतार दिया। जसवन्त सिंह ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री से बात की कि हवाई जहाज को लाहौर से न उड़ने दिया जाये, लेकिन पाकिस्तानी अधिकारी जानबूझकर मामले से दूरी बनाना चाहते थे, ताकि बाद में वे इससे सम्बन्ध होने से इन्कार कर सकें। वे यह भी नहीं चाहते थे कि लाहौर में NSG के कमाण्डो कोई ऑपरेशन करें, इसलिये उन्होंने तुरन्त हवाई जहाज में पेट्रोल भर दिया और उसे दुबई रवाना कर दिया। दुबई में भी अधिकारियों ने हवाई जहाज को उतरने नहीं दिया। जसवन्त सिंह लगातार फ़ोन पर बने हुए थे, उन्होंने यूएई के अधिकारियों से बातचीत करके अपहर्ताओं से 13 औरतों और 11 बच्चों को विमान से उतारने के लिये राजी कर लिया। रूपेन कत्याल का शव भी साथ में उतार लिया गया, जबकि उनकी नवविवाहिता पत्नी अन्त तक बन्धक रहीं और उन्हें बाद में ही पता चला कि वे विधवा हो चुकी हैं।

25 दिसम्बर की सुबह – विमान कंधार हवाई अड्डे पर उतर चुका है, जहाँ कि एक टूटा-फ़ूटा हवाई अड्डा और पुरानी सी घटिया विमान कंट्रोल प्रणाली है, न पानी है, न ही बिजली है (तालिबान के शासन की एक उपलब्धि)। 25 दिसम्बर की दोपहर से अचानक ही चारों ओर से प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री निवास और कार्यालय के बाहर जमा होने लगे, छाती पीटने लगे, कपड़े फ़ाड़ने लगे, नारे लगाने लगे, प्रधानमंत्री हाय-हाय, हमारे आदमियों को बचाओ… जैसे-जैसे दिन बीतता गया भीड़ और नारे बढ़ते ही गये। अमृतसर, लाहौर और दुबई में निराशा झेलने के बाद सरकार अपनी कोशिशों में लगी थी कि किसी तरह से अपहर्ताओं से पुनः सही सम्पर्क स्थापित हो सके, जबकि 7 रेसकोर्स रोड के बाहर अपहृत परिवारों के सदस्यों के साथ वृन्दा करात सबसे आगे खड़ी थीं। मुफ़्ती प्रकरण का हवाला दे-देकर मीडिया ने पहले दिन से ही आतंकवादियों की मांगें मानकर “जो भी कीमत चुकानी पड़े… बन्धकों को छुड़ाना चाहिये” का राग अलापना शुरु कर दिया था…

मुल्ला उमर और उसके विदेशमंत्री(?) मुत्तवकील से बातचीत शुरु हो चुकी थी और शुरुआत में उन्होंने विभिन्न भारतीय जेलों में बन्द 36 आतंकवादियों को छोड़ने की माँग रखी। मीडिया के दबाव के चलते एक भी वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री अपहृत व्यक्तियों के परिजनों से मिलने को तैयार नहीं था, लेकिन जसवन्त सिंह हिम्मत करके उनसे मिलने गये, तत्काल सभी लोगों ने उन्हें बुरी तरह से घेर लिया और उनके एक वाक्य भी कहने से पहले ही, “हमें हमारे रिश्तेदार वापस चाहिये…”, “आतंकवादियों को क्या चाहिये इससे हमें क्या मतलब…”, “चाहे आप कश्मीर भी उन्हें दे दो, हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता…”, “मेरा बेटा है, मेरी बहू है, मेरा पति है उसमें…” आदि की चिल्लाचोट शुरु कर दी गई, जबकि जसवन्त सिंह उन्हें स्थिति की जानकारी देने गये थे कि हम बातचीत कर रहे हैं। जसवन्त सिंह ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि देशहित में जेल में बन्द आतंकवादियों को छोड़ना ठीक नहीं है, लेकिन भीड़ में से एक व्यक्ति चिल्लाया “भाड़ में जाये देश और देश का हित…”। इसके बाद जसवन्त सिंह मीडिया के लिये शास्त्री भवन में आयोजित प्रेस कांफ़्रेस में आये, लेकिन वहाँ भी नाटकीय ढंग से भीड़ घुस आई, जिसका नेतृत्व संजीव छिब्बर नाम के विख्यात सर्जन कर रहे थे। उनका कहना था कि उनके 6 परिजन हवाई जहाज में हैं, डॉ छिब्बर का कहना था कि हमें तत्काल सभी 36 आतंकवादी छोड़ देना चाहिये। वे चिल्लाये, “जब मुफ़्ती की बेटी के लिये आतंकवादियों को छोड़ा जा सकता है तो हमारे रिश्तेदारों के लिये क्यों नहीं?… उन्हें कश्मीर दे दो, कुछ भी दे दो, लेकिन हमें हमारे रिश्तेदार वापस चाहिये…”।

उसी शाम को प्रधानमंत्री कार्यालय में स्वर्गीय स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा की पत्नी पहुँचीं, उन्होंने अपहृतों के रिश्तेदारों से मुलाकात कर उनसे बात करके बताने की कोशिश की कि क्यों भारत को इन खतरनाक माँगों को नहीं मानना चाहिये और इससे शहीदों का अपमान होगा, लेकिन “समाज के उन इज्जतदार लोगों” ने ताना मारा कि “खुद तो विधवा हो गई है और चाहती है कि हम भी विधवा हो जायें… ये इधर कहाँ से आई?” फ़िर भी आहूजा की पत्नी देश का सम्मान बनाये रखने के लिये खड़ी रहीं। इसी प्रकार एक और वृद्ध दम्पति भी आये जिन्होंने कहा कि हमारे बेटों ने भी भारत के लिये प्राण दिये हैं, कर्नल वीरेन्द्र थापर (जिनके बेटे लेफ़्टीनेंट कर्नल विजयन्त थापर युद्ध में शहीद हुए थे) ने खड़े होकर सभी लोगों से एकजुट होकर आतंकवादियों के खिलाफ़ होने की अपील की, लेकिन सब बेकार… उन बहरे कानों को न कुछ सुनना था, न उन्होंने सुना… (ध्यान रखिये ये वही आभिजात्य वर्ग था, जो मोमबत्ती जलाने और अंग्रेजी स्लोगन लगाये टी-शर्ट पहनने में सबसे आगे रहता है, ये वही धनी-मानी लोग थे जो भारत की व्यवस्था का जमकर शोषण करके भ्रष्टाचार करते हैं, ये वही “पेज-थ्री” वाले लोग थे जो फ़ाइव-स्टार होटलों में बैठकर बोतलबन्द पानी पीकर समाज सुधार के प्रवचन देते हैं), ऐसे लोगों का छातीकूट अभियान जारी रहा और “जिम्मेदार मीडिया(?)” पर उनकी तस्वीरें और इंटरव्यू भी… मीडिया ने दो-चार दिनों में ही जादू के जोर से यह भी जान लिया कि देश की जनता चाहती है कि “कैसे भी हो…” अपहृतों की सुरक्षित रिहाई की जाना चाहिये…

आखिर 28 दिसम्बर को सरकार और आतंकवादियों के बीच “डील फ़ाइनल” हुई, जिसके अनुसार मौलाना मसूद अजहर, मुश्ताक अहमद जरगर, और अहमद उमर शेख को छोड़ा जाना तय हुआ। एक बार फ़िर जसवन्त सिंह के कंधों पर यह कड़वी जिम्मेदारी सौंपी गई कि वे साथ जायें ताकि अन्तिम समय पर यदि किसी प्रकार की “गड़बड़ी” हो तो वे उसे संभाल सकें। आखिर नववर्ष की संध्या पर सभी अपहृत सकुशल दिल्ली लौट आये… और भाजपा-एनडीए के सबसे बुरे अनुभव को समेटे और मीडिया द्वारा खलनायक करार दिये गये जसवन्त सिंह भी अपना बुझा हुआ सा मुँह लेकर वापस आये। इस प्रकार भारत ने अपमान का कड़वा घूँट पीकर नई सदी में कदम रखा… (जरा इस घटना की तुलना, रूस में चेचन उग्रवादियों द्वारा एक सिनेमा हॉल में बन्धक बनाये हुए बच्चों और उससे निपटने के तरीके से कीजिये, दो राष्ट्रों के चरित्र में अन्तर साफ़ नज़र आयेगा)।

इस घटना ने हमेशा की तरह सिर्फ़ और सिर्फ़ सवाल खड़े किये (जवाब पाने या माँगने की परम्परा हमारे यहाँ कभी थी ही नहीं)। न ही नौ साल पहले हमने कोई सबक सीखा था, न ही दो महीने पहले हुए मुम्बई हमले के बाद कुछ सीखने को तैयार हैं। एक और कंधार प्रकरण कभी भी आसानी से मंचित किया जा सकता है, और भारत की जनता में इतनी हिम्मत नहीं लगती कि वह आतंकवादियों के खिलाफ़ मजबूती से खड़ी हो सके। हो सकता है कि एक बार आम आदमी (जो पहले ही रोजमर्रा के संघर्षों से मजबूत हो चुका है) कठोर बन जाये, लेकिन “पब संस्कृति”, “रेव-पार्टियाँ” आयोजित करने वाले नौनिहाल इस देश को सिर्फ़ शर्म ही दे सकेंगे। किसी भी प्रकार के युद्ध से पहले ही हम नुकसान का हिसाब लगाने लगते हैं, लाशें गिनने लगते हैं। पाकिस्तान के एक मंत्री ने बिलकुल सही कहा है कि भारत अब एक “बनिया व्यापारी देश” बन गया है वह कभी भी हमसे पूर्ण युद्ध नहीं लड़ सकेगा। डरपोक नेताओं और धन-सम्पत्ति को सीने से चिपकाये हुए अमीरों के इस देश में अपनी कमजोरियाँ स्वीकार करने की ताकत भी नहीं बची है… भ्रष्टाचार या आतंकवाद से लड़ना तो बहुत दूर की बात है…

सन्दर्भ, आँकड़े और घटनायें : कंचन गुप्ता (तत्कालीन प्रधानमंत्री कार्यालय के मीडिया सेल में पदस्थ पत्रकार) के लेख से…

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Bharat Bhawan Culture Politics & BJP

1982 में चार्ल्स कोरिया द्वारा डिजाइन किया हुआ “भारत भवन” भोपाल ही नहीं बल्कि समूचे देश की एक धरोहर है। इस के मूलतः चार प्रखण्ड हैं, “रूपंकर” (फ़ाइन आर्ट्स का म्यूजियम), “रंगमण्डल” (नाटकों हेतु), “वागर्थ” (कविता और साहित्य सम्बन्धी लायब्रेरी) और “अनहद” (शास्त्रीय और लोक संगीत का पुस्तकालय)। कला और संस्कृति के विकास और साहित्य के प्रचार-प्रसार की गतिविधियों में लगे हुए इस संस्थान के बारे में पहले भी कई सकारात्मक और नकारात्मक खबरें आती रही हैं। ताजा खबर यह है कि “वागर्थ” के अन्तर्गत भारत भवन से एक आलोचनात्मक पत्रिका निकलती है “पूर्वग्रह”, इसे नये कलेवर के साथ पुनः प्रकाशित किया जा रहा है और इसका लोकार्पण 4 फ़रवरी को दिल्ली में डॉ नामवर सिंह करेंगे।




राज्य में चलने वाले किसी भी प्रकार के संस्थान में जब कोई गतिविधि होती है तो उसमें राज्य सरकार का हस्तक्षेप भले ही न हो लेकिन उसकी जानकारी में उस गतिविधि या उससे सम्बन्धित कार्यकलापों की जानकारी उच्च स्तर तक होती ही है और होना चाहिये भी। चूंकि भारत भवन सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र है और इसके कर्ताधर्ता अन्ततः सरकार के ही नुमाइन्दे होते हैं, चाहे वे प्रशासकीय अधिकारी हों या कोई अन्य। जब इस सम्बन्ध में मध्यप्रदेश के संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकान्त शर्मा से फ़ोन पर चर्चा हुई तो उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। यानी कि 4 फ़रवरी को भारत भवन द्वारा आयोजित दिल्ली में होने वाले एक विशेष समारोह और पुस्तक विमोचन की जानकारी मंत्री जी को 31 जनवरी तक नहीं दी गई या नहीं पहुँची, यह घोर आश्चर्य का विषय है।

उल्लेखनीय है कि डॉ नामवर सिंह खुले तौर पर भाजपा-संघ की विचारधारा के आलोचक और भारतीय संस्कृति को पानी पी-पीकर कोसने वालों में से हैं। अब सवाल उठता है कि जब मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है तो “वागर्थ” द्वारा आयोजित लोकार्पण समारोह में नामवर सिंह जैसे व्यक्ति को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाने और महिमामण्डित करने का क्या औचित्य है? क्या इससे नामवर सिंह भाजपा-संघ से खुश हो जायेंगे? या फ़िर भाजपा शासित सरकारें अपनी छवि(?) सुधारने के लिये ऐसी कोई भीषण सदाशयता दिखा रही हैं कि वे अपने घोर विरोधियों को भी सम्मान देने में नहीं हिचक रहीं? या, क्या भाजपा सरकार में नौकरशाही-अफ़सरशाही इतनी मनमानी करने लगी है कि प्रदेश के संस्कृति मंत्री को ही कार्यक्रम की जानकारी नहीं दी गई? क्या कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों के किसी कार्यक्रम में संघ की विचारधारा वाले किसी व्यक्ति को बुलाया जाता है? यदि नहीं, तो फ़िर नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, खुशवन्त सिंह, शबाना आजमी आदि जैसे घोषित रूप से संघ विरोधी लोगों के प्रति भाजपा के मन में प्रेम क्यों उमड़ना चाहिये?

भाजपा विरोधियों को सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन आम लोगों खासकर संघ और भाजपा के निचले स्तर के कार्यकर्ता से बात कीजिये तो अक्सर उनका यह दर्द उभरकर सामने आता है कि भाजपा की सरकार में संघ के जमीनी कार्यकर्ताओं के मामूली ट्रांसफ़र जैसे वाजिब काम ही नहीं हो पाते, जबकि कांग्रेसी व्यक्ति, कैसी भी सरकार हो, अपना गैरवाजिब काम भी करवा लेते हैं। इसे क्या कहा जाये? भाजपा का कांग्रेसीकरण, कार्यकर्ताओं के त्याग की उपेक्षा या प्रशासनिक नाकामी? भाजपा का यही रवैया भारतीय संस्कृति के बारे में भी है, जब वे सत्ता से बाहर होते हैं तब हिन्दू विरोधी पाठ्यक्रमों, पुस्तकों, पेंटिंग्स आदि पर खूब विरोध जताते हैं, लेकिन सत्ता में आते ही याददाश्त गुम हो जाती है।

मई 2007 में भारत भवन में चित्रकार कैलाश तिवारी की चित्र प्रदर्शनी लगी थी, जिसमें गोधरा के ट्रेन जलाये जाने की एक पेंटिंग थी। स्थानीय मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया और प्रदर्शनी बन्द कर दी गई। आगामी 13 फ़रवरी को भारत भवन का वार्षिकोत्सव होने जा रहा है, उसमें एक कवि सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है, पता चला है कि उसमें से 70% कवि कम्युनिस्ट विचारधारा वाले हैं, और अब नामवर सिंह से “पूर्वग्रह” का विमोचन करवाने जैसी हरकत… ऐसा क्यों किया जा रहा है और हो कैसे रहा है, यही सोच-सोचकर हैरानी होती है, कि इसका क्या अर्थ निकाला जाये?

मैं जानता हूँ कि इस लेख के विरोध में कई कथित “संस्कृति प्रेमी” उठ खड़े होंगे और कला-संस्कृति-साहित्य में किसी राजनैतिक हस्तक्षेप या तथाकथित राजनैतिक दखल-अंदाजी के विरोध की मुद्रा अपनाने की कोशिश करेंगे, लेकिन जेएनयू के कम्युनिस्ट हों, ICHR से पैसा लेकर विकृत भारतीय इतिहास लिखने वाले हों या जमाने भर के नकली फ़ाउण्डेशनों के द्वारा “संस्कृति” की सेवा(?) करने वाले हों, वे खुद जानते हैं कि वे भीतर से कितने खोखले हैं। दुःख तो इस बात का है कि सत्ता का फ़ायदा उठाकर कम्युनिस्ट और कांग्रेसी तो अपनी विचारधारा फ़ैलाने वालों को प्रश्रय देते हैं, खुलेआम अनुदान देते हैं, विभिन्न हिन्दू विरोधी और संघ विरोधी संस्थाओं को पैसा देते हैं, जबकि भाजपा दूसरी बार पूर्ण बहुमत मिलने के बावजूद भारत भवन जैसी संस्था के कार्यक्रम में “भारतीयता विरोधी व्यक्ति” को प्रमुखता दे रही है…। इस समय जबकि देश एक वैचारिक लड़ाई के दौर से गुजर रहा है, ऐसे वक्त में भाजपा को अपने बौद्धिक और वैचारिक समर्थकों को आगे बढ़ाना चाहिये या किसी और को? या फ़िर संघ कार्यकर्ताओं, भाजपा समर्थक बुद्धिजीवियों, लेखकों का काम सिर्फ़ सभाओं में दरियाँ उठाना और भूखे पेट गाँव-गाँव जाकर प्रचार करना भर है? इतनी छोटी सी बात मेरे जैसा अदना व्यक्ति समझाये, यह उचित नहीं है…


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Muslim Reservation in India, Congress & Minority Politics

विश्व के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे प्रधानमंत्री माननीय मनमोहन सिंह का यह बयान कि “देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है…” अब जोर-शोर से अपना रंग दिखाने लगा है, जाहिर है कि आम चुनाव सिर पर हैं, “कौए” बोलने लगे हैं और “सियार” गुफ़ाओं से बाहर आ चुके हैं। रविवार (दिनांक 1 फ़रवरी 2009) को दिल्ली में आयोजित मुस्लिम आरक्षण सम्बन्धी राष्ट्रीय अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए विभिन्न वक्ताओं ने सरकार से एक सुर में मुसलमानों को आरक्षण देने की माँग की। तमाम मुस्लिम संगठनों के नेताओं का कहना था कि उन्हें जनसंख्या के अनुपात में और पिछड़ेपन की वजह से सरकारी नौकरियो में आरक्षण मिलना चाहिये। इस सिलसिले में एक संयुक्त कमेटी बनाकर सरकार से कम से कम 10 प्रतिशत का आरक्षण माँगा गया है। हालांकि अधिकतर वक्ताओं ने रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफ़ारिशों को मानने का आग्रह करते हुए 15% आरक्षण की माँग की, साथ ही यह माँग भी रखी गई कि मुस्लिमों और ईसाई दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाये। सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री एएम अहमदी ने कहा कि “मुस्लिम गत 60 साल से समाज के हाशिये पर हैं (यानी कौन सा दल जिम्मेदार हुआ?), और मुसलमानों के साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगातार भेदभाव होता रहा है, उन्हें मुख्यधारा (फ़िर मुख्यधारा का राग) में लाने के लिये “सच्चर” कमेटी की रिपोर्ट को पूरी तरह से लागू किया जाये…”।

इस अवसर पर रामविलास पासवान (एक और “शर्मनिरपेक्ष” नेता) ने कहा कि “सच्चर कमेटी ने पाया है कि मुस्लिम आबादी की सामाजिक और आर्थिक स्थिति भारत की अनुसूचित जनजातियों के बराबर ही है… इसे देखते हुए उच्चतम न्यायालय द्वारा जो 50% प्रतिशत आरक्षण की सीमा तय की गई है, उसे बढ़ाना उचित होगा, क्योंकि मण्डल आयोग ने पिछड़ी जातियों को 52% आरक्षण देने की सिफ़ारिश की थी, जबकि उन्हें सिर्फ़(?) 27% आरक्षण दिया जा रहा है… और अधिकतम 50% आरक्षण की सीमा व्यवहारिक नहीं है…” (यानी पासवान अपने दलित हिस्से में से मुसलमानों को आरक्षण नहीं देंगे, अलग से चाहिये)। भाकपा के एबी बर्धन ने कहा कि “मुसलमानों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज समाज से कटा हुआ और निराश महसूस कर रहा है और देश के लिये यह एक खतरनाक संकेत है…” (यानी कि बर्धन साहब मुसलमानों का उत्साहवर्धन करते हुए पश्चिम बंगाल के सभी जिलों को मुस्लिम बहुल बनाकर ही दम लेंगे)।

हालांकि अधिकतर नेताओं के सुर थोड़े धीमे थे, लेकिन सबसे खतरनाक बयान था स्टूडेण्ट इस्लामिक ऑर्गेनाइज़ेशन के सचिव शाहनवाज़ का, उन्होंने कहा कि “मुसलमानों को आरक्षण सरकार से भीख में नहीं चाहिये, यह मुसलमानों का हक है…” (सुन रहे हैं मनमोहन सिंह जी, आपकी कोशिशें रंग लाई हैं)। शाहनवाज़ ने आगे कहा कि “हमारे लिये आरक्षण कोई खैरात नहीं है, मुस्लिम इस देश की आबादी का 23 प्रतिशत हैं, जिसमें से 10% मुस्लिमों को आरक्षण की आवश्यकता नहीं है, लेकिन बाकी के 12% मुसलमानों को नौकरियों में 12% आरक्षण चाहिये…। 10% आरक्षण तो कम है, 15% आरक्षण ज्यादा लगता है, इसलिये हम 12% आरक्षण की माँग करते हैं (यह देश पर उनका अहसान है)। मुस्लिम द्रविड़ मुनेत्र कषगम के इब्नैस मुहम्मद कहते हैं, “हमें देश को एक कारपोरेट कम्पनी की तरह देखना चाहिये, इस हिसाब से मुसलमानों का 15% शेयर इस कम्पनी में बनता ही है…” (अब कोई इस शेयर होल्डर को जाकर बताये कि “कम्पनी” को बरबाद करने में इसका शेयर कितना है)।

आंध्रप्रदेश के ईसाई मुख्यमंत्री रेड्डी द्वारा 5% आरक्षण देने के बावजूद “शर्मनिरपेक्षता” के इस खुले नाच के बाद हमेशा की तरह अनसुलझे सवाल उठते हैं कि, मुसलमानों को हमेशा पिछड़ा, अशिक्षित और भयग्रस्त रखने वाली कांग्रेस आखिर इनके वोटों के लिये इन्हें कितनी बार और कितने साल तक उपयोग करती रहेगी? मुसलमानों को तथाकथित “मुख्यधारा”(?) में लाने के बहुतेरे प्रयास पहले भी किये गये, लेकिन “कठमुल्लों” के अत्यधिक नियन्त्रण के कारण वे इस धारा से बाहर ही रहे, इसमें किसकी गलती है? मुसलमानों को मदरसे छोड़कर सीबीएसई या राज्य के स्कूलों में पढ़ने से किसने रोका था, क्यों नहीं वे कम से कम बच्चे पैदा करके खुद की गरीबी दूर कर लेते?

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सचमुच मुसलमान राष्ट्र की मुख्यधारा में आना भी चाहते हैं या नहीं? यदि वाकई में वे मुख्यधारा में आना चाहते हैं तो पहले उन्हें अपने दिमाग खुले करने पड़ेंगे, ये नहीं चलेगा कि वे मुख्यधारा में भी आना चाहें और शरीयत के कानून(?) भी चाहें, ऐसा नहीं हो सकता कि वे मदरसों को आधुनिक बनाने के लिये पैसा माँगते रहें और लड़के-लड़कियों की सहशिक्षा को इस्लाम-विरोधी बताते रहें (हाल ही में उप्र के एक उलेमा ने सहशिक्षा वाले स्कूलों के खिलाफ़ फ़तवा जारी किया है), कश्मीर में लड़कियाँ स्कूल की साधारण वेशभूषा में भी स्कूल नहीं जा सकती हैं, सरेआम उनके चेहरे पर तेजाब फ़ेंका जा रहा है और “शर्मनिरपेक्ष मीडिया” को मंगलोर की घटनायें अतिवादी लग रही हैं (शर्म की बात तो है, मगर भाजपा या हिन्दूवादी संगठनों की बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना और मुस्लिम कट्टरपंथियों की हरकतों को नज़र-अंदाज़ करना शर्मनिरपेक्ष लोगों का एक पुराना खेल है)।

अब एक महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि सभी तरह का जाति आधारित आरक्षण पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाये, नया फ़ार्मूला इस प्रकार हो कि - जिस “परिवार में सिर्फ़ एक बच्चा” हो उसे 5%, विकलांगों के लिये 10%, महिलाओं के लिये 20%, आर्थिक रूप से अति-गरीब सभी जातियों-धर्मों के लोगों के लिये 30% तथा सेना-अर्धसैनिक बलों-पुलिस वालों के परिजनों तथा शहीदों के उत्तरजीवियों के लिये 10% आरक्षण दिया जाये। इस फ़ार्मूले से एक तो जनसंख्या पर रोक लगाने में मदद मिलेगी तो दूसरी ओर सेना और पुलिस में भरती होने का एक और आकर्षण बढ़ेगा, गरीबों का सच में फ़ायदा होगा। बाकी के आर्थिक रूप से सक्षम लोगों, जातियों, धर्मों आदि को आरक्षण की क्या जरूरत है?

लेकिन जो पार्टी 60 साल से वोट-बैंक की राजनीति के आधार पर ही इस देश में टिकी हुई है, आज की तारीख में कथित “युवा शक्ति और युवा सोच”(?) का ढोल पीटने के बावजूद उसमें इस प्रकार का राजनैतिक “प्रस्ताव रखने तक की” हिम्मत नहीं है… अमल में लाना तो बहुत दूर की बात है।

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Pink Chaddi Campaign, Women Liberation and Mangalore Pub Incidence

दिल्ली स्थित एक स्वयंभू पत्रकार महोदया हैं निशा सूसन, इन्होंने श्री राम सेना के प्रमोद मुतालिक के विरोध करने के लिये वेलेण्टाइन डे के अवसर पर सभी पब जाने वाली लड़कियों और महिलाओं से अनुरोध किया है कि वे 14 फ़रवरी को बंगलोर स्थित श्रीराम सेना के दफ़्तर में “गुलाबी चड्डियाँ” (गुलाबी रंग की महिला अण्डरवियर) भेजें। इन आभिजात्य वर्ग की महोदया (जो पत्रकार हैं तो जाहिर है कि पढ़ी-लिखी भी होंगी) का कहना है कि पब जाने वाली महिलाओं के समर्थन में यह एक अनूठा विरोध प्रदर्शन है। (इनका छिछोरा ब्लॉग यहाँ देखें)

इस तथाकथित “महिला समर्थक”(???) अभियान के अनुसार दिल्ली, मुम्बई, पुणे, हैदराबाद आदि शहरों में 11-12 फ़रवरी तक गुलाबी अंडरवियर एकत्रित की जायेंगी और उन्हें 14 फ़रवरी को श्रीराम सेना को भेजा जायेगा। नारी स्वतन्त्रता की पक्षधर निशा सूसन ने सभी महिलाओं (जाहिर है हाई सोसायटी की) से आव्हान किया है कि 14 फ़रवरी के दिन वे पब-बार आदि में भीड़ करें, श्रीराम सेना का नाम लेकर “चियर्स” करें और खूब “मस्ती”(???) करें। एक इंटरव्यू (जो कि उन्हीं जैसे किसी विद्वान ने उनसे लिया होगा) में इस महान महिला ने कहा कि चूँकि “गुलाबी” एक स्त्री रंग माना जाता है इसलिये उन्हें गुलाबी अन्तर्वस्त्र भेजने का आयडिया आया, साथ ही गुलाबी रंग कलर चार्ट स्पेक्ट्रम में “खाकी” के ठीक सामने आता है, सो “खाकी चड्डी” का विरोध करने के लिये यह “गुलाबी चड्डी” अभियान जारी किया गया है।

हालांकि अभी इस बात की पुष्टि होना बाकी है कि इस कथित नारी मुक्ति आन्दोलन के पीठ पीछे “तहलका” का हाथ है या नहीं, क्योंकि इन मोहतरमा का पता है –

निशा सूसन (9811893733)
द्वारा – तहलका
M-76, “M” Block Market
Greater Kailash, Delhi

यदि इस मुहिम को “तहलका” का समर्थन हासिल है तब तो यह विशुद्ध रूप से एक राजनैतिक अभियान है, क्योंकि तहलका की विश्वसनीयता और उसकी निष्पक्षता पहले से ही सन्देह के घेरे में है। “वेलेन्टाइन डे के दिन पब-बार को भर दो” का आव्हान तो निश्चित रूप से दारू कम्पनियों द्वारा प्रायोजित लगता है (क्योंकि पैसे के लिये इस प्रकार की पत्रकार कुछ भी कर सकते हैं) और यदि यह मुहिम निशाजी ने स्वयंस्फ़ूर्त ढंग से पैदा किया है तब तो इनकी मानसिक कंगाली पर तरस ही किया जा सकता है, लेकिन दिक्कत यह है ऐसे “मानसिक कंगाल” मीडिया के चहेते बने हुए हैं और इनका यथोचित “इलाज” करना बेहद आवश्यक होता जा रहा है। “गुलाबी चड्डी” को एकत्रित करने का काम भी अधिकतर महिलाओं ने ही संभाल रखा है, जो भी इच्छुक हों वे दिव्या (9845535406), रत्ना (09899422513) से भी सम्पर्क कर सकते हैं।

अब इस कथित अनूठे विरोध प्रदर्शन से कई सवाल खड़े होते हैं,

1) गुलाबी चड्डी और पब का आपस में क्या सम्बन्ध है?

2) क्या श्रीराम सेना को गुलाबी चड्डियां भेजने से पब-बार में जाने वाली महिलाओं को नैतिक बल मिलेगा?

3) क्या रत्ना जी को यह मालूम है कि गोवा में स्कारलेट नाम की एक लड़की के साथ बलात्कार करके उसकी हत्या की गई थी और उसमें गोवा के एक मंत्री का बेटा भी शामिल है, और वे वहाँ कितनी बार गई हैं?

4) क्या निशा जी को केरल की वामपंथी सरकार द्वारा भरसक दबाये जाने के बावजूद उजागर हो चुके “सिस्टर अभया बलात्कार-हत्याकांड” के बारे में कुछ पता है?

5) इंटरव्यू लेने वाले पत्रकार को दिल्ली की ही एक एमबीए लड़की के बलात्कार के केस की कितनी जानकारी है?

6) जिन उलेमाओं ने सह-शिक्षा को गैर-इस्लामी बताया है क्या उन्हें भी निशा जी गुलाबी चड्डी भेजेंगी? या यह विशेष कृपा सिर्फ़ भाजपा की कर्नाटक सरकार और श्रीराम सेना के लिये है?

7) कश्मीर में आतंकवादियों ने कई लड़कियों से बन्दूक की नोक पर शादी कर ली है, क्या दिव्या जी गुलाबी चड्डियों का एक बन्डल श्रीनगर भिजवा सकती हैं?

8) तसलीमा नसरीन भी तो औरत ही है जो कलकत्ता, जयपुर और न जाने कहाँ-कहाँ मारी-मारी फ़िर रही थी, तब यह “तहलका” कहाँ चला गया था?

9) यदि प्रमोद मुतालिक इन सभी चड्डियों के साथ चिठ्ठी लगाकर वापस भेजें कि “…कल शायद पब में आप नशे में अपनी गुलाबी चड्डी वहीं भूल गई थीं और इसे गलती से मेरे पास भेज दिया गया है, कृपया वापस ले लीजिये…” तो क्या इसे अश्लीलता समझा जायेगा?

10) सबसे अन्तिम और महत्वपूर्ण सवाल कि क्या भारत में नारी स्वतन्त्रता आन्दोलन का यह एक नया, बदला हुआ और परिष्कृत रूप है? (इस विषय पर महिला लेखिकाओं और ब्लॉगरों के विचार जानना भी दिलचस्प रहेगा)

नोट : चूंकि यह मुहिम एक महिला द्वारा शुरु की गई है, इसलिये यह लेख बनती कोशिश सभ्य भाषा में लिखा गया है, जिसे “भारतीय संस्कृति” का एक हिस्सा माना जा सकता है, और जिसका नाम भी इन “पेज-थ्री महिलाओं” ने शायद नहीं सुना होगा… और इस लेख को श्रीराम सेना द्वारा मंगलोर में किये गये कृत्य का समर्थन नहीं समझा जाये…

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Legal Notice to Renuka Choudhary quoting Mangloreans as Taliban

कर्नाटक के प्रसिद्ध वकील श्री पीपी हेगड़े द्वारा मंगलोर शहर के कुछ प्रमुख नागरिकों और संगठनों की तरफ़ से केन्द्रीय मंत्री रेणुका चौधरी जी को एक संयुक्त नोटिस भेजा गया है, उसका मजमून इस प्रकार से है –

प्रति,
श्रीमती रेणुका चौधरी
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय
भारत सरकार, नई दिल्ली

नोटिस
निम्नलिखित के निर्देशानुसार –
1) श्री गणेश होसाबेत्तु (मंगलोर शहर के माननीय मेयर)
2) श्री रमेश वासु (एक उद्योगपति, मंगलोर)
3) श्री अनवर मणिप्पादि (भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष)
4) श्री मेलविन फ़र्नांडीज़, निवासी मंगलोर
5) श्री हसन साब (संगठन “युवाशक्ति” के अध्यक्ष)
6) श्रीमती नलिनी शेट्टी (स्त्री शक्ति ग्रुप मंगलोर की अध्यक्षा)
एवं अन्य कई संगठनों की ओर से –
मैं पीपी हेगड़े आपके नोटिस में लाना चाहता हूँ कि –

1) आपने सार्वजनिक रूप से बयान दिया है कि “मंगलोर का तालिबानीकरण हो रहा है…” और “मंगलोर का तालिबानीकरण हो चुका है…”। आपने आगे एक बयान में कहा है कि “मंगलोर में साफ़ तौर पर धार्मिक विभाजन हो चुका है, जहाँ एक हिन्दू लड़की को मुसलमान लड़के के साथ जाने से रोका गया है…”

2) आपके यह विभिन्न बयान अनेक अखबारों में 7 और 8 फ़रवरी को प्रकाशित हो चुके हैं, और पूरे मंगलोर शहर में वितरित भी हो चुके हैं। मंगलोर शहर की जनता अपने ऊपर लगाये गये इन आरोपों से हैरान और व्यथित है।

3) मंगलोर शहर का एक प्रतिष्ठित इतिहास है और यहाँ कई धर्मों के पवित्र मकबरे भी हैं। यह शहर अपने शिक्षा केन्द्रों और धार्मिक सदभावना के लिये भी मशहूर है। मंगलोर शहर के लोग विभिन्न तरीकों से देशसेवा के काम में लगे हुए हैं और उन्हें अपने देश से प्रेम है।

4) तालिबान और तालिबानीकरण नामक शब्द का सन्दर्भ आतंकवाद, आतंकवादियों और अफ़गानिस्तान के कुछ गुटों का प्रतिनिधित्व करता है। प्रत्येक भारतीय के लिये “तालिबान” का अर्थ भारत-विरोधी और मानवता-विरोधी ही है। “तालिबान” और “तालिबानीकरण” शब्द मंगलोर निवासियों के लिये एक अपशब्द के रूप में उपयोग किया गया है। किसी एक घटना के लिये समूचे मंगलोर शहर को जिसमें हिन्दू, मुस्लिम ईसाई सभी रहते हैं, तालिबान की संज्ञा देना अधार्मिक कृत्य है और जनता के विश्वास को चोट पहुँचाने वाला है। मंगलोर शहर की जनता “तालिबान” और “तालिबानीकरण” शब्द से घृणा करती है।

5) आपके इन बयानों से इस शहर और मंगलोर के निवासियों का “तालिबान” कहे जाने से अपमान हुआ है, यह आपके द्वारा मंगलोर की भावनाओं के साथ किया गया गम्भीर अपराध है।

6) एक जिम्मेदार केन्द्रीय मंत्री होने के बावजूद आपने मंगलोर निवासियों को तालिबान के समकक्ष रखकर बेहद गैर-जिम्मेदारी का काम किया है और उनकी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाई है।

7) आपके इस प्रकार के लगातार आये बयानों से मेरे मुवक्किलों को यह आभास होता है कि आप जानबूझकर दो समुदायों के बीच अविश्वास और दुश्मनी फ़ैलाने का काम कर रही हैं और इन बयानों से मंगलोर शहर की शान्ति भंग होने का खतरा है।

8) आपके यह बयान राष्ट्रीय एकता के प्रति भी पूर्वाग्रह से ग्रसित लगते हैं क्योंकि तालिबान खुले तौर पर भारत का विरोधी है और इस देश को खत्म करने का दावा करता है। “तालिबान” कहकर आपने मंगलोर वासियों के देशप्रेम पर शक किया है, हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्धी एकाध घटना का उल्लेख करके आपने हिन्दू-मुस्लिम समुदायों के बीच नफ़रत बढ़ाने का काम किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि राजनैतिक फ़ायदे के लिये यह बयान देकर आपने मंगलोर शहर में दुर्भावना फ़ैलाने का काम किया है।

9) आपके बयानों की वजह से मंगलोर के बाहर रहने वाले अन्य भारतीयों के मन में मंगलोर की छवि खराब हुई है, जिसकी वजह से मेरे मुवक्किलों के आर्थिक सम्बन्धों और कार्य-व्यवसाय पर विपरीत असर पड़ने की आशंका है। मंगलोर शहर की आर्थिक उन्नति को भी इन बयानों से धक्का पहुँच सकता है।

10) मेरे मुवक्किलों की माँग है आप ऊपर दर्शाये गये सभी बयानों को तत्काल सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगकर वापस लें, आप नोटिस प्राप्त होने के तीन दिन के भीतर मंगलोर शहर के निवासियों से उनकी भावनायें दुखाने के लिये भी माफ़ी माँगें।

11) यदि आप ऐसा नहीं करती हैं तो मेरे मुवक्किलों की ओर से आप पर न्यायालय में आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जायेगा जिसकी पूरी जिम्मेदारी आपकी होगी।

पीपी हेगड़े
अधिवक्ता, मंगलोर

चलते-चलते : हो सकता है कि मामला कुछ आगे बढ़े तथा आये दिन भाजपा-संघ के बहाने तालिबान-तालिबान भजने वाले कुछ संगठनों, नेताओं और सेक्यूलरों (SICKular) के मुँह पर कुछ दिन तक ताला लगे… यह भी देखना है कि माननीया मंत्री द्वारा "पब भरो आन्दोलन" को समर्थन देने पर कोई केस बनता है या नहीं?

स्रोत : दीपक कामत

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Rafique Zakaria, Indian Muslims, Congress and Secularism

पाठकों को लगेगा कि यह किसी संघ-भाजपा के नेता के विचार हैं, यदि यही बातें नरेन्द्र मोदी या आडवाणी किसी सार्वजनिक सभा में कहते तो “सेकुलर मीडिया” और उनके लगुए-भगुए खासा बवाल खड़ा कर देते, लेकिन नहीं… उक्त विचार प्रख्यात मुस्लिम राजनीतिज्ञ और विद्वान डॉ रफ़ीक ज़कारिया के हैं। डॉ ज़कारिया ने अपनी पुस्तक “कम्यूनल रेज इन सेक्यूलर इंडिया” (पापुलर प्रकाशन, सितम्बर 2002) मे मुसलमानों के व्यवहार और उनकी सोच पर “मुसलमानों को क्या करना चाहिये” नाम से एक पूरा एक अध्याय लिखा है। यह पुस्तक उन्होंने गोधरा दंगों के बाद लिखी थी… डॉ ज़कारिया का निधन 9 जुलाई 2005 को हुआ।

गत कुछ वर्षों में मुस्लिमों के लिये अलग से वित्तीय बजट, अल्पसंख्यकों के लिये अलग से मंत्रालय, सच्चर कमेटी द्वारा आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े मुसलमानों की पहचान करना और विभिन्न सुझाव देना, हज सब्सिडी की रकम बढ़ाना, नौकरियों में आरक्षण का हक जताना आदि कई ऐसे काम हैं जो कि UPA सरकार ने समय-समय पर मुस्लिमों के लिये (वोट बैंक मानकर) किये हैं, वैसे भी कांग्रेस तो 1947 से ही मुसलमानों के फ़ायदे के लिये विभाजन से लेकर उनकी हर माँग मानती आ रही है, फ़िर चाहे देश के अन्य धर्मावलम्बियों पर इसका कुछ भी असर हो। सिख, जैन और बौद्ध भी अल्पसंख्यक हैं यह बात लगता है कि कांग्रेस भूल चुकी है। ईसाईयों पर भी कांग्रेस का “विशेष ध्यान” तब से ही जाना शुरु हुआ, जब उनके खानदान में एंटोनिया माइनो बहू बनकर पधारीं, वरना अल्पसंख्यक का मतलब सिर्फ़ और सिर्फ़ मुसलमान होता है यह हमारी “महान सेकुलर प्रेस और मीडिया” ने भी मान लिया लगता है।

ऐसा प्रतीत होता है कि मुस्लिम नेतृत्व और कठमुल्लों ने विगत 60 सालों में सिवाय हक मांगने और सरकारों को वोट की ताकत के बल पर धमकाने के अलावा कुछ नहीं किया। पाकिस्तान मांगने से लेकर आरक्षण माँगने तक एक बार भी इन मुस्लिम नेताओं ने “देश के प्रति कर्त्तव्य” को याद नहीं रखा, और रीढ़विहीन कांग्रेस ने सदा इनके सामने लोट लगाई, मुसलमानों को अशिक्षित और गरीब बनाये रखा और देश को सतत गुमराह किया। जब किसी समाज या समुदाय को कोई अधिकार या सुविधायें दी जाती हैं तो देश और सरकार को यह अपेक्षा होती है कि इसके बदले में वह समाज देश की उन्नति और सुरक्षा के लिये काम करेगा और देश को और ऊँचे ले जायेगा। क्या कभी मुस्लिम नेतृत्व ने आत्मपरीक्षण किया है कि इस देश ने उन्हें क्या-क्या दिया है और उन्होंने देश को अब तक क्या दिया?

पुस्तक में डॉ ज़कारिया ने स्वीकार किया है कि भारतीय मुसलमानों में इस्लामिक कट्टरतावाद के फ़ैलते असर को लेकर बेचैनी है और वे इसके खिलाफ़ कुछ करना चाहते हैं, इसलिये उन्होंने यह निम्न सुझाव दिये हैं –

1) मुसलमानों के लिये संघर्ष का रास्ता उचित नहीं है। उनके लिये खुशहाली का एकमात्र उपाय यह है कि वे देश और समाज के मुख्य अंगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलें। मुसलमानों को खुले दिल से हिन्दुओं और इस राष्ट्र को अपनाना चाहिये। इसके लिये सबसे पहले उन्हें अपनी “कबीलाई मानसिकता” (Ghetto Mentality) से बाहर आना होगा, एक समरसता भरे समाज के निर्माण में उन्हें ही मुख्य भूमिका निभानी होगी।

2) मुसलमानों को समझना चाहिये कि ज़माना बदल रहा, बदल गया है। उन्हें अपने पूर्वाग्रहों को छोड़ना होगा और पुरानी मानसिकता को समय के अनुरूप बदलना चाहिये। मुसलमानों को सरकारों से मदद माँगना छोड़कर अपने पैरों पर खुद खड़े होने का प्रयास करना चाहिये, वरना वे एक अपंग समाज की तरह बन जायेंगे जिन्हें कभी-न-कभी बोझ समझा जाने लगेगा। मुसलमानों को जल्दी ही यह समझ लेना चाहिये कि जो भी नेता उनकी मदद करने को तत्पर दिखाई दे रहा है वह निश्चित ही अपने चुनावी फ़ायदे के लिये ऐसा कर रहा है, यहाँ तक कि मुसलमानों को दूसरे देशों के मुसलमानों से भी कोई अपेक्षा नहीं रखना चाहिये, हो सकता है कि वे कुछ आर्थिक मदद कर दें लेकिन मुश्किल समय मे वे उनके बचाव के लिये कभी आगे नहीं आयेंगे, और यह बात अन्य कई देशों में कई बार साबित हो चुकी है।

3) मुसलमानों को “अपनी खुद की बनाई हुई भ्रम की दुनिया” से बाहर निकलना चाहिये, उन्हें कठमुल्लों की भड़काऊ और भावनात्मक बातों पर यकीन नहीं करना चाहिये। मुस्लिमों के दुश्मन सिर्फ़ ये कठमुल्ले ही नहीं हैं बल्कि समाज के ही कुछ मौलाना, शिक्षाविद और पत्रकार भी इनका साथ देकर आग में घी डालने का काम करते हैं, इनसे बचना चाहिये। भारत के मुसलमानों को इस दलदल से बाहर निकलकर अपने काम और हुनर को माँजना चाहिये ताकि वे समाज की मुख्यधारा में आसानी से आ सकें और देश के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें।

4) भारतीय मुसलमानों को देश के उदार हिन्दुओं के साथ मिलकर एक उन्नत समाज की स्थापना के लिये काम करना चाहिये। हालांकि यह कोई मुश्किल काम नहीं है लेकिन इसके लिये उन्हें अपने व्यवहार और मानसिकता में बदलाव लाना चाहिये।

5) यही बात भारतीय मुस्लिमों में युवाओं पर भी लागू होती है, उनका ध्यान शिक्षा और सामाजिक गतिविधियों पर ही होना चाहिये क्योंकि “ज्ञान” का कोई विकल्प नहीं है, इसके लिये सबसे पहले इन युवाओं के माता-पिता को अपने पूर्वाग्रह छोड़ना होंगे और उन्हें अधिक से अधिक और उच्च शिक्षा दिलाने की कोशिश करना चाहिये।

6) भारत के मुसलमानों को जिहादी तत्वों और कट्टर धर्मांध लोगों को सख्ती से “ना” कहना सीखना ही चाहिये। उन्हें अन्य धर्मावलम्बियों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करना चाहिये कि उनका धर्म भी “जियो और जीने दो” के सिद्धान्त पर काम करता है। उनके इस प्रयास से ही इस्लाम को भारत में सच्चे अर्थों में लोकप्रिय बनाने में मदद मिलेगी।

7) कुरान में दिये गये आदेशों को मानते हुए भी भारतीय मुस्लिम “एकपत्नीवाद” का पालन कर सकता है। शरीयत में निकाह, तलाक, मेहर और गुज़ारे के कानूनों को समयानुकूल बदलने की काफ़ी गुंजाइश है। इसे करने की कोशिश की जाना चाहिये।

8) “वन्देमातरम” को गाने या न गाने सम्बन्धी विवाद बेमानी है। आज़ादी के आन्दोलन के समय कांग्रेस के सभी मुस्लिम नेता इस गीत को खुले दिल से गाते थे। जो मुसलमान इसे नहीं गाना चाहते कम से कम वे इसे गाये जाते समय खड़े हो जायें क्योंकि यह राष्ट्रगीत है और देश के सम्मान में गाया जा रहा है। पहले से ही घायल साम्प्रदायिक तानेबाने को एक छोटी सी बात पर बिगाड़ना उचित नहीं है।

9) परिवार नियोजन का सवाल हमेशा प्रत्येक विकासशील देश के लिये एक मुख्य प्रश्न होता है। हमें यह सच्चाई स्वीकारना चाहिये कि परिवार नियोजन को मुसलमानों ने उतने खुले दिल से स्वीकार नहीं किया जितना कि हिन्दुओं ने। मुसलमानो को अपनी गरीबी दूर करने के लिये यह गलती तुरन्त सुधारना चाहिये। इसके लिये समाज के पढ़े-लिखे व्यक्तियों को ही एक जागरण अभियान चलाना होगा ताकि अनपढ़ मुसलमान परिवार नियोजन अपनायें, यह एक बेहद जरूरी कदम है, वरना भारत कभी भी आगे नहीं बढ़ सकेगा, गरीबी और अशिक्षा बनी रहेगी।

10) मुसलमानों को अपने स्वभाव, हावभाव, रहन-सहन, व्यवहार से हिन्दुओं को यह विश्वास दिलाना होगा कि वे उनके दुश्मन नहीं हैं और उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचायेंगे। हिन्दुओं को अपने काम से यह विश्वास दिलाना होगा कि मुसलमान भी इसी देश की संतान हैं जैसे कि हिन्दू हैं, और वे भी इस देश की उन्नति के लिये चिन्तित हैं।

11) सबसे अन्त में मैं सबसे मुख्य बात कहना चाहूँगा, कि “मुसलमानों को यह साफ़ समझ लेना चाहिये कि उनका भाग्य सिर्फ़ वे खुद बदल सकते हैं उनका कोई भी नेता नहीं…”

क्या यह मात्र संयोग है कि ऊपर दिये गये कई विचार हिन्दुत्ववादी मानी जानी वाली पार्टियों और व्यक्तियों के विचारों से मिलते-जुलते हैं? हो सकता है कि कोई “अति-विद्वान”(?), डॉ रफ़ीक ज़कारिया की प्रतिबद्धता पर ही शक कर बैठे, इसलिये यहाँ बताना जरूरी है कि डॉ ज़कारिया एक अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान थे, उन्होंने लन्दन विश्वविद्यालय से पीएच. डी. की है और भारत के स्वतन्त्रता आंदोलन में भी हिस्सा लिया। डॉ ज़कारिया एक प्रतिष्ठित वकील, शिक्षाविद और पत्रकार थे, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि डॉ ज़कारिया पक्के कांग्रेसी थे, जो संसद के उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं तथा महाराष्ट्र सरकार में विभिन्न कैबिनेट पदों पर 15 वर्ष तक रहे।

डॉ ज़कारिया के यह विचार आज के माहौल में बेहद प्रासंगिक हैं, मुस्लिमों के लिये एक पथप्रदर्शक के तौर पर हैं, लेकिन वोट बैंक की राजनीति के चलते पहले ही देश को बरबाद कर चुकी कांग्रेस, जिसने पहले भी एक बार आरिफ़ मोहम्मद खान को बाहर का दरवाजा दिखा दिया था… ज़कारिया जी के इन विचारों और सुझावों को रद्दी की टोकरी में फ़ेंक चुकी है। कांग्रेस, सपा, वामपंथियों के प्रिय पात्र कौन हैं… अबू आज़मी, जावेद अख्तर, शबाना आज़मी, तीस्ता सीतलवाड, अरुन्धती रॉय और अंग्रेजी प्रेस के पेज-थ्री टाईप के कुछ “सेकुलर पत्रकार”(?)… इन जैसे ही कई भांड-गवैयों को नरेन्द्र मोदी के नाम से ही पेचिश हो जाती है… क्योंकि यदि रफ़ीक ज़कारिया के यह विचार अधिक प्रचारित-प्रसारित हो गये तो इनकी “दुकानें” बन्द हो जायेंगी… देश का पहला विभाजन भी कांग्रेस की वजह से हुआ था, भगवान न करे यदि दूसरा विभाजन हुआ तो इसकी जिम्मेदार भी यही घटिया, स्वार्थी और भ्रष्ट लोगों से भरी पार्टी होगी…

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Slumdog Millionaire Oscar Award India Secularism

22 फ़रवरी को ऑस्कर पुरस्कार समारोह में भारत की अब तक की “सबसे महान फ़िल्म”(?) स्लमडॉग मिलियनेयर को ऑस्कर मिलने की काफ़ी सम्भावना है, उसके मजबूत “सेकुलर” कारण निम्नानुसार हैं –

1) क्योंकि फ़िल्म के निर्देशक एक अंग्रेज हैं। जबकि महबूब खान (मदर इंडिया) से लेकर आशुतोष गोवारीकर (लगान) तक के हिन्दी निर्देशक निहायत नालायक और निकम्मे किस्म के हैं।

2) “मदर इंडिया” को ऑस्कर इसलिये नहीं मिला क्योंकि उसमें भारतीय स्त्री द्वारा दिखाई गई नैतिकता “अंग्रेजों” को समझ में नहीं आई थी (उनके अनुसार बच्चों को भूख से बचाने के लिये उस औरत को पैसे के लिये लम्पट मुनीम की वासना का शिकार हो जाना चाहिये था, ये “नैतिकता”(?) अंग्रेजों में 40-50 साल पहले आ गई थी जबकि उनके गुलामों में “पब कल्चर” के रूप में अब यहाँ घर कर चुकी है), तथा “लगान” को ऑस्कर इसलिये नहीं मिला क्योंकि उसमें अंग्रेजों को हारते दिखाया गया था, जो कि “शासक मानसिकता” को रास नहीं आया। जबकि “स्लमडॉग” की सम्भावना इसलिये ज्यादा है कि इसमें “तरक्की के लिये छटपटाते हुए युवा भारत” को उसकी “औकात” बताने का प्रयास किया गया है।

3) “हिन्दू” बेहद आक्रामक और दंगाई किस्म के होते हैं, ऐसा भी फ़िल्म में दर्शाया गया है। हीरो मुसलमान है और हिन्दू दंगाई उसकी माँ की हत्या कर देते हैं, भीड़ चिल्लाती है “ये मुसलमान हैं इन्हें मारो… मारो…” और बच्चे चिल्लाते हैं “हिन्दू आ रहे हैं, हिन्दू आ रहे हैं भागो-भागो…” (कुल मिलाकर एक बेहद “सेकुलर” किस्म का सीन है इसलिये पुरस्कार मिलने की सम्भावना बढ़ जाती है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार वामपंथी नन्दिता दास की गोधरा दंगों पर बनी फ़िल्म को पाकिस्तान में पुरस्कार दिया गया है)।



4) फ़िल्म में भगवान राम का ऐसा भयानक काल्पनिक रूप शायद ही पहले किसी ने देखा होगा (जो चित्र यहाँ दिखाया गया है)।

5) मुस्लिम हमेशा “सेकुलर” होते हैं और “पीड़ित” होते हैं जो कि सिर्फ़ एक अंग्रेज निर्देशक ही भारत की मूर्ख जनता को बता सकता है, फ़िल्म में दोनो मुस्लिम लड़के सिर्फ़ सूरदास रचित कृष्ण के भजन ही गाते हैं (सेकुलरिज़्म की दाल में एक और तड़का)।

6) फ़िल्म पूरी तरह से “भारतीय” है, क्योंकि इसके निर्देशक डैनी बोयल अंग्रेज हैं, स्क्रीनप्ले सिमोन ब्यूफ़ोय का है जो अंग्रेज हैं, हीरो देव पटेल नाम के गुजराती हैं जिनका परिवार पहले नैरोबी और अब लन्दन में रहता है, मूल उपन्यास (Q & A) के लेखक एक पूर्व भारतीय राजनयिक हैं जो अब दक्षिण अफ़्रीका में रहते हैं, यह फ़िल्म भी “हू वांट्स टु बी मिलियनेयर” नामक टीवी शो पर आधारित है जो कि एक सफ़ल ब्रिटिश गेम शो है, यानी की पूरी-पूरी “भारतीय”(?) फ़िल्म है, उस पर तुर्रा यह कि मूल उपन्यास में हीरो का नाम है “राम जमाल थॉमस”, जिसे फ़िल्म में बदलकर सिर्फ़ जमाल रखा गया है, क्योंकि यही नाम “सेकुलर” लगता है…

तो भाईयों और बहनों, ऑस्कर पुरस्कार के लिये तालियाँ बचाकर रखिये… हम जैसे “विघ्नसंतोषी” आपका मजा नहीं बिगाड़ेंगे…इसका वादा करते हैं… सो ऑस्कर के लिये जय हो, जय हो…

अब मूल विषय से हटकर एक घटना :– अपुष्ट समाचार के अनुसार मुम्बई के मलाड इलाके में स्थित “हायपरसिटी मॉल” में एक पाकिस्तानी लड़की सबा नज़ीम (उम्र 22 वर्ष) को कुछ नाराज मुसलमानों की भीड़ ने बुरी तरह से पीटा। रियाज़ अहमद तालुकदार नामक शख्स, जो कि “जन सेवा संघ” नाम का एक NGO चलाते हैं, ने उस महिला की पीठ पर उर्दू में “शुक्र अलहम दुलिल्लाह” (यानी, अल्लाह तेरा शुक्रिया) छपा हुआ टैटू देखा, उसने अपनी माँ को फ़ोन किया और मिनटों में ही उस मॉल में दर्जनों महिलाओं ने उस पाकिस्तानी लड़की की सरेआम पिटाई कर दी, वह लड़की घबराकर अगले ही दिन पाकिस्तान लौट गई।
क्या इस घटना के बारे में आपने किसी अखबार में पढ़ा है? किसी न्यूज़ चैनल पर बड़ी बिन्दी वाली प्रगतिशील महिलाओं से इसके बारे में बहस सुनी है? क्या इस घटना को लेकर किसी महिला केन्द्रीय मंत्री ने “नैतिक झण्डाबरदारी” के खिलाफ़ कोई भाषण दिया है? क्या किसी अंग्रेजी पत्रकार ने उस NGO मालिक को गुलाबी चड्डियाँ भेजने का प्लान बनाया है? ट्रेन भरकर आजमगढ़ से दिल्ली आने वाले उलेमाओं में से किसी ने इसकी आलोचना की? यदि इन सबका जवाब “नहीं” में है, तो एक आत्म-पीड़ित, खुद पर तरस खाने वाले, स्वाभिमान-शून्य राष्ट्र को मेरा नमन…

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Pakistan Owes Rs 300 crore for 60 years

आपने अक्सर खबरों में पढ़ा होगा कि अलाँ-फ़लाँ बैंक के गुर्गे किसी कर्जदार के घर मारपीट करके उससे बैंक की उधारी/कर्जे की रकम लेकर आते हैं। गत 60 साल से एक कर्जदार भारत की छाती पर मूँग दल रहा है, है कोई माई का लाल जो उससे वसूल कर सके? जी हाँ वह कर्जेदार और कोई नहीं, हमारा पड़ोसी, हमारा छोटा भाई(?), हमारा गलेलगू-छुराघोंपू मित्र पाकिस्तान ही है। एक समाचार (यहाँ देखें) के अनुसार 1948-49 से लेकर आज तक भारत के प्रत्येक बजट में बारीक अक्षरों में एक लाइन लिखी होती है “विभाजन के समय हुए समझौते के अनुसार पाकिस्तान से हमारे हिस्से के 300 करोड़ रुपये लेना बाकी”।

असल में विभाजन के समय यह तय किया गया था कि फ़िलहाल दोनों देशों की जो भी संयुक्त अन्तर्राष्ट्रीय देनदारियाँ हैं वह भारत चुका देगा (बड़ा भाई है ना), फ़िर अपनी हिस्सेदारी का 300 करोड़ रुपया पाकिस्तान 3% सालाना ब्याज की दर से 1952 से शुरु करके पचास किश्तों में भारत को वापस करेगा। आज तक “छोटे भाई” ने एक किस्त भी जमा नहीं की है (इस प्रकरण में किसी और ब्लॉगर को अधिक विस्तारित जानकारी मालूम हो तो वह यहाँ टिप्पणियों में साझा कर मेरा ज्ञानवर्धन करें)।

पाकिस्तान को आज़ादी के वक्त भारत ने 55 करोड़ रुपये दिये थे, जो कि गाँधी के वध के प्रमुख कारणों में से एक था। सवाल यह उठता है कि आज तक इतनी बड़ी बात भारत की किसी भी सरकार ने किसी भी मंच से क्यों नहीं उठाई? अपना पैसा माँगने में शरम कैसी? जनता पार्टी और भाजपा की सरकारों ने इस बात को लेकर पाकिस्तान पर दबाव क्यों नहीं बनाया? (कांग्रेस की बात मत कीजिये)। हमने पाकिस्तान को 3-4 बार विभिन्न युद्धों में धूल चटाई है, क्या उस समय यह रकम नहीं वसूली जा सकती थी? या कहीं हमारी “गाँधीवादी” और “सेकुलर”(?) सरकारें यह तो नहीं समझ रही हैं कि पाकिस्तान यह पैसा आसानी से, बिना माँगे वापस कर देगा? (कुत्ते की दुम कभी सीधी होती है क्या?)।

300 करोड़ रुपये को यदि मात्र 3% ब्याज के आधार पर ही देखा जाये तो 60 साल में यह रकम 1600 करोड़ से ज्यादा होती है, क्या इतनी बड़ी रकम हमें इतनी आसानी से छोड़ देना चाहिये? इतनी रकम में तो एक छोटी-मोटी सत्यम कम्पनी खड़ी की जा सकती है, और चलो मान लिया कि बड़ा दिल करके, उन भिखारियों को हम यह रकम दान में दे भी दें तब भी क्या वे हमारा अहसान मानेंगे? छोटा भाई तो फ़िर भी कश्मीर-कश्मीर की रट लगाये रखेगा ही, ट्रेनों-नावों में भर-भरकर आतंकवादी भेजता ही रहेगा।

विभाजन की बहुत बड़ी सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक कीमत भारत पहले ही चुका रहा है उस पर से यह एक और घाव!!! एक सम्भावना यह बनती है कि, असल में यह रकम पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के हिस्सों को मिलकर भारत को देना थी, लेकिन जब भारत ने पूर्वी पाकिस्तान (यानी हमारा एक और सिरदर्द आज का बांग्लादेश) को आजाद करवाने में मदद देने का फ़ैसला किया और आज़ाद करवा भी लिया तो यह रकम डूबत खाते में चली गई, क्योंकि जब देनदारों में से एक इलाका खुद ही स्वतन्त्र देश बन गया, तो फ़िर कर्जा कैसा? और बांग्लादेश इस रकम में से आधा हिस्सा देगा, यह सोचकर भी हँसी आती है। इसमें पेंच यह है कि भारत ने तो सन् 1971 में बांग्लादेश को आजाद करवाया तो फ़िर सन् 1952 से लेकर 1971 की किस्त क्यों नहीं दी गई? चलो पाकिस्तान कम से कम उतना ही दे दे, लेकिन ऐसी कोई माँग करने के लिये हमारे देश के नेताओं को “तनकर सीधा खड़ा होना” सीखना पड़ेगा। “सेकुलरों” और “नॉस्टैल्जिक” बुद्धिजीवियों की बातों में आकर हमेशा पाकिस्तान के सामने रेंगते रहने की फ़ितरत छोड़ना होगी।

55 करोड़ रुपये का दूध “साँप” को फ़ोकट में पिलाने के जुर्म में गाँधी की हत्या हो गई, अब इस 1600 करोड़ को न वसूल पाने की सजा “नेताओं”(?) को देने हेतु कम से कम 40 नाथूराम गोड़से चाहिये होंगे, लेकिन जो देश “पब कल्चर” और “वेलेन्टाइन” में रंग चुका हो और अंग्रेजों द्वारा “झोपड़पट्टी का कुत्ता” घोषित होने के बावजूद खुशी मना रहा हो, ऐसे स्वाभिमान-शून्य देश में अब कोई गोड़से पैदा होने की उम्मीद कम ही है…

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