Super User

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I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

Website URL: http://www.google.com
Hindu Organizations and Hindu Bashing for General Elections in India
मनमोहन सिंह और सोनिया गाँधी ने जब “राष्ट्रीय अनेकता परिषद” में सांप्रदायिकता का राग अलापा था उससे भी पहले से कांग्रेस में आत्ममंथन का दौर शुरु हो चुका था। आतंकवाद काबू में नहीं आ रहा, महंगाई आसमान छू रही है, शेयर मार्केट तलछटी में बैठ गया है, नौकरियाँ छिन रही हैं, केन्द्र की कांग्रेस सरकार जैसे-तैसे अमरसिंह जैसों के सहारे पर अपने दिन काट रही है। ऐसे में कांग्रेस और “सेकुलरों” को चिंता खाये जा रही है अगले आम चुनावों की। उन्हें भाजपा के सत्ता में लौटने का खतरा महसूस हो रहा है, इसलिये यह तय किया गया है कि पहले चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को पटखनी दी जाये और फ़िर लोकसभा के चुनावों में उतरा जाये।

“अनेकता परिषद” में जानबूझकर आतंकवाद का मुद्दा ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, लेकिन “सांप्रदायिकता” पर जमकर हल्ला मचाया गया, उसी समय आभास हो गया था कि अब चुनाव सिर पर आ गये हैं और कांग्रेस, “सेकुलर” तथा उनकी कठपुतली मीडिया सभी एक सुर में हिन्दुओं, हिन्दुत्व और हिन्दू संघटनों पर हमला करने वाले हैं। हवा में अचानक एक शब्द सुनाई देने लगा है, “हिन्दू आतंकवाद”, साध्वी प्रज्ञा सिंह और उनके साथी गिरफ़्तार किये गये, फ़िर खबरें छापी जाने लगी हैं कि “हिन्दू कट्टरपंथियों को भी विदेशों से बड़ी मात्रा में धन मिलता रहा है…”, विश्व हिन्दू परिषद पर प्रतिबन्ध लगाने की माँग भी जोर-शोर से उठने लगी है, कहने का तात्पर्य यह है कि बीते एक महीने में ही केन्द्र की कांग्रेस सरकार अचानक सक्रिय हो गई है, कानून-व्यवस्था चाक-चौबन्द करने के लिये कमर कसने लगी है, हिन्दुओं को बदनाम करने की साजिश शुरु हो चुकी है। यह सब आने वाले आम चुनावों का भय है और कुछ नहीं… इसलिये आने वाले अगले छह माह हिन्दुओं के लिये बेहद अपमानजनक और हिन्दूवादी संगठनों के लिये परीक्षा की घड़ी साबित होने वाले हैं।



सभी को याद होगा कैसे गत गुजरात चुनावों के ऐन पहले सारा का सारा बिका हुआ मीडिया नरेन्द्र मोदी के खिलाफ़ जहर उगलने लगा था, लगभग 3-4 माह तक लगातार नरेन्द्र मोदी को, उनकी नीतियों को, अहमदाबाद के दंगों को, भाजपा को, प्रवीण तोगड़िया को, संघ को सोच-समझकर निशाना बनाया गया था। NDTV जैसे “सेकुलर”(?) चैनल लगातार अपने-अपने महान पत्रकारों को गुजरात भेजकर नकली रिपोर्टिंग करवाते रहे, जब नतीजा सामने आया और मोदी भारी बहुमत से फ़िर मुख्यमंत्री बन गये तो सभी लोग वापस अपने-अपने बिलों में घुस गये। लगभग यही रणनीति इन चार विधानसभा चुनावों के पहले से ही शुरु कर दी गई है, और “हिन्दू आतंकवाद” नाम का शब्द इसी बड़ी रणनीति का हिस्सा है। बटला हाऊस पर मंडराते गिद्धों से आतंकित कांग्रेस ने मुस्लिम वोटों को गोलबन्द करने के लिये “गुजरात पैटर्न” पर काम करने का फ़ैसला लिया है। कौन कहता है कि “सिमी” और “अल-कायदा” का नेटवर्क बहुत मजबूत है? उस नेटवर्क से ज्यादा मजबूत है कांग्रेस-सेकुलर-मानवाधिकारवादी-मीडिया का मिलाजुला नेटवर्क… यकीन नहीं आता हो अगले कुछ ही दिनों में आपको इस नेटवर्क का असर महसूस होने लगेगा, शुरुआत की जा चुकी है, इलेक्ट्रानिक मीडिया, अखबार, ब्लॉग आदि के सहारे हिन्दुओं और हिन्दुत्ववादियों जमकर गरियाया जायेगा, उन्हें “जंगली बहुसंख्यक”, “आततायी”, “कट्टर”, “भेड़िये” आदि के खिताब दिये जायेंगे। मीडिया में चारों ओर “अल्पसंख्यकों पर अत्याचार” के किस्से आम हो जायेंगे, किसी बड़े हिन्दू संत या महात्मा के चरित्र पर कीचड़ या उनके बारे में कोई दुष्प्रचार किया जायेगा, आडवाणी, मोदी, विहिप, संघ आदि के बारे में अनाप-शनाप खबरें अखबारों में “प्लांट” की जाने लगेंगी… गरज कि सारे के सारे हथकण्डे अपनाये जायेंगे। NDTV, CNN-IBN, Times समूह जैसे “सेकुलर” मीडिया से कांग्रेस का मजबूत गठबंधन होने का जमकर फ़ायदा उठाया जायेगा। अफ़ज़ल गुरु को गोद में लेकर बैठने वाली कांग्रेस, भाजपा को पाठ पढ़ायेगी, सिंगूर-नन्दीग्राम में बेकसूरों को भूनने वाले वामपंथी नरेन्द्र मोदी को विकास पर लेक्चर देने लग जायेंगे, राज ठाकरे जैसे क्षुद्र स्वार्थी छुटभैये नेता कांग्रेस की छत्रछाया में मिलाजुला गेम खेलेंगे, और यदि किसी को यह सब कपोल-कल्पना मात्र लग रही हो तो वह जल्दी ही इसे वास्तविकता में बदलता हुआ देख लेगा। कांग्रेस के लिये यह आने वाले 6 महीने बहुत-बहुत महत्वपूर्ण हैं, उसके अस्तित्व पर भी प्रश्न चिन्ह लगने का खतरा मंडरा रहा है, ऐसे में वह “हर जरूरी” घटिया राजनैतिक कदम अवश्य उठायेगी, वरना आज कांग्रेस अकेले के दम पर सिर्फ़ आंध्रप्रदेश, हरियाणा और असम में है, हो सकता है कि कल ये भी ना रहे।

लेकिन आखिर में सभी को जनता के पास ही आना है, कोई कितने ही प्रयास कर ले आखिरी फ़ैसला तो जनता को ही करना है, हिन्दुओं के सामने विकल्प बहुत ही सीमित हैं। हालांकि जब 60 साल में कांग्रेस को पूरे देश से धकियाकर सिर्फ़ तीन-चार राज्यों में सीमित कर दिया गया है तो हो सकता है कि अगले 40 साल में कांग्रेस का कोई नामलेवा ही न रहे। 2 अक्टूबर को गाँधी जयन्ती के अवसर पर निकलने वाली प्रभात फ़ेरी में इस बार कुल 13 कांग्रेसी थे, जबकि 15-20 दिन बाद दशहरे पर निकलने वाले संघ के पथसंचलन में 130 बाल-सेवक और 1300 स्वयंसेवक ही थे। हिन्दुओं को विचारधारा का यह विशाल अन्तर लगातार और निरन्तर बनाये रखना होगा, जमीनी स्तर पर अपना काम करते रहना होगा, जिस तरह वक्त आने पर “मीडिया प्रायोजित दुष्प्रचार” को गुजरात की जनता ने जवाब दिया, वैसा ही जवाब आने वाले लोकसभा चुनाव में जनता दे तभी कोई बात बनेगी। देश को जितना बड़ा खतरा आतंकवादियों या जेहादियों से नहीं है, उतना अपने ही बीच में सेकुलर के भेष में बैठे हुए “घर के भेदियों” से है। अंग्रेजी का एक शब्द है “Enough is Enough”, तो अब भारत का स्वाभिमान जगाने तथा उसे “इंडिया” से “भारत” बनाने का समय आ रहा है… लेकिन उसके लिये सबसे पहले हिन्दुओं का एकजुट होना जरूरी है, और कुछ ताकतें इसके लिये काम करने वाले संगठनों को तोड़ना-मरोड़ना चाहती हैं…

एक बार पहले भी दीवाली के दिन ही शंकराचार्य को गिरफ़्तार करके एक खेल खेला गया था, अब भी दीवाली से ही “अनर्गल प्रचार” नाम का खेल शुरु किया गया है… सो अगले 6 माह के लिये इन “जयचन्दों” की गालियों, शब्दबाणों, उपमाओं आदि को झेलने के लिये तैयार हो जाईये… अधिकतर मुसलमान तो अपने ही भाई हैं, लेकिन यदि आप अपने देश से प्रेम करते हैं तो “कांग्रेसी और सेकुलर” नाम के दो लोगों से सावधान हो जायें…

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सोचा कि मैं भी एक माइक्रो पोस्ट लिखूँ, यह तस्वीर देखिये और बताईये कि हमारे देश के “वीरबहादुर” गृहमंत्री किस महान(?) हस्ती के आगे नतमस्तक होते हुए लगभग घिघियाने की मुद्रा में झुके हैं? मुझे तो इतना ज्ञान नहीं है, इसीलिये फ़ोटो में उपस्थित सज्जनों की वेशभूषा और दाढ़ी देखकर समझ में नहीं आ रहा कि ये ईसाई धर्मगुरु हैं या कोई मुस्लिम मौलवी? किसी को नाम-पता मालूम हो तो अवश्य बतायें…

सबसे मजेदार मुद्रा है पास बैठे “स्वघोषित” महान धर्मनिरपेक्ष वामपंथी नेताओं (केरल के मुख्यमंत्री और एक अन्य मंत्री) की, जो ऐसे मुस्करा रहे हैं मानो ये तथाकथित धर्मगुरु उनके मुँह में ही कुछ डालने वाले हों… कैसी लगी ये माइक्रो-पोस्ट?
Mugalistan and Red Corridor – Threat to Indian Security

गत दिनों असम में हुए उपद्रव और दंगों के दौरान भीड़ द्वारा सरेआम पाकिस्तानी झंडे लहराने की घटनायें हुईं। एक पाकिस्तानी झंडा तो 2-3 दिनों तक एक लैम्प पोस्ट पर लहराता दिखाई दिया था, जिसकी तस्वीरें नेट पर प्रसारित भी हुई थीं। असम के कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने हमेशा की तरह कांग्रेसी (यानी नकली सेकुलर) तरीके से देश को बताने की कोशिश की, कि यह कोई खास बात नहीं है। उसी के बाद असम में भीषण बम-विस्फ़ोट हुए और कई लोग मारे गये। बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण असम, त्रिपुरा और मेघालय के कई इलाकों में स्थिति गम्भीर से भी ज्यादा खतरनाक हो चुकी है, असम अब कश्मीर की राह पर चल पड़ा है, लेकिन जब भी इस प्रकार के कोई आँकड़े पेश करके सिद्ध करने की कोशिश की जाती है तत्काल मामले को या तो “संघी एजेण्डा” कहकर या फ़िर हल्के-फ़ुल्के तौर पर लेकर दबाने की कोशिश तेज हो जाती है, और अब कुछ मूर्ख तो “हिन्दू आतंकवादी” नाम की अवधारणा भी लेकर आ गये हैं। ओसामा बिन लादेन के एक वीडियो में कश्मीर के साथ असम का भी विशेष उल्लेख है (देखें यह समाचार), लेकिन भारत की सरकार, असम की कांग्रेस सरकार और पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार खतरनाक नींद और मुगालते में खोई हुई है इसके प्रमाण लगातार हमें मिलते रहते हैं। विगत 5 साल से “मुगलिस्तान” नाम की नई देशद्रोही अवधारणा मूर्तरूप लेती जा रही है, फ़िर भी सभी राजनैतिक पार्टियाँ गहरी निद्रा में तल्लीन हैं। इस “मुगलिस्तान” की अवधारणा पाकिस्तान की ISI और बांग्लादेश की इस्लामी सरकार ने मिलकर तैयार की है। इस विस्तृत अवधारणा को ओसामा बिन लादेन का फ़िलहाल नैतिक समर्थन हासिल है, तथा दाऊद इब्राहिम जो कि पाकिस्तान के आकाओं की दया पर वहाँ डेरा डाले हुए है उसका आर्थिक और शारीरिक समर्थन मिला हुआ है। विभिन्न वेबसाईटों पर अलग-अलग लेखकों ने इस कथित “मुगलिस्तान” के बारे लिखा हुआ है। जिसमें से (मुख्य वेबसाईट यह है) यह आँकड़े किसी “धर्म-विशेष” के खिलाफ़ नहीं हैं, बल्कि देश पर मंडरा रहे खतरे को सबके सामने रखने की एक कोशिश भर है। “नकली कांग्रेसी सेकुलरों” को तो इन आँकड़ों से कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला, लेकिन जो भी देशप्रेमी और हिन्दू हित की बात करने वाले लोग हैं उन्हें समय रहते जाग जाना होगा, वरना…।
यह एक ऐतिहासिक तथ्य और सत्य है कि जिस भी क्षेत्र, इलाके या देश विशेष में मुस्लिमों की आबादी बहुसंख्यक हुई है या पहले से रही है, वहाँ अन्य धर्मों को पनपने का कोई मौका नहीं होता। इसका सबसे बड़ा सबूत तो यही है कि भारत में गरीबों की सेवा के नाम पर ढिंढोरा पीटने वाली मिशनरी संस्थायें किसी इस्लामी देश में तो बहुत दूर की बात है, भारत में ही उन इलाकों में “सेवा”(???) करने नहीं जातीं, जिन जिलों या मोहल्ले में मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मुस्लिम पिछड़े, गरीब और अशिक्षित नहीं हैं? और उन्हें मिशनरी सेवा की जरूरत नहीं है?… बिलकुल है, और सेवा करना भी चाहिये, मुस्लिम बस्तियों में विभिन्न शिक्षा प्रकल्प चलाने चाहिये, लेकिन इससे मिशनरी का “असली” मकसद हल नहीं होता, फ़िर भला वे मुस्लिम बहुल इलाकों में सेवा क्यों करने लगीं। हिन्दू-दलित आदिवासियों को बरगलाना आसान होता है, क्योंकि जहाँ हिन्दू बहुसंख्यक होता है वहाँ धार्मिक स्वतंत्रता होती है, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता होती है, लोकतन्त्र होता है… लेकिन जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक होता है वहाँ…………… तो इस बात को अलग से साबित करने की आवश्यकता नहीं है कि, धीरे-धीरे जनसंख्या बढ़ाकर और बांग्लादेश के रास्ते घुसपैठ बढ़ाकर भारत के उत्तर-पूर्वी हिस्से में मुस्लिम बहुल जिले बढ़ते जा रहे हैं तब देश के सामने क्या चुनौतियाँ हैं।



गत कुछ सालों से एक नाम हवा में तैर रहा है “मुगलिस्तान” यानी मुसलमानों के लिये एक अलग “गृहदेश”। जैसा कि पहले कहा इस (Concept) अवधारणा को अमलीजामा पहनाने का बीड़ा उठाया है पाकिस्तान की ISI ने। इस अवधारणा के अनुसार भारत के उत्तर-पूर्वी हिस्से, पश्चिम बंगाल (जहाँ पहले ही कई जगह मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक हो चुकी है) को पाकिस्तान से मिलाना, ताकि पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक एक “मुगलिस्तान” बनाया जा सके। इस काम में ISI वामपंथियों, माओवादियों और नक्सलवादियों के बीच प्रसारित “लाल गलियारा” की मदद भी लेने वाली है। जैसा कि सभी जानते हैं कि आंध्रप्रदेश के उत्तरी इलाके, मध्यप्रदेश के दक्षिण-पूर्वी कुछ जिले, समूचा छत्तीसगढ़, आधा उड़ीसा, लगभग आधा झारखण्ड तथा दक्षिणी बिहार के बहुत सारे जिलों में माओवादियों और नक्सलवादियों ने अपना अघोषित साम्राज्य स्थापित कर लिया है और इस गलियारे को नेपाल तक ले जाने की योजना है, जिसे “लाल गलियारा” नाम दिया गया है। नेपाल में तो माओवादी लोकतन्त्र के सहारे (बन्दूक के जोर पर ही सही) सत्ता पाने में कामयाब हो चुके हैं, छत्तीसगढ़, झारखण्ड और उड़ीसा के कई दूरदराज के जिलों में “भारत सरकार” नाम की चीज़ नहीं बची है, ऐसे में सोचा जा सकता है कि ISI और नक्सलवादी-माओवादी का गठबन्धन देश के लिये कितना खतरनाक साबित होगा।

इस समूचे मास्टर-प्लान (जिसे भारत का “दूसरा विभाजन” नाम दिया गया है) को बांग्लादेश की जहाँगीरनगर विश्वविद्यालय में पाकिस्तान की ISI और बांग्लादेश की Director General of Forces Intelligence (DGFI) द्वारा मिलकर तैयार किया गया है। इस योजना के “विचार” को पाकिस्तान के तानाशाह जनरल जिया-उल-हक के समय से “ऑपरेशन टोपाक” के तहत सतत पैसा दिया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि जिया-उल-हक का भारत को तोड़ने का सपना अधूरा ही रह गया, लेकिन पाकिस्तान के शासकों ने अभी भी अपने प्रयास कम नहीं किये हैं, पहले “खालिस्तान” को समर्थन, फ़िर कश्मीर में लगातार घुसपैठ और अब बांग्लादेश के साथ मिलकर “मुगलिस्तान” की योजना, यानी कि साठ साल बाद भी “कुत्ते की दुम टेढ़ी की टेढ़ी”।



दाऊद इब्राहीम, लश्कर-ए-तोयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन मिलकर इस योजना को गुपचुप अंजाम देने में जुटे हुए हैं, भारत में उन्होंने “सिमी” और “इंडियन मुजाहिदीन” जैसे बड़े मजबूत नेटवर्क वाले संगठन तैयार कर लिये हैं। लश्कर-ए-तोयबा के साहित्य और वेबसाईटों पर भारत विरोधी दुष्प्रचार लगातार चलता रहता है। लश्कर और जैश दोनों ही संगठनों का एकमात्र उद्देश्य भारत को तोड़ना और कश्मीर को आजाद(?) करना है। नई रणनीति यह है कि इंडियन मुजाहिदीन कर बम विस्फ़ोट की जिम्मेदारी ले, ताकि पाकिस्तान पर लगने वाले “आतंकवादी देश” के आरोपों से बचा जा सके और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को बताया जा सके कि तमाम विस्फ़ोट भारत के अन्दरूनी संगठन ही करवा रहे हैं।

पाकिस्तान की आजादी के बाद वहाँ के घरू हालात सुधारने की बजाय उग्रवादी गुटों को भारत को तोड़ने की ललक ज्यादा है। वे यह नहीं देखते कि पाकिस्तान में भयंकर गरीबी है, देश दीवालिया होने की कगार पर पहुँच चुका है… बल्कि वे लोगों को “जेहाद” के नाम पर चन्दा देने को उकसाते हैं और पाक सरकार भी भारी मात्रा में पैसा देकर उनकी सहायता करती रहती है। हालांकि अमेरिका ने लश्कर और जैश पर प्रतिबन्ध लगा दिया है, लेकिन उस प्रतिबन्ध को लागू तो पाकिस्तान की सरकार को ही करवाना है, ऐसे में इस प्रतिबन्ध का कोई मतलब नहीं है। इस प्रस्तावित मुगलिस्तान की प्लानिंग के अनुसार भारत भर में लगभग 100 जिले चिन्हित किये गये हैं, जहाँ कि पहले से ही मुस्लिम आबादी 30% से लेकर 60% है और ये जिले भारत के विभिन्न हिस्सों में फ़ैले हुए हैं, इसमें जम्मू-कश्मीर के जिले शामिल नहीं हैं, क्योंकि वहाँ पहले ही कश्मीरी पंडितों को सामूहिक हत्याओं के जरिये भगाया जा चुका है और उनकी सम्पत्तियों पर कब्जा जमाया चुका है। अब ISI की प्राथमिकता है पश्चिम बंगाल और असम पर जहाँ का राजनैतिक वातावरण (वामपंथी और कांग्रेस) उनके अनुकूल है। इन प्रदेशों के जिलों में भारी संख्या में घुसपैठ करवाकर यहाँ का जनसंख्या सन्तुलन काफ़ी हद तक बिगाड़ा जा चुका है और अगले कदम के तौर पर यहाँ बात-बेबात दंगे, मारकाट और तोड़फ़ोड़ आयोजित किये जायेंगे ताकि वहाँ रहने वाले अल्पसंख्यक हिन्दू खुद को असुरक्षित महसूस करके वहाँ से पलायन कर जायें या फ़िर उन्हें मार दिया जाये (जैसा कि कश्मीर में किया गया)। केरल के मलप्पुरम, आंध्रप्रदेश के हैदराबाद दक्षिण जैसे इलाके भी इनके खास निशाने पर हैं।

(भाग-2 में जारी रहेगा…) (सभी सन्दर्भ www.bengalgenocide.com से साभार)

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Mugalistan and Red Corridor – Threat to Indian Security-2

(भाग-1 से जारी…) कश्मीर में नागरिकों (यानी 99% मुसलमानों को) को धारा 370 के अन्तर्गत विशेषाधिकार प्राप्त हैं, इस राज्य से आयकर का न्यूनतम संग्रहण होता है। केन्द्र से प्राप्त कुल राशि का 90% सहायता और 10% का लोन माना जाता है, फ़िर भी यहाँ के लोग “भारत सरकार” को गालियाँ देते हैं और तिरंगा जलाते रहते हैं। बौद्ध बहुल इलाकों (जैसे लेह) के युवाओं को कश्मीर की सिविल सेवा से महरूम रखा जाता है। बौद्ध संगठनो ने कई बार केन्द्र को ज्ञापन देकर उनके प्रति अपनाये जा रहे भेदभाव को लेकर शिकायत की, लेकिन जैसा कि कांग्रेस की “वोट-बैंक” नीति है उसके अनुसार कोई सुनवाई नहीं होती। हालात यहाँ तक बिगड़ चुके हैं कि बौद्धों को मृत्यु के पश्चात मुस्लिम बहुल इलाके कारगिल में दफ़नाने की जगह मिलना मुश्किल हो जाता है।

अपनी आँखों के सामने भारत का नक्शा लाईये, आईये देखते हैं कि कैसे और किन-किन जिलों और इलाकों में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है, उत्तर से चलें तो कश्मीर में लगभग 98% आबादी मुस्लिम हो चुकी है, पुंछ, डोडा, बनिहाल, किश्तवार और भद्रवाह जैसे इलाके पूर्ण मुस्लिम हो चुके हैं। लद्दाख इलाके में कारगिल में मुस्लिम 70-30 के अनुपात में बहुसंख्यक हो चुके हैं। थोड़ा नीचे खिसकें तो हरियाणा-राजस्थान के मेवात इलाके में मुस्लिम आबादी 2005 में 66% हो चुकी थी। मेवात इलाके में गौ-हत्या तो एक मामूली बात बन चुकी है, लेकिन हिन्दुओं का सामाजिक बहिष्कार और उनके साथ दुर्व्यवहार भी अब आम हो चला है। हरियाणा की कांग्रेस सरकार ने चुपचाप गुड़गाँव इलाके को काट कर एक नया जिला मेवात भी बना दिया। इस इलाके में मुस्लिम परिवारों में औसत जन्म दर प्रति परिवार 12 है, और मोहम्मद ईशाक जैसे भी लोग हैं जिनके 23 बच्चे हैं और उसे इस पर गर्व(?) है। थोड़ा आगे जायें तो पुरानी दिल्ली और मलेरकोटला (पंजाब) भी धीरे-धीरे मुस्लिम बहुल बनते जा रहे हैं, इसी पट्टी में नीचे उतरते जायें तो उत्तरप्रदेश के आगरा, अलीगढ़, आजमगढ़, मेरठ, बिजनौर, मुज़फ़्फ़रनगर, कानपुर, वाराणसी, बरेली, सहारनपुर, और मुरादाबाद में भी मुस्लिम आबादी न सिर्फ़ तेजी से बढ़ रही है बल्कि गणेश विसर्जन, दुर्गा पूजा आदि उत्सवों पर जुलूसों पर होने वाले पथराव और हमलों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है।

अगला दरवाजा है हमारे मीडिया दुलारे लालू का प्रदेश बिहार… जहाँ मुस्लिम आबादी 17% तक पहुँच चुकी है। भारत-नेपाल की सीमा के किनारे-किनारे लगभग 1900 मदरसे खोले जा चुके हैं। सशस्त्र सीमा पुलिस के महानिदेशक तिलक काक बताते हैं कि न सिर्फ़ बिहार में बल्कि साथ लगी नेपाल की सीमा के भीतर भी मदरसों की संख्या में अचानक बढ़ोतरी आई है, यदि इन मदरसों की संख्या की तुलना मुस्लिम जनसंख्या से की जाये तो ऐसा लगेगा कि मानो न सिर्फ़ पूरी मुस्लिम बिरादरी बल्कि हिन्दू बच्चे भी इन मदरसों में पढ़ने जाने लगे हैं। काक के अनुसार यह बेहद खतरनाक संकेत है और कोई भी सामान्य बुद्धि वाला व्यक्ति कह सकता है कि मदरसों की यह संख्या गैर-आनुपातिक और अचरज में डालने वाली है। लेकिन कांग्रेस-लालू और “सेकुलरों” के कान पर जूँ भी नहीं रेंगने वाली।




सीमा प्रबन्धन की टास्क फ़ोर्स के अनुसार अक्टूबर 2000 से भारत-नेपाल सीमा पर मदरसों और मस्जिदों की बाढ़ आ गई है और ये दिन-दूनी-रात-चौगुनी तरक्की कर रहे हैं। भारत की तरफ़ वाली सीमा में दस वर्ग किलोमीटर के दायरे में 343 मस्जिदें, 300 मदरसे बने हैं जबकि नेपाल की तरफ़ 282 मस्जिदें और 181 मदरसों का निर्माण हुआ है। ये मदरसे और मस्जिदें सऊदी अरब, ईरान, कुवैत, पाकिस्तान और बांग्लादेश से भारी मात्रा में धन प्राप्त करती हैं। इनके मुख्य प्राप्ति स्रोत इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक (जेद्दाह) और हबीब बैंक (कराची) हैं, इनका साथ देने के लिये नेपाल की हिमालयन बैंक ने अपनी शाखायें विराटनगर और कृष्णानगर में भी खोल दी हैं। यह तो सर्वविदित है कि नेपाल के रास्ते ही भारत में सर्वाधिक नकली नोट खपाये जाते हैं, यहाँ दाऊद की पूरी गैंग इस काम में शामिल है जिसे ISI का पूरा कवर मिलता रहता है।

पश्चिम बंगाल और असम में स्थिति और भी खराब हो चुकी है। 2001 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या 28% तथा आसाम में 31% तक हो चुकी है। अरुण शौरी जी ने इंडियन एक्सप्रेस के अपने कालम में लिखा है कि – 1951 में भारत में मुस्लिम जनसंख्या 10% थी, 1971 में 10.8%, 1981 में 11.3% और 1991 में लगभग 12.1%। जबकि 1991 की ही जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले में मुस्लिम जनसंख्या 56%, नदिया में 48%, मुर्शिदाबाद में 52%, मालदा में 54% और इस्लामपुर में 60% हो चुकी थी। बांग्लादेश से लगी सीमा के लगभग 50% गाँव पूरी तरह से मुस्लिम बहुल हो चुके हैं। असम में भी सीमावर्ती जिले पूरी तरह से हरे रंग में रंगे जा चुके हैं, ऐसे में किसी बाहरी आक्रमण के वक्त हमारे सुरक्षा बल बुरी तरह से दो पाटों के बीच फ़ँस सकते हैं, और न तो तब न ही अभी हमारे परमाणु शक्ति होने का कोई फ़र्क पड़ेगा। जब आक्रमणकारियों को “लोकल सपोर्ट” मिलना शुरु हो जायेगा, तब सारी की सारी परमाणु शक्ति धरी रह जायेगी।



आँकड़े बताते हैं कि 24 परगना और दिनाजपुर से लेकर बिहार के किशनगंज तक का इलाका पूरी तरह से मुस्लिम बहुल हो चुका है। 1991 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल की कुल 7 करोड़ जनसंख्या में से लगभग 2.8 करोड़ मुस्लिम थे जिसमें से भी 1.2 करोड़ तो सिर्फ़ सीमावर्ती जिलों में रहते हैं। बंगाल और बिहार का यह गंगा-हुगली के किनारे का महत्वपूर्ण इलाका लगभग पूरी तरह से मुस्लिम देश की तरह लगने लगा है। ऐसे में देश की सुरक्षा कितनी खतरे में है यह आसानी से समझा जा सकता है। कुल मिलाकर उभरने वाली तस्वीर बेहद चिंताजनक है, 24 परगना से शुरु करके, नदिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, दिनाजपुर, रायगंज, इस्लामपुर, किशनगंज (बिहार), सिलिगुड़ी, दार्जीलिंग, न्यू-जलपाईगुड़ी, कूच बिहार और आसाम में प्रवेश करते ही धुबरी, ग्वालपाड़ा, बोंगाईगाँव, कोकराझार और बारपेटा… एक बेहद सघन मुस्लिम बहुल इलाका पैर पसार चुका है।

“द पायनियर” में प्रकाशित संध्या जैन के लेख “इंडियाज़ कैंसर वार्ड” के मुताबिक, अरुणाचल के पूर्व IGP आर के ओहरी पहले ही इस सम्बन्ध में चेतावनी जारी कर चुके हैं कि पश्चिम एशिया से लेकर बांग्लादेश तक एक “इस्लामी महाराज्य” बनाने की एक व्यापक योजना गुपचुप चलाई जा रही है (“मुस्लिम बंगभूमि”(?) की माँग एक बार उठाई जा चुकी है)। बांग्लादेश के मानवाधिकार कार्यकर्ता सलाम आज़ाद कहते हैं कि “तालिबान की वापसी” के लिये बांग्लादेश सबसे मुफ़ीद जगह है। बांग्लादेश में हिन्दुओं और उनकी महिलाओं के साथ बदसलूकी और ज्यादतियाँ बढ़ती ही जा रही हैं और वहाँ की सरकार को भी इसका मूक समर्थन हासिल है। (बांग्लादेश दुनिया का एकमात्र देश होगा जो उसकी आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले भारत के खिलाफ़ ही सोचता है, आखिर यह कौन सी भावना है और किस प्रकार की मानसिकता है?) नॉर्थ-ईस्ट स्टूडेण्ट ऑर्गेनाइजेशन के चेयरमैन समुज्जल भट्टाचार्य बताते हैं कि असम के लगभग 49 आदिवासी इलाके बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण अल्पमत में आ गये हैं और घुसपैठियों की यह छाया अरुणाचल, नागालैण्ड, मणिपुर और मेघालय तक फ़ैलती जा रही है। वैसे भी भारत “एक विशाल धर्मशाला” है जहाँ कोई भी, कभी भी, कहीं से भी अपनी मर्जी से आ-जा सकता है, यह गाँधीवादियों का भी देश है और करुणा की जीती-जागती मिसाल भी है जहाँ घुसपैठियों को राशन कार्ड और मतदाता परिचय पत्र भी दिये जाते हैं, कांग्रेस का एक सांसद तो भारत का नागरिक ही नहीं है, और 8000 से अधिक पाकिस्तानी नागरिक वीसा अवधि समाप्त होने के बाद भारत में कहीं “गुम” हो चुके हैं, है ना हमारा भारत एक सहनशील, “धर्मनिरपेक्ष” महान देश???। जब आडवाणी गृहमंत्री थे तब इस समस्या के हल के लिये उन्होंने एक विशेष योजना बनाई थी जो कि यूपीए सरकार के आते ही ठण्डे बस्ते में डाल दी गई।

2001 की जनगणना के अनुसार लगभग 1.6 करोड़ बांग्लादेशी इस समय भारत में अवैध निवास कर रहे हैं। एक सर्वे के अनुसार लगभग 3 लाख बांग्लादेशी प्रति दो माह में भारत मे प्रवेश कर जाते हैं। अगस्त 2000 की सीमा संगठन की रिपोर्ट के अनुसार 13 लाख से अधिक बांग्लादेशी इस समय अकेले दिल्ली में मौजूद हैं। ये “भिखारी” लोग भारत की अर्थव्यवस्था के लिये बोझा तो हैं हीं, देश की सुरक्षा के लिये भी बहुत बड़ा खतरा हैं, लेकिन वोटों के लालच में अंधे हो चुके कांग्रेस और वामपंथियों को यह बात समझायेगा कौन? भारत-बांग्लादेश की 2216 किमी सीमा पर तार लगाने का काम बेहद धीमी रफ़्तार से चल रहा है और मार्च 2007 तक सिर्फ़ 1167 किमी पर ही बाड़ लगाई जा सकी है, पैसों की कमी का रोना रोया जा रहा है, जबकि देश के निकम्मे सरकारी कर्मचारियों और सांसदों के वेतन पर अनाप-शनाप खर्च जारी है। पश्चिम बंगाल की 53 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक की स्थिति में आ चुके हैं, अब ऐसे में भला कौन सी राजनैतिक पार्टी उनसे “पंगा” लेगी? रही बात हिन्दुओं की तो वे कभी एक होकर वोट नहीं दे सकते, क्योंकि उन्हीं के बीच में “सेकुलर” नाम के जयचन्द मौजूद रहते हैं। पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से 45 मुस्लिम हैं, जबकि 5 मंत्री हैं, इसी प्रकार 42 लोकसभा सीटों में से 5 पर मुस्लिम सांसद हैं, ऐसे में सरकार की नीतियों पर इनका प्रभाव तो होना ही है। यूपीए सरकार को समर्थन देने के एवज में वामपंथियों ने वोट बैंक बनाने के लिये इस क्षेत्र का जमकर उपयोग किया।

(भाग-3 में जारी रहेगा…)

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Mugalistan and Red Corridor – Threat to Indian Security-3

(भाग-2 से जारी) “मुगलिस्तान” के लक्ष्य में सबसे पहले पश्चिम बंगाल और असम का नाम आयेगा। ऐसे कई इलाके “पहचाने” गये हैं जिन्हें “मिनी पाकिस्तान” कहा जाने लगा है, असम में पाकिस्तानी झंडे लहराने की यह घटना कोई अचानक जोश-जोश में नहीं हो गई है, इसके पीछे गहरी रणनीति काम कर रही है, मुगलिस्तान का सपना देखने वालों को इस पर प्रतिक्रिया देखना थी, और असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने यह कहकर कि “ये कोई पाकिस्तानी झंडे नहीं थे…” इनका काम और भी आसान बना दिया है। भारत के उत्तर-पूर्वी इलाके को मुख्य भूमि से जोड़ने वाली छोटी सी भूमि जिसे “चिकन नेक” या “सिलीगुड़ी कॉरीडोर” कहा जाता है, इनके मुख्य निशाने पर है और इस ऑपरेशन का नाम “ऑपरेशन पिनकोड” रखा गया है, जिसके मुताबिक बांग्लादेश की सीमा के भीतर स्थित 950 मस्जिदों और 439 मदरसों से लगभग 3000 जेहादियों को इस विशेष इलाके में प्रविष्ट करवाने की योजना है। उल्लेखनीय है कि यह “चिकन नेक” या सिलिगुड़ी कॉरीडोर 22 से 40 किमी चौड़ा और 200 किमी लम्बा भूमि का टुकड़ा है जो कि समूचे उत्तर-पूर्व को भारत से जोड़ता है, यदि इस टुकड़े पर नेपाल, बांग्लादेश या कहीं और से कब्जा कर लिया जाये तो भारतीय सेना को उत्तर-पूर्व के राज्यों में मदद पहुँचाने के लिये सिर्फ़ वायु मार्ग ही बचेगा और वह भी इसी जगह से ऊपर से गुजरेगा। इतनी महत्वपूर्ण सामरिक जगह से लगी हुई सीमा और प्रदेशों में कांग्रेस इस प्रकार की घिनौनी “वोट बैंक” राजनीति खेल रही है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि जहाँ हिन्दू बहुसंख्यक होता है वहाँ धार्मिक स्वतन्त्रता, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता और लोकतन्त्र होता है, लेकिन जहाँ भी मुस्लिम बहुसंख्यक होता है वहाँ इनमें से कुछ भी नहीं पाया जाता, और आजादी के बाद पश्चिम बंगाल, असम, मणिपुर, नागालैण्ड और त्रिपुरा के कुल मिलाकर 20 से अधिक जिले अब मुस्लिम या ईसाई बहुसंख्यक बन चुके हैं, लेकिन “सेकुलर” नाम के प्राणी को यह सब दिखाई नहीं देता।



(चित्र से स्पष्ट है कि सामरिक महत्व के "चिकन नेक" पर कितना बड़ा खतरा मंडरा रहा है)

अपने लेख “डेमोग्राफ़ी सर्वे ऑन ईस्टर्न बॉर्डर” में भावना विज अरोरा कहती हैं, “
जिस समय भारत का विभाजन हुआ उसी वक्त मुस्लिम नेता पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान को पाकर पूरी तरह खुश नहीं थे, उस वक्त से ही “अविभाजित आसाम” उनकी निगाहों में खटकता था और वे पूरा उत्तर-पूर्व पाकिस्तान में मिलाना चाहते थे। मानुल-हक-चौधरी, जो कि जिन्ना के निजी सचिव थे (और बाद में असम में मंत्री भी बने) ने 1947 में जिन्ना को पत्र लिखकर कहा था कि “कायदे-आजम आप मुझे सिर्फ़ 30 साल दीजिये मैं आपको आसाम तश्तरी में सजाकर दूँगा…” उसी समय से “पूरे उत्तर-पूर्व में मुस्लिम जनसंख्या बढ़ाओ” अभियान चलाया जा रहा है, जो कि अब विस्फ़ोटक स्थिति में पहुँच चुका है, जबकि देश के साथ-साथ असम में भी अधिकतर समय कांग्रेस का शासन रहा है। इसीलिये जब अनुभवी लोग कहते हैं कि कांग्रेस से ज्यादा खतरनाक, वोट-लालची और देशद्रोही पार्टी इस दुनिया में कहीं नहीं है तब उत्तर-पूर्व और कश्मीर को देखकर इस बात पर विश्वास होने लगता है। आज की तारीख में असम के 24 में 6 जिले मुस्लिम बहुसंख्यक हो चुके हैं, 6 जिलों में मुस्लिम जनसंख्या लगभग 40 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है, अभी 126 विधानसभा सीटों में से 54 पर मुस्लिम वोट ही निर्णायक हैं, कुल 28 से अधिक मुस्लिम विधायक हैं, और चार मंत्री हैं। स्वाभाविक सी बात है कि मुस्लिम समुदाय (स्थानीय और बांग्लादेश से आये हुए मिलाकर) राज्य में नीति-नियंता बन चुके हैं। इन घुसपैठियों ने असम के स्थानीय आदिवासियों को उनके घरों से खदेड़ना शुरु कर दिया है और असम में आये दिन आदिवासी-मुस्लिम झड़पें होने लगी हैं। असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का पूरा संरक्षण इन लोगों को प्राप्त है, और यह “भस्मासुर” एक दिन इन्हीं के पीछे पड़ेगा, तब इन्हें अकल आयेगी, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।



(चित्र से स्पष्ट है कि प्रत्येक दशक में मुस्लिम जनसंख्या ने जन्मदर में हिन्दुओं को पछाड़ा है)

लगभग यही हालात नागालैण्ड में हैं, जहाँ दीमापुर जिले में बांग्लादेशी घुसपैठियों की तादाद बहुत बढ़ चुकी है। रिक्शा चलाने वाले, खेतिहर मजदूर, ऑटो-चालक अब बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुख्य काम बन चुके हैं, इन्होंने नगा खेत मालिकों पर भी अपना रौब गाँठना शुरु कर दिया है। आये दिन चोरी, लूट, तस्करी, नशीली दवाईयों का कारोबार जैसे अपराधों में बांग्लादेशी मुस्लमान लिप्त पाये जाते हैं, लेकिन राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाती। राजधानी कोहिमा, मोकोकचुंग, वोखा, जुन्हेबोटो, फ़ेक, मोन और त्सुएनसांग इलाकों में भी ये पसरते जा रहे हैं।

एक बार नागालैण्ड के मुख्यमंत्री एस सी जमीर ने कहा था कि “बांग्लादेशी मुसलमान हमारे राज्य में मच्छरों की तरह फ़ैलते जा रहे हैं…”, कुछ साल पहले नगा छात्रों ने इनके खिलाफ़ मुहिम चलाई थी, लेकिन “अज्ञात” कारणों से इन पर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकी। खतरनाक बात तो यह भी है कि नगा विद्रोहियों और उल्फ़ा-बोडो संगठनों के कई कैम्प बांग्लादेश के इलाके में चल रहे हैं और जब भी बांग्लादेशी मुसलमानों पर कोई कड़ी कार्रवाई करने की बात की जाती है तब बांग्लादेश की ओर से धमकी दी जाती है कि यदि भारत में रह रहे (आ-जा रहे) बांग्लादेशियों पर कोई कार्रवाई हुई तो हम इनके कैम्प बन्द करवा देंगे। दीमापुर के स्थानीय अखबारों के छपी खबर के अनुसार किसी भी मुस्लिम त्यौहार के दिन कोहिमा और दीमापुर के लगभग 75% बाजार बन्द रहते हैं, इससे जाहिर है कि व्यापार और अर्थव्यवस्था पर भी इनका कब्जा होता जा रहा है।

विस्तारित और बड़ी योजना –
मुगलिस्तान की इस संकल्पना को साकार करने के लिये एक साथ कई मोर्चों पर काम किया जा रहा है, देश के एक कोने से दूसरे कोने तक गहरी मुस्लिम जनसंख्या का जाल बिछाया जा रहा है। केरल राज्य में मुस्लिम जनसंख्या लगभग 25% तक पहुँच चुकी है, आये दिन वहाँ संघ कार्यकर्ताओं पर हमले होते रहते हैं। कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों (दोनों ही इन मुस्लिम वोटों के सौदागर हैं), ने अब्दुल मदनी जैसे व्यक्ति को छुड़वाने के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। मलप्पुरम जिला काफ़ी पहले मुस्लिम बहुल हो चुका है और इस जिले में लगभग हरेक संस्थान में शुक्रवार को छुट्टी मनाई जाती है (रविवार को नहीं) और सरकारें चुपचाप देखती रहती हैं। पड़ोसी दो जिले कोजीकोड और कन्नूर में भी हिन्दुओं की हत्याओं का दौर चलता रहता है, लेकिन दोनों ही पार्टियाँ इसे लेकर कोई कार्रवाई नहीं करतीं (ठीक वैसे ही जैसा कि कश्मीर में किया गया था)।

मुगलिस्तान की इस योजना में फ़िलहाल नक्सलवादियों और चर्च की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है। जब नक्सलवादी और चर्च मिलकर आंध्रप्रदेश से नेपाल तक एक विशाल “लाल गलियारा” बना लेंगे उस वक्त तक भारत नामक सत्ता बहुत कमजोर हो चुकी होगी, जाहिर है कि इस खेल में हिन्दुओं को ही सबसे अधिक भुगतना पड़ेगा, फ़िर कब्जे के लिये अन्तिम निर्णायक लड़ाई इस्लामी कट्टरपंथियों, मिशनरी-ईसाई और वाम-समर्थित नक्सलवादी गुटों में होगी, तब तक पहले ये लोग एक साथ मिलकर भारत और हिन्दुओ को कमजोर करते रहेंगे, आये दिन बम विस्फ़ोट होते रहेंगे, हिन्दुओं, हिन्दू नेताओं, मन्दिरों पर हमले जारी रहेंगे, आदिवासियों और गरीबों में धर्म-परिवर्तन करवाना, जंगलों में नक्सलवादी राज्य स्थापित करना, मुस्लिम आबादी को पूर्व-नियोजित तरीके से बढ़ाते जाना इस योजना के प्रमुख घटक हैं। दुःख की बात यह है कि हम कश्मीर जैसे हालिया इतिहास तक को भूल चुके हैं, जहाँ यह नीति कामयाब रही है और लाखों हिन्दू अपने ही देश में शरणार्थी बने हुए हैं और अमरनाथ की एक छोटी सी जमीन के लिये भारत सरकार को नाक रगड़नी पड़ती है। लेकिन इस मुगलिस्तान के योजनाकारों को भारत में बैठे “सेकुलरों”, “बुद्धिजीवियों”, “कांग्रेस”, NDTV-CNNIBN जैसे चैनलों पर पूरा भरोसा है और ये इनका साथ वफ़ादारी से दे भी रहे हैं… बाकी का काम हिन्दू खुद ही दलित-ब्राह्मण-तमिल-मराठी जैसे विवादों में विभाजित होकर कर रहे हैं, जो यदि अब भी जल्दी से जल्दी नहीं जागे तो अगली पीढ़ी में ही खत्म होने की कगार पर पहुँच जायेंगे…


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Election Campaign in India and Instructions of Election Commission
चार राज्यों में चुनाव का बिगुल बज चुका है और मौसम में चुनावी रंगत घुलने लगी है। जिस प्रकार होली के दिन नज़दीक आते ही एक विशेष प्रकार का मौसम अंगड़ाई लेने लगता है उसी प्रकार अब अगले कुछ दिनों तक हवा में चुनाव का रंग चढ़ा रहेगा। और बस इससे फ़ारिग होते ही अप्रैल के लोकसभा के चुनाव की तैयारियों का असर दिखने लगेगा, यानी कि अगले 6 महीने तक चुनाव का यह मौसम बना रहेगा।

चुनाव का यह मौसम मुझे बहुत भाता है, चारों ओर गहमागहमी है, भागदौड़ है, सरकारी कर्मचारी जो आम आदमी की बात पर कान तक नहीं देते और नम्बर एक के मक्कार और भ्रष्ट होते हैं वे भी चुनाव आयोग के डण्डे के कारण अटेंशन की मुद्रा में हैं, अभी तो वे अपनी बीबी की बात भी नहीं सुनेंगे, और शादी-ब्याह भी कैंसल कर देंगे। देखकर बड़ा अच्छा महसूस होता है कि चलो पाँच साल में ही सही कभी तो शासकीय कर्मचारी काम करता हुआ दिखता है, चुनाव आयोग के बहाने ही सही कभी-कभार लगता है कि “सरकार” नाम की कोई चीज है जो सरकारी कर्मचारियों पर रौब डालती है। जिस तरह से चुनाव आयोग के नाम से लोग यहाँ-वहाँ थर-थर काँप रहे हैं, लगता है कि देश का शासन चुनाव आयोग को ही सौंप देना चाहिये।

मुझे पता नहीं कि कितने लोगों ने मुर्गों, पाड़ों (भैंसा) और सूअरों की लड़ाई देखी है, मैंने तो बचपन में काफ़ी देखी है और बहुत मजा आता था। चुनाव की बेला आते ही बचपन की इन यादों में खो जाता हूँ। चारों तरफ़ उसी तरह का आलम है, थोड़े से “सोफ़िस्टिकेटेड” दो नेता जब चुनाव मैदान में उतरते हैं तो वह मुर्गे की लड़ाई जैसा लगता है (जैसे मुर्गे के पैर में बंधे हुए छोटे-छोटे चाकू से वार होता है ना, वैसा ही इनके चुनावी दंगल में होता है), उससे थोड़े गिरे हुए गुण्डे-बदमाश टाइप के लोगों के चुनाव “पाड़ों की लड़ाई” जैसे लगते हैं (हुंकार भरते हुए, एक-दूसरे को निपटाने के मूड में, सींग से सींग भिड़ाते हुए, खून बहाते हुए, एक दूसरे के समर्थकों पर भी चढ़ बैठने की अदा में), तीसरी कैटेगरी बहुत नीचे स्तर की है (और ऐसे ही लोगों की संख्या ज्यादा है) यानी सूअरों की लड़ाई (इसमें लड़ने वाले खुद भी कीचड़ में लोटते-नोचते-खसोटते हैं और देखने वालों पर भी कीचड़ उछालते हैं)। कहने का मतलब यह कि चुनाव नाम का यह दंगल देखने में बहुत मजा आता है।



सभी पार्टियों के उम्मीदवारों की सूची जारी हो चुकी है, सभी ने नामांकन भर दिया है, बागी भी अपना-अपना झंडा-डंडा थामे मैदान में कूद पड़े हैं। अब अगले कुछ दिन पार्टी उम्मीदवार और विद्रोही उम्मीदवार के बीच “सौदेबाजी” में गुजरेंगे। जो भी विपक्ष में “अपना ही भाई जैसा” आदमी खड़ा हुआ है उसे बिठाने की कोशिशें तेज की जायेंगी। एक भाई ने उस पर चल रहे 4 हत्याओं के मामले वापस लेने की शर्त रखी है, दूसरे ने चालीस लाख माँगे हैं “बैठने” के लिये, क्योंकि पिछले पाँच साल में वह पहले ही 5-10 लाख खर्च कर चुका है “खड़े” होने के लिये। एक जगह एक सज्जन बैठने की एवज में अपनी (सिर्फ़) 15 बसों का “राष्ट्रीय परमिट” चाहते हैं, दूसरी जगह एक और सज्जन सरकार बन जाने की स्थिति में “मलाईदार” निगम या मण्डल में अध्यक्ष पद चाहते हैं और यदि सरकार नहीं बनी तो केन्द्र के किसी आयोग या प्रतिनिधिमण्डल में जगह चाहते हैं। एक और “सज्जन” (सभी सज्जन ही होते हैं यारों…) बैठने के बदले में दो मेडिकल कॉलेज और चार बी-एड कॉलेज खोलने की अनुमति चाहते हैं…सोचिये एक विधायक बनने की क्या कीमत होगी, कितनी कीमत चुकानी पड़ेगी और कितनी कीमत वह अगले पाँच साल में बनायेगा, सोचते-सोचते दिमाग का दही बन जायेगा। जब-तब “भारत के महान लोकतन्त्र” की दुहाई देने वाले एलीट क्लास के लोग वोट देने जाना अपनी शान के खिलाफ़ समझते हैं और यही सबसे ज्यादा आलोचना भी करते हैं।

बहरहाल, अपने जैसे आम आदमी को चुनाव नाम के इस मेले-ठेले में बहुत मजा आता है, सूअरों-मुर्गों की लड़ाई फ़्री में देखने मिल जाती है, गरीबों को कम्बल-दारू मिल जाती है, काला पैसा और भ्रष्टाचार की कमाई जो नेताओं की तिजोरी में बन्द रहती है, वह टेम्पो चलाने वाले, माइक थामने वाले, मंच बनाने वाले, बैनर लिखने वाले, सौ-सौ रुपये लेकर पुतले जलाने वाले और नारे लगाने वाले जैसे हजारों लोगों की जेबों में, कुछ दिनों के लिये ही सही पहुँचती तो है, वापस इस लक्ष्मी को उन्हीं की तिजोरियों में दोगुना-तिगुना होकर पहुँचना है। पन्द्रह-बीस दिनों के लिये हजारों बेरोजगारों को काम मिल जाता है, कई हाथों को बिना कमाये रात को एक “क्वार्टर” दारू मिल जाती है, सब अपने-अपने कामों में व्यस्त हो जाते हैं, कितना-कितना फ़ायदा है चुनावों से… मुझे तो लगता है कि हर साल चुनाव होते रहें तो कम से कम सरकारी कर्मचारी काम करते हुए तो दिखाई देंगे, नेता जितना कमायेगा लगातार उतना ही खर्च भी करता रहेगा, हजारों-लाखों को रोजगार मिलता रहेगा और हमारा भी मनोरंजन होता रहेगा। अभी भारत में ब्रिटेन जैसी व्यक्तिगत और छिछोरी बातों को छापने वाले “टेब्लॉयड” अखबारों की संस्कृति नहीं आई है वरना जैसे नारायणदत्त तिवारी को बुढ़ापे में सरेआम नंगा कर दिया गया है, वैसे हजारों केसेस हमें देखने-पढ़ने-सुनने को मिल जाते, तो चुनाव का मजा और भी दोगुना हो जाता… खैर हमें क्या… कहते हैं “कोऊ नृप होई हमे का हानि…”, लेकिन यहाँ मामला उल्टा है कोई भी नृप (विधायक/सांसद) बने हमें (आम नागरिक) तो हानि ही हानि है, जैसे अमेरिका में “गधा” (डेमोक्रेट) जीते या “हाथी” (रिपब्लिकन) वह तो सारी दुनिया को लतियायेगा ही, उसी प्रकार यहाँ भी हमें चुनाव सिर्फ़ यह तय करना है कि हम किससे अपनी इज्जत लुटवाना चाहते हैं, “इस” पार्टी से या “उस” पार्टी से… बस बीच का यह आचार संहिता का एक महीने का समय बड़ा ही मजेदार-रंगबाज होता है तो इस “चुनाव मौसम” के मजे क्यों न लूटें… चुनाव के बाद तो सारे नेता मिलकर हमारी सबकी………… दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतन्त्र की यह एक विडम्बना है, लेकिन फ़िलहाल इससे बचने और निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा।

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Election Commission of India, General Elections and Instructions

चार प्रमुख राज्यों में चुनाव की घोषणा के साथ ही लगभग एक-डेढ़ माह के लिये चुनाव आयोग की “सत्ता” शुरु हुए कुछ दिन बीत चुके हैं। उल्लेखनीय है कि चुनाव के समय चुनाव आयोग ही उच्चतम प्रशासनिक संस्था होता है एवं चुनाव आयोग का आदेश अन्तिम व सर्वमान्य होता है। इस “कानून की शक्ति” और इस शक्ति केन्द्र का सबसे पहला और प्रभावशाली उपयोग किया था कालजयी नौकरशाह टी एन शेषन ने। कालजयी इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि उनके मुख्य चुनाव आयुक्त का पद सम्भालने से पहले “केन्द्रीय चुनाव आयोग” सत्ताधारी दलों के आँगन में बँधी हुई बकरी के अलावा और कुछ भी नहीं था, जो सिर्फ़ मिमिया सकती थी या फ़िर खामखा हवा में सींग चला सकती थी, जिसका कोई नतीजा नहीं निकलने वाला था। लेकिन जब टी एन शेषन ने यह शक्तिशाली कुर्सी संभाली तभी से स्थितियाँ बदलना शुरु हो गईं। एक नौकरशाह अपनी शक्ति का उपयोग करके कैसे धूर्त, बेईमान और जोड़तोड़ में माहिर नेताओं और राजनैतिक पार्टियों की नकेल कस सकता है शेषन इसका अनुपम उदाहरण बन गये हैं। जाते-जाते उन्होंने आने वाले चुनाव आयुक्तों के लिये एक नज़ीर पेश कर दी, एक परम्परा सी स्थापित कर दी। अब जो भी मुख्य चुनाव आयुक्त बनता है, राजनैतिक दल उससे सहमकर ही रहते हैं, ऐसा जलवा कायम किया जा चुका है।

इस बार के विधानसभा चुनावों के लिये चुनाव आयोग ने बहुत ही कठोर दिशानिर्देश जारी किये हैं। हालांकि दिशानिर्देश तो हमेशा जारी किये जाते हैं, लेकिन “शेषन युग” के बाद अब आयोग इन पर ईमानदारी से अमल भी करवाने लगा है। वैसे तो पहले ही शासकीय कर्मचारियों पर चुनाव आयोग का डण्डा तना हुआ है, लेकिन हाल ही में मध्यप्रदेश के पर्यटन मंत्री तुकोजीराव पवार और एक पूर्व सांसद उम्मीदवार फ़ूलचन्द वर्मा को एक रिटर्निंग ऑफ़िसर से बदतमीजी करने के आरोप में प्रकरण दर्ज कर जेल भेजा गया है तबसे सभी कर्मचारी और उम्मीदवार आतंकित हो गये हैं। मैंने पहले भी कहा था कि इतने उच्च स्तर के काम को देखते हुए क्यों न चुनाव आयोग को ही दिल्ली की सरकार चलाने का जिम्मा सौंप दिया जाये। भले ही यह बात मजाक में कही हो, लेकिन जिला कलेक्टरों, पुलिस अधिकारियों और अन्य शासकीय कर्मचारियों के काम करने के तौर तरीके देखकर महसूस होता है कि “इसे कहते हैं कानून का राज”। साधारण कर्मचारी हो या उच्च अधिकारी, रात के 12-12 बजे तक लगातार काम में जुटे हैं, कोई मतदाता सूची टटोल रहा है, कोई ईवीएम मशीनों का रिकॉर्ड दुरुस्त कर रहा है, कोई मतदान केन्द्रों के बारे में पूरी जानकारी तैयार कर रहा है। चुनाव आयोग ने सभी को एक समय-सीमा तय कर दी है, और उसी के भीतर उसे अपना काम करना है। सभी के सिर पर नोटिस, कारण बताओ पत्र, निलम्बन, बर्खास्तगी की तलवार लटक रही है… उम्मीदवार भी फ़ूंक-फ़ूंक कर कदम रख रहे हैं, सभी ने एक-दो वकीलों (आचार संहिता का अक्षरशः पालन करने) और चार्टर्ड अकाउंटेंट को (दैनिक हिसाब-किताब “ईमानदारी” से दर्शाने के लिये) नियुक्त कर रखा है, मकान मालिकों से विनम्रता से पूछ-पूछकर दीवारों पर लिख रहे हैं, ध्यान रखा जा रहा है कि प्रचार गाड़ी पर कितने स्पीकर लगेंगे, बिजली के खम्भों पर झंडे टांगने में सतर्कता बरत रहे हैं, इस दौरान किससे मिलना है किससे नहीं मिलना है इसका ध्यान रखा जा रहा है… रिरिया रहे हैं, मिमिया रहे हैं, गिड़गिड़ा रहे हैं… क्या खूब माहौल है, क्या देश में यह माहौल 24 घंटे, सातों दिन, बारहों महीने नहीं रह सकता? क्या यह जरूरी है कि “डण्डे” के डर से ही शासकीय कर्मचारी काम करें? बीते 60 सालों में कार्य-संस्कृति पैदा करने की आवश्यकता क्यों नहीं महसूस की गई? सत्ता में सर्वाधिक समय रहने के कारण “मुफ़्तखोरी” की इस आदत को बढ़ावा देने के लिये सबसे ज्यादा जिम्मेदारी कांग्रेस की होना चाहिये या नहीं? हर आठ-दस साल में नया वेतन आयोग चाहिये होता है, साल के 365 दिनों में से 100 से अधिक छुट्टियाँ, जमाने भर के भत्ते, भ्रष्टाचार के अलावा यूनियनबाजी, राजनीति और चापलूसी की संस्कृति का विकास किया गया है। हालांकि मक्कार कर्मचारी बचने के रास्ते ढूँढ ही लेते हैं, चुनाव ड्यूटी से बचने के लिये फ़र्जी स्वास्थ्य प्रमाण-पत्र, नकली शादी-ब्याह की पत्रिकायें तक पेश की जाती हैं, इतने बड़े “सिस्टम” में कुछ न कुछ गलत काम और गलत लोग आ ही जाते है, लेकिन फ़िर भी चुनाव आयोग के एक आदेश मात्र से बड़े-बड़ों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है, इसलिये शेषन कालजयी हैं, और अब जब यह “परम्परा” ही बन चुकी है तो कोई भी चुनाव आयुक्त बने वह इस प्रथा को आगे ही बढ़ायेगा, जनता और प्रेस का दबाव उसे सत्ताधारी दल की खुलेआम चमचागिरी करने से बचाकर रखेगा।



भारत के चुनाव आयोग ने एक और महान और उल्लेखनीय काम किया है पर्यावरण संरक्षण का। इस मुद्दे पर अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं को पर्यावरण से सम्बन्धित पुरस्कार किसी व्यक्ति विशेष को देने की बजाय भारत के चुनाव आयोग को देना चाहिये। सबसे पहले सन् 2004 के आम चुनावों में आयोग ने “पेपरलेस” चुनाव का प्रयोग किया जो कि सफ़ल भी रहा। लगभग प्रत्येक राज्य मे हरेक मतदान केन्द्र पर इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (EVM) से मतदान करवाकर चुनाव आयोग ने देश का सैकड़ों टन कागज बचाया, जाहिर है कि कागज बचाया मतलब लाखों पेड़ कटने से बचे। इन आगामी विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग ने एक नई और अनुकरणीय पहल की है, वह है “प्लास्टिक पर बैन”। कोई भी प्रत्याशी या पार्टी प्लास्टिक के बिल्ले, बैनर, झंडियाँ, पोस्टर, स्टीकर आदि नहीं बनवा सकेगा। आयोग ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए सभी कलेक्टरों को आदेश दिया है और सार्वजनिक सूचना दी है कि जो भी प्रकाशक या स्क्रीन प्रिंटिंग वाले प्लास्टिक की सामग्री छापेंगे उन्हें तुरन्त काली सूची में डाल दिया जायेगा और उन पर कार्रवाई की जायेगी (यानी सीधे जड़ पर प्रहार)। चुनाव आयोग का यह कदम पर्यावरणीय दृष्टिकोण से क्रांतिकारी कहा जा सकता है। सभी जानते हैं कि प्लास्टिक पर्यावरण को भयानक नुकसान पहुँचाता है और चुनाव निपटने के बाद यदि भारी मात्रा में चुनाव प्रचार सामग्री सड़कों पर बिखरी रहती, नालियों में चोक होती, जलाई जाने पर जहरीला धुआँ छोड़ती। प्रत्याशियों से यह उम्मीद करना कि चुनाव के बाद वे खुद अपनी प्रचार सामग्री हटायेंगे, बेकार ही है। ऐसे में चुनाव आयोग ने यह कदम उठाकर बेहतरीन काम किया है।

मूल समस्या है भारतीयों के चरित्र की, हम इतने अनुशासनहीन और अकर्मण्य हैं कि जब तक कोई मजबूत डण्डा हमारे सिर पर न तना हो हम काम नहीं करना चाहते, हम अनुशासन में नहीं रहना चाहते (चाहे लाल बत्ती पार करने का मामला हो, या गलत पार्किंग का), हम नैतिकता का पालन नहीं करना चाहते (बड़े बंगलों में अतिक्रमण हो या बिजली की चोरी हो)… “निजीकरण” हर समस्या का हल नहीं है, जब तक सरकारी मशीनरी वास्तविक तौर पर काम करने की मुद्रा में न आये, भारत को तेजी से आगे बढ़ना मुश्किल होगा, इसीलिये जब चुनाव आयोग की एक फ़टकार पर बड़े-बड़े अधिकारी अटेंशन की मुद्रा में आ जाते हैं तब बार-बार यही सवाल मन में उठता है कि आखिर दुनिया भर को “कर्म” की शिक्षा देने वाले “गीता” के इस देश में डण्डे की जरूरत ही क्यों पड़ना चाहिये?

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Kerala and Malwa becoming Nursery of Terrorism in India

हाल ही में जम्मू कश्मीर में दो आतंकवादी मुठभेड़ में मारे गये। सुरक्षा बलों द्वारा उनकी तलाशी लेने पर उनकी जेबों से केरल के मतदाता परिचय पत्र पाये गये। जो आतंकवादी मारे गये उनके नाम हैं मुहम्मद फ़याज़ (थय्यिल जिला कन्नूर) और अब्दुल रहीम (चेट्टिपदी, जिला मलप्पुरम)। यह आम जनता के लिये चौंकाने वाली खबर हो सकती है, कि केरल के युवक कश्मीर में आतंकवादी बनकर क्या कर रहे थे? और क्या केरल भी अब जेहाद की नर्सरी बनता जा रहा है? लेकिन सच यही है कि पहले भी इस प्रकार की खबरें आती रही हैं कि केरल के अन्दरूनी इलाकों में आतंकवादी अपने पैर पसार चुके हैं। केरल की नेशनल डेवलेपमेण्ट फ़्रण्ट (NDF) जो कि केरल का एक मुस्लिम संगठन है बड़ी तेजी से “नई भरती” कर रहा है, और इस संगठन के “सिमी” और “इंडियन मुजाहिदीन” से गहरे सम्पर्क रहे हैं। यह वही NDF है जिस पर ISI के साथ रिश्ते होने के आरोप सतत लगते रहते हैं और पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार यह संगठन केरल के “मराड नरसंहार” में भी शामिल रहा। इस प्रकार की खबरें भी हैं कि इंडियन मुजाहिदीन के मुख्य लीडर सुबैन कुरैशी ने केरल का सघन दौरा किया था। इस मामले में सबसे अधिक शर्मनाक पहलू यह है कि केरल में कांग्रेस हो या वामपंथी दोनों पार्टियाँ मुसलमानों को रिझाने के नाम पर NDF की लल्लोचप्पो करती फ़िरती हैं। सत्ताधारी वामपंथी नेता तो ISS के नेता अब्दुल नासिर मदनी के साथ कई जगहों पर एक ही मंच पर भाषण देते देखे गये और कांग्रेस हमेशा से NDF के नेताओं की संदिग्ध गतिविधियों पर परदा डालती रही है।



केरल को हमेशा ही धर्मनिरपेक्ष संस्कृति के ताने-बाने वाला राज्य माना जाता रहा है, लेकिन पिछले एक दशक में स्थितियाँ बहुत तेजी से बदली हैं। केरल का तटीय मलाबार इलाका जो पहले प्राकृतिक सौन्दर्य के लिये जाना जाता था, अब स्मगलिंग के जरिये हथियार और ड्रग सप्लाई का केन्द्र बनता जा रहा है। पर्यटन की आड़ लेकर इस क्षेत्र में कई संदिग्ध गतिविधियाँ जारी हैं। आईबी की एक आंतरिक रिपोर्ट के अनुसार जब 1993 में मौलवी अबुल हसन चेक्कानूर का अपहरण और हत्या हुई, उस वक्त यह माहौल बनाया गया कि सुरक्षा बल और जाँच एजेंसियाँ जानबूझकर इस हत्या की गुत्थी नहीं सुलझा रहे हैं। दुष्प्रचार के जरिये “सिमी” और “इस्लामिक सेवक संघ” प्रदेश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को चोट पहुँचाने की कोशिशें तेज करते रहे और धीरे-धीरे वे इसमें कामयाब भी होने लगे। केरल में बढ़ता शिक्षा स्तर और फ़िर भी बेरोजगारी ने इन परिस्थितियों को पनपने का भरपूर मौका दिया। खाड़ी में काम करने जाने वाले अन्य मुसलमानों की बेहतर होती आर्थिक स्थिति और उन्हीं के बीच में पाकिस्तानी तत्व आग भड़काने में लगे रहे और हताश मुस्लिम युवा धीरे-धीरे इन तत्वों की ओर खिंचा चला गया। सिमी ने अपना पुनर्घनत्वीकरण शुरु कर दिया, और यदि आईबी की मानें तो अलुवा के पास बिनानीपुरम, एर्नाकुलम जिला, मलप्पुरम और कोजीकोड जिलों में सिमी बेहद मजबूत स्थिति में है। केरल में आतंकवादी उपस्थिति की सबसे पहली झलक कोयम्बटूर बम धमाकों के दौरान पता चल गई थी, जब जाँच के दौरान तमिलनाडु स्थित अल-उम्मा के अब्दुल नासिर मदनी (इस्लामिक सेवक संघ का संस्थापक) के साथ जीवंत सम्पर्क पाये गये थे। आईएसआई के लिये केरल एक पसन्दीदा जगह बन चुका है। गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख है कि अब आईएसआई इस बात को समझ चुका है कि कश्मीर में और भारत के अन्य राज्यों में स्थानीय युवाओं को भरती करना अधिक फ़ायदेमन्द है और इसीलिये “इंडियन मुजाहिदीन” नाम भी दिया गया है, ताकि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हल्ला मचे तो कहा जा सके कि यह तो भारत के अन्दरूनी गुटों का ही काम है हमारा इससे कोई लेना-देना नहीं है। केरल पर अधिकाधिक शक इससे भी हुआ है कि इंडियन मुजाहिदीन के खासमखास अब्दुल पेदिकल शिबली और याह्या कामाकुट्टी जो इन्दौर से हाल में गिरफ़्तार हुए, केरल से ही हैं और ये लोग सिमी के सदस्यों को “तकनीकी” प्रशिक्षण देते थे। एक और व्यक्ति अब्दुल जलील भी गिरफ़्तार किया गया है जो केरल के कन्नूर का रहने वाला है और उससे बरामद डायरियों से उसके कश्मीरी आतंकवादियों से सम्बन्ध स्थापित होते हैं। लेकिन कश्मीर में केरल के युवाओं का मारा जाना एक बेहद गम्भीर मसला है और असम विस्फ़ोटों के बाद यह दर्शाता है कि भारत की सुरक्षा इतनी तार-तार हो चुकी है कि देश के किसी भी कोने से आतंकवादी अपना काम कर सकते हैं।



इसी प्रकार देश का मध्य क्षेत्र है मध्यप्रदेश और जिसका पश्चिमी इलाका है मालवा, जिसमें रतलाम, मन्दसौर, इन्दौर, उज्जैन और देवास आदि इलाके आते हैं। यह क्षेत्र भी पिछले एक दशक के दौरान सिमी का मजबूत गढ़ बन चुका है। उद्योग-धंधों के न पनपने और इन्दौर के “मिनी मुम्बई” बनने की चाहत ने अपराधियों, भू-माफ़ियाओं और नेताओं का एक ऐसा गठजोड़ तैयार कर दिया है जो सिर्फ़ अपने फ़ायदे की सोचता है, इस इलाके (मालवा) की खास बात है कि इन्दौर को छोड़कर बाकी का समूचा इलाका बेहद शांत है, लोग धर्मप्रिय हैं, खामखा किसी के पचड़े में नहीं पड़ते। लेकिन इस इलाके में बदलाव आना शुरु हुआ बाबरी मस्जिद ध्वंस और उसके बाद हुए दंगों के बाद से। कई लोगों को सोहराबुद्दीन की याद होगी, हाल ही में कई सेकुलरों और मानवाधिकारवादियों ने इसके गुजरात पुलिस द्वारा किये गये एनकाउंटर पर काफ़ी शोरगुल मचाया था। सोहराबुद्दीन भी मालवा के इलाके की ही पैदाइश है, उन्हेल नामक कस्बे में इसके खेत के कुंए से एके-56 रायफ़लें बरामद की गई थीं, और कई बम विस्फ़ोटों में भी यह शामिल रहा ऐसा पुलिस और एजेंसियों का कहना है (लेकिन “सेकुलर” लोग इसे संत मानते हैं जैसे कि अफ़ज़ल गुरु को)। ताजा मामला इन्दौर से ही सिमी के प्रमुख व्यक्ति सफ़दर नागौरी और उसके साथियों की गिरफ़्तारी का रहा। उल्लेखनीय है कि सफ़दर नागौरी भी हमारे उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय का पीएच. डी. का छात्र रहा और उसने कश्मीर विषय पर केन्द्रित थीसिस “बर्फ़ की आग कैसे बुझेगी” जमा की है, जिसमें कुछ राष्ट्रविरोधी टिप्पणियाँ पाई गईं, और इस विषय पर इंडिया टुडे में काफ़ी कुछ प्रकाशित हो चुका है। सफ़दर नागौरी सिमी का सबसे प्रमुख व्यक्ति है, और कई राज्यों में इस संगठन को फ़ैलाने में इसका बड़ा हाथ रहा है, इसके साथ ही शिबली भी इसी के साथ पकड़ा गया था (जैसा कि पहले बताया)। हाल ही में उज्जैन पुलिस ने गुजरात एटीएस के साथ एक संयुक्त ऑपरेशन में उज्जैन में कापड़िया उर्फ़ मूसा को पकड़ा जो कि अहमदाबाद धमाकों का प्रमुख आरोपी है और अब तक फ़रार था। सिमी के अन्य पदाधिकारियों का आना-जाना इन जिलों में लगा रहता है, यहाँ वे आसानी से छिप जाते हैं उन्हें “स्थानीय समर्थन” भी हासिल हो जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि केरल और मालवा के शांत इलाकों को आतंकवादी अपनी शरणस्थली बना चुके हैं और जब वे यहाँ आराम फ़रमाने या फ़रारी काटने आते हैं तो साथ-साथ यहाँ के असंतुष्ट युवकों को बरगलाकर अपने साथ मिलाने में भी कामयाब हो जाते हैं।

देश इस समय सबसे गम्भीर खतरे की चपेट में है, और इस खतरे को और ज्यादा बढ़ा रहे हैं कांग्रेस और कथित “सेकुलर” लोग जो तीन श्रेणियों में हैं, पहला जिन्हें यह आसन्न खतरा उनकी “जिद” के कारण दिखाई नहीं दे रहा… दूसरा यदि दिखाई दे भी रहा है तो वे उसे खतरा मानना नहीं चाहते… और तीसरा या तो वे लोग भी जाने-अनजाने इस खतरे का हिस्सा बन चुके हैं। जब इन तत्वों से मुकाबले के लिये हिन्दूवादी संगठन आगे आते हैं (साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का भी उज्जैन से गहरा सम्बन्ध रहा है) तो जिस प्रकार कन्नूर और मलप्पुरम में संघ कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुई, या कंधमाल में एक वयोवृद्ध स्वामीजी की हत्या हुई या फ़िर कश्मीर से जिस प्रकार हिन्दुओं का जातीय सफ़ाया किया गया, ऐसा कुछ होता है, जिसका दोष भी षडयंत्रपूर्वक ये सेकुलर उन्हीं के माथे पर ढोल देते हैं। इसीलिये विभिन्न फ़ोरमों पर यह लगातार दोहराया जाता है कि इस देश का सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस और “सो-कॉल्ड” सेकुलर लोग कर रहे हैं। कहा गया है न कि सोते हुए को जगाना आसान है लेकिन जो सोने का नाटक कर रहा हो उसे आप कैसे जगायेंगे? जब हमारे बीच में ही “जयचन्द” मौजूद हैं तो दूसरों को दोष क्या देना, पहले तो इनसे निपटना होगा।


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Newspapers, Published News Between the Lines

लगभग सभी पढ़े-लिखे लोग अखबार तो पढ़ते ही हैं, उसमें काफ़ी खबरें छपी होती हैं, क्या आप सभी खबरों को सीधे-सीधे जैसी लिखी हैं वैसा ही पढ़ लेते हैं? ठहरिये, असल में जो छपा होता है वह वैसा होता नहीं है, हमें छपी हुई पंक्तियों के बीच में “न छपा हुआ” अर्थ पढ़ना आना चाहिये तभी आपको अखबार पढ़ने में बहुत मजा आयेगा, इस कला को “study between the lines” भी कहा जाता है, कैसे!!! एक छोटा सा उदाहरण देखिये… समाचार : अमेरिका ने कहा है कि आर्थिक मंदी के इस दौर में भारत उसका हमेशा की तरह मजबूत साथी बना रहेगा। अब आप समझेंगे कि यह भारत-अमेरिका के बढ़ते सम्बन्धों और मित्रता की मिसाल दी जा रही है, लेकिन “बिटवीन द लाइन्स” इसका मतलब यह होता है कि “जिस प्रकार पिछले 10-15 साल से हम भारत को बेवकूफ़ बना कर अपना माल उसे चेप रहे हैं, आगे भी भारत हमारी इसी प्रकार मदद करता रहेगा…”। देखा न आपने, लिखा क्या होता है और मतलब क्या निकलता है, इस “बिटवीन द लाईन्स” पढ़ने की कला को कोई “अर्थ का अनर्थ” कहता है, कोई इसे “बाल की खाल निकालना” कहता है, कोई इसे “तिल का ताड़ बनाना” कहता है, तो कोई इसे “शातिर दिमाग का फ़ितूर” कहता है, लेकिन हम जानते हैं कि जो लोग बिटवीन द लाइन्स पढ़ लेते हैं, वह बहुत “चतुर-सुजान” होते हैं (ऐसा माना जाता है)।

आजकल कई प्रदेशों में चुनाव का मौसम चल रहा है, हजारों प्रत्याशी अपनी-अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। रोज सुबह का अखबार खोलते ही कईयों का दिमाग खराब हो जाता है, सुबह-सुबह चाय का स्वाद बिगड़ जाता है। पन्ने के पन्ने भरे हुए हैं प्रत्याशियों के जीवन परिचय से। एक तस्वीर में एक “भेड़िया” मुस्करा रहा है, दूसरी तस्वीर में एक “कौआ” आपको सच्चाई का वचन दे रहा है, अखबार के एक तरफ़ “साँप और नाग” एकता प्रदर्शित कर रहे हैं तो दूसरी तरफ़ एक “लकड़बग्घा” विकास का वादा कर रहा है… लेकिन इस माहौल में भी आप “बिटवीन द लाइन्स” पढ़कर अपनी सुबह को आनन्दमयी और कॉमेडी से भरपूर बना सकते हैं। कुछ उदाहरण…



उदाहरण – 1) इन्होंने छात्र जीवन से ही राजनीति में कदम रख लिया था और छात्रसंघ के चुनावों में पार्टी का परचम लहराया था (बिटवीन द लाइन्स – ये नम्बर एक के गुण्डे हैं और कॉलेज में इन्होंने कम से कम चार प्रोफ़ेसरों को तमाचे रसीद किये हैं, तीन हड़तालें करवाईं, दो बसें जलाईं, छात्र संघ का चुनाव जीता है मतलब कम से कम सौ गुण्डे इनके हाथ के नीचे काम करते हैं)

उदाहरण – 2) फ़लाँ महानुभाव अपने पिता के नक्शे-कदम पर चलते हुए जनता की सेवा करने हेतु राजनीति में उतरे हैं (बिटवीन द लाइन्स – ये एक निकम्मे किस्म के युवा हैं जो अपने बाप की वजह से टिकट पा गये हैं, जैसा लम्पट इनका बाप था वैसे ही इनके भी नक्शे-कदम हैं)

उदाहरण – 3) ये महान नेता सहकारिता के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम है, गाँव-गाँव में फ़ैली विभिन्न सहकारिता संस्थाओं के माध्यम से इन्होंने गरीब किसानों की सेवा का प्रकल्प सफ़लतापूर्वक सिद्ध किया है (बिटवीन द लाइन्स – ये साहब सहकारी बैंकों के बहुत बड़े वाले “डिफ़ॉल्टर” हैं, एकाध-दो बैंक ये अपने अकेले के दम पर ही ले डूबे हैं, बाकी की सहकारी संस्थायें भी इनके गुर्गे लोन ले-लेकर अगले चुनाव तक डुबो देंगे)।

उदाहरण – 4) वयोवृद्ध नेताजी पिछले चालीस साल से जनता के सुख-दुख में साथ रहे हैं, राजनैतिक जीवन के कई उतार-चढ़ाव देखने के बावजूद आज भी इनका सेवा का जोश बरकरार है। (बिटवीन द लाइन्स – उतार-चढ़ाव यानी कि दो तीन बार जनता इन्हें बेइज्जती से सरेआम हरा चुकी है, फ़िर भी बुढ़ापे में इनसे सत्ता का मोह नहीं छूट रहा, सो कब्र में पैर लटके होने के बावजूद फ़िर से चुनाव में खड़े हो गये हैं)…

ये तो खैर चुनावी मौसम की खबरें हैं यूं साधारण दिनों में भी आप अखबार में बिटवीन द लाइन्स पढ़ सकते हैं, जैसे – “भारत ने पाकिस्तान के साथ आपसी सम्बन्ध बढ़ाने के लिये एक प्रतिनिधिमण्डल भेजने का फ़ैसला किया है” (बिटवीन द लाइन्स – हम जानते हैं कि यह कुत्ते की पूँछ है सीधी नहीं होगी लेकिन फ़िर भी प्रतिनिधिमण्डल भेज रहे हैं…)। समाचार - “ओलम्पिक में भारत पहले पदक के काफ़ी करीब…” (बिटवीन द लाइन्स – साठ साल में गिने-चुने पदक मिले हैं, फ़िर भी शर्म नहीं आ रही, क्रिकेट देखे जा रहे हैं…), आदि-आदि।

तो भाईयों आपकी मदद और गाइडेंस के लिये यहाँ मैंने कुछेक उदाहरण पेश कर दिये हैं कि “बिटवीन द लाइन्स” कैसे पढ़ा जाता है, बाकी का अभ्यास तो आप कर ही लेंगे। जब आप इस कला में काफ़ी निपुण हो जायेंगे तो आप ब्लॉग में मिल रही टिप्पणियों में से भी “बिटवीन द लाइन्स” पढ़ लेंगे, तब आप “मठाधीश ब्लॉगर” कहलायेंगे और अन्य ब्लॉगर आपके आतंक से खौफ़ खायेंगे और टिप्पणी-दर-टिप्पणी करके आपकी तारीफ़ों के पुल बाँध देंगे (सबसे ज्यादा पाठक इसी वाक्य में “बिटवीन द लाइन्स” पढ़ने की कोशिश करेंगे)। वैसे भी यह कला “अनुभव” से आती है, जैसे-जैसे आप अखबार को ध्यान से पढ़ेंगे और उसमें “बिटवीन द लाइन्स” पढ़ने की कोशिश करेंगे, आपको अखबार नाम की “चीज़” बहुत मजेदार लगने लगेगी। यदि आप चाहते हैं कि रोज-ब-रोज सुबह खुलकर हँसा जाये जिससे फ़ेफ़ड़ों की वर्जिश हो जाये तो इस “कला” की प्रैक्टिस कीजिये और अखबार पठन को एक आनन्ददायी अनुभव बनाईये, क्योंकि आजकल अखबार हों या टीवी चैनल, ये सिर्फ़ “दुकानदारी” बनकर रह गये हैं, इन्हें समाज पर पड़ने वाले प्रभाव से कोई लेना-देना नहीं होता… तो अखबार पढ़कर टेंशन लेने का नईं… खामखा दीमाक का पाव-भाजी क्यों बनाने का, मजा लेने का…

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Hindu Terrorism Congress and Secularism

श्रीनगर में एक मुस्लिम महिला संगठन है जिसका नाम है “दुख्तरान-ए-मिल्लत”, जो मुस्लिम महिलाओं को इस्लामिक परम्पराओं और ड्रेस कोड को सख्ती से लागू करवाने के लिये कुख्यात है चाहे इस “पवित्र कार्य”(?) के लिये हिंसा का ही सहारा क्यों न लेना पड़े। उनका दावा है कि यह मुस्लिम महिलाओं के भले के लिये है, दुख्तरान-ए-मिल्लत की स्वयंभू अध्यक्षा हैं आसिया अन्दराबी, जिसे कई बार देशद्रोही गतिविधियों, जेहादी गुटों द्वारा भारी मात्रा में पैसा प्राप्त करने, और आतंकवादी संगठनों की मदद के लिये कई बार जेल हुई। अमेरिका की खुफ़िया एजेंसियों की एक रिपोर्ट के अनुसार दुख्तरान-ए-मिल्लत 1995 में बीबीसी के दफ़्तर में हुए पार्सल बम विस्फ़ोट के लिये भी दोषी पाई गई है। आसिया अन्दराबी को पोटा के तहत गिरफ़्तार किया जा चुका है और उसे हवाला के जरिये भारी मात्रा में पैसा प्राप्त होता रहा है। मैडम अन्दराबी भारत के खिलाफ़ जब-तब जहर उगलती रहती हैं। इतनी भूमिका बाँधने का असली मकसद सेकुलरों, कांग्रेसियों, नकली हिन्दुओं, नपुंसक हिन्दुओं, तटस्थ हिन्दुओं को सिर्फ़ यह बताना है कि इस “महान महिला” का एक बार भी नार्को टेस्ट नहीं किया गया। कभी भी जीटीवी या NDTV ने इसके बारे में कोई खबर नहीं दी। इसके विपरीत कई महिला संगठनों ने इसका इंटरव्यू लिया और कहा गया कि यह “इस्लामी महिलाओं का क्रांतिकारी रूप”(?) है।

कश्मीर में भारत के झण्डे जलाते और उग्र प्रदर्शन करते युवक भारत के सेकुलरों के लिये “भ्रमित युवा” हैं जिन्हें समझने(?) की जरुरत है, जबकि अमरनाथ भूमि के लिये जम्मू में प्रदर्शन करते युवक “उग्र, हिंसक और भाजपा के गुण्डे” हैं, ये है इनका असली चेहरा… जैसे ही एक साध्वी सिर्फ़ शंका के आधार पर पकड़ाई, मानो सारे चैनलों और अखबारों को काम मिल गया, जाँच एजेंसियाँ और ATS अचानक प्रभावशाली हो गये, तुरन्त नारको टेस्ट का आदेश दिया गया, कोई सबूत न मिला तो “मकोका” लगा दिया गया ताकि आसानी से छुटकारा न हो सके और न्यायालय को गच्चा दिया जा सके, साध्वी को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा, लेकिन महान सेकुलर लोकतन्त्र का एक भी महिला संगठन उसके पक्ष में आवाज उठाने आगे नहीं आया। भले ही कोई साध्वी को निर्दोष बताने के पक्ष में सामने न आता, लेकिन एक “महिला” के सम्मान बचाने, उसे अपने दैनिक धार्मिक कार्य सम्पन्न करवाने, और सतत एक महिला कांस्टेबल साथ रखने जैसी मामूली माँगें तक उठाने की जहमत किसी ने नहीं उठाई। जबकि यही महिला संगठन और गिरिजा व्यास के नेतृत्व में महिला आयोग, देश के किसी भी कोने में किसी अल्पसंख्यक महिला पर हो रहे अत्याचार पर जरा-जरा सी बात पर आसमान सिर पर उठा लेते हैं। नारको टेस्ट के दौरान साध्वी पूरा सहयोग देती हैं, लेकिन फ़िर भी ATS चार-चार बार नारको टेस्ट करवाती है, ये सब क्या है? मजे की बात तो यह है कि यही महिला आयोग राखी सावन्त जैसी “आईटम गर्ल” के पक्ष में तुरन्त आवाज उठाता रहा है, जबकि वह अपनी पब्लिसिटी के लिये वह सारी “हरकतें” कर रही थी।



मानवाधिकार आयोग नाम का “बिजूका” तो चुपचाप बैठा ही है, मार्क्सवादियों के मुँह में भी दही जम गया है, वाचाल अमर सिंह भी अज्ञातवास में चले गये हैं, जबकि यही लोग अफ़जल की फ़ाँसी बचाने के लिये जी-जान एक किये हुए हैं, भले ही सुप्रीम कोर्ट ने उसे दोषी करार दिया है। प्रज्ञा का असली दोष यह है कि वह “भगवा” वस्त्र पहनती है, जो कि कांग्रेस और वामपंथियों को बिलकुल नहीं सुहाता है। सरकार की “सुरक्षा” लिस्ट में वह इसलिये नहीं आती क्योंकि “540 विशिष्ट” (सांसद) लोगों जिनमें से दो तिहाई पर हत्या, बलात्कार, लूट, डकैती, धोखाधड़ी के मामले चल रहे हैं, इनकी “सुरक्षा और सम्मान” बरकरार रखना ज्यादा जरूरी है।

सबसे पहले ATS की RDX वाली “थ्योरी” पिटी, फ़िर हैदराबाद पुलिस ने यह कहकर केस की हवा निकाल दी कि मालेगाँव और हैदराबाद की मक्का मस्जिद विस्फ़ोट में आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है। जिस मोटरसाइकल के आधार पर यह केस खड़ा किया जा रहा है वह प्रज्ञा ने कई साल पहले ही बेच दी थी। आपको याद होगा जब शंकराचार्य को गिरफ़्तार किया गया था तब भी मीडिया और पुलिस ने उन पर रेप, मर्डर, धोखाधड़ी और औरतखोरी के आरोप लगाये थे, कहाँ गये वे आरोप, क्या हुआ उस केस का आज तक किसी को पता नहीं, लेकिन हिन्दू गुरुओं की छवि बिगाड़ने का काम तो सतत जारी है ही… कांची के बाद कंधमाल में भी “हिन्दू आतंकवाद” की कहानियाँ गढ़ी गईं, एक बुजुर्ग स्वामी की हत्या को सिरे से भुलाकर मीडिया सिर्फ़ नन के बलात्कार को ही प्रचारित करता रहा और “बटला हाऊस की गैंग” इससे बहुत खुश हुई होगी। बहुसंख्यकों की भावनाओं का अपमान करने वाले देश और उसके नेताओं का चरित्र इससे उजागर होता है, और वह भी सिर्फ़ अपने चुनावी फ़ायदे के लिये। कुल मिलाकर इनका एक ही काम रह गया है, “भगवा ब्रिगेड” को बदनाम करो, हिन्दुओं को “आतंकवादी” चित्रित करो, चिल्ला-चिल्ला कर भारत की संस्कृति और संस्कारों को पिछड़ा, दकियानूसी और बर्बर बताओ, कारण सिर्फ़ एक ही है कि “हिन्दू” सहिष्णु(?) है, और देखना यही है कि आखिर कब तक यह सहिष्णु बना रहता है।

बांग्लादेश से घुसपैठ जारी है, रामसेतु को तोड़ने के लिये नित नये हलफ़नामे सुप्रीम कोर्ट में दिये जा रहे हैं, बटला हाउस के आरोपियों को एक विश्वविद्यालय खुलेआम मदद दे रहा है, लेकिन जीटीवी और NDTV को एक नया फ़ैशन सूझा है “हिन्दू आतंकवाद”। जयपुर या मुम्बई के विस्फ़ोटों के बाद किसी मौलवी को पकड़ा गया या किसी मुस्लिम धर्मगुरु को हिरासत में लिया गया? किसी चैनल ने “हरा आतंकवाद” नाम से कोई सीरीज चलाई? “उनका” कहना होता है कि “धर्म को आतंकवाद” से नहीं जोड़ना चाहिये, उन्हीं लालुओं और मुलायमों के लिये सिमी निर्दोष है जिसके “मोनो” में ही AK47 राइफ़ल दर्शाई गई है। लेकिन जब प्रज्ञा कहती हैं कि पुलिस उन्हें बुरी तरह पीट रही है और टॉर्चर कर रही है तब किसी के मुँह से बोल नहीं फ़ूटता। जब पप्पू यादव, शहाबुद्दीन और तेलगी जैसे लोगों तक को जेल में “सभी सुविधायें” उपलब्ध हैं, तो क्या प्रज्ञा उनसे भी बुरी है? क्या प्रज्ञा ने आसिया अन्दराबी की तरह मासूम महिलाओं पर एसिड फ़ेंका है? या प्रज्ञा ने देश के कोई राज चुराकर पाकिस्तान को बेचे हैं? ये सब तब हो रहा है जबकि एक “महिला”(?) ही इस देश की सर्वेसर्वा है।



अब देखते हैं कि क्यों हिन्दू “हिजड़े” कहलाते हैं –

1) 3 लाख से अधिक हिन्दू कश्मीर से “धर्म” के नाम पर भगा दिये जाते हैं, लेकिन एक भी हिन्दू उठकर यह नहीं कहता कि बस बहुत हो चुका, मैं सारे “शैतानों” को सबक सिखाने का प्रण लेता हूँ।
2) कश्मीर घाटी में 500 से अधिक मंदिर सरेआम तोड़े जाते हैं, कोई कश्मीरी हिन्दू “हिन्दू आतंकवाद” नहीं दिखाता।
3) डोडा और पुलवामा छोटे-छोटे बच्चों तक को चाकुओं से रेता जाता है, लेकिन एक भी हिन्दू संगठन उनके विरोध में आगे नहीं आता। एक संगठन ने “मानव बम” बनाने की पहल की थी, एक भी हिन्दू युवक आगे नहीं आया।

राममनोहर लोहिया ने कहा था कि भारत के तीन महान स्वप्न हैं – राम, शिव और कृष्ण। मुस्लिम आक्रांताओं ने तो हजारों मन्दिर तोड़े ही, आज की स्थिति में भी राम जन्मभूमि में रामलला अस्थाई टेंट में धूप-पानी में खड़े हैं, जरा गूगल पर जाईये और देखिये किस तरह काशी में विश्वनाथ मन्दिर चारों तरफ़ से मस्जिद से घिर चुका है, पुराने विश्वनाथ मन्दिर के खंभों को बड़ी सफ़ाई खुलेआम यह दर्शाते हुए घेरा गया है कि देखो ऐ हिन्दुओं, यह पहले तुम्हारा मन्दिर था, अब यह मस्जिद बनने जा रही है। कोई हिन्दू संगठन “आतंकवादी” बना? नहीं। जो काम गजनी, गोरी और अब्दाली भी न कर पाये, मुस्लिम वोटों के लिये यह सरकार कर चुकी है। कांग्रेस, सेकुलर और वामपंथी एक खतरनाक खेल खेल रहे हैं, और उन्हें अन्दाजा नहीं है कि वे भारत का क्या नुकसान करने जा रहे हैं। देखना यह है कि आखिर कब हिन्दुओं के सब्र का बाँध टूटता है, लेकिन एक बात तो तय है कि “सुनामी” चेतावनी देकर नहीं आती, वह अचानक किसी एक “झटके” से आती है और सब कुछ बहा ले जाती है…

(सन्दर्भ – मा. तरुण विजय का इंडिया टाइम्स पर अंग्रेजी में छपा यह लेख)


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