वामपंथी पाखण्ड धारावाहिक का एपिसोड क्रमांक 34872… Indian Communist Parties Double Standards

Written by बुधवार, 03 नवम्बर 2010 12:10
हाल ही में कैम्ब्रिज विवि में एक व्याख्यान के दौरान प्रकाश करात ने माना कि "भारत के वामपंथी" देश में होने वाले आर्थिक बदलावों को समझने में असफ़ल रहे तथा भारतीय वामपंथ आज भी 1940 के ज़माने की मानसिकता में जी रहा है। कुछ माह पहले यही स्वीकारोक्ति वचन, वामपंथियों के पितातुल्य फ़िदेल कास्त्रो भी अपने मुँह से उचर चुके हैं (यहाँ देखें…)

आज़ादी के पिछले 60 साल से भारत की जनता ने वामपंथियों को लाल झण्डे उठाये, मुठ्ठियाँ भींचे, नारे लगाते देखा है, यह सारी प्रक्रिया अक्सर (लगभग हमेशा) उद्योगपतियों के खिलाफ़, निजीकरण के विरोध में, सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों को बचाने के नाम पर बरसों से दोहराई जाती रही है।



विभिन्न सरकारी संस्थानों, उपक्रमों, सार्वजनिक कम्पनियों, नवरत्न कम्पनियों से लेकर रेल्वे तक वामपंथी नेता, विदेशी पुस्तकों से एवं विदेशी विचारकों से उधार ले-लेकर भाषण, सिद्धान्त जनता के माथे पर झाड़ते रहे। बात-बात पर हड़ताल, तालाबन्दी, कलमबन्दी, घेराव, प्रदर्शन, तोड़फ़ोड़, नारेबाजी, उकसाना, प्रबन्धन को हड़काना, मजदूर नेताओं(?) द्वारा हाजिरी मस्टर पर हस्ताक्षर करके दिन भर गायब हो जाना, प्रबन्धन को मनचाहा झुकाने के बावजूद ब्लैकमेल करना, अपने-अपने आदमियों को विभिन्न संस्थानों में दबाव से फ़िट करवाना… जैसे कई मार्क्सवादी(?) पुनीत काम पिछले कुछ दशकों से हम देखते आये हैं। उदारीकरण के दौर के बाद, इन लोगों के इसी रवैये की वजह से देश के सार्वजनिक उपक्रम निजी उपक्रमों से टक्कर लेने में कमजोर पड़ने लगे, फ़िर भी ये सुधरे नहीं। देखते-देखते पिछले 20 साल में निजी क्षेत्र तरक्की के नये सोपान चढ़ता गया और कामगारों के हमदर्द कहे जाने वाले वामपंथियों ने सरकारी उपक्रमों की टाँग खींचना जारी रखा।

इनके अधिकतर आंदोलन तनख्वाह बढ़ाने, कर्मचारियों की सुविधाएं बढ़ाने, छुट्टियाँ और भत्ते बढ़वाने तक ही सीमित रहते हैं, बहुत कम आंदोलन ऐसे हुए हैं जिसमें इन्होंने उच्च प्रबन्धन के भ्रष्टाचार को लेकर तालाबन्दी की हो, ऐसा भी कम ही हुआ कि किसी कर्मचारी नेता या संस्थान के कर्मचारियों की काम के प्रति जवाबदेही और उसके कर्तव्यों के निर्वहन में मक्कारी के खिलाफ़ इन्होंने कोई आन्दोलन किया हो… नतीजा ये हुआ कि कई सार्वजनिक उपक्रम पूरी तरह बैठ गये, कुछ बीमार हो गये और कुछ बिकने की कगार पर हैं। इसका सारा दोष वामपंथी हमेशा दूसरी सरकारों पर डालते आये हैं, कि इन्होंने ऐसा नहीं किया इसलिये यह कम्पनी बन्द हो गई या उन्होंने वैसा मैनेजमेण्ट किया इसलिये वह संस्था बरबाद हो गई… तात्पर्य यह कि कामचोरी, मक्कारी, हड़ताल, कर्मचारी यूनियन नेताओं की दादागिरी और कदाचरण तथा कर्मचारियों और मजदूरों को "सिर्फ़ अधिकार-सुविधाएं लेना" के साथ "कर्तव्य नहीं करना" की शिक्षा देना जैसे कामों में इनका कोई दोष नहीं है, सारा दोष दूसरों का ही है (यह इनकी पुरानी आदत रही है)। अपनी असफ़लता को स्वीकार करने में इन्हें हिचक तो होती है, अतः खुलकर कुछ कह नहीं पाते।


इतिहास गवाह है कि हर नये विचार का वामपंथियों ने विरोध किया है, इन्होंने कम्प्यूटर का विरोध किया, उस समय इसके फ़ायदे इन्हें समझ नहीं आये… और अन्त में वामपंथ मुख्यालय में कम्प्यूटर लगाने ही पड़े। ये लोग केरल और बंगाल में हड़तालें करवाते रहे, सरकारी उपक्रमों का भट्टा बैठाते रहे, कार्यसंस्कृति का सत्यानाश करते रहे और इनके पड़ोसी राज्य तेजी से आगे बढते चले गये… अब जाकर इनकी आँख खुली है। इन्होंने ट्रैक्टर का विरोध किया, इन्होंने थ्रेशर का विरोध किया, इन्होंने 10+2 शिक्षा पद्धति का विरोध किया, इन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में निजी भागीदारी का विरोध किया… तात्पर्य यह कि वास्तविकता को स्वीकार करने की बजाय रेत में मुँह दबाये बैठे रहे… फ़िलहाल इनका यही रवैया इस्लामिक उग्रवाद को लेकर है, अभी भी ये समझ नहीं पा रहे हैं कि केरल और बंगाल में मुस्लिम वोटों की खातिर जिस "भस्मासुर" को ये पाल रहे हैं, वह अन्ततः इन्हें ही भस्म करने वाला है…

लेकिन हाल ही में केरल की एक और घटना ने इनके "पाखण्डों के धारावाहिक" का एक और एपीसोड प्रदर्शित किया है। केरल में वामपंथियों का एक "भोंपू" है (भोंपू यानी मुखपत्र अखबार) जिसका नाम है "देशाभिमानी" (नाम ही विचित्र है, क्योंकि इसका नाम तो मार्क्साभिमानी होना चाहिये था)। इस अखबार के विभिन्न दफ़्तरों और संवाददाताओं को BSNL के नेटवर्क (टेलीफ़ोन, मोडम, राऊटर, लीज़ लाइन्स इत्यादि) से जोड़ा गया था। हाल ही में CPM की केन्द्रीय समिति ने इस अखबार से BSNL का ठेका समाप्त करके रिलायंस टेलीकॉम कम्पनी की सेवाएं लेने का फ़ैसला कर लिया है। अब देशाभिमानी अखबार और वेबसाइट से माकपा ने BSNL को बाहर करके रिलायंस का हाई-स्पीड डाटा नेटवर्क ले लिया है। BSNL को माकपा अखबार से बाहर करने का कारण "खराब और गुणवत्ताहीन सेवाएं" बताया गया है। BSNL की धीमी गति, लाइनों में बार-बार खराबी और डाटा नष्ट होने की वजह से परेशान होकर माकपा की केन्द्रीय समिति के सदस्य ईपी जयराजन और समिति के अन्य सदस्यों ने BSNL को बाहर का रास्ता दिखाने का फ़ैसला किया। "…आखिर कब तक हम BSNL को झेलते, उनकी सेवाएं बहुत खराब हैं और ऊपर से उनके बिल भी भारी-भरकम होते हैं…" ऐसा कहना है समिति के सदस्यों का।

BSNL के स्थानीय प्रबन्धन ने इस बात से साफ़ इंकार किया है कि खराब सेवाओं के कारण उन्हें बन्द किया गया है, जबकि BSNL में ही कार्यरत यूनियन (माकपा से जुड़ी) के सदस्य भी इस निर्णय से बेहद शर्मिन्दा और खफ़ा हैं। BSNL एम्पलाइज़ यूनियन के सचिव के. मोहनन कहते हैं, "…हमारा प्रयास हमेशा BSNL की सेवाओं में सुधार का ही होता है, हम अपने सभी मिलने-जुलने वालों को BSNL की सेवाएं लेने हेतु प्रेरित करते हैं, लेकिन देशाभिमानी के इस निर्णय से हमारी स्थिति अजीब हो गई है…"।

उल्लेखनीय है कि CPM और CITU ने BSNL को "निजीकरण से बचाने" के नाम पर जमकर (राजनैतिक और आर्थिक) रोटियाँ सेंकी हैं और UPA पर BSNL को कमजोर करने का आरोप लगाते रहे हैं, परन्तु जब बात खुद पर और "धंधे" पर आई तो BSNL को लात मारने में देर नहीं लगाई। यदि CPM वाले वाकई BSNL को सुधारने के प्रति गम्भीर होते तो अपनी यूनियन के जरिये सेवाओं में सुधार के लिये प्रबन्धन पर दबाव बनाते या फ़िर अपनी यूनियन सदस्यों को अच्छा काम करने को प्रेरित करते, सेवाओं में सुधार के लिये CPM की यूनियनें एक घण्टा अधिक काम करतीं, जो कर्मचारी दोषी या मक्कार है उसे सजा दिलाने के लिये CPM की यूनियन आवाज़ उठाती… ऐसा तो कुछ नहीं किया गया, उलटा BSNL का एक हजारों रुपये मासिक का बड़ा ग्राहक (यानी पार्टी का अखबार) खुद ही तोड़ दिया। ये कैसा मार्क्सवाद है भाई…?

जबकि हकीकत यह है कि यदि BSNL को उचित माहौल, सही प्रबन्धन, नेतागिरी और यूनियनबाजों से से मुक्ति मिल जाये तो रिलायंस, आईडिया, एयरटेल किसी भी औकात नहीं है कि उसके सामने टिक सकें। ऐसे आरोप आम हैं कि निजी कम्पनियों को बढ़ावा देने के लिये BSNL के अफ़सरों ने शुरुआत में जानबूझकर "सिम" को दबाये रखा, उसका ब्लैक होने दिया, जल्दी-जल्दी टावर खड़े नहीं किये… तब मार्क्सवादियों ने इसके खिलाफ़ कोई आंदोलन नहीं किये? निजी कम्पनियाँ ग्रामीण क्षेत्रों में लैण्डलाइन सेवाएं देना नहीं चाहतीं, जबकि BSNL बाज़ार में मौजूद है इसलिये उन पर "कम रेट्स" रखने का दबाव भी है…। क्यों नहीं CPM वाले दूरसंचार मंत्री राजा को उसके भ्रष्टाचार के लिये रगड़ते?

असल में मार्क्सवादी हों, वामपंथी हों, CPM-CPI आदि जैसे जो भी हों, इनके सिद्धान्त सिर्फ़ बघारने के लिये होते हैं, कार्यकर्ताओं को लुभाने और जनता को बरगलाने के लिये होते हैं। माकपा की असली ताकत "गरीबी और बेरोज़गारी" है, इसलिये ये चाहते हैं कि गरीबी बनी रहे…, बेरोज़गार इनके झण्डे उठाते रहें। "विकास" से इनकी दुश्मनी है, क्योंकि जैसे ही उद्योग-धंधे लगेंगे… बाज़ार पनपेगा, क्रय शक्ति बढ़ेगी… गरीब आगे बढ़कर निम्न-मध्यम और मध्यमवर्ग बनेगा… तो सबसे पहले इन्हें ही लात मारेगा। फ़र्जी विदेशी सिद्धान्त झाड़ते-झाड़ते ये लोग यथार्थ से दूर हो गये हैं। सामाजिक सुरक्षा, गरीबी उन्मूलन की सिर्फ़ बातें ही बातें इनसे करवा लो… जबकि "सरकारी एजेंसी द्वारा" करवाये गये सर्वे में यह बात सिद्ध हुई है कि गरीबों के लिये चलाये जाने वाले "बीस सूत्री कार्यक्रम" का सबसे सफ़ल क्रियान्वयन भाजपा शासित गुजरात (क्रमांक 1) और कर्नाटक (क्रमांक 2) राज्यों में हुआ है, जबकि केरल का नम्बर पाँचवा और बंगाल का 14वां है…। अब बताईये, क्या फ़ायदा हुआ एक ही राज्य में 30 साल शासन करने का और गरीबी-गरीबी भजने का? लेकिन फ़िर भी न तो ये सुधरेंगे, न ही झूठे सिद्धान्त बघारना छोड़ेंगे, न ही जनता की आमदनी बढ़ाने और विकास करने के लिये कुछ करेंगे…।
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विशेष टीप -
1) इतने सालों तक सड़कों पर "संघर्ष"(?) करने के बावजूद वामपंथी लोग बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कुछ नहीं उखाड़ पाये, लेकिन जब अकेले रामदेव बाबा ने अपने योग के प्रचार के जरिये इन शीतल पेय, जंक फ़ूड, दवा आदि कम्पनियों को अरबों रुपये का नुकसान करवा दिया तब भी इनके पेट में दर्द हो रहा है और ये रामदेव बाबा की आलोचना में लग गये हैं… कारण एक ही है कि रामदेव बाबा भारतीय संस्कृति की बात करते हैं तथा "भगवा" वस्त्र पहनते हैं…। इसी पाखण्ड की वजह से वामपंथ तेजी से अपना जनाधार खोता जा रहा है…

2) अन्त में एक आसान सा सवाल - खबर है कि बिल क्लिंटन और जॉर्ज बुश की भारत यात्रा के दौरान जमकर विरोध करने वाले वामपंथी, ओबामा का बहिष्कार भी नहीं करेंगे और संसद में ओबामा के भाषण को सुनेंगे भी… बताईये ऐसा क्यों? जी हाँ, सही समझे आप… ओबामा के नाम में "हुसैन" शब्द जो आता है। स्वाभाविक है कि भारतीय संस्कृति को भले ही ये लोग जब-तब ईंट मारते रहें, लेकिन "हुसैन" से इनका "प्यार और दुलार" जगज़ाहिर है, फ़िर जल्दी ही केरल और बंगाल में विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं… ऐसे में "हुसैन" शब्द जहाँ भी दिखेगा, सारे वामपंथी जीभ लपलपाते हुए उधर दौड़े चले जायेंगे…

लेख का सन्दर्भ :- http://expressbuzz.com/cities/thiruvananthapuram/deshabhimani-dumps-bsnl-prefers-reliance/216340.html


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