Super User

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I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

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Media Coverage Mumbai Terror Attack

मुम्बई में जो दर्दनाक घटनायें हुईं उसका मूर्खतापूर्ण और लज्जाजनक “लाइव” कवरेज भारत के इलेक्ट्रानिक मीडिया ने दिखाया। जरा कुछ बानगियाँ देखिये इन गिद्धों के कवरेज की…

1) एक व्यक्ति के हाथ पर गोली लगी है, खून बह रहा है, माँस गिर रहा है, लेकिन उसकी मदद करने की बजाय एक गिद्ध पत्रकार उसके हाथ की फ़ोटो खींचने को उतावला हो रहा है और उसके पीछे भाग रहा है…

2) सुबह के सात बजे – ताज होटल के भीतर हमारे जाँबाज सिपाही आतंकवादियों से लोहा ले रहे हैं, दो दिन से भूखे-प्यासे और नींद को पीछे ढकेलते हुए… और ताज के बाहर कैमरे के पिछवाड़े में लेटे हुए गिद्ध आराम से कॉफ़ी-सैण्डविच का आनन्द उठा रहे हैं मानो क्रिकेट मैच का प्रसारण करने आये हों…

3) वीटी स्टेशन पर आम आदमियों को मारा जा चुका है, लेकिन गिद्ध टिके हुए हैं ओबेरॉय होटल के बाहर कि कब कोई विदेशी निकले और कब वे उसका मोबाईल नम्बर माँगें…

4) एक और पत्रकार(?) मनोरंजन भारती एक ही वाक्य की रट लगाये हुए हैं “ताज हमारे “देस” की “सान” (शान) है… और इस “सान” का सम्मान हमें बचाये रखना है…सेना का अफ़सर कह रहा है कि अब कोई आतंकवादी नहीं बचा, लेकिन ये “खोजी” बड़बड़ाये जा रहे हैं कि नहीं एक आतंकवादी अन्दर बचा है…

5) “आपको कैसा लग रहा है…” जैसा घटिया और नीच सवाल तो न जाने कितनी बार और किस-किस परिस्थिति में पूछा जा चुका है इसका कोई हिसाब ही नहीं है, आरुषि हत्याकाण्ड में भी कुछ पत्रकार ये सवाल पूछ चुके हैं…

6) अमेरिका में हुए वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद किसी चैनल ने लाशों, रोते-बिलखते महिलाओं-बच्चों की तस्वीरें नहीं दिखाईं, लेकिन यहाँ तो होड़ लगी थी कि कौन कितनी लाशें दिखाता है, कितना बिखरा हुआ खून दिखाता है… इन गिद्धों पर सिर्फ़ लानत भेजना तो बहुत कम है, इनका कुछ और इलाज किया जाना आवश्यक है।

7) जीटीवी द्वारा 28 तारीख की रात को बड़े-बड़े अक्षरों में “कैप्शन” दिखाया गया “हम समझते हैं अपनी जिम्मेदारी…”, “सुरक्षा की खातिर लाइव प्रसारण रोका जा रहा है…” और यह अकल उन्हें तब आई, जब सेना ने अक्षरशः उन्हें “लात” मारकर ताज होटल से भगा दिया था, वरना यह “सुरक्षा हित” पहले दो दिन तक उन्हें नहीं दिखा था… “टीआरपी के भूखे एक और गिद्ध” ने आतंकवादियों के इंटरव्यू भी प्रसारित कर दिये, ठीक वैसे ही जैसे सुबह तीन बजे अमिताभ के मन्दिर जाने की खबर को वह “ब्रेकिंग न्यूज” बताता है…

क्या-क्या और कितना गिनाया जाये, ये लोग गिरे हुए और संवेदनाहीन तो पहले से ही थे, देशद्रोही भी हैं यह भी देख लिया। कई बार लगता है प्रिंट मीडिया इनसे लाख दर्जे से बेहतर है, भले ही वह भी ब्लैकमेलर है, राजनैतिक आका के चरण चूमता है, विज्ञापन पाने के लिये तरह-तरह के हथकण्डे अपनाता है, लेकिन कम से कम “सबसे तेज” बनने और पैसा कमाने के चक्कर में इतना नीचे तो नहीं गिरता… किसी चैनल ने सीएसटी स्टेशन पर मारे गये लोगों की सहायता के लिये हेल्पलाईन नहीं शुरु की, किसी चैनल ने रक्तदान की अपील नहीं की, किसी भी चैनल ने “इस खबर” को छोड़कर तीन दिन तक समूचे भारत की कोई खबर नहीं दिखाई मानो भारत भर में सिर्फ़ यही एक काम चल रहा हो…

मजे की बात तो ये कि कवरेज कर कौन रहा था, एक पूरे वाक्य में छः बार “ऐं ऐं ऐं ऐं” बोलने वाले पंकज पचौरी यानी इस्लामिक चैनल NDTV के महान पत्रकार। विनोद दुआ नाम के पद्म पुरस्कार से सम्मानित(?) एक पत्रकार, जिन्हें उपस्थित भीड़ द्वारा वन्देमातरम और भारत माता की जय बोलना रास नहीं आया और वे स्टूडियो में बैठे मेजर जनरल से खामखा “धर्म का कोई मजहब नहीं होता…” जैसी बकवास लगातार करते रहे… अमिताभ स्टाइल में हाथ रगड़ते हुए और अपने आप को “एस पी सिंह” समझते हुए पुण्यप्रसून वाजपेयी… यानी कुल मिलाकर एक से बढ़कर एक महान लोग…

सो आइये हम सब मिलकर न्यूज चैनलों का बहिष्कार करें। लोग यह तय करें कि दिन भर में सिर्फ़ पाँच या दस मिनट से ज्यादा न्यूज चैनल नहीं देखेंगे, इन गिद्धों की टीआरपी गिराओ, इन्हें विज्ञापनों का सूखा झेलने दो, इन्हें सार्वजनिक रूप से देश की जनता से माफ़ी माँगने दो कि “हाँ हमसे बहुत बड़ी गलती हुई है और इस प्रकार की राष्ट्रीय आपदा के समय आगे से हम सावधानीपूर्वक रिपोर्टिंग करेंगे… और पढ़े-लिखे पत्रकारों को नौकरी पर रखेंगे…”।

नोट - एक बात के लिये आप मुझे माफ़ करें कि बार-बार मैंने “गिद्ध” शब्द का उपयोग किया, जबकि गिद्ध तो मरे हुए जानवरों की गंदगी साफ़ करता है, लेकिन टीआरपी के भूखे गिद्ध तो……

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Attack on Corruption as well as on Pakistan

मुम्बई की घटना के बाद नौसेना प्रमुख ने माना है कि देश की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा में गम्भीर खामियाँ हैं और इन्हें सुधारने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी माना कि जिस शंकास्पद ट्रॉलर को नौसेना ने जाँच हेतु रोका था उसके पास सारे कागजात एकदम सही पाये गये थे। देखने में यह घटना बेहद मामूली सी लग सकती है, लेकिन असल में यह हमारे समूचे “सिस्टम” के सड़ जाने की ओर इशारा करती है। कुछ वर्षों पहले एक मित्र के साथ मुझे भी एक बार मुम्बई के डॉकयार्ड में जाने का सौभाग्य(?) मिला था (डॉकयार्ड में हमारा काम उस स्थान पर था, जहाँ से आयात-निर्यात के माल का कस्टम क्लियरेंस किया जाता है)। मेरा मित्र एक छोटा सा निर्यातक है जो खाड़ी देशों को गारमेंट का निर्यात करता है और उधर से अपनी ही एक अन्य फ़र्म के लिये खजूर और अन्य छोटी-मोटी वस्तुऐं आयात भी करता है। वहाँ (डॉकयार्ड) का माहौल देखकर मेरे जैसा किसी भी सामान्य आदमी की बुद्धि चकरा सकती है। सैकड़ों की संख्या में पैकिंग किये हुए कार्टन्स, बैग, बोरे, कण्टेनर, पीपे, खोखे आदि चारों ओर बिखरे पड़े हुए थे। कस्टम क्लियर करने वाले अधिकारी और कर्मचारी अपनी ड्यूटी इस प्रकार कर रहे थे, मानो वह सामने वाले व्यक्ति पर अहसान कर रहे हों। चारों तरफ़ एक अलसाया हुआ उदासी भरा माहौल था, जैसा कि अमूमन एक सरकारी विभाग में होता है। जबकि वह विभाग कोई मामूली और आम नगर निगम जैसा विभाग नहीं था, वह सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण एक संवेदनशील विभाग है। मेरा मित्र जो कि इन “सरकारी बाबुओं” की नस-नस से वाकिफ़ हो चुका है, उसी ने बताया कि जितनी जल्दी और जितनी ज्यादा “भेंटपूजा” इन कर्मचारियों की होगी उतनी ही जल्दी उसका “माल” यहाँ से “क्लियर” होगा। मैंने देखा और पाया कि उस डॉकयार्ड में आने वाले लगभग सभी लोग, व्यापारी, कर्मचारी, कुली, लाइसेंसशुदा हम्माल आदि आराम से कहीं भी आ-जा रहे थे, किसी भी “माल” को चेक करने की कोई “परम्परा” शायद वहाँ थी ही नहीं, बस जिस व्यापारी/एजेण्ट/दलाल आदि ने जो कागज दिखाया वही माल मान लिया जाता था, भले ही कागज पर लिखा हो कि कण्टेनर में कपड़ा है और अन्दर अफ़ीम भरी हो, कोई देखने-सुनने वाला नहीं। पूरे स्टाफ़ का हिस्सा ऊपर से नीचे तक बँटा हुआ था (और कहीं ईमानदारी हो या नहीं हो भ्रष्टाचार पूरी ईमानदारी से किया जाता है, चपरासी से लेकर ठेठ अफ़सर और मंत्री तक)। कोई भी सहज बुद्धि वाला व्यक्ति सोच सकता है कि भला आतंकवादियों को इतनी मगजमारी करके समुद्र के रास्ते से हथियार लाने की क्या जरूरत है? जबकि वह जब चाहे एक कण्टेनर भरकर हथियार आराम से भारत भिजवा सकता है। एक अंग्रेजी चैनल ने एक “स्टिंग ऑपरेशन” के तहत हमले के दो दिन बाद ही एक बड़ा सा खाली खोखा (जिसे उन्होंने यह माना कि उसमें RDX भरा है) आराम से स्थानीय लोगों के साथ मिलकर ठीक उसी जगह उतार दिया, जिस जगह पर दाऊद इब्राहीम ने कुछ साल पहले अपने हथियार उतारे थे। इस स्टिंग ऑपरेशन में उस चैनल को कुल 10-15 हजार का खर्च आया। अब खुद ही सोचिये कि जब हमले के दो दिन बाद सुरक्षा की ये हालत है तो आगे क्या होगा? या पहले क्या हुआ होगा।



असल समस्या यह है कि अब भारत के लोग “भोगवादी” प्रवृत्ति के हो चुके हैं। खुली अर्थव्यवस्था और पैसे की चकाचौंध ने आँखों पर जो चर्बी चढ़ाई है उसके कारण “देश”, “राष्ट्र”, “नैतिकता”, “अनुशासन” आदि कुछ नहीं दिखाई देता। और भ्रष्टाचार की यह चर्बी सिर्फ़ सरकारी बाबुओं, अफ़सरों, नेताओं और मंत्रियों की आँखों पर ही नहीं है, अब तो यह बीमारी रिसते-रिसते बहुत नीचे स्तर तक, आम आदमी तक पहुँच चुकी है। आज मुम्बई में हुए हमले के विरोध में मोमबत्तियाँ जलाई जा रही हैं, मानव-श्रृंखला बनाई जा रही है, एकता यात्रा निकाली जा रही है, हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है… क्या वाकई इससे कोई फ़र्क पड़ेगा? मुझे तो नहीं लगता। देश पर हुआ हमला और उसकी प्रतिक्रिया कुछ-कुछ ऐसी है, जैसे कैंसर और लकवे से ग्रस्त एक आदमी की बीवी को छेड़ दिया गया हो और वह मरने-मारने की बातें करने लग पड़ा हो।

ट्रैफ़िक सिग्नल को सरेआम तोड़ते लोग, पकड़े जाने पर पचास-सौ रुपये देकर छूट जाने की मानसिकता लिये हुए लोग आतंकवाद से नहीं लड़ सकते। राशनकार्ड, गैस कनेक्शन, ड्रायविंग लायसेंस जैसे रोजमर्रा के काम करवाने के लिये सरकारी विभागों में नियम तोड़ते-तोड़ते, रिश्वत देते-देते भारत का नागरिक इतना घिस चुका है कि उसमें आतंकवाद से लड़ने की धार ही नहीं बची है, और हाल-फ़िलहाल ये जो कुछ माहौल दिखाई दे रहा है वह मात्र “पेशाब का झाग” भर है, बहुत जल्दी ही नीचे बैठ जायेगा। जिस तरह श्मशान में व्यक्ति “मैं अपनी आँखें दान कर दूँगा…”, “इस दुनिया में क्या रखा है भाई…”, “मोहमाया से दूर रहने में ही भलाई है…” जैसे विचार लेकर खड़ा होता है, और बाहर निकलते ही वापस अपनी दुनिया में रम जाता है, ठीक वैसा ही कुछ हरेक आतंकवादी हमले के बाद भारत में होता आया है। लेकिन जिस देश के लोग भ्रष्टाचार पर नहीं उबलते, किसी मासूम लड़की के बलात्कार और हत्या के बाद भी कोई आंदोलन नहीं करते, बल्कि खुद ही इस जुगाड़ में लगे रहते हैं कि किस तरह से प्रत्येक “सिचुएशन” में मेरा फ़ायदा हो जाये, वह भला आतंकवाद से कैसे लड़ेगा? क्या रक्षा मंत्रालय के किसी अधिकारी को सियाचिन में सैनिकों के जूते खरीदने में भ्रष्टाचार करने के लिये आज तक कोई सजा हुई है? क्या शहीदों को मिलने वाले पेट्रोल पंपों पर कुंडली मारे बैठे नेताओं से आज तक किसी ने जवाबतलब किया है? सेना के ताबूत, राशन, बुलेटप्रूफ़ जैकेटों और यहाँ तक कि सेना के कैंटीन में मिलने वाली सस्ती शराब की अफ़रातफ़री के मामले में आज तक किसी IAS अधिकारी पर कोई मुकदमा चलाया गया है? नहीं ना… फ़िर आप कैसे उम्मीद करते हैं कि रातोंरात देश में कोई क्रान्ति आ जायेगी और देश अचानक अनुशासन की राह पर चल पड़ेगा? आतंकवाद के खिलाफ़ युद्ध लड़ना तो बहुत बाद की बात है, क्या हम लोग रेल्वे स्टेशन या सिनेमा हॉल की टिकट लाइन में ही दस मिनट सीधे खड़े रह सकते हैं? इसलिये जब नौसेना कहती है कि शंकास्पद जहाज के पास कागज पूरे थे तब स्वाभाविक है कि सही और पूरे कागज होना ही है, भारत में लाखों कारें ऐसी हैं जिनके पास “व्यावसायिक LPG से” चलाने के कागज पूरे हैं, लेकिन अमीर लोग उसे चलाते हैं “घरेलू गैस” से, कितनों के ही नौनिहाल अभी 12-14 साल के ही हैं लेकिन सरेआम उन्हें बाइक थमा दी गई है और उनके पास लायसेंस भी है। जब बांग्लादेश से आने के 2 साल के भीतर ही राशनकार्ड बनवाया जा सकता है, नेपाल का एक भगोड़ा हत्यारा कांग्रेस का सांसद बन सकता है, तो “भारत में बने वैध कागज” की क्या और कैसी कीमत है इसके बारे में अलग से क्या बताऊँ। भारत के लोग हमेशा तात्कालिक उपाय के बारे में सोचते हैं, “परमानेंट इलाज” के बारे में नहीं, जैसे कि पहले लाखों कारों का उत्पादन कर लेना, फ़िर बाद में सड़कें बनवाना। युद्ध लड़ना एक तात्कालिक उपाय है, जबकि देशवासियों में नैतिकता, अनुशासन, और ईमानदारी पैदा करना, अन्दरूनी भ्रष्टाचार से लड़ना एक “परमानेंट इलाज” है। मोमबत्ती जलाने वाले और “इनफ़ इज़ इनफ़” का नारा लगाने वालों के नेतृत्व को ध्यान से देखिये, बिजली चोरी करने वाला उद्योगपति, मरीज के साथ जानवर से भी बदतर व्यवहार करने वाला डॉक्टर, बेशर्मी से आगे-आगे दिखने वाला राजनेता, बच्चों के दोपहर भोजन में कमीशन खाने वाला IAS अफ़सर, सभी दिखाई देंगे… आम आदमी तो युद्ध की विभीषिका और खर्च को झेल भी लेगा, लेकिन युद्ध के बाद मोमबत्ती जलाने और रैलियाँ निकालने वाले यही नेता और उद्योगपति उसका खून चूसने में सबसे आगे होंगे… मन में संकल्प लो कि “इन घटिया लोगों से भी निपटेंगे” और युद्ध में कूद पड़ो।



कुछ पाठकों को यह लेख “नकारात्मक” लग सकता है, जबकि मेरा व्यक्तिगत मत है कि पाकिस्तान के साथ युद्ध होना ही चाहिये, भले ही सीधे तौर पर नहीं, लेकिन छापामार शैली में जोरदार कमाण्डो/मिसाइल कार्रवाई तो बहुत ही जरूरी है। जिस तरह से कुछ वर्षों के अन्तराल से झाड़ू लेकर भूत उतारा जाता है वैसे ही हर दस-बारह साल के अन्तराल से पाकिस्तान जैसे देश की धुलाई होती रहनी चाहिये, लेकिन मेरे व्यक्तिगत मत से क्या होता है। अभी तो युद्ध की बात भी ठीक से शुरु नहीं हो पाई है कि देश में समझाइश (यानी विरोध) के स्वर उठने लगे हैं, तमाम बुद्धिजीवी(?) कहने लग पड़े हैं कि “युद्ध कोई इलाज नहीं है…”, “भारत को शांति से काम लेना चाहिये…”, “युद्ध से कुछ हासिल नहीं होगा…”, “शेयर मार्केट 4000 तक पहुँच जायेगा…”, “महंगाई बेतहाशा बढ़ जायेगी…”… आदि-आदि। कहने का तात्पर्य यह है कि अभी तो लड़ाई की मानसिक तैयारी शुरु ही हो रही है कि “भीतरघाती” अपना राग अलापने लगे हैं, ऐसी खण्डित मानसिकता लेकर आतंकवाद से लड़ेंगे??? हम कोई अमेरिका की तरह रोज-रोज युद्ध नहीं लड़ते, युद्ध लड़ना है तो एक स्वर में “हाँ” होनी चाहिये, लेकिन “लड़ाई” हमारे खून में, हमारे संस्कारों में ही नहीं है… और जब देश में आस्तीन के साँप “सेकुलर” और “गाँ……(धी)वादी” लोग मौजूद हैं, “आर या पार” वाला युद्ध तो मुश्किल ही लगता है…

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पहला SMS

13 मई – जयपुर विस्फ़ोट
जून माह – खाली
26 जुलाई – अहमदाबाद विस्फ़ोट
अगस्त माह – खाली
13 सितम्बर – दिल्ली विस्फ़ोट
अक्टूबर माह – खाली
26 नवम्बर – मुम्बई फ़ायरिंग और विस्फ़ोट
दिसम्बर माह – खाली (???) (उम्मीद पर दुनिया कायम है)

13 जनवरी को क्या होने वाला है?
कृपया 13 जनवरी को बहुत सावधान रहें… चौकन्ने रहें और चारों तरफ़ ध्यान रखें…

दूसरा SMS

क्या 26 तारीख भारत के लिये बहुत बुरी है?
26 दिसम्बर – सुनामी
26 जनवरी – कच्छ का भूकम्प
26 फ़रवरी – गोधरा काण्ड
26 जून – गुजरात की भयानक बाढ़
26 जुलाई – मुम्बई ट्रेन ब्लास्ट
26 सितम्बर – अहमदाबाद धमाके
26 नवम्बर – मुम्बई फ़ायरिंग और विस्फ़ोट

कौन- कौन से महीने खाली बचे हैं, उनकी तारीखों पर अपना खयाल रखियेगा…

SMS की दुनिया वाकई निराली है, लेकिन इससे एक बात साबित होती है कि उच्च शिक्षा का “अंकज्योतिष” से कोई लेना-देना नहीं होता तथा लोगों के पास इस तरह का विश्लेषण करने का समय भी होता है… मैंने भी सोचा कि एक माइक्रो-पोस्ट ठेल ही दूँ…
How a Muslim Could be a Secular?

जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक मौलाना मौदूदी कहते हैं कि कुरान के अनुसार विश्व दो भागों में बँटा हुआ है, एक वह जो अल्लाह की तरफ़ हैं और दूसरा वे जो शैतान की तरफ़ हैं। देशो की सीमाओं को देखने का इस्लामिक नज़रिया कहता है कि विश्व में कुल मिलाकर सिर्फ़ दो खेमे हैं, पहला दार-उल-इस्लाम (यानी मुस्लिमों द्वारा शासित) और दार-उल-हर्ब (यानी “नास्तिकों” द्वारा शासित)। उनकी निगाह में नास्तिक का अर्थ है जो अल्लाह को नहीं मानता, क्योंकि विश्व के किसी भी धर्म के भगवानों को वे मान्यता ही नहीं देते हैं।

इस्लाम सिर्फ़ एक धर्म ही नहीं है, असल में इस्लाम एक पूजापद्धति तो है ही, लेकिन उससे भी बढ़कर यह एक समूची “व्यवस्था” के रूप में मौजूद रहता है। इस्लाम की कई शाखायें जैसे धार्मिक, न्यायिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सैनिक होती हैं। इन सभी शाखाओं में सबसे ऊपर, सबसे प्रमुख और सभी के लिये बन्धनकारी होती है धार्मिक शाखा, जिसकी सलाह या निर्देश (बल्कि आदेश) सभी धर्मावलम्बियों को मानना बाध्यकारी होता है। किसी भी देश, प्रदेश या क्षेत्र के “इस्लामीकरण” करने की एक प्रक्रिया है। जब भी किसी देश में मुस्लिम जनसंख्या एक विशेष अनुपात से ज्यादा हो जाती है तब वहाँ इस्लामिक आंदोलन शुरु होते हैं। शुरुआत में उस देश विशेष की राजनैतिक व्यवस्था सहिष्णु और बहु-सांस्कृतिकवादी बनकर मुसलमानों को अपना धर्म मानने, प्रचार करने की इजाजत दे देती है, उसके बाद इस्लाम की “अन्य शाखायें” उस व्यवस्था में अपनी टाँग अड़ाने लगती हैं। इसे समझने के लिये हम कई देशों का उदाहरण देखेंगे, आईये देखते हैं कि यह सारा “खेल” कैसे होता है –

जब तक मुस्लिमों की जनसंख्या किसी देश/प्रदेश/क्षेत्र में लगभग 2% के आसपास होती है, तब वे एकदम शांतिप्रिय, कानूनपसन्द अल्पसंख्यक बनकर रहते हैं और किसी को विशेष शिकायत का मौका नहीं देते, जैसे -
अमेरिका – मुस्लिम 0.6%
ऑस्ट्रेलिया – मुस्लिम 1.5%
कनाडा – मुस्लिम 1.9%
चीन – मुस्लिम 1.8%
इटली – मुस्लिम 1.5%
नॉर्वे – मुस्लिम 1.8%

जब मुस्लिम जनसंख्या 2% से 5% के बीच तक पहुँच जाती है, तब वे अन्य धर्मावलम्बियों में अपना “धर्मप्रचार” शुरु कर देते हैं, जिनमें अक्सर समाज का निचला तबका और अन्य धर्मों से असंतुष्ट हुए लोग होते हैं, जैसे कि –
डेनमार्क – मुस्लिम 2%
जर्मनी – मुस्लिम 3.7%
ब्रिटेन – मुस्लिम 2.7%
स्पेन – मुस्लिम 4%
थाईलैण्ड – मुस्लिम 4.6%

मुस्लिम जनसंख्या के 5% से ऊपर हो जाने पर वे अपने अनुपात के हिसाब से अन्य धर्मावलम्बियों पर दबाव बढ़ाने लगते हैं और अपना “प्रभाव” जमाने की कोशिश करने लगते हैं। उदाहरण के लिये वे सरकारों और शॉपिंग मॉल पर “हलाल” का माँस रखने का दबाव बनाने लगते हैं, वे कहते हैं कि “हलाल” का माँस न खाने से उनकी धार्मिक मान्यतायें प्रभावित होती हैं। इस कदम से कई पश्चिमी देशों में “खाद्य वस्तुओं” के बाजार में मुस्लिमों की तगड़ी पैठ बनी। उन्होंने कई देशों के सुपरमार्केट के मालिकों को दबाव डालकर अपने यहाँ “हलाल” का माँस रखने को बाध्य किया। दुकानदार भी “धंधे” को देखते हुए उनका कहा मान लेता है (अधिक जनसंख्या होने का “फ़ैक्टर” यहाँ से मजबूत होना शुरु हो जाता है), ऐसा जिन देशों में हो चुका वह हैं –
फ़्रांस – मुस्लिम 8%
फ़िलीपीन्स – मुस्लिम 6%
स्वीडन – मुस्लिम 5.5%
स्विटजरलैण्ड – मुस्लिम 5.3%
नीडरलैण्ड – मुस्लिम 5.8%
त्रिनिदाद और टोबैगो – मुस्लिम 6%



इस बिन्दु पर आकर “मुस्लिम” सरकारों पर यह दबाव बनाने लगते हैं कि उन्हें उनके “क्षेत्रों” में शरीयत कानून (इस्लामिक कानून) के मुताबिक चलने दिया जाये (क्योंकि उनका अन्तिम लक्ष्य तो यही है कि समूचा विश्व “शरीयत” कानून के हिसाब से चले)। जब मुस्लिम जनसंख्या 10% से अधिक हो जाती है तब वे उस देश/प्रदेश/राज्य/क्षेत्र विशेष में कानून-व्यवस्था के लिये परेशानी पैदा करना शुरु कर देते हैं, शिकायतें करना शुरु कर देते हैं, उनकी “आर्थिक परिस्थिति” का रोना लेकर बैठ जाते हैं, छोटी-छोटी बातों को सहिष्णुता से लेने की बजाय दंगे, तोड़फ़ोड़ आदि पर उतर आते हैं, चाहे वह फ़्रांस के दंगे हों, डेनमार्क का कार्टून विवाद हो, या फ़िर एम्स्टर्डम में कारों का जलाना हो, हरेक विवाद को समझबूझ, बातचीत से खत्म करने की बजाय खामख्वाह और गहरा किया जाता है, जैसे कि –
गुयाना – मुस्लिम 10%
भारत – मुस्लिम 15%
इसराइल – मुस्लिम 16%
केन्या – मुस्लिम 11%
रूस – मुस्लिम 15% (चेचन्या – मुस्लिम आबादी 70%)

जब मुस्लिम जनसंख्या 20% से ऊपर हो जाती है तब विभिन्न “सैनिक शाखायें” जेहाद के नारे लगाने लगती हैं, असहिष्णुता और धार्मिक हत्याओं का दौर शुरु हो जाता है, जैसे-
इथियोपिया – मुस्लिम 32.8%

जनसंख्या के 40% के स्तर से ऊपर पहुँच जाने पर बड़ी संख्या में सामूहिक हत्याऐं, आतंकवादी कार्रवाईयाँ आदि चलने लगते हैं, जैसे –
बोस्निया – मुस्लिम 40%
चाड – मुस्लिम 54.2%
लेबनान – मुस्लिम 59%

जब मुस्लिम जनसंख्या 60% से ऊपर हो जाती है तब अन्य धर्मावलंबियों का “जातीय सफ़ाया” शुरु किया जाता है (उदाहरण भारत का कश्मीर), जबरिया मुस्लिम बनाना, अन्य धर्मों के धार्मिक स्थल तोड़ना, जजिया जैसा कोई अन्य कर वसूलना आदि किया जाता है, जैसे –

अल्बानिया – मुस्लिम 70%
मलेशिया – मुस्लिम 62%
कतर – मुस्लिम 78%
सूडान – मुस्लिम 75%

जनसंख्या के 80% से ऊपर हो जाने के बाद तो सत्ता/शासन प्रायोजित जातीय सफ़ाई की जाती है, अन्य धर्मों के अल्पसंख्यकों को उनके मूल नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाता है, सभी प्रकार के हथकण्डे/हथियार अपनाकर जनसंख्या को 100% तक ले जाने का लक्ष्य रखा जाता है, जैसे –

बांग्लादेश – मुस्लिम 83%
मिस्त्र – मुस्लिम 90%
गाज़ा पट्टी – मुस्लिम 98%
ईरान – मुस्लिम 98%
ईराक – मुस्लिम 97%
जोर्डन – मुस्लिम 93%
मोरक्को – मुस्लिम 98%
पाकिस्तान – मुस्लिम 97%
सीरिया – मुस्लिम 90%
संयुक्त अरब अमीरात – मुस्लिम 96%

बनती कोशिश पूरी 100% जनसंख्या मुस्लिम बन जाने, यानी कि दार-ए-स्सलाम होने की स्थिति में वहाँ सिर्फ़ मदरसे होते हैं और सिर्फ़ कुरान पढ़ाई जाती है और उसे ही अन्तिम सत्य माना जाता है, जैसे –
अफ़गानिस्तान – मुस्लिम 100%
सऊदी अरब – मुस्लिम 100%
सोमालिया – मुस्लिम 100%
यमन – मुस्लिम 100%



दुर्भाग्य से 100% मुस्लिम जनसंख्या होने के बावजूद भी उन देशों में तथाकथित “शांति” नहीं हो पाती। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि जिन देशों में मुस्लिम जनसंख्या 8 से 10 प्रतिशत हो चुकी होती है, उन देशों में यह तबका अपने खास “मोहल्लो” में रहना शुरु कर देता है, एक “ग्रुप” बनाकर विशेष कालोनियाँ या क्षेत्र बना लिये जाते हैं, उन क्षेत्रों में अघोषित रूप से “शरीयत कानून” लागू कर दिये जाते हैं। उस देश की पुलिस या कानून-व्यवस्था उन क्षेत्रों में काम नहीं कर पाती, यहाँ तक कि देश का न्यायालयीन कानून और सामान्य सरकारी स्कूल भी उन खास इलाकों में नहीं चल पाते (ऐसा भारत के कई जिलों के कई क्षेत्रों में खुलेआम देखा जा सकता है, कई प्रशासनिक अधिकारी भी दबी जुबान से इसे स्वीकार करते हैं, लेकिन “सेकुलर-देशद्रोहियों” के कारण कोई कुछ नहीं बोलता)।

आज की स्थिति में मुस्लिमों की जनसंख्या समूचे विश्व की जनसंख्या का 22-24% है, लेकिन ईसाईयों, हिन्दुओं और यहूदियों के मुकाबले उनकी जन्मदर को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस शताब्दी के अन्त से पहले ही मुस्लिम जनसंख्या विश्व की 50% हो जायेगी (यदि तब तक धरती बची तो)… भारत में कुल मुस्लिम जनसंख्या 15% के आसपास मानी जाती है, जबकि हकीकत यह है कि उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और केरल के कई जिलों में यह आँकड़ा 40 से 50% तक पहुँच चुका है… अब देश में आगे चलकर क्या परिस्थितियाँ बनेंगी यह कोई भी (“सेकुलरों” को छोड़कर) आसानी से सोच-समझ सकता है…
(सभी सन्दर्भ और आँकड़े : डॉ पीटर हैमण्ड की पुस्तक “स्लेवरी, टेररिज़्म एण्ड इस्लाम – द हिस्टोरिकल रूट्स एण्ड कण्टेम्पररी थ्रेट तथा लियोन यूरिस – “द हज”, से साभार)

यदि इस्लाम की धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देखें, तो कोई मुस्लिम सही अर्थों में सेकुलर हो ही नहीं सकता, क्योंकि वे “एकेश्वरवादी” हैं, उनके लिये अल्लाह ही सबसे बड़ी और एकमात्र सच्चाई है और पैगम्बर मोहम्मद के सन्देश पत्थर की लकीर। वे दूसरे धर्मों के देवताओं का अस्तित्व ही नहीं मानते, बल्कि दूसरे मूर्तिपूजकों को वे काफ़िर मानते हैं, ऐसे में भला वे सेकुलर कैसे हो सकते हैं। जब कोई हिन्दू, अपने धर्म या देवी-देवताओं पर सवाल उठाता है तो हिन्दू उस पर बहस करेंगे, उस व्यक्ति की आलोचना करेंगे, उसकी बातों को कम से कम एक बार सुनेंगे और उसके बावजूद उस व्यक्ति का कोई बाल भी बाँका नहीं होगा, जबकि मुस्लिम व्यक्ति अपने ही धर्म के खिलाफ़ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता, और सलमान रुश्दी या तसलीमा नसरीन जैसे कुछ लोग यदि समाज में व्याप्त किसी बुराई पर बोलने की कोशिश भी करते हैं तो उनके खिलाफ़ फ़तवे जारी हो जाते हैं, उन्हें जान से मारने की धमकियाँ मिलती हैं, उन्हें अपने ही देश से भागना पड़ता है। हिन्दुओं और मुस्लिमों में यही मुख्य अन्तर है, यानी सहिष्णुता और असहिष्णुता का। हिन्दुओं को दूसरे धर्मों और उनकी पूजा पद्धतियों से कभी कोई आपत्ति नहीं होती, जबकि इस्लाम में दूसरे धर्मों को समान रूप से इज्जत देना तो दूर, उनके लिये कोई जगह छोड़ना भी लगभग गुनाह मान लिया जाता हो, तब ऐसे में भला कैसे कोई मुस्लिम “सेकुलर” हो सकता है? विद्वानों से मैं पूछना चाहता हूँ कि “सेकुलर” की उनकी परिभाषा क्या है? और उस परिभाषा के खाँचे में मुस्लिम धर्मावलम्बी कैसे सेकुलर कहला सकते हैं? इसका दूसरा अर्थ यह भी निकलता है कि कोई व्यक्ति या तो “सेकुलर” हो सकता है या फ़िर “सच्चा मुसलमान”, दोनों एक साथ नहीं हो सकता। और जो आँकड़े तथा विभिन्न देशों की परिस्थियाँ ऊपर दी गई हैं, उससे एक सवाल और भी खड़ा होता है कि आखिर मुस्लिम बहुल देशों में लोकतन्त्र क्यों नहीं पनपता? हालांकि इसका जवाब भी इसी लेख में छुपा हुआ है, लेकिन उस विषय पर बाद में कभी विस्तार से बात करेंगे…

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NDTV, India-Pakistan Relation, Cricket

भारत के खेल मंत्री श्री गिल ने बयान दिया है कि भारत की क्रिकेट टीम को पाकिस्तान का दौरा नहीं करना चाहिये। असल में गिल साहब अभी पूरी तरह “अफ़सर” से “नेता” नहीं बन पाये हैं और उनमें “सेकुलरिज़्म” का कीड़ा भी पूरी तरह घुस नहीं पाया है, सो उन्होंने आम जनता की भावना को शब्दों में मीडिया के सामने उतार दिया।

अब भारत में लाखों व्यक्ति और काफ़ी संस्थान जान चुके हैं कि पाकिस्तान में दाऊद इब्राहीम का नेटवर्क जबरदस्त मजबूत है। पाकिस्तान में होने वाली किसी भी “बड़ी आर्थिक गतिविधि” में उसका “हिस्सा” निश्चित रूप से होता है। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड लगभग कंगाली की हालत में पहुँच चुका है। भारत की क्रिकेट टीम के दौरे का सपना देखकर वे अपने बुरे दिन उबारना चाहते हैं, लेकिन आतंकवाद की जो फ़सल उन्होंने इतने सालों में उगाई है, उस “गाजरघास” के कुछ बीज मुम्बई हमलों में शामिल थे, अब भारत की आम जनता पाकिस्तान से सम्बन्ध पूरी तरह खत्म करने के मूड में हैं, लेकिन “कांग्रेसी नेता”, “सेकुलरिज़्म से पीड़ित लोग”, और “नॉस्टैल्जिया में जीने वाले तथा कुछ गाँधीवादी लोग” अभी भी पाकिस्तान से दोस्ती का राग अलाप रहे हैं। असल में भारत में तीन तरह के लोग अब भी “पाकिस्तान-प्रेम” से बुरी तरह ग्रसित हैं, पहले वे लोग जो विभाजन के समय यहाँ रह गये (जाना तो चाहते थे), उन्हें अभी भी लाहौर की हवेलियाँ, बाजार, मुजरे वगैरह याद आते रहते हैं, दूसरे हैं फ़िल्म कलाकारों और नचैयों की एक जमात, जिसे दाऊद भाई अपने इशारों और पैसों पर यहाँ-वहाँ-जहाँ-तहाँ नचवाते रहते हैं, तीसरे हैं “मोमबत्ती छाप सेकुलर गैंग”, जो हजार बार गलत साबित होने के बावजूद भी पाकिस्तान को जबरन अपना “छोटा भाई” मानने पर उतारू है (NDTV इस तीसरे टाइप की कैटेगरी में आता है)।






जैसे ही गिल साहब का यह बयान आया फ़ौरन से भी पहले NDTV ने अपनी खबरों में उसे हाइलाईट करना शुरु कर दिया, चैनल पर उपस्थित एंकरों ने खुद अपनी तरफ़ से ही बयानबाजी शुरु कर दी कि “खेल मंत्री को दौरा रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है…” “भारत-पाकिस्तान के आपसी सम्बन्ध सामान्य बनाने के लिये यह दौरा बहुत जरूरी है…”, “यह दौरा सिर्फ़ सुरक्षा कारणों से रद्द किया जा सकता है…”, “इससे क्रिकेट का बहुत नुकसान होगा…”, “खेल में राजनीति नहीं होना चाहिये…”, आदि-आदि-आदि-आदि, यानी कि “फ़ोकटिया शब्दों की लफ़्फ़ाज़ी” चालू हो गई, जिसमें NDTV पहले से ही माहिर है, और “कमाई” करने के मामले में भी, जाहिर है कि तत्काल SMS भी मंगवाये जाने लगे कि “भारत को पाकिस्तान का दौरा करना चाहिये या नहीं…” हमें SMS करें और हमारी जेब भरें…




सेकुलर और NDTV जैसे लोग शायद यह भूल जाते हैं कि खेल या अन्य किसी भी प्रकार के खेल सम्बन्ध “शरीफ़ों” और “सभ्य नागरिकों” से ही रखे जाते हैं, जो देश अपने जन्म से ही घृणा फ़ैलाने में लगा हुआ हो, जहाँ पाठ्यक्रम में ही बाकायदा “जेहाद” की शिक्षा दी जाती है, जहाँ के नौनिहाल “भारत (बल्कि विश्व) में इस्लाम का परचम फ़हराने के उद्देश्य से ही बड़े होते हैं, उस देश से सम्बन्ध रखने की क्या तुक है? और “खेल में राजनीति नहीं होना चाहिये…” का तर्क तो इतना बोदा और थोथा है कि ये सेकुलर लोग इस बात का भी जवाब नहीं दे सकते कि रंगभेद के जमाने में दक्षिण अफ़्रीका ने भारत क्या बिगाड़ा था, जो हमने उससे सम्बन्ध तोड़ रखे थे? या कि इसराइल ने भारत के कौन से हिस्से पर कब्जा कर लिया था कि यासर अराफ़ात को गले लगाते-लगाते उससे भी हमने सम्बन्ध तोड़ रखे थे? क्या यह व्यवहार खेल में राजनीति नहीं थी? और सबसे बड़ी बात तो यह कि पाकिस्तान के साथ न खेलने से हमारा क्या नुकसान होने वाला है? कुछ भी नहीं। सारा विश्व इस समय पाकिस्तान के खिलाफ़ है, हमें इस माहौल का फ़ायदा उठाना चाहिये, न कि अपना परम्परागत “गाँधीवादी” तरीका अपनाकर मामले को ढीला छोड़ देना चाहिये। लेकिन इस देश में देश का स्वाभिमान देखने से ज्यादा “पैसे के भूखे” लोग हैं, उन्हें तत्काल “डॉलर” का नुकसान दिखाई दे रहा है। जबकि असल में नुकसान होगा पाकिस्तान क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का, यानी प्रकारान्तर से दाऊद का भी, फ़िर क्यों भाई लोग क्रिकेट खेलने के पीछे पड़े हैं। यहीं से भारत के कुछ “खास” लोगों पर शक मजबूत होता है। पाकिस्तान से मधुर सम्बन्ध बनाये रखने में बासमती चावल, कश्मीरी शॉल, शक्कर, आलू, पान के करोड़ों में “खेलने-खाने-खिलाने” वाले आयातक और निर्यातकों की एक बहुत बड़ी गैंग के अपने स्वार्थ हैं, और इन्हें देश के स्वाभिमान से कभी भी कोई लेना-देना नहीं रहा।

यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि पाकिस्तान में सेना और आईएसआई का शिकंजा वहाँ के प्रत्येक वित्तीय संस्थान पर कसा हुआ है। पाकिस्तान की डॉ आयशा सिद्दिकी-आगा द्वारा एक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में सन् 2000 में प्रस्तुत एक पेपर “पावर, पर्क्स, प्रेस्टीज एण्ड प्रिविलेजेस – मिलिटरी इकॉनामिक एक्टिविटीज इन पाकिस्तान” में उन्होंने बताया है कि पाकिस्तान ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ कि सेना का हरेक संस्थान और हरेक जमात पर पूरा नियन्त्रण है। अध्ययनों से पता चला है कि पाकिस्तान में चार विशालकाय फ़ाउण्डेशन हैं 1) फ़ौजी फ़ाउण्डेशन (FF), 2) आर्मी वेलफ़ेयर ट्रस्ट (AWT), 3) बहारिया फ़ाउण्डेशन (BF), 4) शाहीन फ़ाउण्डेशन (SF), इन विभिन्न ट्रस्टों और फ़ाउण्डेशनों पर पाकिस्तान फ़ौज का पूर्ण कब्जा है, पाकिस्तान की आर्थिक धुरी में ये काफ़ी महत्वपूर्ण माने जाते हैं (सन्दर्भ - आर वैद्यनाथन रेडिफ़. कॉम 10/12/08)। ऐसे में यह मानना मूर्खतापूर्ण ही होगा कि आर्थिक रूप से मजबूत पाकिस्तान हमारा दोस्त बन सकता है, बल्कि वह जितना आर्थिक रूप से सम्पन्न होगा, वहाँ की सेना और दाऊद इब्राहीम ही आर्थिक रूप से मजबूत होते जायेंगे। ऐसे में पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलना यानी उन्हें संजीवनी प्रदान करने जैसा होगा, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि पाकिस्तान की पूर्ण आर्थिक नाकेबन्दी की जानी चाहिये, जैसे एक “भोगवादी” वर्ग भारत में है वैसा ही पाकिस्तान में भी है, उसके आर्थिक हितों पर चोट होना जरूरी है। पाकिस्तान में सेना ने हमेशा ही कुछ कठपुतलियों को प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बनाये रखा है और उनसे कोई उम्मीद रखना बेकार ही होगा। खुद जरदारी की यह घोषणा बेहद हास्यास्पद है कि बेनज़ीर की हत्या की जाँच स्कॉटलैण्ड यार्ड से करवाई जायेगी, अर्थात उन्हें अपने देश की पुलिस पर ही भरोसा नहीं है, ऐसे में भारत उस व्यक्ति पर भरोसा क्यों करे जिसका अतीत दागदार है और अपने “बिजनेस”(?) को बढ़ाने के लिये जिस व्यक्ति के दाऊद के साथ रिश्ते सरेआम जाहिर हो चुके हैं? असल में जरदारी और प्रधानमंत्री सिर्फ़ “टाइमपास” कर रहे हैं, और भारत मूर्ख बनता हुआ लग रहा है। जरूरत इस बात की है कि सबसे पहले हम “गुजराल डॉक्ट्रिन” को कूड़े में फ़ेंकें और पाकिस्तान को अपना “छोटा भाई” मानना बन्द करें।

पाकिस्तान के खिलाफ़ अभी हमने युद्ध की मुद्रा बनाना शुरु ही किया है, लेकिन उससे पहले ही NDTV ने “भाईचारे” का राग छेड़ना शुरु कर दिया है, “खेल को राजनीति से दूर रखना चाहिये…” रूपी उपदेश झाड़ने शुरु हो गये हैं। उधर अरुन्धती रॉय ने विदेश में अंग्रेजी अखबारों में भारत और हिन्दुओं के खिलाफ़ जहर उगलना जारी रखा है… ऐसे में शक होता है कि कहीं दाऊद के कुछ “गुर्गे” सफ़ेदपोशों के भेष में हमारे बीच में तो मौजूद नहीं हैं, जो जब-तब पाकिस्तान से दोस्ती का “डोज़” देते रहते हैं? कहीं भारत के कुछ खास लोगों की पाकिस्तान में बैठे खास लोगों से कुछ गुप्त साँठगाँठ तो नहीं, जो हमेशा भारत पाकिस्तान के आगे झुक जाता है?

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Mumbai Terror Attacks India-America and Pakistan

मुम्बई हमले को एक माह होने को आया, गत एक साल में 60 से ज्यादा बम विस्फ़ोट हो चुके, संसद पर हमले को आठ साल हो गये, कारगिल हुए दस साल बीत गये, भारत नाम की कथित “महाशक्ति” लगता है कि आज भी वहीं की वहीं है। मुझे आज तक पता नहीं कि भारत को महाशक्ति (या क्षेत्रीय महाशक्ति) का नाम किसने, कब और क्यों दिया था। महाशक्ति की परिभाषा क्या होती है, इसे लेकर भी शायद विभिन्न मत होंगे, इसीलिये किसी विद्वान(?) ने भारत को महाशक्ति कहा होगा।

चीन ने अमेरिका के जासूसी विमान को अपनी सीमा का उल्लंघन करने पर उसे रोक रखा और तब तक रोक कर रखा जब तक कि अमेरिका ने नाक रगड़ते हुए माफ़ी नहीं माँग ली। रूस, चेचन अलगाववादियों पर लगातार हमले जारी रखे हुए हैं, हाल ही में जॉर्जिया के इलाके में अपने समर्थकों के समर्थन और नई सीमाओं को गढ़ने के लिये रूस ने जॉर्जिया पर भीषण हमले किये। 9/11 के बाद अमेरिका ने न ही संयुक्त राष्ट्र से औपचारिक सहमति ली, न ही किसी का समर्थन लिया, वर्षों पहले जापान ने भी यही किया था। ब्रिटेन हजारों मील दूर अपने फ़ॉकलैण्ड द्वीप को बचाने के लिये अर्जेण्टीना से भी भिड़ गया था और उसे घुटने पर बैठाकर ही युद्ध का खत्मा किया… महाशक्तियाँ ऐसी होती हैं… अलग ही मिट्टी की बनी हुई, अपने देश का स्वाभिमान बनाये रखने के लिये किसी भी हद तक जाने वाली… इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में 1971 के आधे-अधूरे ही सही भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद गत 39 वर्षों में भारत ने अब तक क्या किया है… किस आधार पर इसे कोई महाशक्ति कह सकता है? क्या सिर्फ़ इसलिये कि यह देश सबसे अधिक संख्या में “सॉफ़्टवेयर मजदूर” पैदा करता है (पहले गन्ना कटाई के लिये यहाँ से मजदूर मलेशिया, मालदीव, फ़िजी, तंजानिया, केन्या जाते थे, अब सॉफ़्टवेयर मजदूर अमेरिका जाते हैं), या महाशक्ति सिर्फ़ इसलिये कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा अपना माल खपाने के लिये यहाँ करोड़ों की संख्या में मध्यमवर्गीय मूर्ख मौजूद हैं, या इसलिये कि भारत हथियारों, विमानों का सबसे बड़ा ग्राहक है? कोई मुझे समझाये कि आखिर महाशक्ति हम किस क्षेत्र में हैं? क्या सिर्फ़ बढ़ती आर्थिक हैसियत से किसी देश को महाशक्ति कहा जा सकता है? भारत को अमेरिका बराबर की आर्थिक महाशक्ति बनने में अभी कम से कम 30 साल तो लग ही जायेंगे, फ़िलहाल हम “डॉलर” की चकाचौंध के आगे नतमस्तक हैं, फ़िर इस तथाकथित “क्षेत्रीय महाशक्ति” की सुनता या मानता कौन है? नेपाल? बांग्लादेश? श्रीलंका? म्यांमार… कोई भी तो नहीं।



मुम्बई हमलों के बाद मनमोहन सिंह जी ने देश को सम्बोधित किया था। एक परम्परा है, किसी भी बड़े हादसे के बाद प्रधानमंत्री देश को सम्बोधित करते हैं सो उन्होंने भी रस्म-अदायगी कर दी। इतने बड़े हमले के बाद राष्ट्र को सम्बोधन करते समय अमूमन कुछ “ठोस बातें या विचार” रखे जाते हैं, लेकिन सीधे-सादे प्रधानमंत्री उस वक्त भी सीधे-सादे बने रहे और माफ़ी माँगते नज़र आये। अपने सम्बोधन में उन्होंने मुख्यतः तीन बातें कही थीं, उन्होंने आतंकवादियों को धमकी की भाषा भी बड़े मक्खन लगाने वाले अन्दाज़ में दी। उन्होंने कहा कि 1) “हम आतंकवादी गुटों और उनके आकाओं को मिलने वाली आर्थिक मदद को रोकेंगे”, 2) देश में घुसने वाले हरेक संदिग्ध व्यक्ति को रोकने के उपाय किये जायेंगे, 3) हम आतंक फ़ैलाने वालों, उनकी मदद करने वालों और उन्हें पनाह देने वालों का पीछा करेंगे और उन्हें इस कृत्य की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी… सुनने में यह बातें कितनी अच्छी लगती हैं ना!!! 9/11 के बाद लगभग इसी से मिलती-जुलती बातें जॉर्ज बुश ने अपने राष्ट्र के नाम सम्बोधन में कही थीं, और दुनिया ने देखा कि कम से कम आखिरी दो मुद्दों पर उन्होंने गम्भीरता से काम किया है और कुछ अर्थों में सफ़ल भी हुए… यह होती है महाशक्ति की पहचान। इसके विपरीत भारत में क्या हो रहा है, बातें, बातें, बातें, समीक्षायें, मीटिंग्स, लोकसभा और राज्यसभा में बहसें, नतीजा……फ़िलहाल जीरो।

संदिग्ध गुटों को आर्थिक मदद मिलने के मुद्दे पर बस इतना ही कहा जा सकता है कि ISI और SIMI या अल-कायदा किसी बैंक या वित्तीय संस्थान के भरोसे अपना संगठन नहीं चलाते हैं, उनकी अपनी खुद की अलग अर्थव्यवस्था है, अफ़ीम, तस्करी, नकली नोटों, ड्रग्स और अवैध हथियारों की खरीद-फ़रोख्त से बनाई हुई। यकीन न आता हो तो उत्तर भारत की बैंकों की शाखाओं से निकलते 500 के नकली नोटों की बढ़ती घटनाओं पर गौर कीजिये, एक छोटे शहर के छोटे व्यापारी से 500 और 1000 के नोटों का लेन-देन कीजिये, पता चल जायेगा कि अर्थव्यवस्था से विश्वास डिगाने में महाशक्ति कामयाब हुई या ISI? और आतंकवादी देश में वैध रास्तों से तो घुसते नहीं हैं, उनके लिये मुम्बई-कोंकण के समुद्र तटों से लेकर, नेपाल, बांग्लादेश तक की सीमायें खुली हुई हैं, उन्हें कैसे रोकेंगे?

“हम आतंकवादियों का पीछा करेंगे और उन्हें सबक सिखाया जायेगा…” अब तो सभी जान गए हैं कि यह सिवाय “खोखली” धमकी के अलावा कुछ और नहीं है। विश्व देख रहा है कि भारत की सरकार अफ़ज़ल को किस तरह गोद में बैठाये हुए है और बात कर रहे हैं “पीछा करने की”… जिस प्रकार किसी हत्या के मुजरिम को कहा जाये कि आप हत्यारे को ढूँढने में पुलिस की मदद कीजिये उस प्रकार हमारे प्रधानमंत्री ने हमले के बाद ISI के मुखिया को भारत बुलावा भेजा था, क्या है यह सब? दुर्भाग्य यह है कि विपक्ष भी मजबूती से अपनी बात रखने में सक्षम नहीं है, उसके कंधे पर भी संसद पर हमला और कंधार के भूत सवार हैं। NDA ने ही संसद पर हमले के बाद सेनाओं को खामख्वाह छह महीने तक पाकिस्तान की सीमाओं पर तैनात रखा था, जिसका नतीजा सिर्फ़ इतना हुआ कि उस कवायद में भारत के करोड़ों रुपये खर्च हो गये।

अब पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिये पूरा देश उतावला है, तो हमारे नेता और पार्टियाँ सिर्फ़ शब्दों की जुगाली करने में लगे हुए हैं। श्री वैद्यनाथन जी ने पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिये कुछ उपाय सुझाये थे – जैसे कि

1) पाकिस्तान से निर्यात होने वाले मुख्य जिंसों जैसे बासमती चावल और कालीन आदि को भारत से निर्यात करने के लिये शून्य निर्यात कर लगाया जाये या भारी सबसिडी दी जाये ताकि पाकिस्तान का निर्यात बुरी तरह मार खाये।

2) जो प्रमुख देश (ब्राजील, जर्मनी और चीन) पाकिस्तान को हथियार सप्लाई करते हैं, उन्हें स्पष्ट शब्दों में बताया जाना चाहिये कि पाकिस्तान को शस्त्र देने से हमारे आपसी सम्बन्ध दाँव पर लग सकते हैं और इन देशों की कम्पनियों को भारत में निवेश सम्बन्धी “धमकियाँ” देनी चाहिये, ताकि वे अपनी-अपनी सरकारों को समझा सकें कि पाकिस्तान से सम्बन्ध रखना ठीक नहीं है, भारत से सम्बन्ध रखने में फ़ायदा है।

3) जिस प्रकार चीन में पेप्सी-कोक के आगमन के साथ ही वहाँ हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों की खबरें दबा दी गई, उसी प्रकार भारत को अपने विशाल “बाजार” को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहिये।

4) पाकिस्तानी कलाकारों, क्रिकेट खिलाड़ियों को भारत प्रवेश से वंचित करना होगा ताकि दाऊद द्वारा जो पैसा फ़िल्मों और क्रिकेट में लगाया जा रहा है, उसमें उसे नुकसान उठाना पड़े।

5) भारत की कोई भी सॉफ़्टवेयर कम्पनी पाकिस्तान से जुड़ी किसी भी कम्पनी को अपनी सेवायें न दे, यदि हम सॉफ़्टवेयर में महाशक्ति हैं तो इस ताकत का देशहित में कुछ तो उपयोग होना चाहिये।

वैद्यनाथन जी ने और भी कई उपाय सुझाये हैं, लेकिन एक पर भी भारत सरकार ने शायद अभी तक विचार नहीं किया है। जो लोग युद्ध विरोधी हैं उन्हें भी यह उपाय मंजूर होना चाहिये, क्योंकि आखिर पेट पर लात पड़ने से शायद उसे अकल आ जाये। लगभग यही उपाय कश्मीर समस्या के हल के लिये भी सुझाये गये थे। भारत द्वारा कश्मीर और पाकिस्तान को जोर-शोर से प्रचार करके यह जताना चाहिये कि “हम हैं, हमारी मदद है, हमारे से सम्बन्ध बेहतर हैं तो उनकी रोटी चलेगी…वरना”, लेकिन यह इतनी सी बात भी खुलकर कहने में हमारे सेकुलर गद्दारों को पसीना आ रहा है।



और सबसे बड़ी दिक्कत अरुंधती रॉय, अब्दुल रहमान अन्तुले, लालू-पासवान जैसे सेकुलर हैं, जिनके बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता कि वे किस तरफ़ हैं? पाकिस्तान से भिड़ने से पहले इन जैसे सेकुलर लोगों से पार पाना अधिक जरूरी है। असल में भारत के “सिस्टम” में किसी की जवाबदेही किसी भी स्तर पर नहीं है, जब तक यह नहीं बदला जायेगा तब तक कोई ठोस बदलाव नहीं होने वाला। प्रधानमंत्री से जवाब माँगने से पहले खुद सोचिये कि क्या आपने मनमोहन सिंह को चुना था? नहीं, उन्हें तो मैडम ने चुना था आप पर शासन करने के लिये, फ़िर वे किसे जवाबदेह होंगे? सारा देश इस समय गुस्से, अपमान और क्षोभ से भरा हुआ है, और उधर संसद में हमारे बयानवीर रोजाना नये-नये बयान दिये जा रहे हैं, संयुक्त राष्ट्र से गुहार लगाई जा रही है, जबकि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान जाकर उसे आतंकवाद से लड़ने के नाम पर 6 मिलियन पाऊण्ड की मदद दे दी। इधर जनता त्रस्त है कि अब कहने का वक्त गुजर चुका, कुछ करके दिखाईये जनाब… उधर पाकिस्तान में एक चुटकुला आम हो चला है कि “जब पचास-पचास कोस दूर गाँव में बच्चा रात को रोता है तो माँ कहती है कि बेटा सो जा, सो जा नहीं तो प्रणब मुखर्जी का एक और बयान आ जायेगा…” और बच्चा इस बात पर हँसने लगता है। कुल मिलाकर स्थिति यह बन रही है कि एक पिलपिली सी “महाशक्ति”, बच्चों की तरह अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, संयुक्त राष्ट्र से शिकायत कर रही है कि “ऊँ, ऊँ, ऊँ… देखो, देखो अंकल वो पड़ोस का बच्चा मुझे फ़िर से मारकर भाग गया… अब मैं क्या करूँ, अंकल मैं आपको सबूत दे चुका हूँ कि वही पड़ोसी मुझे रोजाना मारता रहता है…” अंकल को क्या पड़ी है कि वे उस शैतान बच्चे को डाँटें (दिखावे के लिये एकाध बार डाँट भी देते हैं), लेकिन अन्ततः उस शैतान बच्चे से निपटना तो रोजाना पिटने वाले बच्चे को ही है, कि “कम से कम एक बार” उसके घर में घुसकर जमकर धुनाई करे, फ़िर अंकल भी साथ दे देंगे…

फ़िलहाल आशा की एक किरण आगामी लोकसभा चुनाव हैं, जिसमें कांग्रेस को अपना चेहरा बचाने के लिये कोई न कोई कठोर कदम उठाने ही पड़ेंगे, क्योंकि वोटों के लिये कांग्रेस “कुछ भी” कर सकती है, और दोनो हाथों में लड्डू रखने की उसकी गन्दी आदत के कारण कोई कदम उठाने से पहले ही अन्तुले, दिग्विजय सिंह को भी “दूसरी तरफ़” तैनात कर दिया है… हो सकता है कि कांग्रेस एक मिनी युद्ध के लिये सही “टाईमिंग” का इंतजार कर रही हो, क्योंकि यदि युद्ध हुआ तो लोकसभा के आम चुनाव टल जायेंगे, तब तक कश्मीर में चुनाव निपट चुके होंगे और यदि उसके बाद अफ़ज़ल को फ़ाँसी दे दी जाये और पाकिस्तान पर हमला कर दिया जाये तो कांग्रेस के दोनो हाथों में लड्डू और दिल्ली की सत्ता होगी… जैसी कि भारत की परम्परा रही है कि हरेक बड़े निर्णय के पीछे राजनीति होती है, वैसा ही कुछ युद्ध के बारे में होने की सम्भावना है और “पीएम इन वेटिंग” सदा वेटिंग में ही रह जायें। रही आम जनता, तो उसे बिके हुए मीडिया के तमाशे से आसानी से बरगलाया जा सकता है…

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मंगलवार, 30 दिसम्बर 2008 11:39

भारत को दस लाख “माधवन” चाहिये…

IIT Engineer Farmer India’s Food Crisis

“तकनीकी” भारत को बदल रही है यह हम सब जानते हैं, लेकिन यदि तकनीक का उपयोग भारत की मूल समस्याओं को दूर करने में हो जाये तो यह सोने में सुहागा होगा। हम अक्सर भारत के आईआईटी पास-आउट छात्रों के बारे में पढ़ते रहते हैं, उनकी ऊँची तनख्वाहों के बारे में, उनके तकनीकी कौशल के बारे में, विश्व में उनकी प्रतिभा के चर्चे के बारे में भी… गत कुछ वर्षों में आईआईटी छात्रों में एक विशिष्ट बदलाव देखने में आ रहा है, वह है मोटी तनख्वाह वाली नौकरियों को ठोकर मारकर “अपने मन का काम करना”, उनमें भारत को आमूलचूल बदलने की तड़प दिखाई देने लगी है और भले ही अभी इनकी संख्या कम हो, लेकिन आने वाले कुछ ही सालों में यह तेजी से बढ़ेगी…

पहले हम देख चुके हैं कि किस तरह बिट्स पिलानी का एक छात्र बहुराष्ट्रीय कम्पनी की नौकरी को ठोकर मारकर चेन्नई में गरीबों के लिये सस्ती इडली बेचने के धंधे में उतरा और उसने “कैटरिंग” का एक विशाल बिजनेस खड़ा कर लिया… लेकिन यह काम श्री माधवन सालों पहले ही कर चुके हैं… जी हाँ, बात हो रही है चेन्नई के नज़दीक चेंगलपट्टू में खेती-किसानी करने वाले आईआईटी-चेन्नई के पास आऊट श्री आर माधवन की… ONGC जैसे नवरत्न कम्पनी की नौकरी को छोड़कर खेती के व्यवसाय में उतरने वाले आर माधवन एक बेमिसाल शख्सियत हैं… उनकी सफ़लता की कहानी कुछ इस प्रकार है…

माधवन जी को बचपन से ही पेड़-पौधे लगाने, सब्जियाँ उगाने में बेहद रुचि थी, किशोरावस्था में ही उन्होंने कई बार अपनी माँ को खुद की उगाई हुई सब्जियाँ लाकर दी थीं और माँ की शाबाशी पाकर उनका उत्साह बढ़ जाता था। बचपन से उनका सपना “किसान” बनने का ही था, लेकिन जैसा कि भारत के लगभग प्रत्येक मध्यमवर्गीय परिवार में होता है कि “खेती करोगे?” कमाओगे क्या? और भविष्य क्या होगा? का सवाल हरेक युवा से पूछा जाना लाजिमी है, इनसे भी पूछा गया। परिवार के दबाव के कारण किसान बनने का कार्यक्रम माधवन को उस समय छोडना पड़ा। उन्होंने आईआईटी-जेईई परीक्षा दी, और आईआईटी चेन्नई से मेकेनिकल इंजीनियर की डिग्री प्राप्त की। जाहिर है कि एक उम्दा नौकरी, एक उम्दा कैरियर और एक चमकदार भविष्य उनके आगे खड़ा था। लेकिन कहते हैं ना कि “बचपन का प्यार एक ऐसी शै है जो आसानी से नहीं भूलती…”, और फ़िर आईआईटी करने के दौरान किसानी का यह शौक उनके लिये “आजीविका के साथ समाजसेवा” का रुप बन चुका था। ONGC में काम करते हुए भी उन्होंने अपने इस शौक को पूरा करने की “जुगत” लगा ही ली। समुद्र के भीतर तेल निकालने के “रिग” (Oil Rig) पर काम करने वालों को लगातार 14 दिन काम करने पर अगले 14 दिनों का सवैतनिक अवकाश दिया जाता है, माधवन ने यह काम लगातार नौ साल तक किया। 14 दिन तक मेकेनिकल इंजीनियर अगले 14 दिन में खेती-किसानी के नये-नये प्रयोग और सीखना। वे कहते हैं कि “मुझे मेकेनिकल इंजीनियरिंग से भी उतना ही लगाव है और खेती में इंजीनियरिंग और तकनीक का अधिकाधिक उपयोग करना चाहता था। मेरा मानना है कि किसी भी अन्य शिक्षा के मुकाबले “इंजीनियरिंग” की पढ़ाई खेती के काम में बहुत अधिक उपयोगी साबित होती है। मैंने भी खेत में काम करने, निंदाई-गुड़ाई-कटाई के लिये सरल से उपकरणों का घर पर ही निर्माण किया। अन्न-सब्जियाँ उगाने में मेहनत 20% और इंजीनियरिंग तकनीक 80% होना चाहिये।

जब मैंने पिता से कहा कि इतने सालों की नौकरी बाद अब मैं खेती करना चाहूँगा, उस वक्त भी उन्होंने मुझे मूर्ख ही समझा था। चार साल की नौकरी में मैंने इतना पैसा बचा लिया था कि चेन्नई के निकट चेंगलपट्टू गाँव में 6 एकड़ जमीन खरीद सकूँ, सन् 1989 में गाँव में पैण्ट-शर्ट पहनकर खेती करने वाला मैं पहला व्यक्ति था, और लोग मुझे आश्चर्य से देखते थे…”। माधवन जी को किसी ने भी खेती नहीं सिखाई, परिवार का सहयोग मिलना तो दूर, ग्राम सेवक से लेकर कृषि विश्वविद्यालय तक ने उनके साथ असहयोग किया। चार साल तक वे अपने खेत में खेती-किसानी-फ़सल को लेकर विभिन्न प्रयोग करते रहे। 6 एकड़ में उनकी सबसे पहली फ़सल मात्र 2 टन की थी और इससे वे बेहद निराश हुए, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

1996 में उनके जीवन का “टर्निंग पॉइंट” साबित हुई उनकी इज़राइल यात्रा। उन्होंने सुन रखा था कि “टपक-सिंचाई” (Drip Irrigation) और जल-प्रबन्धन के मामले में इज़राइल की तकनीक सर्वोत्तम है। इज़राइल जाकर उन्होंने देखा कि भारत में एक एकड़ में एक टन उगने वाली मक्का इज़राइली एक एकड़ में सात टन कैसे उगाते हैं। जितनी जमीन पर भारत में 6 टन टमाटर उगाया जाता है, उतनी जमीन पर इज़राईली लोग 200 टन टमाटर का उत्पादन कर लेते हैं। उन्होंने इज़राइल में 15 दिन रहकर सारी तकनीकें सीखीं। वे कहते हैं कि “इज़राइलियों से मैंने मुख्य बात यह सीखी कि वे एक पौधे को एक इंडस्ट्री मानते हैं, यानी कि एक किलो मिरची पैदा करने वाला पौधा उनके लिये एक किलो की इंडस्ट्री है। सच तो यही है कि हम भारतवासी पानी की कद्र नहीं जानते, भारत में किसानी के काम में जितना पानी का अपव्यय होता है वह बेहद शर्मनाक है…। 2005 के आँकड़ों के अनुसार भारत में फ़सलों में जितना काम 1 लीटर पानी में हो जाना चाहिये उसके लिये 750 लीटर पानी खर्च किया जाता है…”।

इज़राइल में उन्हे मिले एक और हमवतन, डॉ लक्ष्मणन जो एक तरह से उनके “किसानी-गुरु” माने जा सकते हैं। कैलिफ़ोर्निया में रहने वाले डॉ लक्ष्मणन पिछले 35 सालों से अमेरिका में खेती कर रहे है और लगभग 60,000 एकड़ के मालिक हैं। उन्होंने माधवन की जिद, तपस्या और संघर्ष को देखकर उन्हें लगातार “गाइडेंस” दिया। उनसे मिलकर माधवन को लगा कि पैसे के लिये काम करते हुए यदि मन की खुशी भी मिले तो काम का आनन्द दोगुना हो जाता है। उस जमाने में न तो इंटरनेट था न ही संचार के आधुनिक माध्यम थे, इस कारण माधवन को लक्ष्मणन से संवाद स्थापित करने में बड़ी मुश्किलें होती थीं और समय ज़ाया होता था। हालांकि आज की तारीख में तो माधवन सीधे “स्काईप” या “गूगल टॉक” से उन्हें अपनी फ़सलों की तस्वीरें दिखाकर दो मिनट में सलाह ले लेते हैं। नई-नई तकनीकों से खेती करने में मन की खुशी तो थी ही, धीरे-धीरे पैसा भी मिलने ही लगा। लगभग 8 साल के सतत संघर्ष, घाटे और निराशा के बाद सन् 1997 में उन्हें पहली बार खेती में “प्रॉफ़िट” हुआ। माधवन बताते हैं “इतने संघर्ष के बाद भी मैंने हार नहीं मानी, मेरा मानना था कि आखिर यह एक सीखने की प्रक्रिया है और इसमे मैं गिरूंगा और फ़िर उठूंगा, भले ही कोई मुझे सहारा दे या ना दे, मुझे स्वयं ही लड़ना है और जीतकर दिखाना है”। भारत में कृषि शिक्षा की बात करते समय उनका दर्द साफ़ झलकता है, “भारत के कृषि विश्वविद्यालयों का समूचा पाठ्यक्रम बदलने की आवश्यकता है, भारत के अधिकतर कृषि विश्वविद्यालय खेती करना नहीं सिखाते, बल्कि बैंकों से लोन कैसे लिया जा सकता है- यह सिखाते हैं। उनकी तकनीकें और शिक्षा इतनी पुरानी ढर्रे वाली और जमीनी हकीकतों से कटी हुई है कि कृषि विश्वविद्यालय से निकला हुआ एक स्नातक खेती करने की हिम्मत तक नहीं जुटा सकता। गाँवों के असली हालात और कृषि पाठ्यक्रमों के बीच भारी “गैप” है…”।

अगस्त में धान की खेती से उनका वार्षिक सीजन शुरु होता है, दिसम्बर तक वह फ़सल तैयार हो जाती है तब वे फ़रवरी तक सब्जियाँ उगाते हैं, जब फ़रवरी में वह फ़सल निकल आती है तो सूखा प्रतिरोधी तेल-बीज की फ़सलों जैसे तिल और मूंगफ़ली के लिये खेत खाली हो जाते हैं, मई में इसकी फ़सल लेने के बाद वे एक माह तक विभिन्न सेमिनारों, विदेश यात्राओं के जरिये खेती की नई तकनीकें और नई फ़सलों के बारे में जानकारी लेने में समय बिताते हैं। जून-जुलाई में वापस अपने खेत पर पहुँचकर अगले सीजन की तैयारी में लग जाते हैं। 1999 में उन्होने और 4 एकड़ जमीन खरीद ली। फ़िलहाल उनका लक्ष्य प्रति एकड़ एक लाख रुपये कमाने का है जिसका “आधा टारगेट” वे हासिल कर चुके हैं, यानी फ़िलहाल वे प्रति एकड़ 50,000 रुपये की कमाई कर पा रहे हैं। फ़सलें बेचने के लिये उनके पास खुद की एक जीप और ट्रॉलर है, वे सीधे अपनी फ़सल ग्राहक को बेचते है, बगैर किसी बिचौलिये के। अब तो आसपास के लोग उन्हें आवश्यकतानुसार पहले ही चावल का ऑर्डर दे देते हैं, और माधवन उन्हें खुशी-खुशी पूरा कर देते है, ग्राहक भी कम भाव मिलने से खुश रहता है। उनके खेत के प्रत्येक एकड़ की दस प्रतिशत जमीन विभिन्न प्रयोगों के लिये होती है, वे अलग-अलग फ़सलों पर तरह-तरह के प्रयोग करते रहते हैं, कुछ सफ़ल होते हैं और कुछ असफ़ल। भविष्य की योजनानुसार वे कम से कम 200 एकड़ जमीन खरीदकर उस पर “फ़ूड प्रोसेसिंग” का कारखाना शुरु करना चाहते हैं, और उनका दावा है कि विभिन्न फ़ूड प्रोसेसिंग इकाईयाँ खुद-ब-खुद आयेंगी और वे अपने गाँव को समृद्ध बनाने में सफ़ल होंगे। उनका कहना है कि सबसे पहला लक्ष्य होना चाहिये फ़सल की प्रति एकड़ लागत में कमी करना। उससे पैदावार भी अधिक होगी और सस्ती भी होगी, जिससे निर्यात भी बढ़ाया जा सकता है। उनके दिल में भारत के गरीबों के लिये एक तड़प है, वे कहते हैं “अमेरिका में चार घंटे काम करके एक श्रमिक तीन दिन की रोटी के लायक कमाई कर सकता है, जबकि भारत के गाँवों में पूरा दिन काम करके भी खेती श्रमिक दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पाता। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व की लगभग 65% जनसंख्या कुपोषण या अल्पपोषण से ग्रस्त है, जिसमें भारत के नागरिकों की संख्या सर्वाधिक है। भारत के दस वर्ष से कम 49% बच्चे कुपोषण से पीड़ित हैं, उनकी भूख मिटाना मेरा लक्ष्य है, क्योंकि यदि इस एक पूरी की पूरी भूखी पीढ़ी को हमने नज़र-अंदाज़ कर दिया तो यह एटम बम से भी खतरनाक हो सकती है।

माधवन के जीवन का एक और स्वर्णिम क्षण तब आया जब पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम उनके खेत पर उनसे मिलने और प्रयोगों को देखने गये, राष्ट्रपति से तय 15 मिनट की मुलाकात दो घण्टे में बदल गई, और तत्काल कलाम साहब के मुँह से निकला कि “भारत को कम से कम दस लाख माधवन की आवश्यकता है…”, स्वभाव से बेहद विनम्र श्री माधवन कहते हैं कि यदि मैं किसी उद्यमशील युवा को प्रेरणा दे सकूँ तो यह मेरे लिये खुशी की बात होगी…

इस खबर का स्रोत इस जगह है…
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चलते-चलते : सन् 2008 बीतने को है, हो सकता है कि इस वर्ष की यह अन्तिम ब्लॉग पोस्ट हो… संयोग से 30 दिसम्बर 2007 को भी मैंने फ़ुन्दीबाई सरपंच की एक ऐसी ही पोस्ट (यहाँ क्लिक कर पढ़ें) लिखी थी, इस प्रकार की सकारात्मक और प्रेरणादायी पोस्ट लिखने हेतु यही उत्तम अवसर है, 2008 में कई अच्छी-बुरी घटनायें घटीं, नेताओं ने हमेशा की तरह निराश ही किया, लेकिन माधवन और फ़ुन्दीबाई सरपंच (एक आईआईटी इंजीनियर और दूसरी अनपढ़) जैसे लोग उम्मीद की किरण जगाते हैं, निराशा से उबारते हैं, और हमें आश्वस्त करते हैं कि बुराई का अंधेरा कितना ही गहरा हो, अच्छाई का एक दीपक उसे हरा सकता है…। इस वर्ष मुझे पाठकों का भरपूर स्नेह मिला, मेरे सभी स्नेही पाठकों, ब्लॉगर मित्रों, इष्ट मित्रों को आगामी अंग्रेजी नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें… स्नेह बनाये रखें और माधवन जैसे लोगों से प्रेरणा लें… फ़िर मिलेंगे अगले वर्ष… सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें…

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New Year Celebration Marketing & Hindu Traditions

उज्जैन स्थित महाकालेश्वर का मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसका खासा महत्व माना जाता है। यहाँ प्रातःकाल 4 बजे होने वाली “भस्मार्ती” (भस्म-आरती) भी प्रसिद्ध है जिसके लिये देश-विदेश से श्रद्धालु पहुँचते हैं। इस भस्मार्ती में रोज शामिल होने वाले 100 लोगों के अलावा बाहर से आने वालों के लिये 100 विशेष पास जारी किये जाते हैं। गत कुछ वर्षों से देखने में आया है कि 31 दिसम्बर की रात (या कहें कि 1 जनवरी को तड़के) की भस्मार्ती के लिये बहुत भीड़ होने लगी है। श्रद्धालुओं(?) का कहना है कि नववर्ष के पहले दिन का प्रारम्भ वे महाकालेश्वर के दर्शन करने के बाद ही करना चाहते हैं। इस वर्ष भीड़ को देखते हुए उज्जैन जिला प्रशासन ने बाहरी 100 लोगों के अलावा भी थोड़े पास वितरित करने की योजना रखी थी, लेकिन भक्तों(?) की भारी भीड़ के चलते 23 दिसम्बर को ही पास समाप्त हो गये और मन्दिर प्रशासन को लोगों को भस्मार्ती के पास के लिये मना करना पड़ा, जो कि गर्भगृह की क्षमता को देखते हुए उचित कदम था। 23 दिसम्बर से लेकर 31 दिसम्बर तक भक्तों(?) और श्रद्धालुओं(?) ने पास के लिये जुगाड़ लगाईं, जोड़-तोड़ किये, प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव डलवाये, और फ़िर भी कुछ वीवीआईपी अपने रुतबे का जलवा दिखाते हुए भस्मार्ती वाली सुबह मन्दिर में “विशेष गेट और विशेष पास” से घुसने में कामयाब रहे… इस तमाम भूमिका की वजह यह प्रश्न हैं कि “बेजा और ठसियलपने की हद तक जाकर पास जुगाड़ कर नववर्ष के पहले दिन सूर्योदय से पहले ही महाकालेश्वर के दर्शन करने की यह जिद आखिर क्यों?”… क्या इसी खास दिन “इतनी नाजायज़ मेहनत”(?) से सबसे पहले भगवान के दर्शन करने से कोई विशेष पुण्यलाभ मिलने वाला है?… और सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि क्या यह भारत का अथवा हिन्दुओं का नववर्ष है भी?… साफ़तौर पर नहीं। यह दिन तो विशुद्ध रूप से ईसाई नववर्ष है, ईस्वी सन् है। हैदराबाद से प्राप्त समाचारों के अनुसार तिरुपति बालाजी के मुख्य पुजारियों श्री एमवी सौंदाराजन और सीएस गोपालकृष्ण ने बाकायदा एक अपील जारी करके धर्मालुओं(?) को आगाह किया कि ईसाई नववर्ष के इस मौके पर मन्दिर में खामख्वाह भीड़ न बढ़ायें, इस दिन किसी भी प्रकार की विशेष आरती आदि नहीं की जायेगी और न ही मन्दिर के पट खुलने-बन्द होने के समय में बदलाव किया जायेगा। दोनो पुजारियों ने स्पष्ट कहा कि हिन्दुओं का नववर्ष 1 जनवरी से नहीं शुरु होता, तेलुगू लोगों का नववर्ष “उगादि” पर तथा केरल का नववर्ष “विसू” के तौर पर मनाया जाता है, इसलिये ख्रिस्ती नववर्ष के दिन प्रार्थना करने से कोई विशेष आध्यात्मिक लाभ नहीं होने वाला है। इतना सब कुछ बताने के बावजूद कई धर्मालु(?) 1 जनवरी को अलसुबह मन्दिर में भीड़ करने पहुँच गये थे।

भारत के विभिन्न भागों में विभिन्न धर्म समूहों के नववर्ष अलग-अलग मनाये जाते हैं, फ़िर भी सामान्य तौर पर अप्रैल माह में पड़ने वाला गुड़ी पड़वा (चैत्र शुक्ल प्रथमा) को हिन्दू नववर्ष माना जाता है, इसी प्रकार मुस्लिमों का हिजरी सन और पारसियों आदि के नववर्ष भी साल में अलग-अलग समय पर आते हैं। फ़िर यह ईस्वी सन् को धूमधड़ाके से मनाने की यह परम्परा भारत (और कुछ हद तक समूचे विश्व) में क्यों बढ़ रही है? यदि विश्लेषण किया जाये तो इसके पीछे बाजार की शक्तियाँ प्रमुख होती हैं, जिन्होंने विभिन्न प्रसार माध्यमों के जरिये समूचे विश्व में यह स्थापित कर दिया है कि 1 जनवरी ही नववर्ष है और इसे “धूमधाम से मनाया” जाना चाहिये। जाहिर है कि जिस तरह से वेलेन्टाईन डे, पेरेण्ट्स डे, मदर्स डे, फ़ादर्स डे आदि “कुकुरमुत्ते” दिनोंदिन अपने पैर पसारते जा रहे हैं, उसके पीछे मानसिकता सिर्फ़ और सिर्फ़ “बाजार” है। तर्क देने वाले कह सकते हैं कि आखिर इसमें क्या खराबी है, यदि इस बहाने लोग उत्सवप्रियता का आनन्द लेते हैं और बाजार में पैसे का चलन बढ़ता है तो इसमें क्या बुराई है? सही बात है, कोई बुराई नहीं है… 1 जनवरी जरूर जोरशोर से मनाओ, लेकिन इसके लिये गुड़ी पड़वा को भूलना जरूरी है क्या? जितना धूमधड़ाका, शोरशराबा, हो-हल्ला, पटाखे आदि 31 दिसम्बर की रात को किया जाता है क्या उसका दस प्रतिशत भी हिन्दू नववर्ष को किया जाता है? जितने उल्लास से और अनाप-शनाप पैसा खर्च करके 31 दिसम्बर मनाया जाता है, क्या “उगादि” भी वैसा मनाया जाता है? हिन्दू नववर्ष कब से शुरु होता है इसकी जानकारी का सर्वे किया जाये तो चौंकाने वाले आँकड़े निकल सकते हैं। क्या प्रकारान्तर से यह “एक दिन का धर्मान्तरण” नहीं है? सवाल ये नहीं है कि 1 जनवरी की “मार्केटिंग” सही तरीके से की गई है इसलिये यह अधिक लोकप्रिय है, बल्कि सवाल यह है कि क्या मार्केटिंग कम्पनियाँ अपना माल नहीं बेचेंगी तो हम अपना पारम्परिक धार्मिक नववर्ष भी भूल जायेंगे? दारू पीने और मुर्गे खाने को मिलता है इसलिये 31 दिसम्बर याद रखा जायेगा और चूँकि रात-बेरात लड़कियों के साथ घूमने का मौका नहीं मिलेगा इसलिये गुड़ी पड़वा को भूल जायेंगे? 200 साल की अंग्रेजी मानसिक गुलामी ने धीरे-धीरे भारत की जनता को सांस्कृतिक रूप से खोखला कर दिया है।

2009 साल पहले हुई एक घटना के आधार पर आज समूचा विश्व नववर्ष मनाता है, पश्चिम की अंधी नकल करने में माहिर हम भारतवासी भी देखादेखी ईस्वी नववर्ष मनाने लगे हैं। ऐसे-ऐसे गाँव-कस्बों में भी ढाबों-होटलों आदि में जश्न मनाये जाने लगे हैं जहाँ न तो बिजली ठीक से मिलती है, न ही ढंग की सड़क उपलब्ध है, लेकिन फ़िर भी अंधी दौड़ में सब मिलकर बहे जा रहे हैं, क्या 2009 वर्ष पहले इस दुनिया में कुछ था ही नहीं? या 2009 वर्ष पहले दुनिया में न पंचांग थे, न ही काल गणना की जाती थी? जिस प्रकार धर्म परिवर्तन करने के बाद व्यक्ति उस धर्म के त्यौहारों, परम्पराओं को अपनाने लगता है, उसी प्रकार “बाजार” की शक्तियाँ भारत में “एक दिन का धर्मान्तरण” करने में सफ़ल होती हैं। बच्चे-बूढ़े-जवान सभी देर रात तक एक दूसरे को “हैप्पी न्यू ईयर” कहते पाये जाते हैं, ये और बात है कि इनमें से 20% भी गुड़ी पड़वा को “नूतन वर्ष की शुभकामनायें” कहते हुए नहीं दिखाई देते। क्या सिर्फ़ 200 साल की अंग्रेजी गुलामी और 60 साल की आज़ादी(??) में हमारा इतना सांस्कृतिक क्षरण हो गया? कि हम “अपने” ही त्यौहार भूलने लगे हैं। और यदि वाकई में पश्चिम की नकल करना है तो उनकी समय की पाबन्दी की करो, अधिकार के साथ-साथ नागरिक कर्तव्यों के निर्वहन की नकल करो, उनके छोटे-छोटे कानूनों के पालन की नकल करो, उनके सफ़ाईपसन्द व्यवहार की नकल करो, उनके कतार में खड़े रहने की नकल करो… लेकिन भारत के अकर्मण्य और पलायनवादी लोग आसान काम की नकल करते हैं, कठिन काम की नहीं, और आसान काम है पश्चिम की देखादेखी फ़लाने-डे, ढिमाके-डे और न्यू ईयर की फ़ूहड़ डांस पार्टियों की नकल।

अन्तिम पंच लाईन - हिन्दुओं में ही सर्वाधिक धर्मान्तरण क्यों होता है इसका जवाब अगले दो सवालों में है – 1) कितने मुस्लिम हैं जो इस “अंग्रेजी नववर्ष के उपलक्ष्य में” मस्जिदों में विशेष नमाज अदा करने जाते हैं? 2) भारत में कितने चर्च हैं जहाँ गुड़ी पड़वा या उगादि के दिन विशेष घंटियाँ बजाई जाती हैं? ज़रा सोचिये कि हम कहाँ जा रहे हैं… आप कितने ही दरियादिल, कितने ही “सेकुलर”(?), कितने ही “सर्वधर्मसमभाववादी” क्यों न हों, “यदि आप मौसी को माँ कहना चाहते हैं तो शौक से कहें, लेकिन ‘माँ’ को न भूलें…”


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मुम्बई हमले और बम विस्फ़ोटों को लगभग डेढ़ माह होने को आया, जैसी की पूरी सम्भावना थी कि भारत के नेताओं से कुछ नहीं होने वाला और इस देश के मिजाज़ को समझने वाले अधिकतर लोग आशंकित थे कि पाकिस्तान के खिलाफ़ गुस्से का यह वक्ती जोश बहुत जल्दी ठण्डा पड़ जायेगा, ठीक वैसा ही हुआ… 40 आतंकवादियों की लिस्ट से शुरु करके धीरे से 20 पर आ गये, फ़िर “सैम अंकल” के कहने पर सिर्फ़ एक लखवी पर आ गये और अब तो अमेरिका की शह पर पाकिस्तान खुलेआम कह रहा है कि किसी को भारत को सौंपने का सवाल ही नहीं है… तमाम विद्वान सलाहें दे रहे हैं कि भले ही युद्ध न लड़ा जाये, लेकिन कुछ तो ऐसे कदम उठाना चाहिये कि दुनिया को लगे कि हम पाकिस्तान के खिलाफ़ गम्भीर हैं, कुछ तो ऐसा करें कि जिससे विश्व जनमत को लगे कि हम आतंकवाद के जनक, आतंकवाद के गढ़ को खत्म करने के लिये कटिबद्ध हैं। इसकी बजाय सोनिया जी के सिपहसालार क्या कर रहे हैं देखिये… एक मंत्री कहते हैं कि पाकिस्तान को “मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन” (MFN) का दर्जा जारी रहेगा (यानी जब भी भारत की जनता बम विस्फ़ोट से मरना चाहेगी, बांग्लादेश से पहले पाकिस्तान “मोस्ट फ़ेवर्ड” देश होगा), पूर्व गृहमंत्री पाटिल साहब अभी भी “उसी पुराने चोले” में हैं, वे फ़रमाते हैं, “अफ़ज़ल गुरु को फ़ाँसी देने की इतनी जल्दी क्या है?” (अभी उसे भारत की छाती पर और मूँग दलने दो), हमारे नये-नवेले गृहमंत्री अमेरिका की यात्रा पर जा रहे हैं, वहाँ पर वे अमेरिका को पाकिस्तान के खिलाफ़ सबूत देंगे (इज़राइल ने कभी भी हमास के खिलाफ़ की सबूत नहीं दिया, न ही अमेरिका ने अफ़गानिस्तान-इराक के खिलाफ़ कोई सबूत दिया), “पपू” प्रधानमंत्री (ना, ना, ना…“पप्पू” नहीं, बल्कि परम पूज्य) कहते हैं कि “पाकिस्तान को हम बताना चाहते हैं कि आतंकवाद को समाप्त करने के लिये हम किसी भी हद तक जा सकते हैं…” (यानी कि अफ़ज़ल गुरु को माफ़ करने की हद तक भी जा सकते हैं), “भारत के सभी विकल्प खुले हैं…” (यानी कि पिछवाड़े में दुम दबाकर बैठ जाने का विकल्प)।

उधर पुंछ में मेंढर के जंगलों में जैश के आतंकवादियों ने पक्के कंक्रीट के बंकर बना लिये हैं और महीनों की सामग्री जमा कर ली है, हमारे सुरक्षाबल कह रहे हैं कि “स्थानीय” मदद के बिना यह सम्भव नहीं है (यही बात मुम्बई हमले के वक्त भी कही गई थी), लेकिन कांग्रेस पहले आतंकवादियों की पार्टी (पीडीपी) के साथ सत्ता की मलाई चख रही थी, अब “नाकारा” नेशनल कांफ़्रेंस के साथ मजे मार रही है, लेकिन पाकिस्तानियों की हमारे देश में आवाजाही लगातार जारी है। सोच-सोचकर हैरत होती है कि वे लोग कितने मूर्ख होंगे जो यह सोचते हैं कि पाकिस्तान कभी भारत का दोस्त भी बन सकता है। जिस देश का विभाजन/गठन ही धार्मिक आधार पर हुआ, जिसके मदरसों में कट्टर इस्लामिक शिक्षा दी जाती हो, जो देश भारत के हाथों चार-चार बार पिट चुका हो, जिसके दो टुकड़े हमने किये हों… क्या ऐसा देश कभी हमारा दोस्त हो सकता है? एक बार दोनों जर्मनी एकत्रित हो सकते हैं, दोनो कोरिया आपस में दोस्त बन सकते हैं, लेकिन हमारे हाथों से पिटा हुआ एक मुस्लिम देश कभी भी मूर्तिपूजकों के देश का दोस्त नहीं बन सकता, लेकिन इतनी सी बात भी उच्च स्तर पर बैठे लोगों को समझ में नहीं आती?… तरस आता है…

अब तो लगने लगा है कि वाजपेयी जी ने पोखरण परमाणु विस्फ़ोट करके बहुत बड़ी गलती कर दी थी… कैसे? बताता हूँ… ज़रा सोचिये यदि वाजपेयी पोखरण-2 का परीक्षण ना करते और घोषित रूप से परमाणु बम होने की गर्जना ना करते, तो पाकिस्तान जो कि पोखरण के बाद पगलाये हुए साँड की तरह किसी भी तरह से परमाणु शक्ति बनने को तिलमिला रहा था, वह भी खुलेआम परमाणु शक्ति न बनता… “खुलेआम” कहने का मतलब यह है कि यह समूचा विश्व जानता है कि पाकिस्तान का परमाणु बम “चोरी” का है, यह बात भी सभी जानते हैं कि न सिर्फ़ पाकिस्तान, बल्कि ईरान और उत्तर कोरिया जैसे कई देश परमाणु बम शक्ति सम्पन्न हैं, लेकिन “अघोषित” रूप से… ऐसे में यदि न हम परमाणु बम की घोषणा करते, न ही हमारा नकलची पड़ोसी देखादेखी में परमाणु बम बनाता, तब स्थिति यह थी कि “बँधी मुठ्ठी लाख की खुल गई तो फ़िर खाक की…” लेकिन दोनों पार्टियों ने सारे विश्व को बता दिया कि “हाँ हमारे पास परमाणु बम है…”। अब होता यह है कि जब भी भारत, “पाकिस्तान को धोने के मूड” में आता है, सारा विश्व और सारे विश्व के साथ-साथ भारत में भी काफ़ी लोग इस बात से आशंकित हो जाते हैं कि कहीं “परमाणु युद्ध” न छिड़ जाये… इसलिये शान्ति बनाये रखो… पाकिस्तान जैसा गिरा हुआ देश भी परमाणु बम की धमकी देकर अमेरिका और बाकी देशों को इस बात के लिये राजी कर लेता है कि वे “भारत को समझायें…” रही बात भारत की तो वह तो “समझने” को तैयार ही बैठा रहता है, और कुल मिलाकर सेनाओं को सीमाओं तक ले जाकर बासी कढ़ी का उबाल थोड़े समय में ठण्डा पड़ जाता है, और ऐसा दो बार हो चुका है… जबकि उधर देखिये इज़राइल भले ही जानता हो कि ईरान एक “अघोषित” परमाणु शक्ति है, लेकिन चूँकि हमास या फ़िलीस्तीन के पक्ष में वह इस हद तक नहीं जा सकता, सो जब मर्जी होती है इज़राइल हमास पर टूट पड़ता है…

चलो माना कि किसी को पता नहीं है कि आखिर पाकिस्तान में “परमाणु बटन” पर किसका कंट्रोल है, या यह भी नहीं पता कि पाकिस्तान से कितने परमाणु बम आतंकवादियों के हाथ में पहुँच सकते हैं, या आतंकवादियों की पहुँच में हैं… सो हम युद्ध करने का खतरा मोल नहीं ले सकते… लेकिन पाकिस्तान से सम्बन्ध तो खत्म कर सकते हैं, उसके पेट पर लात तो मार सकते हैं (जो लोग इस बात के समर्थक हैं कि “आर्थिक रूप से मजबूत पाकिस्तान”, भारत का दोस्त बन सकता है, वे भी भारी मुगालते में हैं), पाकिस्तान की आर्थिक नाकेबन्दी करें, उसके साथ सभी सम्बन्ध खत्म करें, उसके नकली राजदूत (जो कि आईएसआई का एजेंट होने की पूरी सम्भावना है) को देश से निकाल बाहर करें, पाकिस्तान के साथ आयात-निर्यात खत्म करें, उधर से आने वाले कलाकारों, खिलाड़ियों पर प्रतिबन्ध लगायें, पाकिस्तान आने-जाने वाली तमाम हवाई उड़ानों को भारत के ऊपर से उड़ने की अनुमति रद्द की जाये… सिर्फ़ एक छोटा सा उदाहरण देखें – यदि पाकिस्तान एयरलाइंस की सभी उड़ानों को भारत के उड़ान क्षेत्र से न उड़ने दिया जाये तो क्या होगा… पाकिस्तान से दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैण्ड आदि देशों को जाने वाले विमानों को कितना बड़ा चक्कर लगाकर जाना पड़ेगा, पाकिस्तान से बांग्लादेश या श्रीलंका जाने वाले विमानों को कहाँ-कहाँ से घूमकर जाना पड़ेगा… पाकिस्तान का कितना नुकसान होगा, कश्मीर घाटी में नदियों और पानी पर हमारा नियन्त्रण है, हम जब चाहें पाकिस्तान को सूखा या बाढ़ दे सकते हैं, देना चाहिये… इस सम्बन्ध में अन्तर्राष्ट्रीय नियम-कानूनों की दुहाई दी जायेगी, लेकिन यदि वाकई “महाशक्ति” बन के दिखाना है तो भारत को नुकसान दे सकने वाले नियम-कानून नहीं मानने चाहिये, अमेरिका या चीन कौन से सारे अन्तर्राष्ट्रीय कानून मानते हैं? संक्षेप में यह कि जब तक हम ही विश्व को यह संकेत नहीं देंगे कि पाकिस्तान एक “खुजली वाला कुत्ता” है और जो भी उससे सम्बन्ध रखेगा, वह हमसे मधुर सम्बन्ध की आशा न रखे… बस एक संकेत भर की देर है, पाकिस्तान पर ऐसा भारी दबाव बनेगा कि उसे सम्भालना मुश्किल हो जायेगा… लेकिन कांग्रेस हो या भाजपा दोनों से ऐसी उम्मीद करना बेकार है, वाजपेयी ने मुशर्रफ़ का लाल कालीन बिछाकर स्वागत किया था, आडवाणी जिन्ना की मज़ार पर हो आये, तो कांग्रेस इज़राईल की आलोचना कर रही है… और फ़िलीस्तीन जैसे “सड़ल्ले देश” को दिल्ली की बेशकीमती जमीन पर दूतावास खोलने दिया जा रहा है… दूसरी तरफ़ “मोमबत्ती ब्रिगेड” भी “हैप्पी न्यू ईयर” की खुमारी में खो चुकी है… हमारे विदेश मंत्रालय के अधिकारी इतने पढ़े-लिखे हैं फ़िर भी यह बात क्यों नहीं समझते कि अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति-कूटनीति में कोई भी “स्थायी दोस्त या दुश्मन” नहीं होता, न वहाँ भावनाओं का कोई महत्व है, न ही किये गये वादों का… बस अपने देश का फ़ायदा किसमें है सिर्फ़ यह देखा जाता है… ये छोटी सी बात समझाने के लिये क्या आसमान से देवता आयेंगे? “नकली सेकुलरिज़्म” और “थकेले” नेताओं ने इस देश को कहीं का नहीं छोड़ा…


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CBSE Board Equal to Madarsa Board

प्रसिद्ध उपन्यास “राग दरबारी” में पं. श्रीलाल शुक्ल कह गये हैं कि भारत की “शिक्षा व्यवस्था” चौराहे पर पड़ी उस कुतिया के समान है, जिसे हर आता-जाता व्यक्ति लात लगाता रहता है। आठवीं तक के बच्चों की परीक्षा न लेकर उन्हें सीधे पास करने का निर्णय लेकर पहले प्राथमिक शिक्षा को जोरदार लात जमाने का काम किया गया है, लेकिन अब यूपीए सरकार ने वोट बैंक की खातिर मुसलमानों और तथाकथित “सेकुलरों” की “चरणवन्दना” करने की होड़ में एक और अल्पसंख्यक (इस शब्द को हमेशा सिर्फ़ और सिर्फ़ मुसलमान ही पढ़ा जाये) समर्थक निर्णय लिया है कि “मदरसा बोर्ड” का सर्टिफ़िकेट CBSE के समतुल्य माना जायेगा… है न एक क्रांतिकारी(?) निर्णय!!!

रिपोर्टों के मुताबिक केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय अब लगभग इस निर्णय पर पहुँच चुका है कि मदरसा बोर्ड के सर्टिफ़िकेट को CBSE के समतुल्य माना जायेगा। वैसे तो यह निर्णय “खच्चर” (क्षमा करें…) सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशों के आधार पर लिया जा रहा है, लेकिन इसमें मुख्य भूमिका “ओबीसी मसीहा” अर्जुनसिंह की है, जो आने वाले लोकसभा चुनावों को देखते हुए “मुस्लिम मसीहा” भी बनना चाहते हैं और असल में अन्तुले की काट करना चाहते हैं।

“संवैधानिक रूप से प्रधानमंत्री” मनमोहन सिंह द्वारा अल्पसंख्यकों (पढ़ें मुसलमान) के कल्याण हेतु घोषित 15 सूत्रीय कार्यक्रम के अनुसार मंत्रालय द्वारा एक समिति का गठन किया गया था, जिसने यह “बेजोड़” सिफ़ारिश की थी। मानव संसाधन मंत्रालय के इस निर्णय के बाद लगभग 7000 मदरसे, खासकर उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, झारखण्ड, उड़ीसा, असम और पश्चिम बंगाल (यानी लगभग 250 लोकसभा सीटों पर) में मदरसों में पढ़ने वाले साढ़े तीन लाख विद्यार्थी लाभान्वित होंगे। केन्द्र ने अन्य राज्यों में यह सुविधा भी प्रदान की है कि यदि उस सम्बन्धित राज्य में मदरसा बोर्ड नहीं हो तो छात्र पड़ोसी राज्य में अपना रजिस्ट्रेशन करवाकर इस “सुविधा”(?) का लाभ ले सकता है। “स्वयंभू मुस्लिमप्रेमी” लालू यादव भला कैसे पीछे रहते? उन्होंने भी घोषणा कर डाली है और उसे अमलीजामा भी पहना दिया है कि रेल्वे की परीक्षाओं में मदरसा बोर्ड के प्रमाणपत्र मान्य होंगे, ताकि रेल्वे में अल्पसंख्यकों (पढ़ें मुसलमानों) की संख्या में बढ़ोतरी की जा सके। हाथी के दाँत की तरह दिखाने के लिये इसका मकसद है “अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा(?) में लाना…” (यानी वोट बैंक पक्का करना), ये सवाल पूछना नितांत बेवकूफ़ी है कि “अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा से बाहर किया किसने…”? “क्या किसी ने उनके हाथ-पैर बाँधकर मुख्यधारा से अलग जंगल में रख छोड़ा है?”, क्यों नहीं वे आधुनिक शिक्षा लेकर, खुले विचारों के साथ मुल्लाओं का विरोध करके, “नकली सेकुलरों” को बेनकाब करके कई अन्य समुदायों की तरह खुद ही मुख्यधारा में आते?

इस निर्णय से एक बात स्पष्ट नहीं हो पा रही है कि आखिर केन्द्र सरकार मदरसों का स्तर उठाना चाहती है या CBSE का स्तर गिराना चाहती है? लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि यह उन छात्रों के साथ एक क्रूर मजाक है जो CBSE के कठिन पाठ्यक्रम को पढ़ने और मुश्किल परीक्षा का सामना करने के लिये अपनी रातें काली कर रहे हैं। यदि सरकार को वाकई में मदरसे में पढ़ने वाले मुस्लिमों को मुख्यधारा में लाना ही है तो उन क्षेत्रों में विशेष स्कूल खोले जा सकते हैं जिनमें वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण पढ़ाई करवाई जा सके। लेकिन इस्लाम की धार्मिक शिक्षा देने वाले मदरसों को सीधे CBSE के बराबर घोषित करना तो वाकई एक मजाक ही है। क्या सरकार को यह नहीं मालूम कि उत्तरप्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में चल रहे मदरसों में “किस प्रकार की पढ़ाई” चल रही है? सरकार द्वारा पहले ही “अल्पसंख्यकों” के लिये विभिन्न सबसिडी और योजनायें चलाई जा रही हैं, जो कि अन्ततः बहुसंख्यक छात्रों के पालकों के टैक्स के पैसों पर ही होती हैं और उन्हें ही यह सुविधायें नहीं मिलती हैं। असल में यूपीए सरकार के राज में हिन्दू और उस पर भी गरीब पैदा होना मानो एक गुनाह ही है। कहाँ तो संविधान कहता है कि धार्मिक आधार पर नागरिकों के साथ कोई भेदभाव नहीं होना चाहिये, लेकिन असल में मुसलमानों को खुश करने में सोनिया सरकार कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहती।

धार्मिक आधार पर आरक्षण नहीं होगा यह सुप्रीम कोर्ट भले ही कह चुका हो, संविधान में भी लिखा हो, विभिन्न नागरिक संगठन विरोध कर रहे हों, लेकिन आंध्रप्रदेश के ईसाई मुख्यमंत्री “सैमुअल रेड्डी” “क्या कर लोगे?” वाले अंदाज में जबरन 5% मुस्लिम आरक्षण लागू करने पर उतारू हैं, केन्द्र की यूपीए सरकार मदरसों के आधुनिकीकरण हेतु करोड़ों रुपये के अनुदान बाँट रही है, लेकिन मदरसे हैं कि राष्ट्रीय त्योहारों पर तिरंगा फ़हराने तक को राजी नहीं हैं (यहाँ देखें)। मुल्ला और मौलवी जब-तब इस्लामी शिक्षा के आधुनिकीकरण के खिलाफ़ “फ़तवे” जारी करते रहते हैं, लेकिन सरकार से (यानी कि टैक्स देने वाले हम और आप के पैसों से) “अनुदान” वे खुशी-खुशी स्वीकार करते हैं। केन्द्र सरकार का यह दायित्व है कि वह मदरसों के प्रबन्धन से कहे कि या तो वे सिर्फ़ “धार्मिक”(?) शिक्षा तक ही सीमित रहें और छात्रों को अन्य शिक्षा के लिये बाहर के स्कूलों में नामजद करवाये या फ़िर मदरसे बन्द किये जायें या उन्हें अनुदान नहीं दिया जाये, लेकिन सरकार की ऐसा कहने की हिम्मत ही नहीं है। सरकार चाहती है कि मदरसे देश भर में कुकुरमुत्ते की तरह फ़ैल जायें। जो नकली “सेकुलर”(?) हमेशा सरस्वती शिशु मन्दिरों की शिक्षा प्रणाली पर हमले करते रहते हैं, उन्हें एक बार इन स्कूलों में जाकर देखना चाहिये कि मदरसों में और इनमें क्या “मूल” अन्तर है।

तीन मुस्लिम विश्वविद्यालयों जामिया हमदर्द, जामिया मिलिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने पोस्ट-ग्रेजुएशन में प्रवेश के लिये पहले ही मदरसों के सर्टिफ़िकेट को मान्यता प्रदान की हुई है, अब मानव संसाधन मंत्रालय (इसे पढ़ें अर्जुनसिंह) चाहता है कि देश की बाकी सभी यूनिवर्सिटी इस नियम को लागू करें। फ़िलहाल तो कुछ विश्वविद्यालयों ने इस निर्णय का विरोध किया है, लेकिन जी-हुजूरी और चमचागिरी के इस दौर में कब तक वे अपनी “रीढ़” सीधी रख सकेंगे यह कहना मुश्किल है। विभिन्न सूत्र बताते हैं कि देश भर में वैध-अवैध मदरसों की संख्या दस लाख के आसपास है और सबसे खतरनाक स्थिति पश्चिम बंगाल और बिहार के सीमावर्ती जिलों के गाँवों में है, जहाँ आधुनिक शिक्षा का नामोनिशान तक नहीं है, और इन मदरसों को सऊदी अरब से आर्थिक मदद भी मिलती रहती है।

सच्चर कमेटी की आड़ लेकर यूपीए सरकार पहले ही मुसलमानों को खुश करने हेतु कई कदम उठा चुकी है, जैसे अल्पसंख्यक (यानी मुसलमान) संस्थानों को विशेष आर्थिक मदद, अल्पसंख्यक (यानी वही) छात्रों को सिर्फ़ 3 प्रतिशत ब्याज पर शिक्षा ॠण (हिन्दू बच्चों को शिक्षा ॠण 13% की दर से दिया जाता है), बेरोजगारी भी धर्म देखकर आती है इसलिये हिन्दू युवकों को 15 से 18 प्रतिशत पर व्यापार हेतु ॠण दिया जाता है, जबकि मुस्लिम युवक को “प्रोजेक्ट की कुल लागत” का सिर्फ़ 5 प्रतिशत अपनी जेब से देना होता है, 35 प्रतिशत राशि का ॠण 3% ब्याज दर पर “अल्पसंख्यक कल्याण फ़ायनेंस” करता है बाकी की 60 प्रतिशत राशि सिर्फ़ 2% का ब्याज पर केन्द्र सरकार उपलब्ध करवाती है। IIM, IIT और AIIMS में दाखिला होने पर पूरी फ़ीस सरकार के माथे होती है, प्रशासनिक और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी हेतु “उनके” लिये विशेष मुफ़्त कोचिंग क्लासेस चलाई जाती हैं, उन्हें खास स्कॉलरशिप दी जाती है, इस प्रकार की सैकड़ों सुविधायें हिन्दू छात्रों का हक छीनकर दी जा रही हैं, और अब मदरसा बोर्ड के सर्टिफ़िकेट को CBSE के बराबर मानने की कवायद…

क्या सरकार यह चाहती है कि देश की जनता “धर्म परिवर्तन” करके अपने बच्चों को CBSE स्कूलों से निकालकर मदरसे में भरती करवा दे? या श्रीलाल शुक्ल जिस “शिक्षा व्यवस्था नाम की कुतिया” का उल्लेख कर गये हैं उसे “उच्च शिक्षा नाम की कुतिया” भी माना जाये? जिसे मौका मिलते ही जब-तब लतियाया जायेगा……

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