Super User

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I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

Website URL: http://www.google.com
Kandhamal National Shame & Manmohan
विश्व के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे नेताओं में से एक हमारे देश के प्रधानमंत्री ने कंधमाल की घटनाओं को “राष्ट्रीय शर्म” घोषित किया है। इसके पहले एकाध बार ही “राष्ट्रीय शर्म” का नाम सुना था मैंने, जी हाँ “गुजरात दंगों” के दौरान… उस वक्त भी कई कांग्रेसियों ने और यहाँ तक कि वाजपेयी जी ने भी इसे राष्ट्रीय शर्म का नाम दिया था। सवाल उठता है कि एक देश के लिये “राष्ट्रीय शर्म” क्या होनी चाहिये? राष्ट्रीय शर्म के क्या मायने हैं? क्या इस परिभाषा के अनुसार पूरे देश को शर्म आना चाहिये, शर्म से डूब मरना चाहिये या शर्म के मारे सुधर जाना चाहिये, पश्चाताप करना चाहिये या माफ़ी माँगना चाहिये? जब राष्ट्रीय शर्म घोषित हुई है तो देश का कुछ तो फ़र्ज़ बनता ही है, जैसे कि राष्ट्रीय आपदा के दौरान हर देशवासी का फ़र्ज़ बनता है कि वह कुछ न कुछ आर्थिक सहयोग करे, उसी प्रकार देशवासी किसी राष्ट्रीय शर्म पर कम से कम मुँह लटका कर तो बैठ ही सकते हैं।

साठ साल में सिर्फ़ दो बार ही राष्ट्रीय शर्म आई? आईये अब एक लिस्ट बनाते हैं कि गुजरात और उड़ीसा के दंगों के अलावा क्या-क्या राष्ट्रीय शर्म हो सकती हैं, या होना चाहिये (लेकिन हैं नहीं)। इस सूची में आप भी अपनी तरफ़ से एक-दो शर्म डाल सकते हैं, जब शर्म की यह सूची बहुत लम्बी हो जायेगी तब इसे माननीय प्रधानमंत्री को भेजा जायेगा, इस सूची को अनुमोदन के लिये कांग्रेस और भाजपा के अन्य नेताओं को भी भेजा जायेगा और उनसे पूछा जायेगा कि इसमें से कोई मुद्दा “शर्म” की श्रेणी में आता है या नहीं? (बिलकुल निचोड़कर भेजा जायेगा साहब, क्योंकि तब तक यह लिस्ट “शर्म” से पानी-पानी होकर भीग चुकी होगी) –



1) जम्मू के तीन लाख से ज्यादा पंडित अपने ही देश में शरणार्थी बने हुए हैं, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

2) गोधरा में कुछ हिन्दू जला दिये जाते हैं, तब किसी को शर्म नहीं आई?

3) आज़ादी के बाद 5000 से अधिक हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो चुके हैं (अधिकतर “सेकुलरों” की सरकारों में), यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

4) विश्व के कम भ्रष्ट देशों में भारत का स्थान बहुत-बहुत नीचे है और इसकी छवि एक “बिकाऊ लोगों वाले देश” के रूप में है, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

5) पिछले दस वर्षों में लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

6) 525 सांसदों में से दो तिहाई पर चोरी, हत्या, बलात्कार, लूटपाट और धोखाधड़ी के आरोप हैं, ये शर्म है या गर्व?

7) मुफ़्ती मुहम्मद और हज़रत बल के दबाव में आतंकवादी छोड़े जाते हैं, कंधार प्रकरण में घुटने टेकते हुए चार आतंकवादियों को छोड़ा गया, शर्म आती है या नहीं?

8) देश की 40 प्रतिशत से अधिक जनता गरीबी की रेखा के नीचे है, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

9) भारत नाम की “धर्मशाला” में लाखों लोग अवैध रूप से रह रहे हैं, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

10) सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद शाहबानो केस बदला, दिल्ली में अतिक्रमणकारियों को शह दी गई, जस्टिस रामास्वामी को बचाने के लिये सारे भ्रष्ट एक सुर में बोले थे, अफ़ज़ल गुरु, अबू सलेम, तेलगी सब मजे कर रहे हैं, कभी शर्म आई थी कि नहीं?

11) देश के करोड़ों बच्चों को दोनों समय का भोजन नहीं मिलता है, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

12) करोड़ों लोगों को प्राथमिक चिकित्सा तक उपलब्ध नहीं है, यह राष्ट्रीय शर्म है या नहीं?

मनमोहन जी, माना कि अपने “बॉस” को खुश करने के लिये ईसाईयों पर हमले को आपने “राष्ट्रीय शर्म” बता दिया, लेकिन ज़रा कभी इस “शर्म की लिस्ट” पर भी एक निगाह डाल लीजियेगा…

तो ब्लॉगर बन्धुओं, अब क्या सब कुछ मैं ही लिखूंगा? कभी तो कोई पोस्ट “छटाँक” भर की लिखने दो यार… चलो अपनी-अपनी तरफ़ से “एक-एक बाल्टी शर्म” इस लिस्ट में डालो और “आज तक की सबसे ज़्यादा सेकुलर सरकार” (जी हाँ, क्या कहा विश्वास नहीं होता? अरे भाई, राष्ट्रपति हिन्दू, उपराष्ट्रपति मुस्लिम, प्रधानमंत्री सिख और इन सबका बॉस "ईसाई", है ना महानतम सेकुलर) को भेजने का बन्दोबस्त करो…

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Terrorist attack & Indian Police Encounter
बंगलोर, अहमदाबाद, जयपुर के बाद अब दिल्ली का नम्बर भी आ गया, साफ़ है कि कोई भी शहर अब सुरक्षित नहीं रहा, बम धमाके और मौत किसी भी समय किसी भी परिवार को उजाड़ सकते हैं। इस देश में एक गृहमंत्री भी है, जिनका नाम है शिवराज पाटिल (नाम बहुत कम लोगों ने सुना होगा, ठीक वैसे ही जैसे कि उपराष्ट्रपति का नाम भी कम ही लोगों को मालूम होगा)। तो हमारे गृहमंत्री साहब मीटिंग करते हैं, सेमिनार करते हैं, निर्देश देते हैं, लेकिन होता-जाता कुछ नहीं है। वही बरसों पुरानी रट लगाये रहते हैं, "आतंकवादियों का कड़ा मुकाबला किया जायेगा…", "इस तरह की कायराना हरकतों को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा…", आदि-आदि। रेड अलर्ट और हाई अलर्ट तो एक सरकारी उत्सव की तरह हो गये हैं जो हर महीने-पन्द्रह दिन में आते-जाते रहते हैं, एक कर्मकाण्ड की तरह रेड अलर्ट मनाया जाता है, एक बेगारी की तरह हाई अलर्ट टाला जाता है। फ़िर से सब उसी ढर्रे पर लौट आते हैं, जैसे कुछ हुआ ही न हो… फ़िर अखबार और मीडिया देश की जनता की तारीफ़ों(?) के कसीदे काढ़ते हैं कि "देखो कैसे जनजीवन सामान्य हो गया…" "देश की जनता ने अलाँ-फ़लाँ त्यौहार जोरशोर से मनाकर आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब दिया…" इन मूर्खों को कौन समझाये कि क्या जनता अगले दिन अपने काम पर न जाये? या बम विस्फ़ोट हो गया है तो अगले दिन सभी लोग भूखे सो जायें? कोई कामधाम नहीं है क्या, जनजीवन सामान्य न करें तो क्या करें? सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ अपना काम नहीं कर रही, कम से कम आम जनता तो अपना काम करे, उसमें आतंकवाद को जवाब देने की बात कहाँ से आ गई? खैर… जो हो रहा है वह ऐसे ही चलता रहेगा, अब उम्मीद की किरण बची है पुलिस वालों से…

पुलिस वालों, अब तुम्हारे जागने का वक्त आ गया है यदि देशद्रोही नेताओं के भरोसे बैठे रहे और उनके घटिया आदेशों का पालन करते रहे तो एक दिन तुम्हारा परिवार भी ऐसे ही किसी बम विस्फ़ोट में मारा जायेगा तब हाथ मलने के सिवा कोई चारा न होगा। इस लेख के माध्यम से पुलिस वालों से एक अनुरोध है, विनती है, करबद्ध प्रार्थना है कि अब अपना पुलिसिया जलवा दिखाओ, अपने मुखबिरों की नकेल कसो, उनका नेटवर्क मजबूत करो, सूचनायें एकत्रित करो और "व्यक्तिगत स्तर पर देश की खातिर" मुठभेड़ों का जोरदार दौरदौरा चलाओ। चार-छः महीनों में पकड़े जा सकने वाले आतंकवादियों और देशद्रोहियों की लाशें बिछाओ। भले ही उसे आधिकारिक मुठभेड़ न दिखाओ, लेकिन देश के भले के लिये हर पुलिस वाला कम से कम दो-चार समाजविरोधी काँटों को तो साफ़ कर ही सकता है। "सेफ़ मुठभेड़" कैसे की जाती है, यह अनुभवी पुलिस वालों को बताने की ज़रूरत नहीं है, बस इस बात का ध्यान रखना होगा कि कहीं कोई बेगुनाह न मारा जाये, पहले पक्की सूचनायें इकठ्ठा करो, उनको जाँच-परख लो, फ़िर उस आतंकवादी को उड़ा दो। ऐसा दमनचक्र चलाओ कि देशद्रोहियों को पनाह देने वालों का सर चकरा जाये कि आखिर यह हो क्या रहा है? जिसके पास AK-47 बरामद हो वह कोई सन्त तो नहीं हो सकता, जिस घर से RDX और डिटोनेटर बरामद हो रहे हों वह कोई महात्मा का आश्रम तो हो नहीं सकता, उसे वहीं मार गिराओ, उस घर को नेस्तनाबूद कर दो, उस घर में रहने वाले पूरे परिवार को पुलिस की थर्ड डिग्री का मजा चखाओ। सेकुलर लोग कहेंगे कि उस परिवार का क्या दोष है वह तो निर्दोष है, लेकिन बम विस्फ़ोट में मारे जाने वाले भी तो निर्दोष ही होते हैं।



प्रिय पुलिस वालों, हम एक युद्धकाल में जी रहे हैं यहाँ शान्तिकाल के नियम लागू नहीं होते। हो सकता है कि गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाये, लेकिन अभी गेहूँ का पिसना अधिक महत्वपूर्ण है, अपनी तरफ़ से सावधानी बरतो, लेकिन यदि कोई बेगुनाह मारा भी जाता है तो उसमें छाती कूटने की आवश्यकता नहीं है, रोजाना कई बेगुनाह सड़कों पर कारों-ट्रकों द्वारा कुचले जाते हैं और अमीरज़ादे पैसा देकर छूट जाते हैं, और फ़िर यह तो देश की सुरक्षा का मामला है, गर्व का मामला है। हे पुलिस वालों, तुम नाकों-चौराहों पर पैसा खाते हो, मर्डर-झगड़ा होने पर दोनों पार्टियों से पैसा खाते हो, तुम FIR लिखने तक का पैसा खाते हो, ये काम तो तुम छोड़ने से रहे तो कम से कम एक नेक काम करो, महीने-दो महीने में एकाध बड़े गुण्डे का एनकाउंटर करो, यदि वह गुण्डा देशविरोधी काम में लिप्त पाया जाये तो जल्दी से जल्दी करो। एक बात होती है "राजदण्ड", दिखने में यह हवलदार के हाथ में एक मामूली डण्डे जैसा दिखता है, लेकिन उस डण्डे का जलाल ही अपराधियों में खौफ़ पैदा करता है। आतंकवादियों के दिलोदिमाग में इस राजदण्ड का ऐसा खौफ़ पैदा करो कि वे कुछ भी करने से पहले दस बार सोचें। हमारे देश की न्याय व्यवस्था पर भी भरोसा रखो, जो न्याय व्यवस्था अबू सलेम, दाऊद इब्राहीम, तेलगी, शहाबुद्दीन जैसों की "मददगार" है, वह कई एनकाउंटर करने के बावजूद तुम्हारी भी "मदद" करेगी, यदि देशद्रोही वकील हैं तो देशप्रेमी वकील भी हैं इस देश में… इसलिये बेखौफ़ होकर इस युद्धकाल में अपना कर्तव्य निभाओ, लोग यह नहीं याद रखते कि पंजाब में कितने बेगुनाह मारे गये, लोग याद रखते हैं केपीएस गिल को…।

और एक अन्तिम बात… "सेकुलर" और "मानवाधिकारवादी" नाम के दो आस्तीन के साँपों (ये साँप अफ़ज़ल को गले लगाये रहेंगे, बांग्लादेशी घुसपैठियों की राशनकार्ड और पैसों से मदद करते रहेंगे, आतंकवादियों को बिरयानी खिलाकर छोड़ते रहेंगे) से दूर रहने की कोशिश करना… जनता तुम्हें लाख-लाख दुआयें देगी जो तुम्हारे बच्चों के ही काम आयेगी। तो उठो और काम में जुट जाओ, शुरुआत जेल में बन्द आतंकवादियों से ही करो… सबसे पहले उन्हें एक दिन छोड़कर खाने में जुलाब की चार गोली खिलाओ…, चुपके से एड्स के इंजेक्शन लगाओ… "असली गोली" बाद में, फ़िर आगे क्या और कैसे करना है यह भी मुझे बताना पड़ेगा क्या???

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Raj Thakre Mumbai Anti-Hindi Movement
सबसे पहले एक सवाल – कितने लोग हैं जिन्होंने मेगास्टार रजनीकान्त को चेन्नई शहर के किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में हिन्दी में बोलते सुना है? रजनीकान्त की मातृभाषा मराठी है, उनके जीवन का काफ़ी सारा समय कर्नाटक में बीता, फ़िर वे तमिल के सुपरस्टार बने। इसी तमिलनाडु के एक और हीरो हैं करुणानिधि, जिन्होंने हिन्दी विरोध की ही राजनीति से अपना जीवन शुरु किया था और आज इस मुकाम तक पहुँचे हैं। बहुत लोगों को याद है कि साठ के दशक में तमिलनाडु में सभी दुकानों पर तमिल भाषा के बोर्ड लगाना अनिवार्य किया गया था, और हिन्दी के साइनबोर्ड पर कालिख पोती गई थी। आज लगभग वही काम मुम्बई में राज ठाकरे करने की कोशिश कर रहे हैं (उनके सफ़ल होने की सम्भावना फ़िलहाल नहीं के बराबर है), तो उस पर इतना बवाल क्यों मचाया जा रहा है? दूसरी तरफ़ जया बच्चन हैं जो लगभग दंभी अन्दाज़ में ठाकरे का मखौल उड़ाते हुए कहती हैं कि “हम यूपी वाले लोग हैं, तो हम हिन्दी में ही बोलेंगे…”। सोचा जा सकता है कि जिस परिवार को मुम्बई में 30-40 साल होने आये, मुम्बई ने ही उन्हें पहचान दी, रोजी-रोटी दी, आज भी वह “हम यूपी वाले हैं…” की मानसिकता से बाहर नहीं आ पाया है, तो इसमें किसे दोष देना चाहिये? निश्चित रूप से यह सिर्फ़ मुम्बई में ही सम्भव है, कोलकाता या चेन्नई में नहीं।

अक्सर मुम्बई के “मेट्रो कल्चर” की दलील और दुहाई दी जाती है, क्या चेन्नई और कोलकाता मेट्रो नहीं हैं? फ़िर वहाँ जाकर रहने वाला व्यक्ति कैसे तमिल और बांग्ला को अपना लेता है? और वही व्यक्ति मुम्बई में अपना सारा जीवन मराठी का एक शब्द बोले बिना निकाल लेता है? क्या “मेट्रो कल्चर” का मतलब स्थानीय भाषा और संस्कृति की उपेक्षा करने का लाइसेंस है? आम मध्यमवर्गीय मराठी व्यक्ति मुम्बई की सीमा से लगभग बाहर हो चुका है, आज मुम्बई सिर्फ़ और सिर्फ़ व्यापारियों, शेयर दलालों, धनपतियों और अन्य राज्यों से आये लोगों का शहर बन चुका है। जब राज ठाकरे इस मुद्दे को उठाते हैं तो बुद्धिजीवियों और चैनलों में तत्काल उन्हें “लगभग आतंकवादी” घोषित करने की होड़ लग जाती है, जबकि करुणानिधि यदि दिल्ली में भी प्रेस कान्फ़्रेंस आयोजित करते हैं तो भी तमिल में ही बोलते हैं, लेकिन कहीं कोई बात नहीं होती। हिन्दीभाषियों द्वारा मराठी भाषा को मुम्बई में जितने हल्के तौर पर लिया जाता है, उतना वह तमिल भाषा को चेन्नई में नहीं ले सकते, वह भी तब जबकि मराठी भाषा की लिपि देवनागरी है, तमिल या मलयालम की तरह द्रविड नहीं। तमिल के मुकाबले, मराठी सीखना बेहद आसान है, लेकिन फ़िर भी ऐसी घोर उपेक्षा? इसमें किसका दोष है? क्या राज ठाकरे का, कि वह मराठी में बोर्ड लगाने की बात कह रहे हैं और सार्वजनिक कार्यक्रमों में मराठी में बोलने का आग्रह कर रहे हैं, या फ़िर उनका जो अभी भी “हम यूपी वाले हैं…” की मानसिकता में जी रहे हैं?

एक शख्स हैं श्री साईसुरेश सिवास्वामी, तमिल हैं और लगभग 23 वर्ष पूर्व नौकरी के सिलसिले में मुम्बई आये थे। उन्होंने हाल के विवाद पर रेडिफ़.कॉम पर एक लेख लिखा है, जिसमें वे कहते हैं “जब मैं जवान था तब चेन्नई में हिन्दी साइनबोर्ड को कालिख पोतने वाला वहाँ “लोकल हीरो” समझा जाता था, और जब मैं मुम्बई आया तो यह देखकर हैरान था कि यहाँ मराठी का नामोनिशान मिटता जा रहा है और कोई भी साईनबोर्ड मराठी में नहीं है। यहाँ तक कि मुझे खुद शर्म महसूस होती है कि इतने वर्ष मुम्बई में बिताने के बावजूद मेरी हिन्दी अधिक शुद्ध है, मराठी की बनिस्बत…”। बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं कि “शिवसेना ने भी मराठी पर उतना जोर नहीं दिया, क्योंकि उसे महानगरपालिका से आगे बढ़कर राज्य की सत्ता चाहिये थी जो सिर्फ़ मराठी वोटों से नहीं मिल सकती थी, अन्ततः शिवसेना ने भी सिर्फ़ बम्बई को “मुम्बई” बनाकर इस मुद्दे से अपना हाथ खींच लिया…” लेकिन बाहर से आने वालों का यह फ़र्ज़ बनता था कि वह स्थानीय भाषा का सम्मान करते, उसके साथ चलते और उसे दिल से अपनाते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि मराठी माणुस स्वभावतः बेहद सहिष्णु, लोकतान्त्रिक और अपने काम से काम रखने वाला होता है। उसके सीधेपन को उसकी सहमति जानकर अन्य राज्यों के लोग आते गये, हिन्दी थोपते गये, पैसे के जोर पर मुम्बई में ज़मीनें हथियाते गये और एक आम मराठी व्यक्ति धीरे-धीरे मुम्बई से बाहर हो गया। राज ठाकरे को भी मराठी से बहुत प्रेम है ऐसा नहीं है, साफ़ है कि वह भी अपनी राजनीति को चमकाने के लिये ऐसा कर रहा है, लेकिन उसने जो मुद्दा उठाया है वह कई स्थानीय लोगों के दिल के तार हिलाता है। मंत्रालय और मुख्य कार्यालयों का कामकाज या तो हिन्दी में होता है या अंग्रेजी में, मराठी कहीं नहीं है। रोज़ाना नये अंग्रेजी स्कूल खुलते जा रहे हैं, जहाँ हिन्दी “भी” पढ़ाई जाती है, लेकिन मराठी स्कूलों की स्थिति अत्यन्त दयनीय है, ज़ाहिर है कि यह राज्य सरकार का दोष है, लेकिन जो व्यक्ति मुम्बई में रहकर इलाहाबाद में स्कूल खोल सकता है, उसका फ़र्ज़ बनता है कि वह एकाध मराठी स्कूल मुम्बई में भी खोले।



लेकिन राज ठाकरे बहुत देर कर चुके हैं, उनके इस मराठी-अमराठी मुद्दे की पकड़ बनाने के लिये मुम्बई में इतने मराठी बचे ही नहीं हैं कि राज ठाकरे की राजनीति पनप सके। पिछले “मुम्बई मनपा” चुनावों में राज ठाकरे इसका मजा चख चुके हैं। राज ठाकरे द्वारा मराठी की बात करते ही अन्य प्रान्तों के लोग उनके खिलाफ़ लामबन्द हो जाते हैं और वे अकेले पड़ जाते हैं, ऐसा ही होता रहेगा, क्योंकि मुम्बई में बाहर से आने वालों की संख्या अब इतनी ज़्यादा हो चुकी है कि अब वहाँ यह मुद्दा चलने वाला नहीं है। यह मुम्बई के स्थानीय मराठियों का दुर्भाग्य तो है, लेकिन इसके जिम्मेदार वे खुद ही हैं जो उन्होंने चेन्नई जैसा आन्दोलन नहीं चलाया और बर्दाश्त करते रहे।

हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है, सप्ताह और पखवाड़ा मनाया जा रहा है, अच्छी बात है। हिन्दी-हिन्दी भजने वाले सिर्फ़ एक बार करुणानिधि को हिन्दी सिखाकर दिखायें, हिन्दी भाषा की अलख उत्तर-पूर्व के राज्यों (जहाँ से हिन्दीभाषियों को भगाया जा रहा है) और तमिलनाडु में जलाकर दिखायें। हालांकि अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण के कारण अब स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है और दक्षिण के लोग भी हिन्दी सीखना चाहते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि बगैर इसके उत्तर भारत में काम चलाना मुश्किल होगा, लेकिन यह स्थिति दक्षिण से बाहर जाने वालों की है, दक्षिण में जाकर बसने वालों को वहाँ की स्थानीय भाषा सीखना-बोलना अभी भी आवश्यक है, जबकि मुम्बई में ऐसा नहीं है। दरअसल हिन्दी प्रांतों के लोग क्षेत्रीय भाषाओं को गम्भीरता से लेते ही नहीं हैं, यदि सीखना भी पड़े तो मजबूरी में ही सीखते हैं। वे इस बात को नहीं समझते कि उस क्षेत्रीय भाषा का भी अपना विराट साहित्य संसार है। वे हिन्दी को ही श्रेष्ठ मानते हैं, और क्षेत्रीय भाषा को संख्याबल से दबाने का प्रयास करते हैं। इसके ठीक उलट मराठी व्यक्ति है जो जिस प्रान्त में जाता है वहाँ की भाषा, बोलचाल का लहजा और पहनावा तत्काल पकड़ लेता है, मैं आपको बनारस के कई मराठी परिवार दिखा सकता हूँ, जिनकी धोती, मुँह में पान और अवधी तथा खड़ी बोली को सुनकर आप विश्वास नहीं करेंगे कि यह व्यक्ति ठेठ मराठी है। मराठी व्यक्ति कभी अन्य राज्यों में “गुट” नहीं बनाता, दबंगता नहीं दिखाता, न ही राजनीति में कोई खास दिलचस्पी रखता है। एक ज़माने में कर्नाटक से लेकर अटक (अफ़गानिस्तान) तक मराठा साम्राज्य फ़ैला हुआ था, लेकिन क्या आज की तारीख में महाराष्ट्र छोड़कर किसी भी अन्य राज्य में मराठी वोट बैंक नाम की कोई चीज़ है? क्या अन्य राज्यों में मराठियों ने कभी राजनैतिक ताकत जताने या सामाजिक दबाव बनाने की कोशिश की है? महाराष्ट्र से बाहर कितने विधायक और सांसद मराठी हैं? इन प्रश्नों के जवाबों को अन्य राज्यों में बसे हुए विभिन्न राज्यों के लोगों को लेकर उसका प्रतिशत निकालिये, स्थिति साफ़ हो जायेगी।

मेरा जन्म मध्यप्रदेश में हुआ है और कर्मस्थली भी यही है और मुझे इस पर गर्व है। मेरी हिन्दी कई हिन्दीभाषियों से बेहतर है, गाँधीसागर बाँध के कारण मध्यप्रदेश के हितों को चोट लगने पर मैं राजस्थान को गरियाता हूँ, और विद्युत मंडल के बँटवारे में यदि मध्यप्रदेश के साथ अन्याय हुआ तो छत्तीसगढ़ को भी खरी-खोटी सुनाता हूँ, और ऐसा ही होना चाहिये। जो भी व्यक्ति जहाँ रहे, जिस जगह काम करे, जहाँ अपना आशियाना बनाये, रोजी-रोटी कमाये-खाये, उसे वहाँ की भाषा-संस्कृति में घुल-मिल जाना चाहिये, तभी सामाजिक समरसता बनेगी। ये नहीं कि रहते-खाते-कमाते तो दुबई में हैं, लेकिन अस्पताल खोलेंगे आज़मगढ़ में, नागरिक तो हैं कनाडा के लेकिन सड़क बनवायेंगे टिम्बकटू में…



यह थोड़ा विषयान्तर हो सकता है लेकिन इस मौके पर विदेशों में बसे भारतीयों को भी इस मुद्दे से सीखने की आवश्यकता है, ऐसा क्यों होता है कि भारतीय जिस देश में जाते हैं वहाँ के स्थानीय समाज को वे नहीं अपनाते हैं। कई परिवार ऐसे हैं जो 30-40 साल से ब्रिटेन-कनाडा-न्यूजीलैण्ड में बसे हुए हैं, वहीं नौकरी-व्यवसाय करते हैं, उनकी नागरिकता तक ब्रिटिश है, वे भविष्य में कभी भी भारत नहीं आने वाले, लेकिन ताज़िन्दगी वे “भारत-भारत” भजते रहते हैं, यहाँ की सरकार भी उन्हें भारतवंशी(?) कहकर बुलाती रहती है, आखिर क्यों? फ़िर कैसे वहाँ का स्थानीय समाज उनसे जुड़ेगा? “हम तो यूपी वाले हैं…” की मानसिकता वहाँ भी दिखाई देती है और फ़िर जर्मनी, फ़िजी, अरब देशों, मलेशिया, केन्या सभी जगहों पर भारतीयों(?) पर हमले होते रहते हैं। रहे होंगे कभी आपके वंशज भारतीय, लेकिन अब तो आप और आपके बच्चे इंग्लैण्ड के नागरिक हैं, फ़िर भारत इंग्लैण्ड को क्रिकेट में हराये तो आप तिरंगा क्यों लहराते हैं? और फ़िर अपेक्षा करते हैं कि स्थानीय व्यक्ति आपका सम्मान करे?

यह सारा खेल पेट से जुड़ा हुआ है, हर जगह स्थानीय व्यक्ति को लगता है कि बाहर से आया हुआ व्यक्ति उसकी रोजी-रोटी छीन रहा है, इसका फ़ायदा नेता उठाते हैं और इसे भाषा का मुद्दा बना डालते हैं, और दोनों व्यक्तियों में आपसी सामंजस्य न होने के कारण आग और भड़कती जाती है। राज ठाकरे और करुणानिधि में कोई अन्तर नहीं है, दोनों ही क्षेत्रीयतावाद की राजनीति करते हैं, भाषा के विवाद पैदा करते हैं, अन्तर सिर्फ़ इतना है कि राज ठाकरे गालियाँ खा रहे हैं…और करुणानिधि मलाई। राज ठाकरे को गालियों से मलाई का सफ़र तय करने में अभी काफ़ी समय लगेगा… क्योंकि मराठी लोग ही उनका साथ नहीं देने वाले… लेकिन फ़िर भी स्थानीय भाषा के सम्मान और उसे “दिल से” अपनाने का मुद्दा तो अपनी जगह पर कायम रहेगा ही…

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Unmarried Prime Minister of India
किसी भी व्यक्ति का अविवाहित रहना या न रहना उसका व्यक्तिगत मामला होता है। लेकिन जब यह परिस्थिति राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में काम करने वालों की होती है तब इसे मीडिया व्यक्तिगत नहीं रहने देता। फ़िलहाल देश में कुछ ऐसे राजनैतिक व्यक्तित्व उभर रहे हैं जो कि एक लक्ष्य को लेकर अविवाहित रहे हैं। कुछ उस वक्त की परिस्थितियाँ और कुछ उसकी विचारधारा का प्रवाह, लेकिन कई व्यक्तियों ने आजीवन अविवाहित रहने का फ़ैसला किया है।

देश के राजनैतिक परिदृश्य पर इस वक्त सबसे आगे और सबसे तेज तीन नाम चमक रहे हैं, और संयोग देखिये कि तीनों ही अविवाहित हैं। पहला नाम है राहुल गाँधी का जो कि 39 वर्ष के होने के बावजूद "फ़िलहाल" अविवाहित हैं, दूसरा नाम है बसपा नेत्री मायावती (53 वर्ष) का और तीसरा नाम है नरेन्द्र मोदी (59 वर्ष) का। यदि इन तीनों व्यक्तित्वों की पार्टियाँ सही समय पर सही गतिविधियाँ और राजनैतिक पैंतरेबाजी करें तो निश्चित जानिये कि भारत का अगला प्रधानमंत्री कोई "अविवाहित" होगा (जो कि न सिर्फ़ भारत बल्कि विश्व में भी काफ़ी कम ही देखने में आया है)। इन तीनों नामों में राहुल गाँधी को इस क्लब में जोड़ने का एकमात्र कारण उनका "फ़िलहाल" अविवाहित होना ही है, लेकिन उनकी उम्र काफ़ी कम है इसलिये भविष्य के बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन बाकी के दोनो व्यक्तित्वों के बारे में कहा जा सकता है कि उनके अविवाहित ही रहने की सम्भावना काफ़ी है। सवाल है कि क्या अविवाहित रहने वाले सामाजिक और राजनैतिक व्यक्तित्व अपने लक्ष्यों के प्रति अधिक समर्पित होते हैं? क्या उनका अविवाहित रहना उनकी विचारधारा और पार्टी तथा देश के लिये फ़ायदेमन्द होता है? लगता तो ऐसा ही है…



सबसे पहले बात करते हैं मायावती के बारे में। उल्लेखनीय है कि कांशीराम भी आजीवन अविवाहित रहे, उन्होंने अपना सारा जीवन समाज के दबे-कुचले वर्गों को संगठित करने में लगा दिया। सरकारी नौकरी में रहे, "बामसेफ़" नाम का संगठन तैयार किया, जिसका विस्तारित राजनैतिक रूप "बहुजन समाज पार्टी" के रूप में देश के सामने आया। कांशीराम ने सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा देकर अपने-आप को पार्टी के काम के लिये झोंक दिया। वे अपनी "पेन" वाली थ्योरी के इतने कायल थे कि हर जगह, हर सभा में, हर इंटरव्यू में वह "खड़े पेन" का उदाहरण अवश्य देते थे। बात थी विचारधारा की, सो उन्होंने पार्टी को बनाने में दिन-रात एक कर दिया, न अपनी परवाह की न अपने विवाह के बारे में सोचा। उन्होंने देश और उत्तरप्रदेश के सघन दौरे करके पार्टी को इतना मजबूत बना दिया कि अब उत्तरप्रदेश में कोई भी सरकार बसपा के बगैर बन नहीं सकती। इन्हीं कांशीराम ने जब मायावती में प्रतिभा देखी तभी उन्हें कह दिया था कि तुम IAS बनने के चक्कर में मत पड़ो, एक दिन तुम्हें मुख्यमंत्री बनना है…सैकड़ों IAS तुम्हारे आगे-पीछे हाथ बाँधे घूमते नज़र आयेंगे… कांशीराम ने जो कहा सच कर दिखाया। आज मायावती सिर्फ़ मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि प्रधानमंत्री पद की भी दावेदार हैं। बसपा नेत्री मायावती ने जब अपने उत्तराधिकारी के बारे में सार्वजनिक बयान दिया था, तो लोगों ने उस नाम के बारे में कयास लगाने शुरु कर दिये थे, खोजी पत्रकारों की बात मानें तो वह शख्स हैं राजाराम, जो कि फ़िलहाल मध्यप्रदेश के बसपा प्रभारी हैं। वे भी अविवाहित हैं और सारा जीवन बसपा को समर्पित करने का मन बना चुके हैं।

सवाल उठता है कि क्या यदि कांशीराम विवाह कर लेते तो पत्नी और बच्चों की जिम्मेदारी के चलते इतना बड़ा आंदोलन वे खड़ा कर पाते? मेरे खयाल से तो नहीं… हर कोई इस बात को स्वीकार करेगा कि शादी के बाद व्यक्ति की प्राथमिकतायें बदल जाती हैं। उस व्यक्ति पर अपने परिवार की देखभाल, भरण-पोषण की जिम्मेदारी आयद होती है, रिश्तेदारियाँ निभाने का दबाव होता है जो उसे समाजसेवा या राजनीति में झोंक देने में बाधक होता है। ज़ाहिर सी बात है कि उसके अपने परिवार के प्रति कुछ कर्तव्य होते हैं जिन्हें पूरा करने के लिये उसे परिवार को समय देना ही पड़ेगा।

महात्मा गाँधी के पुत्र की आत्मकथा (जिस पर फ़िल्म "गाँधी माय फ़ादर" भी बनी) में उन्होंने कहा है कि गाँधीजी सामाजिक और राजनैतिक आंदोलनों में व्यस्त रहने के कारण परिवार को अधिक समय नहीं दे पाते थे और उनके बच्चे अकेलापन (पिता की कमी) महसूस करते थे। बहुत से पुरुषों और महिलाओं को जीवन में कभी न कभी ऐसा महसूस होता है कि यदि मेरे पीछे परिवार की जिम्मेदारियाँ न होतीं तो शायद मैं और बेहतर तरीके से और खुलकर काम कर सकता था, ये और बात है कि कर्तव्य और जिम्मेदारी के अहसास के कारण यह विचार कुछ ही समय के लिये आते हैं। ऐसे में सहज ही लगता है कि यदि राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में काम करने वाले लोग अविवाहित रहते हैं तो वे अपने लक्ष्यों के प्रति अधिक सजग, सक्रिय और समर्पित हो सकते हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में तो यह बहुत पुरानी परम्परा है कि पूर्णकालिक स्वयंसेवक अविवाहित ही रहेंगे, और यह उचित भी है क्योंकि स्वयंसेवकों को सुदूर क्षेत्रों में अभावों में कई-कई दिनों तक प्रचार के लिये जाना पड़ता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं भाजपा के पितृपुरुष कुशाभाऊ ठाकरे। आज भाजपा जो भी है, जितनी भी है उसके पीछे कुशाभाऊ ठाकरे का अमिट योगदान है। उत्तर-पूर्व के राज्यों और दक्षिण में आज संघ का जो भी प्रसार है वह सिर्फ़ और सिर्फ़ कुशाभाऊ ठाकरे की अनथक मेहनत का नतीजा है। कुल एक सूटकेस ही जीवन भर उनकी गृहस्थी और सम्पत्ति रहा। दो-तीन जोड़ कपड़े, संघ का साहित्य और सादी चप्पलें पहन कर ताउम्र उन्होंने यात्राओं में बिता दी, रहना-खाना संघ कार्यालयों में और पूरा जीवन संघ को समर्पित। RSS में ऐसे कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है। अब तक हुए तमाम सरसंघचालक, जेपी माथुर, अटलबिहारी वाजपेयी, नानाजी देशमुख, नरेन्द्र मोदी जैसे सैकड़ों लोग हैं जो कि शायद विवाह कर लेते तो पता नहीं संघ और भाजपा आज कहाँ होते।



कम्युनिस्ट पार्टियों में भी लगभग यही ट्रेण्ड रहा है उनके भी कई नेता अविवाहित रहे और पार्टी की विचारधारा के प्रचार-प्रसार में उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। नक्सलवादी आन्दोलन के प्रवर्तक कहे जाने वाले कानू सान्याल भी अविवाहित हैं। चर्च और ईसाईयत के प्रचार में लगे हुए पादरी और नन भी आजीवन अविवाहित रहने का व्रत लेते हैं ताकि वे अपना काम पूर्ण निष्ठा से कर सकें, क्योंकि विवाह करने से व्यक्ति कई प्रकार के बन्धनों में बँध जाता है। गाहे-बगाहे इन कार्यकर्ताओं के बारे में मीडिया और अन्य माध्यमों में यौन कदाचरण के मामले सामने आते रहते हैं। देश-विदेश में चर्च में बिशपों, पादरियों और ननों द्वारा घटित ऐसी कई घटनायें सामने आती रहती हैं (ये और बात है कि संघ का व्यक्ति यदि इसमें पाया जाये तो हल्ला ज्यादा होता है) कुछ समय पहले संघ के एक प्रचारक संजय जोशी के बारे में भी इस तरह की एक सीडी मीडिया में आई थी, उसमें कितनी सच्चाई है यह तो सम्बन्धित पक्ष ही जानें, लेकिन इतना कहा जा सकता है कि इस प्रकार का व्यवहार पूर्णरूपेण एक मानव स्वभाव और मानवीय गलती है। इस दुनिया में शायद ही कोई ऐसा पुरुष या स्त्री होगी जिसमें कभी भी यौनेच्छा जागृत नहीं हुई हो, चाहे वह कितना भी बड़ा संत-महात्मा-पीर क्यों न हो। ऐसे में इन अविवाहित व्यक्तियों द्वारा जाने-अनजाने कभी-कभार इस प्रकार की गलती होना कोई भूचाल लाने वाली घटना नहीं है, यदि अपराध के दोषी हैं तो सजा अवश्य मिलना चाहिये। दिक्कत तब होती है जब "सेकुलर"(?) लोग अटलबिहारी वाजपेयी के जवानी के किस्से चटखारे ले-लेकर सुनाते हैं लेकिन नेहरू नामक "रंगीले रतन" को भूल जाते हैं। खैर यह विषय अलग ही है…

राहुल गाँधी के बारे में सुना गया है कि वे किसी कोलम्बियन कन्या से शादी करना चाहते हैं, लेकिन शायद बात कहीं अटक रही है। यदि वे विवाह कर लेते हैं तो फ़िर "अविवाहित क्लब" के नेताओं में सबसे कद्दावर दो ही लोग बचेंगे, मायावती और नरेन्द्र मोदी। दोनों ही अपनी प्रशासनिक क्षमता साबित कर चुके हैं, दोनों का खासा जनाधार है, दोनों ही अपनी-अपनी पार्टी में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, दोनों "चुनाव-जिताऊ" भाषणों के लिये मशहूर हैं। मायावती तो "भेंट" पर सबसे अधिक टैक्स देने वाली राजनेता बन चुकी हैं, मोदी पर भी फ़िलहाल तो कोई बड़ा भ्रष्टाचार का मामला सामने नहीं आया है। ऐसे में हो सकता है कि भारत को अगले कुछ ही समय में एक अविवाहित प्रधानमंत्री मिल जाये। अविवाहित प्रधानमंत्री होने के तीन फ़ायदे तो तत्काल दिखाई दे रहे हैं, पहला वह अपना पूरा समय काम में बितायेगा, परिवार के लिये नहीं। दूसरा यह कि उसके किसी बेटे-बेटी-बहू आदि को आतंकवादी किडनैप नहीं कर सकते (क्योंकि हैं ही नहीं), तीसरा उस व्यक्ति पर वंशवाद और भाई-भतीजावाद का आरोप भी नहीं लग सकता। मायावती ने तो पहले ही कह दिया कि उनका उत्तराधिकारी उनके परिवार का कोई व्यक्ति नहीं होगा, जो कि तारीफ़ की बात तो है। संघ के सरसंघचालकों ने कभी भी अपने परिवार के किसी व्यक्ति को उत्तराधिकारी नामज़द नहीं किया, जबकि वे चाहते तो कर सकते थे और उसे संघ के लाखों कार्यकर्ता स्वीकार भी कर लेते, लेकिन फ़िर कांग्रेस और बाकियों में क्या अन्तर रह जाता?

तो प्रिय पाठकों, देश के प्रधानमंत्री के तौर पर एक अविवाहित व्यक्ति के कुछ फ़ायदे मैंने गिना दिये हैं, कुछ आप गिना दीजिये। साथ ही राहुल गाँधी, मायावती और नरेन्द्र मोदी में से आपका वोट किसे मिलेगा यह भी बताईये…

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सोमवार, 29 सितम्बर 2008 17:35

पोप का साम्राज्य और उनका दुःख…

Pope & Conversion in India
जी न्यूज़ पर चर्च के बारे में एक सीरिज़ आ रही है, जिसमें बताया गया है कि भारत सरकार के बाद इस देश में भूमि का सबसे बड़ा अकेला मालिक है “चर्च”, जी हाँ, “चर्च” के पास इस समय समूचे भारत में 52 लाख करोड़ की भू-सम्पत्ति है। इसमें से लगभग 50 प्रतिशत ज़मीन उसके पास अंग्रेजों के समय से है, लेकिन बाकी की ज़मीन तमाम केन्द्र और राज्य सरकारों ने उसे धर्मस्व कार्य हेतु “दान” में दी है।

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि धर्म के नाम पर सबसे अधिक रक्तपात इस्लाम और ईसाई धर्मावलम्बियों द्वारा किया गया है। ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करना, सेवा करने के लिये स्कूल और अस्पताल खोलना आदि चर्च के मुख्य काम हैं, लेकिन असल में इसका मकसद ईसाईयों की संख्या में वृद्धि करना होता है। गरीब, ज़रूरतमंद, अशिक्षित लोग इनके फ़ेंके हुए झाँसे में आ जाते हैं, रही-सही कसर भारी-भरकम पैसे और नौकरी का लालच पूरी कर देता है। “चर्च” की सत्ता और धन-सम्पत्ति के अकूत भण्डार के बारे में जब-तब कई पुस्तकों और जर्नलों में प्रकाशित होता रहता है। भारत में चर्च फ़िलहाल “गलत” कारणों से चर्चा में है, ज़ाहिर है कि “धर्मान्तरण” के मामले को लेकर। इन घटनाओं पर “पोप” भी बहुत दुखी हैं और उन्होंने भारत में अपने प्रतिनिधियों और भारत सरकार (इसे सोनिया गाँधी पढ़े) के समक्ष चिन्ता जताई है।



पोप का दुखी होना स्वाभाविक भी है, जिस “एकमात्र सच्चे धर्म” का जन्म 2008 वर्ष पहले समूची धरती से “विभिन्न गलत अवधारणाओं को मिटाने के लिये” हुआ था, उस पर भारत जैसे देश में हमले हो रहे हैं। चर्च और पोप की सत्ता जिस “प्रोफ़ेशनल” तरीके से काम करती है, उसे देखकर बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनियाँ भी शर्मा जायें। जिस तरह विशाल कम्पनियों में “बिजनेस प्लान” बनाया जाता है, ठीक उसी तरह रोम में ईसाई धर्म के प्रचार के लिये “वार-प्लान” बनाया जाता है। यह “योजनायें” विभिन्न देशों, विभिन्न क्षेत्रों, विभिन्न धर्मों के लिये अलग-अलग होती हैं। इन सभी योजनाओं को “गहन मार्केटिंग रिसर्च” और विश्लेषण के बाद तैयार किया जाता है। जिस प्रकार एक कम्पनी अपने अगले आने वाले 25 वर्षों का एक “प्रोजेक्शन” तैयार करती है, उसी प्रकार इसे भी तैयार किया जाता है। ऐसा बताया जाता है कि वर्तमान में ऐसी 1590 योजनायें चल रही हैं जो कि सन् 2025 तक बढ़कर 3000 हो जायेंगी। सन् 2025 के “प्रोजेक्शन” के अनुसार बढ़ोतरी इस प्रकार की जाना है (यानी कि टारगेट यह दिया गया है) वर्तमान 35500 ईसाई संस्थायें बढ़कर 63000, धर्म परिवर्तन के मामले 35 लाख से बढ़कर 53 लाख, 4100 विभिन्न मिशनरी संस्थायें बढ़कर 6000, 56 लाख धर्मसेवकों की संख्या बढ़ाकर 65 लाख (पूरे यूरोप की समूची सेना से भी ज्यादा संख्या) किया जाना है। वर्तमान में चर्च की कुल सम्पत्ति (भारत में) 13,71,000 करोड़ है (जिसमें खाली पड़ी ज़मीन शामिल नहीं है), यह राशि भारत के GDP का 60% से भी ज्यादा है, इसे भी बढ़ाकर 2025 तक 40,00,000 करोड़ किया जाना प्रस्तावित है।

इवेलैंजिकल चर्च द्वारा लाखों की संख्या में साहित्य बाँटा जाता है। वर्तमान में चर्च द्वारा 20 करोड़ बाइबल, 70 लाख बुकलेट, 1,70,000 मिशनरी साहित्य, 60000 पत्रिकायें और 18000 लेख वितरित किये जाते हैं, सन् 2025 तक इसे बढ़ाकर दोगुना करने का लक्ष्य दिया गया है। इसी प्रकार चर्च द्वारा अलग-अलग देशों में संचालित विभिन्न रेडियो और टीवी स्टेशनों की संख्या 4050 से बढ़ाकर 5000 करने का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है। हालांकि चर्च द्वारा अपरोक्ष रूप से “खरीदे हुए” कई चैनल चल ही रहे हैं, लेकिन इससे उनका नेटवर्क और भी मजबूत होगा। बजट देखें तो हाल-फ़िलहाल प्रति व्यक्ति को ईसाई बनाने का खर्च लगभग 1.55 करोड़ रुपये आता है (सारे खर्चे मिलाकर) जिसे 2025 तक बढ़ाकर 3.05 करोड़ प्रति व्यक्ति कर दिया गया है।

दुनिया भर के चार्टर्ड अकाउंटेण्ट्स के लिये एक खुशखबरी है। चर्च द्वारा इन चार्टर्ड अकाउंटेंट्स को किसी भी बड़ी से बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनी से अधिक भुगतान किया जाता है। चर्च द्वारा हिसाब-किताब रखने के लिये लगभग 4800 करोड़ रुपये ऑडिट फ़ीस के रूप में दिये जाते हैं। लेकिन पोप की मुश्किलें यहीं से शुरु भी होती हैं, एक अनुमान के अनुसार चर्च के पैसों में घोटाले का आँकड़ा बेहद खतरनाक तरीके से बढ़ रहा है, जिसके सन् 2025 तक बहुत ज़्यादा बढ़ जाने की आशंका है। इस प्रकार चर्च एक संगठित MNC की तरह काम करता है, भले ही इसमें आर्थिक घोटाले होते रहते हैं, अधिक जानकारी के लिये International Bulletin of Missionary Research (IBMR, जनवरी 2002 का अंक) देखा जा सकता है।



पोप की मुश्किलें भारत में और बढ़ जाती हैं जब जयललिता और नरेन्द्र मोदी जैसे “ठरकी” लोग धर्मान्तरण के खिलाफ़ अपने-अपने राज्यों में कानून लागू कर देते हैं, उनकी देखादेखी शिवराज और वसुन्धरा जैसे लोग भी ऐसा कानून बनाने की सोचने लगते हैं। यदि ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जायेगी तो पोप 2000 साल पुराने इस सबसे पवित्र धर्म को कैसे बचायेंगे? उनकी विशाल “सेना” क्या करेगी? जबकि उसमें से भी 5 लाख लोग प्रतिवर्ष रिटायर हो जाते हैं, उससे अधिक की नई भरती की जाती है। “चर्च” दुनिया की सबसे बड़ी रोज़गार निर्माता “कम्पनी” है। जयललिता और मोदी दुनिया के उस इलाके से आते हैं जहाँ के गरीबों को “सेवा” और “पवित्र धर्म” की सबसे अधिक ज़रूरत है। IBMR की रिपोर्ट के अनुसार भारत में किसी भी गरीब को ईसाई बनाने का खर्च दुनिया के किसी विकसित देश के मुकाबले 700 गुना (जी हाँ 700 गुना) सस्ता है। भारत पोप के लिये सबसे “सस्ता बाजार” है, लेकिन जयललिता और मोदी जैसे लोग उनका रास्ता रोकना शुरु कर देते हैं। पोप और उनके भारतीय “भक्त” इस प्रयास में हैं कि इस प्रकार के कानून और न बनने पायें, जो बने हैं उन्हें भी हटा लिया जाये, टीवी चैनलों पर चर्च की छवि एक “सेवाभावी”, “दयालु” और “मददगार” की ही दिखाई दे (ये और बात है कि नागालैण्ड जैसे राज्य में जैसे ही ईसाई बहुसंख्यक होते हैं, हथियारों के बल पर बाकी धर्मों के लोगों को वहाँ से खदेड़ना शुरु कर देते हैं), और इस कार्य में वे सफ़ल भी हुए हैं, क्योंकि उन्हें भारत के भीतर से ही “सेकुलरिज़्म” के नाम पर बहुत लोग समर्थन(?) के लिये मिल जाते हैं।

तो कहने का तात्पर्य यह है कि पोप अपने विशाल साम्राज्य के बावजूद भारत के मामले में बहुत दुःखी हैं, आइये उन्हें सांत्वना दें… और हाँ यदि आप में भी “सेवा”(?) की भावना हिलोरें लेने लगी हो, तो एक NGO बनाईये, चर्च से पैसा लीजिये और शुरु हो जाईये… भारत जैसे देश में “सेवा” का बहुत “स्कोप” है…


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Lata Mangeshkar Dinanath Mangeshkar Ashirwad
लता मंगेशकर का जन्मदिन हाल ही में मनाया गया। लता मंगेशकर जैसी दिव्य शक्ति के बारे में कुछ लिखने के लिये बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। उन पर और उनके बारे में इतना कुछ लिखा जा चुका है कि अब शब्दकोष भी फ़ीके पड़ जाते हैं और उपमायें खुद बौनी लगती हैं। व्यस्तता की वजह से उस पावन अवसर पर कई प्रियजनों के आग्रह के बावजूद कुछ नहीं लिख पाया, लेकिन देवी की आराधना के लिये अष्टमी का दिन ही क्यों, लता पर कभी भी, कुछ भी लिखा जा सकता है। साथ ही लता मंगेशकर के गीतों में से कुछ अच्छे गीत छाँटना ठीक उसी प्रकार है जैसे किसी छोटे बच्चे को खिलौने की दुकान में से एक-दो खिलौने चुनने को कहा जाये।

फ़िर भी कई-कई-कई पसन्दीदा गीतों में से एक गीत के बारे में यहाँ कुछ कहने की गुस्ताखी कर रहा हूँ। गीत है फ़िल्म “आशीर्वाद” का, लिखा है गुलज़ार जी ने तथा धुन बनाई है वसन्त देसाई ने। गीत के बोल हैं “एक था बचपन…एक था बचपन…”, यह गीत राग गुजरी तोड़ी पर आधारित है और इसे सुमिता सान्याल पर फ़िल्माया गया है। पहले आप गीत सुनिये, उसकी आत्मा और गुलज़ार के बोलों को महसूस कीजिये फ़िर आगे की बात करते हैं…



यू-ट्यूब पर यह गीत इस लिंक पर उपलब्ध है…

इस गीत को ध्यान से सुनिये, वैसे तो लता ने सभी गीत उनकी रूह के भीतर उतर कर गाये हैं, लेकिन इस गीत को सुनते वक्त साफ़ महसूस होता है कि यह गीत लता मंगेशकर उनके बचपन की यादों में बसे पिता यानी कि दीनानाथ मंगेशकर को लक्षित करके गा रही हों… उल्लेखनीय है कि दीनानाथ मंगेशकर की पुत्री के रूप में उन्हें वैसे ही ईश्वरीय आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। दीनानाथ मंगेशकर 1930 में मराठी रंगमंच के बेताज बादशाह थे। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि उस वक्त के सोलह हजार रुपये महीने आज क्या कीमत रखते होंगे? जी हाँ उस वक्त दीनानाथ जी की मासिक आय 16000 रुपये थी, भेंट-उपहार-पुरस्कार वगैरह अलग से। उनका कहना था कि यदि ऊपरवाले की मेहरबानी ऐसे ही जारी रही तो एक दिन मैं पूरा गोआ खरीद लूँगा। उच्च कोटि के गायक कलाकार दीनानाथ मंगेशकर और उनकी भव्य नाटक कम्पनी ने समूचे महाराष्ट्र में धूम मचा रखी थी। वक्त ने पलटा खाया, दीनानाथ जी नाटक छोड़कर फ़िल्म बनाने के लिये कूद पड़े और उसमें उन्होंने जो घाटे पर घाटा सहन किया वह उन्हें भीतर तक तोड़ देने वाला साबित हुआ। मात्र 42 वर्ष की आयु में सन् 1942 में उच्च रक्तदाब की वजह से उनका निधन हो गया। उस वक्त लता सिर्फ़ 13 वर्ष की थीं और उन्हें रेडियो पर गाने के अवसर मिलने लगे थे, उन पर पूरे परिवार (माँ, तीन बहनें और एक भाई) की जिम्मेदारी आन पड़ी थी, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और देवप्रदत्त प्रतिभा के साथ उन्होंने पुनः शून्य से संघर्ष शुरु किया और “भारत रत्न” के उच्च स्तर तक पहुँचीं।



मृत्युशैया पर पड़े दीनानाथ जी ने रेडियो पर लता की आवाज़ सुनकर कहा था कि “अब मैं चैन से अन्तिम साँस ले सकता हूँ…” लता के सिर पर हाथ फ़ेरते हुए उन्होंने कहा था कि “मैंने अपने जीवन में बहुत धन कमाया और गंवाया भी, लेकिन मैं तुम लोगों के लिये कुछ भी छोड़कर नहीं जा रहा, सिवाय मेरी धुनों, एक तानपूरे और ढेरों आशीर्वाद के अलावा…तुम एक दिन बहुत नाम कमाओगी…”। लता मंगेशकर ने उनके सपनों को पूरा किया और आजीवन अविवाहित रहते हुए परिवार की जिम्मेदारी उठाई। यह गीत सुनते वक्त एक पुत्री का अपने पिता पर प्रेम झलकता है, साथ ही उस महान पिता की जुदाई की टीस भी शिद्दत से उभरती है, जो सुनने वाले के हृदय को भेदकर रख देती है… यह एक जेनेटिक तथ्य है कि बेटियाँ पिता को अधिक प्यारी होती हैं, जबकि बेटे माँ के दुलारे होते हैं। गीत के तीसरे अन्तरे में जब लता पुकारती हैं “मेरे होंठों पर उनकी आवाज़ भी है…” तो लगता है कि वाकई दीनानाथ जी का दिया हुआ आशीर्वाद हम जैसे अकिंचन लोगों को भीतर तक तृप्त करने के लिये ही था।

फ़िल्म इंडस्ट्री ने कई कलाकारों को कम उम्र में दुनिया छोड़ते देखा है, जिनकी कमी आज भी खलती है जैसे गुरुदत्त, संजीव कुमार, स्मिता पाटिल आदि… मास्टर दीनानाथ भी ऐसी ही एक दिव्य आत्मा थे, एक तरह से यह गीत पूरी तरह से उन्हीं को समर्पित है… गुलज़ार – जो कि “इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त कदम रस्ते, कुछ तेज कदम राहें…” या फ़िर “हमने देखी हैं उन आँखों की महकती खुशबू…” जैसे अजब-गजब बोल लिखते हैं उन्होंने भी इस गीत में सीधे-सादे शब्दों का उपयोग किया है, गीत की जान है वसन्त देसाई की धुन, लेकिन समूचे गीत पर लता-दीनानाथ की छाया प्रतिध्वनित होती है। यह भी एक संयोग है कि फ़िल्म में सुमिता सान्याल को यह गीत गायिका के रूप में रेडियो पर गाते दिखाया गया है।

आज लता मंगेशकर हीरों की अंगूठियाँ और हार पहनती हैं, लन्दन और न्यूयॉर्क में छुट्टियाँ बिताती हैं, पुणे में दीनानाथ मंगेशकर के नाम से विशाल अस्पताल है, और मुम्बई में एक सर्वसुविधायुक्त ऑडिटोरियम, हालांकि इससे दस गुना वैभव तो उन्हें बचपन में ही सुलभ था, और यदि दीनानाथ जी का अल्पायु में निधन न हुआ होता तो??? लेकिन वक्त के आगे किसी की कब चली है, मात्र 13 वर्ष की खेलने-कूदने की कमसिन आयु में लता मंगेशकर पर जो वज्रपात हुआ होगा, फ़िर जो भीषण संघर्ष उन्होंने किया होगा उसकी तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते। पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते स्वयं अविवाहित रहना भी तो त्याग की एक पराकाष्ठा है… इस गीत में लता का खोया हुआ बचपन और पिता से बिछुड़ने का दर्द साफ़ झलकता है। दुनिया में फ़ैले दुःख-दर्द, अन्याय, शोषण, अत्याचार को देखकर कभी-कभी ऐसा लगता है कि “ईश्वर” नाम की कोई सत्ता नहीं होती, परन्तु लता मंगेशकर की आवाज़ सुनकर फ़िर महसूस होता है कि नहीं… नहीं… ईश्वर ने अपने कुछ अंश धरती पर बिखेरे हुए हैं, जिनमें से एक है लता मंगेशकर…

गीत के बोल इस प्रकार हैं…

एक तथा बचपन, एक था बचपन
बचपन के एक बाबूजी थे, अच्छे-सच्चे बाबूजी थे
दोनों का सुन्दर था बन्धन…
एक था बचपन…

1) टहनी पर चढ़के जब फ़ूल बुलाते थे
हाथ उचके तो टहनी तक ना जाते थे
बचपन के नन्हें दो हाथ उठाकर वो
फ़ूलों से हाथ मिलाते थे…
एक था बचपन… एक था बचपन

2) चलते-चलते, चलते-चलते जाने कब इन राहों में
बाबूजी बस गये बचपन की बाहों में
मुठ्ठी में बन्द हैं वो सूखे फ़ूल अभी
खुशबू है सीने की चाहों में…
एक था बचपन… एक था बचपन

3) होठों पर उनकी आवाज भी है
मेरे होंठों पर उनकी आवाज भी है
साँसों में सौंपा विश्वास भी है
जाने किस मोड़ पे कब मिल जायेंगे वो
पूछेंगे बचपन का अहसास भी है…
एक था बचपन, एक था बचपन…
छोटा सा नन्हा सा बचपन…

एक और बात गौर करने वाली है कि अब “बाबूजी” शब्द भी लगभग गुम चुका है। वक्त के साथ “बाबूजी” से पिताजी हुए, पिताजी से पापा हुए, पापा से “डैड” हो गये और अब तो बाबूजी को सरेआम धमकाया जाता है कि “बाबूजी जरा धीरे चलो, बिजली खड़ी, यहाँ बिजली खड़ी, नैनों में चिंगारियाँ, गोरा बदन शोलों की लड़ी…” बस और क्या कहूँ, मैंने पहले ही कहा कि “वक्त के आगे सभी बेबस हैं…”।
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चलते-चलते दो लाईन – अक्सर सोचता हूँ कि इस प्रकार के और लेख लिखूँ, लेकिन “सेकुलर” और “कांग्रेस” नाम के शब्द सुनते ही तलुवे का खून मस्तक में पहुँच जाता है और मैं फ़िर से अपनी “सामाजिक जिम्मेदारी” निभाने निकल पड़ता हूँ…


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Alliance between Church and Naxalites India
नक्सली कमाण्डर पांडा ने एक उड़िया टीवी चैनल को दी गई भेंटवार्ता में दावा किया कि स्वामी लक्ष्मणानन्द को उन्होंने ही मारा है। पांडा का कहना था कि चूंकि लक्ष्मणानन्द सामाजिक अशांति(???) फ़ैला रहे थे, इसलिये उन्हें खत्म करना आवश्यक था। जिस प्रकार त्रिपुरा में NFLT नाम का उग्रवादी संगठन बैप्टिस्ट चर्च से खुलेआम पैसा और हथियार पाता है, उसी प्रकार अब यह साफ़ हो गया है कि उड़ीसा और देश के दूरदराज में स्थित अन्य आदिवासी इलाकों में नक्सलियों और चर्च के बीच एक मजबूत गठबंधन बन गया है, वरना क्या कारण है कि इन इलाकों में काम करने वाली मिशनरी संस्थाओं को तो नक्सली कोई नुकसान नहीं पहुँचाते, लेकिन गरीब और मजबूर आदिवासियों को नक्सली अपना निशाना बनाते रहते हैं?

कुरेदने पर पांडा ने स्वीकार किया कि नक्सलियों के उड़ीसा स्थित कैडर में ईसाई युवकों की संख्या ज्यादा है, उन्होंने माना कि उनके संगठन में ईसाई लोग बहुमत में हैं, उड़ीसा के रायगड़ा, गजपति, और कंधमाल में काम कर रहे लगभग सभी नक्सली ईसाई हैं।

पांडा की इस स्वीकृति से दो सवाल उठते हैं, पहला तो यह कि लक्ष्मणानन्द की हत्या की जिम्मेदारी अब वे क्यों ले रहे हैं? सबसे पहले इन्हीं माओवादियों कहा कि हाँ हमने यह हत्या की है, फ़िर उनका बयान आया कि नहीं हम इस प्रकार की धार्मिक हत्याएं नहीं करते, और अब फ़िर एक इंटरव्यू आया कि हाँ हमने हत्या की है, आखिर क्या मतलब है इसका? असल में शायद पांडा को उड़ीसा के अन्दरूनी इलाकों में हिन्दुओं की इतनी तीव्र प्रतिक्रिया का अंदेशा नहीं था, और अब चूंकि उनके काडर में ही फ़ूट पड़ने की नौबत आ गई तो उन्हें यह जिम्मेदारी लेना सूझा। दूसरा, यह कि कहीं यह स्वीकृति मिशनरियों को हिन्दुओं के हमले से बचाने की साजिश तो नहीं? जिससे कि मिशनरियों को “पवित्र गाय” दर्शाया जाये।

दूसरी तरफ़ देश में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग नाम का एक “पालतू बिजूका” भी है, जो तभी काम करता है जब किसी राज्य में मुस्लिम या ईसाईयों पर हमले और अत्याचार होते हैं। इस अल्पसंख्यक आयोग के लिये हिन्दू कहीं भी अल्पसंख्यक नहीं होते। जब भी किसी राज्य में जैसे नागालैण्ड, जहाँ हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, वहाँ उन पर अत्याचार होते हैं, या फ़िर कश्मीर जैसे राज्य जहाँ से लगभग सभी हिन्दुओं को भगा दिया गया है, वहाँ इस आयोग के सदस्य झाँकने भी नहीं जाते। इस नकली आयोग को मिजोरम से भगाये जा रहे हिन्दू भी नहीं दिखते, इस आयोग को त्रिपुरा में शरणार्थी कैम्पों में रह रहे 30000 हिन्दू भी दिखाई नहीं देते। इन्हें चिन्ता होती है सिर्फ़ गुजरात और उड़ीसा की।



अब उड़ीसा में राष्ट्रपति शासन लगाने की माँग की जा रही है, बजरंग दल और विहिप पर प्रतिबन्ध लगाने के लिये जोर-शोर से गला फ़ाड़ा जा रहा है, चारों ओर यह माहौल तैयार करने की कोशिश जारी है कि मुस्लिम आतंकवाद नाम की कोई चीज़ नहीं होती या मिशनरी सिर्फ़ सेवा करती हैं, बाकी के लोग (यानी संघ परिवार) सिर्फ़ भड़काने में लगे हुए हैं। हो सकता है कि सोनिया को खुश करने के लिये शिवराज पाटिल और मनमोहन मिलकर उड़ीसा में राष्ट्रपति शासन लगा भी दें, आखिर सत्ता और पावर मैडम के हाथ में है, लेकिन कांग्रेस यह भूल न ही करे तो बेहतर होगा। पहले ही कांग्रेस हरियाणा, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश यानी सिर्फ़ तीन बड़े राज्यों में सत्ता में है, कहीं अगले आम चुनाव में वह और भी सिमटकर क्षेत्रीय पार्टी न बन जाये। राष्ट्रपति शासन लगाने की यह माँग बेहद बचकाना इसलिये भी है कि जब 1993 में मुम्बई बम विस्फ़ोट हुए तब भी, और मुम्बई में ही सदी के सबसे भीषण दंगे हुए तब भी, महाराष्ट्र की सुधाकरराव नाईक सरकार को बर्खास्त नहीं किया गया था। जबकि कांग्रेसी लोग सत्ता के इतने लालची हैं कि सैयद सिब्ते रजी (झारखंड के खलनायक) और रोमेश भंडारी (उत्तरप्रदेश के खलनायक) जैसे राज्यपालों और गुलाम नबी आज़ाद जैसे गैर-जनाधारी नेता को पालते-पोसते हैं।

सूचना के अधिकार से प्राप्त जानकारी के अनुसार केरल में 63 पादरियों पर मर्डर, बलात्कार, अवैध वसूली और हथियार रखने के मामले विभिन्न पुलिस थानों में दर्ज हैं। केरल पुलिस द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार पिछले सात वर्षों में दो पादरियों को हत्या के जुर्म में सजा मिल चुकी है, जबकि दस अन्य को “हत्या के प्रयास” की धाराओं में चार्जशीट किया गया है। माकपा का कैडर, नक्सली और चर्च ये तीनों मिलकर एक घातक “कॉम्बिनेशन” बनाते हैं। इसके लिये काफ़ी हद तक हमारे आस्तीन में पल रहे “सेकुलर” भी जिम्मेदार हैं। इन लोगों के आँखों पर “धर्मनिरपेक्षता” की ऐसी मजबूत पट्टी बँधी हुई है कि इन्हें यह भी दिखाई देना बन्द हो गया है कि देश का हित किसमें है, राष्ट्रवाद क्या है और देशद्रोह किसे कहते हैं। सेकुलर लोग धर्मान्तरण या मुस्लिम आतंकवाद को खतरा तभी मानेंगे जब यह उनके द्वार तक पहुँच जायेगा, और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

सरकार को चाहिये कि सभी मिशनरियों के खातों की बारीकी से जाँच की जाये, उनके सम्बन्धों के बारे में खुफ़िया जानकारी एकत्रित की जाये और एक स्वतन्त्र जाँच एजेंसी से चर्च और नक्सलियों के आपसी अन्तर्सम्बन्धों पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की जाये। लेकिन सोनिया गाँधी के रहते यह सम्भव नहीं है, क्योंकि अपने उड़ीसा दौरे के समय राहुल गाँधी एक रात बगैर सुरक्षा एजेंसियों को बताये अचानक गायब हो गये थे और बाद में पता चला कि वे घने जंगलों में एक मिशनरी के कामकाज को देखने(???) चले गये थे, इसलिये जनता को ही जागरूक बनना होगा, चुनावों में वोट देने के लिये घर से निकलना होगा और कांग्रेस नाम के इस कैंसर को देश से हटाना होगा… हिन्दुओं के सब्र का इम्तहान लिया जा रहा है, अब देखना यही है कि यह बाँध कब फ़ूटता है, एक बार गुजरात में यह फ़ूट चुका है, लेकिन “सेकुलर” और कांग्रेसी उससे कोई सबक सीखने को तैयार नहीं हैं…

(भाग-2 में जारी रहेगा…)


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Alliance between Church and Naxalites India
(गत भाग से जारी…) इस बात के साफ़ सबूत हैं कि कुछ अन्तराष्ट्रीय ईसाई संस्थायें उत्तर-पूर्व के राज्यों में आतंकवाद को खुला समर्थन दे रही हैं, उनका मकसद है समूचे उत्तर-पूर्व को भारत से अलग करना। इन विभिन्न आतंकवादी संगठनों को चर्च की ओर से पैसा और हथियार मुहैया करवाये जा रहे हैं।

त्रिपुरा
इस राज्य में नेशनल लिबरेशन ऑफ़ त्रिपुरा (NFLT) की स्थापना दिसम्बर 1989 में हुई थी। अपने स्थापना के समय से ही इसे बैप्टिस्ट चर्च का खुला समर्थन हासिल है, हालांकि इस संगठन पर 1997 में प्रतिबन्ध लगा दिया गया था, लेकिन इसकी गतिविधियाँ बांगलादेश से सतत जारी हैं। नोआपारा बैप्टिस्ट चर्च के सचिव नागमनलाल हालम को सीआरपीएफ़ द्वारा सन् 2000 में आतंकवादियों को सीमापार करवाने और 60 जिलेटिन की छड़ें रखने के आरोपों में गिरफ़्तार किया गया था। इसी चर्च के दो अन्य कर्मचारियों को NFLT को हथियार सप्लाई करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। हालम ने स्वीकार किया था कि वे NFLT के लिये हथियार खरीदने में बिचौलिये की भूमिका निभाते थे। एक और चर्च अधिकारी जतना कोलोई को भी NFLT के शिविर में गुरिल्ला प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिये गिरफ़्तार किया जा चुका है।

त्रिपुरा के जंगलों में आदिवासियों को जबरिया धर्मान्तरित करने का धंधा जोरशोर से चलता है। NFLT पर कई बार स्थानीय आदिवासियों ने आरोप लगाये हैं कि वह धर्मान्तरण के जरिये उनकी स्थानीय संस्कृति को खतरे में डाल रहा है, लेकिन दिल्ली की लूली-लंगड़ी सरकारों तथा त्रिपुरा के मार्क्सवादियों की शह पर यह काम धड़ल्ले से जारी रहा। अब स्थिति यह है कि वहाँ के स्थानीय लोग अल्पसंख्यक हो गये हैं और दुर्गापूजा जैसा वार्षिक त्यौहार भी वे शान्ति से नहीं मना पाते। NFLT के घोषणापत्र में कहा गया है कि वे त्रिपुरा में 'क्राईस्ट" का राज्य लाकर रहेंगे। जमातिया नाम का आदिवासी समुदाय अपने परम्परागत रूप से मार्च में भगवान "गादिया" की पूजा करता आया है, जिसे वे शिव का अवतार मानते हैं, लेकिन चर्च और आतंकवादियों ने यह पूजा क्रिसमस के दिन करने हेतु "आदेश" दिया है। इन आतंकवादी समूहों को ऑस्ट्रेलिया व न्यूजीलैण्ड के बैप्टिस्ट चर्चों से भी लगातार पैसा मिलता है। जो भोले-भाले आदिवासी इनकी बात नहीं मानते, उनकी औरतों के साथ अपहरण और बलात्कार किया जाता है, और उन्हें ईसाई धर्म मानने पर मजबूर कर दिया जाता है, और जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अन्य हिन्दू संगठन वहाँ काम करने जाते हैं, तो उन्हें धमकियाँ दी जाती हैं और उन पर जानलेवा आक्रमण किये जाते हैं। अगस्त 2000 में स्वामी शान्तिकलि महाराज की हत्या कर दी गई थी। इसी प्रकार दिसम्बर 2000 में जमातिया कबीले के मुख्य पुजारी लबकुमार जमातिया की भी हत्या की गई, उनका भी कसूर वही था जो कि लक्ष्मणानन्द सरस्वती का था, यानी कि हिन्दुओं को धर्मान्तरण के खिलाफ़ जागृत करना। सिर्फ़ सन 2001 में त्रिपुरा में कुल 826 आतंकवादी हमले हुए और जिसमें 405 लोग मारे गये और 481 आदिवासियों का अपहरण हुआ।



नागालैण्ड
नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैण्ड (NSCN) के दो गुट हैं, दोनों ही गुट ईसाईयों द्वारा ही संचालित हैं और इन्हें वर्ल्ड काउंसिल ऑफ़ चर्चेस से आर्थिक मदद मिलती रहती है, चीन भी इन्हें हथियारों से मदद करता रहता है। NSCN के न्यूयॉर्क, जिनेवा और हेग में अपने ऑफ़िस हैं, जिस पर डिस्प्ले बोर्ड लगे हैं "पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ नागालैण्ड"। नागालैण्ड के इन दोनों आतंकवादी गुटों ने संयुक्त राष्ट्र में अब तक दो बार स्वतन्त्र नागालैण्ड की गुहार लगाई है। नागालैण्ड में इन दोनों गुटों की सरकार चलती है, वे लोगों से पैसा वसूलते हैं। भारत सरकार के कर्मचारियों की एक तिहाई तनख्वाह "नागालैण्ड टैक्स" के रूप में छीन ली जाती है। नागालैण्ड में अधिकतर सरकारी बैंक बन्द हो चुके हैं, क्योंकि उसमें से भारी धनराशि लूटी जा चुकी है। इन संगठनों के लेटरहेड पर लिखा हुआ है "नागालैण्ड फ़ॉर क्राईस्ट"। स्वतन्त्रता के बाद त्रिपुरा में ईसाईयों की संख्या नगण्य थी, जबकि आज 1,20,000 है, जो कि पिछली जनगणना (1991) के अनुसार 90% का उछाल है। अरुणाचल प्रदेश की स्थिति और भी भयावह है, उस राज्य में सन् 1961 में 1,710 ईसाई थे, लेकिन आज सिर्फ़ 40-45 सालों में बढ़कर एक करोड़ से ऊपर हो गये और चर्चों की संख्या हो गई है 780… आंध्रप्रदेश, जहाँ एक ईसाई मुख्यमंत्री हैं, में दूरदराज के इलाकों में रोज-ब-रोज एक नया चर्च खुलता है, क्या वाकई में ईसाई संस्थाएं इतनी समाजसेवा कर रही हैं? लेकिन यह सारी सूचनायें कांग्रेस सरकार और सेकुलरों के लिये या तो बेकार हैं या फ़िर "संघ का दुष्प्रचार" भर हैं।

लालच की हद तो यह है कि धर्मान्तरण होने के बाद चर्च से भारी आर्थिक मदद लेने के बावजूद ये "भगोड़े" लोग भारत सरकार से आरक्षण का लाभ लेने के लिये हल्ला करते हैं और सेकुलर लोग जो गरीबों के हमदर्द होने का दम भरते हैं, वास्तविक दलितों और पिछड़े वर्गों के हक मारकर इन्हें आरक्षण और अन्य सुविधायें दिलवाने की पैरवी करते रहते हैं, यानी धर्मान्तरित होने वाले को दोहरी मलाई मिलती है। चर्च भी इसमें अपना फ़ायदा देखते हुए इसका समर्थन करता है, जबकि असल में जो लोग धर्मान्तरित होकर ईसाई बनते हैं उनके लिये चर्च भी अलग होता है और उनसे दोहरा और अपमानजनक बर्ताव जारी रहता है, मूलरूप से ईसाई व्यक्ति इन्हें कभी भी दिल से स्वीकार करने को तैयार नहीं होता। चर्च भी अपना "कथित भारतीयकरण" करने में लगा हुआ है, आजकल दलितों को धर्मान्तरण के बाद नाम बदलने पर जोर नहीं दिया जाता, दूरदराज के गाँवों में जहाँ बहुत ज्यादा अशिक्षा है, वहाँ पादरी गाँव में जाते हैं व अपने साथ यीशु की धातु की मूर्ति ले जाते हैं व भगवान की एक मूर्ति लकड़ी की भी ले जाते हैं, फ़िर दोनो को आग में डालते हैं, स्वाभाविक है कि भगवान की मूर्ति जल जाती है, लेकिन यीशु की मूर्ति सही-सलामत निकलती है, बस फ़िर भोले-भाले आदिवासियों का "ब्रेन-वॉश" करने में कितनी देर लगती है। हालांकि इस प्रकार के चमत्कार दिखाकर तो हिन्दुओं के बाबा भी अपनी दुकानदारियाँ चलाये हुए हैं, लेकिन यहाँ मामला साफ़-साफ़ देश की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। चर्च का भारतीयकरण करने के फ़ेर में आजकल छोटे-छोटे गाँवों में "फ़ादर" सफ़ेद की बजाय गेरुए अथवा पीले वस्त्र पहनने लगे हैं ताकि किसी को कोई शक न हो, लेकिन मौका मिलते ही वे अपने "असली रूप" में आ जाते हैं यानी कि भगवानों को भला-बुरा कहते हुए यीशु का गुणगान करना। यह स्थिति मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा धर्मान्तरण किये जाने से अधिक खतरनाक है, क्योंकि औरंगजेब जैसे मुस्लिम आक्रांता जब हिन्दुओं का धर्म परिवर्तित करवाते थे, तब नाम, भेष और रहन-सहन सभी बदलना पड़ता था, लेकिन ईसाई संस्थायें दलितों को ईसाई भी बना रही हैं और उनके नाम भी नहीं बदलतीं फ़िर धर्म परिवर्तन के बाद भी आरक्षण की बैसाखी मिलती रहती है, और असली गरीब दलितों (जिन्होंने धर्म परिवर्तन नहीं किया) का हक मारा जाता है…

शायद भारत ही विश्व एकमात्र ऐसा देश होगा जहाँ बहुसंख्यक आबादी को ही दबकर रहना पड़ता हो… लेकिन UPA की अध्यक्षा जब देश की सर्वेसर्वा हों, आस्तीन में सेकुलर बैठे हुए हों, मीडिया भी इनके साथ हो तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये…

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Truth about Christian Riots in Mangalore
गत कुछ दिनों से उड़ीसा और कर्नाटक केन्द्र की कांग्रेस सरकार के निशाने पर है। उड़ीसा के कंधमाल में स्वामी लक्षमणानन्द सरस्वती की हत्या के कारण दंगे और अशांति पैदा हुई है, जबकि कर्नाटक में अभी इतनी तीव्रता से तनाव नहीं फ़ैला है, कुछ चर्चों पर हमले अवश्य हुए हैं लेकिन उड़ीसा के मुकाबले यह कुछ भी नहीं है। फ़िर भी केन्द्र की कांग्रेस सरकार दोनों राज्य सरकारों पर बराबर का दबाव बनाये हुए है और लगातार धारा 356 के उपयोग से बर्खास्त करने की धमकियाँ दी जा रही हैं।

दोनों राज्यों की ज़मीनी स्थिति में काफ़ी अन्तर होने के बावजूद ऐसा क्यों किया जा रहा है, इसे हम बाद में देखेंगे, पहले यह बात जान ली जाये कि आखिर कर्नाटक में ऐसा क्या हुआ है जिसके कारण तनाव और फ़साद धीरे-धीरे फ़ैलता जा रहा है। किसी भी भारतीय अखबार, और न ही किसी विदेशी अखबार ने इस हिंसा और तोड़फ़ोड़ के कारणों की तह में जाने की कोशिश की। एक ईसाई संगठन है जिसका नाम है “न्यू लाईफ़ वॉइस” (वेबसाईट यह है)। यह संगठन विदेशी पैसों पर चलने वाला एक मिशनरी केन्द्र है। कर्नाटक में इस संगठन की शुरुआत वीएम सैमुअल और उनकी पत्नी सोमी ने सन् 1983 में शुरु की थी, इस संगठन ने 1987 तक मंगलोर में काम किया फ़िर इसका मुख्यालय बंगलोर में स्थानान्तरित किया गया। इस संगठन का मुख्य काम ईसाई धर्म का प्रचार करना और प्रभु यीशु का गुणगान करना है। दक्षिण भारत में इस संगठन ने कई चर्चों की स्थापना की है। इनके लोग मंगलोर में विभिन्न ठिकानों (बस स्टैण्ड, रेल्वे स्टेशन, अस्पताल आदि) पर खड़े होकर अपना प्रचार करते हैं। इसके स्वयंसेवक ग्रामीणों और अनपढ़ लोगों को चर्च के फ़ादर से “मिलवाने”(?) ले जाते हैं। पहली मुलाकात में उस व्यक्ति को 2500/- रुपये दिये जाते हैं तथा उसे वेलनकन्नी आश्रम (तमिलनाडु) में ले जाया जाता है, जहाँ उसे 3000/- रुपये और दिये जाते हैं। यदि वह व्यक्ति पूरी तरह से ईसाई बन जाता है और नाम भी बदल लेता है तो उसे Incentive के रूप में और 10,000/- रुपये दिये जाते हैं। इस प्रकार एक MLM चलाने वाली कम्पनी की तरह Incentive की लड़ी तैयार की जाती है (यानी कि यदि एक व्यक्ति किसी अन्य दो अन्य व्यक्तियों को ईसाई बनाये तो उसे बोनस मिलेगा, इस प्रकार “चेन” चलाई जाती है)। शुरुआत में माथे से तिलक हटाने, मन्दिरों में न जाने और घरों में यीशु की तस्वीरें लगाने के छोटे Incentive होते हैं।



यहाँ तक तो किसी तरह वहाँ के हिन्दू अपना गुस्सा दबाये रहे, लेकिन इस संगठन ने एक पुस्तक प्रकाशित की जिसका नाम रखा गया “सत्य दर्शिनी”, और इस बुकलेटनुमा पुस्तक को बड़े पैमाने पर गाँव-गाँव में वितरित किया गया। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद लोग भड़क गये और यही इन दंगों का मुख्य कारण रहा (जो कि सेकुलरों को नहीं दिखाई देगा), पेश हैं इस पुस्तक के विवादास्पद अंशों का अनुवाद –

1) “…इन्द्रसभा की नृत्यांगना उर्वशी विष्णु की पुत्री थी, जो कि एक वेश्या थी…”।
2) “…गुरु वशिष्ठ एक वेश्या के पुत्र थे…”।
3) “…बाद में वशिष्ठ ने अपनी माँ से शादी की, इस प्रकार के नीच चरित्र का व्यक्ति भगवान राम का गुरु माना जाता है…” (पेज 48)।
4) “…जबकि कृष्ण खुद ही नर्क के अंधेरे में भटक रहा था, तब भला वह कैसे वह दूसरों को रोशनी दिखा सकता है। कृष्ण का चरित्र भी बहुत संदेहास्पद रहा था। हमें (यानी न्यूलाईफ़ संगठन को) इस झूठ का पर्दाफ़ाश करके लोगों को सच्चाई बताना ही होगी, जैसे कि खुद ब्रह्मा ने ही सीता का अपहरण किया था…” (पेज 50)।
5) “…ब्रह्मा, विष्णु और महेश खुद ही ईर्ष्या के मारे हुए थे, ऐसे में उन्हें भगवान मानना पाप के बराबर है। जब ये त्रिमूर्ति खुद ही गुस्सैल थी तब वह कैसे भक्तों का उद्धार कर सकती है, इन तीनों को भगवान कहना एक मजाक है…” (पेज 39)।

यह तो एक झलक भर थी, इस प्रकार के दुष्प्रचार लगातार किये गये और हिन्दू संगठन भड़क गये और उन्होंने चर्चों में तोड़फ़ोड़ शुरु कर दी। इसके बाद तमाम अन्य ईसाई संगठनों ने बयान जारी करके कहा कि हमारा “न्यूलाईफ़ फ़ाऊंडेशन” से कोई लेनादेना नहीं है, और धर्मांतरण करवाने वाले संगठन कोई और हैं और इसमें “चर्च” का कोई हाथ नहीं है। लेकिन ये सब “मुखौटे” वाली बातें हैं। सभी जानते हैं कि सच्चाई क्या है। गत कुछ वर्षों में, (खासकर सुनामी के बाद) तमिलनाडु के तटीय इलाकों में रामेश्वरम से लेकर कन्याकुमारी तक के गाँवों में ईसाईयों का जनसंख्या 2 प्रतिशत से बढ़कर 10 प्रतिशत तक हो गई है। जब उड़ीसा में एक निहत्थे और 84 वर्ष के बूढ़े स्वामी जी की हत्या की जाती है तब कोई “सेकुलर” या कोई “मानवाधिकारवादी” आगे नहीं आता, जब वाराणसी, अहमदाबाद में बम विस्फ़ोट होते हैं तो चैनलों पर गुहार लगाई जाने लगती है कि इसे “मुस्लिम आतंकवाद” का नाम न दिया जाये, आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता… आदि। लेकिन जब कर्नाटक और उड़ीसा में हिन्दू भड़कते हैं तो तत्काल उन्हें “हिन्दू संप्रदायवादी”, “बजरंग दली” घोषित कर दिया जाता है।

सिमी से “बैलेंस” बनाये रखने के लिये बजरंग दल पर प्रतिबन्ध लगाने की बात की जाती है, जबकि यदि सिमी या अल-कायदा जितनी “ताकत” वाला एक भी हिन्दू संगठन भारत में होता तो उनकी इधर देखने की भी हिम्मत नहीं होती थी, असल में हिन्दुओं के लगाये हुए बम नकली और फ़ुस्सी टाइप के होते हैं (जैसा कि ठाणे के गड़करी नाट्यगृह में लगाये हुए थे, या कि जैसे कानपुर में बरामद हुए थे)। हिन्दू अपने बहुसंख्यक (90 करोड़ से ज्यादा) होने पर ही इतराते रहते हैं, लेकिन हकीकत में हिन्दुओं के घर में “ढंग का” एक भी हथियार नहीं मिलेगा, ज्यादा से ज्यादा एकाध लाठी मिल जायेगी या सब्जी काटने वाला चाकू, बस… अहिंसा-अहिंसा का जाप करते रहो और कश्मीर से लेकर असम तक जूते खाते रहो, इस देश को कांग्रेस ने यही दिया है। दंगों के एक भुक्तभोगी का यह बयान आँखें खोलने वाला है कि यदि पुलिस हिन्दुओं की मदद न करे तो इस देश में हिन्दू लोग गाजर-मूली की तरह काटे जायें…

अब आते हैं उस बात पर कि क्यों कर्नाटक और उड़ीसा को एक ही तराजू में रखकर तौला जा रहा है, जबकि उड़ीसा में हालत काफ़ी गम्भीर है तथा कर्नाटक में बेहद छुटपुट। यहाँ पर बात है ईसाईयों में भी प्रचलित वर्गभेद की… कंधमाल में जिनके खिलाफ़ हिंसा हो रही है वह धर्मांतरित हुए आदिवासी हैं, जिनका दर्जा चर्च में “नीचा” होता है, जबकि मंगलोर में जिनके खिलाफ़ हमले हुए हैं वे उच्च वर्ग के ईसाई हैं, जिनकी चिंता में फ़्रांस के राष्ट्रपति भी दुबले होते हैं और बुश भी। इन दोनो राज्यों में ईसाईयों का असली चेहरा सामने आ जाता है, असल में उड़ीसा में जब बात बहुत आगे बढ़ गई तभी हल्ला मचाया गया, क्योंकि वहाँ गरीब और दलित ईसाई हिंसा के शिकार हुए, लेकिन ऑस्कर फ़र्नांडीस, मार्गरेट अल्वा जैसे ईसाईयों की कर्मभूमि होने के कारण मंगलोर की मामूली सी घटनाओं को बेवजह तूल दिया गया। सोनिया गाँधी को खुश करने के लिये लगातार धारा 356 की धमकी दी जा रही है, जबकि कर्नाटक से ज्यादा हिंसा की घटनायें तो हाल में अमरावती, धुळे और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में हो चुकी हैं, और इस सबके बीच में कर्नाटक में हाल ही में करारी हार से भी कांग्रेसी तिलमिलाये हुए हैं, उन्हें येदियुरप्पा बिलकुल नहीं सुहा रहे। हालांकि येदियुरप्पा ने त्वरित कार्रवाई करते हुए हिन्दू संगठनों पर लगाम कसने की कोशिश की है, लेकिन भाजपा के अन्य नेताओं के मुकाबले येदियुरप्पा में ही “दूसरा मोदी” बनने की क्षमता है।



अन्त में यही बात बार-बार उभरती है कि ऐसी घटनाओं के लिये हिन्दू भी उतने ही जिम्मेदार हैं, 80-90 करोड़ होने के बावजूद वे एकत्रित नहीं होते, कांग्रेस, सेकुलर और अल्पसंख्यक मिलकर उन्हें दबाते जाते हैं, कश्मीर-असम में पाकिस्तानी झंडे लहराये जा रहे हैं और वे असहाय से देख रहे हैं, केन्द्रीय मंत्री सिमी का खुलकर समर्थन कर रहे हैं, सेकुलर मीडिया अपना दुष्प्रचार लगातार चलाये हुए है, कोई कुछ नहीं बोलता, एक गहरी निद्रा में सोये हैं सब… हिन्दुओं के पास दिमाग है, पैसा है, ज्ञान है… सिर्फ़ एकता नहीं है। इस गहरी नींद से यदि समय रहते नहीं जागे तो मिशनरीकरण, अमेरिकीकरण, वामपंथीकरण और इस्लामीकरण की ताकतें मिलकर एक दिन सब कुछ खत्म कर देंगी… पहले ही बहुत देर हो चुकी है, अब और देर मत करो… जागो और एक बनो।

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Become Secular Intellectual & Get Job in NDTV, CNN-IBN
मेरा भारत महान है इसमें कोई शक नहीं है, हाल के दिनों में तो यह और भी ज्यादा महान होता जा रहा है, क्योंकि यहाँ एक खास किस्म के बुद्धिजीवियों की “खरपतवार” उग आई है, ये महान बुद्धिजीवी (जिनमें से कुछ पत्रकार भी कहलाते हैं), विभिन्न चैनलों पर अपनी अमूल्य राय मुफ़्त में देते फ़िरते हैं, अखबारों में लेख लिखते हैं, सरकारों से पद्म पुरस्कार पाते हैं… यानी कि इनकी महिमा अपरम्पार है… यदि आप अभी युवा हैं और NDTV या फ़िर CNN-IBN जैसे चैनलों में नौकरी पाना चाहते हैं या फ़िर यदि आप एक “खास कैटेगरी” के बुद्धिजीवी का “चमकदार कैरियर” बनाना चाहते हैं तो ये टिप्स नोट कर लीजिये… आपके बहुत काम आयेंगे…

1) यदि आप हिन्दू हैं तो आप हिन्दुओं, हिन्दू धर्म और सनातन धर्म की अधिक से अधिक आलोचना करें। आपकी शैक्षणिक योग्यता, बुद्धिमानी, आपकी वर्तमान पोजीशन आदि कोई मायने नहीं रखता, बस आपको हिन्दुओं के खिलाफ़ लगातार, अबाध गति से बोलते जाना है।

2) भारतीय संस्कृति, भारतीय पुरातत्व और सांस्कृतिक गौरव को हमेशा हीन निगाह से देखें और उसे नीचा दिखाने की कोशिश करते रहें। अकबर जैसे दारूकुट्टे और औरंगजेब जैसे लुटेरे को भारत का नीति-नियन्ता बतायें तो और भी अच्छा रहेगा।

3) हिन्दू धर्म, पुरातन हिन्दू मान्यताओं, भगवा रंग, ओम्, मन्दिर, ब्राह्मण और पुजारियों की जमकर खिल्ली उड़ायें। आपको यह दर्शाना आना चाहिये कि सिर्फ़ आप ही हैं जो हिन्दू धर्म की बेहतरीन आलोचना कर सकते हैं।

4) दूसरे अन्य धर्मों की सिर्फ़ अच्छी-अच्छी बातें ही मीडिया को बतायें और हिन्दू धर्म की सतत आलोचना करते रहें। यदि आरएसएस और भाजपा, 2+2=4 बताये तो आप उसे 5 बताईये।

5) कभी भी भारतीय ग्रन्थों से किसी भी बात का उद्धरण (Quote) न दें, न सुनें, क्योंकि आपके मुताबिक तमाम भारतीय पुरातन ग्रन्थ एकदम घटिया और अवैज्ञानिक होने चाहिये। हमेशा पश्चिम की पुस्तकों, विचारकों, चीन के क्रान्तिकारियों और ईराक के नेताओं के वचनों का ही उद्धरण और उदाहरण पेश करें। यदि मजबूरी में भारत का ही कोई उद्धरण पेश करना पड़े, तो सिर्फ़ नेहरू और गाँधी परिवार द्वारा कही बातें ही पेश करें (उसमें से भी “जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है” जैसे वाक्य चुपचाप गोल कर जायें)।

6) अधिक से अधिक हिन्दू विरोधी बुद्धिजीवियों जैसे रोमिला थापर, माइकल विट्जेल, कांचा इल्लैया आदि की पुस्तकें पढ़ें और उसमें से छाँटकर उद्धरण पेश करें।

7) कभी भी भारत के भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्य की तारीफ़ें न करें, हमेशा यह दर्शाने की कोशिश करें कि भारतीय रूढियों के कारण ही यह देश सदियों तक गुलाम बना रहा। जहाँ तक हो सके तो भारतीय उत्थान की कहानियाँ अंग्रेजों से शुरु करें, या अधिक से अधिक मुगलकाल से… लेकिन उसके पहले के इतिहास को कूड़ा-करकट बतायें।

8) हमेशा विदेशी वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को ही महान बतायें, हो सके तो कम्युनिस्ट देशों के। जबकि भारतीय वेदों, आयुर्वेद, आदि की आलोचना करें।

9) यदि कोई हिन्दू-विरोधी हस्ताक्षर अभियान चल रहा है, तो प्रेस के कैमरों के सामने उस पर हस्ताक्षर अवश्य करें।

10) मदर टेरेसा, ईमाम बुखारी, और सेंट जेवियर फ़्रांसिस आदि के बारे में मीठी-मीठी बातें बतायें (भले ही फ़्रांसिस ने गोआ में 480 मन्दिर ढहाये हों और हजारों हिन्दुओं का धर्मान्तरण करवाया हो)।



11) हमेशा यह आभास होना चाहिये कि आपको सब कुछ मालूम है, आप सारी दुनिया के मुद्दों के बारे में जानते हैं, चाहे वह इराक हो, ह्यूस्टन हो, कोरिया हो, लंका हो, मिजोरम हो, फ़िलीस्तीन हो, कुछ भी हो बस आपको बोलना है। सिर्फ़ कश्मीर, असम और नागालैण्ड के बारे में कोई नकारात्मक बात मुँह से न निकल जाये इसका ध्यान रखना होगा।

12) कश्मीर और नागालैण्ड में हमेशा भारतीय सेनाओं और पुलिस की ज्यादतियों के बारे में जोर-जोर से चिल्लाईये।

13) यदि कभी “अल्पसंख्यक आतंकवाद” के बारे में बोलना भी पड़ जाये तो उसके लिये “हिन्दू आतंकवाद” को दोषी बतायें।

14) जब आप किसी ईसाई संस्था में भाषण दें तो यह कहें कि आप अगले जन्म में ईसाई बनना चाहते हैं, और जब किसी मुस्लिम जलसे में बोलें तो कहें कि आप अगले जन्म में मुस्लिम बनना चाहते हैं, साथ में यह भी जोड़ दें कि वेद और उपनिषद् तो कुरान और बाईबल का ही एक अंश हैं।

15) हिन्दुओं के बड़े समारोहों और उत्सवों की आलोचना करें और हिन्दुत्व के बारे में अनाप-शनाप बकते रहें (आपका कुछ नहीं बिगड़ने वाला)। भगवान राम को काल्पनिक और रामसेतु को मनगढ़न्त बतायें…

16) यदि आप कोई पुस्तक लिखना चाहते हैं तो सबसे पहले हिन्दू-विरोधी, उनकी परम्परा विरोधी पुस्तक लिखें… आपको मार्केटिंग की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और पुस्तक हाथों-हाथ बिकेगी।

17) यदि आप JNU या Jamia से पढ़ाई करके निकले हुए हैं, फ़िर तो आप समझिये कि खुद-ब-खुद स्थापित हो जायेंगे, क्योंकि तब “सेकुलर” शब्द आपके माथे पर ही लिखा पाया जायेगा।

18) जब भी कोई पुलिस मुठभेड़ हो, तुरन्त सबसे पहले तो उसे नकली बताईये, फ़िर उस पर जमकर हल्ला मचाईये…। अफ़ज़ल गुरु की रिहाई के लिये हस्ताक्षर अभियान चलाईये, मोमबत्तियाँ भी जलाईये…। भले ही कश्मीर में लाखों हिन्दू मरते रहें, आप सिर्फ़ फ़िलीस्तीन का राग अलापिये…

19) यदि आप महिला हैं तो माथे पर कम से कम पचास पैसे बराबर की बिन्दी लगाईये, यौन-शिक्षा की वकालत कीजिये, लिव-इन रिलेशनशिप, समलैंगिकता आदि का भी जोरदार समर्थन करें, साथ ही वाघा सीमा पर मोमबत्तियाँ भी जलाईये…

20) हमेशा बाल ठाकरे, नरेन्द्र मोदी को गिरफ़्तार करने की माँग करते रहिये, भले ही इमाम बुखारी के खिलाफ़ कई गैर-जमानती वारंट धूल खाते पड़े हों… हज सब्सिडी पर अपनी माँग बढ़ाते जाईये, और मन्दिरों-मठों के सरकारीकरण के लिये लॉबी बनाईये…

21) यदि किसी हिन्दू-विरोधी प्रदर्शनी पर हमला होता है तो उसे बजरंगियों की करतूत बताईये और लोकतन्त्र की दुहाई दीजिये, लेकिन कभी भी एमएफ़ हुसैन की आलोचना मत कीजिये, उन्हें सिर्फ़ महान बताईये। हमेशा हिन्दुओ के विरोध को “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता” बताईये, लेकिन तसलीमा नसरीन को भारत मत आने दीजिये (वह सेकुलरिज़्म के लिये बहुत बड़ा खतरा है)। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर जमाने भर के नुक्कड़ नाटक खेलिये, लेकिन सलमान रशदी की पुस्तक और ईसाईयों की पोल खोलने वाली “द विंसी कोड” फ़िल्म को भारत में प्रतिबन्धित करवा दीजिये।

22) अब्दुल करीम तेलगी, दाऊद इब्राहीम, अफ़ज़ल गुरु, अबू सलेम, परवेज मुशर्रफ़ आदि को महिमामंडित करने की और इन्हें बेगुनाह साबित करने की कोशिश कीजिये और इनकी तारीफ़ों के पुल बाँधिये…लेकिन शंकराचार्य को तत्काल अपराधी घोषित कर दें।

23) अरुंधती रॉय जैसे लेखकों के करीब रहने और उनकी चमचागिरी करने का सतत प्रयास करते रहें… बांग्लादेशी घुसपैठियों को मज़लूम, मजबूर… और हो सके तो अपना छोटा भाई कहें। संभव हो तो कश्मीर जाकर किसी आतंकवादी की मय्यत में शामिल हो जायें और कैमरे पर दिखाई दें…

तो भाईयों अब लिस्ट लम्बी होती जा रही है, आप तो संक्षेप में समझ लीजिये कि यदि आपको “सेकुलर बुद्धिजीवी”, “इंटेलेक्चुअल” कहलवाना है, दिखाई देना है, NDTV और CNN-IBN जैसे महान चैनलों पर बहस में हिस्सा लेना है तो आपको इन उपायों पर अमल करना ही होगा… फ़िर देखियेगा, कैसे धड़ाधड़ आप इन चैनलों की बहस में, सेमिनारों, मीटिंग, उद्घाटन समारोहों आदि में बुलाये जायेंगे, तमाम अखबारों के लाड़ले बन जायेंगे, आप विभिन्न पुरस्कारों के लायक बन जायेंगे। यदि आप ज्यादा “उँचे लेवल” तक चले गये तो आपको पद्मभूषण जैसे पुरस्कार, और भी ज्यादा उँचे चले गये तो मेगसायसाय और बुकर पुरस्कार तक मिल सकता है…

यदि आपको ऐसा लगता है कि एकाध “क्वालिफ़िकेशन” छूट गई है, तो आप टिप्पणी में जोड़ सकते हैं…

और यदि आप यह सब नहीं कर पाते हैं तो आप साम्प्रदायिक, कट्टरतावादी, हिन्दुत्व के झंडाबरदार, संघ के समर्थक… आदि-आदि-आदि-आदि माने जायेंगे…


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