सर्वोच्च न्यायालय के कुछ जजों की संदिग्ध करतूतें… (भाग-2)... Corruption in Indian Judiciary System (Part-2)

Written by गुरुवार, 11 नवम्बर 2010 11:39
(भाग-1 में हमने सर्वोच्च न्यायालय के कुछ जजों के संदिग्ध आचरण के बारे में देखा था (यहाँ क्लिक करके पढ़ें), पेश है उसी की दूसरी और अन्तिम कड़ी…)

5) जस्टिस एएस आनन्द (10.10.1998 - 01.11.2001)


जस्टिस पुंछी महाशय की तरह ही जस्टिस आनन्द का कार्यकाल भी विवादों और विभिन्न संदिग्ध निर्णयों से भरा रहा। इन साहब के खिलाफ़ भी राष्ट्रपति से महाभियोग चलाने की अनुमाति ली गई थी और विभिन्न आरोप तय किये गये थे।

(अ) जब ये सज्जन जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे उस समय कृष्ण कुमार आमला नामक उद्योगपति के केस की सुनवाई करते रहे और उसके पक्ष में निर्णय भी दिया, जबकि गांदरबल में नहर के किनारे ज़मीन के दो बड़े-बड़े प्लॉट आमला ने जस्टिस आनन्द के नाम कर दिये थे।

(ब) जस्टिस आनन्द ने जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीश रहते काफ़ी बड़ी कृषि भूमि पर कब्जा जमाये रखा, जबकि यह ज़मीन जम्मू-कश्मीर कृषि सुधार कानून 1976 के अनुसार राज्य सरकार के कब्जे में होनी चाहिए थी।

जस्टिस आनन्द के खिलाफ़ कई पक्के सबूत होने के बावजूद महाभियोग अपील पर हस्ताक्षर करने लायक सांसदों की पर्याप्त संख्या नहीं मिल पाई, क्योंकि लगभग सभी पार्टियों के नेता इस बात से भयभीत थे कि जस्टिस आनन्द की अदालत में चल रहे उनके और उनकी पार्टियों से सम्बन्धित मुकदमों का क्या होगा, जब आनन्द को पता चलेगा कि उनके खिलाफ़ किस-किस सांसद ने हस्ताक्षर किये हैं। सो आनन्द साहब का कुछ नहीं बिगड़ा…

6) जस्टिस वायके सभरवाल (01.11.2005 - 14.01.2007)


दिल्ली में "सीलिंग एक्ट" के सम्बन्ध में धड़ाधड़ आदेश और निर्देश जारी करने वाले सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सभरवाल के खिलाफ़ भी न्यायिक जिम्मेदारी समिति ने कई गम्भीर आरोप लगाये हैं जिनकी जाँच होना आवश्यक है। दिल्ली के रिहायशी इलाकों में चल रहे व्यावसायिक संस्थानों को बन्द करके सील लगाने सम्बन्धी इनके आदेश बहुचर्चित हुए। इस आदेश की वजह से छोटे दुकानदारों और एक-दो कमरों में अपने दफ़्तर चलाने वाले छोटे संस्थानों पर रातोंरात ताले डलवा दिये गये और उन्हें सील कर दिया गया। इस वजह से इन लोगों को अपना धंधा सुचारु रुप से जारी रखने के लिये बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल्स और व्यावसायिक कॉम्पलेक्स में अपनी दुकानें और ऑफ़िस खरीदने या किराये पर लेने पड़े, जिसके कारण दिल्ली के बड़े-बड़े डेवलपर्स और बिल्डर्स के भाव ताबड़तोड़ बढ़ गए तथा मुख्य बाज़ारों में व्यावसायिक प्रापर्टी की कीमतें आसमान छूने लगीं। इसके पीछे की कहानी का खुलासा बाद में तब हुआ जब पता चला कि सभरवाल साहब के दोनों बेटे (चेतन और नितिन सभरवाल) शॉपिंग मॉल्स और कमर्शियल कॉम्पलेक्स के बड़े निर्माताओं के न सिर्फ़ सम्पर्क में थे, बल्कि कुछ बिल्डर फ़र्मों में उनकी पार्टनरशिप भी थी… (यहाँ देखें…)। जिन व्यापारियों का टर्नओवर 2 करोड़ से कम था उन्हें सभरवाल साहब ने अपने आदेशों से मजबूर कर दिया कि वे महारानीबाग और सिकन्दर रोड पर 15-20 करोड़ की प्रापर्टी खरीदें। इस तरह उन्होंने कुछ ही महीनों में उनके बेटों ने करोड़ों रुपये की सम्पत्ति खड़ी कर ली। बेशर्मी की इन्तेहा यह भी थी कि उनके बेटों की फ़र्मों के ऑफ़िस का पता भी सभरवाल साहब का सरकारी आवास ही दर्शाया जाता रहा। इसी प्रकार अमर सिंह टेप काण्ड की सुनवाई के समय ही अचानक उनके पुत्रों को उतरप्रदेश सरकार द्वारा नोएडा में बेशकीमती ज़मीन अलॉट की गई। "विशेषाधिकार प्राप्त" वीवीआईपी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश महोदय के खिलाफ़ अभी तक प्रशासनिक मशीनरी में एक पत्ता भी नहीं खड़का है…

यह तो हुई सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की बात, जिसे प्रशान्त भूषण जैसे धुन के पक्के व्यक्ति ने उजागर करने और उसके खिलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत की, लेकिन इससे पहले भी कई मामले ऐसे सामने आ चुके हैं जिसमें "माननीय"(?) न्यायाधीश महोदय के पद पर बैठे महानुभावों ने अपना हाथ "काला-पीला" किया है…

1) बच्चों को नकल नहीं करने की नसीहत देने वाले और नकल के केस बनने पर जुर्माना और रेस्टीकेशन करने वाले जज महोदय खुद परीक्षा में नकल करते पकड़ाये गये… http://www.dailypioneer.com/278780/5-AP-judges-suspended-for-cheating-exams.html

2) जस्टिस सेन द्वारा अपने बंगले के रखरखाव और फ़र्नीचर पर 33 लाख रुपये का बेतुका खर्चा किया गया… http://www.dailypioneer.com/270092/Justice-Sen-misappropriated-funds-RS-probe-panel-told.html
(ताज़ा खबर यह है कि जस्टिस सेन के खिलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव को उपराष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी है)

3) कई न्यायाधीश ऐसे "भाग्यशाली" रहे हैं कि सरकारी नौकरी से रिटायर होने के "अगले दिन ही" उन्हें बेहद महत्वपूर्ण पद मिल गया (ज़ाहिर है कि उनकी "प्रतिभा" के बल पर) - जैसे कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस एचके सेमा ने अपने कार्यकाल के अन्तिम दिनों में अम्बेडकर पार्क के निर्माण कार्य पर लगी रोक हटाने में मायावती की "मदद" की तो वे तड़ से उप्र राज्य के मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष बना दिये गये। फ़िर इन माननीय को ज्यादा तकलीफ़ न हो इसलिये मानवाधिकार आयोग का कार्यालय भी उठाकर नोएडा में खोल दिया गया, क्योंकि "माननीय" दिल्ली में रहते हैं।



4) जस्टिस यूसी बनर्जी जिन्हें NDA सरकार ने अप्रत्यक्ष कर बोर्ड के अध्यक्ष पद पर बैठाने से मना कर दिया था, उन्हें UPA सरकार के "मैनेजमेंट के धनी और सबसे प्रतिभाशाली"(?) मंत्री लालू यादव ने गोधरा काण्ड की जाँच आयोग का अध्यक्ष बना दिया। इस "अहसान" का बदला बनर्जी साहब ने लालूप्रसाद यादव की मनमर्जी की रिपोर्ट बनाकर दिया, यानी कि गोधरा में आग डिब्बे के अन्दर से लगाई गई थी, न कि बाहर से।


5) जस्टिस अरिजीत पसायत जिन्होंने अहसान जाफ़री केस दोबारा खोलने और मोदी को फ़ाँसने वाले SIT की तारीफ़ करने का काम किया था उन्हें "अपीलेट अथॉरिटी" के पद से नवाज़ा गया।

6) सोहराबुद्दीन केस में गुजरात सरकार की खिंचाई करने वाले जस्टिस तरुण चटर्जी साहब को रिटायरमेण्ट के अगले दिन अरुणाचल/असम के सीमा प्रदेशों के विवाद में मध्यस्थ हेतु नियुक्त किया गया। हालांकि तरुण चटर्जी साहब PF घोटाले में उनकी संदिग्ध भूमिका के लिये अभी भी जाँच के घेरे में हैं।

7) जस्टिस एआर लक्षमणन जिन्होंने मुलायम सिंह को सीबीआई के घेरे में लिया, सेवानिवृत्ति के बाद तड़ से लॉ कमीशन के चेयरमैन बना दिये गये।


8) चेन्नई के जस्टिस दिनाकरन तो मानो "भूमिपुत्र" ही हैं, उन्हें ज़मीन से विशेष प्रेम है… चेन्नई कलेक्टर ने उनकी ज़मीनों की एक पूरी लिस्ट जारी की है… यहाँ देखें…http://www.hindu.com/2009/11/13/stories/2009111355421300.htm

लेकिन न तो आज तक किसी भी मुख्य न्यायाधीश और उनके परिजनों की सम्पत्ति की जाँच कभी भी केन्द्रीय सतर्कता आयोग या सीबीआई द्वारा नहीं की गई… ज़ाहिर है कि इन महानुभावों के पास आलोचकों के लिये "न्यायालय की अवमानना" नामक घातक हथियार तथा सरकार और राष्ट्रपति का विशेष कानून रुपी रक्षा-कवच मौजूद है।

किसी राजनैतिक भ्रष्ट को आप और हम मिलकर कभीकभार वोट के जरिये 5 साल में ही बाहर का रास्ता दिखा देते हैं, लेकिन IAS-IPS-IFS जैसे उच्चाधिकारी और न्यायिक सेवा के इन "माननीय महानुभावों" का आप क्या कीजियेगा… वरिष्ठ वकील प्रशान्त भूषण जी द्वारा दायर हलफ़नामे में सरकार से इन भ्रष्ट जजों के खिलाफ़ जाँच शुरु करने की माँग की गई है।

जजों की सम्पत्ति घोषित करना इस लड़ाई में छोटी सी, लेकिन पहली जीत है… न्यायाधीशों को सूचना के अधिकार कानून में शामिल करने को लेकर हीलेहवाले और टालमटोल किये जा रहे हैं, लेकिन यह भी होकर रहेगा… फ़िर सबसे अन्त में नम्बर आयेगा "माननीयों" के खिलाफ़ मुकदमे दायर करने का…। जिस तरह से सेना में भ्रष्टाचार को "राष्ट्रीय सुरक्षा" के नाम पर अधिक दिनों तक छिपाया नहीं जा सकता उसी तरह न्यायिक क्षेत्र को भी "अवमानना" और "विशेषाधिकार" के नाम पर अधिक दिनों तक परदे के पीछे नहीं रखा जा सकेगा…। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा हाल ही में जारी भ्रष्ट देशों की सूची में भारत और नीचे खिसक गया है… पर हमें शर्म नहीं आती।

यह लेख आम जनता की जानकारी हेतु जनहित में प्रस्तुत किया गया -

(डिस्क्लेमर - प्रस्तुत जानकारियाँ विभिन्न वेबसाईटों एवं प्रशान्त भूषण/शान्ति भूषण जी के एफ़िडेविट पर आधारित हैं, यदि इनसे किसी भी "माननीय" न्यायालय की अवमानना होती हो, तो "आधिकारिक आपत्ति" दर्ज करवायें… सामग्री हटा ली जायेगी…)

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I am a Blogger, Freelancer and Content writer since 2006. I have been working as journalist from 1992 to 2004 with various Hindi Newspapers. After 2006, I became blogger and freelancer. I have published over 700 articles on this blog and about 300 articles in various magazines, published at Delhi and Mumbai. 


I am a Cyber Cafe owner by occupation and residing at Ujjain (MP) INDIA. I am a English to Hindi and Marathi to Hindi translator also. I have translated Dr. Rajiv Malhotra (US) book named "Being Different" as "विभिन्नता" in Hindi with many websites of Hindi and Marathi and Few articles. 

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