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I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

Website URL: http://www.google.com
रविवार, 01 अप्रैल 2007 11:59

Reservation in Education and Job in India

आरक्षण : आ....क थू 

(१) गत वर्ष मेरे भतीजे को AIEEE में 142 अंक मिले जबकि उसके आरक्षित वर्ग के दोस्त को मात्र 48 अंक, लेकिन 142 अंक वाले को काऊंसिलिंग तक के लिये नहीं बुलाया गया, जबकि 48 अंक वाले को लगभग मनचाहे विषय में BE करने की पात्रता मिल गई...

(२) गत वर्ष के IIT Entrance के आँकडों के अनुसार जितने अंकों पर आरक्षित वर्ग को 10 वीं रैंक मिली है उतने ही अंक यदि सामान्य वर्ग के छात्र के हैं तो उसकी रैंक होगी 3800 वीं...इतना अन्तर सिर्फ़ आरक्षण के कारण है और यदि आरक्षण नहीं होता तो वह नालायक कभी इंजीनियरिंग कॉलेज में घुस भी नहीं पाता...

(३) सुमन गत बीस वर्षों से एक सरकारी ऑफ़िस में एलडीसी के पद पर कार्यरत है, जबकि मात्र पाँच वर्ष पहले नौकरी में लगी उसकी जूनियर चार प्रमोशन पाकर उसकी बॉस बन गई है, सिर्फ़ इसलिये कि वह आरक्षित वर्ग से है (ये और बात है कि उसे अंग्रेजी का एक पत्र ड्राफ़्ट करना नहीं आता)..प्रतिभा और विभागीय कार्य जाये भाड में...

ऐसे हजारों-लाखों उदाहरण गिनाये जा सकते हैं.. लेकिन क्या किया जा सकता है ? जब २१ वीं सदी में सत्ता ही जन्म के आधार पर प्रतिभा को लतिया रही हो.. तब क्या रास्ता बचता है ? आरक्षण समर्थकों का एक तर्क यह होता है कि आरक्षण से सामाजिक समरसता बढेगी (?).. क्या ऐसे ही बढेगी ? यदि मैं मेरे भतीजे की जगह होता तो अपने दोस्त के प्रति मेरे मन में हमेशा के लिये एक विषमता जन्म ले लेती..कि मैं इससे ज्यादा प्रतिभाशाली हूँ फ़िर भी यह मुझसे आगे निकल गया तो फ़िर मैं क्यों इसके प्रति सदाशयता दिखाऊँ ? सुमन अपना कार्य ईमानदारी से क्यों करे, जबकि उसे मालूम है कि उसकी बॉस में इतनी भी अकल नहीं है कि वह उसके सामने सर उठाकर खडी हो सके, लेकिन वह मन मसोस कर उसके आदेश मानती है... और मसोसे हुए मन और कुचली हुई प्रतिभायें सामाजिक समरसता का निर्माण नहीं किया करतीं... लेकिन यह बात नेताओं और आरक्षण समर्थकों के कानों तक कौन पहुँचाये ? वे तो समाज को खण्ड-खण्ड कर देना चाहते हैं.. और नेताओं की बात छोड भी दें तो आरक्षण का एक्मात्र उद्देश्य लगता है... "बदला"...सवर्ण वर्ग के किसी छात्र के किसी पूर्वज ने कभी दलितों पर अत्याचार किया होगा उसका फ़ल उसे आज भुगतना पड़ रहा है..क्या इससे समरसता बढेगी ? दलितों पर अत्याचार हुए हैं यह एक कडवा सत्य है, लेकिन उसमें आज के प्रतिभाशाली युवा की क्या गलती है ?

लेकिन वह अपने पूर्वजों की गलतियों को ढोने पर मजबूर है, ठीक वैसे ही जैसे कि वह भीषण जनसंख्या के दुष्परिणामों को भुगत रहा है, जाहिर है कि उसमें भी उसकी कोई गलती नहीं है । इस घृणित खेल में सबसे अधिक नुकसान हो रहा है गरीब.. या कहें मध्यमवर्गीय सामान्य वर्ग के छात्रों का...। मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं अपने बेटे को किसी महँगे (आजकल तो सभी महँगे हैं) कॉलेज में पैसे के बल पर एडमिशन दिलवाऊँ.. और प्रतिभा के बल पर तो वह कहीं स्थान पा ही नहीं सकता.. तो मेरे बेटे के लिये क्या रास्ता बचा ? लोगों ने Monster.com का विज्ञापन देखा होगा जिसकी "पंच लाईन" है "Caught in a wrong job" ठीक यही सामान्य वर्ग के गरीब छात्रों के साथ होने वाला है.. जबकि कोई प्रतिभाशाली इंजीनियर कहीं तेल बेच रहा होगा.. या कोई होनहार भविष्य का वैज्ञानिक किसी गाँव में सरपंच की चाकरी करते हुए मास्टरी करता होगा... या IIM की प्रतिभा रखने वाला कोई लडका कहीं मैकेनिकगिरी में लगा होगा... यही हो रहा है.. लेकिन सुनेगा कौन ? सबको तो अपनी-अपनी जाति की पडी है.. सब पिछडे़ होने के लिये मरे जा रहे हैं..और नेता मरे जा रहे हैं अपने वोटों के लिये और निजी क्षेत्र के दरवाजे भी हमारे मुँह पर बन्द करने में..। मेरे पास तीन "M" (Money, Muscle, Manipulation) में से एक भी नहीं है, तो मैं भी अपने बेटे से कहूँगा कि यदि उसके आरक्षित वर्ग के कई दोस्तॊं से ज्यादा अंक पाने के बावजूद उसे किसी अच्छे कॉलेज में दाखिला नहीं मिलता.. तो दाऊद या बबलू गैंग का रुख कर.. कम से कम वहाँ "प्रतिभा" की कद्र तो होगी...

सुप्रीम कोर्ट से जूते खाने के बावजूद जैसा कि हमेशा होता आया है अब हमारे नेता (?) अध्यादेश के जरिये अपनी बात थोपने की कोशिश करेंगे, और सुप्रीम कोर्ट के हाथ बाँध दिये जायेंगे और सवर्णों.. विशेषकर गरीब सवर्णों की प्रतिभा की भ्रूण हत्या करके खुशी मनाई जायेगी । सुप्रीम कोर्ट इससे अधिक क्या कर सकता है... सुप्रीम कोर्ट नहीं होता तो दिल्ली में कभी CNG लागू नहीं होता, सुप्रीम कोर्ट नहीं होता तो दिल्ली के भ्रष्ट शासक और उतने ही बेईमान अतिक्रमणकर्ता बेशर्मी से कब्जा जमाये रहते और सीलिंग कभी नहीं होती.., सुप्रीम कोर्ट ना होता तो मायावती ताजमहल भी बेच खाती... ऐसे अनेकों उदाहरण हैं कि यदि सुप्रीम कोर्ट ना हो तो ये नेता समूचे देश को SEZ (Special Exploitation Zone) बना डालें.. लेकिन सुप्रीम कोर्ट की भी एक सीमा है.. फ़िर हमारी नजर जाती है राष्ट्रपति पर..बात आती है अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने की तो हमारे यहाँ जैल सिंह को छोडकर कोई भी "मर्द" राष्ट्रपति नहीं हुआ जो सरकार के अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने से मना कर दे, और यदि वह मना कर भी दे तो लोकसभा में बैठे 525 गधे (या शायद 540..क्या फ़र्क पडता है) उसे फ़िर पास करके वापस भेज देंगे और फ़िर राष्ट्रपति को उस पर दस्तखत करना ही होंगे । जबकि कम से कम राष्ट्रपति ऐसा तो कर ही सकता है कि वह विवादित अध्यादेश को अनिश्चितकाल के लिये विचाराधीन रख ले.. विचार करने की सीमा पर लोकसभा की कोई पाबन्दी नहीं है इसलिये राष्ट्रपति को चाहिये कि वे अपने कार्यकाल की समाप्ति तक उक्त अध्यादेश पर "विचार" करते ही रहें... करते ही रहें.. फ़िर उनका कार्यकाल समाप्त होने के पश्चात वह अध्यादेश स्वतः ही समाप्त हो जायेगा और नये राष्ट्रपति के चुने जाने और आने तक बात टल जायेगी, फ़िर से लोकसभा को उसे पास करके विचारार्थ और हस्ताक्षर करने राष्ट्रपति के पास भेजा जायेगा.. फ़िर चाहे तो अगला राष्ट्रपति उस अध्यादेश पर पाँच साल तक बैठ सकता है । जैसे वे इस वक्त वे अफ़जल के केस में उस पर कुंडली मारे बैठे हैं..उसी तरह हम गरीबों के हक के लिये वे क्यों नहीं सरकार के सामने अपनी कमर सीधी करते ?

लेकिन यदि आजादी के साठ वर्षों बाद भी जनसंख्या नियंत्रित नहीं हो पाई, प्राथमिक शाला के अभाव में चालीस प्रतिशत निरक्षर हैं, नेहरू के जमाने से पुष्पित-पल्लवित हुआ भ्रष्टाचार अब लोकाचार बन गया है.. तो इसमें आम आदमी की क्या गलती है ? सजा मिलनी किसे चाहिये और मिल किसे रही है... यही है हमारा आज का "शाईनिंग इंडिया"... यानी सो कॉल्ड "मेरा भारत महान"...
रविवार, 01 अप्रैल 2007 16:07

Reservation in India and SC, ST Jobs

आरक्षण : चाहिये ही चाहिये

माननीय प्रधानमन्त्री जी,

इतिहास पुरुषों वीपी सिंह और अर्जुन सिंह (दोनो ठाकुर ? क्या वाकई) नेताओं ने जो आरक्षण की महान परम्परा चलाई है मैं उसका पूर्ण समर्थन करता हूँ..इसीलिये मैं माँग करता हूँ कि नौकरियों और पदोन्नति की तरह हमें सभी क्षेत्रों में आरक्षण लागू कर देना चाहिये, मैं अपनी माँगों की सूची इस तरह रखता हूँ ....
सबसे पहले भारतीय क्रिकेट टीम में आरक्षण नीति लागू होना चाहिये । टीम में ओबीसी के लिये चालीस प्रतिशत और मुसलमानों के लिये बीस प्रतिशत आरक्षण होना चाहिये । जब ओबीसी का बल्लेबाज चौका मारे तो उसे छक्का माना जाये, एससी वर्ग का बल्लेबाज जब साठ रन बना ले तो उसे शतक माना जाये । शोएब अख्तर को सखत चेतावनी दी जायेगी कि जब मुसलमान बल्लेबाजी करे तो गेंदबाजी साठ मील प्रतिघंटा से अधिक नहीं होना चाहिये (आखिर हमें पिछडे वर्गों को सुविधायें देकर आगे लाने का प्रयास करना है) । ओलंपिक मे ओबीसी का धावक अस्सी मीटर भी दौड ले तो उसे सौ मीटर माना जाये । भाला फ़ेंक, चक्का फ़ेंक और गोला फ़ेंक में ओबीसी और एससी/एसटी को तीस प्रतिशत की छूट मिलेगी । चूँकि प्रमोशन में भी आरक्षण है इसीलिये टीम का कप्तान भी बदल-बदल कर रोटेशन के आधार पर होना चाहिये । सबसे पहले एससी कप्तान, एसटी कप्तान, मुसलमान कप्तान, ओबीसी कप्तान, सामान्य कप्तान, अगडों में पिछडा कप्तान, पिछडों में अति पिछडा कप्तान, थोडे पिछडों में ज्यादा अगडा कप्तान.. आदि, क्योंकि हमें खिलाडी की प्रतिभा से हमें कोई लेना-देना नहीं है, हाँ, लेकिन यह नियम लोकसभा और राज्यसभाओं पर लागू नहीं होगा, क्योंकि वहाँ तो प्रतिभा पहले ही नदारद है ।

इस वर्ष से फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड में भी आरक्षण लागू हो..जैसे यदि कुल बीस पुरस्कार बाँटे जाने हैं तो उसमें से चौदह पुरस्कार स्वमेव आरक्षित हो जायेंगे, जैसे कि "बेस्ट गायक" का पुरस्कार सामान्य वर्ग वाले को मिले, तो "बेस्ट संगीतकार" का अवार्ड ओबीसी संगीतकार को ही मिलेगा । यदि बेस्ट अभिनेत्री का पुरस्कार मुसलमान को मिला, तो बेस्ट स्क्रीन प्ले का पुरस्कार खुद-ब-खुद एसटी लेखक को मिलना चाहिये । नेताओं को आम जनता में अपनी छवि बनाने के लिये उसी हवाई जहाज से सफ़र करना चाहिये जिसे कोई एससी-एसटी पायलट उडा रहा हो, फ़ोकट में AIIMS में भरती होने पर वे जोर दें कि उनका ऑपरेशन सिर्फ़ और सिर्फ़ एसटी डॉक्टर ही करेगा.. तभी सही मायनों में इन वर्गों की उन्नति हो सकेगी..आओ हम दुनिया को बता दें कि भारत तेजी से आगे बढ रहा है.. मुझे आशा है कि हमारे बुद्धिजीवी प्रधानमन्त्री इन माँगों पर विचार करेंगे और आगे इटली की मेम तक पहुँचायेंगे.. क्योंकि उनके पास विचार करने के अलावा और कोई शक्ति है भी नहीं.. आमीन
बुधवार, 04 अप्रैल 2007 12:57

Lord Mcaulay and Britishers in India

लॉर्ड मैकाले के भाषण का एक अंश


आईये देखें कि सन 1835 में मैकाले भारत के बारे में क्या सोचते थे...



इसी नीति के तहत अंग्रेजों ने भारतीयों विशेषकर हिन्दुओं के मन में उनकी संस्कृति, उनके आचार-विचार, उनके रहन-सहन आदि के बारे में हीनभावना भरने की शुरुआत की और इसमें वे काफ़ी हद तक सफ़ल भी रहे । भारतीय इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करना, हिन्दुओं के भगवानों, उनके चिन्हों का मखौल उडाना, हिन्दू राजाओं को नाकारा बताना आदि इसी कडी़ का हिस्सा हैं..और अब राम जन्मभूमि पर प्रश्न उठाना, भारत-श्रीलंका के बीच बने राम-सेतु को तोडना, क्रॉस के चिन्ह वाले सिक्कों का प्रचलन शुरु करवाना आदि कई कदम उठाये जा रहे हैं...अंग्रेजों के ही मानस पुत्र "वामपन्थी" भी भारत, भारतीय संस्कृति, हिन्दुत्व के बारे में दुष्प्रचार करने में लगे हुए हैं...लेकिन वे कभी सफ़ल नहीं होंगे..
(यदि चित्र साफ़ और बडा नहीं दिख रहा हो तो कृपया मुझसे सम्पर्क करें, मैं ई-मेल भेज दूँगा)

बुधवार, 04 अप्रैल 2007 20:33

Secularism in India and Politics


धर्मनिरपेक्षता की जय ?

क्या आप धर्मनिरपेक्ष हैं ? जरा फ़िर सोचिये और स्वयं के लिये इन प्रश्नों के उत्तर खोजिये.....

१. विश्व में लगभग ५२ मुस्लिम देश हैं, एक मुस्लिम देश का नाम बताईये जो हज के लिये "सब्सिडी" देता हो ?

२. एक मुस्लिम देश बताईये जहाँ हिन्दुओं के लिये विशेष कानून हैं, जैसे कि भारत में मुसलमानों के लिये हैं ?

३. किसी एक देश का नाम बताईये, जहाँ ८५% बहुसंख्यकों को "याचना" करनी पडती है, १५% अल्पसंख्यकों को संतुष्ट करने के लिये ?

४. एक मुस्लिम देश का नाम बताईये, जहाँ का राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री गैर-मुस्लिम हो ?

५. किसी "मुल्ला" या "मौलवी" का नाम बताईये, जिसने आतंकवादियों के खिलाफ़ फ़तवा जारी किया हो ?

६. महाराष्ट्र, बिहार, केरल जैसे हिन्दू बहुल राज्यों में मुस्लिम मुख्यमन्त्री हो चुके हैं, क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि मुस्लिम बहुल राज्य "कश्मीर" में कोई हिन्दू मुख्यमन्त्री हो सकता है ?

७. १९४७ में आजादी के दौरान पाकिस्तान में हिन्दू जनसंख्या 24% थी, अब वह घटकर 1% रह गई है, उसी समय तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब आज का अहसानफ़रामोश बांग्लादेश) में हिन्दू जनसंख्या 30% थी जो अब 7% से भी कम हो गई है । क्या हुआ गुमशुदा हिन्दुओं का ? क्या वहाँ (और यहाँ भी) हिन्दुओं के कोई मानवाधिकार हैं ?

८. जबकि इस दौरान भारत में मुस्लिम जनसंख्या 10.4% से बढकर 14.2% हो गई है, क्या वाकई हिन्दू कट्टरवादी हैं ?

९. यदि हिन्दू असहिष्णु हैं तो कैसे हमारे यहाँ मुस्लिम सडकों पर नमाज पढते रहते हैं, लाऊडस्पीकर पर दिन भर चिल्लाते रहते हैं कि "अल्लाह के सिवाय और कोई शक्ति नहीं है" ?

१०. सोमनाथ मन्दिर के जीर्णोद्धार के लिये देश के पैसे का दुरुपयोग नहीं होना चाहिये ऐसा गाँधीजी ने कहा था, लेकिन 1948 में ही दिल्ली की मस्जिदों को सरकारी मदद से बनवाने के लिये उन्होंने नेहरू और पटेल पर दबाव बनाया, क्यों ?

११. कश्मीर, नागालैण्ड, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय आदि में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, क्या उन्हें कोई विशेष सुविधा मिलती है ?

१२. हज करने के लिये सबसिडी मिलती है, जबकि मानसरोवर और अमरनाथ जाने पर टैक्स देना पड़ता है, क्यों ?

१३. मदरसे और क्रिश्चियन स्कूल अपने-अपने स्कूलों में बाईबल और कुरान पढा सकते हैं, तो फ़िर सरस्वती शिशु मन्दिरों में और बाकी स्कूलों में गीता और रामायण क्यों नहीं पढाई जा सकती ?

१४. गोधरा के बाद मीडिया में जो हंगामा बरपा, वैसा हंगामा कश्मीर के चार लाख हिन्दुओं की मौत और पलायन पर क्यों नहीं होता ?

१५. क्या आप मानते हैं - संस्कृत सांप्रदायिक और उर्दू धर्मनिरपेक्ष, मन्दिर साम्प्रदायिक और मस्जिद धर्मनिरपेक्ष, तोगडिया राष्ट्रविरोधी और ईमाम देशभक्त, भाजपा सांप्रदायिक और मुस्लिम लीग धर्मनिरपेक्ष, हिन्दुस्तान कहना सांप्रदायिकता और इटली कहना धर्मनिरपेक्ष ?

१६. अब्दुल रहमान अन्तुले को सिद्धिविनायक मन्दिर का ट्रस्टी बनाया गया था, क्या मुलायम सिंह को हजरत बल दरगाह का ट्रस्टी बनाया जा सकता है ?

१७. एक मुस्लिम राष्ट्रपति, एक सिख प्रधानमन्त्री और एक ईसाई रक्षामन्त्री, क्या किसी और देश में यह सम्भव है, यह सिर्फ़ सम्भव है हिन्दुस्तान में क्योंकि हम हिन्दू हैं और हमें इस बात पर गर्व है, दिक्कत सिर्फ़ तभी होती है जब हिन्दू और हिन्दुत्व को साम्प्रदायिक कहा जाता है ।

स्वामी विवेकानन्द ने कहा था - "हिन्दुत्व कोई धर्म नहीं है, यह एक उत्तम जीवन पद्धति है" । गाँधी के खिलाफ़त आन्दोलन के समर्थन और धारा ३७० पर भी काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है और ज्यादा लिखने की जरूरत नहीं है, इसलिये नहीं लिखा, फ़िर भी.....उपरिलिखित विचार किसी राजनैतिक उद्देश्य के लिये नहीं हैं, ये सिर्फ़ ध्यान से चारों तरफ़ देखने पर स्वमेव ही दिमाग में आते हैं और एक सच्चे देशभक्त नागरिक होने के नाते इन पर प्रकाश डालना मेरा कर्तव्य है
(एक ई-मेल के सम्पादन और अनुवाद पर आधारित)
शुक्रवार, 13 अप्रैल 2007 11:38

असली खतरा कौन ?

ईराक युद्ध अब लगभग समाप्त हो चुका है (अमेरिका के लिये) और अमेरिका और उसकी कम्पनियों ने वहाँ पर अपना शिकंजा कस लिया है । जिस बहाने को लेकर ईराक पर हमला किया गया था, अब अमेरिका / ब्रिटेन का सफ़ेद झूठ सिद्ध हो चुका है, क्योंकि जिन व्यापक विनाश के हथियारों का ढोल पीटा गया था, वे कहीं नहीं मिले, जैसा कि हथियार निरीक्षक हैन्स ब्लिक्स पहले ही कह चुके थे । अब अमेरिका का अगला निशाना बनने जा रहा है ईरान, इस सूरतेहाल में कुछ प्रश्नों पर विचार करें, जिनके उत्तर संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न रिपोर्टों, समाचार पत्रों और न्यूज चैनलों से लिये गये हैं -
प्रश्न - विश्व की आबादी में अमेरिका का प्रतिशत कितना है ?
उ. - छः प्रतिशत
प्रश्न - विश्व की कुल सम्पत्ति में अमेरिका के पास कितना है ?
उ. - लगभग पचास प्रतिशत
प्र. - किस देश के पास सबसे बडा तेल भंडार है ?
उ.- सऊदी अरब के पास (जो अमेरिका के इशारों पर नाचता है)
प्र. - किस देश के पास दूसरा सबसे बडा तेल भण्डार है ?
उ.- ईराक
प्र. - द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, तमाम युद्धों मे कितने लोग मारे जा चुके हैं ?
उ. - लगभग नौ करोड़
प्र. - ईराक के पास रासायनिक और जैविक हथियार कब से हैं ?
उ.- १९८० के पहले से ही
प्र. - क्या ये सारे हथियार ईराक ने स्वयं ही निर्माण कर लिये ?
उ. - नहीं.. इसके लिये सहायता, सामान और तकनीक अमेरिका और ब्रिटेन ने दी थी (इसीलिये वे दावे से कहते थे कि इराक के पास ये हथियार हैं)
प्र. - ईरान के खिलाफ़ युद्ध में इराक ने गैस का उपयोग किया, अमेरिका ने कभी आलोचना की ?
उ.- नहीं
प्र.-सद्दाम हुसैन ने कुर्दिश शहर हलबजा में १९८८ मे कितने लोगों को गैस से मारा था ?
उ.- लगभग ५०००
प्र.- उस वक्त कितने पश्चिमी देशों ने इसकी आलोचना की ?
उ. - एक ने भी नहीं
प्र.- वियतनाम युद्ध में अमेरिका ने कितने गैलन "एजेण्ट ऑरेंज" (एक रासायनिक हथियार) का उपयोग किया ?
उ.- लगभग १.७ करोड गैलन
प्र.- ९/११ की घटना का सद्दाम हुसैन से कोई सीधा सम्बन्ध है ?
उ.- नहीं
प्र.- 1991 के खाडी युद्ध मे कितने इराकी नागरिक मारे गये ?
उ.- लगभग 35,000
प्र.- यूएन के अनुसार 1991 से 1994 के बीच इराक में कैन्सर के रोगियों में कितनी वृद्धि हुई ?
उ.- लगभग 700%
प्र.- 1991 के खाडी युद्ध में अमेरिका ने इराक की कितनी सैन्य क्षमता समाप्त कर दी थी ?
उ.- लगभग अस्सी प्रतिशत
प्र.- कितने वर्षों तक अमेरिका ने इराक पर वायु हमले (उडान वर्जित क्षेत्र के नाम पर) जारी रखे ?
उ.- 11 वर्षों तक
प्र.- 1989 से पहले इराक में बच्चों की मृत्यु दर क्या थी ?
उ.- 38
प्र.- दस साल बाद 1999 में इराक में बच्चों की मृत्यु दर क्या थी ?
उ.- 131 (अर्थात 345 % की बढोतरी)
प्र.- बारह वर्षों के प्रतिबन्ध झेलने के दौरान कितने इराकियों की दवा के अभाव में मृत्यु हुई ?
उ.- 1.5 करोड़
प्र. - क्या सद्दाम ने कभी हथियार निरीक्षकों को इराक से भगाया ?
उ.- नहीं
प्र.- अब तक कितनी बार इराक में हथियार निरीक्षण हुआ ?
उ.- 300 बार
प्र.- 1992 से अब तक इसराईल ने कितने संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों का उल्लंघन किया है ?
उ.- 65 से ज्यादा बार
प्र.- 1972 से 1990 के बीच अमेरिका ने कितनी बार इसराइल विरोधी प्रस्तावों को वीटो कर दिया ?
उ.- 30 से ज्यादा बार
प्र.- कितने देशों के पास ज्ञात रूप से परमाणु हथियार हैं ?
उ.- आठ देशों के पास
प्र.- अमेरिका के पास कितने परमाणु हथियार हैं ?
उ.- 10,000 से ज्यादा
प्र.- किस एकमात्र देश ने अब तक परमाणु हथियारों का उपयोग किया ?
उ.- अमेरिका ने (उसमें भी मासूम बच्चे और नागरिक ही मारे गये थे)
प्र.- क्या इसराइल ने कभी हथियार निरीक्षकों को अपने यहाँ आने दिया है ?
उ.- कभी नहीं
प्र.- अन्तिम और सबसे बडा सवाल - विश्व शांति के लिये ईरान, उत्तर कोरिया और अमेरिका में से कौन सबसे बडा खतरा है
उ.- ......??????
रविवार, 15 अप्रैल 2007 15:47

Hindi Films Direction and Funny Scenes

हिन्दी फ़िल्म निर्देशकों की कल्पनाशीलता

भारत में फ़िल्में आम जनजीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं । आम आदमी आज भी फ़िल्मों के आकर्षण में इतना बँधा हुआ है कि कई बार वह दिखाये जाने वाले दृश्यों को असली समझ लेता है, खासकर यह स्थिति किशोरवय एवं युवा वर्ग के दर्शकों के साथ ज्यादा आती है । एक बार महानायक अमिताभ बच्चन ने एक मुलाकात में कहा भी था कि "फ़िल्म माध्यम खासकर मसाला और मारधाड़ वाली फ़िल्में 'मेक बिलीव' का अनुपम उदाहरण होती हैं" अर्थात जो दिखाया जा रहा है दर्शक उस पर विश्वास करें, चाहे वह "किडीकाँप" अमिताभ द्वारा दस-बीस गुण्डों की पिटाई हो, या शाहरुख खान द्वारा मानेक ईरानी, पुनीत इस्सर या महेश आनन्द जैसे बॉडी बिल्डरों की धुँआधार धुलाई का, या हीरो द्वारा चूँ.......की आवाज के साथ जमीन से सीधे दूसरी मंजिल तक की छलांग हो, या घोडे दौडाकर ट्रेन को पकडना हो, तात्पर्य यह कि जो भी दिखाया जाये दर्शक उसे झेल जाये और उफ़ तक ना करे उसे कहते हैं मेक बिलीव ।

लेकिन हमारी हिन्दी फ़िल्मों के निर्देशकों की कल्पनाशीलता का कोई मुकाबला नहीं कर सकता, चाहे वे स्टीवन स्पीलबर्ग हों जिन्होंने मात्र कल्पना से डायनासोर दिखाकर लोगों से करोडों रुपये झटक लिये,या फ़िर ऑर्नोल्ड महोदय हों जो टर्मिनेटर श्रंखला की बदौलत ही कैलीफ़ोर्निया के गवर्नर बन गये, या फ़िर जैकी चैन और ब्रूस ली की फ़िल्में हों जिसमें वे दोनो बन्दर की तरह कूदते हुए जाने क्या-क्या करतब दिखाते फ़िरते हैं, लेकिन फ़िर भी वे हमारे हिन्दी हीरो का मुकाबला नहीं कर सकते....जरा एक उदाहरण देखिये... फ़िल्म हीरालाल-पन्नालाल में हमारे गरीबों के अमिताभ यानी मिथुन दा एक पहाडी से लटक रहे हैं, खाई में अब गिरे कि तब गिरे, तभी वहाँ एक शेर आ जाता है, और... नहीं..नहीं आप गलत सोचने लगे...मिथुन दा को खाता नहीं है, बल्कि अपना एक पंजा बढाकर मिथुन दा को वापस ऊपर जमीन पर न सिर्फ़ खीच लेता है, बल्कि दोनों पंजे जोडकर नमस्कार भी करता है (बैकग्राऊँड में माँ शेरों वाली का भजन जो चल रहा होता है)... यह सीन देखकर मैं धन्य-धन्य हो गया, हिन्दी फ़िल्मों में मेरी आस्था ऐसे चिपक गई जैसे फ़ेविकोल का मजबूत जोड हो... तभी मैने तय कर लिया था कि मैं भी कुछ धाँसू सीन लिखूँगा, ऐसे सीन जो आज तक विश्व सिनेमा ने कभी देखे नहीं होंगे ना सोचे होंगे... तो पेश हैं हमारी महान हिन्दी फ़िल्मों के भविष्य में आने वाले कुछ दृश्य....

(१) फ़िल्म 'नरसिम्हा' में हमारा पंजाबी पुत्तर सनी देओल खंभा फ़ाडकर बाहर निकल आता है, यह बात तो बहुत पुरानी हो गई है, आने वाली फ़िल्म में एक दृष्य ऐसा होगा... सनी देओल विलेन के अड्डे पर भीषण मारधाड करता है, तभी वहाँ रखे खाली खोकों में विस्फ़ोट होने लगते हैं (यह ना पूछना कि हमेशा विलेन के अड्डे पर सैकडों खाली खोके क्यों रखे रहते हैं)... उन विस्फ़ोटों से सारी इमारत भरभराकर ढहने लगती है, तभी सनी देओल उस इमारत का बीच का एक पिलर दाँये हाथ से पकडकर खडा हो जाता है और गिरती इमारत को थाम लेता है । तभी वहाँ उसकी माँ आ जाती है (फ़िल्म का अन्त आने पर माँ-बाप जरूर आते हैं), उसके हाथ में पंजाब के गेहूँ से बनी रोटी है और वह बे.......टा करते हुए उससे गले मिलने की जिद करती है.. अब सनी देओल क्या करेगा ? जी हाँ आप सोच भी नहीं सकते, वह अपना हाथ उस पिलर से हटाकर पिलर को अपनी पीठ पर टिका लेता है और दोनों गले मिलते हैं, और सनी भाई रोटी के साथ गाँव की कसम खाना नहीं भूलता.... है ना आँसू लाने वाला धाँसू सीन.... अब अगला सीन..

(२) एक फ़िल्म में हमारे अक्षय भाई को ब्रेन ट्यूमर हो जाता है, डॉक्टर ने भी हाथ ऊँचे कर दिये हैं (जैसा कि वह हर फ़िल्म में करता है - "अब इनकी जिन्दगी ऊपर वाले के हाथ में है, इन्हें दवा की नहीं दुआ की जरूरत है" दुआ भी हीरोईन की या माँ की हो और जोर-जोर से घँटियाँ बजाते हुए हो तो और भी जल्दी ठीक होंगे), खैर, फ़िर भी अक्षय क्लाईमैक्स तक किसी तरह जिन्दा रहते हैं । सारी पट्टियाँ और सलाईन तोडते हुए "अक्की" जब विलेन के अड्डे पर लडने पहुँचते हैं तो उन्हें एक गोली कनपटी में लगती है... और भगवान का चमत्कार देखिये...कि वह गोली अक्षय कुमार का ब्रेन ट्यूमर अपने साथ लेकर दूसरे कान से निकल जाती है, और सभी लोग खुशी-खुशी साथ रहने लगते हैं... जय हो...

(३) आने वाली एक फ़िल्म में मिथुन दा दो गुन्डों से अकेले लड रहे होते हैं (चाहते तो दस से भी लड सकते थे) और उस वक्त उनके पास रिवाल्वर में सिर्फ़ एक गोली बची होती है, अब मिथुन दा क्या करें.. क्या ना करें वाली पोजीशन में आ जाते हैं, परन्तु आप अपने दिमाग की पाव भाजी न बनायें, क्योंकि मिथुन दा अपने एक हाथ में चाकू पकडकर उसकी धार पर वो एकमात्र गोली चलाते हैं, उस गोली के दो टुकडे हो जाते हैं और दोनों गुण्डों को जा लगती है और दोनो ढेर हो जाते हैं (मिथुन दा उवाच... अपुन का नाम है हीरा, अपुन ने सबको चीरा... क्या !)

(४) ऐसे ही एक बार पहलवान (?) आमिर खान की महबूबा को विलेन अगवा करके एफ़िल टावर की छत पर बाँध देता है और आमिर से मिसाईल खरीदी के पेपर माँगता है । आमिर भाई तत्काल एक हेलिकॉप्टर पर सवार होकर (जो एक्स्क्लूसिवली आमिर भाई के लिये ही खाली खडा होता है) एफ़िल टावर पर उडने लगते हैं, उस हेलीकॉप्टर में से सीढी लगी रस्सी से आमिर झूलते जाते हैं... झूलते जाते हैं (इसे दस बार पढा जाये, तभी झूलने का पूरा मजा आयेगा) फ़िर एक हुक लगी रस्सी आमिर फ़ेंकते हैं और... आप क्या सोच रहे हैं... वे हीरोईन को कष्ट देंगे... नहीं... आमिर भाई खुद उस रस्सी पर चलकर एफ़िल टावर की छत पर कूदते हैं, तब तक विलेन देखता रहता है और हेलिकॉप्टर टावर से एक बकरी की तरह बाँध दिया जाता है... तभी धाँय...धाँय... विलेन की गोली से हेलीकॉप्टर उड जाता है... आमिर भाई हीरोईन को बाँहों मे उठाकर एफ़िल टावर से कूदता है... सीधे कुतुबमीनार पर (यह पूछने का टाईम नहीं होता कि एफ़िल टावर और कुतुबमीनार पास-पास कैसे, क्योंकि तुरन्त अगला स्विटजरलैण्ड का सीन आ जाता है)... ऐसे आमिर भाई हीरोईन को भगा ले जाते हैं... सीधे गाना गाने के लिये....

(५) दक्षिण के अमिताभ यानी रजनीकान्त (इस टिप्पणी के लिये रजनीकान्त और अमिताभ दोनों के प्रशंसक मुझे मारेंगे) को एक बार एक विलेन को मारना बहुत जरूरी हो जाता है, वैसी कसम जो उन्होंने खाई हुई थी...लेकिन विलेन एक बहुत ही ऊँची दीवार के उस पार खडा होता है, जहाँ रजनीकान्त हीरो वाली छलाँग लगाकर भी नहीं पहुँच सकते... यहाँ पर रजनीकान्त की कल्पना काम आती है... रजनी बाबू तत्काल दो पिस्तौलें निकालते हैं, एक पिस्तौल को वे ताकत से ऊपर उछालते हैं, जैसे ही वह पिस्तौल दीवार से कुछ ऊपर पहुँचती है, रजनी दूसरी पिस्तौल से पहली पिस्तौल के ट्रिगर पर गोली दागते हैं, जिससे पहली पिस्तौल से गोली चल जाती है, और दीवार के उस पार खडा विलेन जो कि इस चमत्कार को आँखे फ़ाडे देख रहा होता है, मारा जाता है....

(६) एक फ़िल्म के क्लाईमैक्स में संजू बाबा के पास गोलियाँ खतम हो जाती हैं.. अब संजू बाबा क्या करें, विलेन पीछा कर रहा होता है.. संजू बाबा अपनी पुरानी एके ४७ (वही सलेम की दी हुई) निकालते हैं , विलेन भी एके ५६ निकालता है और गोलियों की बरसात कर देता है...(आगे पढकर सिर ना धुनियेगा...) लेकिन संजू बाबा तत्काल अपनी राईफ़ल की मैगजीन खोलते हैं, आने वाली सारी गोलियों को वे उसमें झेलते-भरते जाते हैं, फ़िर पूरी भर जाने के बाद उसे वापस लगाकर अपनी एक४७ से विलेन का खात्मा कर देते हैं....(जब अग्निपथ में बिग बी, गोलियाँ हथेली पर झेल सकते हैं तो संजू बाबा मैगजीन में क्यों नही ?)

ये तो सिर्फ़ कुछेक दृश्य ही बताये हैं, ऐसे अनेकों आईडिया हमारी फ़िल्मों के निर्देशकों के दिमाग में हैं, फ़िर भी पता नहीं क्यों लोग अंग्रेजी फ़िल्मों के पीछे भागते रहते हैं । वैसे तो ऊपर दिये गये सीन खासतौर पर हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री के लिये हैं, लेकिन ये आईडियाज यदि कोई अंग्रेजी निर्देशक अपनी फ़िल्म में लेना चाहे, तो वह हमारा कॉपीराईट शुल्क चुकाकर ले सकता है.... या फ़िर अपनी तरफ़ से थोडी और मगजमारी करके "रीमिक्स" कर ले (सभ्य भाषा में चोरी को रीमिक्स कहते हैं)... फ़िर हम उसका कुछ नहीं बिगाड सकते हैं, क्योंकि रीमिक्स भी हमारी ही देन है....
बुधवार, 18 अप्रैल 2007 15:43

Nehru Dynasty and Gandhi Family in India

नेहरू-गाँधी राजवंश (?)

(प्रस्तुत लेख में दी गई जानकारियाँ विभिन्न पुस्तकों के अंशों, वेबसाईटों की सामग्रियों से संकलित की गई हैं, जिनके लिंक्स साथ में दिये गये हैं… इन जानकारियों को लेखक ने सिर्फ़ संकलित और अनु्वादित किया है)

आजकल जबसे "बबुआ" राहुल गाँधी ने राजनीति में आकर अपने बयान देना शुरू कर दिया है, तब से "नेहरू राजवंश" नामक शब्द बार-बार आ रहा है । नेहरू राजवंश अर्थात Nehru Dynasty... इस सम्बन्ध में अंग्रेजी में विभिन्न साईटों और ग्रुप्स में बहुत चर्चा हुई है....बहुत दिनों से सोच रहा था कि इसका हिन्दी में अनुवाद करूँ या नहीं, गूगल बाबा पर भी खोजा, लेकिन इसका हिन्दी अनुवाद कहीं नहीं मिला, इसलिये फ़िर सोचा कि हिन्दी के पाठकों को इन महत्वपूर्ण सूचनाओं से महरूम क्यों रखा जाये. यह जानकारियाँ यहाँ, यहाँ तथा और भी कई जगहों पर उपलब्ध हैं मुख्य समस्या थी कि इसे कैसे संयोजित करूँ, क्योंकि सामग्री बहुत ज्यादा है और टुकडों-टुकडों में है, फ़िर भी मैने कोशिश की है इसका सही अनुवाद करने की और उसे तारतम्यता के साथ पठनीय बनाने की...जाहिर है कि यह सारी सामग्री अनुवाद भर है, इसमें मेरा सिर्फ़ यही योगदान है... हालांकि मैने लगभग सभी सन्दर्भों (references) का उल्लेख करने की कोशिश की है, ताकि लोग इसे वहाँ जाकर अंग्रेजी में पढ सकें, लेकिन हिन्दी में पढने का मजा कुछ और ही है... बाकी सब पाठकों की मर्जी...हजारों-हजार पाठकों ने इसे अंग्रेजी में पढ ही रखा होगा, लेकिन जो नहीं पढ़ पाये हैं और वह भी हिन्दी में, तो उनके लिये यह पेश है...


"नेहरू-गाँधी राजवंश (?) की असलियत"...इसको पढने से हमें यह समझ में आता है कि कैसे सत्ता शिखरों पर सडाँध फ़ैली हुई है और इतिहास को कैसे तोडा-मरोडा जा सकता है, कैसे आम जनता को सत्य से वंचित रखा जा सकता है । हम इतिहास के बारे में उतना ही जानते हैं जितना कि वह हमें सत्ताधीशों द्वारा बताया जाता है, समझाया जाता है (बल्कि कहना चाहिये पीढी-दर-पीढी गले उतारा जाता है) । फ़िर एक समय आता है जब हम उसे ही सच समझने लगते हैं क्योंकि वाद-विवाद की कोई गुंजाईश ही नहीं छोडी जाती । हमारे वामपंथी मित्र इस मामले में बडे़ पहुँचे हुए उस्ताद हैं, यह उनसे सीखना चाहिये कि कैसे किताबों में फ़ेरबदल करके अपनी विचारधारा को कच्चे दिमागों पर थोपा जाये, कैसे जेएनयू और आईसीएचआर जैसी संस्थाओं पर कब्जा करके वहाँ फ़र्जी विद्वान भरे जायें और अपना मनचाहा इतिहास लिखवाया जाये..कैसे मीडिया में अपने आदमी भरे जायें और हिन्दुत्व, भारत, भारतीय संस्कृति को गरियाया जाये...ताकि लोगों को असली और सच्ची बात कभी पता ही ना चले... हम और आप तो इस खेल में कहीं भी नहीं हैं, एक पुर्जे मात्र हैं जिसकी कोई अहमियत नहीं (सिवाय एक ब्लोग लिखने और भूल जाने के)...तो किस्सा-ए-गाँधी परिवार शुरु होता है साहेबान...शुरुआत होती है "गंगाधर" (गंगाधर नेहरू नहीं), यानी मोतीलाल नेहरू के पिता से । नेहरू उपनाम बाद में मोतीलाल ने खुद लगा लिया था, जिसका शाब्दिक अर्थ था "नहर वाले", वरना तो उनका नाम होना चाहिये था "मोतीलाल धर", लेकिन जैसा कि इस खानदान की नाम बदलने की आदत थी उसी के मुताबिक उन्होंने यह किया । रॉबर्ट हार्डी एन्ड्रूज की किताब "ए लैम्प फ़ॉर इंडिया - द स्टोरी ऑफ़ मदाम पंडित" में उस तथाकथित गंगाधर का चित्र छपा है, जिसके अनुसार गंगाधर असल में एक सुन्नी मुसलमान था, जिसका असली नाम गयासुद्दीन गाजी था. लोग सोचेंगे कि यह खोज कैसे हुई ?

दरअसल नेहरू ने खुद की आत्मकथा में एक जगह लिखा था कि उनके दादा अर्थात मोतीलाल के पिता गंगा धर थे, ठीक वैसा ही जवाहर की बहन कृष्णा ने भी एक जगह लिखा है कि उनके दादाजी मुगल सल्तनत (बहादुरशाह जफ़र के समय) में नगर कोतवाल थे. अब इतिहासकारों ने खोजबीन की तो पाया कि बहादुरशाह जफ़र के समय कोई भी हिन्दू इतनी महत्वपूर्ण ओहदे पर नहीं था..और खोजबीन पर पता चला कि उस वक्त के दो नायब कोतवाल हिन्दू थे नाम थे भाऊ सिंह और काशीनाथ, जो कि लाहौरी गेट दिल्ली में तैनात थे, लेकिन किसी गंगा धर नाम के व्यक्ति का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला (मेहदी हुसैन की पुस्तक : बहादुरशाह जफ़र और १८५७ का गदर, १९८७ की आवृत्ति), रिकॉर्ड मिलता भी कैसे, क्योंकि गंगा धर नाम तो बाद में अंग्रेजों के कहर से डर कर बदला गया था, असली नाम तो था "गयासुद्दीन गाजी" । जब अंग्रेजों ने दिल्ली को लगभग जीत लिया था,तब मुगलों और मुसलमानों के दोबारा विद्रोह के डर से उन्होंने दिल्ली के सारे हिन्दुओं और मुसलमानों को शहर से बाहर करके तम्बुओं में ठहरा दिया था (जैसे कि आज कश्मीरी पंडित रह रहे हैं), अंग्रेज वह गलती नहीं दोहराना चाहते थे, जो हिन्दू राजाओं (पृथ्वीराज चौहान ने) ने मुसलमान आक्रांताओं को जीवित छोडकर की थी, इसलिये उन्होंने चुन-चुन कर मुसलमानों को मारना शुरु किया, लेकिन कुछ मुसलमान दिल्ली से भागकर पास के इलाकों मे चले गये थे । उसी समय यह परिवार भी आगरा की तरफ़ कूच कर गया...हमने यह कैसे जाना ? नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि आगरा जाते समय उनके दादा गंगा धर को अंग्रेजों ने रोक कर पूछताछ की थी, लेकिन तब गंगा धर ने उनसे कहा था कि वे मुसलमान नहीं हैं, बल्कि कश्मीरी पंडित हैं और अंग्रेजों ने उन्हें आगरा जाने दिया... बाकी तो इतिहास है ही । यह "धर" उपनाम कश्मीरी पंडितों में आमतौर पाया जाता है, और इसी का अपभ्रंश होते-होते और धर्मान्तरण होते-होते यह "दर" या "डार" हो गया जो कि कश्मीर के अविभाजित हिस्से में आमतौर पाया जाने वाला नाम है । लेकिन मोतीलाल ने नेहरू नाम चुना ताकि यह पूरी तरह से हिन्दू सा लगे । इतने पीछे से शुरुआत करने का मकसद सिर्फ़ यही है कि हमें पता चले कि "खानदानी" लोग क्या होते हैं । कहा जाता है कि आदमी और घोडे़ को उसकी नस्ल से पहचानना चाहिये, प्रत्येक व्यक्ति और घोडा अपनी नस्लीय विशेषताओं के हिसाब से ही व्यवहार करता है, संस्कार उसमें थोडा सा बदलाव ला सकते हैं, लेकिन उसका मूल स्वभाव आसानी से बदलता नहीं है.... फ़िलहाल गाँधी-नेहरू परिवार पर फ़ोकस...


अपनी पुस्तक "द नेहरू डायनेस्टी" में लेखक के.एन.राव (यहाँ उपलब्ध है) लिखते हैं....ऐसा माना जाता है कि जवाहरलाल, मोतीलाल नेहरू के पुत्र थे और मोतीलाल के पिता का नाम था गंगाधर । यह तो हम जानते ही हैं कि जवाहरलाल की एक पुत्री थी इन्दिरा प्रियदर्शिनी नेहरू । कमला नेहरू उनकी माता का नाम था, जिनकी मृत्यु स्विटजरलैण्ड में टीबी से हुई थी । कमला शुरु से ही इन्दिरा के फ़िरोज से विवाह के खिलाफ़ थीं... क्यों ? यह हमें नहीं बताया जाता...लेकिन यह फ़िरोज गाँधी कौन थे ? फ़िरोज उस व्यापारी के बेटे थे, जो "आनन्द भवन" में घरेलू सामान और शराब पहुँचाने का काम करता था...नाम... बताता हूँ.... पहले आनन्द भवन के बारे में थोडा सा... आनन्द भवन का असली नाम था "इशरत मंजिल" और उसके मालिक थे मुबारक अली... मोतीलाल नेहरू पहले इन्हीं मुबारक अली के यहाँ काम करते थे...खैर...हममें से सभी जानते हैं कि राजीव गाँधी के नाना का नाम था जवाहरलाल नेहरू, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति के नाना के साथ ही दादा भी तो होते हैं... और अधिकतर परिवारों में दादा और पिता का नाम ज्यादा महत्वपूर्ण होता है, बजाय नाना या मामा के... तो फ़िर राजीव गाँधी के दादाजी का नाम क्या था.... किसी को मालूम है ? नहीं ना... ऐसा इसलिये है, क्योंकि राजीव गाँधी के दादा थे नवाब खान, एक मुस्लिम व्यापारी जो आनन्द भवन में सामान सप्लाय करता था और जिसका मूल निवास था जूनागढ गुजरात में... नवाब खान ने एक पारसी महिला से शादी की और उसे मुस्लिम बनाया... फ़िरोज इसी महिला की सन्तान थे और उनकी माँ का उपनाम था "घांदी" (गाँधी नहीं)... घांदी नाम पारसियों में अक्सर पाया जाता था...विवाह से पहले फ़िरोज गाँधी ना होकर फ़िरोज खान थे और कमला नेहरू के विरोध का असली कारण भी यही था...हमें बताया जाता है कि राजीव गाँधी पहले पारसी थे... यह मात्र एक भ्रम पैदा किया गया है । इन्दिरा गाँधी अकेलेपन और अवसाद का शिकार थीं । शांति निकेतन में पढते वक्त ही रविन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें अनुचित व्यवहार के लिये निकाल बाहर किया था... अब आप खुद ही सोचिये... एक तन्हा जवान लडकी जिसके पिता राजनीति में पूरी तरह से व्यस्त और माँ लगभग मृत्यु शैया पर पडी़ हुई हों... थोडी सी सहानुभूति मात्र से क्यों ना पिघलेगी, और विपरीत लिंग की ओर क्यों ना आकर्षित होगी ? इसी बात का फ़ायदा फ़िरोज खान ने उठाया और इन्दिरा को बहला-फ़ुसलाकर उसका धर्म परिवर्तन करवाकर लन्दन की एक मस्जिद में उससे शादी रचा ली (नाम रखा "मैमूना बेगम") । नेहरू को पता चला तो वे बहुत लाल-पीले हुए, लेकिन अब क्या किया जा सकता था...जब यह खबर मोहनदास करमचन्द गाँधी को मिली तो उन्होंने ताबडतोड नेहरू को बुलाकर समझाया, राजनैतिक छवि की खातिर फ़िरोज को मनाया कि वह अपना नाम गाँधी रख ले.. यह एक आसान काम था कि एक शपथ पत्र के जरिये, बजाय धर्म बदलने के सिर्फ़ नाम बदला जाये... तो फ़िरोज खान (घांदी) बन गये फ़िरोज गाँधी । और विडम्बना यह है कि सत्य-सत्य का जाप करने वाले और "सत्य के साथ मेरे प्रयोग" लिखने वाले गाँधी ने इस बात का उल्लेख आज तक कहीं नहीं किया, और वे महात्मा भी कहलाये...खैर... उन दोनों (फ़िरोज और इन्दिरा) को भारत बुलाकर जनता के सामने दिखावे के लिये एक बार पुनः वैदिक रीति से उनका विवाह करवाया गया, ताकि उनके खानदान की ऊँची नाक (?) का भ्रम बना रहे । इस बारे में नेहरू के सेक्रेटरी एम.ओ.मथाई अपनी पुस्तक "रेमेनिसेन्सेस ऑफ़ थे नेहरू एज" (पृष्ट ९४ पैरा २) (अब भारत सरकार द्वारा प्रतिबन्धित) में लिखते हैं कि "पता नहीं क्यों नेहरू ने सन १९४२ में एक अन्तर्जातीय और अन्तर्धार्मिक विवाह को वैदिक रीतिरिवाजों से किये जाने को अनुमति दी, जबकि उस समय यह अवैधानिक था, कानूनी रूप से उसे "सिविल मैरिज" होना चाहिये था" । यह तो एक स्थापित तथ्य है कि राजीव गाँधी के जन्म के कुछ समय बाद इन्दिरा और फ़िरोज अलग हो गये थे, हालाँकि तलाक नहीं हुआ था । फ़िरोज गाँधी अक्सर नेहरू परिवार को पैसे माँगते हुए परेशान किया करते थे, और नेहरू की राजनैतिक गतिविधियों में हस्तक्षेप तक करने लगे थे । तंग आकर नेहरू ने फ़िरोज का "तीन मूर्ति भवन" मे आने-जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था । मथाई लिखते हैं फ़िरोज की मृत्यु से नेहरू और इन्दिरा को बडी़ राहत मिली थी । १९६० में फ़िरोज गाँधी की मृत्यु भी रहस्यमय हालात में हुई थी, जबकि वह दूसरी शादी रचाने की योजना बना चुके थे । अपुष्ट सूत्रों, कुछ खोजी पत्रकारों और इन्दिरा गाँधी के फ़िरोज से अलगाव के कारण यह तथ्य भी स्थापित हुआ कि श्रीमती इन्दिरा गाँधी (या श्रीमती फ़िरोज खान) का दूसरा बेटा अर्थात संजय गाँधी, फ़िरोज की सन्तान नहीं था, संजय गाँधी एक और मुस्लिम मोहम्मद यूनुस का बेटा था । संजय गाँधी का असली नाम दरअसल संजीव गाँधी था, अपने बडे भाई राजीव गाँधी से मिलता जुलता । लेकिन संजय नाम रखने की नौबत इसलिये आई क्योंकि उसे लन्दन पुलिस ने इंग्लैण्ड में कार चोरी के आरोप में पकड़ लिया था और उसका पासपोर्ट जब्त कर लिया था । ब्रिटेन में तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त कृष्ण मेनन ने तब मदद करके संजीव गाँधी का नाम बदलकर नया पासपोर्ट संजय गाँधी के नाम से बनवाया था (इन्हीं कृष्ण मेनन साहब को भ्रष्टाचार के एक मामले में नेहरू और इन्दिरा ने बचाया था) । अब संयोग पर संयोग देखिये... संजय गाँधी का विवाह "मेनका आनन्द" से हुआ... कहाँ... मोहम्मद यूनुस के घर पर (है ना आश्चर्य की बात)... मोहम्मद यूनुस की पुस्तक "पर्सन्स, पैशन्स एण्ड पोलिटिक्स" में बालक संजय का इस्लामी रीतिरिवाजों के मुताबिक खतना बताया गया है, हालांकि उसे "फ़िमोसिस" नामक बीमारी के कारण किया गया कृत्य बताया गया है, ताकि हम लोग (आम जनता) गाफ़िल रहें.... मेनका जो कि एक सिख लडकी थी, संजय की रंगरेलियों की वजह से गर्भवती हो गईं थीं और फ़िर मेनका के पिता कर्नल आनन्द ने संजय को जान से मारने की धमकी दी थी, फ़िर उनकी शादी हुई और मेनका का नाम बदलकर "मानेका" किया गया, क्योंकि इन्दिरा गाँधी को "मेनका" नाम पसन्द नहीं था (यह इन्द्रसभा की नृत्यांगना टाईप का नाम लगता था), पसन्द तो मेनका, मोहम्मद यूनुस को भी नहीं थी क्योंकि उन्होंने एक मुस्लिम लडकी संजय के लिये देख रखी थी । फ़िर भी मेनका कोई साधारण लडकी नहीं थीं, क्योंकि उस जमाने में उन्होंने बॉम्बे डाईंग के लिये सिर्फ़ एक तौलिये में विज्ञापन किया था । आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि संजय गाँधी अपनी माँ को ब्लैकमेल करते थे और जिसके कारण उनके सभी बुरे कृत्यों पर इन्दिरा ने हमेशा परदा डाला और उसे अपनी मनमानी करने की छूट दी । ऐसा प्रतीत होता है कि शायद संजय गाँधी को उसके असली पिता का नाम मालूम हो गया था और यही इन्दिरा की कमजोर नस थी, वरना क्या कारण था कि संजय के विशेष नसबन्दी अभियान (जिसका मुसलमानों ने भारी विरोध किया था) के दौरान उन्होंने चुप्पी साधे रखी, और संजय की मौत के तत्काल बाद काफ़ी समय तक वे एक चाभियों का गुच्छा खोजती रहीं थी, जबकि मोहम्मद यूनुस संजय की लाश पर दहाडें मार कर रोने वाले एकमात्र बाहरी व्यक्ति थे...। (संजय गाँधी के तीन अन्य मित्र कमलनाथ, अकबर अहमद डम्पी और विद्याचरण शुक्ल, ये चारों उन दिनों "चाण्डाल चौकडी" कहलाते थे... इनकी रंगरेलियों के किस्से तो बहुत मशहूर हो चुके हैं जैसे कि अंबिका सोनी और रुखसाना सुलताना [अभिनेत्री अमृता सिंह की माँ] के साथ इन लोगों की विशेष नजदीकियाँ....)एम.ओ.मथाई अपनी पुस्तक के पृष्ठ २०६ पर लिखते हैं - "१९४८ में वाराणसी से एक सन्यासिन दिल्ली आई जिसका काल्पनिक नाम श्रद्धा माता था । वह संस्कृत की विद्वान थी और कई सांसद उसके व्याख्यान सुनने को बेताब रहते थे । वह भारतीय पुरालेखों और सनातन संस्कृति की अच्छी जानकार थी । नेहरू के पुराने कर्मचारी एस.डी.उपाध्याय ने एक हिन्दी का पत्र नेहरू को सौंपा जिसके कारण नेहरू उस सन्यासिन को एक इंटरव्यू देने को राजी हुए । चूँकि देश तब आजाद हुआ ही था और काम बहुत था, नेहरू ने अधिकतर बार इंटरव्य़ू आधी रात के समय ही दिये । मथाई के शब्दों में - एक रात मैने उसे पीएम हाऊस से निकलते देखा, वह बहुत ही जवान, खूबसूरत और दिलकश थी - । एक बार नेहरू के लखनऊ दौरे के समय श्रध्दामाता उनसे मिली और उपाध्याय जी हमेशा की तरह एक पत्र लेकर नेहरू के पास आये, नेहरू ने भी उसे उत्तर दिया, और अचानक एक दिन श्रद्धा माता गायब हो गईं, किसी के ढूँढे से नहीं मिलीं । नवम्बर १९४९ में बेंगलूर के एक कॉन्वेंट से एक सुदर्शन सा आदमी पत्रों का एक बंडल लेकर आया । उसने कहा कि उत्तर भारत से एक युवती उस कॉन्वेंट में कुछ महीने पहले आई थी और उसने एक बच्चे को जन्म दिया । उस युवती ने अपना नाम पता नहीं बताया और बच्चे के जन्म के तुरन्त बाद ही उस बच्चे को वहाँ छोडकर गायब हो गई थी । उसकी निजी वस्तुओं में हिन्दी में लिखे कुछ पत्र बरामद हुए जो प्रधानमन्त्री द्वारा लिखे गये हैं, पत्रों का वह बंडल उस आदमी ने अधिकारियों के सुपुर्द कर दिया ।

मथाई लिखते हैं - मैने उस बच्चे और उसकी माँ की खोजबीन की काफ़ी कोशिश की, लेकिन कॉन्वेंट की मुख्य मिस्ट्रेस, जो कि एक विदेशी महिला थी, बहुत कठोर अनुशासन वाली थी और उसने इस मामले में एक शब्द भी किसी से नहीं कहा.....लेकिन मेरी इच्छा थी कि उस बच्चे का पालन-पोषण मैं करुँ और उसे रोमन कैथोलिक संस्कारों में बडा करूँ, चाहे उसे अपने पिता का नाम कभी भी मालूम ना हो.... लेकिन विधाता को यह मंजूर नहीं था.... खैर... हम बात कर रहे थे राजीव गाँधी की...जैसा कि हमें मालूम है राजीव गाँधी ने, तूरिन (इटली) की महिला सानिया माईनो से विवाह करने के लिये अपना तथाकथित पारसी धर्म छोडकर कैथोलिक ईसाई धर्म अपना लिया था । राजीव गाँधी बन गये थे रोबेर्तो और उनके दो बच्चे हुए जिसमें से लडकी का नाम था "बियेन्का" और लडके का "रॉल" । बडी ही चालाकी से भारतीय जनता को बेवकूफ़ बनाने के लिये राजीव-सोनिया का हिन्दू रीतिरिवाजों से पुनर्विवाह करवाया गया और बच्चों का नाम "बियेन्का" से बदलकर प्रियंका और "रॉल" से बदलकर राहुल कर दिया गया... बेचारी भोली-भाली आम जनता !

प्रधानमन्त्री बनने के बाद राजीव गाँधी ने लन्दन की एक प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में अपने-आप को पारसी की सन्तान बताया था, जबकि पारसियों से उनका कोई लेना-देना ही नहीं था, क्योंकि वे तो एक मुस्लिम की सन्तान थे जिसने नाम बदलकर पारसी उपनाम रख लिया था । हमें बताया गया है कि राजीव गाँधी केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के स्नातक थे, यह अर्धसत्य है... ये तो सच है कि राजीव केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में मेकेनिकल इंजीनियरिंग के छात्र थे, लेकिन उन्हें वहाँ से बिना किसी डिग्री के निकलना पडा था, क्योंकि वे लगातार तीन साल फ़ेल हो गये थे... लगभग यही हाल सानिया माईनो का था...हमें यही बताया गया है कि वे भी केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की स्नातक हैं... जबकि सच्चाई यह है कि सोनिया स्नातक हैं ही नहीं, वे केम्ब्रिज में पढने जरूर गईं थीं लेकिन केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में नहीं । सोनिया गाँधी केम्ब्रिज में अंग्रेजी सीखने का एक कोर्स करने गई थी, ना कि विश्वविद्यालय में (यह बात हाल ही में लोकसभा सचिवालय द्वारा माँगी गई जानकारी के तहत खुद सोनिया गाँधी ने मुहैया कराई है, उन्होंने बडे ही मासूम अन्दाज में कहा कि उन्होंने कब यह दावा किया था कि वे केम्ब्रिज की स्नातक हैं, अर्थात उनके चमचों ने यह बेपर की उडाई थी)। क्रूरता की हद तो यह थी कि राजीव का अन्तिम संस्कार हिन्दू रीतिरिवाजों के तहत किया गया, ना ही पारसी तरीके से ना ही मुस्लिम तरीके से । इसी नेहरू खानदान की भारत की जनता पूजा करती है, एक इटालियन महिला जिसकी एकमात्र योग्यता यह है कि वह इस खानदान की बहू है आज देश की सबसे बडी पार्टी की कर्ताधर्ता है और "रॉल" को भारत का भविष्य बताया जा रहा है । मेनका गाँधी को विपक्षी पार्टियों द्वारा हाथोंहाथ इसीलिये लिया था कि वे नेहरू खानदान की बहू हैं, इसलिये नहीं कि वे कोई समाजसेवी या प्राणियों पर दया रखने वाली हैं....और यदि कोई सानिया माइनो की तुलना मदर टेरेसा या एनीबेसेण्ट से करता है तो उसकी बुद्धि पर तरस खाया जा सकता है और हिन्दुस्तान की बदकिस्मती पर सिर धुनना ही होगा...

 यह अनुवाद सिर्फ़ इसीलिये किया गया है कि जो बात बरसों पहले से ही अंग्रेजी में उपलब्ध है, उसे हिन्दी में भी अनुवादित भी होना चाहिये.... यह करने के पीछे उद्देश्य किसी का दिल दुखाना नहीं है, ना ही अपने चिठ्ठे की टीआरपी बढाने का है... हाँ यह स्वार्थ जरूर है कि यदि पाठकों को अनुवाद पसन्द आया तो इस क्षेत्र में भी हाथ आजमाया जाये और इस गरीब की झोली में थोडा़ सा नावां-पत्ता आ गिरे.... (नीले रंग से इटैलिक किये हुए शब्द मेरे हैं, बाकी सब अनुवाद है)
शनिवार, 21 अप्रैल 2007 10:41

आप क्या सोचते हैं ?

आजादी के ६० वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भारत के बारे में विभिन्न आयु समूहों की सोच अलग-अलग हो गई है । आप क्या सोचते हैं, यह इस बात पर निर्भर हो गया है कि आप कौन हैं, आप क्या हैं, आपकी जाति क्या है, धर्म क्या है, शिक्षा क्या है, अमीर हैं या गरीब हैं आदि खाँचों में हमारी सोच बँटी हुई है । कहा जाता है कि देश, काल और परिस्थिति के अनुसार मनुष्य की सोच और उसका व्यवहार बदलता रहता है, परन्तु भारत के बारे में यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि यहाँ बहुसंख्यक अवाम की कोई सोच (जिसे हम "विचार" कहते हैं) विकसित हुई ही नहीं । एक तरफ़ तो हम देखते हैं कि इसराईल जैसे देश में जब रेडियो पर भी राष्ट्रीय गीत की धुन बजती है तो लोगबाग अपनी कारें रोक कर बाहर निकलकर खडे हो जाते हैं और दूसरी तरफ़ हमारे देश के एक महान (?) नेता राष्ट्रगीत के समय आराम से सोफ़े पर पसरे रहते हैं (देखें चित्र), यह सब क्या है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें आजादी इसलिये मिल गई कि ब्रिटिश भी विश्वयुद्ध के बाद यहाँ से उकता चुके थे और जाने-अनजाने गाँधी के सत्याग्रह और अहिंसा ने उन्हें ही आजादी प्राप्त करने वाले का "आइकॉन" बना दिया था ? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें आजादी रक्तहीन (बाकी कई राष्ट्रों की तुलना में कम रक्त बहाकर) आन्दोलन से मिल गई ? आज देशभक्ति, ईमानदारी, वफ़ादारी, संवेदनापूर्ण हृदय जैसी बातें किताबी लगती हैं, विश्वास ही नहीं होता कि हमारा देश सिर्फ़ ६० वर्ष पहले आजाद हुआ था । आज की परिस्थिति को देखकर आश्चर्य होता है कि हमें आजादी मिल कैसे गई ? उस वक्त लोगों में देशभक्ति, ईमानदारी और नैतिकता की कैसी भावना थी, जो उन्होंने अंग्रेजों से संघर्ष किया और हमें स्वतंत्रता दिलाई, यह प्रश्न मन में इसलिये उठता है, क्योंकि जैसा कि पहले कहा गया "मात्र" (किसी राष्ट्र के जीवन में ६० वर्ष कोई बडा़ वक्फ़ा नहीं है) ६० वर्षों में हम पतन की पराकाष्ठा पर पहुँच गये ? ऐसा क्यों हुआ ? या जो हो रहा है, वैसा क्यों हो रहा है ? भाषा-धर्म को लेकर हो रहे दंगे, रग-रग में फ़ैल चुका भ्रष्टाचार और बेईमानी, तेजी से बढते अपराध और अब राजनीति और अपराध का खतरनाक घालमेल, शिक्षा का गिरता स्तर, पारम्परिक डिग्रियों का मात्र एक कागज रह जाना, शिक्षा के प्रसार के ढोल पीटने के बावजूद सार्वजनिक और नागरिक जीवन में लोगों में बढती अराजकता और उद्दण्डता, गन्दे कुकुरमुत्ते की तरह फ़ैलती और हमें मुँह चिढाती "काँटा लगा" और राखी-शिल्पा टाईप की संस्कृति, कन्या पूजने और स्त्री को माता मानने का ढोंग करने वालों के हाथों भ्रूण हत्या, बिका हुआ और लगभग भद्दी नौटंकी की हद तक जा चुका इलेक्ट्रानिक मीडिया....क्या-क्या और कितना गिनवाया जाये, इसका कोई अन्त नहीं है । आखिर यह विस्फ़ोटक स्थिति आई कैसे ? यह कोई रातोंरात होने वाली बातें तो नहीं हैं ? जाहिर है कि हमसे प्रारम्भ से ही भीषण गलतियाँ हो गई हैं । उसका परिमार्जन कैसे किया जा सकता है ? दरअसल आजादी के बाद आम जनता, जिसमें अशिक्षितों का प्रतिशत काफ़ी ज्यादा था, ने देश को संवारने का जिम्मा राजनीति और नेताओं पर छोड दिया, और नेताओं ने भी आम जनता को सबसे आवश्यक बात "शिक्षा", "स्वास्थ्य" और "बुनियादी ढाँचे का विकास" इन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया । इन्हीं तीन मूलभूत बातों के अभाव में जनसंख्या वृद्धि, पर्यावरण विनाश और सामाजिक ताने-बाने में ओजोन परत से भी बडे छेद, जैसी विराट समयाओं को जन्म दिया । जिस प्रकार की विविधताओं वाला हमारा देश है, उसमें सर्वमान्य और एकछत्र नेता मिलना दुर्लभ है । इसीलिये आजादी के बाद से ही हम "मेरा देश" की भावना विकसित नहीं कर पाये और मेरा घर, मेरा परिवार, मेरे बच्चे तक ही सीमित होकर रह गये । ऐसा नहीं कि हमने कुछ किया ही नहीं, बेशक भारत ने जबरदस्त तरक्की की है, विज्ञान, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य, कम्प्यूटर, शिक्षा, सेना, अर्थात लगभग सभी क्षेत्रों में । परन्तु... फ़िर वही बात कि इस विकास में महती योगदान व्यक्तोयों का रहा, न कि नेताओं या राजनीति का । विभिन्न लोगों ने अपने व्यक्तिगत प्रयास और अथक मेहनत करके भारत का और अपना नाम रोशन किया है, जाहिर है बेहतर अवसर मिलने पर ही, और विडम्बना यह है कि इस विशाल मानव समुद्र का हम बेहतर उपयोग नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि स्थिति यह हो गई है कि जिसके पास पैसा है वही सारी सुविधायें छीनता जा रहा है, और गरीब आदमी दिनोंदिन गर्त में जा रहा है । एक साजिश के तहत इस देश में मात्र दस प्रतिशत लोगों का राज सदा चला आ रहा है, पच्चीस प्रतिशत लोग उनके आदेशों का पालन करते हैं, और बाकी बचे पैंसठ प्रतिशत (जिनके लिये नीतियाँ बनाई जाती हैं) वे तो सदा दो जून की रोटी के संघर्ष में इतने घिस-पिट चुके हैं कि कोई विरोध करने के लिये अब उनके हाथ उठते तक नहीं । देश को जगाना है, या उसे दुनिया में एक शक्ति के रूप में बनाना है, तो सबसे पहले उन पैंसठ प्रतिशत लोगों की हालत सुधारनी होगी, और यह काम कोई व्यक्ति या संस्था नहीं कर सकती, यह काम तो सामूहिक जिम्मेदारी का है । विदेशों में भारतीयों की सफ़लता ने इस बात को रेखांकित किया है कि बेहतर सामाजिक, आर्थिक, नागरिक और राजनैतिक वातावरण मिलने पर हम भारतीय कुछ भी कर सकते हैं, और इस वातावरण के निर्माण के लिये अब एक "सम्पूर्ण क्रांति" की आवश्यकता है.... एक ऐसा सैलाब जो सारी गन्दगी को बहा ले जाये... आप क्या सोचते हैं ?
कल ही खबर पढी कि ऐश-अभि की शादी का कवरेज करने गये पत्रकारों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झडप हुई, कुछ दिन पहले स्टार न्यूज के दफ़्तर पर भी हमला हुआ, जिसे प्रेस पर हमला बताकर कई भाईयों ने निन्दा की...तो भाईयों सबसे पहले तो यह खयाल दिल से निकाल दें कि ये लोग पत्रकार हैं, ये लोग हैं भारत में पनप रही "नव-पपाराजियों" की भीड़, जिसका पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं है..इन लोगों के लिये भारत और भारत की समस्याएं मतलब है... अमिताभ की मन्दिर परिक्रमा, ऐश-अभिषेक की शादी, क्रिकेट और सचिन तेंडुलकर, या कोई फ़ैशन शो, या कोई बेमतलब का प्यार-अपहरण-हत्या का केस, जिसे घंटों, दिनों, महीनों चबाये रह सकते हैं किसी तथाकथित टीआरपी के नाम पर..इन्हें ना तो यह पता है कि नक्सलियों का आतंक कहाँ तक और कैसे पहुँच गया है, न इन्हें इस बात से कोई मतलब है कि गेहूँ की बम्पर फ़सल के बावजूद उसके दाम बढ रहे हैं, ना ही ये जानते हैं कि वायदा बाजार में सट्टेबाजी के कारण दालें आम आदमी की पहुँच से बाहर होती जा रही हैं, भ्रष्टाचार और अनैतिकता से सडा हुआ समाज इन्हें नहीं दिखता...किसानों की आत्महत्याएं इन्हें नहीं झकझोरतीं...और भी बहुत कुछ नहीं दिखता और ना ही सुनाई देता है..इन्हें तो बस कैमरे और माईक लेकर भारत की जनता को बेवकूफ़ बनाने में मजा आता है...काहे के पत्रकार..ये तो भूखे भेडिये बन गये हैं...एंजेलीना जोली के सुरक्षाकर्मियों ने जो एक "पपारजी" के साथ किया उसमें कुछ भी गलत नहीं था और जो अब भारत में यहाँ-वहाँ-जहाँ-तहाँ..मत पूछो कहाँ-कहाँ, जैसी इन तथाकथित पत्रकारों की पिटाई हो रही है उसमें स्यापा करने की कोई जरूरत नहीं है, इनसे कोई सहानुभूति जताने की भी जरूरत नहीं है । जो वर्ग आम जनता से कट चुका है उसके लिये क्या रोना-धोना ? बल्कि मैं तो एक कदम आगे जाकर इन लोगों की "कम्बल-कुटाई" के पक्ष में हूँ...(कम्बल कुटाई का मतलब होता है, पहले उस पर कम्बल डाल दो और फ़िर जमकर धुलाई करो..ताकि भविष्य में वह पहचान भी ना सके कि किसने धुलाई की थी...वरना फ़िर से शिकारी कुत्ते की तरह ये उसके पीछे पड जायेंगे)। लेकिन ये सुधरने वाली जमात नहीं है.. अभिषेक-ऐश की शादी से निपटेंगे तो विश्वकप फ़ायनल आ जायेगा, फ़िर उससे निपटते ही उत्तरप्रदेश के चुनावों के परिणाम आ जायेंगे... फ़िर कोई राखी सावन्त आ जायेगी, फ़िर कोई छिछोरा रिचर्ड गेर चूमा-चाटी में लग जायेगा.. मतलब इन पत्रकारों के पास काम (?) की कोई कमी नहीं रहने वाली... तो इन्हें कूटे खाने दो.. अपन तो अपना काम करें..
सोमवार, 23 अप्रैल 2007 12:51

South and North States of India :- Increasing Difference

उत्तर-दक्षिण के बीच बढती खाई… 

विश्व बैंक की ताजा सर्वेक्षण रिपोर्ट में बताया गया है कि केरल और उत्तरप्रदेश के मानव विकास सूचकांक में काफ़ी बडा़ अन्तर आ गया है । शिक्षा, स्वास्थ्य, जनभागीदारी के कार्यक्रम, शिशु मृत्यु दर, बालिका साक्षरता, महिला जागरूकता आदि कई बिन्दुओं पर विश्व बैंक ने इस तथ्य को रेखांकित किया है कि सामाजिक विकास की दृष्टि से केरल भारत के अग्रणी राज्यों में से एक है, और उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्यप्रदेश (जिसकी स्थिति बाकी तीनों से कुछ बेहतर बताई गई है) ये चारों राज्य अब तक "बीमारू" राज्यों की श्रेणी से बाहर नहीं निकल सके हैं, और ना ही निकट भविष्य में इसकी कोई सम्भावना है ।

कुछ वर्षों पूर्व जब संसद में सीटों की संख्या बढाये जाने का प्रस्ताव विचाराधीन था, तब दक्षिण के राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने राजनैतिक पूर्वाग्रहों और मतभेदों से ऊपर उठकर इस बात का विरोध किया था कि संसद में सीटों की संख्या को जनसंख्या के अनुपात में बढाया जाये । उनका तर्क था कि इस तरह तो पुनः उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे राज्यों को इसका फ़ायदा मिल जायेगा, क्योंकि जनसंख्या तो वहीं की सबसे ज्यादा बढ रही है, जबकि दक्षिण के राज्यों को एक तरह से इसकी "सजा" मिलेगी, क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियन्त्रण को प्रभावी तरीके से सफ़ल बनाया है । दक्षिणी राज्यों का विरोध बिलकुल सही था, क्योंकि अभी भी दक्षिण के राज्यों को संसद में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है, जबकि उत्तरप्रदेश (उत्तराखण्ड मिलाकर) ८५ एवं बिहार (झारखण्ड मिलाकर) ५४ सांसद संख्या के मामले में संसद में अपनी उपस्थिति से सारे गणित को उलटफ़ेर करने में सक्षम हैं ।

भारत के अधिकतर प्रधानमन्त्री उत्तरप्रदेश से आते हैं, क्योंकि लोकतन्त्र संख्या बल से चलता है (यहाँ सिर गिने जाते हैं, सिरों के भीतर क्या है यह नहीं देखा जाता), परन्तु यह संख्या बल के साथ-साथ उस जनता का भी अपमान है, जिसने स्वतः होकर जनसंख्या नियन्त्रण में महती भूमिका निभाई है, यह उनके साथ अन्याय होता कि मात्र जनसंख्या के आधार पर उत्तरप्रदेश और बिहार संसद में सभी पर हावी हो जाते हैं (लगभग यही स्थिति हिन्दी और उसके आग्रह को लेकर है और जिस पर क्षेत्रीय राज्यों को गहरी आपत्ति है, लेकिन यह बहस का अलग विषय है)... बहरहाल आर्थिक दृष्टि से अपने को समृद्ध करने के लिये चारों दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की कुछ समय पहले एक बैठक हुई थी, जिसमें इन चारों राज्यों ने अपने राजनैतिक विचारधाराओं और पार्टियों की सीमा से ऊपर उठकर आपस में समझदारी बनाई कि चारों राज्यों को आपस में मिलकर व्यापार, परिवहन, कर प्रणाली आदि में तालमेल बनाकर उसे सरल एवं सभी के लिये फ़ायदेमन्द बनाने की कोशिश करनी चाहिये । इस प्रक्रिया में उन्होंने महाराष्ट्र को भी शामिल कर लिया है । अब भविष्य में स्थिति धीरे-धीरे यह बनने जा रही है कि दक्षिण के राज्यों का एक आर्थिक महासंघ आकार ग्रहण करेगा, जाहिर है कि इससे वहाँ की जनता को दीर्घकालीन लाभ प्राप्त होगा । दक्षिण के राज्य पहले से ही शिक्षा और स्वास्थ्य के मानकों में उत्तरी राज्यों से काफ़ी आगे हैं, लेकिन सामाजिक सुरक्षा, बुनियादी ढाँचे एवं ग्रामीण विकास में भी उत्तरी राज्य बहुत पिछडे हुए हैं, जबकि उतरप्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश से दर्जनों मन्त्री केन्द्र मे हैं और पहले भी रहते आये हैं (रेल मंत्रालय पर तो लगभग हमेशा बिहार का ही कब्जा रहा है), तर्क देने वाले अक्सर कहते हैं कि बिहार राज्य से अधिकतर आईएएस और आईपीएस चुनकर आते हैं, जरूर आते हैं, लेकिन इसलिये नहीं कि बिहार में शिक्षा का स्तर अच्छा है, बल्कि इसलिये कि बिहार में इन सिविल सेवाओं के प्रति सामाजिक आकर्षण एवं भययुक्त आदर आज भी मौजूद है ।

उत्तरी राज्यों के पिछडने का प्रमुख कारण अशिक्षा और बुनियादी सेवाओं (सडक, विजली, सिंचाई और संचार) की बेहद कमी है । ऊपर से "करेला और वो भी नीम चढा" की तर्ज पर जातीय समीकरणों वाली राजनीति ने स्थिति को और खराब कर दिया है । जबकि दक्षिणी राज्यों और महाराष्ट्र में कई सफ़ल सामाजिक आन्दोलन हुए, छुआछूत, भेदभाव, विधवा विवाह आदि पर कई समाज सुधारकों ने वहाँ समाज को जगाया, परन्तु राज्यों के विकास की कीमत पर नहीं । परन्तु उत्तर भारत में इसका ठीक उलटा हुअ, यहाँ दलितों, राजपूतों, और ब्राह्मणों को सिर्फ़ एक वोट बैंक की तरह विकसित किया गया, जोड़तोड़ से सरकार बनाओ, अपनी जातियों का भला करो, उन्हें बढावा दो, उनकी गलतियों को नजरअंदाज करो, मुफ़्तखोरी को सरकारी जामा पहना दो, अपनी गलतियों को केन्द्र के मत्थे मढने की कोशिश करो, राज्य का विकास गया भाड में । अब स्थिति यह हो गई है कि दक्षिण के राज्य केन्द्र से मिलने वाली सहायता को "परफ़ॉर्मेंस" आधारित करने की माँग कर रहे हैं, जो कि सही भी है । जैसे कि जो राज्य विद्युत पारेषण एवं उपयोग की पूरी राशि चुकायेंगे उन्हें पर्याप्त बिजली मिलनी चाहिये । इस मामले में हरियाणा का उदाहरण आश्चर्यजनक किन्तु सत्य है कि हरियाणा देश का पहला राज्य बन गया, जिसके विद्युत मण्डल ने जबरदस्त मुनाफ़ा कमाया और वहाँ किसानों को भरपूर बिजली मिल रही है । यह तो सिर्फ़ एक उदाहरण है, लेकिन बात साफ़ है कि जब तक उत्तरी राज्य जातीय राजनीति और अशिक्षा के जाल में फ़ँसे रहेंगे, समूची जनता का नुकसान तय है, और इसके कारण उत्तर भारत की प्रतिभा का पलायन मुम्बई, दिल्ली, बेंगलोर, हैदराबाद की ओर हो रहा है ।

यह बात भारत के भविष्य के लिये भी ठीक नहीं है, क्योंकि इसके कारण अलगाव की भावना पैदा होती है, जिसे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ के सन्दर्भ में समझा जा सकता है । छत्तीसगढ के लोगों में यह भावना मजबूत हो गई थी कि मध्यप्रदेश उसके अधिकतम संसाधनों का उपयोग कर रहा है, लेकिन वहाँ के निवासियों को इसका पूरा फ़ायदा नहीं मिल रहा है, उलटे किसी अधिकारी को "सजा" के तौर पर छत्तीसगढ ट्रांसफ़र किया जाता था, लगभग यही बात झारखण्ड और बिहार पर भी लागू होती है । व्यापक परिप्रेक्ष्य में देशहित में यह ठीक बात नहीं है...दक्षिणी राज्यों से प्रचुर राजस्व वसूली करके उत्तरी राज्यों को सबसिडी देना ठीक नहीं है । लेकिन जब तक जनता जाति विशेष को आरक्षण, मुफ़्त बिजली, कर्जा माफ़ी, धर्म परिवर्तन आदि मुद्दों में उलझी रहेगी, तब तक विकास नहीं हो सकता । आरक्षण से क्या हासिल होने वाला है, नौकरियाँ तो पहले से ही नहीं हैं जो हैं वे भी जाने वाली हैं, मुफ़्त बिजली बाँटकर नेताओं की जेब से क्या जाता है, कटौती तो जनता को ही भुगतना होता है, धर्म परिवर्तन रोकने या करवाने पर हल्ला मचाने से ज्यादा जरूरी है आदिवासियों की सामाजिक / आर्थिक हालत सुधारना, अवैध कालोनियों को वैध करने से अतिक्रमण रुकना तो दूर बल्कि भूमाफ़िया और जमीन दबा लेंगे । तात्पर्य यह कि नेताओं को घोषणायें करने में कुछ नहीं लगता, उन्हें तो मालूम है कि तेल तो तिल्ली में से ही निकलेगा (यानी जनता की जेब से), बस एक बार वोट दो और पाँच साल की फ़ुर्सत, परन्तु लाख टके का सवाल तो यही है कि जनता कब जागेगी ?