Super User

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I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

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गुरुवार, 15 मार्च 2007 19:39

Beggers and Begging in India as Career




 

भीख और भिखारी : उम्दा व्यवसाय ? 

उक्त समाचार १५.०३.२००७ के "नईदुनिया" में छपा है....जरा सोचिये जब ३६ हजार की सिर्फ़ प्रीमियम है तो बीमा कितने का होगा और उसकी कमाई कितनी होगी ?
संभाजी काले और उनका चार सदस्यों वाला परिवार रोजाना एक हजार रुपये कमाता है, उनके बैंक खाते में कभी भी चालीस हजार रुपये से कम की रकम नहीं रही है । उन्होंने कई कम्पनियों में निवेश भी किया है, उनका एक फ़्लैट मुम्बई के उपनगर विरार में है और सोलापुर में पुश्तैनी जमीन तथा दो मकान हैं । आप सोच रहे होंगे, क्या यह परिवार शेयर ब्रोकर है ? या मध्यम वर्ग का कोई व्यापारी ? जी नहीं, संभाजी काले साहब अपने पूरे परिवार के साथ मुंबई में भीख माँगते हैं । चौंकिये नहीं, यह सच है और ऐसी ही चौंकाने वाली जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं जब "सोशल डेवलपमेंट सेंटर" (एसडीसी) मुम्बई के छात्रों नें डॉ.चन्द्रकान्त पुरी के निर्देशन में एक सामाजिक सर्वे किया । सर्वे के मुताबिक संभाजी काले जैसे कई और भिखारी (?) मुम्बई में मौजूद हैं । चूँकि सर्वे पूरी तरह से निजी था (सरकारी नहीं) इसलिये कुछ भिखारियों ने अपनी सही-सही जानकारी दे दी, लेकिन अधिकतर भिखारियों ने अपनी सम्पत्ति और आय के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बताया । फ़िर भी सर्वे करने वालों ने बडी मेहनत से कई चौंकाने वाले आँकडे खोज निकाले हैं । संभाजी काले के अनुसार वे पच्चीस साल पहले मुम्बई आये थे । कई छोटी-मोटी नौकरियाँ की, शादी की, कई सपने देखे, लेकिन पाया कि एक धोखाधडी के चलते वे सड़क पर आ गये हैं । फ़िर उन्होंने तय किया कि वे सपरिवार भीख माँगेंगे । ट्रैफ़िक सिअगनल के नीचे रखे लकडी के बडे खोके की ओर इशारा करते हुए वे कहते हैं "यही मेरा घर है" । काले का बाकी परिवार खार (मुम्बई का एक उपनगर) में रहता है, विरार में नहीं जहाँ उनका फ़्लैट है, क्योंकि खार से अपने "काम" की जगह पर पहुँचना आसान होता है । विरार तक आने जाने में समय भी खराब होता है । काले परिवार का सबसे बडा लडका सोमनाथ सबसे अधिक भीख कमाता है, क्योंकि वह अपनी एक टाँग खो चुका है (एक बार बचपन में भीख माँगते वक्त वह कार के नीचे आ गया था) । काले परिवार में तीन बच्चे और हैं - दो लड़कियाँ और एक लड़का । कुल जमा छः लोग भीख माँगकर आराम से एक हजार रुपये कमा लेते हैं । काले कहते हैं कि बुरे से बुरे दिनों में भी (अर्थात जब मुम्बई महानगरपालिका उन्हें अचानक खदेडने लग जाये, बन्द का ऐलान हो जाये, कर्फ़्यू लग जाये, लगातार दो-तीन दिन छुट्टी आ जाये आदि) वे तीन-चार सौ रुपये तो कमा ही लेते हैं । इस भिखारी परिवार को खार में बहुतेरे लोग जानते हैं और मजेदार बात यह है कि बैंक के कागजात या चिट्ठी-पत्री आदि भी उन तक पहुँच जाती हैं । उनका कहना है कि यह सब उनके अच्छे व्यवहार और पोस्टमैन से "सेटिंग" की वजह से हो पाता है । उक्त सर्वे के अनुसार प्रत्येक भिखारी औसतन प्रतिदिन दो-तीन सौ रुपये तो कमा ही लेता है और उनकी पसन्दीदा जगहें होती हैं ट्रैफ़िक सिग्नल और धार्मिक स्थान । पुरी साहब के अनुसार मात्र पन्द्रह प्रतिशत भिखारी ही असली भिखारी हैं, जिनमें से कुछ वाकई गरीब हैं । जिनमें से कुछ विकलांग हैं, कुछ ऐसे हैं जिन्हें उनके बेटों ने घर से निकाल दिया है, बाकी के पिचासी प्रतिशत भिखारी सिर्फ़ इसी "काम" के लिये अपने गाँव से मुम्बई आये हैं । वे बाकायदा छुट्टी मनाते हैं, अपने गाँव जाते हैं, होटलों में जाते हैं । उस वक्त वे अपनी "जगह" या "सिग्नल" दूसरे भिखारी को लीज पर दे देते हैं और प्रतिशत के हिसाब से उनसे पैसे वसूलते हैं । इच्छित जगह पाने के लिये कभी-कभी इनमें भयंकर खून-खराबा भी होता है और इनके गैंग लीडर (जो कि कोई स्थानीय दादा या किसी विख्यात नेता का गुर्गा होता है) बाकायदा मामले सुलझाते हैं, जाहिर है इसमें अंडरवर्ल्ड की भी भूमिका होती है । अपने-अपने इलाके पर कब्जे को लेकर इनमें गैंगवार भी होते रहते हैं । भिखारियों के अलग-अलग समूह बनाकर उनका वर्गीकरण किया जाता है, बच्चों को पहले चोरी करना, जेब काटना और ट्रेनों में सामान पार करना सिखाया जाता है, फ़िर उनमें से कुछ को भीख माँगने के काम में लिया जाता है । एक बार सरकार ने भिखारियों के पुनर्वास के लिये इन्हें काम दिलवाने की कोशिश की लेकिन कुछ दिनों के बाद वे पुनः भीख माँगने लगे । मुम्बई में लगभग एक लाख भिखारी हैं, इनके काम के घंटे बँधे होते हैं । शाम का समय सबसे अधिक कमाई का होता है । धार्मिक महत्व के दिनों के अनुसार वे अपनी जगहें बदलते रहते हैं । मंगलवार को सिद्धिविनायक मन्दिर के बाहर, बुधवार को संत माईकल चर्च, शुक्रवार को हाजी अली दरगाह और रविवार को महालक्ष्मी मन्दिर में उनका धन्धा चमकदार होता है । यह खबर भी अधिक पुरानी नहीं हुई है कि राजस्थान के पुष्कर में एक भिखारी करोडपति है और बाकायदा मोटरसायकल से भीख माँगने आता है । तिरुपति में एक भिखारी ब्याज पर पैसे देने काम करता है ।

इसलिये भविष्य में किसी भिखारी को झिडकने से पहले सोच लीजिये कि कहीं वह आपसे अधिक पैसे वाला तो नहीं है ? और सबसे बडी बात तो यह कि क्या आप उसे भीख देंगे ?

तो भाईयों सॉफ़्टवेयर इंजीनियर नहीं बन सकें, तो एक चमकदार कैरियर (वो भी टैक्स फ़्री) आपका इंतजार कर रहा है .... smile_teeth
मंगलवार, 17 जुलाई 2007 17:45

"माँ" पर निबन्ध : माँ से पहचान

राहुल.. होमवर्क हो गया क्या ? चलो जल्दी करो.. स्कूल को देर हो रही है । हो गया मम्मी.. देखो स्कूल में मुझे "मेरी माँ" पर निबन्ध लिखकर ले जाना है, मैने लिखा है - "मेरी माँ मुझे जल्दी उठाती है, होमवर्क करवाती है, पढा़ती है, मुझे कहानियाँ सुनाती है, मुझे डॉक्टर के यहाँ ले जाती है..." चलो,चलो ठीक है, जल्दी से नाश्ता कर लो... बस आती ही होगी । माँ ने राहुल को मदद करके उसे स्कूल भेज दिया । लेकिन शाम को जब राहुल स्कूल से वापस आया तो गुमसुम सा था, निराश सा था । स्कूल में मैडम ने कहा कि जो तुम लोग लिखकर लाये हो, वह तो सभी बच्चों ने थोडे-बहुत फ़ेरबदल के साथ लिखा है, तुम लोगों ने निबन्ध में नया क्या लिखा ? माँ तुम्हारे लिये इतना कुछ करती है, इसलिये वह तुम्हें अच्छी लगती है, लेकिन अपनी माँ के बारे में तुम्हें क्या-क्या मालूम है, वह लिखो... तुम्हारी माँ को क्या पसन्द-नापसन्द है, उसके शौक क्या हैं, उसका जन्मदिन, उसकी मेहनत... इन सब के बारे में तुम्हारे पिताजी को, तुम्हारी दीदी और भैया को क्या लगता है, तुम लोग अपनी माँ के लिये क्या करते हो ? इन सब बातों को देखो, परखो और निरीक्षण करके नया निबन्ध लिखकर लाओ, चाहो तो अपने दीदी, भाई या पिताजी से मदद ले सकते हो... तुम लोग अब आठवीं के बच्चे हो, जरा अपना भी दिमाग लगाओ और फ़िर से निबन्ध लिख कर लाओ..
राहुल के निरीक्षण की शुरुआत हो गई.... माँ की पसन्द-नापसन्द... मैं तो सिर्फ़ आलू की सब्जी खाता हूँ, माँ तो सभी सब्जियाँ, चटनियाँ खाती है, हम सभी को ताजा परोसती है, और यदि किसी दिन कम पड़ जाये तो थोडा़ सा ही खाती है.. बचा हुआ खाना बेकार ना जाये इसलिये कई बार खामख्वाह एक रोटी ज्यादा भी खा लेती है । ताजा और गरम खाना हमें परोसती है, और सुबह का या कल का बासी खुद की थाली में लेती है...अरे.. मैने तो कभी माँ से नहीं कहा कि आज मुझे बासी खाना दे दो, ताजी रोटी तुम खा लो.. मैं ही क्यों, दीदी, भैया और पिताजी ने भी माँ से ऐसा नहीं कहा । मुझे टेबल टेनिस खेलना पसन्द है, इसलिये माँ ने मेरे बर्थ-डे पर बैट लाकर दिया । माँ के शौक क्या हैं ? ... हाँ ठीक.. उसे पत्रिकायें पढना और हारमोनियम बजाना अच्छा लगता है, लेकिन बहुत सालों से हमारा हारमोनियम खराब हो गया है, माँ ने तो सभी से कहा था, लेकिन ना तो भैया, न पापा, किसी ने उस हारमोनियम को ठीक नहीं करवाया... थोडा़ सा समय मिलता है तो माँ कुछ पढने बैठ जाती है, लेकिन एकाध पुस्तक खरीदने की बात चलते ही पापा कहते हैं, पत्रिकायें बहुत महंगी हो गई हैं, इतने में तो दीदी की एक किताब आ जायेगी । अब.. रंग.. रंग.. रंग.. माँ को कौन सा रंग पसन्द है ? पता नहीं, क्योंकि माँ खुद के लिये बहुत ही कम साडियाँ खरीदती है, शादी-ब्याह में जो मिल जाती हैं उसी से काम चलाती है, हाँ, लेकिन बिस्तर की चादरें माँ ने हल्के नीले रंग की ली थीं... निबन्ध में नीला लिख लेता हूँ.. । माँ का जन्मदिन.. कब होता है.. मैडम ने कहा है कि कुछ भी माँ से नहीं पूछना है, दीदी ने बताया - ४ जनवरी... इस दिन हम लोग क्या करते हैं... छिः माँ का जन्मदिन तो हमने कभी ठीक से मनाया ही नहीं.. मेरे, दीदी और पापा के बर्थ-डे पर माँ लौकी का हलवा, गुलाब जामुन और पुरणपोली बनाती है । माँ को कौन सी मिठाई पसन्द है ? मालूम नहीं.. क्यों पापा, माँ को मीठे में क्या पसन्द है ? पापा... पापा... "अरे क्या चाहिये, मैं अखबार पढ रहा हूँ, दिखता नहीं क्या ? माँ से पूछो.. मुझे क्या मालूम !
पिछले हफ़्ते दीदी अपनी सहेलियों के साथ पिकनिक गई थी.. माँ ने सुबह जल्दी उठकर उसके लिये आलू की सब्जी और पूडि़याँ बनाकर दी थीं, पापा ने जो पैसे दिये थे, उसके अलावा अपने पास से पचास रुपये भी दिये... माँ कब पिकनिक पर गई थी ? याद नहीं.. पिछले महीने माँ के महिला मंडल की पिकनिक थी, लेकिन पिताजी ने अपने दोस्तों को खाने पर बुला लिया था और माँ पिकनिक पर नहीं जा पाई । माँ की पढाई के बारे में...मुझे ऐसा याद आ रहा है कि माँ किसी को बता रही थी कि दो मामाओं की पढाई के लिये माँ को कॉलेज बीच में ही छोड़ना पडा़ और उसकी शादी कर दी गई थी । अखबार पढना भी माँ को बहुत पसन्द है, दोपहर में सारे काम निपटाकर माँ अखबार पढती थी, लेकिन दीदी कॉलेज जाने लगी और मैं आठवीं में आ गया तो पिताजी ने हमारी अंग्रेजी सुधारने के लिये हिन्दी अखबार बन्द करके इंग्लिश अखबार लगवा दिया । माँ को टीवी देखना भी अच्छा लगता है, लेकिन रात को पिताजी घर आते ही अंग्रेजी कार्यक्रम और न्यूज लगा देते हैं और मैं दोपहर में कार्टून देखता हूँ, इन सब के बीच माँ को टीवी भी देखने को नहीं मिलता । माँ की सहेलियाँ... एकाध ही हैं महिला मंडल को छोड़कर... मतलब इतने सारे काम करते-करते माँ को सहेलियों के यहाँ जाने का समय ही नहीं मिलता... दीदी अपनी सहेलियों के साथ पिकनिक, फ़िल्में जाती है, मैं शाम को क्रिकेट खेलने जाता हूँ..पिताजी के दोस्त भी हर रविवार को ताश खेलने आ जाते हैं, माँ उनके लिये चाय-नाश्ता बनाती रहती है । माँ को शाम को घूमने जाना अच्छा लगता है, लेकिन पिताजी तो हमेशा रात को देर से घर आते हैं, मैं खेलने में मगन, दीदी और भैया अपने-अपने दोस्तों में, ऐसे में माँ अकेले ही सब्जी खरीदने के बहाने घूमकर आती है, लेकिन उसे वहाँ से भी जल्दी लौटना पडता है, क्योंकि यदि उसे देर हो जाये तो हम "भूख लगी..भूख लगी" करके उसे परेशान कर देते हैं । माँ कभी-कभी क्यों जरा-जरा सी बात पर चिढ जाती है, अब मुझे समझने लगा है ।
मैडम ने निबन्ध लिखने के लिये दस दिन का समय दिया था, राहुल का निरीक्षण जारी था... माँ के कामकाज, उसकी दिनचर्या और दूसरों के साथ उसकी तुलना करते-करते राहुल की धीरे-धीरे अपनी माँ से "पहचान" हो गई थी.. माँ पर निबन्ध लगभग पूरा हो चला था... और अचानक निबन्ध समाप्त करते-करते उसकी कॉपी पर दो बूँद आँसू टपक पडे़ ।
(एक मराठी रचना का अनुवाद, आंशिक फ़ेरबदल व सम्पादन के साथ)
शिल्पा शेट्टी को "राष्ट्रीय गुणवत्ता पुरस्कार" मिल गया, चलो अच्छा हुआ वरना हम जैसे अज्ञानियों को पता कैसे चलता कि "गुणवत्ता" क्या होती है और किस चीज से खाई जाती है... लेकिन हमारी सरकार, संस्थायें और कुछ अधिकारियों ने हमें बता दिया कि गुणवत्ता "किस" से खाई जाती है । मैं तो सोच रहा था कि यह गुणवत्ता पुरस्कार रिचर्ड गेरे को मिलेगा कि उन्होंने कैसे शिल्पा को झुकाया, कैसे मोडा़ और फ़िर तडा़तड़ गुणवत्ता भरे चुम्बन गालों पर जडे़ । लेकिन सरकार तो कुछ और ही सोचे बैठी थी, सरकार एक तो कम सोचती है लेकिन जब सोचती है तो उम्दा ही सोचती है, इसलिये उसने शिल्पा को यह पुरस्कार देने का फ़ैसला किया । क्योंकि यदि रिचर्ड को देते तो सिर्फ़ किस के बल पर देना पड़ता, लेकिन अब शिल्पा को दिया है तो वह उसके बिग ब्रदर में बहाये गये आँसुओं, उसके बदले अंग्रेजों से झटकी गई मोटी रकम, फ़िर अधेडा़वस्था में भी विज्ञापन हथिया लेने और ब्रिटेन में एक अदद डॉक्टरेट हासिल करने के संयुक्त प्रयासों (?) के लिये दिया गया है । दरअसल सरकार ने बिग ब्रदर के बाद उसके लिये आईएसआई मार्क देना सोचा था, लेकिन अफ़सरों ने देर कर दी और रिचर्ड छिछोरा सरेआम वस्त्रहरण कर ले गया, फ़िर सरकार ने सोचा कि अब देर करना उचित नहीं है सो तड़ से पुरस्कार की घोषणा कर दी और देश की उभरती हुई कन्याओं को सन्देश दिया कि "किस" करना हो तो ऐसा गुणवत्तापूर्ण करो, अपने एक-एक आँसू की पूरी कीमत वसूलो । पहले सरकार यह पुरस्कार मल्लिका शेरावत को देने वाली थी, लेकिन फ़िर उसे लगा कि यह तो पुरस्कार का अपमान हो जायेगा, क्योंकि मल्लिका तो आईएसओ 14001 से कम के लायक नहीं है । तो भाईयों और (एक को छोड़कर) बहनों, अब कोई बहस नहीं होगी, सरकार ने गुणवत्ता के "मानक" तय कर दिये हैं, यदि कोई इस बात का विरोध करेगा तो उसे "महिला सशक्तीकरण" का विरोधी माना जायेगा ।
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किशोर दा का जन्मदिन ४ अगस्त को है, मुहम्मद रफ़ी की पुण्यतिथि के चार दिनों बाद ही किशोर कुमार की जयन्ती आती है । इन दो महान गायकों के बारे में तिथियों का ऐसा दुःखद योग अधिक विदारक इसलिये भी है कि यह पूरा सप्ताह इन दोनों गायकों के बारे में विचार करते ही बीतता है । उनके व्यक्तित्व, उनके कृतित्व, उनकी कलाकारी सभी के बारे में कई मीठी यादें मन को झकझोरती रहती हैं । किशोर दा के बारे में तो यह और भी शिद्दत से होता है क्योंकि उनके अभिनय और निर्देशन से सजी कई फ़िल्मों की रीलें मन पर छपी हुई हैं, चाहे "भाई-भाई" में अशोक कुमार से टक्कर हो, "हाफ़ टिकट" में हाफ़ पैंट पहने मधुबाला से इश्कियाना हो, "प्यार किये जा" के नकली दाढी़ वाले बूढे हों या फ़िर "पडो़सन" के मस्तमौला गुरु हों... उन जैसा विविधता लिये हुए कलाकार इस इंडस्ट्री में शायद ही कोई हुआ हो । क्या नहीं किया उन्होंने - निर्माता, निर्देशक, अभिनेता, संपादक, गायक, संगीतकार... है और कोई ऐसा "ऑलराऊंडर" ! उनके जन्मदिवस पर दो विविधतापूर्ण गीत पेश करता हूँ, जिससे उनकी "रेंज" और गाते समय विभिन्न "मूड्स" पर उनकी पकड़ प्रदर्शित हो सके । इनमे से पहला गीत है दर्द भरा और दूसरा गीत है मस्ती भरा । अक्सर किशोर कुमार को उनकी "यूडलिंग" के बारे में जाना जाता है, कहा जाता है कि किशोर खिलन्दड़, मस्ती भरे और उछलकूद वाले गाने अधिक सहजता से गाते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि किशोर कुमार ने दर्द भरे गीत भी उतनी ही "उर्जा" से गाये हैं जितने कि यूडलिंग वाले गीत । किशोर कुमार के पास मन्ना डे जैसा शास्त्रीय "बेस" नहीं था, लेकिन गीत में ढलने का उनका अन्दाज उन्हें औरों से अलग और ऊँचा बनाता था (लगभग यही बात शाहरुख खान के बारे में भी कही जाती है कि शाहरुख के पास आमिर की तरह अभिनय की विशाल रेंज नहीं है, लेकिन अपनी ऊर्जा और अंग-प्रत्यंग को अभिनय में शामिल करके उसकी कमी वे पूरी कर लेते हैं... किशोर दा की नकल करने वाले और उन्हें अपना "आदर्श" मानने वाले कुमार सानू, बाबुल सुप्रियो आदि उनके बाँये पैर की छोटी उँगली के नाखून बराबर भी नहीं हैं) । बहरहाल, किशोर कुमार गाते वक्त अपने समूचे मजाकिया व्यक्तित्व को गीत में झोंक देते थे, और दर्द भरे गीत गाते समय संगीतकार के हवाले हो जाते थे । पहला गीत है फ़िल्म "शर्मीली" का "कैसे कहें हम,प्यार ने हमको क्या-क्या खेल दिखाये...", लिखा है नीरज ने, धुन बनाई है एस.डी.बर्मन दा ने । इस गीत में एक फ़ौजी के साथ हुए शादी के धोखे के दुःख को किशोर कुमार ने बेहतरीन तरीके से पेश किया है, उन्होंने शशिकपूर को अपने ऊपर कभी भी हावी नहीं होने दिया, जबकि इसी फ़िल्म में उन्होंने "खिलते हैं गुल यहाँ.." और "ओ मेरी, ओ मेरी शर्मीली.." जैसे रोमांटिक गाने गाये हैं । जब मैं किशोर दा के दर्द भरे नगमें चुनता हूँ तो यह गीत सबसे ऊपर होता है, इसके बाद आते हैं, "चिंगारी कोई भड़के...(अमरप्रेम)", "आये तुम याद मुझे.. (मिली)", "मंजिलें अपनी जगह हैं... (शराबी)" आदि... इसे "यहाँ क्लिक करके" भी सुना जा सकता है और नीचे दिये विजेट में प्ले करके सुना जा सकता है...

SHARMILEE - Kaise ...


अगला गीत मैंने चुना है फ़िल्म "आँसू और मुस्कान" से, जिसकी धुन बनाई है एक और हँसोड़ जोडी़ कल्याणजी-आनन्दजी ने... गीत के बोल हैं "गुणी जनों, भक्त जनों, हरि नाम से नाता जोडो़..." इस गीत में किशोर कुमार अपने चिर-परिचित अन्दाज में मस्ती और बमचिक-बमचिक करते पाये जाते हैं...इस गीत के वक्त किशोर कुमार इन्कम टैक्स के झमेलों में उलझे हुए थे और उन्होंने ही जिद करके "पीछे पड़ गया इन्कम टैक्सम.." वाली पंक्ति जुड़वाई थी । मैंने "पडोसन" का "एक चतुर नार..." इसलिये नहीं चुना क्योंकि वह तो कालजयी है ही, और लगातार रेडियो / टीवी पर बजता रहता है । यदि आप तेज गति ब्रॉडबैंड के मालिक हैं तो "यहाँ क्लिक करके" यू-ट्यूब पर इस गीत का वीडियो भी देख सकते हैं, जिसमें साक्षात किशोर कुमार आपको लोटपोट कर देंगे...यदि नहीं, तो फ़िर नीचे दिये गये विजेट पर इसे प्ले करके सुन तो सकते ही हैं...

Aansoo Aur Muskan ...


इस महान गायक... नहीं.. नहीं.. "हरफ़नमौला" को जन्मदिन की बधाई और हार्दिक श्रद्धांजलि...

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शनिवार, 04 अगस्त 2007 13:35

"सैंडी" का फ़्रेण्डशिप बैंड

उस दिन शाम को "सैंडी" बहुत दुःखी दिख रहा था, ना.. ना.. "सैंडी" कोई अमेरिकन नहीं है बल्कि कल तक नाक पोंछने वाला हमारा सन्दीप ही है । मेरे पूछते ही मानो उसका दुःख फ़ूट पडा़, बोला - भाई साहब, सारे शहर में ढूँढ कर आ रहा हूँ, "फ़्रेंडशिप बैंड" कहीं नहीं मिल रहा है । यदि मैं पूछता कि यह फ़्रेंडशिप बैंड क्या है, तो निश्चित ही वह मुझे ऐसे देखता जैसे वह अपने पिता को देखता है जब वह सुबह उसे जल्दी उठाने की कोशिश करते हैं, प्रत्यक्ष में मैने सहानुभूति जताते हुए कहा - हाँ भाई ये छोटे नगर में रहने का एक घाटा तो यही है, यहाँ के दुकानदारों को जब मालूम है कि आजकल कोई ना कोई "डे" गाहे-बगाहे होने लगा है तो उन्हें इस प्रकार के आईटम थोक में रखना चाहिये ताकि मासूम बच्चों (?) को इधर-उधर ज्यादा भटकना नहीं पडे़गा । संदीप बोला - हाँ भाई साहब, देखिये ना दो दिन बीत गये फ़्रेंडशिप डे को, लेकिन मैंने अभी तक अपने फ़्रेंड को फ़्रेंडशिप बैंड नहीं बाँधा, उसे कितना बुरा लग रहा होगा...। मैने कहा - लेकिन वह तो वर्षों से तुम्हारा दोस्त है, फ़िर उसे यह बैंड-वैंड बाँधने की क्या जरूरत है ? यदि तुमने उसे फ़्रेंडशिप बैंड नहीं बाँधा तो क्या वह दोस्ती तोड़ देगा ? या मित्रता कोई आवारा गाय-ढोर है, जो कि बैंड से ही बँधती है और नहीं बाँधा तो उसके इधर-उधर चरने चले जाने की संभावना होती है । अब देखो ना मायावती ने भी तो भाजपा के लालजी भय्या को फ़्रेंडशिप बैंड बाँधा था, एक बार जयललिता और ममता दीदी भी बाँध चुकी हैं, देखा नहीं क्या हुआ... फ़्रेंडशिप तो रही नहीं, "बैंड" अलग से बज गया, इसलिये कहाँ इन चक्करों में पडे़ हो... (मन में कहा - वैसे भी पिछले दो दिनों में अपने बाप का सौ-दो सौ रुपया एसएमएस में बरबाद कर ही चुके हो) । सैंडी बोला - अरे आप समझते नहीं है, अब वह जमाना नहीं रहा, वक्त के साथ बदलना सीखिये भाई साहब... पता है मेरे बाकी दोस्त कितना मजाक उडा़ रहे होंगे कि मैं एक फ़्रेंडशिप बैंड तक नहीं ला सका (फ़िर से मेरा नालायक मन सैंडी से बोला - जा पेप्सी में डूब मर) । फ़िर मैने सोचा कि अब इसका दुःख बढाना ठीक नहीं, उसे एक आईडिया दिया...ऐसा करो सैंडी... तुमने बचपन में स्कूल में बहुत सारा "क्राफ़्ट" किया है, एक राखी खरीदो, उसके ऊपर लगा हुआ फ़ुन्दा-वुन्दा जो भी हो उसे नोच फ़ेंको, उस पट्टी को बीच में से काटकर कोकाकोला के एक ढक्कन को चपटा करके उसमें पिरो दो, उस पर एक तरफ़ माइकल जैक्सन और मैडोना का और दूसरी तरफ़ संजू बाबा और मल्लिका के स्टीकर लगा दो, हो गया तुम्हारा आधुनिक फ़्रेंडशिप बैंड तैयार ! आइडिया सुनकर सैंडी वैसा ही खुश हुआ जैसे एक सांसद वाली पार्टी मन्त्री पद पाकर होती है... मेरा मन भी प्रफ़ुल्लित (?) था कि चलो मैने एक नौजवान को शर्मिन्दा (!) होने से बचा लिया ।

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स्वतंत्रता की साठवीं वर्षगाँठ के पवित्र अवसर पर देश के अन्दरूनी हालातों के बारे में बेहद चिन्ता होना स्वाभाविक है। भले ही हम भारतवर्ष के भविष्य की कितनी भी रोमांटिक कल्पना करें, हकीकत यही है कि देश इस समय एक दिशाहीन स्थिति से गुज़र रहा है। सेंसेक्स का पन्द्रह हजारी होना, या विकास दर ६-८ प्रतिशत होना, या आईटी क्षेत्र में भारत का परचम विश्व में लहराना भले ही कुछ खास रहा हो, आम आदमी को इससे कोई लेना-देना नहीं है और इनसे देश के अस्सी प्रतिशत लोगों का भला होने वाला भी नहीं है। दो जून की रोटी की जुगाड़ करने में गरीब, निम्न-मध्यम वर्ग इतना पिसा जा रहा है कि उसे "शाइनिंग इंडिया" कभी दिखाई नहीं देगा, क्योंकि वह "शाइन" कर रहा है सिर्फ़ पाँच-आठ प्रतिशत लोगों के लिये। लेकिन सबसे बड़ी, और रोजमर्रा के जीवन में हमारा सामना जिस समस्या से हो रहा है वह है भ्रष्टाचार, और आश्चर्य इस बात का है कि भ्रष्टाचार को हमने जीवन शैली मान लिया है, और यही बहुत खतरनाक बात है। धीरे-धीरे इस बात पर आम सहमति बनती जा रही है कि भ्रष्टाचार तो होगा ही, कोई इस बात पर विचार करने को तैयार ही नहीं है कि कम से कम वह स्वयं तो रिश्वत ना ले... लेकिन प्रायवेट क्षेत्र में अनाप-शनाप बढती तनख्वाहें और सरकारी क्षेत्र में पैसे और रुतबे की भूख और लालच ने इस समस्या को सर्वव्यापी कर दिया है। हमारा तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग इस मुगालते में है कि देश मे साक्षरता बढने पर भ्रष्टाचार में कमी आयेगी, और एक है हमारा "तटस्थ" वर्ग (जो सबसे बड़ा है) वह तो... क्या होगा इस बारे में बोलकर? हमें क्या करना है? कुछ नहीं होना-जाना है? जैसे नकारात्मक विचारों वाले सवालों में मगन है। गरीबों को मारने वाली महंगाई बढने की एक वजह भ्रष्टाचार भी है। इस देश में कितने प्रतिशत लोग इंजीनियरिंग या मेडिकल कॉलेजों की केपिटेशन फ़ीस भरने के काबिल हैं? कितने प्रतिशत लोग अपोलो या किसी अन्य संगठित "कम्पनीनुमा" अस्पताल में इलाज करवाने की हैसियत रखते हैं? जब भी कोई ईमानदार अधिकारी इस नेता-उद्योगपति-अपराधी के चक्रव्यूह को तोड़ने की कोशिश करता है, उसका हश्र मंजूनाथ की तरह होता है। भ्रष्टाचार पर एक विशेष प्रकार की उदासीनता और नकारात्मकता बनी हुई है, जबकि ये सभी के जीवन को प्रभावित कर रहा है। "किरण बेदी पर लिखी हुई मेरी पोस्ट" के जवाब में कई मेल प्राप्त हुए थे, उसमें से एक मित्र ने महाराष्ट्र कैडर के एक बेहद ईमानदार आईपीएस अधिकारी वाय.पी.सिंह की पुस्तक "कार्नेज बाय एन्जेल्स" के बारे में बताया। वाय.पी.सिंह एक ईमानदार आईपीएस अधिकारी हैं ('थे' लिखना उचित नहीं है) उन्होंने सन १९८५ में पुलिस सेवा आरम्भ की और लगभग बीस वर्ष की सेवा के बाद २००५ में त्यागपत्र दे दिया। रिटायर्ड डीजीपी श्री एस.एस.पुरी ने वायपी सिंह के त्यागपत्र को देश और महाराष्ट्र की पुलिस के लिये बेहद दुःखद दिन बताया। पुलिस की नौकरी के दौरान उन्होंने जो अपमान, तनाव और दबाव भुगता वह उन्होंने अपनी पहली पुस्तक "कार्नेज बाय एंजेल्स" में व्यक्त किया। ईमानदार होने के कारण लगातार उन पर मानसिक हमले होते रहे। सेवानिवृत्ति के पश्चात वे पुरी साहब के साथ मिलकर गरीबों को कानूनी सहायता प्रदान करते हैं। अपने इस्तीफ़े में उन्होंने लिखा है, उन्हीं के शब्दों में - "देश के सबसे उम्दा पुलिस अफ़सरों में से एक होने के बावजूद लगातार मेरा अनादर किया जा रहा है, मुझे नीचा दिखाने की कोशिश हो रही है, मैं नौकरी तो कर रहा हूँ, लेकिन एक जिंदा लाश की तरह"। अपने उजले कार्यकाल में वे "यूटीआई यूएस-६४ घोटाले" और "पन्ना-मुक्ता तेल क्षेत्र घोटाले" आदि की जाँच में शामिल रहे, दिनांक १३-१४ दिसम्बर २००४ को रेडिफ़.कॉम के पत्रकार सलिल कुमार और विजय सिंह ने उनसे एक इंटरव्यू लिया, जिसमें उन्होंने पुलिस में फ़ैले भ्रष्टाचार, अनैतिकता और नेताओं की सांठगांठ के बारे में बताया। हिन्दी के पाठकों के लिये पेश है उसी इंटरव्यू का हिन्दी अनुवाद, क्योंकि अंग्रेजी में ऐसी पुस्तकें छपती तो हैं, लेकिन एक विशिष्ट वर्ग उन्हें पढता है और फ़िर वे लायब्रेरियों की शोभा बन कर रह जाती हैं, उन पुस्तकों के बारे में व्यापक प्रचार नहीं हो पाता और वे आम हिन्दी पाठक से दूर ही रह जाती हैं। इस पुस्तक के कुछ अध्याय अथवा अंश उपलब्ध होने पर उसका अनुवाद भी पेश करने की कोशिश करूँगा -

प्रश्न : आप अपने काम के दौरान लम्बे समय तक विभागीय समस्याओं से घिरे रहे, आपके इस्तीफ़े की मुख्य वजह क्या है?
उत्तर : यह निर्णय अचानक नहीं, बल्कि कई वर्षों के सोच-विचार के पश्चात लिया गया है।
प्रश्न : लेकिन मुख्यतः आपको किस बात ने उकसाया?
उत्तर : यह एक संयुक्त प्रभाव रहा, सन १९९६ में जब मैं सीबीआई में था तो मुझे अपने मूल कैडर अर्थात महाराष्ट्र लौटने के आदेश हुए। उस समय मैं कुछ बड़े घोटालों को लगभग उजागर करने की स्थिति में आ गया था, जिसमें यूटीआई का घोटाला प्रमुख था। अन्ततः जब सन २००१ में यूएस-६४ घोटाला जनता के सामने आया तब उससे दो करोड़ लोग सीधे तौर पर प्रभावित हुए, जिसमें कि अधिकतर निम्न-मध्यम वर्ग के लोग थे, जिन्होंने अपनी खून-पसीने की गाढ़ी कमाई इसमें खो दी। सीबीआई में जब कोई अधिकारी उत्तम और असाधारण काम करता है तो उसे प्रताड़ित किया जाता है, और भ्रष्ट अधिकारी मेडल और प्रमोशन पाते हैं। मैं जानता था कि मैं पुलिस में ज्यादा दिन तक नहीं रह पाऊँगा, और वही हुआ। सबसे आसान रास्ता था कि मैं भ्रष्टों के साथ हाथ मिला लूँ और जिन्दगी के मजे लूँ, लेकिन मैंने वह रास्ता नहीं अपनाया, उसके बजाय मैंने कानून की पढाई की और डिग्री हासिल की।
प्रश्न : यूटीआई घोटाले के लिये आप किसे जिम्मेदार मानते हैं?
उत्तर : इस घोटाले के लिये पूरा संगठन ही जिम्मेदार है, ये कोई एक दिन में होने वाला नहीं था, यह लगभग दस वर्षों के कुप्रबन्धन का नतीजा था, सन १९९५ में कुप्रबन्धन अपने सर्वोच्च स्तर पर था।
प्रश्न : अर्थात एस.ए.दवे जब इसके अध्यक्ष थे, तब?
उत्तर: हाँ, उन्हीं के कार्यकाल में, यूटीआई ने कई फ़र्जी निवेश किये, नियमों और कानून को ताक पर रख कर कई मनमाने निर्णय लिये।
प्रश्न : क्या आप थोड़ा स्पष्ट बतायेंगे?
उत्तर : यूटीआई खुले तौर पर उन शेयरों में निवेश कर रही थी जिन्हें "सेबी" ने प्रतिबन्धित कर दिया था, यह कहकर कि यूटीआई सेबी के नियमों से बँधी हुई नहीं है। यूटीआई ने "लॉक-इन शेयरों" और ऐसे ही डिबेन्चरों में भी निवेश किया। यदि सन १९९१ में ही इस बारे में सवाल उठाये जाते और सही काम किया गया होता तो यूएस-६४ घोटाला होता ही नहीं।
प्रश्न : क्या राजनेताओं ने इस देश को नीचा दिखाया है ? क्या नेता इस घोटाले में शामिल हैं?
उत्तर : बिना किसी राजनैतिक समर्थन के इतना बड़ा घोटाला होना सम्भव ही नहीं है। जब आप इसमें जाँच-दर-जाँच आगे बढते जाते हैं, तभी आपको नेताओं के किसी घोटाले में शामिल होने के बारे में पता चलता जाता है, लेकिन जनता के सामने सच्चाई कभी नहीं आने दी जाती।
प्रश्न : "पन्ना-मुक्ता तेलक्षेत्र" केस आपके सबसे विवादास्पद केसेस में रहा है। क्या आप इसके बारे में हमें कुछ बता सकते हैं?
उत्तर : ओएनजीसी ने इस बड़े तेलक्षेत्र की खोज की थी। जब सरकार द्वारा उसे प्रायवेट कम्पनियों के साथ साझा करने को कहा गया था, तब ओएनजीसी में काफ़ी चीखपुकार मची थी। ओएनजीसी के बडे़ अधिकारी इससे बहुत नाखुश थे, क्योंकि इस क्षेत्र में विपुल सम्भावनायें थीं। उनका तर्क था कि यदि सरकार को निजी कम्पनियों को देना ही है तो बिना खोजा हुआ या नई खोज के लिये तेलक्षेत्र देना चाहिये।
प्रश्न : सरकार को इसमें कितना नुकसान हुआ?
उत्तर : अभी तक इसका सही-सही आकलन नहीं हो पाया है, लेकिन लगभग पूरा का पूरा तेलक्षेत्र मुफ़्त में ही दे दिया गया। क्योंकि ओएनजीसी कि इसमें सिर्फ़ चालीस प्रतिशत हिस्सेदारी रखी गई जबकि रिलायंस और एनरॉन को बाकी का हिस्सा दे दिया गया।
(अब समझ में आया कि मैनेजमेंट गुरु जो "धीरुभाईज्म" सिखा रहे हैं, वह क्या है?)
प्रश्न : इस तेलक्षेत्र से कितना तेल उत्पादन होता है?
उत्तर : लगभग चालीस से पचास लाख टन सालाना। यह बहुमूल्य तेलक्षेत्र सरकार ने लगभग मुफ़्त में निजी कम्पनियों को दे दिया, जबकि ओएनजीसी ने सारी मेहनत की थी। इस "डीलिंग" की जाँच और पूछताछ के समय सीबीआई मुझसे बहुत नाराज थी। उन्होंने केस को उलझाने की कोशिश की, सीबीआई अधिकारियों ने मेरे फ़ोन काट दिये, मेरी कार और सहायक छीन ली गई, मेरा मकान खाली करवा लिया गया। जब उच्चतम न्यायालय ने इस पर नाराजगी जताई तब यह सिलसिला थमा। जब मुझे सीबीआई से निकाल दिया गया उस वक्त मैंने केन्द्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में शिकायत की थी, लेकिन उन अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
प्रश्न : आपको कभी भी कोई जाँच पूरी नहीं करने दी गई।?
उत्तर : किसी भी मामले की सही जाँच तभी हो सकती है, जब शुरु से अन्त तक एक ही अधिकारी उस पर काम करे। अचानक, बीच में से ही आप को ट्रांसफ़र कर दिया जाता है, फ़िर एक भ्रष्ट अधिकारी आकर सारे मामले को रफ़ा-दफ़ा कर देता है या उसे और उलझा देता है। यह बहुत आम हो गया सा खेल है।
प्रश्न : आपने ग्लोबल ट्रस्ट बैंक और ओरियन्टल बैंक ऑफ़ कॉमर्स के विलय का भी विरोध किया था? क्यों?
उत्तर : उस विलय ने जमकर्ताओं का संरक्षण तो किया था, लेकिन शेयरधारकों को बहुत चोट पहुँचाई थी, और इस मामले में कुछ नियमों का उल्लंघन भी किया गया था, जिसके लिय आज तक किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया।
प्रश्न : कौन था जिम्मेदार?
उत्तर : निश्चित रूप से रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया। जबकि रिजर्व बैंक को यह मालूम था कि जीटीबी की अन्दरूनी हालत बहुत खराब है, फ़िर भी उसने एक प्रेस वार्ता में कहा कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है, बैंक की स्थिति सही है, क्या यह आम जनता के साथ धोखाधड़ी नहीं है?
प्रश्न : चलिये वापस पुलिस में फ़ैले भ्रष्टाचार की तरफ़ आते हैं, क्या वाकई में आईपीएस अधिकारी एक हवलदार से भी अधिक भ्रष्ट हैं?
उत्तर : सामान्य मान्यता है कि भ्रष्टाचार का सम्बन्ध तनख्वाह से है, लेकिन ऐसा नहीं है। पुलिस के उच्चाधिकारी एक हवलदार से छः गुना अधिक वेतन पाते हैं (हवलदार का वेतन है ५०००/- और अधिकारी का ३०,०००/-), इसके अतिरिक्त अधिकारी को मकान, ड्रायवर सहित कार, फ़ोन, नौकर मिलता है, फ़िर भी वे भ्रष्ट हैं, वे जितना अधिक पैसा कमाते जाते हैं, उतने ही अधिक लालची होते जाते हैं। प्रतिमाह तीस हजार वेतन पाने वाला अधिकारी करोड़पति बनना चाहता है, इसलिये वह रिश्वत लेता है। फ़िर वह तीन करोड़ बनाने की सोचने लगता है, फ़िर पाँच करोड़, यह कभी खत्म नहीं होता। इसलिये वेतन और भ्रष्टाचार का कोई सम्बन्ध नहीं है। भ्रष्टाचार दरअसल एक मानसिक स्थिति है, इसे आप लालच से जोड़कर देख सकते हैं। मैंने कई हवलदार ऐसे भी देखे हैं, जो उनके वरिष्ठ अधिकारियों से कहीं अधिक ईमानदार हैं (हाल ही में एक रिक्शाचालक नें सवारी के छूटे हुए दस लाख रुपये खुद होकर थाने में जमा कराये) । इसी के साथ भ्रष्टाचार को भी आप कई श्रेणियों में बाँट सकते हैं, कुछ अधिकारी कट्टर तौर पर ईमानदार होते हैं, वे दूसरों को भी रिश्वत नहीं लेने देते, ऐसे लोग कम ही हैं। कुछ ऐसे हैं जो खुद पैसा नहीं लेते, लेकिन दूसरे लेने वाले को रोकते नहीं है, हालांकि वे ईमानदार हैं, लेकिन मैं उन्हें "रीढविहीन"मानता हूँ। ऐसे लोग लगभग मृतप्राय होते हैं। पुलिस फ़ोर्स में भ्रष्टाचार संस्थागत बीमारी बन गया है। उन्हीं अफ़सरों को मुख्य पोस्टिंग दी जाती है जो भ्रष्ट हैं, फ़िर यह उनकी आदत बन जाती है, आसानी से मिलने वाली रिश्वत के अलावा भी वे और दाँव लगाने और पैसा कमाने की जुगत में लगे रहते हैं।
प्रश्न : एक आईपीएस के लिये कमाई की कितनी सम्भावना होती है?
उत्तर : यदि कोई अफ़सर मुम्बई में पदस्थ है तो वह आसानी से पच्चीस से तीस लाख रुपये प्रतिमाह तो सिर्फ़ लेडीज बार से ही कमा लेता है।
प्रश्न : एक महीने में?
उत्तर : जी हाँ, कुछ लेडीज बार पाँच लाख रुपये महीना देते हैं और कुछ छोटे बार एक लाख रुपये प्रतिमाह।
प्रश्न : क्या सभी लेडीज बार रिश्वत देते हैं?
उत्तर : उसके बिना वे धंधा कर ही नहीं सकते।
प्रश्न : क्या सभी उच्चाधिकारी भ्रष्ट हैं?
उत्तर : नहीं, सभी नहीं, लेकिन जो रिश्वत नहीं मांगते वे इस बुराई को दूर करने के लिये कुछ करते भी नहीं, इसलिये एक तरह से वे बेकार हैं। भ्रष्टाचार का दूसरा मुख्य कारण है पैसा देकर पोस्टिंग खरीदना, फ़िर आप निर्भय हो जाते हैं, क्योंकि आप के सिर पर उस नेता का हाथ होता है, जिसने आपसे पैसा लिया है। उस पैसे को वसूल करने के लिये व्यक्ति और जमकर भ्रष्टाचार करता है, क्योंकि उसे रोकने वाला कोई होता ही नहीं।
प्रश्न : आपने अपनी पुस्तक में आईपीएस पोस्टिंग के लिये लॉबिंग के बारे में बताया है, क्या आप इसे विस्तार से बता सकते हैं?
उत्तर : आईपीएस की पोस्टिंग बिकती हैं, उसके लिये आपको किसी दलाल या नेता का करीबी होना होता है।
प्रश्न : ये दलाल कौन लोग होते हैं?
उत्तर : कोई भी हो सकता है, साधारणतः ये वे लोग होते हैं जिनके नेताओं से सम्पर्क होते हैं, बडे़ व्यापारी, कुछ वरिष्ठ नौकरशाह आदि। यदि किसी को कोई खास जगह की पोस्टिंग चाहिये होती है तो वह इनसे सम्पर्क करता है, ये लोग नेताओं के द्वारा उसका काम करवा देते हैं।
प्रश्न : क्या तेलगी घोटाले के बाद इसमें कोई कमी आई है?
उत्तर : कुछ खास नहीं, सौ भ्रष्ट अधिकारियों में से एक-दो को पकड़ा भी जायें तो कोई अन्तर नहीं आता। बल्कि दूसरे अधिक सतर्क हो जाते हैं, और सब कुछ पहले की तरह ही चलता रहता है।
प्रश्न : क्या आप कहना चाहते हैं कि पूरी मुम्बई में एक भी अधिकारी ईमानदार नहीं है?
उत्तर : यदि होगा तो वह भी मेरे जैसी स्थिति में ही होगा।
प्रश्न : आपने पुस्तक में लिखा है कि एक नया अफ़सर अपने कांस्टेबल से ही भ्रष्टाचार सीखता है, क्या यह सच है?
उत्तर : ये बातें सिखाई नहीं जातीं, सिस्टम में से अपने-आप आ जाती हैं। कई नागरिक आपसे मिलेंगे और कहेंगे, "अरे साहब हम तो पुलिस वालों के मित्र हैं", फ़िर धीरे-धीरे वे ही आपको विभिन्न "आईडिया" देने लग जाते हैं। भ्रष्ट अफ़सर अपना एक दलाल तैयार कर लेते हैं, जो कि अमूमन सब-इंस्पेक्टर स्तर का होता है, फ़िर एक-दो महीने में नया अफ़सर सब कुछ सीख जाता है। यह सीखने के लिये किसी विशेषज्ञता की आवश्यकता नहीं होती। प्रत्येक राज्य में उच्च स्तर के गिने-चुने अधिकारी ही होते हैं, एक अधिकारी एक जिले में जब "गुल" खिला चुका होता है और उसका तबादला दूसरे जिले में होता है तो तब तक दलालों और उच्चाधिकारियों के पास उसका पूरा चिठ्ठा मौजूद होता है, और वह खुद भी यही चाहता है।
प्रश्न : भ्रष्टाचार का संस्थानीकरण कैसे होता है, और रिश्वत की रकम कैसे तय की जाती है?
उत्तर : यह कमाई की सम्भावना पर निर्भर होता है। कस्टम विभाग का एक उदाहरण लें, मान लीजिये कि कोई फ़ोन सौ रुपये का है, उस पर कस्टम ड्यूटी साठ प्रतिशत के हिसाब से साठ रुपये होती है। एक भ्रष्ट कस्टम अफ़सर उस फ़ोन की कीमत दस रुपये बताता है, तो कस्टम ड्यूटी मात्र छः रुपये रह जाती है और सरकार को छप्पन रुपये का नुकसान होता है। इसमें से बीस प्रतिशत, मतलब ग्यारह रुपये उस कस्टम अफ़सर की रिशवत होती है। इस प्रकार रिश्वत का आकलन होता है।
प्रश्न : किन पोस्टिंग को वरीयता दी जाती है?
उत्तर : सबसे अधिक कस्टम्स विभाग में, हालांकि उदारीकरण के बाद इसमें थोडी़ कमी आई है, और दूसरे नम्बर पर है आयकर विभाग। एक बेईमान आयकर अधिकारी अपनी पैंतीस वर्ष की सेवा में सरकार का लगभग एक हजार करोड़ का नुकसान करता है। यह पैसा सरकार आधारभूत ढाँचे, अस्पताल, स्कूल, पेंशन आदि में खर्च करती।
प्रश्न : फ़िर सीबीआई और एंटी-करप्शन ब्यूरो आदि इसे क्यों रोक नहीं पाते?
उत्तर : सारा पैसा भ्रष्ट अधिकारी अकेले नहीं रखता, वह पूरा ऊपर तक बँटता हुआ जाता है। यदि कोई बीच में इसे रोकने की कोशिश करता है तो उसे प्रताडि़त किया जाता है, और मनुष्य है तो कभी-ना-कभी गलती तो करेगा ही, बस फ़िर सब मिलकर उसे ही फ़ाँस लेते हैं।
प्रश्न : आप पुलिस फ़ोर्स की बहुत ही धूमिल छवि पेश कर रहे हैं।
उत्तर : मैं सच्ची छवि पेश कर रहा हूँ, यह कोई रहस्य नहीं है, सभी लोग इसे जानते हैं। आपके चारों तरफ़ अचानक अवैध इमारतें और झुग्गी-झोंपडियाँ खड़ी हो जाती हैं, क्या आप समझते हैं कि कोई इसके बारे में नहीं जानता? माटुंगा (मुम्बई का एक उपनगर) में डाकतार विभाग और कस्टम विभाग की कालोनियाँ पास-पास ही हैं, जरा वहाँ जाकर देखिये, तीसरी श्रेणी के अधिकारियों की कालोनियाँ हैं वे। कस्टम विभाग की कालोनी में आपको कारें, कारें और सिर्फ़ कारें ही मिलेंगी, जबकि डाकतार कालोनी में शायद ही एकाध कार हो, और दोनों केन्द्रीय विभागों के उन अधिकारियों के वेतन और तमाम स्केल्स बराबर हैं।
प्रश्न : आपकी पुस्तक में "रघु" जो एक सब-इंस्पेक्टर है, उसे कोल्हापुर में एक एसपी दो घंटे तक कमरे के बाहर खड़ा रखता है, फ़िर वह एसपी उसे ठीक से सेल्यूट ना करने के लिये बुरी तरह डाँटता है, क्या यह एक वास्तविक घटना है?
उत्तर : हाँ, साधारणतया यही होता है, इसके पीछे की चाल यह है कि जूनियर को अपमानित करो, उसे उसकी औकात दिखाओ, एक तरह से उसकी रैगिंग लो, एक बार जब वह झुक जायेगा तो फ़िर वह आपके लिये काम करने लगेगा और आप उसे आसानी से "मैनेज" कर लेंगे।
प्रश्न : आपके प्रमोशन के बारे में?
उत्तर : मेरी बैच में ८२ अफ़सर थे, मुझे छोड़कर लगभग सभी या तो "डिप्टी-कमिश्नर" हैं या "ज्वाईंट कमिश्नर", जबकि मैं अभी भी पुलिस रैंक का डिप्टी कमिश्नर हूँ।
प्रश्न : क्या आपके बच्चे आईपीएस में आयेंगे?
उत्तर : उन्हें आईपीएस का आकर्षण तो है, लेकिन वे समझते नहीं है, उनके लिये आकर्षण है, पुलिस की वर्दी, बैज, जीप, बंगला। मेरी बेटी आईपीएस में आना चाहती है, लेकिन अभी वह बहुत छोटी है इसलिये कुछ समझती नहीं, हाँ बेटा जरूर दसवीं में है और वह मेरी पीड़ा को समझ सकता है।

(वायपी सिंह की दूसरी पुस्तक "वल्चर्स इन लव" कहानी है एक आईएएस महिला राजस्व अधिकारी की, जिसमें प्रशासनिक स्तर पर फ़ैली यौनिकता और सड़ाँध के बारे में बताया गया है। संक्षेप में इसकी कहानी यह है कि एक महिला राजस्व अधिकारी की शादी एक कस्टम अधिकारी से होती है, दोनों मिलकर अथाह सम्पत्ति एकत्रित करते हैं, फ़िर सीबीआई का छापा पड़ता है, लेकिन छापा मारने वाला सीबीआई पुलिस अधिकारी उस महिला राजस्व अधिकारी का पूर्व प्रेमी निकलता है, फ़िर शुरु होता है पैसे, सेक्स और सत्ता का नंगा खेल। भले ही सिंह साहब ने पुस्तक के शुरु में लिखा हो कि "यह एक काल्पनिक कथा है" लेकिन पुस्तक की रिलीज के वक्त कई कस्टम्स अधिकारियों के ड्रायवर वह पुस्तक खरीदने के लिये खडे़ थे। "कार्नेज बाय एंजेल्स" पर भी छगन भुजबल बहुत भड़के थे, पता नहीं क्यों?)


मुझे अहसास है कि यह सब पढ़कर कई लोग सन्न रह गये होंगे, लेकिन यही सच्चाई है। आजादी के इस पर्व पर सभी लोग मीठी-मीठी और रूमानी बातें ही करेंगे, तो मैंने सोचा कि मैं ही बुरा बनूँ और एक सामाजिक कैंसर जिसे सब जानते हैं, लेकिन उसे ढँके रहते है, को मैं उघाड़ने की कोशिश करूँ। किसी कवि की चार पंक्तियाँ कहीं पढीं थीं, उसे उद्धृत कर रहा हूँ -
एक बार जो आउते बापू
नेक बात समझाउते बापू
सत्य-अहिंसा कहतई भर में
बीसन लप्पर पाऊते बापू

मतलब यह कि यदि गाँधी दोबारा आ जाते हमें नेक बातें समझाते रहते। लेकिन सत्य-अहिंसा की बात कहते ही उनमें बीसियों चाँटे पड़ जाते। लेकिन यह दौर ही पाखंड का है, फ़र्जी गाँधीगिरी चलाई जा रही है, ट्रैफ़िक पुलिस वाला चुन-चुनकर महिलाओं को ही फ़ूल दे रहा है, जबकि दो कौड़ी की औकात वाले विधायक का बेटा उसके सामने से बिना नम्बर की गाड़ी तीन लोगों को बिठाकर ले जाता है। हम यह
मानने को तैयार ही नहीं हैं कि हम स्वयं पाखंडी हैं।
दो-दो लड़कियों की भ्रूण हत्या करवाने वाला नवरात्रि में "कन्या भोज" आयोजित कर रहा है, घर-घर में "जोर से कहो कंडोम" के जयकारे लग रहे हैं, शहीद की विधवा पेंशन पाने तक के लिये दर-दर की ठोकरें खा रही है, देश की चालीस प्रतिशत आबादी आधे पेट सोती है, पैसे वाला जमीने खरीद कर शॉपिंग मॉल और टाउनशिप बनवा रहा है और उसी जमीन का मालिक किसान या तो आत्महत्या कर रहा है, या बाँधों में डूबती जा रही अपनी जमीन को बेबस देख रहा है... क्या-क्या और कितना कहा जाये... क्या सचमुच हमें आजादी का जश्न मनाने का हक है?

(सिर्फ़ इंटरव्यू वाला हिस्सा ही अनुवाद है, बाकी के विचारों की जिम्मेदारी मेरी है)
इतना बड़ा ब्लॉग एक बार में लिखने के लिये माफ़ करें, आशा है कि मित्रों ने इसे पूरा पढा होगा, लेकिन यदि इसे दो भागों में पेश करता तो इसका प्रभाव समाप्त हो जाता।
Teacher’s Day Siddhanath Verma

“एक पैर से उचक-उचक कर चलना मजबूरी, दो हाथ नहीं, सिर्फ़ एक पैर विकसित है”

मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में शाजापुर नामक जिले में एक जिजीविषा की साक्षात मिसाल हैं श्री सिद्धनाथ वर्मा जी। शिक्षक दिवस पर राष्ट्रपति पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया जायेगा। सिद्धनाथ जी स्थानीय शासकीय नवीन कन्या माध्यमिक विद्यालय में सहायक शिक्षक हैं। वर्मा जी सम्भवतः देश के ऐसे पहले शिक्षक हैं जो पैर से बोर्ड पर लिखकर पढाते हैं, क्योंकि जन्म से ही उनके दोनो हाथ नहीं है और दाहिना पैर अविकसित है। इस महान व्यक्ति ने पैर से ही लिखकर बी.कॉम, एम.कॉम., बी.एड., एलएलबी की परीक्षायें प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। दोनो बाहें ना होने के कारण वे बैसाखी का उपयोग भी नहीं कर सकते। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी गई-गुजरी रही कि ट्रायसिकल खरीदने के पैसे ही नहीं थे। अतः एक ही पैर से उचक-उचक कर अपने गाँव “करजू” से छः किमी दूर बड़ोदिया परीक्षा देने जाते थे, बाद में जब इनकी नौकरी लगी तब कहीं जाकर ट्रायसिकल खरीद पाये।

वे बताते हैं कि कुदरत के इस क्रूर मजाक को उन्होंने एक चुनौती के रूप में लिया, एक पैर से उचककर चलना सीखा, हाथों का काम पैर से लिये, लिखना सीखा, प्राथमिक स्तर तक की पढाई गाँव में, माध्यमिक स्तर की मो.बड़ोदिया में और महाविद्यालयीन स्तर की पढ़ाई शाजापुर में सम्पन्न की। वर्मा जी ने कई वर्षों तक इलेक्ट्रॉनिक घड़ियों के सेल्समैन के रूप में काम किया, क्योंकि नौकरी के लिये इन्हें काफ़ी भटकना पड़ा (किसी नेता के भतीजे नहीं हैं, और ना ही रिश्वत देने के लिये हराम के रुपये थे)। सामाजिक न्याय अधिकारिता मंत्रालय द्वारा उन्हें 1998 में पुरस्कृत किया जा चुका है। कई स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा भी उन्हें अलंकृत किया गया है (उस समय ये सभी एनजीओ और तमाम “क्लब” पता नहीं कहाँ थे, जब वे ट्रायसिकल के लिये संघर्षरत थे)। और अब राष्ट्रपति द्वारा आगामी शिक्षक दिवस पर इन्हें सम्मानित किया जायेगा। आइये सलाम करें जीवट के धनी इस महान व्यक्ति को, जिसे मीडिया का कवरेज शायद कभी नहीं मिलेगा, क्योंकि हमारा मीडिया सुबह से इस खबर की खोज (?) में जुट जाता है कि “कहाँ, किस शिक्षक या शिक्षिका ने बच्चों के साथ यौन कुंठा व्यक्त की”, या “कहाँ, किस शिक्षक का मुँह उन लाड़लों द्वारा काला किया गया, जो कनपटी पर मोबाईल और पिछवाड़े के नीचे “बाइक” लिये घूमते रहते हैं, और दो-दो हाथ और पैर होने के बावजूद एक डिग्री भी ईमानदारी से नहीं पा सकते”।

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Wedding Ring Finger

शायद वर्षों से यह परम्परा चली आ रही है कि सगाई या शादी की अंगूठी हमेशा “अनामिका” उंगली में ही पहनी जाती है। हालांकि इस परम्परा के बारे में अधिक जानकारी का अभाव है, लेकिन अब चूँकि परम्परा है तो लोग लगातार निभाये जाते हैं। हाल ही में एक ई-मेल में यह रोचक जानकारी मिली, जिसमें अनूठे “लॉजिक” के जरिये यह सिद्ध किया गया है कि अंगूठी उसी उंगली में क्यों पहनना चाहिये, आप भी मुलाहिजा फ़रमाईये –

सर्वप्रथम माना कि सबसे मजबूत होते हैं अंगूठे अर्थात उन्हें हम माता-पिता की संज्ञा दें –
फ़िर अगली उंगली “तर्जनी” को माना जाये हमारे भाई-बहन –
फ़िर आती है बीच की उंगली “मध्यमा” ये हैं हम स्वयं (परिवार का केन्द्रबिन्दु) –
उसके बाद रिंग फ़िंगर “अनामिका” जिसे हम मान लेते हैं, पत्नी –
सबसे अन्त में “कनिष्ठा” उंगली को हम मानते हैं, हमारे बच्चे –

अब चित्र में दिखाये अनुसार अपनी दोनों हथेलियाँ पूरी फ़ैलाकर उनके पोर आपस में मिला लीजिये और बीच की दोनो उंगलियाँ “मध्यमा” (ऊपर माना गया है कि जो आप स्वयं हैं) को अपनी तरफ़ मोड़ लीजिये, हथेलियों को जोड़े रखिये –



अब दोनो अंगूठों (जिन्हें हमने माता पिता माना है) को अलग-अलग कीजिये, क्योंकि अनचाहे ही सही माता-पिता जीवन भर हमारे साथ नहीं रह सकते। फ़िर अंगूठों को साथ मिला लीजिये।
अब दोनों तर्जनी (जिन्हें हमारे भाई-बहन, रिश्तेदार माना है) को अलग-अलग करके देखिये, क्योंकि भाई-बहन और रिश्तेदार भी उम्र भर साथ नहीं रहने वाले, उनके भी अपने परिवार हैं। फ़िर वापस तर्जनी अपनी पूर्व स्थिति में ले आईये।
अब सबसे छोटी कनिष्ठा (हमारे बच्चे) को भी अलग कर देखिये, वे भी जीवन भर हमारे साथ नहीं रहने वाले हैं, बड़े होकर कहीं दूर निकल जायेंगे। पुनः दोनो उंगलियों को वापस पूर्वस्थान पर रख लें।
अब सबसे अन्त में “अनामिका” को अलग-अलग करने की कोशिश कीजिये, नहीं होंगी, क्योंकि पति-पत्नी को आजीवन साथ रहना होता है, तमाम खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ, इसीलिये “अनामिका” में शादी की अंगूठी पहनाई जाती है। एक बार यह करके देखिये....
संयुक्त राष्ट्र में पेश की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि “आतंकवाद से लड़ने के लिये भारत की तैयारी और प्रतिबद्धता काफ़ी कम है और उसे कानूनों में सुधार और सीमाओं पर चौकसी बढ़ाने की आवश्यकता है।“ जिस किसी अधिकारी या संस्था ने यह रिपोर्ट बनाई है और “मासूम” से संयुक्त राष्ट्र ने उसे जस का तस पेश भी कर दिया है, वे भोले हैं, या नादान हैं, या मूर्ख हैं यह तय कर पाना मुश्किल हो गया है। क्या ये लोग नहीं जानते हैं कि –

(१) भारत में देशप्रेम या देश के नाम पर कुछ नहीं किया जाता, यहाँ एक महान (?) लोकतन्त्र है इसलिये यहाँ सब कुछ “वोट” के लिये किया जाता है।

(२) इस देश में राष्ट्रभक्ति १५ अगस्त या २६ जनवरी पर “बासी कढ़ी में उबाल” जैसी आती है, या फ़िर एक मेक-अप की हुई नकली देशभक्ति, “ताज” पर वोट देने के दौरान आती है।

(३) यहाँ “देश की सीमायें” नाम की कोई चीज वजूद में नहीं है, भारत एक “विशाल धर्मशाला” है, बांग्लादेशी, पाकिस्तानी, नेपाली, तिब्बती कोई भी यहाँ कभी भी आ-जा सकता है कितने भी समय रह सकता है।

(४) राष्ट्रीय चरित्र की बात करने वाले को क्या मालूम कि भ्रष्ट कांग्रेस का एक सांसद इस देश का नागरिक ही नहीं है, फ़िर भी संसद में है, फ़र्जी वामपंथियों को बंगाल या असम में घुसपैठ नहीं दिखाई देती, नकली भाजपा वाले रामसेतु के आंदोलन कर रहे हैं, जबकि मध्यप्रदेश में सड़कें ही नहीं हैं। ५२५ सांसदों में से आधे से ज्यादा पर गम्भीर आपराधिक मामले हैं, और संसद में “अपना भत्ता बढ़वाने” के अलावा वे किसी बात पर सहमत नहीं होते हैं।

(५) यहाँ “अफ़जल” को फ़ाँसी से बचाने वाले भी मौजूद हैं, और चालीस-चालीस साल तक मुकदमा चलने के बावजूद फ़ैसला न देने वाली अदालतें मौजूद हैं। अनाथ बच्चों, विकलांगों और वृद्धों को मिलने वाली आर्थिक योजनाओं में भी करोड़ों का भ्रष्टाचार करने वाले सरकारी कर्मचारी हैं, धर्म की अफ़ीम पिलाकर “पाप-पुण्य” की कथायें सुनाने वाले बाबा मौजूद हैं, ज्योतिष-वास्तु-फ़ेंगशुई “बेचने” वाले कलाकार मौजूद हैं।

(६) और अन्त में “सौ बात की एक बात” – पड़ोसी के यहाँ खून होते देखकर अपना दरवाजा बन्द कर लेने वाली जनता, नेताओं की करतूतों को खामोशी से सहने वाली जनता, वोट देकर “सो” जाने वाली जनता, “एसएमएस” करने में भिड़ी हुई जनता, सेंसेक्स को टकटकी लगाये देखने वाली जनता, एकाध लालची अफ़सर को न मार कर खुद मर जाने वाले किसान, “स्टिंग” और टीआरपी के खेल में लगा हुआ मीडिया, सब-सब तो मौजूद हैं।

अब बताईये भला कैसे भारत आतंकवाद से लड़ेगा? पहले हम हर बात में पैसा तो खा लें, फ़िर सोचेंगे देश-वेश के बारे में....
Pepsi, Shahrukh, John, Uncle

हाल ही में पेप्सी का नया विज्ञापन जारी हुआ है जिसमें जॉन अब्राहम और शाहरुख को एक बच्चे द्वारा “अंकल” कहे जाने पर चुहलबाजी करते दिखाया गया है, लेकिन इस विज्ञापन के मूल में सन्देश यही है कि दोनों ही व्यक्ति (जॉन थोड़े युवा, लेकिन अधेड़ावस्था की उम्र पर खड़े शाहरुख भी) उस बालक द्वारा “अंकल” कहे जाने पर आहत होते हैं या एक-दूसरे की हँसी उड़ाते हैं। सहज ही प्रश्न उठता है कि क्या “अंकल” सुना जाना इतना बुरा लगता है? खासकर यदि “सही” उम्र के व्यक्ति द्वारा “सही” व्यक्ति को बोला गया हो। मतलब जैसा कि उस विज्ञापन से परिलक्षित होता है, वह बालक शायद दसवीं-बारहवीं का लगता है (अर्थात सोलह-सत्रह वर्ष का), ऐसे में यदि वह शाहरुख (जो कि चालीस पार हो चुके हैं) को अंकल कहता है तो उन्हें बुरा क्यों लगना चाहिये? यह दृष्टांत एक विशाल “बाजार” (चिरयुवा दिखाई देने के लिये बने उत्पादों का) के खेल का अहम हिस्सा है, जिसमें सतत हमारे दिमाग में ठसाया जाता है, “सफ़ेद बाल बहुत बुरे हैं”, “थोड़ी सी भी तोंद निकलना खतरे का संकेत है”, “लड़कियों वाली क्रीम नहीं बल्कि जवान दिखने के लिये मर्दों वाली क्रीम वापरना चाहिये” और तो और “सिगरेट पीने से बहादुरी और जवानी आती है” आदि-आदि-आदि। जबकि देखा जाये तो आजकल के किशोरों और युवाओं में “अंकल” बोलना एक फ़ैशन बन चुका है। फ़ैशन का मतलब होता है कि “ऐसी कोई बात जिसकी आपको कोई समझ नहीं है लेकिन सिर्फ़ भेड़चाल के लिये या किसी हीरो-हीरोइन की नकल करनी है, उसे फ़ैशन कहते हैं” जो कि युवाओं की स्वाभाविक हरकत होती है, लेकिन आश्चर्य तो तब होता है कि “अनुभव” और “अध्ययन” के कारण कनपटी पर पके बालों को भी अधेड़ लोग छुपाने के लिये विभिन्न उपाय करते पाये जाते हैं।

यदि अपने से आधी उम्र का कोई बालक-बालिका अंकल कहे तो उसमें बुरा मानने वाली क्या बात है (औरतों को उनके स्त्रीत्व की एक विशेष भावना के चलने “आंटी” सुनना बुरा लग सकता है, बल्कि लगता भी है)। लेकिन तथाकथित “फ़ैशन” की नकल के चलते कई बार “कमर पर चर्बी का टायर चढ़ाये” नवयौवनायें भी अपने से सिर्फ़ दो-पाँच साल बड़े व्यक्ति को अंकल कहती फ़िरती हैं, और स्थिति तब अधिक हास्यास्पद हो जाती है, जबकि आमतौर पर दिखने-चलने-फ़िरने में वह व्यक्ति उससे अधिक जवान दिखाई देता है। एक चीज होती है “कॉमन सेंस” (सामान्य बोध), जो कि आजकल “अनकॉमन” हो गया है, (यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है - जब एक “स्लीवलेस” पहनी हुई “युवती” जिसकी बाँहें, दो लटकी हुई बड़ी लौकियों की तरह दिखाई दे रही थीं, वह मुझे अंकल संबोधित कर रही थी, और तब मजबूरन मुझे, उन्हें “हाँ, बोलो बेटी...” कहना पड़ा था)।

सवाल फ़िर यही खड़ा होता है कि क्यों लोग उम्र को सही सन्दर्भों में नहीं लेते? (खुद की भी और दूसरों की भी), क्यों वे आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते कि अब नौजवानी का दामन छूटने को है और अधेड़ावस्था की आहट आ गई है? क्यों आजकल “सफ़ेद बालों” को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है? अक्षय खन्ना, सलमान खान, संजय दत्त या शाहरुख को “अंकल” सुनना क्यों बुरा लगता है? क्यों अमिताभ ने आज तक सार्वजनिक तौर पर अपनी “विग” नहीं उतारी, जबकि रजनीकान्त आमतौर पर सभाओं में बिना मेक-अप के, सफ़ेद बालों, गंजे सिर और सादी सी लुंगी में दिखाई दे जाते हैं (और फ़िर भी वे अपनी नाती की उम्र के साथ हीरो के रूप में अमिताभ से अधिक सुपरहिट हो जाते हैं), ऐसी हिम्मत अन्य कथित “स्टार”(?) क्यों नहीं दिखा पाते? आपका क्या कहना है?

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