पहले आप ये बयान पढ़िए... फिर बताता हूँ कि यह किसने कहा?? -- “....हमें बंगाल पैटर्न पर अपने विरोधियों की हत्याएँ करनी चाहिए, जैसी हत्याएँ आप लोग केरल में करते हो उससे मीडिया में हंगामा ज्यादा होता है, और विपक्षियों को भी मौका मिलता है. केरल में आप लोग खूनखराबा बहुत करते हो.

उत्तरप्रदेश के विस्मयकारी, अप्रत्याशित और राजनैतिक भूकंप लाने वाले परिणाम आए. खुद भाजपा के कट्टर समर्थकों को भी यह उम्मीद नहीं थी कि भाजपा को यूपी में तीन सौ से अधिक सीटें मिलेंगी.

भाग - १ :- पंजाब और गोवा... 

आख़िरकार 11 मार्च 2017 का वह दिन आ ही गया, जिसका केवल भारत ही नहीं विदेशों में भी बेसब्री से इंतज़ार किया जा रहा था. देश में तो खैर बेचैनी थी ही, विदेशों में भी इन चुनाव परिणामों को लेकर कम बेचैनी नहीं थी.

पाकिस्तान में पैदा हुई पैंतीस वर्षीय एक औरत ताहिरा मकबूल ने अपने जीवन में पहली बार मतदान किया, वो भी भारत में. आप सोच रहे होंगे, इसमें हैरान करने वाली क्या बात है?? बात यह है कि ताहिरा मकबूल एक "अहमदिया मुसलमान" हैं.

भारत शासन की ओपन डोर पॉलिसी के अंतर्गत सन् 1962 में श्री वैष्णव पोलिटेक्निक महाविद्यालय, इन्दौर की स्थापना की गई थी. इस संस्था को 17.02 एकड भूमि शहर के पश्चिमी भाग में प्राइम लोकेशन पर (एम.ओ.जी.लाईन्स, महू नाका, इन्दौर) में शासन द्वारा लीज पर “केवल शैक्षणिक उपयोग हेतु” (और केवल पोलिटेक्निक हेतु) दी गई है।

पश्चिम बंगाल में जिस तरह से वामपंथ के भूतपूर्व और TMC के वर्तमान गुण्डे, अपने मुल्ले वोटर्स के साथ मिलकर पिछले तीस-पैंतीस वर्षों से हिन्दुओं पर लगातार अत्याचार और दमन बरपाए हुए हैं, उसे देखते हुए इस खबर को एक सकारात्मक शुरुआत या “पहली अच्छी खबर” माना जा सकता है.

इस पुरे विश्व में लगभग 200 देश हैं, जिनमे अपना अपना संविधान और अपने नियम कानून लागू है, और अलग शासन प्रणाली है और कुछ इस्लामी देश हैं, लेकिन कुछ ऐसे गैर मुस्लिम देश भी हैं जहाँ मुसलमानों की अच्छी खासी जनसंख्या मौजूद है।

पश्चिम बंगाल एक बेहद गंभीर मोड़ पर पहुँच चुका है, और यदि जल्दी ही कुछ न किया गया तो इसे “इस्लामिक बांग्लादेश” में बदलते देर नहीं लगेगी.

पिछले दस वर्ष के लेख गवाह हैं कि पश्चिम बंगाल के बारे में कई राष्ट्रवादी ब्लॉगर्स चेतावनियाँ जारी करते रहे, बंगाल के वामपंथी शासन में बढ़ते इस्लामी मुल्लावाद के खिलाफ जनजागरण करते रहे, सरकारों से अपीलें करते रहे, लेकिन किसी पर कोई असर नहीं हुआ.

वह 1 फरवरी 1948 का दिन था. गांधी का वध हुए दो ही दिन हुए थे. हवाओं में कुछ बेचैनी और माहौल में कुछ उदासी थी. सुबह स्कूल जाते समय कुछ ब्राह्मण बच्चों ने गलियों के कोने में खड़े कुछ लोगों कानाफूसियाँ सुनी थीं

पृष्ठ 1 का 63
न्यूज़ लैटर के लिए साइन अप करें